सोमवार, 22 जनवरी 2018

राक्षसों को महाभारत में धर्मज्ञ कहा है । अवध्यां स्त्रियमित्याहुर्धर्मज्ञा धर्म निश्चये । धर्मज्ञान् राक्षसान् आहु: हन्यात् स च मामपि।३१।।


राक्षसों को महाभारत में धर्मज्ञ कहा है ।
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राक्षस शब्द का अर्थ संस्कृत भाषा में होता है ।
धर्म की रक्षा करने वाला धर्मस्य रक्षयति इति "राक्षस रक्षस् एव स्वार्थे अण् ।
“क्वचित् स्वार्थिका अपि प्रत्ययाः प्रकृतितो लिङ्गवचनान्यतिवर्त्तन्ते”
अवध्यां स्त्रियमित्याहुर्धर्मज्ञा धर्म निश्चये ।
धर्मज्ञान् राक्षसान् आहु: हन्यात् स च मामपि।३१।।
अर्थात् धर्म को जानने वाले राक्षस धर्म निर्धारण में स्त्रीयों को अवध्य ( न मारने योग्य ) कहते हैं ।
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राक्षसों को महाभारत में धर्मज्ञ कहा है । और असुर को वेदों में श्रेष्ठ कोटि का  व्यक्ति भी ।

यह बात सत्य है परन्तु  व्यभिचारी ब्राह्मणों ने सत्य को छिपाने की असफल चेष्टा की है ।

स्वयं वाल्मीकि-रामायण में और पुराणों में शराब पीने वाले सुर अर्थात् देवता हैं । और शराब न पीने बाले असुर !
और देवताओं की अय्यशी पुराणों में वर्णित है ही ।
कि किस प्रकार इन्द्र आदि देवता व्यभिचार करते हैं ।

पहले हम देखें--- महाभारत में राक्षसों को धर्म वेत्ता और पुण्यजन कहाँ और क्यों कहा गया है ।⏬
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अवध्यां स्त्रियमित्याहुर्धर्मज्ञा धर्म निश्चये ।
धर्मज्ञान् राक्षसाहुर्नहन्यात् स च मामपि।३१।।
धर्मज्ञ विद्वानों ने धर्म निर्णय के प्रसंग में नारीयों को अवध्या बताया ।
राक्षसों को भी लोग धर्मज्ञ कहते हैं।
इस लिए सम्भव है ; कि राक्षस भी मुझे स्त्री समझ कर न मारे ।३१।।
उपर्युक्त श्लोक
महाभारत आदि पर्व के बकवध नामक उप पर्व का 157 वाँ अध्याय है ।

संस्कृत कोश कारों ने पुण्यजन शब्द की गलत व्युत्पत्ति-की है।
ताकि साधारण जनता इसके उच्च अर्थ को न जान पाए
क्यों पुण्यजन राक्षस का विशेषण है ।

(पुण्यः विरुद्धलक्षणया पापी चासौ जनश्चेति 
अर्थात् जो पुण्य के विरुद्ध लक्षण वाला पापी है वह जन " इस प्रकार व्याख्याऐं की परन्तु ये व्याख्या पूर्ण असंगत व व्युत्पत्ति विज्ञान के नियमों के विरुद्ध हैं )
पुण्यजन शब्द की सही व्युत्पत्ति इस प्रकार है ।👇

पुण्यानि कार्याणि येभि: कारयन्ते जना: इति  पुण्यजना: अर्थात् जिनके द्वारा पुण्यकार्य किये जाने हैं वे जन पुण्यजन कहेजाते हैं ।

राक्षसः का अर्थ भी धर्म रक्षकों से है ।
तो फिर भक्षक
को राक्षस कहना अनर्थ ही है ।

वत्स वैश्रवण कृत्वा यक्षै: पुण्यजनैस्तदा ।
दोग्धा रचतनामस्तु पिता मणिवरस्त य: ।।३३।(हरिवंशपुराण नवम अध्याय " वेन का विनाश और पृथु का जन्म )
अर्थात्‌ इसके बाद पुण्यजन और यक्षों ने मृतक के कपाल में रुधिर रूप का दोहन किया।
उस समय सुमाली बछड़ा और रजतनाम दोग्धा हुआ।
ये वर्णन काल्पनिक रूप से रक्षसों को गलत दर्शाने के लिए पुराणों में किये गये ।

शब्द  स्वयं ही अपना इतिहास कह रहा है।

परन्तु पुण्यजन का अर्थ होना चाहिए पुण्य करने वाला जन अर्थात् धर्मात्मा ।

वैसे भी पुष्यमित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मणों ने द्वेष वश विपरीत अर्थ ही किए ।

इस परम्पराओं में सम्मिलित हैं पुष्यमित्र सुंग के विधानों का प्रकाशन करने वाले ब्राह्मण ।
जिनके महान अर्थों का अनर्थ किया गया ऐसे बहुत से शब्द हैं :- दो चार शब्दों के उदाहरण- नीचे देखें---👇

बुद्ध से बुद्धू बना देना ।
पाषं बन्धनं षण्डयति खण्डयति इति पाषण्ड से पाखण्ड वना देना ।
निर्ग्रन्थ: से नाखन्दा ।
चोल अथवा कोल से चोर आदि .... ।
अमर कोश वाचस्पत्यम् कोश आदि में भी व्युत्पत्तियाँ संदिग्ध ही है ।जैसे

। १।१।६३ ॥  यक्षः--- यज् धातु से व्युत्पन्न होना चाहिए है ।
अर्थात यज्ञ करने वाला ।
परन्तु यक्ष को पिशाच और अनिष्ट कर माना ।

परन्तु बुद्ध के परवर्ती काल खण्ड में सृजित पुराण विष्णु पुराण के पञ्चम् अध्याय के श्लोक संख्या ।43। में
ब्रह्मा ने अन्धकार में स्थित होकर  क्षुधा (भूख) ग्रसित -सृष्टि की रचना की  उनमें बड़े कुरूप और दाढ़ी मूँछ वाले व्यक्ति उत्पन्न हुए ;
वे स्वयं ब्रह्मा जी की ओर उन्हें खाने के लिए दौड़े ।42।

उनमें से जिन्होंने यह कहा कि  " ऐसा मत करो " 'इनकी रक्षा करो ' वे राक्षस कहलाए और जिन्होंने यह कहा कि हम  इन्हें खाएेंगे वे खाने की वासना वाले होने से यक्ष कहलाए ।।
अब यज् धातु का अर्थ यज्ञकरना तो है खाना कैसे हो गया।👇
मैवं भो रक्ष्यतामेष यैरुक्तं राक्षसास्तु ते ।
ऊचु: खादाम इत्यन्ये ये  ते यक्षास्तु जक्षणात् ।43।

वस्तुत यह व्युत्पत्ति- काल्पनिक रूप से ही है ।
और मिथ्या भी क्यों कि यक्ष शब्द यज् धातु मूलक है न कि  भक्ष् धातु मूलक ।

परन्तु पुराणों में राक्षसों तथा यक्षों को अधर्मी और यज्ञ विध्वंसक वर्णित किया गया है।
यह तो दौनों शब्दों के विपरीत व्युत्पत्ति अर्थ है ।

(यथा    हरिवंशपुराण में कहा ) अध्याय  २ । २६ ।
“ सर्पैः पुण्यजनैश्चैव वीरुद्भिः पर्व्वतैस्तथा ॥
“  पुण्याश्रितो जनः )
सर्प और पुण्यजन पर्वतों के द्वारा घिर गये ।

सर्प एक जन जाति का नाम हैं ---जो  अंग्रेज़ी भाषा में Serf  (दास) के अर्थ में है ।

अमरकोश तथा मेदिनी कोश में पुण्यजन का अर्थ सज्जन भी किया है ।
सज्जनः ।  इति मेदिनी ।  १६८ ॥
अब असुर शब्द भी वेदों में पूज्य तथा शक्ति सम्पन्नता का वाचक है।जैसे नीचे दर्शाया गया है ।

आदिष्ठन्तं परि विश्वे अभूषञ्छियो वसानश्चरति स्वरोचि:।
महत् तद् वृष्णो असुरस्य ।
विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ।।४।ऋ०१/३८/४

सभी मेधावी जनों ने रथ में विराजमान इन्द्र को सजाया।
अपने तेज से ही तेजवान इन्द्र प्रकाशित हुए सुस्थित हैं
कामनाओं की वर्षा करने वाले इन्द्र विचित्र कीर्ति वाले । ये विश्व रूप को धारण करते हैं ;
तथा अमृत से व्याप्त हैं ।
और भी देखें--- असुर शब्द को अर्थ नीचे 👇

इमे भोज अंगिरसो विरूपा
दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीरा:
विश्वमित्राय ददतो मघानि सहस्र
सावे प्र तिरन्त आयु:। ७।। (ऋग्वेद १/५३/७ )

हे इन्द्र ! ये सुदास और 'ओज' राजा की और से यज्ञ करते हैं । यह अंगिरा मेधातिथि और विविध रूप वाले हैं। देवताओं में बलिष्ठ (असुर) रूद्रोत्पन्न मरुद्गण अश्व मेध यज्ञ में मुझ विश्वामित्र को महान धन दें !
और अन्न बढ़ावें। ऋग्वेद १/५३/७ )

उषसा पूर्वा अध यद्व्यूषुर्महद वि जज्ञे अक्षरं पदे गो:
व्रता देवानामुप नु प्रभूषन् महद्
देवानाम् असुरत्वम् एकम् ।। (ऋ० १/५५/१ )

तथा मोषुणो अन्न जुहुरन्त देवा मा पूर्वज अग्ने पितर :पदज्ञा ।
पुराण्यो: सझ्ननो : केतुरन्तर्महद् देवानाम्
असुरत्वम् एकम् ।।२। (ऋ० १/५५/२/)

हे अग्ने ! देव गण हमारा विनाश न करें;
देवत्व प्राप्त पितर गण  हमको न मारे ।
यज्ञ की प्रेरणा देने वाले सूर्य आकाश पृथ्वी के मध्य उदित होते हैं ।
वे हमारी हिंसा न करें । उन सब महान देवताओं का बल एक ही है ।(ऋ० १/५५/२/)
यहाँ असुरत्व बल तथा तेज का वाचक है ।

तद् देवस्य सवितुर्वीर्यं महद् वृणीमहे असुरस्य प्रचेतस: ।
(ऋग्वेद - ४/५३/१ )
हम उस प्रचेतस असुर अर्थात् वरुण जो सबको जन्म देने वाला है ; उसका ही हम वरण करते हैं ।- ४/५३/१ )

अनस्वन्ता सत्पतिर्मामहे मे गावा चेतिष्ठो असुरो मघोन ।
हे मनुष्यों में अग्र पुरुष अग्ने !
तुम सज्जनों के पालन कर्ता , ज्ञानवान , बलवान तथा ऐश्वर्यवान हो ।

यहाँ अग्नि को असुर कहा गया है ।
इसके अतिरिक्त बौद्ध काल में रचित महाभारत आदि में भी असुरों की प्रशंसा हुई है। देखें 👇

तथासुरा गिरिभिरदीन चेतसो मुहुर्मुह:
सुरगणमादर्ययंस्तदा
महाबला विकसित मेघ वर्चस:
सहस्राशो गगनमभिप्रपद्य ह ।।२५।

(महाभारत आदि पर्व आस्तीक पर्व १८वाँ अध्याय)
इसी प्रकार उदार और उत्साह से भरे हुए हृदय वाले  महाबला असुर भी जल रहित बादलों के समान श्वेत रंग के दिखाई देते थे।
उस समय हजारों 'की संख्या में-- उड़ उड़ कर  देवों को पीड़ित करने लगे ।२५

असुर शब्द ईरानी धर्म-ग्रन्थ अवेस्ता ए झन्द में अहुर
उनके ख़ुदा का वाचक है- अर्थात् अहुर-मज्द़ा।
वैदिक रूप असुर - महत् !
अवेस्ता ए झन्द में देव का रूप दएव (देव) है ।
जिसका अर्थ है दुष्ट , कामी , धूर्त ।

राक्षस शब्द का ही अर्थ धर्म का रक्षण करने वाला ।
ज्ञात करना चाहिए कि ब्राह्मणों ने द्वेष राक्षस जनों का नकारात्मक वर्णन क्यों किया ।

असुर संस्कृति मैसॉपोटमिया (ईराक-ईरान ) की संस्कृति में  अपने क्रूर अनुशासन के लिए प्रसिद्ध थी ।
केवल इतना ही पूर्वाग्रह शासन के प्रतिष्ठित था ।
फिर तो परवर्ती काल में प्रतिद्वन्द्वीयों की लेखनी ने उन्हें नकारात्मक अर्थ में रूढ़ ही कर दिया ।

वाल्मीकि-रामायण में असुर की उत्पत्ति का उल्लेख :-इस प्रकार है 👇
वाल्मीकि रामायण कार ने वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में )
सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है-

“सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l” 👇
सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:. अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥
(वाल्मीकि रामायणबालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द)

उक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है। चूंकि देव लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे।
इस कारण आर्यों के कथित देव (देवता) सुर कहलाये और सुरा का पान नहीं करने वाले इनके विरोधी असुर (जिन्हें देव संस्कृति के अनुयायीयों द्वारा अदेव कहा गया) कहलाये.।
जबकि इसके उलटे यदि देव-संस्कृति के अनुयायीयों द्वारा रचित वेदों में उल्लिखित सन्दर्भों पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि देव संस्कृति के अनुयायी आर्यों के आगमन से पूर्व तक यहाँं के मूल निवासियों द्वारा ‘असुर’ शब्द को विशिष्ठ सम्मान सूचक अर्थ में विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता था।
क्योंकि संस्कृत में असुर को सन्धि विच्छेद करके ‘असु+र’ दो हिस्सों में विभाजित किया है ।

और ‘असु’ का अर्थ ‘प्राण’ तथा ‘र’ का अर्थ ‘वाला’-‘प्राणवाला’ दर्शाया गया है ।
असु प्राणं राति ददाति इति असुर ..

एक अन्य स्थान पर असुनीति का अर्थ प्राणनीति बताया गया है।
ॠग्वेद में (10.59.56) भी इसकी पुष्टि की गयी है. इस प्रकार प्रारम्भिक काल में ‘असुर’ का भावार्थ ‘प्राणवान’ और ‘शक्तिशाली’ के रूप में दर्शाया गया है।


ॠग्वेद के अनुसार असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति के बारे में यह माना जाता जात था कि वह रहस्यमयी गुणों से युक्त व्यक्ति है।
महाभारत सहित अन्य प्रचलित कथाओं में भी असुरों के विशिष्ट गुणों पर प्रकाश डालते हुए उन्हें मानवों में श्रेृष्ठ कोटि के विद्याधरों में शामिल किया गया है.।

मगर कालान्तर में देव-संस्कृति के अनुयायी आर्यों और असुर संस्कृति के अनुयायी  आर्यों ( यौद्धा) के मध्य चले संघर्ष में आर्यों देव-संस्कृति के अनुयायीयों की लगातार हार होती गयी और असुर जीतते गये. आर्य देव-संस्कृति के अनुयायी लगातार असुर संस्कृति के
अनुयायीयो के समक्ष अपमानित और पराजित होते गये.

इस कुण्ठा के चलते सुरों अर्थात सुरा का पान करने वालों के दुश्मन के रूप में सुरों के दुश्मनों को ‘असुर’ कहकर सम्बोधित किया गया.

आर्यों के कथित देवताओं को ‘सुर’ लिखा गया है और उनकी हाँ में हाँ नहीं मिलाने वाले या उनके दुश्मनों को ‘असुर’ कहा गया. ।

इस प्रकार यहॉं पर आर्यों ने असुर का दूसरा अर्थ यह दिया कि जो सुर (देवता) नहीं है, या जो सुरा (शराब) का सेवन नहीं करता है-वो असुर है.

लेकिन इसके बाद में ब्राह्मणों द्वारा रचित कथित संस्कृत धर्म ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव को समानार्थी के रूप में उपयोग किया गया है.

जबकि ऐसा उल्लेख मिलता है ।
कि प्रारम्भ में ‘दैत्य’ और ‘दानव’ असुर जाति के दो विभाग थे. क्योंकि असुर जाति के दिति के पुत्र ‘दैत्य’ और दनु के पुत्र ‘दानव’ कहलाये.
जो आगे चलकर दैत्य, दैतेय, दनुज, इन्द्रारि, दानव, शुक्रशिष्य, दितिसुत, दूर्वदेव, सुरद्विट्, देवरिपु, देवारि आदि नामों से जाने गये. जहॉं तक राक्षस शब्द की उत्पत्ति का प्रश्न है तो आचार्य चुतरसेन द्वारा लिखित महानतम ऐैतिहासिक औपन्यासिक कृति
‘वयं रक्षाम:’ और उसके खण्ड दो में प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों पर गौर करें तो देवों के आक्रमणों से अपने कबीलों की सुरक्षा के लिये भारत के मूल निवासियों द्वारा हर एक कबीले में बलिष्ठ यौद्धाओं को वहॉं के निवासियों को ‘रक्षकों’ के रूप में नियुक्ति किया गया. ।
‘रक्षक समूह’ को ‘रक्षक दल’ कहा गया और रक्षकों पर निर्भर अनार्यों की संस्कृति को ‘रक्ष संस्कृति’ का नाम दिया गया. यही रक्ष संस्कृति कालान्तर में आर्यों द्वारा ‘रक्ष संस्कृति’ से ‘राक्षस प्रजाति’ बना दी गयी.
ये धर्म के नियमों की रक्षाम करते इस लिए राक्षस कहलाए।

वाल्मीकि रामायण
बालकाण्ड का पैतालीसवां सर्ग श्लोक संख्या ३६ से ३८ प्रसंग
( समुद्र मंथन.)
विश्वामित्र राम लक्ष्मण को कुछ वेद पुराण सुना रहे हैं और उसी के तहत समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों के बारे बताते हुए कहते हैं 👇
....
असुरास्तेंन दैतेयाः   सुरास्तेनादितेह सुताः
हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन वारुणीग्रह्नात सुराः (३८)

('सुरा से रहित होने के कारण ही दैत्य 'असुर ' कहलाये
और सुरा-सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों की 'सुर' संज्ञा हुई.

वारुणी को ग्रहण करने से देवतालोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनंदमग्न हो गए )
इसके पहले और बाद के दो श्लोकों में समुद्र  मन्थन से वरुण की कन्या वारुणी "जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी"
के प्रकट होने और दैत्यों द्वारा उसे ग्रहण न करने और देवों द्वारा इन अनिनद्य सुन्दरी को ग्रहण करने का उल्लेख है....
तो अब हमें कोई रोके टोके न..... हम सुर हैं,देवता है और  धरती के सुर -भूसुर अर्थात ब्राह्मण तो बेरोक टोक सुरापान करे -हमारा शास्त्र  इसकी खुली  अनुमति देता है
सत्य पूछा जाय तो सुर जन-जाति जर्मनिक शाखा के रूप में उत्तरी जर्मन- में स्वीडन में रहती थी ।
--जो शराब पीने को आौषधि के तुल्य समझते थे ।

.यह वृत्तांत भी सन्दर्भित किया जाता है -बिना पढ़े मत कहीं और जाईयेगा.

वेदों में असुर शब्द का अर्थ :--- उरुं यज्ञाय चक्रथुरु लोकं जनयन्ता सूर्यमुषासमग्निम् ।
दासस्य चिद्वृषशिप्रस्य माया जघ्नथुर्नरा पृतनाज्येषु ॥४॥
इन्द्राविष्णू दृंहिताः शम्बरस्य नव पुरो नवतिं च श्नथिष्टम् ।
शतं वर्चिनः सहस्रं च साकं हथो अप्रत्यसुरस्य वीरान् ॥५॥

संस्कृत भाषा में सुरा शब्द का केवल एक ही रूढ़ अर्थ प्राप्त है । शराब
देखें--- नीचे उद्धृत सन्दर्भों को 👇
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(सु अभिषवे + क्रन् ) 
स्त्रियां टाप् । इत्युणादिवृत्तौ उज्ज्वलः ।  २ ।  २४ ।
यद्वा   सुष्ठु रायन्त्यनयेति ।
सु + रै  शब्दे +  “ आतश्चोप- सर्गे ।  ३ ।  ३ ।  ११६ ।  इत्यङ् ।  टाप् । )
चषकम् ।  मद्यम् ।  इति मेदिनी ॥ 
अस्याः पर्य्यायगुणादि मदिराशब्दे मद्यशब्द च द्रष्टव्यम् ।  सुराया विशेषगुणा यथा   --
  “ कृशानां सक्तमूत्राणां ग्रहण्यर्शोविकारिणाम् सुरा प्रशस्ता वातघ्नी स्तन्यरक्तक्षयेषु च ॥
“ इति राजवल्लभः ॥

तत्पानप्रायश्चित्तं यथा   --  “ ब्रह्मघ्रश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः ।
सेतु दृष्ट्वा विशुध्यन्ते तत्संयोगी च पञ्चमः । ततो धेनुशतं दद्यात् ब्राह्यणानान्तु भोजनम् ॥
“ इति गारुडे २२६ अध्यायः ॥
तत्पाने शुक्राचार्य्यशापो यथा   -- 
“ सुरापानाद्वञ्चनां प्रापयित्वा संज्ञानाशं चैनमस्यातिघोरम्
दृष्ट्वा कचञ्चापि तथापि रूपं पीत तथा सुरया मोहितेन ॥

समन्युरुत्थाय महानुभावस्तदोशना विप्रहितं चिकीर्षुः । काव्यः स्वयं वाक्यमिदं जगाद सुरापानं प्रति वै जातशङ्कः ॥

यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चित् मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः ।
अपेतधर्म्मा ब्रह्महा चैव स स्यात् अस्मिन् लोके गर्हितः स्यात् परे च ॥

मया चेमां विप्रधर्म्मोक्तसीमां मर्य्यादां वै स्थापितां सर्व्वलोके ।
सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां देवा
दैत्याश्चोपशृण्वन्तु सर्व्वे ॥ 
“ इति महाभारते ।  १ ।  ७६ ।  ५९ -- ६२ ॥
ब्राह्मणक्षत्त्रियवैश्यानां त्रिविधसुरापानप्राय- श्चित्तादि यथा   -- 
“ सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णां सुरां पिबेत् ।
तथा स्वकाये निर्दग्धे मुच्यते किल्विषात्ततः ॥

गोमूत्रमग्निवर्णं वा पिबेदुदकमेव वा ।
पयो घृतं वा मरणाद्गोसकृद्रसमेव वा ॥

कणान् वा भक्षयेदब्दं पिण्याकं वा सकृन्निशि ।
सुरापानापनुत्त्यर्थं बालवासा जटी ध्वजी ॥

सुरा वै मलमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते । तस्माद्ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत् ॥

गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ।
यथैवैका तथा सर्व्वा न पातव्या द्विजोत्तमैः ॥

यक्षरक्षःपिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम् ।
तद्ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हविः ॥

अमेध्ये वा पतेन्मत्तो वैदिकं वाप्युदाहरेत् ।
अकार्य्यमन्यत् कुर्य्याद्वा ब्राह्मणो मदमोहितः ॥

यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत् ।
तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वञ्च स गच्छति ॥
एषा विचित्राभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः ॥
इति मानवे ११ ।  ९१ -- ९९ ॥

सौत्रामणियज्ञेऽपि तत्पाननिषेधो यथा   “ यद्घ्राणमक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा ।
एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै इमं विशुद्धं न विदुः
स्वधर्म्मम् ॥ 
“ इति श्रीभागवते ।  ११ ।  ५ ।  १३ ॥ ॥
“ यस्मात् सुराया घ्राणभक्षः अवघ्राणं स एव विहितः न पानं तथा पशोरपि आलभनमेव विहितं न तु हिंसा ।
  अतो न यथेष्टभक्षणाभ्यनुज्ञेत्यर्थः । 
व्यवायोऽपि प्रजया निमित्तभूतया न रत्यै ।
  अतो मनोरथवादिन इमं विशुद्धं स्वधर्म्मं न विदुरिति ।  “  इति तट्टीकायां श्रीधरस्वामी ॥
अन्यत् प्रायश्चित्तशब्दे द्रष्टव्यम् ॥
  सुरापाने वर्णनीयानि यथा 
सुरापाने विकलता स्खलनं वचने गतौ ।
लज्जा मानच्यु तिः प्रेमाधिक्यं रक्ताक्षता भ्रमः ॥
“ इति कविकल्पतायां १ स्तवके ३ कुसुमम् ॥

इसी प्रकार द्वेष-प्रेरित विकृत मानसिकता वाले रूढ़िवादीयों ने भूत जिन्दा मनुष्यों को बना दिया ।

भूत कौन थे ? और उनका निवास स्थान क्या था ? यथार्थ के धरातल पर प्रतिष्ठित शोध.... यादव योगेश कुमार रोहि के गहन मीमांसा पर आधारित ....💥💥💥💥 अब सुनिए और पढ़िए👇

भूटिया हिमालयी लोग हैं ! जो नौंवी शताब्दी या बाद में तिब्बत से दक्षिण की ओर उत्प्रवास करने वाले माने जाते हैं। इस जनजाति के लोगों को 'भोटिया' या 'भोट' और 'भूटानी' भी कहलाते हैं।
ये लोग प्राचीन काल में भूत नाम से संस्कृत साहित्य में वर्णित हैं ...पश्चिमोत्तर की खश जन जाति से भी इनका तादात्म्य ( एकरूपता ) रही है
.. ......परन्तु कालान्तरण में यह जनजाति पृथक् रूप से जानी गयी ..इन भूत जन जाति का जो स्थान था वही बाद में भूतःस्थान अर्थात् भूटान कह लाया था !
यह शिव के परम भक्त तथा अनुयायी थे इसी लिए शिव को भूतनाथ कहा जाता था ..ये लोग मुख्य रूप से अधिकांशत: पहाड़ी स्थानों पर ही रहते हैं। भूटिया जनजाति के लोग पर्वतीय ढलानों पर सीढ़ीदार खेत बनाकर खेती करते हैं।
ये दलाई लामा को अपने आध्यात्मिक नेता के रूप में मानते हैं।
भूटिया भारत के पड़ोसी देश भूटान की जनसंख्या में बहुसंख्यक हैं और नेपाल तथा भारत, विशेषकर भारत के सिक्किम राज्य में अल्पसंख्यक हैं। ये चीनी तिब्बती भाषा परिवार की तिब्बती-बर्मी शाखा की विविध भाषाएँ बोलते हैं। भूटिया छोटे गाँवों और लगभग अगम्य भू-भाग द्वारा अलग किये गए पृथक भूखंडों में रहने वाले पहाड़ी लोग हैं।
इस तथ्य का विश्लेषण ~इतिहास का यथार्थ विश्लेषण|.
... नामक प्रथम श्रृंखला ...📔 इस जनजाति के लोग खेती पर अधिक निर्भर हैं। ये लोग पर्वतीय ढलानों पर सीढ़ीदार खेती करते हैं और मुख्यत: चावल, मक्का और आलू की फसल उगाते हैं। इनमें से कुछ पशु प्रजनक हैं, जो मवेशियों और याक के लिए जाने जाते हैं।
🐃🐃🐃🐃🐃🐏. 🐏🐏🐏. 🐏. 🐏 🐏 भूटियाओं का धर्म 'बॉन' नाम से विख्यात पूर्व बौद्ध ओझाई धर्म के सम्मिश्रण वाला तिब्बती बौद्ध धर्म है। ये दलाई लामा को अपने आध्यात्मिक नेता के रूप में मानते हैं।
भूटिया अपनी उत्पत्ति को पैतृक वंश के अनुसार चिह्नित करते हैं। ये एकविवाही होते हैं, किन्तु कुछ क्षेत्रों में बहुविवाह अब भी प्रचलित हैं भारत के उत्तराखंड में द्रोणगिरी गाँव में बसने वाले भूटिया जनजाति के लोग हिन्दू धर्म को मानने वाले हैं ..वस्तुतः यह तो हमारे उन तथाकथित ब्राह्मणवाद के नाम पर समाज को विखण्डित करने बालों का ही प्रायश्चित से भी न मिटने बाला पाप है ...इन्हीं धूर्तों ने बुद्ध को बुद्धू बना दिया महावीर स्वामी के चरितार्थ नाम निर्ग्रन्थ अर्थात् जिसकी सभी विकारों की गाँठें मिट थी अतः महावीर को निर्ग्रन्थ कहा गया है और निर्ग्रन्थ .. को नाखन्दा बना दिया भूत एक हिमालय की जनजाति थी जो शिव- भक्त थी उसे यम लोक की आत्मा बना दिया .. और खश को खहीस बना दिया और पिशाच भी एक जनजाति थी जिसका विकृत रूप से पुराणों में पुष्यमित्र शुंग ई०पू० १४९ के समकक्ष वर्णन किया गया है ।
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..विचार विश्लेषक.... योगेश कुमार रोहि ग्राम आजादपुर पत्रालय पहाड़ीपुर जनपद अलीगढ़ उ०प्र० सम्पर्क 8077160219.
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               (यादव योगेश कुमार  'रोहि')

1 टिप्पणी:

  1. या तो तुम भीमटे हो या मलेच्छ.. गर तुम्हारे लेख सच हैं तो सबुत क्यों नहीं दे रहे हो?? पेज नंबर, श्लोक कुछ नहीं बस मलेच्छों भीमटों की भांति सनातन का दुष्प्रचार? औ तुम स्वयं को ब्लोगर बता रहे हो

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