गुरुवार, 30 नवंबर 2023

गोलोक और पञ्चमवर्ण तथा विष्णु और कृष्ण का भेद- अहीर जाति की उत्पत्ति अत्रि से न होकर स्वराट् विष्णु से होना - विडियो -

नमस्कार मित्रो !   मित्रो - इस विडियो में आप लोग परम प्रभु श्रीकृष्ण के उन तीन रहस्य पूर्ण प्रसंगों के विषय में जानेगे' जिन्हें आजतक बहुत ही कम लोग जानते हैं। 

अथवा कहें कि फिर जानते ही नहीं हैं- किन्तु आज हम इस युगान्त कारी ज्ञान के आधार पर भगवान् श्रीकृष्ण से सम्बन्धित उन घटनाओं को प्रस्तुत करेंगे जिसे जानबूझ कर अथवा अज्ञानतावश कथाकारों द्वारा अब तक जनसाधारण को नहीं बताया गया है। 

जिसके परिणाम स्वरूप जनमानस में कृष्ण के वास्तविक चरित्रों ( कारनामों)  का प्रचार- प्रसार नहीं हो सका और श्रीकृष्ण के रहस्यों से सारी दुनिया अनिभिज्ञ ही रह गयी ।

कृष्ण के वास्तविक स्वरूप का यथावत् ज्ञान न होने के कारण  साधारण लोग आज तक भ्रम जाल में भँसकर संसार में विभिन्न प्रकार के प्रलाप करते हुए चक्कर लगा रहे-

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और इसी भ्रमजाल को दूर करने के लिए अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण के चारित्रिक रहस्यों को सम्पूर्ण सारगर्भित  रूप से बताने के लिए हमने  इस विडियो को  प्रमुख रूप से तीन भागों में बाँटा हैं ताकि -

आप लोगों को स्टेप बाइ स्टेप (क्रमश:) समझ में आ जाय कि कृष्ण क्या थे ? उनका आध्यात्मिक और सांसारिक क्या योगदान था ?-
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जिसमें आप लोग विडियों के प्रथम भाग "ब्रह्माण्ड की संरचना" को जानते हुए यह जान पायेगें कि सबसे ऊपर कौन सा लोक है और उनसे नीचे क्रमश कौन कौन से लोक है। क्या इस ब्रह्माण्ड से परे भी कोई लोक है ?

और उस लोक में कौन कौन प्राणी रहते हैं , तथा उन लोके के अधिपति कौन है ? और उन अधिपतियों के भी अधिपति (सुप्रीम पावर) कौन है ?

जिसकी शक्ति से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गतिमान है  जिसे ईश्वर, परम-प्रभु परम-तत्व" इत्यादि नामों से तत्वज्ञानी अपने अपने हिसाब से ही उस एक  परम शक्ति का अनुभव व वर्णन किया करते हैं।


ब्रह्म वैवर्त पुराण-प्रकृतिखण्ड: अध्याय (3)

परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्री राधा से प्रकट विराट स्वरूप बालक का वर्णन-
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भगवान नारायण कहते हैं– नारद ! तदनन्तर वह बालक जो केवल अण्डाकार था, ब्रह्मा की आयु पर्यन्त ब्रह्माण्ड गोलक के जल में रहा। फिर समय पूरा हो जाने पर वह सहसा( अचानक) दो रूपों में प्रकट हो गया। एक अण्डाकार ही रहा और एक शिशु के रूप में परिणत हो गया। 

उस शिशु की ऐसी कान्ति थी, मानो सौ करोड़ सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हों। माता का दूध न मिलने के कारण भूख से पीड़ित होकर वह कुछ समय तक रोता रहा।

माता-पिता उसे त्याग चुके थे। वह निराश्रय होकर जल के अन्दर समय व्यतीत कर रहा था। जो असंख्य ब्रह्माण्ड का स्वामी है, उसी के अनाथ की भाँति, आश्रय पाने की इच्छा से ऊपर की ओर दृष्टि दौड़ायी। उसकी आकृति स्थूल से भी स्थूल थी। अतएव उसका नाम ‘महाविराट’ पड़ा।

जैसे परमाणु अत्यन्त सूक्ष्मतम होता है, वैसे ही वह अत्यन्त स्थूलतम था। वह बालक तेज में परमात्मा श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश की बराबरी कर रहा था।

परमात्मा स्वरूपा प्रकृति-संज्ञक राधा से उत्पन्न यह महान विराट बालक सम्पूर्ण विश्व का आधार है। यही ‘महाविष्णु’ कहलाता है।

इसके प्रत्येक रोमकूप में जितने विश्व हैं, उन सबकी संख्या का पता लगाना श्रीकृष्ण के लिये भी असम्भव है। वे भी उन्हें स्पष्ट बता नहीं सकते। जैसे जगत के रजःकण को कभी नहीं गिना जा सकता, उसी प्रकार इस शिशु के शरीर में कितने ब्रह्मा" विष्णु और शिव आदि हैं– यह नहीं बताया जा सकता। 

प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा, विष्णु और शिव विद्यमान हैं। पाताल से लेकर ब्रह्मलोक तक अनगनित ब्रह्माण्ड बताये गये हैं। अतः उनकी संख्या कैसे निश्चित की जा सकती है ? ऊपर वैकुण्ठलोक है।

यह ब्रह्माण्ड से बाहर है। इसके भी ऊपर पचास करोड़ योजन के विस्तार में गोलोकधाम है। 
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श्रीकृष्ण के समान ही यह लोक भी नित्य और चिन्मय सत्य स्वरूप है। पृथ्वी सात द्वीपों से सुशोभित है। सात समुद्र इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उन्नचास छोटे-छोटे द्वीप हैं। पर्वतों और वनों की तो कोई संख्या ही नहीं है।

सबसे ऊपर सात स्वर्गलोक हैं। ब्रह्मलोक भी इन्हीं में सम्मिलित है। नीचे सात पाताल हैं। यही ब्रह्माण्ड का परिचय है। 

पृथ्वी से ऊपर भूर्लोक, उससे परे भुवर्लोक, भुवर्लोक से परे स्वर्लोक, उससे परे जनलोक, जनलोक से परे तपोलोक, तपोलेक से परे सत्यलोक और सत्यलोक से परे ब्रह्मलोक है।

ऐसा प्रकाशमान है, मानो तपाया हुआ सोना चमक रहा हो। ये सभी कृत्रिम हैं। कुछ तो ब्रह्माण्ड के भीतर हैं और कुछ बाहर। नारद! ब्रह्माण्ड के नष्ट होने पर ये सभी नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि पानी के बुलबुले की भाँति यह सारा जगत अनित्य है।
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गोलोक और वैकुण्ठलोक को नित्य, अविनाशी एवं अकृत्रिम कहा गया है। उस विराटमय बालक के प्रत्येक रोमकूप में असंख्य ब्रह्माण्ड निश्चित रूप से विद्यमान हैं। एक-एक ब्रह्माण्ड में अलग-अलग ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं।
वत्स नारद! देवताओं की संख्या  (तीन + तीस) करोड़ है।
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ये सर्वत्र व्याप्त हैं। दिशाओं के स्वामी, दिशाओं की रक्षा करने वाले तथा ग्रह एवं नक्षत्र– सभी इसमें सम्मिलित हैं। भूमण्डल पर चार प्रकार के वर्ण हैं।  नीचे नागलोक है। चर और अचर सभी प्रकार के प्राणी उस पर निवास करते हैं।
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नारद! तदनन्तर वह विराट स्वरूप बालक बार-बार ऊपर दृष्टि दौड़ाने लगा। वह गोलाकार पिण्ड बिल्कुल खाली था।

दूसरी कोई भी वस्तु वहाँ नहीं थी। उसके मन में चिन्ता उत्पन्न हो गयी। भूख से आतुर होकर वह बालक बार-बार रुदन करने लगा। फिर जब उसे ज्ञान हुआ, तब उसने परम पुरुष श्रीकृष्ण का ध्यान किया।

तब वहीं उसे सनातन ब्रह्म ज्योति के दर्शन प्राप्त हुए। वे ज्योतिर्मय श्रीकृष्ण नवीन मेघ के समान श्याम थे। उनकी दो भुजाएँ थीं। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था। उनके हाथ में मुरली शोभा पा रही थी। मुखमण्डल मुस्कान से भरा था। भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये वे कुछ व्यस्त-से जान पड़ते थे।पिता परमेश्वर को देखकर वह बालक संतुष्ट होकर हँस पड़ा। फिर तो वर के अधिदेवता श्रीकृष्ण ने समयानुसार उसे वर दिया। 
कहा- ‘बेटा ! तुम मेरे समान ज्ञानी बन जाओ। भूख और प्यास तुम्हारे पास न आ सके। प्रलय पर्यन्त यह असंख्य ब्रह्माण्ड तुम पर अवलम्बित रहे। तुम निष्कामी, निर्भय और सबके लिये वरदाता बन जाओ।
देवी भागवत पुराण- प्रकृति खण्ड- स्कन्ध नवम् अध्याय तृतीय) में भी  इस  बालक के विषय में वर्णन है कि -
ब्रह्मपुत्र नारद! मन्त्रोपदेश के पश्चात् परम प्रभु श्रीकृष्ण ने उस बालक के भोजन की व्यवस्था की, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो! प्रत्येक विश्व में वैष्णवजन जो कुछ भी नैवेद्य भगवान को अर्पण करते हैं,
उसमें से सोलहवाँ भाग विष्णु को मिलता है और पंद्रह भाग इस बालक के लिये निश्चित हैं; क्योंकि यह बालक स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्ण का विराट-रूप है।
यह बालक ही महाविष्णु है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण
प्रकृतिखण्ड: अध्याय (3) देवी भागवत पराण
नवम स्कन्ध तृतीय अध्याय- में भी वर्णन है।

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा– 'वत्स! मेरी ही भाँति तुम भी बहुत समय तक अत्यन्त स्थिर होकर विराजमान रहो। असंख्य ब्रह्माओं के जीवन समाप्त हो जाने पर भी तुम्हारा नाश नहीं होगा। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में अपने सूक्ष्म अंश से तुम विराजमान रहोगे। तुम्हारे नाभिकमल से विश्वस्रष्टा ब्रह्मा प्रकट होंगे।  ब्रह्मा के ललाट से ग्यारह रुद्रों का आविर्भाव होगा। शिव के अंश से वे रुद्र सृष्टि के संहार की व्यवस्था करेंगे। उन ग्यारह रुद्रों में ‘कालाग्नि’ नाम से प्रसिद्ध हैं, वे ही रुद्र विश्व के संहारक होंगे।

"विष्णु विश्व की रक्षा करने के लिये तुम्हारे सूक्ष्म अंश से प्रकट होंगे। मेरे वर के प्रभाव से तुम्हारे हृदय में सदा मेरी भक्ति बनी रहेगी। तुम मेरे परम सुन्दर स्वरूप को ध्यान के द्वारा निरन्तर देख सकोगे, यह निश्चित है। तुम्हारी कमनीया माता मेरे वक्षःस्थल पर विराजमान रहेगी। उसकी भी झाँकी तुम प्राप्त कर सकोगे। वत्स! अब मैं अपने गोलोक में जाता हूँ। तुम यहीं ठहरो।'

इस प्रकार उस बालक से कहकर भगवान श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और तत्काल वहाँ पहुँचकर उन्होंने सृष्टि की व्यवस्था करने वाले ब्रह्मा को तथा संहार कार्य में कुशल रुद्र को आज्ञा दी।

भगवान श्रीकृष्ण बोले– 'वत्स! सृष्टि रचने के लिये जाओ। विधे! मेरी बात सुनो, महाविराट के एक रोमकूप में स्थित क्षुद्र विराट पुरुष के नाभिकमल से प्रकट होओ।' 

फिर रुद्र को संकेत करके कहा– ‘वत्स महादेव! जाओ। महाभाग! अपने अंश से ब्रह्मा के ललाट से प्रकट हो जाओ और स्वयं भी दीर्घकाल तक तपस्या करो।’

नारद ! जगत्पति भगवान श्रीकृष्ण यों कहकर चुप हो गये। तब ब्रह्मा और कल्याणकारी शिव– दोनों महानुभाव उन्हें प्रणाम करके विदा हो गये।
 महाविराट पुरुष के रोमकूप में जो ब्रह्माण्ड-गोलक का जल है, उसमें वे महाविराट पुरुष अपने अंश से क्षुद्र विराट पुरुष हो गये, जो इस समय भी विद्यमान हैं। 

इनकी सदा युवा अवस्था रहती है। इनका श्याम रंग का विग्रह है। ये पीताम्बर पहनते हैं। जलरूपी शैय्या पर सोये रहते हैं। इनका मुखमण्डल मुस्कान से सुशोभित है। इन प्रसन्न मुख विश्वव्यापी प्रभु को ‘जनार्दन’ कहा जाता है। इन्हीं के नाभि कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और उसके अन्तिम छोर का पता लगाने के लिये वे ब्रह्मा उस कमलदण्ड में एक लाख युगों तक चक्कर लगाते रहे।
सन्दर्भ:-
ब्रह्म वैवर्त पुराण-
प्रकृतिखण्ड: अध्याय(3) देवीभागवत पुराण नवम स्कन्ध तृतीय (अध्याय) 
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नारद इतना प्रयास करने पर भी वे पद्मजन्मा ब्रह्मा पद्मनाभ की नाभि से उत्पन्न हुए कमलदण्ड के अन्त तक जाने में सफल न हो सके। तब उनके मन में चिन्ता घिर आयी। वे पुनः अपने स्थान पर आकर भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमल का ध्यान करने लगे। उस स्थिति में उन्हें दिव्य दृष्टि के द्वारा क्षुद्र विराट पुरुष के दर्शन प्राप्त हुए।

ब्रह्माण्ड-गोलक के   भीतर जलमय शैय्या पर वे पुरुष क्षुद्र विराट् शयन कर रहे थे। फिर जिनके रोमकूप में वह ब्रह्माण्ड था, तब ब्रह्मा को उन महाविराट पुरुष के तथा उनके भी परम प्रभु भगवान श्रीकृष्ण के भी दर्शन हुए। 

साथ ही गोपों और गोपियों से सुशोभित गोलोकधाम का भी दर्शन हुआ। फिर तो उन्हें श्रीकृष्ण की स्तुति की और उनसे वरदान पाकर सृष्टि का कार्य आरम्भ कर दिया।
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सर्वप्रथम ब्रह्मा से सनकादि चार मानस पुत्र हुए। फिर उनके ललाट से शिव के अंशभूत ग्यारह रुद्र प्रकट हुए। फिर क्षुद्र विराट पुरुष के वामभाग से जगत की रक्षा के व्यवस्थापक चार भुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हुए। 
वे श्वेतद्वीप में निवास करने लगे।  यही नारायण ( क्षीरोदकशायी विष्णु हैं) क्षुद्र विराट पुरुष के नाभिकमल में प्रकट हुए ब्रह्मा ने विश्व की रचना की। स्वर्ग, मर्त्य और पाताल–त्रिलोकी के सम्पूर्ण चराचर प्राणियों का उन्होंने सर्जन किया।

नारद! इस प्रकार महाविराट पुरुष के सम्पूर्ण रोमकूपों में एक-एक करके अनेक ब्रह्माण्ड हुए। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में एक क्षुद्र विराट पुरुष, ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदि भी हैं। 

ब्रह्मन! इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के मंगलमय चरित्र का वर्णन कर दिया। यह सारभूत प्रसंग सुख एंव मोक्ष प्रदान करने वाला है। ब्रह्मन्! अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ?
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भगवान नारायण बोले– नारद! आत्मा, आकाश, काल, दिशा, गोकुल तथा गोलोकधाम– ये सभी नित्य हैं। कभी इनका अन्त नहीं होता।
 गोलोकधाम का एक भाग जो उससे नीचे है, वैकुण्ठधाम है। वह भी नित्य है। ऐसे ही प्रकृति को भी नित्य माना जाता है।
श्रीनारायण उवाच ।।
नित्यात्मा च नभो नित्यं कालो नित्यो दिशो यथा।
विश्वेषां गोकुलं नित्यं नित्यो गोलोक एव च ।५।

तदेकदेशो वैकुण्ठो लम्बभागः स नित्यकः
तथैव प्रकृतिर्नित्या ब्रह्मलीना सनातनी ।६।

यथाऽग्नौ दाहिका चन्द्रे पद्मे शोभा प्रभा रवौ।
शश्वद्युक्ता न भिन्ना सा तथा प्रकृतिरात्मनि।७।

विना स्वर्णं स्वर्णकारः कुण्डलं कर्तुमक्षमः।
विना मृदा कुलालो हि घटं कर्तुं न हीश्वरः।८।

सन्दर्भ:-
ब्रह्म वैवर्त पुराण
प्रकृतिखण्ड: अध्याय 2-
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नारद ! अतीत काल की बात है, असंख्य ब्रह्माओं का पतन होने के पश्चात् भी जिनके गुणों का नाश नहीं होता है तथा गुणों में जिनकी समानता करने वाला दूसरा नहीं है; वे भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि के आदि में अकेले ही थे। उस समय उनके मन में सृष्टि विषयक संकल्प का उदय हुआ। अपने अंशभूत काल से प्रेरित होकर ही वे प्रभु सृष्टिकर्म के लिये उन्मुख हुए थे। 

उनका स्वरूप स्वेच्छामय है। वे अपनी इच्छा से ही दो रूपों में प्रकट हो गये। उनका वामांश स्त्रीरूप में आविर्भूत हुआ और दाहिना भाग पुरुष रूप में।

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फिर आप लोग विडियो के दूसरे भाग में सृष्टि उत्पत्ति को दो तरीकों से जानेंगे- जिसमें सर्वप्रथम सुप्रीम पावर ( परम प्रभु श्रीकृष्ण) द्वारा सृष्टि कि उत्पत्ति को जानेंगे-  जिसमे आप लोग जान    पायेंगे  कि परम प्रभु श्रीकृष्ण से सर्व प्रथम नारायण, ब्रह्मा, और विष्णु तथा शिव के अतिरिक्त गोलोक में ही गोप और गोपियाँ तथा देवों में धर्म ,वायु आदि  की उत्पत्ति कब और कैसे हुई ?  यह वराह कल्प का सर्जन है।


वह बालक तेज में परमात्मा श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश की बराबरी कर रहा था।
परमात्मा स्वरूपा प्रकृति-संज्ञक राधा से उत्पन्न यह महान विराट बालक सम्पूर्ण विश्व का आधार है। यही ‘महाविष्णु’ कहलाता है। इसके प्रत्येक रोमकूप में जितने विश्व हैं, उन सबकी संख्या का पता लगाना श्रीकृष्ण के लिये भी असम्भव है
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उसी क्रम में आप लोग जान पाएंगे की श्रीकृष्ण के कितने भेद और विभेद हैं। जिसमे आप लोग तुलनात्मक ढ़ग से यह भेद कर पाएंगे कि श्री कृष्ण से भगवान विष्णु की उत्पत्ति हुई कि विष्णु से भगवान श्रीकृष्ण की 


ब्रह्म वैवर्त पुराणप्रकृतिखण्ड: अध्याय ३-  परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्री राधा से प्रकट विराट स्वरूप बालक का वर्णन
भगवान नारायण कहते हैं– नारद! तदनन्तर वह बालक जो केवल अण्डाकार था, ब्रह्मा की आयु पर्यन्त ब्रह्माण्ड गोलक के जल में रहा। फिर समय पूरा हो जाने पर वह सहसा दो रूपों में प्रकट हो गया। एक अण्डाकार ही रहा और एक शिशु के रूप में परिणत हो गया। उस शिशु की ऐसी कान्ति थी, मानो सौ करोड़ सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हों। माता का दूध न मिलने के कारण भूख से पीड़ित होकर वह कुछ समय तक रोता रहा। माता-पिता उसे त्याग चुके थे। वह निराश्रय होकर जल के अंदर समय व्यतीत कर रहा था। जो असंख्य ब्रह्माण्ड का स्वामी है, उसी के अनाथ की भाँति, आश्रय पाने की इच्छा से ऊपर की ओर दृष्टि दौड़ायी। 

उसकी आकृति स्थूल से भी स्थूल थी। अतएव उसका नाम ‘महाविराट’ पड़ा। जैसे परमाणु अत्यन्त सूक्ष्मतम होता है, वैसे ही वह अत्यन्त स्थूलतम था। वह बालक तेज में परमात्मा श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश की बराबरी कर रहा था।
परमात्मा स्वरूपा प्रकृति-संज्ञक राधा से उत्पन्न यह महान विराट बालक सम्पूर्ण विश्व का आधार है। यही ‘महाविष्णु’ कहलाता है। इसके प्रत्येक रोमकूप में जितने विश्व हैं, उन सबकी संख्या का पता लगाना श्रीकृष्ण के लिये भी असम्भव है। वे भी उन्हें स्पष्ट बता नहीं सकते। जैसे जगत के रजःकण को कभी नहीं गिना जा सकता, उसी प्रकार इस शिशु के शरीर में कितने ब्रह्मा और विष्णु आदि हैं– यह नहीं बताया जा सकता। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा, विष्णु और शिव विद्यमान हैं। पाताल से लेकर ब्रह्मलोक तक अनगनित ब्रह्माण्ड बताये गये हैं। अतः उनकी संख्या कैसे निश्चित की जा सकती है? ऊपर वैकुण्ठलोक है।
यह ब्रह्माण्ड से बाहर है। इसके ऊपर पचास करोड़ योजन के विस्तार में गोलोकधाम है। श्रीकृष्ण के समान ही यह लोक भी नित्य और चिन्मय सत्य स्वरूप है। पृथ्वी सात द्वीपों से सुशोभित है। सात समुद्र इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उन्नचास छोटे-छोटे द्वीप हैं। पर्वतों और वनों की तो कोई संख्या ही नहीं है। सबसे ऊपर सात स्वर्गलोक हैं। ब्रह्मलोक भी इन्हीं में सम्मिलित है। नीचे सात पाताल हैं। यही ब्रह्माण्ड का परिचय है। पृथ्वी से ऊपर भूर्लोक, उससे परे भुवर्लोक, भुवर्लोक से परे स्वर्लोक, उससे परे जनलोक, जनलोक से परे तपोलोक, तपोलेक से परे सत्यलोक और सत्यलोक से परे ब्रह्मलोक है।


फिर सृष्टि उत्पत्ति के द्वितीय क्रम में जान पाएंगे कि प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि रचना होती हैं -जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य तथा शूद्र चार वर्णो की उत्पत्ति कर ब्रह्मा जी उपने कार्य में सफल होते हैं।
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फिर आप लोग विडियो के अन्तिम व तीसरे भाग में यह भी जान पाएंगे कि ब्रह्मा जी की सृष्टि- रचना  चार वर्णों के अतिरिक्त भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक पाँचवा वर्ण अर्थात वैष्णव वर्ण भी विद्यमान है। जो ब्रह्मा जी के चार वर्णो से अलग है और जिसकी उत्पत्ति  सर्वोच्च सत्ता- श्रीकृष्ण अर्थात जिसे (स्वराट- विष्णु ) भी कह सकते हैं  से हुई है।

जिनके  सदस्यगण  व लीला सहचर एक मात्र गोप ( अहीर ) ही हैं। जिन अहीरों को ही वास्तविक वैष्णव कहा जाता है । ये स्वराट्- विष्णु से उत्पन्न होने से ही वैष्णव हैं। स्वराट् विष्णु कृष्ण ही अपर नाम है।

श्री भगवान द्वारा सृष्टि के कार्य में नियुक्त ब्रह्माजी कमलकोष में प्रवेश किया और उसके ही भू:, भव:, और सव: तीन भाग किए । जीवों के भोगस्थान के रूप में इन्ही तीन लोकों का शास्त्रों में वर्णन हुआ है। जो निष्काम कर्म करने वाले हैं, उन्हें मह:, तप: जन: और सत्यलोकस्वरूप ब्रहमलोक की प्राप्ति होती है।

विषयों का निरंतर बदलना ही काल का आकार है । स्वयं तो वह निर्विशेष अनादि और अनन्त है। उसी को निमित्त बना कर भगवान खेल खेल में ही अपने आपको सृष्टि के रूप में प्रकट कर देते हैं। पहले यह सारा विश्व भगवान की माया से लीं होकर ब्रह्मरूप से स्थित था। उसी को अव्यक्त मूर्ति काल के द्वारा भगवान ने प्रथक रूप से प्रकट किया है।

यह जगत जैसा अब है पहले भी वैसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही होगा। प्रलयकाल आने पर सृष्टि के सम्पूर्ण विनाश के बाद, भगवान सृष्टि की पुनः रचना करते है। आदि काल से यह चक्र निर्विवाद रूप से विद्यमान है।

जगत की सृष्टि नौ प्रकार की होती है तथा प्राकृत वैकृत भेद से एक दसवीं सृष्टि और भी है । सृष्टि का प्रलयकाल, द्रव्य तथा गुणों के द्वारा तीन प्रकार होता है। दस प्रकार की सृष्टि का भेद निम्न प्रकार के बताया गया है:

छह प्राकृत सृष्टि-

१. पहली सृष्टि महत्व की है। भगवान की कृपा से सत्वआदि गुणो में विषमता होना ही इसका स्वरूप है।

२. दूसरी सृष्टि अहंकार की है। जिससे पृथ्वी आदि पंचभूत ज्ञानेंद्रिय और कर्मइंद्रियों की उत्पत्ति होती है।

३. तीसरी सृष्टि भूतसर्ग है जिससे पंचमहाभूतों को उत्पन्न करने वाला तन्मात्र वर्ग रहता है।

४. चौथी सृष्टि इंद्रियों की है। यह ज्ञान और क्रिया शक्ति से उत्पन्न होती है।

५. पाँचवी सृष्टि सात्विक अहंकार से उत्पन्न हुए देवताओं इंद्रियाधिष्ठाताओ देवताओं की है, मन भी इसी सृष्टि के अंतर्गत है।

६. छठी सृष्टि अविद्या की है। इसमें तमिस्र, अंधतमिस्र, तम, मोह और महामहिम- यह पाँच गाँठें हैं। यह जीवों की आत्मा का आवरण और विक्षेप करने वाली हैं।

वैकृत सृष्टि-

७. सातवी प्रधान वैकृत सृष्टि छह प्रकार के स्थावर वृक्षों की होती है। इनका संचार नीचे (जड़) से ऊपर की और होता है। इनके ज्ञान शक्ति नहीं होती, यह अंदर ही अंदर केवल स्पर्श का अनुभव करते है, इनमे से प्रत्येक के गुण अलग होते हैं।

– वनस्पति – जो बिना बौर आए ही फलते हैं जैसे गूलर, बड़, पीपल।
– औषधि – जो फलों के पक जाने पर नष्ट हो जाते हैं जैसे धान, गेहूँ, चना ।
– लता – जो किसी का आश्रय ले कर बढ़ते हैं जैसे ब्राह्मी।
– तवकसार – जिनकी छाल बहुत कठोर होती है जैसे बाँस ।
– वीरुध- जिनकी लता पृथ्वी पर ही फैलती है जैसे तरबूज़।
– द्रुम- जिनमे फूल आ कर फिर फूलों के स्थान पर ही फल लगते हैं जैसे जामुन

८. आठवीं सृष्टि तिर्यग्योनियों (पशु पक्षियों) की है। इन्हें काल का ज्ञान नहीं होता और तमोगुण की अधिकता के कारण यह केवल खाना- पीना मैथुन तथा सोना ही जानते हैं। इन्हें सूँघने मात्र से से वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है। इनके मस्तिष्क में विचारशक्ति नहीं होती।

– द्विशफ – दो खुरों वाले पशु जैसे गाय, बकरा, भैंसा, मृग, शूकर, भेद और ऊँट।
– एकशफ – एक खुर वाले पशु जैसे गधा, घोड़ा, खच्चर।
– पञ्च नख – पाँच नखों वाले पशु जैसे कुत्ता, भेड़िया, बाघ, बिल्ली, सिंह, हाथी इत्यादि
– उड़ने वाले जीव – जैसे बगुला, गिध, हंस, मोर, कौवा, सरस उल्लू, इत्यादि

९. मनुष्य – नवी सृष्टि मनुष्यों की है। यह एक ही प्रकार के हैं। परस्पर इनमे कोई भेद नहीं है । इनका आहार ऊपर से नीचे की और होता है। मनुष्य रजोगुण प्रधान, कर्म परायण और दुःख: रूप विषयों में ही सुख मनने वाले होते हैं।

उपरोक्त के अतिरिक्त देव सृष्टि आठ प्रकार की –

देवता-पितर,

असुर,

गंधर्व -अप्सरा,

यक्ष – राक्षस,

सिद्ध- चारण-विद्याधर,

भूत- प्रेत-पिशाच और

किन्नर-किम्पपुरुष-अश्वमुख है ।

इस प्रकार सृष्टि करने वाले सत्य संकल्प के रूप श्री हरि ही ब्रह्मा जी के रूप में प्रत्येक कल्प के आदि में रजोगुण से व्याप्त होकर स्वयं ही जगत के रूप में अपनी ही रचना करते हैं।      

सौति कहते हैं– शौनक जी! तब भगवान की आज्ञा के अनुसार तपस्या करके  सृष्टि क्रम में अभीष्ट सिद्धि पाकर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम मधु और कैटभ के मेद(चर्बी ) से मेदिनी की सृष्टि की।
उन्होंने आठ प्रधान पर्वतों की रचना की। 
वे सब बड़े मनोहर थे। 
उनके बनाये हुए छोटे-छोटे पर्वत तो असंख्य हैं, उनके नाम क्या बताऊँ ? मुख्य-मुख्य पर्वतों की नामावली सुनिये– सुमेरु, कैलास, मलय, हिमालय, उदयाचल, अस्ताचल, सुवेल और गन्धमादन – ये आठ प्रधान पर्वत हैं। फिर ब्रह्मा जी ने सात समुद्रों, अनेकानेक नदों और कितनी ही नदियों की सृष्टि की।

वृक्षों, गाँवों और नगरों का निर्माण किया। समुद्रों के नाम सुनिये– लवण, इक्षुरस, सुरा, घृत, दही, दूध और सुस्वादु जल के वे समुद्र हैं।

उनमें से पहले की लंबाई-चौड़ाई एक लाख योजन की है। बाद वाले उत्तरोत्तर दुगुने होते गये हैं। इन समुद्रों से घिरे हुए सात द्वीप हैं। 

उनके भूमण्डल कमल पत्र की आकृति वाले हैं। उनमें उपद्वीप और मर्यादा पर्वत भी सात-सात ही हैं।

ब्रह्मन! अब आप उन द्वीपों के नाम सुनिये, जिनकी पहले ब्रह्मा जी ने रचना की थी।

वे हैं–जम्बूद्वीप, शाकद्वीप, कुशद्वीप, प्लक्षद्वीप, क्रौंचद्वीप, न्यग्रोध (अथवा शाल्मलि) द्वीप तथा पुष्करद्वीप। 

भगवान ब्रह्मा ने मेरु पर्वत के आठ शिखरों पर आठ लोकपालों के विहार के लिये आठ मनोहर पुरियों का निर्माण किया। उस पर्वत के मूलभाग–पाताल लोक में उन्होंने भगवान अनन्त (शेषनाग) की नगरी बनायी। 

तदनन्तर लोकनाथ ब्रह्मा ने उस पर्वत के ऊपर-ऊपर सात स्वर्गों की सृष्टि की।

शौनक जी ! उन सबके नाम सुनिये– भूर्लोक, भुवर्लोक, परम मनोहर- स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक।

मेरु के सबसे ऊपरी शिखर पर जरा-मृत्यु आदि से रहित ब्रह्मा का लोक ब्रह्मलोक है।
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 उससे भी ऊपर ध्रुवलोक है,( उत्तरीध्रुव) जो सब ओर से अत्यन्त मनोहर है। जगदीश्वर ब्रह्मा जी ने उस पर्वत के निम्न भाग में सात पातालों का निर्माण किया। मुने! वे स्वर्ग की अपेक्षा भी अधिक भोग-साधनों से सम्पन्न हैं और क्रमशः एक से दूसरे उत्तरोत्तर नीचे भाग में स्थित हैं।
 उनके नाम इस प्रकार हैं– अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल तथा रसातल। सबसे नीचे रसातल ही है।

 सात द्वीप, सात स्वर्ग तथा सात पाताल– इन लोकों सहित जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, वह ब्रह्मा जी के ही अधिकार में है।

शौनक! ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और महाविष्णु के रोमांच-विवरों ( रोमकूपों)में उनकी स्थिति है।

श्रीकृष्ण की माया से प्रत्येक ब्रह्माण्ड में दिक्पाल, ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं, देवता, मनुष्य आदि सभी प्राणी स्थित हैं।

इन ब्रह्माण्डों की गणना करने में न तो लोकनाथ ब्रह्मा, न शंकर, न धर्म और न विष्णु ही समर्थ हैं; फिर और देवता किस गिनती में हैं ?

कृत्रिमाणि च विश्वानि विश्वस्थानि च यानि च ।।
अनित्यानि च विप्रेन्द्र स्वप्नवन्नश्वराणि च ।। १९ ।।
वैकुण्ठः शिवलोकश्च गोलोकश्च तयोः परः ।।
नित्यो विश्वबहिर्भूतश्चात्माकाशदिशो यथा ।। 1.7.२० ।।
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे ब्रह्मखण्डे सृष्टिनिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः । ७।

विप्रवर! कृत्रिम विश्व तथा उसके भीतर रहने वाली जो वस्तुएँ हैं, वे सब अनित्य तथा स्वप्न के समान नश्वर हैं। 

वैकुण्ठ, शिवलोक तथा इन दोनों से परे जो गोलोक है, ये सब नित्य-धाम हैं। इन सबकी स्थिति कृत्रिम विश्व से बाहर है। ठीक उसी तरह, जैसे आत्मा, आकाश और दिशाएँ कृत्रिम जगत से बाहर तथा नित्य हैं।
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इसी क्रम में ब्रह्मा सृष्टि करते हुए 
सावित्री से वेद आदि की सृष्टि करते हैं, ब्रह्मा जी से सनकादि की, सस्त्रीक स्वायम्भुव मनु की, रुद्रों की, पुलस्त्यादि मुनियों की तथा नारद की उत्पत्ति, भी सावित्री द्वारा होती है । सावित्री प्रसव की देवी हैं।  इसी उपरान्त नारद को ब्रह्मा का और ब्रह्मा जी को नारद का शाप
 
सौति कहते हैं – तदनन्तर सावित्री ब्रह्मा के संयोग से  चार मनोहर वेदों को प्रकट किया। साथ ही न्याय और व्याकरण आदि नाना प्रकार के शास्त्र-समूह तथा परम मनोहर एवं दिव्य छत्तीस रागिनियाँ उत्पन्न कीं। 

नाना प्रकार के तालों से युक्त छः सुन्दर राग प्रकट किये। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलहप्रिय कलियुग; वर्ष, मास, ऋतु, तिथि, दण्ड, क्षण आदि; दिन, रात्रि, वार, संध्या, उषा, पुष्टि, मेधा, विजया, जया, छः कृत्तिका, योग, करण, कार्तिकेय प्रिया सती महाषष्ठी देवसेना– जो मातृकाओं में प्रधान और बालकों की इष्ट देवी हैं, इन सबको भी सावित्री ने ही उत्पन्न किया।******
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 ब्रह्मा, पाद्म और वाराह– ये तीन कल्प माने गये हैं। नित्य, नैमित्तिक, द्विपरार्ध और प्राकृत – ये चार प्रकार के प्रलय हैं। 
इन कल्पों और प्रलयों को तथा काल, मृत्युकन्या एवं समस्त व्याधिगणों को उत्पन्न करके सावित्री ने उन्हें अपना स्तन पान कराया।
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तदनन्तर ब्रह्मा जी के पृष्ठ देश से अधर्म उत्पन्न हुआ। अधर्म से वामपार्श्व से अलक्ष्मी उत्पन्न हुई, जो उसकी पत्नी थी। 

ब्रह्मा जी के नाभि देश से शिल्पियों के गुरु विश्वकर्मा हुए। साथ ही आठ महावसुओं की उत्पत्ति हुई, जो महान बल-पराक्रम से सम्पन्न थे। *******

तत्पश्चात् विधाता के मन से चार कुमार आविर्भूत हुए, जो पाँच वर्ष की अवस्था के-से जान पड़ते थे और ब्रह्मतेज से प्रज्वलित हो रहे थे। 

उनमें से प्रथम तो सनक थे, दूसरे का नाम सनन्दन था, तीसरे सनातन और चौथे ज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान सनत्कुमार थे।
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इसके बाद ब्रह्मा जी के मुख से सुवर्ण के समान कान्तिमान कुमार उत्पन्न हुआ, जो दिव्य रूपधारी था। उसके साथ उसकी पत्नी भी थी।

वह श्रीमान एवं सुन्दर युवक था। क्षत्रियों का बीजस्वरूप था। उसका नाम था स्वायम्भुव मनु।
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 जो स्त्री थी, उसका नाम शतरूपा था। वह बड़ी रूपवती थी और लक्ष्मी की कलास्वरूपा थी। पत्नी सहित मनु विधाता की आज्ञा का पालन करने के लिये उद्यत रहते थे। स्वयं विधाता ने हर्ष भरे पुत्रों से, जो बड़े भगवद्भक्त थे, सृष्टि करने के लिये कहा। परंतु वे श्रीकृष्ण परायण होने के कारण ‘नहीं’ करके तपस्या करने के लिये चले गये। इससे जगत्पति विधाता को बड़ा क्रोध हुआ।

कोपासक्त ब्रह्मा ब्रह्मतेज से जलने लगे। 
प्रभो! इसी समय उनके ललाट से ग्यारह रुद्र प्रकट हुए। 

उन्हीं में से एक को संहारकारी 'कालाग्नि रुद्र' कहा गया है। समस्त लोगों में केवल वे ही तामस या तमोगुणी माने गये हैं।
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 स्वयं ब्रह्मा राजस हैं और शिव तथा विष्णु सात्त्विक कहे गये हैं।

गोलोकनाथ श्रीकृष्ण निर्गुण हैं; क्योंकि वे प्रकृति से परे हैं। जो परम अज्ञानी और मूर्ख हैं, वे ही शिव को तामस (तमोगुणी) कहते हैं। वे शुद्ध, सत्त्वस्वरूप, निर्मल तथा वैष्णवों में अग्रगण्य हैं।

अब रुद्रों के वेदोक्त नाम सुनो– महान, महात्मा, मतिमान, भीषण, भयंकर, ऋतुध्वज, ऊर्ध्वकेश, पिंगलाक्ष, रुचि, शुचि तथा कालाग्नि रुद्र। 

ब्रह्मा जी के दायें कान से पुलस्त्य, बायें कान से पुलह, दाहिने नेत्र से अत्रि, वाम नेत्र से क्रतु, नासिका छिद्र से अरणि, मुख से अंगिरा एवं रुचि, वामपार्श्व से भृगु, दक्षिणपार्श्व से दक्ष, छाया से कर्दम, नाभि से पंचशिख, वक्षःस्थल से वोढु, कण्ठ देश से नारद, स्कन्ध देश से मरीचि, गले से अपान्तरतमा, रसना से वसिष्ठ, अधरोष्ठ से प्रचेता, वामकुक्षि से हंस और दक्षिणकुक्षि से यति प्रकट हुए। विधाता ने अपने इन पुत्रों की सृष्टि करने की आज्ञा दी। 
पिता की बात सुनकर नारद ने उनसे कहा। नारद बोले – जगत्पते! पितामह! पहले सनक, सनन्दन आदि ज्येष्ठ पुत्रों को बुलाइये और उनका विवाह कीजिये। तत्पश्चात् हम लोगों से ऐसा करने के लिये कहिये। जब पिता जी! आपने उन्हें तपस्या में लगाया है, तब हमें ही क्यों संसार-बन्धन में डाल रहे हैं? 

अहो ! कितने खेद की बात है कि प्रभु की बुद्धि विपरीत भाव को प्राप्त हो रही है। भगवन! आपने किसी पुत्र को तो अमृत से भी बढ़कर तपस्या का कार्य दिया है और किसी को आप विष से भी अधिक विषम विषय-भोग दे रहे हैं। 
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पिताजी! जो अत्यन्त निम्न कोटि के भयानक भवसागर में गिरता है, उसका करोड़ों कल्प बीतने पर भी उद्धार नहीं होता। भगवान पुरुषोत्तम ही सबके आदि कारण तथा निस्तार के बीज हैं। वे ही सब कुछ देने वाले, भक्ति प्रदान करने वाले, दास्यसुख देने वाले, सत्य तथा कृपामय हैं। वे ही भक्तों को एकमात्र शरण देने वाले, भक्तवत्सल और स्वच्छ हैं।

भक्तों के प्रिय, रक्षक और उन पर अनुग्रह करने वाले भी वे ही हैं। भक्तों के आराध्य तथा प्राप्य उन परमेश्वर श्रीकृष्ण को छोड़कर कौन मूढ़ विनाशकारी विषय में मन लगायेगा? 

अमृत से भी अधिक प्रिय श्रीकृष्ण सेवा छोड़कर कौन मूर्ख विषय नामक विषम विष का भक्षण (आस्वादन) करेगा?

विषय तो स्वप्न के समान नश्वर, तुच्छ, मिथ्या तथा विनाशकारी है।
मरीचि आदि ब्रह्मकुमारों तथा दक्षकन्याओं की संतति का वर्णन, दक्ष के शाप से पीड़ित चन्द्रमा का भगवान शिव की शरण में जाना, अपनी कन्याओं के अनुरोध पर दक्ष का चन्द्रमा को लौटा लाने के लिये जाना, शिव की शरणागत वत्सलता तथा विष्णु की कृपा से दक्ष को चन्द्रमा की प्राप्ति
 
सौति कहते हैं– विप्रवर शौनक! तदनन्तर ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों को सृष्टि करने की आज्ञा दी। नारद को छोड़कर शेष सभी पुत्र सृष्टि के कार्य में संलग्न हो गये।

मरीचि के मन से प्रजापति कश्यप का प्रादुर्भाव हुआ। 

अत्रि के नेत्रमल से क्षीरसागर में चन्द्रमा प्रकट हुए। प्रचेता के मन से भी गौतम का प्राकट्य हुआ। मैत्रावरुण पुलस्त्य के मानस पुत्र हैं।
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मनु से शतरूपा के गर्भ से तीन कन्याओं का जन्म हुआ– आकूति, देवहूति और प्रसूति। 

वे तीनों ही पतिव्रता थीं। मनु-शतरूपा से दो मनोहर पुत्र भी हुए, जिनके नाम थे– प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे।

मनु ने अपनी पुत्री आकूति का विवाह प्रजापति रुचि के साथ तथा प्रसूति का विवाह दक्ष के साथ कर दिया। 
इसी तरह देवहूति का विवाह-सम्बन्ध उन्होंने कर्दम मुनि के साथ किया, जिनके पुत्र साक्षात भगवान कपिल हैं। 

दक्ष के वीर्य और प्रसूति के गर्भ से आठ कन्याओं का जन्म हुआ। उनमें से आठ कन्याओं का विवाह दक्ष ने धर्म के साथ किया, ग्यारह कन्याओं को ग्यारह रुद्रों के हाथ में दे दिया। एक कन्या सती भगवान शिव को सौंप दी। 

तेरह कन्याएँ कश्यप को दे दीं तथा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को अर्पित कर दीं।

विप्रवर! अब मुझसे धर्म की पत्नियों के नाम सुनिये– शान्ति, पुष्टि, धृति , तुष्टि, क्षमा, श्रद्धा, मति और स्मृति। 

शान्ति का पुत्र संतोष और पुष्टि का पुत्र महान हुआ।
धृति से धैर्य का जन्म हुआ। तुष्टि से दो पुत्र हुए – हर्ष और दर्प। 
क्षमा का पुत्र सहिष्णु था और श्रद्धा का पुत्र धार्मिक। 
मति से ज्ञान नामक पुत्र हुआ और स्मृति से महान जातिस्मर का जन्म हुआ।
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धर्म की जो पहली पत्नी मूर्ति थी, उससे नर - नारायण नामक दो ऋषि उत्पन्न हुए। 

शौनक जी ! धर्म के ये सभी तीन पुत्र बड़े धर्मात्मा हुए।

अब आप सावधान होकर रुद्र पत्नियों के नाम सुनिये। कला, कलावती, काष्ठा, कालिका, कलहप्रिया, कन्दली, भीषणा, रास्रा, प्रमोचा, भूषणा और शुकी। इन सबके बहुत-से पुत्र हुए, जो भगवान शिव के पार्षद हैं।

दक्षपुत्री सती ने यज्ञ में अपने स्वामी की निन्दा होने पर शरीर को त्याग दिया और पुनः हिमवान की पुत्री पार्वती के रूप में अवतीर्ण हो भगवान शंकर को ही पतिरूप में प्राप्त किया।

धर्मात्मन! अब कश्यप की पत्नियों के नाम सुनिये। देवमाता, अदिति, दैत्यमाता दिति, सर्पमाता कद्रू, पक्षियों की जननी विनता, 
गौओं और भैंसों की माता सुरभि, दानवजननी दनु तथा अन्य पत्नियाँ भी इसी तरह अन्यान्य संतानों की जननी हैं। 
मुने! इन्द्र आदि बारह आदित्य तथा उपेन्द्र (वामन) आदि देवता अदिति के पुत्र कहे गये हैं, जो महान बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं।

 ब्रह्मन! इन्द्र का पुत्र जयन्त हुआ, जिसका जन्म शची के गर्भ से हुआ था। आदित्य (सूर्य) की पत्नी तथा विश्वकर्मा की पुत्री सर्वणा के गर्भ से शनैश्चर और यम नामक दो पुत्र तथा कालिन्दी नाम वाली एक कन्या हुई। 
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उपेन्द्र के वीर्य और पृथ्वी के गर्भ से मंगल नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

तदनन्तर भगवान उपेन्द्र अंश और धरणी के गर्भ से मंगल के जन्म का प्रसंग सुनाकर सौति बोले– मंगल की पत्नी मेधा हुई, जिसके पुत्र महान घंटेश्वर और विष्णु तुल्य तेजस्वी व्रणदाता हुए। दिति से महाबली हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक पुत्र तथा सिंहिका नाम वाली कन्या का जन्म हुआ।
 सैंहिकेय (राहु) सिंहिका का ही पुत्र है। सिंहिका का दूसरा नाम निर्ऋति भी था। इसीलिये राहु को नैर्ऋत कहते हैं। हिरण्याक्ष को कोई संतान नहीं थी। वह युवावस्था में ही भगवान वाराह के हाथों मारा गया। हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद हुए, जो वैष्णवों में अग्रगण्य माने गये हैं। उनके पुत्र विरोचन हुए और विरोचन के पुत्र साक्षात राजा बलि। बलि का पुत्र बाणासुर हुआ, जो महान योगी, ज्ञानी तथा भगवान शंकर का सेवक था। यहाँ तक दिति का वंश बताया गया।

अब कद्रू के वंश का परिचय सुनिये। अनन्त, वासुकि, कालिय, धनंजय, कर्कोटक, तक्षक, पद्म, ऐरावत, महापद्म, शंकु, शंक, संवरण, धृतराष्ट्र, दुर्धर्ष, दुर्जय, दुर्मुख, बल, गोक्ष, गोकामुख तथा विरूप आदि को कद्रू ने जन्म दिया था।

शौनक जी! जितनी सर्प-जातियाँ हैं, उन सब में प्रधान ये ही हैं। लक्ष्मी के अंश से प्रकट हुई मनसादेवी कद्रू की कन्या हैं। ये तपस्विनी स्त्रियों में श्रेष्ठ, कल्याणस्वरूपा और महातेजस्विनी हैं। इन्हीं का दूसरा नाम जरत्कारु है। इन्हीं के पति मुनिवर जरत्कारु थे, जो नारायण की कला से प्रकट हुए थे। 

विष्णु तुल्य तेजस्वी आस्तीक इन्हीं मनसा देवी के पुत्र हैं। इन सबके नाम मात्र से मनुष्यों का नागों से भय दूर हो जाता है। यहाँ तक कद्रू के वंश का परिचय दिया गया। अब विनता के वंश का वर्णन सुनिये।

विनता के दो पुत्र हुए– अरुण और गरुड़। दोनों ही विष्णु-तुल्य पराक्रमी थे। उन्हीं दोनों से क्रमशः सारी पक्षी-जातियाँ प्रकट हुईं। गाय, बैल और भैंसे – ये सुरभि की श्रेष्ठ संतानें हैं।

समस्त सारमेय (कुत्ते) सरमा के वंशज हैं। दनु के वंश में दानव हुए तथा अन्य स्त्रियों के वंशज अन्यान्य जातियाँ। यहाँ तक कश्यप-वंश का वर्णन किया गया। 

अब चन्द्रमा का आख्यान सुनिये।
पहले चन्द्रमा की पत्नियों के नामों पर ध्यान दीजिये। फिर पुराणों में जो उनका अत्यन्त अपूर्व पुरातन चरित्र है, उसको श्रवण कीजिये। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पूजनीया साध्वी पुनर्वसु, पुष्या, आश्लेषा, मघा, पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, हस्ता, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूला, पूर्वाषाढा, उत्तरषाढा, श्रवणा, धनिष्ठा, शुभा शतभिषा, पूर्वभाद्रपदा, उत्तरभाद्रपदा तथा रेवती– ये सत्ताईस चन्द्रमा की पत्नियाँ हैं।
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इनमें रोहिणी के प्रति चन्द्रमा का विशेष आकर्षण होने के कारण चन्द्रमा ने अन्य सब पत्नियों की बड़ी अवहेलना की। तब उन सबने जाकर पिता दक्ष को अपना दुःख सुनाया। दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय-रोग से ग्रस्त होने का शाप दे दिया। चन्द्रमा ने दुःखी होकर भगवान शंकर की शरण ली और शंकर ने उन्हें आश्रय देकर अपने मस्तक में स्थान दिया।

तब से उनका ‘चन्द्रशेखर’ हो गया। 
देवताओं तथा अन्य लोगों में शिव से बढ़कर शरणागत पालक दूसरा कोई नहीं है।

अपने पति के रोग मुक्त और शिव के मस्तक में स्थित होने की बात सुनकर दक्ष कन्याएँ बारंबार रोने लगीं और तेजस्वी पुरुषों में श्रेष्ठ पिता दक्ष की शरण में आयीं। वहाँ जाकर अपने अंगों को बारंबार पीटती हुई वे उच्चस्वर से रोने लगीं तथा दीनानाथ ब्रह्मपुत्र दक्ष से दीनतापूर्वक कातर वाणी में बोलीं।

दक्ष कन्याओं ने कहा- पिताजी! हमें स्वामी का सौभाग्य प्राप्त हो, इसी उद्देश्य को लेकर हमने आपसे अपना दुःख निवेदन किया था। परंतु सौभाग्य तो दूर रहे, हमारे सद्गुणशाली स्वामी ही हमें छोड़कर चल दिये। तात! नेत्रों के रहते हुए भी हमें सारा जगत अन्धकारपूर्ण दिखायी देता है। आज यह बात समझ में आयी है कि स्त्रियों का नेत्र वास्तव में उनका पति ही है। पति ही स्त्रियों की गति है, पति ही प्राण तथा सम्पत्ति है। ****

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का हेतु तथा भवसागर का सेतु भी पति ही है। पति ही स्त्रियों का नारायण है, पति ही उनका व्रत और सनातन धर्म है। जो पति से विमुख हैं उन स्त्रियों का सारा कर्म व्यर्थ है।



आगामी विडियों में हम स्पष्ट करेंगे कि अत्रि चन्द्रमा ( सोम) और बुध का अहीर जाति से क्या सम्बन्ध है?
अत्रि की उत्पत्ति कभी ब्रह्मा के मन से तो कभी शिव से अग्नि रूप में होती है। अत्रि की उपस्थिति  आभीर कन्या  गायत्री और जगत पिता ब्रह्मा के विवाह के प्रसंग में भी होती है। जिसमें गायत्री स्वयं सावित्री द्वारा गायत्री  और ब्रह्मा के विवाह में सहायक सभी सप्तर्षि गण सभी देवों और देवीयों के अतिरिक्त स्वयं ब्रह्मा और विष्णु तथा शिव को भी शापित कर देती हैं। 
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तब सावित्री द्वारा दिए गये शाप के निवारण स्वरूप आभीर कन्या गायत्री ही सभी के शाप को वरदान में बदल देती हैं।  और  गायत्री माता अत्रि और विष्णु को अपनी अहीर जाति के उत्थान ,मार्गदर्शन और संरक्षण करने का वचन देती हैं। 
तभी से अत्रि आभीर जाति के गोत्र प्रवर्तक माने जाते हैं। 

और विष्णु  सतयुग में नहुष और द्वापर में अपने मूल कारण सम्पूर्ण अंशों से कृष्ण रूप में गोपों ( अहीरों ) के मध्य में ही अवतरित होते हैं।
अहीर जाति सतयुग के प्रारम्भ में भी विद्यमान है। और कालान्तर में पुरुरवा जो गायत्री की नित्य अधिक स्तुति करने से पुरुरवा पुरु  रौति रु--असि दीर्षश्च। पुरु= अधिक + रौति =स्तुते( स्तुति करता है।
गर्ग संहिता में सभी यादवों अथवा अहीरों को कृष्ण नें अपना सनातन अंश कहा है। इसलिए भी अहीरों (यादवों)को विष्णु से उत्पन्न -माना जाता है।
क्योंकि शास्त्रों की विरोधाभासी बातों में एक बात तो मिथकीय आधार पर स्वीकार करनी पड़ेगी ।
तर्क या दर्शन के आधार पर स्वीकार करना भी शास्त्रीय पद्धति है। 

कालान्तर में गोपों, यादवों अथवा अहीरों के सर्वोपरिता को विखण्डन करने के लिए पुरोहितों में उन्हें ब्राह्मण वाद के दायरे में समेटने का प्रयास किया - और अभीर गोपाल ,गोप और यादव आदि पर्याय शब्दों को द्वेष वश अलग अलग जाति बनाकर प्रस्तुत कर दिया 
यहाँ उन प्रक्षेपों को प्रस्तुत करने की आवश्यता नहीं है।
 
यादवों को ब्रह्मा के मानस पुत्र  अत्रि से जोड़कर शास्त्र में लिपिबद्ध करना भी गोपों को ब्राह्मी वर्ण-व्यवस्था में गी घसीटना है।

ब्रह्मा के मन से अत्रि उत्पन्न किए और फिर अत्रि के नेत्रों के मल  से समुद्र में चन्द्रमा उत्पन्न कर दिया । समुद्र मंथन के दौरान दसवें नंबर पर "चन्द्रमा" प्रकट हुआ जिसे  शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लियाl
और चन्द्रमा से बुध को उत्पन्न कर दिया 
महाभारत आदि पर्व नें एक स्थान पर सूर्य चन्द्र दनु की संतान दानव हैं।

📚: सूर्य और चन्द्रमा हैं। ये दनु के वंश में विख्यात दानव बताये गये हैं।
सूर्यवंश और चन्द्र वंश देव ही नही अपितु दानव वंश भी है।
(महाभारत-65) अध्‍याय: आदि पर्व (सम्भव पर्व)

इस लिए यादवों को किस चन्द्र वंश से समबन्धित किया जाए दानव अथवा देव सम्बन्धित अत: ये सारी अत्रि" चन्द्रमा और बुध मूलक थ्योरी सिद्धान्त हीन व परवर्ती  ही है।

ऋषिः - नारायण ऋषिः
देवता - पुरुषो देवता
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः

"चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्याऽअजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥
अनुवाद:-
हे मनुष्यो ! इस विराट पुरुष के (मनसः)-मनन रूप से (चन्द्रमाः)  (जातः) उत्पन्न हुआ (चक्षोः)  आँखों से  (सूर्य्यः) सूर्य (अजायत) उत्पन्न हुआ (श्रोत्रात्) श्रोत्र नामक अवकाश रूप सामर्थ्य से (वायुः) वायु (च) तथा आकाश प्रदेश (च) और (प्राणः) जीवन के निमित्त दश प्राण और (मुखात्) मुख्य ज्योतिर्मय भक्षणस्वरूप सामर्थ्य से (अग्निः) अग्नि (अजायत) उत्पन्न हुआ है, ऐसा तुमको जानना चाहिये॥१२॥
_________    
इस लिए अहीरों की उत्पत्ति गायत्री से भी पूर्व है और गायत्री के परवर्ती उत्पन्न गायत्री का अनन्य  स्तौता- (स्तुति करने वाला)  पुरुरवा पृथ्वी ( इला पर उत्पन्न प्रथम  गोपालक सम्राट है । जिसका साम्राज्य पृथ्वी से लेकर स्वर्ग तक स्थापित है।
पुरुरवा के आयुष-फिर उनके नहुष और बहुत के ययाति से यदु तुर्वसु पुरु अनु द्रुह आदि पुत्र ःीःःीःीःःःीःःीःीःःःीःःीःीःःःीःःीःीः

 आभीर जाति के अन्तर्गत ही हैं।
____________
और विडियो के अन्त में हम  एक समीक्षा प्रस्तुत करेंगे  कि भगवान श्रीकृष्ण की कथा का राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार के लिए हमने कौन सी संस्था का निर्माण किया है ? 

और इस दुर्लभ प्रसंग को विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए एक पुस्तक को  लेखनी बद्ध करने के लिए किन दो  विद्वानों को प्रेरित  किया है ?  यह भी बताया जाएगा-

मित्रों विडियो थोड़ा लम्बा अवश्य है। किन्तु अद्भुत जानकारी से परिपूर्ण है। 

जिसे आज तक साधारण लोग नहीं जानते हैं  इसलिए इस विडियो को एकाग्र चित्त होकर अन्त तक अवश्य देखें-

तो चलिए इसे भगवान श्री कृष्ण  की स्तुति करके  प्रारम्भ करते हैं।

"सच्चिदानन्द रूपाय विश्व उत्पत्ति आदि  हेतवे  तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः।

(श्रीपद्मपुराण उत्तरखण्ड श्रीमद्‌भागवतमाहात्म्य
भक्तिनारदसमागमो नामक प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥)
अनुवाद:-

हे सत् चित्त आनंद! हे संसार की उत्पत्ति के कारण! हे दैहिक, दैविक और भौतिक तीनो तापों का विनाश करने वाले महाप्रभु! हे श्रीकृष्ण! आपको हम कोटि कोटि नमन करते हैं।
_____    

स्वयं भगवान स्वराट् विष्णु ( श्रीकृष्ण)  जो गोलोक में अपने मूल कारण कृष्ण रूप में ही विराजमान हैं वही आभीर जाति में मानवरूप में सीधे अवतरित होकर इस पृथ्वी पर आते हैं; 

क्योंकि आभीर(गोप) जाति साक्षात् उनके रोम कूप ( शरीर) से उत्पन है जो गुण-धर्म में उन्हीं कृष्ण के समान होती है। 

इस बात की पुष्टि अनेक ग्रन्थ से होती है।प्रसिद्ध वैष्णव ग्रन्थ गर्ग-संहिता में उद्धृत " कुछ तथ्यो  को हम प्रस्तुत करते हैं।

कृष्ण का गोप जाति में अवतरण और गोप जाति के विषय में राधा जी का अपना मन्तव्य प्रकट करना ही इसी तथ्य को सूचित करता है। कि गोपों से श्रेष्ठ इस सृष्टि मैं को ईव दूसरा नहीं है।

अनुवाद:- जब स्वयं कृष्ण राधा की एक सखी बनकर  स्वयं ही कृष्ण की राधा से निन्दा करते हैं तब राधा कहती हैं -

 "भूतल के अधिक-भार का -हरण करने वाले कृष्ण तथा सत्पुरुषों के कल्याण करने वाले कृष्ण  गोपों के घर में प्रकट हुए हैं। फिर तुम हे सखी ! उन आदिपुरुष श्रीकृष्ण की निन्दा कैसे करती हो ? तुम तो बड़ी ढीठ जान पड़ती हो। ये गोप सदा गौओं का पालन करते हैं, गोरज की गंगा में नहाते हैं, उसका स्पर्श करते हैं तथा गौओं का उत्तम नामों का जप करते हैं।                       इतना ही नहीं, उन्हें दिन-रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप-जाति से बढ़कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।२१-२२।

(सन्दर्भ:- गर्गसंहिता वृन्दावन खण्ड अध्याय १८)

गाय और गोप जिनके लीला- सहचर बनते हैं।
और इनकी आदिशक्ति- राधा ही "दुर्गा" गायत्री"और उर्वशी आदि के रूप में अँशत:  इन अहीरों के घर में जन्म लेने के लिए प्रेरित होती हैं। उन अहीरों को हेय कैसे कहा जा सकता है ?_ 

ऋग्वेद में विष्णु के लिए  'गोप', 'गोपति' और 'गोपा:' जैसे विशेषणों से सम्बोधित किया गया है।  वस्तुत: वैदिक ऋचाओं मे ं सन्दर्भित  विष्णु गोप रूप में जिस लोक में रहते वहाँ बहुत सी स्वर्ण मण्डित सीगों वाली गायें रहती हैं। 

जो पुराण वर्णित गोलोक का  ही रूपान्तरण अथवा संस्करण है। विष्णु के लिए गोप - विशेषण की परम्परा  "गोप-गोपी-परम्परा के ही प्राचीनतम लिखित प्रमाण कहे जा सकते हैं।

इन (उरूक्रम त्रिपाद-क्षेपी)लंबे डग धर के अपने तीन कदमों में ही तीन लोकों को नापने वाले। विष्णु के कारण रूप और इस ब्रह्माण्ड से परे  ऊपर गोलोक में विराजमान द्विभुजधारी शाश्वत किशोर कृष्ण ही हैं।

विष्णु के तृतीय पाद-क्षेप  परम पद में मधु के उत्स (स्रोत )और भूरिश्रृंगा-(स्वर्ण मण्डित सींगों वाली) जहाँ गउएँ  रहती हैं , वहाँ पड़ता है।

"कदाचित इन गउओं के पालक होने के नाते ही विष्णु को गोप कहा गया है।

ऋग्वेद में विष्णु के सन्दर्भ में ये तथ्य इस ऋचा में प्रतिबिम्बित है।

"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥ (ऋग्वेद १/२२/१८)

शब्दार्थ:-(अदाभ्यः) =सोमरस रखने के लिए गूलर की लकड़ी का बना हुआ पात्र को (धारयन्) धारण करता हुआ । (गोपाः) गोपालक रूप, (विष्णुः) संसार का अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) =तीन (पदानि) क़दमो से (विचक्रमे)= गमन करता है । और ये ही (धर्माणि)= धर्मों को धारण करता है ॥18॥

इन सभी तथ्यों की हम क्रमश: व्याख्या करेंगे।विष्णु को सम्पूर्ण संसार का रक्षक और अविनाशी बताया है। जिन्होंने धर्म को धारण करते हुए तीनों लोको सहित सम्पूर्ण ब्राह्माण्ड को तीन पगों( कदमों) में नाप लिया है

इस तरह अनेक श्रुतियों में परमात्मा के सगुण- साकार रूप का भी वर्णन मिलता है। "विष्णु का परम पद, परम धाम' दिव्य आकाश में स्थित एवं अनेक सूर्यों के समान देदीप्यमान गोलोक ही माना गया है -

"तद् विष्णो: परमं पदं पश्यन्ति सूरयः। दिवीय चक्षुरातातम् (ऋग्वेद १/२२/२०)।

उस विष्णु के परम पद में अनेक सूर्य दिखाई देते है। अर्थात तद् विष्णो:( उस विष्णु के)
सूरयः) सूर्यगण (दिवि) प्रकाशित लोक में । (आततम्) =फैले हुए (चक्षुरिव) नेत्रों के समान जो (विष्णोः) परमेश्वर के  (परमम्) उत्तम से उत्तम (पदम्)=स्थान (तत्) उस को (सदा) सब काल में (पश्यन्ति) देखते हैं॥२०॥

अनुवाद:-वह विष्णु के परम पद में अनेक सूर्य प्रकाशित होते हैं अर्थात- जिस प्रकाशित लोक में अनेक सूर्य गण विस्तारित हैं। जो  विस्तृत नेत्रों के समान उस विष्णु के उत्तम से उत्तम स्थान (लोक ) को सदैव देखते हैं।

ऋग्वेद के मंडल 1 के सूक्त (154) की ऋचा संख्या (6) में भी नीचे देखें-

"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः।अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि" ऋग्वेद-१/१५४/६।)

सरल अनुवाद व अर्थ:-जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें हैं स्थित  अथवा विचरण करती हैं उस  स्थानों को - तुम्हारे  जाने के लिए जिसे-  वास्तव में तुम चाहते भी हो। जो- बहुत प्रकारों से प्रशंसित है जो- सुख वर्षाने वाले परमेश्वर का  उत्कृष्ट (पदम्) -स्थान लोक है जो अत्यन्त उत्कृष्टता से प्रकाशमान होता है  उसी के लिए यहाँ हम वर्णन करते हैं ॥६॥

उपर्युक्त ऋचाओं का सार है कि विष्णु का परम धाम वह है। जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें हैं। और वे विष्णु गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) है)। वस्तुत ऋग्वेद में यहाँ उसी गोलोक का वर्णन है जो ब्रह्म वैवर्त पुराण और देवीभागवतपुराण और गर्ग संहिता आदि  में वर्णित गोलोक है ।

'विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए। परन्तु विष्णु कृष्ण का ही एकाँशी अथवा बह्वाँशी ( बहुत अंशों वाला) रूप है। 

सृष्टि में क्रियान्वित रहता है। स्वयं कृष्ण नहीं कृष्ण तो केवल लीला हेतु पृथ्वी लोक पर गोपों के सानिध्य में ही अवतरण करते हैं। क्योंकि गोप मूलत:  गोलोक की ही सृष्टि हैं 


विदित हो कि वामन अवतार कृष्ण के अंशावतार विष्णु का ही अवतार है नकि स्वयं कृष्ण का अवतार -क्योंकि कृष्ण का साहचर्य सदैव गो और गोपों मैं ही रहता है।

"कृष्ण हाई वोल्टेज रूप हैं तो विराट और क्षुद्र विराट आदि रूप उनके ही कम वोल्टेज के रूप हैं।

 विष्णु कृष्ण के ही एक प्रतिनिधि रूप हैं। परन्तु स्वयं कृष्ण नहीं क्योंकि कृष्ण समष्टि (समूह) हैं तो विष्णु व्यष्टि ( इकाई) अब इकाई में समूह को गुण धर्म तो विद्यमान होते हैं पर उसकी सम्पूर्ण सत्ता अथवा अस्तित्व नहीं।

विशेष:- पद्म पुराण सृष्टि खण्ड '  ऋग्वेद तथा श्रीमद्भगवद्गीता और स्कन्द आदि पुराणों में  गोपों को ही धर्म का आदि प्रसारक(propagater) माना गया है ।

ऋग्वेद 1.22.18) में  भगवान विष्णु गोप रूप में ही धर्म को धारण किये हुए हैं।


विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्”(ऋग्वेद 1.22.18) ऋग्वेद की यह ऋचा इस बात का उद्घोष कर रही है।


आभीर लोग प्राचीन काल से ही "व्रती और "सदाचार सम्पन्न होते थे। स्वयं भगवान् विष्णु ने सतयुग में भी अहीरों के समान किसी अन्य जाति को व्रती और सदाचारीयों में श्रेष्ठ न जानकर अहीरों को ही सदाचार सम्पन्न और धर्मवत्सल स्वीकार किया।

और इस कारण से भी स्वराट्- विष्णु(कृष्ण) ने अपना अवतरण भी इन्हीं अहीरों की जाति में लेना स्वीकार किया। और दूसरा कारण गोप स्वयं कृष्ण के सनातन अंशी हैं। जिनका पूर्व वराह कल्प में ही गोलोक में जन्म हुआ।

"व्यक्ति अपनी भक्ति और तप की शक्ति से गोलोक को प्राप्त कर गोप जाति में जन्म लेता है।

वैदिक ऋचाओं में विष्णु का गोप होना सर्वविदित ही है।

यह गोप रूप विष्णु के आदि कारण रूप कृष्ण का है और यह विष्णु कृष्ण के प्रतिनिध रूप में ही अपने गोप रूप में धर्म को धारण करने की घोषणा कर रहे हैं। धर्म सदाचरण और नैतिक मूल्यों का  पर्याय है। और इसी की स्थापना के लिए कृष्ण भूलोक पर पुन: पुन: आते है।

 "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! अभ्युत्थानम्-अधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजामि- अहम्।। 
श्रीमद्भगवद्गीता ( 4/7) 

हे अर्जुन ! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूप से प्रकट करता हूँ।

अत: गोप रूप में ही कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए समय समय पर अपने एक मानवीय रूप का आश्रय लेकर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं।


कृष्ण और विष्णु का भेद- 

 (दर- असल विष्णु शब्द तीन सात्विक सत्ताओं का वाचक है। एक वह जो स्वराट्-  अथवा स्वयंप्रकाश अथवा सबका मूलकारण द्विभुजधारी गोलोक वासी कृष्ण रूप है। 

 द्वितीय वह रूप है जो  कृष्ण और और उनकी आदि -प्राकृतिक शक्ति राधा दौंनों के संयोग से उत्पन्न विराट रूप है जो अनन्त है।  स्वयं कृष्ण भी इसके विस्तार को नहीं जानते ! 

और  तृतीय रूप जो इस विराट महाविष्णु के प्रत्येक रोमकूप में उत्पन्न ब्रह्माण्ड के देव त्रयी( ब्रह्मा विष्णु महेश) में क्षुद्र विराट्( छोटे विष्णु) नाम से हैं। वह अन्तिम है।इन्हीं की नाभि कमल से ब्रह्मा और फिर उनसे चातुर्वर्ण ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र उत्पन्न होते है।यद्यपि गोलोक में भी ब्रह्मा की उत्पत्ति कृष्ण की नाभि से होती है। परन्तु सृष्टि उत्पादक के रूप में तो रोमकूपीय ब्रह्माण्ड में क्षुद्र विराट् विष्णु के नाभि कमल से होती है। और शिव भी  शिव लोक से आकर  इन्हीं की प्रेरणासे अंश रूप इन्हीं ब्रह्मा के ललाट से उत्पन्न होकर रुदन करने से रूद्र कहलाते हैं। 

विष्णु के तीनों रूप सत्व गुण की ही क्रमश: तीन अवस्था १- विशिष्ट सत्व २-शुद्ध सत्व और ३-सत्व ये तीन अवस्थाऐं हैं।

"पद्म पुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय-17 में अहीरों की जाति में भगवान कृष्ण के रूप में विष्णु के निम्नलिखित तीन श्लोक विशेष विचारणीय हैं।

१- जिसमें प्रथम श्लोक में अहीरों का धर्मतत्व का ज्ञाता होना और सदाचारी होना सूचित किया गया है !

इसके बाद के श्लोकों में गायत्री के द्वारा आभीर जाति का उद्धार करने वाला बताकर अहीरो को दिव्य लोको (गोलोकों) में निवास करने का अधिकारी बनाकर तृतीय श्लोक में विष्णु द्वारा अपने अवतरण की स्वीकृति अहीरों को दी गयी है।

"आभीर लोग पूर्वकाल में भी धर्मतत्व वेत्ता धार्मिक, सदाचारी और धर्मवत्सल कहकर सम्बोधित किए गये हैं।

तीनों तथ्यों के प्रमाणों का वर्णन इन श्लोकों में निर्दशित है।

"धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।      मया ज्ञात्वा ततःकन्या दत्ता चैषा विरञ्चये।१५।

"अनया गायत्र्या तारितो गच्छ युवां भो आभीरा ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।          युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।

"अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।

अनुवाद:-विष्णु ने अहीरों से कहा- मैंने तुमको धर्मज्ञ और धार्मिक सदाचारी तथा धर्मवत्सल जानकर तुम्हारी इस गायत्री नामकी कन्या को ब्रह्मा के लिए यज्ञकार्य हेतु पत्नी रूप में दिया है। (क्योंकि यज्ञ एक व्रतानुष्ठान ही है)। और अहीर कन्याऐं कठिन व्रतों का पालन करती हैं।

हे अहीरों इस गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब दिव्यलोकों (गोलोकों) को जाओ- तुम्हारी अहीर जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों की कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा ( अवतारं करिष्येहं ) और वहीं मेरी लीला (क्रीडा) होगी जब धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।

"गर्गसंहिता के विश्वजित् खण्ड में के अध्याय दो और ग्यारह में यह वर्णन है।

"एक समय की बात है- सुधर्मा में श्रीकृष्‍ण की पूजा करके, उन्‍हें शीश नवाकर प्रसन्नचेता राजा उग्रसेन ने दोनों हाथ जोड़कर धीरे से कहा।

उग्रसेन कृष्ण से बोले ! - भगवन् ! नारदजी के मुख से जिसका महान फल सुना गया है, उस राजसूय नामक यज्ञ का यदि आपकी आज्ञा हो तो अनुष्‍ठान करुँगा। पुरुषोत्तम ! आपके चरणों से पहले के राजा लोग निर्भय होकर, जगत को तिनके के तुल्‍य समझकर अपने मनोरथ के महासागर को पार कर गये थे।

तब श्री कृष्ण भगवान ने कहा- राजन् ! यादवेश्‍वर ! आपने बड़ा उत्तम निश्‍चय किया है। उस यज्ञ से आपकी कीर्ति तीनों लोको में फैल जायगी। प्रभो ! सभा में समस्‍त यादवों को सब ओर से बुलाकर पान का बीड़ा रख दीजिये और प्रतिज्ञा करवाइये।

क्योंकि सभी यादव मेरे ही अंश है।

"ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः ॥ जित्वारीनागमिष्यंति हरिष्यंति बलिं दिशाम् ॥७॥

"शब्दार्थ:-१-ममांशा= मेरे अंश रूप (मुझसे उत्पन्न) २-यादवा: सर्वे = सम्पूर्ण यादव।३- लोकद्वयजिगीषवः = दोनों लोकों को जीतने की इच्छा वाले। ४- जिगीषव: = जीतने की इच्छा रखने वाले। ५- जिगीषा= जीतने की इच्छा - जि=जीतना धातु में +सन् भावे अ प्रत्यय ।= जयेच्छायां । ६- जित्वा= जीतकर।७-अरीन्= शत्रुओ को। ८- आगमिष्यन्ति = लौट आयेंगे। ९-हरिष्यन्ति= हरण कर लाऐंगे।१०-बलिं = भेंट /उपहार।११- दिशाम् = दिशाओं में।

"अनुवाद:-समस्‍त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हें। वे दौनों लोक, को जीतने की इच्‍छा रखने वाले हैं।वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्‍पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।७।

सन्दर्भ:- गर्गसंहिता‎ खण्डः ७ विश्वजित्खण्ड)

"गोप अथवा यादव एक ही हैं। क्योंकि एक स्थान पर गर्ग सहिता में यादवों को कृष्ण के अंश से उत्पन्न बताया गया है। और दूसरी ओर उसी अध्याय में गोपों को कृष्ण के रोमकूपों से उत्पन्न बताया है।"

जब ब्राह्मण स्वयं को ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न मानते हैं। तो यादव तो विष्णु के शरीर से क्लोन विधि से भी उत्पन हो सकते हैं।

और ब्रह्मा का जन्म विष्णु की नाभि में उत्पन्न कमल से सम्भव है। तो यादव अथवा गोप तो साक्षात् स्वराट् विष्णु ( कृष्ण) के शरीर से उत्पन्न हैं। अत: पुराणों में स्वयं ब्राह्मणों के आदि पितामह ब्रह्मा गोपों की स्तुति करते हैं । और उनकी चरणधूलि लेकर अपने को धन्य मानते हैं। गोप ब्रह्मा की सृष्टि नहीं हैं गोप स्वराट विष्णु (कृष्ण) की सृष्टि हैं।  इसी लिए ब्रह्मा भी गोपों की स्तुति करते हैं।

"शास्त्र में लिखा है कि वैष्णव ही इन अहीरों का वर्ण है।

सम्पूर्ण गोप अथवा यादव विष्णु अथवा कृष्ण के अंश अथवा उनके शरीर के रोमकूपों से उत्पन्न हुए है। यह बात ब्रह्म-वैवर्त पुराण ,गर्गसंहिता ,पद्मपुराण और अन्य परवर्ती ग्रन्थ लक्ष्मी नारायणी संहिता और ब्रह्म संहिता आदि में वर्णित है।

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विष्णोरिदम् ।  विष्णु + अण् । )  विष्णुसम्बन्धी  वैष्णव!

विष्णु के उपासक, भक्त और विष्णु से सम्बंधित वैष्णव. कहे जाते हैं। विष्णु के इन छै: गुणों से युक्त होने के कारण भगवत् - संज्ञा है। जो निम्नलिखित हैं।

 १-अनन्त ऐश्वर्य, २-वीर्य, ३-यश, ४-श्री, ५-ज्ञान और ६-वैराग्य रूप 'भग' से सम्पन्न होने के कारण परमात्मा को भगवान् या भगवत् कहा जाता है।

"इस कारण वैष्णवों को भागवत नाम से भी जाना जाता है - भगवत्+अण्=भागवत।

जो भगवत् का भक्त हो वह भागवत् है। श्रीमद् -वल्लभाचार्य का कथन है कि इन्ही परमतत्त्व को वेदान्त में 'ब्रह्म'. स्मृतियों में 'परमात्मा' तथा भागवत में 'भगवान्' कहा गया है।

उनकी सुदृढ़ मान्यता है कि श्रीकृष्ण ही परब्रह्म है वल्लभाचार्य द्वारा लिखित ग्रन्थ में वर्णन है।

"श्रीमद्वल्लभाचार्य लिखित -सिद्धान्त मुक्तावलि "वैष्णव धर्म मूलत: भक्तिमार्ग है।"भक्ति का सम्बंध हृदय की रागात्मिक वृति प्रेम से है। इसीलिए महर्षि शाण्डिल्य भक्ति को ईश्वर के प्रति अनुरक्ति अर्थात् उत्कृष्ठ प्रेम मानते हैं और देवर्षि नारद इसे परमात्मा के प्रति परम प्रेमस्वरूपता कहते हैं।


"मान ले कि ब्रह्माण्ड के जो गोप हैं उनके साथ लीला सहचर बनने के लिए विष्णु उपस्थित होते हैं तो ये असम्भव है ।





देखें ऋग्वेद के दशम मण्डल के द्वादश सूक्त की यह नब्बे वी ऋचा में जिसमें ब्राह्मी सृष्टि का वर्णन है - ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होते हैं।

"ब्राह्मणो अस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।
(ऋग्वेद 10/90/12
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श्लोक का अनुवाद:- इस (ब्रह्मा) के मुख से ब्राह्मण हुआ , बाहू से क्षत्रिय लोग हुए एवं उसकी जांघों से वैश्य हुआ एवं दौनों चरण से शूद्रो की उत्पत्ति हुई।-(10/90/12)

"वक्राद्भुजाभ्यामूरुभ्यां पद्भ्यां चैवाथ जज्ञिरे। "सृजतः प्रजापतेर्लोकानिति धर्मविदो विदुः।-5।

अनुवाद:-
धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि प्रजापति ब्रह्मा जी जब मानव-जगत की सृष्टि करने लगे, उस समय उनके मुख, भुजा, ऊरू और पैर- इन अंगों से मनुष्‍यों का प्रादुर्भाव हुआ था।
 तात! जो मुख से उत्‍पन्‍न हुए, वे ब्राह्मण कहलाये। दोनों भुजाओं से उत्‍पन्‍न होने वाले मनुष्‍यों को क्षत्रिय माना गया। राजन! जो ऊरूओं (जाँघों) से उत्‍पन्‍न हुए, वे धनवान (वैश्‍य) कहे गये; जिनकी उत्‍पत्ति चरणों से हुई, वे सेवक या शूद्र कहलाये ।5-6।

श्रीमहाभारत शान्तिपर्व के अन्‍तर्गत मोक्षधर्म पर्व में पराशरगीता विषयक दो सौ छानबेवाँ अध्‍याय
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ब्रह्मा की सृष्टि हैं। यही चातुर्वर्ण व्यवस्था के अवयव हैं। परन्तु गोप  स्वराट् विष्णु से गोलोक में उत्पन्न हुए है। वह ब्राह्मी सृष्टि नहीं माने जाऐंगे- वे स्वराट् विष्णु ( कृष्ण) से उत्पन्न होने से वैष्णव हैं। 

"इसी सिद्धान्त से पञ्चम वर्ण की उत्पत्ति हुई जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। अथवा पुरोहितों अथवा कथावाचको  द्वारा जानबूझकर छिपाया गया !

शास्त्रों में वर्णन है कि गोप (आभीर) वैष्णव (विष्णु या कृष्ण या मूल तत्व परम्ब्रह्म के रोमकूप) से उत्पन्न वैष्णव (विष्णु या कृष्ण या मूल तत्व परम्ब्रह्म के रोमकूप) से उत्पन्न वैष्णव अञ्श ही थे।

ब्रह्म-वैवर्त पुराण में भी यही अनुमोदन साक्ष्य है।

"कृष्णस्य लोमकूपेभ्य: सद्यो गोपगणो मुने:" आविर्बभूव रूपेण वैशैनेव च तत्सम:।४१।
👇(ब्रह्म-वैवर्त पुराण अध्याय -5 श्लोक 41)

अनुवाद:- कृष्ण के रोमकूपों से गोपोंं (अहीरों) की उत्पत्ति हुई है , जो रूप और वेश में उन्हीं कृष्ण ( विष्णु) के समान थे।

वास्तव में विष्णु का ही गोलोक धाम का वृहद् रूप कृष्ण है।
यही गोपों की उत्पत्ति की बात गर्गसंहिता श्रीविश्वजित्खण्ड के ग्यारहवें अध्याय में यथावत् वर्णित है।

"नन्दो द्रोणो वसुःसाक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः।गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्‌भवाः।२१।"

"राधारोमोद्‌भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः॥काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परैः।२२।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान्स्वयम् ।असंख्यब्रह्मांडपतिर्गोलोकेशः परात्परः ॥२३॥

यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयंते स्वतेजसि ॥तं वदंति परे साक्षात्परिपूर्णतमः स्वयम् ॥२४॥

अनुवाद:-नन्‍दराज साक्षात द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। गोलोक में जो गोपालगण हैं, वे साक्षात श्रीकृष्‍ण के रोम से प्रकट हुए हैं और गोपियॉं श्रीराधा के रोम से उद्भुत हुई हैं।

वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आयी हैं। कुछ ऐसी भी गोपांगनाएं हैं, जो पूर्वकृत पुण्‍यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्‍ण को प्राप्‍त हुई हैं।२१-२२।

भगवान श्रीकृष्‍ण साक्षात परिपूर्णतम परमात्‍मा हैं, असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति, गोलोक के स्‍वामी तथा परात्‍पर ब्रह्म हैं। जिनके अपने तेज में सम्‍पूर्ण तेज विलीन होते हैं, उन्‍हें ब्रह्मा आदि उत्‍कृष्‍ट देवता साक्षात ‘परिपूर्णतम’ कहते हैं, 

____सन्दर्भ:-
इति श्रीगर्गसंहितायां श्रीविश्वजित्खण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे दंतवक्त्रयुद्धे करुषदेशविजयो नामैकादशोऽध्यायः।११।
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"ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा । स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा।४३। ।

ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्रह्मखण्ड अध्याय- एकादश( ग्यारह)।(१.२.४३
अनुवाद- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ,और शूद्र जैसे चार वर्ण-और उनके अनुसार जातियाँ हैं । इनसे पृथक स्वतन्त्र एक वर्ण और उसके अनुसार जाति है वह वर्ण इस विश्व में  वैष्णव नाम से है  और उसकी एक स्वतन्त्र जाति है।(१.२.४३)
 
उपर्युक्त श्लोक में परोक्ष रूप से आभीर जाति का ही संकेत है। जो कि स्वयं स्वराट् विष्णु ( कृष्ण) के रोम कूपों से प्रादुर्भूत होने से वैष्णव वर्ण में हैं।
अहीरों का गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण गोप  है।
अहीरों का वर्ण चातुर्यवर्ण से पृथक पञ्चम् वर्ण वैष्णव है।

शास्त्रों में प्रमाण प्राप्त हुए हैं कि यादव,गोप अथवा अहीर लोग ब्रह्मा की सृष्टि न होने से ही ब्रह्मा के द्वारा बनायी गयी वर्णव्यवस्था में शामिल नहीं माने जाते हैं। विष्णु से उत्पन्न होने से इनका पृथक वर्ण वैष्णव है।

  1. तादृशं मुनिशार्दूल शृणु त्वं वच्मि सांप्रतम् ।विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते ३।
  2. जाति सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव: श्रेष्ठ उच्यते। येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ।४।
  3. क्षमा दया तपः सत्यं येषां वै तिष्ठति द्विज ।तेषां दर्शनमात्रेण पापं नश्यति तूलवत् ।५।
  4. हिंसाधर्माद्विनिर्मुक्ता यस्य विष्णौ स्थिता मतिः ।शंखचक्रगदापद्मं नित्यं वै धारयेत्तु यः ।६।
  5. तुलसीकाष्ठजां मालां कंठे वै धारयेद्यतः ।तिलकानि द्वादशधा नित्यं वै धारयेद्बुधः७।
  6. धर्माधर्मं तु जानाति यः स वैष्णव उच्यते ।वेदशास्त्ररतो नित्यं नित्यं वै यज्ञयाजकः ८।
  7. उत्सवांश्च चतुर्विंशत्कुर्वंति च पुनः पुनः ।तेषां कुलं धन्यतमं तेषां वै यश उच्यते।९।
  8. ते वै लोके धन्यतमा जाता भागवता नराः ।एक एव कुले यस्य जातो भागवतो नरः १०।
  9. तत्कुलं तारितं तेन भूयोभूयश्च वाडव ।अंडजा उद्भिजाश्चैव ये जरायुज योनयः ११।

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"अनुवाद:-महेश्वर ने कहा:- हे नारद सुनो ! मैं वैष्णव के लक्षण बताता हूँ। उसके सुनने मात्र से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है ।१।

वैष्णवों के जैसे लक्षण और स्वरूप होते हैं। उसे मैं बतला रहा हूँ। हे मुनि श्रेष्ठ उसे तुम सुनो!।२।

चूँकि वह विष्णु से उत्पन्न  होता है। इस लिए वह वैष्णव हुआ।


विष्णोरयं यतो हि आसीत् तस्मात् वैष्णव उच्यते .३..........सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव श्रेष्ठ: उच्यते ।४।

अनुवाद:- विष्णु से यह उत्पन्न होने ही वैष्णव कहे जाते हैं....... सभी वर्णों में वैष्णव वर्ण श्रेष्ठ कहा जाता है।३-४।

"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र चार वर्ण और उनके अनुसार( जातीयाँ) इस विश्व में हैं उसी प्रकार वैष्णव वर्ण के अनुसार एक स्वतन्त्र जाति है।*

"विशेष:- ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियाँ नहीं हैं ये वर्ण हैं जातियाँ वर्णों के अन्तर्गत ही होती है।

"पद्म पुराण उत्तरखण्ड में अध्याय 68 में  वैष्णव वर्ण को रूप में वर्णित है

"जाति सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव: श्रेष्ठ उच्यते। येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ।४।

पद्म पुराण कार ने वैष्णव वर्ण के रूप में सम्पादित किया है। 


ऐसे वैष्णव का वंश अत्यन्त धन्य है। उन्ही का यश बढ़ता है।"जो भागवत हो जाते हैं। वे मनुष्य अत्यन्त धन्य हैं।९। 

जिसके वंश में एक भी भागवत हो जाता है  हे नारद ! उस वंश को बार- बार तार देता है।१०।

"उपर्युक्त श्लोकों में गोपों के वैष्णव वर्ण तथा भागवत धर्म का संकेत है जिसे अन्य जाति के पुरुष गोपों के प्रति श्रृद्धा और कृष्ण भक्ति से प्राप्त कर लेते हैं।। 

"सन्दर्भ:-(पद्मपुराण खण्ड ६ (उत्तरखण्डः) अध्यायः -(६८)

"विशेष:-विष्णोरस्य रोमकूपैर्भवति  अण्सन्तति वाची- विष्णु+ अण् = वैष्णव= विष्णु से उत्पन्न अथवा विष्णु से सम्बन्धित- जन वैष्णव हैं।

अर्थ- विष्णु के रोमकूपों से उत्पन्न अण्- प्रत्यय सन्तान वाची भी है विष्णु पद में तद्धित अण् प्रत्यय करने पर वैष्णव शब्द निष्पन्न होता है। अत: गोप वैष्णव वर्ण के हैं। 

वैष्णव वर्ण की स्वतन्त्र जाति आभीर है। पद्म पुराण उत्तराखण्ड के अतिरिक्त इसका संकेत ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी है । प्रसंगानुसार वर्णित किया गया है।

श्रीपाद्मे महापुराणे पंचपंचाशत्साहस्र्यां संहितायामुत्तरखंडे उमापतिनारदसंवादे वैष्णवमाहात्म्यंनाम अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।६८।

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अत: यादव अथवा गोप गण ब्राह्मणों की वर्ण व्यवस्था में समाहित नही होने से रूढ़िवादी पुरोहितों ने अहीरों के विषय में इतिहास छुपा कर बाते लिखीं हैं।

किसी भी पुराण अथवा शास्त्र में ब्रह्मा से गोपों की उत्पत्ति नहीं हुई है ।

गोप वैष्णव वर्ण में आभीर जाति के रूप में हैं देखे नीचे ब्रह्मवैवर्त पुराण का सन्दर्भ-

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मूल विष्णु स्वयं भगवान् कृष्ण का गोलोक वासी सनातन रूप है। और स्थूल विष्णु ही उनका विराट् रूप है।
कृष्ण सदैव गोपों में ही अवतरित होते हैं। और
गो" गोलोक और गोप सदैव समन्वित (एकत्रित) रहते हैं।

गोपों की उत्पत्ति गोपियों सहित कृष्ण और राधा से गोलोक धाम में ही होती है। कृष्ण की लीलाओं के सहायक बनने के लिए ही गोप गोलोक से सीधे पृथ्वी लोक में आते हैं।

और जब तक पृथ्वी पर गोप जाति विद्यमान रहती है तब तक कृष्ण भी अपने लौकिक जीवन का अवसान होने पर भी निराकार रूप से विद्यमान रहते ही हैं। इसमें कोई सन्देह पृथ्वी पर दोनों की उपस्थित कृष्ण के होने को सूचित करती है। 

"गोप अथवा यादव एक ही थे क्योंकि एक स्थान पर गर्ग सहिता में यादवों को कृष्ण के अंश से उत्पन्न बताया गया है। और दूसरी ओर उसी अध्याय में गोपों को कृष्ण के रोमकूपों से उत्पन्न बताया है।" जिसका समान भावार्थ है।

"जब ब्राह्मण स्वयं को ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न मानते हैं। तो यादव तो विष्णु के शरीर से क्लोन विधि से भी उत्पन क्यों नहीं हो सकते हैं ?

और ब्रह्मा का जन्म विष्णु की नाभि में उत्पन्न कमल से सम्भव है। तो यादव अथवा गोप तो साक्षात् विष्णु के शरीर से उत्पन्न हैं।परन्तु दोनों की उत्पत्ति मूलत: ब्रह्माण्ड से परे गोलोक में ही होती है और ब्राह्मणों की उत्पत्ति विराट के एक रोम कप में स्थित  ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा के मुख से -इसलिए गोप अथवा यादव ब्राह्मणों से कई गुना  श्रेष्ठ व पूज्य हैं

परन्तु उन्हें इसके अनुरूप चरित्र स्थापित करने की आवश्यकता है।

परन्तु हम इन शास्त्रीय मान्यताओं पर ही आश्रित होकर वर्णव्यवस्था का पालन और आचरण करते हैं जो कि गोप जाति के अनुकूल नहीं है । "किसी शास्त्र में ब्रह्मा से गोपों की उत्पत्ति नहीं दर्शायी है!

तो विचार करना होगा कि गोप साक्षात् विष्णु के ही शरीर(रोम कूप) से उत्पन्न हैं । जबकि ब्राह्मण विष्णु की सृष्टि ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हैं  । इस लिए गोप ब्राह्मणों से श्रेष्ठ और उनके भी पूज्य हैं।

ब्रह्म-वैवर्त पुराण में भी यही अनुमोदन साक्ष्य है।

(👇 "कृष्णस्य लोमकूपेभ्य: सद्यो गोपगणो आविर्बभूव रूपेण वैशैनेव च तत्सम:।४१।

👇(ब्रह्म-वैवर्त पुराण अध्याय -5 श्लोक 41)

अनुवाद:- कृष्ण के रोमकूपों से गोपोंं (अहीरों) की उत्पत्ति हुई है , जो रूप और वेश में उन्हीं कृष्ण ( विष्णु) के समान थे।

वास्तव में विष्णु का ही गोलोक धाम का वृहद् रूप कृष्ण है।
यही गोपों की उत्पत्ति की बात गर्गसंहिता श्रीविश्वजित्खण्ड के ग्यारहवें अध्याय में यथावत् वर्णित है।

"

"नन्दो द्रोणो वसुःसाक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः।गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्‌भवाः।२१।"

"राधारोमोद्‌भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः॥काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परैः।२२।

परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान्स्वयम् ।असंख्यब्रह्मांडपतिर्गोलोकेशः परात्परः ॥२३॥

यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयंते स्वतेजसि ॥तं वदंति परे साक्षात्परिपूर्णतमः स्वयम् ॥२४॥

अनुवाद:-नन्‍दराज साक्षात द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। गोलोक में जो गोपालगण हैं, वे साक्षात श्रीकृष्‍ण के रोम से प्रकट हुए हैं और गोपियॉं श्रीराधा के रोम से उद्भुत हुई हैं।

वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आयी हैं। कुछ ऐसी भी गोपांगनाएं हैं, जो पूर्वकृत पुण्‍यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्‍ण को प्राप्‍त हुई हैं।२१-२२।

भगवान श्रीकृष्‍ण साक्षात परिपूर्णतम परमात्‍मा हैं, असंख्‍य ब्रह्माण्‍डों के अधिपति, गोलोक के स्‍वामी तथा परात्‍पर ब्रह्म हैं। जिनके अपने तेज में सम्‍पूर्ण तेज विलीन होते हैं, उन्‍हें ब्रह्मा आदि उत्‍कृष्‍ट देवता साक्षात ‘परिपूर्णतम’ कहते हैं, 

____सन्दर्भ:-
इति श्रीगर्गसंहितायां श्रीविश्वजित्खण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे दंतवक्त्रयुद्धे करुषदेशविजयो नामैकादशोऽध्यायः।११।
_______________

"ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा । स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा।४३। ।

ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्रह्मखण्ड अध्याय- एकादश( ग्यारह)।(१.२.४३
अनुवाद- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ,और शूद्र जैसे चार वर्ण-और उनके अनुसार जातियाँ हैं । इनसे पृथक स्वतन्त्र एक वर्ण और उसके अनुसार जाति है वह वर्ण इस विश्व में  वैष्णव नाम से है  और उसकी एक स्वतन्त्र जाति है।(१.२.४३)
 
उपर्युक्त श्लोक में परोक्ष रूप से आभीर जाति का ही संकेत है। जो कि स्वयं स्वराट् विष्णु ( कृष्ण) के रोम कूपों से प्रादुर्भूत होने से वैष्णव वर्ण में हैं।
अहीरों का गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण गोप  है।
अहीरों का वर्ण चातुर्यवर्ण से पृथक पञ्चम् वर्ण वैष्णव है।

शास्त्रों में प्रमाण प्राप्त हुए हैं कि यादव,गोप अथवा अहीर लोग ब्रह्मा की सृष्टि न होने से ही ब्रह्मा के द्वारा बनायी गयी वर्णव्यवस्था में शामिल नहीं माने जाते हैं। विष्णु से उत्पन्न होने से इनका पृथक वर्ण वैष्णव है।

  1. तादृशं मुनिशार्दूल शृणु त्वं वच्मि सांप्रतम् ।विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते ३।
  2. जाति सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव: श्रेष्ठ उच्यते। येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ।४।
  3. क्षमा दया तपः सत्यं येषां वै तिष्ठति द्विज ।तेषां दर्शनमात्रेण पापं नश्यति तूलवत् ।५।
  4. हिंसाधर्माद्विनिर्मुक्ता यस्य विष्णौ स्थिता मतिः ।शंखचक्रगदापद्मं नित्यं वै धारयेत्तु यः ।६।
  5. तुलसीकाष्ठजां मालां कंठे वै धारयेद्यतः ।तिलकानि द्वादशधा नित्यं वै धारयेद्बुधः७।
  6. धर्माधर्मं तु जानाति यः स वैष्णव उच्यते ।वेदशास्त्ररतो नित्यं नित्यं वै यज्ञयाजकः ८।
  7. उत्सवांश्च चतुर्विंशत्कुर्वंति च पुनः पुनः ।तेषां कुलं धन्यतमं तेषां वै यश उच्यते।९।
  8. ते वै लोके धन्यतमा जाता भागवता नराः ।एक एव कुले यस्य जातो भागवतो नरः १०।
  9. तत्कुलं तारितं तेन भूयोभूयश्च वाडव ।अंडजा उद्भिजाश्चैव ये जरायुज योनयः ११।

_________________

"अनुवाद:-महेश्वर ने कहा:- हे नारद सुनो ! मैं वैष्णव के लक्षण बताता हूँ। उसके सुनने मात्र से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है ।१।

वैष्णवों के जैसे लक्षण और स्वरूप होते हैं। उसे मैं बतला रहा हूँ। हे मुनि श्रेष्ठ उसे तुम सुनो!।२।

चूँकि वह विष्णु से उत्पन्न  होता है। इस लिए वह वैष्णव हुआ।

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"विष्णोरयं यतो हि आसीत् तस्मात् वैष्णव उच्यते .३..........सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव श्रेष्ठ: उच्यते ।४।

अनुवाद:- विष्णु से यह उत्पन्न होने ही वैष्णव कहे जाते हैं....... सभी वर्णों में वैष्णव वर्ण श्रेष्ठ कहा जाता है।३-४।

"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र चार वर्ण और उनके अनुसार( जातीयाँ) इस विश्व में हैं उसी प्रकार वैष्णव वर्ण के अनुसार एक स्वतन्त्र जाति है।*

"विशेष:- ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियाँ नहीं हैं ये वर्ण हैं जातियाँ वर्णों के अन्तर्गत ही होती है।

"पद्म पुराण उत्तरखण्ड में अध्याय 68 में  वैष्णव

वर्ण को रूप में वर्णित है

"जाति सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णव: श्रेष्ठ उच्यते। येषां पुण्यतमाहारस्तेषां वंशे तु वैष्णवः ।४।

पद्म पुराण कार ने वैष्णव वर्ण के रूप में सम्पादित किया है। 




बुध्न बनाम bottom- और बुध की पौराणिक काल्पनिक कहानी-

Old English Wōdnesdæg ‘day of Odin’, named after the Germanic god Odin or Woden, the supreme god; translation of late Latin Mercurii dies, Odin being equated with the Roman god Mercury. Compare with Dutch woensdag

पुरानी अंग्रेज़ी Wōdnesdæg 'ओडिन का दिन', जिसका नाम जर्मनिक देवता ओडिन या वोडेन, सर्वोच्च देवता के नाम पर रखा गया था; दिवंगत लैटिन मर्क्यूरी डाइस का अनुवाद, ओडिन की तुलना रोमन देवता मर्करी से की गई। डच वोन्सडैग से तुलना करें



बुध्न- शब्द की व्युत्पत्ति परवर्ती कोशकारों ने बन्ध धातु से की है। बन्ध धातु में उणादि सूत्र नक् पूर्वक बन्ध का बुध आदेश होने पर-

(बन्ध--नक् बुधादेशः)-  १ मूल अमरः कोश २ शिव गरतः ३ अन्तरीक्ष ऋग्वेद ४ । १९ । ४ भाष्यम् ।

 “पृथुबुध्नोदरा- कृतिः” वेदान्तप० । “अर्वाग्बिधश्चमस ऊर्द्ध्व बुधः” शा० भा० धृता श्रुतिः । निरुक्ते तु बुद्धा अस्मिन् धृता आप इति अन्तरिक्षं बुध्नम्” तस्य निरुक्तिरुक्ता 

यूरोपीय ग्रीक लैटिन और डच आदि भाषोओं में भी यह शब्द निम्न रूपों में है।
Proto-Indo-European *bʰudʰmḗn (“bottom”). To 
 Middle English botme, botom, 
To 
Proto-Germanic *butmaz, *budmaz,
To
Old English botm, bodan (“bottom, foundation; ground, abyss”), मूल- 

______________________
सम्बन्धित अन्य शब्द-
 Cognate with Dutch bodem, 

German Boden, Icelandic botn, 

Danish bund; also Irish bonn (“sole (of foot)”),
Ancient Greek πυθμήν (puthmḗn, “bottom of a cup or jar”), 

Sanskrit बुध्न (budhna, “bottom”), 

Persian بن‎ (bon, “bottom”), 

Latin fundus (“bottom”)

 (whence fund, via French). 

The sense “posterior of a person” is from 1794; the verb “to reach the bottom of” is from 1808.

 bottom dollar (“the last dollar one has”) is from 1882.

__________________
मध्य अंग्रेजी से बॉटमे, बॉटम, पुरानी अंग्रेजी से बॉटम, बोडन ("बॉटम, फाउंडेशन; ग्राउंड, एबिस"), प्रोटो-जर्मेनिक से *बटमाज़, *बडमाज़, प्रोटो-इंडो-यूरोपियन से *ब्यूडमैन ("बॉटम")। डच बोडेम, जर्मन बोडेन, आइसलैंडिक बॉटन, डेनिश बंड के साथ संगत; इसके अलावा आयरिश बॉन ("पैर का एकमात्र"), प्राचीन यूनानी πυθμήν (पुथमन, "कप या जार का निचला हिस्सा"), 
संस्कृत बुध्न (बुध्ना, "नीचे"), 
फ़ारसी بن‎ (बॉन, "नीचे"), लैटिन फ़ंडस ("नीचे") 

(फ़्रेंच के माध्यम से फ़ंड कहाँ से है)।

 "किसी व्यक्ति का पिछला भाग" का अर्थ 1794 से है; क्रिया "नीचे तक पहुंचना" 1808 से है।

 निचला डॉलर ("जिसके पास आखिरी डॉलर है") 1882 से है

____________________ 
बुध्नः, पुं, (बध्नातीति । बन्धबन्धने “बन्धेर्व्रधिबधी च ।” उणा० ३ । ५ । इति नक् बुधादेशश्च ।) वृक्षमूलम् । इत्यमरः । २ । ४ । १२ ॥ (मूलदेशः । अग्रभागः । यथा, अथर्व्ववेदे । २ । १४ । ४ । “गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रो वज्रेणाधि- तिष्ठतु ।”) शिवः । यथा, -- “निवेश्य बुध्ने चरणं स्मितानना गुरुं समारोढु मथोपचक्रमुः ।” इति हरविलासे राजशेस्वरः । इति भरतः ॥

अमरकोशः
बुध्न पुं।

मूलमात्रम्

समानार्थक:मूल,बुध्न,अङ्घ्रिनामक

2।4।12।1।5

शिरोग्रं शिखरं वा ना मूलं बुध्नोऽङ्घ्रिनामकः। सारो मज्जा नरि त्वक्स्त्री वल्कं वल्कलमस्त्रियाम्.।

: अब्जादीनाम्_मूलम्, तरुमूलम्, शाखामूलम्, वीरणमूलम्, पक्षमूलम्, यवादीनां_मूलम्, इक्षुमूलम्, पिप्पलीमूलम्

पदार्थ-विभागः : अवयवः

वाचस्पत्यम्
'''बुध्न'''¦ पु॰ बन्ध--नक् बुधादेशः।

१ मूले अमरः

२ शिवे गरतः

३ अन्तरीक्षे ऋ॰

४ ।

१९ ।

४ भाष्यम्।
“पृथुबुध्नोदरा-कृतिः” वेदान्तप॰।
“अर्वाग्बिधश्चमस ऊर्द्ध्व बुधः” शा॰ भा॰धृता श्रुतिः। निरुक्ते तु बुद्धा अस्मिन् धृता आप इतिअन्तरिक्षं बुध्नम्” तस्य निरुक्तिरुक्ता।

शब्दसागरः
बुध्न¦ m. (-ध्नः)
1. The root of a tree.
2. The bottom of a vessel.
3. S4IVA. E. बुध् to know, Una4di aff. नक्ः also ब्रध्न in the last sense.

Apte
बुध्नः [budhnḥ], 1 The bottom of a vessel; अर्वाग् बिलश्चमस ऊर्ध्व- बुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं बिश्वरूपम् Bṛi. Up.2.2.3.

The foot of a tree; बुध्नानधुरवाग्भावभिया शुण्डाग्रमण्डलैः Śiva B.

The lowest part.

An epithet of Śiva. (Also बुध्न्य in the last sense).

The body.

Ved. The sky.

The stock of a musket (Mar. दस्ता); सुकाष्ठोपाङ्गबुध्नं च Śukra.4.128.

Monier-Williams
बुध्न mn. (probably not connected with बुध्; but See. Un2. iii , 5 )bottom , ground , base , depth , lowest part of anything (as the root of a tree etc. ) RV. AV. S3Br. ( बुध्न) S3rS. ChUp.

बुध्न mn. the sky Nir.

बुध्न mn. the body ib.

बुध्न mn. N. of a son of the 14th मनुVP. ; often w.r. for बुध्न्य([ cf. Gk. ? Lat. fundus ; Germ. bodam , bodem , Boden ; Angl.Sax. botm ; Eng. bottom.])

Purana index
--a son of खश and a राक्षस. Br. III. 7. १३४; वा. ६९. १६६.




स्कन्दपुराणम्/खण्डः ४ (काशीखण्डः)/अध्यायः ०१५

              "अगस्तिरुवाच।
शृणु पत्नि महाभागे लोपामुद्रे सधर्मिणि ।
कथा विष्णुगणाभ्यां च कथितां शिवशर्मणे।१।
                "शिवशर्मोवाच ।
अहो गणौ विचित्रेयं श्रुता चान्द्रमसी कथा ।।
उडुलोककथां ख्यातं विष्वगाख्यानकोविदौ ।२।
                 "गणावूचतुः ।
पुरा सिसृक्षतः सृष्टिं स्रष्टुरंगुष्ठपृष्ठतः ।।
दक्षः प्रजाविनिर्माणे दक्षो जातः प्रजापतिः।।
षष्टिर्दुहितरस्तस्य तपोलावण्यभूषणाः ।।
सर्वलावण्यरोहिण्यो रोहिणीप्रमुखाः शुभाः।४।

ताभिस्तप्त्वा तपस्तीव्रं प्राप्य वैश्वेश्वरीं पुरीम् ।।
आराधितो महादेवः सोमः सोमविभूपणः ।५।

यदा तुष्टोयमीशानो दातुं वरमथाययौ ।।
उवाच च प्रसन्नात्मा याचध्वं वरमुत्तमम् ।। ६ ।।

शंभोर्वाक्यमथाकर्ण्य ऊचुस्ताश्च कुमारिकाः ।।
यदि देयो वरोऽस्माकं वरयोग्याः स्म शंकर ।। ७ ।।

भवतोपि महादेव भवतापहरो हि यः ।।
रूपेण भवता तुल्यः स नो भर्ता भवत्विति ।। ८ ।।

लिंगं संस्थाप्य सुमहन्नक्षत्रेश्वर संज्ञितम् ।।
वारणायास्तटे रम्ये संगमेश्वरसन्निधौ। ।। ९ ।।

दिव्यं वर्ष सहस्रं तु पुरुषायितसंज्ञितम् ।।
तपस्तप्तं महत्ताभिः पुरुषैरपि दुष्करम् ।। 4.1.15.१० ।।

ततस्तुष्टो हि विश्वेशो व्यतरद्वरमुत्तमम् ।।
सर्वासामेकपत्नीनामकत्रे(?) स्थिरचेतसाम् ।११।

                  "श्री विश्वेश्वर उवाच ।।
न क्षान्तं हि तपोत्युग्रमेतदन्याभिरीदृशम् ।।
पुराऽबलाभिस्तस्माद्वो नाम नक्षत्रमत्र वै ।१२ ।


पुरुषायितसंज्ञेन तप्तं यत्तपसाधुना ।।
भवतीभिस्ततः पुंस्त्वमिच्छया वो भविष्यति।१३।

ज्योतिश्चक्रे समस्तेऽस्मिन्नग्रगण्या भविष्यथ ।।
मेषादीनां च राशीनां योनयो यूयमुत्तमाः ।। १४ ।।

_________________
ओषधीनां सुधायाश्च ब्राह्मणानां च यः पतिः ।।
पतिमत्यो भवत्योपि तेन पत्या शुभाननाः।। १५।


भवतीनामिदं लिंगं नक्षत्रेश्वर संज्ञितम् ।।
पूजयित्वा नरो गंता भवतीलोकमुत्तमम् ।। १६ ।।


उपरिष्टान्मृगांकस्य लोको वस्तु भविष्यति ।।
सर्वासां तारकाणां च मध्ये मान्या भविष्यथ।१७।


नक्षत्रपूजका ये च नक्षत्रव्रतचारिणः ।।
ते वो लोके वसिष्यंति नक्षत्र सदृशप्रभाः ।। १८ ।।

नक्षत्रग्रहराशीनां बाधास्तेषां कदाचन ।।
न भविष्यंति ये काश्यां नक्षत्रेश्वरवीक्षकाः ।१९।


               "अगस्त्य उवाच ।।
अतिथित्वमवाप नेत्रयोर्बुधलोकः शिवशर्मणस्त्वथ 
गणयोर्भगणस्य संकथां कथयित्रो रिति विष्णुचेतसोः ।। 4.1.15.२० ।।


               शिवशर्मोवाच ।।
कस्य लोकोयमतुलो ब्रूतं श्रीभगवद्गणौ ।।
पीयूषभानोरिव मे मनः प्रीणयतेतराम् ।। २१ ।।
               "गणावूचतुः ।।
शिवशर्मञ्छृणु कथामेतां पापापहारिणीम्।।
स्वर्गमार्गविनोदाय तापत्रयविनाशिनीम् ।। २२ ।।

योसौ पूर्वं महाकांतिरावाभ्यां परिवर्णितः ।।
साम्राज्यपदमापन्नो द्विजराजस्तवाग्रतः ।। २३ ।।

दक्षिणा राजसूयस्य येन त्रिभुवनं कृता ।।
तपस्तताप योत्युग्रं पद्मानां दशतीर्दश ।।२४।।

अत्रिनेत्रसमुद्भूतः पौत्रो वै द्रुहिणस्य यः ।।
नाथः सर्वौषधीनां च ज्योतिषां पतिरेव च।२५।

निर्मलानां कलानां च शेवधिर्यश्च गीयते ।।
उद्यन्परोपतापं यः स्वकरैर्गलहस्तयेत् ।। २६ ।।

मुदंकुमुदिनीनांयस्तनोति जगता सह ।।
दिग्वधू चारु शृंगारदर्शनादर्शमंडलः ।। २७ ।।

किमन्यैर्गुणसंभारैरतोपि न समं विधोः ।।
निजोत्तमांगे सर्वज्ञः कलां यस्यावतंसयेत् ।२८ ।।

बृहस्पतेस्स वै भार्यामैश्वर्यमदमोहितः ।।
पुरोहितस्यापिगुरोर्भ्रातुरांगिरसस्य वै ।२९ ।

जहार तरसा तारां रूपवान्रूपशालिनीम्।।
वार्यमाणोपि गीर्वाणैर्बहुदेवर्षिभिः पुनः ।। 4.1.15.३० ।।

_________________________________


नायं कलानिधेर्दोषो द्विजराजस्य तस्य वै ।।
हित्वा त्रिनेत्रं कामेन कस्य नो खडितं मनः ।।३१।।

ध्वांतमेतदभितः प्रसारियत्तच्छमाय विधिनाविनिर्मितम्।।
दीपभास्करकरामहौषधं नाधिपत्य तमसस्तुकिंचन ।। ३२ ।।

आधिपत्यमदमोहितं हितं शंसितं स्पृशति नो हरेर्हितम् ।।
दुर्जनविहिततीर्थमज्जनैः शुद्धधीरिव विरुद्धमानसम्।। ३३ ।।

धिग्धिगेतदधिकर्द्धि चेष्टितं चंक्रमेक्षणविलक्षितं यतः ।।
वीक्षते क्षणमचारुचक्षुषा घातितेन विपदःपदेन च ।। ३४ ।।

कः कामेन न निर्जितस्त्रिजगतां पुष्पायुधेनाप्यहो कः क्रोधस्यवशंगतो ननच को लोभेन संमोहितः ।।
योषिल्लोचनभल्लभिन्नहृदयः को नाप्तवानापदं को राज्यश्रियमाप्यनांधपदवीं यातोपि सल्लोचनः ।। ३५ ।।

आधिपत्यकमलातिचंचला प्राप्यतां च यदिहार्जितं किल ।।
निश्चलं सदसदुच्चकैर्हितं कार्यमार्यचरितैः सदैव तत् ।। ३६ ।।

न यदांगिरसे तारां स व्यसर्जयदुल्बणः ।।
रुद्रोथ पार्ष्णिं जग्राह गृहीत्वाजगवं धनुः ।। ३७ ।।

तेन ब्रह्मशिरोनाम परमास्त्रं महात्मना ।।
उत्सृष्टं देवदेवायतेन तन्नाशितं ततः ।। ३८ ।।

तयोस्तद्युद्धमभवद्घोरं वै तारकामयम् ।।
ततस्त्वकांड ब्रह्मांड भंगाद्भीतोभवद्विधिः ।।३९।।

निवार्य रुद्रं समरात्संवर्तानलवर्चसम् ।।
ददावांगिरसे तारां स्वयमेव पितामहः ।।4.1.15.४०।।

अथांतर्गर्भमालोक्य तारां प्राह बृहस्पतिः ।।
मदीयायां न ते योनौ गर्भो धार्यः कथंचन ।।४१।।

इषीकास्तंबमासाद्य गर्भं सा चोत्ससर्ज ह ।।
जातमात्रः स भगवान्देवानामाक्षिपद्वपुः ।। ४२ ।।

ततः संशयमापन्नास्तारामूचुः सुरोत्तमाः ।।
सत्यं बूहि सुतः कस्य सोमस्याथ बृहस्पतेः ।४३।

पृच्छमाना यदा देवै र्नाह ताराऽतिसत्रपा ।।
तदा सा शप्तुमारब्धा कुमारेणातितेजसा ।। ४४ ।।

तं निवार्य तदा ब्रह्मा तारां पप्रच्छ संशयम्।।
प्रोवाच प्रांजलिः सा तं सोमस्येति पितामहम् ।। ४५ ।।

तदा स मूर्ध्न्युपाघ्राय राजा गर्भं प्रजापतिः ।।
बुध इत्यकरोन्नाम तस्य बालस्य धीमतः ।। ४६।


ततश्च सर्वदेवेभ्यस्तेजोरूपबलाधिकः ।।
बुधः सोमं समापृच्छय तपसे कृतनिश्चयः ।।४७।।

जगाम काशीं निर्वाणराशिं विश्वेशपालिताम् ।।
तत्र लिगं प्रतिष्ठाप्य स स्वनाम्ना बुधेश्वरम् ।४८।

तपश्चचार चात्युग्रमुग्रं संशीलयन्हृदि ।।
वर्षाणामयुतं बालो बालेंदुतिलकं शिवम् ।। ४९ ।।

ततो विश्वपतिः श्रीमान्विश्वेशो विश्वभावनः ।।
बुधेश्वरान्महालिंगादाविरासीन्महोदयः ।। 4.1.15.५० ।।

उवाच च प्रसन्नात्मा ज्योतीरूपो महेश्वरः ।।
वरं ब्रूहि महाबुद्धे बुधान्य विबुधोत्तमः ।। ५१ ।।

तवानेनाति तपसा लिंगसंशीलनेन च ।।
प्रसन्नोस्मि महासौम्य नादेयं त्वयि विद्यते ।५२।

इति श्रुत्वा वचः सोथ मेघगंभीर निःस्वनम्।।
अवग्रहपरिम्लान सस्यसंजीवनोपमम्।। ५३ ।।

उन्मील्यलोचने यावत्पुरः पश्यति बालकः ।।
तावल्लिंगे ददर्शाथ त्र्यंबकं शशिशेखरम्।।५४।।


                "बुध उवाच  ।।
नमः पूतात्मने तुभ्यं ज्योतीरूप नमोस्तु ते ।।
विश्वरूप नमस्तुभ्यं रूपातीताय ते नमः ।।५५ ।

नमः सर्वार्ति नाशाय प्रणतानां शिवात्मने ।।
सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वकर्त्रे नमोस्तु ते ।। ५६ ।।

कृपालवे नमस्तुभ्यं भक्तिगम्याय ते नमः ।।
फलदात्रे च तपसां तपोरूपाय ते नमः ।। ५७ ।।

शंभो शिवशिवाकांत शांतश्री कंठशूलभृत् ।।
शशिशेखरशर्वेश शंकरेश्वर धूर्जटे ।। ५८ ।।

पिनाकपाणे गिरिश शितिकंठ सदाशिव ।।
महादेव नमस्तुभ्यं देवदेव नमोस्तु ते ।। ५९ ।।

स्तुतिकर्तुं न जानामि स्तुतिप्रिय महेश्वर ।।
तव पादांबुजद्वंद्वे निर्द्वंद्वा भक्तिरस्तु मे ।। 4.1.15.६० ।।

अयमेव वरो नाथ प्रसन्नोसि यदीश्वर ।।
नान्यं वरं वृणे त्वत्तः करुणामृतवारिधे ।। ६१ ।।

ततः प्राह महेशानस्तत्स्तुत्या परितोषितः ।।
रौहिणेय महाभाग सौम्यसौम्यवचोनिधे ।। ६२ ।।

नक्षत्रलोकादुपरि तव लोको भविष्यति ।।
मध्ये सर्वग्रहाणां च सपर्यां लप्स्यसे पराम् ।६३।

त्वयेदं स्थापितं लिंगं सर्वेषां बुद्धिदायकम् ।।
दुर्बुद्धिहरणं सौम्य त्वल्लोकवसतिप्रदम् ।। ६४ ।।

इत्युक्त्वा भगवाञ्छंभुस्तत्रैवांतरधीयत ।।
बुधः स्वर्लोकमगमद्देवदेवप्रसादतः ।। ६५ ।।

              "गणावूचतुः।।
काश्यां बुधेश्वरसमर्चनलब्धबुद्धिः संसारसिंधुमधिगम्य नरो ह्यगाधम् ।।

मज्जेन्न सज्जनविलोचन चंद्रकांतिः कांताननस्त्वधिवसेच्च बुधेऽत्र लोके ।। ६६ ।।

चंद्रेश्वरात्पूर्वभागे दृष्ट्वा लिंगं बुधेश्वरम् ।।
न बुद्ध्या हीयते जंतुरंतकालेपि जातुचित् ।।६७।।

गणौ यावत्कथामित्थं चक्राते बुधलोकगाम् ।।
तावद्विमानं संप्राप्तं शुक्रलोकमनुत्तमम् ।६८।। ।।


इति श्री स्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थे काशीखंडे पूर्वार्द्धे नक्षत्रबुधलोकयोर्वर्णनं नाम पंचदशोध्यायः ।। १५ ।।

अध्याय 15 - तारकीय विश्व का विवरण

अगस्त्य ने कहा :

1. हे मेरी श्रेष्ठ पत्नी लोपामुद्रा , हे धार्मिक अनुष्ठानों में मेरी सहभागी, विष्णु के दो सेवकों द्वारा शिवशर्मन को सुनाई गई कहानी सुनो ।

शिवशर्मन ने कहा :

2. हे प्रिय गणों , सब कुछ बताने में कुशल,  चान्द्रमसी कथा  (चन्द्र क्षेत्र) की यह अद्भुत कहानी सुनी गई है। अब, मुझे सितारों की दुनिया की कहानी बताओ।

परिचारकों ने कहा :

3. पूर्व में, विषयों के निर्माण में विशेषज्ञ, कुलपिता दक्ष का जन्म सृष्टिकर्ता ( ब्रह्मा ) के अंगूठे के पिछले भाग से हुआ था, जो सृजन की गतिविधि को आगे बढ़ाने के इच्छुक थे।

4. उनकी साठ बेटियाँ थीं, जिनमें से प्रमुख रोहिणी थी । वे तपस्या करने में निपुण थे और हर चीज़ में उनकी कुशलता और उत्कृष्टता बढ़ती जा रही थी।

5. विश्वेश्वर नगर में पहुंचकर उनके द्वारा घोर तपस्या की गई। उमा सहित चन्द्रमा से अलंकृत महान भगवान को उनके द्वारा प्रसन्न किया गया।

6. जब ईशान प्रसन्न हुए तो वह वरदान देने के लिए वहां आये। संतुष्ट मन से उन्होंने कहा, “उत्कृष्ट वरदान माँगें।”

7-8. शम्भु के वचन सुनकर उन कन्याओं ने उत्तर दिया, "हे शंकर , यदि हम वरदान के पात्र हैं और यदि हमें वरदान दिया जा सकता है, तो वही हमारा पति हो - जो सौंदर्य में आपके समान हो, हे महान स्वामी, और संसार के कष्टों को तुमसे भी बेहतर कौन दूर कर सकता है।”

9-10. संगमेश्वर के पास वारणा के सुंदर तट पर उनके द्वारा नक्षत्रेश्वर नामक एक महान लिंग स्थापित किया गया था । पुरुषायत नामक एक महान तपस्या,  जिसे मनुष्य भी नहीं कर सकते, उनके द्वारा एक हजार दिव्य वर्षों तक किया गया था।

11. तब प्रसन्न होकर विश्वेश्वर ने उन सभी (लड़कियों) को एक ही पुरुष की पत्नी होने और मानसिक स्थिरता का उत्कृष्ट वरदान दिया।

श्री विश्वेश्वर ने कहा :

12. ऐसी अत्यंत कठोर तपस्या पहले कभी स्त्रियों ने नहीं सही थी। अत: यहां आपका नाम नक्षत्र होगा ।

"न क्षान्तं हि तपोत्युग्रमेतदन्याभिरीदृशम् ।।
पुराऽबलाभिस्तस्माद्वो नाम नक्षत्रमत्र वै ।१२ ।

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13. चूंकि पुरुषायत नामक तपस्या अब आपने की है, इसलिए जब भी आप चाहें, आपको पुरुषों की स्थिति प्राप्त होगी।

14. आप समस्त प्रकाशक मंडल में अग्रणी हो जायेंगे। आप मेष- (मेष) से ​​शुरू होने वाली सभी राशियों की उत्पत्ति का उत्कृष्ट स्रोत होंगे ।

15. हे तेजस्वी मुख वाली, आप सभी को (चंद्रमा) पति के रूप में मिलेगा, जो जड़ी-बूटियों, अमृत और ब्राह्मणों का स्वामी है ।

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16 आपके नक्षत्रेश्वर नामक लिंग की पूजा करने से मनुष्य आपके उत्तम लोक को प्राप्त होगा।

17. तुम्हारी दुनिया चंद्रमा से ऊपर होगी. आप सभी तारक (नक्षत्रों) में सबसे अधिक सम्मानित होंगे ।

18. जो लोग तारों की पूजा करते हैं, जो लोग नियमित रूप से तारों का व्रत करते हैं, वे सितारों की तरह चमक के साथ आपकी दुनिया में रहेंगे।

19. जो लोग काशी में नक्षत्रेश्वर के दर्शन करते हैं, उन पर कभी भी सितारों, ग्रहों और राशियों का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अगस्त्य ने कहा :

20. जब विष्णु में तल्लीन मन वाले दो सेवक सितारों की उत्कृष्ट कहानी सुना रहे थे, तब बुद्ध (बुध) की दुनिया शिवशर्मन की आँखों का मेहमान (वस्तु) बन गई।

शिवशर्मन ने कहा :

21. हे महिमामय प्रभु के सेवकों, यह अद्वितीय संसार किसका है? मुझे बताओ। यह मुझे चंद्रमा के समान ही आनंदित करता है।

परिचारकों ने कहा :

22. हे शिवशर्मन, स्वर्गीय मार्ग से यात्रा के दौरान (अपने) मनोरंजन के लिए, पापों को दूर करने वाली और तीन प्रकार के संकटों को नष्ट करने वाली इस कहानी को सुनो।

23. हम ने तुम से उसका वर्णन ऐसा किया है, कि वह अत्यन्त तेजवाला है; वह ब्राह्मणों का राजा है और उसने सम्राट का पद ग्रहण कर लिया है।

24. उनके द्वारा राजसूय यज्ञ के दौरान तीनों लोक दक्षिणा (उपहार) के रूप में दिए गए थे । उन्होंने एक हजार अरब शताब्दियों तक अत्यंत कठोर तपस्या की।

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25. उनका जन्म अत्रि के नेत्रों से हुआ था ; जो ब्रह्मा के पौत्र हैं;  वह चन्द्रमा जड़ी-बूटियों और प्रकाशकों का स्वामी है।

26. उनकी स्तुति शुद्ध कलाओं के भण्डार के रूप में की जाती है ; वह उठते-बैठते दूसरों के कष्टों का नाश करता है।

27. वह रात में खिलनेवाले सोसन( कुमुदनी) के फूलों के साथ सब जगत् के सुख को बढ़ाता है; जब अलग-अलग क्वार्टर( दिशाऐं रूपी  युवतियां अपना मेकअप श्रृँगार करती हैं तो उनका (मण्डल) दर्पण के रूप में कार्य करता है।

"मुदंकुमुदिनीनांयस्तनोति जगता सह ।।
दिग्वधू चारु शृंगारदर्शनादर्शमंडलः ।। २७ ।।

28. चंद्रमा के अन्य गुण किस काम के हैं? केवल निम्नलिखित से संकेत मिलता है कि चंद्रमा के बराबर कुछ भी नहीं है जिसके अंक को सर्वज्ञ भगवान शिव अपने शिखा रत्न के रूप में उपयोग करते हैं।

29-30. वह वैभवशाली संपत्ति से उत्पन्न अहंकार के कारण भ्रमित हो गया। उसने शीघ्रता से अपने चाचा अंगिरस के पुत्र , गुरु बृहस्पति [2] की सुंदर पत्नी तारा का अपहरण कर लिया । उन्हें अपनी सुंदर विशेषताओं पर गर्व था, हालाँकि देवताओं और कई दिव्य ऋषियों ने उन्हें रोका था (उन्होंने ऐसा किया)।

"बृहस्पतेस्स वै भार्यामैश्वर्यमदमोहितः ।।
पुरोहितस्यापिगुरोर्भ्रातुरांगिरसस्य वै ।२९ ।

जहार तरसा तारां रूपवान्रूपशालिनीम्।।
वार्यमाणोपि गीर्वाणैर्बहुदेवर्षिभिः पुनः ।। 4.1.15.३० ।।

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31. यह ब्राह्मणों के राजा, स्ट्रो[स्टोर?]-अंकों के घर की गलती नहीं है। तीन आंखों वाले भगवान शिव को छोड़कर, किसका मन काम (वासना के स्वामी) से पीड़ित नहीं हुआ है?

32. यह अंधकार सर्वत्र फैला हुआ है और इसे दबाने के साधन ब्रह्मा ने दीपक, सूर्य की किरणें आदि बनाये हैं; परन्तु प्रभुता से उत्पन्न भ्रम के अंधकार का कोई उत्तम उपाय उपलब्ध नहीं है।

"नायं कलानिधेर्दोषो द्विजराजस्य तस्य वै ।।
हित्वा त्रिनेत्रं कामेन कस्य नो खडितं मनः ।।३१।।

ध्वांतमेतदभितः प्रसारियत्तच्छमाय विधिनाविनिर्मितम्।।
दीपभास्करकरामहौषधं नाधिपत्य तमसस्तुकिंचन ।। ३२ ।।


33. विष्णु की भक्ति आदि के बारे में सलाह के शब्द, हालांकि स्पष्ट रूप से व्यक्त किए गए हैं, आधिपत्य के अहंकार से भ्रमित व्यक्ति को नहीं छूते हैं, जैसे शुद्ध मन का व्यक्ति, उसके द्वारा किए गए पवित्र स्नान से पवित्र होता है, जो प्रतिकूल स्वभाव वाले दुष्ट व्यक्ति को नहीं छूता है। मानसिकता.

34. फ़ी! उस अतिरिक्त धन वाले व्यक्ति के (पापपूर्ण) कार्यों पर धिक्कार है, जिसे हर चीज़ घूमती हुई दिखाई देती है! वह हमेशा अविवेक की आंख से देखता है जो तुरंत विनाशकारी और विपत्ति का स्रोत बन गया है।

35. तीनों लोकों में ऐसा कौन है जिस पर काम ने विजय नहीं पाई है, जिसके बाणों के लिए केवल पुष्प ही हैं? कौन क्रोध से पराजित नहीं हुआ है? लोभ से कौन भ्रमित नहीं हुआ है? युवा युवतियों की तिरछी आँखों से छलनी हुए हृदय के साथ किसने विपत्ति नहीं झेली है? ऐसा कौन व्यक्ति है जो उत्कृष्ट दृष्टि से संपन्न होने पर भी राज्य का गौरव प्राप्त करने के बाद अंधी राह पर नहीं चला गया हो?

36. प्रभुता की महिमा बड़ी चंचल है. इसे प्राप्त करके यदि कुछ भी अर्जित किया जाता है तो वह निश्चित ही अच्छा या बुरा हो सकता है। अच्छे आचरण वाले पुरुषों को हमेशा वही करना चाहिए जो अत्यधिक लाभकारी हो।

37. जब वह आक्रामक हो गया और बृहस्पति को तारा को नहीं दिया , तो रुद्र ने अपना अजगव ('बकरी और गाय के सींग से बना') धनुष उठाया और उनकी सहायता के लिए आए।

38. पुण्यात्मा चंद्रमा ने देवों के भगवान की ओर ब्रह्मशिरस नामक महान मिसाइल छोड़ी। उसे तो (रुद्र ने) नष्ट कर दिया।

39 तारा के द्वारा उन दोनों का युद्ध अत्यन्त भयानक हो गया। इसके बाद ब्रह्मा ब्रह्मांड के असामयिक विनाश से डर गए।

40. रुद्र, जिसका तेज परम विनाश के समय अग्नि के समान था, को युद्ध जारी रखने से रोकते हुए, ब्रह्मा ने स्वयं तारा को अंगिरस (अर्थात् बृहस्पति [बृहस्पति?]) के पुत्र को दे दिया।

41 तारा को गर्भवती देखकर बृहस्पति ने कहा, “तुम्हारे गर्भ में जो मेरा गर्भ है, उसमें कोई भ्रूण नहीं पलेगा।”

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42. फिर वह इशिका घास के एक समूह के पास गई और भ्रूण को त्याग दिया। जैसे ही उस दिव्य प्राणी का जन्म हुआ, उसने देवताओं के शरीर को ग्रहण कर लिया (उत्कृष्टता और प्रतिभा में उनसे आगे निकल गया)।

43. जिन श्रेष्ठ सुरों को संदेह हुआ, उन्होंने कहा, “सच बताओ, यह किसका पुत्र है, बृहस्पति का या चंद्रमा का?”

44. देवताओं के पूछने पर भी अत्यधिक लज्जित तारा ने कुछ नहीं कहा। तभी वह परम तेजस्वी पुत्र उसे शाप देने ही वाला था।

45. ब्रह्मा ने उसे रोका और तारा से उसके संदेह के संबंध में पूछा। उसने ब्रह्मा से हथेलियाँ जोड़कर कहा, "यह सोम का है "।

46. ​​तब प्रजा के स्वामी राजा (जड़ी-बूटियों के राजा) ने बालक का सिर सुंघाया। उन्होंने उस बुद्धिमान लड़के का नाम "बुद्ध" रखा।

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47-49. बुद्ध, जो तेजस्विता, सुंदरता और शक्ति में सभी देवताओं से श्रेष्ठ थे, ने तपस्या करने का फैसला किया। उन्होंने सोम से विदा ली और विश्वेश द्वारा संरक्षित मोक्ष की राजधानी काशी चले गए । 

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वहां उन्होंने अपने नाम पर बुधेश्वर नामक लिंग की स्थापना की। उस बालक ने अपने मन में चन्द्रमाधारी भगवान शिव के रूप में अत्यंत भयानक उग्र (शिव) का ध्यान करते हुए दस हजार वर्षों तक तपस्या की।

50. तब ब्रह्मांड के निर्माता, महान उत्पादकता वाले ब्रह्मांड के स्वामी, गौरवशाली विश्वेश, स्वयं लिंग बुधेश्वर से प्रकट हुए।

51-52. महान तेज से प्रसन्न महान स्वामी ने कहा: "हे अत्यधिक बुद्धिमान बुद्ध, अन्य सुरों और विद्वानों में अग्रणी, एक वरदान मांगो (आप चाहते हैं)। मैं तुम्हारी उत्तम तपस्या तथा लिंग ध्यान से प्रसन्न हूँ। हे सोम के महान पुत्र (हे अत्यधिक विनम्र), ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपको नहीं दिया जा सकता है।

53-54. गड़गड़ाहट की गहरी आवाज की तरह इन शब्दों को सुनकर, ऐसा प्रतीत हुआ मानो सूखे के कारण मुरझाई हुई वनस्पति को जीवंत कर दिया हो, लड़के ने अपनी आँखें खोलीं और अपने सामने लिंग में तीन आंखों वाले, चंद्रमा-शिखा वाले भगवान को देखा।

बुद्ध ने कहा :

[ बुद्ध की प्रार्थना ]

55. पवित्र आत्मा आपको प्रणाम। हे तेजस्वी तेजस्वरुप प्रभु, आपको नमस्कार है! ब्रह्माण्ड स्वरूप आपकी जय हो। आपको प्रणाम जो सभी रूपों से परे हैं।

56. उन शुभ-भाव वाले को नमस्कार है, जो झुकने वालों के सभी संकटों का नाश करते हैं। सर्वज्ञ आपको नमस्कार है। सबके रचयिता, आपको नमस्कार है।

57. हे दयालु, तुझे नमस्कार है। आपको नमस्कार है जिसे (केवल) भक्ति के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। तपस्या के लाभकारी फल के दाता को नमस्कार। तपस्या स्वरूप प्रभु आपको नमस्कार है।

58. हे शम्भु, हे शिव, हे शिव की पत्नी , हे शांत भगवान! हे श्रीकंठ , हे त्रिशूलधारी, हे चन्द्रमाधारी भगवान, हे शर्व , हे ईश, हे भगवान शंकर, हे धूर्जति!

59. हे पिनाक हाथ में लिए हुए गिरीश , हे शितिकंठ , हे सदाशिव ! हे महान प्रभु, आपको प्रणाम; देवों के देव, आपको नमस्कार है।

60. हे प्रार्थना के शौकीन महेश्वर , मैं स्तुति करना नहीं जानता। आपके चरणकमलों की जोड़ी में मेरी अद्वितीय भक्ति हो।

61. हे प्रभु, यदि आप प्रसन्न हैं तो यही एकमात्र वरदान है (मैं पाना चाहता हूँ)। हे ईश्वर, दया के अमृत के सागर, मैं कोई अन्य वरदान नहीं चुनता।

62-64 तब उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर महेषाण ने कहा: "हे (दत्तक) रोहिणी के पुत्र, हे चंद्रमा-देव के अत्यधिक भाग्यशाली पुत्र, हे विनम्र शब्दों के भंडार, आपकी दुनिया सितारों की दुनिया से ऊपर होगी। सभी ग्रहों के बीच आपका बहुत सम्मान होगा। आपके द्वारा स्थापित यह लिंग सभी को सद्बुद्धि प्रदान करेगा। इससे बुरे इरादे दूर हो जायेंगे. हे सज्जन, यह तुम्हारी दुनिया में निवास प्रदान करेगा।

65. इतना कहकर भगवान शम्भु वहीं से अन्तर्धान हो गये। देवों के देव भगवान की कृपा से बुद्ध स्वर्गलोक चले गये।

परिचारकों ने कहा :

66. जिस व्यक्ति ने काशी में बुधेश्वर की पूजा करके ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वह सांसारिक अस्तित्व के गहरे सागर में गिरने के बाद भी नहीं डूबेगा। वह भले लोगों की आँखों में चाँदनी के समान होगा। प्रसन्न मुख के साथ, वह बुद्ध की दुनिया में निवास करेगा।

67. मृत्यु के समय भी, किसी भी जीवित प्राणी की बुद्धि में कमी नहीं होगी, यदि उसने चंद्रेश्वर के पूर्व में बुधेश्वर लिंग का दर्शन किया हो।

68. जब तक परिचारकों ने बुद्ध की दुनिया की कहानी समाप्त की, हवाई रथ शुक्र की उत्कृष्ट दुनिया तक पहुंच गया ।