बहुत नारि सुहाग-सुंदरि और घोष कुमारी / सूरदास

राग गौरी

"बहुत नारि सुहाग-सुंदरि और घोष कुमारी ।
सजन-प्रीतम-नाम लै-लै, दै परसपर गारि ॥

अनँद अतिसै भयौ घर-घर, नृत्य ठावँहि ठाँव ।
नंद-द्वारैं भेंट लै-लै उमह्यौ गोकुल गावँ ॥

चौक चंदन लीपि कै, धरि आरती संजोइ ।
कहति घोष-कुमारि, ऐसौ अनंद जौ नित होइ ॥

द्वार सथिया देति स्यामा, सात सींक बनाइ ।
नव किसोरी मुदित ह्वै-ह्वै गहति जसुदा-पाइ ॥

करि अलिंगन गोपिका, पहिरैं अभूषन-चीर ।
गाइ-बच्छ सँवारि ल्याए, भई ग्वारनि भीर ॥

मुदित मंगल सहित लीला करैं गोपी-ग्वाल ।
हरद, अच्छत, दूब, दधि लै, तिलक करैं ब्रजबाल।

एक एक न गनत काहूँ, इक खिलावत गाइ ।
एक हेरी देहिं, गावहिं, एक भेंटहिं धाइ ॥

एक बिरध-किसोर-बालक, एक जोबन जोग ।
कृष्न-जन्म सु प्रेम-सागर, क्रीड़ैं सब ब्रज-लोग ॥

प्रभु मुकुन्द कै हेत नूतन होहिं घोष-बिलास ।
देखि ब्रज की संपदा कौं, फूलै सूरदास ॥

भावार्थ:--बहुत सी सौभाग्यवती सुन्दरी स्त्रियाँ और गोपकुमारियाँ ( अहीर कन्याओ )एक-दूसरी के प्यारे पति का नाम ले-लेकर परस्पर गाली गा गा रही हैं ।

(गोकुल के) घर-घर में अतिशय आनन्द हो रहा है । स्थान-स्थान पर नृत्य हो रहा है ।                  पूरा गोकुल नगर ही भेंट ले-लेकर श्रीनन्द जी के द्वार पर उमड़ पड़ा है ।                              आँगन को चंदन से लीपकर आरती सजाकर रखी गयी है ।                                        गोपकुमारियाँ कहती हैं-`यदि ऐसा आनन्द नित्य हुआ करे--' युवतियाँ सात सींकों से सजाकर द्वार पर स्वस्तिक चिह्न बना रही हैं । नवकिशोरियाँ आनन्दित होकर बार-बार श्रीयशोदा जी के पैर पकड़ लेती हैं । गोपिकाओं ने (श्रीयशोदा जी को) आलिंगन करके (उनसे उपहार में मिले) आभूषण तथा वस्त्र पहिन लिये ।

 (दूसरी ओर) गायों तथा बछड़ों को सजाकर ले आये । गोपों की भीड़ एकत्र हो गयी । सभी गोपियाँ और गोप प्रमुदित हैं, अनेक प्रकार की मंगल-क्रीड़ा कर रहे हैं । गोपियाँ एक-दूसरी को हल्दी, अक्षत, दूर्वा और दही लेकर तिलक लगा रही हैं । (आज) कोई किसी की भी परवा नहीं करता है, कोई गायों को खिला रहे हैं, कोई `हेरी-हेरी' कहकर पुकारते हैं, कोई गाते हैं, कोई गाते हैं, कोई दौड़कर दूसरे को भेंट रहे हैं--क्या वृद्ध, क्या युवक, क्या बालक और क्या तरुण, सभी व्रज के लोग श्रीकृष्णजन्म से प्रेम-सागर में ही मग्न क्रीड़ा कर रहे हैं । 

प्रभु मुकुन्द के जन्मोपलक्ष्य में गोपों में होने वाले नये-नये क्रीड़ा कौतुक हो रहे हैं । व्रज की यह सम्पत्ति देखकर सूरदास प्रफुल्लित हो रहे हैं ।

सूरदास- दशम स्कन्ध★— रागविलावल

"अरुन सेत सित सुंदर तारे।                         पीत रंग पीतांबर धारे।।


नाना रंग स्याम गुनकारी। '.                          सूर' स्याम रँग घोषकुमारी।।1912।।