सोमवार, 31 जुलाई 2017

पेरियार ललई यादव एक विमर्ष--

प्रस्तोता -- योगेश कुमार "रोहि "
ग्राम - आजादपुर पत्रालय
पहाड़ीपुर जनपद अलीगढ़ उ०प्र०.....📝📝📝📝📝📝📝📝📝 ➖➖➖➖➖➖➖➖➖ पेरियार ललई सिंह यादव जिन्होने सुप्रीम कोर्ट तक सच्ची रामायण के लिए अपनी क्षमता अकाट्य तर्कशील से विजय पञ्जीकृत करायी थी !
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श्री राजेन्द्र यादव जिनके हंस को न पढ़ पाने वाला हिन्दी का मूर्धन्य विद्वान भी कुछ खोया महसूस करता हो को कौन अस्तित्वविहीन साबित करने की क्षमता रखता है।
अंग्रेजी के एक विद्वान की लाईन  कि---
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‘‘It is better to reign hell than to be slave in heaven’’
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अर्थात स्वर्ग में गुलाम बनकर रहने की अपेक्षा नरक में शासक बनकर रहना बेहतर है".. पूरी दुनिया दास प्रथा के विरुद्ध लड़ रही है।
1942 का स्वतंत्रता अन्दोलन अंग्रेजी दासता से मुक्ति का आंदोलन था |
परन्तु जब हम समाज में सदीयों से व्याप्त मानवीय असमानताओं से मुक्त होगें ..तब वास्तविक स्वतन्त्र माने जाएगे .. ऐसे में यदि तुलसीदास जी लिखतें हों कि निरमल मन अहीर निज दासा और हम इस पर गर्व करें ! "तो हम्हें इस कपटपूर्ण नीति से युक्त प्रशंसा को समझने की महती आवश्यकता है ।
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.. भला तुलसी दास "निरमल मन भगवान का दास अहीर को क्यों लिखते हैं... क्या उन्हें दास का मतलब नहीं पता था ?
उन्हें जब ब्राह्मण को भुसूर बनाना था। तब उन्होंने लिख दिया --
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”पूजिय विप्र सकल गुणहीना“
विप्र न पूजिए ज्ञान प्रवीणा !! 
( अरण्यकाण्ड राम चरित मानस)

जल तुलसी को अहीर का मन निर्मल ही लिखना था तो  वे दास क्यों बनायें ?
वे जानते थे कि दासता का पट्टा कुत्ते के गले में ही रह सकता है।
लोमड़ी या भेडि़यें के गले में नहीं।
तुलसी दास जी ने श्री कृष्ण के वंशजों को लिखा है कि आभीर, यवन, किरात, खल स्वपचादि अति अधरूपजे।
इसमें अहीर को नीच, अन्त्यज, पापी बताया है जिस अहीर की कन्या ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी गायत्री है (नरेन्द्र सैन आभीर की कन्या थी )...
पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड में देखे विस्तार से ...
और वाल्मीकि के नाम पर बौद्धकाल के बाद में लिपिबद्ध ग्रन्थ वाल्मीकीय रामायण बुद्ध भगवान् को चोर कहा गया है और बुद्ध के प्रथम सम्प्रदाय पाषण्डः का विरोध किया गया है ।
अयोध्या काण्ड १०९ वें सर्ग ३४ वाँ श्लोक प्रमाण रूप में देखें---
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" यथा ही चोर:स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि ।।
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ये बाते राम और जावालि ऋषि के सम्वाद रूप में है ।
राम बुद्ध को चोर और नास्तिक बताते है ।
क्या ये बाते कल्पना व की परिचायक नहीं हैं ।
.. प्रारम्भ में पाषण्डः शब्द बुद्ध का वह पवित्र अनुयायीयों का समुदाय था जिसने तत्कालीन कुछ ब्राह्मणों द्वारा प्रचारित वैदिक यज्ञों के नाम पर हिंसात्मक तथा व्यभिचार पूर्ण पृथाओं का खण्डन किया था ..जो समाज में पाश या बन्धन के समान थे पाषण्डः= अर्थात् पाषण् पाषम् षण्डयति इति पाषण्डः कथ्यते " वाल्मीकीय रामायण में ही युद्धकांड के 22वें सर्ग में स्पष्ट लिखा है कि जब राम ने लंका जाने हेतु सागर को समाप्त करने के लिए अपनी प्रत्यञ्चा पर वाण चढ़ा लिया तो सागर प्रकट होकर अपने भगवान राम को सनातन मार्ग न छोड़ने की सीख देते हुए वाण न छोड़ने का आग्रह करता है।
जिस पर राम कहते हैं कि
"तमब्रवीत् तदा रामः श्रणु में वरुणालय।
अमोघोSयं महाबाणः कस्मिन् देशे निपात्यताम्।।30।। वरुणालय! मेरी बात सुनों। मेरा यह विशाल बाण अमोघ है। बताओं, इसे किस स्थान पर छोड़ा जाय" राम के इस सवाल पर महासागर ने कहा।
क्रमश
तब जड़ समुद्र भी राम से अपने अमोघ वाण को उत्तर दिशा मे छोड़ने की प्रथना।
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रविवार, 30 जुलाई 2017

"कृष्ण का अहीर रूप " योगेश कुमार रोहि-

अर्थात्   ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या ९६ के श्लोक
१३, १४,१५, पर असुर अथवा दास कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ है ।"
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" आवत् तमिन्द्र शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त।द्रप्सम पश्यं विषुणे चरन्तम् उपह्वरे नद्यो अंशुमत्या: न भो न कृष्णं अवतस्थि वांसम् इष्यामि।।
वो वृषणो युध्य ताजौ ।।१४।।
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थे$धारयत् तन्वं तित्विषाण: विशो अदेवीरभ्या चरन्तीर्बृहस्पतिना
युज इन्द्र: ससाहे ।। १५।।
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अर्थात् कृष्ण नामक असुर अंशुमती अर्थात्  यमुना  नदी के तटों पर दश हजार सैनिको के साथ निवास करता है ,उसे अपनी बुद्धि-बल से इन्द्र ने खोज लिया है ! और उसकी सम्पूर्ण सेना (गोप मण्डली) को इन्द्र ने नष्ट कर दिया है ।
आगे इन्द्र कहता है :--कृष्ण को मैंने देख लिया है ,जो  यमुना नदी के एकान्त स्थानों पर घूमता रहता है । __________________________________________
"कृष्ण के पूर्वज यदु को  वेदों में पहले ही शूद्र घोषित कर दिया " तो कृष्ण भी शूद्र हुए ऋग्वेद में तो कृष्ण को असुर कहा ही है ।
क्योंकि वैदिक सन्दर्भों में जो दास अथवा असुर कहे गये हैं । लौकिक संस्कृत में उन्हें शूद्र कहा गया है।
मनु-स्मृति का यह श्लोक प्रमाण है । जो पुष्यमित्र सुंग ई०पू०१८४ के समकक्ष निर्मित है ।
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शर्मा देवश्च विप्रस्य वर्मा त्राता भूभुज:
भूतिर्दत्तश्च वैश्यस्य दास शूद्रस्य कारयेत् ।।
अर्थात् विप्र(ब्राह्मण) के वाचक शब्द शर्मा तथा देव हों,
तथा क्षत्रिय के वाचक वर्मा तथा त्राता हों ।और वैश्य के वाचक भूति तथा दत्त हों तथा दास शूद्र का वाचक हो ।
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कृष्ण का सम्बन्ध मधु नामक असुर से स्थापित कर दिया है ।और यादव और माधव पर्याय रूप में हैं ।
यादवों में मधु एक प्रतापी शासक माना जाता है । यह इक्ष्वाकु वंशी राजा दिलीप द्वितीय का अथवा उसके उत्तराधिकारी दीर्घबाहु का समकालीन रहा है , मधु के गुजरात से लेकर यमुना तट तक के स्वामी होने का वर्णन है ।  प्राय: मधु को `असुर`, दैत्य, दानव आदि कहा गया है ।
साथ ही यह भी है कि मधु बड़ा धार्मिक एवं न्यायप्रिय शासक था । मधु की स्त्री का नाम कुंभीनसी था, जिससे लवण का जन्म हुआ ।
लवण बड़ा होने पर लोगों को अनेक प्रकार से कष्ट पहुँचाने लगा ।
लवण को अत्याचारी राजा कहा गया है । इस पर दु:खी होकर कुछ ऋषियों ने अयोध्या जाकर श्री राम से सब बातें बताई और उनसे प्रार्थना की कि लवण के अत्याचारों से लोगों को शीघ्र छुटकारा दिलाया जाय । अन्त में श्रीराम ने शत्रुघ्न को मधुपुर जाने की आज्ञा दी  लवण को मार कर शत्रुघ्न ने उसके प्रदेश पर अपना अधिकार किया ।
पुराणों तथा वाल्मीकि रामायण के अनुसार मधु के नाम पर मधुपुर या मधुपुरी नगर यमुना तट पर बसाया गया ।
यद्यपि अवान्तर काल में पुष्यमित्र सुंग ई०पू०१८४ के अनुयायी ब्राह्मण समाज ने वाल्मीकि-रामायण में बहुत सी काल्पनिक व विरोधाभासी कथाओं का समायोजन कर दिया ।
वाल्मीकि-रामायण में वर्णन है कि
इसके आसपास का घना वन `मधुवन` कहलाता था । मधु को लीला नामक असुर का ज्येष्ठ पुत्र लिखा है और उसे बड़ा धर्मात्मा, बुद्धिमान और परोपकारी राजा कहा गया है ।
मधु ने शिव की तपस्या कर उनसे एक अमोघ त्रिशूल प्राप्त किया । निश्चय ही लवण एक शक्तिशाली शासक था ।
किन्तु श्री कृष्ण दत्त वाजपेयी के मतानुसार 'चन्द्रवंश की 61 वीं पीढ़ी में हुआ उक्त 'मधु' तथा लवण-पिता 'मधु' एक ही थे अथवा नही, यह विवादास्पद है ।
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परन्तु ऐतिहासिक प्रणाम साक्षी हैं कि यहूदीयों का असीरियन जन-जाति से सेमेटिक होने से सजातीय सम्बन्ध है ।
  अत: यादवों से असुरों के जातीय सम्बन्ध हैं । असीरियन जन-जाति को ही भारतीय पुराणों में असुर कहा है ।
जिन्हें भारतीय पुराणों में असुर कहा गया है वह यहूदीयों के सहवर्ती तथा सजातीय असीरियन लोग हैं ।
साम अथवा सोम शब्द हिब्रू एवं संस्कृत भाषा में समान अर्थक हैं ।
जिसके आधार पर सोम वंश की अवधारणा की गयी
जिसे भारतीय पुराणों में चन्द्र से जोड़ कर काल्पनिक पुट दिया गया है ।
योगेश कुमार'रोहि' के शोध पर आधारित असुरों का मैसॉपोटमिया की पुरातन कथाओं में एक परिचय :-
हिन्दू धर्मग्रन्थों में असुर वे लोग हैं जो 'सुर' (देवताओं) से संघर्ष करते हैं।
धर्मग्रन्थों में उन्हें शक्तिशाली, अतिमानवीय, असु राति इति असुर: अर्थात् जो प्राण देता है, वह असुर है ।
इस रूप में चित्रित किया गया है
'असुर' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में लगभग १०५ बार हुआ है। उसमें ९० स्थानों पर इ सका प्रयोग 'असु युक्त अथवा प्राण -युक्त के अर्थ में किया गया है ।
और केवल १५ स्थलों पर यह 'देवताओं के शत्रु' का वाचक है।
'असुर' का व्युत्पत्ति -लभ्य अर्थ है :-प्राणवंत, प्राणशक्ति संपन्न :-
('असुरिति प्राणनामास्त: शरीरे भवति, निरुक्ति ३.८)
और इस प्रकार यह वैदिक देवों के एक सामान्य विशेषण के रूप में व्यवहृत किया गया है।
विशेषत: यह शब्द इंद्र, मित्र तथा वरुण के साथ प्रयुक्त होकर उनकी एक विशिष्ट शक्ति का द्योतक है।
इंद्र के तो यह वैयक्तिक बल का सूचक है, परंतु वरुण के साथ प्रयुक्त होकर यह उनके नैतिक बल अथवा शासनबल का स्पष्टत: संकेत करता है।
असुर शब्द इसी उदात्त अर्थ में पारसियों के प्रधान देवता 'अहुरमज़्द' ('असुर: महत् ') के नाम से विद्यमान है।
यह शब्द उस युग की स्मृति दिलाता है जब वैदिक आर्यों तथा ईरानियों (पारसीकों) के पूर्वज एक ही स्थान पर निवास कर एक ही देवता की उपासना में निरत थे। अन्तर आर्यों की इन दोनों शाखाओं में किसी अज्ञात विरोध के कारण फूट पड़ी गई।
फलत: वैदिक आर्यों ने 'न सुर: असुर:' यह नवीन व्युत्पत्ति मानकर असुर का प्रयोग दैत्यों के लिए करना आरम्भ किया ।
और उधर ईरानियों ने भी देव शब्द का ('दएव' के रूप में) अपने धर्म के दानवों के लिए प्रयोग करना शुरू किया।
अर्थात् ईरानी आर्यों की भाषा में देव का अर्थ दुष्ट व्यभिचारी,----------
फलत: वैदिक 'वृत्रघ्न' (इंद्र) अवेस्ता में 'वेर्थ्रोघ्न' के रूप में एक विशिष्ट दैत्य का वाचक बन गया तथा ईरानियों का 'असुर' शब्द पिप्रु आदि देवविरोधी दानवों के लिए ऋग्वेद में प्रयुक्त हुआ जिन्हें इंद्र ने अपने वज्र से मार डाला था।
ईरानी आर्यों ने असुर शब्द पूज्य अर्थ में प्रयुक्त किया है
(ऋक्. १०।१३८।३-४)। शतपथ ब्राह्मण की मान्यता है कि असुर देवदृष्टि से अपभ्रष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं :---
(तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्त: पराबभूवु:)।
अर्थात् वे असुर हे अरय: हे अरय इस प्रकार करते हुए पराजित हो गये ।
विश्व एैतिहासिक सन्दर्भों में असुर मैसॉपोटमिया की संस्कृति में वर्णित असीरियन लोग थे।
जिनकी भाषा में "र" वर्ण का उच्चारण "ल" के रूप में होता है ।
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वाल्मीकि-रामायण में वर्णित किया गया है, कि देवता सुरा पान करने के कारण देव सुर कहलाए ,
और जो सुरा पान नहीं करते वे असुर कहलाते थे  ।
बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में )
सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है-
“सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l”
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" सुरा प्रति ग्रहाद् देवा: सुरा इति अभिविश्रुता ।
अप्रति ग्रहणात् तस्या दैतेयाश्चासुरा: स्मृता ।।
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वस्तुत देव अथवा सुर जर्मनिक जन-जातियाँ से सम्बद्ध हैं ।
स्वीडन के स्वीअर (Sviar)लोग ही भारतीय पुराणों में सुर देवों के रूप में सम्बद्ध हैं ।
यूरोपीय संस्कृतियों में सुरा एक सीरप (syrup)
के समान है l
यूरोपीय लोग शराब पीना शुभ और स्वास्थ्य प्रद समझते है ।
यह उनकी संस्कृति के लिए
स्वास्थ्य प्रद परम्परा है
कारण वहाँ की शीतित जल-वायु के प्रभाव से बचने के लिए शराब औषधि तुल्य है । 
 फ्रॉञ्च भाषा में शराब को सीरप syrup ही कहते हैं ।
अत: वाल्मीकि-रामायण कार ने सुर शब्द की यह अानुमानिक व्युत्पत्ति- की है ।
परन्तु सुर शब्द का विकास जर्मनिक जन-जाति स्वीअर (Sviar) से हुआ है ।
असुर और सुर दौनों शब्दों की व्युत्पत्ति भिन्न भिन्न हुई है
पतञ्जलि ने अपने 'महाभाष्य' के पस्पशाह्निक में शतपथ के इस वाक्य को उधृत किया है।
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शबर स्वामी ने 'पिक', 'नेम', 'तामरस' आदि शब्दों को असूरी भाषा का शब्द माना है।
आर्यों के आठ विवाहों में 'आसुर विवाह' का सम्बन्ध असुरों से माना जाता है।
पुराणों तथा अवान्तर साहित्य में 'असुर' एक स्वर से दैत्यों का ही वाचक माना गया है।
असुर संस्कृति असीरियन लोगों की संस्कृति थी ।
असीरियन अक्काडियन ,हिब्रू आदि जातियों के आवास वर्तमान ईराक और ईरान के प्राचीनत्तम रूप में थे ।
जिसे यूनानीयों ने मैसॉपोटामिया अर्थात् दजला और फ़रात के मध्य की आवासित सभ्यता माना --
उत्तरीय ध्रव से भू-मध्य रेखीय क्षेत्रों में आगमन काल में आर्यों ने  दीर्घ काल तक असीरियन लोगों से संघर्ष किया प्रणाम स्वरूप बहुत से सांस्कृतिक तत्व ग्रहण किये
वेदों में अरि शब्द देव वाची है ।और असीरियन भाषा में भी अलि अथवा इलु के रूप में देव वाची ही है ।
देखें---
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विश्ववो हि अन्यो अरि: आजगाम ।
मम इदह श्वशुरो न आजगाम ।
जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात् स्वाशित पुनरस्तं जगायात् ।।
             (10/28/1 ऋग्वेद )
अर्थात् ऋषि पत्नी कहती है कि सब देवता निश्चय हमारे यज्ञ में आये , परन्तु हमारे श्वशुर  नहीं आये इस यज्ञ में यदि वे आते तो भुने हुए जौ के साथ सोमपान करते ।।10/28/1
यहाँ अरि शब्द घर का वाचक है ।
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तथा अन्यत्र भी ऋग्वेद 8/51/9 -
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यस्यायं  विश्वार्यो दास: शेवधिपा अरि:।
तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत् सो अज्यते रयि:।।
अरि: आर्यों का प्रधान देव था  आर्यों ने स्वयं को अरि पुत्र माना ।
यहाँ अरि शब्द ईश्वर का वाचक है ।
असुर संस्कृति में अरि: शब्द अलि के रूप में परिणति हुआ ।
सुमेरियन और बैबीलॉनियन तथा असीरियन अक्काडियन हिब्रू आदि संस्कृतियों में असुर संस्कृति में अरि: शब्द अलि के रूप में परिणति हुआ । सुमेरियन और बैबीलॉनियन तथा असीरियन अक्काडियन हिब्रू आदि संस्कृतियों में अरि एल (el)
इलु एलॉह elaoh तथा बहुवचन रूप एलोहिम Elohim हो गया ।
अरबों के अल्लाह शब्द का विकास अल् उपसर्ग Prefix के पश्चात् इलाह करने से हुआ है ।
निश्चित रूप से यादव मैसॉपोटमिया की पुरातन संस्कृति में यहुदह् के वंशज यहूदी हैं ।
तात्पर्य यही कि असुर संस्कृति यादव संस्कृति से सम्बद्ध थी ।
असुरों के इतिहास को भारतीय पुराणों में हेय रूप में वर्णित किया गया है ।
बाणासुर की पुत्री उषा का विवाह कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न से पुराणों में वर्णित है । बाणासुर तथा लवणासुर ये सभी  असुर संस्कृति के उपासक थे।
लवण ने अपने राज्य को विस्तृत कर लिया ।
इस काम में अपने बहनोई हृर्यश्व से मदद ली होगी । लवण ने राज्य की पूर्वी सीमा गंगा नदी तक बढ़ा ली और राम को कहलवाया कि 'मै तुम्हारे राज्य के निकट के ही राज्य का राजा हूँ ।' लवण की चुनौती से स्प्ष्ट था कि लवण की शक्ति बढ़ गई थी । लवण के द्वारा रावण की सराहना तथा राम की निंदा इस बात की सूचक है कि रावण की नीति और कार्य उसे पसंद थे । इससे पता चलता है कि लवण और उसका पिता मधु संभवत: किसी अनार्य शाखा के थे । प्राचीन साहित्य में मधु की नगरी मधुपुरी के वर्णनों से ज्ञात होता है कि उस नगरी का स्थापत्य श्रेष्ठ कोटि का था ।
शत्रुघ्न भी उस मनमोहक नगर को देख कर आर्श्चयचकित हो गये ।
वैदिक साहित्य में अनार्यौं के विशाल तथा दृढ़ दुर्गों एव मकानों के वर्णन मिलते हैं । संभवतः लवण-पिता मधु या उनके किसी पूर्वज ने यमुना के तटवर्ती प्रदेश पर अधिकार कर लिया हो । यह अधिकार लवण के समय से समाप्त हो गया । मधुवन और मधुपुरी के निवासियों या लवण के अनुयायिओं को शत्रुघ्न ने समाप्त कर दिया होगा । संभवत: उन्होंने मधुपुरी को नष्ट नहीं किया । उन्होंने जंगल को साफ़ करवाया तथा प्राचीन मधुपुरी को एक नये ढंग से आबाद कर उसे सुशोभित किया । (प्राचीन पौराणिक उल्लेखों तथा रामायण के वर्णन से यही प्रकट होता है ) रामायण में देवों से वर माँगते हुए शत्रुघ्न कहते हैं- `हे देवतागण, मुझे वर दें कि यह सुन्दर मधुपुरी या मथुरा नगरी, जो ऐसी सुशोभित है मानों देवताओं ने स्वयं बनाई हो, शीघ्र बस जाय ।
` देवताओं ने `एवमस्तु` कहा और मथुरा नगरी बस गई यद्यपि ये कथाऐं काल्पनिक उड़ाने अधिक हैं । परन्तु इन व्यक्तित्वों के उपस्थिति के सूचक हैं ।

दास असुर अथवा शूद्र परस्पर पर्याय वाची हैं ।
अहीर प्रमुखतः एक हिन्दू भारतीय जाति समूह है ।
परन्तु कुछ अहीर मुसलमान भी हैं ।
पश्चिमीय पाकिस्तान के सिन्धु प्रान्त में ..
और बौद्ध तथा कुछ सिक्ख भी हैं ,और ईसाई भी ।
अहीर एशिया की सबसे बड़ी जन-जाति है ।
भारत में अहीरों को यादव समुदाय के नाम से भी पहचाना जाता है, तथा अहीर व यादव या राव साहब ये सब के सब  यादवों के ही विशेषण हैं।
हरियाणा में राव शब्द यादवों का विशेषण है।
भारत में दो हजार एक की जन गणना के अनुसार यादव लगभग २०० मिलियन अर्थात् २० करोड़ से अथिक हैं । भारत में पाँच सौ बहत्तर से अधिक गोत्र यादवों में हैं ।
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यहूदीयों की हिब्रू बाइबिल के सृष्टि-खण्ड नामक अध्याय Genesis 49: 24 पर --- अहीर शब्द को जीवित ईश्वर का वाचक बताया है । --------------------------------------------------------------- ___The name Abir is one of The titles of the living god for some reason it,s usually translated( for some reason all god,s in Isaiah 1:24 we find four names of The lord in rapid succession as Isaiah Reports " Therefore Adon - YHWH - Saboath and Abir ---- Israel declares... ------------------ --------------------- Abir (अभीर )---The name reflects protection more than strength although one obviously -- has to be Strong To be any good at protecting still although all modern translations universally translate this name whith ---- Mighty One , it is probably best translated whith  Protector
... ------------------ ---------------------

यह नाम अबीर किसी जीवित देवता के शीर्षक में से किसी एक कारण से है।
जिसे आमतौर पर अनुवाद किया गया है।
(यशायाह 1:24 में किसी भी कारण से सभी ईश्वर यशायाह के रूप में बहुतायत से उत्तराधिकार में भगवान के चार नाम मिलते हैं)
"इसलिए अदोन - YHWH यह्व :  सबोथ और अबीर -इजराइल की घोषणा ------------------ ------------------ --- अबीर (अबर) --- नाम ताकत से अधिक सुरक्षा को दर्शाता है ।
यद्यपि एक स्पष्ट रूप से मजबूत होना जरूरी है।
यद्यपि अभी भी सभी आधुनिक अनुवादक सार्वभौमिक रूप से इस नाम का अनुवाद करते हैं। शक्तिशाली (ताकतवर)यह शायद सबसे अच्छा अनुवाद किया है।
--रक्षक ।
हिब्रू बाइबिल में तथा यहूदीयों की परम्पराओं में ईश्वर के पाँच नाम प्रसिद्ध हैं :-(१)-अबीर (२)--अदॉन (३)--सबॉथ (४)--याह्व्ह् तथा (५)--(इलॉही)बाइबल> सशक्त> हिब्रू> 46
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◄ 46. अबीर ►
सशक्त कमान
अबीर: मजबूत
मूल शब्द: אֲבִיר
भाषण का भाग: विशेषण 'पौरुष '
लिप्यान्तरण: अबीर
ध्वन्यात्मक :-वर्तनी: (अ-बियर ')
लघु परिभाषा: एक
संपूर्ण संक्षिप्तता
शब्द उत्पत्ति:-
अबार के समान ही
परिभाषा
बलवान
अनुवाद
शक्तिशाली एक (6)
[אבִיר विशेषण रूप  मजबूत; हमेशा = सशक्त, भगवान के लिए पुराने नाम (कविता में प्रयुक्त अबीर); केवल निर्माण में उत्पत्ति खण्ड(Genesis) 49:24 और उसके बाद से भजन संहिता (132: 2; भजन 132: 5; यशायाह (49:26; )यशायाह 60:16; יִשְׂרָאֵל 'या यशायाह 1:24 (सीए के महत्वपूर्ण टिप्पणी की तुलना करें) -  51 इस निर्माण को बैंक के लिए निर्दिष्ट करता है।

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सशक्त की संपूर्णता
पराक्रमी
'Abar से; शक्तिशाली (भगवान की बात की) - शक्तिशाली (एक)

हिब्रू भाषा में 'अबीर रूप
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रूप और लिप्यंतरण
אֲבִ֖יר אֲבִ֣יר אֲבִ֥יר אביר לַאֲבִ֥יר לאביר 'ר ·יי' רḇייר एक वैर ला'एरीर ला · 'ḇ ḇîr laaVir
'Ă ḇîr - 4 ओक
ला '' ırîr - 2 प्रा
उत्पत्ति खण्ड बाइबिल:-- (49:24)
יָדָ֑יו מִידֵי֙ אֲבִ֣יר יַעֲקֹ֔ב מִשָּׁ֥ם: याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति के हाथों से
: याकूब के शक्तिशाली [परमेश्वर] (अबीर )के हाथों से;
: हाथ याकूब के पराक्रमी हाथ वहाँ
भजन 132: 2
और याकूब के पराक्रमी को  याकूब के पराक्रमी [ईश्वर] को वचन दिया;
भगवान के लिए और याकूब के शक्तिशाली करने के लिए कसम खाई

भजन 132: 5
: लेट्वाः लिबियूः יהו֑֑֑ מִ֝שְּנ֗וֹת לַאֲבִ֥יר יַעֲקֹֽב: याकूब के पराक्रमी एक के लिए एक आवास स्थान
केजेवी: याकूब के शक्तिशाली [परमेश्वर] के लिए एक निवासस्थान
: भगवान एक याकूब की ताकतवर(अबीर) निवास

यशायाह 1:24
: יְהוָ֣ה צְבָא֔וֹת אֲבִ֖יר יִשְׂרָאֵ֑ל ה֚וֹי
: मेजबान के, इज़राइल के पराक्रमी,
केजेवी: सेनाओं के, इस्राएल के पराक्रमी,
: सेनाओं के सर्वशक्तिमान इस्राएल के शक्तिशाली अहा

यशायाह 49:26
: מֽוֹשִׁיעֵ֔ךְ וְגֹאֲלֵ֖ךְ אֲבִ֥יר יַעֲקֹֽב: ס
: और अपने उद्धारकर्ता, याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति
: और तेरा उद्धारकर्ता, याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति।
: अपने उद्धारकर्ता और अपने उद्धारक याकूब की ताकतवर हूँ

यशायाह 60:16
: מֽוֹשִׁיעֵ֔ךְ וְגֹאֲלֵ֖ךְ אֲבִ֥יר יַעֲקֹֽב:
और अपने उद्धारकर्ता, याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति
: और तेरा उद्धारकर्ता, याकूब के शक्तिशाली व्यक्ति।
अपने उद्धारकर्ता और अपने उद्धारक याकूब की ताकतवर हूँ
------------------------------------------------------------------- हिब्रू भाषा मे अबीर (अभीर) शब्द के बहुत ऊँचे अर्थ हैं- अर्थात् जो रक्षक है, सर्व-शक्ति सम्पन्न है इज़राएल देश में याकूब अथवा इज़राएल-- ( एल का सामना करने वाला )को अबीर का विशेषण दिया था । इज़राएल एक फ़रिश्ता है जो भारतीय पुराणों में यम के समान है ।
जिसे भारतीय पुराणों में ययाति कहा है ।
ययाति यम का भी विशेषण है ।
भारतीय पुराणों में विशेषतः महाभारत तथा श्रीमद्भागवत् पुराण में वसुदेव और नन्द दौनों को परस्पर सजातीय वृष्णि वंशी यादव बताया है ।
यादवों का सम्बन्ध पणियों ( Phoenician)
सेमेटिक जन-जाति से भी है ।
इनकी भाषा यहूदीयों तथा असीरियन लोगों के समान ही है ।
भारतीय इतिहास कारों ने इन्हें वणिक अथवा वणिक कहा है ।पणि कौन थे?
राथ के मतानुसार यह शब्द 'पण्=विनिमय' से बना है तथा पणि वह व्यक्ति है, जो कि बिना बदले के कुछ नहीं दे सकता।
इस मत का समर्थन जिमर तथा लुड्विग ने भी किया है।
लड्विग ने इस पार्थक्य के कारण पणिओं को यहाँ का आदिवासी व्यवसायी माना है।
ये अपने सार्थ अरब, पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ़्रीका में भेजते थे और अपने धन की रक्षा के लिए बराबर युद्ध करने को प्रस्तुत रहते थे।
दस्यु अथवा दास शब्द के प्रसंगों के आधार पर उपर्युक्त मत पुष्ट होता है।
किन्तु आवश्यक है कि आर्यों के देवों की पूजा न करने वाले और पुरोहितों को दक्षिणा न देने वाले इन पणियों को धर्मनिरपेक्ष, लोभी और हिंसक व्यापारी कहा जा सकता है।
ये आर्य और अनार्य दोनों हो सकते हैं।
हिलब्रैण्ट ने इन्हें स्ट्राबो द्वारा उल्लिखित पर्नियन जाति के तुल्य माना है।
जिसका सम्बन्ध दहा (दास) लोगों से था।
फ़िनिशिया इनका पश्चिमी उपनिवेश था, जहाँ ये भारत से व्यापारिक वस्तुएँ, लिपि, कला आदि ले गए।
मिश्र में रहने वाले ईसाई कॉप्ट Copt यहूदीयों की ही शाखा से सम्बद्ध हैं ।
Copts are one of the oldest Christian communities in the Middle East. Although integrated in the larger Egyptian nation, the Copts have survived as a distinct religious community forming today between 10 and 20 percent of the native population. They pride themselves on the apostolicity of the Egyptian Church whose founder was the first in an unbroken chain of patriots 
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कॉप्ट (Copt)
मध्य पूर्व में सबसे पुराना ईसाई समुदायों में से एक है | यद्यपि बड़े मिस्र के राष्ट्र में एकीकृत, कॉप्ट्स आज एक अलग धार्मिक समुदाय के रूप में बचे हैं,
जो आज की जनसंख्या के 10 से 20 प्रतिशत के बीच हैं।
वे खुद को मिस्र के चर्च की धर्मोपयो गीता पर गर्व करते थे ।
जिनके संस्थापक देशभक्तों की एक अटूट श्रृंखला में सबसे पहले थे
जो भारतीय इतिहास में गुप्त अथवा गुप्ता के रूप में
देवमीढ़ के दो रानीयाँ मादिष्या तथा वैश्यवर्णा नाम की थी । मादिषा के शूरसेन और वैश्यवर्णा के पर्जन्य हुए । शूरसेन के वसुदेव तथा पर्जन्य के नन्द हुए नन्द नौ भाई थे ।
__________________________________ धरानन्द ,ध्रुवनन्द ,उपनन्द ,अभिनन्द सुनन्द ________________________________ कर्मानन्द धर्मानन्द नन्द तथा वल्लभ । हरिवंश पुराण में वसुदेव को भी गोप कहकर सम्बोधित किया है । _________________________________________ "इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेन अहमच्युत ! गावां कारणत्वज्ञ सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति !!
अर्थात् हे विष्णु वरुण के द्वारा कश्यप को व्रज में गोप (आभीर) का जन्म धारण करने का शाप दिया गया .. क्योंकि उन्होंने वरुण की गायों का अपहरण किया था.. _________________________________________ हरिवंश पुराण--(ब्रह्मा की योजना नामक अध्याय) ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण पृष्ठ संख्या १३३---- और गोप का अर्थ आभीर होता है ।

“आभीरवामनयनाहृतमानसाय दत्तं मनो यदुपते ! तदिदं गृहाण” उद्भटः स च सङ्कीर्ण्णवर्ण्णः।
यहाँ आभीर और यदुपति परस्पर पर्याय वाची हैं ।

मैं अर्जुन गोपिकाओं को अपने साथ इन्द्र-प्रस्थ लेकर आ रहा था ।
परन्तु मार्ग में दुष्ट गोपों ने मुझे एक अबला के समान हरा दिया ।
और मैं अर्जुन उनकी रक्षा नहीं कर सका !  महाभारत के मूसल पर्व में गोप के स्थान पर आभीर शब्द का प्रयोग --
ततो लोभ: समभवद् दस्यूनां निहतेश्वरा:।
दृष्टवा स्त्रीयो नीयमाना: पार्थेनैकेन भारत ।४६।
हे भरत नन्दन! एकमात्र अर्जुन के संरक्षण में लायी जाती हुई स्त्रीयों को देख कर वहाँ रहने बाले डाँकूओं के मन मे लोभ उत्पन्न हो गया ।
ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहतचेतस: ।
आभीरा मन्त्रामासु: समेत्याशुभ दर्शना: ।। ४७।।             

     संस्कृत साहित्य के कवि उद्भट के काव्य- से उद्धृत
हम आपको बता दें कि
इतिहासकारों ने जयापीड का शासनकाल सन् ७७९-८१३ ई. माना है। उद्भट जयापीड के शासनकाल के प्रथम चरण में रख जा सकते हैं क्योंकि मान्यता है कि जयापीड ने अपने शासन के अंतिम चरण में प्रजा को पर्याप्त उत्पीड़ित किया था।
इससे क्षुब्ध हो ब्राह्मणों ने उसका बहिष्कार कर दिया था।
अतएव उद्भट का समय ईसवी सन् की आठवीं शताब्दी में ही संभव हो सकता है। जबकि भागवत पुराण बारहवीं सदी के अन्त में तैरहवीं सदी में रचित ग्रन्थ है ।
दक्षिणात्य के ब्राह्मणों द्वारा ।
________________________________________ परन्तु यादवों को कभी भी कहीं भी वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत क्षत्रिय स्वीकार न करने का कारण यही है, कि ब्राह्मण समाज ने प्राचीन काल में ही यदु को दास अथवा शूद्र घोषित कर दिया था ।
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त का १०वाँ श्लोक प्रमाण रूप में देखें--- _________________________________________ उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे---- ---------------------------------------------------------
अन्यत्र ऋग्वेद के द्वित्तीय मण्डल के तृतीय सूक्त के छठे श्लोक में दास शब्द का प्रयोग शम्बर असुर के लिए हुआ है । जो कोलों का नैतृत्व करने वाला है ! ------------------------------------------------------------ उत् दासं कौलितरं बृहत: पर्वतात् अधि आवहन इन्द्र: शम्बरम् ।।
________________________________________
कोलों के नेता शम्बर को इन्द्र ने बड़े पर्वतों से नीचे गिरा दिया । ------------------------------------------------------------६६-६ ऋग्वेद-२ /३ /६
दास शब्द इस सूक्त में एक वचन रूप में है ।
और ६२वें सूक्त में द्विवचन रूप में है । वैदिक व्याकरण में "दासा " लौकिक संस्कृत भाषा में "दासौ" रूप में मान्य है ।
परीणसा :---
परि + नस--व्याप्तौ बा० आत् दीर्षः । बहुपदार्थे निघण्टुः ऋ० ९९७९ उदा० ।
गोप , आभीर और यादव परस्पर विशेषण शब्द हैं ।
ये संस्कृत के प्रमाण देखें---
(गोप + स्वार्थेकन्।) गोपाल।
बहुग्रामाधिपतिः ।
इतिशब्दरत्नावली॥
गोपकन्या स्त्री (इन्द्रियाद्युपलक्षितशरीररक्षकस्यगोपस्यवैद्यस्यकन्येवहितकारित्वात्।)
शारिवौषधिः। इतिराजनिर्घण्टः॥
(गोपस्यकन्या।) आभीरसुता॥
(यथा -- “युवतीर्गोपकन्याश्चरात्रौसंकाल्यकालवित्।कैशोरकंमानयन्वैसहताभिर्मुमोदह॥”
इतिहरिवंशे।७६।१८॥)

(गोर्जलात्कफपित्तादिदूषितरसातपातिरक्षतीति।गो + पा + “आतोऽनुपसर्गेकः।” ३।२।३।इतिकः।)
बोलः। (गांगोजातिंपातिरक्षतीति।गो + पा + कः।) जातिविशेषः।.
गोयालाइतिभाषा॥तत्पर्य्यायः।गोसंख्यः२गोधुक्३आभीरः४वल्लवः५गोपालः६।इत्यमरः।२।९।५७॥
तस्योत्पत्तिर्यथा -- “मणिबन्ध्यांतन्त्रवायात्गोपजातेश्चसम्भवः।” इतिपराशरपद्धतिः॥
(यथा मनुः।८।२६०। “व्याधाञ्छाकुनिकान्गोपान्कैवर्त्तान्मूलखानकान्।व्यालग्राहानुञ्छवृत्तीनन्यांश्चवनचारिणः॥”)
गोष्ठाध्यक्षः। (गांपृथिवींपातिरक्षतीति।पा + कः।) पृथ्वीपतिः।बहुग्रामस्याधिकृतः।इतिमेदिनी।पे।५॥ (गाःपातिरक्षतीति।पा + कः।गोरक्षकः।यथा मनुः।८।२३१। “गोपःक्षीरभृतोयस्तुसदुह्याद्दशतोवराम्।गोस्वाम्यनुमतेभृत्यःसास्यात्पालेभृतेभृतिः॥” गन्धर्व्वविशेषः।
यथा रामायणे।६।९१।४६। “नारदस्तुम्बुरुर्गोपःप्रभयासूर्य्यवर्च्चसः।एतेगन्धर्व्वराजानोभरतस्याग्रतोजगुः॥”

ईरानी आर्यों ने " दास " शब्द का उच्चारण "दाहे " रूप में किया है -- ईरानी आर्यों की भाषा में दाहे का अर्थ --श्रेष्ठ तथा कुशल होता है ।
अर्थात् दक्ष-- ----------------------------------------------------------------- यदुवंशी कृष्ण द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में-- यह कहना पूर्ण रूपेण मिथ्या व विरोधाभासी ही है कि .......
"वर्णानां ब्राह्मणोsहम् " ( श्रीमद्भगवद् गीता दशम् अध्याय विभूति-पाद) __________________________________ {"चातुर्यवर्णं मया सृष्टं गुण कर्म विभागश:" } (श्रीमद्भगवत् गीता अध्याय ४/३)
क्योंकि कृष्ण यदु वंश के होने से स्वयं ही शूद्र अथवा दास थे । फिर वह व्यक्ति समाज की पक्ष-पात पूर्ण इस वर्ण व्यवस्था का समर्थन क्यों करेगा ! ... गीता में वर्णित बाते दार्शिनिक रूप में तो कृष्ण का दर्शन (ज्ञान) हो सकता है । ________________________ परन्तु
{"वर्णानां ब्राह्मणोsहम् "} ________________________________________ अथवा
{ चातुर्यवर्णं मया सृष्टं गुण कर्म विभागश:} जैसे
तथ्य उनके मुखार-बिन्दु से नि:सृत नहीं हो सकते हैं गुण कर्म स्वभाव पर वर्ण व्यवस्था का निर्माण कभी नहीं हुआ... ये तो केवल एक आडम्बरीय आदर्श है । केवल जन्म या जाति के आधार पर ही हुआ ।
ईरानी आर्यों ने भी समाज को चार वेदों में विभाजित किया था ।
परन्तु वह विभाजन कर्म पर आधारित था ।
परन्तु भारतीय वर्ण-व्यवस्था जाति पर आधारित रही
__________________________________________
.. स्मृतियों का विधान था , कि ब्राह्मण व्यभिचारी होने पर भी पूज्य है ।
क्योंकि वह जन्म से ब्राह्मण है इसलिए _____________________________________
और शूद्र जितेन्द्रीय होने पर भी पूज्य नहीं है।
क्योंकि कौन दोष-पूर्ण अंगों वाली गाय को छोड़कर, शील वती गधी को कौन दुहेगा ?
_____________"_________________""______
... "दु:शीलोSपि द्विज पूजयेत् न शूद्रो विजितेन्द्रीय: क: परीत्ख्य दुष्टांगा दुहेत् शीलवतीं खरीम् ।।१९२।।. ( पराशर स्मृति ) ------------------------------------------------------

हरिवंश पुराण में वसुदेव का गोप रूप में वर्णन है । _______________________________
"इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेन अहमच्युत ! गावां कारणत्वज्ञ: सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वम् एष्यति ।।२२।।
अर्थात् जल के अधिपति वरुण के द्वारा ऐसे वचनों को सुनकर अर्थात् कश्यप के विषय में सब कुछ जानकर वरुण ने कश्यप को शाप दे दिया , कि कश्यप ने अपने तेज के प्रभाव से उन गायों का अपहरण किया है । उसी अपराध के प्रभाव से व्रज में गोप (आभीर) का जन्म धारण करें अर्थात् गोपत्व को प्राप्त हों । ________________________________________ हरिवंश पुराण (ब्रह्मा की योजना) नामक अध्याय पृष्ठ संख्या २३३ (ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करणों) ****************************************** और बौद्ध काल के बाद में रचित स्मृति - ग्रन्थों में जैसे व्यास -स्मृति में अध्याय १ श्लोक संख्या ११--१२ में--- ______________________________________ ______________________________________ अर्थात् बढ़ई ,नाई ,गोप (यादव)कुम्भकार,बनिया ,किरात कायस्थ मालाकार ,दास अथवा असुर कोल आदि जन जातियाँ इतनी अपवित्र हैं, कि इनसे बात करने के बाद सूर्य दर्शन अथवा स्नानं करके पवित्र होना चाहिए ----------(व्यास -स्मृति )----. सम्वर्त -स्मृति में एक स्थान पर लिखा है ---------------------------------------------------
" क्षत्रियात् शूद्र कन्यानाम् समुत्पन्नस्तु य: सुत: । स गोपाल इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशय: --------------------
अर्थात् क्षत्रिय से शूद्र की कन्या में उत्पन्न होने वाला पुत्र गोपाल अथवा गोप होता है । और विप्रों के द्वारा भोजान्न होता है इसमे संशय नहीं .... (सम्वर्त- स्मृति) ____________________________ वेद व्यास स्मृति में लिखा है कि _____________________________________ वर्द्धकी नापितो गोप: आशाप: कुम्भकारक: । वणिक् किरात: कायस्थ :मालाकार: कुटुम्बिन: एते चान्ये च बहव शूद्र:भिन्न स्व कर्मभि: चर्मकारो भटो भिल्लो रजक: पुष्करो नट: वरटो मेद चाण्डालदास श्वपचकोलका: ।।११।। एतेsन्त्यजा समाख्याता ये चान्ये च गवार्शना: एषां सम्भाषणाद् स्नानंदर्शनादर्क वीक्षणम् ।।१२।। ----------------------------------------------------------------- वर्द्धकी (बढ़ई) ,नाई ,गोप ,आशाप , कुम्हार ,वणिक् ,किरात , कायस्थ,माली , कुटुम्बिन, ये सब अपने कर्मों से भिन्न बहुत से शूद्र हैं । चमार ,भट, भील ,धोवी, पुष्करो, नट, वरट, मेद , चाण्डाल ,दास,श्वपच , तथा कोल (कोरिया)ये सब अन्त्यज कहे जाते हैं । और अन्य जो गोभक्षक हैं वे भी अन्त्यज होते हैं । इनके साथ सम्भाषण करने पर स्नान करना चाहिए तब शुद्धि होती है
____________________________
अभोज्यान्ना:स्युरन्नादो यस्य य: स्यात्स तत्सम: नापितान्वयपित्रार्द्ध सीरणो दासगोपका:।।४९।। शूद्राणामप्योषान्तु भुक्त्वाsन्न नैव दुष्यति ( व्यास-स्मृति) धर्मेणान्योन्य भोज्यान्ना द्विजास्तु विदितान्वया: ।।५०।। _______________________________________ नाई वंश परम्परा व मित्र ,अर्धसीरी ,दास ,तथा गोप ,ये शूद्र हैं ।
तो भी इन शूद्रों के अन्न को खाकर दूषित नहीं होते ।।
जिनके वंश का ज्ञान है एेसे द्विज धर्म से परस्पर में भोजन के योग्य अन्न वाले होते हैं ।५०। ________________________________________ (व्यास- स्मृति प्रथम अध्याय श्लोक ११-१२) -------------------------------------------------------------- स्मृतियों की रचना काशी में हुई ,---------- वर्ण-व्यवस्था का पुन: दृढ़ता से विधान पारित करने के लिए काशी के इन ब्राह्मणों ने रूढ़ि वादी पृथाओं के पुन: संचालन हेतु स्मृति -ग्रन्थों की रचना की जो पुष्यमित्र सुंग की परम्पराओं के अनुगामी थे । _________________________________________ "" वाराणस्यां सुखासीनं वेद व्यास तपोनिधिम् । पप्रच्छुमुर्नयोSभ्येत्य धर्मान् वर्णव्यवस्थितान् ।।१।।
__________________________________________
अर्थात् वाराणसी में सुख-पूर्वक बैठे हुए तप की खान वेद व्यास से ऋषियों ने वर्ण-व्यवस्था के धर्मों को पूछा । -------------------------------------------------------------- तुलसी दास जी भी इसी पुष्य मित्र सुंग की परम्पराओं का अनुसरण करते हुए लिखते हैं --- -------- राम और समुद्र के सम्वाद रूप में..
. "आभीर यवन किरात खल अति अघ रूप जे " वाल्मीकि-रामायण में राम और समुद्र के सम्वाद रूप में वर्णित युद्ध-काण्ड सर्ग २२ श्लोक ३३पर समुद्र राम से निवेदन करता है कि आप अपने अमोघ वाण उत्तर दिशा में रहने वाले अहीरों पर छोड़ दे-- जड़ समुद्र भी राम से बाते करता है ।
कितना अवैज्ञानिक व मिथ्या वर्णन है ................
जड़ समुद्र भी अहीरों का शत्रु बना हुआ है ।

--------------------------------------------------------------उत्तरेणावकाशो$स्ति कश्चित् पुण्यतरो मम ।
द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान् ।।३२।।
उग्रदर्शनं कर्माणो बहवस्तत्र दस्यव: ।
आभीर प्रमुखा: पापा: पिवन्ति सलिलम् मम ।।३३।।
तैर्न तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पाप कर्मभि: ।
अमोघ क्रियतां रामो$यं  तत्र शरोत्तम: ।।३४।।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सागरस्य महात्मन: ।
मुमोच तं शरं दीप्तं परं सागर दर्शनात् ।।३५।।
          (वाल्मीकि-रामायण युद्ध-काण्ड २२वाँ सर्ग)
__________________________________________
अर्थात् समुद्र राम से बोल प्रभो ! जैसे जगत् में आप सर्वत्र विख्यात एवम् पुण्यात्मा हैं ।
उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर द्रुमकुल्य नामका बड़ा ही प्रसिद्ध देश है ।३२।
वहाँ अाभीर आदि जातियों के बहुत सेमनुष्य निवास करते हैं ।
जिनके कर्म तथा रूप बड़े भयानक हैं ।सबके सब पापी और लुटेरे हैं ।
वे लोग मेरा जल पीते हैं ।३३।
उन पापाचारियों का मेरे जल से स्पर्श होता रहता है ।
इस पाप को मैं नहीं यह सकता हूँ ।
हे राम आप अपने इस उत्तम वाण को वहीं सफल कीजिए ।३४।
महामना समुद्र का यह वचन सुनकर समुद्र के दिखाए मार्ग के अनुसार उसी अहीरों के देश द्रुमकुल्य की दिशा में राम ने वह वाण छोड़ दिया ।३।
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निश्चित रूप से ब्राह्मण समाज ने राम को आधार बनाकर ऐसी मनगढ़न्त कथाओं का सृजन किया है
जो अवैज्ञानिक ही नहीं अपितु मूर्खता पूर्ण भी है ।
__________________________________________
पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय १६  में गायत्री माता को  नरेन्द्र सैन आभीर की कन्या गायत्री के रूप में वर्णित किया गया है ।
_________________________________________
" स्त्रियो दृष्टास्तु यास्त्व ,
      सर्वास्ता: सपरिग्रहा : |
आभीरः कन्या रूपाद्या ,
      शुभास्यां चारू लोचना ।७।
न देवी न च गन्धर्वीं ,
नासुरी न च पन्नगी ।
वन चास्ति तादृशी कन्या ,
यादृशी सा वराँगना ।८।
_________________________________________
अर्थात् जब इन्द्र ने पृथ्वी पर जाकर देखा
तो वे पृथ्वी पर कोई सुन्दर और शुद्ध कन्या न पा सके
परन्तु एक नरेन्द्र सैन आभीर की कन्या गायत्री को सर्वांग सुन्दर और शुद्ध देखकर  दंग रह गये ।
उसके समान सुन्दर  कोई देवी न कोई गन्धर्वी  न सुर असुर की स्त्री और न कोई पन्नगी ही थी।
इन्द्र ने तब  ने उस कन्या गायत्री से पूछा कि तुम कौन हो  ? और कहाँ से आयी हो ? और किस की पुत्री हो ?
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गोप कन्यां च तां दृष्टवा , गौरवर्ण महाद्युति:।
एवं चिन्ता पराधीन ,यावत् सा गोप कन्यका ।।९ ।।
पद्म पुराण सृष्टि खण्ड अध्याय १६ १८२ श्लोक में
इन्द्र ने कहा कि तुम बड़ा रूप वती हो , गौरवर्ण वाली महाद्युति से युक्त हो ,
अध्याय १७ के ४८३ में प्रभु ने कहा कि यह गोप कन्या पराधीन चिन्ता से व्याकुल है ।
देवी चैव महाभागा , गायत्री नामत: प्रभु ।
गान्धर्वेण विवाहेन ,विकल्प मा कथाश्चिरम्।९।
१८४ श्लोक में विष्णु ने ब्रह्मा जी से कहा कि हे प्रभो इस कन्या का नाम गायत्री है ।
भागवत पुराण :----को
१०/१/२२ में स्पष्टत: आभीरों अथवा गोपों देवताओं का अवतार बताया गया है ।
________________________________________
" अंशेन त्वं पृथिव्या वै ,प्राप्य जन्म यदो:कुले ।
भार्याभ्याँश संयुतस्तत्र ,गोपालत्वं करिष्यसि ।१४।
________________________________________
वस्तुत आभीर और गोप शब्द परस्पर पर्याय वाची हैं
पगले आभीर- कन्या शब्द आया है फिर गोप -कन्या भी
गायत्री के लिए ..

________________________________________
अहीर ही वास्तविक यादवों का रूप हैं ।
जिनकी अन्य शाखाएें गौश्चर: (गुर्जर) तथा जाट हैं ।
दशवीं सदी में अल बरुनी ने नन्द को जाट के रूप में वर्णित किया है ।
...जाट अर्थात् जादु (यदु ) अहीर ,जाट ,गुर्जर आदि जन जातियों को शारीरिक रूप से शक्ति शाली और वीर होने पर भी तथा कथित ब्राह्मणों ने कभी क्षत्रिय नहीं माना.. _______________________________________ क्योंकि इनके पूर्वज यदु दास घोषित कर दिये थे ।.... और आज जो राजपूत अथवा ठाकुर अथवा क्षत्रिय स्वयं को लिख रहे हैं ... वो यदु वंश के कभी नहीं हैं । क्योंकि वेदों में भी यदु को दास अथवा असुर के रूप में वर्णित किया है।
जादौन तो अफ़्ग़ानिस्तान में तथा पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में पठान थे ।
जो सातवीं सदी में कुछ इस्लाम में चले गये और कुछ भारत में राजपूत अथवा ठाकुर के रूप में उदित हुए ... यद्यपि जादौन पठान स्वयं को यहूदी ही मानते हैं .... ________________________________________ परन्तु हैं ये पठान लोग धर्म की दृष्टि से मुसलमान है ... पश्चिमीय एशिया में भी अबीर (अभीर) यहूदीयों की प्रमाणित शाखा है । यहुदह् को ही यदु कहा गया ... हिब्रू बाइबिल में यदु के समान यहुदह् शब्द की व्युत्पत्ति मूलक अर्थ है " जिसके लिए यज्ञ की जाये" और यदु शब्द यज् --यज्ञ करणे धातु से व्युत्पन्न वैदिक शब्द है । -----------------------------------------------------------------
वेदों में वर्णित तथ्य ही ऐतिहासिक श्रोत हो सकते हैं । न कि रामायण और महाभारत आदि ग्रन्थ में वर्णित तथ्य.... ये पुराण आदि ग्रन्थ बुद्ध के परवर्ती काल में रचे गये । और भविष्य-पुराण सबसे बाद अर्थात् में उन्नीसवीं सदी में.. ----------------------------------------------------------------- आभीर: , गौश्चर: ,गोप: गोपाल : गुप्त: यादव - इन शब्दों को एक दूसरे का पर्याय वाची समझा जाता है।
अहीरों को एक जाति, वर्ण, आदिम जाति या नस्ल के रूप मे वर्णित किया जाता है, जिन्होने भारत व नेपाल के कई हिस्सों पर राज किया था ।
गुप्त कालीन संस्कृत शब्द -कोश "अमरकोष " में गोप शब्द के अर्थ ---गोपाल, गोसंख्य, गोधुक, आभीर:, वल्लभ, आदि बताये गए हैं।
प्राकृत-हिन्दी शब्दकोश के अनुसार भी अहिर, अहीर, अरोरा व ग्वाला सभी समानार्थी शब्द हैं। हिन्दी क्षेत्रों में अहीर, ग्वाला तथा यादव शब्द प्रायः परस्पर समानार्थी माने जाते हैं।.
वे कई अन्य नामों से भी जाने जाते हैं, जैसे कि गवली, घोसी या घोषी अहीर, घोषी नामक जो मुसलमान गद्दी जन-जाति है ।
वह भी इन्ही अहीरों से विकसित है । हिमाचल प्रदेश में गद्दी आज भी हिन्दू हैं । तमिल भाषा के एक- दो विद्वानों को छोडकर शेष सभी भारतीय विद्वान इस बात से सहमत हैं कि अहीर शब्द संस्कृत के आभीर शब्द का तद्भव रूप है।
आभीर (हिंदी अहीर) एक घुमक्कड़ जाति थी जो शकों की भांति बाहर से हिंदुस्तान में आई। _________________________________________
इतिहास कारों ने ऐसा लिखा ...
परन्तु प्रमाण तो यह भी हैं कि अहीर लोग , देव संस्कृति के उपासक जर्मनिक जन-जातियाँ से सम्बद्ध भारतीय आर्यों से बहुत पहले ही इस भू- मध्य रेखीय देश में आ गये थे, जब भरत नाम की इनकी सहवर्ती जन-जाति निवास कर कहा थी । भारत नामकरण भी यहीं से हुआ है...
शूद्रों की यूरोपीय पुरातन शाखा स्कॉटलेण्ड में शुट्र (Shouter) थी ।
स्कॉटलेण्ड का नाम आयर लेण्ड भी नाम था । तथा जॉर्जिया (गुर्जिस्तान) भी इसी को कहा गया ... स्पेन और पुर्तगाल का क्षेत्र आयबेरिया इन अहीरों की एक शाखा की क्रीडा-स्थली रहा है ! आयरिश भाषा और संस्कृति का समन्वय प्राचीन फ्रॉन्स की ड्रयूड (Druids) अथवा द्रविड संस्कृति से था । ब्रिटेन के मूल निवासी ब्रिटॉन् भी इसी संस्कृति से सम्बद्ध थे । ______________________________________ परन्तु पाँचवी-सदी में जर्मन जाति से सम्बद्ध एेंजीलस शाखा ने इनको परास्त कर ब्रिटेन का नया नाम आंग्ललेण्ड देकर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया --- भारत के नाम का भी ऐसा ही इतिहास है । _______________________________________ आभीर शब्द की व्युत्पत्ति- " अभित: ईरयति इति आभीर " के रूप में भी मान्य है । इनका तादात्म्य यहूदीयों के कबीले अबीरों (Abeer) से प्रस्तावित है । "( और इस शब्द की व्युत्पत्ति- अभीरु के अर्थ अभीर से प्रस्तावित है--- जिसका अर्थ होता है ।जो भीरु अथवा कायर नहीं है ,अर्थात् अभीर :) ________________________________________ इतिहास मे भी अहीरों की निर्भीकता और वीरता का वर्णन प्राचीनत्तम है । इज़राएल में आज भी अबीर यहूदीयों का एक वर्ग है । जो अपनी वीरता तथा युद्ध कला के लिए विश्व प्रसिद्ध है । कहीं पर " आ समन्तात् भीयं राति ददाति इति आभीर : इस प्रकार आभीर शब्द की व्युत्पत्ति-की है , जो अहीर जाति के भयप्रद रूप का प्रकाशन करती है । अर्थात् सर्वत्र भय उत्पन्न करने वाला आभीर है । यह सत्य है कि अहीरों ने दास होने की अपेक्षा दस्यु होना उचित समझा ... तत्कालीन ब्राह्मण समाज द्वारा बल-पूर्वक आरोपित आडम्बर का विरोध किया । अत: ये ब्राह्मणों के चिर विरोधी बन गये और ब्राह्मणों ने इन्हें दस्यु ही कहा " _________________________________________ बारहवीं सदी में लिपिबद्ध ग्रन्थ श्रीमद्भागवत् पुराण में अहीरों को बाहर से आया हुआ बताया है , वह भी यवन (यूनानीयों)के साथ ... देखिए कितना विरोधाभासी वर्णन है । फिर महाभारत में मूसल पर्व में वर्णित अभीर कहाँ से आ गया.... और वह भी गोपिकाओं को लूटने वाले .. ________________________________________ जबकि गोप को ही अहीर कहा गया है । संस्कृत साहित्य में.. इधर उसी महाभारत के लेखन काल में लिखित स्मृति-ग्रन्थों में व्यास-स्मृति के अध्याय १ के श्लोक संख्या ११---१२ पर गोप, कायस्थ ,कोल आदि को इतना अपवित्र माना, कि इनको देखने के बाद तुरन्त स्नान करना चाहिए.. _______________________________________ यूनानी लोग भारत में ई०पू० ३२३ में आये और महाभारत को आप ई०पू० ३०००वर्ष पूर्व का मानते हो.. फिर अहीर कब बाहर से आये ई०पू० ३२३ अथवा ई०पू० ३०००में .... भागवत पुराण में तथागत बुद्ध को विष्णु का अवतार माना लिया गया है । जबकि वाल्मीकि-रामायण में राम बुद्ध को चोर और नास्तिक कहते हैं । राम का और बुद्ध के समय का क्या मेल है ? अयोध्या काण्ड सर्ग १०९ के ३४ वें श्लोक में राम कहते हैं--जावालि ऋषि से---- -------------------------------------------------------------- यथा ही चोर:स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि ------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------
बारहवीं सदी में लिपिबद्ध ग्रन्थ श्रीमद्भागवत् पुराण में अहीरों को बाहर से आया बताया गया..... फिर महाभारत में मूसल पर्व में वर्णित अभीर कहाँ से आ गये.... -------------------------------- किरात हूणान्ध्र पुलिन्द पुलकसा: आभीर शका यवना खशादय :। येsन्यत्र पापा यदुपाश्रयाश्रया शुध्यन्ति तस्यै प्रभविष्णवे नम: ------------------------------------ श्रीमद्भागवत् पुराण-- २/४/१८
वास्तव में एैसे काल्पनिक ग्रन्थों का उद्धरण देकर जो लोग अहीरों(यादवों) पर आक्षेप करते हैं ।
नि: सन्देह वे अल्पज्ञानी व मानसिक रोगी हैं .. वैदिक साहित्य का अध्ययन कर के वे अपना उपचार कर लें ... ------------------------------------------------------------
हिब्रू भाषा में अबीर शब्द का अर्थ---वीर अथवा शक्तिशाली (Strong or brave) आभीरों को म्लेच्छ देश में निवास करने के कारण अन्य स्थानीय आदिम जातियों के साथ म्लेच्छों की कोटि में रखा जाता था, तथा वृत्य क्षत्रिय कहा जाता था। वृत्य अथवा वार्त्र भरत जन-जाति जो वृत्र की अनुयायी तथा उपासक थी । जिस वृत्र को कैल्ट संस्कृति में ए-बरटा (Abarta)कहा है । जो त्वष्टा परिवार का सदस्य हैं । तो इसके पीछे यह कारण था , कि ये यदु की सन्तानें हैं _______________________________________ यदु को ब्राह्मणों ने आर्य वर्ग से बहिष्कृत कर उसके वंशजों को ज्ञान संस्कार तथा धार्मिक अनुष्ठानों से वञ्चित कर दिया था । और इन्हें दास -(दक्ष) घोषित कर दिया था ।
इसका एक प्रमाण देखें --- ------------------------------------------------------------------- उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे- ------------------------------------------------------------- ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२ सूक्त के १० वें श्लोकाँश में.. यहाँ यदु और तुर्वसु दौनों को दास कर सम्बोधित किया गया है । यदु और तुर्वसु नामक दास गायों से घिरे हुए हैं हम उनकी प्रशंसा करते हैं। ---------------------------------------------------------------- ईरानी आर्यों की भाषा में दास शब्द दाह/ के रूप में है जिसका अर्थ है ---पूज्य व पवित्र अर्थात् (दक्ष ) यदु का वर्णन प्राचीन पश्चिमीय एशिया के धार्मिक साहित्य में गायों के सानिध्य में ही किया है । अत: यदु के वंशज गोप अथवा गोपाल के रूप में भारत में प्रसिद्ध हुए..... हिब्रू बाइबिल में ईसा मसीह की बिलादत(जन्म) भी गौओं के सानिध्य में ही हुई ... ईसा( कृष्ट) और कृष्ण के चरित्र का भी साम्य है | ईसा के गुरु एेंजीलस( Angelus)/Angel हैं ,जिसे हिब्रू परम्पराओं ने फ़रिश्ता माना है ।
तो कृष्ण के गुरु घोर- आंगीरस हैं ।
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दास शब्द ईरानी असुर आर्यों की भाषा में दाहे के रूप में उच्च अर्थों को ध्वनित करता है।
बहुतायत से अहीरों को दस्यु उपाधि से विभूषित किया जाता रहा है ।
सम्भवत: इन्होंने चतुर्थ वर्ण के रूप में दासता की वेणियों को स्वीकार नहीं किया, और ब्राह्मण जाति के प्रति विद्रोह कर दिया तभी से ये दास से दस्यु: हो गये ... जाटों में दाहिया गोत्र इसका रूप है ।
वस्तुत: दास का बहुवचन रूप ही दस्यु: रहा है । जो अंगेजी प्रभाव से डॉकू अथवा (dacoit )हो गया । ------------------------------------------------------------------- महाभारत में भी युद्धप्रिय, घुमक्कड़, गोपाल अभीरों का उल्लेख मिलता है। महाभारत के मूसल पर्व में आभीरों को लक्ष्य करके प्रक्षिप्त और विरोधाभासी अंश जोड़ दिए हैं । कि इन्होने प्रभास क्षेत्र में गोपियों सहित अर्जुन को भील रूप में लूट लिया था । आभीरों का उल्लेख अनेक शिलालेखों में पाया जाता है। शक राजाओं की सेनाओं में ये लोग सेनापति के पद पर नियुक्त थे। आभीर राजा ईश्वरसेन का उल्लेख नासिक के एक शिलालेख में मिलता है। ईस्वी सन्‌ की चौथी शताब्दी तक अभीरों का राज्य रहा। अन्ततोगत्वा कुछ अभीर राजपूत जाति में अंतर्मुक्त हुये व कुछ अहीर कहलाए, जिन्हें राजपूतों सा ही योद्धा माना गया। ---------------------------------------------------------- मनु-स्मृति में अहीरों को काल्पनिक रूप में ब्राह्मण पिता तथा अम्बष्ठ माता से उत्पन्न कर दिया है । आजकल की अहीर जाति ही प्राचीन काल के आभीर हैं।
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ब्राह्मणद्वैश्य कन्यायायामबष्ठो नाम जायते ।
"आभीरोsम्बष्टकन्यायामायोगव्यान्तु धिग्वण" इति-----( मनु-स्मृति ) अध्याय १०/१५
तारानाथ वाचस्पत्य कोश में आभीर शब्द की व्युत्पत्ति- दी है --- "आ समन्तात् भियं राति ददाति - इति आभीर : " अर्थात् सर्वत्र भय भीत करने वाले हैं ।
- यह अर्थ तो इनकी साहसी और वीर प्रवृत्ति के कारण दिया गया था ।
क्योंकि शूद्रों का दर्जा इन्होने स्वीकार नहीं किया । दास होने की अपेक्षा दस्यु बनना उचित समझा।
अत: इतिहास कारों नें इन्हें दस्यु या लुटेरा ही लिखा । जबकि अपने अधिकारों के लिए इनकी यह लड़ाई थी । सौराष्ट्र के क्षत्रप शिलालेखों में भी प्रायः आभीरों का वर्णन मिलता है। ----------------------------------------------------------------- पुराणों व बृहद्संहिता के अनुसार समुद्रगुप्त काल में भी दक्षिण में आभीरों का निवास था।
उसके बाद यह जाति भारत के अन्य हिस्सों में भी बस गयी। मध्य प्रदेश के अहिरवाड़ा को भी आभीरों ने संभवतः बाद में ही विकसित किया।
राजस्थान में आभीरों के निवास का प्रमाण जोधपुर शिलालेख (संवत 918) में मिलता है, जिसके अनुसार "आभीर अपने हिंसक दुराचरण के कारण निकटवर्ती इलाकों के निवासियों के लिए आतंक बने हुये थे " यद्यपि पुराणों में वर्णित अभीरों की विस्तृत संप्रभुता 6ठवीं शताब्दी तक नहीं टिक सकी, परंतु बाद के समय में भी आभीर राजकुमारों का वर्णन मिलता है, हेमचन्द्र के "दयाश्रय काव्य" में जूनागढ़ के निकट वनस्थली के चूड़ासम राजकुमार गृहरिपु को यादव व आभीर कहा गया है। भाटों की श्रुतियों व लोक कथाओं में आज भी चूड़ासम "अहीर राणा" कहे जाते हैं। अम्बेरी के शिलालेख में सिंघण के ब्राह्मण सेनापति खोलेश्वर द्वारा आभीर राजा के विनाश का वर्णन तथा खानदेश में पाये गए गवली (ग्वाला) राज के प्राचीन अवशेष जिन्हें पुरातात्विक रूप से देवगिरि के यादवों के शासन काल का माना गया है, यह सभी प्रमाण इस तथ्य को बल देते हैं कि आभीर यादवों से संबन्धित थे।
आज तक अहीरों में यदुवंशी अहीर नामक उप जाति का पाया जाना भी इसकी पुष्टि करता है।
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अहीरों की ऐतिहासिक उत्पत्ति को लेकर विभिन्न इतिहासकर एकमत नहीं हैं।
परन्तु महाभारत या श्री मदभगवत् गीता के युग मे भी यादवों के आस्तित्व की अनुभूति होती है ।। तथा उस युग मे भी इन्हें आभीर,अहीर, गोप या ग्वाला ही कहा जाता था। कुछ विद्वान इन्हे भारत में आर्यों से पहले आया हुआ बताते हैं, परंतु शारीरिक गठन के अनुसार इन्हें आर्य माना जाता है। ---------------------------------------------------------------- पौराणिक दृष्टि से, अहीर या आभीर यदुवंशी राजा आहुक के वंशज है। शक्ति संगम तंत्र मे उल्लेख मिलता है कि राजा ययाति के दो पत्नियाँ थीं-देवयानी व शर्मिष्ठा। देवयानी से यदु व तुर्वशू नामक पुत्र हुये। यदु के वंशज यादव कहलाए।
यदुवंशीय भीम , सात्वत के वृष्णि आदि चार पुत्र हुये व इन्हीं की कई पीढ़ियों बाद राजा आहुक हुये, जिनके वंशज आभीर या अहीर कहलाए। “आहुक वंशात् समुद्भूता आभीरा: इति प्रकीर्तिता। (शक्ति संगम तंत्र, पृष्ठ 164)” इस पंक्ति से स्पष्ट होता है।
देवक तथा उग्रसेन आहुक के पुत्र थे ।
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यादव व आभीर मूलतः एक ही वंश के क्षत्रिय थे ।
तथा "हरिवंश पुराण" मे भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। भागवत में भी वसुदेव ने आभीर पति नन्द को अपना भाई कहकर संबोधित किया है ।
, व श्रीक़ृष्ण ने नन्द को मथुरा से विदा करते समय गोकुलवासियों को संदेश देते हुये उपनन्द, वृषभानु आदि अहीरों को अपना सजातीय कह कर संबोधित किया है।
व्रज के कवियों ने अहीरों को कहीं "जाट " तो कहीं "गुर्जर "भी वर्णित किया है ।
जैसे वृषभानु आभीर की कन्या राधा को गुजरीया कहकर वर्णित करना... अलबरुनी ने नन्द को जाट कहा है । वर्तमान अहीर भी स्वयं को यदुवंशी आहुक की संतान मानते हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, अहीरों ने 108 ई०सन् में मध्य भारत मे स्थित 'अहीर बाटक नगर' या 'अहीरोरा' (अरौरा) व उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले मे अहिरवाड़ा की नींव रखी थी।
रुद्रमूर्ति नामक अहीर अहिरवाड़ा का सेनापति था , जो कालांतर मे राजा बना।
माधुरीपुत्र, ईश्वरसेन व शिवदत्त इस वंश के मशहूर राजा हुये, जो बाद मे यादव राजपूतो मे सम्मिलित हो गये। कोफ (कोफ 1990,73-74) के अनुसार - अहीर प्राचीन गोपालक परंपरा वाली कृषक जाति है । जिन्होने अपने पारम्परिक मूल्यों को सदा राजपूत प्रथा के अनुरूप व्यक्त किया , परंतु उपलब्धियों के मुक़ाबले वंशावली को ज्यादा महत्व मिलने के कारण उन्हे "कल्पित या स्वघोषित राजपूत" ही माना गया। __________________________________________ थापर के अनुसार पूर्व कालीन इतिहास में 10वीं शताब्दी तक प्रतिहार शिलालेखों में अहीर-आभीर समुदाय को पश्चिम भारत के लिए "एक संकट जिसका निराकरण आवश्यक है" बताया गया। --------------------------------------------------------
"मेगास्थनीज के वृतान्त व महाभारत के विस्तृत अध्ययन के बाद रूबेन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि " भगवान कृष्ण एक गोपालक नायक थे ! " ______________________________________ तथा गोपालकों की जाति अहीर ही कृष्ण के असली वंशज हैं, न कि कोई और राजवंश।
" प्रमुख रूप से अहीरो के तीन सामाजिक वर्ग है-यदुवंशी, नंदवंशी व ग्वालवंशी। इनमे वंशोत्पत्ति को लेकर विभाजन है।
यदुवंशी स्वयं को राजा नन्द का वंशज बताते है व ग्वालवंशी प्रभु कृष्ण के ग्वाल सखाओ से संबन्धित बताए जाते है। एक अन्य दन्तकथा के अनुसार भगवान कृष्ण जब असुरो का वध करने निकलते है ! तब माता यशोदा उन्हे टोकती है, उत्तर देते देते कृष्ण अपने बालमित्रो सहित यमुना नदी पार कर जाते है। कृष्ण के साथ असुर वध हेतु यमुना पार जाने वाले यह बालसखा कालांतर मे अहीर नंदवंशी कहलाए।
आधुनिक साक्ष्यों व इतिहासकारों के अनुसार नंदवंशी व यदुवंशी मौलिक रूप से समानार्थी है, क्योंकि ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार यदु नरेश वासुदेव तथा नन्द बाबा निकट संबंधी या कुटुंबीजन थे व यदुवंशी थे। नन्द की स्वयं की कोई संतान नहीं थी ।
अतः यदु राजकुमार कृष्ण ही नंदवश के पूर्वज हुये। अहीरों का बहू संख्यक कृषक संवर्ग स्वयं को ग्वाल अहीरों से श्रेष्ठ व जाट, राजपूत, गुर्जर आदि कृषक वर्गों के बराबर का मानता है।
ग्वाल अहीरों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन व दुग्ध-व्यापार है तथा यह वर्ग उत्तर प्रदेश की सीमाओं व हरियाणा के फ़रीदाबाद व गुड़गाँव जनपदों में पाया जाता है। प्रारम्भ में तीव्र रहा यह विभेद अब कम हो चला है। बनारस के ग्वाल अहीरों को 'सरदार' उपनाम से संबोधित किया जाता है।
मानव वैज्ञानिक कुमार सुरेश सिंह के अनुसार, अहीर समुदाय लगभग 64 बहिर्विवाही उपकुलों मे विभाजित है।
कुछ उपकुल इस प्रकार है- जग्दोलिया, चित्तोसिया, सुनारिया, विछवाल, जाजम, ढडवाल, खैरवाल, डीवा, मोटन, फूडोतिया, कोसलिया, खतोड़िया, भकुलान, भाकरिया, अफरेया, काकलीय, टाटला, जाजड़िया, दोधड़, निर्वाण, सतोरिया, लोचुगा, चौरा, कसेरा, लांबा, खोड़ा, खापरीय, टीकला तथा खोसिया। प्रत्येक कुल का एक कुलदेवता है।............. ________________________________________ मजबूत विरासत व मूल रूप से सैन्य पृष्ठभूमि से बाद में कृषक चरवाहा बनी अहीर जाति स्वयं को सामाजिक पदानुक्रम में ब्राह्मण व राजपूतो से निकटतम बाद का व जाटो के बराबर का मानती है। अन्य जातियाँ भी इन्हें महत्वपूर्ण समुदाय का मानती है अहीर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से एक लड़ाकू जाति है। 1920 मे ब्रिटिश शासन ने अहीरों को एक "कृषक जाति" के रूप मे वर्गीकृत किया था, जो कि उस काल में "लड़ाकू जाति" का पर्याय थी। वे 1898 से सेना में भर्ती होते रहे थे। तब ब्रिटिश सरकार ने अहीरों की चार कंपनियाँ बनायीं थी, इनमें से दो 95वीं रसेल इंफेंटरी में थीं। 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान 13 कुमायूं रेजीमेंट की अहीर कंपनी द्वारा रेजंगला का मोर्चा भारतीय मीडिया में सरहनीय रहा है। वे भारतीय सेना की राजपूत रेजीमेंट में भी भागीदार हैं। भारतीय हथियार बंद सेना में आज तक बख्तरबंद कोरों व तोपखानों में अहीरों की एकल टुकड़ियाँ विद्यमान हैं।
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प्रियास इत् ते मघवन्नभिष्टौ 
        नरो मदेम शरणे सखाय:।
नि तुर्वशं नि यादवं शिशीहि
        अतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन् ।। ऋग्वेद ७/१९/८ में भी यही ऋचा
अथर्ववेद (काण्ड २० /अध्याय ५/ सूक्त ३७/ ऋचा ७
हे इन्द्र ! तुम्हारे मित्र रूप यजमान हम
अपने घर में प्रसन्नता से रहें।
तुम अतिथिगु को सुख प्रदान करो ।
और तुम तुर्वसु और यादवों को क्षीण करने वाले हो ।
ऋग्वेद में अर्थ किया हे ! इन्द्र तुम अतिथि की सेना करने सुदास को सुखी करो । और तुर्वसु और यदु को अपने अधीन करो ।

और भी देखें--- अया वीति परिस्रव यस्त इन्दो मदेष्वा ।
अवाहन् नवतीर्नव ।१। पुर: सद्य इत्थाधिये दिवोदासाय शम्बरं अध त्यं तुर्वशुं यदुम् ।२। (ऋग्वेद ७/९/६१/ की ऋचा १-२)
हो सोम !  तुम्हारे किस रस ने दासों के निन्यानवे पुरों  (नगरों) को तोड़ा था । उसी रस से युक्त होकर इन्द्र के पाने के लिए प्रवाहित होओ। १।
शम्बर के नगरों को तोड़ने वाले सोम रस ने ही  तुर्वसु सन्तान तुर्को तथा यदु की सन्तान यादवों को  शासन (वश)में किया ।

सत्यं तत् तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम् । व्यानट् तुर्वशे शमि । ऋग्वेद ८/४६/२७
हे इन्द्र! तुमने यादवों के प्रचण्ड कर्मों  को सत्य मान कर संग्राम में अह्नवाय्यम् को प्राप्त कर डाला ।
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किम् अंगत्वा मघवन् भोजं आहु: शिशीहि मा शिशयं
त्वां श्रृणोमि अथर्ववेद का० २०/७/ ८९/३/
हे इन्द्र तुम भोगने वाले हो ।तुम शत्रु को क्षीण करने वाले हो ।मुझे क्षीण न करो ।

वेद मेंअश्लील ता
तद् इन्द्राव आ भर येना दसिष्ठ कृत्वने ।
द्विता कुत्साय शिश्नथो नि चोदय ! ऋग्वेद ८/२४/२५
चोदयति चोदना, चोद्यम् 55

यदु एेसे स्थान पर रहते हैं ।
जहाँ ऊँटो का बाहुल्य है ।
शतमहं तिरिन्दरे सहस्रं वर्शावा ददे ।
राधांसि यादवानाम्
त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम् ददुष्पज्राय साम्ने ४६। उदानट् ककुहो दिवम् उष्ट्रञ्चतुर्युजो ददत् ।श्रवसा याद्वं जनम् ।४८।१७।
यदु वंशीयों में परशु के पुत्र तिरिन्दर से सहस्र संख्यक धन मैने प्राप्त किया !
ऋग्वेद ८/६/४६

चोदयति चोदना, चोद्यम् 55

______'______________________'___'_______ योगेश कुमार" रोहि" ग्राम --आजा़दपुर ,पत्रालय ---पहाड़ीपुर , जनपद-- अलीगढ़---के सौजन्य से प्रेषित यह सन्देश आज अहीरों को कुछ रूढ़िवादीयों द्वारा फिर से परिभाषित करने की असफल कुचेष्टाऐं की जा रहीं अतः उसके लिए यह सन्देश आवश्यक है । कि इसे पढ़े....... और अपना मिथ्या वितण्डावाद बन्द करें ..

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       दूरभाष -- संख्या 8077160219....../