शनिवार, 31 दिसंबर 2022

मनु विश्व संस्कृतियों में -


"मनु विश्व संस्कृतियों में "

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 यथार्थ के धरातल पर  मनु की ऐतिहासिकता !
मनुस्मृति ,और वर्ण- व्यवस्था के अस्तित्व पर एक वृहद् विश्लेषण -
यद्यपि यह एक सांस्कृतिक समीकरण मूलक पर्येष्टि है, जिसमें तथ्य समायोजन भी " यादव योगेश कुमार "रोहि" के सांस्कृतिक अनुसन्धान श्रृंखला की एक कणिका है।

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मनु के विषय में  विश्व के सभी धर्म - मतावलम्बी अपने अपने पूर्वाग्रह से ग्रस्त ही हैं ।
भारतीय सन्दर्भों में किसी ने "मनु" की अवधारणा  अयोध्या  के आदि- पुरुष के रूप में है । परन्तु अयोध्या का स्थान निर्धारण अनिश्चित है।  किसी ने मनु को हिमालय का अधिवासी कहा है !
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"परन्तु सत्य के निर्णय निश्पक्षता के सम धरातल पर होते हैं न कि पूर्वाग्रह के ऊबड़ खाबड़ स्थलों पर ".

विश्व की सभी महान संस्कृतियों में "मनु" का वर्णन मानव सभ्यता के उद्भासक के रूप में किसी न किसी प्रकार अवश्य हुआ है !
परन्तु भारतीय संस्कृति में यह मान्यता अधिक प्रबल तथा पूर्णत्व को प्राप्त है। अत: भारतीय सन्दर्भों को उद्धृत करते हुए अन्य संस्कृतियों से भी तथ्य उद्धृत किए गये हैं।
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1- प्रथम सांस्कृतिक वर्णन:–"भारतीय पुराणों में मनु का वर्णन:–👇

पुराणों में वर्णित है कि मनु ब्रह्मा के पुत्र हैं ;
जो मनुष्यों के मूल पुरुष माने जाते हैं।
विशेष—वेदों में मनु को यज्ञों का आदिप्रवर्तक लिखा है। ऋग्वेद में कण्व और अत्रि को यज्ञप्रवर्तन में मनु का सहायक लिखा है।

शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि मनु एक बार जलाशय में हाथ धो रहे थे; उसी समय उनके हाथ में एक छोटी सी मछली आई।
उसने मनु सें अपनी रक्षा की प्रार्थना की और कहा कि आप मेरी रक्षा कीजिए;
मैं अपकी भी रक्षा करुँगी। उसने मनु से एक आनेवाली बाढ़ की बात कही और उन्हें एक नाव बनाने के लिये कहा।

मनु ने उस मछली की रक्षा की; पर वह मछली थोड़े ही दिनों में बहुत बड़ी हो गई।
जब बाढ़ आई, मनु अपनी नाव पर बैठकर पानी पर चले और अपनी नाव उस मछली की आड़ ( श्रृंग) में बाँध दी। मछली उत्तर को चली और हिमालय पर्वत की चोटी पर उनकी नाव उसने पहूँचा दी। वहाँ मनु ने अपनी नाव बाँध दी।
उस बड़े ओघ (जल-प्रलय )से अकेले मनु ही बचे थे। उन्हीं से फिर मनुष्य जाति की वृद्धि हुई। दूसरी कथा के अनुसार-

ऐतरेय ब्राह्यण में मनु के अपने पुत्रों में अपनी  सम्पत्ति का विभाग करने का वर्णन मिलता है। उसमें यह  भी लिखा है कि उन्होंने हरिवंश पुराण के अनुसार वैवस्वत मनु के एक पुत्र "नाभागारिष्ठ" को अपनी संपत्ति का भागी नहीं बनाया था।

निघंटु में 'मनु' शब्द का पाठ "द्युस्थान देवगणों में है ; और वाजसनेयी संहिता में मनु को प्रजापति लिखा है। पुराणों और सूर्यसिद्धान्त आदि ज्योतिष के ग्रन्थों के अनुसार एक कल्प में चौदह मनुओं का अधिकार होता है और उनके उस अधिकारकाल को मन्वन्तर (मनु-अन्तर)कहते हैं।

चौदह मनुओं के नाम ये हैं—(१)स्वायम्। (२)स्वारोचिष्। (३) उत्तम। (४) तामस। (५) रवत। (६) चाक्षुष। (७) वैवस्वत। (८) सावर्णि। (९) दक्षसावर्णि। (१०) ब्रह्मसावर्णि। (११) धमसावर्णि। (१२) रुद्रसावर्णि। (१३) देवसावर्णि और(१४) इन्द्रसावर्णि।

वर्तमान मन्वन्तर वैवस्वत मनु का है।
मनुस्मृति मनु को विराट् का पुत्र लिखा है और मनु से दस प्रजापतिया की उत्पत्ति हुई यह वर्णन है।
उपर्युक्त कथा हिब्रू बाइबिल में  भी कुछ अन्वतर से वर्णित है मनु की कथा  "नूह" की कथा का प्रतिरूप ही  है ।
--जो सुमेरियन माइथॉलॉजी से संग्रहीत है-

"संस्कृत भाषा में मनु शब्द की व्युत्पत्ति !
 मन्यते इति मनु। ( मन् + इति उ:) मनु: “ शॄस्वृस्निहीति । “ उणादि सूत्र १ । ११ ।  


ब्रह्मणः पुत्त्रः । स च प्रजापतिर्धर्म्मशास्त्रवक्ता च ।
 इति लिङ्गादिसंग्रहे अमरः ॥ ब्रह्मा का पुत्र धर्मशास्त्र का वक्ता मनुष्यों का पूर्वज ।  इति शब्द- रत्नावली ॥

(यथा  ऋग्वेदे । ८। ४७। ४।“ मनोर्विश्वस्य घेदिम आदित्याराय ईशतेऽनेहसो व ऊतयः सु ऊतयो व ऊतयः ॥ ऋगवेद 8/47/4“  मनोर्भव: मनुष्य: ।
इति तद्भाष्ये सायणः ॥
मनु सुमेरियन संस्कृतियों में विकसित माइथॉलॉजीकल की अवधारणा है ।
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इसी आधार पर काल्पनिक रूप से ब्राह्मण समाज द्वारा वर्ण-व्यवस्था का समाज पर आरोपण कर दिया गया , जो वैचारिक रूप से तो सम्यक् था परन्तु व्यवहारिक रूप में कभी यथावत् परिणति नहीं हुआ।

वर्ण व्यवस्था जाति अथवा जन्म के आधार पर दोष-पूर्ण व अवैज्ञानिक ही थी ।
इसी वर्ण-व्यवस्था को ईश्वरीय विधान सिद्ध करने के लिए काल्पनिक रूप से ब्राह्मण - समाज ने मनु-स्मृति की रचना की ।
जिसमें तथ्य समायोजन इस प्रकार किया गया कि स्थूल दृष्टि से कोई बात नैतिक रूप से मिथ्या प्रतीत न हो ।

यह कृति पुष्यमित्र सुंग के अनुयायी सुमित भार्गव (ई०पू०१८४-४८ ) के समकालिक है ।
यह  पुष्य-मित्र सुंग केे निर्देशन में ब्राह्मण समाज द्वारा 'मनु'की रचना मान्य कर दी गयी ।

लगभग चौथी शताब्दी में नारद स्मृति के लेखक को मनुस्मृति के लेखक का नाम ज्ञात था । नारद स्मृति कार के अनुसार ' सुमति भार्गव ' नाम के एक व्यक्ति थे जिन्होंने मनुसंहिता की रचना की ।इस प्रकार मनु नाम ‘सुमति भार्गव' का छद्म नाम था और वह ही इसके वास्तविक रचयिता थे” ( अम्बेडकर वाड्मय , भाग 7 , पृ० 151 ) ।

— “मनु के काल - निर्धारण के प्रसंग में डॉक्टर अम्बेडकर की पुस्तक में सन्दर्भ देते हुए बताया था कि मनुस्मृति का लेखन ईसवी पूर्व 185 , अर्थात पुष्यमित्र की क्रान्ति के बाद सुमति भार्गव के हाथों हुआ था ।” ( वही , भाग 7 , पृ० 116 )


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परन्तु मनु भारतीय धरा की विरासत नहीं थे ।
और ना हि अयोध्या उनकी जन्म भूमि थी। यह भी सत्य है क्योंकि भारत में अयोध्या का स्थान अनिश्चित ही है।
वर्तमान में अयोध्या भी थाईलेण्ड में "एजोडिया" के रूप में है ।

बैकॉक। रामनगरी अयोध्या (Ayodhya) की तरह एक और आयोध्या थाइलैंड (Thailand) में भी बसती है। थाइलैंड एक ऐसा देश है जहां पर राम को सांस्कृति धरोहर की तरह माना जाता है। यहां पर कई प्राचीनकाल राममंदिर हैं और एक शहर है 'अयुत्थया' (Ayutthaya, Thailand) जो स्थानीय भाषा में अयोध्या का समानार्थी है।

क्या है शहर का इतिहास

गौरतलब है कि इतिहास को गौर से देखा जाए तो दक्षिण पूर्व एशिया के देश थाइलैंड में एक वक्त पर राम राज ही था। माना जाता है कि चक्री वंश के पहले राजा की उपाधि ही राम प्रथम थी। थाईलैंड में आज भी यहीं राजवंश मौजूद है। जब यहां पर बर्मा का शासन हटा तो देश ने दोबारा से अपनी सांस्कृतिक धरोहर को समेटना शुरू कर दिया।

सुमेरियन सभ्यताओं में भी अयोध्या को एजेडे "Agede" नाम से वर्णन किया है। जिसे सुमेरियन इतिहास में "अक्काद" रूप में वर्णन किया गया है। यहीं सूर्य वंशी राजा सगर का शासन था । जिन्हें सारगॉन नाम से जाना जता है। मनु को भी सगर की पूर्वज माना जाता है। सगर अयोध्या के एक प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा। ईरान, मध्य एशिया, बर्मा, थाईलैंड, इण्डोनेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया, चीन, जापान और यहां तक ​​कि फिलीपींस में भी मनु की पौराणिक कथाऐं लोकप्रिय थीं।

विद्वान ब्रिटिश संस्कृतिकर्मी, जे. एल. ब्रॉकिंगटन के अनुसार "राम" को विश्व साहित्य का एक उत्कृष्ट शब्द मानते हैं।
यद्यपि वाल्मीकि रामायण महाकाव्य का कोई प्राचीन इतिहास नहीं है। यह बौद्ध काल के बाद की रचना है। फिर भी इसके पात्र का प्रभाव सुमेरियन और ईरानीयों की प्राचीनत्तम संस्कृतियों में देखा जा सकता है।

राम के वर्णन की विश्वव्यापीयता का अर्थ है कि राम एक महान ऐतिहासिक व्यक्ति रहे होंगे। इतिहास और मिथकों पर औपनिवेशिक हमला सभी महान धार्मिक साहित्यों का अभिन्न अंग है। लेकिन स्पष्ट रूप से एक ऐतिहासिक पात्र के बिना रामायण कभी भी विश्व की श्रेण्य-साहित्यिक रचना नहीं बन पाएगी।

राम,  मेडियनस  और ईरानीयों के एक नायक भी  हैं ।  जहाँ मित्र, अहुरा मज़्दा आदि जैसे सामान्य देवताओं को वरीयता दी गई है। टी• क्यूइलर यंग, ​​एक प्रख्यात सांस्कृतिक ईरानी विद्वान   जिन्होंने कैम्ब्रिज में प्राचीन इतिहास और प्रारंभिक विश्वकोश में ईरान के इतिहास और पुरातत्व पर लिखा है:-👇

वह उप-महाद्वीप के बाहर प्रारम्भिक भारतीयों और ईरानीयों को सन्दर्भों की विवेचना करते हैं ।

 💐 राम ’पूर्व-इस्लामी ईरान में एक पवित्र नाम था; जैसे आर्य "राम-एनना" दारा-प्रथम के प्रारम्भिक पूर्वजों में से थे।

जिसका सोने की टैबलेट( शील या मौहर पुरानी फ़ारसी में एक प्रारम्भिक दस्तावेज़ है;

राम जोरास्ट्रियन कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण नाम है; "रेमियश" राम और वायु को समर्पित है। संभवतः हनुमान की एक प्रतिध्वनि; भी है। कई राम-नाम पर्सेपोलिस (ईरानी शहर) में पाए जाते हैं।

राम बजरंग फार्स की एक कुर्दिश जनजाति का नाम भी है। राम-नामों के साथ कई सासैनियन शहर: राम अर्धशीर, राम होर्मुज़, राम पेरोज़, रेमा और रुमागम -जैसे नाम प्राप्त होते हैं ।

राम-शहरिस्तान सूरों की प्रसिद्ध राजधानी थी। राम-अल्ला यूफ्रेट्स (फरात) पर एक शहर है और यह फिलिस्तीन में भी है।
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उच्च प्रामाणिक सुमेरियन राजा-सूची में राम सिंन और भरत (बरत-सिन) सौभाग्य से प्राप्त होते हैं। सुमेरियन इतिहास का एक अध्ययन राम का एक बहुत ही ज्वलन्त चित्र प्रदान करता है।

उच्च प्रामाणिक सुमेरियन राजा-सूची में भरत (वरद) warad सिन और रामसिन(रिमसिन )जैसे पवित्र नाम दिखाई देते हैं।
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राम मेसोपोटामिया वर्तमान (ईराक और ईरान)के सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाले सम्राट थे। जिन्होंने 60 वर्षों तक शासन किया।
भरत सिन ने 12 वर्षों तक शासन किया (1834-1822 ई.पू.) का समय
जैसा कि बौद्धों के दशरथ जातक में कहा गया है। जातक का कथन है, "साठ बार सौ, और दस हज़ार से अधिक, सभी को बताया, / प्रबल सशस्त्र राम ने"

केवल इसका मतलब है कि राम ने साठ वर्षों तक शासन किया, जो अश्शूरियों (असुरों) के आंकड़ों से बिल्कुल सहमत हैं।
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अयोध्या सरगोन की राजधानी अगड (अजेय) हो सकती है ।
जिसकी पहचान अभी तक नहीं हुई है।
यह संभव है कि एजेड (Agade) (अयोध्या)डेर या हारुत के पास हरयु  या सरयू के पास थी।👇
सीर दरिया का साम्य सरयू से है ।

इतिहास लेखक डी. पी. मिश्रा जैसे विद्वान इस बात से अवगत थे कि राम हेरात क्षेत्र से हो सकते हैं।

प्रख्यात भाषाविद् "सुकुमार सेन" ने यह भी कहा कि राम ईरानीयों के धर्म ग्रन्थ अवेस्ता में एक पवित्र नाम है।

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सुमेरियन माइथॉलॉजी में "दूर्मा" नाम धर्म की प्रतिध्वनि है ।

सुमेरियन माइथॉलॉजी के मितानियन ( मितज्ञु )राजाओं का तुसरत नाम दशरथ की प्रतिध्वनि प्रतीत होता है। मितज्ञुओं का वर्णन ऋग्वेद में हुआ है । ये बाइबिल के मितन्नी ही हैं।Mitanni वैदिक ऋचाओं में (मितज्ञु)

उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत्सुभगा यज्ञे अस्मिन् ।
मितज्ञुभिर्नमस्यैरियाना राया युजा चिदुत्तरा सखिभ्यः ॥४॥ ऋग्वेद7/95/4

सायण-भाष्य-उत अपि च "जुषाणा प्रीयमाणा "सुभगा शोभनधना “स्या सा “सरस्वती “नः अस्माकम् “अस्मिन् “यज्ञे “उप “श्रवत् । अस्मदीयाः स्तुतीरुपशृणोतु । कीदृशी सा। “मितज्ञुभिः प्रह्वैर्जानुभिः “नमस्यैः नमस्कारैर्देवैः “इयाना उपगम्यमाना । चिच्छब्दश्चार्थे । “युजा नित्ययुक्तेन “राया धनेन च संगता “सखिभ्यः "उत्तरा उत्कृष्टतरा । ईदृश्यस्मदीयाः स्तुतीरुपशृणोत्वित्यन्वयः

वैदिक पात्र मितज्ञुओं का वर्णन अन्य संस्कृतियों में" 

तथा ऋग्वेद में अन्यत्र भी मितज्ञु जाति का वर्णन है ।"

स वह्निभिरृक्वभिर्गोषु शश्वन्मितज्ञुभिः पुरुकृत्वा जिगाय । पुरः पुरोहा सखिभिः सखीयन्दृळ्हा रुरोज कविभिः कविः सन्॥३॥(ऋग्वेद 6/32/3)

सायण भाष्य- पुरुकृत्वा बहुकर्मकृत् “सः इन्द्रः “वह्निभिः हविषां वोढृभिः “ऋक्वभिः स्तोतृभिः “शश्वत् सर्वदा "मितज्ञुभिः= संकुचितजानुभिरङ्गिरोभिः सह “गोषु निमित्तभूतेषु "जिगाय असुरान् जितवान् । जित्वा च "पुरोहा पुराणां हन्ता सः इन्द्रः “सखिभिः समानख्यानैः “कविभिः क्रान्तप्रज्ञैरङ्गिरोभिः सह “सखीयन् सखित्वमात्मन इच्छन् “कविः “सन् स्वयमपि क्रान्तप्रज्ञो भवन् “दृळ्हाः स्थिराः “पुरः आसुरीः पुरीः “रुरोज ॥

सायण ने उपर्युक्त दौनों भाष्यों में मितज्ञु का अर्थ  "छोटे घुटनों वाले" किया है । जो सत्य नहीं 

मिश्तानी (मिथानी क्यूनिफॉर्म कूर उरुमी  Ta-e-an-i), मित्तानी Mitanni ), जिसे मिस्र के ग्रंथों में अश्शुरियन के समकालीन व सहवर्ती  भी  कह गया है।

उत्तरी सीरिया में एक (Hurrian) 
(सुर-भाषा )बोलने वाला  और सीसिस्तान के  दक्षिण पूर्व अनातोलिया राज्य था।

1500-1300 ईसा पूर्व मितन्नी (मितज्ञु) एक हज़ारों अमोरिथ- एमॉराइट (मरुतों) को बाबुल के विनाश के बाद एक क्षेत्रीय शक्ति बन गई ।
और असीरी (अशरियन राजाओं) की एक श्रृंखला ने मेसोपोटामिया में एक शक्ति निर्वाध रूप में बनायी।

मित्तानी साम्राज्य

1500-1300 ईसा पूर्व, सीरिया से उत्तरी सीरिया और दक्षिण-पूर्व एनाटोलिया में स्थित साम्राज्य


मित्तानी साम्राज्य यह सा्म्राज्य कई सदियों तक (१६०० -१२०० ईपू) पश्चिम एशिया में राज करता रहा। इस वंश के सम्राटों के संस्कृत नाम थे। विद्वान समझते हैं कि यह लोग महाभारत के पश्चात भारत से वहां प्रवासी बने। कुछ विद्वान समझते हैं कि यह लोग वेद की (मैत्रायणीय) शाखा के प्रतिनिधि हैं। कुछ भी हो यहूदियों के ग्रन्थों में भी इनका वर्ण "सिन्नार (सिनाई पर्वत" के रहने वालों के रूप में हुआ है।

मिद्यान  ( हिब्रू : מדין , Miḏyān ; अरबी : مدين , Maḏyān ; " नाम का अर्थ है :: संघर्ष, निर्णय ") अब्राहम के पुत्र का चौथा पुत्र और :: केतुराह का पुत्र था । वह मिद्यानी लोगों ( हिब्रू : מדיןים , Miḏyānīm ) के पूर्वज हैं, जिन्हें हाउस ऑफ़ इज़राइल के इतिहास में दो महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई थीं । मीदिया उत्तर-पश्चिमी ईरान का एक क्षेत्र है, 

 बाइबल मिद्यानियों की वंशावली के बारे में और अधिक विवरण नहीं देती है।  (बाइबिल-उत्पत्ति 25:2,4 )

यूसुफ

यूसुफ के ईर्ष्यालु भाइयों ने उसे गड्ढ़े में फेंकने के बाद , उसे मिद्यानियों के व्यापारियों को बेच दिया, जो उसे  वे  दास के रूप में बेचने के लिए मिस्र ले गए। 

मूसा

2473 ईसापूर्व पूर्वाह्न की सर्दियों में, मूसा मिस्र से भागकर मिद्यानी देश चले गये। वहाँ उसकी मित्रता एक मिद्यानी याजक से हुई जिसका नाम :: जेथ्रो था । इस जेथ्रो की सात बेटियाँ थीं, जिनमें सिप्पोरा बड़ी थी , जिनसे मूसा ने विवाह किया था।  वर्षों बाद, किन के वंशज क़ेनियों ने स्वयं को इस्राएलियों से जोड़ लिया। ( न्यायियों 1:16 )

परन्तु जब इस्राएली जंगल में भटक रहे थे, तब मिद्यानियों ने "मोआबियों" के साथ मिलकर इस्राएलियों को नष्ट करने का प्रयास किया था। प्रतिशोध में, पीनहास ने मिद्यानियों को कुचलने के लिए 12,000 पुरुषों की एक सेना का नेतृत्व किया।

गिदोन

2764 पूर्वाह्न में, मिद्यानियों ने इस्राएलियों पर अत्याचार किया, जिन्होंने तब तक कनान पर कब्जा कर लिया था । मिद्यानियों ने इस प्रभुत्व को सात वर्षों तक बनाए रखा, जब तक कि न्यायाधीश गिदोन ने तीन सौ की सेना के साथ एक संयुक्त मिद्यानियों- और मोआबी सेना को पराजित नहीं किया। 

वंशज

बाइबिल मिद्यानियों

अरब इतिहासकार और भूगोलवेत्ता, याकूत अल-हमवी, हमें बताते हैं कि अरब की मिद्यानी जनजातियाँ अरबी की हाविल भाषा बोलती थीं , और वह इस तथ्य की भी पुष्टि करते हैं कि मिद्यान इब्राहीम का पुत्र था । मिद्यान की जनजातियाँ मिस्र और अन्य स्रोतों से भी जानी जाती हैं। उदाहरण के लिए, टॉलेमी ने उनकी नाम मोदियाना के रूप में दर्ज किया, जबकि सिनाई प्रायद्वीप के छोर के विपरीत प्राचीन पूर्व-इस्लामिक अरब शहर मद्यान को आज मगहिर शुऐब ("शुऐब की गुफा") के रूप में जाना जाता है। 

कुर्द

इब्राहीम द्वारा भेजे जाने के बाद , मिद्यान के वंशज पर्वत श्रृंखला के उत्तर और दक्षिण दोनों काकेशस के क्षेत्र में बस गए:

मित्तानी देश की राजधानी का नाम वसुखानी (धन की खान) था।

इस वंश के वैवाहिक सम्बन्ध मिस्र से थे। एक धारणा यह है कि इनके माध्यम से भारत का बाबुलमिस्र और यूनान पर गहरा प्रभाव पडा।

मित्तानी वंशावली

  • कीर्त्य Kirta 1500 BC-1490 BC
  • सत्वर्ण 1 :Shuttarna I, son of Kirta 1490 BC-1470 BC
  • वरतर्ण- Barattarna, P/Barat(t)ama 1470 BC-1450 BC
  • Parshatatar, (may be identical with Barattarna) 1450 BC-1440 BC
  • Shaushtatar (son of Parsha(ta) tar) 1440 BC-1410 BC
  • आर्ततम 1 Artatama I 1410 BC-1400 BC
  • सत्वर्ण 2 Shuttarna II 1400 BC-1385 BC
  • अर्थसुमेढ़ Artashumara 1385 BC-1380 BC
  • तुष्यरथ अथवा दशरथ en:Tushratta 1380 BC-1350 BC
  • सत्वर्ण 3 Shuttarna III 1350 BC, son of an usurper Artatama II
  • मतिवाज Shattiwaza or Mattivaza, son of Tushratta 1350 BC-1320 BC
  • क्षत्रवर 1 Shattuara I 1320 BC-1300 BC
  • वसुक्षत्र Wasashatta, son of Shattuara 1300 BC-1280 BC
  • क्षत्रवर 2 Shattuara II, son or nephew of Wasashatta 1280 BC-1270 BC, or maybe the same king as Shattuara I.
सभी तिथियों को सावधानी के साथ लिया जाना चाहिए क्योंकि वे अन्य प्राचीन निकट पूर्वी देशों के कालक्रम के साथ तुलना करके ही काम करते हैं

मितानी के राज्य

सदी 1500 ई०पू० से 1300 ईसा पूर्व विद्यमान थे।ओल्ड असीरियन साम्राज्य (Yamhad) जमहद मध्य अश्शूर साम्राज्य अपने इतिहास की शुरुआत में वैदिक रूप मितज्ञु की प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी मिस्र थुटमोसाइट्स के तहत थी। हालांकि,  हित्ती साम्राज्य की चढ़ाई के साथ, मित्तन्नी और मिस्र ने हित्ति प्रभुत्व के खतरे से अपने पारस्परिक हितों की रक्षा के लिए एक बन्धन बनाया।

14 वीं शताब्दी ईसा पूर्व 14 वीं सदी के दौरान, मितांनी ने अपनी राजधानी वासुखेनी पर केंद्रित निगरानी रखी, जिसका स्थान पुरातत्वविदों द्वारा खबुर नदी के मुख्यालयों पर बताया गया था।
मितन्नी राजवंश ने उत्तरी युफ्रेट्स-तिग्रिस (फरात एवं दजला) क्षेत्र पर सदी के बीच शासन किया।
1475 और सदी 1275 ईसा पूर्व आखिरकार, मित्तानी हित्ती और बाद में अश्शूर (असुर )के हमलों की निन्दा  करते थे, और मध्य असीरियन साम्राज्य के एक प्रान्त का दर्जा कम कर दिया गया था।

पाश्चात्य इतिहास विद "मार्गरेट .एस. ड्रावर ने "तुसरत" (दशरथ)-के नाम का अनुवाद 'भयानक रथों के मालिक' के रूप में किया है।
लेकिन यह वास्तव में 'दशरथ रथों का मालिक' या 'दस गुना रथ' हो सकता है

जो दशरथ के नाम की प्रतिध्वनि है।
दशरथ ने दस राजाओं के संघ का नेतृत्व किया। इस नाम में आर्यार्थ जैसे बाद के नामों की प्रतिध्वनि है।
सीता और राम का ऋग्वेद में भी वर्णन है।
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राम नाम के एक असुर (शक्तिशाली राजा) को संदर्भित करता है, लेकिन कोसल का कोई उल्लेख नहीं करता है

वास्तव में कोसल नाम शायद सुमेरियन माइथॉलॉजी में "खास-ला" के रूप में था ।
और सुमेरियन अभिलेखों के मार-कासे (बार-कासे) के अनुरूप हो सकता है।👇

"refers to an Asura (powerful king) named Rama but makes no mention of Kosala.♨
In fact the name Kosala was probably Khas-la and may correspond to Mar-Khase (Bar-Kahse) of the Sumerian records.

कई प्राचीन संस्कृतियों में  मिथकों में साम्य उनकी प्राचीन एकरूपता का सूचक  हैं।
प्रस्तुत लेख मनु के जीवन की प्रधान घटना  बाढ़ की कहानी का विश्लेषण करना ही  है। परन्तु ये सभी पात्र पौराणिक हैं अत: इनकी ऐतिहासिक सिद्ध के लिए इनका अन्य संस्कृतियों से उद्धरण अपेक्षित है।
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2-सुमेरियन संस्कृति में 'मनु'का वर्णन जीवसिद्ध के रूप में-
महान बाढ़ आई और यह अथक थी और मछली जो विष्णु की मत्स्य अवतार थी, ने मानवता को विलुप्त होने से बचाया।
ज़ीसुद्र सुमेर का एक अच्छा राजा था और देव एनकी ने उसे चेतावनी दी कि शेष देवताओं ने मानव जाति को नष्ट करने का दृढ़ संकल्प किया है ।
उसने एक बड़ी नाव बनाने के लिए ज़ीसुद्र को बताया। बाढ़ आई और मानवता बच गई-

ज़िसुद्रा ( ओल्ड बेबीलोनियन : 𒍣𒌓𒋤𒁺 zi-ud-su₃-ra₂ , नियो-असीरियन : 𒍣𒋤𒁕 zi-sud-da , [1] ग्रीक : Ξίσουθρος , अनुवाद।  Xísouthros ) शूरुपक (c. 2900 ईसा पूर्व) में सूचीबद्ध है। 62 सुमेरियन राजा महान बाढ़ से पहले सुमेर के अंतिम राजा के रूप में सूची की पुनरावृत्ति । बाद में उन्हें सुमेरियन सृजन मिथक के नायक के रूप में दर्ज किया गया और बेरोसस के लेखन में ज़िसुथ्रोस के रूप में प्रकट होता है। उद्धरण वांछित ]

ज़िसुद्र
𒍣𒌓𒋤𒁺
शूरुपक के
राजा सुमेर के राजा
सुमेरियन राजा सूची, 1800 ईसा पूर्व, लार्सा, इराक (विस्तार)। जेपीजी
सुमेरियन राजा सूची, 1800 ईसा पूर्व, लार्सा, इराक
एंटीडिल्वियन राजा
शासनसी।  2900 ईसा पूर्व
पूर्वजउबर टूटू
उत्तराधिकारीकीश का जलप्रलय
जुशूर
मृतअमर
राजवंशपुराना
पिताउबारा-तुतु (अक्कडियन परंपरा)

ज़ीसुद्र कई पौराणिक पात्रों में से एक है जो निकट पूर्वी बाढ़ मिथकों के नायक हैं, जिनमें अत्रहासिस , उत्तानपश्चिम और बाइबिल नूह शामिल हैं। हालांकि प्रत्येक कहानी अपनी विशिष्ट विशेषताओं को प्रदर्शित करती है, कहानी के कई प्रमुख तत्व दो, तीन या सभी चार संस्करणों के लिए आम हैं। उद्धरण वांछित ]

"साहित्यिक और पुरातात्विक साक्ष्य-

"शूरुपक के राजा जीसूद्र 

 सुमेरियन राजा सूची में, ज़्यूसुद्र, या शूरुपक के ज़िन-सुड्डू को एक महान बाढ़ से पहले सुमेर के अंतिम राजा के पुत्र के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। [2] उन्हें दस सार्स (3,600 वर्ष की अवधि) के लिए राजा और गुडुग पुजारी दोनों के रूप में शासन करने के रूप में दर्ज किया गया है , [3] हालांकि यह आंकड़ा शायद दस वर्षों के लिए एक प्रतिवादी त्रुटि है। [4] इस संस्करण में, ज़िसुद्र को अपने पिता उबरा-टूटू से शासन विरासत में मिला , [5] जिन्होंने दस सार्स तक शासन किया । [6]

ज़ियसुद्र के उल्लेख के बाद की पंक्तियाँ पढ़ती हैं:

फिर बाढ़ बह गई। जब जल-प्रलय समाप्त हो गया, और राज्य स्वर्ग से उतर गया, तब राज्य कीश में था। [7]

नदी की बाढ़ के तुरंत बाद प्रारंभिक राजवंशीय काल में किश शहर का विकास शूरुपक (आधुनिक टेल फारा ), उरुक, किश और अन्य  स्थानों पर तलछटी स्तर द्वारा पुरातात्विक रूप से प्रमाणित किया गया था , जिनमें से सभी को रेडियोकार्बन दिनांकित किया गया है। 2900 ईसा पूर्व। [8] जेमडेट नस्र अवधि (सी.ए. 30वीं शताब्दी ईसा पूर्व) से पॉलीक्रोम मिट्टी के बर्तन , जो प्रारंभिक राजवंश I काल से तुरंत पहले थे, सीधे शूरुपक बाढ़ स्तर के नीचे खोजे गए थे। [8] [9] मैक्स मल्लोवन ने लिखा है कि "हम वेल्ड ब्लंडेल प्रिज्म [अर्थात् डब्ल्यूबी-62] से जानते हैं कि बाढ़ के समय, सुमेरियन नूह,शूरुपक शहर का राजा था, जहां उसे आसन्न आपदा की चेतावनी मिली थी। एक के रूप में उसकी भूमिका उद्धारकर्ता गिलगमेश महाकाव्य में अपने समकक्ष उत्तानपश्चिम को सौंपे गए से सहमत हैं। ... पुरालेख संबंधी और पुरातात्विक खोज दोनों ही इस बात पर विश्वास करने के लिए अच्छा आधार देते हैं कि ज़िसुद्र एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक शहर का एक प्रागैतिहासिक शासक था, जिसके स्थल की पहचान की गई है। [10]

यह कि ज़िसुद्र शूरुपक का एक राजा था, गिलगमेश XI टैबलेट द्वारा समर्थित है, जो उत्तानपश्चिम ( सुमेरियन नाम ज़िसुद्रा का अक्कादियन अनुवाद) का संदर्भ 23 पंक्ति में "मैन ऑफ़ शूरुपक" के साथ देता है। [11

सुमेरियन बाढ़ मिथक-

ज़ियसुद्रा की कहानी सुमेरियन में लिखी गई एक एकल खंडित गोली से जानी जाती है, जिसकी लिपि 17 वीं शताब्दी ईसा पूर्व ( ओल्ड बेबीलोनियन साम्राज्य ) के अनुसार है, और 1914 में अर्नो पोएबेल द्वारा प्रकाशित की गई थी। [12] पहला भाग मनुष्य और जानवरों के निर्माण और पहले शहरों एरिडु , बाद-तिबिरा , लारक , सिप्पार और शूरुपक की स्थापना से संबंधित है । टैबलेट में लापता खंड के बाद, हम सीखते हैं कि देवताओं ने मानव जाति को नष्ट करने के लिए बाढ़ भेजने का फैसला किया है। भगवान एनकी(ताजे पानी के अंडरवर्ल्ड समुद्र के स्वामी और बेबीलोनियन देवता ईए के सुमेरियन समकक्ष) एक बड़ी नाव बनाने के लिए शूरुपक के शासक ज़िसुद्रा को चेतावनी देते हैं; नाव के लिए दिशाओं का वर्णन करने वाला मार्ग भी खो गया है। जब टैबलेट फिर से शुरू होता है, तो यह बाढ़ का वर्णन कर रहा होता है। एक भयानक तूफान सात दिनों तक चला, "विशाल नाव को महान जल पर उछाला गया था," तब उत्तु (सूर्य) प्रकट होता है और ज़िसुद्र एक खिड़की खोलता है, खुद को आगे बढ़ाता है, और एक बैल और एक भेड़ की बलि देता है। एक और विराम के बाद, पाठ फिर से शुरू होता है, बाढ़ स्पष्ट रूप से खत्म हो जाती है, और ज़ीसुद्र खुद को एन (स्काई) और एनिल (लॉर्डब्रेथ) के सामने झुका रहा है, जो उसे "अनन्त सांस" देते हैं और उसे दिलमुन में रहने के लिए ले जाते हैं । कविता का शेष भाग खो गया है। [13]विफल सत्यापन ]

ज़ियसुद्रा का महाकाव्य 258-261 पंक्तियों में एक तत्व जोड़ता है जो अन्य संस्करणों में नहीं मिलता है, कि नदी की बाढ़ के बाद [14] "राजा ज़िसुद्र ... उन्होंने कुर दिलमुन में निवास किया , वह स्थान जहां सूरज उगता है"। सुमेरियन शब्द "कुर" एक अस्पष्ट शब्द है। शमूएल नूह क्रैमर का कहना है कि "इसका प्राथमिक अर्थ 'पहाड़' है, इस तथ्य से प्रमाणित है कि इसके लिए इस्तेमाल किया जाने वाला चिन्ह वास्तव में पहाड़ का प्रतिनिधित्व करने वाला एक चित्रलेख है। पहाड़ी देशों के बाद से 'पहाड़' के अर्थ से 'पहाड़' विकसित हुआ है। सीमावर्ती सुमेर अपने लोगों के लिए एक निरंतर खतरा थे। कुर का अर्थ सामान्य रूप से 'भूमि' भी था। [13] अंतिम वाक्य का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है "पार करने के पहाड़ में, दिलमुन का पहाड़,

एक सुमेरियन दस्तावेज़ जिसे क्रेमर द्वारा लगभग 2600 ईसा पूर्व के शूरुपक के निर्देश के रूप में जाना जाता है, बाद के संस्करण में ज़िसुद्र को संदर्भित करता है। क्रेमर ने कहा "तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक ज़ियसुद्र साहित्यिक परंपरा में एक सम्मानित व्यक्ति बन गए थे" [15]

ज़िसुथ्रोस -

ज़िसुथ्रोस (Ξίσουθρος) सुमेरियन ज़ियसुद्रा का यूनानीकरण है, जिसे बेरोसस के लेखन से जाना जाता है जो बाबुल में बेल का एक पुजारी था , जिस पर अलेक्जेंडर पॉलीहिस्टर मेसोपोटामिया की जानकारी के लिए बहुत अधिक निर्भर था। बाढ़ मिथक के इस संस्करण की दिलचस्प विशेषताओं में, सुमेरियन देवता एन्की की ग्रीक देवता क्रोनस , ज़ीउस के पिता के साथ व्याख्या के माध्यम से पहचान है ; और दावा है कि ज़िसुथ्रोस द्वारा निर्मित ईख की नाव कम से कम बेरोसस के दिन तक, अर्मेनिया के "कोरसीरियन पर्वत" में बची रही. ज़िसुथ्रोस को एक राजा के रूप में सूचीबद्ध किया गया था, जो एक आर्डेट्स का पुत्र था, और उसने 18 सारोई पर शासन किया था । एक सरोस ( अक्कडियन में शार ) 3600 के लिए खड़ा है और इसलिए 18 सरोई का अनुवाद 64,800 वर्षों के रूप में किया गया था। एक सरोई या सरोस एक ज्योतिषीय शब्द है जिसे 29.5 दिनों के 222 चंद्र महीनों या 17.93 सौर वर्षों के बराबर 18.5 चंद्र वर्ष के रूप में परिभाषित किया गया है।

अन्य स्रोत-

ज़ियसुद्र का उल्लेख अन्य प्राचीन साहित्य में भी किया गया है, जिसमें द डेथ ऑफ़ गिलगमेश [16] और द पोएम ऑफ़ अर्ली रूलर्स , [17] और द इंस्ट्रक्शंस ऑफ़ शूरुपक का एक बाद का संस्करण शामिल है । [18]


ज़ियसुद्रा

मेसोपोटामिया पौराणिक कथाओं

मेसोपोटामिया के धर्म में ज़ीसुद्रा , भगवान द्वारा भेजी गई बाढ़ के उत्तरजीवी के रूप में बाइबिल के नूह के मोटे तौर पर प्रतिरूप । जब देवताओं ने मानवता को बाढ़ से नष्ट करने का फैसला किया था, तो भगवान एन्की (अक्कादियनईए ), जो डिक्री से सहमत नहीं था , ने इसे ज़ीसुद्रा को प्रकट किया, जो अपनी विनम्रता और आज्ञाकारिता के लिए जाना जाता है। एनकी की आज्ञा के अनुसार ज़्यूसुद्र ने किया और एक विशाल नाव का निर्माण किया, जिसमें वह सफलतापूर्वक बाढ़ से बाहर निकला। बाद में, उसने खुद को देवताओं अन ( अनु ) और एनिल (बेल) के सामने दंडवत किया, और एक ईश्वरीय जीवन जीने के लिए एक इनाम के रूप में, ज़िसुद्र को अमरता दी गई । उत्तानपश्चिम देखें ।

बाढ़ मिथक

पौराणिक कथा
वैकल्पिक शीर्षक: प्रलय मिथक

बाढ़ मिथक , जिसे बाढ़ मिथक भी कहा जाता है, कई पौराणिक कथाओं में से कोई भी जिसमें बाढ़ आम तौर पर अवज्ञाकारी मूल आबादी को नष्ट कर देती है। एक महान बाढ़ (जलप्रलय) के मिथक यूरेशिया और अमेरिका में फैले हुए हैं । बाढ़, कुछ अपवादों के साथ, पानी द्वारा एक प्रायश्चित है, जिसके बाद एक नए प्रकार की दुनिया का निर्माण होता है।

बाइबिल बाढ़ मिथक

जलप्रलय का बाइबिल विवरण (उत्पत्ति 6:11–9:19) विशेषताएंबाढ़ कहानी के नायक के रूप में नूह । अपने खाते में, नूह को कुलपति के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने निर्दोष धर्मपरायणता के कारण, अपने दुष्ट समकालीनों के जलप्रलय में नाश होने के बाद मानव जाति को बनाए रखने के लिए परमेश्वर द्वारा चुना गया था। एक धर्मी व्यक्ति, नूह ने "प्रभु की दृष्टि में अनुग्रह पाया" (उत्पत्ति 6:8)। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने पृथ्वी के भ्रष्टाचार को देखा और इसे नष्ट करने का निश्चय किया, तो उसने नूह को आसन्न आपदा की दिव्य चेतावनी दी और उसे और उसके परिवार को बचाने का वादा करते हुए उसके साथ एक वाचा बाँधी। नूह को एक निर्माण करने का निर्देश दिया गया था सन्दूक , और परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार उसने सन्दूक में दुनिया की सभी प्रजातियों के जानवरों के नर और मादा नमूने लिए, जिससे स्टॉक की भरपाई की जा सकती थी। नतीजतन, इस कथा के अनुसार, पूरी जीवित मानव जाति नूह के तीन पुत्रों और उनकी पत्नियों के वंशज थे।

नूह के वीरतापूर्ण उत्तरजीविता के बाद, अरारत पर्वत पर सुरक्षित रूप से उतरने के बाद बाढ़ का धार्मिक अर्थ व्यक्त किया गया । फिर उसने एक वेदी का निर्माण किया जिस पर उसने भगवान को जले हुए बलिदान चढ़ाए, जिसने फिर खुद को एक समझौते के लिए बाध्य किया कि वह मानवता के खाते में पृथ्वी को फिर कभी श्राप न दे। तब परमेश्वर ने इस वाचा में अपने वादे की दृश्य गारंटी के रूप में आकाश में एक मेघधनुष स्थापित किया । परमेश्वर ने सृष्टि के समय दी गई अपनी आज्ञाओं को भी नवीनीकृत किया लेकिन दो परिवर्तनों के साथ: मानव जाति अब जानवरों को मार सकती थी और मांस खा सकती थी, और हत्या के लिए मनुष्यों को दंड दिया जाएगा। मेसोपोटामिया की पौराणिक कथाओं की मूर्त समानताओं के बावजूदऔर बाइबिल की बाढ़, बाइबिल की कहानी का एक अनूठा हिब्रू परिप्रेक्ष्य है। बेबीलोनियन कहानियों में बाढ़ का विनाश देवताओं के बीच असहमति का परिणाम था, जबकि उत्पत्ति में यह मानव इतिहास के नैतिक भ्रष्टाचार का परिणाम था। मेसोपोटामिया के संस्करणों का आदिम बहुदेववाद बाइबिल की कहानी में एक धर्मी ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और परोपकार की पुष्टि में बदल गया है।

मेसोपोटामिया बाढ़ मिथक

के अनुसारएरिडु जेनेसिस , एक प्राचीन सुमेरियन  धार्मिक महाकाव्य, देवताओं ने मिट्टी से मानव जाति को जमीन पर खेती करने, भेड़-बकरियों की देखभाल करने और देवताओं की पूजा को बनाए रखने के लिए तैयार किया। शहर जल्द ही बन गए, लेकिन, किसी कारण से, देवताओं ने बाढ़ से मानव जाति को नष्ट करने का फैसला किया। एन्की ( अक्कडियन : ईए), जो डिक्री से सहमत नहीं था, ने इसे प्रकट किया ज़िसुद्र , एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी विनम्रता और आज्ञाकारिता के लिए जाना जाता है। एनकी की आज्ञा के अनुसार ज़्यूसुद्र ने किया और एक विशाल नाव का निर्माण किया, जिसमें वह सफलतापूर्वक बाढ़ से बाहर निकला। बाद में, उसने खुद को देवताओं एन (अनु) और एनिल के सामने झुकाया, और एक ईश्वरीय जीवन जीने के लिए एक इनाम के रूप में, ज़िसुद्र को अमरत्व दिया गया।

 संबंधित बेबीलोनियन में गिलगमेश महाकाव्य , उत्तानपश्चिम और उनकी पत्नी पौराणिक बाढ़ के उत्तरजीवी हैं, जिन्होंने अपने द्वारा निर्मित महान नाव में मानव और पशु जीवन को संरक्षित किया है। इस जोड़े को एक सन्दूक बनाने के दैवीय निर्देश को मानने के लिए एक इनाम के रूप में भगवान एनिल द्वारा देवता घोषित किया गया था।

एक अन्य मेसोपोटामिया मिथक की कहानी है अतरहासिस , एक बुद्धिमान व्यक्ति जिसे खुद को बचाने के लिए एक जहाज बनाने के लिए देवताओं में से एक द्वारा चेतावनी दिए जाने के बाद बाढ़ से बचाया गया था। यह कहानी खंडित ओल्ड बेबीलोनियन और असीरियन संस्करणों में संरक्षित है। 

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इन बेबीलोनियन पौराणिक कथाओं में बाढ़ की बाइबिल की कहानी के साथ घनिष्ठ संबंध हैं और सन्दूक के निर्माण और प्रावधान, इसके प्लवनशीलता, और रेवेन और कबूतर के प्रेषण के साथ-साथ मानव द्वारा निभाई गई भूमिका जैसी विशेषताओं का स्रोत हैं। बाइबिल खाते में नायक।

अन्य बाढ़ मिथक

ग्रीक पौराणिक कथाओं में,प्रोमेथियस (मानव जाति का निर्माता) का पुत्र ड्यूकालियन , नूह के समकक्ष है। जब  देवताओं के राजा ज़्यूस ने बाढ़ से पूरी मानवता को नष्ट करने का संकल्प लिया, तो ड्यूकालियन ने एक सन्दूक का निर्माण किया, जिसमें एक संस्करण के अनुसार, वह और उसकी पत्नी बाढ़ से बाहर निकले और  माउंट पर्नासस पर उतरे । 

भारतीय बाढ़ पौराणिक कथाओं के अनुसार, आदमीमनु महान बाढ़ का एकमात्र उत्तरजीवी था , जो पहले आदमी नूह और  आदम के हिब्रू बाइबिल के आंकड़ों की विशेषताओं को मिलाता  था । शतपथ  ब्राह्मण याद करते हैं कि कैसे मनु को एक मछली ने चेतावनी दी थी, जिस पर उसने दया की थी, कि एक बाढ़ पूरी मानवता को नष्ट कर देगी। इसलिए उसने मछली की सलाह के अनुसार एक नाव बनाई। जब बाढ़ आई, तो उसने इस नाव को मछली के सींग से बांध दिया और सुरक्षित रूप से एक पहाड़ की चोटी पर आराम करने के स्थान पर ले जाया गया। जब बाढ़ कम हुई, तो एकमात्र जीवित मानव मनु ने जल में मक्खन और खट्टे दूध की आहुति डालते हुए एक यज्ञ किया। एक वर्ष के बाद, जल से एक स्त्री का जन्म हुआ जिसने स्वयं को "मनु की पुत्री" घोषित किया। ये दोनों तब पृथ्वी को फिर से भरने के लिए एक नई मानव जाति के पूर्वज बन गए । महाभारत ("भारत राजवंश के   महान महाकाव्य") में, मछली की पहचान भगवान  ब्रह्मा के साथ की गई है , जबकि पुराणों ("प्राचीन विद्या") में यह हैमत्स्य , भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार ।

एज़्टेक का मानना ​​था कि वर्तमान ब्रह्मांड से पहले चार संसार मौजूद थे। वे संसार, या "सूर्य", विपत्तियों द्वारा नष्ट कर दिए गए थे, और प्रत्येक सूर्य के अंत में मानवजाति को पूरी तरह से मिटा दिया गया था। चौथा सूर्य, नहुई-अटल, "चार-जल", 52 वर्षों तक चली एक विशाल बाढ़ में समाप्त हुआ। केवल एक पुरुष और एक महिला बच गए, एक विशाल सरू में शरण ली, लेकिन बाद में उन्हें कुत्तों में बदल दिया गया।

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के संपादक
यह आलेख हाल ही में मेलिसा पेट्रुज़ेलो द्वारा संशोधित और अद्यतन किया गया था ।

नूह

बाइबिल का आंकड़ा
वैकल्पिक शीर्षक: नहीं
सारांश

इस विषय का संक्षिप्त सारांश पढ़ें

नूह , बाइबिल के नायक, नोए की वर्तनी भी हैउत्पत्ति के पुराने नियम की किताब में बाढ़ की कहानी , दाख की बारी की खेती के प्रवर्तक, और, शेम, हाम और जेफेथ के पिता के रूप में, एक सेमिटिक वंशावली रेखा के प्रतिनिधि प्रमुख। कम से कम तीन बाइबिल स्रोत परंपराओं का एक संश्लेषण, नूह एक धर्मी व्यक्ति की छवि है जिसे एक पक्ष बनाया गया हैइस्राएल के परमेश्वर यहोवा के साथ वाचा , जिसमें आपदा के विरुद्ध प्रकृति की भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित है।

नूह उत्पत्ति 5:29 में लेमेक के पुत्र के रूप में और आदम के वंश में नौवें स्थान पर प्रकट होता है। जलप्रलय की कहानी (उत्पत्ति 6:11-9:19) में, उसे कुलपति के रूप में दर्शाया गया है, जिसे उसकी निष्कलंक धर्मपरायणता के कारण, उसके दुष्ट समकालीनों के जलप्रलय में नष्ट हो जाने के बाद मानव जाति को बनाए रखने के लिए परमेश्वर द्वारा चुना गया था। एक धर्मी व्यक्ति, नूह ने "प्रभु की दृष्टि में अनुग्रह पाया" (उत्पत्ति 6:8)। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने पृथ्वी के भ्रष्टाचार को देखा और इसे नष्ट करने का निश्चय किया, तो उसने नूह को आसन्न आपदा की दिव्य चेतावनी दी और उसे और उसके परिवार को बचाने का वादा करते हुए उसके साथ एक वाचा बाँधी । नूह को एक निर्माण करने का निर्देश दिया गया थासन्दूक , और परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार उसने सन्दूक में दुनिया की सभी प्रजातियों के जानवरों के नर और मादा नमूने लिए, जिससे स्टॉक की भरपाई की जा सकती थी। नतीजतन, इस कथा के अनुसार, पूरी जीवित मानव जाति नूह के तीन पुत्रों के वंशज थे। ऐसी वंशावली एक सार्वभौमिक ढाँचे को स्थापित करती है जिसके भीतर इज़राइल के विश्वास के पिता के रूप में इब्राहीम की बाद की भूमिका अपने उचित आयामों को ग्रहण कर सकती है।

बाढ़ की कहानी का इनसे गहरा नाता है सर्वनाश बाढ़ की बेबीलोनियन परंपराएँ जिसमेंउत्तानपश्चिम नूह के अनुरूप भूमिका निभाता है। ये पौराणिक कथाएँ बाइबिल की बाढ़ की कहानी की ऐसी विशेषताओं का स्रोत हैं जैसे कि सन्दूक का निर्माण और प्रावधान, उसका तैरना, और पानी का घटाव, साथ ही साथ मानव नायक द्वारा निभाई गई भूमिका। टैबलेट XIगिलगमेश महाकाव्य उत्तानपश्चिम का परिचय देता है, जो नूह की तरह, एक सन्दूक बनाने के लिए दिव्य निर्देश को ध्यान में रखते हुए लौकिक विनाश से बच गया।

The religious meaning of the Flood is conveyed after Noah’s heroic survival. He then built an altar on which he offered burnt sacrifices to God, who then bound himself to a pact never again to curse the earth on man’s account. God then set a rainbow in the sky as a visible guarantee of his promise in this covenant. God also renewed his commands given at creation but with two changes: man could now kill animals and eat meat, and the murder of a man would be punished by men.


Despite the tangible similarities of the Mesopotamian and biblical myths of the flood, the biblical story has a unique Hebraic perspective. In the Babylonian story the destruction of the flood was the result of a disagreement among the gods; in Genesis it resulted from the moral corruption of human history. The primitive polytheism of the Mesopotamian versions is transformed in the biblical story into an affirmation of the omnipotence and benevolence of the one righteous God. Again, following their survival, Utnapishtim and his wife are admitted to the circle of the immortal gods; but Noah and his family are commanded to undertake the renewal of history.

उत्पत्ति 9:20-27 में नूह से संबंधित कथा एक अलग चक्र से संबंधित है, जो जलप्रलय की कहानी से संबंधित नहीं लगती है। उत्तरार्द्ध में, नूह के पुत्र विवाहित हैं और उनकी पत्नियाँ उनके साथ सन्दूक में हैं; लेकिन इस आख्यान में वे अविवाहित प्रतीत होंगे, और न ही नूह की बेशर्म नशे की लत बाढ़ की कहानी के पवित्र नायक के चरित्र के साथ मेल खाती है। उत्पत्ति 9:20-27 में तीन अलग-अलग विषयों का पता लगाया जा सकता है: पहला, यह परिच्छेद कृषि की शुरुआत का वर्णन करता है, और विशेष रूप सेबेल , नूह के लिए; दूसरा, यह नूह के तीन पुत्रों के व्यक्तियों में प्रदान करने का प्रयास करता है,शेम,हाम, और जेफेथ, मानव जाति की तीन जातियों के पूर्वज और उनके ऐतिहासिक संबंधों के लिए कुछ हद तक खाते में; और तीसरा, कनान की अपनी निंदा के द्वारा , यह बाद में इस्राएलियों की विजय और उनके अधीनता के लिए एक परोक्ष औचित्य प्रदान करता है।कनानी । नूह के नशे में धुत होने और उसके पुत्र हाम का अनादर करने के परिणामस्वरूप नूह ने हाम के पुत्र कनान को श्राप दिया। यह घटना फ़िलिस्तीन के जातीय और सामाजिक विभाजन का प्रतीक हो सकती है: इज़राइली (शेम की रेखा से) कनान की पूर्व-इज़राइली आबादी से अलग हो जाएंगे (जो कि व्यभिचारी के रूप में चित्रित किया गया है), जो इब्रानियों के अधीन रहेंगे।

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पेन्टाट्यूक के संकलन से पहले नूह की प्रतीकात्मक आकृति प्राचीन इस्राएल में जानी जाती थी । यहेजकेल (14:14, 20) उसके बारे में उस धर्मी व्यक्ति के आदर्श के रूप में बात करता है , जो इस्राएलियों के बीच अकेले, परमेश्वर के प्रतिशोध से बचेगा । नए नियम में, ल्यूक (3:36) के अनुसार सुसमाचार की वंशावली में नूह का उल्लेख किया गया है जो कि चित्रित करता है आदम से यीशु का वंश। यीशु जलप्रलय की कहानी का भी उपयोग करते हैं जो पुरुषों की एक सांसारिक पीढ़ी पर "नूह के दिनों में" बपतिस्मा के उदाहरण के रूप में आई थी, और नूह को अपने समय के पुरुषों के लिए पश्चाताप के उपदेशक के रूप में चित्रित किया गया है, जो स्वयं में एक प्रमुख विषय है यहूदी एपोक्रिफ़ल और रैबिनिकल लेखन।


पौराणिक आंकड़ा


जबकि मिथकों की रूपरेखा एक अतीत की अवधि से या अपने स्वयं के अलावा किसी अन्य समाज से आम तौर पर काफी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, उन मिथकों को पहचानना जो अपने समय और समाज में प्रभावी हैं हमेशा मुश्किल होता है। यह शायद ही आश्चर्य की बात है, क्योंकि एक मिथक का अधिकार खुद को साबित करने से नहीं बल्कि खुद को पेश करने से होता है। इस अर्थ में एक मिथक का अधिकार वास्तव में "बिना कहे चला जाता है," और मिथक को विस्तार से केवल तभी रेखांकित किया जा सकता है जब उसका अधिकार अब निर्विवाद नहीं है, लेकिन किसी अन्य, अधिक व्यापक मिथक द्वारा किसी तरह से खारिज या दूर कर दिया गया है।

मिथ शब्द ग्रीक मिथोस से निकला है , जिसमें "शब्द", "कहने" और "कहानी," से लेकर "कथा" तक कई अर्थ हैं; मिथकों की निर्विवाद वैधता की तुलना लोगो से की जा सकती है , जिस शब्द की वैधता या सच्चाई को तर्क और प्रदर्शित किया जा सकता है। क्योंकि मिथक सबूत के प्रयास के बिना शानदार घटनाओं का वर्णन करते हैं, कभी-कभी यह माना जाता है कि वे बिना किसी वास्तविक आधार वाली कहानियां हैं, और यह शब्द झूठ या सबसे अच्छा गलत धारणा का पर्याय बन गया है। हालांकि, धर्म के अध्ययन में , मिथकों और कहानियों के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण है जो केवल असत्य हैं।

इस लेख के पहले भाग में ज्ञान की आधुनिक शाखाओं द्वारा प्रस्तावित विषय के विभिन्न दृष्टिकोणों को ध्यान में रखते हुए प्रकृति, अध्ययन, कार्यों, सांस्कृतिक प्रभाव और मिथकों के प्रकारों पर चर्चा की गई है। दूसरे भाग में, मिथक में जानवरों और पौधों की भूमिका के विशेष विषय की कुछ विस्तार से जांच की जाती है। विशिष्ट संस्कृतियों की पौराणिक कथाओं को ग्रीक धर्म , रोमन धर्म और जर्मनिक धर्म के लेखों में शामिल किया गया है ।

मिथक की प्रकृति, कार्य और प्रकार

मिथक हर समाज में मौजूद है। वास्तव में, यह मानव संस्कृति का एक बुनियादी घटक प्रतीत होगा । क्योंकि विविधता इतनी महान है, मिथकों की प्रकृति के बारे में सामान्यीकरण करना मुश्किल है। लेकिन यह स्पष्ट है कि उनकी सामान्य विशेषताओं और उनके विवरण में लोगों के मिथक लोगों की आत्म-छवि को प्रतिबिंबित, अभिव्यक्त और अन्वेषण करते हैं। इस प्रकार मिथक का अध्ययन व्यक्तिगत समाजों और समग्र रूप से मानव संस्कृति दोनों के अध्ययन में केंद्रीय महत्व रखता है।





सैमेटिक संस्कृतियों में प्राप्त मिथकों के अनुसार
नूह (मनु:)को एक बड़ी नाव बनाने और नाव पर सभी जानवरों की एक जोड़ी लेने की चेतावनी दी गई थी। नाव को अरारात पर्वत जाना था ।
और उसके शीर्ष पर लंगर डालना था जो बाढ़ में बह गया था।

इन तीन प्राचीन संस्कृतियों में महान बाढ़ के बारे में बहुत समान कहानियाँ हैं।

बाइबिल के अनुसार इज़राइल में इस तरह की बड़ी बाढ़ का कारण कोई महान नदियाँ नहीं हैं, लेकिन हम जानते हैं कि
इब्रानियों ने उर के इब्राहीम के लिए अपनी उत्पत्ति का पता लगाया जो मेसोपोटामिया में है।
भारतीय इतिहास में यही इब्राहीम ब्रह्मा है।
जबकि टिगरिस (दजला)और यूफ्रेट्स (फरात)बाढ़ और अक्सर बदलते प्रवेश में, उनकी बाढ़ उतनी बड़े पैमाने पर नहीं होती है।
एक दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजी क्रिया "Meander "का अर्थ है, जिसका उद्देश्य लक्ष्यहीनता से एक तुर्की नदी के नाम से आता है।
जो अपने परिवेश को बदलने के लिए कुख्यात है।
सिंधु और गंगा बाढ़ आती हैं लेकिन मनु द्वारा वर्णित प्रलय जैसा कुछ भी नहीं है।

महान जलप्रलय 5000 ईसा पूर्व के आसपास हुआ जब भूमध्य सागर काला सागर में टूट गया।
इसने यूक्रेन, अनातोलिया, सीरिया और मेसोपोटामिया को विभिन्न दिशाओं में (littoral) निवासियों के प्रवास का नेतृत्व किया।
ये लोग अपने साथ बाढ़ और उसके मिथक की अमिट स्मृति को ले गए।

अक्कादियों ने कहानी को आगे बढ़ाया क्योंकि उनके लिए सुमेरियन वही थे जो लैटिन यूरोपीय थे।

सभी अकाडियन शास्त्रियों को सुमेरियन, एक मृत भाषा सीखना था, जैसे कि सभी शिक्षित यूरोपीय मध्य युग में लैटिन सीखते हैं।

ईसाइयों ने मिथक को शामिल किया क्योंकि वे पुराने नियम को अवशोषित करते थे क्योंकि उनके भगवान जन्म से यहूदी थे।
बाद में उत्पन्न हुए धर्मों ने मिथक को शामिल नहीं किया। जोरास्ट्रियनवाद जो कि भारतीय वैदिक सन्दर्भों में साम्य के साथ दुनियाँ के रंगमञ्च पर उपस्थित होता है; ने मिथक को छोड़ दिया।
अर्थात्‌ पारसी धर्म ग्रन्थ अवेस्ता में जल प्रलय के स्थान पर यम -प्रलय ( हिम -प्रलय ) का वर्णन है 

जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म। इसी तरह इस्लाम जो यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और कुछ स्थानीय अरब रीति-रिवाजों का मिश्रण है, जो मिथक को छोड़ देता है। सभी मनु के जल प्रलय के मिथकों में विश्वास करते हैं ।

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सुमेरियन और भारतीयों के बीच एक और आम मिथक है  सात ऋषियों का है।
सुमेरियों का मानना ​​था कि उनका ज्ञान और सभ्यता सात ऋषियों से उत्पन्न हुई थी। हिंदुओं में सप्त ऋषियों का मिथक है जो इन्द्र से अधिक शक्तिशाली थे।
यह सुमेरियन कैलेंडर से है कि हमारे पास अभी भी सात दिन का सप्ताह है।
उनके पास एक दशमलव प्रणाली भी नहीं थी जिसे भारत ने शून्य के साथ आविष्कार किया था। उनकी गिनती का आधार दस के बजाय साठ था ।
और इसीलिए हमारे पास अभी भी साठ सेकंड से एक मिनट, साठ मिनट से एक घंटे और एक सर्कल में 360 डिग्री है।

सीरिया में अनदेखी मितन्नी राजधानी को वासु-खन्नी अर्थात समृद्ध -पृथ्वी का नाम दिया गया था।
मनु ने अयोध्या को बसाया यह तथ्य वाल्मीकि रामायण में वर्णित है।

वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"
अथर्ववेद १०/२/३१ में  वर्णित है।
वास्तव में यह सारा सूक्त ही अयोध्या पुरी के निर्माण के लिए है।
नौ द्वारों वाला हमारा यह शरीर ही अयोध्या पुरी बन सकता है।
अयोध्या का समानार्थक शब्द "अवध" है ।

प्राचीन काल में एशिया - माइनर ---(छोटा एशिया), जिसका ऐतिहासिक नाम -करण अनातोलयियो के रूप में भी हुआ है ।
यूनानी इतिहास कारों विशेषत: होरेडॉटस् ने अनातोलयियो के लिए एशिया माइनर शब्द का प्रयोग किया है ।

जिसे आधुनिक काल में तुर्किस्तान अथवा टर्की नाम से भी जानते हैं ।
यहाँ की पार्श्व -वर्ती संस्कृतियों में मनु की प्रसिद्धि उन सांस्कृतिक-अनुयायीयों ने अपने पूर्व-पुरुष  { Pro -Genitor } के रूप में स्वीकृत की है ।

मनु को पूर्व- पुरुष मानने वाली जन-जातियाँ प्राय: भारोपीय वर्ग की भाषाओं का सम्भाषण करती रहीं हैं ।
वस्तुत: भाषाऐं सैमेटिक वर्ग की हो अथवा हैमेटिक वर्ग की अथवा भारोपीय , सभी भाषाओं मे समानता का कहीं न कहीं सूत्र अवश्य है।

जैसा कि मिश्र की संस्कृति में मिश्र का प्रथम पुरुष जो देवों का का भी प्रतिनिधि था , वह था "मेनेस्" (Menes)अथवा मेनिस् (Menis) इस संज्ञा से अभिहित था ।

मेनिस ई०पू० 3150 के समकक्ष मिश्र का प्रथम शासक और मेंम्फिस (Memphis) नगर में जिसका निवास था

"मेंम्फिस "प्राचीन मिश्र का महत्वपूर्ण नगर जो नील नदी की घाटी में आबाद है ।
तथा यहीं का पार्श्ववर्ती देश फ्रीजिया (Phrygia)के मिथकों में भी मनु की जल--प्रलय का वर्णन मिऑन (Meon)के रूप में है ।

मिऑन अथवा माइनॉस का वर्णन ग्रीक पुरातन कथाओं में क्रीट के प्रथम राजा के रूप में है । जो ज्यूस तथा यूरोपा का पुत्र है ।

और यहीं एशिया- माइनर के पश्चिमीय समीपवर्ती लीडिया( Lydia) देश वासी भी इसी मिअॉन (Meon) रूप में मनु को अपना पूर्व पुरुष मानते थे।

इसी मनु के द्वारा बसाए जाने के कारण लीडिया देश का प्राचीन नाम मेऑनिया "Maionia" भी था ।
ग्रीक साहित्य में विशेषत: होमर के काव्य में "मनु" को (Knossos) क्षेत्र का का राजा बताया गया है ।

ग्रीक पौराणिक कथाओं में मिनोस कौन था?

ग्रीक पौराणिक कथाओं में मिनोस क्रेते द्वीप के राजा और शासक थे। उन्हें ज़्यूस और यूरोपा का पुत्र माना जाता था । किंवदंतियों के भीतर, मिनोस को कई उपलब्धियों का श्रेय दिया जाता है, जिसमें पोसिडॉन की इच्छा के माध्यम से सिंहासन प्राप्त करना और एजियन सागर के कई द्वीपों का उपनिवेश करना शामिल है। उन्हें कानूनों का एक सफल कोड बनाने का श्रेय भी दिया जाता है। मिनोस ग्रीक पौराणिक कथाओं की कई कहानियों में एक शक्तिशाली राजा के रूप में एक चरित्र के रूप में प्रकट होता है जो न्याय और कभी-कभी अत्याचार के साथ शक्ति रखता है। ग्रीक किंवदंतियों के अलावा, विद्वानों और इतिहासकारों का मानना ​​है कि मिनोस कांस्य युग के शासकों को दी गई एक शाही उपाधि हो सकती है।

कनान देश की कैन्नानाइटी(Canaanite ) संस्कृति में बाल -मिअॉन के रूप में भारतीयों के बल और मनु (Baal- meon) और यम्म (Yamm) देव के रूप मे वैदिक देव यम से साम्य संयोग नहीं अपितु संस्कृतियों की एकरूपता की द्योतक है ।
यम और मनु दौनों को सजातिय रूप में सूर्य की सन्तानें बताया है।
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विश्व संस्कृतियों में  यम  का वर्णन --- यहाँ भी कनानी संस्कृतियों में भारतीय पुराणों के समान यम का उल्लेख यथाक्रम नदी ,समुद्र ,पर्वत तथा न्याय के अधिष्ठात्री देवता के रूप में हुआ है।

कनान प्रदेश से ही कालान्तरण में सैमेटिक हिब्रु परम्पराओं का विकास हुआ था । 
स्वयम् कनान शब्द भारोपीय है , केन्नाइटी भाषा में कनान शब्द का अर्थ होता है मैदान अथवा जड्•गल यूरोपीय कोलों अथवा कैल्टों की भाषा पुरानी फ्रॉन्च में कनकन (Cancan)आज भी जड्.गल को कहते हैं ।

और संस्कृत भाषा में कानन =जंगल सर्वविदित ही है। परन्तु कुछ बाइबिल की कथाओं के अनुसार कनान एक पूर्व पुरुष था --जो  हेम (Ham)की परम्पराओं में एनॉस का पुत्र था।

जब कैल्ट जन जाति का प्रव्रजन (Migration) बाल्टिक सागर से भू- मध्य रेखीय क्षेत्रों में हुआ।

तब मैसॉपोटामिया की संस्कृतियों में कैल्डिया के रूप में इनका विलय  हुआ ।
तब यहाँ जीव सिद्ध ( जियोसुद्द )अथवा नूह के रूप में मनु की किश्ती और प्रलय की कथाओं की रचना हुयी ।

और तो क्या ? यूरोप का प्रवेश -द्वार कहे जाने वाले ईज़िया तथा क्रीट ( Crete ) की संस्कृतियों में मनु आयॉनिया लोगों के आदि पुरुष माइनॉस् (Minos)के रूप में प्रतिष्ठित हए।
भारतीय संस्कृति की पौराणिक कथाऐं इन्हीं घटनाओं ले अनुप्रेरित हैं।
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भारतीय पुराणों में मनु और श्रृद्धा का सम्बन्ध वस्तुत: मन के विचार (मनन ) और हृदय की आस्तिक भावना (श्रृद्धा ) के मानवीय-करण (personification) रूप है ।

शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में मनु को श्रृद्धा-देव
(श्रृाद्ध -देव) कह कर सम्बोधित किया है।
तथा बारहवीं सदी में रचित श्रीमद्भागवत् पुराण में वैवस्वत् मनु तथा श्रृद्धा से ही मानवीय सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है। 👇

सतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में " मनवे वै प्रात: "वाक्यांश से घटना का उल्लेख आठवें अध्याय में मिलता है।

सतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में मनु को श्रृद्धा-देव कह कर सम्बोधित किया है।👇

--श्रृद्धा देवी वै मनु (काण्ड-१--प्रदण्डिका १) श्रीमद्भागवत् पुराण में वैवस्वत् मनु और श्रृद्धा से मानवीय सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है--
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"ततो मनु: श्राद्धदेव: संज्ञायामास भारत श्रृद्धायां जनयामास दशपुत्रानुस आत्मवान"(9/1/11) 
 छन्दोग्य उपनिषद में मनु और श्रृद्धा की विचार और भावना रूपक व्याख्या भी मिलती है।
"यदा वै श्रृद्धधाति अथ मनुते नाSश्रृद्धधन् मनुते " __________________________________________
जब मनु के साथ प्रलय की घटना घटित हुई तत्पश्चात् नवीन सृष्टि- काल में :– असुर (असीरियन) पुरोहितों की प्रेरणा से ही मनु ने पशु-बलि दी थी।

किल आत्आकुलीइति ह असुर ब्रह्मावासतु:।
तौ हो चतु: श्रृद्धादेवो वै मनु: आवं नु वेदावेति।
तौ हा गत्यो चतु:मनो वाजयाव तु इति।।

असुर लोग वस्तुत: मैसॉपोटमिया के अन्तर्गत असीरिया के निवासी थे।
सुमेर भी इसी का एक अवयव है ।
अत: मनु और असुरों की सहवर्तीयता प्रबल प्रमाण है मनु का सुमेरियन होना ।
बाइबिल के अनुसार असीरियन लोग यहूदीयों के सहवर्ती सैमेटिक शाखा के थे।

सतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में मनु की वर्णित कथा हिब्रू बाइबिल में यथावत है --- देखें एक समानता !
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हिब्रू बाइबिल में नूह का वर्णन:-👇
बाइबिल उत्पत्ति खण्ड (Genesis)- "नूह ने यहोवा (ईश्वर) कहने पर एक वेदी बनायी ;
और सब शुद्ध पशुओं और सब शुद्ध पक्षियों में से कुछ की वेदी पर होम-बलि चढ़ाई।(उत्पत्ति-8:20) ।👇
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And Noah builded an alter unto the Lord Jehovah and took of the every clean beast, and of every clean fowl or birds, and offered ( he sacrificed ) burnt offerings on the alter
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Genesis-8:20 in English translation... -------------------------------------------------------------------
हृद् तथा श्रृद्  शब्द वैदिक भाषा में मूलत: एक रूप में ही हैं ; रोम की सांस्कृतिक भाषा लैटिन आदि में क्रेडॉ "credo" का अर्थ :--- मैं विश्वास करता हूँ ।
तथा क्रिया रूप में credere---to believe लैटिन क्रिया credere--- का सम्बन्ध भारोपीय धातु 
"Kerd-dhe" ---to believe से है ।
साहित्यिक रूप इसका अर्थ "हृदय में धारण करना –(to put On's heart-- पुरानी आयरिश भाषा में क्रेटिम cretim रूप  --- वेल्स भाषा में (credu ) और संस्कृत भाषा में श्रृद्धा(Srad-dha)---faith,
इस शब्द के द्वारा सांस्कृतिक प्राक्कालीन एक रूपता को वर्णित किया है ।
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श्रृद्धा का अर्थ :–Confidence, Devotion आदि हार्दिक भावों से है ।

प्राचीन भारोपीय (Indo-European) रूप कर्ड (kerd)--हृदय है ।
ग्रीक भाषा में श्रृद्धा का रूप "Kardia" तथा लैटिन में "Cor " है ।
आरमेनियन रूप ---"Sirt" पुरातन आयरिश भाषा में--- "cride" वेल्स भाषा में ---"craidda" हिट्टी में--"kir" लिथुअॉनियन में--"sirdis" रसियन में --- "serdce" पुरानी अंग्रेज़ी --- "heorte". जर्मन में --"herz" गॉथिक में --hairto " heart" ब्रिटॉन में---- kreiz "middle" स्लेवॉनिक में ---sreda--"middle ..

यूनानी ग्रन्थ "इलियड तथा ऑडेसी "महा काव्य में प्राचीनत्तम भाषायी साम्य तो है ही देवसूचीयों मेंभी साम्य है ।

आश्चर्य इस बात का है कि ..आयॉनियन भाषा का शब्द माइनॉस् तथा वैदिक शब्द मनु: की व्युत्पत्तियाँ (Etymologies)भी समान हैं।

जो कि माइनॉस् और मनु की एकरूपता(तादात्म्य) की सबसे बड़ी प्रमाणिकता है।

क्रीट (crete) माइथॉलॉजी में माइनॉस् का विस्तृत विवेचन है, जिसका अंग्रेजी रूपान्तरण प्रस्तुत है ।👇
------------------------------------------------------------- .. Minos and his brother Rhadamanthys
जिसे भारतीय पुराणों में रथमन्तः कहा है ।
And sarpedon wereRaised in the Royal palace of Cnossus-... Minos Marrieged pasiphae- जिसे भारतीय पुराणों में प्रस्वीः प्रसव करने वाली कहा है !
शतरूपा भी इसी का नाम था यही प्रस्वीः या पैसिफी सूर्य- देव हैलिअॉस् (Helios) की पुत्री थी।
क्यों कि यम और यमी भाई बहिन ही थे ।
जिन्हें मिश्र की संस्कृतियों में पति-पत्नी के रूप में भी वर्णित किया है ।

Pasiphae is the Doughter of the sun god (helios ) हैलीअॉस् के विषय में एक तथ्य और स्पष्ट कर दें कि यूनानीयों का यही हैलीअॉस् मैसोपॉटामियाँ की पूर्व सैमेटिक भाषाओं ---हिब्रू आरमेनियाँ तथा अरब़ी आदि में "ऐल " (El) के रूप में है।
इसी शब्द का हिब्रू भाषा में बहुवचन रूप ऐलॉहिम Elohim )है ।
इसी से अरब़ी में " अल् --इलाह के रूप में अल्लाह शब्द का विकास हुआ है।
विश्व संस्कृतियों में सूर्य ही प्रत्यक्ष सृष्टि का कारण है
अत: यही प्रथम देव है ।

भारतीय वैदिक साहित्य में " अरि " शब्द का प्राचीनत्तम अर्थ "ईश्वर" है ।
वेद में अरि शब्द के अर्थ हैं ईश्वर तथा घर "और लौकिक संस्कृत में अरि शब्द केवल शत्रु के अर्थ में रूढ़ हो गया

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के १३६ वें सूक्त का ५वाँ श्लोक "अष्टौ अरि धायसो गा:
पूर्ण सूक्त इस प्रकार है ।👇

पूर्वामनु प्रयतिमा ददे वस्त्रीन्युक्ताँ अष्टवरि धायसो गा: । सुबन्धवो ये विश्वा इव व्रा अनस्वन्त: श्रव एेषन्त पज्रा: ऋ०2/126/5/

कुछ भाषा -विद् मानते हैं कि ग्रीक भाषा के हेलिअॉस् (Helios)का सम्बन्ध भारोपीय धातु स्वेल (sawel ) से प्रस्तावित करते हैं।

अवेस्ता ए जेन्द़ में  हवर (hvar )-- सूर्य , प्रकाश तथा स्वर्ग लिथुऑनियन सॉले (Saule )   गॉथिक-- सॉइल (sauil) वेल्स ---हॉल (haul) पुरानी कॉर्निश-- हिऑल (heuul) आदि शब्दों का रूप साम्य स्पष्ट है ।

परन्तु यह भाषायी प्रवृत्ति ही है कि संस्कृत भाषा में अर् धातु "हृ "धातु के रूप में पृथक विकसित हुयी।
वैदिक "अरि" का रूप लौकिक संस्कृत भाषा में "हरि" हो कर ईश्वरीय अर्थ को तो प्रकट करता है 
परन्तु इरि रूप में शत्रु का अर्थ रूढ़ हो जाता है ।

कैन्नानाइटी संस्कृति में यम "एल" का पुत्र है।

और भारतीय पुराणों में सूर्य अथवा विवस्वत् का पुत्र.. इसी लिए भी हेलिअॉस् ही हरिस् अथवा अरि: का रूपान्तरण है ।👇

अरि से हरि और हरि से सूर्य का भी विकास सम्भवत है जैसे वीर: शब्द सम्प्रसारित होकर आर्य रूप में विकसित हो जाता  है।
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जिसमें अज् धातु का संयोजन है:–अज् धातु अर् () धातु का ही विकास क्रम है जैसे वीर्य शब्द से बीज शब्द विकसित हुआ ।संस्कृत साहित्य में सूर्य को समय का चक्र (अरि) कह कर वर्णित किया गया है।

."वैदिक सूक्तों में अरिधामश् शब्द का अर्थ अरे: ईश्वरस्य धामश् लोकं इति अरिधामश् रूप में है।
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वास्तव में पैसिफी और माइनॉस् दौनों के पिता सूर्य ही थे ।
ऐसी प्राचीन सांस्कृतिक मान्यताऐं थी ।
ओ३म् (अमॉन्) रब़ तथा ऐल जिससे अल्लाह शब्द का विकास हुआ प्राचीनत्तम संस्कृतियों में केवल सूर्य के ही वाचक थे ।

आज अल्लाह शब्द को लेकर मुफ़्ती और मौलाना लोग फ़तवा जारी करते हैं और कहते हैं  कि यह एक इस्लामीय अरब़ी शब्द है।
--जो गैर इस्लामीय के लिए हराम है ।
परन्तु यह अल्लाह वैदिक अरि का असीरियन रूप है । मनु के सन्दर्भ में ये बातें इस लिए स्पष्ट करनी पड़ी हैं कि क्योंकि अधिकतर संस्कृतियों में मनु को मानवों का आदि तथा सूर्य का ही पुत्र माना गया है।

यम और मनु को भारतीय पुराणों में सूर्य (अरि) का पुत्र माना गया है।

क्रीट पुराणों में इन्द्र को (Andregeos) के रूप में मनु का ही छोटा भाई और हैलीअॉस् (Helios) का पुत्र कहा है।
इधर चतुर्थ सहस्राब्दी ई०पू० मैसॉपोटामियाँ दजला- और फ़रात का मध्य भाग अर्थात् आधुनिक ईराक की प्राचीन संस्कृति में मेनिस् (Menis)अथवा मेैन (men) के रूप में एक समुद्र का अधिष्ठात्री देवता है।

यहीं से मेनिस का उदय फ्रीजिया की संस्कृति में हुआ था । यहीं की सुमेरीयन सभ्यता में यही मनुस् अथवा नूह के रूप में उदय हुआ, जिसका हिब्रू परम्पराओं नूह के रूप वर्णन में भारतीय आर्यों के मनु के समान है।
मनु की नौका और नूह की क़िश्ती
दोनों प्रसिद्ध हैं।
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जर्मनिक संस्कृतियों में मनु: (मैनुस)Mannus का आख्यान-👇
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Mannus, according to the Roman writer Tacitus, was a figure in the creation myths of the Germanic tribes. Tacitus is the only source of these myths.Tacitus wrote that Mannus was the son of Tuisto and the progenitor of the three Germanic tribes Ingaevones, Herminones and Istvaeones. In discussing the German tribes Tacitus wrote:I n ancient lays, their only type of historical tradition, they celebrate Tuisto, a god brought forth from the earth.They attribute to him a son, Mannus, the source and founder of their people, and to Mannus three sons, from whose names those nearest the Ocean are called Ingvaeones, those in the middle Herminones, and the rest Istvaeones. Some people, inasmuch as antiquity gives free rein to speculation, maintain that there were more sons born from the god and hence more tribal designations—Marsi, Gambrivii, Suebi, and Vandilii—and that those names are genuine and ancient. (Germania, chapter 2)

Several authors consider the name Mannus in Tacitus's work to stem from an Indo-European root; see Indo-European cosmogony § Linguistic evidence.

The Latinized name Mannus is evidently of some relation to Proto-Germanic *Mannaz, "man".

Mannus again became popular in literature in the 16th century, after works published by Annius de Viterbo and Johannes Aventinus purported to list him as a primeval king over Germany and Sarmatia.

In the 19th century, F. Nork wrote that the names of the three sons of Mannus can be extrapolated as Ingui, Irmin, and Istaev or Iscio. A few scholars like Ralph T. H. Griffith have expressed a connection between Mannus and the names of other ancient founder-kings, such as Minos of Greek mythology, and Manu of Hindu tradition.

Guido von List incorporated the myth of Mannus and his sons into his occult beliefs which were later adopted into Nazi occult beliefs.

अनुवाद:-

मन्नुस, रोमन लेखक टैसिटस के अनुसार, जर्मनिक जनजातियों के उत्पत्ति मिथकों में एक व्यक्ति था। रोमन इतिहासकार टैसिटस इन मिथकों का एकमात्र स्रोत है।

टैसिटस ने लिखा है कि मन्नस ( Mannus)ट्यूइस्टो ( _त्वष्टा) का पुत्र था और ज्सने तीन जर्मनिक जनजातियों  १-इंगेवोन्स, २-हर्मिनोन्स और ३-इस्तवाइओन्स के पूर्वज रूप में स्वयं को व्याख्यायित किया।

जर्मन जनजातियों पर चर्चा करते हुए टैकिटस ने लिखा: कि 

प्राचीन काल में, उनकी एकमात्र प्रकार की ऐतिहासिक परंपरा में, जर्मन लोग   ट्यूइस्टो का जश्न (उत्सव)मनाते हैं, जो कि पृथ्वी से लाए गए देवता हैं।

वे उसके लिए एक पुत्र, मन्नुस, उनके लोगों के स्रोत और संस्थापक, और मन्नू के तीन पुत्रों को श्रेय देते हैं, जिनके नाम से महासागर के निकटतम लोगों को (इंगवीओन्स ) कहा जाता है, जो मध्य हर्मिनोन्स में हैं, और बाकी इस्तवाईओन्स हैं। कुछ लोग, चूंकि इनकी पुरातनता  अटकलों पर पूरी तरह से लगाम लगाती है, यह बनाए रखती है  और  विश्वास है  कि  देव से   और अधिक पुत्र पैदा हुए थे और इसलिए अधिक आदिवासी पदनाम-मार्सी, गम्ब्रिवी, सुएबी, और वंदिली-आदि हैं और ये नाम वास्तविक और प्राचीन हैं। (जर्मनिया, अध्याय 2)

कई लेखक टैसिटस के काम में मन्नस नाम को एक इंडो-यूरोपियन मूल से उत्पन्न  मानते हैं; 

लैटिनकृत नाम मन्नस स्पष्ट रूप से प्रोटो-जर्मनिक * मन्नज, "आदमी" से कुछ संबंध रखता है।

मेनुस फिर से 16 वीं शताब्दी में साहित्य में लोकप्रिय हो गया, एनियस डी विटर्बो और जोहान्स एवेंटिनस द्वारा प्रकाशित कार्यों के बाद उन्हें जर्मनी और सरमाटिया पर एक आदिम राजा के रूप में जिसे सूचीबद्ध करने के लिए कहा गया।

19 वीं सदी में एफनोर्क ने लिखा है कि "मानुस के तीन बेटों के नाम इंगुई, इरमिन और इस्तैव या इस्सियो के रूप में निकाले जा सकते हैं। कुछ विद्वान जैसे 'राल्फ टी.एचग्रिफ़िथ" ने मानस और अन्य प्राचीन संस्थापक-राजाओं के नामों के बीच एक संबंध व्यक्त किया है, जैसे ग्रीक पौराणिक कथाओं के मिनोस और भारतीय परंपरा के मनु में है।

गुइडो वॉन लिस्ट" ने मन्नस और उसके बेटों के मिथक को अपने मनोगत विश्वासों में शामिल किया, जिन्हें बाद में नाज़ीयों ने मनोगत विश्वासों में अपनाया गया।

References

[1]Publishers, Struik; Stanton, Janet Parker, Alice Mills, Julie (2007-11-02). Mythology: Myths, Legends and Fantasies. Struik. pp. 234–. ISBN 9781770074538. Archived from the original on 2014-07-04. Retrieved 6 April 2014.

[2]The Phonology/paraphonology Interface and the Sounds of German Across Time, p.64, Irmengard Rauch, Peter Lang, 2008

[3]Tales of the Barbarians: Ethnography and Empire in the Roman West, p. 40, Greg Woolf, John Wiley & Sons, 01-Dec-2010

[4]"Word and Power in Mediaeval Bulgaria", p. 167. By Ivan Biliarsky, Brill, 2011

[5]Mitra-Varuna: An Essay on Two Indo-European Representations, p. 87, by Georges Dumézil, Zone, 1988. The question remains whether one can phonetically link this Latin mani- "(dead) man" the *manu- which, apart from the Sanskrit Manu (both the name and the common noun for "man"), has given, in particular, the Germanic Mannus (-nn- from *-nw- regularly), mythical ancestor of the Germans (...), the Gothic manna "man" ... and the Slavic monžǐ."

[6]"man | Origin and meaning of man by Online Etymology Dictionary". www.etymonline.com. Archived from the original on 2020-08-14. Retrieved 2020-09-28.

[7]Germany and the Holy Roman Empire: Volume I: Maximilian I to the Peace of Westphalia, 1493-1648, p.110, Joachim Whaley, Oxford University Press, 2012

[8]Historian in an age of crisis: the life and work of Johannes Aventinus, 1477-1534, p. 121 Gerald Strauss, Harvard University Press, 1963

[9]William J. Jones, 1999, "Perceptions in the Place of German in the Family of Languages" in Images of Language: Six Essays on German Attitudes, p9 ff.

[10]Populäre Mythologie, oder Götterlehre aller Völker, p. 112, F. Nork, Scheible, Rieger & Sattler (1845)

[11]"A Classical Dictionary of India: Illustrative of the Mythology, Philosophy, Literature, Antiquities, Arts, Manners, Customs &c. of the Hindus", p. 383, by John Garrett, Higginbotham and Company (1873)

[12]़Goodrick-Clarke, Nicholas (1992). The Occult Roots of Nazism: Secret Aryan Cults and Their Influence on Nazi Ideology. NYU Press. pp. 56–. ISBN 9780814730607. Archived from the original on 4 July 2014. Retrieved 6 April 2014.

Grimm, Jacob (1835). Deutsche Mythologie (German Mythology); From English released version Grimm's Teutonic Mythology (1888); Available online by Northvegr © 2004-2007: Chapter 15, page 2 Archived 2012-01-14 at the Wayback Machine File retrieved 12-08-2011.

Tacitus. Germania (1st Century AD). (in Latin...

जर्मन वर्ग की प्राचीन सांस्कृतिक भाषों में क्रमशः यमॉ Yemo- (Twice) -जुँड़वा यमल तथा मेन्नुस Mannus- मनन (Munan ) का वर्णन करने वाला एक रूपता आधार है ।
अर्थात् विचार शक्ति का अधिष्ठाता मनु है ।
और उन मनन "Munan" में संयम का रूप यम है ।

फ्राँस भाषा में यम शब्द (Jumeau )के रूप में है । रोमन इतिहास कारों में "टेकट्टीक्स" (Tacitus) जर्मन जाति से सम्बद्ध इतिहास पुस्तक "जर्मनिका " में लिखता हैं।
अपने प्राचीन गाथा - गीतों में वे ट्युष्टो अर्थात् ऐसा ईश्वर जो पृथ्वी से निकल कर आता है
मैनुस् उसी का पुत्र है वही जन-जातिों का पिता और संस्थापक है।

जर्मनिक जन-जातियाँ उसके लिए उत्सव मनाती हैं । मैनुस् के तीन पुत्रों को वह नियत करते हैं ।
जिनके पश्चात मैन (Men)नाम से बहुत से लोगों को पुकारा जाता है ।
( टेकट्टीक्स (Tacitus).. जर्मनिका अध्याय (2)
100 ईस्वी सन् में लिखित ग्रन्थ.... --------------------------------------------------------------

यम शब्द रोमन संस्कृति में (Gemellus ) के रूप में है
जो लैटिन शब्द (Jeminus) का संक्षिप्त रूप है।
रोमन मिथकों के मूल-पाठ (Text )में मेन्नुस् (Mannus) ट्युष्टो (Tuisto )का पुत्र तथा जर्मन आर्य जातियों के पूर्व पुरुष के रूप में वर्णित है ।👇

-- A. roman text(dated) ee98) tells that Mannus the Son of Tvisto Was the Ancestor of German Tribe or Germanic people "
इधर जर्मन आर्यों के प्राचीन मिथकों "प्रॉज़एड्डा आदि में उद्धरण है :–👇
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Mannus progenitor of German tribe son of tvisto in some Reference identified as Mannus "
उद्धरण अंश (प्रॉज- एड्डा ) वस्तुतः ट्युष्टो ही भारतीय आर्यों का देव त्वष्टा है।
,जिसे विश्व कर्मा कहा है जिसे मिश्र की पुरा कथाओं में "तिहॉती" ,जर्मन भाषा में प्रचलित डच (Dutch )का मूल रूप "त्वष्टा" शब्द है ।
गॉथिक शब्द (Thiuda )के रूप में भी "त्वष्टा" शब्द है प्राचीन उच्च जर्मन में यह शब्द (Diutisc )तथा जर्मन में (Teuton )है ।
और मिश्र की संस्कृति में (tehoti) के रूप में वर्णित है।
जर्मन पुराणों में भारतीयों के समान यम और मनु सजातीय थे ।
भारतीय संस्कृति में मनु: और यम: दोनों ही विवस्वान् (सूर्य) की सन्तान थे ।

इसी लिए इन्हें वैवस्वत् कहा गया यह बात जर्मनिक जन-जाति में भी प्रसिद्ध थी।
The Germanic languages have lnformation About both ...Ymir ------------------------------------------------------------ यमीर ( यम) and (Mannus) मेनुस् Cognate of Yemo and Manu"..मेन्नुस् मूलक मेन "Man" शब्द भी डच भाषा का है ।

जिसका रूप जर्मन तथा ऐंग्लो - सेक्शन भाषा में मान्न "Mann" रूप है ।
प्रारम्भ में जर्मन लोग "मनुस्" का वंशज होने के कारण स्वयं को मान्न कहते थे।

मनु का उल्लेख ऋग्वेद काल से ही मानव -सृष्टि के आदि प्रवर्तक एवम् समग्र मानव जाति के आदि- पिता के रूप में मान्य हो गया था।
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वैदिक सन्दर्भों मे प्रारम्भिक चरण में मनु तथा यम का अस्तित्व अभिन्न था कालान्तरण में मनु को जीवित मनुष्यों का तथा यम को मृत मनुष्यों के लोक का आदि पुरुष माना गया ... _____________________________________ जिससे यूरोपीय भाषा परिवार में मैन (Man) शब्द आया ।
मैने प्रायः उन्हीं तथ्यों का पिष्ट- पेषण भी किया है जो मेरे विचार बलाघात का लक्ष्य है।
और मुझे अभिप्रेय भी ..

जर्मन माइथॉलॉजी में यह तथ्य प्रायः प्रतिध्वनित होता रहता है ।👇 ------------------------------------------------------------

 "The ancient Germanic tribes believeb that they had acmmon origin all of them Regarding as their fore father  "mannus" the son of god "tuisco" mannus was supposed to have and three sons from whom had sprung the istaevones the lngavones" ------------------------------------------------------------------

 हम पूर्व में इस बात को कह चुके हैं , कि क्रीट मिथकों में माइनॉस् (Minos )ज्युस तथा यूरोपा की प्रथम सन्तान है । 👇

यूनानीयों का ज्यूस ही वैदिक संहिताओं में (द्यौस् )के रूप में वर्णित है विदित हो कि यूरोप महाद्वीप की संज्ञा का आधार यही यूरोपा शब्द ही है।

.यहाँ एक तथ्य विद्वानों से निवेदित है कि मिथकों में वर्णित घटनाऐं और पात्र प्राचीन होने के कारण परम्परागत रूप से सम्वहन होते होते अपने मूल रूप से प्रक्षिप्त (बदली हुई ) हो जाती है ; परन्तु उनमें वर्णित पात्र और घटनाओं का अस्तित्व अवश्य होता है ।
किसी न किसी रूप में मनु के विषय में यूरेशिया की बहुत सी संस्कृतियाँ वर्णन करती हैं । ---------------------------------------------------------------
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पाश्चात्य पुरातत्व वेत्ता - डॉ० लियो नार्ड वूली ने पूर्ण प्रमाणित पद्धति से सिद्ध किया है ।
कि एशिया माइनर के पार्श्ववर्ती स्थलों का जब उत्खनन करवाया , तब ज्ञात हुआ कि जल -प्रलय की विश्व -प्रसिद्ध घटना सुमेरिया और उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में हुई थी।

सुमेरियन जल - प्रलय के नायक सातवें मनु वैवस्वत् थे जल प्रलय के समय मत्स्य अवतार विष्णु रूप में भगवान् ने इसी मनु की रक्षा की थी ...इस घटना का एशिया-माइनर की असीरी संस्कृति (असुरों की संस्कृति ) की पुरा कथाओं में उल्लेख है कि मनु ही जल- प्रलय के नायक थे ।
विष्णु और मनु के आख्यान सुमेरियन संस्कृति से उद्धृत किए भारत में आगत देव संस्कृति  से अनुयायीयों ने 👇

"विष्णु देवता का जन्म सुमेरियन
पुरातन कथाओं में"
82 INDO-SUMERIAN SEALS DECIPHERED
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sentation on ancient Sumerian and Hitto-Phoenician sacred seals and on Ancient Briton monuments,
see our former work,
1 of which the results therein announced are now con- firmed and established by the evidence of these Indo- Sumerian seals.
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This Sumerian " Fish " title for the Sun-god on this and the other amulet seals, as " Fish of the Setting Sun (S'u- kha) " is of the utmost critical importance for establishing the Sumerian origin of the Indo-Aryans..
and the Aryan character of the Sumerian language,
as it discloses for the first time the origin and hither to unknown real meaning of the Vedic name for the Sun-god " Vishnu," and of his represen-tative as a Fish-man, as well as the Sumerian origin of the English word " Fish," the Gothic " Fisk " and Latin " Piscis."
The first " incarnation " of the Sun-god Vishnu in Indian mythology is represented as a Fish-man (see Fig. 19)

and in substantially the same form as the Sumerian Fish-man personification of the Sun-god of the Waters in the Sumerian seals.
Now the Sumerians of Mesopotamia called the Setting Sun " The Fish (KM) "
2- a fact which has not hitherto been remarked or recognized.
And this Sumerian title of " Fish " for the Sun is explained in the bilingual
Sumero-Akkadian glossaries by the actual word occurring in this and the other Indo-Sumerian amulets,
namely S'u-khd, with the addition of " man = (na),
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3 by word-signs which read literally " The Winged Fish-man " ; * thus co-relating the Winged or soaring Sun with the Fish personification of the supposed " returning or resurrecting " Sun in " the waters under the earth."
This solar title of "
The Winged Fish " is further given the synonym of "The turning Bii-i-es's which latter name 1 W.P.O.B., 247 f., 251, 308. 2 B.. 8638. 3 lb., and 1586. 4 S'u=" wing," B.W., 311. 5 Gar-bi-i-i-es' (B., 7244) ; gar=" turn " (B., 11984) ; es' (B., 2551).

SUMER ORIGIN OF VISHNU IN NAME AND FORM 83
is evidently a variant spelling of the Sumerian Pi-es' or Pish for " Great Fish " with the pictograph word-sign of Fig, 19. — Sumerian Sun-Fish as Indian Sun-god Vishnu. From an eighteen th-centuiy Indian image (after Moor's Hindoo Pantheon).
Note the Sun-Cross pendant on his necklace. He is given four arms to carry his emblems : la) Disc of the Fiery Wheel {weapon) of the Sun, (M Club or Stone-mace (Gada or Kaumo-daki)
1 of the Sky-god Vanma, (c) Conch-shell (S'ank-ha), trumpet of the Sea-Serpent demon, 1 (d) Lotus (Pad ma) as Sun- flower.* i. Significantly this word " Kaumo-daki " seems to be the Sumerian Qum, " to kill or crush to pieces " (B., 4173 ; B.W.. 193) and Dak or Daggu " a cut stone " (B., 5221, 5233). a. " Protector of the S'ankha (or Conch) " is the title of the first and greatest Sea- Serpent king in Buddhist myth, see my List of Naga (or Sea-Serpent) Kings in Jour. Roy. Asiat. Soc, Jan, 1894. 3. On the Lotus as symbol of heavenly birth, see my W.B.T., 338, 381, 388.
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84 INDO-SUMERIAN SEALS DECIPHERED Fish joined to sign " great." 1 This now discloses the Sumerian origin not only of the " Vish " in Vish-nu, but also of the English '* Fish," Latin " Piscis," etc.— the labials B, P, F and V being freely interchangeable in the Aryan family of languages.
The affix nu in " Vish-nu " is obviously the Sumerian Nu title of the aqueous form of the Sun-god S'amas and of his father-god la or In-duru इन्द्र:  (Indra) as " God of the Deep." ' It literally defines them as " The lying down, reclining or bedded " (god)
3 or " drawer or pourer out of water." ' It thus explains the common Indian representation of Vishnu as reclining upon the Serpent of the Deep amidst the Waters, and also seems to disclose the Sumerian origin of the Ancient Egyptian name Nu for the " God of the Deep."
5 Thus the name
Vish-nu " is seen to be the equivalent of the Sumerian Pisk-nu,(पिस्क- नु ) and to mean "Pisk-nu,(पिस्क- नु ) and to mean " The reclining Great Fish (-god) of the Waters " ; and it will doubtless be found in that full form in Sumerian when searched for. And it would seem that this early " Fish " epithet of Vishnu for his " first incarnation " continued to be applied by the Indian Brahmans to that Sun-god even in his later "
incarnations " as the "striding" Sun-god in the heavens.
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Indeed the Sumerian root Pish or Pis for " Great Fish " still survives in Sanskrit as Fts-ara विसार:  " fish." " This name thus affords another of the many instances which I 1 On sign T.D., 139; B.W., 303. The sign is called " Increased Fish " {Kua-gunu, i.e., Khd-ganu, B., 6925), in which significantly the Sumerian grammatical term gunu meaning " increased " as applied to combined signs, is radically identical with the Sanskrit grammatical term gut.a ( = " multi- plied or auxiliary," M.W.D., 357) which is applied to the increased elements in bases forming diphthongs, and thus disclosing also the identity of Sanskrit and Sumerian grammatical terminology.
* M., 6741, 6759 ; B., 8988. s B., 8990-1, 8997. 4 lb., 8993. 5 This Nu is probably a contraction for Nun, or " Great Fish," a title of the god la (or Induru) इन्द्ररु of the Deep (B., 2627). Its Akkad synonym of Naku, as "drawer or pourer out of Water," appears cognate with the Anu(n)-«aAi, or " Spirits of the Deep," and with the Sanskrit Ndga or " Sea-Serpent." • M.W.D., 1000. The affix ara is presumably the Sanskrit affix ra, added to roots to form substantives, just as in Sumerian the affix ra is similarly added (cp., L.S.G., 81).
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SUMER ORIGIN OF POSEIDON
85 have found of the Sumerian origin of Aryan words, and in particular in the Sanskrit and English.
This Fish-man form of the Sumerian Sun-god of the Waters of the Deep,
Piesh, Pish or Pis (or Vish-nu),
also appears to disclose the unknown origin of the name of the Greek Sea-god "
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संख्या 82 वीं इण्डो-सुमेरियन निद्रा (सील )में प्राचीन सुमेरियन और हिट्टो फॉनिशियन पवित्र मुद्राओं पर( और प्राचीन ब्रिटान स्मारकों पर हस्ताक्षर किए गए हैं ।
जिनमें से मौहर संख्या (1) में से परिणाम घोषित किए गए हैं ।
अब इन इंडो-सुमेरियन सीलों  के प्रमाण के आधार पर पुष्टि की गई है कि इस सुमेरियन "मछली देव" पर सूर्य-देवता का आरोपण है।
और अन्य ताबीज मुद्राओं के लिए शीर्षक, "स्थापित सूर्य (सु-ख़ाह) की मछली" के रूप में इंडो-आर्यों की सुमेरियन मूल की स्थापना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साम्य है ।

और सुमेरियन भाषा के आर्यन चरित्र के रूप में, यह सूर्य-देवता "विष्णु" के लिए वैदिक नाम की उत्पत्ति और अब तक अज्ञात मछली अर्थ के रूप में प्रकट करता है और मत्स्य -मानव के रूप में उनकी प्रतिनिधि के समान साथ ही अंग्रेजी शब्द "फिश" के सुमेरियन मूल, गॉथिक "फिसक" और लैटिन "पिसिस पर भी प्रकाश डालता है ।
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भारतीय पौराणिक कथाओं में सूर्य-देव विष्णु का पहला "अवतार" मत्स्य -नर के रूप में दर्शाया गया है।
, और अत्यधिक सीमा तक उसी तरह के रूप में जैसे सुमेरियन मछली-नर  के रूप में सूर्य का देवता के रूप में चित्रण सुमेरियन मुद्राओं पर (अब मेसोपोटामिया )के सुमेरियन मुद्राओं पर उत्कीर्ण है।

और सूर्य के लिए "मछली" के इस सुमेरियन शीर्षक को द्विभाषी सुमेरो-अक्कादियन शब्दावलियों में वास्तविक शब्द और अर्थ इस प्रकार के अन्य इंडो-सुमेरियन ताबीज पर व्याख्यायित है ।
"मत्स्य मानव ।
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पिस्क-नु" शब्द को पंखधारी मछली-मानव " आदि अर्थों के रूप पढ़ते हैं। इस प्रकार पंखों या बढ़ते सूर्य को "पृथ्वी के नीचे के पानी में" लौटने या पुनर्जीवित करने वाले सूर्य के मछली के संलयन के साथ सह-संबंधित कथाओं का सृजन सुमेरियन संस्कृति में होगया था 
--जो कालान्तरण में भारतीय पुराणों में मिथक रूप में अभिव्यक्त हुई ।
"द विंगेड फिश" के इस सौर शीर्षक को "biis"को  फिश" का समानार्थ दिया गया है।
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सूर्य और विष्णु भारतीय मिथकों में समानार्थक अथवा पर्याय वाची रहे हैं।
"विष्-नु " में प्रत्यय "नु" स्पष्ट रूप से सूर्य-देवता के जलीय रूप और उनके पिता-देवता  इन-दुरु (इन्द्र) के "देवता  के रूप में सुमेरियन आदम का शीर्षक है।

यह इस प्रकार विष्णु के सामान्य भारतीय प्रतिनिधित्व को जल के बीच दीप के नाग पर पुन: और यह भी लगता है कि "दीप के देवता" के लिए प्राचीन मिस्र के नाम आतम के सुमेरियन मूल का खुलासा किया गया है।
इस प्रकार "विष्णु" नाम सुमेरियन "पिस्क-नु "के बराबर माना जाता है।
और " जल की बड़ी फिश (-गोड) को  करना; और और यह निश्चित रूप से सुमेरियन में उस पूर्ण रूप में पाए जाने पर खोजा जाएगा।
और ऐसा प्रतीत होता है कि "अवतार" के लिए विष्णु के इस बड़ी "मछली" का उपदेश भारतीय ब्राह्मणों ने अपने बाद के "अवतारों" में भी विष्णु-देवता को स्वर्ग में सूर्य-देवता के रूप में लागू किया है।वास्तव में "महान मछली" के लिए सुमेरियन मूल पीश या पीस शब्द अभी भी संस्कृत में एफ्स-ऐरा "मछली" के रूप में जीवित है।जो वैदिक मत्स्यवाची शब्द "विसार" से साम्य है "यह नाम इस प्रकार कई उदाहरणों में से एक है जिसे मैं  दीप, पीश, पीश या पीस (या वाश-नु) के जल के सुमेरियन सूर्य-देवता का यह नाम है ।

मिश्रु "MISHARU" - The Sumerian god of law and justice, brother of Kittu.
भारतीय पुराणों में मधु और कैटव का वध विष्णु-देवता करते है ।
मत्स्यः से लिए वैदिक सन्दर्भों में एक शब्द पिसार
भारोपीय मूल की धातु से प्रोटो-जर्मनिक में फिस्कज़(पुरानी सैक्सोन, पुरानी फ्रिसिज़, पुरानी उच्च जर्मन फ़िश, पुरानी नोर्स फिस्कर। मध्य डच विस्सी, डच, जर्मनी, फ़िश्च, गॉथिक फिसक का स्रोत) से पुरानी अंग्रेजी मछलियां "मछली"
pisk- "एक मछली।
*pisk-
Proto-Indo-European root meaning
"a fish."It forms all or part of: fish; fishnet; grampus; piscatory; Pisces; piscine; porpoise.It is the hypothetical source of/evidence for its existence is provided by:Latin piscis (source of Italian pesce)

French poisson, Spanish pez, Welsh pysgodyn, Breton pesk); Old Irish iasc; Old English fisc, Old Norse fiskr, Gothic fisks.

1-Latin piscis,
2-Irish íasc/iasc,
3-Gothic fisks,
4-Old Norse fiskr,
5-English fisc/fish,
6-German fisc/Fisch,
7-Russian пескарь (peskarʹ),
8-Polish piskorz,
9-Welsh pysgodyn,
10-Sankrit visar
11Albanian peshk

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This important reference is researched by Yadav Yogesh Kumar 'Rohi'. Thus, no gentleman should not add to its break!

भारतीय ग्रन्थ शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अपने इष्ट को वलि समर्पण हेतु मनुः ने असीरियन द्रविड पुरोहितों का आह्वान किया था "" असुरः ब्राह्मण इति आहूत " -------------------------------------------------------------
मानव संज्ञा का आधार प्रथम स्वायंभुव मनु थे ।
उधर नार्वे की पुरा कथाओं में मनु की प्रतिष्ठा मेनुस (Mannus )के रूप में है।
जे जर्मनिक जन-जातियाँ के आदिम रूप हैं।
पश्चिमीय एशिया की हिब्रू जन-जाति के धर्म ग्रन्थ ऑल्ड-टेक्सटामेण्ट(पुरानी बाइबिल ) जैनेसिस्(उत्पत्ति) खण्ड के पृष्ठ संख्या  82 पर वर्णित है ""👇

कि नूह (मनुः) ने ईश्वर के लिए एक वेदी बनायीऔर उसमें पशु पक्षीयों को लेकर यज्ञ- अग्नि में उनकी बलि दी इन्हीं कथाओं का वाचन ईसाई तथा इस्लामीय ग्रन्थों में किया गया है।
मनु के सन्दर्भ में ये कुछ प्रमाणिक तथ्य थे •••••••• •√•√इस श्रृंखला की यह प्रथम कणिका है !
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विचार-विश्लेण---यादव योगेश कुमार "रोहि"
ग्राम आजा़दपुर पत्रालय पहाड़ीपुर जनपद अलीगढ़--- उ०प्र०......