शुक्रवार, 20 मई 2022

शास्त्रों के कुछ दो गले सिद्धान्त- नन्द और वसुदेव तथा परशुराम को लेकर-

यह स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जो की गोवर्धन मठ (पुरी) उडीसा के निवर्तमान शंकराचार्य हैं ।

उन्हें नंद और वसुदेव के विषय में पारिवारिक जानकारी न होने के कारण केवल अपने पूर्वदुराग्रह से प्रेरित हो कर दोनों ही महापुरुषों को अलग अलग जाति -वर्ण का बता दिया है।

परन्तु यह आवश्यक नहीं कि आज के शंकराचार्य पूर्ण ज्ञानी और शिव का ही अवतार हों-

इस लिए आज के शंकराचार्यों से प्राय: यह गलतियाँ होना स्वाभाविक हैं।

नन्द और वसुदेव को लेकर जो विवाद किया जाता है वह केवल उन दौंनो के गोपत्व को लेकर है। 

गोप शब्द का अभिधा मूलक अर्थ गोपालक ( गायों का पालन करने वाला-है  गोपालन करना और कृषि करना आर्यों की परम्परागत और मौलिक वृत्ति रही है। शास्त्रों में गाय के विषय में लिखा है ।

"भुक्त्वा तृणानि शुष्कानि ,पीत्वा तोयं जलाशयात्  दुग्धं ददति लोकेभ्यो गावो विश्वस्य मातरः॥ 

अर्थात्‌ रूखी-सूखी घास के तिनके खाकर भी और जलाशयों ( तालाब , पोखर आदि) से जल पीकर संसार के प्राणियों को दूध देती हैं इसी लिए वे गायें विश्व की माता हैं ।
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निश्चलानन्द जी का कहना है कि नन्द गाय पालन करने से ही वैश्य थे। और वसुदेव क्षत्रिय थे; अर्थात  दोनों का वर्ण अलग अलग था ।

वसुदेव ने भी जब गोपालन और कृषि कार्य किया तो वे किस आधार पर क्षत्रिय थे गोपालन करने से उनको भी वैश्य कहना चाहिए।

और पुराणों में वसुदेव को गोपों में जन्म लेने का वर्णन अनेक स्थलों पर हुआ है।

नन्द जी ही नहीं अपितु वसुदेव को भी पुराणों में गोप रूप में जन्म लेने का वर्णन हुआ है ।
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और देवीभागवत पुराण के चतुर्थ स्कन्ध में वसुदेव को गोपालन और कृषि करने वाला बताया है अर्थात्  वैश्य वृत्ति को धारण करने वाला बताया देखें निम्न श्लोकों को ।👇

शूरसेनाभिधःशूरस्तत्राभून्मेदिनीपतिः ।
माथुराञ्छूरसेनांश्च बुभुजे विषयान्नृप॥५९॥

तत्रोत्पन्नः कश्यपांशः शापाच्च वरुणस्य वै ।
वसुदेवोऽतिविख्यातः शूरसेनसुतस्तदा॥ ६०॥

वैश्यवृत्तिरतः सोऽभून्मृते पितरि माधवः ।
उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान् ॥६१॥

•-तब वहाँ के शूर पराक्रमी राजा शूरसेन नाम से हुए । और वहाँ की सारी सम्पत्ति भोगने का शुभ अवसर उन्हें प्राप्त हुआ ! तब वहाँ वरुण के शाप के कारण कश्यप अपने अंश रूप में शूरसेन के पुत्र वसुदेव के रूप में उत्पन्न हुए और कालान्तरण में पिता के स्वर्गवासी हो जाने पर वसुदेव (वैश्य-वृति) से अपना जीवन निर्वाह करने लगे ।

उन दिनों उग्रसेन भी जो मथुरा के एक भाग पर राज्य पर राज करते थे !  ये (शूरसेन और अग्रसेन दौंनों ही बड़े प्रतापी राजा हुए ) कुछ दिनों बाद उग्रसेन का पुत्र कंस हुआ जो उस समय के अत्याचारी राजाओं में बड़ा पराक्रमी कहा जाता था।

सन्दर्भ:- इति श्रमिद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः।२०।

हरिवंश पुराण हरिवंश पर्व में कश्यप का ब्रह्मा के आदेश से व्रज में वसुदेव गोप के रूप में अवतरण होना भी वसुदेव के गोप रूप को सूचित करता है।-

                    (ब्रह्मोवाच)
नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं शृणु मे विभो ।
भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति ।१८।

यत्र त्वं च महाबाहो जातः कुलकरो भुवि ।
यादवानां महद् वंशमखिलं धारयिष्यसि ।१९ ।

तांश्चासुरान्समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मनो महत्।
स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय ।1.55.२०।।   

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पुरा हि कश्यपो विष्णो वरुणस्य महात्मनः ।
जहार यज्ञिया गा वै पयोदास्तु महामखे ।२१।

अदितिः सुरभिश्चैते द्वे भार्ये कश्यपस्य तु ।
प्रदीयमाना गास्तास्तु नैच्छतां वरुणस्य वै । २२ ।

ततो मां वरुणोऽभ्येत्य प्रणम्य शिरसा ततः ।
उवाच भगवन् गावो गुरुणा मे हृता इति ।। २३ ।।

कृतकार्यो हि गास्तास्तु नानुजानाति मे गुरुः ।
अन्ववर्तत भार्ये द्वे अदितिं सुरभिं तथा ।। २४ ।।

 मम ता ह्यक्षया गावो दिव्याः कामदुहः प्रभो ।
चरन्ति सागरान् सर्वान्रक्षिताः स्वेन तेजसा।। २५।

कस्ता धर्षयितुं शक्तो मम गाः कश्यपादृते ।
अक्षयं वा क्षरन्त्यग्र्यं पयो देवामृतोपमम् ।। २६ ।

प्रभुर्वा व्युत्थितो ब्रह्मन् गुरुर्वा यदि वेतरः।
त्वया नियम्याः सर्वे वै त्वं हि नः परमा गतिः।२७।।

यदि प्रभवतां दण्डो लोके कार्यमजानताम् ।
न विद्यते लोकगुरो न स्युर्वै लोकसेतवः ।। २८ ।।

यथा वास्तु तथा वास्तु कर्तव्ये भगवान् प्रभुः ।
मम गावः प्रदीयन्तां ततो गन्तास्मि सागरम् ।२९।।

या आत्मदेवता गावो या गावः सत्त्वमव्ययम् ।
लोकानां त्वत्प्रवृत्तानामेकं गोब्राह्मणं स्मृतम्।1.55.३०।।

त्रातव्याः प्रथमं गावस्त्रातास्त्रायन्ति ता द्विजान् ।
गोब्राह्मणपरित्राणे परित्रातं जगद् भवेत् ।३१ ।

इत्यम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत ।
गवां कारणतत्त्वज्ञः कश्यपे शापमुत्सृजम् ।।३२।।

येनांशेन हृता गावः कश्यपेन महर्षिणा ।
स तेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति ।।३३।।

या च सा सुरभिर्नाम अदितिश्च सुरारणिः ।
तेऽप्युभे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यतः ।।३४।।

ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि रंस्यते ।
स तस्य कश्यपस्यांशस्तेजसा कश्यपोपमः ।।३५।।

वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले ।
गिरिर्गोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरतः ।। ३६।।

तत्रासौ गोषु निरतः कंसस्य करदायकः ।
तस्य भार्याद्वयं जातमदितिः सुरभिश्च ते ।।३७।।

देवकी रोहिणी चेमे वसुदेवस्य धीमतः ।
सुरभी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्वभूत् ।। ३८।।

तत्र त्वं शिशुरेवाङ्कौ गोपालकृतलक्षणः ।
वर्धयस्व मूहाबाहो पुरा त्रैविक्रमे यथा ।। ३९ ।।

छादयित्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानं मायया योगरूपया ।
तत्रावतर लोकानां भवाय मधुसूदन ।1.55.४०।

उपर्युक्त श्लोकों में वर्णन है कि जब एक बार कश्यप ऋषि अपने पुत्र वरुण की गायों को उससे लेकर भी गायों के अत्यधिक दुग्ध देने से कश्यप की नीयत में आयी खोट के कारण वरुण की गायें पुन: वापस नहीं करते तब ब्रह्मा के पास आकर वरुण कश्यप और उनकी पत्नीयो अदिति और सुरभि की गायों को इन देने की शिकायत करते हैं।

तब ब्रह्मा कश्यप और उनकी पत्नीयों को गोप गोपी रूप में व्रज में  गोपालन करते रहने के लिए जन्म लेने का शाप देते हैं । 

जो वसुदेव और उनकी दो पत्नी अदिति और सुरभि ही  क्रमश देवकी और रोहिणी बनती हैं ।और वसुदेव कश्यप के अंश हैं ।

तो गोप तो वसुदेव भी थे नन्द ही नहीं ये यादवों के गोपालन वृत्ति परक विशेषण थे ।

 (हरिवंश पुराण हरिवंश पर्व 55वाँ अध्याय)

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गो रूपी पृथ्वी के पालक अर्थात् राजा को भी गोप संज्ञा आदर सूचक लगती थी तथापि मुख्यतः गोप का उपयोग एक विशेष समुदाय हेतु होता था। 
गोप वह समुदाय था  जो गोपालन करता था । गो ही वह प्रथम पशु है ।
जिससे पैसा शब्द का विकास पेकुस ( pekus) रूप में हुआ।
गोप गौ के अविशिष्ट  दुग्ध का व्यापार कर धनार्जन भी करते थे । 
अतः वे  इस आधार पर ही विक्रय कर्ता ( वैश्य ) नहीं कहे जा सकते थे। 
क्यों की तब केवल विनिमय प्रणाली ही थी जिसे हम वस्तुओं का आदान -प्रदान कह सकते हैं ।
और यह तो सभी राजा ऋषि और मुनि भी करते थे। पशु शब्द से ही पैसा और फीस जैसे शब्दों का विकास मुद्रा के लिए सर्वप्रथम हुआ है ।

और तो और निश्चलानन्द जी को महात्मा बुद्ध के विषय में जानकारी न होने के कारण भी ये दो बुद्ध होने की बात करते हैं एक बुद्ध ब्राह्मण थे ।

तो दूसरे क्षत्रिय ।
जो कि इनका समाज को भ्रमित करने वाला बयान है।

परन्तु हम सबसे पहले शंकराचार्य के उस मत का खण्डन करते हैं ।

जिसमें ये कहते हैं  कि नन्द वैश्य थे और वसुदेव क्षत्रिय ?
सरस्वती जी मुझे बड़े दु:ख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि सदीयों से आपके कपटी पूर्वज यादवों का इतिहास बिगाड़ते रहे  हैं ।
विदित हो कि

अहीर जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णि कुल में देवमीढ ही  नन्द और वसुदेव के पितामह थे ।

राजा हृदीक के तीन' पुत्र थे; देवमीढ, सत्धनवा तथा कृतवर्मा थे ।                       

देवमीढ की राजधानी मथुरा पुरी थी हरिवंश पुराण पर्व 2 अध्याय 38 में भी कहा गया है कि..👇

अन्धकस्यसुतो जज्ञे रैवतो नाम  पार्थिव: रैवतस्यात्मजौ राजा, विश्वगर्भो महायशा : ।।४८।
(हरिवंशपुराण विष्णुपर्व ३८ वाँ अध्याय )

यदु की कई पीढ़ियों बाद अन्धक के रैवत हुए जिनका ही दूसरा नाम हृदीक है । रैवत के विश्वगर्भ अर्थात्‌ देवमीढ़ हुए

तस्यतिसृषु भार्याषु दिव्यरूपासु केशव:।
चत्वारो जज्ञिरे पुत्र लोकपालोपमा: शुभा: ।४९

देवमीढ के दिव्यरूपा , १-सतप्रभा,२-अष्मिका,और ३-गुणवती ये तीन रानीयाँ थी ।

देवमीढ के शुभ लोकपालों के समान चार पुत्र थे जिनमें एक अश्मिका के शूरसेन तथा तीन गुणवती के ।
वसु वभ्रु: सुषेणश्च , सभाक्षश्चैव वीर्यमान् ।यदु प्रवीण: प्रख्याता  लोकपाला इवापरे ।।५०।
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सत्यप्रभा के सत्यवती कन्या तथा अष्मिका से वसु ( शूरसेन) पर्जन्य, अर्जन्य, और राजन्य हुए है।                      
शूरसेन की मारिषा रानी में वसुदेव आदि दश पुत्र तथा पर्जन्य के वरियसी रानी में नन्दादि नौं भाई तथा अर्जन्य के चन्द्रिका रानी से दण्डर और कण्डर पुत्र हुए ।👇-💐☘

और राजन्य के हेमवती रानी से चाटु और वाटु दो पुत्र हुए थे ; इस प्रकार राजा देवमीढ के चार पुत्र तैईस पौत्र थे ।

'देवमीढ़स्य या भार्या, वैश्यगुणवती स्मृता ।चन्द्रगुप्तस्य सा पुत्री महारण्य निवासिना ।।५२।

नाभागो दिष्ट पुत्रोऽन्य: कर्मणा वैश्यताँगत: ।तेषां मध्य महारण्य चन्द्रगुप्तस्तथैव च ।५३।

भागवत पुराण 9/2/23 पर वर्णित है कि वैवश्वत मनु का पुत्र दिष्ट था ; और दिष्ट का नाभाग अपने कर्म से वैश्य हुआ  इसी वंश का राजा मरुत था इसी वंश में चन्द्रगुप्त वैश्य गोकुल का था ।

उसी चन्द्र गुप्त की कन्या गुणवती राजा देवमीढ की पत्नी थीं ।👇

श्रीदेवमीढ़स्य बभूवतुः द्वे भार्ये हि विट्क्षत्रिय वंश जाते ।

पर्जन्य नाम्ना जनि गुणवतीम् वा वैश्यपुत्र्या राजन्य पुत्रापि च शूरसेन:।
वनमाली दास कृत "भक्तमालिका"नामक पुस्तक से उद्धृत यह पुस्तक भक्तचरितांक गोरखपुर से पृष्ठ संख्या १७६ सम्बद्ध है। 

अब देखें "देवीभागवत" पुराण के चतुर्थ स्कन्ध के बीसवें अध्याय में वसुदेव को कृषि और गो-पालन करते हुए वैश्यवृत्ति को ग्रहण करने वाला वर्णन किया गया है।

परन्तु कृषि और गोपालन तो प्राचीन काल में क्षत्रियों की भी वृत्ति रही है।

स्मरण करो राजा जनक और राजा दिलीप को
और स्वयं यादव राजा सहस्रबाहु भी              गोपालक ही था ।

निम्न रूप में वसुदेव को कृषि और गोपालन करते हुए वर्णन किया है -
__________
श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ।२०। 

एवं नानावतारेऽत्र विष्णुः शापवशं गतः।
करोति विविधाश्चेष्टा दैवाधीनः सदैव हि ।५२ ॥

अर्थ •-इस प्रकार अनेक अवतारों के रूप में इस पृथ्वी पर विष्णु शाप वश गये
जो दैव के अधीन होकर संसार में विविध चेष्टा करते हैं ।

मार्कण्डेय पुराण में एक स्थान अध्याय 130/ के श्लोक 30 पर शास्त्रीय विधानों का निर्देशन करते हुए ।
वर्णित है अर्थात् ( परिव्राट् मुनि ने राजा दिष्ट से कहा कि  ) हे राजन् आपका पुत्र नाभाग धर्म से पतित होकर वैश्य हो गया है; और वैश्य के साथ आपका युद्ध करना नीति के विरुद्ध अनुचित ही है ।।30।।

"तवत्पुत्रस् महाभागविधर्मोऽयं महातमन्।।
तवापि वैश्येन सह न युद्धं धर्म वन्नृप ||30||

उपर्युक्त श्लोक जो  मार्कण्डेय पुराण से उद्धृत है उसमें स्पष्ट विधान है कि वैश्य युद्ध नहीं कर सकता अथवा वैश्य के साथ युद्ध नहीं किया जा सकता है

तो फिर यह भी विचारणीय है कि गोप जो नारायणी सेना के योद्धा थे  वे वैश्य कहाँ हुए ?
क्योंकि वे तो नित्य युद्ध करते थे।

और इसके अतिरिक्त भी स्वयं श्रीकृष्ण ने अपना पुरुषार्थ परिचय देते हुए कहा था जब

एक बार जब कृष्ण हिमालय पर्वत के कैलास शिखर पर तप करने तथा भूत और पिशाच जनजातियों के नायक शिव से मिलने गये ;

तब वहाँ पैशाची प्राकृत बोलने वाले दो पिशाच जन-जाति के लोगों से परिचय हुआ !
यद्यपि उन्होने भी कृष्ण की ख्याति सुन ली थी ।
परन्तु आज कृष्ण से मिलने का सौभाग्य भी प्राप्त हो गया ।

ये भूत या पिशाच जनजाति के लोग थे
यही आज भूटानी कहे जाते हैं ।
वर्तमान में भूटान (भूतस्थान)  ही भूत या भूटिया जन-जाति का निवास था ।
ये 'लोग' कच्चे माँस का भक्षण करते और गन्दे सन्दे रहते थे ।

क्योंकि जिनका आहार दूषित हो तो उनका व्यवहार भूषित कैसे हो सकता है ?

'परन्तु वहाँ भी दो पिशाच जो कृष्ण के वर्चस्व से प्रभावित कृष्ण के भक्त बन गये थे ।
उन्होंने जब साक्षात् रूप में उपस्थित कृष्ण का परिचय पूछा तो उन्होंने (कृष्ण ने) अपना परिचय देते हुए कहा कि शत्रुओं का क्षरण या क्षति करके पीडित का त्राण करने वाला क्षत्रिय होने से मैं  क्षत्रिय हूँ ।

तब पिशाच और जिज्ञासा पूर्वक पूँछता है ।
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ब्रूहि मर्त्य यथातत्त्वं ज्ञातुमिच्छामि मानद ।
एवं पृष्टः पिशाचाभ्यामाह विष्णुरुरुक्रमः।3/80/ 9।
•–दूसरों को मान देने वाले मानव आप ठीक ठीक बताइए मैं पिशाच यथार्थ रूप से आपका परिचय जानना चाहता हूँ ।

उन दौनों पिशाचों के इस प्रकार पूछने पर महान डग वाले भगवान विष्णु के रूप में कृष्ण बोले !
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क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मानुष्याः प्रकृतिस्थिताः
यदुवंशे समुत्पन्नः क्षात्रं वृत्तमनुष्ठितः ।।3/80/10 

•-मैं क्षत्रिय हूँ  प्राकृत मनुष्य मुझे ऐसा ही कहते हैं  ; और जानते हैं
यदुकुल में उत्पन्न हुआ हूँ ।
इस लिए क्षत्रियोचित कर्म का अनुष्ठान करता हूँ।10।।

लोकानामथ पातास्मि शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।
कैलासं गन्तुकामोऽस्मि द्रष्टुं देवमुमापतिम्।3/80/11।

•-मैं तीनों लोगों का पालक
तथा सदा ही दुष्टों पर शासन करने वाला हूँ।
इस समय उमापति भगवान् शंकर का दर्शन करने कैलास पर्वत पर जाना चाहता हूँ 3/80/11

इसी पुराण में एक स्थान कृष्ण 'ने स्वयं राजाओं के समक्ष उद्घोषणा की कि मैं गोप हमेशा सब प्रकार से प्राणियों की रक्षा करने वाला हूँ।
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गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणद: सदा ।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।।४१।
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•– राजन् ! मैं गोप हूँ , और प्राणियों का सब ओर से प्राण दान करने वाला हूँ।
सम्पूर्ण लोकों का रक्षक और सब ओर से दुष्टों का शासन करने वाला हूँ ।

हरिवशं पुराण भविष्य पर्व सौंवें  अध्याय का इकतालीस वाँ श्लोक
(पृष्ठ संख्या 1298 गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण)

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अतएव गोप ही यादव और यादव अपनी वीरता प्रवृत्ति से आभीर कहलाते थे ।
और क्षत्रिय वीर ही हो सकता है ।
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"अत्रावतीर्णयोः कृष्ण गोपा एव हि बान्धवाः। गोप्यश्च सीदतः कस्मात्त्वं बन्धून्समुपेक्षसे।१८५.३२।

दर्शितो मानुषो भावो दर्शितं बालचेष्टितम्।
तदयं दम्यतां कृष्ण दुरात्मादेवमीढुधः।। १८५.३३
(ब्रह्मपुराण अध्याय हैं।७।

स्र: क्षत्रियसम्बन्धाद्  द्वयोरात्मास्य जायते।हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृति: ।।७।।

अर्थ:-क्षत्रिय से क्षत्रियवर्ण की स्त्री और वैश्यवर्ण की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है वह क्षत्रिय वर्ण का ही होता है ।

तीसरी पत्नी शूद्रा के गर्भ से हीन वर्ण वाले  शूद्र उत्पन्न होते हैं जिन्हें उग्र कहते हैं यह स्मृति (धर्मशास्त्र)का कथन है।७।

(महाभारत अनुशासन पर्व में दान धर्म नामक उप पर्व के अन्तर्गत वर्णसंकरकथन नामक अड़तालीसवाँ अध्याय का सप्तम श्लोक -)
(पृष्ठ संख्या( ५६२४) गीता प्रेस का संस्करण)

अब प्रश्न यह भी उठता है  !
कि जब धर्मशास्त्र इस बात का विधान करते हैं ।

कि ब्राह्मण की चार पत्नीयाँ हो सकती हैं उनमें से दो पत्नीयाँ ब्राह्मणी और क्षत्राणी के गर्भ से ब्राह्मण ही उत्पन्न होगा और शेष दो वैश्याणी और शूद्राणी के गर्भ से जो पुत्र होंगे वे ; 

ब्राह्मणत्व से रहित माता की जाति के ही समझे जाते हैं --कि इसी महाभारत के अनुशासन पर्व में दानधर्म नामक उपपर्व के अन्तर्गत (वर्णसंकरकथन) नामक( अड़तालीसवाँ अध्याय) में यह  वर्णन है ।

 इसके लिए देखें निम्न श्लोक -

भार्याश्चतश्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते ।
आनुपूर्व्याद् द्वेयोर्हीनौ मातृजात्यौ प्रसूयत: ।।४।।
(महाभारत अनुशासन पर्व का दानधर्म नामक उपपर्व)

कि ब्राह्मण की चार पत्नीयाँ हो सकती हैं उनमें से दो पत्नीयाँ ब्राह्मणी और क्षत्राणी के गर्भ से सन्तान केवल  ब्राह्मण ही उत्पन्न होगी !
और शेष दो वैश्याणी और शूद्राणी पत्नीयों के गर्भ से जो सन्तान  होंगी  वे ; ब्राह्मणत्व से रहित माता की जाति की ही समझी जाएगी --।।४।।

इसी अनुशासन पर्व के इसी अध्याय में वर्णन है कि
"तिस्र: क्षत्रियसम्बन्धाद्  द्वयोरात्मास्य जायते।
हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृति: ।।७।।

अर्थ:-क्षत्रिय से क्षत्रियवर्ण की स्त्री और वैश्यवर्ण की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है ;
वह क्षत्रिय वर्ण का होता है ।तीसरी पत्नी शूद्रा के गर्भ से हीन वर्ण वाले  शूद्र उत्पन्न होते हैं जिन्हें उग्र कहते हैं यह स्मृति (धर्मशास्त्र)का कथन है।७।

(महाभारत अनुशासन पर्व में दानधर्म नामक उपपर्व के अन्तर्गत वर्णसंकरकथन नामक अड़तालीसवाँ अध्याय का सप्तम श्लोक -) (पृष्ठ संख्या- ५६२५) गीता प्रेस का संस्करण) _

ऋचीक-सत्यवती के पुत्र जमदग्नि, जमदग्नि-रेणुका के पुत्र परशुराम थे। ऋचीक की पत्नी सत्यवती राजा गाधि (प्रसेनजित) की पुत्री और विश्वमित्र (ऋषि विश्वामित्र) की बहिन थी।

 परशुराम को शास्त्रों की शिक्षा दादा ऋचीक, पिता जमदग्नि तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा अपने पिता के मामा राजर्षि विश्वमित्र और भगवान शंकर से प्राप्त हुई। च्यवन ने राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह किया।

महर्षि भृगु के प्रपौत्र, वैदिक ॠषि ॠचीक के पौत्र, जमदग्नि के पुत्र, महाभारतकाल के वीर योद्धाओं भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देने वाले गुरु, शस्त्र एवं शास्त्र के धनी ॠषि परशुराम का जीवन संघर्ष और विवादों से भरा रहा है। 

भृगुक्षेत्र के शोधकर्ता साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार जिन राजाओं से इनका युद्ध हुआ उनमें से हैहयवंशी राजा सहस्त्रार्जुन इनके सगे मौसा थे। जिनके साथ इनके पिता जमदग्नि ॠषि का इनकी माता रेणुका को लेकर विवाद हो गया था।

कथानक के अनुसार के साथ इनकी माता के सम्बंधों के लेकर हुए इस विवाद में इन्होंने अपने पिता के आदेश पर माता रेणुका का सिर काट दिया था। जिससे नाराज इनके मौसा सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि ॠषि का आश्रम उजाड़ दिया।

अब जब परशुराम ने २१बार पृथ्वी को क्षत्रिय शून्य किया और फिर उन क्षत्रियों की विधवाऐं ब्राह्मणों के पास ऋतु दान के लिए आयीं तो उनसे उत्पन्न सन्तानें क्षत्रिय नहीं अपितु ब्राह्मण ही हुईं-

त्रिसप्तकृत्व : पृथ्वी कृत्वा नि: क्षत्रियां पुरा ।
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ।४।

तदा नि:क्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति ।
ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन्यकृत सुतार्थिन्य८भिचक्रमु:।५।

ताभ्यां: सहसमापेतुर्ब्राह्मणा: संशितव्रता: ।
ऋतो वृतौ नरव्याघ्र न कामात् अन् ऋतौ यथा ।६।

तेभ्यश्च लेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ता: सहस्रश:तत:सुषुविरे राजन्यकृत क्षत्रियान् वीर्यवत्तारान्।७।

कुमारांश्च कुमारीश्च पुन: क्षत्राभिवृद्धये ।
एवं तद् ब्राह्मणै: क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभि:।८।

जातं वृद्धं  च धर्मेण सुदीर्घेणायुषान्वितम्।
चत्वारो८पि ततो वर्णा बभूवुर्ब्राह्ममणोत्तरा: ।९।

(महाभारत आदि पर्व ६४वाँ अध्याय)

अर्थात् पूर्व काल में परशुराम ने (२१ )वार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर के महेन्द्र पर्वत पर तप किया ।
तब क्षत्रिय नारीयों ने पुत्र पावन के लिए ब्राह्मणों से मिलने की इच्छा की ।

तब ऋतु काल में ब्राह्मण ने उनके साथ संभोग कर उनको गर्भिणी किया ।
तब उन ब्राह्मणों के वीर्य से हजारों क्षत्रिय राजा हुए
और चातुर्य वर्ण-व्यवस्था की वृद्धि हुई।
उसमें भी ब्राह्मणों को अधिक श्रेष्ठ  माना गया ।

क्यों कि क्षत्रिया स्त्री में ब्राह्मण से उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण होगी।
अत: परशुराम द्वारा २१बार क्षत्रिय विनाश  वाली घटना कल्पना और शास्त्रीय सिद्धान्तों के विपरीत है। जिसका आगे या था क्रम हम खण्डन करेंगे-

प्रथम १-(वभ्रु, जो पर्जन्य नाम से भी जाने गये । द्वित्तीय २- सुषेण ये अर्जन्य के नाम से जाने गये तथा

तृत्तीय ३-सभाक्ष हुए जिनको "राजन्य" नाम से लोक में जाना गया हुए ।

देवमीढ की द्वित्तीय रानी अश्मिका के पुत्र शूरसेन हुए जो वसुदेव के पिता थे ।___________________________

देवमीढात् शूरो नाम्ना पुत्रोऽजायत् अश्मिकां पत्न्याम्  तथैव च गुणवत्यां पर्जन्यो वा वभ्रो: ।।तस्या: ज्येष्ठ: पुत्रो नाम्ना उपनन्द:।।

नन्द की माता और पर्जन्य की पत्नी का नाम वरीयसी था और वसुदेव की अठारह पत्नियाँ थीं।

उपनन्द , नन्द ,अभिनन्द,कर्मनन्द,धर्मनन्द, धरानन्द,सुनन्द, और बल्लभनन्द ये नौ नन्द हैं । उपनन्द बडे़ थे ।
__________________________________     माधवाचार्य ने भागवत पुराण की टीका में लिखा :-माधवाचार्यश्च वैश्य कन्यायाँ वैभात्रेय: भ्रातुर्जातत्वादिति ब्रह्मवाक्यं च शूरतात् सुतस्य वैश्य कन्या प्रथमोऽथ गोप इति प्राहु:।५७।

एवमन्येऽपि गोपा यादवविशेष: एव वैश्योद् भवत्वात् अतएव स्कन्दे मथुराखण्डे       (अन्वितार्थ प्रकाशिका टीका)

अत: माधवाचार्य की टीका तथा स्कन्द पुराण वैष्णव खण्ड मथुरा महात्म्य में तथा श्रीधर टीका , वंशीधरी टीका और अन्वितार्थ प्रकाशिका टीका आदि में शूरसेन की सौतेली माता चन्द्रगुप्त की कन्या गुणवती से शूर के भाई पर्जन्य आदि उत्पन्न हुए थे ।

_________________

वे गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण से गोप तथा वंश मूलक विशेषण से यादव थे ।

हरिवंशपुराण में गोप तो वसुदेव को भी कहा गया है । पं०वल्देव शास्त्री ने टीका में लिखा है :-

भ्रातरं वैश्यकन्यायां शूर वैमात्रैय भ्रातुर्जातत्वादिति भारत तात्पर्यं _________________________________ ब्रह्मवाक्यं ।।५१।

शूर तात सुतस्यनन्दाख्य गोप यादवेषु च सर्वेषु भवन्तो मम वल्लभा: ( इति वल्देव वाक्यं).    _______________

(विष्णु पुराण पञ्चमाँश २४वाँ अध्याय)

गुरु जी श्री सुमन्त कुमार यादव जौरा के श्री चरणों में नमन करते हुए -
पुरी के शंकराचार्य निश्चलानन्द सरस्वती के भ्रामक मतों का निवारण- प्रस्तुत करते हैं
_____________            

प्रस्तुतिकरण- यादव योगेश कुमार रोहि-
8077160219

प्रस्तुतिकरण - यादव योगेश कुमार रोहि-
ग्राम -आजादपुर -पहाड़ीपुर ( अलीगढ़)

शुक्रवार, 13 मई 2022

करौली के जादौनों का उदय आठवीं सदी में मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से हुआ जो दशवें अहीर राजा थे ।

करौली के जादौनों का उदय आठवीं सदी में  मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से हुआ जो दशवें अहीर राजा थे ।
____________________________________________________

ऋग्वेद में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास और गोप के रूप में सम्बोधित किया गया है।
दास शब्द की व्याख्या विवादित है ।
वर्तमान में दास शब्द भक्त का वाचक और गोप गो- पालक का वाचक है ।
यह तथ्य हम पूर्व में वर्णित कह चुके हैं ।

 अमरकोश में जो गुप्त काल की रचना है ;उसमें अहीरों के अन्य नाम-पर्याय वाची रूप में गोप शब्द भी वर्णित हैं। 

आभीर पुल्लिंग विशेषण संज्ञा गोपालः समानार्थक: 
१-गोपाल,२-गोसङ्ख्य, ३-गोधुक्, ४-आभीर,५-वल्लव,६-गोविन्द, ७-गोप ८ - गौश्चर: 
(2।9।57।2।5)
 अमरकोशः) 

अत: साक्ष्य अहीरों के पक्ष में ही अधिक हैं यदुवंशी होने के और सम्पूर्ण भारत में अहीर ही यादव या गोप के रूप में मान्य हैं ।

'परन्तु जादौनों के रूप में कोई पौराणिक साक्ष्य नहीं है ।
इनकी निकासी भी आठवीं सदीं के मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से है ।

और सोलहवीं सदी के बाद से  लगभग  अठारह वीं सदी ये लोग राजपूत संघ में सम्मिलित हो गये । 
'परन्तु  कुछ राजपूतों 'ने इनका विरोध भी किया और आज भी करते हैं ।

प्रसिद्ध समाज शास्त्रीयों ने भारतीय इतिहास में जादौन जन-जाति को चारण बंजारों का एक छोटे राठौड़ों का सहवर्ती  समुदाय के रूप में वर्गीकृत किया है । 🌸

कुछ अफगानिस्तान में जादौन पशु भेड़ बकरी पालक पठानों का भी समुदाय हैं ।
 जो स्वयं को यहूदियों से उत्पन्न मानते हैं ।
और यहूदी भी यादवों का रूपान्तरण ही है।

इनके विषय में आगे अधिक स्पष्ट किया जाएगा !
विदित हो कि यादवों की एक शाखा कुकुर कहलाती थी  ये लोग अन्धक राजा के पुत्र कुकुर के वंशज माने जाते हैं  दाशार्ह देशबाल -दशवार , ,सात्वत ,जो कालान्तरण में हिन्दी की व्रज बोली क्रमशः सावत ,सावन्त , कुक्कुर कुर्रा , कुर्रू आदि रूपों परिवर्तित हो गये ।

 ये वस्तुत यादवों के कबीलागत विशेषण हैं ।
 कुकुर एक प्रदेश जहाँ कुक्कुर जाति के यादव रहते थे यह देश राजपूताने के अन्तर्गत है ; 
जो कभी मत्स्या देश था । 

और कालान्तरण में उसके वंशजों द्वारा नामकरण हुआ । कुकुर अवलि =कुकुरावलि --कुरावली---करौली।

'परन्तु मुगल काल में पारसी में करौल का अर्थ छावनी या सैनिक पढ़ाब  होने से इस स्थान पर मुगलों के सैनिक पढ़ाब डाल कर रहते थे इस लिए भी इसे करौली या करौल कहा गया । 

ध्यान रखें
_____________________________________

करौली राजस्‍थान का ऐतिहासिक नगर है।
 यह करौली जिला का मुख्यालय है। 
इसकी स्‍थापना 955 ई. के आसपास राजा विजय पाल ने की थी जिनके बारे में कहा जाता है कि वे भगवान कृष्‍ण के वंशज थे। 

एक समय जलेसर व करौली राज्यों पर जादौन राज परिवारों का शासन रहा है।

 इनका निकास मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से है। इसका प्रमाण  सन्दर्भ निम्नलिखित रूप में देखें👇
_____________________
[1] Michelutti, Lucia (2008). The Vernacularisation of Democracy: Politics, Caste, and Religion in India. Routledge. पृ॰ 43. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-41546-732-2.

यह ब्रह्म पाल दशवें अहीर/ पाल शासक थे 
आभीर पाल शासक की श्रृँखला क्रम इस प्रकार है ।

१-धर्म्मपाल

२-सिंहपाल

३-जगपाल 

४- नरपाल

५-संग्रामपाल

६-कुन्तपाल

७-भौमपाल

८-सोचपाल

९-पोचपाल

१०-ब्रह्मपाल

११-जैतपाल ।

करौली का इतिहास प्रारम्भ होता है ब्रह्म पाल और विजयपाल आभीर शासकों से ---

यह विजयपाल बारहवाँ पाल शासक था ---
 जिनका शासन-समापन समय 1030 ई०सन्  के समकालिक है विजयपाल से तुलसी पाल तक पैंतीस -छत्तीस पाल शासकों का राज रहा ।

१२- त्रिभुवनपाल(1000)
१३- विजयपाल (1030)
१४-धर्मपाल (1090)
१५- कुँवरपाल (1120)
१६- अनंगपाल(1122 )
१७-अजयपाल(1150)
१८-हरिपाल ( 1180)
१९-सुघड़पाल(1196)
२०-पृथ्वी पाल (1242)
२१-राजपाल (1264)
२२- त्रिलोकपाल(1284)
२३-विप्पलपाल(1330)
२४-गुगोलपाल(1352)
२५-अर्जुनपाल(1374)
२६- विक्रमपाल(1396)
२७-अभयन्द्रपाल (1418)
२८- पृथ्वी राज पाल (1440)
२९चन्द्रसेनपाल(1462)
३०-भारतीचन्द्रपाल(1484)
३१-गोपालदास (1506)
३२- द्वारिका दास(1528)
३३-मुकुन्ददास(1550)
३४- युगपाल(1572)
३५- धर्म्मपाल(1616)
३६-रतनपाल(1638)
३७-आरतीपाल ( 1860) 
३८- अजयपाल(1682)
३९-रक्षपाल (1704)
४०-सुधाधरपाल( 1726  )
४१-कँवरपाल(1748 ) 
४२-श्रीगोपाल( 1770  )
४३-माणिक्यपाल( 1792 )
४४-अमोलपाल(1814 ) 
४५-हरिपाल ( 1836)
४६-मधुपाल (1856 )
४७-अर्जुन पाल (1879)
४८-तुलसीपाल (1894)
 गोपाल ,पाल, गोप ,पल्लव ,वल्लव गौश्चर ये अहीरों के गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण थे ।
और वंशमूलक रूप में ये यादव थे ही।
विदित हो की पाल विशेषण अहीरों का बहुत समय तक रहा । आज पाल और धेनुगर विशेषण गडेरी समाज के विशेषण हैं ।

उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक अड़तालीस यदुवंशी पाल मथुरा से करौली तक हुए ।

और पाल उपाधि धारक शासकों की शासन सत्ता रही व्रज क्षेत्र कि परिसीमा करौली रियासत में ---👇

कालान्तरण में जातिवंशमूलक ज्ञान के विलुप्त हो जाने से ये मध्य प्रदेश के अहीर घोषों के समान अपने को राजपूत संघ में सम्मिलित मानने लगे ।
'परन्तु राजपूतों में इनकी कितनी प्रतिष्ठा रही 
ये खुद जानते हैं।

और अपने ही पूर्वज अहीरों से मतभेद करने लगे 
करौली के ये शासक अपने नाम- के बाद पाल उपाधि लगाते थे ।
कुछ ने दास उपाधि को भी लगाया।
_________________________

दास शब्द और गोप शब्द ऋग्वेद के कई सन्दर्भों में यदु और तुर्वसु के लिए आया है । 👇

ऋग्वेद 10/62/10 
उत् दासा परिविषे स्मत्दृष्टी गोपर् ईणसा यदुस्तुर्वशुश्च ।।ऋ०10/62/10 
वस्तुत ये समग्र समीकरण मूलक प्रमाण अहीरों के पक्ष में हैं कि करौली के शासक स्वयं को पाल अथवा गोपाल या गोपोंं के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं ।
दास शब्द या वैदिक सन्दर्भों में अर्थ दाता- है 

           लट्(वर्तमान)परस्मैपदी
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथपुदासतिदासतःदासन्ति
मध्यमपुदाससिदासथःदासथ
उत्तमपुदासामिदासावःदासामः
लिट्(परोक्ष)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुददासददासतुःददासुः
मध्यमपुददासिथददासथुःददास
उत्तमपुददासददासिवददासिम
लुट्(अनद्यतन भविष्यत्)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासितादासितारौदासितारः
मध्यमपुदासितासिदासितास्थःदासितास्थ
उत्तमपुदासितास्मिदासितास्वःदासितास्मः
  लृट्(अद्यतन भविष्यत्)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासिष्यतिदासिष्यतःदासिष्यन्ति
मध्यमपुदासिष्यसिदासिष्यथःदासिष्यथ
उत्तमपुदासिष्यामिदासिष्यावःदासिष्यामः
      लोट्(आज्ञार्थ)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासतात्/दासतुदासताम्दासन्तु
मध्यमपुदास/दासतात्दासतम्दासत
उत्तमपुदासानिदासावदासाम
    लङ्(अनद्यतन भूत)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुअदासत्अदासताम्अदासन्
मध्यमपुअदासःअदासतम्अदासत
उत्तमपुअदासम्अदासावअदासाम
विधिलिङ्
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासेत्दासेताम्दासेयुः
मध्यमपुदासेःदासेतम्दासेत
उत्तमपुदासेयम्दासेवदासेम
आशीर्लिङ्
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदास्यात्दास्यास्ताम्दास्यासुः
मध्यमपुदास्याःदास्यास्तम्दास्यास्त
उत्तमपुदास्यासम्दास्यास्वदास्यास्म
     लुङ्(अद्यतन भूत)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुअदासीत्अदासिष्टाम्अदासिषुः
मध्यमपुअदासीःअदासिष्टम्अदासिष्ट
उत्तमपुअदासिषम्अदासिष्वअदासिष्म
लृङ्(भविष्यत्)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुअदासिष्यत्अदासिष्यताम्अदासिष्यन्
मध्यमपुअदासिष्यःअदासिष्यतम्अदासिष्यत
उत्तमपुअदासिष्यम्अदासिष्यावअदासिष्याम
                     
                         (आत्मनेपदी
 लट्(वर्तमान)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासतेदासेतेदासन्ते
मध्यमपुदाससेदासेथेदासध्वे
उत्तमपुदासेदासावहेदासामहे
लिट्(परोक्ष)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुददासेददासातेददासिरे
मध्यमपुददासिषेददासाथेददासिध्वे
उत्तमपुददासेददासिवहेददासिमहे
लुट्(अनद्यतन भविष्यत्)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासितादासितारौदासितारः
मध्यमपुदासितासेदासितासाथेदासिताध्वे
उत्तमपुदासिताहेदासितास्वहेदासितास्महे
लृट्(अद्यतन भविष्यत्)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासिष्यतेदासिष्येतेदासिष्यन्ते
मध्यमपुदासिष्यसेदासिष्येथेदासिष्यध्वे
उत्तमपुदासिष्येदासिष्यावहेदासिष्यामहे
लोट्(आज्ञार्थ)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासताम्दासेताम्दासन्ताम्
मध्यमपुदासस्वदासेथाम्दासध्वम्
उत्तमपुदासैदासावहैदासामहै
लङ्(अनद्यतन भूत)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुअदासतअदासेताम्अदासन्त
मध्यमपुअदासथाःअदासेथाम्अदासध्वम्
उत्तमपुअदासेअदासावहिअदासामहि
विधिलिङ्
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासेतदासेयाताम्दासेरन्
मध्यमपुदासेथाःदासेयाथाम्दासेध्वम्
उत्तमपुदासेयदासेवहिदासेमहि
आशीर्लिङ्
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुदासिषीष्टदासिषीयास्ताम्दासिषीरन्
मध्यमपुदासिषीष्ठाःदासिषीयास्थाम्दासिषीध्वम्
उत्तमपुदासिषीयदासिषीवहिदासिषीमहि
लुङ्(अद्यतन भूत)
एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुअदासिष्टअदासिषाताम्अदासिषत
मध्यमपुअदासिष्ठाःअदासिषाथाम्अदासिढ्वम्
उत्तमपुअदासिषिअदासिष्वहिअदासिष्महि

_____________________________________________
 संस्कृत ग्रन्थों में कुकुर यादवों के विषय में पर्याप्त आख्यान परक विवरण प्राप्त होता है ।

 कोश ग्रन्थों में इस शब्द की व्युत्पत्ति काल्पनिक रूप से इस प्रकार दर्शायी है ।
____
 कुम् पृथिवीं कुरति त्यजति स्वामित्वेन इति कुकुर । यदुवंशीयनृपभेदे तेषां ययातिशापात् राज्यं नास्तीति पुराणकथा यदु शब्दे दृश्या । 

अर्थात् कुकुर 'वह हैं --जो अपने स्वामित्व के द्वारा 'पृथ्वी का राज को त्यागते हैं क्यों कि यदु के वंशज जिनके पूर्वज यदु ने ययाति के शाप से राज्य प्राप्त नहीं किया । इस रूढ़िवादी परम्पराओं के प्रभाव से ...

'परन्तु हरिवंशपुराण तथा अन्य पुराणों में हैहयवंश के यादव सहस्रबाहु चक्रवर्ती सम्राट भी थे ।

तो यह कहना भी मिथ्या ही है कि यदु तथा उनके वंशज राज्य हीन ही रहे ।

इन्हीं कुकल यादवों की परवर्ती शाखा में भजमान शुचि ,कम्बलबर्हिषतथा अन्धक आदि हुए ।

कमरिया अहीरों का सम्बन्ध कम्बलबर्हिष से है जो आजकल कमलनयन राजा से सम्बद्ध करते हैं ।
कामलिया रूप से यह जादौनों का भी गौत्र है ।
भिरुगुदी जादौन और अहीरों का समान गोत्र है ।

कम्बलबर्हिष का विवरण पुराणों में है ।

 “ भजमानशुचिकम्बलबर्हिषास्तथान्धकस्य पुत्राः” इति (विष्णु पुराण)
 “कुकुरो भजमानश्च शुचिः कम्बलबर्हिषः ।
 “अन्धकात् काश्यदुहिता चतुरोलभतात्मजान् कुकुरं भजमानं च शमं कम्बलबहिषम्” 
(हरिवंश पुराण ३८ अध्याय) । ________________________________________

 विदित हो कि मध्यकालीन वारगाथा काल में नल्ह सिह भाट द्वारा विजय पाल रासो के रचना की गयी 
 नल्हसिंह भाट कृत इस रचना के केवल '42' छन्द उपलब्ध है।

 विजयपाल, जिनके विषय में यह रासो काव्य है, विजयगढ़, करौली के पाल  'यादव' राजा थे।

 इनके आश्रित कवि के रुप में 'नल्ह सिंह' का नाम आता है।
 रचना की भाषा से यह ज्ञात होता है कि यह रचना 17 वीं शताब्दी से पूर्व की नहीं हो सकती है।" 

विजयपाल का समय 1030  के समकालिक है ।
अस्तु काल के प्रभाव से मथुरा को त्याग कर जब विजयपाल के वंशज सम्वत् 1052 में बयाने के पास बनी पहाड़ी की उपत्यका में ये जा बसे | 

क्यों कि बयाना वज्रायन शब्द का तद्भव रूप है । 
और वज्र कृष्ण के प्रपौत्र (नाती) थे ।
और इनके पुरोहित शाण्डिल्य ही थे ।
जो युवा अवस्था में नन्द के पुरोहित भी थे ।

 पुराणों में वज्रनाभ का वर्णन इस प्रकार है :- 
______
श्रीकृष्णप्रपौत्त्रः- यथा   -“ अनिरुद्धात् सुभद्रायां वज्रो नाम नृपोऽभवत् ।
 प्रतिबाहुर्वज्रसुतश्चारुस्तस्य सुतोऽभवत् ॥
( इति गरुडपुराण १४४ अध्याय)....

करौली के यदुवंशी राजा शौरसैनी कहे जाते थे यह कहना भी निर्धारित व मनगड़न्त मिथक है ।

क्योंकि यदुवंशीयों का वंशमूलक विशेषण यादव और व्यवसाय मूलक विशेषण गोप तथा ईसा० पूर्व द्वत्तीय सदी के संस्कृत विद्वानों'ने आभीर या अभीर भी कहा ।
यादवों का घोष विशेषण भी गोष: के अर्थ रूपों गोप का ही वाचक रहा है ।

कुछ यदुवंशी बाद में समय के प्रभाव से मथुरा को त्याग कर और सम्वत् 1052 में बयाने के पास बनी पहाड़ी की उपत्यका में ये जा बसे |
 राजा विजयपाल के पुत्र तहनपाल (त्रिभुवनपाल) ने तहनगढ़ का किला बनवाया ।

 तहनपाल के पुत्र धर्मपाल (द्वितीय) और हरिपाल थे ; जिनका समय संवत् 1227 का है ।
 
कृष्ण जी के प्रपौत्र (नाती )वज्र को मथुरा का अधिपति बनाने का प्रसंग श्रीमद भागवत् के दशम स्कन्ध में आता है और वज्रनाभ के पुरोहित शाण्डिल्य ही थे ।
जो  गर्गाचाय की शिष्य परम्परा में थे।
शाण्डिल्य शण्डिल के पुत्र के थे ।

शडि--इलच् । शाण्डिल्यस्य पितरि मुनिभदे तस्यापत्यं गर्गा० घञ् शण्डिल्य ।

कहा जाता है की लगभग सातवीं शताब्दी के आस पास सिंध से (जहां भाटियों का वर्चस्व था ). 
कुछ यदुवंशी मथुरा वापस आ गए और उन्हों ने यह इलाका पुनः जीत लिया विदित हो की भाटी चारण (करण)बंजारों के रूपान्तरण थे ।

जो वंशमूलक विरुदावलियों का संग्रह और गायन करते थे।
वे भी यदुवंशी हमने लगे ।
 ________
 इन करौली के  यदुवंशी पाल  राजाओं की वंशावली राजा धर्मपाल से शुरू होती है जो की श्री कृष्ण 77वीं पीढ़ी के वंशज थे । 

 यह तथ्य कमान  के चौंसठ खम्बा शिलालेख पर उत्कीर्ण भी है ।
 वर्तमान काल में करौली के राजघराना में पाल राजाओं के वंशज हैं ।

 पाल अहीरों का प्राचीनत्तम विशेषण रहा है।

 पहाड़ों पर बसने वाले डोगरा राजपूतों में भी इनकी कई खांपें मिली हुई हैं ।

 ये ढढोर कबीला तो अहीर से सम्बद्ध हैं  
ढढोर ' यदुवंशी अहीरों की एक प्रसिद्ध गोत्र है जिनका निर्गमन राजस्थान के प्रसिद्ध ढूंढार क्षेत्र से हुआ माना दाता है। 

इनके उर हृदय में दृढ़ता( दृढ़+उर)थी तो लोगों ने इन्हें डिढ़ोर भी कहा जाने लगा 
इन्होंने अपनी वीरता का प्रदर्शन और ड़िढोरा किया इस लिए भी कुछ लोग इन्हें डिढ़ोर कहते ।

राजस्थान में जयपुर के आसपास के क्षेत्र जैसे करौली, धौलपुर, नीमराणा और ढींग (दीर्घपुर) बयाना (वज्रायन) के विशाल क्षेत्र को " ढूंढार " कहा जाता है एवं यहाँ ढूंढारी भाषा बोली जाती है। 
जादौनों की वस्तियाँ राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में  (एटा , अलीगढ़ फीरोजाबाद ) तक हैं ।

आज भी यहाँ ढंढोर अहीरों के गांव यहाँ मौजूद हैं।
 ढढोर अहीर मूलतः द्वारिकाधीश भगवान कृष्ण के प्रपौत्र युवराज वज्रनाभ  के वंशजों में से एक माने जाते हैं एवं इनकी अराध्य देवी कैलादेवी(कंकाली माता) हैं। _______________________________________ भगवान कृष्ण की पीढ़ी के 135 वें पाल या अहीर राजा विजयपाल यदुवंशी के ही विभिन्न पुत्रों में से एक से यह "ढढोर" वंश चला।
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 ऐसा "विजयपाल रासो "में भी वर्णन मिलता है कि यदुवंशी क्षत्रियों के उस समय राजस्थान और बृज में 1444 गोत्र उपस्थित थे।

 इन्हीं विभिन्न 1444 यदुवंशी क्षत्रियों के गोत्र में से एक था ।
 ढढोर गोत्र जिन्होंने मुहम्मद गौरी के राजस्थान पर आक्रमण के समय गुर्जर राजा पृथ्वीराज चौहान की ओर से लड़ते हुए गौरी की सेना से युद्ध किया था। 
आज ये अहीर ही हैं ।

सन् 1018 में मथुरा के महाराज कुलचन्द्र यादव और महमूद गज़नी के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें गज़नी की सेना ने कपट पूर्वक यदुवंशीयों को पराजित कर दिया। 

राजा कुलचंद्र यादव के पुत्र राजा विजयपाल अहीर के नेतृत्व में ज्यादातर यादव बयाना आ गए।
'परन्तु यह शुरुआत ( आगा़ज) मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से ही हो गयी थी ।

और  बयाना शब्द अनिरुद्ध के पुत्र वज्रनाभ के आधार पर है ।

यह  वज्रायन शब्द का तद्भव है ।
 इस लिए विजयपाल ने मथुरा के क्षेत्र में बनी अपनी प्राचीन राजधानी छोड़कर पूर्वी राजस्थान की मानी नामक पहाड़ी के उच्च-स्थली भाग पर बयाना का दुर्ग का निर्माण किया।

 विजयपाल रासो नामक ग्रन्थ में इस राजा के पराक्रम का अच्छा वर्णन है ।

 इसमें लिखा है कि महाराजा विजयपाल का 1045 ई0 में अबूबक्र शाह कान्धारी से घमासान युद्ध हुआ ।

 संवत 1103 में यवनों ने संगठित होकर अबूबक्र कंधारी के नेतृत्व में विजय मंदिर गढ़ पर हमला किया और दुर्ग को चारों तरफ से घेर लिया इस युद्ध में विजयपाल वीरगति को प्राप्त हुये ।

और कालान्तरण में उनके साथ उनके 18 में से 11 पुत्र भी वीरगति को प्राप्त हुए पराजय का समाचार किले में पहुचते ही महाराजा विजयपाल की रानियों ने राजपरिवार की अन्य स्त्रियों एवं किले की सैकड़ो अहीर क्षत्राणियों के साथ अग्नि की प्रचंड ज्वाला में कूद कर जौहर कर लिया शायद ही देश के इतिहास में इतना बड़ा जौहर हुआ होगा 

यह चित्तौड़ के जौहर से भी बड़ा जौहर था जिसके साक्ष्य आज भी विजयमन्दिरगढ़ किले में मौजूद है यह घटना फाल्गुन वदी तीज दिन सोमवार संवत 1103 को घटित हुई थी । _________________________________________

 सन् 1196 ई0 सन् में मोहम्मद गौरी ने बयाना( विजयमन्दिरगढ़) और तिमनगढं पर हमला किया जिसमे विजयपाल यदुवंशी के पीढ़ी के शासक राजा कुंवरपाल सिंह यदुवंशी के नेतृत्व में यादव सेना ने मोहम्मद गौरी की सेना का डटकर रणभूमि में मुकबला किया ;
 लेकिन  कम मात्रा रह गये सेना के लोगों को पराजित होकर वहाँ से पलायन करना पड़ा।

 इसके पश्चात वहाँ से पलायन कर राजा कुंवरपाल सिंह यदुवंशी ने बचे हुए यादव सेना और सामंतों के साथ चित्तौड़ में शरण ली ।

 यादव रजवाड़ों ने चित्तौड़ के दुर्ग में अपने कुल देवी माँ योगमाया गोप कन्या विन्ध्यावासिनी के भव्य मंदिर का निमार्ण करवाया जो आज कंकाली माता के मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।

 राजा कुवंरपाल अहीर के पुत्र हुए महिपाल सिंह अन्य अहीरों के साथ राजस्थान के कोटा से 22 किलो मीटर दूर पाटन में आये तथा यहाँ तक यदुवंशी अभीरों के 14 44 गोत्र एक साथ मौजूद थे । 

तथा यहाँ केशवराय जी के विशाल मन्दिर का निर्माण कराया इस मन्दिर के नाम से ही आज वह शहर केशवराय पाटन शहर के नाम से जाना जाता है।

 पाटन से यादव समाज के लोग बिखर गए और राजा कुंवरपाल यदुवंशी के जेष्ठ पुत्र महिपाल सिंह यादव के नेतृत्व में यादव वंश के 86 गोत्र नर्मदांचल में आकर बस गए और शिवपुरी में स्वतंत्र जागीर स्थापित करी।
यह अहीर अस्मिता को भूलने लगे और राजपूत संघ में सम्मिलित होने लगे ।

 इन्हीं 1444 गोत्रों में से एक गोत्र है ढंढोर गोत्र जो मुहम्मद गौरी से युद्ध के बाद राजस्थान से पलायन कर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के गोरखपुर, आज़मगढ़ आदि इलाकों में जा बसे।
और आज भी स्वयं को अहीर ही कहते हैं ।

 करौली के सस्थापक कुकुर यादवों की शाखा से लोग थे यद्यपि ये लोग चरावाहों की परम्पराओं का निर्वहन यदु को द्वारा स्थापित होने से करते थे ।

 क्यों कि यदु ने कभी भी राज्य स्वीकार नहीं किया ।
 वे गोप थे और हमेशा गायों से घिरे रहते थे ।

 ऋग्वेद के दशम मण्डल के 62 वें सूक्त की दशवीं ऋचा में देखें-- " उत् दासा परिविषे स्मत्दृष्टी गोपर् ईणसा यदुस्तुर्वशुश्च मामहे ।।ऋ०10/62/10 ।

और यदुवंश के सूर्य भगवान श्रीकृष्ण 'ने स्वयं कहा कि मेंने जन्म गोपों में लिया ताकि इस संसार में कुमार्ग पर स्थित हुए  दुरात्‍माओं का दमन कर सकूँ 👇

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हरिवंशपुराण विष्णुपर्व हरिवंश पुराण विष्णु पर्व (संस्कृत) अध्याय 11 श्लोक 56-60
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एतदर्थं च वासोऽयं व्रजेऽस्मिन् गोपजन्‍म च।
अमीषामुत्‍पथस्‍थानां निग्रहार्थं दुरात्‍मनाम्।।58।।
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 इसलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है और  मैंने गोपों में जन्म लिया ताकि इस संसार में कुमार्ग पर स्थित हुए इन दुरात्‍माओं का दमन कर सकूँ 
।।58।।
 
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इस प्रकार श्रीमहाभारत के खिलभाग हरिवंश के अन्‍तर्गत विष्‍णु पर्व में बाललीला के प्रसंग में यमुना वर्णन नामक ग्‍यारहवां अध्‍याय पूरा हुआ ।

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्‍णुपर्वणि बालचरिते यमुनावर्णनं नामैकादशोअध्‍याय:।

यहूदियों के जादौन पठानों में भी मणिहार बंजारे हैं ।
मध्य काल  में जादौं भी जब ब्राह्मणों'ने जब -नीच जातियों में घोषित किए तो कुछ नीचे ही बने रहे जो बंजारे कहलाऐ और जो मौका देखकर राजपूत संघ में सम्मिलित हो गये उन्होंने खुद को क्षत्रिय मानना प्रारम्भ कर दिया जादौनों की ज्यादा तर कबीले अफगानिस्तान सिंध और पश्चिमी भारत के ही हैं ।
दरअसल यह एक लम्बा अन्तराल हो गया जादौन राजपूत 'न लगाकर ठाकुर टाइटल लगाते हैं ।
जो कि तुर्की आर्मेनियन व फारसी ''में ताक्वुर जमीदारी लकब है ।

भारतीय जादौन ये गादौन / अफगानिस्तान के पठानों और भारतीय व्रज प्रान्तों के अहीरों का मिलमा -जुलमा रूप है।
निम्नलिखित सन्दर्भों में जादौं का द्वितीय अर्थ नीचकुल में उत्पन्न जादौन बंजारे की तरफ संकेत करता है👇
  ईरानी भाषा में दस्यु तथा दास शब्द क्रमश दह्यु तथा दाहे के रूप में विद्यमान हैं ।

ऋग्वेद में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास और गोप के रूप में सम्बोधित किया गया है।
दास शब्द की व्याख्या विवादित है ।
वर्तमान में दास भक्त का वाचक और गोप गो- पालक का वाचक है ।
यह तथ्य हम पूर्व में वर्णित कह चुके हैं ।

 अमरकोश में जो गुप्त काल की रचना है ;उसमें अहीरों के अन्य नाम-पर्याय वाची रूप में गोप शब्द भी वर्णित हैं। 

आभीर पुल्लिंग विशेषण संज्ञा गोपालः समानार्थक: 
१-गोपाल,२-गोसङ्ख्य, ३-गोधुक्, ४-आभीर,५-वल्लव,६-गोविन्द, ७-गोप ८ - गौश्चर: 
(2।9।57।2।5)
 अमरकोशः) 

अत: साक्ष्य अहीरों के पक्ष में ही अधिक हैं यदुवंशी होने के और सम्पूर्ण भारत में अहीर ही यादव या गोप के रूप में मान्य हैं ।

'परन्तु जादौनों के रूप में कोई पौराणिक साक्ष्य नहीं है ।
इनकी निकासी भी आठवीं सदीं के मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से है ।

और सोलहवीं सदी के बाद से ये लोग राजपूत संघ में सम्मिलित हो गये । 

प्रसिद्ध समाज शास्त्रीयों ने भारतीय इतिहास में जादौन जन-जाति को चारण बंजारों का एक छोटे राठौड़ों का समुदाय रूप में वर्गीकृत किया है । 🌸
अर्थात्‌ राठौड़ और जादौन चारण बंजारों के रूपान्तरण हैं ।
अफगानिस्तान में जादौन पशु भेड़ बकरी पालक पठानों का समुदाय है ।
 जो स्वयं को यहूदियों से उत्पन्न मानते हैं ।
और यहूदी भी यादवों का रूपान्तरण ही हैं।

इनके विषय में आगे अधिक स्पष्ट किया जाएगा ! 

विदित हो कि यादवों की एक शाखा कुकुर कहलाती थी  ये लोग अन्धक राजा के पुत्र कुकुर के वंशज माने जाते हैं  दाशार्ह देशबाल -दशवार , ,सात्वत ,जो कालान्तरण में हिन्दी की व्रज बोली क्रमशः सावत ,सावन्त , कुक्कुर कुर्रा , कुर्रू आदि रूपों परिवर्तित हो गये ।

 ये वस्तुत यादवों के कबीलागत विशेषण हैं ।
 कुकुर एक प्रदेश जहाँ कुक्कुर जाति के यादव रहते थे यह देश राजपूताने के अन्तर्गत है ; 
जो कभी मत्स्या देश था । 

और कालान्तरण में उसके वंशजों द्वारा नामकरण हुआ । कुकुर अवलि =कुकुरावलि --कुरावली---करौली।

'परन्तु मुगल काल में पारसी में करौल का अर्थ छावनी या सैनिक पढ़ाब  होने से इस स्थान पर मुगलों के सैनिक पढ़ाब डाल कर रहते थे इस लिए भी इसे करौली या करौल कहा गया । 

ध्यान रखें
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करौली राजस्‍थान का ऐतिहासिक नगर है।
 यह करौली जिला का मुख्यालय है। 
इसकी स्‍थापना 955 ई. के आसपास राजा विजय पाल ने की थी जिनके बारे में कहा जाता है कि वे भगवान कृष्‍ण के वंशज थे। 

एक समय जलेसर व करौली राज्यों पर जादौन राज परिवारों का शासन रहा है।

 इनका निकास मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से है। इसका प्रमाण  सन्दर्भ निम्नलिखित रूप में देखें👇
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[1] Michelutti, Lucia (2008). The Vernacularisation of Democracy: Politics, Caste, and Religion in India. Routledge. पृ॰ 43. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-41546-732-2.

यह ब्रह्म पाल दशवें अहीर/ पाल शासक थे 
आभीर पाल शासक की श्रृँखला क्रम इस प्रकार है ।

१-धर्म्मपाल

२-सिंहपाल

३-जगपाल 

४- नरपाल

५-संग्रामपाल

६-कुन्तपाल

७-भौमपाल

८-सोचपाल

९-पोचपाल

१०-ब्रह्मपाल

११-जैतपाल ।

करौली का इतिहास प्रारम्भ होता है ब्रह्म पाल और विजयपाल आभीर शासकों से ---

यह विजयपाल बारहवाँ पाल शासक था ---
 जिनका शासन-समापन समय 1030 ई०सन्  के समकालिक है विजयपाल से तुलसी पाल तक पैंतीस -छत्तीस पाल शासकों का राज रहा ।

१२- त्रिभुवनपाल(1000)
१३- विजयपाल (1030)
१४-धर्मपाल (1090)
१५- कुँवरपाल (1120)
१६- अनंगपाल(1122 )
१७-अजयपाल(1150)
१८-हरिपाल ( 1180)
१९-सुघड़पाल(1196)
२०-पृथ्वी पाल (1242)
२१-राजपाल (1264)
२२- त्रिलोकपाल(1284)
२३-विप्पलपाल(1330)
२४-गुगोलपाल(1352)
२५-अर्जुनपाल(1374)
२६- विक्रमपाल(1396)
२७-अभयन्द्रपाल (1418)
२८- पृथ्वी राज पाल (1440)
२९चन्द्रसेनपाल(1462)
३०-भारतीचन्द्रपाल(1484)
३१-गोपालदास (1506)
३२- द्वारिका दास(1528)
३३-मुकुन्ददास(1550)
३४- युगपाल(1572)
३५- धर्म्मपाल(1616)
३६-रतनपाल(1638)
३७-आरतीपाल ( 1860) 
३८- अजयपाल(1682)
३९-रक्षपाल (1704)
४०-सुधाधरपाल( 1726  )
४१-कँवरपाल(1748 ) 
४२-श्रीगोपाल( 1770  )
४३-माणिक्यपाल( 1792 )
४४-अमोलपाल(1814 ) 
४५-हरिपाल ( 1836)
४६-मधुपाल (1856 )
४७-अर्जुन पाल (1879)
४८-तुलसीपाल (1894)
गोपल,पाल, गोप ,पल्लव, वल्लव ये अहीरों के गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण थे 
और वंशमूलक रूप में ये यादव थे ही।

उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक अड़तालीस यदुवंशी पाल उपाधि धारक शासकों की शासन सत्ता रही व्रज क्षेत्र कि परिसीमा करौली रियासत में ---👇

कालान्तरण में जातिवंशमूलक ज्ञान के विलुप्त हो जाने से ये मध्य प्रदेश के अहीर घोषों के समान अपने को राजपूत संघ में सम्मिलित मानने लगे ।

और अपने ही पूर्वज अहीरों से मतभेद करने लगे 
करौली के ये शासक अपने नाम- के बाद पाल उपाधि लगाते थे ।
कुछ ने दास उपाधि को भी लगाया।
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दास शब्द और गोप शब्द ऋग्वेद के कई सन्दर्भों में यदु और तुर्वसु के लिए आया है । 👇

ऋग्वेद 10/62/10 
उत् दासा परिविषे स्मत्दृष्टी गोपर् ईणसा यदुस्तुर्वशुश्च ।।ऋ०10/62/10 
वस्तुत ये समग्र समीकरण मूलक प्रमाण अहीरों के पक्ष में हैं कि करौली के शासक स्वयं को पाल अथवा गोपाल या गोपोंं के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं 

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 संस्कृत ग्रन्थों में कुकुर यादवों के विषय में पर्याप्त आख्यान परक विवरण प्राप्त होता है ।

 कोश ग्रन्थों में इस शब्द की व्युत्पत्ति काल्पनिक रूप से इस प्रकार दर्शायी है ।
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 कुम् पृथिवीं कुरति त्यजति स्वामित्वेन इति कुकुर । यदुवंशीयनृपभेदे तेषां ययातिशापात् राज्यं नास्तीति पुराणकथा यदु शब्दे दृश्या । 

अर्थात् कुकुर 'वह हैं --जो अपने स्वामित्व के द्वारा 'पृथ्वी का राज को त्यागते हैं क्यों कि यदु के वंशज जिनके पूर्वज यदु ने ययाति के शाप से राज्य प्राप्त नहीं किया । 
इस रूढ़िवादी परम्पराओं के प्रभाव से ...

'परन्तु हरिवंशपुराण तथा अन्य पुराणों में हैहयवंश के यादव सहस्रबाहु चक्रवर्ती सम्राट भी थे ।

तो यह कहना भी मिथ्या ही है कि यदु तथा उनके वंशज राज्य हीन ही रहे ।

इन्हीं कुकल यादवों की परवर्ती शाखा में भजमान शुचि ,कम्बलबर्हिषतथा अन्धक आदि हुए ।

कमरिया अहीरों का सम्बन्ध कम्बलबर्हिष से है जो आजकल कमलनयन राजा से सम्बद्ध करते हैं ।
कामलिया रूप से यह जादौनों का भी गौत्र है ।
भिरुगुदी जादौन और अहीरों का समान गोत्र है ।

कम्बलबर्हिष का विवरण पुराणों में है ।

 “ भजमानशुचिकम्बलबर्हिषास्तथान्धकस्य पुत्राः” इति (विष्णु पुराण)
 “कुकुरो भजमानश्च शुचिः कम्बलबर्हिषः ।
 “अन्धकात् काश्यदुहिता चतुरोलभतात्मजान् कुकुरं भजमानं च शमं कम्बलबहिषम्” 
(हरिवंश पुराण ३८ अध्याय) । ________________________________________

 विदित हो कि मध्यकालीन वारगाथा काल में नल्ह सिह भाट द्वारा विजय पाल रासो के रचना की गयी 
 नल्हसिंह भाट कृत इस रचना के केवल '42' छन्द उपलब्ध है।

 विजयपाल, जिनके विषय में यह रासो काव्य है, विजयगढ़, करौली के पाल  'यादव' राजा थे।

 इनके आश्रित कवि के रुप में 'नल्ह सिंह' का नाम आता है।
 रचना की भाषा से यह ज्ञात होता है कि यह रचना 17 वीं शताब्दी से पूर्व की नहीं हो सकती है।" 

विजयपाल का समय 1030  के समकालिक है ।
अस्तु काल के प्रभाव से मथुरा को त्याग कर जब विजयपाल के वंशज सम्वत् 1052 में बयाने के पास बनी पहाड़ी की उपत्यका में ये जा बसे | 

क्यों कि बयाना वज्रायन शब्द का तद्भव रूप है । 
और वज्र कृष्ण के प्रपौत्र (नाती) थे ।
और इनके पुरोहित शाण्डिल्य ही थे ।
जो युवा अवस्था में नन्द के पुरोहित भी थे ।
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प्रथम (1) अध्याय

श्रीमद्भागवत माहात्म्य: प्रथम अध्यायः श्लोक 13-27 का हिन्दी अनुवाद

वज्रनाभ ने कहा—‘महराज! आप मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, वह सर्वथा आपके अनुरूप है। 
आपके पिता ने भी मुझे धनुर्वेद की शिक्षा देकर मेरा महान् उपकार किया है । 
इसलिये मुझे किसी बात की तनिक भी चिन्ता नहीं; क्योंकि उनकी कृपा से मैं क्षत्रियोचित शूरवीरता से भलीभाँति सम्पन्न हूँ। 
मुझे केवल एक बात की बहुत बड़ी चिन्ता है, आप उसके सम्बन्ध में कुछ विचार कीजिये ।
 यद्यपि मैं मथुरा मण्डल के राज्य पर अभिषिक्त हूँ, तथापि मैं यहाँ निर्जन वन में ही रहता हूँ। 
इस बात मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँ की प्रजा कहाँ चली गयी; क्योंकि राज्य का सुख तो तभी है, जब प्रजा रहे’ । 

जब वज्रनाभ ने परीक्षित् से यह बात कही, तब उन्होंने वज्रनाभ का सन्देह मिटाने के लिये महर्षि शाण्डिल को बुलवाया। 
ये ही महर्षि शाण्डिल पहले नन्द आदि यदुवंशी गोपों के पुरोहित थे ।
 परीक्षित् का सन्देश पाते ही महर्षि शाण्डिल अपनी कुटी छोड़कर वहाँ आ पहुँचे। 
वज्रनाभ ने विधिपूर्वक उनका स्वागत-सत्कार किया और वे एक ऊँचे आसन पर विराजमान हुए ।
 राजा परीक्षित् ने वज्रनाभ की बात उन्हें कह सुनायी। इसके बाद महर्षि शाण्डिल बड़ी प्रसन्नता से उनको सान्त्वना देते हुए कहने लगे— शाण्डिल ने कहा—प्रिय परीक्षित् और वज्रनाभ !
 मैं तुम लोगों से वज्रभूमि का रहस्य बतलाता हूँ।
 तुम दत्तचित्त होकर सुनो। 
‘व्रज’ शब्द का अर्थ है व्याप्ति। 
इस वृद्धवचन के अनुसार व्यापक होने के कारण ही इस भूमि का नाम ‘व्रज’ पड़ा है ।
 सत्व, रज, तम—इन तीन गुणों से अतीत जो परब्रम्ह है, वही व्यापक है। 
इसलिये उसे ‘व्रज’ कहते हैं।
 वह सदानन्दस्वरुप, परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है।
 जीवन्मुक्त पुरुष उसी में स्थित रहते हैं । 
इस परब्रम्हस्वरूप व्रजधाम में नन्दनन्दन भगवान श्रीकृष्ण का निवास है। 
उनका एक-एक अंग सच्चिदानन्दस्वरुप है। 
वे आत्माराम और आप्तकाम हैं।
 प्रेम रस में डूबे हुए रसिकजन ही उनका अनुभव करते हैं । 
भगवान श्रीकृष्ण की आत्मा है—राधिका; उनसे रमण करने के कारण ही रहस्य रस के मर्मज्ञ ज्ञानी पुरुष उन्हें ‘आत्माराम’ कहते हैं । ‘काम’ शब्द का अर्थ हिया कामना—अभिलाषा; व्रज में भगवान श्रीकृष्ण के वांछित पदार्थ हैं—
गौएँ, ग्वालबाल, गोपियाँ और उनके साथ लीला-विहार आदि; वे सब-के-सब यहाँ नित्य प्राप्त हैं। इसी से श्रीकृष्ण को ‘आप्तकाम’ कहा गया है । भगवान श्रीकृष्ण की यह रहस्य-लीला प्रकृति से परे है। वे जिस समय प्रकृति के साथ खेलने लगते हैं, उस समय दूसरे लोग भी उनकी लीला का अनुभव करते हैं ।
 प्रकृति के साथ होने वाली लीला में ही रजोगुण, सत्वगुण और तमोगुण के द्वारा सृष्टि, स्थिति और प्रलय की प्रतीति होती है। 
इस प्रकार यह निश्चय होता है कि भगवान की लीला दो प्रकार की है—
एक वास्तवी और दूसरी व्यावहारिकी ।
 वास्तवी लीला स्वयंवेद्द है—उसे स्वयं भगवान और उनके रसिक भक्तजन ही जानते हैं। 
जीवों के सामने जो लीला होती है, वह व्यावहारिकी लीला है। 
वास्तवी लीला के बिना व्यावहारिकी लीला नहीं हो सकती; परन्तु व्यावहारिकी लीला का वास्तविक लीला के राज्य में कभी प्रवेश नहीं हो सकता ।
 तुम दोनों भगवान की जिस लीला को देख रहे हो, यह व्यावहारिकी लीला है।
 यह पृथ्वी और स्वर्ग आदि लोक इसी लीला के अन्तर्गत हैं। 
इसी पृथ्वी पर यह मथुरा मण्डल है ।
यद्यपि व्रज शब्द की काल्पनिक मनगड़न्त है ।
व्रज का मूल अर्थ गायों का बाड़ा है।👇

व्रजःपुल्लिंग शब्द (व्रज गतौ + “गोचरसंचरेति ।३ । ३ । ११९ । इति घप्रत्ययेन निपातनात् साधुः ।) अर्थात्‌ जहाँ गायें चरती या चलती हैं वह स्थान व्रज है 
समूहः । इत्यमरःकोश ॥ (यथा, महाभारते । १ । १८९ । १२ । “ततः प्रतापः सुमहान् शब्दश्चैव विभावसोः । प्रादुरासीत् तदा तेन बुबुधे स जनव्रजः ॥) गोष्ठम् । (यथा, माघे । २ । ६४ । 
 पुराणों में वज्रनाभ का वर्णन इस प्रकार है :- 
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श्रीकृष्णप्रपौत्त्रः- यथा   -“ अनिरुद्धात् सुभद्रायां वज्रो नाम नृपोऽभवत् ।
 प्रतिबाहुर्वज्रसुतश्चारुस्तस्य सुतोऽभवत् ॥
( इति गरुडपुराण १४४ अध्याय)....

करौली के यदुवंशी राजा शौरसैनी कहे जाते थे यह कहना भी निर्धारित व मनगड़न्त मिथक है ।

क्योंकि यदुवंशीयों का वंशमूलक विशेषण यादव और व्यवसाय मूलक विशेषण गोप तथा ईसा० पूर्व द्वत्तीय सदी के संस्कृत विद्वानों'ने आभीर या अभीर भी कहा ।
यादवों का घोष विशेषण भी गोष: के अर्थ रूपों गोप का ही वाचक रहा है ।

कुछ यदुवंशी बाद में समय के प्रभाव से मथुरा को त्याग कर और सम्वत् 1052 में बयाने के पास बनी पहाड़ी की उपत्यका में ये जा बसे |
 राजा विजयपाल के पुत्र तहनपाल (त्रिभुवनपाल) ने तहनगढ़ का किला बनवाया ।

 तहनपाल के पुत्र धर्मपाल (द्वितीय) और हरिपाल थे ; जिनका समय संवत् 1227 का है ।
 
कृष्ण जी के प्रपौत्र (नाती )वज्र को मथुरा का अधिपति बनाने का प्रसंग श्रीमद भागवत् के दशम स्कन्ध में आता है और वज्रनाभ के पुरोहित शाण्डिल्य ही थे ।
जो  गर्गाचाय की शिष्य परम्परा में थे।
शाण्डिल्य शण्डिल के पुत्र के थे ।

शडि--इलच् । शाण्डिल्यस्य पितरि मुनिभदे तस्यापत्यं गर्गा० घञ् शण्डिल्य

कहा जाता है की लगभग सातवीं शताब्दी के आस पास सिंध से (जहां भाटियों का वर्चस्व था ). 
कुछ यदुवंशी मथुरा वापस आ गए और उन्हों ने यह इलाका पुनः जीत लिया विदित हो की भाटी चारण (करण)बंजारों के रूपान्तरण थे ।

जो वंशमूलक विरुदावलियों का संग्रह और गायन करते थे।
वे भी यदुवंशी हमने लगे ।
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 इन करौली के  यदुवंशी पाल  राजाओं की वंशावली राजा धर्मपाल से शुरू होती है जो की श्री कृष्ण 77वीं पीढ़ी के वंशज थे । 

 यह तथ्य कमान  के चौंसठ खम्बा शिलालेख पर उत्कीर्ण भी है ।
 वर्तमान काल में करौली के राजघराना में पाल राजाओं के वंशज हैं ।

 पाल अहीरों का प्राचीनत्तम विशेषण रहा है।

 पहाड़ों पर बसने वाले डोगरा राजपूतों में भी इनकी कई खांपें मिली हुई हैं ।

 ये ढढोर कबीला तो अहीर से सम्बद्ध हैं  
ढढोर ' यदुवंशी अहीरों की एक प्रसिद्ध गोत्र है जिनका निर्गमन राजस्थान के प्रसिद्ध ढूंढार क्षेत्र से हुआ माना दाता है। 

इनके उर हृदय में दृढ़ता( दृढ़+उर)थी तो लोगों ने इन्हें डिढ़ोर भी कहा जाने लगा 
इन्होंने अपनी वीरता का प्रदर्शन और ड़िढोरा किया इस लिए भी कुछ लोग इन्हें डिढ़ोर कहते ।

राजस्थान में जयपुर के आसपास के क्षेत्र जैसे करौली, धौलपुर, नीमराणा और ढींग (दीर्घपुर) बयाना (वज्रायन) के विशाल क्षेत्र को " ढूंढार " कहा जाता है एवं यहाँ ढूंढारी भाषा बोली जाती है। 
जादौनों की वस्तियाँ राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में  (एटा , अलीगढ़, फीरोजाबाद , हाथरस , बुलन्दशहर ) तक हैं ।

आज भी यहाँ ढंढोर अहीरों के गांव यहाँ मौजूद हैं।
 ढढोर अहीर मूलतः द्वारिकाधीश भगवान कृष्ण के प्रपौत्र युवराज वज्रनाभ  के वंशजों में से एक माने जाते हैं एवं इनकी अराध्य देवी कैलादेवी(कंकाली माता) हैं। _______________________________________ भगवान कृष्ण की पीढ़ी के 135 वें पाल या अहीर राजा विजयपाल यदुवंशी के ही विभिन्न पुत्रों में से एक से यह "ढढोर" वंश चला।
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 ऐसा "विजयपाल रासो "में भी वर्णन मिलता है कि यदुवंशी क्षत्रियों के उस समय राजस्थान और बृज में 1444 गोत्र उपस्थित थे।

 इन्हीं विभिन्न 1444 यदुवंशी क्षत्रियों के गोत्र में से एक था ।
 ढढोर गोत्र जिन्होंने मुहम्मद गौरी के राजस्थान पर आक्रमण के समय गुर्जर राजा पृथ्वीराज चौहान की ओर से लड़ते हुए गौरी की सेना से युद्ध किया था। 
आज ये अहीर ही हैं ।

सन् 1018 में मथुरा के महाराज कुलचन्द्र यादव और महमूद गज़नी के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें गज़नी की सेना ने कपट पूर्वक यदुवंशीयों को पराजित कर दिया। 

राजा कुलचंद्र यादव के पुत्र राजा विजयपाल अहीर के नेतृत्व में ज्यादातर यादव बयाना आ गए।
'परन्तु यह शुरुआत ( आगा़ज) मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से ही हो गयी थी ।

और  बयाना शब्द अनिरुद्ध के पुत्र वज्रनाभ के आधार पर है ।

यह  वज्रायन शब्द का तद्भव है ।
 इस लिए विजयपाल ने मथुरा के क्षेत्र में बनी अपनी प्राचीन राजधानी छोड़कर पूर्वी राजस्थान की मानी नामक पहाड़ी के उच्च-स्थली भाग पर बयाना का दुर्ग का निर्माण किया।

 विजयपाल रासो नामक ग्रन्थ में इस राजा के पराक्रम का अच्छा वर्णन है ।

 इसमें लिखा है कि महाराजा विजयपाल का 1045 ई0 में अबूबक्र शाह कान्धारी से घमासान युद्ध हुआ ।

 संवत 1103 में यवनों ने संगठित होकर अबूबक्र कंधारी के नेतृत्व में विजय मंदिर गढ़ पर हमला किया और दुर्ग को चारों तरफ से घेर लिया इस युद्ध में विजयपाल वीरगति को प्राप्त हुये ।

और कालान्तरण में उनके साथ उनके 18 में से 11 पुत्र भी वीरगति को प्राप्त हुए पराजय का समाचार किले में पहुचते ही महाराजा विजयपाल की रानियों ने राजपरिवार की अन्य स्त्रियों एवं किले की सैकड़ो अहीर क्षत्राणियों के साथ अग्नि की प्रचंड ज्वाला में कूद कर जौहर कर लिया शायद ही देश के इतिहास में इतना बड़ा जौहर हुआ होगा 

यह चित्तौड़ के जौहर से भी बड़ा जौहर था जिसके साक्ष्य आज भी विजयमन्दिरगढ़ किले में मौजूद है यह घटना फाल्गुन वदी तीज दिन सोमवार संवत 1103 को घटित हुई थी । _________________________________________

 सन् 1196 ई0 सन् में मोहम्मद गौरी ने बयाना( विजयमन्दिरगढ़) और तिमनगढं पर हमला किया जिसमे विजयपाल यदुवंशी के पीढ़ी के शासक राजा कुंवरपाल सिंह यदुवंशी के नेतृत्व में यादव सेना ने मोहम्मद गौरी की सेना का डटकर रणभूमि में मुकबला किया ;
 लेकिन  कम मात्रा रह गये सेना के लोगों को पराजित होकर वहाँ से पलायन करना पड़ा।

 इसके पश्चात वहाँ से पलायन कर राजा कुंवरपाल सिंह यदुवंशी ने बचे हुए यादव सेना और सामंतों के साथ चित्तौड़ में शरण ली ।

 यादव रजवाड़ों ने चित्तौड़ के दुर्ग में अपने कुल देवी माँ योगमाया गोप कन्या विन्ध्यावासिनी के भव्य मंदिर का निमार्ण करवाया जो आज कंकाली माता के मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।

 राजा कुवंरपाल अहीर के पुत्र हुए महिपाल सिंह अन्य अहीरों के साथ राजस्थान के कोटा से 22 किलो मीटर दूर पाटन में आये तथा यहाँ तक यदुवंशी अभीरों के 14 44 गोत्र एक साथ मौजूद थे । 

तथा यहाँ केशवराय जी के विशाल मन्दिर का निर्माण कराया इस मन्दिर के नाम से ही आज वह शहर केशवराय पाटन शहर के नाम से जाना जाता है।

 पाटन से यादव समाज के लोग बिखर गए और राजा कुंवरपाल यदुवंशी के जेष्ठ पुत्र महिपाल सिंह यादव के नेतृत्व में यादव वंश के 86 गोत्र नर्मदांचल में आकर बस गए और शिवपुरी में स्वतंत्र जागीर स्थापित करी।
यह अहीर अस्मिता को भूलने लगे और राजपूत संघ में सम्मिलित होने लगे ।

🌸
इन्हीं 1444 गोत्रों में से एक गोत्र है ढंढोर गोत्र जो मुहम्मद गौरी से युद्ध के बाद राजस्थान से पलायन कर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के गोरखपुर, आज़मगढ़ आदि इलाकों में जा बसे।
और आज भी स्वयं को अहीर ही कहते हैं ।

 करौली के सस्थापक कुकुर यादवों की शाखा से लोग थे यद्यपि ये लोग चरावाहों की परम्पराओं का निर्वहन यदु को द्वारा स्थापित होने से करते थे ।

 क्यों कि यदु ने कभी भी राज्य स्वीकार नहीं किया ।
 वे गोप थे और हमेशा गायों से घिरे रहते थे ।

 ऋग्वेद के दशम मण्डल के 62 वें सूक्त की दशवीं ऋचा में देखें-- " उत् दासा परिविषे स्मत्दृष्टी गोपर् ईणसा यदुस्तुर्वशुश्च मामहे ।।ऋ०10/62/10 ।

और यदुवंश के सूर्य भगवान श्रीकृष्ण 'ने स्वयं कहा कि मेंने जन्म गोपों में लिया ताकि इस संसार में कुमार्ग पर स्थित हुए  दुरात्‍माओं का दमन कर सकूँ 👇

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हरिवंशपुराण विष्णुपर्व हरिवंश पुराण विष्णु पर्व (संस्कृत) अध्याय 11 श्लोक 56-60
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एतदर्थं च वासोऽयं व्रजेऽस्मिन् गोपजन्‍म च।
अमीषामुत्‍पथस्‍थानां निग्रहार्थं दुरात्‍मनाम्।।58।।
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 इसलिए व्रज में मेरा यह निवास हुआ है और  मैंने गोपों में जन्म लिया ताकि इस संसार में कुमार्ग पर स्थित हुए इन दुरात्‍माओं का दमन कर सकूँ 
।।58।।
 
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इस प्रकार श्रीमहाभारत के खिलभाग हरिवंश के अन्‍तर्गत विष्‍णु पर्व में बाललीला के प्रसंग में यमुना वर्णन नामक ग्‍यारहवां अध्‍याय पूरा हुआ ।

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्‍णुपर्वणि बालचरिते यमुनावर्णनं नामैकादशोअध्‍याय:।
इतिहास लेखक मोहन दास गुप्ता ने लिखा की ये कभी भी  राजपूत सूचक विशेषण सिंह अपने नाम के पश्चात् नहीं लगाते थे केवल पाल विशेषण लगाते थे ।
क्योंकि सिंह गाय को कैसे छोड़ सकता है ।

 ये स्वयं को गोपाल कृष्ण का वंशज मानते थे । गोपाल , पाल गोप तथा आभीर केवल यादवों के व्यवसाय और प्रवृत्तिपरक विशेषण हैं ।

 और आभीर वीरता सूचक प्रवृत्ति का सूचक है । 
करौली के मन्दिर में गाय और भेड़ यदुवंशी शासकों के पाल गोपाल रूपों की स्मृति के आज तक जीवन्त अवशेष हैं। 

इसलिए जादौन समाज का यह दावा निराधार व भ्रान्ति मूलक है कि अहीर यदुवंशी नहीं होते हैं ।
जबकि स्वयं जादौन जन-जाति चारण बंजारों का उप समुदाय है ।
चारण या करण तथा भाट ये बंजारों और वंशमूलक विरुदावलियों का संग्रह और गायन करने वाले हैं ये कालान्तरण में स्वयं को राजपूत भी कहने लगे 

क्योंकि भारतीय पुराणों में विशेषत: ब्रह्मवैवर्तपुराणम् तथा स्कन्द पुराण के सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26 में राजपूत की उत्पत्ति दर्शायी है ।👇
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यद्यपि विकीपीडिया पर विभिन्न इतिहास कारों के हबाले सन्दर्भ दिए गये हैं कि जादौन अहीरों की सन्तान हैं 
जादौन या जादों अहीर[1]❣
ब्रह्मपाल अहीर से जिनका उदय हुआ है।[5][6]
सन्दर्भ 5)-
[5] Cunningham, Joseph Davey; Garrett, H. L. O. A History of the Sikhs from the Origin of the Nation to the Battles of the Sutlej (अंग्रेज़ी में). Asian Educational Services. पृ॰ 7.

 आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788120609501. अभिगमन तिथि 24 April 2016. Quote: "The little chiefship of Karauli. 

The raja is admitted by the genealogists to be of the Yadu or lunar race, but people sometimes say that his being an Ahir or cowherd forms his only relation to Krishna, the pastoral Apollo of the Indians." 

The Yadu Ahir are descendants of Lord Krishna, founded in 900 CE by Raja Brahm Pal. 

The town itself dates from 1348, and is located in a geographical setting naturally defended by ravines on the north and east, and is further protected by a great wall   “Karauli”।
 ब्रिटैनिका विश्वकोष (11th) 15। (1911)। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस
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सन्दर्भित -
[५] कनिंघम, जोसेफ डेवी; गैरेट, एच। एल। ओ। ए हिस्ट्री ऑफ़ द सिख्स ऑफ़ द नेशन ओरिजिन ऑफ़ द नेशन ऑफ़ द नेशन ऑफ़ द सतलज ()t)। एशियाई शैक्षिक सेवाएँ। पृष्ठभूमि। 7।

 आईयूएससबीबैन॰ 9788120609501. अभिगमन तिथि 24 अप्रैल 2016. उद्धरण: "करौली की छोटी मुखिया।

रजा को वंशावलियों द्वारा यदु या चंद्र जाति का माना जाता है, लेकिन लोग कभी-कभी कहते हैं कि उनका अहीर या चरवाहा होना भारतीयों के देहाती अपोलो कृष्ण से उनका एकमात्र संबंध है। "

यदु अहीर भगवान ब्रह्मा द्वारा 900 सीई में स्थापित भगवान कृष्ण के वंशज हैं।

यह शहर 1348 से है, और यह उत्तर और पूर्व में प्राकृतिक रूप से रवीनों द्वारा संरक्षित एक भौगोलिक सेटिंग में स्थित है, और इसे एक महान दीवार "करौली" द्वारा संरक्षित किया गया है।
 बिटैनिका विश्वकोश (11 वां) 15। (1911)। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस
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(सन्दर्भ 6)-[6] Michelutti, Lucia (2008). The Vernacularisation of Democracy: Politics, Caste, and Religion in India. Routledge. पृ॰ 43. 
आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-41546-732-2.
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 CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो।
गोपनीयता डेस्कटॉप
सन्दर्भ 
❣[1] Gazetteer of Ulwur. Trübner & Company, 1878. 1878. पृ॰ 43.
______
और एक विवरण के अनुसार जादौन राठौड़  राजपूत बंजारा जाति का सहवर्ती चारण गोत्र है✨[2] देखें निम्नलिखित सन्दर्भों में👇
✨[2] Singh, David Emmanuel (2012). Islamization in Modern South Asia: Deobandi Reform and the Gujjar Response. Walter de Gruyter,. पृ॰ संख्या 200. अभिगमन तिथि 30 September 2014.
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 बंजारा जाति के एक समुदाय को भी जादोेेैन नाम से जाना जाता है।[3]👇
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यह देखें निम्नलिखित सन्दर्भों में👇
[3]
- Shashishekhar Gopal Deogaonkar, Shailaja Shashishekhar Deogaonkar (1992). The Banjara. Concept Publishing Company. पृ॰ संख्या 18, 19. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788170224334.
____
एक समय जलेसर (एटा) व करौली (राजस्थान) राज्यों पर जादौन[4] राजपूत परिवारों का शासन रहा है।
 इनका निकास मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से है।[5][6]✨
 Deogaonkar (1992). The Banjara. Concept Publishing Company. पपृ॰ 18, 19. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788170224334.
↑ Lucia Michelutti (2018). Sons of Krishna: The Politics of Yadav community formation in a North Indian town (PDF). London School of Economics. पृ॰ 47. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ Phd Thesis Social Anthropology |isbn= के मान की जाँच करें: invalid character (मदद).
↑ Cunningham, Joseph Davey; Garrett, H. L. O. A History of the Sikhs from the Origin of the Nation to the Battles of the Sutlej (अंग्रेज़ी में). Asian Educational Services. पृ॰ 7. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788120609501. अभिगमन तिथि 24 April 2016. Quote: "The little chiefship of Karauli. The raja is admitted by the genealogists to be of the Yadu or lunar race, but people sometimes say that his being an Ahir or cowherd forms his only relation to Krishna, the pastoral Apollo of the Indians." 

The Yadu Ahir are descendants of Lord Krishna, founded in 900 CE by Raja Brahm Pal. 
The town itself dates from 1348, and is located in a geographical setting naturally defended by ravines on the north and east, and is further protected by a great wall  “Karauli”। ब्रिटैनिका विश्वकोष (11th) 15। (1911)। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस।
↑ Michelutti, Lucia (2008). The Vernacularisation of Democracy: Politics, Caste, and Religion in India. Routledge. पृ॰ सख्या०43. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-41546-732-

सामग्री CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो।
गोपनीयताडेस्कटॉप
सन्दर्भ
[5] Cunningham, Joseph Davey; Garrett, H. L. O. A History of the Sikhs from the Origin of the Nation to the Battles of the Sutlej (अंग्रेज़ी में). Asian Educational Services. पृ॰ 7. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788120609501. अभिगमन तिथि 24 April 2016. Quote: "The little chiefship of Karauli. The raja is admitted by the genealogists to be of the Yadu or lunar race, but people sometimes say that his being an Ahir or cowherd forms his only relation to Krishna, the pastoral Apollo of the Indians." The Yadu Ahir are descendants of Lord Krishna, founded in 900 CE by Raja Brahm Pal. The town itself dates from 1348, and is located in a geographical setting naturally defended by ravines on the north and east, and is further protected by a great wall   “Karauli”।
 ब्रिटैनिका विश्वकोष (11th) 15। (1911)। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस।[6] Michelutti, Lucia (2008). The Vernacularisation of Democracy: Politics, Caste, and Religion in India. Routledge. पृ॰ 43. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-41546-732-2.

ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन👇

इसी करण कन्या को चारणों ने करणी माता के रूप में अपनी कुल देवी स्वीकार कर लिया है ।

जिसका विवरण हम आगे देंगे -
ज्वाला प्रसाद मिश्र ( मुरादावादी) 'ने अपने ग्रन्थ जातिभास्कर में पृष्ठ संख्या 197 पर राजपूतों की उत्पत्ति का हबाला देते हुए उद्धृत किया कि ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ब्रह्मवैवर्तपुराणम्‎ (खण्डः १ -(ब्रह्मखण्डः)
← अध्यायः१० ब्रह्मवैवर्तपुराणम्
श्लोक संख्या १११
_______
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।। 
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।। 
1/10।।111
 ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति 
क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।

तथा स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26 में राजपूत की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए कहा
" कि क्षत्रिय से शूद्र जाति की स्त्री में राजपूत उत्पन्न होता है यह भयानक, निर्दय , शस्त्रविद्या और रण में चतुर तथा शूद्र धर्म वाला होता है ;और शस्त्र वृत्ति से ही अपनी जीविका चलाता है ।👇

( स्कन्द पुराण सह्याद्रि खण्ड अध्याय 26)
और ब्रह्मवैवर्तपुराणम् में भी राजपूत की उत्पत्ति 
क्षत्रिय से करण (चारण) कन्या में राजपूत उत्पन्न हुआ और राजपुतानी में करण पुरुष से आगरी उत्पन्न हुआ ।
आगरी संज्ञा पुं० [हिं० आगा] नमक बनानेवाला पुरुष ।
 लोनिया
ये बंजारे हैं ।
प्राचीन क्षत्रिय पर्याय वाची शब्दों में राजपूत ( राजपुत्र) शब्द नहीं है ।

विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा
दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं 
और रही बात राजपूतों की तो राजपूत एक संघ है 
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।
चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में वर्णन है।👇

< ब्रह्मवैवर्तपुराणम्‎ (खण्डः १ -(ब्रह्मखण्डः)
←  ब्रह्मवैवर्तपुराणम्
अध्यायः १० श्लोक संख्या १११
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।। 
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।। 
1/10/१११

"ब्रह्म वैवर्तपुराण में राजपूतों की उत्पत्ति क्षत्रिय के द्वारा करण कन्या से बताई "🐈
करणी मिश्रित या वर्ण- संकर जाति की स्त्री होती है 
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार करण जन-जाति वैश्य पुरुष और शूद्रा-कन्या से उत्पन्न है।

और करण लिखने का काम करते थे ।
ये करण ही चारण के रूप में राजवंशावली लिखते थे ।
एेसा समाज-शास्त्रीयों ने वर्णन किया है ।

तिरहुत में अब भी करण पाए जाते हैं ।
लेखन कार्य के लिए कायस्थों का एक अवान्तर भेद भी करण कहलाता है  ।

करण नाम की एक आसाम, बरमा और स्याम की  जंगली जन-जाति है ।

क्षत्रिय पुरुष से करण कन्या में जो पुत्र पैदा होता उसे राजपूत कहते हैं।

वैश्य पुरुष और शूद्रा कन्या से उत्पन्न हुए को करण कहते हैं ।

और ऐसी करण कन्या से क्षत्रिय के सम्बन्ध से राजपुत्र (राजपूत) पैदा हुआ।

वैसे भी राजा का  वैध पुत्र राजकुमार कहलाता था राजपुत्र नहीं  ।चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।
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स्कन्द पुराण के सह्याद्रि खण्ड मे अध्याय २६ में 
वर्णित है ।

शूद्रायां क्षत्रियादुग्र: क्रूरकर्मा: प्रजायते।
शस्त्रविद्यासु कुशल: संग्राम कुशलो भवेत्।१
 तया वृत्या: सजीवेद्य: शूद्र धर्मा प्रजायते ।
राजपूत इति ख्यातो युद्ध कर्म्म विशारद :।।२।

कि राजपूत क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्याओं में उत्पन्न सन्तान है 
जो क्रूरकर्मा शस्त्र वृत्ति से सम्बद्ध युद्ध में कुशल होते हैं ।
ये युद्ध कर्म के जानकार और शूद्र धर्म वाले होते हैं ।

ज्वाला प्रसाद मिश्र' मुरादावादी'ने जातिभास्कर ग्रन्थ में पृष्ठ संख्या १९७ पर राजपूतों की उत्पत्ति का एेसा वर्णन किया है ।
स्मृति ग्रन्थों में राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन है👇
 राजपुत्र ( राजपूत)वर्णसङ्करभेदे (रजपुत) “वैश्यादम्बष्ठकन्यायां राजपुत्रस्य सम्भवः” 
इति( पराशरःस्मृति )
वैश्य पुरुष के द्वारा अम्बष्ठ कन्या में राजपूत उत्पन्न होता है।

इसी लिए राजपूत शब्द ब्राह्मणों की दृष्टि में क्षत्रिय शब्द की अपेक्षा हेय है ।

राजपूत बारहवीं सदी के पश्चात कृत्रिम रूप से निर्मित हुआ ।
पर चारणों का वृषलत्व कम है । 
इनका व्यवसाय राजाओं ओर ब्राह्मणों का गुण वर्णन करना तथा गाना बजाना है ।

 चारण लोग अपनी उत्पत्ति के संबंध में अनेक अलौकिक कथाएँ कहते हैं;  कालान्तरण में एक कन्या को देवी रूप में स्वीकार कर उसे करणी माता नाम दे दिया  करण या चारण का अर्थ मूलत: भ्रमणकारी होता है ।

चारण जो कालान्तरण में राजपूतों के रूप में ख्याति-लब्ध हुए और अब इसी राजपूती परम्पराओं के उत्तराधिकारी हैं ।
करणी चारणों की कुल देवी है ।
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सोलहवीं सदी के, फ़ारसी भाषा में "तारीख़-ए-फ़िरिश्ता  नाम से भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार, मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता ने राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में लिखा है कि जब राजा, 
अपनी विवाहित पत्नियों से संतुष्ट नहीं होते थे, तो अक्सर वे अपनी महिला दासियो द्वारा बच्चे पैदा करते थे, जो सिंहासन के लिए वैध रूप से जायज़ उत्तराधिकारी तो नहीं होते थे, लेकिन राजपूत या राजाओं के पुत्र कहलाते थे।[7][8]👇
सन्दर्भ देखें:- मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता की इतिहास सूची का ...
[7] "History of the rise of the Mahomedan power in India, till the year A.D. 1612: to which is added an account of the conquest, by the kings of Hydrabad, of those parts of the Madras provinces denominated the Ceded districts and northern Circars : with copious notes, Volume 1". Spottiswoode, 1829. पृ॰ xiv. अभिगमन तिथि 29 Sep 2009

[8] Mahomed Kasim Ferishta (2013). History of the Rise of the Mahomedan Power in India, Till the Year AD 1612. Briggs, John द्वारा अनूदित. Cambridge University Press. पपृ॰ 64–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-108-05554-3.

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विशेष:- उपर्युक्त राजपूत की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक उद्धरणों में करणी (चारण) और शूद्रा
दो कन्याओं में क्षत्रिय के द्वारा राजपूत उत्पन्न होने में सत्यता नहीं क्योंकि दो स्त्रियों में एक पुरुष से सन्तान कब से उत्पन्न होने लगीं 
'परन्तु कुछ सत्य अवश्य है ।
कालान्तरण में राजपूत एक संघ बन गयी 
जिसमें कुछ चारण भाट तथा विदेशी जातियों का समावेश हो गया।
और रही बात आधुनिक समय में राजपूतों की तो राजपूत एक संघ है 
जिसमें अनेक जन-जातियों का समायोजन है ।
जैसे
चारण, भाट , लोधी( लोहितिन्) कुशवाह ( कृषिवाह) बघेले आदि और कुछ गुर्जर जाट और अहीरों से भी राजपूतों का उदय हुआ ।
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 'परन्तु बहुतायत से चारण और भाट या भाटी बंजारों का समूह ही राजपूतों में विभाजित है ।

 : 54 (10 सबसे बड़ा दिखाया गया) सभी दिखाएं
उपसमूह का नाम जनसंख्या।

नाइक 471,000

चौहान 35,000

मथुरा 32,000

 सनार (anar )23,000

लबाना (abana) 19,000

मुकेरी (ukeri )16,000

हंजरा (anjra) 14,000

पंवार 14,000

बहुरूपिया ahrupi 9100

भूटिया खोला 5,900
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परिचय / इतिहास
हिंदू बंजारा, जिन्हें 53 विभिन्न नामों से जाना जाता है, मुख्य रूप से लमबाड़ी या लमानी (53%), और बंजारा (25%) बोलते हैं। 

वे भारत में सबसे बड़े खानाबदोश समूह हैं और पृथ्वी के मूल रोमानी के रूप में जाने जाते हैं। 

रोमनी ने सैकड़ों साल पहले भारत से यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा शुरू की, और अलग-अलग बोलियाँ उन क्षेत्रों में विकसित हुईं जिनमें प्रत्येक समूह बसता था। 

बंजारा का नाम बाजिका( वाणिज्यार )शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है व्यापार या व्यवसाय, और बैंजी से, जिसका अर्थ है पैल्डलर पैक। 
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कई लोग उन्हें मिस्र से निर्वासित किए गए यहूदियों के रूप में मानते हैं, क्योंकि वे मिस्र और फारस से भारत आए थे। 

कुछ का मानना ​​है कि उन्हें मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा अपनी मातृभूमि से निष्कासित कर दिया गया था। 
अब वे भारत के पचास प्रतिशत से अधिक जिलों में स्थित हैं।

उनका जीवन किस जैसा है?
अधिकांश भारतीय रोमानी जैतून की त्वचा, काले बाल और भूरी आँखें हैं। 

हालाँकि हम आम तौर पर इन समूहों को भाग्य से रंग-बिरंगे कारवां में जगह-जगह से यात्रा करने वालों के बैंड के साथ जोड़ते हैं, लेकिन अब बंजारा के साथ ऐसा नहीं है।

 ऐतिहासिक रूप से वे खानाबदोश थे और मवेशी रखते थे, नमक का कारोबार करते थे और माल का परिवहन करते थे। 

अब, उनमें से अधिकांश खेती या पशु या अनाज को पालने-पोसने के लिए बस गए हैं।

 अन्य अभी भी नमक और अन्य वस्तुओं का व्यापार करते हैं। 

कुछ क्षेत्रों में, कुछ सफेदपोश पदों को धारण करते हैं या सरकारी कर्मचारियों के रूप में काम करते हैं।

 वे चमकदार डिस्क और मोतियों के साथ जटिल कढ़ाई वाले रंगीन कपड़े भी सिलते हैं।

 वे गहने और अलंकृत गहने बनाते हैं, जो महिलाएं भी पहनती हैं। 

न केवल बंजारे के पास आमतौर पर एक से अधिक व्यवसाय होते हैं,।
 वे समय पर समाज की जरूरतों के आधार पर, अपनी आय को पूरक करने के लिए अतिरिक्त कौशल का भी उपयोग करते हैं। 

कुछ लोग झाड़ू, लोहे के औजार और सुई जैसी वस्तुएं बनाने में माहिर हैं। 

वे उपकरणों की मरम्मत भी कर सकते हैं या पत्थर के साथ काम कर सकते हैं। 

दूसरों का मानना ​​है कि किसी को "धार्मिक भीख" से जीवन यापन के लिए काम नहीं करना पड़ता है।

 वे विशिष्ट देवता के नाम पर भीख माँगते हुए विशेष श्रृंगार में गाते और पहनते हैं।

 बंजारा को संगीत पसंद है, लोक वाद्य बजाना और नृत्य करना। बंजार भी कलाबाज, जादूगर, चालबाज, कहानीकार और भाग्य बताने वाले हैं। 

क्योंकि वे गरीब हैं, वे डेयरी उत्पादों के साथ अपने बागानों में उगाए गए खाद्य पदार्थ खाते हैं। 

कई घास की झोपड़ियों में रहते हैं, अक्सर विस्तारित परिवारों के साथ रहते हैं ।