शुक्रवार, 8 जून 2018

नियोग एक धर्म संगत व्यभिचार----

पुष्य-मित्र सुंग ई०पू० (१८४) के काल में लिखित मनुस्मृति- अध्याय 9 के श्लोक 60 से 66 तक में  इसी नियोग विषय मे लिखा है!

देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ्नियुक्तया ।प्रजेप्सिताआधिगन्तव्या संतानस्य परिक्षये ।।

अन्वय-

देवराद् वा सपिण्डाद् वा स्त्रिया सम्यङ्नियुक्तया प्रजा इप्सिता आधि गन्तव्या सन्तानस्य परिक्ये।।

(9/59-मनुस्मृति)

(सन्तानस्य परिक्षये)  सन्तान के नष्ट होने पर अथवा किसी भी प्रकार से सन्तान का अभाव होने पर (सम्यक् नियुक्तिया स्त्रिया) ठीक-ढ़ंग से नियोजिता स्त्री के द्वारा अर्थात नियोग के लिये नियुक्त स्त्री को (देवरात् वा सपिंडजात् वा ) देवर-स्वजातीय या अपने  से उत्तम वर्णस्थ पुरुष से अथवा पति की छः पीढ़ियों में पति के छोटे या बड़े भाई से (ईप्सिता प्रजा अधिगन्तव्या) इच्छित सन्तान प्राप्त कर लेनी चाहिए अर्थात् जितनी सन्तान अभीष्ट हो उतनी प्राप्त कर ले ।


नियोग के लिए ’नियुक्त करना’ या ’नियोग की विधि’ से अभिप्राय यह है कि जैसे समाज और परिवार में प्रसिद्धि पूर्वक विवाह होता है, उसी प्रकार नियोग भी होता  था। 

इन्हीं के समक्ष पुत्र आदि प्राप्त करने के सम्बन्ध में निश्चय होते हैं । उस निश्चय के अनुसार चलना विधि है, और अन्यथा चलना ’विधि का त्याग’ है ।  दयानन्द सरस्वती जी ने इसी बात को यह बात तो कही कि

"(जैसे प्रसिद्धि से विवाह, वैसे ही प्रसिद्धि से नियोग होना चाहिए। जिस प्रकार विवाह में भद्रपुरुषों की अनुमति और कन्या-वर की सहमती होती है वैसे नियोग में भी होनी चाहिऐ। अर्थात् जब स्त्री-पुरुष का नियोग होना हो तब अपने कुटुम्ब में पुरुष-स्त्रियों के सामने हम दोनों नियोग सन्तानोत्पत्ति के लिये करते हैं। यह संकल्प करें

जब नियोग का नियम पूरा होगा तब हम संयोग न करेंगे । जो अन्यथा करें तो पापी और जाति वा राज्य के दंडनीय हों । 

महीने में एकबार गर्भाधान का काम करेंगे, गर्भ रहे पश्चात् एक वर्ष पर्य्यन्त पृथक् रहेंगे ।

- इस श्लोक में देवर शब्द के प्रचलित— ’पति का छोटा भाई’ अर्थ के साथ विस्तृत अर्थ भी है । निरुक्त में ’देवर’ शब्द की निरुक्ति निम्न दी है—

देवरः कस्मात् द्वितीयो वर उच्यते ।।"

अर्थात्- "देवर उसको कहते है कि जो विधवा का दूसरा पति होता है, चाहे छोटा भाई वा बड़ा भाई अथवा अपने वर्ण वा अपने से उत्तम वर्ण वाला हो । जिससे नियोग करे उसी का नाम देवर है ।"

परन्तु जब तत्कालीन पुरोहित वर्ग नियोग का विधान बनाकर केवल सन्तान के लिए स्त्री को व्यभिचार करने पर बाध्या करता है  तो उसके पुनर्विवाह कराने में क्यों निषेध है । 
नि:सन्देह स्त्रियों का विधान पूर्व यौन शोषण करने हेतु ही नियोग के विधान बनाये गये और उच्च घरानों की महिलाओं के नियोग के लिए ब्राह्मण पुरोहित ही नियुक्त होते थे ।
नियोग करने में स्त्रियों का कौन सा सतीत्व और पतीत्व सुरक्षित था ?

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"विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो निशि ।एकं उत्पादयेत्पुत्रं न द्वितीयं कथं चन ।।60। मनुस्मृति (नवमो८अध्याय )

नियोग करनेवाला विधवा मैं घीलगाकर मौन होकर रात मैथुन करे एक पुत्र उत्पन्न करे नकि दूसरा भी।।

अर्थान्वय-

(विधवायां नियुक्ताः तु)- जो विधवा के साथ नियोग करे, वह (निशि)- रात में (घृताक्तः) -शरीर में घी लगाकर (वाग्यतः)- मौन होकर (एकम् पुत्रम् उत्पादयेत्)- एक पुत्र उत्पन्न करें। (न द्वितीयं कथंचन)  दूसरा कभी नहीं।


1. अन्तर्विरोध- (क) इन श्लोकों में नियोग द्वारा एक अथवा दो पुत्रों की प्राप्ति का विधान किया है  यह विधान 9/59 श्लोक से विरुद्ध होने से मान्य नही हो सकता । क्योंकि उस श्लोक में ईप्सिता प्रजा= इच्छा के अनुसार सन्तान प्राप्त करे, यह लिखा है । संख्या का कोई निर्देश नही किया है ।

अवान्तरविरोध- 9/60 में एक पुत्र की नियोग से व्यवस्था लिखी है । और दूसरी सन्तान का बिल्कुल निषेध किया है । 

किन्तु 61वें श्लोक में उद्देश्य पूरा न होने पर दूसरी सन्तान को भी न्याययुक्त माना है। इन दोनों कथनों में परस्पर विरोध तो  है ही । और 9/62 में भी कोई संख्या नही लिखी है । केवल नियोग का उद्देश्य पूरा होने पर सन्तानोत्पत्ति का निषेध किया है ।

इसलिये नियोग  की व्यवस्था  किसी भी हालत में ठीक  नहीं है विधवा का पुनर्विवाह ही होना चाहिए यदि उस महिला के सन्तान न हुई हो तो 


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इन नियोग का खण्डन करने वाले चार श्लोकों पर सर्वज्ञनारायण भाष्यकार ने लिखा है कि- ‘इस उक्त प्रकार से अन्य ऋषियों के मतानुसार नियोग का विधान करके मनु-स्मृति कार अपने मतानुसार खण्डन भी करते हैं’ सो यह बात भी ठीक नहीं है।
क्योंकि जब पहले प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि- ‘अब आगे स्त्रियों को आपत्काल में वर्त्तने योग्य धर्म कहेंगे।
फिर स्त्रीयों की तौहीन क्यों ?

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इससे स्पष्टत: मनु स्मृति- का सिद्धान्त आपत्काल में निर्वाह करने के लिये ब्राह्मणों द्वारा बनाया जाता है ।और वह सिद्धान्त वेद के भी सर्वथा अनुकूल है।
वेद में नियोग करने के लिये स्पष्ट ही आज्ञा दी गयी है।
जैसे- "
‘हे नारि= स्त्री ! तू गतासुम् (गता + असुम्), एतम्, उपशेषे=शी धातु का आत्मनेपदीय लट्लकार मध्यम पुरुष  एकवचन का रूप उपशेषे = । पास में सोती( लेटी ) हो । 

इस मरे हुए पति के समीप शोक में मग्न पड़ी है, उसको छोड़कर ।अभिजीवलोकम्= जीते हुए प्राणियों के समूह को देखकर उदीर्ष्व= उठ । और उठके अर्थात् सचेत होके। एहि=  आओ। तव, हस्तग्राभस्य, दिधिषोः,=दिधिषु:का षष्ठी कारक रूप।    दिधीं धैर्य्यम् इच्छति इष--क्विप् शकुब्ध्वा० । द्विरूढायाः स्त्रियाः पत्यौ पुनर्भूपतौ अमरः कोश। दिधिषु=पहले एक बार ब्याही हुई स्त्री का दूसरा पति  २. दिधिषु= गर्भाधान करनेवाला मनुष्य ।

पत्युः= तेरे हाथ को ग्रहण करने वाले द्वितीय पति के। इदम्, जनित्वम्, अभिसम्बभूथ= इस स्त्रीपनरूप सम्बन्ध को सब ओर से प्राप्त हो।’ ऋग्वेद के इस दूसरे पति की आज्ञा देने वाले मन्त्र में अर्थ का भी विवाद नहीं है।
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स्त्री ! तू गतासुम्, एतम्, उपशेषे अभिजीवलोकम्
उदीर्ष्व एहि तव, हस्तग्राभस्य, दिधिषोः, पत्युः
इदम्, जनित्वम्, अभिसम्बभूथ
इस मन्त्र का यही अर्थ सायणादि भाष्यकारों ने भी  लिखा है।
और मेधातिथि  नामक मनु-स्मृति के भाष्यकार ने भी लिखा है कि-“को वां शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ आ।”
इत्यादि नियोग विधायक मन्त्र भी वेदों में दीखते हैं। 


मनु स्मृति कार ने कहा है कि यदि किसी महिला का पति अल्पायु मे मर जाये, अथवा वह सन्तान पैदा करने मे सक्षम न हो तो उस महिला को किसी श्रेष्ठ पुरुष से विशेषत: (ब्राह्मण से नियोग करना चाहिये)!
मनु स्मृति कार का कहना है :-"कि बिना सन्तान के वंश-वृद्धि नही होती,  और ऐसी दशा में पुत् नामक नरक की प्राप्ति भी होती है अतः ऐसी आपात स्थिति मे गुरूजनों की आज्ञा से नियोग ही एकमात्र साधन है!
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मनु-स्मृति कार ने कहा है कि पुरुष जिस महिला से नियोग करें, उसका उद्देश्य काम-सुख नहीं अपितु संतानोत्पत्ति होना चाहिये, और जब सन्तान पैदा हो जाये तो पुरुष फिर से पूर्ववत् हो जाये!
मनु-स्मृति कार ने विधान बताया है कि महिला की माहवारी समाप्त होने के बाद पुरुष शरीर में घी लगाकर रात्रि मे मौन रहकर महिला से नियोग करें।
मनु-स्मृति के अनुसार महिला से उसका (ज्येष्ठ, देवर और कोई श्रेष्ठ पुरुष नियोग करे, और अगर ससुर नियोग करता है तो गर्भधारण हो जाने के बाद महिला और पुरुष पुनः ससुर और पुत्रवधू जैसा व्यवहार करें !                 वस्तुत यह बड़ी हास्यास्पद बातें हैं ।


यहाँ तो पति- पत्नी का दाम्पत्य धर्म ही नष्ट है ?
क्योंकि काम जनित क्रियाऐं आत्मीय जनों के साथ करने से चिर-सञ्जित पुण्य तो नष्ट होते ही है- और जैसा कि मनु-स्मृति कार कहता है कि नियोग करने वाले श्वशुर और पुत्रवधू पू्र्ववत् व्यवहार करें ।

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यह असम्भव है । क्योंकि काम जो दाम्पत्य जीवन के विरुद्ध है - पाप ही है ।
और नियोग- पृथा पापाचारियों की पृथा है।
अत: मनु-स्मृति कार के कथन सर्वथा मिथ्या व पाप पूर्ण ही है ।                                          और मात्र सन्तान के लिए अनेक जन्मों का पुण्य" 

नियोग पृथा के नाम पर व्यभिचार से नष्ट कर देना ;बुद्धि मता नहीं है ।
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नियोग को मनु स्मृति कार ने व्यभिचार नही माना हैं । मनु-स्मृति कार ने मनुष्य के कर्मों को तीन भागों मे विभाजित किया है, जो निम्न हैं-
१-धर्म- ऐसा कर्म जिसे करने से पाप या ग्लानि न हो, और जो नैतिक हो !

२-अधर्म- ऐसा कर्म जो अनैतिक हो और समाज जिसे प्रतिबन्धित मानता हो!

३-आपद्धर्म- ऐसा कर्म जो सामान्य अवस्था में पापकर्म ही है, परन्तु विपत्ति-काल मे मानव बाध्य होकर करे !
वस्तुत: हम इसे ही पाप कहेंगे !
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ठीक इसी तरह विवाह करना 'धर्म' है!
व्यभिचार करना 'अधर्म' है,
और नियोग करना
'आपद्धर्मनहीं पाप कर्म  अवश्य है।

महाभारत में पाण्डवों तथा कौरवों के जीवन में भी यही हुआ था !  पाण्डु सन्तान पैदा करने मे असमर्थ थे, अतः उनकी आज्ञा से कुन्ती ने अलग-अलग पुरुषों से नियोग करके पाण्डवों को जन्म दिया था !
ऐसे ही सत्यवती की आज्ञा से अम्बिका और अम्बालिका ने भी व्यास से नियोग किया था, क्योंकि दोनो के पति जब मरे गये थे ; तब वो सन्तानहीन थीं। और यह बात महाभारत के आदिपर्व में लिखी है ! 




महाभारत में अम्बिका से नियोग से सम्बद्ध श्लोकों को देखें-

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वशिष्ठ स्मृति के (17)वें अध्याय में वर्णन है कि 

भाष्य- टीका-

"प्रेतपत्नी षण्मासं व्रतचारिणी अक्षारलवणं ।भञ्जाना शयीतोर्ध्वै षड्भ्यो मासेभ्य: स्नात्वा श्राद्धं च पत्ये दत्वा विद्याकर्म ।गुरुयोनिनिसम्बन्धात्। सन्निपात्य । पिता भ्राता वा नियोगं कारयेत् तप से वोन्मत्तमवशं व्याधितां वा नियञ्ज्यात्।ज्यायासीमपि षोडशवर्षा नचेदामयाविनी स्यात्।प्रजापत्ये मुहूर्ते ।पाणिग्रहणवत्। उपचारोऽन्यत्र संथाप्य वाक्पारुप्यादण्डपारुप्याच्च ।ग्रासच्छादनस्नानलेपनेषु प्राग्यामिनी स्याद् अनियुक्तायाम् उत्पन्न उत्पादयितु: पुत्रो भवति इति आहु: स्यात् चेनियोगिनो दृष्टा लोभान् अस्ति ।नियोग:।प्रायश्चितं वाप्युप नियञ्जयाद् इति एके।

"जिस स्त्री का पति मर गया हो वह छ: महीने व्रत करे ! तथा खारी वस्तु और लवण न खाये पृथ्वी पर शयन करे ! और छ: महीने  उपरान्त पति का श्राद्ध करे वा कर्म में बड़े' गुरु तथा अपने सम्बन्धियों को इक्कठा करके उस स्त्री का पिता और भाई उस स्त्री का नियोग( गर्भाधान) करावे और जो उन्मत्त और वशी नहो व रोगी हो रिश्ते में बड़ी और सौलह वर्ष से अधिक नहो तो उसका नियोग कराना उचित नहीं और देवर आदि भी रोगी न हो प्रजापत्य-मुहूर्त में नियोग करावै और पति के समान ही वह स्त्री नियोक्ता की सेवा करे हँसना' कठोर वचनऔर कठोर दण्ड इनको न करे जो पहला पति धन छोड़ गया है उससे वह स्त्री भोजन 'वस्त्र और लेपन आदि इनको खरीदें और जिस स्त्री का नियोग न हुआ हो उसमें जो पुत्र उत्पन्न हुआ है वह भी उस स्त्री से सन्तान उत्पन्न करने वाले का होता है यह शास्त्रों के जानकार कहते हैं यदि नियोग करने वाली स्त्री को धन का लोभ हो तो यह नियोग नहीं है कोई ऐसा भी कहते कि कि वह स्त्री फिर प्रायश्चित करे। 

वस्तुत: स्मृतियों में विधवा के पुनर्विवाह का कोई विधान नहीं बनाया परन्तु रिश्तेदारों देवर । श्वसुर आदि से नियोग के रूप यौन सम्बन्ध बनाकर सन्तान उत्पादन का तो विधान धर्म संगत कर दिया गया। इससे ज्यादा नारी अस्मिता की धज्जीयाँ क्या उड़ेगीं।

सत्यार्थप्रकाश चतुर्थसमुल्लास।

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😚 ततः सत्यवती काले वधूं स्नातामृतौ तदा।
संवेशयन्ती शयने शनैर्वचनमब्रवीत्।1-115-1

कौसल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वाऽनुप्रवेक्ष्यति।
अप्रमत्ता प्रतीक्षैनं निशीथे ह्यागमिष्यति।1/115/2

श्वश्र्वास्तद्वचनं श्रुत्वा शयाना शयने शुभे।
साऽचिन्तयत्तदा भीष्ममन्यांश्च कुरुपुङ्गवान्।1-115-3

`ततः सुप्तजनप्रायेऽर्धरात्रे भगवानृषिः।
दीप्यमानेषु दीपेषु शरणं प्रविवेश ह।1-115-4

ततोऽम्बिकायां प्रथमं नियुक्तः सत्यवागृषिः।
जगाम तस्याःशयनं विपुले तपसि स्थितः।1-115-5

तं समीक्ष्य तु कौसल्या दुष्प्रेक्षमतथोचिता।
विरूप इति वित्रस्ता संकुच्यासीन्निमीलिता।1-115-6

विरूपो हि जटी चापि दुर्वर्णः परुषः कृशः।
सुगन्धेतरगन्धश्च सर्वथा दुष्प्रधर्षणः।1-115-7

तस्य कृष्णस्य कपिलां जटां दीप्ते च लोचने।
बब्रूणि चैव श्मश्रूमि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत्।1-115-8

संभूव तया सार्धं मातुः प्रियचिकीर्षया।
भयात्काशिसुता तं तु नाशक्नोदभिवीक्षितुम्।।1-115-9


ततो निष्क्रान्तमागम्य माता पुत्रमुवाच ह।

अप्यस्यां गुणवान्पुत्र राजपुत्रो भविष्यति।।1-115-10

निशम्य तद्वचो मातुर्व्यासः सत्यवतीसुतः।
`प्रोवाचातीन्द्रियज्ञानो विधिना संप्रचोदितः।।'1-115-11

नागायुतसमप्राणो विद्वान्राजर्षिसत्तमः।
महाभागो महावीर्यो महाबुद्धिर्भविष्यति।।1-115-12

तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महात्मनः।
किंतु मातुः स वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति।।1-115-13

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा माता पुत्रमथाऽब्रवीत्।
नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन।।1-115-14

ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितॄणां वंशवर्धनम्।
`अपरस्यामपि पुनर्मम शोकविनाशनम्।1-115-15

तस्मादवरजं पुत्रं जनयान्यं नराधिपम्।
भ्रातुर्भार्याऽवरा चेयं रूपयौवनशालिनी।1-115-16

अस्यामुत्पादयाऽपत्यं मन्नियोगाद्गुणाधिकम्।'
द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि।1-115-17

स तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महायशाः।
साऽपि कालेन कौसल्या सुषुवेऽन्धं तमात्मजम्।।1-115-18

पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः।
ऋषिमावाहयत्सत्या यथापूर्वमरिन्दम।1-115-19

`अम्बालिकां समाहूय तस्यां सत्यवती सुतम्।
भूयो नियोजयामास सन्तानाय कुलस्य वै।1-115-20

विषण्णाम्बालिका साध्वी निषण्णा शयनोत्तमे।
कोन्वेष्यतीति ध्यायन्ती नियतां संप्रतीक्षते'।।1-115-21

ततस्तेनैव विधिना महर्षिस्तामपद्यत।
अम्बालिकामथाऽभ्यागादृषिं दृष्ट्वा च साऽपि तम्।।1-115-22

विवर्णा पाण्डुसंकाशा समपद्यत भारत।
तां भीतां पाण्डुसंकाशां विषण्णां प्रेक्ष्य भारत।।1-115-23

व्यासः सत्यवतीपुत्र इदं वचनमब्रवीत्।
यस्मात्पाण्डुत्वमापन्ना विरूपं प्रेक्ष्य मामिह।।1-115-24

तस्मादेष सुतस्ते वै पाण्डुरेव भविष्यति।
नाम चास्यैतदेवेह भविष्यति शुभानने।।1-115-25

इत्युक्त्वा स निराक्रामद्भगवानृषिसत्तमः।
ततो निष्क्रान्तमालोक्य सत्या पुत्रमथाऽब्रवीत्।1-115-26

`कुमारो ब्रूहि मे पुत्र अप्यत्र भविता शुभः।'
शशंस स पुनर्मात्रे तस्य बालस्य पाण्डुताम्।1-115-27

`भविष्यति सुविक्रान्तः कुमारो दिक्षु विश्रुतः।
पाण्डुत्वं वर्णतस्तस्य मातृदोषाद्भविष्यति।1-115-28

तस्य पुत्रा महेष्वासा भविष्यन्तीह पञ्च वै।
इत्युक्त्वा मातरं तत्र सोऽभिवाद्य जगाम ह।'1-115-29

तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत।
तथेति च महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत।।1-115-30

ततः कुमारं सा देवी प्राप्तकालमजीजनत्।
पाण्डुलक्षणसंपन्नं दीप्यमानमिव श्रिया।।1-115-31a

यस्य पुत्रा महेष्वासा जज्ञिरे पञ्च पाण्डवाः।
`तयोर्जन्मक्रियाः सर्वा यथावदनुपूर्वशः।1-115-32

कारयामास वै भीष्मो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
अन्धं दृष्ट्वाऽम्बिकापुत्रं जातं सत्यवती सुतम्।।1-115-33

कौसल्यार्थे समाहूय पुत्रमन्यमयाचत।
अन्धोयमन्यमिच्छामि कौसल्यातनयं शुभम्।1-115-34

एवमुक्तो महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत।
नियता यदि कौसल्या भविष्यति पुनःशुभा।1-115-35

भविष्यति कुमारोऽस्या धर्मशास्त्रार्थतत्ववित्।
तां समाधाय वै भूयः स्नुषां सत्यवती पुनः।'1-115-36

ऋतुकाले ततो ज्येष्ठां वधूं तस्मै न्ययोजयत्।
सा तु रूपं च गन्धं च महर्षेः प्रविचिन्त्य तं।।1-115-37

नाकरोद्वचनं देव्या भयात्सुरसुतोपमा।
ततःस्वैर्भूषणैर्दासीं भूषयित्वाऽप्सरोपमाम्।1-115-38

प्रेषयामास कृष्णाय ततः काशिपतेः सुता।
सा तं त्वृषिमनुप्राप्तं प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च।।1-115-39
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अर्थात्- सत्यवती ठीक समय पर अपनी ऋतुस्नाता पुत्रवधू को शय्या पर बैठाती हुई धीरे से बोली- ‘कौसल्‍ये! तुम्‍हारे एक देवर हैं, वे ही आज तुम्‍हारे पास गर्भाधान के लिये आएेंगे ।
तुम सावधान होकर उनकी प्रतीक्षा करो।
वे ठीक (निशीथ)आधी रात के समय यहाँ तेरे पास आएगा।

नि: सन्देह जब महाभारत में स्पष्टत: व्यास के द्वारा  विचित्रवीर्य तथा चित्रांगद की पत्नीयाें को साथ संभोग वर्णित है तो यह कहना कथा-वाचकों के द्वारा कहाँ तक संगत है कि व्यास ने चित्रांगद और विचित्रवीर्य की पत्नीयाें को दृष्टि पात करके ही गर्भ धारण करा दिया ।
तो आधी रात को व्यास शय्या पर क्या करने गये थे ?
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दिन मे भी वे दृष्टि पात करके गर्भिणी बना सकते थे  और दूसरी बात ऋतुकाल (माहवारी) पूरा होने की प्रतिक्षा क्यों की ?
ये विचारणीय प्रश्न है !

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ततोऽम्बिकायां प्रथमं नियुक्तः सत्यवागृषिः।
जगाम तस्याः शयनं विपुले तपसि स्थितः।1-115-5

तं समीक्ष्य तु कौसल्या दुष्प्रेक्षमतथोचिता।
विरूप इति वित्रस्ता संकुच्यासीन्निमीलिता।1-115-6

विरूपो हि जटी चापि दुर्वर्णः परुषः कृशः।
सुगन्धेतरगन्धश्च सर्वथा दुष्प्रधर्षणः।1-115-7

तस्य कृष्णस्य कपिलां जटां दीप्ते च लोचने।
बब्रूणि चैव श्मश्रूमि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत्।1-115-8

संभूव तया सार्धं मातुः प्रियचिकीर्षया।
भयात्काशिसुता तं तु नाशक्नोदभिवीक्षितुम्।।

अर्थात- सास की बात सुनकर कौसल्‍या (अम्बिका) पवित्र शय्या पर शयन करके उस समय मन-ही-मन भीष्‍म तथा अन्‍य श्रेष्ठ कुरुवंशियों का चिन्‍तन करने लगी।

कुछ समय बाद नियोगविधि के अनुसार  महर्षि व्यास ने अम्बिका के महल में शरीर पर घी लगाकर प्रवेश किया।

उस समय बहुत से दीपक वहाँ प्रकाशित हो रहे थे। व्यास के शरीर का रंग काला था ; तथा जटाऐं पिंगल वर्ण की और आँखें चमक रही थी तथा दाढी-मूँछ भूरे रंग के थे ! उन्‍हें देखकर अम्बिका ने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये, फिर माता का प्रिय करने की इच्‍छा से व्‍यासजी ने उसके साथ समागम किया।

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कहते हैं कि सहवास के दौरान अम्बिका के नेत्र बन्द रखने की वजह से ही धृतराष्ट्र अन्धे पैदा हुये थे !
अस्तु अब इसके बाद व्यास ने दूसरी रानी अम्बालिका से भी नियोग किया, जो महाभारत मे निम्न तरीके से वर्णित है-

पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः।
ऋषिमावाहयत्सत्या यथापूर्वमरिन्दम।1-115-19

`अम्बालिकां समाहूय तस्यां सत्यवती सुतम्।
भूयो नियोजयामास सन्तानाय कुलस्य वै।1-115-20

विषण्णाम्बालिका साध्वी निषण्णा शयनोत्तमे।
कोन्वेष्यतीति ध्यायन्ती नियतां संप्रतीक्षते'।1-115-21

ततस्तेनैव विधिना महर्षिस्तामपद्यत।
अम्बालिकामथाऽभ्यागादृषिं दृष्ट्वा च साऽपि तम्।।1-115-22

विवर्णा पाण्डुसंकाशा समपद्यत भारत।
तां भीतां पाण्डुसंकाशां विषण्णां प्रेक्ष्य भारत।।1-115-23
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अर्थात- तत्‍पश्चात् देवी सत्‍यवती ने अपनी दूसरी पुत्रवधू को समझा-बुझाकर गर्भाधान के लिये तैयार किया और इसके लिये पूर्ववत् महर्षि व्‍यास का आवाह्न किया। 

फि‍र महर्षि ने उसी नियोग विधि से देवी अम्‍बालिका के साथ मैथुन किया।
महर्षि व्‍यास को देखकर वह भी कान्तिहीन तथा भयभीत हो गयी थी।
कहते हैं की अम्बालिका से डरने से पाण्डु पीले से पैदा हुये थे!

यही नही, व्यास ने दासी के साथ भी नियोग ही किया था, जिससे विदुर का जन्म हुआ!
जब व्यास मे सत्यवती को बताया कि एक का पुत्र अन्धा और दूसरे का रोगी पैदा होगा तो सत्यवती ने पुन:  नियोग करने का आग्रह किया, पर इस बार अम्बिका ने अपने स्थान पर लज्जा करके से अपनी दासी को ही भेज दिया!

वैसे यह नियोग करवाने का परामर्श सत्यवती को भीष्म पितामह ने ही दिया था !  और जब हस्तिनापुर की राजगद्दी का कोई उत्तराधिकारी न रहा तब पितामह ने सत्यवती से कहा-
इसी लिए मनु-स्मृति कार ब्राह्मणों को नियुक्त करता है सभी स्त्रीयों से संभोग के लिए-

"ब्राह्मणो गुणवान् कश्चिद्भनेनोपनिमन्त्र्यात।
विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु यः समुत्पादयेत्प्रजाः।"
                 (महाभारत /आदिपर्व-104/2)

अर्थात- हे माता! भरतवंश की सन्तान परम्‍परा को बढ़ाने और सुरक्षित रखने के लिये जो नियम उपाय हैं, उसे मैं बता रहा हूँ..
सुनो ! किसी गुणवान् ब्राह्मण को धन देकर बुलाओ, जो विचित्रवीर्य की स्त्रियों के गर्भ से सन्तान उत्‍पन्न कर सके।"

महाभारत-

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"उक्त प्रमाण से यह स्पष्ट हो जाता है कि पूर्वकाल में सन्तान आशीर्वाद देने से दृष्टि -पात करने से अथवा खीर खिलाने से नहीं होती थी अपितु मैथुन के द्वारा होती थी"


अर्थात् सन्तान-उत्पत्ति के लिये पुरुष महिला से नियोग के द्वारा मैथुन ही करते थे ; राम ,लक्ष्मण आदि दशरथ के चारों पुत्रों का जन्म ब्राह्मणों के नियोग से हुआ था।

यह बात रामायण और महाभारत मे भी लिखी है, पर कई जगह या तो सांकेतिक है, अथवा इस व्यभिचार को छुपाने के लिए इसे चमत्कारिक पुट दिया गया है।





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यह नियोग की परम्पराओं और मौलवीयों में हलाला के मूलत: एक ही श्रोत रहे हैं ।

और इन सबके मूल में स्त्रीयों को सन्तान का लोभ
और ब्राह्मणों विभिन्न रमणीयों के साथ संभोग का लाभ - इस नियोग पृथा के निर्वहन में  धर्म का लबादा ओढ़े भोग-विलास  के रूप में नियोजित ही है ।
पुत्र न होने से पुत् नामक नरक में जाना पड़ता है
इस धारणा के कारण स्त्रीयों को सन्तान के लिए तैयार किया जाता था ।
यह भय महिलाओं को देकर उनका भावनात्मक तथा शारीरिक शोषण किया जाता था ।
पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति-मूलक विश्लेषण संस्कृत -ग्रन्थों में इस प्रकार है ।
''पुत्र(त्त्र)'' पुल्लिंग पूत् +त्र ह्रश्च पुतो नरकभेदात् त्रायते त्रै धातु -
पुत्र---
१ स्वजन्यपुरुषे 
२ स्वजन्यायां स्त्रियां स्त्री ङीष्।
निरुक्ते तु 
११ अन्या व्युत्पत्तिरुक्ता 
“पुत्र पुरु त्रायतेनिपरणाद्वा पुत् नरकं तस्मात् त्रायते वा” पृषो॰। 
“पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात् पितरं त्रायते सुतः।
तस्मात्पुत्र इति पोक्तः”( मनुःस्मृति)-9.138
पुत्रः [putrḥ], 1 A son; (the word is thus derived: पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् त्रायते पितरं सुतः । तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयंभुवा ॥ Ms.9.138; the word, therefore, should be strictly written पुत्त्रः).

मनु-स्मृति के अनुसार देवर --
दीव्यतेऽनेन दिव करणे अरच् ।
भर्त्तुरनुजे भ्रातरि ।

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पतिश्वशुरता ज्येष्ठे पतिदेवरतानुजे” उद्भटः पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा “मनुः स्मृति (२) भर्तुर्भ्रातृ मात्रे च “देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यग्नियुक्तया” मनुः
अत्र देवर शब्दः भर्तुः ज्येष्ठकनिष्ठोभयपरः ।
 उत्तरत्र “विधवायां नियोगार्थे निर्वृत्ते तु यथाविधि ।
गुरुवच्च स्नुषावच्च वर्त्तेयाताम् परस्परम्”
कनिष्ठस्य पूर्वज पत्नीत्वेन गुरुतुल्यत्वस्य ज्येष्ठस्य च कनिष्ठपत्न्याः स्नुषा- तुल्यत्वस्योक्तेः ।
स्वार्थे क तत्रार्थे । “देवा देवरकोमतः” उज्ज्वलद० धृतकोषः ।

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देवरः, पुं, (दीव्यत्यनेनेति । दिव्यु क्रीडायाम् + “अर्त्तिकमिभ्रमीति ।” उणादि ३ । १३२ । इति अरः ।) पत्युः कनिष्ठभ्राता । देओर इति भाषा

(देवरः कस्मात् द्वितीयो वर उच्यते ।
अर्थात् देवर किससे दूसरा वर कहा- जाता है
इति निरुक्तेः । ३। १५ )
तत्पर्य्यायः । देवा २ । इत्यमरःकोश । २ । ६ । ३२ ॥ देवॄः ३ देवारः ४ देवानः ५ । इति जटाधरः कोश॥ तुरागावः ६ देवल्ली ७ । इति शब्दरत्नावली ॥
(यथा, मनुः । ९ । ५९ ।
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देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ्नियुक्तया  
प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ) पत्युर्ज्येष्ठो भ्राता तु श्वशुरः ।
इति भरतः ॥

अर्थात् विधवा देवर से ,या सपिण्ड ( परिवार के किसी भी व्यक्ति से स्त्रीयों को पूर्ण रूपेण नियुक्त होकर सन्तानें प्राप्त करें इस कार्य के लिए ज्येष्ठ या श्वशुर कोई भी हो ,!

अमरकोशः
देवर पुं। 
पत्युः_कनिष्ठभ्राता  पति का छोटा भाई
समानार्थक:देवृ,देवर,श्वशुर्य 
2।6।32।1।3 
श्यालाः स्युर्भ्रातरः पत्न्याः स्वामिनो देवृदेवरौ। स्वस्रीयो भागिनेयः स्याज्जामाता दुहितुः पतिः॥ 

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शब्दसागरः के अनुसार देवर की काल्पनिक व्युत्पत्ति-
देवर ¦ m. (-रः) A husband's brother, especially his younger brother. E. देव् to play, &c. affix अरच् |
दीव्यते अनेन दिव-करणे अरच् |
वामन शिवराम आप्टे कोश के अनुसार
देवरः [dēvarḥ], 1 A husband's brother (elder or younger); मनु-स्मृति 3.55;9.59;
पति का छोटा अथवा बडा़ भाई देवर होता है 
अपुत्रां गुर्वनुज्ञातो देवरः पुत्रकाम्यया (इयात्) पुत्र हीन विधवा पुत्र की कामना से  देवर के पास जाए
.( याज्ञवल्क्य स्मृति- 1/68) ।

अपुत्रां गुर्वनुज्ञातो देवरः पुत्रकाम्यया ।
सपिण्डो वा सगोत्रो वा घृताभ्यक्त ऋतावियात् । ६८।                                                (याज्ञवल्क्य स्मृति प्रथमोऽध्याय श्लोक68 वाँ) ।


husband; का देवरं वशगतं कुसुमास्त्रवेगविस्रस्त- पौस्नमुशती न भजेत कृत्ये Bhāg.4.26.26.

Monier-Williams के शब्द कोश के अनुसार-

देवर m. = देवृA1s3vGr2. Mn. MBh. etc.
देवर m. husband , lover BhP. iv , 26 , 26.

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परन्तु देवर शब्द भारोपीय भाषा परिवार का पारिवारिक शब्द है -जो लैटिन भाषा में लेविर (levir) तथा ग्रीक में दीयर (daer) ---पुरानी अंग्रेज़ी( ऐंग्लो सैक्सोन) में tacor टेकॉर ---पुरानी उच्च जर्मनिक में (zeihhur)
रूसी पश्तो ईरानी आदि में भी देवर है ।
levirate (noun)
custom by which the male next-of-kin of a dead man was bound to marry his widow,
1725, with -ate  + Latin levir  "brother-in-law," from PIE (Root) daiwer-
"husband's brother" (source also of Greek daer, Sanskrit devara, Old English tacor, Old High German zeihhur). Related: Leviratic; leviratical.


levir (Latin)

Origin & history-


This word is derived  From Proto-Italic *daiwēr‎, from Proto-Indo-European *dayh₂wḗr‎ ("one's brother-in-law")

Noun-


lēvir (genitive lēvirī) (masc.)

(Late Latin) one's husband's brother

Descendants

English: levir, levirate


 

Entries with "levir"

brother-in-law: …(媤同生, sidongsaeng)


 Kurdish: tî‎ (masc.) 

Latgalian: dīvers‎ 

Latin: levir‎ (masc.)

 Latvian: dieveris‎ (masc.) 

Lithuanian: dieveris‎…


levirate marriage: levirate marriage (English) Origin & history From the Latin levir meaning "husband's brother" + -ate, with marriage.


 Noun levirate marriage (pl. levirate marriages) A marriage in which…


levirate: levirate (English) Origin & history From Latin lēvir ("husband's brother, brother-in-law") + -ate Adjective levirate (not comparable) Having to do with one's husband's…

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dajë: -see also daję‎ dajë (Albanian) Alternative forms =Dazhë Daxhë Pronunciation IPA: /dajə/ 

Origin & history- Either from Ottoman Turkish= (dayı‎,) or possibly from…


देवृ: देवृ (Sanskrit) Origin & history From Proto-Indo-European *dayh₂wḗr. Cognate with Latin= lēvir,

 Lithuanian= dieveris,

 Proto-Slavic= *děverь

, Ancient Greek= δαήρ (daēr) and…

लेवीरेट -(संज्ञा)
पृथाऐं जिसके द्वारा एक मृत व्यक्ति के अगले पुरुष  अर्थात् देवर- "पति के भाई" से विधवा  का विवाह (2) + लैटिन लेवीर " वैध्य भाई " के साथ उसकी विधवा को सन् 1725 के साथ शादी करने के लिए बाध्य  किया जाता था। 

यूनानी )दायर) का स्रोत भी, संस्कृत देवर:, पुरानी अंग्रेज़ी टैकोर, पुरानी हाई जर्मन ज़ीहूर) से सम्बन्धित

नियोग  जैसी पृथा अन्य संस्कृतियों में -जैसे यहूदी आदि मे-लेविरेट के रूप विधवा विवाह का एक प्रकार है ।
परन्तु नियोग के रूप में नहीं -
जिसमें मृत व्यक्ति के भाई को अपने भाई की विधवा से शादी करने के लिए बाध्य किया जाता है।
शब्द लेवीरेट खुद लैटिन शब्द लेवीर का व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है "पति का भाई"।

"लीवीरेट' विवाह का चलन एक मजबूत कबीले संरचना के साथ समाजों द्वारा किया जाता है ।
जिसमें असाधारण विवाह (यानी कबीले के बाहर विवाह) करना मना  था।
यह  पृथा दुनिया भर के कई समाजों में जानी जाती है।
Levirate( देवर के साथ विधवा विवाह पद्धति),

अपने सबसे सकारात्मक पर, विधवा और उसके बच्चों के लिए सुरक्षा के रूप में स्वीकार कार्यों से प्रेरित व सामाजिक है ।
यह सुनिश्चित करना कि उनके पास पुरुष प्रदाता और संरक्षक है। 

लेविरेट विवाह एक ऐसे समाज में सकारात्मक हो सकती है जहां महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं हैं और उन्हें पुरुषों को सहचर बनाने के लिए भरोसा करना चाहिए, खासतौर पर उन समाजों में जहां महिलाओं के कुछ अधिकार में हैं, निर्भर हैं, उनके पतियों की सम्पत्ति के रूप में या सम्मान में हैं ।
और कबीले के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए भी ( Levirate )विवाह का चलन पितृसत्तात्मक समाजों के साथ दृढ़ता से जुड़ा हुआ है।
प्राचीन काल में यह चलन बेहद महत्वपूर्ण था ।
और आज तक यह चलन दुनिया के कुछ हिस्सों में बना हुआ है।

एक विचलित विवाह केवल तभी हो सकता है जब एक व्यक्ति अपने परिवार की लाइन जारी रखने के लिए या बेघर हो जाए। मानवविज्ञानी रूथ मैस ने यह भी पाया कि अफ्रीका के कई हिस्सों में आम तौर पर छोटे भाइयों द्वारा विधवा विरासत का अभ्यास जनसंख्या वृद्धि को कम करने में मदद करता है ।
क्योंकि इन पुरुषों को पुरानी (और इसलिए, कम उपजाऊ) महिलाओं से शादी करने के लिए मजबूर किया जाएगा तो इससे अच्छा वे अपने भाई की विधवा स्त्रीयों से विवाह कर लें।

यहूदी धर्म में विधवा विवाह पद्धति--
वैदिक परम्पराओं के समानान्तर है।
धर्म के प्रोफेसर टिकवा फ्राइमर-केन्स्की ने हिब्रू लीविएट विवाह के आर्थिक प्रभावों की ओर इशारा करते हुए कहा है:
"कि भाई की विधवा के लिए पैदा हुए पहले बच्चे को मृत भाई के वारिस समझा जाएगा,
और मृत भाई के विरासत के हिस्से का दावा करने का हकदार होगा। यदि मृत भाई एक ज्येष्ठ पुत्र था, तो लीवरेट बच्चे की विरासत वह दोहरा हिस्सा है जिस पर मृतक का पुत्र हकदार था।
इस्लामी कानून (शरिया) स्पष्ट रूप से शादी के नियमों को बताता है, जिसमें कौन विवाह कर सकता है, और हालांकि कुरान एक आदमी को अपने भाई की विधवा से शादी करने से मना नहीं करता है, यह एक पत्नी को "विरासत" होने पर रोक लगाता है।
इस्लामीय शरीयत में विधवा विवाह की पृथाऐं यहूदीयों को समान रहीं ।
जैसे- कि अल-निसा क़ुरान की आयत में--
हे आप जिसने विश्वास किया है, बाध्यता से महिलाओं का उत्तराधिकारी होना आपके लिए वैध नहीं है।
और जब तक आप स्पष्ट अनैतिकता अर्थात् (जिना )नहीं करते हैं, तब तक आपने जो कुछ दिया है, उसके हिस्से को वापस लेने के लिए उन्हें कठिनाइयों का सामना न करें।
और दयालुता में उनके साथ रहो।
यदि आप उन्हें नापसंद करते हैं - शायद आप किसी चीज़ को नापसंद करते हैं और अल्लाह उसमें बहुत अच्छा बनाता है।

अल-निसा 4:19, साहिह अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद 
सूरा (यदा कदा सूरह भी कहा जाता है سورة sūrah,  سور) एक अरबी शब्द है।

इसका अक्षरशः अर्थ है "कोई वस्तु, जो किसी दीवार या बाडः से घिरी है" यह शब्द कुरान  के अध्याय के लिए प्रयोग होता है,
प्राचीनत्तम ईरानी संस्कृति से सम्बद्ध
Scythia सीथियन परम्पराओं में विधवा विवाह-
लीविरेट रिवाज को पुनर्जीवित किया गया था अगर मृतक के परिवार में कमजोर आर्थिक स्थितियां थीं। एब्रैमज़न ने सन् 19 68 में पृष्ठ 28 9 - 2 9 0  उल्लेख किया है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, मध्य एशिया में लीवरेट को पुनर्जीवित किया गया था।
इन परिस्थितियों में, मृत व्यक्ति के वयस्क बेटे और भाई अपने आश्रितों को विधवा पत्नीयाें को प्रदान करने के लिए जिम्मेदार थे। उनमें से एक विधवा से विवाह करेगा और यदि कोई था, तो उसके बच्चों को अपनाएगा।

मध्य एशिया और Xiongnu की संस्कृतियों में भी विधवा विवाह ---
7 वीं शताब्दी सदी तक पूर्वोत्तर काकेशस की हूण जाति के समाज में लीवरेट कस्टम बचा हुआ था।
आर्मेनियाई इतिहासकार मूवस कलकांकुत्सी ने कहा कि क्षेत्र में हूण जनजातियों में से एक सवार, आम तौर पर एक-दूसरे के थे, लेकिन कभी-कभी एक विवाहित व्यक्ति अपने भाई की विधवा को बहुभुज पत्नी के रूप में अपना लेता था ।
एक दाहेस्तानी इतिहासकार लुडमिला गेमीया ने जोर देकर कहा कि लीवीरेट "नृवंशविज्ञान आधुनिकता" (संदर्भ से, शायद  सन् 1 9 50 के दशक) में अवशिष्ट परम्परा थी।
Kalankatuatsi Huns द्वारा अभ्यास levirate शादी के रूप का वर्णन करता है।

चूंकि महिलाओं की उच्च सामाजिक स्थिति थी, विधवा के पास ये अधिकार भी था कि पुनर्विवाह करना है या नहीं।
यह इनकी इच्छाओं पर निर्भर था ।
विधवा के पास पुनर्विवाह करना था या नहीं। उसका नया पति अपने पहले पति के भाई या बेटे (किसी और महिला द्वारा) हो सकता है, इसलिए वह अपने भाई या सौतेले पिता से भी शादी कर सकती है ; उम्र में अन्तर कोई फर्क नहीं पड़ता।

किरघिज़ संस्कृतियों में विधवा विवाह का वर्णन है

"किरगिज़ अभ्यास लेवीरेट जिससे एक मृत पुरुष की पत्नी अक्सर मृतक के एक छोटे भाई से शादी कर लेती है।"
"किरगीज़ विवाहों का पालन करने के बाद, यानी, एक विधवा जिसने कम से कम एक बच्चा पैदा किया हो । अपने मृत पति / पत्नी के समान वंश से पति के हकदार है ।

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इंडोनेशिया की संस्कृतियों में विधवा विवाह की पृथाऐं--
करो गाँव के लोगों के आदत के मुताबिक, पॉलीगीनी की अनुमति है।  सन् 19 60 के दशक में एक करो गांव कुट्टागाम्बर का एक अध्ययन, लेविएरेट के परिणामस्वरूप अभ्यास के एक उदाहरण को नोट किया गया है।

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कुर्दों में विधवा विवाह की पृथाऐं-
कुर्दों के बीच लेविरेट विवाह बहुत आम हैं
और तुर्की में कुर्दों में भी विशेष रूप से मार्डिन (आधुनिक) रूप में हैं।
कुवीरस्तान में लेवीरेट का चलन किया जाता है: एक विधवा महिला अपने पति के परिवार के साथ रहती है। अगर उसके बच्चे जवान होते हैं तो वह विधवा होती है, तो वह अपने मृत पति के भाई से शादी करने के लिए बाध्य होती है।
विवाह के इस रूप को levirate कहा जाता है।
सोरोरेट विवाह  भी इसी का एक और रिवाज है: जब कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को किसी बच्चे को जन्म देने से पहले खो देता है ; या वह छोटे बच्चों को छोड़ने से मर जाती है, तो उसकी वंशावली आदमी को एक और पत्नी प्रदान करती है, आमतौर पर कमजोर दुल्हन की कीमत वाली एक छोटी बहन के रूप में ।
बच्चों के कल्याण की गारंटी के लिए लीवरेट और सोरोरेट दोनों का चलन किया जाता है ।
और यह सुनिश्चित किया जाता है कि भूमि की कोई भी विरासत परिवार के भीतर रहेगीं या नहीं ।

अफ्रीका संस्कृतियों में में भी यहूदीयों की परम्पराओं से ये परम्परा नि:सृत हुई
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सोमालिया संस्कृति में भी विधवा विवाह की पृथाऐं-
सोमालिया में, लीविएरेट विवाह का अभ्यास किया जाता है, और दुल्हन मूल्य (याराद) के संबंध में सोमाली परंपरागत कानून या ज़ीर के तहत प्रावधान किए जाते हैं।

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कैमरून देश में प्रचलित विधवा विवाह की पृथाऐं-
उत्तरी कैमरून के मंबिला के बीच,
"पत्नियों की विरासत: दोनों लेवियों को पूरे जनजाति में अभ्यास किया जाता है"।

नाइजीरिया की संस्कृतियों में विधवा विवाह प्रचलन की पृथाऐं---
नाइजीरिया के कुछ हिस्सों में, एक महिला के लिए अपने पति के भाई से शादी करने के लिए यह एक आम प्रथा है यदि उसके बच्चे थे। इससे बच्चों को पिता की पारिवारिक पहचान और विरासत बनाए रखने में मदद मिली।
हालांकि आज कम आम है, यह अभी भी अभ्यास किया जाता है:

सन्दर्भित तालिकाऐं -----
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^ क्यों पॉलींड्री विफलता: पॉलींड्रस विवाह में अस्थिरता के स्रोत नैन्सी ई। लेविन; जोन बी रेशम http://case.edu/affil/tibet/tibetanSociety/documents/02.pdf
^ फ्राइमर-केन्स्की, टिकवा। "तामार: बाइबिल", यहूदी महिलाएं: एक व्यापक ऐतिहासिक विश्वकोष। 20 मार्च 200 9। यहूदी महिला संग्रह। (6 अगस्त, 2014 को देखा गया)
^ कुरान अध्याय 4 (अल-निसा) पद 1 9
^ सहहिह अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद
^ खज़ानोव ए। एम। सोशल इतिहास का सिस्टियन, मॉस्को, 1 9 75। पी। 82 (कोई आईएसबीएन नहीं, लेकिन पुस्तक अमेरिकी पुस्तकालयों में उपलब्ध है, रूसी शीर्षक सॉट्सियलनाया इस्टोरिया स्कीफोव, मोस्कोवा, 1 9 75)
^ गेमीया एल। हुन कंट्री एट द कैस्पियन गेट, डगेस्टन, मखाचकाला 1995, पृष्ठ 1212 (कोई आईएसबीएन नहीं, लेकिन यह पुस्तक यूएस पुस्तकालयों में उपलब्ध है, रूसी शीर्षक स्ट्राना गुनोव यू कास्पिस्किक्स वोरोट, डगेस्टन, मखाचकाला, 1 99 5)
^ नाज़ीफ शाहिज शाहरानी: अफगानिस्तान की किरगीज़ और वाखी। वाशिंगटन विश्वविद्यालय प्रेस, 2002. पी। 124
^ अफगानिस्तान - वेबैक मशीन पर नस्ल और जनजाति 2006-12-08 संग्रहित।
^ मास्री सिंगारींबुन, कुट्टागंबर: एक गांव का करो।
^ (तुर्की में) तुर्की में पारंपरिक विवाह और विवाह पर कस्टम के प्रभाव के कारण; Tuğçe पी Taçoğlu "[1]
^ कुर्द-परिवार-कुर्द-विवाह-पैटर्न; http://family.jrank.org/pages/1026/Kurdish-Families-Kurdish-Marriage-Patterns.html
^ जेम्स नॉर्मन डेल्रीम्पल एंडरसन: अफ्रीका में इस्लामी कानून। रूटलेज, 1 9 70. पी .66 https://books.google.com/books?id=j5Rb6Mwd3zoC&pg=PA46&lpg=PA46&dq=%22islamic+levirate%22&source=bl&ots=lvv7iSxxtk&sig=3xKfCnLiejCkBPFLppB3nBdxyv4&hl=hi&sa=X&oi=book_result&resnum=4&ct=result
^ डी। ए। पेरिसवाल 1 xi 35, "मंबिला जनजाति" पर डॉ मीक की रिपोर्ट पर नोट्स (पृष्ठ संख्याएं के.सी. मीक: जनजातीय अध्ययन, 1 9 2 9, खंड 1), पीपी 542-3
^ योरूबा, इग्बो और होसा-फुल्लानी के बीच लेवीरेट विवाह प्रथाओं
^ जान वाल्सीनर: संस्कृति और मानव विकास। एसएजी प्रकाशन, लंदन, 2000. पी। 100A
^ जान वाल्सीनर: संस्कृति और मानव विकास। एसएजी प्रकाशन, लंदन, 2000. पी। 99b
^ रेजिना स्मिथ ओबोलर: "नंदी विधवा", पी। 77 इन: - बेट्टी पोटाश (एड।): अफ्रीकी समाजों में विधवाएं: विकल्प और बाधाएं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1 9 86। पीपी 66-83
^ रेजिना स्मिथ ओबोलर, "नंदी विधवा", पीपी 77-78 इन: - बेट्टी पोटाश (एड।): अफ्रीकी सोसाइटी में विधवाएं: विकल्प और बाधाएं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1 9 86। पीपी 66-83
^ बेस्विक, स्टेफनी (2001)। "" हम कपड़े की तरह खरीदे गए हैं ": दक्षिण सूडान में पॉलीगीनी और लेवीरेट विवाह पर युद्ध"। पूर्वोत्तर अफ्रीकी अध्ययन। 8 (2): 35-61। डोई: 10.1353 / nas.2005.0023। 11 दिसंबर 2011 को पुनःप्राप्त।
^ "विवाह नियम: भाग II असामान्य विवाह व्यवस्था"। 2 9 जून, 2006. 11 दिसंबर 2011 को पुनःप्राप्त।
^ डेडवुड पात्रों की सूची # मार्था बुलॉक
अंतिम बार 12 दिन पहले फ्रेस्कोबॉट द्वारा संपादित किया गया था
संबंधित आलेख
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भारतीय संस्कृति में वेदों में विधवा विवाह के संकेत मिलते हैं; परन्तु महर्षि दयानन्द आदि विद्वानों ने वेदों में नियोग का भी संकेत प्राप्त किया है -

नियोग शब्द का अर्थ है - पुल्लिंग [संज्ञा]
१. नियोजित करने का कार्य अर्थात् किसी काम में लगाना ( तैनाती ) मुकर्रंरी।
२. प्रेरणा। ३. अवधारण।
४. मनु स्मृति-ग्रन्थ के अनुसार प्राचीन देव संस्कृति के उपासक आर्यों की एक प्रथा जिसके अनुसार यदि किसी स्त्री का पति न हो तो या उसे अपने पति से सन्तान न होती हो ती वह अपने देवर या पति के और किसी गोत्रज से सन्तान उत्पन्न करा लेती थी। पर कलि युग  में यह रीति वर्जित है।
७. वह आपत्ति जिसमें यह निश्चय हो कि इसी एक उपाय से यह आपत्ति दूर होगी, दूसरे से नहीं।
(कौटिल्य अर्थशास्त्र)।
सामाजिक विकृतिपूर्ण स्थितियों से बचने के लिए पुनर्विवाह की पृथाऐं तो उचित हैं परन्तु नियोग जैसी कुत्सित व्यभिचार पूर्ण पृथाओं का समर्थन करना मूर्खता पूर्ण ही है ।
पुनर्विवाह न होने की स्थिति में व्यभिचार और गर्भपात आदि बहुत से दुष्ट कर्म होंगे।
यह सम्भाव्य है ।
इसलिए पुनर्विवाह होना अच्छा है।
अथवा इच्छुक नर- नारी ऐसी स्थिति में  ब्रह्मचर्य में स्थित रहे और वंश परंपरा के लिए स्वजाति का लड़का गोद ले लें।
इससे कुल भी चलेगा और व्यभिचार भी न होगा और अगर ब्रह्मचारी न रह सके तो नियोग से सन्तानोत्पत्ति करना केवल धर्म संगत व्यभिचार को ही बढ़ावा देना होगा ।
रूढि वादी ब्राह्मणों ने व्यभिचार को धर्म संगत बनाने के लिए उसे वाद विधानों को परिधान पहना दिए ।
उन्होंने विधान बनाया कि
अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है; और उसके कोई सन्तान नहीं है ;तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर सन्तान उत्पन्न कर सकता है। 
गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है।
इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है।
ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।
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इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)

भावार्थ : ‘‘हे वीर्य सेचन करने वाले ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री  श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर।
इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारह भी
तथा एक स्थान पर -

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)
भावार्थ : ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि ! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर।
हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’
इसी प्रकार संतानोत्पत्ति में असमर्थ स्त्री भी अपने पति  को आज्ञा दे कि हे स्वामी ! आप संतानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़कर किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके संतानोत्पत्ति कीजिए।

देवर, जेठ, ससुर, अथवा कोई भी कुनबा खानदान  के व्यक्ति के संग सम्भोग से गर्भाधारण स्त्रीयाँ करा सकती है। यदि पति जीवित है तो वह व्यक्ति स्त्री के पति की इच्छा से केवल एक ही और विशेष परिस्थिति में दो संतान उत्पन्न कर सकता है।
इसके विपरीत आचरण राजदण्ड प्रायश्चित् के भागी होते हैं।
हिन्दू प्रथा के अनुसार नियुक्त पुरुष सम्मानित व्यक्ति होना चाहिए।
इसी विधि के द्वारा पाण्डु राजा की स्त्री कुन्ती और माद्री आदि ने नियोग किया ।
महाभारत में वेद व्यास विचित्रवीर्य व चित्रांगद के  मर जाने के पश्चात् उन अपने भाइयों की स्त्रियों से नियोग करके अम्बिका से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पाण्डु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की थी।
क्या प्राचीन काल में नियोग व्यवहार का  होता था 
विशेषत: पुष्यमित्र सुंग ई०पू० १८४ के समकालिक समाज में महाभारत ,पुराण, तथा समस्त स्मृति-ग्रन्थों में नियोग के प्रमाण प्रचुरता से हैं ।।

यद्यपि प्राचीन प्रागैतिहासिक मिथकों में नियोग आदि की पृथाओं समायोजित करके उन्हें प्राचीनता का पुट देने के लिए अनेक पात्रों पर आरोपत
 कर दिया महाा है ।भारत में नियोग
व्यासजी का काशिराज की पुत्री अम्बालिका से नियोग- महाभारत आदि पर्व अध्याय-106/6
वन में वनेचर ने युधिष्ठर से कहा- में तेरा धर्म नामक पिता हूँ ।

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 महाभारत वन पर्व 314/6
उस राजा बलि ने पुन: ऋषि को प्रसन्न किया और अपनी भार्या "सुदेष्णा" को उसके पास फिर सन्तान हेतु  भेजा- महाभारत आदि पर्व अध्याय 104
कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो विचित्र वीर्य की स्त्रियों से नियोग कर संतान उत्पन्न करे- महाभारत आदि पर्व 104/2
उत्तम देवर से आपातकाल में स्त्रीयाँ पुत्र की इच्छा करती हैं- महाभारत आदि पर्व 120/26

परशुराम द्वारा लोक के इक्कीस वार क्षत्रिय रहित होने पर वेदज्ञ ब्राह्मणों ने क्षत्राणियों में संतान उत्पन्न की- महाभारत आदि पर्व 103/10 परन्तु मुझे लगता है कि परशुराम वाली थ्योरी काल्पनिक व सिद्धान्त हीन है । 

जब स्मृतियों और महाभारत आदि ग्रन्थों में लिखा है कि ब्राह्मण की तीन पत्नीयों में ब्राह्मणी और क्षत्राणी अधिक  वैध हैं।

फिर तो ब्राह्मणों से  विधवाओं में उत्पन्न सन्तान ब्राह्मण ही हुई क्षत्रिय कदापि नहीं । सारी थ्योरी मनगड़न्त है स्वयं परशुराम सहस्रबाहू अर्जुन की अवैध सन्तान थे।सहस्रबाहू की पत्नी वेणुका की बहिन  परशुराम की माता थी रेणुका । और जमदग्नि वीतराग हो गये थे फिर रेणुका की इच्छा कौन आपूर्ति करता ? सहस्रबाहू ने रेणुका के साथ सहवास करके उसकी रतितृप्ति की । परन्तु इस तथ्य के छिपाने के लिए तत्कालीन पुरोहित वर्ग ने परशुराम को क्षत्रिय संहारक ही वर्णित कर दिया ।

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देखें महाभारत में

त्रिसप्तकृत्व : पृथ्वी कृत्वा नि: क्षत्रियां पुरा ।
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ।४।
तदा नि:क्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति ।
ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन्यकृत सुतार्थिन्यऽभिचक्रमु:।५।

ताभ्यां: सहसमापेतुर्ब्राह्मणा: संशितव्रता: ।
ऋतो वृतौ नरव्याघ्र न कामात् अन् ऋतौ यथा ।६।
तेभ्यश्च लेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ता: सहस्रश:तत:सुषुविरे राजन्यकृत क्षत्रियान् वीर्यवत्तारान्।७।
कुमारांश्च कुमारीश्च पुन: क्षत्राभिवृद्धये ।
एवं तद् ब्राह्मणै: क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभि:।८।
जातं वृद्धं  च धर्मेण सुदीर्घेणायुषान्वितम्।
चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्ब्राह्ममणोत्तरा: ।९।

(महाभारत आदि पर्व 64 वाँ अध्याय)
अर्थात् पूर्व काल में परशुराम ने ( 21)वार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर के महेन्द्र पर्वत पर तप किया ।
तब क्षत्रिय नारीयों ने पुत्र पाने के लिए ब्राह्मणों से मिलने की इच्छा की ।
तब ऋतु काल में ब्राह्मण ने उनके साथ संभोग कर उनको गर्भिणी किया ।
तब उन ब्राह्मणों के वीर्य से हजारों क्षत्रिय राजा हुए ।
और चातुर्य वर्ण-व्यवस्था की वृद्धि हुई।
इसे महाभारत कार ने संभोग को नियोग कहा करार दिया !
उसमें भी ब्राह्मणों को अधिक श्रेष्ठ  माना गया ।
पाण्डु कुन्ती से- हे कल्याणी अब तू किसी बड़े ब्राह्मण से संतान उत्पन्न करने का प्रयत्न कर- महाभारत आदि पर्व (120/28)

अब देंखे पुराणों में नियोग---

किसी कुलीन ब्राह्मण को बुलाकर पत्नी का नियोग करा दो, इनमे कोई दोष नहीं हैं- देवी भगवत महापुराण 1/20/6/41
जब अम्बा सत्यवती से कहती है कि व्यास जी के तेज से में भस्म हो जाऊगी इसलिए शरीर से चन्दन लपेटकर भोग कराया- देवी भगवत महापुराण 1/20/65/41
भीष्म जी ने व्यास से कहा माता का वचन मानकर , हे व्यास सुख पूर्वक परायी स्त्री से सन्तान उत्पत्ति के लिए विहार  (मैथुन )कर- देवी भागवत महापुराण 6/24/46
पति के मरने पर देवर के साथ  देवर के आभाव में इच्छा अनुसार स्त्रीयाँ नियोग द्वारा सन्तान करे  – अग्नि पुराण अध्याय (154) निम्नलिखित है।

अथ चतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

विवाहः प्रकरण-

                 ।पुष्कर उवाच।
विप्रश्चतस्रो विन्देत भार्यास्तिस्रस्तु भूमिपः।
द्वे च वैश्यो यथाकामं भार्यैकामपि चान्त्यजः॥१५४./१


धर्मकार्याणि सर्वाणि न कार्याण्यसवर्णया ।
पाणिर्ग्राह्यः सवर्णासु गृह्णीयात्क्सत्रिया शरं ॥१५४.००२


वैश्या प्रतीदमादद्याद्दशां वै चान्त्यजा तथा ।
सकृत्कन्या प्रदातव्या हरंस्तां चौरदण्डभाक् ॥१५४.००३


अपत्यविक्रयासक्ते निष्कृतिर्न विधीयते ।
कन्यादानं शचीयोगो(१) विवाहोऽथ चतुर्थिका ॥१५४.००४



विवाहमेतत्कथितं नामकर्मचतुष्टयं ।
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ ॥१५४.००५।


पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ।
मृते तु देवरे देयात्तदभावे यथेच्छया ॥१५४.००६


पूर्वात्रितयमाग्नेयं वायव्यं चोत्तरात्रयं ।
रोहिणौ चेति चरणे भगणः शस्यते सदा ॥१५४.००७


नैकगोत्रान्तु वरयेन्नैकार्षेयाञ्च भार्गव ।
पितृतः सप्तमादूर्ध्वं मातृतः पञ्चमात्तथा ॥१५४.००८


आहूय दानं ब्राह्मः स्यात्कुलशीलयुताय तु ।
पुरुषांस्तारयेत्तज्जो नित्यं कन्यप्रदानतः ॥१५४.००९


तथा गोमिथुनादानाद्विवाहस्त्वार्ष उच्यते ।
प्रार्थिता दीयते यस्य प्राजापत्यः स धर्मकृत् ॥१५४.०१०


शुल्केन चासुरो मन्दो गान्धर्वो वरणान्मिथः ।
राक्षसो युद्धहरणात्पैशाचः कन्यकाच्छलात् ॥१५४.०११


वैवाहिकेऽह्नि(१) कुर्वीत कुम्भकारमृदा शुचीं ।
जलाशये तु तां पूज्य वाद्याद्यैः(२) स्त्रीं गृहत्रयेत् ॥१५४.०१२


प्रशुप्ते केशवे नैव विवाहः कार्य एव हि ।
पोषे चैत्रे कुजदिने रिक्ताविष्टितथो न च ॥१५४.०१३


न शुक्रजीवेऽस्तमिते न शशाङ्के ग्रहार्दिते ।
अर्कार्कभौमयुक्ते भे व्यतीपातहते न हि ॥१५४.०१४


सोम्यं पित्र्यञ्च वायव्यं सावित्रं रोहिणी तथा ।१५४.०१५
टिप्पणी
१ वैवाहिकेब्दे इति घ.. , ङ.. , ञ.. , ट.. च
२ वाद्यौघैरिति ग.. , घ.. , ञ.. च
उत्तरात्रितयं मूलं मैत्रं पौष्णं विवाहभं ॥
मानुषाख्यस्तथा लग्नो मानुषाख्यांशकः शुभः ।१५४.०१६


तृतीये च तथा षष्ठे दशमैकादशेऽष्टमे ॥
अर्कार्किचन्दतनयाः प्रशस्ता न कुजोऽष्टमः ।१५४.०१७


सप्तान्त्याष्टमवर्गेषु शेषाः शस्ता ग्रहोत्तमाः ॥
तेषामपि तथा मध्यात्षष्ठः शुक्रो न शस्यते ।१५४.०१८


वैवाहिके भे कर्तव्या तथैव च चतुर्थिका ॥
न दातव्या ग्रहास्तत्र चतुराद्यास्तथैकगाः ।

पर्ववर्जं स्त्रियं गच्छेत्सत्या दत्ता सदा रतिः ॥१५४.०१९

इत्याग्नेये महापुराणे विवाहो नाम सतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥

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राजा विशाप ने स्त्री का सुख प्रजा के लिए त्याग दिया।

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वशिष्ठ ने नियोग से मदयन्ती में संतान उत्पन्न की-( विष्णु पुराण 4/4/69) देखें निम्न सन्दर्भों को -

तेन च क्वोधाश्रितेनांबुना दग्धच्छायौ तत्पादौ कल्माषतामुपगतौ ततस्स कल्माषपादसंज्ञामवाप ।५७।

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वसिष्ठशापाच्च षष्ठेषष्ठे काले राक्षसस्वभावमेत्याटव्यां पर्यटन्ननेकशो मानुषानभक्षयत् ।५८।

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एकदा तु कंचिन्मुनिमृतुकाले भार्यासंगतं ददर्श ।५९।

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तयोश्च तमतिभीषणं राक्षसस्वरूपमवलोक्य त्रासाद्दंपत्योः प्रधावितयोर्ब्रह्मणं जग्राह ।६०।

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ततस्सा ब्राह्मणी बहुशस्तमभियाचितवती ।६१।

प्रसीदेक्ष्वाकुकुलतिलकभूतस्त्वं महाराजो मित्रसहो न राक्षसः ।६२।

नार्हसि स्त्रीधर्मसुखाभिज्ञो मय्यकृतार्थायामस्मद्भर्त्तारं हंतुमित्येवं बहुप्रकारं तस्यां विलपंत्यां व्याघ्रः पशुमिवाऽरण्येऽभिमतं तं ब्राह्मणमभक्षयत् ।६३।

ततश्चातिकोपसमन्विता ब्राह्मणी तं राजानं शशाप ।।६४।

यस्मादेवं मय्यतृषप्तायां त्वयायं मत्पतिर्भक्षितः तस्मात्त्वमपि कामोपभोगप्रवृत्तॐतं प्राप्स्यसीति ।६५।

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शप्त्वा चैव साग्निं प्रविवेश ।६६।

ततस्तस्य द्वादशाब्दपर्यये विमुक्तशापस्य स्त्रीविषयाभिलाषिणो मदयंती तं स्मारयामास ।।६७।

ततः परमसौ स्त्रीभोगं तत्याज ।६८।

वसिष्ठश्चापुत्रेण राज्ञा पुत्रार्थमभ्यर्थितो मदयंत्यां गर्भाधानं चकार ।६९।

यदा च सप्तवर्षाण्यसौ गर्भेण जज्ञे ततस्तं गर्भमश्मना सा देवी जघान ।७०।     पुत्रश्चाजायत ।७१।

तस्य चाश्मक इत्येव नामाभवत् ।७२।   अश्मस्य मूलको नाम पुत्रोऽभवत्। ७३।

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योसौ निःक्षत्रे क्ष्मातलेस्मिन् क्रियमाणे स्त्रीभिर्विवस्त्राभिः परिवार्य रक्षितः ततस्तं नारीकवचमुदाहरंति ।७४।

मूलकाद्दशरथस्तस्मादिलिविलस्ततश्च विश्वसहः ।७५।

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इति श्रीविष्णुमहापुराणे चतुर्थांशो! चतुर्थोऽध्यायः ४


वाल्मीकि-रामायण  में नियोग का वर्णन-
वह तू केशरी का पुत्र क्षेत्रज नियोग से उत्पन्न बड़ा पराकर्मी है ।

★– वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड 66/28

स त्वं केसरिणः पुत्रः क्षेत्रजो भीमविक्रमः ।२७।

मारुतस्यौरसः पुत्रस्तेजसा चापि तत्समः ।२८।

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अञ्जनेति परिख्याता पत्नी केसरिणो हरेः ।८।
अभिशापादभूत्तात वानरी कामरूपिणी 
दुहिता वानरेन्द्रस्य कुञ्जरस्य महात्मनः ।९।

कपित्वे चारुसर्वाङ्गी कदा चित्कामरूपिणी।
मानुषं विग्रहं कृत्वा यौवनोत्तमशालिनी १०।

अचरत्पर्वतस्याग्रे प्रावृडम्बुदसंनिभे।
विचित्रमाल्याभरणा महार्हक्षौमवासिनी ११।

तस्या वस्त्रं विशालाक्ष्याः पीतं रक्तदशं शुभम् ।
स्थितायाः पर्वतस्याग्रे मारुतोऽपहरच्छनैः १२।

स ददर्श ततस्तस्या वृत्तावूरू सुसंहतौ 
स्तनौ च पीनौ सहितौ सुजातं चारु चाननम् ।१३।

तां विशालायतश्रोणीं तनुमध्यां यशस्विनीम् 
दृष्ट्वैव शुभसर्वाग्नीं पवनः काममोहितः १४।

स तां भुजाभ्यां पीनाभ्यां पर्यष्वजत मारुतः 
मन्मथाविष्टसर्वाङ्गो गतात्मा तामनिन्दिताम् ।१५।

सा तु तत्रैव संभ्रान्ता सुवृत्ता वाक्यमब्रवीत् 
एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति ।१६।

अञ्जनाया वचः श्रुत्वा मारुतः प्रत्यभाषत 
न त्वां हिंसामि सुश्रोणि मा भूत्ते सुभगे भयम् ।१७।

मनसास्मि गतो यत्त्वां परिष्वज्य यशस्विनि ।
वीर्यवान् बुद्धिसंपन्नः पुत्रस्तव भविष्यति १८

अभ्युत्थितं ततः सूर्यं बालो दृष्ट्वा महावने ।
फलं चेति जिघृक्षुस्त्वमुत्प्लुत्याभ्यपतो दिवम् १९।

(वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड- 66)

परन्तु यह सम्भव नहीं कि वायु (मरुत)किसी के साथ नियोग करेगा।

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मरुत ने अञ्जना से नियोग कर हनुमान को उत्पन्न किया – वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड 66/15

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हलाला भी कुछ इसी प्रकार का मौलवीयों की वासना तुष्टि का शरीयत के उशूलों सा समायोजित एक माध्यम ।

इस्लामीय पारिभाषिक शब्दों में “हलाल , और “हलाला ” यह ऐैसे दो शब्द हैं , जिनका कुरान और हदीसों में कई जगह तजिकिरा किया गया है .
दिखने में यह दौनों शब्द एक जैसे लगते हैं । परन्तु दौनों में अब अधिक भेद है ।
यह बात तो सभी जानते हैं कि,जब मुसलमान किसी जानवर के गले पर अल्लाह के नाम पर छुरी चलाकर मार डालते हैं , तो इसे हलाल करना कहते हैं .हलाल का अर्थ “अवर्जित ” होता है . लेकिन हलाला के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं .क्योंकि इस शब्द का सम्बन्ध मुसलमानों वैवाहिक जीवन पद्धति और कुरान के महिला विरोधी कानून से है .क्योंकि कुरान में अल्लाह के द्वारा बनाये हुए इस हवशी  ,और मूर्खता पूर्ण कानून की आड़ में मुल्ले , मौलवी और मुफ्ती खुल कर अय्याशी करते हैं ।
यह पृथा उम्मते सुन्नत में प्रचलित है । शिया जमात में नहीं ।
.जो कुरान और हदीसों पर आधारित है . 1-तलाक कैसे हो जाती है यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के सामने तीन बार “तलाक ” शब्द का उच्चारण कर दे , या कहे की मैंने तुझे तीनों तलाक दे दिए तो तलाक हो जाती है ..क्योंकि इस कथन को उस व्यक्ति की कसम माना जाता है .जैसा की कुरान ने कहा है , ” और अगर तुम पक्की कसम खाओगे तो उस पर अल्लाह जरुर पकड़ेगा (“सूरा – मायदा 5 :89 )तलाक के बारे में कुरान की इसी आयत के आधार पर हदीसों में इस प्रकार लिखा है , -“इमाम अल बगवी ने कहा है , यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से कहे की मैंने तुझे दो तलाक दिए और तीसरा देना चाहता हूँ , तब भी तलाक वैध ही मानी जाएगी .और सभी विद्वानों ने इसे जायज बताया है.
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(Rawdha al-talibeen 7/73” “فرع قال البغوي ولو قال أنت بائن باثنتين أو ثلاث ونوى الطلاق وقع ثم إن نوى طلقتين أو ثلاثا فذاك -“इमाम इब्न कदमा ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से कहे कि मैंने तुझे तीनों तलाक दे दिए हैं . लेकिन चाहे उसने यह बात एक ही बार कही हो , फिर भी तलाक हो जायेगा .
Al-Kafi 3/122 ” إذا قال لزوجته : أنت طالق ثلاثا فهي ثلاث وإن نوى واحدة“ 2-अल्लाह की तरकीब  ऐसा कई बार होता है कि व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक देकर बाद में पछताता है , क्योंकि औरतें गुलामों की तरह काम करती हैं , और बच्चे भी पालती हैं . कुछ पढ़ी लिखी औरतें पैसा कमा कर घर भी चलाती है . इस इसलिए लोग फिर से अपनी औरत चाहते है . ” हे नबी तू नहीं जानता कि कदाचित् तलाक के बाद अल्लाह कोई नयी तरकीब सुझा दे ” सूरा -अत तलाक 65 :1 और इस आयत के बाद काफी सोच विचार कर के अल्लाह ने जो उपाय निकाला है ,वह औरतों के लिए शर्मनाक है 3-
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हलाला तलाक़ दी हुई अपनी बीवी को दोबारा अपनाने का एक तरीका है; जिस के तहत मत्लूका(तलाक दी गयी पत्नी ) को किसी दूसरे मर्द के साथ निकाह करना होगा और उसके साथ हम बिस्तरी की शर्त लागू होगी फिर वह तलाक़ देगा, बाद इद्दत ख़त्म औरत का तिबारा निकाह अपने पहले शौहर के साथ होगा, !
तब जा कर दोनों तमाम जिंदगी गुज़ारेंगे.हलाला के बारे में कुरान और हदीसों में इस प्रकार लिखा है ।
, और यदि किसी ने पत्नी को तलाक दे दिया , तो उस स्त्री को रखना जायज नहीं होगा . जब तक वह स्त्री किसी दूसरे व्यक्ति से सहवास (ज़िना ) कर ले .फिर वह व्यक्ति भी उसे तलाक दे दे . तो फिर उन दौनों के लिए एक दूसरे की तरफ पलट आने में कोई दोष नहीं होगा।
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कुरान के हवाले से  “सूरा – बकरा 2 :230 “فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُ مِن بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَن يَتَرَاجَعَا إِن ظَنَّا أَن يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ 2:230 (नोट -इस आयत में अरबी में ” تحلّل لهُ ‘तुहल्लिल लहु”शब्द आया है , मुस्लिम मौलवीयों ने  इसका अर्थ “wedding विवाह ” करते  हैं , जबकि sexual intercourse स्त्री-पुरुष के अन्तरंग शारीरिक सम्बन्ध  सही अर्थ होता है . इसी से हलालाह حلالہ ” शब्द का विकास हुआ है . अंग्रेजी के एक अनुवाद में है “uptill she consummated intercourse with another person “अर्थात् जब तक तलाक शुदा महिला किसी दूसरे व्यक्ति से सम्भोग नहीं करवा लेती ) तब तक निकाह पुन: मान्य नहीं होता है और तलाक शुदा औरत का हलाला करवाकर घर वापसी को ” रजअ رجع” कहा जाता है ।
हलाला इस तरह होता है, पहले तलाकशुदा महिला इद्दत का समय पूरा करे। फिर उसका कहीं और निकाह हो। शौहर के साथ उसके वैवाहिक रिश्ते बनें। इसके बाद शौहर अपनी मर्जी से तलाक दे या उसका इंतकाल हो जाए। फिर बीवी इद्दत का समय पूरा करे। तब जाकर वह पहले शौहर से फिर से निकाह कर सकती है। बड़े बड़े इस्लाम के आलिम तलाक शुदा पत्नी को वापिस रखने के लिए हलाला को सही मानते हैं
4-हलाला का असली उद्देश्य  पति पत्नी में सुलह कराना नहीं , बल्कि तलाक दी गयी औरत से वेश्यावृत्ति करना है , जो इन हादिसों से साबित होता है , -“आयशा ने कहा कि रसूल के पास रिफ़ा अल कुरैजी कि पत्नी आई और बोली , रीफा ने मुझे तलक दे दिया था . और मैंने अब्दुर रहमान बिन अबू जुबैर से शादी कर ली , लेकिन वह नपुंसक है , अब मैं वापिस रिफ़ाके पास जाना चाहती हूँ . रसूल ने कहा जब तक अब्दुर रहमान तुम्हारे साथ विधिवत् सम्भोग नहीं कर लेता , तुम रिफ़ा के पास वापिस नहीं जा सकती देखें--- इस हदीश के हवाले से. “إلا إذا كان لديك علاقة جنسية كاملة مع ” Bukhari, Volume 7, किताब 63, सुमार 186 -“उम्मुल मोमिनीन आयशा ने कहा कि एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी से तीन बार तलाक कह दिया , और फिर से अपनी पत्नी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की इच्छा प्रकट की . रसूल ने कहा ऐसा करना बहुत बड़ा गुनाह है .. और जब तक उसकी पत्नी किसी दुसरे मर्द का शहद और वह उसके शहद का स्वाद नहीं चख लेते .
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حتى انها ذاق العسل من الزوج الآخر وذاقه العسل لها ” Abu Dawud, Book 12, Number 2302 5-हलाला व्यवसाय जिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पति -पत्नी में झगड़े होते रहते हैं ,वहां मुल्ले मुफ्ती अपने दफ्तर बना लेते हैं , और साथ में दस बीस मुस्टंडे भी रखते हैं .इनका काम फतवे देना होता है ! चूँकि इस विज्ञानं के युग में नेट , फोन ,और फेक्स जैसे साधन सामान्य है , और उन्ही के द्वारा तलाक देने का रिवाज हो चला है . कई बार मेल या फेक्स से औरत को तलाक की सूचना नहीं मिलती फिर भी मुल्ले तलाक मानकर हलाला तय कर देते हैं . देखिये देवबंद का फतवा अगर इंसान शराब के नशे में अपनी बीवी को फोन पर तीन बार तलाक बोल दे, लेकिन बाद में उसे पछतावा हो और वह तलाक न चाहता हो …तो क्या ऐसी सूरत में भी तलाक हो जाएगा’दारुल उलूम देवबंद के फतवा विभाग दारुल इफ्ता से। इस पर मुफ्तियों ने फतवा जारी किया है कि अगर तलाक नशे की हालत में दिया गया हो, तो भी पति-पत्नी का रिश्ता खत्म हो जाएगा।
मुल्ले मुफ्ती फ़ोन से या इशारे से दी गयी तलाक को जिन हदीसों का हवाला देते हैं , उन में से एक यह है , -“आयशा ने कहा कि एक व्यक्ति ने सिर्फ तीन तलाक देने का इशारा ही किया था , और तलाक हो गयी , फिर उसकी पत्नी ने दुसरे आदमी से शादी कर ली .और अपने पहले पति के पास जाने की इच्छा प्रकट की . क्या ऐसा संभव है ? रसूल ने कहा जब तक उसका दूसरा व्यक्ति उसे तीसरे आदमी से सहवास नहीं नहीं करा देता , औरत पूर्व पति के पास नहीं जा सकती .Bukhari, Volume 7, Book 63, Number 187 6-हलाली मुल्लों की हकीकत चूँकि हलाला करवाने वाली औरत को किसी दूसरे व्यक्ति के साथ सम्भोग करना और उसका सबूत भी प्रस्तुत करना जरूरी होता है , और फिर ऐसे व्यक्ति को खोजना होता है , जो बाद में उसे तलाक भी दे दे, तभी वह औरत अपने पहले पति के पास जा सकती है
. इस लिए इन मुल्लों ने बेकार जवान पाल रखे हैं , जो रुपये लेकर हलाला का धन्धा करते है . यह लोग जासूसी करते हैं और जहाँ भी कोई शराब पीकर भी औरत से तलाक बोल देता है वहीँ हलाला करने धमक जाते हैं . विवश होकर मुर्ख मुसलमान अपनी पत्नियाँ हलाला करा लेते है, कई बार तो यह मुफ्ती फर्जी तलाकनामे भी जारी कर देते हैं .दिल्ली के पास बवाना गाँव में यही होता है
.ऐसी औरतें जिनका हलाला हो जाता है , वह अल्लाह का हुक्म समझकर चुप रहती है
नियोग पृथा तथा हलाला पृथाओं को मजाहिब लिबाशो में निजामत कर स्त्रीयों से अय्याशी करने के निहायत पुराने तरीके हैं ।
ये केवल जाहिलों पर नाजिल किए जाते हैं ।
और ब्राह्मणों तथा मौलवीयों को अय्याशी का पूरी मोहलत मिलती है ।


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सदियों से नारी जीवन की सात नाम यू शय्या शरीयतों की श्रृंखलाओं में परिबद्ध रहीं -


"नारी जीवन प्रवञ्चनाऐं"

जिस समाज में नारी को देवी देवी के रूप में मानकर फिर उसके साथ दमन और शोषण की दीर्घ वीथिका दृष्टिगोचर हो वह केवल एक आडम्बर और दम्भ की ही अभिव्यक्ति है ।

 इस बात को स्वीकार करने लिए हमारे पास दृढ़ साक्ष्य अथवा आधार भी नहीं कि प्राचीन काल में स्त्री पुरुषों के आधिपत्य से मुक्त थी ।

जो नारी एक करुणा और मातृत्व का भाव धारण कर आजीवन बच्चों ही नही अपितु पुरूषों, और बुर्जुगों का  भी पालन-पोषण करती रही हो। 

उसी नारी की अस्मिता का दोहन करना पुरुष ने अपना पौरुष मान लिया और उसपर क्रूरता से अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। 

अपनी सत्ता छीन जाने के बाद नारी के इतिहास में तरह-तरह के उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं।


पूर्व वैदिक काल में ‘‘महिलाओं की स्थिति समाज में काफी ऊंची थी और उन्हें अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी।

महिला शब्द सूचित करता है कि नारी कभी समाज में पूज्या और श्रद्धा की मात्रा थी।

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"महिला=मह् पूजायाम्"+ इलच्+ टाप्"

महिला=  मह पूजायाम् + इलच् टाप् - उणादि सूत्र ।  १ । ५५ । इति  )

कुछ शोधकों का मत है कि वैदिक काल में विधवा पुर्नविवाह प्रचलित नहीं था ।

परन्तु कुछ विद्वान ऋग्वेद की ऋचाओ में विधवा विवाह के भी दर्शन करते हैं ।

 भारतीय इतिहास का वास्तविक काल वैदिक सभ्यता से जुड़ा हुआ है। चारों वेदों में ऋग्वेद को सबसे अधिक प्राचीन वेद माना है। इसके बाद यजुर्वेद, समार्वेद और अर्थर्ववेद को माना जाता है। 

परन्तु अधिकातर ऋचाऐं सभी वेदों में ऋ’’ ऋग्र्वेद में ब्रम्हज्ञानी पुरूषों के साथ-साथ ब्रम्हवादिनी महिलाओं का भी नाम आता है। इनमें विश्ववारा लोप, मुद्रा, घोषा, इन्द्राणी, देवयानी आदि प्रमुख महिलाएं हैं।

 ‘‘एक तरफ जहां भारतीय संस्कृति में नारी को सदा ऊंचा स्थान मिला है।

नारी को मर्यादा के क्षेत्र में  परबद्धा कर के उसके मानसिक विकास के द्वा ही बन्द कर दिये गये ।


नारी के ऊपर तरह-तरह की बंदिसें जैसे-पर्दे में रहना, पुरुषों की आज्ञा का पालन करना, प्रति उत्तर न देना, घर में ही कैद रहना। 

इन सब बंदिसों ने नारी को नारी से भोग्या के रूप में परिवर्तित कर दिया, तब नारी मात्र संतान पैदा करने के उपकरण के रूप में प्रयोग की जाने लगी।  

 11वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी के समकक्ष मध्यकाल में भारतीय नारी का दुर्भाग्य कहें या कुछ और कि उसे एक तरफ देवी बनाकर पूजा जाता है, तो दूसरी ओर सेविका बनाकर शोषण किया जाता है।

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आज भी दक्षिण भारत में कन्याओ  का विवाह पहले मंदिरों में देवों से किया जाता है तथा  फिर देव को पण्डों में आरोपित कर उन पण्डों द्वारा  उन कन्याओं का प्रथम योनि शील का भेदन किया जाता था । यही देव दासी पृथा पुजारियों की वासना तृप्ति का साधन थी ।और मन्दिर उनके आराम गाह और आमन्दनी मात्र के श्रोत।

एक भयानक सच यह भी है कि हमारे सभ्रांत समाज में आज भी बेटियों को टेंटुआ दबाकर मार दिया जाता है। बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में बेटी का जन्म होते ही, उसे पैदा करवाने वाली दाई कुछ अतिरिक्त पैसा लेकर नवजात का गला दबाकर, उसे आक का दूध पिलाकर, धान की भूसी मुंह में डालकर या सुतली गले में लपेटकर, उसे मरोड़कर अथवा सर्दी के दिनों में गीला कपड़ा लपेटकर बच्ची की जान ले ली जाती हैं।’’ 

इसका एक मात्र कारण दहेज तथा विदेशी अथवा दबंगो द्वारा गरीब और निम्न जाति की कन्या को वासना तृप्ति हेतु अपहरण करना आदि ।

वर्तमान परिवेश में तो नारी पर दहेज के नाम पर, बलात्कार का शिकार बनाकर, मारपीट करके अपना गुलाम बनाना आम बात हो चुकी है। बहुत बार तो ‘‘परिवारों में महिला को निकटतम् संबंधियों की वासना  का शिकार होना पड़ता है।’’ जिनपे वो विश्वास करती और उम्मीद करती हैं  अपनी सुरक्षा की, वो ही ईज्जत का तार-तार करते रहते हैं। 

वैदिक काल में सर्वत्र पत्नी को सम्मान प्राप्त नहीं था। वेदों में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनसे पति की पत्नी के प्रति हेय दृष्टि का आभास मिलता है। स्त्रियों के विषय में ऋग्वेद में जो विवरण आए हैं।

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इस सन्दर्भ में इन्द्राणी और कृषाकपि का प्रसंग अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 

इन्द्र की अनुपस्थिति में वृक्षाकपि ने इन्द्राणी का शील भंग करने का प्रयास किया, जिसे इन्द्राणी में प्रयत्नपूर्वक असफल कर दिया। 

इन्द्र के आने पर इन्द्राणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं, कि वृषाकपि मेरा घनिष्ठ मित्र है। स्वयं इन्द्र भी इसी कामुक प्रवृति का देव है । जो सुरा और सनुन्दरीयों ही जीवन का आनन्द खोजता है 

 इन्द्र शचि से कहता है  कि वृषाकपि के बिना मुझे सुख नहीं प्राप्त हो सकता-

"नाहमिन्द्राणि शरण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते।‘‘

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 ब्याज पर उधार में दिए जाने वाली वस्तुओं में स्वर्ण, अन्न और गायों के साथ स्त्रियों का भी उल्लेख आता है। 

सम्भवतः इसी कारण पी0वी0 काणे जी लिखते हैं, ‘‘ऋग्वेद (1.109.12) गलत सन्दर्भ), मैत्रायाणी संहिता (1.10.1), निरूक्त (6.9,1.3) तैत्तिरीय ब्राह्मण (1.7,10) आदि के अवलोकन से यह विदित होता है कि प्राचीन काल में विवाह के लिए लड़कियों का क्रय-विक्रय होता था।‘‘ 


1.7.10.0
दे॒वैरित्या॑ह स॒त्यस॑वङ्करोतित्रि॒ष्टुभ॑मे॒वैतेना॑भि॒
व्याह॑रति सत्यानृ॒तेए॒वाव॑रुन्धे करोति 
श॒तेन्द्रि॑य॒ष्षट्च॑।।10 ।।
1.7.10.1
मि॒त्रो॑ऽसि॒ वरु॑णो॒ऽसीत्या॑ह ।मै॒त्रव्वाँ अहः॑ ।
 वा॒रु॒णी रात्रिः॑ ।अ॒हो॒रा॒त्राभ्या॑मे॒वैन॑मु॒पाव॑हरति । 
मि॒त्रो॑ऽसि॒ वरु॑णो॒ऽसीत्या॑ह । मै॒त्रो वै दक्षि॑णः । 
वा॒रु॒णस्स॒व्यः । वै॒श्व॒दे॒व्या॑मिक्षा ।
 स्वमे॒वैनौ॑ भाग॒धेय॑मु॒पाव॑हरति । 
सम॒हव्विँश्वैर्दे॒वैरित्या॑ह।। 59 ।।
1.7.10.2
वै॒श्व॒दे॒व्यो॑ वै प्र॒जाः । ता ए॒वाद्या कुरुते ।
 ख्ष॒त्त्रस्य॒ नाभि॑रसि ख्ष॒त्त्रस्य॒ 
योनि॑र॒सीत्य॑धीवा॒समास्तृ॑णाति सयोनि॒त्वाय॑ । 
स्यो॒नामा सी॑द सु॒षदा॒मा सी॒देत्या॑ह ।
 य॒था॒य॒जुरे॒वैतत् । मा त्वा॑ हिसी॒न्मा मा॑ 
हिसी॒दित्या॒हाहि॑सायै । निष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑ण
 प॒स्त्यास्वा साम्राज्याय सु॒क्रतु॒रित्या॑ह ।
 साम्राज्यमे॒वैन॑ सु॒क्रतु॑ङ्करोति । 
ब्रह्मा(३)न्त्व रा॑जन्ब्र॒ह्माऽसि॑ सवि॒ताऽसि॑ स॒त्यस॑व॒ 
इत्या॑ह । स॒वि॒तार॑मे॒वैन॑ स॒त्यस॑वङ्करोति ।। 60 ।।
1.7.10.3
ब्रह्मा(३)न्त्व रा॑जन्ब्र॒ह्माऽसीन्द्रो॑ऽसि स॒त्यौजा॒ इत्या॑ह ।
 इन्द्र॑मे॒वैन॑ स॒त्यौज॑सङ्करोति । ब्रह्मा(३)न्त्व
 रा॑जन्ब्र॒ह्माऽसि॑ मि॒त्रो॑ऽसि सु॒शेव॒ इत्या॑ह । मि॒त्रमे॒वैन॑ 
सु॒शेव॑ङ्करोति । ब्रह्मा(३)न्त्व रा॑जन्ब्र॒ह्मासि॒ वरु॑णोऽसि
 स॒त्यध॒र्मेत्या॑ह । वरु॑णमे॒वैन॑ स॒त्यध॑र्माणङ्करोति । 
स॒वि॒ताऽसि॑ स॒त्यस॑व॒ इत्या॑ह । गा॒य॒त्रीमे॒वैतेना॑भि॒ व्याह॑रति । इन्द्रो॑ऽसि स॒त्यौजा॒ इत्या॑ह । त्रि॒ष्टुभ॑मे॒वैतेना॑भि॒ व्याह॑रति ।। 61 ।।
1.7.10.4
मि॒त्रो॑ऽसि सु॒शेव॒ इत्या॑ह । जग॑तीमे॒वैतेना॑भि॒ व्याह॑रति ।
 स॒त्यमे॒ता दे॒वताः । स॒त्यमे॒तानि॒ छन्दा॑सि । 
स॒त्यमे॒वाव॑रुन्धे । वरु॑णोऽसि स॒त्यध॒र्मेत्या॑ह ।
 अ॒नु॒ष्टुभ॑मे॒वैतेना॑भि॒ व्याह॑रति । स॒त्या॒नृ॒ते वा 
अ॑नु॒ष्टुप् । स॒त्या॒नृ॒ते वरु॑णः ।स॒त्या॒नृ॒ते ए॒वाव॑रुन्धे ।।62।।
1.7.10.5
नैन॑ सत्यानृ॒ते उ॑दि॒ते हि॑स्तः । य ए॒वव्वेँद॑ । इन्द्र॑स्य॒
 वज्रो॑ऽसि॒ वार्त्र॑घ्न॒ इति॒ स्फ्यं प्रय॑च्छति ।वज्रो॒ वै स्फ्यः। 
वज्रे॑णै॒वास्मा॑ अवरप॒र र॑न्धयति । ए॒व हि तच्छ्रेयः॑ ।
 यद॑स्मा ए॒ते रध्ये॑युः । दिशो॒ऽभ्य॑य राजा॑ऽभू॒दिति॒ 
पञ्चा॒क्षान्प्रय॑च्छति । ए॒ते वै सर्वेऽयाः । 
अप॑राजायिनमे॒वैन॑ङ्करोति ।। 63 ।।
1.7.10.6

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उनका निष्कर्ष है कि वैदिक काल में स्त्रियां बहुत नीची दृष्टि से देखी जाती थीं। उन्हें सम्पत्ति में कोई भाग नहीं मिलता था तथा वे आश्रित थीं।

यदि वैदिक काल की असुर स्त्रियों का अवलोकन करें, तो हम पाते हैं कि उनकी दशा तो और भी अधिक सोचनीय थी। वास्तव में  असुर स्त्रियों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था। जैसा कि इन्द्र असुर स्त्रीयों के गर्भस्थ शिशुओं का नास कर देती है ।

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वशिष्ठ स्मृति में वर्णन मिलती है । कि काले वर्णों वाली शूद्र नारी केवल वासना तृप्ति के लिए ही हैं   पत्नी बनाकर धार्मिक कृत्यों के लिए नहीं ।

"द्विजस्य भार्या शूद्रा तु धर्मार्थम् न क्व चिद् भवेत् रत्यर्थम् एता तस्य रागान्धस्य प्रकीर्तिता।।(२६/५ विष्णु स्मृति)

द्विजस्य भार्या शूद्रा तु धर्मार्थे न भवेत् क्वचित्।५

रत्यर्थेमेव सा तस्य रागान्धस्य प्रकीर्तिका।६

विष्णु स्मृति (२६)

ऐसी ही बातें 

गोभिल स्मृति याज्ञवल्कय स्मृति  एवं व्यास स्मृति में भी कही गयी हैं। 

सन्दर्भ संकेत :1. त्रिपाठी, रमेश कुमार, समकालीन हिन्दी पत्रकारिता में नारी सन्दर्भ, पृ0 982. त्रिपाठी, रमेश कुमार, समकालीन हिन्दी पत्रकारिता में नारी सन्दर्भ, पृ0 973. त्रिपाठी, रमेश कुमार, समकालीन हिन्दी पत्रकारिता में नारी सन्दर्भ, पृ0 97-984. ऋग्वेद, 10.86 सूक्त: 1.134.35. ऋग्वेद 10.86.12 तथा डॉ0 कमला, ऋग्वेद में नारी, पृ0 126.6. जोसेफ गापिया, भारत में बालिका, पृ0 28-29.7. महाभारत 9.1.46.8. त्रिपाठी, रमेश कुमार, समकालीन हिन्दी पत्रकारिता में नारी सन्दर्भ पृ0 789. त्रिपाठी, रमेश कुमार, समकालीन हिन्दी पत्रकारिता में नारी सन्दर्भ पृ0 78 से उद्धृत। 10. पाणिनि, अष्टाध्यायी 4.1.33.11. त्रिपाठी रमेश कुमार, समकालीन हिन्दी पत्रकारिता में नारी सन्दर्भ पृ0 79। 12. वशिष्ठ, वशिष्ठ धर्म सूत्र 18.1813. गोमिल स्मृति 9.103, 9.10414. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.88। 15. व्यास स्मृति 2.12।

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अथर्ववेदः/काण्डं २०/सूक्तम् १२६


अथर्ववेदः - काण्डं २०
सूक्तं २०.१२६
वृषाकपिरिन्द्राणी च।

दे. इन्द्रः। छ. पङ्क्तिः
वृषाकपिसूक्तम्


              ( अथर्ववेद  20/126)
वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत ।
यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१॥


परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः ।
नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२॥

किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः ।
यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥३॥

यमिमं त्वं वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि ।
श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥४॥

प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत्।
शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥५॥

न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशुतरा भुवत्।
न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥६॥

उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्गं भविष्यति ।
भसन् मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥७॥

किं सुबाहो स्वङ्गुरे पृथुष्टो पृथुजाघने ।
किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥८॥

अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते ।
उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥९॥

संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति ।
वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१०॥

इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् ।
नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥११॥____________________________________

नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते ।
यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१२॥

वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे ।
घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१३॥

उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंसतिम् ।
उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१४॥

वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत्।
मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१५॥

न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत्।
सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१६॥

न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते ।
सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१७॥

अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत्।
असिं सूनां नवं चरुमादेधस्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१८॥

अयमेमि विचाकशद्विचिन्वन् दासमार्यम् ।
पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१९॥

धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना ।
नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहामुप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२०॥

पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै ।
य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२१॥

यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन ।
क्व स्य पुल्वघो मृगः कमगं जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२२॥

पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम् ।
भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२३॥

________________

ऋग्वेदः सूक्तं १०.८६


वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत ।
यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१॥

परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः ।
नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२॥

किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः ।
यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥३॥

यमिमं त्वं वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि ।
श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥४॥

प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत् ।
शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥५॥

न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशुतरा भुवत् ।
न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥६॥

उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्ग भविष्यति ।
भसन्मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥७॥

किं सुबाहो स्वङ्गुरे पृथुष्टो पृथुजाघने ।
किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥८॥


अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते ।
उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥९॥

संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति ।
वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१०॥

इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् ।
नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥११॥

नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेरृते ।
यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१२॥

वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे ।
घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१३॥

_____________________________________
उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम् ।
उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१४॥

वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत् ।
मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१५॥

न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत् ।
सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१६॥

न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते ।
सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१७॥

अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत् ।
असिं सूनां नवं चरुमादेधस्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१८॥़

अयमेमि विचाकशद्विचिन्वन्दासमार्यम् ।
पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१९॥

धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना ।
नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहाँ उप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२०॥

पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै ।
य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२१॥

यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन ।
क्व स्य पुल्वघो मृगः कमगञ्जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२२॥

पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम् ।
भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२३॥

          सायणभाष्यम्

               ॥श्रीगणेशाय नमः॥

यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् ।निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थमहेश्वरम् ॥

अष्टमाष्टकस्य चतुर्थोऽध्याय आरभ्यते ।              तत्र ‘वि हि ' इति त्रयोविंशत्यृचं द्वितीयं सूक्तम् । वृषाकपिर्नामेन्द्रस्य पुत्रः । स चेन्द्राणीन्द्रश्चैते त्रयः संहताः संविवादं कृतवन्तः । तत्र ‘वि हि सोतोरसृक्षत ' : किं सुबाहो स्वङ्गुरे ' ‘ इन्द्राणीमासु नारिषु ' इति द्वे ‘ उक्ष्णो हि मे ' ' अयमेमि' इति चतस्र इत्येता नवर्च इन्द्रवाक्यानि । अतस्तासामिन्द्र ऋषिः । ‘ परा हीन्द्र ' इति पञ्च ‘ अवीराम् ' इति द्वे ' वृषभो न तिग्मशृङ्गः' इत्याद्याश्चतस्र इत्येकादशर्चं इन्द्राण्या वाक्यानि । अतस्तासामिन्द्राण्यृषिः । ‘ उवे अम्ब ' ‘ वृषाकपायि रेवति ' • पशुर्ह नाम ' इति तिस्रो वृषाकपेर्वाक्यानि । अतस्तासां वृषाकपिर्ऋषिः । सर्वं सूक्तमैन्द्रं पञ्चपदापङ्क्तिच्छन्दस्कम् । तथा चानुक्रान्तं -- वि हि त्र्यधिकैन्द्रो वृषाकपिरिन्द्राणीन्द्रश्च समूदिरे पान्तुम्। ' इति । षष्ठेऽहनि ब्राह्मणाच्छंसिन उक्थ्यशस्त्र एतत्सूक्तम् । सूत्रितं च ---- ‘ अथ वृषाकपिं शंसेद्यथा होताज्याद्यां चतुर्थे ' ( आश्व. श्रौ. ८. ३) इति । यदि षष्ठे:हन्युक्थ्यस्तोत्राणि द्विपदासु न स्तुवीरन् सामगा यदि वेदमहरग्निष्टोमः स्यात्तदानीं ब्राह्मणाच्छंसी माध्यंदिने सवन आरम्भणीयाभ्यः ऊर्ध्वमेतत्सूक्तं शंसेद्विश्वजित्यपि । तथा च सूत्रितं -- सुकीर्तिं ब्राह्मणाच्छंसी वृषाकपिं च पङ्क्तिशंसम् ' (आश्व. श्रौ. ८. ४) इति ।।

___________

वि । हि । सोतोः । असृक्षत । न । इन्द्रम् । देवम् । अमंसत ।यत्र । अमदत् । वृषाकपिः । अर्यः । पुष्टेषु । मत्ऽसखा । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१।

"सोतोः सोमाभिषवं कर्तुं "वि "असृक्षत । यागं प्रति मया विसृष्टा अनुज्ञाताः स्तोतारो वृषाकपेर्यष्टारः । “हि इति पूरणः । तत्र "देवं द्योतमानम् "इन्द्रं मां “न “अमंसत । मया प्रेरिताः सन्तोऽपि ते स्तोतारो न स्तुतवन्तः । किंतु मम पुत्रं वृषाकपिमेव स्तुतवन्तः । "यत्र येषु “पुष्टेषु सोमेन प्रवृद्धेषु यागेषु "अर्यः स्वामी “वृषाकपिः मम पुत्रः मत्सखा मम सखिभूतः सन् “अमदत् सोमपानेन हृष्टोऽभूत् । यद्यप्येवं तथापि “इन्द्रः अहं "विश्वस्मात् सर्वस्माज्जगतः "उत्तरः उत्कृष्टतरः। माधवभट्टास्तु वि हि सोतोरित्येषर्गिन्द्राण्या वाक्यमिति मन्यन्ते। तथा च तद्वचनम् । इन्द्राण्यै कल्पितं हविः कश्चिन्मृगोऽदूदुषदिन्द्रपुत्रस्य वृषाकपेर्विषये वर्तमानः । तत्रेन्द्रमिन्द्राणी वदति । तस्मिन्पक्षे त्वस्या ऋचोऽयमर्थः । सोतोः सोमाभिषवं कर्तुं वि ह्यसृक्षत। उपरतसोमाभिषवा आसन् यजमाना इत्यर्थः । किंच मम पतिमिन्द्रं देवं नामंसत स्तोतारो न स्तुवन्ति । कुत्रेति अत्राह । यत्र यस्मिन् जनपदे पुष्टेषु प्रवृद्धेषु धनेष्वर्यः स्वामी वृषाकपिरमदत् । मत्सखा मत्प्रियश्चेन्द्रो विश्वस्मात् सर्वस्माज्जगत उत्तरः उत्कृष्टतरः ।।


___________

परा । हि । इन्द्र । धावसि । वृषाकपेः । अति । व्यथिः ।नो इति । अह । प्र । विन्दसि । अन्यत्र । सोमऽपीतये । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥२।

सायण-भाष्य

हे “इन्द्र त्वम् "अति= अत्यन्तं “व्यथिः= चलितः "वृषाकपेः =वृषाकपिं “परा “धावसि= प्रतिगच्छसि । "अन्यत्र "सोमपीतये सोमपानाय “नो "अह नैव च “प्र “विन्दसि =प्रगच्छसीत्यर्थः । सोऽयम् "इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ।

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किम् । अयम् । त्वाम् । वृषाकपिः । चकार । हरितः । मृगः ।यस्मै । इरस्यसि । इत् । ऊं इति । नु । अर्यः । वा । पुष्टिऽमत् । वसु । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥३।

हे इन्द्र “त्वां प्रति "हरितः हरितवर्णः "मृगः मृगभूतः "अयं वृषाकपिः। मृगजातिर्हि वृषाकपिः । "किं प्रियं "चकार अकार्षीत् । "यस्मै वृषाकपये "पुष्टिमत् पोषयुक्तं "वसु धनम् "अर्यो “वा उदार इव स त्वं "नु क्षिप्रम् “इरस्यसीत् प्रयच्छस्येव । यः "इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥

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यम् । इमम् । त्वम् । वृषाकपिम् । प्रियम् । इन्द्र । अभिऽरक्षसि ।श्वा । नु । अस्य । जम्भिषत् । अपि । कर्णे । वराहऽयुः । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥४

हे “इन्द्र “त्वं "प्रियम् इष्टं पुत्रं "यमिमं "वृषाकपिम् "अभिरक्षसि परिपालयसि “अस्य एनं वृषाकपिम् । द्वितीयार्थे षष्ठी। "वराहयुः वराहमिच्छन् “श्वा "नु क्षिप्रं "जम्भिषत् भक्षयतु । "अपि च “कर्णे गृह्णात्विति शेषः । श्वानो हि वराहमिच्छन्ति । सिद्धमन्यत् ॥

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प्रिया । तष्टानि । मे । कपिः । विऽअक्ता । वि । अदूदुषत् ।शिरः । नु । अस्य । राविषम् । न । सुऽगम् । दुःऽकृते । भुवम् । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥५।

“मे मह्यमिन्द्राण्यै “तष्टानि यजमानैः कल्पितानि “प्रिया प्रियाणि “व्यक्ता व्यक्तान्याज्यैर्विशेषेणाक्तानि हवींषि कश्चित् वृषाकपेर्विषये वर्तमानः "कपिः “व्यदूदुषत् दूषयामास । ततोऽहम् “अस्य तत्कपिस्वामिनो वृषाकपेः “शिरो “नु क्षिप्रं "राविषं लुनीयाम् । "दुष्कृते दुष्टस्य कर्मणः कर्त्रे वृषाकपयेऽस्मै "सुगं सुखं न "भुवम् अहं न भवेयम् । अस्मै सुखप्रदात्री न भवामीत्यर्थः । अस्या मम पतिः “इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ १ ॥

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न । मत् । स्त्री । सुभसत्ऽतरा । न । सुयाशुऽतरा । भुवत् ।न । मत् । प्रतिऽच्यवीयसी । न । सक्थि । उत्ऽयमीयसी । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥६।

“मत् मत्तोऽन्या "स्त्री नारी "सुभसत्तरा अतिशयेन सुभगा "न "भुवत् न भवति । नास्तीत्यर्थः । किंच मत्तोऽन्या स्त्री "सुयाशुतरा अतिशयेन सुसुखातिशयेन सुपुत्रा वा "न भवति । तथा च मन्त्रान्तरं -- ददाति मह्यं यादुरी याशूनां भोज्या शता' (ऋ. सं. १. १२६. ६) इति । किंच “मत् मत्तोऽन्या “प्रतिच्यवीयसी पुमांसं प्रति शरीरस्यात्यन्तं च्यावयित्री “न अस्ति । किंच मत्तोऽन्या स्त्री “सक्थ्युद्यमीयसी संभोगेऽत्यन्तमुत्क्षेप्त्री “न अस्ति । न मत्तोऽन्या काचिदपि नारी मैथुनेऽनुगुणं सक्थ्युद्यच्छतीत्यर्थः । मम पतिः "इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः उत्कृष्टः ॥

_____________    

उवे । अम्ब । सुलाभिके । यथाऽइव । अङ्ग । भविष्यति ।भसत् । मे । अम्ब । सक्थि । मे । शिरः । मे । विऽइव । हृष्यति । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥७

एवमिन्द्राण्या शप्तो वृषाकपिर्ब्रवीति । “उवे इति संबोधनार्थो निपातः । हे "अम्ब मातः “सुलाभिके शोभनलाभे त्वया "यथैव येन प्रकारेणैवोक्तं तथैव तत् "अङ्ग क्षिप्रं "भविष्यति भवतु । किमनेन त्वदनुप्रीतिकारिणा ग्रहेण मम प्रयोजनम् । किंच "मे मम पितुः त्वदीयो “भसत् भग उपयुज्यताम्। किंच मम पितुस्त्वदीयं "सक्थि चोपयुज्यताम् । किंच "मे मम पितरमिन्द्रं त्वदीयं "शिरः च प्रियालापेन “वीव यथा कोकिलादिः पक्षी तद्वत् “हृष्यति हर्षयतु । मम पिता “इन्द्रः "विश्वस्मात् “उत्तरः ॥

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किम् । सुबाहो इति सुऽबाहो । सुऽअङ्गुरे । पृथुस्तो इति पृथुऽस्तो । पृथुऽजघने ।किम् । शूरऽपत्नि । नः । त्वम् । अभि । अमीषि । वृषाकपिम् । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥८

क्रुद्धामिन्द्र उपशमयति । हे “सुबाहो हे शोभनबाहो "स्वङ्गुरे शोभनाङ्गुलिके “पृथुष्टो पृथुकेशसंघाते “पृथुजघने =विस्तीर्णजघने "शूरपत्नि= वीरभार्ये हे इन्द्राणि “त्वं "नः अस्मदीयं “वृषाकपिं “किं किमर्थम् "अभ्यमीषि अभिक्रुध्यसि । एकः किंशब्दः पूरणः । यस्य पिता “इन्द्रः अहं “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥

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अवीराम्ऽइव । माम् । अयम् । शरारुः । अभि । मन्यते ।उत । अहम् । अस्मि । वीरिणी । इन्द्रऽपत्नी । मरुत्ऽसखा । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥९।

पुनरिन्द्रमिन्द्राणी ब्रवीति । “शरारुः घातुको मृगः “अयं वृषाकपिः “माम् इन्द्राणीम् “अवीरामिव "अभि "मन्यते =विजानाति । "उत अपि च “इन्द्रपत्नी इन्द्रस्य भार्या "अहम् इन्द्राणी “वीरिणी पुत्रवती "मरुत्सखा= मरुद्भिर्युक्ता च "अस्मि =भवामि । यस्या मम पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् “उत्तरः ॥


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सम्ऽहोत्रम् । स्म । पुरा । नारी । समनम् । वा । अव । गच्छति ।वेधाः । ऋतस्य । वीरिणी । इन्द्रऽपत्नी । महीयते । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१०।

“नारी= स्त्री “ऋतस्य= सत्यस्य "वेधाः= विधात्री “वीरिणी= पुत्रवती “इन्द्रपत्नी =इन्द्रस्य भार्येन्द्राणी “संहोत्रं स्म =समीचीनं यज्ञं खलु “समनं संग्रामं “वा। समितिः= समनम्' इति संग्रामनामसु पाठात् । "अव प्रति “पुरा “गच्छति । “महीयते स्तोतृभिः स्तूयते च । तस्या मम पतिः “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ २ ॥


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इन्द्राणीम् । आसु । नारिषु । सुऽभगाम् । अहम् । अश्रवम् ।नहि । अस्याः । अपरम् । चन । जरसा । मरते । पतिः । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥११

अथेन्द्राणीमिन्द्रः स्तौति । "आसु सौभाग्यवत्तया प्रसिद्धासु "नारिषु स्त्रीषु स्त्रीणां मध्ये “इन्द्राणीं “सुभगां सौभाग्यवतीम् "अहम् इन्द्रः “अश्रवम् अश्रौषम्। किंच “अस्याः इन्द्राण्याः “पतिः पालकः "विश्वस्मात् "उत्तरः उत्कृष्टतरः "इन्द्रः “अपरं “चन अन्यद्भूतजातमिव "जरसा= वयोहान्या "नहि "मरते न खलु म्रियते । यद्वा । इदं वृषाकपेर्वाक्यम् । तस्मिन् पक्षे त्वहमिति शब्दो वृषाकपिपरतया योज्यः । अन्यत्समानम् ॥

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न । अहम् । इन्द्राणि । ररण । सख्युः । वृषाकपेः । ऋते ।यस्य । इदम् । अप्यम् । हविः । प्रियम् । देवेषु । गच्छति । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१२।

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हे “इन्द्राणि "अहम् इन्द्रः “सख्युः मम सखिभूतात् "वृषाकपेर्ऋते प्रियं वृषाकपिं विना “न "ररण= न रमे । "अप्यम्= अप्सु भवमद्भिर्वा संस्कृतं "प्रियं प्रीतिकरम् "इदम् उपस्थितं "हविः "देवेषु देवानां मध्ये “यस्य ममेन्द्रस्य सकाशं "गच्छति । यश्चाहम् "इन्द्रः "सर्वस्मात् "उत्तरः । यद्वा । अयमर्थः । हे इन्द्राणि वृषाकपेः सख्युरिन्द्रादृतेऽहं वृषाकपिर्न रारण न रमे। अन्यत्समानम् ॥

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वृषाकपायि । रेवति । सुऽपुत्रे । आत् । ऊं इति । सुऽस्नुषे ।घसत् । ते । इन्द्रः । उक्षणः । प्रियम् । काचित्ऽकरम् । हविः । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१३।

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हे वृषाकपायि । कामानां  वृषाकपिः । तस्य पत्नि । यद्वा । वृषाकपेर्मम मातरित्यर्थः । “रेवति धनवति "सुपुत्रे शोभनपुत्रे "सुस्नुषे शोभनस्नुषे हे इन्द्राणि "ते तवायम् "इन्द्रः "उक्षणः सेचनसमर्थान् “आदु अनन्तरमेव । शीघ्रमेवेत्यर्थः । पशून् “घसत् प्राश्नातु । किंच “काचित्करम् । कं सुखम् । तस्याचित् संघः । तस्करं हविः "प्रियम् इष्टं कुर्विति शेषः । किंच ते पतिः “इन्द्रः “विश्वस्मात् “उतरः । तथा च यास्कः - ‘ वृषाकपायि रेवति सुपुत्रे मध्यमेन सुस्नुषे माध्यमिकया वाचा । स्नुषा साधुसादिनीति वा साधुसानिनीति वा । प्रियं कुरुष्व सुखाचयकरं हविः सर्वस्माद्य इन्द्र उत्तरः' (निरु. १२, ९) इति ॥

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उक्ष्णः । हि । मे । पञ्चऽदश । साकम् । पचन्ति । विंशतिम् ।उत । अहम् । अद्मि । पीवः । इत् । उभा । कुक्षी इति । पृणन्ति । मे । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१४

अथेन्द्रो ब्रवीति । “मे मदर्थं “पञ्चदश पञ्चदशसंख्याकान् “विंशतिं विंशतिसंख्याकांश्च “उक्ष्णः वृषभान् "साकं सह मम भार्ययेन्द्राण्या प्रेरिता यष्टारः "पचन्ति । “उत अपि च अहमग्नि तान् भक्षयामि । जग्ध्वा चाहं "पीव “इत स्थूल एव भवामीति शेषः । किंच "मे मम “उभा उभौ “कुक्षी “पृणन्ति सोमेन पूरयन्ति यष्टारः । सोऽहम् "इन्द्रः "सर्वस्मात् "उत्तरः ॥

वृषभः । न । तिग्मऽशृङ्गः । अन्तः । यूथेषु । रोरुवत् ।मन्थः । ते । इन्द्र । शम् । हृदे । यम् । ते । सुनोति । भावयुः । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१५

अथेन्द्राणी ब्रवीति । "तिग्मशृङ्गः तीक्ष्णशृङ्गः "वृषभो "न यथा वृषभः "यूथेषु गोसंघेषु “अन्तः मध्ये “रोरुवत् शब्दं कुर्वन् गा अभिरमयति तथा हे इन्द्र त्वं मामभिरमयेति शेषः । किंच “हे इन्द्र "ते तव "हृदे हृदयाय "मन्थः दध्नो मथनवेलायां शब्दं कुर्वन् “शं शंकरो भवत्विति शेषः । किंच "ते तुभ्यं "यं सोमं “भावयुः भावमिच्छन्तीन्द्राणी “सुनीति अभिषुणोति सोऽपि शंकरो भववित्यर्थः । मम पतिः “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ ३ ॥

न । सः । ईशे । यस्य । रम्बते । अन्तरा । सक्थ्या । कपृत् ।सः । इत् । ईशे । यस्य । रोमशम् । निऽसेदुषः । विऽजृम्भते । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१६

हे इन्द्र "सः जनः “न “ईशे मैथुनं कर्तुं नेष्टे न शक्नोति "यस्य जनस्य “कपृत् शेपः “सक्थ्या सक्थिनी “अन्तरा "रम्बते लम्बते । "सेत् स एव स्त्रीजने “ईशे मैथुनं कर्तुं शक्नोति “यस्य जनस्य “निषेदुषः शयानस्य "रोमशम् उपस्थं "विज़म्भते विवृतं भवति । यस्य च पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् “उत्तरः ॥

न । सः । ईशे । यस्य । रोमशम् । निऽसेदुषः । विऽजृम्भते ।सः । इत् । ईशे । यस्य । रम्बते । अन्तरा । सक्थ्या । कपृत् । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१७

“सः जनः “न "ईशे मैथुनं कर्तुं नेष्टे "यस्य जनस्य "निषेदुषः शयानस्य "रोमशम् उपस्थं “विजृम्भते विवृतं भवति । "सेत् स एव जनः “ईशे ईष्टे मैथुनं कर्तुं शक्नोति "यस्य जनस्य "कपृत् प्रजननं "सक्थ्या सक्थिनी “अन्तरा “रम्बते लम्बते । सिद्धमन्यत् । पूर्वोक्तव्यतिरेकोऽत्र द्रष्टव्यः । पूर्वस्यामृचि यियप्सुरिन्द्राणीन्द्रं वदति । अत्र त्वयियप्सुरिन्द्र इन्द्राणीं वदतीत्यविरोधः ॥

अयम् । इन्द्र । वृषाकपिः । परस्वन्तम् । हतम् । विदत् ।असिम् । सूनाम् । नवम् । चरुम् । आत् । एधस्य । अनः । आऽचितम् । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥ १८

हे “इन्द्र "अयं “वृषाकपिः "परस्वन्तं परस्वमात्मनो विषयेऽवर्तमानं "हतं हिंसितं “विदत् विन्दतु । तथा हतस्य विशसनाय “असिं शस्त्रं "सूनाम् उद्धानं पाकार्थं "नवं प्रत्यग्रं "चरुं भाण्डम् “आत् अनन्तरम् “एधस्य काष्ठस्य “आचितं पूर्णम् "अनः शकटं च विन्दतु । मस पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥

अयम् । एमि । विऽचाकशत् । विऽचिन्वन् । दासम् । आर्यम् ।पिबामि । पाकऽसुत्वनः । अभि । धीरम् । अचाकशम् । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥१९

अथेन्द्रो ब्रवीति । "विचाकशत् पश्यन् यजमानान् “दासम् उपक्षपयितारमसुरम् "आर्यम् अपि च "विचिन्वन् पृथक्कुर्वन् "अयम् अहमिन्द्रः “एमि यज्ञं प्रति गच्छामि। यज्ञं गत्वा च “पाकसुत्वनः । पचतीति पाकः । सुनोतीति सुत्वा । हविषां पक्तुः सोमस्याभिषोतुर्यजमानस्य पाकेन विपक्वेन मनसा सोमस्याभिषोतुर्वा यजमानस्य संबन्धिनं सोमं "पिबामि । तथा “धीरं धीमन्तं यजमानम् "अभि "अचाकशम् अभिपश्यामि । योऽहम् "इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥

धन्व । च । यत् । कृन्तत्रम् । च । कति । स्वित् । ता । वि । योजना ।नेदीयसः । वृषाकपे । अस्तम् । आ । इहि । गृहान् । उप । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥२०

“धन्व निरुदकोऽरण्यरहितो देशः । "कृन्तत्रं कर्तनीयमरण्यम् । "यत् यत् "च “धन्व "च कृन्तत्रं च भवति । मृगोद्वासमरण्यमेवंविधं भवति न त्वत्यन्तविपिनम् । तस्य शत्रुनिलयस्यास्मदीयगृहस्य च मध्ये "कति "स्वित् “ता तानि “योजना योजनानि स्थितानि । नात्यन्तदूरे तद्भवतीत्यर्थः । अतः "नेदीयसः अतिशयेन समीपस्थाच्छत्रुनिलयात् हे "वृषाकपे त्वम् "अस्तम् अस्माकं गृहं “वि “एहि विशेषेणागच्छ । आगत्य च "गृहान् यज्ञगृहान् "उप गच्छ । यतोऽहम् "इन्द्रः सर्वस्मादुत्कृष्टः ॥

पुनः । आ । इहि । वृषाकपे । सुविता । कल्पयावहै ।यः । एषः । स्वप्नऽनंशनः । अस्तम् । एषि । पथा । पुनः । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥२१

आगत्य प्रतिगतं वृषाकपिमिन्द्रो ब्रवीति । हे "वृषाकपे त्वं "पुनरेहि अस्मान् प्रत्यागच्छ । आगते च त्वयि "सुविता सुवितानि कल्याणानि त्वच्चित्तप्रीतिकराणि कर्माणि "कल्पयावहै इन्द्राण्यहं च आवामुभौ पर्यालोच्य कुर्याव । किंच “यः स्वप्ननंशनः उदयेन सर्वस्य प्राणिनः स्वप्नानां नाशयिता आदित्यः सः “एषः त्वं “पथा मार्गेण “अस्तम् आत्मीयमावासं "पुनः “एषि गच्छसि । यतोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् “उत्तरः। तथा च यास्कः - ‘ सुप्रसूतानि वः कर्माणि कल्पयावहै य एष स्वप्ननंशनः स्वप्नान्नाशयस्यादित्य उदयेन सोऽस्तमेषि पथा पुनः' (निरु. १२.२८) इति ॥

यत् । उदञ्चः । वृषाकपे । गृहम् । इन्द्र । अजगन्तन ।क्व । स्यः । पुल्वघः । मृगः । कम् । अगन् । जनऽयोपनः । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥२२

गत्वा पुनरागतं वृषाकपिमिन्द्रः पृच्छति । हे “इन्द्र परमैश्वर्यवन् हे "वृषाकपे यूयम् "उदञ्चः उद्गामिनः सन्तो मद्गृहम् "अजगन्तन आगच्छ । एकस्यापि बहुवचनं पूजार्थम् । तत्र भवतः संबन्धी “पुल्वघः बहूनां भौमरसानामत्ता “स्यः सः "मृगः "क्व अभूत् "जनयोपनः जनानां मोदयिता मृगः "कं वा देशम् "अगन् अगच्छत् । सोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः । यद्वा इन्द्राणीवाक्यमिदम् । अत्र यास्कः---- ‘ यदुदुञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगमत क्व स्य पुल्वघो मृगः क्व स बह्वादी मृगः । मृगो मार्ष्टेर्गतिकर्मणः । कमगमद्देशं जनयोपनः ' (निरु. १३. ३ ) इति ॥


पर्शुः । ह । नाम । मानवी । साकम् । ससूव । विंशतिम् ।भद्रम् । भल । त्यस्यै । अभूत् । यस्याः । उदरम् । आमयत् । विश्वस्मात् । इन्द्रः । उत्ऽतरः ॥२३

इन्द्रविसृज्यमानमनेन' मन्त्रेण वृषाकपिराशास्ते । हे "भल इन्द्रेण विसृज्यमान शर । भलतिर्भेदनकर्मा । "पर्शुः "नाम मृगी । “ह इति पूरणः । "मानवी मनोर्दुहितेयं "विंशतिं विंशतिसंख्याकान् पुत्रान् "साकं सह "ससूव अजीजनत् । "त्यस्यै तस्यै “भद्रं भजनीयं कल्याणम् "अभूत् भवतु । लोडर्थे लुङ। "यस्या "उदरमामयत् गर्भस्थैर्विंशतिभिः पुत्रैः पुष्टमासीत् । मम पिता “इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ ४ ॥

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वृषाकपि----
                  वृषाकपि सूक्त -ऋग्वेद १०/४६... में इंद्र-इंद्राणी संवाद में ....इंद्र का कथन है....  स्तोताओं से मैंने सोम अभिषुत को कहा था |  वृषाकपि की स्तुति की गयी  –‘ सोम से प्रवृद्ध होकर इस यज्ञ में वृषाकपि जैसे वीर सखा होकर, सोमपान कर हष्ट-पुष्ट हुए, मैं इंद्र सर्वश्रेष्ठ हूँ |’  इंद्राणी का कथन है---
     ‘हे इंद्र! तुम अत्यंतगमनशील होकर वृषाकपि के पास जाते हो, सोम के लिए नहीं |’ 
      कुछ स्थानों पर वृषाकपि इंद्र का अनुचर व पुत्र भी कहा गया है 

     ऋग्वेद १०/८६/१८ में कथन है -अयमिन्द्र वृषाकपि परस्वंव विदत|
                         असि सूनांनवं चरुमादेधस्यान आचितं| विश्वमादिन्द्र उत्तरः|| 
          -----अर्थात हे इंद्र! वृषाकपि को मारा गया पशु, असि, नया बनाया गया चरू और ईंधन से भरी हुई गाडी प्राप्त होगई है | इंद्र सबसे ऊपर है |

                            
  विष्णु सहस्रनाम में विष्णु का एक नाम वृषाकपि है, शायद परवर्ती वैदिक काल में विष्णु, इंद्र से प्रभावशाली देवता होते जा रहे थे, कहीं कहीं उनको इंद्र का छोटा भ्राता भी कहा गया है । अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादि:-अच्युतः ।
वृषाकपि:-अमेयात्मा सर्व-योग-विनिःसृतः ।।                    
  वसु:-वसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः ।
 अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।।    वृषाही वृषभो विष्णु:-वृषपर्वा वृषोदरः ।
 वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुति-सागरः ।।                     
  शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
                      गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।।   


-----३३ कोटि देवताओं में  जो 11 रूद्र बताये गए हैं ..उनमें में एक रूद्र ..वृषाकपि हैं |  ( ये ११ रूद्र  हैं....हरबहुरूपत्र्यम्बकअपराजिता, वृषाकपिशम्भूकपर्दीरेवतम्रग्व्यधशर्व तथा कपाली)
 
  -यह शायद ऋग्वेद के किसी विशेष घटना-सूत्र की अप्राप्य कड़ी लगती है | 
वृषाकपि –विष्णु के किसी.. नृसिंह (मानव-सिंह ), हनुमान ( वृष-बानर मानव- ...वृष = महा बलिष्ठ +वानर = हनुमान का वैदिक रूप  ) या नंदी ( वृषभ मानव ) या स्वयं पशुपति शिव के साथी-सहयोगी-सैनिक का रूप लगता है जो कोई आदिम मानव, आर्य अथवा आर्येतर स्थानीय लोक-देवता भी था जो ‘आ
र्य-देव मंडल’ में सहयोगी की भूमिका में था | उसके साथ इंद्र की मैत्री, अति प्रारम्भिक  ...सामाजिक –व्यवहारिक-राजनैतिक व नैतिक सहयोग एवं शक्ति-संतुलन के तथ्यों-घटनाओं के व्यवहारिक पक्ष की और इंगित करती है| 
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महर्षि पाराशर एक बार यमुना नदी के दूसरी पार जाने के लिए जिस नाव में बैठकर जा रहे थे ; तब उस नाव को चलाने वाली एक बारह साल की लड़की सत्यवती थी।

एकान्त में उस सुन्दर कन्या को देखकर ऋषि का काम- भाव (sex)जाग्रत हो गया और उस कन्या से सैक्स करने की इच्छा की

परन्तु कन्या को एक तरफ अपने पिता और परिवार का डर था  तो दूसरी तरफ उसे यह डर भी था कि कहीं ऋषि उसे शाप न दे दें ।

आश्चर्य तो यह है दोस्तों की जो स्वयं पाप करने वाला होकर भी शाप दे सकता है 

मतलब जो बलात्कारी होकर पीड़िता को शाप भी दे सकता है ! 

ये मन गड़न्त कथाएँ सिद्धांत हीन हैं ।
आज भी कोई साधु यही कहकर महिलाओं की इज्जत लूटता है ।  ऐसा भी हमने सुना है --+

इन कथाओं समाज के लोगों को क्या प्रेरणा मिलेगी ?

निम्न श्लोक यही कहता है ।
तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत ।
वरैर् असुलभेैर् उक्ता न प्रत्याख्यातुम् उत्सहे।।१०।

दुर्लभ वर का लालच और भय दिखाकर  ऋषि ने मुझसे संभोग किया जिससे मैं उनसे मना न कर सकी।
मुझे अपने तेजसे दबाकर अन्धेरा कर के उस नाव में ही ऋषि ने मेरे साथ संभोग किया।
यह निम्न श्लोक यही कहता है ।

अभिभूय स माम् बालां तेजसा वशम् आनयत्।
तमसा लोकम् आवृत्य नौगतामेव भारत )।११।

यह कहना था व्यास की माता धीवर की कन्या सत्यवती का जो दूसरी बार हस्तिनापुर के राजा शान्तनु की पत्नी बन गयी थी ।

(महाभारत आदिपर्व सम्भवपर्व का 
एकसौचारवाँ अध्याय -गीताप्रेस संस्करण)

हिन्दू तथा अन्य इस्लामिक आदि धर्म ग्रन्थों में नारी जीवन कलंक पूर्ण ही था।

परन्तु इस दुर्भाग्य को छुपाने के लिए कुछ नारीयों की चालाकी से प्रशंसा भी की गयी है । जैसे महाभारत और मनुस्मृति के निम्न श्लोक समान है यह कहने के लिए
देखें नीचें

पूज्या लालयितव्याश्च स्त्रियो नित्यं जनाधिप।
स्त्रियो यत्र च पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।।(13-81-5)

अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।
तदा चैतत्कुलं नास्ति यदा शोचन्ति जामयः।।(13-81-6)
स्त्रियों को दुलार करके उनका सम्मान करके उन्हें नित्य खुश करते रहना चाहिए ।

जहां स्त्रियों का आदर सत्कार होता है वहां देवता लोग प्रसन्नता पूर्वक निवास करते हैं तथा जहां उनका अनादर होता है वहां की सारी क्रिया निष्फल हो जाती है

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
पुत्राश्चस्थाविरेभावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति।।(13-81-14)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि 
दानधर्मपर्वणि एकाशीतितमोऽध्यायः।। 81 ।।
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त्रिंशद्वर्षो दशवर्षां भार्यां विन्देत नग्निकाम्।
एकविंशतिवर्षो वा सप्तवर्षामवाप्नुयात्।।१४।

(महाभारत अनुशासन पर्व के अन्तर्गत दानपर्वधर्ममें 
विवाहधर्मकावर्णन विषयक चौवालीस वाँ अध्याय)

कन्‍या को, जो रजस्‍वला न हुई हो, पत्‍नी रूप में प्राप्‍त करे अथवा इक्‍कीस वर्ष का पुरुष सात वर्ष की कुमारी के साथ विवाह करे।१४।

मनुस्मृति में भी वर्णन है -

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स्त्रीयों के विषय में धर्म-शास्त्र का विधान ---
असमता मूलक व  असंवेदनात्मक था ।
पहले तो ऋषि स्त्रीयों से अपने शरीर की मालिश कराते थे ।
और -जब ऋण-धन आवेशों की प्रतिक्रिया स्वरूप
उत्तेजित हो स्खलित  जाते तो नारीयों की निन्दा करने लगते !
इस में नारी का क्या दोष था ?

महाभारत के अनुशासन पर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व बीसवाँ अध्याय पृष्ठ संख्या -5540 पर गीता प्रेस 👇

मुनि अष्टावक्र के माध्यम से महाभारत लिखने वाला  
वर्णन करता है।

" अनुज्ञाता च मुनिना सा स्त्री तेन महात्मना।
अथास्य तैलेनांगानि सर्वाण्येवाभ्यमृक्षत।। 2।

फिर महात्मा मुनि की आज्ञा लेकर उस स्त्री ने उनके सारे अंगों में  तेल की मालिश की।।2।

आगे वर्णन है कि स्त्रीयों को कभी स्वतन्त्र मत करो
वे हमेशा बन्धन में रहें यही धर्म-शास्त्रों का विधान है।

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पुरुष मानसिकता ने केवल स्त्रीयों की मर्यादाओं को लेकर --जो विधान बनाए वे पुरुषों की भावी उपभोग सुविधा को लक्ष्य करके बनाए गये।

मुझे तो ये लगता है कि स्त्रीयों के आभूषणों में भी उनके पूर्व कालिक बन्धन-श्रृखलाओं के स्वरूप ही अवशेष  विद्यमान हैं ।

असीरियन संस्कृति में तो इसकी झलक मिलती है परन्तु वहाँ महिलाओं को आभूषण पहने नहीं दिखाया सायद महिलाओं के आभूषण देव संस्कृतियो में दृष्टि गोचर होता है ।

आभूषणों में नथ कुण्डल और गले का हार  आदि इसके पूर कालिक बन्धन-प्रतीक ही हैं ।

कालान्तर में रूढ होकर ये ही स्त्रियों के श्रँगार भूषण भी बन गये ।

ये आभूषण तो बाद में बन गये ये  ये स्त्रीयों के सौन्दर्य प्रसाधक हों  ये नाथ कुण्डल और हार मौलिक सौन्दर्य वर्धक रहे हों मुझे नहीं लगता ?

क्यों कि  सैमेटिक संस्कृतियों में स्त्री स्वतन्त्रता को असीरियनों और यहूदियों ने तो सम्मान दिया  परन्तु अरबदेशों  में बन्दिशों के विधान या शरीयत थी ।
ठीक  ब्राह्मणों के स्मृति-ग्रन्थों के समान है ।

असुर लोग बड़े वीर और कठोर तथा अनुशासन के दृढ़निश्चयी होते थेे; अपने विजित शत्रओं को ये ओष्ठ और नासिका उच्छेदन कर उनमें रस्सियाँ बाँधकर पशुओं की तरह हाँक कर लाते थे ।

कालान्तरण में जब पुरुष ने स्त्रीयों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया तो उसे नथकर अथवा नकेल डालकर उसे बाँध लिया तबसे वह वधु संज्ञा से अभिहित हुई ।

पति की (नाथ) संज्ञा के मूल में भी यही भाव निहित है

भगवत शरण उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति के श्रोत में असीरिया की संस्कृति से ये तथ्य उद्धृत किया है ।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में ४८ वें सर्ग में -
"पादच् चाया सुखा भर्तुस् तादृशस्य महात्मनः।
स हि नाथो जनस्य अस्य स गतिः स परायणम्॥१७।
(२-४८-१७ वाल्मीकी रामायण)

संस्कृत कोश ग्रन्थों में  (नाथति  पतिर्भवतीति) । 
१-पति: २- ईशः ३ नेता ४ परिवृढः ५ अधिभूः  ६ वर: ७ इन्द्रः ८ स्वामी ९ आर्य्यः १० प्रभुः  ११ भर्त्ता १२ ईश्वरः १३ विभुः १४ ईशिता १५  इनः १६ नायकः १७ । इति हेमचन्द्रः । ३ । २३ ॥

यद्यपि णह् बन्धने बने च के रूप में नह् धातु से निष्पन्न है(नह्यते येेेन स: नाथ: )जो वधु को जीवन सूत्र में बाँध कर लाता है वह नाथ था।

आभीर संस्कृति में स्त्रीयों की स्वतन्त्रता की रक्षा थी ।
उनकी हल्लीषम् नृत्य संस्कृति --जो कालान्तरण में यूनानीयों के के इरॉस देवता की कथक क्रियाओं के  प्रभाव से रास में परिवर्तित हुई ।

हल्लीषम् स्त्रीयों की ललितकलात्मक अभिव्यक्ति थी ।
ये भ्रमराकार रूप में नृत्य शैली थी 
जिसमें कामुकता का भाव कदापि नहीं था।
स्त्री और पुरुष दोनों  प्रतियोगितात्मक रू में भाग लेते थे ।

महिलाओं के आभूषणों में उनकी नथुनी और कुण्डल  और गले का हार उनके बन्धनो के ध्वंषावषेश हैं ।
जिनमें आज आभूषण का भाव है

बौद्ध काल में लिखित महाभारत में प्राचीन ऋषि अष्टावक्र के माध्यम से महाभारत कार कहता है तत्कालीन पुरोहित प्रवृत्तियों को चित्रित करता है 
जिसमें महिलाओं के बन्धन जटिल थे ।

कि- "स्वतन्त्रा त्वं कथं भद्रे ब्रूहि कारणमत्र वै ।
नास्ति त्रिलोके स्त्री काचिद् या वै स्वातन्त्र्यमर्हति।20।

भद्रे ! तुम स्वतन्त्र कैसे हो इसमें जो कारण हो वह बताओ तीनों लोकों में कोई ऐसी स्त्री नहीं जो स्वतन्त्र  रहने योग्य हो ।20।

महाभारत अनुशासनपर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व में पृष्ठ संख्या-5542 पर गीताप्रेस संस्करण ।
_________________________________________
आगे अष्टावक्र कहते हैं -

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
पुत्राश्च स्थाविरे काले नास्ति स्त्रीणां स्वतन्त्रता।21।
      दौनों श्लोकों की तुलना करें !👇

मनु स्मृति में भी ये ही श्लोक हैं ।
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।               
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ||- (मनुःस्मृति 9/3 अध्याय/श्लोक )

कुमार अवस्था में पिता रक्षा करते हैं, जवानी में वह पति के संरक्षण में रहती है और बुढ़ापे में पुत्र उसकी देखभाल करते हैं; इस प्रकार स्त्रियों के लिए स्वतन्त्रता नहीं है।21।

मनुःस्मृति और महाभारत की रचना करने वाले समान लेखक रहे हैं

मनुःस्मृति में यह श्लोक - 9/3 अध्याय/श्लोक ) पर है ।
और इनका समय भी समान महात्मा बुद्ध का परवर्ती काल खण्ड ई०पू० द्वितीय सदी है ।
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मनुस्मृति में ये महाभारत के समान श्लोक हैं

अस्वतन्त्राः स्त्रियःकार्याःपुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्  | 
विषयेषु च सज्जन्त्यः  संस्थाप्या  आत्मनो वशे   ||  
(मनुःस्मृति 9/2अध्याय/श्लोक)

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।               
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ।-
(मनुःस्मृति 9/3 अध्याय/श्लोक )

भावार्थ :-मनुष्य स्त्रियों को स्वतन्त्रता कदापि न दे । 
विषयासक्त स्त्रियों को भी स्ववश में ही रखने का सतत प्रयत्न करे !

स्त्री कभी भी स्वतन्त्र नहीं रखने  योग्य है ।
बचपन में पिता , यौवन में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करे ।

( उपर्युक्त दोनों श्लोक वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के सन्दर्भों में अपनी सार्थकता समाप्त कर चुके हैं ।
क्यों कि स्त्रीयों ने प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष से आगे बढ़कर दिखा दिया है 

  ये श्लोक यही सिद्ध करते हैं कि विगत काल में
में हमारा पुरुष सत्तात्मक समाज था , तथा स्त्रियों को आर्थिक और सामाजिक स्तर स्वतन्त्रता नहीं देता था ।

उन्हें पढ़ने का भी अघिकार नहीं था ।
इसलिए वे गुलामी की जिन्द़गी जी रही थीं ।

फिर भी 'मनु:स्मृति' में तत्कालीन समाज
के नियमन के जो सूत्र है , उनमें अनेकानेक वर्तमान समय में भी उतने ही सार्थक हैं जैसे वे पहले थे ।

अतः उसे एक  ऐतिहासिक ग्रन्थ के रूप ले
कर उस से मार्गदर्शन  प्राप्त कर सकते हैं )

महाभारत और मनुःस्मृति समान लेखकों के समूह की रचनाऐं हैं।
और इनका समय ई०पू० द्वितीय सदी है ।

महाभारत कार यहीं तक नहीं ठहरा  उसने भीष्म के माध्यम से स्त्रीयों के दुर्गुणों के विषय में वर्णन  किया है ।👇

भीष्म  ने कहा राजन इस विषय में देवर्षि नारद का अप्सरा पंचकूला के साथ जो संवाद हुआ था !
उसी प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है पहले की बात है संपूर्ण लोकों में विचरतेे हुए देवर्षि नारद ने एक दिन ब्रह्मलोक की अत्यंत सुंदर अप्सरा पंचकूला को देखा और कहा !
क्या कहा देखें--- नीचे

'महाभारत में यह वर्णन है 👇
दृष्टं स्त्रीचापलं च ते
स्थविराणामापि स्त्रीणां बाधते मैथुन ज्वर:।5।

( स्त्रीयाँ बूढ़ी हो जाने पर भी मैथुन ज्वर से पीड़ित रहती हैं।
नारद जब पुरुष थे और अविवाहित भी फिर विना अनुभव किये 
स्त्रियों के स्वभाव को कैसे जाना ?
ये तो केवल आख्यानों के आधार पर अपनी बाते आरोपित करना ही था और कुछ नहीं -

वस्तुत " भोगी स्ववतां पश्यति "
अर्थात्‌ कामी भोगी रोगी अपने समान सबको देखता है
उसी सिद्धान्त के अनुसार इन ब्राह्मणों ने महिलाओं की निन्दा की
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महाभारत के अनुशासनपर्व  के अड़तीसवें अध्याय को स्त्रीनिन्दा पर्व कहना उचित होगा।

स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि श्रोतुं भारतसत्तम।
स्त्रीयो हि मूलं दोषाणां लघुचित्ता हि ता: स्मृता ।1।

युधिष्ठर ने कहा - भरत -श्रेष्ठ ! मैं स्त्रीयों के स्वभाव का वर्णन सुनना चाहता हूँ। क्यों कि सारे दोषों की जड़ स्त्रियां ही हैं ।1।

--जो युधिष्ठर द्रोपदी को जुए में हार कर भी स्त्रीयों को सारे दोषों की जड़ कहता हो ।

ये बात कितनी औचित्य पूर्ण है !
विचार करना चाहिए!
आगे महाभारत में  और भी इसी प्रकार का वर्णन है👇

न स्त्रीभ्य: किञ्चिदन्यद् वै पापीयस्तरमस्ति वै ।
स्त्रीयो हि मूलं दोषाणां तथा त्वमपि वेत्थ ह ।12।

स्त्रियों से बढ़कर कोई पापी दूसरा नहीं है स्त्रियां सारे दोषों की जड़ है इस बात को आप भी अच्छी तरह जानते हैं।12।

असद्धर्मस्त्वयं स्त्रीणामस्माकं भवति प्रभो।
पापीयसो नरान् यद् वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे।14।

प्रभु हम स्त्रियों में यह सबसे बड़ा पाप है कि हम पापी से पापी पुरुषों को भी लाज छोड़ कर स्वीकार कर लेती हैं

स्त्रियं हि य: प्रार्थयते संनिकर्षं च गच्छति।
ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेछन्ति योषित: ।15।

जो पुरुष किसी स्त्री को चाहता है उसके निकट तक पहुंचता है और उसकी थोड़ी सी सेवा कर देता है उसी को युवतियाँ चाहने लगती हैं

यौवने वर्तमानानां मृष्टाभरणवाससाम्।
नारीणां स्वा़ैरवृत्तीनां स्पृहयन्ति कुलस्त्रिय: ।19।

जो जवान है सुंदर गहने और अच्छे कपड़े पहनते हैं ऐसी स्वेच्छाचारी स्त्रियों के चरित्र को देखकर कितनी ही कुलपति स्त्रियां भी वैसी ही बनने की इच्छा करने लगती हैं।

याश्च शश्वद् बहुमता रक्ष्यन्ते दयिता स्त्रिय: ।
अपि ता: सम्प्रज्जन्ते कुब्जान्धजडवामनै:।20।

जो बहुत सम्मानित और पति की प्यारी स्त्रियां हैं जिनकी सदा अच्छी तरह रखवाली की जाती है वह भी घर में आने वाले कुबड़ो, अन्धो  गूगों और बौनों के साथ भी फँस जाती है।

यदिपुंसां गतिर्ब्रह्मन् कथंचिन्नोपपद्यते।
अप्यन्योन्यं प्रवर्तन्ते न हि तिष्ठन्ति भर्तृषु।22।

ब्राह्मण यदि स्त्रियों को पुरुषों की प्राप्ति किसी प्रकार भी संभव ना हो और पति भी दूर गए हो तो भी आपस में ही कृत्रिम उपायों से ही मैथुन में प्रवृत्त हो जाती हैं

चलस्वभावा दु:सेव्या दुर्ग्राह्या भावतस्था।
प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा वाचस्तथा स्त्रिय: ।24।

स्त्रियों का स्वभाव चंचल होता है उनका सेवन बहुत ही कठिन काम है इनका भाव जल्दी ही किसी के समझ में नहीं आता ठीक उसी तरह जैसे विद्वान पुरुष की वाणी दुर्बोध होती है

नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधि:।
नान्तक: सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना।25।

अग्नि कभी ईंधन से तृप्त नहीं होती समुंद्र कभी नदियों से तृप्त नहीं होता मृत्यु समस्त प्राणीयों को एक साथ आ जाए तो भी उनसे तृप्त नहीं होती इसी प्रकार सुंदर नेत्रों वाली युवतियां पुरुषों से कभी तृप्त नहीं होती

इदमन्यच्च देवर्षे रहस्यं सर्वयोषिताम् ।
दृष्टैव पुरुषं हृद्यं यौनि: प्रक्लिद्यते स्त्रिया:।26।

देव ऋषि संपूर्ण रमणिया के संबंध में दूसरी भी रहस्य की बात यह कि किसी मनोरम पुरुष को देखते ही स्त्री की यौनि गीली हो जाती है

न कामभोगान् विपुलान् नालंकारान् न संश्रयान्।
तथैव बहु मन्यन्ते यथा रत्यामनुग्रहम्।28।

काम भोग की प्रचुर सामग्री को ना अच्छे-अच्छे गहनों को और ना उत्तम घरों को ही उतना अधिक महत्व देती हैं जैसा कि रति के लिए किए गए अनुग्रह को

अन्तक: पवनो मृत्यु: पातालं वडवामुखम्।
क्षुरधारा विषं  सर्पो वह्निरित्येकत: स्त्रिय: ।29।

यमराज वायु, मृत्यु ,पाताल,बड़वानल,क्षुरे की धार,विष, सर्प और अग्नि– यह सब विनाश की हेतु एक तरफ और स्त्रियां अकेली एक तरफ बराबर है।

एता हि रममाणास्तु वञ्चयन्तीह मानवान्।
न चासां मुच्यते कश्चित् पुरुषो हस्तमागत: ।।5।

यह रमण करती हुई भी यहां पुरुषों को ठगती रहती हैं इनके हाथ में आया हुआ कोई भी पुरुष इनसे बचकर नहीं जा सकता

गावो नव तृणानीव गृह्णन्त्येता नवंनवम् ।
शम्बरस्य च माया माया या नमुचेरपि ।6।
बले: कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदु:।

जैसे गाय नई-नई घास चरती है उसी प्रकार यह नारिया भी नए-नए पुरुषों को अपनाती रहती हैं शंबरासुर की जो  माया है तथा नमुचि की बलि और कुंभीनसी की जो मायाएं हैं उन सब को यह युवतियां जानती हैं

स्त्रीणां बुद्ध्यर्थनिष्कर्षादर्थशास्त्राणि शत्रुहन्।10।
बृहस्पति प्रभृतिभिर्मन्ये सद्भि: कृतानि वै।

शत्रुघाती नरेश मुझे तो ऐसा लगता है कि स्त्रियों बुद्धि में जो अर्थ भरा है उसी का निष्कर्ष यानी सारांश लेकर बृहस्पति आदि सत्पुरुषों ने नीति शास्त्रों की रचना की है।

न हि स्त्रीभ्य परं पुत्र! पापीय: किञ्चिदस्ति वै ।
अग्निर्हि प्रमदा दीप्तो मायाश्च मयजा विभो।4।

वत्स ! स्त्रियों से बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है
यौवन मद में उन्मत्त रहने वाली स्त्रियां वास्तव में जलती हुई अग्नि के समान है प्रभु वे मय दानव की रची हुई माया है

न च स्त्रीणां क्रिया: काश्चिदिति धर्मो व्यवस्थित:।11।
निरिन्द्रिया ह्यशास्त्राश्च स्त्रियो८नृतमिति श्रुति: ।
शय्यासनमलं कारमन्नपानमनार्यताम्।12।
दुर्वाग्भावं रतिं चैव ददौ स्त्रीभ्य: प्रजापति।

स्त्रियों के लिए किन्ही वैदिक कर्मों के करने का विधान नहीं है यही धर्म शास्त्र की व्याख्या है स्त्रियां इंद्री शून्यहैं अर्थात वे अपनी इंद्रियों को वश में रखने में असमर्थ हैं इसलिए शास्त्र ज्ञान से रहित हैं।
और असत्य की मूर्ति हैं ऐसा उनके विषय में श्रुति का कथन है।
प्रजापति ने स्त्रियों को सैय्या, आसन, अलंकार, पान ,अनार्यता
दुर्वचन प्रियता, तथा रति प्रदान की है।

महाभारत में अनुशासनपर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व में पृष्ठ संख्या- 5614 पर बैमेल विवाह का वर्णन  भी है।

त्रिंशद्वर्षो दशवर्षो भार्यो विन्देत नग्निकाम्।
एकविंशतिवर्षो वा सप्तवर्षामवाप्नुयात्।14।

30 वर्ष का पुरुष 10 वर्ष की कन्याओं को जो रजस्वला ना हुई हो पति रूप में प्राप्त करें अथवा 21 वर्ष का पुरुष 7 वर्ष की कुमारी के साथ विवाह करें।

इसी प्रकार का वर्णन मनुस्मृति में भी प्राप्त होता है जिसका समर्थन महर्षि दयानंद ने किया है।

ये च क्रीणन्ति दासीं च विकीर्णन्ति तथैव च।
भवेत् तेषां तथा निष्ठा लुब्धानां पापचेतसाम् ।47।

जो दासियों को खरीदते और भेजते हैं वह लोग ही और पाप आत्मा है ऐसे ही लोगों में पत्नी को भी खरीदने और बेचने की निष्ठा होती है।

महाभारत अनुशासनपर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व पृष्ठ संख्या- 5620।

यही कथा देवीभागवत पुराण में भी है।

देवीभागवतपुराण स्कन्धः(२)अध्यायः (२)

            व्यासजन्मवर्णनम्

                 सूत उवाच
एकदा तीर्थयात्रायां व्रजन् पाराशरो मुनिः ।
आजगाम महातेजाः कालिन्द्यास्तटमुत्तमम् ॥१॥


निषादमाह धर्मात्मा कुर्वन्तं भोजनं तदा ।
प्रापयस्व परं पारं कालिन्द्या उडुपेन माम् ॥२॥


दाशः श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं कुर्वाणो भोजनं तटे ।
उवाच तां सुतां बालां मत्स्यगन्धां मनोरमाम् ॥३॥


उडुपेन मुनिं बाले परं पारं नयस्व ह ।
गन्तुकामोऽस्ति धर्मात्मा तापसोऽयं शुचिस्मिते॥४।
इत्युक्ता सा तदा पित्रा मत्स्यगन्धाथ वासवी ।
उडुपे मुनिमासीनं संवाहयति भामिनी ॥ ५ ॥


व्रजन् सूर्यसुतातोये भावित्वाद्दैवयोगतः ।
कामार्तस्तु मुनिर्जातो दृष्ट्वा तां चारुलोचनाम् ।६॥


ग्रहीतुकामः स मुनिर्दृष्ट्वा व्यञ्जितयौवनाम् ।
दक्षिणेन करेणैनामस्पृशद्दक्षिणे करे ॥ ७ ॥


तमुवाचासितापाङ्गी स्मितपूर्वमिदं वचः ।
कुलस्य सदृशं वः किं श्रुतस्य तपसश्च किम् ॥ ८ ॥


त्वं वै वसिष्ठदायादः कुलशीलसमन्वितः ।
किं चिकीर्षसि धर्मज्ञ मन्मथेन प्रपीडितः ॥ ९ ॥


दुर्लभं मानुषं जन्म भुवि ब्राह्मणसत्तम ।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये ब्राह्मणत्वं विशेषतः ॥ १० ॥


कुलेन शीलेन तथा श्रुतेन
     द्विजोत्तमस्त्वं किल धर्मविच्च ।
अनार्यभावं कथमागतोऽसि
     विप्रेन्द्र मां वीक्ष्य च मीनगन्धाम् ॥ ११ ॥


मदीये शरीरे द्विजामोघबुद्धे ॥
     शुभं किं समालोक्य पाणिं ग्रहीतुम् ।
समीपं समायासि कामातुरस्त्वं
     कथं नाभिजानासि धर्मं स्वकीयम् ॥ १२ ॥


अहो मन्दबुद्धिर्द्विजोऽयं ग्रहीष्य-
     ञ्जले मग्न एवाद्य मां वै गृहीत्वा ।
मनो व्याकुलं पञ्चबाणातिविद्धं
     न कोऽपीह शक्तः प्रतीपं हि कर्तुम् ॥ १३ ॥


इति सञ्चिन्त्य सा बाला तमुवाच महामुनिम् ।
धैर्यं कुरु महाभाग परं पारं नयामि वै ॥ १४ ॥


                    सूत उवाच
पराशरस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं हितपूर्वकम् ।
करं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सिन्धोः पारं गतः पुनः॥ १५॥


मत्स्यगन्धां प्रजग्राह मुनिः कामातुरस्तदा ।
वेपमाना तु सा कन्या तमुवाच पुरःस्थितम् ॥१६ ॥


दुर्गन्धाहं मुनिश्रेष्ठ कथं त्वं नोपशङ्कसे ।
समानरूपयोः कामसंयोगस्तु सुखावहः ॥ १७ ॥


इत्युक्तेन तु सा कन्या क्षणमात्रेण भामिनी ।
कृता योजनगन्धा तु सुरूपा च वरानना ॥ १८ ॥


मृगनाभिसुगन्धां तां कृत्वा कान्तां मनोहराम् ।
जग्राह दक्षिणे पाणौ मुनिर्मन्मथपीडितः ॥ १९ ॥


ग्रहीतुकामं तं प्राह नाम्ना सत्यवती शुभा ।
मुने पश्यति लोकोऽयं पिता चैव तटस्थितः ॥२०॥


पशुधर्मो न मे प्रीतिं जनयत्यतिदारुणः ।
प्रतीक्षस्व मुनिश्रेष्ठ यावद्‌भवति यामिनी ॥ २१ ॥


रात्रौ व्यवाय उद्दिष्टो दिवा न मनुजस्य हि ।
दिवासङ्गे महान् दोषः पश्यन्ति किल मानवाः॥२२॥


कामं यच्छ महाबुद्धे लोकनिन्दा दुरासदा ।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या युक्तमुक्तमुदारधीः ॥ २३॥


नीहारं कल्पयामास शीघ्रं पुण्यबलेन वै ।
नीहारे च समुत्पन्ने तटेऽतितमसा युते ॥ २४ ॥


कामिनी तं मुनिं प्राह मृदुपूर्वमिदं वचः।
कन्याहं द्विजशार्दूल भुक्त्वा गन्तासि कामतः॥२५॥


अमोघवीर्यस्त्वं ब्रह्मन् का गतिर्मे भवेदिति ।
पितरं किं ब्रवीम्यद्य सगर्भा चेद्‌भवाम्यहम् ॥२६॥


त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत् ।
                   पराशर उवाच
कान्तेऽद्य मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि ॥ २७॥


वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि ।
                     सत्यवत्युवाच
यथा मे पितरौ लोके न जानीतो हि मानद ॥ २८ ॥


कन्याव्रतं न मे हन्यात्तथा कुरु द्विजोत्तम ।
पुत्रश्च त्वत्समः कामं भवेदद्‌भुतवीर्यवान् ॥ २९ ॥


गन्धोऽयं सर्वदा मे स्याद्यौवनं च नवं नवम् ।
                   पराशर उवाच
शृणु सुन्दरि पुत्रस्ते विष्ण्वंशसम्भवः शुचिः ॥३०॥


भविष्यति च विख्यातस्त्रैलोक्ये वरवर्णिनि ।
केनचित्कारणेनाहं जातः कामातुरस्त्वयि ॥३१॥


कदापि च न सम्मोहो भूतपूर्वो वरानने ।
दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं सदाहं धैर्यमावहम् ॥३२॥


दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वशगोऽभवम् ।
तत्किञ्चित्कारणं विद्धि दैवं हि दुरतिक्रमम् ॥३३॥


दृष्ट्वाहं चातिदुर्गन्धां त्वां कथं मोहमाप्नुयाम् ।
पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने ॥३४॥
वेदविद्‌भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये ।
                      सूत उवाच
इत्युक्त्वा तां वशं यातां भुक्त्वा स मुनिसत्तमः॥ ३५॥
जगाम तरसा स्नात्वा कालिन्दीसलिले मुनिः ।
सापि सत्यवती जाता सद्यो गर्भवती सती ॥३६॥


सुषुवे यमुनाद्वीपे पुत्रं काममिवापरम् ।
जातमात्रस्तु तेजस्वी तामुवाच स्वमातरम् ॥३७॥


तपस्येव मनः कृत्वा विविशे चातिवीर्यवान् ।
गच्छ मातर्यथाकामं गच्छाम्यहमतः परम् ॥३८॥


तपः कर्तुं महाभागे दर्शयिष्यामि वै स्मृतः ।
मातर्यदा भवेत्कार्यं तव किञ्चिदनुत्तमम् ॥३९॥


स्मर्तव्योऽहं तदा शीघ्रमागमिष्यामि भामिनि ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि त्यक्त्वा चिन्तां सुखं वस ॥ ४० ॥


इत्युक्त्वा निर्ययौ व्यासः सापि पित्रन्तिकं गता ।
द्वीपे न्यस्तस्तया बालस्तस्माद्‌द्वैपायनोऽभवत् ॥ ४१ ॥


जातमात्रो जगामाशु वृद्धिं विष्ण्वंशयोगतः।
तीर्थे तीर्थे कृतस्तानश्चचार तप उत्तमम् ॥४२॥


एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् ।
चकार वेदशाखाश्च प्राप्तं ज्ञात्वा कलेर्युगम् ॥४३॥


वेदविस्तारकरणाद्व्यासनामाभवन्मुनिः ।
पुराणसंहिताश्चक्रे महाभारतमुत्तमम् ॥ ४४ ॥


शिष्यानध्यापयामास वेदान्कृत्वा विभागशः ।
सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ॥ ४५ ॥


असितं देवलं चैव शुकं चैव स्वमात्मजम् ।
                 सूत उवाच
एतच्च कथितं सर्वं कारणं मुनिसत्तमाः ॥ ४६॥


सत्यवत्याः सुतस्यापि समुत्पत्तिस्तथा शुभा ।
संशयोऽत्र न कर्तव्यः सम्भवे मुनिसत्तमाः ॥४७॥


महतां चरिते चैव गुणा ग्राह्या मुनेरिति ।
कारणाच्च समुत्पत्तिः सत्यवत्या झषोदरे ॥४८॥


पराशरेण संयोगः पुनः शन्तनुना तथा ।
अन्यथा तु मुनेश्चित्तं कथं कामाकुलं भवेत् ॥४९॥


अनार्यजुष्टं धर्मज्ञः कृतवान्स कथं मुनिः ।
सकारणेयमुत्पत्तिः कथिताश्चर्यकारिणी ॥५०॥


श्रुत्वा पापाच्च निर्मुक्तो नरो भवति सर्वथा ।
य एतच्छुभमाख्यानं शृणोति श्रुतिमान्नरः ॥५१॥


न दुर्गतिमवाप्नोति सुखी भवति सर्वदा ॥५२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे व्यासजन्मवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

_______________________________________
प्रस्तुतिकरण :-यादव योगेश कुमार "रोहि" 8077160219





( स्वामीदयानन्द कृत ॠग्वेदभाष्य में, भाग-(१) में सायण भाष्य को आधार मानकर ही भाष्य लिखा गया )

सोम: प्रथमो विविदे गन्ध्र्वो विविद  उत्तरः।
तृतीयो अग्निष्टे  पतिस्तु रीयस्ते मनुष्यजाः॥
ऋग्वेद  मण्डल- १०, सूक्त- ८५, ऋचा- ४०}

सोमः॑ प्रथ॒मो वि॑विदे गन्ध॒र्वो वि॑विद॒ उत्त॑रः ।  तृ॒तीयो॑ अ॒ग्निष्टे॒ पति॑स्तु॒रीय॑स्ते मनुष्य॒जाः ॥४०


सोमः । प्रथमः । विविदे। गन्धर्वः । विविदे। उत्तरः ।तृतीयः । अग्निः । ते। पतिः । तुरीयः । ते । मनुष्यऽजाः ॥ ४० ॥

सायण-भाष्य-

जातां= कन्यां "सोमः= प्रथमभावी सन् "विविदे =लब्धवान् । "गन्धर्वः ="उत्तरः सन् "विविदे =लब्धवान् । "अग्निः "तृतीयः "पतिः “ते =तव । पश्चात् "मनुष्यजाः पतिः “तुरीयः =चतुर्थः ॥ ॥२७॥



 स्वामी दयानन्द अपने ऋग्वेदभाष्य में सायण के आधार पर ही  इसका अर्थ यह लिखते हैं कि—

हे स्त्री ! जो (ते)- तेरा (प्रथमः) -पहला विवाहित (पतिः)- पति तुझ को (विविदे) -प्राप्त होता है उस का नाम (सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग होने से (विविदे)- प्राप्त होता वह, (गन्धर्व:)- एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व, जो (तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह (अग्निः)- अत्युष्णतायुक्त होने से अग्निसंज्ञक और जो (ते) तेरे (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें तक नियोग से पति होते हैं वे (मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं |            

समीक्षक-- स्वामी जी ने तो ऐसी हठ ठानी है कि अर्थों का अनर्थ कर दिया है इस मंत्र का यह अर्थ नहीं जैसा कि स्वामी नियोगानंद जी ने किया है देखिए इसका सही अर्थ इस प्रकार है कि--

सबसे (प्रथम:)= पहले, (सोम:)= सोम, (विवदे)= इस कन्या को प्राप्त हो, {अर्थात कन्या के माता पिता सब से पहले तो ये देखें कि उसका पति 'सोम' है या नहीं, पति का स्वभाव सौम्य है या नहीं, तत्पश्चात इस कन्या को (गन्धर्व:)= 'गां वेदवायं धारयति' ज्ञान की वाणियों को धारण करने वाला हो, यह (उत्तर:)= अधिक उत्कृष्ट होता है, कि{ सौम्यता यदि पति का पहला गुण है तो ज्ञान की वाणियों को धारण करना उसका दुसरा गुण है, (तृतीय:)= तीसरा, (अग्नि:)= प्रगतिशील मनोवृत्ति वाला हो {अर्थात तेरा पति वह है जो आगे बढ़ने की वृत्तिवाला हो }, (तुरीय:)=चौथा, (मनुष्यजा:)= वह मनुष्य की संतान हो, {अर्थात जिसमें मानवता हो, जिसका स्वभाव दयालुता वाला हो क्रूरता वाला नहीं}, (ते)= तेरा, (पति:)= पति है


इसके अतिरिक्त और भी मंत्र जैसे--
 
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि॥
~ऋग्वेद -(मण्डल १०, सूक्त ० ८५, ऋचा ४५)

  पदपाठ-

इमाम् । त्वम् । इन्द्र । मीढ्वः । सुऽपुत्राम् । सुऽभगाम् । कृणु।दश । अस्याम् । पुत्रान् । आ । धेहि । पतिम् । एकादशम् । कृधि ॥ ४५ ॥

सायण-भाष्य-

हे इन्द्र “त्वम् "इमां वधूं "सुपुत्रां सुभगां च कृणु= कृधि । अस्यां वध्वां "दश पुत्रान् “आ “धेहि = । “पतिमेकादशं "कृधि । दश पुत्राः पतिरेकादशो यथा स्यात्तथा कृधि =कृणु ॥

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उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ॥
~ऋ० {मं० १०, सू० १८, मं० ८}

उत् । ईर्ष्व । नारि । अभि । जीवऽलोकम् । गतऽअसुम् । एतम् । उप । शेषे । आ । इहि ।

हस्तऽग्राभस्य । दिधिषोः । तव । इदम् । पत्युः । जनिऽत्वम् । अभि । सम् । बभूथ ॥८।

सायण-भाष्य

हे "नारि =मृतस्य पत्नि "जीवलोकं= जीवानां पुत्रपौत्रादीनां लोकं= स्थानं गृहमभिलक्ष्य "उदीर्ष्व= अस्मात् स्थानादुत्तिष्ठ। ईर= गतौ' आदादिकः । "गतासुम् =अपक्रान्तप्राणम् "एतं पतिम् "उप “शेषे= तस्य समीपे स्वपिषि । तस्मात्त्वम् “एहि =आगच्छ यस्मात्त्वं "हस्तग्राभस्य= पाणिग्राहं कुर्वतः “दिधिषोः= गर्भस्य निधातुः "तव अस्य “पत्युः संबन्धादागतम् “इदं "जनित्वं =जायात्वमभिलक्ष्य “सं “बभूथ =संभूतासि अनुमरणनिश्चयमकार्षीः तस्मादागच्छ।

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जैसा (इमां त्वमिन्द्र)  इस मन्त्रा में ग्यारहवें पुरुष तक स्त्री नियोग कर सकती है, वैसे पुरुष भी 
 



 
(दयानंद कृत ऋग्वेदभाष्य, भाष्य-२)
 
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्रानाधेहि  पतिमेकादशं कृधि॥
~ऋ० {मं० १०, सू ० ८५, मं ० ४५}

इमाम् । त्वम् । इन्द्र । मीढ्वः । सुऽपुत्राम् । सुऽभगाम् । कृणु।दश । अस्याम् । पुत्रान् । आ । धेहि । पतिम् । एकादशम् । कृधि ॥ ४५ ॥

हे इन्द्र “त्वम् "इमां वधूं "सुपुत्रां सुभगां च कृणु कृधि । अस्यां वध्वां "दश पुत्रान् “आ “धेहि । “पतिमेकादशं "कृधि । दश पुत्राः पतिरेकादशो यथा स्यात्तथा कृधि कृणु ॥

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दयानंद अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि—

“हे (मीढ्व इन्द्र) वीर्य सेचन में समर्थ ऐश्वर्ययुत्तफ पुरुष !तू इस विवाहित स्त्री वा विधवा स्त्रिायों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्ययुक्त कर, इस विवाहित स्त्री में दश पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान !हे स्त्री !तू भी विवाहित पुरुष वा नियुक्त पुरुषों से दश सन्तान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ”

समीक्षक-- धन्य है! स्वामी जी कलयुग तो धिरे-धिरे आता था अपने उसे शीघ्र प्रवर्त करने का ढंग निकाला, जैसा कि आपने अपने सत्यार्थ प्रकाश में इस श्रुति के अर्थ यह लिखा कि "एक स्त्री चार नियुक्त पुरुषों के अर्थ और दो अपने लिए पुत्र उत्पन्न कर लें" यह तो जैसे घर की खेती समझ ली की जब गये पुत्र हो गया, कन्या का कोई नाम ही नहीं बस पुत्र ही पुत्र होंगे, यदि यह ईश्वर की आज्ञा है तो ईश्वर सत्यसंकल्प है सबके पुत्र ही उत्पन्न होने चाहिए कन्या एक भी नहीं, बस सारा नियोग यही समाप्त हो जाता है, 

हे (इन्द्र)= इन्द्र परमएश्वर्य युक्त देव (मीढ:) सर्वसुखकारी पदार्थों की वृष्टि करने वाले, (त्वम्)= आप, (इमाम्)= इस स्त्री को भी, (सुपुत्राम् सुभगम्)=  पुत्रवती धनवती (कृणु)= करें और, (दश)= दश इसमें, (पुत्रान्)= पुत्रों को धारण करो, भाव यह है कि दश पुत्र पैदा करने के अदृष्ट इस स्त्री में स्थापित करों, और (एकादशं)= ग्यारहवां, (पतिम्)- पति को, (कृधि)= करों अर्थात जीवित पति और जीवित पुत्र इसको करों, यह मंत्र आशिर्वाद के अर्थ है, जो स्वामी नियोगानंद जी ने कुछ का कुछ लिख दिया है, और स्वामी जी ने यह न सोचा कि यदि एकादश पति पर्यन्त नियोग करने की ईश्वर की आज्ञा है, तो ईश्वर तो सत्यसंकल्प है तब तो सब स्त्रीयों के दश-दश पुत्र से कम नहीं होने चाहिए यदि दश से कम होंगे तो ईश्वर का संकल्प निष्फल होगा, इससे स्वामी जी का किया अर्थ अशुद्ध है।






(दयानंद कृत ऋग्वेदभाष्य, भाष्य-३)
उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ॥
~ऋ० {मं० १०, सू० १८, मं० ८}

इमाः । नारीः । अविधवाः । सुऽपत्नीः । आऽअञ्जनेन । सर्पिषा । सम् । विशन्तु ।

अनश्रवः । अनमीवाः । सुऽरत्नाः । आ । रोहन्तु । जनयः । योनिम् । अग्रे ॥७

“अविधवाः । धवः पतिः । अविगतपतिकाः । जीवद्भर्तृका इत्यर्थः । "सुपत्नीः शोभनपतिकाः "इमाः "नारीः नार्यः "आञ्जनेन सर्वतोऽञ्जनसाधनेन "सर्पिषा घृतेन अक्तनेत्राः सत्यः “सं "विशन्तु स्वगृहान् प्रविशन्तु । तथा “अनश्रवः अश्रुवर्जिता अरुदत्यः "अनमीवाः । अमीवा रोगः। तद्वर्जिताः। मानसदुःखवर्जिता इत्यर्थः। "सुरत्नाः शोभनधनसहिताः "जनयः। जनयन्त्यपत्यमिति जनयो भार्याः । ताः "अग्रे सर्वेषां प्रथमत एव “योनिं गृहम् “आ “रोहन्तु आगच्छन्तु ॥


अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि—

हे (नारि) विध्वे तू (एतं गतासुम) इस मरे हुए पति की आशा छोड़ के (शेषे) बाकी पुरुषों में से (अभि जीवलोकम) जीते हुए दूसरे पति को (उपैहि) प्राप्त हो और (उदीष्र्व) इस बात का विचार और निश्चय रख कि जो (हस्तग्राभस्यदिधिषो:) तुम विध्वा के पुनः पाणिग्रहण करने वाले नियुक्त पति के सम्बन्ध् के लिये नियोग होगा तो (इदम्) यह (जनित्वम्) जना हुआ बालक उसी नियुक्त (पत्युः) पति का होगा और जो तू अपने लिये नियोग करेगी तो यह सन्तान (तव) तेरा होगा। ऐसे निश्चययुक्त (अभि सम् बभूथ) हो और नियुक्त पुरुष भी इसी नियम का पालन करे”



हे (नारि)= स्त्री, तेरे पति मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं इसलिए, (उदीर्ष्व)= उठ और इस, (जीवलोकम् अभि)= जीवित संसार अपने पुत्रादि और घर-परिवार का तू ध्यान कर, इस प्रकार (गतासुम)= गत प्राण, (एतम्)= इस पति के, (उपशेष)= समीप बैठ शौक करने का क्या लाभ? (एहि)= उठ और अपने घर को गमन कर, (हस्तग्राभस्य)= अपने गर्भ में सन्तान को स्थापित करने वाले, (तव पत्यु:)= अपने पति की,(इदं जनित्वम्)= इस सन्तान को, (अभि)= ध्यान करती हुई, (संबभूथ)= अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए यत्नशील हो।





 
(दयानंद कृत ऋग्वेदभाष्य, भाष्य-४)

 
अदेवृघ्न्यपतिघ्नीहैधि शिवा पशुभ्यः सुयमा सुवर्चाः।
प्रजावती वीरसूर्देवृकामा स्योनेममग्निं गार्हपत्यं सपर्य॥
~अथर्व० {का० १४, अनु० २, मं० १८}

 
दयानंद अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि—

“हे (अपतिघ्न्यदेवृघ्नि) पति और देवर को दुःख न देने वली स्त्री तू (इह) इस गृहाश्रम में (पशुभ्यः) पशुओं के लिये (शिवा) कल्याण करनेहारी (सुयमा) अच्छे प्रकार धर्म-नियम में चलने (सुवर्चाः) रूप और सर्वशास्त्रा विद्यायुक्त (प्रजावती) उत्तम पुत्र पौत्रादि से सहित (वीरसूः) शूरवीर पुत्रों को जनने (देवृकामा) देवर की कामना करने वाली (स्योना) और सुख देनेहारी पति वा देवर को (एधि) प्राप्त होके (इमम्) इस (गार्हपत्यम्) गृहस्थ सम्बंधी (अग्निम्) अग्निहोत्रा का (सपर्य) सेवन किया करें”

समीक्षक-- स्वामी जी यहाँ भी अर्थ का अनर्थ करने से न चूंके, देखिए इस मंत्र में “देवृकामा” इस पद से यह अर्थ सिद्ध नहीं होता कि वह देवर से भोग करना चाहती है, और जबकि पति है तो भला वह दुसरे पुरुष की इच्छा क्यों करेगी? और कामना विद्यमानता में नहीं होती, अविद्यमानता में होती है, यदि वह देवर को पति रूप में चाहती तो “देवरि पतिकामा” ऐसा प्रयोग हो सकता है, सो मंत्र में किया नहीं इससे नियोग सिद्ध नहीं होता, किन्तु यह ऐसे स्थान का प्रयोग है, जिस स्त्री के देवर नहीं वह चाहती है कि यदि मेरे ससुर के बालक हो तो मैं देवर वाली होऊं, ऐसी स्त्री को देवृकामा कहते हैं, जैसे भ्रातृ रहित कन्या  में “भ्रातृकामा” यह प्रयोग बनता है कि मेरे भाई हो तो मैं बहन कहाऊं, ऐसे ही यह देवृकामा शब्द है इससे नियोग सिद्ध नहीं होता, अब इसका यथार्थ अर्थ सुनिए--

हे स्त्री तू, (अपतिघ्न्यदेवृघ्नि)= पति और देवर को दुख न देने वाली, (एधि)= वृद्धि को प्राप्त हो, अर्थात देवर आदि कुटुम्बियों से विरुद्ध मत करना, (इह)= इस गृहाश्रम में, (पशुभ्य:)= पशुओं के लिये, (शिवा)= कल्याणकारी, (सुयमा)= अच्छे प्रकार धर्म नियम में चलने वाली, (सुवर्चा:)= रूप गुणयुक्त, (प्रजावती)= उत्तम पुत्र पौत्रादि सहित, (वीरसू:)= वीर पुत्रों को जन्म देने वाली, (देवृकामा)= देवर के होने की प्रार्थना करने वाली, (स्योना)= सुखिनी, (इमम्)= इस, (गार्हपत्यम्)= गृहस्थ सम्बन्धी, (अग्रिम्)= अग्निहोत्र को, (सपर्य)= सेवन किया करें।

यह इसका अर्थ है स्वामी जी ने यह नहीं सोचा कि उनका यह भाष्य और भी कोई देखेगा तो क्या कहेगा? यह विवाह सम्बन्धी मंत्र नियोग में लगाये हैं, धन्य है तुम्हारी बुद्धि, अब यदि तुम्हारी अश्लील बुद्धि में केवल उल्टी बातें ही आती है तो सुनिये इस श्रुति में कथन है कि--
 
तदा रोहतु सुप्रजा या कन्या विन्दते पतिम्॥ ~अथर्व० {१४/२/२२}
स्योना भव श्वशुरेभ्यः स्योना पत्ये गृहेभ्यः।
स्योनास्यै सर्वस्यै विशे स्योना पुष्टायैषां भव॥ ~अथर्व० {१४/२/२७}

 
हे स्त्री तू ससुर, पति और घर के कुटुम्बियों सभी के अर्थ सुख देने वाली हो।

अब यदि तुम्हारा किया अर्थ ही सही माने तो यहाँ पति, ससुर दोनों के लिए (स्योना) पद आया है अर्थात सुख देने वाली हो एवं सब ही कुटुम्बियों को सुख देने वाली लिखा है, तो क्या जो पति के संग व्यवहार करें, वही सबके साथ करें? यह कभी नहीं हो सकता पति को और प्रकार का सुख, और ससुरादि को सेवा आदि से सुख देती है, यह नहीं कि सुख देने से सबके संग भोग के ही अर्थ हो जाये, इससे स्वामी जी के किये सब अर्थ भ्रष्ट है मिथ्या है,


 
दयानंदी-- तुम नियोग को वेद विरुद्ध कहते हो तो क्या जो ये मनुस्मृति आदि ग्रंथों में नियोग कथन किया है वह सब मिथ्या है?

देखिये स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में मनुस्मृति से नियोग का प्रमाण देते हुए यह लिखा है कि—


प्रोषितो धर्मकार्यार्थं प्रतीक्ष्योsष्टौ नरः समाः।
विद्यार्थं षड् यशोsर्थं वा कामार्थं त्रीस्तु वत्सरान्॥१॥
वन्ध्याष्टमेsधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजाः।
एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी॥२॥ ~मनु० {९/७६,८१}

 
विवाहित स्त्री जो विवाहित पति धर्म के अर्थ परदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या और कीर्ति के लिये गया हो तो छः और धनादि कामना के लिये गया हो तो तीन वर्ष तक बाट देख के, पश्चात् नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर ले, जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त पति छूट जावे॥१॥

वैसे ही पुरुष के लिये भी नियम है कि वन्ध्या हो तो आठवें (विवाह से आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ न रहै), सन्तान होकर मर जायें तो दशवें, जब-जब हो तब-तब कन्या ही होवे पुत्र न हों तो ग्यारहवें वर्ष तक और जो अप्रिय बोलने वाली हो तो सद्यः उस स्त्री को छोड़ के दूसरी स्त्री से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर लेवे॥२॥“


समीक्षक-- यह अर्थ दयानंद के कपोल भंडार से निकलें है, इन दोनों ही श्लोकों में कहीं भी नियोग तो क्या नियोग की गंध तक नहीं है, और यह क्या बात हुई कि यहाँ पहला श्लोक तो ९ वें अध्याय का ७६ वां और दूसरा श्लोक ८१ वां लिखा है और इन दोनों का दयानंद ने एक ही प्रसंग लगा दिया, जबकि इनमें से एक में भी नियोग तो क्या नियोग की गंध तक नहीं है, देखों इससे पहले यह श्लोक हैं कि--


विधाय वृत्तिं भार्यायाः प्रवसेत्कार्यवान्नरः।
अवृत्तिकर्शिता हि स्त्री प्रदुष्येत्स्थितिमत्यपि॥७४॥
विधाय प्रोषिते वृत्तिं जीवेन्नियममास्थिता।
प्रोषिते त्वविधायैव जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः॥७५॥
प्रोषितो धर्मकार्यार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः।
विद्यार्थं षड्यशोऽर्थं वा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान्॥७६॥

 
इसका अर्थ यह है कि-- जब कोई पुरुष परदेश को जाये तो प्रथम स्त्री के खान पान का प्रबंध करता जाये, क्योकि बिना प्रबंध क्षुधा के कारण कुलीन स्त्री भी दूसरे पुरुष की इच्छा कर सकती हैं॥७४॥

खान पान की व्यवस्था करकें परदेश जाने के अनन्तर उस पुरुष की स्त्री नियम अर्थात पतिव्रत से रहकर अपना समय व्यतीत करें, और जब भोजन को न रहे या पुरुष पुरा बंदोबस्त करकें  न गया हो तो पति के परदेश होने तक शिल्पकर्म जो निन्दित न हो अर्थात सूत कातना हस्त से काढना आदि कर्मों से गुजरा करें॥७५॥

यदि वह परदेश धर्म कार्य को गया हो तो आठ वर्ष, विद्या पढने गया हो तो छ: वर्ष, धन यश को गया हो तो तीन वर्ष तक राह देखें, पश्चात पति के पास जहाँ हो वहाँ चली जावें॥७६॥

अब तुम ही बताओ कि इसमें नियोग की बात कहा से आ गई और यह हम पहले ही कह चुके हैं कि मनु जी इस महाअधर्म नियोग का समर्थन नहीं करते, बल्कि मनु जी तो इसे पशुधर्म बताते हुए, इस महाअधर्म व्यभिचार नियोग की घोर निंदा करते हैं, सुनिये मनु जी नियोग की निंदा करते हुए मनुस्मृति में यह लिखते हैं कि--

 
नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्व चित्।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः॥ {९.६५}
पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा।
पतिलोकमभीप्सन्ती नाचरेत्किं चिदप्रियम्॥ {५/१५६}
कामं तु क्सपयेद्देहं पुष्पमूलफलैः शुभैः।
न तु नामापि गृह्णीयात्पत्यौ प्रेते परस्य तु॥ {५/१५७}
आसीता मरणात्क्सान्ता नियता ब्रह्मचारिणी।
यो धर्म एकपत्नीनां काङ्क्षन्ती तमनुत्तमम्॥ {५/१५८}
अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम्।
दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसंततिम्॥ {५/१५९}
मृते भर्तरि साढ्वी स्त्री ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता।
स्वर्गं गच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिणः॥ {५/१६०}
अपत्यलोभाद्या तु स्त्री भर्तारमतिवर्तते।
सेह निन्दामवाप्नोति परलोकाच्च हीयते॥ {५/१६१}
पतिं हित्वापकृष्टं स्वमुत्कृष्टं या निषेवते।
निन्द्यैव सा भवेल्लोके परपूर्वेति चोच्यते॥ {५/१६३}
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम्।
शृगालयोनिं प्राप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते॥ {५/१६४} ~मनुस्मृति

 
जो वेद मंत्र विवाह के संबंध में कहें गए हैं उसमें न तो नियोग का वर्णन है और न ही विधवा विवाह का॥

अगले जन्म में अच्छा पति पाने की इच्छा  रखने वाली स्त्री को इस जन्म में विवाहित पति की जीवन-अवधि में अथवा उसकी मृत्यु हो जाने पर उसे बुरा लगने वाला कोई कार्य नहीं करना चाहिए॥१५६॥

स्त्री अपने पति की मृत्यु हो जाने के पश्चात फल-फूल और कन्द-मूल खाकर अपना शरीर चाहे सुखा ले पर भूल कर भी दूसरे पुरूष के संग की इच्छा न करें॥१५७॥

पतिव्रता स्त्री को पति के मृत्यु के बाद पुरा जीवन क्षमा, संयम, तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुजारना चाहिए, उसे सदाचारणी स्त्रीयों द्वारा आचरण योग्य उत्तम धर्म का पालन करने पर गर्व करना चाहिए॥१५८॥

यदि किसी स्त्री के पति की मृत्यु बिना किसी संतान को उत्पन्न किए हो जाए तब भी स्त्री को अपनी सद्गति के लिए दूसरे पुरुष का संग नहीं करना चाहिए,॥१५९॥

सन्तान उत्पन्न नही करने वाले ब्रह्मचारीयों की तरह पति की मृत्यु के बाद ब्रह्मचर्य पालन करने वाली स्त्री पुत्रवती नही होने पर भी स्वर्ग प्राप्त करती है॥१६०॥

पुत्र प्राप्ति की इच्छा से जो स्त्री पतिव्रत धर्म को तोड़ कर दूसरे पुरुष के साथ संभोग करती है उसकी इस संसार में निंदा होती है तथा परलोक में बुरी गति मिलती है॥१६१॥

कम गुणों वाले अपने पति का त्याग कर जो स्त्री अधिक गुणों वाले अन्य पुरुष का संग करती हैं वह इस संसार में निंदा का पात्र बनती है और दो पुरूषों की अंकशायिनी बनने का कलंक लगवाती है॥१६३॥

पति के सिवाय दूसरे पुरुष से संभोग करने वाली विवाहित स्त्री इस संसार में निंदा का पात्र तो बनती ही है और मरने के बाद   गीदड़ की योनि में जन्म लेती हैं, वह कोढ़ जैसे अनेक असाध्य रोगों से पीड़ा पाति है॥१६४॥

अब कहों क्या तुमने और तुम्हारे इस निर्बुद्धि दयानंद ने मनुस्मृति में यह श्लोक नहीं देखें? अवश्य देखें होंगे परन्तु लिखते कैसे इच्छा तो भारतवर्ष की समस्त स्त्रीयों को व्यभिचारीणी बनाने की थी, भारतवर्ष को इस पशुधर्म की ओर धकेलने की थी, और देखिये तुम्हारे स्वामी जी ने जो यह दूसरा श्लोक लिखा 
है, (वन्ध्याष्टमेsधिवेद्याब्दे०) इसके अर्थ भी गडबड लिखें हैं, सुनिये इसका सही अर्थ इस प्रकार है कि--


वन्ध्याष्टमेsधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजाः।
एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी॥

 
पत्नि यदि वन्ध्या हो तो आठ वर्ष, बार-बार मृत बच्चों को जन्म देती हो तो दश वर्ष, या केवल कन्याओं को ही जन्म देती हों तो ग्यारह वर्ष उपरान्त पति दुसरा विवाह करने का अधिकारी है और यदि पत्नि अप्रिय बोलने वाली है तो पति तत्काल दुसरा विवाह कर सकता है।

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यह इसका अर्थ है, अब कहों इसमें नियोग की बात कहाँ से आ गई, भला इसमें नियोग विषयक ऐसा कौन सा पद है जिससे कि नियोग सिद्ध होता है, यह नियोग की बात तुम्हारे स्वामी जी के कपोल भंडार से प्रकट हुई है, इस कारण दयानंद के किये सभी अर्थ अशुद्ध होने से, मानने योग्य नहीं,


 
दयानंदी-- तो क्या मनुस्मृति से नियोग सिद्ध नहीं होता?



दयानंदी-- यदि ऐसा मानते हो तो सुनिये, स्वामी दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में पुनः मनुस्मृति से प्रमाण लिखा है कि—


“देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिाया सम्यघ् नियुक्तया।
प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये॥१॥
ज्येष्ठो यवीयसो भार्य्या यवीयान्वाग्रजस्त्रिायम्।
पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि॥२॥
औरसः क्षेत्राजश्चै०॥३॥ ~मनु०{अ० ८, श्लोक ५८-६०}

 
(सपिण्ड) अर्थात् पति की छः पीढि़यों में पति का छोटा वा बड़ा भाई अथवा स्वजातीय तथा अपने से उत्तम जातिस्थ पुरुष से विध्वा स्त्री का नियोग होना चाहिये, परन्तु जो वह मृतस्त्रीपुरुष वा विध्वा स्त्री सन्तानोत्पत्ति की इच्छा करती हो तो नियोग होना उचित है, और जब सन्तान का सर्वथा क्षय हो तब नियोग होवे, जो आपत्काल अर्थात् सन्तानों के  होने की इच्छा न होने में बड़े भाई की स्त्री से छोटे का और छोटे की स्त्री से बड़े भाई का नियोग होकर सन्तानोत्पत्ति हो जाने पर भी पुनः वे नियुक्त आपस में समागम करें तो पतित हो जायें, अर्थात् एक नियोग में दूसरे पुत्र के गर्भ रहने तक नियोग की अवधि है”

अब तुम कहों क्या इससे नियोग सिद्ध नहीं होता?

समीक्षक-- तुम चुतिया हो, और तुमसे भी बड़ा चुतिया है तुम्हारा यह निर्बुद्धि दयानंद, सुनो तुमने यह श्लोक तो पढ़े पर यह जाना कि यह श्लोक यहाँ किस सन्दर्भ में लिखा है, मनुस्मृति में लिखीं सब ही बातों को मनु जी का मत जान लेना, इसी से दयानंद की बुद्धि का पता चलता है, सुनिये यह मत मनु जी  का नहीं बल्कि राजा वेन का है जिसे मनु जी अपने ग्रंथ में इस कारण कथन किया है क्योंकि उस समय राजा वेन के राज में यह पशुधर्म नियोग चलन में था, यह पशुधर्म राजा वेन ने आरंभ किया और उसने नियोग के जो-जो नियम चलाए उसे मनु जी ने अपने ग्रंथ में लिखा है जिससे सब मनुष्य यह बात भलीभाँति समझ सकें कि क्या धर्म है और क्या अधर्म?
 और यह हम पूर्व ही सिद्ध कर आये हैं कि मनु जी इस पशुधर्म नियोग के घोर विरोधी थे, सुनिये मनु जी, राजा वेन द्वारा चलाये इस महाअधर्म नियोग की निंदा करते हुए लिखते हैं कि--


भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भार्या या गुरुपत्न्यनुजस्य सा।
यवीयसस्तु या भार्या स्नुषा ज्येष्ठस्य सा स्मृता॥ -{९/५७}
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम्।
सृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते॥ -{९/३०}
नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः।
अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना धर्मं हन्युः सनातनम्॥ -{९/६४}
नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्व चित्।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः॥ -{९/६५}
अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः।
मनुष्याणामपि प्रोक्तो वेने राज्यं प्रशासति॥ -{९/६६}
स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा।
वर्णानां संकरं चक्रे कामोपहतचेतनः॥ -{९.६७}
ततः प्रभृति यो मोहात्प्रमीतपतिकां स्त्रियम्।
नियोजयत्यपत्यार्थं तं विगर्हन्ति साधवः॥ -{९/६८} ~मनु०

 
छोटे भाई के लिए बड़े भाई की पत्नी गुरु पत्नी तुल्य, और बड़े भाई के लिए छोटे भाई की पत्नी पुत्रवधू जैसी होती है॥

यदि विवाहित स्त्री परपुरूष का संग करती है तो वह इस लोक में निन्दित होती है, और अनेक यौन सम्बन्धी रोगों से ग्रसित हो जाती है तथा मृत्यु के बाद गीदड़ी के रूप में जन्म लेती है॥

ब्राह्मणादि तीनों वर्णों की विधवा स्त्री को परपुरूष का संग नहीं करना चाहिए, दूसरे पुरुष का संग करने से स्त्री सनातन एक पतिव्रत धर्म को नष्ट करती है और उससे उत्पन्न संतान धर्म का विनाश करने वाली होती है॥

जो वेद मंत्र विवाह के सम्बन्ध में कहें गये हैं, उनमें न तो नियोग का वर्णन है और न ही विधवा विवाह का॥

नियोग का प्रयोग राजा वेन के शासनकाल में अवश्य हुआ था लेकिन तब भी विद्वज्जनों ने इसे पशुधर्म बताते हुए मनुष्यों के लिए निषिद्ध बताया था॥

जो राजा वेन सम्पूर्ण धरती को भोगने वाला चक्रवर्ती सम्राट था, कामवासना के  वशीभूत हो उसी राजा ने वर्णसंकर संतान उत्पन्न करने के दुष्चक्र(नियोग) का आरम्भ किया॥

उस राजा वेन के समय से यह रीति चली  और जो उसकी मति मानने वाले लोग शास्त्र के न जानने वाले विधवा स्त्री को परपुरूष के साथ योजना करते हैं, उस विधि को साधु पुरुष निन्दा करते हैं॥

इससे सिद्ध होता है कि यह पशुधर्म नियोग राजा वेन ने आरम्भ किया, और मनु जी नियोग प्रथा के घोर विरोधी थे, मनु जी ने इस महाअधर्म नियोग की तुलना पशुधर्म से करते हुए इसकी बहुत निन्दा की है, जो विद्वान लोग हैं वे इस बात को भलीभाँति समझते हैं, मुझे तो तुम्हारे स्वामी जी राजा वेन के ही अवतार मालूम पड़ते हैं, या राजा वेन के भी बाप, दादा या गुरु कहूं तो गलत नहीं होगा, क्योकि उसने तो केवल अपनी ही जाति में नियोग चलाया और एक ही संतान उत्पन्न करने को कहा, परन्तु तुम्हारे दयानंद तो सब ही जाति में नियोग करना और ग्यारह तक पति बनाने की आज्ञा करते हैं, यह पशुधर्म दयानंद ने चलाया जो राजा वेन से प्रारम्भ हुआ है इससे पता चलता है कि दयानंद धर्म के नहीं अधर्म के फैलाने वाले हैं।

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ऋग्वेदः सूक्तं १०.१८


परं मृत्यो अनु परेहि पन्थां यस्ते स्व इतरो देवयानात् ।
चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान् ॥१॥

पदपाठ-

परम् । मृत्यो इति । अनु । परा । इहि । पन्थाम् । यः । ते । स्वः । इतरः । देवऽयानात् ।चक्षुष्मते । शृण्वते । ते । ब्रवीमि । मा । नः । प्रऽजाम् । रिरिषः । मा । उत । वीरान् ॥१।

सायण-भाष्य

हे "मृत्यो सर्वेषां मारकैतन्नामक देव "परम् अन्यं "पन्थां पन्थानम् "अनु आनुपूर्व्येण “परेहि पराङ्मुखो गच्छ। यजमानादिति शेषः । कोऽसौ पन्थाः । "ते तव "स्वः स्वभूतः "देवयानात् । देवा अनेन मार्गेण गच्छन्तीति देवयानो देवमार्गः। तस्मात् "इतरः यः पन्थाः तं प्रगच्छ । न केवलमतः परागच्छ अपि तु "चक्षुष्मते दर्शनवते “शृण्वते सर्वम् । अप्रतिहतसर्वेन्द्रियविज्ञानायेत्यर्थः । "ते तुभ्यं "ब्रवीमि कथयामि । “नः अस्माकं "प्रजां दुहितृदौहित्रात्मिकां “मा "रिरिषः मा हिंसीः । “उत अपि च "वीरान् पुत्रपौत्रादीन् "मा हिंसीः । तत्परागमनेन रक्षेत्यर्थः ॥

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मृत्योः पदं योपयन्तो यदैत द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः ।
आप्यायमानाः प्रजया धनेन शुद्धाः पूता भवत यज्ञियासः ॥२॥

पदपाठ-

मृत्योः । पदम् । योपयन्तः । यत् । ऐत । द्राघीयः । आयुः । प्रऽतरम् । दधानाः ।आप्यायमानाः । प्रऽजया । धनेन । शुद्धाः । पूताः । भवत । यज्ञियासः ॥२

सायण-भाष्य

हे मृतस्य ज्ञातयः "मृत्योः परागच्छतः तस्य "पदम् । पद्यतेऽस्मिन्निति पदं पितृयाणः । तं “योपयन्तः विमोहयन्तः परिवर्जयन्तः "यत् यस्मात् “ऐत देवयानीयपथा गतवन्तः तस्मात् “द्राघीयः दीर्घतरम् “आयुः जीवनं “प्रतरं प्रकृष्टतरमत्यर्थं "दधानाः धारयन्तो भवथ। किंच हे "यज्ञियासः यज्ञार्हा यज्ञसंपादिनो यजमानाः "प्रजया पुत्रपौत्रादिकया “धनेन गवाश्वादिकेन च “आप्यायमानाः वर्धमानाः सन्तः शुद्धाः जन्मान्तरसंचितदुरितक्षयात् शुद्धाः "भवत । “पूताः वर्तमानजन्मोपचितदुरितक्षयाच्च पूता भवत ॥

पैतृमेधिके कर्मणि अमात्याः ‘इमे जीवा वि मृतैः' इति सव्यावृतो व्रजन्ति । सूत्रितं च’इमे जीवा वि मृतैरिति सव्यावृतो व्रजन्ति' (आश्व. गृ. ४. ४. ९) इति ॥

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इमे जीवा वि मृतैराववृत्रन्नभूद्भद्रा देवहूतिर्नो अद्य 
प्राञ्चो अगाम नृतये हसाय द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः ॥३॥

पदपाठ-

इमे । जीवाः । वि । मृतैः । आ । अववृत्रन् । अभूत् । भद्रा । देवऽहूतिः । नः । अद्य ।प्राञ्चः । अगाम । नृतये । हसाय । द्राघीयः । आयुः । प्रऽतरम् । दधानाः ॥३

सायण-भाष्य

“इमे “जीवाः जीवन्तः पुरुषाः "मृतैः पित्रादिभिः । तेभ्य इत्यर्थः । “वि “आ “अववृत्रन् व्यावृत्ता भवन्तु । एते न म्रियन्तामिति भावः । किंच "अद्य अस्मिन् दिने "नः अस्माकमशौचे विसृष्टे "देवहूतिः देवानामाह्वानं यत्र स देवहूतिः पितृमेधाख्यो यज्ञः "भद्रा कल्याणः "अभूत् भवतु । तत उत्तरं वयं "प्राञ्चः प्राङ्मुखाञ्चनाः "अगाम गच्छेम । प्रत्यञ्च इति भावः। "नृतये नर्तनाय कर्मणि गात्रविक्षेपाय । स्वकर्मानुष्ठानायेति भावः। "हसाय हसनाय पुत्रादिभिः सह क्रीडनाय । कीदृशा वयम्। "द्राघीय "आयुः "प्रतरं "दधानाः ॥

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इमं जीवेभ्यः परिधिं दधामि मैषां नु गादपरो अर्थमेतम् ।
शतं जीवन्तु शरदः पुरूचीरन्तर्मृत्युं दधतां पर्वतेन ॥४॥

पदपाठ-

इमम् । जीवेभ्यः । परिऽधिम् । दधामि । मा । एषाम् । नु । गात् । अपरः । अर्थम् । एतम् ।शतम् । जीवन्तु । शरदः । पुरूचीः । अन्तः । मृत्युम् । दधताम् । पर्वतेन ॥४।

सायण-भाष्य

अनया जीवरक्षार्थं पाषाणं परिधिरूपेण स्थापयन्ति । "जीवेभ्यः जीवद्भ्यः पुत्रपौत्रादिभ्यस्तेषां रक्षणार्थमेवं "परिधिं मृत्योः परिधानभूतं पाषाणं "दधामि निदधामि । ततः "एषां जीवतां मध्ये “अपरः अन्यः “एतम् इमम् "अर्थम् । अर्तेरिदं रूपम् । गन्तव्यं मरणाख्यं मार्गं "नु क्षिप्रं "मा “गात् मा गच्छतु । एतदर्थं परिधिं स्थापयामीति संबन्धः। किंच "पुरूचीः बह्वञ्चना बहुगमनाः "शतं “शरदः एतत्संख्याकान् वर्षान् "जीवन्तु स्वस्वप्राणान् धारयन्तु । तथा "पर्वतेन शिलोच्चयेन "मृत्युं सर्वेषां मारकमेतन्नामकम् "अन्तः दधताम् अन्तर्हितं कुर्वन्तु । यथा नागच्छति तथा कुर्वतामित्यर्थः॥

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यथाहान्यनुपूर्वं भवन्ति यथ ऋतव ऋतुभिर्यन्ति साधु ।
यथा न पूर्वमपरो जहात्येवा धातरायूंषि कल्पयैषाम् ॥५॥

पदपाठ

यथा । अहानि । अनुऽपूर्वम् । भवन्ति । यथा । ऋतवः । ऋतुऽभिः । यन्ति । साधु ।यथा । न । पूर्वम् । अपरः । जहाति । एव । धातः । आयूंषि । कल्पय । एषाम् ॥५।

-सायण-भाष्य

“यथा येन प्रकारेण "अहानि अहोरात्रात्मकानि दिनानि "अनुपूर्वं पूर्वपूर्वमनुक्रमेण "भवन्ति परिवर्तन्ते । "यथा च “ऋतवः वसन्तादयः “ऋतुभिः सह "साधु शोभनमविपर्यासेन "यन्ति गच्छन्ति । "यथा च “पूर्वं पूर्वकालीनं पितरम् "अपरः अर्वाक्कालीनः पुत्रः "न "जहाति न परित्यजति पूर्वमरणेन । “एव "एवं तेनैवोक्तप्रकारेण हे “धातः सर्वेषां धारयितरेतन्नामक देव “एषाम् अस्मत्कुलीनानां जीवानाम् "आयूंषि जीवनानि “कल्पय समर्थय। कुर्वित्यर्थः ॥ ॥ २६ ॥

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आ रोहतायुर्जरसं वृणाना अनुपूर्वं यतमाना यतिष्ठ 
इह त्वष्टा सुजनिमा सजोषा दीर्घमायुः करति जीवसे वः ॥६॥

सायण-भाष्य

हे मृतस्य स्वजनाः पुत्रपौत्रादयः "जरसं जरां "वृणानाः संभजमाना यूयम् "आयुः जीवनम् “आ “रोहत अधितिष्ठत । “अनुपूर्वम् आनुपूर्व्येण । अव्ययीभावः । पूर्वो ज्येष्ठः । ज्येष्ठानुपूर्व्या “यतमानाः प्रयत्नं कुर्वन्तो यूयं "यति “स्थ यत्संख्याका भवथ । यच्छब्दाच्छान्दसो डतिः । “सुजनिमा शोभनजननः “त्वष्टा एतन्नामको देवः "सजोषाः भवद्भिः संगतः सन् "इह अस्मिन् कर्मणि प्रवृत्तानां “वः युष्माकं “जीवसे जीवनाय “दीर्घं प्रभूतम् “आयुः "करति करोतु ॥

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इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं विशन्तु ।
अनश्रवोऽनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे ॥७॥

इमाः । नारीः । अविधवाः । सुऽपत्नीः । आऽअञ्जनेन । सर्पिषा । सम् । विशन्तु ।

अनश्रवः । अनमीवाः । सुऽरत्नाः । आ । रोहन्तु । जनयः । योनिम् । अग्रे ॥७

“अविधवाः । धवः पतिः । अविगतपतिकाः । जीवद्भर्तृका इत्यर्थः । "सुपत्नीः शोभनपतिकाः "इमाः "नारीः नार्यः "आञ्जनेन सर्वतोऽञ्जनसाधनेन "सर्पिषा घृतेन अक्तनेत्राः सत्यः “सं "विशन्तु स्वगृहान् प्रविशन्तु । तथा “अनश्रवः अश्रुवर्जिता अरुदत्यः "अनमीवाः । अमीवा रोगः। तद्वर्जिताः। मानसदुःखवर्जिता इत्यर्थः। "सुरत्नाः शोभनधनसहिताः "जनयः। जनयन्त्यपत्यमिति जनयो भार्याः । ताः "अग्रे सर्वेषां प्रथमत एव “योनिं गृहम् “आ “रोहन्तु आगच्छन्तु । (ऋग्वेद १०/१८/७)

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उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि 
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ ॥८॥

उत् । ईर्ष्व । नारि । अभि । जीवऽलोकम् । गतऽअसुम् । एतम् । उप । शेषे । आ । इहि ।हस्तऽग्राभस्य । दिधिषोः । तव । इदम् । पत्युः । जनिऽत्वम् । अभि । सम् । बभूथ ॥८।

हे "नारि मृतस्य पत्नि "जीवलोकं जीवानां पुत्रपौत्रादीनां लोकं स्थानं गृहमभिलक्ष्य "उदीर्ष्व अस्मात् स्थानादुत्तिष्ठ। ईर गतौ' आदादिकः । "गतासुम् अपक्रान्तप्राणम् "एतं पतिम् "उप “शेषे तस्य समीपे स्वपिषि । तस्मात्त्वम् “एहि आगच्छ यस्मात्त्वं "हस्तग्राभस्य पाणिग्राहं कुर्वतः “दिधिषोः गर्भस्य निधातुः "तव अस्य “पत्युः संबन्धादागतम् “इदं "जनित्वं जायात्वमभिलक्ष्य “सं “बभूथ संभूतासि अनुमरणनिश्चयमकार्षीः तस्मादागच्छ ॥

क्षत्रियस्य ‘धनुर्हस्तात्' इत्यनया धनुः प्रहरेत् । सूत्रितं च---‘धनुर्हस्तादाददानो मृतस्येति धनुः' (आश्व. गृ. ४.२.२०) इति ।

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धनुर्हस्तादाददानो मृतस्यास्मे क्षत्राय वर्चसे बलाय 
अत्रैव त्वमिह वयं सुवीरा विश्वा स्पृधो अभिमातीर्जयेम ॥९॥

धनुः । हस्तात् । आऽददानः । मृतस्य । अस्मे इति । क्षत्राय । वर्चसे । बलाय ।

अत्र । एव । त्वम् । इह । वयम् । सुऽवीराः । विश्वाः । स्पृधः । अभिऽमातीः । जयेम ॥९

“मृतस्य क्षत्रियस्य “हस्तात् "धनुः “आददानः । किमर्थम् । "अस्मे अस्माकं "क्षत्राय प्रजापालनसमर्थाय बलाय “वर्चसे तेजसे “बलाय सेनालक्षणाय च धनुराददानोऽहं ब्रवीमीति शेषः। किमिति । “त्वम् "अत्रैव अस्मिन् स्थान एव भव “वयं च “इह अस्मिँल्लोके "सुवीराः सुपुत्रयुक्ता भवन्तः "विश्वाः सर्वान् अभिमातीः अभिमन्यमानान् "स्पृधः संघर्षयितॄन् बाधकान् शत्रून् “जयेम सहेमहि ॥

दीक्षितमरणे उप सर्प मातरम्' इत्याद्याश्चतस्रः शंसनीयाः । सूत्रितं च- उप सर्प मातरं भूमिमेतामिति चतस्रः सोम एकेभ्यः' ( आश्व. श्रौ. ६. १०) इति । 'उप सर्प' इत्यनया संचितान्यस्थीनि गते निदध्युः (आश्व. गृ. ४, ५, ५)॥

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उप सर्प मातरं भूमिमेतामुरुव्यचसं पृथिवीं सुशेवाम् ।
ऊर्णम्रदा युवतिर्दक्षिणावत एषा त्वा पातु निरृतेरुपस्थात् ॥१०॥

उप । सर्प । मातरम् । भूमिम् । एताम् । उरुऽव्यचसम् । पृथिवीम् । सुऽशेवाम् ।

ऊर्णऽम्रदाः । युवतिः । दक्षिणाऽवते । एषा । त्वा । पातु । निःऽऋतेः । उपऽस्थात् ॥१०

“मातरं मातृभूतां "भूमिम् अस्माभिर्भूमौ निधीयमानस्त्वम् "उप "सर्प उपगच्छ । अनुप्रविशेत्यर्थः । कीदृशीम् । "उरुव्यचसं बहुव्याप्तिकां “पृथिवीं विस्तीर्णां "सुशेवां सुसुखाम्। सर्वेषां सुखदात्रीमित्यर्थः। तामुपगच्छ । "युवतिः यौवनान्विता स्त्रीरूपेयं भूमिः "दक्षिणावते ऋत्विग्भ्यो देयत्वेन धनवते यजमानाय “ऊर्णम्रदाः । ऊर्णेव ऊर्जास्तुक इव मृद्वी भवति । सुकुमारा भवति । न बाधयित्रीत्यर्थः । स "एषा पृथिवी “निर्ऋतेः मृत्युदेवतायाः "उपस्थात् समीपस्थानात् “त्वा त्वामस्थिरूपं यजमानं "पातु रक्षतु ॥ ॥ २७ 

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उच्छ्वञ्चस्व पृथिवि मा नि बाधथाः सूपायनास्मै भव सूपवञ्चना ।
माता पुत्रं यथा सिचाभ्येनं भूम ऊर्णुहि ॥११॥


उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सु तिष्ठतु सहस्रं मित उप हि श्रयन्ताम् ।
ते गृहासो घृतश्चुतो भवन्तु विश्वाहास्मै शरणाः सन्त्वत्र ॥१२॥


उत्ते स्तभ्नामि पृथिवीं त्वत्परीमं लोगं निदधन्मो अहं रिषम् ।
एतां स्थूणां पितरो धारयन्तु तेऽत्रा यमः सादना ते मिनोतु ॥१३॥


प्रतीचीने मामहनीष्वाः पर्णमिवा दधुः ।
प्रतीचीं जग्रभा वाचमश्वं रशनया यथा ॥१४॥

सायणभाष्यम्


देवारादिकः प्रेतपत्नीम् ‘उदीर्ष्व नारि ' इत्यनया भर्तृसकाशादुत्थापयेत् । सूत्रितं च--- ‘तामुत्थापयेद्देवरः पतिस्थानीयोऽन्तेवासी जरद्दासो वोदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकम्' (आश्व. गृ. ४. २.१८) इति ॥

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धनुः । हस्तात् । आऽददानः । मृतस्य । अस्मे इति । क्षत्राय । वर्चसे । बलाय ।अत्र । एव । त्वम् । इह । वयम् । सुऽवीराः । विश्वाः । स्पृधः । अभिऽमातीः । जयेम ॥९।

“मृतस्य क्षत्रियस्य “हस्तात् "धनुः “आददानः । किमर्थम् । "अस्मे अस्माकं "क्षत्राय प्रजापालनसमर्थाय बलाय “वर्चसे तेजसे “बलाय सेनालक्षणाय च धनुराददानोऽहं ब्रवीमीति शेषः। किमिति । “त्वम् "अत्रैव अस्मिन् स्थान एव भव “वयं च “इह अस्मिँल्लोके "सुवीराः सुपुत्रयुक्ता भवन्तः "विश्वाः सर्वान् अभिमातीः अभिमन्यमानान् "स्पृधः संघर्षयितॄन् बाधकान् शत्रून् “जयेम सहेमहि ॥

दीक्षितमरणे उप सर्प मातरम्' इत्याद्याश्चतस्रः शंसनीयाः । सूत्रितं च- उप सर्प मातरं भूमिमेतामिति चतस्रः सोम एकेभ्यः' ( आश्व. श्रौ. ६. १०) इति । 'उप सर्प' इत्यनया संचितान्यस्थीनि गते निदध्युः (आश्व. गृ. ४, ५, ५)॥


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उप । सर्प । मातरम् । भूमिम् । एताम् । उरुऽव्यचसम् । पृथिवीम् । सुऽशेवाम् ।ऊर्णऽम्रदाः । युवतिः । दक्षिणाऽवते । एषा । त्वा । पातु । निःऽऋतेः । उपऽस्थात् ॥१० ।

“मातरं मातृभूतां "भूमिम् अस्माभिर्भूमौ निधीयमानस्त्वम् "उप "सर्प उपगच्छ । अनुप्रविशेत्यर्थः । कीदृशीम् । "उरुव्यचसं बहुव्याप्तिकां “पृथिवीं विस्तीर्णां "सुशेवां सुसुखाम्। सर्वेषां सुखदात्रीमित्यर्थः। तामुपगच्छ । "युवतिः यौवनान्विता स्त्रीरूपेयं भूमिः "दक्षिणावते ऋत्विग्भ्यो देयत्वेन धनवते यजमानाय “ऊर्णम्रदाः । ऊर्णेव ऊर्जास्तुक इव मृद्वी भवति । सुकुमारा भवति । न बाधयित्रीत्यर्थः । स "एषा पृथिवी “निर्ऋतेः मृत्युदेवतायाः "उपस्थात् समीपस्थानात् “त्वा त्वामस्थिरूपं यजमानं "पातु रक्षतु ॥ २७ 

‘उच्छ्वञ्चस्व' इत्येतया पांसूनवकिरेत् । सूत्र्यते हि- उत्तरया पासूनवकिरेत्' ( आश्व. गृ. ४. ५. ६) इति ॥


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उच्छ्वं॑चस्व पृथिवि॒ मा नि बा॑धथाः सूपाय॒नास्मै॑ उत् । श्वञ्चस्व । पृथिवि । मा । नि । बाधथाः । सुऽउपायना । अस्मै । भव । सुऽउपवञ्चना ।माता । पुत्रम् । यथा । सिचा । अभि । एनम् । भूमे । ऊर्णुहि ॥११

हे पृथिवि “उच्छ्वञ्चस्व । ऊर्ध्वंगतोच्छ्वासमेनं कुरु । अधस्तान्मा कृथा इत्यर्थः । किंच “मा “नि “बाधथाः मा संपीडय । तथा “अस्मै यजमानार्थं सूपायना शोभनोपगमना सूपचारिका भवेत्यर्थः । “सूपवञ्चना। उपवञ्चनं प्रलम्भनम् । शोभनप्रलम्भा सुप्रतिष्ठा “भव । अपि च "माता “पुत्रम् आत्मीयं बालकं “सिचा वस्त्रान्तेन "यथा आच्छादयति तद्वद्धे भूमि “एनम् अस्थिरूपं यजमानं त्वम् “अभि “ऊर्णुहि आभिमुख्येनाच्छादय ॥


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उत्ऽश्वञ्चमाना । पृथिवी । सु । तिष्ठतु । सहस्रम् । मितः । उप । हि । श्रयन्ताम् ।ते । गृहासः । घृतऽश्चुतः । भवन्तु । विश्वाहा । अस्मै । शरणाः । सन्तु । अत्र ॥१२

पांसुभिः प्रच्छाद्यैनां पठन्ति । "उच्छ्वञ्चमाना अस्थिकुम्भमवष्टभ्योर्ध्वं गच्छन्ती “पृथिवी "सु “तिष्ठतु प्रतिष्ठिता भवतु । किंच “सहस्रं सहस्रसंख्याकाः “मितः प्रक्षिप्ताः ॥ मिनोतेरौणादिके कर्मणि क्विपि तुगागमः । ततो जस् । यद्वा । सहस्रम् । तृतीयार्थे प्रथमा । मित इति निष्ठान्तं रूपम् । व्यत्ययेन बहुवचनस्यैकवचनम् । स्वरो वृषादित्वाद्द्रष्टव्यः ॥ सहस्रेण संमिता बहुसंख्याकाः । पार्थिवाः पांसवः “उप “श्रयन्ताम् । एनमुपसेवन्ताम् । संपरिवार्यं तिष्ठन्त्वित्यर्थः । हिरवधारणे । तथा “ते पांसवोऽस्मै “गृहासः गृहा भवन्तः “घृतश्चुतः घृतस्योदकस्य सर्पिषो वा क्षारयितारः “भवन्तु । “अत्र अस्मिँल्लोके “विश्वाहा सर्वेष्वहःसु सर्वदा “अस्मै अस्य “शरणाः “सन्तु आश्रयभूता भवन्तु ॥

‘उत्तै स्तभ्नामि' इति कपालेनास्थीन्यपिदध्यात्। सूत्रितं च- उत्ते स्तभ्नामीति कपालेनापिधाय' (आश्व. गृ. ४. ५. ८) इति ॥


उत् । ते । स्तभ्नामि । पृथिवीम् । त्वत् । परि । इमम् । लोगम् । निऽदधत् । मो इति । अहम् । रिषम् ।एताम् । स्थूणाम् । पितरः । धारयन्तु । ते । अत्र । यमः । सदना । ते । मिनोतु ॥१३

हे अस्थिकुम्भ “त्वत्परि । परिशब्दयोगे पञ्चमी । तवोपरि “ते त्वदीयेन कपालेन “पृथिवीम् “उत् “स्तभ्नामि प्रतिबध्नामि । यथा पृथिवी तवोपरि मा गच्छति तथापिदधामीत्यर्थः। “इमं “लोग कपाललक्षणं लोष्टं “निदधत् उपरि स्थापयन् “अहं “मो “रिषं मा हिंसिषम्। किंच “एतां मया निहितां “स्थूणां “ते त्वदीयां पृथिव्या धारयित्रीं कपाललक्षणां “पितरः “धारयन्तु निश्चलां कुर्वन्तु । ततः "ते त्वदीये अस्मिन् स्थाने “यमः पितृपतिः सदनानि स्थानानि “मिनोतु परिच्छिनत्तु । करोत्वित्यर्थः ।।


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प्रतीचीने । माम् । अहनि । इष्वाः । पर्णम्ऽइव । आ । दधुः ।प्रतीचीम् । जग्रभ । वाचम् । अश्वम् । रशनया । यथा ॥१४।

सायण-भाष्य-

अनया प्रजापतिः प्रार्थ्यते । हे प्रजापते प्रतीचीने प्रतिपूज्ये अहनि तदुपलक्षिते संवत्सरात्मके मां संकुसुकमृषिं आ दधुः निहितवंतः सर्वे देवाः । किमिव । इष्वाः बाणस्य पर्णमिव पक्षमिव । पक्षं यथा बाणस्य मूले स्थापयंति तद्वज्जगन्मूले त्वयि मां स्थापितवंतः । अतो मदीयां प्रतीचीं प्रतिपूज्यां वाचं स्तुतिरूपां जग्रभ गृहाण । कथमित्युच्यते । अश्वं आशुगामिनं हयं रशनया रज्ज्वा यथा गृह्णंति तद्वत्कर्णाभ्यां मत्कृतां स्तुतिं गृहाणेत्यर्थः ।

याज्ञवल्क्यस्मृतिः/आचाराध्यायः(विवाहप्रकरणम्

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विवाहप्रकरणम्

 (याज्ञवल्क्य स्मृति में नियोग)

गुरवे तु वरं दत्त्वा स्नायाद्वा तदनुज्ञया ।
वेदं व्रतानि वा पारं नीत्वा ह्युभयं एव वा। १.५१ ।

अविप्लुतब्रह्मचर्यो लक्षण्यां स्त्रियं उद्वहेत् ।
अनन्यपूर्विकां कान्तां असपिण्डां यवीयसीम्। १.५२ ।

अरोगिणीं भ्रातृमतीं असमानार्षगोत्रजान् ।
पञ्चमात्सप्तमादूर्ध्वं मातृतः पितृतस्तथा।१.५३ ।

दशपूरुषविख्याताच्छ्रोत्रियाणां महाकुलात् ।
स्फीतादपि न संचारि रोगदोषसमन्वितात् । १.५४ । ।

एतैरेव गुणैर्युक्तः सवर्णः श्रोत्रियो वरः ।
यत्नात्परीक्षितः पुंस्त्वे युवा धीमान्जनप्रियः । १.५५  ।

यदुच्यते द्विजातीनां शूद्राद्दारोपसंग्रहः ।
नैतन्मम मतं यस्मात्तत्रायं जायते स्वयम्।१.५६ । 

तिस्रो वर्णानुपूर्व्येण द्वे तथैका यथाक्रमम् ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां भार्या स्वा शूद्रजन्मनः । १.५७ । ।

ब्राह्मो विवाह आहूय दीयते शक्त्यलंकृता ।
तज्जः पुनात्युभयतः पुरुषानेकविंशतिम् । । १.५८ । ।

यज्ञस्थ ऋत्विजे दैव आदायार्षस्तु गोद्वयम् ।
चतुर्दश प्रथमजः पुनात्युत्तरजश्च षट् ।१.५९ । ।

इत्युक्त्वा चरतां धर्मं सह या दीयतेऽर्थिने ।
स कायः पावयेत्तज्जः षट्षड्वंश्यान्सहात्मना  । १.६० । ।

आसुरो द्रविणादानाद्गान्धर्वः समयान्मिथः ।
राक्षसो युद्धहरणात्पैशाचः कन्यकाछलात् । १.६१ । ।

पाणिर्ग्राह्यः सवर्णासु गृह्णीयात्क्षत्रिया शरम् ।
वैश्या प्रतोदं आदद्याद्वेदने त्वग्रजन्मनः१.६२ । ।

पिता पितामहो भ्राता सकुल्यो जननी तथा ।
कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थः परः परः।१.६३।

अप्रयच्छन्समाप्नोति भ्रूणहत्यां ऋतावृतौ ।
गम्यं त्वभावे दातॄणां कन्या कुर्यात्स्वयंवरम् । । १.६४ । ।

सकृत्प्रदीयते कन्या हरंस्तां चोरदण्डभाक् ।
दत्तां अपि हरेत्पूर्वाच्छ्रेयांश्चेद्वर आव्रजेत् । । १.६५ । ।

अनाख्याय ददद्दोषं दण्ड्य उत्तमसाहसम् ।
अदुष्टां तु त्यजन्दण्ड्यो दूषयंस्तु मृषा शतम् । । १.६६ । ।

अक्षता च क्षता चैव पुनर्भूः संस्कृता पुनः ।
स्वैरिणी या पतिं हित्वा सवर्णं कामतः श्रयेत् । । १.६७ । ।

अपुत्रां गुर्वनुज्ञातो देवरः पुत्रकाम्यया ।
सपिण्डो वा सगोत्रो वा घृताभ्यक्त ऋतावियात् । । १.६८ । ।

आगर्भसंभवाद्गच्छेत्पतितस्त्वन्यथा भवेत् ।
अनेन विधिना जातः क्षेत्रजोऽस्य भवेत्सुतः । । १.६९ । ।

हृताधिकारां मलिनां पिण्डमात्रोपजीविनाम् ।
परिभूतां अधःशय्यां वासयेद्व्यभिचारिणीम् । । १.७० । ।

सोमः शौचं ददावासां गन्धर्वश्च शुभां गिरम् ।
पावकः सर्वमेध्यत्वं मेध्या वै योषितो ह्यतः । । १.७१ । ।

व्यभिचारादृतौ शुद्धिर्गर्भे त्यागो विधीयते ।
गर्भभर्तृवधादौ च तथा महति पातके । १.७२ । ।

सुरापी व्याधिता धूर्ता वन्ध्यार्थघ्न्यप्रियंवदा ।
स्त्रीप्रसूश्चाधिवेत्तव्या पुरुषद्वेषिणी तथा। १.७३ 

अधिविन्ना तु भर्तव्या महदेनोऽन्यथा भवेत् ।
यत्रानुकूल्यं दंपत्योस्त्रिवर्गस्तत्र वर्धते ।१.७४ । ।

मृते जीवति वा पत्यौ या नान्यं उपगच्छति ।
सेह कीर्तिं अवाप्नोति मोदते चोमया सह । । १.७५ । ।

आज्ञासंपादिनीं दक्षां वीरसूं प्रियवादिनीम् ।
त्यजन्दाप्यस्तृतीयांशं अद्रव्यो भरणं स्त्रियाः । । १.७६ । ।

स्त्रीभिर्भर्तृवचः कार्यं एष धर्मः परः स्त्रियाः ।
आशुद्धेः संप्रतीक्ष्यो हि महापातकदूषितः । । १.७७ । ।

लोकानन्त्यं दिवः प्राप्तिः पुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः ।
यस्मात्तस्मात्स्त्रियः सेव्याः कर्तव्याश्च सुरक्षिताः । । १.७८ । ।

षोडशर्तुनिशाः स्त्रीणां तस्मिन्युग्मासु संविशेत् ।
ब्रह्मचार्येव पर्वाण्याद्याश्चतस्रस्तु वर्जयेत् । । १.७९ । ।

एवं गच्छन्स्त्रियं क्षामां मघां मूलं च वर्जयेत् ।
सुस्थ इन्दौ सकृत्पुत्रं लक्षण्यं जनयेत्पुमान् । । १.८० । ।

यथाकामी भवेद्वापि स्त्रीणां वरं अनुस्मरन् ।
स्वदारनिरतश्चैव स्त्रियो रक्ष्या यतः स्मृताः । । १.८१ । ।

भर्तृभ्रातृपितृज्ञाति श्वश्रूश्वशुरदेवरैः ।
बन्धुभिश्च स्त्रियः पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः । । १.८२ । ।

संयतोपस्करा दक्षा हृष्टा व्ययपराङ्मुखी ।
कुर्याच्छ्वशुरयोः पाद वन्दनं भर्तृतत्परा । १.८३ 

क्रीडां शरीरसंस्कारं समाजोत्सवदर्शनम् ।
हास्यं परगृहे यानं त्यजेत्प्रोषितभर्तृका ।१.८४ । ।

रक्षेत्कन्यां पिता विन्नां पतिः पुत्रास्तु वार्धके ।
अभावे ज्ञातयस्तेषां न स्वातन्त्र्यं क्वचित्स्त्रियाः । । १.८५ । ।

पितृमातृसुतभ्रातृ श्वश्रूश्वशुरमातुलैः ।
हीना न स्याद्विना भर्त्रा गर्हणीयान्यथा भवेत्  १.८६ ।

पतिप्रियहिते युक्ता स्वाचारा विजितेन्द्रिया ।
सेह कीर्तिं अवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमां गतिम् । । १.८७ । ।

सत्यां अन्यां सवर्णायां धर्मकार्यं न कारयेत् ।
सवर्णासु विधौ धर्म्ये ज्येष्ठया न विनेतरा। १.८८ 

दाहयित्वाग्निहोत्रेण स्त्रियं वृत्तवतीं पतिः ।
आहरेद्विधिवद्दारानग्नींश्चैवाविलम्बयन् ।१.८९ ।

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प्रस्तुति करण - यादव योगेश कुमार 'रोहि'
ग्राम-आज़ादपुर पत्रालय पहाड़ीपुर जनपद अलीगढ़---उ०प्र०

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