बुधवार, 6 जून 2018

ग्रीक-यूनानी पुराणों में इन्द्र का वर्णन

andreus आन्द्रेस्  (/ ændriəs /; प्राचीन ग्रीक: Ἀνδρεύς)
थिस्सलिया में नदी-देवता पेनेस का पुत्र के रूप में इन्द्र की मान्यता थी ।
जिस से बोईओटिया में ऑर्कोमेनोस के बारे में जिला आंद्रेइस कहलाता था।
एक अन्य मार्ग में पौसानीस एण्ड्रयूस् की बात करते हैं (हालांकि, यह अनिश्चित है कि क्या वह पूर्व के समान व्यक्ति का मतलब है) जिस व्यक्ति ने पहले एंड्रोस द्वीप का उपनिवेश किया था। वही एण्ड्रयूस् डायोडोरस सिकुलस के अनुसार, आंद्रेस राधामंथिस के जनरलों सामान्य सामन्तों  में से एक था, 
जिसके बाद उन्हें द्वीप प्राप्त हुआ और बाद में एंड्रोस को एक उपस्थिति कहा जाता था।
बीजान्टियम के स्टेफनस,  कॉनन और ओविड  इस पहले उपनिवेशक "एंड्रस" (एनीस के पुत्र) और एंड्रयूस को नहीं कहते हैं।
लियूकॉन की पुत्री एविपेप के साथ, आंद्रेस के उत्तराधिकारी बेटे एटेकल्स थे।

minos माइनॉस, Aiakos 
ऐकॉस ईकास वैदिक रूप (इक्ष्वाकु:)
इकस एक मौसम का देवता है जो आबेरियन (स्पेन ) में पूजा जाता है। वह कास्टाइल के क्षेत्र से जाना जाता है और स्थानीय रोमन देवता (बृहस्पति) ज्यूस पितर सोलुटोरियस के साथ समन्वयित किया गया था ) 
और Rhadamanthys राधामन्तिस ।
यूनानी पौराणिक कथाओं में, राधामन्थस (/ ˌrædəmænθəs /) या Rhadamanthys (प्राचीन ग्रीक: Ῥαδάμανθυς)
क्रीट का एक बुद्धिमान राजा था।
बाद के विवरणों में उन्हें मृतकों के न्यायाधीशों में से एक माना जाता है।
Rhadamanthus शब्द की व्युत्पत्ति-मूलक विश्लेषण
यहाँ शब्द भारोपीय भाषा परिवार का है ।
व्युत्पत्ति-मूलक दृष्टि से इसका विश्लेषण-
Rhadamanthus 'नाम का मतलब हो सकता है' रॉध diviner 'दो ग्रीक शब्द mantis "soothsayer, seer" और rhabdos "रॉध, wand" से व्युत्पन्न।
यह यूनानी एडैमास "अजेय, अदम्य" या यूनानी डैमोजो से "ईमानदारी से, जीतने के लिए, जीतने के लिए" भी व्युत्पन्न रूप से संबंधित हो सकता है।

परिवार ----

राधामंथस ज़ीउस और यूरोपा का पुत्र था!
और सरपिदोन और मिनोस (एक राजा और बाद में मृतकों का जज) का भाई था!
अपने भाइयों के साथ, राधामंथस को उनके सौतेले पिता एस्टरियन (अत्रि )द्वारा उठाया गया था। उनके दो बेटे थे, गोर्टी (गॉर्टिन, क्रेते से जुड़े) और एरिथ्रस (एरिथ्रे के संस्थापक) थे।

भारतीय संस्कृति में इन्द्र का महत्व ---
ऋग्वेद के लगभग एक-चौथाई सूक्त इन्द्र से सम्बन्धित हैं। 250 सूक्तों के अतिरिक्त 50 से अधिक मन्त्रों में उसका स्तवन प्राप्त होता है
वह ऋग्वेद का सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण देवता है। उसे आर्यों का राष्ट्रीय देवता भी कह सकते हैं।मुख्य रूप से वह वर्षा का देवता है जो कि अनावृष्टि अथवा अन्धकार रूपी दैत्य से युद्ध करता है।
तथा अवरुद्ध जल को अथवा प्रकाश को विनिर्मुक्त बना देता है।
वह गौण रूप से आर्यों का युद्ध-देवता भी है, जो आदिवासियों के साथ युद्ध में उन आर्यों की सहायता करता है।
इन्द्र का मानवाकृतिरूपेण चित्रण दर्शनीय है। उसके विशाल शरीर, शीर्ष भुजाओं और बड़े उदर का बहुधा उल्लेख प्राप्त होता है। उसके अधरों और जबड़ों का भी वर्णन मिलता है।
उसका वर्ण हरित् है। उसके केश और दाढ़ी भी हरित्वर्णा है। वह स्वेच्छा से विविध रूप धारण कर सकता है। ऋग्वेद इन्द्र के जन्म पर भी प्रकाश डालता है। पूरे दो सूक्त इन्द्र के जन्म से ही सम्बन्धित हैं।[ ‘निष्टिग्री’ अथवा ‘शवसी’ नामक गाय को उसकी माँ बतलाया गया है।  उसके पिता ‘द्यौः’ (ज्यूस Zeus) या ‘त्वष्टा’ हैं।  एक स्थल पर उसे ‘सोम’ से उत्पन्न कहा गया है।
उसके जन्म के समय द्यावा-पृथ्वी काँप उठी थी।
इन्द्र के जन्म को विद्युत् के मेघ-विच्युत होने का प्रतीक माना जा सकता है।

इन्द्र के सगे-सम्बन्धियों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। अग्नि और पूषन् यूनानीयों की पुरातन कथाओं में पॉसीडन (Poisson) pousidon रूप है ।
उसके भाई हैं। इसी प्रकार इन्द्राणी उसकी पत्नी है। संभवतः 'इन्द्राणी' नाम परम्परित रूप से पुरुष (पति) के नाम का स्त्रीवाची बनाने से ही है। मूल नाम कुछ और ('शची') हो सकता है।
मरुद्गण उसके मित्र तथा सहायक हैं। उसे वरुण, वायु, सोम, बृहस्पति, पूषन् और विष्णु के साथ युग्मरूप में भी कल्पित किया गया है तीन चार सूक्तों में वह सूर्य का प्रतिरूप है।

इन्द्र एक वृहदाकार देवता है। उसका शरीर पृथ्वी के विस्तार से कम से कम दस गुना है। वह सर्वाधिक शक्तिमान् है। इसीलिए वह सम्पूर्ण जगत् का एक मात्र शासक और नियन्ता है।
उसके विविध विरुद शचीपति (=शक्ति का स्वामी), शतक्रतु (=सौ शक्तियों वाला) और शक्र (=शक्तिशाली), आदि उसकी विपुला शक्ति के ही प्रकाशक हैं।

सोमरस इन्द्र का परम प्रिय पेय है। वह विकट रूप से सोमरस का पान करता है। उससे उसे स्फूर्ति मिलती है। वृत्र के साथ युद्धके अवसर पर पूरे तीन सरोवरों को उसने पीकर सोम-रहित कर दिया था।
दशम मण्डल के 119वें सूक्त में सोम पीकर मदविह्वल बने हुए स्वगत भाषण के रूप में अपने वीर-कर्मों और शक्ति का अहम्मन्यतापूर्वक वर्णन करते हुए इन्द्र को देखा जा सकता है। सोम के प्रति विशेष आग्रह के कारण ही उसे सोम का अभिषव करने वाले अथवा उसे पकाने वाले यजमान का रक्षक बतलाया गया है।

इन्द्र का प्रसिद्ध आयुध ‘वज्र’ है, जिसे कि विद्युत्-प्रहार से अभिन्न माना जा सकता है। इन्द्र के वज्र का निर्माण ‘त्वष्टा’ नामक देवता-विशेष द्वारा किया गया था। इन्द्र को कभी-कभी धनुष-बाण और अंकुश से युक्त भी बतलाया गया है। उसका रथ स्वर्णाभ है। दो हरित् वर्ण अश्वों द्वारा वाहित उस रथ का निर्माण देव-शिल्पी ऋभुओं द्वारा किया गया था।

इन्द्रकृत वृत्र-वध ऋग्वेद में बहुधा और बहुशः वर्णित और उल्लिखित है। सोम की मादकता से उत्प्रेरित हो, प्रायः मरुद्गणों के साथ, वह ‘वृत्र’ अथवा ‘अहि’ नामक दैत्यों (=प्रायः अनावृष्टि और अकाल के प्रतीक) पर आक्रमण करके अपने वज्र से उनका वध कर डालता है और पर्वत को भेद कर बन्दीकृत गायों के समान अवरुद्ध जलों को विनिर्मुक्त कर देता है। उक्त दैत्यों का आवास-स्थल ‘पर्वत’ मेघों के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जिनका भेदन वह जल-विमोचन हेतु करता है। इसी प्रकार गायों को अवरुद्ध कर रखने वाली प्रस्तर-शिलाएँ भी जल-निरोधक मेघ ही हैं।[18] मेघ ही वे प्रासाद भी हैं जिनमें पूर्वोक्त दैत्य निवास करते हैं। इन प्रासादों की संख्या कहीं 90, कहीं 99 तो कहीं 100 बतलाई गई है, जिनका विध्वंस करके इन्द्र ‘पुरभिद्’ विरुद धारण करता है। वृत्र या अहि के वधपूर्वक जल-विमोचन के साथ-साथ प्रकाश के अनवरुद्ध बना दिये जाने की बात भी बहुधा वर्णित है।
उस वृत्र या अहि को मार कर इन्द्र सूर्य को सबके लिये दृष्टिगोचर बना देता है। यहाँ पर उक्त वृत्र या अहि से अभिप्राय या तो सूर्य प्रकाश के अवरोधक मेघ से है, या फिर निशाकालिक अन्धकार से। सूर्य और उषस् के साथ जिन गायों का उल्लेख मिलता है, वे प्रातः कालिक सूर्य की किरणों का ही प्रतिरूप हैं, जो कि अपने कृष्णाभ आवास-स्थल से बाहर निकलती हैं। इस प्रकार इन्द्र का गोपपतित्व भी सुप्रकट हो जाता है। वृत्र
आयरिश संस्कृति में ए-बरटा रूप है ।
और वैदिक सन्दर्भों में अहि के वध के अतिरिक्त अन्य अनेक उपाख्यान भी इन्द्र के सम्बन्ध में उपलब्ध होते हैं।

नृमणस्य मह्ना स जनास इन्द्रः’ कह कर स्वयं गृत्समद ऋषि ने उसके बलविक्रम का उद्घोष कर दिया है।

अन्य संस्कृतियों में भी इन्द्र का वर्णन है --
बोगाजकोई एशिया माइनर (तुर्की संस्कृति) के प्राचीनत्तम शिलालेख के अनुसार मितन्नी (वैदिक रूप  मितज्ञु )जाति के देवताओं में वरुण, मित्र एवं नासत्यों (अश्विन्) के साथ इन्द्र का भी उल्लेख मिलता है! (1400 ई.पू.)।
ईरानी धर्म में इन्द्र का स्थान है, परन्तु अच्छे रूप में नहीं, अपितु दुष्ट रूप में।
वेरेथ्रघ्न वहाँ विजय का देवता है, जो वस्तुतः 'वृत्रघ्न' (वृत्र को मारने वाला) का ही रूपान्तर है। इसी कारण डाॅ.कीथ इन्द्र को भारत-पारसीक एकता के युग से सम्बद्ध मानते हैं।
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  प्रस्तुति करण-यादव योगेश कुमार 'रोहि'

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