शनिवार, 9 जून 2018

नियोग वेदों में ---

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के ‘शंका-समाधान परिशिष्ट में पण्डित ज्वालाप्रसाद शर्मा द्वारा नियोग प्रथा के समर्थन में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं।

"नियोग की पृथा "

एक शर्मा जी ने लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में कुलनाश के भय से ऋषि-मुनि, विद्वान, महापुरुषों से नियोग द्वारा वीर्य ग्रहण कर उच्च कुल की स्त्रियां संतान उत्पन्न करती थी। 

जो प्रमाण पंडित जी ने प्रस्तुत किए हैं वे सभी महाभारत काल के हैं। 
क्या महाभारत काल ही प्राचीन वैदिक काल था?

क्या नियोग ही ऋषियों का एक मात्र प्रयोजन था? 
यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती नियोग को एक वेद प्रतिपादित और स्थापित व्यवस्था मानते थे तो उन्होंने इस परंपरा का खुद पालन करके अपने अनुयायियों के लिए आदर्श प्रस्तुत क्यों नहीं किया ?
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इससे स्वामी जी के चरित्र को भी बल मिलता और एक मृत प्रायः हो चुकी वैदिक परम्परा पुनः जीवित हो जाती।

यह भी एक अजीब विडंबना है कि जिस वैदिक मंत्र से स्वामी जी ने नियोग परंपरा को प्रतिपादित किया है उसी ऋचा से अन्य वेद विद्वानों और भाष्यकारों ने विधवा पुनर्विवाह का प्रतिपादन किया है।

 निम्न ऋचा देखिए –
 ‘‘कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः। 
को वां शयुत्रा विधवेव देवरं मंर्य न योषा कृणुते सधस्य आ।। (ऋग्वेद, 10-40-2) 
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‘‘उदीष्र्व नार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि। हस्तग्राभस्य दिधिशोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।’’ (ऋग्वेद, 10-18-8) 
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उक्त दोनों ऋचाओं से जहाँ स्वामी दयानंद सरस्वती ने नियोग प्रथा का भावार्थ निकाला है वहीं ओमप्रकाश पाण्डेय ने इन्हीं मंत्रों का उल्लेख विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में किया है।
 
अपनी पुस्तक ‘‘वैदिक साहित्य और संस्कृति का स्वरूप’’ में उन्होंने लिखा है कि वेदकालीन समाज में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त थी। 
उक्त मंत्र (10-18-8) का भावार्थ उन्होंने निम्न प्रकार किया है – ‘‘हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’’ 
इसी ऋचा का भावार्थ वैद्यनाथ ‘शास्त्री द्वारा निम्न प्रकार किया गया है – ‘‘जब कोई स्त्री जो संतान आदि करने में समर्थ है, विधवा हो जाती है तब वह नियुक्त पति के साथ संतान उत्पत्ति के लिए नियोग कर सकती है।’’

उक्त मंत्रों में स्वामी दयानंद ने देवर ‘शब्द का अर्थ जहाँ ‘द्वितीय नियुक्त पति’ लिया है वहीं पाण्डेय जी ने देवर ‘शब्द का अर्थ ‘द्वितीय विवाहित पति’ लिया है।
 निरुक्त के संदर्भ में पाण्डेय जी ने लिखा है कि यास्क ने अपने निरूक्त में देवर ‘शब्द का निर्वचन ‘द्वितीय वर’ के रूप में ही किया है। उक्त मंत्रों के साथ पाण्डेय जी ने अथर्ववेद का भी एक मंत्र विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में प्रस्तुत किया है।
 जो निम्न है –
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‘‘या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते परम्। 
पत्र्चैदनं च तावजं ददातो न वि योषतः। समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः। 
योऽजं पत्र्चैदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति।’’ (अथर्वसंहिता 9-5-27,28) 

उक्त से स्पष्ट है कि वेद भाष्यों में इतना अधिक अर्थ भेद और मतभेद पाया जाता है कि सत्य और विश्वसनीय धारणाओं का निर्णय करना अत्यंत दुरूह कार्य  है ?

 यहाँ यह भी विचारणीय है कि विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना ही नहीं होता बल्कि स्वच्छंद यौन संबंध को रोकना और भावों को संयमित करना भी है।

 यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो विषय (नारी और सेक्स) एक बाल ब्रह्मचारी के लिए कतई निषिद्ध था, स्वामी जी ने उसे भी अपनी चर्चा और लेखनी का विषय बनाया है।

 बेहद अफसोस और दुःख का विषय है कि जहाँ एक विद्वान और समाज सुधारक को पुनर्विवाह और विधवा विवाह का समर्थन करना चाहिए था,
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 वहाँ कथित समाज सुधारक द्वारा नियोग प्रथा की वकालत की गई है ।

और इसे वर्तमान काल के लिए भी उपयुक्त बताया है। 
क्या यह एक विद्वान की घटिया मनोवृत्ति का प्रतीक नहीं है ? 
आज की फिल्में जो कतई निम्न स्तर का प्रदर्शन करती हैं, उनमें भी कहीं इस प्रथा का प्रदर्शन और समर्थन देखने को नहीं मिलता। 
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स्वामी दयानंद को छोड़कर नवजागरण के सभी विद्वानों और सुधारकों द्वारा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया गया है।

जब किसी जाति या समाज के धार्मिक लोग जघन्य नैतिक बुराइयों और बिगाड़ में गर्क हो जाते हैं, तो वह जाति नैतिक पतन की पराकाष्ठा को पहुंच जाती है। 

नैतिक बुराइयों में निमग्न होने के बावजूद कथित धार्मिक लोग अपने बचाव और समाज में अपना स्तर और आदर-सम्मान बनाए रखने के लिए और साथ-साथ अपने को सही और सदाचारी साबित करने के लिए उपाय तलाशते हैं।
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अपने बचाव के लिए कथित मक्कार लोग अपनी धार्मिक पुस्तकों से छेड़छाड़ करते हैं और उनमें फेरबदल कर उस नैतिक बुराई को जो उनमें है, अपने देवताओं, अवतारों, ऋषियों, मुनियों और आदर्शों से जोड़ कर अपने स्वार्थ पूर्ण सिद्धान्तो का पोषण कर देते हैं और जनसाधारण को यह समझाकर अपने बचाव का रास्ता निकाल लेते हैं कि यह बुराई नहीं है बल्कि धर्मानुकूल है।

ऐसा तो हमारे ऋषि-मुनियों और महापुरुषों ने भी किया है। 
नियोग के विषय में भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है। 

जब जाति में स्वच्छंद यौन संबंधों की अधिकता हो गई और जो बुराई थी, वह सामाजिक रस्म और रिवाज बन गई तो मक्कार लोगों ने उस बुराई को अच्छाई बनाकर अपने धार्मिक ग्रंथों में प्रक्षेपित कर दिया।

प्राचीन काल में धार्मिक ग्रंथों में परिवर्तन करना आसान था, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों पर चन्द लोगों का अधिकार होता था।
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नियोग एक गर्हित और गंदी परंपरा है, इसे किसी भी काल के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति अत्यंत दयनीय प्रतीत होती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि, मुनियों और महापुरुषों द्वारा कुछ ऐसे नियम-कानून बनाए गए, जिन्होंने नारी को भोग की वस्तु और भोजन की स्थाली बना दिया।

 नियोग प्रथा ने विधवा स्त्री को कतई वेश्या ही बना दिया।
कदाचित् इसी कारण से रण्डा( राँड़) विधवा और वैश्या दोनों का समान वाचक हो गया।

 जैसा कि आप ऊपर पढ़ चुके हैं कि एक विधवा 10 पुरुषों से नियोग कर सकती है। यहाँ विधवा और वेश्या ‘शब्दों को एक अर्थ में ले लिया जाए तो ‘शायद अनुचित न होगा। 

विधवाओं की दुर्दशा को चित्रित करने वाली एक फिल्म ‘वाटर’ सन् 2000 में विवादों के कारण प्रतिबंधित कर दी गई थी, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर विधवाओं को वेश्याओं के रूप में दिखाया गया था। 

प्रायः विधवा स्त्रियाँ काशी, वृन्दावन आदि तीर्थस्थानों में आकर मंदिरों में भजन-कीर्तन करके और भीख मांगकर अपनी गुजर बसर करती थी, क्योंकि समाज में उनको अशुभ और अनिष्ट सूचक समझा जाता था। 

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी जी ने भी इस दशा का वर्णन करते हुए लिखा है-

 ‘‘वृंदावन जब था तब था अब तो वेश्यावनवत्, लल्ला-लल्ली और गुरु-चेली आदि की लीला फैल रही है।
 ( समुल्लास-11-159), 
आज भी काशी में लगभग 16000 विधवाएं रहती हैं। ‘मनुस्मृति’ में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं।
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 (अध्याय-3-21) इनमें आर्ष, आसुर और गान्धर्व विवाह को निकृष्ट बताया गया है मगर ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और मर्मज्ञों ने इनका भरपूर फायदा उठा कर वासना तृप्ति की ।

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, मुनि पराशर, कौरवों-पांडवों के पूर्वज शान्तनु, पाण्डु पुत्र अर्जुन और भीम आदि ने उक्त प्रकार के विवाहों की आड़ में नारी के साथ क्या किया ?

इसका वर्णन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। भारतीय ग्रंथों में नारी को किस रूप में दर्शाया गया है आइए अति संक्षेप में इस पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं। 
 ‘‘ढिठाई, अति ढिठाई और कटुवचन कहना, ये स्त्री के रूप हैं।
 जो जानकार हैं वह इन्हें शुद्ध करता है।’’ (ऋग्वेद, 10-85-36) 
गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ।
भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥३६॥

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‘‘सर्वगुण सम्पन्न नारी अधम पुरुष से हीन है।’’ (तैत्तिरीय संहिता, 6-5-8-2)


 
उक्त तथ्यों के आधार पर भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति और दशा का आकलन हम भली-भांति कर सकते हैं।
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भारतीय ग्रंथों में नारी की स्थिति दमन, दासता और भोग की वस्तु से अधिक दिखाई नहीं पड़ती। 
यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या आधुनिक भारतीय नारी चिंतकों की सोच अपने ग्रंथों से हटकर हो सकती है ? 

भारतीय संस्कृति में नारी की दशा का आकलन करने के लिए छांदोग्य उपनिषद् के एक मुख्य प्रसंग पर भी दृष्टि डाल लेते हैं। 
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नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि, बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलमे साहमेतन्न वेद यद् गोत्रत्वमसि, जाबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति। 
(छांदोग्य उपनिषद् 4-4-2) 

अर्थ-. जबला ने उससे कहा: 'पुत्र, मुझे नहीं पता कि तुम्हारा गोत्र क्या है ? जब मैं युवति थी तब मैं बहुत से लोगों की सेवा करने में बहुत व्यस्त थी, और मेरे पास आप थे जैसा कि यह स्थिति थी, मैं आपके वंश के बारे में कुछ नहीं जानता। मेरा नाम जबला है, और तुम्हारा नाम सत्यकाम है।                    जब आपके वंश के बारे में पूछा जाए, तो कहें, "मैं सत्यकाम जाबाला हूँ ।

छान्दोग्योपनिषद्भाष्यम्
चतुर्थोऽध्यायःचतुर्थः खण्डः

 
सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रवीथा इति ॥ २ ॥

"शब्दार्थ-

सा= वह [जबाला]।  एनम् उवाच = ,निश्चय ही  उसको कहा;।  अहम् एतत् वेद , =मैं यह नहीं जानती; तात= , बेटे; । यत गोत्रं त्वम् असि= जो गोत्र आपका  है; । बहव् अहं चरन्ती परिचारिणी । =मैं बहुत से लोगों की परिचर्या करने में भागदौड़ करती थी; । यौवने त्वं अलाभे = जब मैं जवान थी तब मैंने तुमको पाया था;। सा एतत् = , इस कारण से;। अहम् यत् गोत्रं त्वं असि न वेद=जो तुम्हारा गोत्र है मैं नहीं जानती हूँ।। जाबाला तु नाम अहम् अस्मि = लेकिन मेरा नाम जाबाला है; । सत्यकाम नाम त्वं असि आपका नाम सत्यकाम है;। स: सत्यकामं एव. जाबाला ब्रवीथा इति =, (जब आपके वंश के बारे में पूछा गया ) यह कहो कि तुम सत्यकाम जाबाला हो ।
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"आनन्द-टीका"छान्दोग्य-

एवं पृष्टा जबाला सा ह एनं पुत्रमुवाच—नाहमेतत् तव गोत्रं वेद, हे तात यद्गोत्रस्त्वमसि। कस्मान्न वेत्सीत्युक्ता आह—बहु भर्तृगृहे परिचर्याजातमतिथ्यभ्यागतादि चरन्ती अहं परिचारिणी परिचरन्तीति परिचरणशीलैवाहम् , परिचरणचित्ततया गोत्रादिस्मरणे मम मनो नाभूत्  यौवने च तत्काले त्वामलभे लब्धवत्यस्मि।      तदैव ते पितोपरतः ; अतोऽनाथा अहम् , साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि । जबाला तु नामाहमस्मि, सत्यकामो नाम त्वमसि, स त्वं सत्यकाम एवाहं जाबालोऽस्मीत्याचार्याय ब्रवीथाः ; यद्याचार्येण पृष्ट इत्यभिप्रायः ॥
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यह प्रसंग सत्यकाम का है। जिसकी माता का नाम जाबाला था। 
सत्यकाम गौतम ऋषि के यहाँ विद्या सीखना चाहता था। जब वह घर से जाने लगा, तब उसने अपनी माँ से पूछा ‘‘माता मैं किस गोत्र का हूँ ?’’ उसकी माँ ने उससे कहा, ‘‘बेटा मैं नहीं जानती तू किस गोत्र का है। 
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अपनी युवावस्था में, जब मैं अपने पिता के घर आए हुए बहुत से अतिथियों की सेवा में रहती थी, उस समय तू मेरे गर्भ में आया था। 
मैं नहीं जानती तेरा गोत्र क्या है ?

मेरा नाम जाबाला है, तू सत्यकाम है, अपने को सत्यकाम जाबाला बताना।’’ क्या उपरोक्त उद्धरणों से तथ्यात्मक रूप से यह बात साबित नहीं होती कि भारतीय चिंतन में नारी को न केवल निम्न और भोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझा गया है । 
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ऋग्वेदः सूक्तं १०.४०

← ऋग्वेदः - मण्डल १०

काक्षीवती घोषा

       देव. अश्विनौ। छन्द-जगती

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रथं यान्तं कुह को ह वां नरा प्रति द्युमन्तं सुविताय भूषति।
प्रातर्यावाणं विभ्वं विशेविशे वस्तोर्वस्तोर्वहमानं धिया शमि ॥१॥

कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः ।
को वां शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ आ ॥२॥

प्रातर्जरेथे जरणेव कापया वस्तोर्वस्तोर्यजता गच्छथो गृहम् ।
कस्य ध्वस्रा भवथः कस्य वा नरा राजपुत्रेव सवनाव गच्छथः॥३॥

युवां मृगेव वारणा मृगण्यवो दोषा वस्तोर्हविषा नि ह्वयामहे ।
युवं होत्रामृतुथा जुह्वते नरेषं जनाय वहथः शुभस्पती ॥४॥

युवां ह घोषा पर्यश्विना यती राज्ञ ऊचे दुहिता पृच्छे वां नरा ।
भूतं मे अह्न उत भूतमक्तवेऽश्वावते रथिने शक्तमर्वते ॥५॥

युवं कवी ष्ठः पर्यश्विना रथं विशो न कुत्सो जरितुर्नशायथः।
युवोर्ह मक्षा पर्यश्विना मध्वासा भरत निष्कृतं न योषणा ॥६॥

युवं ह भुज्युं युवमश्विना वशं युवं शिञ्जारमुशनामुपारथुः ।
युवो ररावा परि सख्यमासते युवोरहमवसा सुम्नमा चके ॥७॥

युवं ह कृशं युवमश्विना शयुं युवं विधन्तं विधवामुरुष्यथः ।
युवं सनिभ्य स्तनयन्तमश्विनाप व्रजमूर्णुथः सप्तास्यम् ॥८॥

जनिष्ट योषा पतयत्कनीनको वि चारुहन्वीरुधो दंसना अनु ।
आस्मै रीयन्ते निवनेव सिन्धवोऽस्मा अह्ने भवति तत्पतित्वनम् ॥९॥

जीवं रुदन्ति वि मयन्ते अध्वरे दीर्घामनु प्रसितिं दीधियुर्नरः ।
वामं पितृभ्यो य इदं समेरिरे मयः पतिभ्यो जनयः परिष्वजे ॥१०॥

न तस्य विद्म तदु षु प्र वोचत युवा ह यद्युवत्याः क्षेति योनिषु ।
प्रियोस्रियस्य वृषभस्य रेतिनो गृहं गमेमाश्विना तदुश्मसि ॥११॥

आ वामगन्सुमतिर्वाजिनीवसू न्यश्विना हृत्सु कामा अयंसत ।
अभूतं गोपा मिथुना शुभस्पती प्रिया अर्यम्णो दुर्याँ अशीमहि ॥१२॥

ता मन्दसाना मनुषो दुरोण आ धत्तं रयिं सहवीरं वचस्यवे ।
कृतं तीर्थं सुप्रपाणं शुभस्पती स्थाणुं पथेष्ठामप दुर्मतिं हतम् ॥१३॥

क्व स्विदद्य कतमास्वश्विना विक्षु दस्रा मादयेते शुभस्पती ।
क ईं नि येमे कतमस्य जग्मतुर्विप्रस्य वा यजमानस्य वा गृहम् ॥१४॥

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(सायणभाष्यसहितम्) 

‘रथं यान्तम्' इति चतुर्दशर्चमेकादशं सूक्तं काक्षीवत्या घोषाया आर्षं जागतमाश्विनम् ।       ‘रथं यान्तम् ' इत्यनुक्रान्तम् । प्रातरनुवाकाश्विनशस्त्रयोरुक्तो विनियोगः॥


(पद-पाठ)-

रथम् । यान्तम् । कुह । कः । ह । वाम् । नरा । प्रति । द्युऽमन्तम् । सुविताय । भूषति ।प्रातःऽयावानम् । विऽभ्वम् । विशेऽविशे । वस्तोःऽवस्तोः । वहमानम् । धिया । शमि ॥१।

(सायण-भाष्य)-

हे “नरा कर्मणां नेतारावश्विनौ “वां =युवयोः संबन्धिनं “द्युमन्तं= दीप्तिमन्तं “प्रातर्यावाणं= यज्ञं प्रति प्रातःकाले गन्तारं “विभ्वं विभुं =व्यापिनं “विशेविशे =सर्वेषु मनुष्येषु “वस्तोर्वस्तोः अन्वहं “वहमानं धनं प्रापयन्तं “यान्तं =गच्छन्तं “रथं “कुह =कस्मिन् देशे “को “ह कः खलु यजमानः “शमि यज्ञरूपे कर्मणि “धिया= स्तुतिरूपेण कर्मणा “सुविताय अभ्युदयार्थं “प्रति “भूषति =अलंकरोति  कस्मिन् देशे यज्ञे कोऽन्यो यजमानो युवां स्तुतिभिर्हविर्भिश्च पूजितवान् येनास्मद्यज्ञे प्रति विलम्बेनागतवन्तौ स्थ इत्यभिप्रायः ॥

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(पद-पाठ)-

कुह । स्वित् । दोषा । कुह । वस्तोः । अश्विना । कुह । अभिऽपित्वम् । करतः । कुह । ऊषतुः ।कः । वाम् । शयुऽत्रा । विधवाऽइव । देवरम् । मर्यम् । न । योषा । कृणुते । सधऽस्थे । आ ॥२।

(सायण-भाष्य)-

हे “अश्विना =अश्विनौ “कुह “स्वित्= क्व चित् “दोषा =रात्रौ भवथ इति शेषः। “कुह “वस्तोः क्व वा दिवा भवथः । “कुह क्व वा अभिपित्वम् अभिप्राप्तिं “करतः= कुरुथः। “कुह =क्व वा “ऊषथुः= वसथः । किंच “वां =युवां “कः यजमानः “सधस्थे= सहस्थाने वेद्याख्ये “आ “कृणुते= आकुरुते । परिचरणार्थमात्माभिमुखीकरोति । तत्र दृष्टान्तौ =दर्शयति । “शयुत्रा =शयने “विधवेव =यथा मृतभर्तका नारी "देवरं भर्तृभ्रातरमभिमुखीकरोति । “मर्यं “न यथा च सर्वं मनुष्यं “योषा =सर्वा नारी संभोगकालेऽभिमुखीकरोति तद्वदित्यर्थः । तथा च यास्कः----’क्व स्विद्रात्रौ भवथः क्व दिवा क्वाभिप्राप्तिं कुरुथः क्व वसथः को वां शयने विधवेव' देवरम् । देवरः = कस्माद्द्वितीयो वर उच्यते । विधवा= विधातृका भवति विधवनाद्वा विधावनाद्वेति चर्म शिरा अपि वा धव इति मनुष्यनाम तद्वियोगाद्विधवा । देवरो =दीव्यतिकर्मा । मर्यो =मनुष्यो मरणधर्मा । योषा =यौतेराकुरुते सधस्थाने ' ( निरु. ३. १५) इति ॥

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(पद-पाठ)-

प्रातः । जरेथे इति । जरणाऽइव । कापया । वस्तोःऽवस्तोः । यजता । गच्छथः । गृहम् ।

कस्य । ध्वस्रा । भवथः । कस्य । वा । नरा । राजपुत्राऽइव । सवना । अव । गच्छथः ॥३

(सायण-भाष्य)-

हे “नरा= नेतारावश्विनौ युवां “प्रातः= प्रातःकाले “जरेथे= स्तोतृभिः स्तूयेथे । तत्र दृष्टान्तः । “जरणेव । यथा जरणौ= ऐश्वर्येण वृद्धौ राजानौ “कापया। प्रातःप्रबोधकस्य बन्दिनो वाणी कापा । तया स्तूयेते । तद्वदित्यर्थः । किंच "वस्तोर्वस्तोः अन्वहं “यजता= यष्टव्यौ युवां “गृहं यजमानस्य मन्दिरं “गच्छथः= प्राप्नुथः । तौ युवाँ "कस्य यजमानसंबन्धिनो दोषस्य “ध्वस्रा= ध्वंसकौ- विनाशयितारौ} “भवथः । “कस्य यजमानस्य “सवना =सवनानि "राजपुत्रेव राजकुमाराविव युवाम् “अव “गच्छथः प्राप्नुथः ॥

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(पद-पाठ)-

युवाम् । मृगाऽइव । वारणा । मृगण्यवः । दोषा । वस्तोः । हविषा । नि । ह्वयामहे ।युवम् । होत्राम् । ऋतुऽथा । जुह्वते । नरा । इषम् । जनाय । वहथः । शुभः । पती इति ॥४

(सायण-भाष्य)-

हे अश्विनौ “युवां “वारणा =वारणौ "मृगेव यथा शार्दूलौ “मृगण्यवः मृगयवः तद्वद्वयं “दोषा= रात्रौ "वस्तोः अहनि च “हविषा “नि ह्वयामहे= नियमेन हृयामः । किंच हे "नरा= नेतारावश्विनौ "युवं =युवाम् “ऋतुथा काले काले “होत्रम् =आहुतिं “जुह्वते =जुह्वति । यजमाना इति शेषः । किंच युवां “शुभः =शुभस्य वृष्टयुदकस्य "पती =स्वामिनौ सन्तौ “जनाय =जनार्थम् “इषम् =अन्नं "वहथः प्रापयथः॥

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(पद-पाठ)-

युवाम् । ह । घोषा । परि । अश्विना । यती । राज्ञः । ऊचे । दुहिता । पृच्छे । वाम् । नरा ।

भूतम् । मे । अह्ने । उत । भूतम् । अक्तवे । अश्वऽवते । रथिने । शक्तम् । अर्वते ॥५

(सायण-भाष्य)-

हे “नरा नेतारावश्विनौ “युवां खलु “परि परितो “यती गच्छन्ती “राज्ञः दीप्तस्य कक्षीवतः “दुहिता पुत्री “घोषा घोषाख्या अहम् "ऊचे संनिहितेभ्यो वृद्धेभ्य उक्तवत्यस्मि । किंच “वां युवां “पृच्छे वृद्धान् संनिहितान् कीदृशावश्विनाविति पृच्छामि । तथा सति “मे मम अह्ने दिवसाय दिवसनिर्वर्त्यकर्मणे “भूतं भवतम् । "उत अपि च "अक्तवे रात्र्यै रात्रिनिर्वर्त्यकर्मणे “भूतं भवतम् । तथा “अश्ववते अश्वयुक्ताय “रथिने रथवते च “अर्वते भ्रातृव्याय “शक्तं निरसने शक्तौ भवतम्॥ ॥१८॥

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(पद-पाठ)-

युवम् । कवी इति । स्थः । परि । अश्विना । रथम् । विशः । न । कुत्सः । जरितुः । नशायथः ।

युवोः । ह । मक्षा । परि । अश्विना । मधु । आसा । भरत । निःऽकृतम् । न । योषणा ॥६

(सायण-भाष्य)-

हे “अश्विना= अश्विनौ “कवी =मेधाविनौ "युवं= युवां “रथं परि “ष्ठः परितो भवथः । अथ “जरितुः स्तोतुर्यज्ञं प्रति गमनाय “नशायथः रथं प्राप्नुथः । तत्र दृष्टान्तः । “कुत्सः “न । यथा कुत्सश्चेन्द्रश्च सरथमधितिष्ठतः । तथा च मन्त्रान्तरं -- यासि कुत्सेन सरथमवस्युस्तोदो वातस्य हर्योरीशानः ' (ऋ. सं. ४. १६. ११ ) इति । किंच हे “अश्विना अश्विनौ "युवोर्ह युवयोः खलु स्वभूतं “मधु “मक्षा मक्षिका “आसा आस्येन “परि “भरत बिभर्ति । तत्र दृष्टान्तः । “निष्कृतं “न यथा निष्कृतं संस्कृतं मधु “योषणा नारी तद्वदित्यर्थः। तथा च मन्त्रान्तरम् -- उत स्था वां मधुमन्मक्षिकारपन्मदे सोमस्यौशिजो हुवन्यति ' ( ऋ. सं. १. ११९. ९) इति ॥

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(पद-पाठ)-

युवम् । ह । भुज्युम् । युवम् । अश्विना । वशम् । युवम् । शिञ्जारम् । उशनाम् । उप । आरथुः ।

युवोः । ररावा । परि । सख्यम् । आसते । युवोः । अहम् । अवसा । सुम्नम् । आ । चके ॥७

(सायण-भाष्य)-

हे “अश्विना अश्विनौ “युवं “ह युवां खलु “भुज्युं समुद्रमध्ये विपन्न`नावं तुग्रपुत्रं भुज्युम् “उपारथुः उत्तारयितुमुपगतवन्तौ भवथः । किंच “युवं युवां “वशं हस्तिबलेन शत्रुभिः पराजीयमानं वशनामधेयं राजानं रक्षणाय उपारथुः । किंच “युवं युवां “शिञ्जारम् अत्रिमग्निकूटादुत्तारयितुम् “उशनां कमनीयां स्तुतिं च श्रोतुमुपारथुः । तथा च मन्त्रान्तरम्---’अत्रिं शिञ्जारमश्विना ' (ऋ . सं. ८..५. २५) इति । किंच “युवोः युवयोः “सख्यं मित्रत्वं “ररावा हविषां प्रदाता यजमानः “परि आसते पर्यास्ते । वचनव्यत्ययः । किं च “युवोः युवयोः “अवसा रक्षणेन “अहं घोषा “सुम्नं सुखम् “आ “चके कामये ॥

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(पद-पाठ)-

युवम् । ह । कृशम् । युवम् । अश्विना । शयुम् । युवम् । विधन्तम् । विधवाम् । उरुष्यथः ।

युवम् । सनिऽभ्यः । स्तनयन्तम् । अश्विना । अप । व्रजम् । ऊर्णुथः । सप्तऽआस्यम् ॥८

(सायण-भाष्य)-

हे “अश्विना अश्विनौ “युवं “ह युवां खलु “कृशं दुर्बलं कृशनामधेयं वा "उरुष्यथः रक्षथः । किंच "युवं युवां “शयुं शयुनामानमृषिमुरुष्यथः। किंच “युवं युवां “विधन्तं परिचरन्तं मनुष्यं “विधवां च अपतिकां वध्रिमतीं योद्ध्रीं स्त्रियं च उरुष्यथः । किंच हे “अश्विना अश्विनौ “युवं युवां “स्तनयन्तं शब्दं कुर्वन्तं “सप्तास्यं सर्पणशीलद्वारं व्रजं मेघम् । व्रजश्चरुः' इति मेघनामसु पाठात् । “सनिभ्यः हविषां दातृभ्यः “अप “ऊर्णुथः विवृतद्वारं कृतवन्तौ स्थ इत्यर्थः ॥

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(पद-पाठ)-

जनिष्ट । योषा । पतयत् । कनीनकः । वि । च । अरुहन् । वीरुधः । दंसनाः । अनु ।

आ । अस्मै । रीयन्ते । निवनाऽइव । सिन्धवः । अस्मै । अह्ने । भवति । तत् । पतिऽत्वनम् ॥९

(सायण-भाष्य)-

हे अश्विनौ युवयोः प्रसादादियं घोषा “योषा स्त्रीगुणोपेता सुभगा “जनिष्ट जाता । अस्याः समीपं “कनीनकः कन्याकामः पतिः “पतयत् पततु । अस्मै कनीनकाय युवयोः “दंसनाः “अनु वृष्टिलक्षणानि कर्माणि लक्षीकृस्य “वीरुधः ओषधयः “वि “चारुहन विरोहन्तु प्रादुर्भवन्तु । “अस्मै कनीनकाय “निवनेव प्रवणेनेव “सिन्धवः उदकानि “आ “रीयन्ते । ता वीरुधोऽभिगच्छन्तु । किंच “अह्रे केनाप्यहन्तव्याय “अस्मै कनीनकाय “तत् संभोगसमर्थं“पतित्वनं यौवनं “भवति भवतु॥

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(पद-पाठ)-

जीवम् । रुदन्ति । वि । मयन्ते । अध्वरे । दीर्घाम् । अनु । प्रऽसितिम् । दीधियुः । नरः ।

वामम् । पितृऽभ्यः । ये । इदम् । सम्ऽएरिरे । मयः । पतिऽभ्यः । जनयः । परिऽस्वजे ॥१०।


(सायण-भाष्य)- 

हेअश्विनौ युवथोरनुग्रहात “ये “नरः पतयो जायानां “जीवं जीवनमुद्दिश्य "रुदन्ति । रोदनेनापि जायानां जीवनमेवाशासत इत्यर्थः । ता जायाः अध्वरे यज्ञे “वि “मयन्ते निवेशयन्ति च किंच तासु “दीर्घां महतीं “प्रसितिं भुजयोः प्रबन्धनम् “अनु “दीधियुः अनुदधति । “इदं “वामं वननीयमपत्यं “पितृभ्यः “समीरिरे संप्रेरयन्ति च। तेभ्यः पतिभ्यः “जनयः जायाः “परिष्वजे परिष्वङ्गार्थं “मयः सुखं कुर्वन्तीति शेषः ॥ ॥ १९ ॥

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(पद-पाठ)-

न । तस्य । विद्म । तत् । ऊं इति । सु । प्र । वोचत । युवा । ह । यत् । युवत्याः । क्षेति । योनिषु ।

प्रियऽउस्रियस्य । वृषभस्य । रेतिनः । गृहम् । गमेम । अश्विना । तत् । उश्मसि ॥११

(सायण-भाष्य)-

हे “अश्विना अश्विनौ तस्य “तत् सुखं वयं “न “विद्म न जानीमः। तत्सुखं यूयं “सु सुष्ठु “प्र “वोचत । बहुवचनं पूजार्थम् । “युवा “ह तरुणः खलु मत्पतिः "युवत्याः यौवनान्विताया मम “योनिषु गृहेषु “यत् “क्षेति निवसतीति । किंच “प्रियोस्रियस्य प्रिययुवतेः “वृषभस्य सेक्तुः “रेतिनः रेतस्विनो मत्पतेः “गृहं “गमेम गच्छेम । वयं “तत् गृहम् “उश्मसि कामयामहे ॥

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(पद-पाठ)-

आ । वाम् । अगन् । सुऽमतिः । वाजिनीवसू इति वाजिनीऽवसू । नि । अश्विना । हृत्ऽसु । कामाः । अयंसत ।

अभूतम् । गोपा । मिथुना । शुभः । पती इति । प्रियाः । अर्यम्णः । दुर्यान् । अशीमहि ॥१२

(सायण-भाष्य)-

हे वाजिनीवसू अन्नधनौ “शुभस्पती उदकस्य स्वामिनौ हे “अश्विना अश्विनौ “मिथुना मिथुनौ परस्परं सहितौ “वां युवां “सुमतिः “आ “अगन् आगच्छतु । “हृत्सु अस्मदीयेषु हृदयेषु “कामाः अभिलाषा: “नि अयंसत नियम्यन्ताम् । किंच युवां “गोपा मम गोपयितारौ “अभूतं भवतम् । अपि च "प्रियाः सत्यो वयम् “अर्यम्णः पत्युः "दुर्यान गृहान् "अशीमहि प्राप्नुयाम ॥

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(पद-पाठ)-

ता । मन्दसाना । मनुषः । दुरोणे । आ । धत्तम् । रयिम् । सहऽवीरम् । वचस्यवे ।

कृतम् । तीर्थम् । सुऽप्रपानम् । शुभः । पती इति । स्थाणुम् । पथेऽस्थाम् । अप । दुःऽमतिम् । हतम् ॥१३

(सायण-भाष्य)-

हे अश्विनौ “मन्दसाना मन्दसानौ “ता तौ युवां “मनुषः मनुष्यस्य मत्पतेः "दुरोणे गृहे “वचस्यवे युष्मत्स्तुतिकामायै मह्यं “सहवीरं पुत्रादिसहितं “रयिं धनम् “आ “धत्तं स्थापयतम् । किंच हे अश्विनौ "शुभस्पती उदकस्य स्वामिनौ युवां पतिगृहं गच्छन्त्या मम “तीर्थं पानाय "सुप्रपाणं “कृतं कुरुतम् । किंच युवां “पथेष्ठां मार्गस्थं “स्थाणुं वृक्षं “दुर्मतिं दुर्बुद्धिं परिपन्थिनं च “अप “हतम् अपगमयतम् ॥

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(पद-पाठ)-

क्व । स्वित् । अद्य । कतमासु । अश्विना । विक्षु । दस्रा । मादयेते इति । शुभः । पती इति ।

कः । ईम् । नि । येमे । कतमस्य । जग्मतुः । विप्रस्य । वा । यजमानस्य । वा । गृहम् ॥१४

(सायण-भाष्य)-

हे “अश्विना अश्विनौ “दस्रा दर्शनीयौ “शुभस्पती उदकस्य पती स्वामिनौ भवन्तौ "क्व “स्वित् क्व स्थितौ जनपदे “अद्य अस्मिन्नहनि “कतमासु कासु “विक्षु प्रजासु “मादयेते आत्मानं तर्पयतः । किंच कः यजमानः “ईम् एतौ “नि “येमे नियच्छति । किंच भवन्तौ “कतमस्य “विप्रस्य मेधाविनः स्तोतुः यजमानस्य "गृहं “वा “जग्मतुः गतवन्तौ ॥ ॥ २०॥


ऋग्वेदः सूक्तं १०.८५

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सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः।
ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः॥१॥

सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही।
अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः॥२॥

सोमं मन्यते पपिवान्यत्सम्पिंषन्त्योषधिम् ।
सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन॥३॥

आच्छद्विधानैर्गुपितो बार्हतैः सोम रक्षितः ।
ग्राव्णामिच्छृण्वन्तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः।४॥

यत्त्वा देव प्रपिबन्ति तत आ प्यायसे पुनः ।
वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः ॥५॥

रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी ।
सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम् ॥६॥

चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम् ।
द्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्या पतिम् ॥७॥

स्तोमा आसन्प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः ।
सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत्पुरोगवः ॥८॥

सोमो वधूयुरभवदश्विनास्तामुभा वरा ।
सूर्यां यत्पत्ये शंसन्तीं मनसा सविताददात् ॥९॥

मनो अस्या अन आसीद्द्यौरासीदुत च्छदिः ।
शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात्सूर्या गृहम् ॥१०॥

ऋक्सामाभ्यामभिहितौ गावौ ते सामनावितः ।
श्रोत्रं ते चक्रे आस्तां दिवि पन्थाश्चराचारः ॥११॥

शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहतः ।
अनो मनस्मयं सूर्यारोहत्प्रयती पतिम् ॥१२॥

सूर्याया वहतुः प्रागात्सविता यमवासृजत् ।
अघासु हन्यन्ते गावोऽर्जुन्योः पर्युह्यते ॥१३॥

यदश्विना पृच्छमानावयातं त्रिचक्रेण वहतुं सूर्यायाः 
विश्वे देवा अनु तद्वामजानन्पुत्रः पितराववृणीत पूषा ॥१४॥

यदयातं शुभस्पती वरेयं सूर्यामुप ।
क्वैकं चक्रं वामासीत्क्व देष्ट्राय तस्थथुः ॥१५॥

द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः ।
अथैकं चक्रं यद्गुहा तदद्धातय इद्विदुः॥१६॥

सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च ।
ये भूतस्य प्रचेतस इदं तेभ्योऽकरं नमः॥१७॥

पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीळन्तौ परि यातो अध्वरम् ।
विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायते पुनः ॥१८॥

नवोनवो भवति जायमानोऽह्नां केतुरुषसामेत्यग्रम् 
भागं देवेभ्यो वि दधात्यायन्प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः ॥१९॥

सुकिंशुकं शल्मलिं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम् ।
आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व ॥२०॥

उदीर्ष्वातः पतिवती ह्येषा विश्वावसुं नमसा गीर्भिरीळे ।
अन्यामिच्छ पितृषदं व्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि ॥२१॥

उदीर्ष्वातो विश्वावसो नमसेळा महे त्वा ।
अन्यामिच्छ प्रफर्व्यं सं जायां पत्या सृज ॥२२॥

अनृक्षरा ऋजवः सन्तु पन्था येभिः सखायो यन्ति नो वरेयम् ।
समर्यमा सं भगो नो निनीयात्सं जास्पत्यं सुयममस्तु देवाः ॥२३॥

प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद्येन त्वाबध्नात्सविता सुशेवः ।
ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोकेऽरिष्टां त्वा सह पत्या दधामि ॥२४॥

प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम् ।
यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति ॥२५॥

पूषा त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन। 
गृहान्गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि ॥२६॥

इह प्रियं प्रजया ते समृध्यतामस्मिन्गृहे गार्हपत्याय जागृहि ।
एना पत्या तन्वं सं सृजस्वाधा जिव्री विदथमा वदाथः ॥२७॥

नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्यज्यते ।
एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते ॥२८॥

परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु ।
कृत्यैषा पद्वती भूत्व्या जाया विशते पतिम् ॥२९॥

अश्रीरा तनूर्भवति रुशती पापयामुया ।
पतिर्यद्वध्वो वाससा स्वमङ्गमभिधित्सते ॥३०॥

ये वध्वश्चन्द्रं वहतुं यक्ष्मा यन्ति जनादनु ।
पुनस्तान्यज्ञिया देवा नयन्तु यत आगताः ॥३१॥

मा विदन्परिपन्थिनो य आसीदन्ति दम्पती।
सुगेभिर्दुर्गमतीतामप द्रान्त्वरातयः ॥३२॥

सुमङ्गलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत ।
सौभाग्यमस्यै दत्त्वायाथास्तं वि परेतन ॥३३॥

तृष्टमेतत्कटुकमेतदपाष्ठवद्विषवन्नैतदत्तवे ।
सूर्यां यो ब्रह्मा विद्यात्स इद्वाधूयमर्हति ॥३४॥

आशसनं विशसनमथो अधिविकर्तनम् ।
सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मा तु शुन्धति॥३५॥

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गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ।
भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥३६॥

तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या वपन्ति ।
या न ऊरू उशती विश्रयाते यस्यामुशन्तः प्रहराम शेपम् ॥३७॥

तुभ्यमग्रे पर्यवहन्सूर्यां वहतुना सह ।
पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह ॥३८॥

पुनः पत्नीमग्निरदादायुषा सह वर्चसा ।
दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम् ॥३९॥

सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः ।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥४०॥

सोमो ददद्गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये ।
रयिं च पुत्राँश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम् ॥४१॥

इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् ।
क्रीळन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वे गृहे ॥४२॥

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आ नः प्रजां जनयतु प्रजापतिराजरसाय समनक्त्वर्यमा ।
अदुर्मङ्गलीः पतिलोकमा विश शं नो भव द्विपदे   शं चतुष्पदे ॥४३॥

अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः ।
वीरसूर्देवकामा स्योना शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥४४॥

इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु ।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि ॥४५॥

सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव ।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु ॥४६॥

समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ ।
सं मातरिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ ॥४७॥

सायणभाष्यम्

सप्तमेऽनुवाके षट् सूक्तानि । तत्र 'सत्येन' इति सप्तचत्वारिंशदृचं प्रथमं सूक्तं सवितृसुतायाः सूर्याया आर्षम्। 'नवोनवः' इति तिस्रः ‘अनृक्षराः' इति द्वे ‘गृभ्णामि' इति द्वे ‘यदश्विना पृच्छमानौ' इत्येका ‘ पूषा त्वेतो नयतु' इत्येका ‘अघोरचक्षुः' इति चैवमेता दशर्चस्त्रिष्टुभः । ‘तृष्टमेतत्' इत्येषोरोबृहत्यष्टकद्वादशद्वयष्टकवती । “पूर्वपरं चरतः ' ‘इह प्रियं प्रजया' ‘आ नः प्रजां जनयतु' इत्येतास्तिस्रो जगत्यः । शिष्टास्त्र्यत्रिंशदनुष्टुभः । आदितः पञ्चानामृचां सोमो देवता । तत एकादशभिः सूर्या स्वविवाहं स्तुतवती । अतस्तत्र योऽर्थः प्रतिपाद्यते स एव देवतात्वेन विज्ञेयः। ‘या तेनोच्यते सा देवता' इति न्यायात् । सप्तदश्या देवी देवता । अष्टादश्याः सोमार्कौ। एकोनविंश्याश्चन्द्रमाः । सुकिंशुकम्' इत्याद्या नवर्चो विवाहमन्त्रा आशिषः प्रतिपादकाः । अतस्तत्र तत्र प्रतिपाद्योऽर्थों देवता । ‘परा देहि' अश्रीरा तनूः' इति द्वे वध्वा विवाहकाले परिहितस्य वाससः संस्पर्शनिन्दयित्र्यौ।'

 ये वध्वश्चन्द्रम्' इति दंपत्योः क्षयरोगस्य नाशिनी । अतस्तद्देवताका'। परिशिष्टानां षोडशाना सूर्या देवता । तथा चानुक्रान्तं-' सत्येन सप्तचत्वारिंशत् ' सर्वमनुक्रान्तम्। सूक्तविनियोगो लैङ्गिकः ॥


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सत्येन । उत्तभिता । भूमिः । सूर्येण । उत्तभिता । द्यौः ।।ऋतेन । आदित्याः । तिष्ठन्ति । दिवि । सोमः । अधि । श्रितः ॥ १ ॥

"सत्येन ब्रह्मणानन्तात्मना । ब्रह्मा खलु देवानां मध्ये सत्यभूतः । तेनाधःस्थितेन "भूमिः “उत्तभिता उपरि स्तम्भिता । यथाधो न पतेत्तथा कृताः। यद्वा । सत्येन अनृतप्रतियोगिना धर्मण भूमिरुत्तभितोद्धृता फलिता भवतीत्यर्थः । असति सत्ये भूम्यां सस्यादयो न फलन्ति । तथा "सूर्येण देवेन "द्यौः "उत्तभिता । सूर्यो हि द्युस्थानत्वाद्दिवं दधार। “ऋतेन यज्ञेन आदित्याः अदितेः पुत्रा देवाः "तिष्ठन्ति । यज्ञे यजमानदत्तेन खल्वाहुत्या देवा उपजीवन्ति । "दिवि द्युलोके “सोमः देवानामाप्यायनकारी वल्लीरूपो देवतारूपश्च अधि “श्रितः अधितिष्ठति । इति स्वपतिं सोमं सूर्या स्तौति॥



सोमेन । आदित्याः । बलिनः । सोमेन । पृथिवी । मही।अथो इति । नक्षत्राणाम् । एषाम् । उपऽस्थे । सोमः । आऽहितः ॥ २ ॥

“सोमेनादित्याः अदितेः पुत्रा इन्द्रादयः "बलिनः भवन्ति । ऐन्द्रवायवादिग्रहपरिग्रहादिति भावः । तथा “सोमेन आहुत्यात्मनाग्नौ हुतेन "पृथिवी =भूमिः "मही= महती भवति । आहुत्या वृष्टिद्वारेण सस्यादिसंपत्तेः । "अथो अपि चायं सोमः "नक्षत्राणामेषाम् । न क्षं त्रायन्त इति नक्षत्रा ग्रहचमसादयः । तेषामेषाम् ="उपस्थे "सोमः रसात्मकः “आहितः । यद्वा । प्रसिद्धानामेव नक्षत्राणामुपस्थ उपस्थाने द्युलोके सोम आहितः । तृतीयस्यामितो दिवि सोम आसीत्तं गायत्र्याहरत्' (तै. ब्रा. ३. २. १. १ ) इत्यादिश्रुतेः । देवतारूपसोमपक्षे । सोमेनादित्या देवा बलिनो बलवन्तो भवन्ति तस्यैकैककलास्वादनात् । प्रथमां पिबते वह्रिर्द्वितीयां पिबते रविः' इत्यादिस्मृतेः । सोमेन पृथिवी मही। अमृतसेकेनौषध्याद्यभिवृद्ध्या पृथिव्या बलवत्त्वम् । चन्द्रस्य नक्षत्राणामुपस्थे स्थितिः प्रसिद्धा ॥



सोमम् । मन्यते । पपिऽवान् । यत् । सम्ऽपिंषन्ति। ओषधिम् ।।सोमम् । यम् । ब्रह्माणः । विदुः । न । तस्य । अश्नाति । कः ।  चन ॥ ३ ॥

तं सोमं मन्यते । 'कः । यः “पपिवान् । वर्धनकामार्थं चिकित्सार्थं पीतः सोमो येन । “यत् यमित्यर्थः । यं सोमम् “ओषधिं वल्लीरूपं “संपिंषन्ति सामर्थ्यद्रासायनिकाः । न च स साक्षात्सोमः । तर्हि कः । उच्यते । सोमं हि तं मन्यते “यं “ब्रह्माणः । यद्ब्रह्मशब्दो ब्राह्मणशब्दपर्यायोsस्ति । कुतो नु चरसि ब्रह्मन् ' ' तस्मै मा ब्रूया निधिपाय ब्रह्मन्' इत्यादिप्रयोगात् । ब्राह्मणा इत्यर्थः । ते चर्त्विजो यजमानश्च यागसाधनभूतं संस्कर्तुं “विदुः जानन्ति “तस्य अंशम् । यद्वा । कर्मणि षष्ठी। तं सोमं "कश्चन “न अश्नाति । कश्चिदप्ययज्वेति शेषः । यज्वैनं भक्षयितुमर्हति नान्य इत्यर्थः । एवमोषधिपक्षे । अथ चन्द्रपक्ष उच्यते । तं सोमं मन्यते पपिवान् पीतवान् यजमानो यद्यमोषधिरूपं संपिंषन्त्यभिषवग्रावभिरध्वर्य्वादयो यजमानश्च:। न च स सोमः। कस्तहिं । यं ब्रह्माणो ब्राह्मणा अभिज्ञा दैवज्ञा विदुः कथयन्ति चन्द्रमसं न तस्याश्नाति कश्चनादेवो देवेभ्योऽन्यो मनुष्यादिः । देवा अग्न्यादयो रश्मयो वा । यज्ञार्हसोमस्यासमत्वं न निन्दायै अपि तु इतरस्य स्तुत्यै इति मन्तव्यम् । “ अपशवो वा अन्ये गोअश्वेभ्यः' (तै. सं. ५. २. ९. ४) इत्यादिवत् ।एवमत्र सोम्या उभयथा योज्याः॥



आच्छत्ऽविधानैः । गुपितः । बार्हतैः । सोम । रक्षितः ।ग्राव्णाम् । इत् । शृण्वन् । तिष्ठसि । न । ते । अश्नाति । पार्थिवः ॥ ४ ॥

हे "सोम “आच्छद्विधानैः । आच्छादयन्ति विधानानि येषां विद्यन्ते त आच्छद्विधानाः । तैः “गुपितः । तथा “बार्हतैः गुपितः स्वानभ्राजाङ्घार्यादिभिः सप्तभिः सोमपालैः रक्षितः त्वम् । एते वा अमुष्मिँल्लोके सोममरक्षन् ' (तै. सं. ६.१.१०.५) इति ब्राह्मणम् । "ग्राव्णामिच्छृण्वन् अभिषवग्राव्णां ध्वनिं शृण्वन्नेव “तिष्ठसि । “ते त्वां “पार्थिवः पार्थिवो जनः “न “अश्नाति । न हि द्युस्थश्चन्द्ररूपः सोमोऽत्रत्यैः पानयोग्यो भवति । चन्द्रमा वै सोमो देवानामन्नं तं पौर्णमास्यामभिषुण्वन्ति' (श. ब्रा. ११.१.५.३ ) इति वाजसनेयकम् ॥



यत् । त्वा । देव । प्रऽपिबन्ति । ततः । आ । प्यायसे । पुनरिति ।।वायुः । सोमस्य । रक्षिता । समानाम् । मासः । आऽकृतिः ॥ ५ ॥

हे “देव सोम “यत् यदा “त्वा त्वां प्रपिबन्ति ओषधिरूपं त्रिष्वपि सवनेषु “ततः अनन्तरमेव “पुनः “आ “प्यायसे ।“ आ प्यायस्व सम् ' ( ऋ. सं. १. ९१. १६) इति प्रातःसवने ‘सं ते पयांसि' (ऋ. सं. १. ९१. १८) इत्युत्तरयोः सवनयोराप्यायसे । किंच “वायुः तव “सोमस्य “रक्षिता । यथा न शुष्यति तथा । वायुः शोषकः प्रसिद्धो लोके । किंच "मासः । ‘मसी =परिमाणे । मस्यते परिमीयत इति मासः सोमः। स च "समानां संवत्सराणाम् "आकृतिः आकर्ता व्यवच्छेदको भवति । संवत्सरे संवत्सरे वसन्तादिकालेष्वनुष्ठीयमानत्वात् ' वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत' इति श्रुतेः । यद्वा । सोमाधारवनस्पतिविकारग्रहद्वारेण वायुः सोमरसस्य रक्षिता भवति । ‘वायुगोपा वनस्पतयः' इति श्रुतेः । एवं वल्लीरूपसोमपक्षे योजना । चन्द्रपक्षे तु । हे देव सोम यद्यदा वा त्वां प्रपिबन्ति रश्मयोऽपरपक्षे ततोऽनन्तरमेव पूर्वपक्षे पुनराप्यायसे । वायुश्च सोमस्य तव रक्षिता । वाय्वधीनत्वाच्चन्द्रगतेः । किंच समानां संवत्सराणां मासः । षष्ठ्येकवचनमेतत् । मासस्याकृतिश्च कर्ता त्वं चासि । एकैककलाहासवृद्धिभ्यां हि मासः पूर्यते तैः संवत्सर इति ॥ ॥ २० ॥



रैभी। आसीत् । अनुऽदेयी । नाराशंसी । निऽओचनी ।।सूर्यायाः । भद्रम् । इत् । वासः । गाथया । एति । परिऽकृतम् ॥ ६ ॥

आभिः सूर्या स्वविवाहमस्तौदित्युक्तम् । सूर्या सावित्री ब्रूते । "रैभी। रैभ्यः काश्चनर्चः । ‘रैभीः शंसति रेभन्तो वै देवाश्चर्षयश्च स्वर्गं लोकमायन्' (ऐ. ब्रा. ६. ३२) इत्यादिब्राह्मणविहिता रैभ्यः । सा रैभी “अनुदेयी “आसीत् । दीयमानवधूविनोदनायानुदीयमाना वयस्यासीत् । तथा “नाराशंसी। प्राता रत्नम् ' (ऋ. सं. १. १२५. १ ) इत्यादिका मनुष्याणां स्तुतयो नाराशंस्यः । सा नाराशंसी “न्योचनी । उचतिः सेवाकर्मा । सा वधूशुश्रूषार्थं दीयमाना दास्यभवत् । “सूर्यायाः मम “भद्रं “वासः विचित्रं दुकूलादिकमाच्छादनयोग्यं वस्त्रं “गाथया “परिष्कृतम् अलंकृतम् “एति । 'गाथा गीयते' इत्यादिब्राह्मणोक्ता गाथा । तया गाथया यत्परिष्कृतमस्ति तद्वासोऽभवदिति ॥



चित्तिः । आः । उपऽबर्हणम् । चक्षुः । आः । अभिऽअञ्जनम् ।द्यौः । भूमिः । कोशः । आसीत् । यत् । अयात् । सूर्या । पतिम् ॥ ७ ॥

“चित्तिः देवता “उपबर्हणम् “आः आसीत् ।“चक्षुः "अभ्यञ्जनम् “आः आसीत् । तथा हि। वृत्रस्य कनीनिका परापतत्त्रिककुन्नाम पर्वते । तेन त्रैककुदेनाञ्जनसजातीयेन चक्षुषी अञ्जते । तच्चक्षुरेवाञ्जनमासीदिति । “द्यौः च "भूमिः च "कोशः आसीत् । कोशस्थानीये अभूताम् । “यत् यदा "सूर्या "पतिं स्वकीयं नवभर्तारं सोमम् "अयात् अगच्छत् तदैवमुपकरणान्यासन् ॥



स्तोमाः । आसन् । प्रतिऽधयः । कुरीरम् । छन्दः । ओपशः ।सूर्यायाः । अश्विना । वरा । अग्निः । आसीत् । पुरःऽगवः ॥ ८ ॥

सूर्याया रथस्य “स्तोमाः त्रिवृदादयः “प्रतिधयः “आसन् । प्रतिधीयन्त इति प्रतिधय ईषातिर्यगायतकाष्ठादयः । तथा “कुरीरं “छन्दः कुरीरनामकं छन्दोऽनसः "ओपशः अभवत् । येनोपशेरते स ओपशः । तादृशायाः “सूर्यायाः “अश्विना अश्विनौ “वरा वरावास्तामिति शेषः । तस्या विवाहे “पुरोगवः पुरोगन्ता पुरतो गन्ता' यः पूर्वमेव प्रस्तावार्थं गच्छति तत्स्थानीयः “अग्निरासीत् । ‘प्रजापतिर्वै सोमाय राज्ञे दुहितरं प्रायच्छत्सूर्यां सावित्रीं तस्यै सर्वे देवा वरा आगच्छन् ' (ऐ. ब्रा. ४.७) इत्यादि हि ब्राह्मणम् । अत्रायमभिप्रायः । प्रजापतिः सविता स्वदुहितरं सोमाय प्रायच्छत् । सोमाय दास्यामीति मनीषामकरोत् । तस्मिन् समये पुत्र्या उपचारार्थं प्रदानान्युक्तान्यभवन् । तथा च सत्यश्विनौ प्रबलौ सन्तावाजिं पुरतो गत्वा तामलभेतामिति । उत्तरत्रापि सोमो वधूयुरभवत् । इत्यादिनायमेवार्थः स्पष्टो भविष्यति । 'योषावृणीत जेन्या' (ऋ.सं.१.११९.५) इत्यादिकमुक्तम् ॥



सोमः । वधूऽयुः । अभवत् । अश्विना । आस्ताम् । उभा । वरा ।।सूर्याम् । यत् । पत्ये । शंसन्तीम् । मनसा । सविता । अददात् ॥ ९ ॥

“सोमो “वधूयुः वधूकामो वरः “अभवत् । तस्मिन् समये “अश्विना अश्विनौ "उभा उभौ “वरा वरौ "आस्ताम् अभूताम् । “यत् यदा "सूर्याँ “पत्ये "शंसन्तीं पतिं कामयमानाम् । पर्याप्तयौवनामित्यर्थः। सूर्यां "मनसा सहिताय' सोमाय वराय "सविता तत्पिता अददात् प्रादात् दित्सां चकार ॥



मनः । अस्याः । अनः । आसीत् । द्यौः । आसीत् । उत । छदिः ।शुक्रौ । अनड़्वाहौ। आस्ताम् । यत् । अयात् । सूर्या । गृहम् ॥ १० ॥

“अस्याः सूर्यायाः पत्युर्गृहं गच्छन्त्याः "अनः रथः “मनः “आसीत् । या पतिगृहं त्वया गच्छामीति मतिरस्ति सा अन आसीत् । "उत अपि च तस्या अनसः “द्यौः द्युलोकः “छदिः उपर्यपिधानम् “आसीत् । शुक्रौ दीप्तौ सूर्याचन्द्रमसौ "अनड्वाहौ रथस्य वोढारौ “आस्ताम् अभवताम् । “यत् यदा "सूर्या गृहं सोमम् अयात् अगात् ॥ ॥ २१ ॥



ऋक्ऽसामाभ्याम् । अभिऽहितौ । गावौ । ते। सामनौ । इतः ।श्रोत्रम् । ते । चक्रे इति । आस्ताम् । दिवि । पन्थाः । चराचरः ॥ ११ ॥

हे सूर्ये देवि ते तव “ऋक्सामाभ्याम् अभिधानीस्थानाभ्याम् “अभिहितौ “गाव गोस्थानीयौ सूर्याचन्द्रमसौ “सामनौ सामानौ सन्तौ “इतः गच्छतः । अनोवाहौ पत्युर्गृहं प्रति गच्छतः । “ते तव “श्रोत्रम् । श्रोत्रे इत्यर्थः । वरस्य गुणग्राहिणी श्रोत्रे एव “चक्रे "आस्ताम् । मनोरूपस्य रथस्य श्रोत्रे चक्रे अभवतामित्यर्थः । “दिवि “पन्थाश्चराचरः चलाचलोऽप्यन्तं गमनसाधनभूतो मार्गोऽभूत् । रथसंचारप्रदेशो द्युलोक आसीत् ॥



शुची इति । ते । चक्रे इति । यात्याः । विऽआनः । अक्षः । आऽहतः ।अनः । मनस्मयम् । सूर्या । आ । अरोहत् । प्रऽयती । पतिम् ।। १२ ।।

“यात्याः गच्छन्त्याः “ते तव अनसः “चक्रे चङ्क्रमणशीले रथाङ्गे “शुची श्रोत्रे आस्ताम् । “व्यानः तव व्यानो वायुः “अक्षः । उभयरथचक्रच्छिद्रगामिनी या काष्ठा सा च रथस्य सर्वं भारं वहति । सोऽक्षो व्यानोऽभूत् । “मनस्मयं मनोमयम् “अनः शकटं “सूर्या “पतिं सोमं प्रति “प्रयती प्रकर्षेण गच्छन्ती “आरोहत् आरूढवती । पतिं प्रति जिगमिषोर्मनोरूपस्य रथस्य पत्युर्गुणश्राविणी श्रोत्रे एव चक्रे अभूतां व्यानो धारको वायुश्चेष्टकोऽक्षोऽभूदित्यर्थः ।।



सूर्यायाः । वहतुः । प्र । अगात् । सविता । यम् । अवऽअसृजत् ।अघासु । हन्यन्ते । गावः । अर्जुन्योः । परि । उह्यते ॥ १३ ॥

सोमाय प्रदित्सितायाः “सूर्याया वहतुः । कन्याप्रियार्थं दातव्यो गवादिपदार्थों वहतुः । स च “प्रागात् तस्या अपि पूर्वमगच्छत् । “यं वहतुं “सविता अस्याः पिता “अवासृजत् अवसृष्टवान् । प्रादादित्यर्थः। कदा सागच्छत् कदा वहतुरित्युभयोः काल उच्यते । “अघासु । मघास्वित्यर्थः । मघानक्षत्रेषु “गावः सवित्रा दत्ता गावः सोमगृहं प्रति “हन्यन्ते दण्डैस्ताड्यन्ते प्रेरणार्थम् । “अर्जुन्योः । फल्गुन्योरित्यर्थः। तयोर्नक्षत्रयोः सवितुः सकाशात् परि सोमगृहं प्रति “उह्यते नीयते रथेन ॥



यत् । अश्विना । पृच्छमानौ । अयातम् । त्रिऽचक्रेण । वहतुम् । सूर्यायाः ।विश्वे । देवाः । अनु । तत् । वाम् । अजानन् । पुत्रः । पितरौ । अवृणीत । पूषा ॥ १४ ॥

हे "अश्विना अश्विनौ "यत् यदा “पृच्छमानौ सवितारं प्रष्टुम् "अयातम् अगच्छतम् । केन साधनेनायातं तदुच्यते । "त्रिचक्रेण चक्रत्रययुक्तेन रथेन । किं पृच्छमानौ । "सूर्यायाः “वहतुम् । विवाहमित्यर्थः । "तत् तदानीं “वां युवां सवितारं प्रति गच्छन्तौ “विश्व सर्वे "देवाः “अनु "अजानन् अनुज्ञातवन्तः । तथा “पितरौ "पुत्रः अश्विनोः पुत्रः "पूषा "अवृणीत वृतवान् ॥



यत् । अयातम् । शुभः । पती इति । वरेऽयम् । सूर्याम् । उप ।क्व । एकम् । चक्रम् । वाम् । आसीत् । क्व। देष्ट्राय । तस्थथुः ॥ १५ ॥

हे “शुभस्पती उदकस्य स्वामिनौ "यत् यौ “अयातम् अगच्छतम् । कं प्रति। “वरेयं वरणीयायाः सूर्यायाः संबन्धिनं वरैर्याचितव्यं वा । सवितारमित्यर्थः । किमर्थम् । "सूर्यामुप गन्तुम् । “वां भवतोः संप्रति दृश्यमानमिदम् "एकं चक्रं “क्व “आसीत् पुरा । "क्व वा युवां “देष्ट्राय दानाय प्रवृत्तौ “तस्थथुः इत्यश्विनोर्निवासं पृच्छति ॥ ॥ २२ ॥



द्वे इति । ते । चक्रे इति । सूर्ये । ब्रह्माणः । ऋतुऽथा। विदुः ।।अथ । एकम् । चक्रम् । यत् । गुहा । तत् । अद्धातयः । इत् । विदुः ॥ १६ ॥

अथ स्वयमेव स्वात्मानं प्रति सूर्यां वदति । हे "सूर्ये ते तव “द्वे "चक्रे प्रज्ञाते पुरा दृष्टे द्वे एव चन्द्रसूर्यात्मके “ऋतुथा ऋतुषु विनिर्दिष्टे चक्रे “ब्रह्माणः ब्राह्मणाः विदुः । "अथैकं "चक्रं तृतीयं संवत्सरात्मकं "गुहा गुहायां निहितं "यत् अस्ति "तदद्धातय “इत् । एतन्मेधाविनामसु पठितम् (नि. ३. १५, २१ ) । मेधाविन एव "विदुः जानन्ति ॥



सूर्यायै । देवेभ्यः । मित्राय । वरुणाय । च ।ये। भूतस्य । प्रऽचेतसः । इदम् । तेभ्यः । अकरम् । नमः ॥ १७ ॥

"सूर्यायै सूर्यस्य पत्न्यै "देवेभ्यः अग्न्यादिभ्यः "मित्राय "वरुणाय च "ये च "भूतस्य भूतजातस्य “प्रचेतसः सुमतयोऽभिमतप्रदा भवन्ति "तेभ्यः सर्वेभ्यः इदं "नमः नमस्कारम् "अकरं करोमि ॥



पूर्वऽअपरम् । चरतः । मायया । एतौ । शिशू इति । क्रीळन्तौ । परि । यातः । अध्वरम् ।विश्वानि । अन्यः ।भुव॑ना । अभिऽचष्टे । ऋतून् । अन्यः । विऽदधत् । जायते । पुनरिति ॥१८॥

कश्चित्पूर्वं गच्छति सूर्यः । अन्यस्तमनुचरति चन्द्रमाः। एवं पूर्वापरं पौर्वापर्येण "मायया स्वप्रज्ञानेन "एतौ आदित्यचन्द्रौ "चरतः गच्छतो दिवि । तौ “शिशू । शिशुवद्भ्रमणाज्जायमानत्वाद्वा शिशू इत्युच्येते । शिशू सन्तौ "क्रीळन्तौ अन्तरिक्षे विहरन्तौ "अध्वरं "परि "यातः यज्ञं प्रतिगच्छतः । तयोः "अन्यः आदित्यः "विश्वानि “भुवना भुवनानि “अभिचष्टे अभिपश्यति । “ऋतून् वसन्तादीन् “अन्यः चन्द्रमाः “विदधत् कुर्वन् मासानर्धमासांश्च कुर्वन् "पुनः "जायते । यद्यप्युभयोरपि पुनर्जनिरस्ति तथापि सूर्यस्य सर्वदा प्रवृद्धेरुदयो नाभिप्रेतः । चन्द्रस्य तु हासवृद्धि सद्भावात्पुनःपुनर्जायत इत्युक्तिर्युक्ता।' चन्द्रमा वै जायते पुनः' (तै. ब्रा. ३. ९. ५. ४) इत्यादिश्रुतेः ॥

अतिमूर्तिनाम्न्येकाहे शुक्लपक्षे चान्द्रमसीष्टिः । तत्र ‘नवोनवः' इत्येषा याज्या। सूत्रितं च--- ‘नवोनवो भवति जायमानस्तरणिर्विश्वदर्शतः' (आश्व. श्रौ. ९. ८) इति ॥



नवःऽनवः । भवति । जायमानः । अह्राम् । केतुः । उषसाम् । एति । अग्रम् ।भागम् । देवेभ्यः । वि । दधाति । आऽयन् । प्र । चन्द्रमाः । तिरते । दीर्घम् । आयुः ॥१९॥

अयं चन्द्रमाः “जायमानः प्रतिदिनं जायमान एकैककलाधिक्येनोत्पद्यमानः सन् "नवोनवो “भवति प्रतिदिनं नूतन एव भवति । एतत्पूर्वपक्षाद्यभिप्रायम् । तथा “अह्नां दिवसानां "केतुः प्रज्ञापकः प्रतिपदादीनां तिथीनां चन्द्रकलाहासवृद्ध्यधीनत्वात् । तादृशश्चन्द्रमाः “उषसां प्रभातीनाम् "अग्रम् “एति। एतत्कृष्णपक्षान्ताभिप्रायम् । केचनैतं पादमादित्यदैवत्यमाहुः । तस्मिन् पक्षेऽह्नां केतुत्वमुषसामग्रगतिश्च प्रसिद्धे । "देवेभ्यः "भागं हविर्भागं “वि “दधाति करोति उभयपक्षान्ते । किं कुर्वन् । “आयन प्रतिदिनं हासवृद्ध्या पक्षान्तमभिगच्छन्। एतदर्धमासाभिप्रायम्। "चन्द्रमाः उक्तलक्षणो देवः "दीर्घमायुः “तिरते वर्धयति ॥



सुऽकिंशुकम् । शल्मलिम् । विश्वऽरूपम् । हिरण्यऽवर्णम् । सुऽवृतम् । सुऽचक्रम् ।आ। रोह। सूर्ये । अमृतस्य । लोकम् । स्योनम् । पत्ये । वहतुम् । कृणुष्व ॥ २० ॥

“सुकिंशुकं शोभनकिंशुकवृक्षनिर्मितं तथा “शल्मलिं शल्मलिवृक्षनिर्मितं "विश्वरूपं नानारूपं हिरण्यवर्णं हितरमणीयवर्णं हिरण्यालंकारयुक्तं वा "सुवृतं सुष्ठुवर्तनं "सुचक्रं शोभनचक्रोपेतं रथं हे "सूर्ये “आ “रोह । अमृतस्य लोकं स्थानं "स्योनं सुखकरं "पत्ये सोमाय "वहतुं वहनमात्मनः प्रापणं "कृणुष्व कुरुष्व । अत्र निरुक्तं (१२. ८) द्रष्टव्यम् ॥२३॥



उत् । ईर्ष्व । अतः । पतिऽवती । हि । एषा । विश्वऽवसुम् । नमसा । गी:ऽभिः । ईळे।अन्याम् । इच्छ । पितृऽसदम् । विऽअक्ताम् । सः । ते । भागः । जनुषा । तस्य । विद्धि ॥२१॥

आभिर्नृणां विवाहः स्तूयते । हे विश्वावसो "अतः स्थानात् कन्यासमीपात् "उदीर्ष्व उत्तिष्ठ । यतः “एषा कन्या “पतिवती “हि संजाता अत उदीर्ष्वेति वा अतःशब्दो योज्यः । "विश्वावसुम् एतन्नामानं गन्धर्वं नमसा नमस्कारेण “गीर्भिः स्तुतिभिश्च “ईळे स्तौमि । तर्ह्येनां विहाय कां स्वीकरोमीति यदि ब्रूषे तर्हि "अन्यां "पितृषदं पितृकुले स्थितां “व्यक्ताम् अनूढेति परिस्फुटां विगताञ्जनां वा । स्तनोद्ग-- मादिराहित्येनाप्रौढामित्यर्थः । "सः तादृशः पदार्थः "ते तव “भागः कल्पितः । "तस्य तं भागं “विद्धि जानीहि "जनुषा जन्मना । लभस्वेत्यर्थः ॥



उत् । ईर्ष्व । अतः । विश्ववसो इति विश्वऽवसो । नमसा । ईळामहे । त्वा ।।अन्याम् । इच्छ। प्रऽफर्व्यम् । सम् । जायाम् । पत्या । सृज ॥२२ ॥

“अतः अस्माच्छयनात् हे "विश्वावसो कन्यास्वामिन् गन्धर्व “उदीर्ष्व उद्गच्छ। ‘ईर गतौ ' । आदादिकः । अनुदात्तेत् । तस्य लोटि रूपम् । विश्वावसुर्नाम गन्धर्वः कन्यानामधिपतिर्यतः । लभामि तेन कन्याम्' इति हि मन्त्रः । तादृश देव त्वां "नमसा नमस्कारेण ईळामहे स्तुमः । स त्वम् "अन्यां "प्रफर्व्यं बृहन्नितम्बां कन्याम् इच्छ। "जायां मां “पत्या सह पुनः "सं "सृज ॥



अनृक्षराः । ऋजवः । सन्तु। पन्थाः । येभिः । सखायः । यन्ति । नः । वरेऽयम् ।सम् । अर्यमा । सम् । भगः । नः । निनीयात् ।। सम् । जापत्यम् । सुऽयमम् । अस्तु । देवाः ॥ २३ ॥

हे देवाः "पन्थाः पन्थानो मार्गाः अनृक्षराः । ऋक्षरः कण्टक उच्यते । कण्टकरहिताः “ऋजवः अकुटिलाश्च "सन्तु "येभिः यैः पथिभिः "नः अस्माकं “सखायः वरप्रेषिताः “वरेयं वरैर्याचितव्यं पितरं प्रति “यन्ति गच्छन्ति ते पन्था इति । किंच “अर्यमा देवः “नः अस्मान् “सं “निनीयात् सम्यक् प्रापयेत् । तथा भगः देवः "सं निनीयात् । हे "देवाः आसंगतमस्तु पतिकुलमिति शेषः । तथेदं "जास्पत्यं जायापत्योर्युगलं "सुयममस्तु सुमिथुनमस्तु ॥


पत्न्या योक्त्रविमोचने ‘प्र त्वा मुञ्चामि' इत्येषा । सूत्रितं च– अथास्या योक्त्रं विचृतेत्प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशात् ' ( आश्व. श्रौ. १. ११ ) इति ॥


प्र । त्वा । मुञ्चामि । वरुणस्य । पाशात् । येन । त्वा । अबध्नात् । सविता । सुऽशेवः ।ऋतस्य । योनौ । सुऽकृतस्य । लोके । अरिष्टाम् । त्वा । सह । पत्या । दधामि ।। २४ ।।

जातं प्राणिनं सवित्रा प्रेरितो वरुण आत्मपाशैर्बध्नाति । तस्मात् “वरुणस्य “पाशात् हे वधु “त्वा त्वां “प्र “मुञ्चामि “येन पाशेन “त्वा त्वां “सविता वरुणस्य प्रेरकः “सुशेवः सुसुखः “अबध्नात् बन्धनं कृतवान् । यज्ञविनियोगपक्षे पत्नीं योक्त्रेण बध्नाति । बन्धनस्य वरुणोऽभिमानी। अतो वरुणपाशयोक्त्रात्प्र मुञ्चामि येन योक्त्रेण सविता कर्मणामनुज्ञाता देव ऋत्विक्पाशेनाबध्नात् । तं मोचयित्वा च "ऋतस्य यज्ञस्य “योनौ स्थाने यागभूमौ "सुकृतस्य “लोके कर्मक्षेत्रे भूलोके च “अरिष्टाम् अहिंसितां त्वां पुत्राद्यर्थं “पत्या “सह “दधामि स्थापयामि ॥



प्र । इतः । मुञ्चामि । न । अमुतः । सुऽबद्धाम् । अमुतः । करम् ।यथा । इयम् । इन्द्र । मीढ्वः । सुऽपुत्रा । सुऽभगा । असति ॥ २५ ॥

“इतः पितृकुलात् “प्र “मुञ्चामि त्वां “नामुतः भर्तृगृहात्प्रमुञ्चामि । “अमुतः भर्तृगृहे "सुबद्धां “करम् । “यथेयं कन्या हे “इन्द्र “मीढ़्वः सेक्तः “सुपुत्रा “सुभगा सुष्ठुभाग्या वा “असति भवति तथा कुरु ॥ ॥ २४ ॥


विवाहानन्तरभाविनि प्रयाणे ‘पूषा त्वेतो नयतु' इत्यनया रथादियानमारोहयेत् । सूत्रितं च- पूषा त्वेतो नयतु हस्तगृह्येति यानमारोहयेत्' (आश्व. गृ. १. ८. १ ) इति ॥


पूषा । त्वा । इतः । नयतु । हस्तऽगृह्य । अश्विना । त्वा । प्र । वहताम् । रथेन ।गृहान् । गच्छ । गृहऽपत्नी । यथा । असः । वशिनी । त्वम् । विदथम् । आ। वदासि॥२६॥

“हस्तगृह्य ग्राह्यहस्तः पूषा “त्वा त्वाम् इतः “नयतु प्रापयतु । “अश्विना अश्विनौ “त्वा त्वां “रथेन “प्र “वहतां प्रगमयताम् । “गृहान् भर्तृसंबन्धिनः “गच्छ त्वं “गृहपत्नी “यथासः भवसि स्वगृहस्वामिनी भवसि । “वशिनी सर्वेषां गृहगतानां वंशं प्रापयित्री पत्युर्वशे वर्तमाना वा “विदथं पतिगृहम् “आ “वदासि आवदसि । गृहस्थितं भृत्यादिजनमावद ‘इह प्रियम्' इत्येषा वध्वा गृहप्रवेशनी । सूत्रितं च-’इह प्रियं प्रजया ते समृध्यतामिति गृहं प्रवेशयेत्' (आश्व. गृ. १. ८. ८) इति ॥


इह । प्रियम् । प्रऽजया । ते । सम् । ऋध्यताम् । अस्मिन् । गृहे । गार्हऽपत्याय । जागृहि ।एना। पत्या । तन्वम् । सम् । सृजस्व । अध । जिव्री इति । विदथम् । आ । वदाथः ॥२७॥

हे वधु “ते तव “इह अस्मिन् पतिकुले “प्रियं “प्रजया सह "समृध्यताम् । “अस्मिन्गृहे “गार्हपत्याय गृहपतित्वाय “जागृहि बुध्यस्व। “एना अनेन “पत्या सह “तन्वं स्वीयं शरीरं “सं “सृजस्व । संसृष्टा भव । “अध अथ "जिव्री जीर्णौ जायापती युवां “विदथं गृहम् आ “वदाथः आभिमुख्येन वदतम् ।।



नीललोहितम् । भवति । कृत्या । आसक्तिः । वि । अज्यते ।एधन्ते । अस्याः । ज्ञातयः । पतिः । बन्धेषु । बध्यते ॥ २८ ॥

“कृत्या अभिचाराभिमानिनी देवता “नीललोहितं भवति । नीलं च लोहितं च तस्या रूपं भवतीत्यर्थः । सा कृत्या “आसक्तिः आसक्तास्यां संबद्धा “व्यज्यते । त्यज्यत इत्यर्थः । तस्यां कृत्यायामपगतायाम् “अस्याः वध्वाः "ज्ञातयः “एधन्ते वर्धन्ते । पतिः च “बन्धेषु सांसारिकेषु "बध्यते ॥


परा । देहि । शामुल्यम् । ब्रह्मऽभ्यः । वि । भज । वसु ।कृत्या । एषा । पत्ऽवती । भूत्वी । आ । जाया। विशते । पतिम् ॥ २९ ॥

“शामुल्यम् । शामलमित्यर्थः । शमलं शरीरं मलम् । शरीरावच्छन्नस्य मलस्य धारकं वस्त्रं “परा “देहि परात्यज । धृतप्रायश्चित्तार्थं “ब्रह्मभ्यः ब्राह्मणेभ्यः "वसु धनं “वि “भज प्रयच्छेत्यर्थः । किमर्थं वधूवासः परित्याग इति चेत् उच्यते । “एषा “कृत्या “पद्वती पदवती सती "जाया “भूत्वी भूत्वा “पतिं “विशते । कृत्यारूपवासःप्रवेशात् कृत्या जाया भूत्वा विशत इत्युपचर्यते । अतस्तत्परित्यागे कृत्यैव त्यक्ता भवतीत्यर्थः । यदि वधूवासः स्वयं निधत्ते तदैवं भवतीति वधूवासःसंस्पर्शनं निन्दायुक्तम् ॥



अश्रीरा । तनूः । भवति । रुशती । पापया । अमुया ।।पतिः । यत् । वध्वः । वाससा । स्वम् । अङ्गम् । अभिऽधित्सते ॥ ३० ॥

अत्रापि वधूवासःसंस्पर्शनिन्दोच्यते । “तनूः वरस्य संबन्धिनी अश्रीराः अश्रीका “भवति । कथं स्याच्चेदिति उच्यते । “रुशती । रुशदिति वर्णनाम । दीप्तया "अमुया अनया "पापया पापरूपया कृत्यया युक्ता चेत्तनूः । तदेवाह । “पतिर्यत् यदि “वध्वो “वाससा “स्वमङ्गमभिधित्सते परिधातुमिच्छति ॥ ॥ २५ ॥



ये । वध्वः । चन्द्रम् । वहतुम् । यक्ष्माः । यन्ति । जनात् । अनु ।पुनरिति । तान् । यज्ञियाः । देवाः । नयन्तु । यतः । आऽगताः ॥ ३१ ॥

“वध्वश्चन्द्रं हिरण्यरूपं “वहतुं “ये यक्ष्माः व्याधयः “अनु “यन्ति प्राप्नुवन्ति “जनात् अस्मद्विरोधिनः सकाशात् । यद्वा । जनाद्यमाख्यात् । “तान “पुनः “नयन्तु प्रापयन्तु “यज्ञियाः यज्ञार्हाः "देवाः इन्द्रादयः । “यत “आगताः यस्मात्ते यक्ष्मा आगतास्तत्र तान्नयन्तु ॥

वध्वाः प्रयाणे ‘मा विदन्' इत्येषा जप्या। सूत्रितं च-’कल्याणेषु देशवृक्षचतुष्पथेषु मा विदन् परिपन्थिन इति जपेत ' ( आश्व. गृ. १. ८. ६ ) इति ॥


मा । विदन् । परिऽपन्थिनः । ये । आऽसीदन्ति । दंपती इति दम्ऽपती ।सुऽगेभिः । दुःऽगम् । अति । इताम् । अप । द्रान्तु । अरातयः ॥ ३२ ॥

“परिपन्थिनः पर्यवस्थातारः शत्रवः “मा “विदन् मा प्रापयन् ये “परिपन्थिनः “दंपती “आसीदन्ति अभिगच्छन्ति । "सुगेभिः सुगैर्मार्गैः "दुर्गं दुःखेन गन्तुं शक्यं दुर्गमं देशम् “अतीतां अतिगच्छताम्। “अरातयः अदातारः शत्रवः “अप "द्रान्तु अपगच्छन्तु ॥



सुऽमङ्गलीः । इयम् । वधूः । इमाम् । सम्ऽएत । पश्यत ।सौभाग्यम् । अस्यै । दत्त्वाय । अथ । अस्तम् । वि । परा । इतन ॥ ३३ ॥

“इयं “वधूः “सुमङ्गलीः शोभनमङ्गला । अतः “इमां सर्वं आशीःकर्तारः “समेत संगच्छत । तां “पश्यत च । तां संगताश्च दृष्ट्वा “अस्यै ऊढायै सौभाग्यं “दत्वाय दत्त्वा “अथ “अस्तम् । गृहनामैतत् । स्वस्वसंबन्धिनं “वि “परेतन विविधं परागच्छत ॥



तृष्टम् । एतत् । कटुकम् । एतत् । अपाष्ठऽवत् । विषऽवत् । न । एतत् । अत्तवे ।सूर्याम् । यः । ब्रह्मा । विद्यात् । सः । इत् । वाधूऽयम् । अर्हति ।। ३४ ।।

अनयापि वधूवस्त्रपरित्यागः प्रतिपाद्यते । एतत् वस्त्रं “तृष्टं दाहजनकम् । तथा “एतत् “कटुकम् । तथा “अपाष्ठवत् । अपाष्ठमपस्थितमृजीषम् । तद्वत् । तथा “विषवत् । “नैतत् वस्त्रम् “अत्तवे अत्तव्यम् । अनुपयोग्यम्। “यो “ब्रह्मा ब्राह्मणः “सूर्याम् इदानीं प्रस्तुतां देवीं “विद्यात् सम्यग्जानीयात् “स “इत् स एव “वाधूयं वधूवस्त्रम् “अर्हति।।



आऽशसनम् । विऽशसनम् । अथो इति । अधिऽविकर्तनम् ।।सूर्यायाः । पश्य । रूपाणि । तानि । ब्रह्मा । तु । शुन्धति ।। ३५ ।।

“आशसनं तूषाधानम्। तच्चान्यवर्णं भवति । “विशसनं शिरसि निधीयमानम् । तादृशं दशान्ते निधीयमानम् “अधिविकर्तनं यत्त्रिधा वासो विकृन्तन्ति । तान्याशसनादीनि वासांस्यवस्थितानि “सूर्यायाः "रूपाणि भवन्ति । तानि “पश्य। एवंभूतान्याशसनादीनि पुरा सूर्यास्वशरीरे स्थितान्यमङ्गलानि वासांसि विधत्ते । “तानि रूपाणि सूर्यावित् “ब्रह्मा “तु ब्राह्मण एव तस्माद्वाससः सकाशात् “शुन्धति अपनयति ॥ ॥ २६ ॥


विवाहे कन्याहस्तग्रहणे 'गृभ्णामि' इत्येषा । सूत्रितं च--- गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तमित्यङ्गुष्ठमेव गृह्णीयात् ' ( आश्व. गृ. १. ७. ३) इति ॥


गृभ्णामि । ते। सौभगऽत्वाय । हस्तम् । मया । पत्या । जरत्ऽअष्टिः । यथा । असः ।भगः । अर्यमा । सविता । पुरम्ऽधिः । मह्यम् । त्वा । अदुः । गार्हऽपत्याय । देवाः ॥३६॥

हे वधु "ते तव “हस्तम् अहं “गृभ्णामि गृह्णामि । किमर्थम् । “सौभगत्वाय सौभाग्याय । “मया “पत्या त्वं यथा "जरदष्टिः प्राप्तवार्धक्या “असः भवसि । “भगो “अर्यमा “सविता “पुरंधिः पूषा एते "देवाः “त्वा त्वां “मह्यम् अदुः दत्तवन्तः। किमर्थम् । “गार्हपत्याय । यथाहं गृहपतिः स्यामिति॥



ताम् । पूषन् । शिवऽतमाम् । आ । ईरयस्व । यस्याम् । बीजम् । मनुष्याः । वपन्ति ।या। नः । ऊरू इति । उशती । विऽश्रयते । यस्याम् । उशन्तः । प्रऽहराम । शेपम् ॥३७॥

हे "पूषन् पोषकैतन्नामक देव "शिवतमाम् अत्यन्तमङ्गलभूतां "ताम् “एरयस्व आ ईरय सर्वतः प्रेरय । “यस्याम् ऊरौ "बीजं रेतोलक्षणं "मनुष्या “वपन्ति आदधते । “या “नः अस्माकम् “ऊरू “उशती कामयमाना “विश्रयाते । “यस्याम् ऊरौ "उशन्तः कामयमाना वयं “शेपं स्पर्शनयोग्यं पुंस्प्रजननं “प्रहराम । ऊरौ व्यञ्जनसंबन्धं करवामेत्यर्थः ॥



तुभ्यम् । अग्रे । परि । अवहन् । सूर्याम् । वहतुना । सह ।।पुनरिति । पतिऽभ्यः । जायाम् । दाः । अग्ने । प्रऽजया । सह ॥ ३८ ॥

गन्धर्वा हे अग्ने "तुभ्यमग्ने "पर्यवहन् । प्रायच्छन्नित्यर्थः । काम् । "सूर्याम् । केन सह । “वहतुना “सह । त्वं च तां सूर्यां वहतुना सह सोमाय प्रायच्छः । तद्वदिदानीमपि हे अग्ने “पुनः "पतिभ्यः अस्मभ्यं "जायां "प्रजया "सह "दाः देहि 



पुनरिति । पत्नीम्। अग्निः । अदात् । आयुषा । सह । वर्चसा ।दीर्घऽआयुः । अस्याः । यः । पतिः । जीवति । शरदः । शतम् ॥ ३९ ॥

“पुनः स्वगृहीतां "पत्नीम् "अग्निः "आयुषा “सह वर्चसा सह “अदात् प्रायच्छत् ।। "अस्याः अग्निदत्तायाः "यः "पतिः पुमान् सः "दीर्घायुः सन् "शरदः "शतं शतसंवत्सरं "जीवाति जीवतु ॥



सोमः । प्रथमः । विविदे। गन्धर्वः । विविदे। उत्तरः ।तृतीयः । अग्निः । ते। पतिः । तुरीयः । ते । मनुष्यऽजाः ॥ ४० ॥

जातां कन्यां "सोमः प्रथमभावी सन् "विविदे लब्धवान् । "गन्धर्वः "उत्तरः सन् "विविदे लब्धवान् । "अग्निः "तृतीयः "पतिः “ते तव । पश्चात् "मनुष्यजाः पतिः “तुरीयः चतुर्थः ॥ ॥२७॥



सोमः । ददत् । गन्धर्वाय । गन्धर्वः । ददत् । अग्नये ।रयिम् । च । पुत्रान् । च । अदात् । अग्निः । मह्यम् । अथो इति । इमाम् ॥ ४१ ॥

“सोमः "गन्धर्वाय प्रथमं "ददत् प्रादात् । "गन्धर्वः "अग्नये प्रादात् । "अथो अपि च "अग्निः “इमां कन्यां "रयिं धनं “पुत्रांश्च "मह्यम् अदात् ॥



इह । एव । स्तम्। मा । वि । यौष्टम् । विश्वम् । आयुः । वि। अश्नुतम् ।क्रीळन्तौ । पुत्रैः । नप्तृऽभिः । मोदमानौ । स्वे । गृहे ॥ ४२ ॥

“इहैव "स्तम् इहैवास्मिँल्लोके स्तं भवतम् । “मा "वियौष्टं मा पृथग्भूतम् । विश्वमायुर्व्यश्नुतं प्राप्नुतम् । किंच “पुत्रैर्नप्तृभिः पौत्रैः सह "स्वे "गृहे "मोदमानौ भवतमिति शेषः ॥


गृहप्रवेशे ‘आ नः प्रजां जनयतु ' इत्याद्याश्चतस्रो होमार्थाः । सूत्रितं च-’आ नः प्रजां जनयतु प्रजापतिरिति चतसृभिः प्रत्यृचं हुत्वा' (आश्व. गृ. १. ८. ९) इति ॥


आ । नः । प्रऽजाम् । जनयतु । प्रजाऽपतिः । आऽजरसाय । सम् । अनक्तु । अर्यमा ।अदुःऽमङ्गलीः । पतिऽलोकम् । आ। विश। शम्। नः । भव । द्विऽपदे । शम् । चतु:ऽपदे॥४३॥

“प्रजापतिः देवः नः अस्माकं "प्रजाम् आ “जनयतु । "अर्यमा च "आजरसाय जरापर्यन्तं जीवनाय "समनक्तु संगमयतु । सा त्वम् "अदुर्मङ्गलीः दुर्मङ्गलरहिता सुमङ्गली। यद्वा । या मङ्गलाचारान् दूषयति सा दुर्मङ्गली । ततोऽन्या अदुर्मङ्गली । तादृशी सती “पतिलोकं पतिसमीपम् "आ “विश प्राप्नुहि । "नः अस्माकं “द्विपदे “शं "भव । तथा च "शं चतुष्पदे भव ॥ ।



अघोरऽचक्षुः । अपतिऽघ्नी । एधि । शिवा । पशुऽभ्यः । सुऽमनाः । सुऽवर्चाः ।वीरऽसूः । देवऽकामा । स्योना । शम् । नः । भव । द्विऽपदे । शम्। चतुःऽपदे ।। ४४ ॥

हे वधु “त्वम् "अघोरचक्षुः क्रोधादभयंकरचक्षुः “एधि भव । तथा "अपतिघ्नी भव । तथा “पशुभ्यः "शिवा हितकरी भव "सुमनाः "सुवर्चाः च भव । वीरसूः पुत्राणामेव प्रसवित्री “देवकामा "स्योना सुखकरा च भव ॥



इमाम् । त्वम् । इन्द्र । मीढ्वः । सुऽपुत्राम् । सुऽभगाम् । कृणु।दश । अस्याम् । पुत्रान् । आ । धेहि । पतिम् । एकादशम् । कृधि ॥ ४५ ॥

हे इन्द्र “त्वम् "इमां वधूं "सुपुत्रां सुभगां च कृणु कृधि । अस्यां वध्वां "दश पुत्रान् “आ “धेहि । “पतिमेकादशं "कृधि । दश पुत्राः पतिरेकादशो यथा स्यात्तथा कृधि कृणु ॥



सम्ऽराज्ञी । श्वशुरे । भव । सम्ऽराज्ञी । श्वश्र्वाम् । भव ।ननान्दरि । सम्ऽराज्ञी । भव । सम्ऽराज्ञी । अधि । देवृषु ॥ ४६॥

हे वधु श्वशुरादिषु त्वं "सम्राज्ञी “भव। "देवृषु । देवरेष्वित्यर्थः ॥

‘समञ्जन्तु ' इत्येषा वरस्य दधिप्राशने वधूवरयोर्हृदयस्पर्शने वा विनियुक्ता। तथा च सूत्रितं - समञ्जन्तु विश्वे देवा इति दध्नः प्राश्य प्रतिप्रयच्छेदाज्यशेषेण वानक्ति हृदये' (आश्व. गृ. १. ८. ९) इति ॥


सम् । अञ्जन्तु। विश्वे । देवाः । सम्। आपः । हृदयानि । नौ।सम् । मातरिश्वा। सम् । धाता। सम् । ॐ इति । देष्ट्री । दधातु । नौ ।। ४७ ॥

“विश्वे "देवाः सर्वे देवाः "नौ "हृदयानि मानसानि "समञ्जन्तु सम्यगञ्जन्तु । अपगतदुःखादिक्लेशानि कृत्वा लौकिकवैदिकविषयेषु प्रकाशयुक्तानि कुर्वन्त्वित्यर्थः। “आपः च “सम् अञ्जन्तु । तथा "मातरिश्वा नौ हृदयानि "सं "दधातु । आवयोर्बुद्धीः परस्परानुकूलाः करोत्वित्यर्थः । “धाता च “सं दधातु । “देष्ट्री दात्री फलानाम् । सरस्वतीत्यर्थः । सा च "सं दधातु संधानं करोतु ॥ ॥२८॥

वेदार्थस्य प्रकाशेन तमो हार्दं निवारयन् ।पुमर्थांश्चतुरो देयाद्विद्यातीर्थमहेश्वरः ॥

इति श्रीमद्राजाधिराजपरमेश्वरवैदिकमार्गप्रवर्तकश्रीवीरबुक्कभूपालसाम्राज्यधुरंधरेण सायणाचार्येण विरचिते माधवीये वेदार्थप्रकाश ऋक्संहिताभाष्येऽष्टमाष्टके तृतीयोऽध्यायः ॥

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स्मृतियों का विधान था , कि ब्राह्मण व्यभिचारी होने पर भी पूज्य है । क्योंकि वह जन्म से ब्राह्मण है इसलिए _______________________________और शूद्र जितेन्द्रीय होने पर भी पूज्य नहीं है। क्योंकि कौन दोष-पूर्ण अंगों वाली गाय को छोड़कर, शील वती गधी को कौन दुहेगा ? 

 "दु:शीलोSपि द्विज पूजयेत् न शूद्रो विजितेन्द्रीय: क: परीत्ख्य दुष्टांगा दुहेत् शीलवतीं खरीम् ।।१९२।।.

 ( पराशर स्मृति ) 

महाभारत में वर्णन है कि ब्राह्मण विद्या हीन होने पर भी देवता के समान और परम पवित्र पात्र माना गया है। फिर जो विद्वान है उसके लिए तो कहना ही क्या वह महान देवता के समान है और भरे हुए महासागर के समान सदगुण संपन्न है👇
(महाभारत अनुशासनपर्व के दानधर्मपर्व) पृष्ठ संख्या -6056..
अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत्।
प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ।21।

शूद्रेषु दास गोपाल कुल मित्रार्द्ध सीरिण:। भोज्यान्न नापितस्यश्चैव यश्चात्मानं निवेदयेत्।16। (याज्ञवल्क्य -स्मृति) गर्भ -दास , गायों का पालन करने वाला गोप कुल का मित्र, खेती में सामी, नई और जो मन वाणी तथा शरीर द्वारा अपने आपको निवेदन कर चुका हो! शूद्र होते हुए भी इन छ: का अन्न खाने योग्य होता है।16। व्यास-स्मृति में वर्णन हा कि 👇 ब्राह्मण्यां शूद्र जनितश्चचाण्डालस्त्रिविधि: स्मृत:। वर्द्धकी नापितो गोप: आशाप: कुम्भकारक:।10। वणिक् किरातकायस्थमालाकार कुटुम्बिन:। एते चान्ये च बहव शूद्रा भिन्न: स्वकर्मभि:। चर्मकारो भटो भिल्लो रजक: पुष्करो नट: । वरटोमेदचण्डालदास(श)स्वपचकोलका:।11 एते८न्यजा समाख्याता ये चान्ये च गवार्शना 12। (व्यास-स्मृति) बड़ाई ,नाई ,गोप अाशाप , कुम्भकारक वणिक, किरात कायस्थ और माली कुटुम्बिन यह सब अपने कर्मों से भिन्न बहुत से शूद्र होते हैं:- चमार ,भट्ट ,भील, धोबी पुष्कर नॉट वर्क विद चांडाल दास स्वच्छ और कुल यह सब अंतेज कहे जाते हैं ! और जो गोमांस भक्षक हैं वह भी अन्त्यज होते हैं


 👇 माङ्गल्यं ब्राह्मणस्य बलवत् क्षत्रियस्य धनोपेतं वैश्यस्य। जुगुप्सितं शूद्रस्य ( विष्णु -स्मृति)

 👇 ब्राह्मण का नाम मांगलिक अर्थ का सूचक होना चाहिए और क्षत्रिय का बल वत्ता सूचक वैश्य का धनयुक्तता सूचक और शूद्र का घृणा सूचक होना चाहिए! _________________________________________

 ब्राह्मण को कभी भी शूद्रा स्त्री को धर्मार्थ में संलग्न नहीं रखना चाहिए वह तो केवल का कामान्ध ब्राह्मण को रति प्रदान करने के लिए होती है👇

 द्विजस्य भार्या शूद्रा धर्म्मार्थे न भवेत् क्वचित् रत्यर्थ नैव सा यस्य रागान्धस्य प्रकीर्तिता। ( विष्णु-स्मृति) 

26/5 द्विजस्य।भार्याशूद्रा।तु।धर्मार्थम्।न।क्वचिद्
भवेत्रत्य्अर्थम्।भवेत्।रति।अर्थं।एव।सा 
तस्य।रागान्धस्य।प्रकीर्तिता ।।

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बाल्ययौवनबार्द्धकेष्वपि पितृभर्तृपुत्राधीना ।      मृते भर्त्तरिब्रह्मचर्य्य तदन्वाअग्नीरोहणं वा। (विष्णु-स्मृति) 

बालावस्था ,युवावस्था तथा वृद्धावस्था में भी क्रमश पिता, भर्ता और पुत्रों की अधीनता मैं रहना स्त्रियों का धर्म है । 

अपने स्वामी के मर जाने पर ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन अथवा उसके साथ चिता पर अारोहण करना स्त्री का परम धर्म है। ______________________________________

 अथ ब्राह्मणसं वर्णानुक्रमेण चतस्रो भार्य्या भवन्ति तिस्रा क्षत्रियस्य द्वे वैश्यस्य ।

 (विष्णु-स्मृति) 

ब्राह्मण की वर्णों के अनुक्रम से चार स्त्रियां होती हैं यानी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र तथा क्षेत्रीय की तीन स्त्रियां होती हैं स्वयं क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र और वैश्य की दो वैश्य और शूद्रा ।            तथा शूद्र की एक ही पत्नी होती है केवल शूद्र। 

तिस्त्रो ब्राह्मणस्य भार्य्या वर्णानुपूर्व्येण।               द्वे राजन्यस्य एकैका वैश्यशूद्रयो:24। 

(वशिष्ठ -स्मृति) 

ब्राह्मण की वर्णानुपूर्वी रूप से तीन पत्नियां होती हैं। क्षत्रिय की दो पत्नियां होती हैं अर्थात ब्राह्मण की पत्नियां हुईं क्षत्रिय और वैश्य कन्या से ब्राह्मण विवाह कर सकता है और क्षत्रिय स्वयं क्षत्रिय तथा वैश्य की कन्या से और वैश्य और शूद्र की एक एक ही पत्नियां होती है यही वैश्य और शूद्र की एक एक बार होती है कुछ पुरोहितों के मतानुसार वैश्य कि एक शुद्र वर्ण की भार्या होती है किन्तु मन्त्र वर्जित।

अधिकतर स्मृतियों की रचना पुराणों के पश्चात् हुई शान्तातप -स्मृति की रचना हरिवंश पुराण के बाद हुई।

 वासुदेव जगन्नाथसर्वभूताशयस्थित: । पातकार्णवमग्नं मां तारय प्रणतार्तिहृत्।55। 

हे वासुदेव हे जगत के स्वामी हे प्रणतों को पीड़ा का नाश करने वाले ,समस्त प्राणियों के अंतःकरण में विराजमान पापों की सागर में निमग्न मेरा उद्धार करो।

 ब्राह्मणोद्वाहनञ्चैव कर्तव्यं तेन शुद्धये श्रवणं हरिवंशस्य कर्तव्यञ्च यथाविधि।।61। 

इस पाप से छुटकारा पाने के लिए किसी ब्राह्मण का उद् वाहन करना चाहिए और विधि पूर्वक "हरिवंश पुराण" का श्रवण करना चाहिए।61। 

आपस्तम्बः -स्मृति द्वितीय अध्याय। 

कारूहस्तगतं पुण्यं यच्च प्रामाद्विनि: स्तनम । स्त्रीबालवृद्धाचरितं प्रत्यक्षाद्दृष्ममेव च ।1।

 शिल्पी के हाथ गई हुई वस्तु पवित्र मानी जाती है और जो पात्र व्यायाम से निकली हुई हो वह भी पवित्र है इस्त्री वाला कोई व्यक्ति के द्वारा जो कुछ किया जावे और पवित्र हैं जो प्रत्यक्ष में अपनी आंखों से नहीं देखी जाए वह भी पवित्र मानी जाती है।

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 "न दुष्येत् सन्तता धारा वाताद्धृताश्च रैणव:। स्त्रीयो वृद्धाश्च बालाश्च न दुष्यति कदाचन।3। 

निरंतर बहने वाली धारा दूषित नहीं होती है और वायु द्वारा उठाए गए रेणुका भी दूषित नहीं माने जाते स्त्री बालक वृद्ध कभी भी दूषित नहीं होते हैं।3।

 आपने सही अपना वस्त्र ,जाया ,संतति और अखंड अन्न यह सब अपनी तो शुद्ध होते हैं और यह दूसरों के अशुद्ध कहीं गए हैं।

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