रविवार, 26 मार्च 2023

राधा तत्व भक्ति मूलक"


राधा का वेदों में वर्णन --
राधा तत्वामृत
राधा ---व्युत्पत्ति व उदभव----
राधा एक कल्पना है या वास्तविक चरित्र, यह सदियों से तर्कशील व्यक्तियों विज्ञजनों के मन में प्रश्न बनकर उठता रहा है|

अधिकाँशतः जन राधा के चरित्र को काल्पनिक एवं पौराणिक काल में रचा गया मानते हैं | 

कुछ विद्वानों के अनुसार कृष्ण की आराधिका का ही रुप राधा हैं।
आराधिका शब्द में से "आ" उपसर्ग हटा देने से राधिका बनता है। 
कुछ भी सही परम्परागत रूप से कृष्ण चरित्र का सहचरी रूप है राधा।
यदि शास्त्र कृष्ण का वर्णन करते हैं तो राधा का भी वर्णन करते ही हैं । भले ही एक दो ग्रन्थ या पुराण राधा का वर्णन करना भूल गये हों। परन्तु राधा के अस्तित्व को खारिज नहीं किया जा सकता है।

राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था। 
यहाँ राधा का मंदिर भी है। 
राधारानी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है।
साझा जी का जहाँ जहाँ पदार्पण हुआ वह स्थान तीर्थ बन गया।
यह आश्चर्य की बात हे कि राधा-कृष्ण की इतनी अभिन्नता होते हुए भी महाभारत या भागवत पुराण में राधा का नामोल्लेख नहीं मिलता, यद्यपि कृष्ण की एक प्रिय सखी का संकेत अवश्य मिलता है। 
हो सकता है उस समय राधा के साहचर्य की तत्कालीन लेखकों को आवश्यकता न हुई हो।

राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया। 
कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेम-भाव में और भी वृद्धि हुई। 'परन्तु यह प्रेम लौकिक प्रेम नहीं था यह अलौकिक प्रेम था  बिल्कुल सूफीयों जैसा लौकिक प्रेम  जो वासना समन्वित है।

"अलौकिक प्रेम वैराग्य और त्याग  समन्वित है।
परन्तु लौकिक दृष्टि से अवलोकन करने वाले तो केवल वासना जन्य प्रेम ही वर्णन कर सकते हैं।
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राधा और कृष्ण का मिलन अनेक बार हुआ उग्रसेन के राजसूय यज्ञ के अवसर पर भी वृन्दावन में राधा कृष्ण को लौकिक मिलन हुआ था।
दोनों का पुनर्मिलन कुरूक्षेत्र में भी  बताया जाता है जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृन्दावन से नंद, राधा आदि गए थे। 
'परन्तु भारतीय पुरोहितों' ने भी कृष्ण चरित्र को जन किंवदंतियों से ग्रहण कर अपने अपने भाव प्रवृत्तियों के अनुरूप वर्णित व चित्रित  किया है। 
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यहाँ पर हम वस्तुतः राधा शब्द व चरित्र कहाँ से आया इस प्रश्न पर कुछ प्रकाशन डालने का प्रयत्न करेंगे | 

भक्ति प्रधान इस देश में श्रीकृष्ण (श्री राधाजी व श्री कृष्ण ) स्वयं ही ब्रह्म व आदि-शक्ति रूप माने जाते हैं।
राधा का चरित्र-वर्णन, श्रीमदभागवत में स्पष्ट नहीं मिलता ....
वेद-उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है।
ऐसा आर्य्य समाजी मानते हैं । परन्तु राधिकोपनिषद् इस बात का साक्ष्य है कि राधा उपनिषदों का भी वर्ण्य विषय रही हैं।
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आर्य्य समाजी तो वेदों की व्याख्या अपने धातुज या योगज शब्दों के अर्थ रूप में करते हैं ।
जो अनर्थ मूलक और पूर्व दुराग्रह से ग्रस्त ही हैं ।
शब्द मूल और रूढ़ अर्थ को ये अपने मन्तव्य के अनुरूप खींचकर फिट कर लेते हैं।

राधा-कृष्ण का सांगोपांग वर्णन ‘गीत-गोविन्द’ में मिलता है। 'परन्तु वहाँ भक्ति में श्रृंँगार प्रवाहित है 
'जबकि  राधा भागवत धर्म में भक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं और स्वयं भगवान् भक्ति के अधीन है।
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राधा को दक्षिणी भारतीय आख्यानकों में 
भक्ति की अधिष्ठात्री देवी रूप में स्वीकार किया भी गया है।

तमिलनाडू की गाथा के अनुसार --दक्षिण भारत का अय्यर जाति समूह, उत्तर के यादव के समकक्ष हैं। तमिल भाषा में अय्यर का अर्थ होता है गोपाल होता है ।

एक कथा के अनुसार गोप व ग्वाले ही कंस के अत्याचारों से डर कर दक्षिण तमिलनाडू चले गए थे।
उनके नायक की पुत्री नप्पिंनई से कृष्ण ने विवाह किया --- श्रीकृष्ण ने नप्पिंनई को ७ बैलों को हराकर जीता था।
 तमिल गाथाओं के अनुसार नप्पिनयी नीला देवी का अवतार है जो ऋग्वेद की तैत्रीय संहिता के अनुसार ---श्री सूक्त या अदिति सूक्त या नीला देवी सूक्त में राधा ही हैं।
 जिन्हें अदिति –दिशाओं की देवी भी कहते हैं।
नीला देवी या राधा परमशक्ति की मूल आदि-शक्ति हैं –अदिति .| 

श्री कृष्ण की एक पत्नी कौशल देश की राजकुमारी---नीला भी थी, जो यही नाप्पिनायी ही है जो दक्षिण की राधा है।
नामान्तरण से ये पात्र राधा हैं। और मदुरई ( मथुरा)का रूपान्तरण है।

एक कथा के अनुसार राधा के कुटुंब के लोग ही दक्षिण चले गए अतः नप्पिंनई राधा ही थी | 
भारतीय पुराणों में श्री राध का वर्णन अतिरञ्जना पूर्ण शैली में हुआ है ।

वेदव्यास जी ने श्रीमदभागवत के अलावा १७ और पुराण रचे हैं अथवा उनके अनुयायी सूतों ने रचना की इनमें से छ : में श्री राधा जी का उल्लेख है।
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 यथा राधा प्रिया विष्णो : (पद्मपुराण ) 
श्रीचैतन्य चरितामृत   मध्य लीला    अध्याय 18: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वृन्दावन में भ्रमण    श्लोक 8!

 
मध्य लीला 18.8  
"यथा राधा प्रिया विष्णो स्तस्याःकुण्डं प्रियं तथा ।
सर्व - गोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्त वल्लभा ॥8॥
शब्दार्थ:-
यथा - जैसे; राधा - श्रीमती राधारानी ; प्रिया - प्रिय; विष्णोः - भगवान् कृष्ण की: तस्याः - उनका ; कुण्डम् - कुण्ड, सरोवर ; प्रियम् - अति प्रिय ; तथा - तथा; सर्व - गोपीषु - सभी गोपियों में से ; सा - वह; एव - निस्सन्देह ; एका - अकेली ; विष्णोः - भगवान् कृष्ण की; अत्यन्त - अत्यन्त ; वल्लभा - प्रिया।
अनुवाद:-
“जिस प्रकार श्रीमती राधारानी भगवान् कृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं, उसी प्रकार उनका सरोवर राधाकुण्ड भी उन्हें अत्यधिक प्रिय है। समस्त गोपियों में श्रीमती राधारानी निश्चित रूप से अत्यन्त प्रिय हैं।’
यह पद्म पुराण का श्लोक है।


राधा वामांश सम्भूता महालक्ष्मीर्प्रकीर्तिता (नारद पुराण )
तत्रापि राधिका शाश्वत (आदि पुराण ) 

रुक्मणी द्वारवत्याम् तु  (मत्स्य पुराण १३. ३७ ) 

श्लोक 5.3.198.76 स्कन्द पुराण-

रुक्मिणी द्वारवत्यां तु राधा वृंदावने वने।
देवकी मथुरायां तु पाताले भगवानी॥ 76॥

श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे शूलेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टनवत्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥

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श्लोक 5.77.37

शिवकुंडे शिवानंदा नंदिनी देहिकाटे।
रुक्मिणी द्वारवत्यां तु राधा वृंदावने वने ॥ 37 ॥

श्रीपद्मपुराणे पातालखंडे वृंदावनमाहात्म्ये पार्वतीशिवसंवादे श्रीकृष्णरूपवर्णनंनाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ।७७।

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शिवकुंडे शुभानंद नंदिनी देवीकत्ते।
रुक्मिणी द्वारपाल हैं और राधा वृन्दावन के वन हैं। 69।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण सप्तम: स्कंद: त्रिंशोध्याय 
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कृष्णप्राणाधिदेवी सा तदधीनो विभुर्यतः ।
रासेश्वरी तस्य नित्यं तया हीनो न तिष्ठति ॥ ८॥

राध्नोति सकलात्कामांस्तस्माद्राधेति कीर्तिता ।
अत्रोक्तानां मनूनां च ऋषिरस्याहमेव च ॥ ९॥
इति श्रीदेवीभागवते नवमस्कन्धे पञ्चाशत्तमेऽध्याये
देवी पूजाविधानं समाप्तम् ॥
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"यां गोपीमनयत कृष्णो (श्रीमद भागवतम १०.३०.३५ )
भावार्थ:-
श्री कृष्ण एक गोपी को साथ लेकर अगोचर हो गए। महारास से विलग हो गए। 
गोपी, राधा का एक नाम है|
अन्या आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वर : -(श्रीमद भागवतम )

इस गोपी ने कृष्ण की अनन्य भक्ति (आराधना) की है। इसीलिए कृष्ण उन्हें अपने (संग रखते हैं ) संग ले गए, इसीलिये वही आराधिका राधिका है |

वस्तुतः ऋग्वेदिक व यजुर्वेद व अथर्ववैदिक साहित्य में ’ राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति = रयि (संसार, ऐश्वर्य, श्री, वैभव) +धा (धारक, धारण करने वाली शक्ति) से हुई है।
अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ज्ञान मार्गीकाल में सृष्टि के कर्ता का ब्रह्म व पुरुष, परमात्मा रूप में वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चितशक्ति, ह्लादिनी शक्ति, परमेश्वरी राधा का आविर्भाव हुआ|

भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण कहा गया तो उनकी मूल कृतित्व - काल, कर्म, धर्म व काम के अधिष्ठाता हुए—कालरूप- कृष्ण व उनकी सहोदरी (साथ-साथ उदभूत) राधा-परमेश्वरी कर्म रूप - ब्रह्मा व नियति (सहोदरी).... धर्म रूप-महादेव व श्रद्धा (सहोदरी) .....एवम कामरूप-अनिरुद्ध व उषा ( सहोदरी )---- इस प्रकार राधा परमात्व तत्व कृष्ण की चिर सहचरी,इच्छित-शक्ति (ब्रह्मसंहिता) है। 
वही परवर्ती साहित्य में.... श्रीकृष्ण का लीला-रमण व लौकिक रूप के आविर्भाव के साथ उनकी साथी, प्रेमिका, पत्नी हुई व ब्रजबासिनी रूप में जन-नेत्री। 
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भागवत-पुराण ...मैं जो आराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है 

किसी एक प्रिय गोपी को भगवान श्री कृष्ण महारास के मध्य में लोप होते समय साथ ले गये थे जिसे ’मान ’ होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः यह वही गोपी रही होगी जिसे गीत-गोविन्द के रचयिता विद्यापति व सूरदास आदि परवर्ती कवियों, भक्तों ने श्रंगारभूति श्रीकृष्ण (पुरुष) की रसेश्वरी (प्रकृति) राधा....के रूप में कल्पित व प्रतिष्ठित किया। 

-------महाभारत में राधा ----
उल्लेख उस समय आ सकता था जब शिशुपाल श्रीकृष्ण की लम्पटता का बखान कर रहा था| 

परन्तु भागवतकार निश्चय ही राधा जैसे पावन चरित्र को इसमें घसीटना नहीं चाहता होगा, अतः शिशुपाल से केवल सांकेतिक भाषा में कहलवाया गया, अनर्गल बात नहीं कहलवाई गयी।
कुछ विद्वानों के अनुसार महाभारत में तत्व रूप में राधा का नाम सर्वत्र है क्योंकि उसमें कृष्ण को सदैव श्री कृष्ण कहा गया है |

श्री का अर्थ राधा ही है जो आत्मतत्व की भांति सर्वत्र अंतर्गुन्थित है, श्रीकृष्ण = राधाकृष्ण | 

श्री कृष्ण की विख्यात प्राणसखी और उपासिका राधा वृषभानु नामक गोप अथवा अहीर की पुत्री थीं।

 राधा कृष्ण शाश्वत प्रेम का प्रतीक हैं।
 राधा की माता कीर्ति के लिए 'वृषभानु पत्नी 'शब्द का प्रयोग किया जाता है।

राधा को कृष्ण की प्रेमिका और कहीं-कहीं पत्नी के रुप में माना जाता हैं।

राधा वृषभानु की पुत्री थी।
पद्म पुराण ने इसे वृषभानु राजा की कन्या बताया है।
यह राजा जब यज्ञ की भूमि साफ कर रहा था, इसे भूमि में कन्या के रूप में राधा मिली।
राजा ने अपनी कन्या मानकर इसका पालन-पोषण किया। 

यह भी कथा मिलती है कि विष्णु ने कृष्ण अवतार लेते समय अपने परिवार के सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा।

तभी राधा भी जो चतुर्भुज विष्णु की अर्धांगिनी और लक्ष्मी के रूप में वैकुंठ लोक में निवास करती थीं, राधा बनकर पृथ्वी पर आई। 

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की सखी थी और उसका विवाह रापाण अथवा रायाण नामक व्यक्ति के साथ हुआ था।

अन्यत्र  जैसे गर्गसंहिता अष्टम अध्याय में भाण्डीर वन में राधा और कृष्ण के विवाह का भी उल्लेख मिलता है। 

कहते हैं, राधा अपने जन्म के समय ही वयस्क हो गई थी। यह भी किंवदन्ती है कि जन्म के समय राधा अन्धी थी और यमुना में नहाते समय जाते हुए राजा वृषभानु को सरोवर में कमल के पुष्प पर खेलती हुई मिली।

शिशु अवस्था में ही श्री कृष्ण की माता यशोदा के साथ बरसाना में प्रथम मुलाक़ात हुई, पालने में सोते हुए राधा को कृष्ण द्वारा झांक कर देखते ही जन्मांध राधा की आँखें खुल गईं। 

महान कवियों- लेखकों ने राधा के पक्ष में कान्हा को निर्मोही जैसी उपाधि दी।

दे भी क्यूँ न ? राधा का प्रेम ही ऐसा अलौकिक था। उसकी साक्षी थी यमुना जी की लहरें, वृन्दावन की वे कुंज वेल गलियाँ वो कदम्ब का पेड़, वो गोधुली बेला जब श्याम गायें चरा कर वापिस आते .....

वो मुरली की स्वर लहरी जो सदैव वहाँ की हवाओं में विद्यमान रहती थी ।

"राधा जो वनों में भटकती, कृष्ण कृष्ण पुकारती, अपने प्रेम को अमर बनाती, उसकी पुकार सुन कर भी ,कृष्ण ने एक बार भी पलट कर पीछे नही देखा।
तो क्यूँ न वो निर्मोही एवं कठोर हृदय कहलाए।
किन्तु कृष्ण के हृदय का स्पंदन किसी ने नहीं सुना। 
स्वयं कृष्ण को कहाँ कभी समय मिला कि वो अपने हृदय की बात मन की बात सुन सकें। 

जब अपने ही कुटुंब से व्यथित हो कर वे प्रभास -क्षेत्र में लेट कर चिंतन कर रहे थे तब 'जरा'के छोडे तीर की चुभन महसूस हुई। 

उन्होंने देहोत्सर्ग करते हुए 'राधा'शब्द का उच्चारण किया।
 जिसे 'जरा' ननेमक बसुेलिए न  सुना और 'उद्धव' को जो उसी समय वह पहुँचे उन्हें सुनाया।

 उद्धव की आँखों से आँसू लगतार बहने लगे।
 सभी लोगों को कृष्ण का संदेश देने के बाद जब उद्धव राधा के पास पहुँचे तो वे केवल इतना कह सके ---

"राधा, कान्हा तो सारे संसार के थे ।
राधिके ! कृष्ण सर्वस्य जगते: 
किन्तु राधा तो केवल कृष्ण के हृदय में थी।
कान्हा के हृदय में तो केवल राधा थीं। 
समस्त भारतीय साहित्य के अध्यन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम और भक्ति का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। 
यदि है तो वह प्रक्षिप्त ही है।
इसलिए इस प्रेम को शाश्वत प्रेम की श्रेणी में रखते हैं।

इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली।
 बरसाना के श्री जी के मंदिर में ठाकुर जी भी रहते हैं | 
ठाकुर शब्द का प्रयोग तेरहवीं सदी में हुआ तुर्की आर्मेनियन और ईरानी भाषाओं से 
सोलहवीं सदी में पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के वैष्णव सन्त बल्लभाचार्य'ने इसका प्रयोग किया ।
सामले खुद ही चूनर ओढ़ा देते हैं सखी वेष में रहते हैं ताकि कोई जान न पाये | 

महात्माओं से सुनते हैं कि ऐसा संसार में कहीं नहीं है जहाँ कृष्ण सखी वेश में रहते हैं | 
जो पूर्ण पुरुषोत्तम पुरुष सखी बने ऐसा केवल बरसाने में है |
अति सरस्यौ बरसानो जू | 
राजत रमणीक रवानों जू || 
जहाँ मनिमय मंदिर सोहै जू | 

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