शुक्रवार, 17 मार्च 2023

गोपैरसद्भ‍िरबलेव विनिर्जितोऽस्मि


 नृपेन्द्र रहित: पुरुषोत्तमेन
सख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्य:।
अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन्
गोपैरसद्भ‍िरबलेव विनिर्जितोऽस्मि ॥२०॥
 (भागवत पुराण  1/15/20) 
शब्दार्थ:-स:—वह; अहम्—मैं; नृपेन्द्र—हे सम्राट; रहित:—विहीन; पुरुषोत्तमेन—परमेश्वर द्वारा; सख्या—अपने सखा द्वारा; प्रियेण—अपने  प्रिय के द्वारा; सुहृदा—शुभचिन्तक द्वारा; हृदयेन—हृदय से ; शून्य:– रहित; अध्वनि— मार्ग  में; उरुक्रम-परिग्रहम्—सर्वशक्तिमान विष्णु रूप कृष्ण की पत्नियाँ; अङ्ग—शरीर; रक्षन्—रक्षा करते हुए; गोपै:—ग्वालों द्वारा; असद्भि:— जो वास्तव में सद् नहीं थे उनके द्वारा; अबला इव—निर्बला स्त्री की तरह; विनिर्जित: अस्मि—पराजित हो चुका हूँ।.
अनुवाद:-हे राजन्, अब मैं अपने मित्र तथा सर्वाधिक प्रिय शुभचिन्तक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से विलग हो गया हूँ, अतएव मेरा हृदय हर तरह से शून्य-सा प्रतीत हो रहा है। उनकी अनुपस्थिति में, जब मैं कृष्ण की तमाम पत्नियों की रखवाली कर रहा था, तो अनेक अविश्वस्त ग्वालों ने मुझे हरा दिया।

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