रविवार, 14 फ़रवरी 2021

पाराशर और सत्यवती की कथा के बहाने से नारी अस्मिता का तार तार होना-

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महर्षि पाराशर एक बार यमुना नदी के दूसरी पार जाने के लिए जिस नाव में बैठकर जा रहे थे ; तब उस नाव को चलाने वाली एक बारह साल की लड़की सत्यवती थी।

एकान्त में उस सुन्दर कन्या को देखकर ऋषि का काम- भाव (sex)जाग्रत हो गया और उस कन्या से सैक्स करने की इच्छा की

परन्तु कन्या को एक तरफ अपने पिता और परिवार का डर था  तो दूसरी तरफ उसे यह डर भी था कि कहीं ऋषि उसे शाप न दे दें ।

आश्चर्य तो यह है दोस्तों की जो स्वयं पाप करने वाला होकर भी शाप दे सकता है 

मतलब जो बलात्कारी होकर पीड़िता को शाप भी दे सकता है ! 

ये मन गड़न्त कथाएँ सिद्धांत हीन हैं ।
आज भी कोई साधु यही कहकर महिलाओं की इज्जत लूटता है ।  ऐसा भी हमने सुना है --+

इन कथाओं समाज के लोगों को क्या प्रेरणा मिलेगी ?

निम्न श्लोक यही कहता है ।
तमहं शापभीता च पितुर्भीता च भारत ।
वरैर् असुलभेैर् उक्ता न प्रत्याख्यातुम् उत्सहे।।१०।

दुर्लभ वर का लालच और भय दिखाकर  ऋषि ने मुझसे संभोग किया जिससे मैं उनसे मना न कर सकी।
मुझे अपने तेजसे दबाकर अन्धेरा कर के उस नाव में ही ऋषि ने मेरे साथ संभोग किया।
यह निम्न श्लोक यही कहता है ।

अभिभूय स माम् बालां तेजसा वशम् आनयत्।
तमसा लोकम् आवृत्य नौगतामेव भारत )।११।

यह कहना था व्यास की माता धीवर की कन्या सत्यवती का जो दूसरी बार हस्तिनापुर के राजा शान्तनु की पत्नी बन गयी थी ।

(महाभारत आदिपर्व सम्भवपर्व का 
एकसौचारवाँ अध्याय -गीताप्रेस संस्करण)

हिन्दू तथा अन्य इस्लामिक आदि धर्म ग्रन्थों में नारी जीवन कलंक पूर्ण ही था।

परन्तु इस दुर्भाग्य को छुपाने के लिए कुछ नारीयों की चालाकी से प्रशंसा भी की गयी है । जैसे महाभारत और मनुस्मृति के निम्न श्लोक समान है यह कहने के लिए
देखें नीचें

पूज्या लालयितव्याश्च स्त्रियो नित्यं जनाधिप।
स्त्रियो यत्र च पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।।(13-81-5)

अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।
तदा चैतत्कुलं नास्ति यदा शोचन्ति जामयः।।(13-81-6)
स्त्रियों को दुलार करके उनका सम्मान करके उन्हें नित्य खुश करते रहना चाहिए ।

जहां स्त्रियों का आदर सत्कार होता है वहां देवता लोग प्रसन्नता पूर्वक निवास करते हैं तथा जहां उनका अनादर होता है वहां की सारी क्रिया निष्फल हो जाती है

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
पुत्राश्चस्थाविरेभावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति।।(13-81-14)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि 
दानधर्मपर्वणि एकाशीतितमोऽध्यायः।। 81 ।।
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त्रिंशद्वर्षो दशवर्षां भार्यां विन्देत नग्निकाम्।
एकविंशतिवर्षो वा सप्तवर्षामवाप्नुयात्।।१४।

(महाभारत अनुशासन पर्व के अन्तर्गत दानपर्वधर्ममें 
विवाहधर्मकावर्णन विषयक चौवालीस वाँ अध्याय)

कन्‍या को, जो रजस्‍वला न हुई हो, पत्‍नी रूप में प्राप्‍त करे अथवा इक्‍कीस वर्ष का पुरुष सात वर्ष की कुमारी के साथ विवाह करे।१४।

मनुस्मृति में भी वर्णन है -

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स्त्रीयों के विषय में धर्म-शास्त्र का विधान ---
असमता मूलक व  असंवेदनात्मक था ।
पहले तो ऋषि स्त्रीयों से अपने शरीर की मालिश कराते थे ।
और -जब ऋण-धन आवेशों की प्रतिक्रिया स्वरूप
उत्तेजित हो स्खलित  जाते तो नारीयों की निन्दा करने लगते !
इस में नारी का क्या दोष था ?

महाभारत के अनुशासन पर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व बीसवाँ अध्याय पृष्ठ संख्या -5540 पर गीता प्रेस 👇

मुनि अष्टावक्र के माध्यम से महाभारत लिखने वाला  
वर्णन करता है।

" अनुज्ञाता च मुनिना सा स्त्री तेन महात्मना।
अथास्य तैलेनांगानि सर्वाण्येवाभ्यमृक्षत।। 2।

फिर महात्मा मुनि की आज्ञा लेकर उस स्त्री ने उनके सारे अंगों में  तेल की मालिश की।।2।

आगे वर्णन है कि स्त्रीयों को कभी स्वतन्त्र मत करो
वे हमेशा बन्धन में रहें यही धर्म-शास्त्रों का विधान है।

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पुरुष मानसिकता ने केवल स्त्रीयों की मर्यादाओं को लेकर --जो विधान बनाए वे पुरुषों की भावी उपभोग सुविधा को लक्ष्य करके बनाए गये।

मुझे तो ये लगता है कि स्त्रीयों के आभूषणों में भी उनके पूर्व कालिक बन्धन-श्रृखलाओं के स्वरूप ही अवशेष  विद्यमान हैं ।

असीरियन संस्कृति में तो इसकी झलक मिलती है परन्तु वहाँ महिलाओं को आभूषण पहने नहीं दिखाया सायद महिलाओं के आभूषण देव संस्कृतियो में दृष्टि गोचर होता है ।

आभूषणों में नथ कुण्डल और गले का हार  आदि इसके पूर कालिक बन्धन-प्रतीक ही हैं ।

कालान्तर में रूढ होकर ये ही स्त्रियों के श्रँगार भूषण भी बन गये ।

ये आभूषण तो बाद में बन गये ये  ये स्त्रीयों के सौन्दर्य प्रसाधक हों  ये नाथ कुण्डल और हार मौलिक सौन्दर्य वर्धक रहे हों मुझे नहीं लगता ?

क्यों कि  सैमेटिक संस्कृतियों में स्त्री स्वतन्त्रता को असीरियनों और यहूदियों ने तो सम्मान दिया  परन्तु अरबदेशों  में बन्दिशों के विधान या शरीयत थी ।
ठीक  ब्राह्मणों के स्मृति-ग्रन्थों के समान है ।

असुर लोग बड़े वीर और कठोर तथा अनुशासन के दृढ़निश्चयी होते थेे; अपने विजित शत्रओं को ये ओष्ठ और नासिका उच्छेदन कर उनमें रस्सियाँ बाँधकर पशुओं की तरह हाँक कर लाते थे ।

कालान्तरण में जब पुरुष ने स्त्रीयों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया तो उसे नथकर अथवा नकेल डालकर उसे बाँध लिया तबसे वह वधु संज्ञा से अभिहित हुई ।

पति की (नाथ) संज्ञा के मूल में भी यही भाव निहित है

भगवत शरण उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति के श्रोत में असीरिया की संस्कृति से ये तथ्य उद्धृत किया है ।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में ४८ वें सर्ग में -
"पादच् चाया सुखा भर्तुस् तादृशस्य महात्मनः।
स हि नाथो जनस्य अस्य स गतिः स परायणम्॥१७।
(२-४८-१७ वाल्मीकी रामायण)

संस्कृत कोश ग्रन्थों में  (नाथति  पतिर्भवतीति) । 
१-पति: २- ईशः ३ नेता ४ परिवृढः ५ अधिभूः  ६ वर: ७ इन्द्रः ८ स्वामी ९ आर्य्यः १० प्रभुः  ११ भर्त्ता १२ ईश्वरः १३ विभुः १४ ईशिता १५  इनः १६ नायकः १७ । इति हेमचन्द्रः । ३ । २३ ॥

यद्यपि णह् बन्धने बने च के रूप में नह् धातु से निष्पन्न है(नह्यते येेेन स: नाथ: )जो वधु को जीवन सूत्र में बाँध कर लाता है वह नाथ था।

आभीर संस्कृति में स्त्रीयों की स्वतन्त्रता की रक्षा थी ।
उनकी हल्लीषम् नृत्य संस्कृति --जो कालान्तरण में यूनानीयों के के इरॉस देवता की कथक क्रियाओं के  प्रभाव से रास में परिवर्तित हुई ।

हल्लीषम् स्त्रीयों की ललितकलात्मक अभिव्यक्ति थी ।
ये भ्रमराकार रूप में नृत्य शैली थी 
जिसमें कामुकता का भाव कदापि नहीं था।
स्त्री और पुरुष दोनों  प्रतियोगितात्मक रू में भाग लेते थे ।

महिलाओं के आभूषणों में उनकी नथुनी और कुण्डल  और गले का हार उनके बन्धनो के ध्वंषावषेश हैं ।
जिनमें आज आभूषण का भाव है

बौद्ध काल में लिखित महाभारत में प्राचीन ऋषि अष्टावक्र के माध्यम से महाभारत कार कहता है तत्कालीन पुरोहित प्रवृत्तियों को चित्रित करता है 
जिसमें महिलाओं के बन्धन जटिल थे ।

कि- "स्वतन्त्रा त्वं कथं भद्रे ब्रूहि कारणमत्र वै ।
नास्ति त्रिलोके स्त्री काचिद् या वै स्वातन्त्र्यमर्हति।20।

भद्रे ! तुम स्वतन्त्र कैसे हो इसमें जो कारण हो वह बताओ तीनों लोकों में कोई ऐसी स्त्री नहीं जो स्वतन्त्र  रहने योग्य हो ।20।

महाभारत अनुशासनपर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व में पृष्ठ संख्या-5542 पर गीताप्रेस संस्करण ।
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आगे अष्टावक्र कहते हैं -

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
पुत्राश्च स्थाविरे काले नास्ति स्त्रीणां स्वतन्त्रता।21।
      दौनों श्लोकों की तुलना करें !👇

मनु स्मृति में भी ये ही श्लोक हैं ।
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।               
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ||- (मनुःस्मृति 9/3 अध्याय/श्लोक )

कुमार अवस्था में पिता रक्षा करते हैं, जवानी में वह पति के संरक्षण में रहती है और बुढ़ापे में पुत्र उसकी देखभाल करते हैं; इस प्रकार स्त्रियों के लिए स्वतन्त्रता नहीं है।21।

मनुःस्मृति और महाभारत की रचना करने वाले समान लेखक रहे हैं

मनुःस्मृति में यह श्लोक - 9/3 अध्याय/श्लोक ) पर है ।
और इनका समय भी समान महात्मा बुद्ध का परवर्ती काल खण्ड ई०पू० द्वितीय सदी है ।
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मनुस्मृति में ये महाभारत के समान श्लोक हैं

अस्वतन्त्राः स्त्रियःकार्याःपुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्  | 
विषयेषु च सज्जन्त्यः  संस्थाप्या  आत्मनो वशे   ||  
(मनुःस्मृति 9/2अध्याय/श्लोक)

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।               
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ।-
(मनुःस्मृति 9/3 अध्याय/श्लोक )

भावार्थ :-मनुष्य स्त्रियों को स्वतन्त्रता कदापि न दे । 
विषयासक्त स्त्रियों को भी स्ववश में ही रखने का सतत प्रयत्न करे !

स्त्री कभी भी स्वतन्त्र नहीं रखने  योग्य है ।
बचपन में पिता , यौवन में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करे ।

( उपर्युक्त दोनों श्लोक वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के सन्दर्भों में अपनी सार्थकता समाप्त कर चुके हैं ।
क्यों कि स्त्रीयों ने प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष से आगे बढ़कर दिखा दिया है 

  ये श्लोक यही सिद्ध करते हैं कि विगत काल में
में हमारा पुरुष सत्तात्मक समाज था , तथा स्त्रियों को आर्थिक और सामाजिक स्तर स्वतन्त्रता नहीं देता था ।

उन्हें पढ़ने का भी अघिकार नहीं था ।
इसलिए वे गुलामी की जिन्द़गी जी रही थीं ।

फिर भी 'मनु:स्मृति' में तत्कालीन समाज
के नियमन के जो सूत्र है , उनमें अनेकानेक वर्तमान समय में भी उतने ही सार्थक हैं जैसे वे पहले थे ।

अतः उसे एक  ऐतिहासिक ग्रन्थ के रूप ले
कर उस से मार्गदर्शन  प्राप्त कर सकते हैं )

महाभारत और मनुःस्मृति समान लेखकों के समूह की रचनाऐं हैं।
और इनका समय ई०पू० द्वितीय सदी है ।

महाभारत कार यहीं तक नहीं ठहरा  उसने भीष्म के माध्यम से स्त्रीयों के दुर्गुणों के विषय में वर्णन  किया है ।👇

भीष्म  ने कहा राजन इस विषय में देवर्षि नारद का अप्सरा पंचकूला के साथ जो संवाद हुआ था !
उसी प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है पहले की बात है संपूर्ण लोकों में विचरतेे हुए देवर्षि नारद ने एक दिन ब्रह्मलोक की अत्यंत सुंदर अप्सरा पंचकूला को देखा और कहा !
क्या कहा देखें--- नीचे

'महाभारत में यह वर्णन है 👇
दृष्टं स्त्रीचापलं च ते
स्थविराणामापि स्त्रीणां बाधते मैथुन ज्वर:।5।

( स्त्रीयाँ बूढ़ी हो जाने पर भी मैथुन ज्वर से पीड़ित रहती हैं।
नारद जब पुरुष थे और अविवाहित भी फिर विना अनुभव किये 
स्त्रियों के स्वभाव को कैसे जाना ?
ये तो केवल आख्यानों के आधार पर अपनी बाते आरोपित करना ही था और कुछ नहीं -

वस्तुत " भोगी स्ववतां पश्यति "
अर्थात्‌ कामी भोगी रोगी अपने समान सबको देखता है
उसी सिद्धान्त के अनुसार इन ब्राह्मणों ने महिलाओं की निन्दा की
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महाभारत के अनुशासनपर्व  के अड़तीसवें अध्याय को स्त्रीनिन्दा पर्व कहना उचित होगा।

स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि श्रोतुं भारतसत्तम।
स्त्रीयो हि मूलं दोषाणां लघुचित्ता हि ता: स्मृता ।1।

युधिष्ठर ने कहा - भरत -श्रेष्ठ ! मैं स्त्रीयों के स्वभाव का वर्णन सुनना चाहता हूँ। क्यों कि सारे दोषों की जड़ स्त्रियां ही हैं ।1।

--जो युधिष्ठर द्रोपदी को जुए में हार कर भी स्त्रीयों को सारे दोषों की जड़ कहता हो ।

ये बात कितनी औचित्य पूर्ण है !
विचार करना चाहिए!
आगे महाभारत में  और भी इसी प्रकार का वर्णन है👇

न स्त्रीभ्य: किञ्चिदन्यद् वै पापीयस्तरमस्ति वै ।
स्त्रीयो हि मूलं दोषाणां तथा त्वमपि वेत्थ ह ।12।

स्त्रियों से बढ़कर कोई पापी दूसरा नहीं है स्त्रियां सारे दोषों की जड़ है इस बात को आप भी अच्छी तरह जानते हैं।12।

असद्धर्मस्त्वयं स्त्रीणामस्माकं भवति प्रभो।
पापीयसो नरान् यद् वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे।14।

प्रभु हम स्त्रियों में यह सबसे बड़ा पाप है कि हम पापी से पापी पुरुषों को भी लाज छोड़ कर स्वीकार कर लेती हैं

स्त्रियं हि य: प्रार्थयते संनिकर्षं च गच्छति।
ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेछन्ति योषित: ।15।

जो पुरुष किसी स्त्री को चाहता है उसके निकट तक पहुंचता है और उसकी थोड़ी सी सेवा कर देता है उसी को युवतियाँ चाहने लगती हैं

यौवने वर्तमानानां मृष्टाभरणवाससाम्।
नारीणां स्वा़ैरवृत्तीनां स्पृहयन्ति कुलस्त्रिय: ।19।

जो जवान है सुंदर गहने और अच्छे कपड़े पहनते हैं ऐसी स्वेच्छाचारी स्त्रियों के चरित्र को देखकर कितनी ही कुलपति स्त्रियां भी वैसी ही बनने की इच्छा करने लगती हैं।

याश्च शश्वद् बहुमता रक्ष्यन्ते दयिता स्त्रिय: ।
अपि ता: सम्प्रज्जन्ते कुब्जान्धजडवामनै:।20।

जो बहुत सम्मानित और पति की प्यारी स्त्रियां हैं जिनकी सदा अच्छी तरह रखवाली की जाती है वह भी घर में आने वाले कुबड़ो, अन्धो  गूगों और बौनों के साथ भी फँस जाती है।

यदिपुंसां गतिर्ब्रह्मन् कथंचिन्नोपपद्यते।
अप्यन्योन्यं प्रवर्तन्ते न हि तिष्ठन्ति भर्तृषु।22।

ब्राह्मण यदि स्त्रियों को पुरुषों की प्राप्ति किसी प्रकार भी संभव ना हो और पति भी दूर गए हो तो भी आपस में ही कृत्रिम उपायों से ही मैथुन में प्रवृत्त हो जाती हैं

चलस्वभावा दु:सेव्या दुर्ग्राह्या भावतस्था।
प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा वाचस्तथा स्त्रिय: ।24।

स्त्रियों का स्वभाव चंचल होता है उनका सेवन बहुत ही कठिन काम है इनका भाव जल्दी ही किसी के समझ में नहीं आता ठीक उसी तरह जैसे विद्वान पुरुष की वाणी दुर्बोध होती है

नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधि:।
नान्तक: सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना।25।

अग्नि कभी ईंधन से तृप्त नहीं होती समुंद्र कभी नदियों से तृप्त नहीं होता मृत्यु समस्त प्राणीयों को एक साथ आ जाए तो भी उनसे तृप्त नहीं होती इसी प्रकार सुंदर नेत्रों वाली युवतियां पुरुषों से कभी तृप्त नहीं होती

इदमन्यच्च देवर्षे रहस्यं सर्वयोषिताम् ।
दृष्टैव पुरुषं हृद्यं यौनि: प्रक्लिद्यते स्त्रिया:।26।

देव ऋषि संपूर्ण रमणिया के संबंध में दूसरी भी रहस्य की बात यह कि किसी मनोरम पुरुष को देखते ही स्त्री की यौनि गीली हो जाती है

न कामभोगान् विपुलान् नालंकारान् न संश्रयान्।
तथैव बहु मन्यन्ते यथा रत्यामनुग्रहम्।28।

काम भोग की प्रचुर सामग्री को ना अच्छे-अच्छे गहनों को और ना उत्तम घरों को ही उतना अधिक महत्व देती हैं जैसा कि रति के लिए किए गए अनुग्रह को

अन्तक: पवनो मृत्यु: पातालं वडवामुखम्।
क्षुरधारा विषं  सर्पो वह्निरित्येकत: स्त्रिय: ।29।

यमराज वायु, मृत्यु ,पाताल,बड़वानल,क्षुरे की धार,विष, सर्प और अग्नि– यह सब विनाश की हेतु एक तरफ और स्त्रियां अकेली एक तरफ बराबर है।

एता हि रममाणास्तु वञ्चयन्तीह मानवान्।
न चासां मुच्यते कश्चित् पुरुषो हस्तमागत: ।।5।

यह रमण करती हुई भी यहां पुरुषों को ठगती रहती हैं इनके हाथ में आया हुआ कोई भी पुरुष इनसे बचकर नहीं जा सकता

गावो नव तृणानीव गृह्णन्त्येता नवंनवम् ।
शम्बरस्य च माया माया या नमुचेरपि ।6।
बले: कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदु:।

जैसे गाय नई-नई घास चरती है उसी प्रकार यह नारिया भी नए-नए पुरुषों को अपनाती रहती हैं शंबरासुर की जो  माया है तथा नमुचि की बलि और कुंभीनसी की जो मायाएं हैं उन सब को यह युवतियां जानती हैं

स्त्रीणां बुद्ध्यर्थनिष्कर्षादर्थशास्त्राणि शत्रुहन्।10।
बृहस्पति प्रभृतिभिर्मन्ये सद्भि: कृतानि वै।

शत्रुघाती नरेश मुझे तो ऐसा लगता है कि स्त्रियों बुद्धि में जो अर्थ भरा है उसी का निष्कर्ष यानी सारांश लेकर बृहस्पति आदि सत्पुरुषों ने नीति शास्त्रों की रचना की है।

न हि स्त्रीभ्य परं पुत्र! पापीय: किञ्चिदस्ति वै ।
अग्निर्हि प्रमदा दीप्तो मायाश्च मयजा विभो।4।

वत्स ! स्त्रियों से बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है
यौवन मद में उन्मत्त रहने वाली स्त्रियां वास्तव में जलती हुई अग्नि के समान है प्रभु वे मय दानव की रची हुई माया है

न च स्त्रीणां क्रिया: काश्चिदिति धर्मो व्यवस्थित:।11।
निरिन्द्रिया ह्यशास्त्राश्च स्त्रियो८नृतमिति श्रुति: ।
शय्यासनमलं कारमन्नपानमनार्यताम्।12।
दुर्वाग्भावं रतिं चैव ददौ स्त्रीभ्य: प्रजापति।

स्त्रियों के लिए किन्ही वैदिक कर्मों के करने का विधान नहीं है यही धर्म शास्त्र की व्याख्या है स्त्रियां इंद्री शून्यहैं अर्थात वे अपनी इंद्रियों को वश में रखने में असमर्थ हैं इसलिए शास्त्र ज्ञान से रहित हैं।
और असत्य की मूर्ति हैं ऐसा उनके विषय में श्रुति का कथन है।
प्रजापति ने स्त्रियों को सैय्या, आसन, अलंकार, पान ,अनार्यता
दुर्वचन प्रियता, तथा रति प्रदान की है।

महाभारत में अनुशासनपर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व में पृष्ठ संख्या- 5614 पर बैमेल विवाह का वर्णन  भी है।

त्रिंशद्वर्षो दशवर्षो भार्यो विन्देत नग्निकाम्।
एकविंशतिवर्षो वा सप्तवर्षामवाप्नुयात्।14।

30 वर्ष का पुरुष 10 वर्ष की कन्याओं को जो रजस्वला ना हुई हो पति रूप में प्राप्त करें अथवा 21 वर्ष का पुरुष 7 वर्ष की कुमारी के साथ विवाह करें।

इसी प्रकार का वर्णन मनुस्मृति में भी प्राप्त होता है जिसका समर्थन महर्षि दयानंद ने किया है।

ये च क्रीणन्ति दासीं च विकीर्णन्ति तथैव च।
भवेत् तेषां तथा निष्ठा लुब्धानां पापचेतसाम् ।47।

जो दासियों को खरीदते और भेजते हैं वह लोग ही और पाप आत्मा है ऐसे ही लोगों में पत्नी को भी खरीदने और बेचने की निष्ठा होती है।

महाभारत अनुशासनपर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व पृष्ठ संख्या- 5620।

यही कथा देवीभागवत पुराण में भी है।

देवीभागवतपुराण स्कन्धः(२)अध्यायः (२)

            व्यासजन्मवर्णनम्

                 सूत उवाच
एकदा तीर्थयात्रायां व्रजन् पाराशरो मुनिः ।
आजगाम महातेजाः कालिन्द्यास्तटमुत्तमम् ॥१॥


निषादमाह धर्मात्मा कुर्वन्तं भोजनं तदा ।
प्रापयस्व परं पारं कालिन्द्या उडुपेन माम् ॥२॥


दाशः श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं कुर्वाणो भोजनं तटे ।
उवाच तां सुतां बालां मत्स्यगन्धां मनोरमाम् ॥३॥


उडुपेन मुनिं बाले परं पारं नयस्व ह ।
गन्तुकामोऽस्ति धर्मात्मा तापसोऽयं शुचिस्मिते॥४।
इत्युक्ता सा तदा पित्रा मत्स्यगन्धाथ वासवी ।
उडुपे मुनिमासीनं संवाहयति भामिनी ॥ ५ ॥


व्रजन् सूर्यसुतातोये भावित्वाद्दैवयोगतः ।
कामार्तस्तु मुनिर्जातो दृष्ट्वा तां चारुलोचनाम् ।६॥


ग्रहीतुकामः स मुनिर्दृष्ट्वा व्यञ्जितयौवनाम् ।
दक्षिणेन करेणैनामस्पृशद्दक्षिणे करे ॥ ७ ॥


तमुवाचासितापाङ्गी स्मितपूर्वमिदं वचः ।
कुलस्य सदृशं वः किं श्रुतस्य तपसश्च किम् ॥ ८ ॥


त्वं वै वसिष्ठदायादः कुलशीलसमन्वितः ।
किं चिकीर्षसि धर्मज्ञ मन्मथेन प्रपीडितः ॥ ९ ॥


दुर्लभं मानुषं जन्म भुवि ब्राह्मणसत्तम ।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये ब्राह्मणत्वं विशेषतः ॥ १० ॥


कुलेन शीलेन तथा श्रुतेन
     द्विजोत्तमस्त्वं किल धर्मविच्च ।
अनार्यभावं कथमागतोऽसि
     विप्रेन्द्र मां वीक्ष्य च मीनगन्धाम् ॥ ११ ॥


मदीये शरीरे द्विजामोघबुद्धे ॥
     शुभं किं समालोक्य पाणिं ग्रहीतुम् ।
समीपं समायासि कामातुरस्त्वं
     कथं नाभिजानासि धर्मं स्वकीयम् ॥ १२ ॥


अहो मन्दबुद्धिर्द्विजोऽयं ग्रहीष्य-
     ञ्जले मग्न एवाद्य मां वै गृहीत्वा ।
मनो व्याकुलं पञ्चबाणातिविद्धं
     न कोऽपीह शक्तः प्रतीपं हि कर्तुम् ॥ १३ ॥


इति सञ्चिन्त्य सा बाला तमुवाच महामुनिम् ।
धैर्यं कुरु महाभाग परं पारं नयामि वै ॥ १४ ॥


                    सूत उवाच
पराशरस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं हितपूर्वकम् ।
करं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सिन्धोः पारं गतः पुनः॥ १५॥


मत्स्यगन्धां प्रजग्राह मुनिः कामातुरस्तदा ।
वेपमाना तु सा कन्या तमुवाच पुरःस्थितम् ॥१६ ॥


दुर्गन्धाहं मुनिश्रेष्ठ कथं त्वं नोपशङ्कसे ।
समानरूपयोः कामसंयोगस्तु सुखावहः ॥ १७ ॥


इत्युक्तेन तु सा कन्या क्षणमात्रेण भामिनी ।
कृता योजनगन्धा तु सुरूपा च वरानना ॥ १८ ॥


मृगनाभिसुगन्धां तां कृत्वा कान्तां मनोहराम् ।
जग्राह दक्षिणे पाणौ मुनिर्मन्मथपीडितः ॥ १९ ॥


ग्रहीतुकामं तं प्राह नाम्ना सत्यवती शुभा ।
मुने पश्यति लोकोऽयं पिता चैव तटस्थितः ॥२०॥


पशुधर्मो न मे प्रीतिं जनयत्यतिदारुणः ।
प्रतीक्षस्व मुनिश्रेष्ठ यावद्‌भवति यामिनी ॥ २१ ॥


रात्रौ व्यवाय उद्दिष्टो दिवा न मनुजस्य हि ।
दिवासङ्गे महान् दोषः पश्यन्ति किल मानवाः॥२२॥


कामं यच्छ महाबुद्धे लोकनिन्दा दुरासदा ।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या युक्तमुक्तमुदारधीः ॥ २३॥


नीहारं कल्पयामास शीघ्रं पुण्यबलेन वै ।
नीहारे च समुत्पन्ने तटेऽतितमसा युते ॥ २४ ॥


कामिनी तं मुनिं प्राह मृदुपूर्वमिदं वचः।
कन्याहं द्विजशार्दूल भुक्त्वा गन्तासि कामतः॥२५॥


अमोघवीर्यस्त्वं ब्रह्मन् का गतिर्मे भवेदिति ।
पितरं किं ब्रवीम्यद्य सगर्भा चेद्‌भवाम्यहम् ॥२६॥


त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत् ।
                   पराशर उवाच
कान्तेऽद्य मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि ॥ २७॥


वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि ।
                     सत्यवत्युवाच
यथा मे पितरौ लोके न जानीतो हि मानद ॥ २८ ॥


कन्याव्रतं न मे हन्यात्तथा कुरु द्विजोत्तम ।
पुत्रश्च त्वत्समः कामं भवेदद्‌भुतवीर्यवान् ॥ २९ ॥


गन्धोऽयं सर्वदा मे स्याद्यौवनं च नवं नवम् ।
                   पराशर उवाच
शृणु सुन्दरि पुत्रस्ते विष्ण्वंशसम्भवः शुचिः ॥३०॥


भविष्यति च विख्यातस्त्रैलोक्ये वरवर्णिनि ।
केनचित्कारणेनाहं जातः कामातुरस्त्वयि ॥३१॥


कदापि च न सम्मोहो भूतपूर्वो वरानने ।
दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं सदाहं धैर्यमावहम् ॥३२॥


दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वशगोऽभवम् ।
तत्किञ्चित्कारणं विद्धि दैवं हि दुरतिक्रमम् ॥३३॥


दृष्ट्वाहं चातिदुर्गन्धां त्वां कथं मोहमाप्नुयाम् ।
पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने ॥३४॥
वेदविद्‌भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये ।
                      सूत उवाच
इत्युक्त्वा तां वशं यातां भुक्त्वा स मुनिसत्तमः॥ ३५॥
जगाम तरसा स्नात्वा कालिन्दीसलिले मुनिः ।
सापि सत्यवती जाता सद्यो गर्भवती सती ॥३६॥


सुषुवे यमुनाद्वीपे पुत्रं काममिवापरम् ।
जातमात्रस्तु तेजस्वी तामुवाच स्वमातरम् ॥३७॥


तपस्येव मनः कृत्वा विविशे चातिवीर्यवान् ।
गच्छ मातर्यथाकामं गच्छाम्यहमतः परम् ॥३८॥


तपः कर्तुं महाभागे दर्शयिष्यामि वै स्मृतः ।
मातर्यदा भवेत्कार्यं तव किञ्चिदनुत्तमम् ॥३९॥


स्मर्तव्योऽहं तदा शीघ्रमागमिष्यामि भामिनि ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि त्यक्त्वा चिन्तां सुखं वस ॥ ४० ॥


इत्युक्त्वा निर्ययौ व्यासः सापि पित्रन्तिकं गता ।
द्वीपे न्यस्तस्तया बालस्तस्माद्‌द्वैपायनोऽभवत् ॥ ४१ ॥


जातमात्रो जगामाशु वृद्धिं विष्ण्वंशयोगतः।
तीर्थे तीर्थे कृतस्तानश्चचार तप उत्तमम् ॥४२॥


एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् ।
चकार वेदशाखाश्च प्राप्तं ज्ञात्वा कलेर्युगम् ॥४३॥


वेदविस्तारकरणाद्व्यासनामाभवन्मुनिः ।
पुराणसंहिताश्चक्रे महाभारतमुत्तमम् ॥ ४४ ॥


शिष्यानध्यापयामास वेदान्कृत्वा विभागशः ।
सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ॥ ४५ ॥


असितं देवलं चैव शुकं चैव स्वमात्मजम् ।
                 सूत उवाच
एतच्च कथितं सर्वं कारणं मुनिसत्तमाः ॥ ४६॥


सत्यवत्याः सुतस्यापि समुत्पत्तिस्तथा शुभा ।
संशयोऽत्र न कर्तव्यः सम्भवे मुनिसत्तमाः ॥४७॥


महतां चरिते चैव गुणा ग्राह्या मुनेरिति ।
कारणाच्च समुत्पत्तिः सत्यवत्या झषोदरे ॥४८॥


पराशरेण संयोगः पुनः शन्तनुना तथा ।
अन्यथा तु मुनेश्चित्तं कथं कामाकुलं भवेत् ॥४९॥


अनार्यजुष्टं धर्मज्ञः कृतवान्स कथं मुनिः ।
सकारणेयमुत्पत्तिः कथिताश्चर्यकारिणी ॥५०॥


श्रुत्वा पापाच्च निर्मुक्तो नरो भवति सर्वथा ।
य एतच्छुभमाख्यानं शृणोति श्रुतिमान्नरः ॥५१॥


न दुर्गतिमवाप्नोति सुखी भवति सर्वदा ॥५२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे व्यासजन्मवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

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प्रस्तुतिकरण :-यादव योगेश कुमार "रोहि" 8077160219

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