शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

राधा कृष्ण का विवाह -



गर्गसंहिता- 

(प्रथम गोलोकखण्डः)

अध्यायः(१६)


भागवत पुराण में जो लोग कहते हैं कि राधा का वर्णन नहीं है तो वे लोग यह श्लोक अवश्य देखे 

-अनया आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः।   यत् नो विहाय गोविन्दः प्रीतो याम् अनयत् रहः ॥  (भागवत पुराण -10/30/028) 


जिसके द्वारा हरीश्वर भगवान कृष्ण की आराधना की गयी अवश्य ही सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की वह ‘आराधिका’ होगी।  इसीलिये इस पर प्रसन्न होकर श्यामसुन्दर ने हमें छोड़ दिया है और उसे एकान्त में ले गये हैं।
भागवत पुराण में राधा का वर्णन ना मानने वाले लोग यह  श्लोक भी अवश्य देख लें ।
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श्रीकृष्ण-राधिका विवाहवर्णनम्

       -श्रीनारद उवाच -
गाश्चारयन् नन्दनमङ्कदेशे
     संलालयन् दूरतमं सकाशात् ।
कलिंदजातीरसमीरकंपितं
     नंदोऽपि भांडीरवनं जगाम ॥ १ ॥

श्री नारद जी कहते हैं- राजन् ! एक दिन नन्द जी अपने नन्दन को अंक (गोद)में लेकर लाड़ लड़ाते और गौएँ चराते हुए खिरक (गोशाला)  के पास से बहुत दूर निकल गये  । धीरे-धीरे भाण्डीर वन जा पहुँचे, जो कालिन्दी-नीर का स्पर्श करके बहने वाले तीरवर्ती शीतल समीर के झोंके से कम्पित हो रहा था।।१।


कृष्णेच्छया वेगतरोऽथ वातो
     घनैरभून्मेदुरमंबरं च ।
तमालनीपद्रुमपल्लवैश्च
     पतद्‌भिरेजद्‍‌भिरतीव भाः कौ ॥ २ ॥

थोड़ी ही देर में श्रीकृष्ण की इच्छा से वायु का वेग अत्यंत प्रखर हो उठा और आकाश मेघों की घटा से आच्छादित हो गया। तमाल और कदम्ब वृक्षों के पल्लव टूट-टूटकर गिरने, उड़ने और अत्यंत भय का उत्पादन करने लगे।२।


तदांधकारे महति प्रजाते
     बाले रुदत्यंकगतेऽतिभीते ।
नंदो भयं प्राप शिशुं स बिभ्र-
     द्धरिं परेशं शरणं जगाम ॥ ३ ॥

उस समय महान अन्धकार छा गया। नन्द नन्दन रोने लगे। वे पिता की गोद में बहुत भयभीत दिखायी देने लगे। नन्द को भी भय हो गया। वे शिशु को गोद में लिये परमेश्वर श्री हरि की शरण में गये।३।


तदैव कोट्यर्कसमूहदीप्ति-
     रागच्छतीवाचलती दिशासु ।
बभूव तस्यां वृषभानुपुत्रीं
     ददर्श राधां नवनंदराजः ॥ ४ ॥

उसी क्षण करोड़ों सूर्यों के समूह की सी दिव्य दीप्ति उदित हुई, जो सम्पूर्ण दिशाओं में व्याप्त थी; वह क्रमश: निकट आती-सी जान पड़ी उस दीप्ति राशि के भीतर नौ नन्दों के राजा ने वृषभानु नन्दनी श्रीराधा को देखा।४।



कोटींदुबिंबद्युतिमादधानां
     नीलांबरां सुंदरमादिवर्णाम् ।
मंजीरधीरध्वनिनूपुराणा-
     माबिभ्रतीं शब्दमतीव मंजुम् ॥ ५ ॥

 वे करोड़ों चन्द्र मण्डलों की कांति धारण किये हुए थी। उनके श्री अंगों पर आदिवर्ण नील रंग के सुन्दर वस्त्र शोभा पा रहे थे। चरण प्रांत में मंजीरों की धीर-ध्वनि से युक्त नूपुरों का अत्यंत मधुर शब्द हो रहा था। ५।


कांचीकलाकंकणशब्दमिश्रां
     हारांगुलीयांगदविस्फुरंतीम् ।
श्रीनासिकामौक्तिकहंसिकीभिः
     श्रीकंठचूडामणिकुंडलाढ्याम् ॥ ६ ॥

उस शब्द में कांचीकलाप और कंकणों की झनकार भी मिली थी। रत्नमय हार, मुद्रिका और बाजूबन्दों की प्रभा से वे और भी उद्भासित हो रही थी।

 नाक में मोती की बुलाक और नकबेसर की अपूर्व शोभा हो रही थी। कण्ठ में कंठा, सीमंत पर चूड़ामणि और कानों में कुण्डल झलमला रहे थे।६।


तत्तेजसा धर्षित आशु नंदो
     नत्वाथ तामाह कृतांजलिः सन् ।
अयं तु साक्षात्पुरुषोत्तमस्त्वं
     प्रियास्य मुख्यासि सदैव राधे ॥ ७ ॥


गुप्तं त्विदं गर्गमुखेन वेद्मि
     गृहाण राधे निजनाथमंकात् ।
एनं गृहं प्रापय मेघभीतं
     वदामि चेत्थं प्रकृतेर्गुणाढ्यम् ॥ ८ ॥


नमामि तुभ्यं भुवि रक्ष मां त्वं
     यथेप्सितं सर्वजनैर्दुरापम् ।
श्रीराधोवाव -
अहं प्रसन्ना तव भक्तिभवा-
     न्मद्दर्शनं दुर्लभमेव नंद ॥ ९ ॥


         -श्रीनंद उवाच -
यदि प्रसन्नासि तदा भवेन्मे
     भक्तिर्दृढा कौ युवयोः पदाब्जे ।
सतां च भक्तिस्तव भक्तिभाजां
     संगः सदा मेऽथ युगे युगे च ॥ १० ॥


       -श्रीनारद उवाच -
तथास्तु चोक्त्वाथ हरिं कराभ्यां
     जग्राह राधा निजनाथमंकात् ।
गतेऽथ नंदे प्रणते व्रजेशे
     तदा हि भांडीरवनं जगाम ॥ ११ ॥


गोलोकलोकाच्च पुरा समागता
     भूमिर्निजं स्वं वपुरादधाना ।
या पद्मरागादिखचित्सुवर्णा
     बभूव सा तत्क्षणमेव सर्वा ॥ १२ ॥


वृंदावनं दिव्यवपुर्दधानं
     वृक्षैर्वरैः कामदुघैः सहैव ।
कलिंदपुत्री च सुवर्णसौधैः
     श्रीरत्‍नसोपानमयी बभूव ॥ १३ ॥


गोवर्धनो रत्‍नशिलामयोऽभू-
     त्सुवर्णशृङ्गैः परितः स्फुरद्‌भिः ।
मत्तालिभिर्निर्झरसुंदरीभि-
     र्दरीभिरुच्चांगकरीव राजन् ॥ १४ ॥


तदा निकुंजोऽपि निजं वपुर्दध-
     त्सभायुतं प्रांगणदिव्यमंडपम् ।
वसंतमाधुर्यधरं मधुव्रतै-
     र्मयूरपारावतकोकिलध्वनिम् ॥१५॥


सुवर्णरत्‍नादिखचित्पटैर्वृतं
     पतत्पताकावलिभिर्विराजितम् ।
सरः स्फुरद्‌भिर्भ्रमरावलीढितै-
     र्विचर्चितं कांचनचारुपंकजैः ॥१६॥


तदैव साक्षात्पुरुषोत्तमोत्तमो
     बभूव कैशोरवपुर्घनप्रभः ।
पीतांबरः कौस्तुभरत्‍नभूषणो
     वंशीधरो मन्मथराशिमोहनः ॥१७॥


भुजेन संगृह्य हसन्प्रियां हरि-
     र्जगाम मध्ये सुविवाहमंडपम् ।
विवाहसंभारयुतः समेखलं
     सदर्भमृद्‌वारिघटादिमंडितम् ॥१८॥


तत्रैव सिंहासन उद्‌गते वरे
     परस्परं संमिलितौ विरेजतुः ।
परं ब्रुवंतौ मधुरं च दंपती
     स्फुरत्प्रभौ खे च तडिद्‌घनाविव ॥१९॥


तदांबराद्‌देववरो विधिः प्रभुः
     समागतस्तस्य परस्य संमुखे ।
नत्वा तदंघ्री ह्युशती गिराभिः
     कृताञ्जलिश्चारु चतुर्मुखो जगौ ॥२०॥


         -श्रीब्रह्मोवाच -
अनादिमाद्यं पुरुषोत्तमोत्तमं
     श्रीकृष्णचन्द्रं निजभक्तवत्सलम् ।
स्वयं त्वसंख्यांडपतिं परात्परं
     राधापतिं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् ॥२१॥


गोलोकनाथस्त्वमतीव लीलो
     लीलावतीयं निजलोकलीला ।
वैकुंठनाथोऽसि यदा त्वमेव
     लक्ष्मीस्तदेयं वृषभानुजा हि ॥२२॥


त्वं रामचंद्रो जनकात्मजेयं
     भूमौ हरिस्त्वं कमलालयेयम् ।
यज्ञावतारोऽसि यदा तदेयं
     श्रीदक्षिणा स्त्री प्रतिपत्‍निमुख्या ॥२३॥


त्वं नारसिंहोऽसि रमा तदेयं
     नारायणस्त्वं च नरेण युक्तः ।
तदा त्वियं शांतिरतीव साक्षा-
     च्छायेव याता च तवानुरूपा ॥२४॥


त्वं ब्रह्म चेयं प्रकृतिस्तटस्था
     कालो यदेमां च विदुः प्रधानाम् ।
महान्यदा त्वं जगदंकुरोऽसि
     राधा तदेयं सगुणा च माया ॥२५॥


यदांतरात्मा विदितश्चतुर्भि-
     स्तदा त्वियं लक्षणरूपवृत्तिः ।
यदा विराड्‍देहधरस्त्वमेव
     तदाखिलं वा भुवि धारणेयम् ॥२६॥


श्यामं च गौरं विदितं द्विधा मह-
     स्तवैव साक्षात्पुरुषोत्तमोत्तम ।
गोलोकधामाधिपतिं परेशं
     परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् ॥२७॥

सदा पठेद्यो युगलस्तवं परं
     गोलोकधामप्रवरं प्रयाति सः ।
इहैव सौंदर्यसमृद्धिसिद्धयो
     भवंति तस्यापि निसर्गतः पुनः ॥२८॥


यदा युवां प्रीतियुतौ च दंपती
     परात्परौ तावनुरूपरूपितौ ।
तथापि लोकव्यवहारसङ्ग्रहा-
     द्विधिं विवाहस्य तु कारयाम्यहम् ॥२९॥


         - श्रीनारद उवाच -
तदा स उत्थाय विधिर्हुताशनं
     प्रज्वाल्य कुंडे स्थितयोस्तयोः पुरः ।
श्रुतेः करग्राहविधिं विधानतो
     विधाय धाता समवस्थितोऽभवत् ॥३०॥


स वाहयामास हरिं च राधिकां
     प्रदक्षिणं सप्तहिरण्यरेतसः ।
ततश्च तौ तं प्रणमय्य वेदवित्तौ-
     पाठयामास च सप्तमंत्रकम् ॥३१॥


ततो हरेर्वक्षसि राधिकायाः
     करं च संस्थाप्य हरेः करं पुनः ।
श्रीराधिकायाः किल पृष्ठदेशके
     संस्थाप्य मंत्रांश्च विधिः प्रपाठयन् ॥३२॥


राधा कराभ्यां प्रददौ च मालिकां
     किंजल्किनीं कृष्णगलेऽलिनादिनीम् ।
हरेः कराभ्यां वृषभानुजा गले ।
     ततश्च वह्निं प्रणमय्य वेदवित् ॥३३॥


संवासयामास सुपीठयोश्च तौ
     कृतांजली मौनयुतौ पितामहः ।
तौ पाठयामास तु पंचमंत्रकं
     समर्प्य राधां च पितेव कन्यकाम् ॥३४॥

इति श्रीगर्गसंहितायां गोलोकखण्डे नारदबहुलाश्वसंवादे श्रीराधिकाविवाहवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥



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 श्री राधा के दिव्य तेज अभिभूत हो नन्द ने तत्काल उनके सामने मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा- ‘राधे ! ये साक्षात पुरुषोत्तम हैं और तुम इनकी मुख्य प्राणवल्लभा हो।७।

 यह गुप्त रहस्य मैं गर्गजी के मुख से सुनकर जानता हूँ। राधे ! अपने प्राणनाथ को मेरे अंक से ले लो। ये बादलों की गर्जना से डर गये हैं। इन्होंने लीलावश यहाँ प्रकृति के गुणों को स्वीकार किया है।८।

इसीलिये इनके विषय में इस प्रकार भयभीत होने की बात कही गयी है। देवि ! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम इस भूतल पर मेरी यथेष्ट रक्षा करो। तुमने कृपा करके ही मुझे दर्शन दिया है, वास्तव में तो तुम सब लोगों के लिये दुर्लभ हो’। ८-१/२।

श्री राधा ने कहा- नन्द जी ! तुम ठीक कहते हो। मेरा दर्शन दुर्लभ ही है। आज तुम्हारे भक्ति-भाव से प्रसन्न होकर ही मैंने तुम्हें दर्शन दिया है। ९।

श्री नन्द बोले- देवि ! यदि वास्तव में तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो तुम दोनों प्रिया-प्रियतम के चरणारविन्दों में मेरी सुदृढ भक्ति बनी रहे। साथ ही तुम्हारी भक्ति से भरपूर साधु-संतों का संग मुझे सदा मिलता रहे। प्रत्येक युग में उन संत-महात्माओं के चरणों में मेरा प्रेम बना रहे। ।१०।


श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! तब ‘तथास्तु’ कहकर श्रीराधा ने नन्द जी को गोद से अपने प्राणनाथ को दोनों हाथों में ले लिया। फिर जब नन्दराय जी उन्हें प्रणाम करके वहाँ से चले गये, तब श्री राधिका जी भाण्डीर वन में गयीं। ।११।


पहले गोलोकधाम से जो ‘पृथ्वी देवी’ इस भूतल पर उतरी थी, वे उस समय अपना दिव्य रूप धारण करके प्रकट हुई। उक्त धाम में जिस तरह पद्भराग मणि से जटित सुवर्णमयी भूमि शोभा पाती है, उसी तरह इस भूतल पर भी व्रजमण्डल में उस दिव्य भूमिका तत्क्षण अपने सम्पूर्ण रूप से आविर्भाव हो गया।१२।

 वृन्दावन काम पूरक दिव्य वृक्षों के साथ अपन दिव्य रूप धारण करके शोभा पाने लगा। कलिन्दनन्दिनी यमुना भी तट पर सुवर्णनिर्मित प्रासादी तथा सुन्दर रत्नमय सोपानों से सम्पन्न हो गयी।१३।

 गोवर्धन पर्वत रत्नमयी शिलाओं से परिपूर्ण हो गया। उसके स्वर्णमय शिखर सब ओर से उद्भासित होने लगे। राजन ! मतवाले भ्रमरों तथा झरनों से सुशोभित कन्दराओं द्वारा वह पर्वतराज अत्यंत ऊँचे अंग वाले गजराज की भाँति सुशोभित हो रहा था।१४।


 उस समय वृन्दावन के निकुंज ने भी अपना दिव्य रूप प्रकट किया। उसमें सभाभवन, प्रांगण तथा दिव्य मण्डप शोभा पाने लगे। वसंत ऋतु की सारी मधुरिमा वहाँ अभिवयक्त हो गयी। मधुपों, मयूरों, कपोतों तथा कोकिलों के कलरव सुनायी देने लगे।१५।

निकुंजवर्ती दिव्य मण्डपों के शिखर सुवर्ण-रत्नादि से खचित कलशों से अलंकृत थे। सब ओर फहराती हुई पताकाएँ उनकी शोभा बढ़ाती थी। वहाँ एक सुन्दर सरोवर प्रकट हुआ, जहाँ सुवर्णमय सुन्दर सरोज खिले हुए थे और उन सरोजों पर बैठी हुई मधुपावलियाँ उनके मधुर मकरन्द का पान कर रही थी।१६।


 दिव्यधाम की शोभा का अवतरण होते ही साक्षात पुरुषोत्तमोत्तम घनश्याम भगवान श्रीकृष्ण किशोरावस्था के अनुरूप दिव्य देह धारण करके श्री राधा के सम्मुख खड़े हो गये। 

उनके श्री अंगों पर पीताम्बर शोभा पा रहा था। कौस्तुभ मणि से विभूषित हो, हाथ में वंशी धारण किये वे नन्दनन्दन राशि-राशि मन्मथों (कामदेवों) को मोहित करने लगे। १७।

उन्होंने हँसते हुए प्रियतमा का हाथ अपने हाथ में थाम लिया और उनके साथ विवाह-मण्डप में प्रविष्ट हुए। उस मण्ड़प में विवाह की सब सामग्री संग्रह करके रखी गयी थी। मेखला, कुशा, सप्तमृत्तिका और जल से भरे कलश आदि उस मण्ड़प की शोभा बढ़ा रहे थे। १८।


वहीं एक श्रेष्ठ सिंहासन प्रकट हुआ, जिस पर वे दोनों प्रिया-प्रियतम एक-दूसरे से सटकर विराजित हो गये और अपनी दिव्य शोभा का प्रसार करने लगे। वे दोनों एक-दूसरे से मीठी-मीठी बातें करते हुए मेघ और विधुत की भाँति अपनी प्रभा से उद्दीप्त हो रहे थे। १९।


उसी समय देवताओं में श्रेष्ठ विधाता-भगवान ब्रह्मा आकाश से उतर कर परमात्मा श्रीकृष्ण के सम्मुख आये और उन दोनों के चरणों में प्रणाम करके, हाथ जोड़ कमनीय वाणी द्वारा चारों मुखों से मनोहर स्तुति करने लगे।२०।


श्री ब्रह्मा जी बोले- प्रभो ! आप सबके आदिकारण हैं, किंतु आपका कोई आदि-अंत नहीं है। आप समस्त पुरुषोत्तमों में उत्तम हैं। अपने भक्तों पर सदा वात्सल्य भाव रखने वाले और ‘श्रीकृष्ण’ नाम से विख्यात हैं। अगणित ब्रह्माण्ड के पालक-पति हैं। ऐसे आप परात्पर प्रभु राधा-प्राणवल्लभ श्रीकृष्णचन्द्र की मैं शरण लेता हूँ। ।२१।

आप गोलोकधाम के अधिनाथ है, आपकी लीलाओं का कहीं अंत नहीं है। आपके साथ ये लीलावती श्रीराधा अपने लोक (नित्यधाम) में ललित लीलाएँ किया करती हैं। जब आप ही ‘वैकुण्ठनाथ’ के रूप में विराजमान होते हैं, तब ये वृषभानु नन्दिनी ही ‘लक्ष्मी’ रूप से आपके साथ सुशोभित होती हैं। २२।


जब आप ‘श्रीरामचन्द्र’ के रूप में भूतल पर अवतीर्ण होते हैं, तब ये जनक नन्दिनी ‘सीता’ के रूप में आपका सेवन करती हैं। आप ‘श्रीविष्णु’ हैं और ये कमलवन वासिनी ‘कमला’ हैं; जब आप ‘यज्ञ-पुरुष’ का अवतार धारण करते हैं, तब ये श्रीजी आपके साथ ‘दक्षिणा’ रूप में निवास करती हैं। आप पति शिरोमणी हैं तो ये पत्नियों में प्रधान हैं।२३।

 आप ‘नृसिंह’ हैं तो ये आपके ह्र्दय में ‘रमा’ रूप से निवास करती हैं। आप ही ‘नर-नारायण’ रूप से रहकर तपस्या करते हैं, उस समय आपके साथ ये ‘परम शांति’ के रूप में विराजमान होती हैं। आप जहाँ जिस रूप में रहते हैं, वहाँ तदनुरूप देह धारण करके ये छाया की भाँति आपके साथ रहती हैं। २४।

आप ‘ब्रह्म’ हैं और ये ‘तटस्था प्रकृति’। आप जब ‘काल’ रूप से स्थित होते हैं, तब इन्हें ‘प्रधान’ (प्रकृति) के रूप में जाना जाता है। जब आप जगत के अंकुर ‘महान’ (महत्तत्त्व) रूप में स्थित होते हैं। तब ये श्रीराधा ‘सगुण माया’ रूप से स्थित होती हैं। २५।

जब आप मन, बुद्धि, चित्त और अन्हकार-इन चारों अंत:करणों के साथ ‘अंतरात्मा’ रूप से स्थित होते हैं, तब ये श्रीराधा ‘लक्षणावृत्ति’ के रूप में विराजमान होती हैं। जब आप ‘विराट’ रूप धारण करते हैं, तब ये अखिल भूमण्डल में ‘धारणा’ कहलाती हैं। २६।

पुरुषोत्तमोत्तम ! आपका ही श्याम और गौर-द्विविध तेज सर्वत्र विदित है। आप गोलोकधाम के अधिपति परात्पर परमेश्वर हैं। मैं आपकी शरण लेता हूँ। २७।

जो इस युगलरूप की उत्तम स्तुति का सदा पाठ करता है, वह समस्त धामों में श्रेष्ठ गोलोकधाम में जाता है और इस लोक में भी उसे स्वभावत: सौन्दर्य, समृद्धि और सिद्धियों की प्राप्ति होती है।२८।

 यद्यपि आप दोनों नित्य-दम्पत्ति हैं और परस्पर प्रीति से परिपूर्ण रहते हैं, परात्पर होते हुए भी एक-दूसरे के अनुरूप रूप धारण करके लीला-विलास करते हैं; तथापि मैं लोक-व्यवहार की सिद्धि या लोकसंग्रह के लिये आप दोनों की वैवाहिक विधि सम्पन्न कराऊँगा।२९।

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 श्री नारद जी कहते हैं- राजन ! इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजी ने उठकर कुण्ड में अग्नि प्रज्वलित की और अग्निदेव के सम्मुख बैठे हुए उन दोनों प्रिया-प्रियतम के वैदिक विधान से पाणिग्रहण-संस्कार की विधि पूरी की। ।३०।

यह सब करके ब्रह्माजी ने खड़े होकर श्री हरि और राधिकाजी से अग्निदेव की सात परिक्रमाएँ करवायीं। तदनंतर उन दोनों को प्रणाम करके वेदवेत्ता विधाता ने उन दोनों से सात मंत्र पढ़वाये। ३१।

उसके बाद श्रीकृष्ण के वक्ष:स्थल पर श्रीराधिका का हाथ रखवाकर और श्रीकृष्ण का हाथ श्रीराधिका के पृष्ठ-देश  में (पीठ पर )स्थाापित करके विधाता ने उनसे मंत्रों का उच्च स्वर से पाठ करवाया।३२।

 उन्होंने राधा के हाथों से श्रीकृष्ण के कण्ठ में एक केसरयुक्त माला पहनायी, जिस पर भ्रमर गुञ्जार कर रहे थे। इसी तरह श्रीकृष्ण के हाथों से भी वृषभानु नन्दिनी के गले में माला पहनवाकर वेदज्ञ ब्रह्माजी ने उन दोनों से अग्निदेव को प्रणाम करवाया। ३३।

और सुन्दर सिंहासन पर इन अभिनव दम्पत्ति को बैठाया। वे दोनों हाथ जोड़े मौन रहे।
 पितामह ने उन दोनों से पांच मंत्र पढ़वाये और जैसे पिता अपनी पुत्री का सुयोग्यम वर के हाथ में दान करता है, उसी प्रकार उन्होंंने श्रीराधा को श्रीकृष्ण के हाथ में सौंप दिया। ३४।

राजन ! उस समय देवताओं ने फूल बरसाये और विद्याधरियों के साथ देवताओं ने फूल बरसाये और विद्याधरियों के साथ देवांगनाओं ने नृत्यत किया।
 गन्धर्वों, विद्याधरों, चारणों और किंनरों ने मधुर स्वरर से श्रीकृष्ण के लिए सुमंगल गान किया। ३५।

(भाण्डीर -वन में नन्द के द्वारा राधा जी की स्तुति)

प्रस्तुति करण:- यादव योगेश कुमार "रोहि"
8077160219-





कौन थे राधा के पति : 
ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड 2 के अध्याय 49 के श्लोक 39 और 40 के अनुसार राधा जब बड़ी हुई तो उनके माता पिता ने रायाण नामक एक वैश्य के साथ उसका संबंध निश्चित कर दिया। 
उस समय राधा घर में अपनी छाया का स्थापित करके खुद अन्तर्धान हो गईं। 
उस छाया के साथ ही उक्त रायाण का विवाह हुआ।
 
इसी श्लोक में आगे बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण की माता यशोदा का वह रायाण सगा भाई था, जो गोलक में कृष्ण का अंश और यहां यशोदा के संबंध से उनका मामा था। 

मतलब यह कि राधा श्रीकृष्ण की मामी थी। यदि हम यह मानें कि श्रीकृष्ण यशोदा के नहीं देवकी के पुत्र थे तो फिर राधा उनकी मामी नहीं लगती थीं।

 रायाण को रापाण अथवा अयनघोष भी कहा जाता था। पिछले जन्म में राधा का पति रायाण गोलोक में श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप था। 

ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः २ (प्रकृतिखण्डः)/अध्यायः ४९

                  ।।पार्वत्युवाच ।।


कथं सुदामशापञ्च सा देवी ललाभ ह ।।
कथं शशाप भृत्यो हि स्वाभीष्टां देवकामिनीम् ।। १ ।।
               ।।श्रीभगवानुवाच ।।
शृणु देवी प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ।।
गोप्यं सर्वपुराणेषु शुभदं भक्तिमुक्तिदम् ।। २ ।।


एकदा राधिकेशश्च गोलोके रासमण्डले ।।
शतशृंगाख्यगिर्येकदेशे वृन्दावने वने ।।३।।


गृहीत्वा विरजां गोपीं सुभाग्यां राधिकासमाम् ।।
क्रीडां चकार भगवान्रत्नभूषणभूषितः ।। ४ ।।


रत्नप्रदीपसंयुक्ते रत्ननिर्माणमण्डले ।।
अमूल्यरत्नखचितमञ्चके पुष्पतल्पके ।। ५ ।।


कस्तूरीकुंकुमारक्ते सुचन्दनसुधूपिते ।।
सुगन्धिमालतीमालासमूहपरिमण्डिते ।।६।।


सुरताद्विरतिर्नास्ति दम्पती रतिपण्डितौ ।।
तौ द्वौ परस्पराक्तौ सुखसम्भोगतन्त्रितौ ।। ७ ।।


मन्वन्तराणां लक्षश्च कालः परिमितो गतः ।।
गोलोकस्य स्वल्पकाले जन्मादिरहितस्य च ।। ८ ।।


दूत्यश्चतस्रो ज्ञात्वाऽथ जगदुस्तां तु राधिकम् ।।
श्रुत्वा परमरुष्टा सा तत्याज हरिमीश्वरी ।।९।।


प्रबोधिता च सखिभिः कोपरक्तास्यलोचना ।।
विहाय रत्नालङ्कारं वह्निशुद्धांशुके शुभे ।। 2.49.१० ।


क्रीडापद्मं च सद्रत्नामूल्यदर्पणमुज्ज्वलम् ।।
निर्मार्जयामास सती सिन्दूरं चित्रपत्रकम् ।। ११ ।।


प्रक्षाल्य तोयाञ्जलिभिर्मुखरागमलक्तकम् ।।
विस्रस्तकबरीभारा मुक्तकेशी प्रकम्पिता ।। १२ ।।


शुक्लवस्त्रपरीधाना रूक्षा वेषादिवर्जिता ।।
ययौ यानान्तिकं तूर्णं प्रियालीभिर्निवारिता।।१३।।


आजुहाव सखीसंघं रोषविस्फुरिताधरा ।।
शश्वत्कम्पान्वितांगी सा गोपीभिः परिवारिता ।।१४।।


ताभिर्भक्त्या युताभिश्च कातराभिश्च संस्तुता ।।
आरुरोह रथं दिव्यममूल्यं रत्ननिर्मितम् ।।
दशयोजनविस्तीर्णं दैर्घ्ये तच्छतयोजनम् ।।१५।।


सहस्रचक्रयुक्तं च नानाचित्रसमन्वितम् ।।
नानाविचित्रवसनैः सूक्ष्मैः क्षौमैर्विराजितम् ।। १६ ।।


अमूल्यरत्ननिर्माणदर्पणैः परिशोभितम् ।।
मणीन्द्रजालमालाभैः पुष्पमालासहस्रकैः ।। १७ ।।


सद्रत्न कलशैर्युक्तं रम्यैर्मन्दिरकोटिभिः ।।
त्रिलक्षकोटिभिः सार्द्ध गोपीभिश्च प्रियालिभिः ।। १८ ।।


ययौ रथेन तेनैव सुमनोमालिना प्रिये ।।
श्रुत्वा कोलाहलं गोपः सुदामा कृष्णपार्षदः ।। १९ ।।


कृष्णं कृत्वा सावधानं गोपैः सार्द्धं पलायितः ।।
भयेन कृष्णः सन्त्रस्तो विहाय विरजां सतीम्।।2.49.२०।


स्वप्रेममग्नः कृष्णोऽपि तिरोधानं चकार सः ।।
सा सती समयं ज्ञात्वा विचार्य्य स्वहृदि क्रुधा ।। २१ ।।


राधाप्रकोपभीता च प्राणांस्तत्याज तत्क्षणम् ।।
विरजालिगणास्तत्र भयविह्वलकातराः ।। २२ ।।


प्रययुः शरणं साध्वीं विरजां तत्क्षणं भिया ।।
गोलोके सा सरिद्रूपा जाता वै शैलकन्यके ।। २३ ।।


कोटियोजनविस्तीर्णा दीर्घे शतगुणा तथा ।।
गोलोकं वेष्टयामास परिखेव मनोहरा ।। २४ ।।


बभूवुः क्षुद्रनद्यश्च तदाऽन्या गोप्य एव च ।।
सर्वा नद्यस्तदंशाश्च प्रतिविश्वेषु सुन्दरि ।। २५ ।।


इमे सप्त समुद्राश्च विरजानन्दना भुवि ।।
अथागत्य महाभागा राधा रासेश्वरी परा ।। २६ ।।


न दृष्ट्वा विरजां कृष्णं स्वगृहं च पुनर्ययौ ।।
जगाम कृष्णस्तां राधां गोपालैरष्टभिः सह ।। २७ ।।


गोपीभिर्द्वारि युक्ताभिर्वारितोऽपि पुनः पुनः ।।
दृष्ट्वा कृष्णं च सा देवी भर्त्सयामास तं तदा ।। २८ ।।


सुदामा भर्त्सयामास तां तथा कृष्णसन्निधौ ।।
क्रुद्धा शशाप सा देवी सुदामानं सुरेश्वरी ।। २९ ।।


गच्छ त्वमासुरीं योनिं गच्छ दूरमतो द्रुतम् ।।
शशाप तां सुदामा च त्वमितो गच्छ भारतम् ।।2.49.३० ।।
भव गोपी गोपकन्यामुख्याभिः स्वाभिरेव च ।।
तत्र ते कृष्णविच्छेदो भविष्यति शतं समाः ।। ।।३१।।


तत्र भारावतरणं भगवांश्च करिष्यति ।।
इति शप्त्वा सुदामाऽसौ प्रणम्य जननीं हरिम् ।।
साश्रुनेत्रो मोहयुक्तस्ततो गन्तुं समुद्यतः ।। ३२ ।।


राधा जगाम तत्पश्चात्साश्रुनेत्राऽतिविह्वला ।।
वत्स क्व यासीत्युच्चार्य्य पुत्रविच्छेदकातरा ।। ३३ ।।


कृष्णस्तां बोधयामास विद्यया च कृपानिधिः ।।
शीघ्रं संप्राप्स्यसि सुतं मा रुदस्त्वं वरानने ।। ३४ ।।


स चासुरः शङ्खचूडो बभूव तुलसीपतिः ।।
मच्छूलभिन्नकायेन गोलोकं वै जगाम सः ।। ३५ ।।


राधा जगाम वाराहे गोकुलं भारतं सती ।।
वृषभानोश्च वैश्यस्य सा च कन्या बभूव ह ।। ३६ ।।


अयोनिसम्भवा देवी वायुगर्भा कलावती ।।
सुषुवे मायया वायुं सा तत्राविर्बभूव ह ।। ३७ ।।

______________________________________
अतीते द्वादशाब्दे तु दृष्ट्वा तां नवयौवनाम् ।।
सार्धं रायाणवैश्येन तत्सम्बन्धं चकार सः ।। ३८ ।।


छायां संस्थाप्य तद्गेहे साऽन्तर्द्धानमवाप ह ।।
बभूव तस्य वैश्यस्य विवाहश्छायया सह ।। ३९ ।।


गते चतुर्दशाब्दे तु कंसभीतेश्छलेन च ।।
जगाम गोकुलं कृष्णः शिशुरूपी जगत्पतिः ।2.49.४० ।।


कृष्णमाता यशोदा या रायाणस्तत्सहोदरः ।।
गोलोके गोपकृष्णांशः सम्बन्धात्कृष्णमातुलः।।४१।।


कृष्णेन सह राधायाः पुण्ये वृन्दावने वने ।।
विवाहं कारयामास विधिना जगतां विधिः।।४२।।


स्वप्ने राधापदाम्भोजं नहि पश्यन्ति बल्लवाः।।
स्वयं राधा हरेः क्रोडे छाया रायाणमन्दिरे।।४३।।


षष्टिवर्षसहस्राणि तपस्तेपे पुरा विधिः।।
राधिकाचरणाम्भोजदर्शनार्थी च पुष्करे ।।४४।।


भारावतरणे भूमेर्भारते नन्दगोकुले ।।
ददर्श तत्पदाम्भोजं तपसस्तत्फलेन च।४५।।


किञ्चित्कालं स वै कृष्णः पुण्ये वृन्दावने वने ।।
रेमे गोलोकनाथश्च राधया सह भारते।। ४६ ।।


ततः सुदामशापेन विच्छेदश्च बभूव ह ।।
तत्र भारावतरणं भूमेः कृष्णश्चकार सः ।। ४७ ।।


शताब्दे समतीते तु तीर्थयात्राप्रसंगतः ।।
ददर्श कृष्णं सा राधा स च तां च परस्परम् ।। ४८ ।।


ततो जगाम गोलोकं राधया सह तत्त्ववित् ।।
कलावती यशोदा च पर्यगाद्राधया सह ।। ४९ ।।


वृषभानुश्च नन्दश्च ययौ गोलोकमुत्तमम् ।।
सर्वे गोपाश्च गोप्यश्च ययुस्ता याः समागताः।2.49.५० ।।

छाया गोपाश्च गोप्यश्च प्रापुर्मुक्तिं च सन्निधौ ।।
रेमिरे ताश्च तत्रैव सार्द्धं कृष्णेन पार्वति ।। ५१ ।।


षट्त्रिंशल्लक्षकोट्यश्च गोप्यो गोपाश्च तत्समाः ।।
गोलोकं प्रययुर्मुक्ताः सार्धं कृष्णेन राधया ।। ५२ ।।

__________________________        
द्रोणः प्रजापतिर्नन्दो यशोदा तत्प्रिया धरा ।।
संप्राप पूर्वतपसा परमात्मानमीश्वरम् ।। ५३ ।।


वसुदेवः कश्यपश्च देवकी चादितिः सती ।।
देवमाता देवपिता प्रतिकल्पे स्वभावतः ।। ५४ ।।


पितॄणां मानसी कन्या राधामाता कलावती ।।
वसुदामापि गोलोकाद् वृषभानुः समाययौ ।। ५५ ।।

_________________________________
इत्येवं कथितं दुर्गे राधिकाख्यानमुत्तमम् ।।
सम्पत्करं पापहरं पुत्रपौत्रविवर्धनम् ।। ५६ ।।


श्रीकृष्णश्च द्विधारूपो द्विभुजश्च चतुर्भुजः ।।
चतुर्भुजश्च वैकुण्ठे गोलोके द्विभुजः स्वयम् ।। ५७ ।।


चतुर्भुजस्य पत्नी च महालक्ष्मीः सरस्वती ।।
गंगा च तुलसी चैव देव्यो नारायणप्रियाः ।।५८।।


श्रीकृष्णपत्नी सा राधा तदर्द्धाङ्गसमुद्भवा ।।
तेजसा वयसा साध्वी रूपेण च गुणेन च ।। ५९ ।।

____________________
आदौ राधां समुच्चार्य पश्चात्कृष्णं वदेद्बुधः ।।
व्यतिक्रमे ब्रह्महत्यां लभते नात्र संशयः ।। 2.49.६० ।।

कार्त्तिकीपूर्णिमायां च गोलोके रासमण्डले ।।
चकार पूजां राधायास्तत्सम्बन्धिमहोत्सवम् ।। ६१ ।।


सद्रत्नघुटिकायाश्च कृत्वा तत्कवचं हरिः ।।
दधार कण्ठे बाहौ च दक्षिणे सह गोपकैः ।। ६२ ।।


कृत्वा ध्यानं च भक्त्या च स्तोत्रमेतच्चकार सः ।।
राधाचर्वितताम्बूलं चखाद मधुसूदनः ।। ६३ ।।


राधा पूज्या च कृष्णस्य तत्पूज्यो भगवान्प्रभुः ।।
परस्पराभीष्टदेवे भेदकृन्नरकं व्रजेत् ।। ६४ ।।


द्वितीये पूजिता सा च धर्मेण ब्रह्मणा मया ।।
अनन्तवासुकिभ्यां च रविणा शशिना पुरा ।। ६५ ।।


महेन्द्रेण च रुद्रैश्च मनुना मानवेन च ।।
सुरेन्द्रैश्च मुनीन्द्रैश्च सर्वविश्वैश्च पूजिता ।। ६६ ।।


तृतीये पूजिता सा च सप्तद्वीपेश्वरेण च ।।
भारते च सुयज्ञेन पुत्रैर्मित्रैर्मुदाऽन्वितैः ।। ६७ ।।


ब्राह्मणेनाभिशप्तेन देवदोषेण भूभृता ।।
व्याधिग्रस्तेन हस्तेन दुःखिना च विदूयता ।। ६८ ।।


संप्राप राज्यं भ्रष्टश्रीः स च राधावरेण च ।।
स्तोत्रेण ब्रह्मदत्तेन स्तुत्वा च परमेश्वरीम् ।। ६९ ।।


अभेद्यं कवचं तस्याः कण्ठे बाहौ दधार सः ।।
ध्यात्वा चकार पूजां च पुष्करे शतवत्सरान् ।2.49.७० ।।


अन्ते जगाम गोलोकं रत्नयानेन भूमिपः ।।
इति ते कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। ७१ ।।

_____________________     
इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे द्वितीये प्रकृतिखण्डे नारदनारायणसंवादान्तर्गत हरगौरीसंवादे राधोपाख्याने राधायाः सुदामशापादिकथनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ४९ ।।

________________________________    


और इसी पुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्डः केे )१५) वें अध्याय में राधा-कृष्ण का विवाह वर्णन है ।


ब्रह्मवैवर्तपुराण खण्डः चतुर्थ (श्रीकृष्णजन्मखण्डः)अध्यायः (१५)

          ।।श्रीनारायण उवाच ।।
एकदा कृष्णसहितो नन्दो वृन्दावनं ययौ।।
तत्रोपवनभाण्डीरे चारयामास गोधनम्।।१।।


सरः सुस्वादुतोयं च पाययामास तत्पपौ ।।
उवास वृक्षमूले च बालं कृत्वा स्ववक्षसि ।। २ ।।


एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो मायामानुषविग्रहः ।।
चकार माययाऽकस्मान्मेघाच्छन्नं नभो मुने ।। ३ ।।


मेघावृतं नभो दृष्ट्वा श्यामलं काननान्तरम्।।
झंझावातं महाशब्दं वज्रशब्दं च दारुणम्।।४।।


वृष्टिधारामतिस्थूलां कम्पमानांश्च पादपान्।।
दृष्ट्वैवं पतितस्कन्धान्नन्दो भयमवाप ह।।५।।


कथं यास्यामि गोवत्सान्विहाय स्वाश्रमं बत।।
गृहं यदि न यास्यामि भविता बालकस्य किम् ।।६।।


एवं नन्दे प्रवदति रुरोद श्रीहरिस्तदा।।
पयोभिया हरिश्चैव पितुः कण्ठं दधार सः।।७।।


एतस्मिन्नन्तरे राधाऽऽजगाम कृष्ण सन्निधिम् ।।
गमनं कुवनी राजहंसखञ्जनगञ्जनम् ।।८।।


शरत्पार्वणचन्द्राभामुष्टवक्त्रमनोहरा ।।
शरन्मध्याह्नपद्मानां शोभामोचनलोचना ।। ९ ।।


परितस्तारकापक्ष्मविचित्रकज्जलोज्ज्वला ।।
खगेन्द्रचञ्चुचारुश्रीशंसानाशकनासिका।4.15.१०।।

___________________________________
तन्मध्यस्थलशोभार्ह स्थूलमुक्ताफलोज्ज्वला।।
कबरीवेषसंयुक्ता मालतीमाल्यवेष्टिता ।।११।।

ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डप्रभामुष्टककुण्डला ।।
पक्वबिम्बफलानां च श्रीमुष्टाधरयुग्मका।।१२।।

मुक्तापङ्क्तिप्रभातैकदन्तपङ्क्तिसमुज्ज्वला ।।
ईषत्प्रफुल्लकुन्दानां सुप्रभानाशकस्मिता ।।१३।।

कस्तूरीबिन्दुसंयुक्त सिन्दूरबिन्दुभूषिता।।
कपालं मल्लिकायुक्तं बिभ्रती श्रीयुतं सती।।१४।।

सुचारुवर्तुलाकारकपोलपुलकान्विता ।।
मणिरत्नेन्द्रसाराणां हारोरःस्थलभूषिता ।। १५ ।।

सुचारुश्रीफलयुगकठिनस्तनसंगता ।।
पत्रावलीश्रिया युक्ता दीप्ता सद्रत्नतेजसा ।।१६।।

सुचारुवर्तुलाकारमुदरं सुमनोहरम् ।।
विचित्रत्रिवलीयुक्तं निम्ननाभिं च बिभ्रती ।। १७ ।। 

सद्रत्नसाररचितमेखलाजालभूषिता ।।

कामास्त्रसारभ्रूभङ्गयोगीन्द्रचित्तमोहिनी ।। १८ ।।

कठिनश्रोणियुगलं धरणीधरनिन्दितम् ।।
स्थलपद्मप्रभामुष्टचरणं दधती मुदा ।। ।। १९ ।।

रत्नभूषणसंयुक्तं यावकद्रवसंयुतम् ।।
मणीन्द्रशोभासंमुष्टसालक्तकपुनर्भवम् ।। 4.15.२० ।।

सद्रत्नसाररचितक्वणन्मञ्जीर रञ्जितम् ।।
रत्नकङ्कणकेयूरचारुशङ्खविभूषिता ।। २१ ।।

रत्नाङ्गुलीयनिकरवह्निशुद्धांशुकोज्वला ।।
चारुचम्पकपुष्पाणां प्रभा मुष्टकलेवरा ।। २२ ।।


सहस्रदलसंयुक्तक्रीडाकमलमुज्ज्वलम् ।।
श्रीमुखश्रीदर्शनार्थं बिभ्रती रत्नदर्पणम् ।। २३ ।।


दृष्ट्वा तां निर्जने नन्दो विस्मयं परमं ययौ ।।
चन्द्रकोटिप्रभामुष्टां भासयन्तीं दिशो दश ।। २४ ।।


ननाम तां साश्रुनेत्रो भक्तिनम्रात्मकन्धरः ।।
जानामि त्वां गर्गमुखात्पद्माधिकप्रियां हरेः ।। २५ ।।


जानामीमं महाविष्णोः परं निर्गुणमच्युतम् ।।
तथापि मोहितोऽहं च मानवो विष्णुमायया ।। २६ ।।


गृहाण प्राणनाथं च गच्छ भद्रे यथासुखम् ।।
पश्चाद्दास्यसि मत्पुत्रं कृत्वा पूर्णमनोरथम् ।। २७ ।।


इत्युक्त्वा प्रददौ तस्यै रुदन्तं बालकं भिया ।।
जग्राह बालकं राधा जहास मधुरं सुखात् ।। २८ ।।


उवाच नन्दं सा यत्नान्न प्रकाश्यं रहस्यकम् ।।
अहं दृष्टा त्वया नन्द कतिजन्मफलोदयात् ।। २९ ।।


प्राज्ञस्त्वं गर्गवचनात्सर्वं जानासि कारणम् ।।
अकथ्यमावयोर्गोप्यं चरितं गोकुले व्रज।।4.15.३०।।


वरं वृणु व्रजेश त्वं यत्ते मनसि वाञ्छितम् ।।
ददामि लीलया तुभ्यं देवानामपि दुर्लभम् ।। ३१ ।।


राधिकावचनं श्रुत्वा तामुवाच व्रजेश्वरः ।।
युवयोश्चरणे भक्तिं देहि नान्यत्र मे स्पृहा ।। ३२ ।।


युवयोः सन्निधौ वासं दास्यसि त्वं सुदुर्लभम् ।।
आवाभ्यां देहि जगतामम्बिके परमेश्वरि ।। ३३ ।।


श्रुत्वा नन्दस्य वचनमुवाच परमेश्वरी ।।
दास्यामि दास्यमतुलमिदानीं भक्तिरस्तु ते ।। ३४ ।।


आवयोश्चरणाम्भोजे युवयोश्च दिवानिशम् ।।
प्रफुल्लहृदये शश्वत्स्मृतिरस्तु सुदुर्लभा ।। ३९ ।।


माया युवां च प्रच्छन्नौ न करिष्यति मद्वरात् ।।
गोलोके यास्यथान्ते च विहाय मानवीं तनुम् ।। ३६ ।।


एवमुक्त्वा तु सानन्दं कृत्वा कृष्णं स्ववक्षसि ।।
दूरं निनाय श्रीकृष्णं बाहुभ्यां च यथेप्सितम् ।। ३७ ।।


कृत्वा वक्षसि तं कामाच्छ्लेषंश्लेषं चुचुम्ब च ।।
पुलकाङ्कितसर्वाङ्गो सस्मार रासमण्डलम् ।। ३८ ।।


एतस्मिन्नन्तरे राधा मायासद्रत्नमण्डपम् ।।
ददर्श रत्नकलशशतेन च समन्वितम् ।। ३९ ।।


नानाविचित्रचित्राढ्यं चित्रकाननशोभितम् ।।
सिन्दूराकारमणिभिः स्तम्भसंघैर्विराजितम्।।4.15.४० ।।


चन्दनागुरुकस्तृरीकुङ्कुमद्रवयुक्तया ।।
संयुक्तं मालतीमालासमूहपुष्पशय्यया ।। ४१ ।।


नानाभोगसमायुक्तं दिव्यदर्पणसंयुतम् ।।
मणीन्द्रमुक्तामाणिक्यमालाजालैर्विभूषितम् ।। ४२ ।।


मणीन्द्रसाररचितकपाटेन समन्वितम् ।।
भूषितं भूषितैर्वस्त्रैः पताकानिकरैर्वरैः ।।
कुङ्कुमाकारमणिभिः सप्तसोपानसंयुतम् ।। ४३ ।।


युक्तं षट्पदसंयुक्तैः पुष्पोद्यानं च पुष्पितैः ।।
सा देवी मण्डपं दृष्ट्वा जगामाभ्यन्तरं मुदा ।। ४४ ।।


ददर्श तत्र ताम्बूलं कर्पूरादिसमन्वितम् ।।
जलं च रत्नकुम्भस्थं स्वच्छं शीतं मनोहरम् ।। ४९ ।।


सुधामधुभ्यां पूर्णानि रत्नकुम्भानि नारद ।।
पुरुषं कमनीयं च किशोर श्यामसुन्दरम् ।।४६।।


कोटिकन्दर्पलीलाभं चन्दनेन विभूषितम् ।।
शयानं पुष्पशय्यायां सस्मितं सुमनोहरम् ।।४७।।


पीतवस्त्रपरीधानं प्रसन्नवदनेक्षणम् ।।
मणीन्द्रसारनिर्माणं क्वणन्मञ्जीररञ्जितम् ।। ४८ ।। 

सद्रत्नसारनिर्माणकेयूरवलयान्वितम् ।।
मणीन्द्रकुण्डलाभ्यां च गण्डस्थलविराजितम् ।। ४९ ।।


कौस्तुभेन मणीन्द्रेण वक्षःस्थलसमुज्ज्वलम् ।। शरत्पार्वणचंद्रास्यप्रभामुष्टमुखोज्ज्वलम्।4.15.५०।।


शरत्प्रफुल्लकमलप्रभामोचनलोचनम् ।।
मालतीमाल्यसंश्लिष्टशिखिपिच्छसुशोभितम् ।। ५१ ।।


त्रिवंकचूडां बिभ्रन्तं पश्यन्तं रत्नमन्दिरम् ।।
क्रोडं बालकशून्यं च दृष्ट्वा तं नवयौवनम् ।। ५२ ।।


सर्वस्मृतिस्वरूपा सा तथापि विस्मयं ययौ ।।
रूपं रासेश्वरी दृष्ट्वा मुमोह सुमनोहरम् ।। ५३ ।।


कामाच्चक्षुश्चकोराभ्यां मुखचन्द्रं पपौ मुदा ।।
निमेषरहिता राधा नवसंगमलालसा ।। ५४ ।।


पुलकाङ्कितसर्वाङ्गी सस्मिता मदनातुरा ।।
तामुवाच हरिस्तत्र स्मेराननसरोरुहाम् ।।
नवसंगमयोग्यां च पश्यन्तीं वक्रचक्षुषा ।। ५५ ।।


                    ।।श्रीकृष्ण उवाच ।।
राधे स्मरसि गोलोकवृत्तान्तं सुरसंसदि ।। ५६ ।।


अद्य पूर्णं करिष्यामि स्वीकृतं यत्पुरा प्रिये ।।
त्वं मे प्राणाधिका राधे प्रेयसी च वरानने ।। ५७ ।।


यथा त्वं च तथाऽहं च भेदो हि नावयोर्ध्रुवम् ।।
यथा क्षीरे च धावल्यं यथाऽग्नौ दाहिका सति ।। ५८ ।।


यथा पृथिव्यां गन्धश्च तथाऽहं त्वयि संततम् ।।
विना मृदा घटं कर्तुं विना स्वर्णेन कुण्डलम् ।। ५९ ।।


कुलालः स्वर्णकारश्च नहि शक्तः कदाचन ।।
तथा त्वया विना सृष्टिमहं कर्तुं न च क्षमः। 4.15.६०।


सृष्टेराधारभूता त्वं बीजरूपोऽहमच्युतः ।।
आगच्छ शयने साध्वि कुरु वक्षःस्थले हि माम् ।। ६१ ।।


त्वं मे शोभा स्वरूपाऽसि देहस्य भूषणं यथा ।।
कृष्णं वदान्त मां लोकास्त्वयैव रहितं यदा ।। ६२ ।।


श्रीकृष्णं च तदा तेऽपि त्वयैव सहितं परम् ।।
त्वं च श्रीस्त्वं च संपत्तिस्त्वमाधारस्वरूपिणी ।। ६३ ।।


सर्वशक्तिस्वरूपासि सर्वरूपोऽहमक्षरः ।।
यदा तेजःस्वरूपोऽहं तेजोरूपाऽसि त्वं तदा ।। ६४ ।।


न शरीरी यदाहं च तदा त्वमशरीरिणी ।।
सर्वबीजस्वरूपोऽहं सदा योगेन सुन्दरि ।। ६५ ।।


त्वं च शक्तिस्वरूपा च सर्वस्त्रीरूपधारिणी ।।
ममाङ्गांशस्वरूपा त्वं मूलप्रकृतिरीश्वरी ।। ६६ ।।


शक्त्या बुद्ध्या च ज्ञानेन मया तुल्या वरानने ।।
आवयोर्भेदबुद्धिं च यः करोति नराधमः ।। ६७ ।।


तस्य वासः कालसूत्रे यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।।
पूर्वान्सप्त परान्सप्त पुरुषान्पातयत्यधः ।। ६८ ।।


कोटिजन्मार्जितं पुण्यं तस्य नश्यति निश्चितम् ।।
अज्ञानादावयोर्निन्दां ये कुर्वन्ति नराधमाः ।। ६९ ।।


पच्यन्ते नरके घोरे यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।।
राशब्दं कुर्वतस्त्रस्तो ददामि भक्तिमुत्तमाम्।4.15.७०।


धाशब्दं कुर्वतः पश्चाद्यामि श्रवणलोभतः ।।
ये सेवन्ते च दत्त्वा मामुपचारांश्च षोडश ।।
यावजीवनपर्यन्तं या प्रीतिर्जायते मम ।। ७१ ।।


सा प्रीतिर्मम जायेत राधाशब्दात्ततोऽधिका ।।
प्रिया न मे तथा राधे राधावक्ता ततोऽधिकः ।। ७२ ।।


ब्रह्मानन्तः शिवो धर्मो नरनारायणावृषी ।।
कपिलश्च गणेशश्च कार्त्तिकेयश्च मत्प्रियः ।। ७३ ।।


लक्ष्मीः सरस्वती दुर्गा सावित्री प्रकृतिस्तथा।।
मम प्रियाश्च देवाश्च तास्तथापि न तत्समाः ।।७४।।


ते सर्वे प्राणतुल्या मे त्वं मे प्राणाधिका सती ।।
भिन्नस्थानस्थितास्ते च त्वं च वक्षःस्थले स्थिता ।। ७५ ।।


या मे चतुर्भुजा मूर्तिर्बिभर्त्ति वक्षसि प्रियाम् ।।
सोऽहं कृष्णस्वरूपस्त्वां विवहामि स्वयं सदा ।। ७६ ।।


इत्येवमुक्त्वा श्रीकृष्णस्तस्थौ तल्पे मनोरमे ।।
उवाच राधिका नाथं भक्तिनम्रात्मकन्धरा ।।७७ ।।


                    ।।राधिकोवाच ।।
स्मरामि सर्वं जानामि विस्मरामि कथं विभो ।।
यत्त्वं वदसि सर्वाहं त्वत्पादाब्जप्रसादतः ।। ७८ ।।


ईश्वरस्याप्रियाः केचित्प्रियाश्च कुत्र केचन ।।
ये यथा मां न स्मरन्ति तथा तेषु तवाकृपा ।। ७९ ।।


तृणं च पर्वतं कर्तु समर्थः पर्वतं तृणम् ।।
तथापि योग्यायोग्ये च संपत्तौ च समा कृपा।4.15.८०।


तिष्ठत्यहं शयानस्त्वं कथाभिर्यत्क्षणं गतम् ।।
तत्क्षणं च युगसमं नाहं प्रापयितुं क्षमा ।।८१।।


वक्षःस्थले च शिरसि देहि ते चरणाम्बुजम् ।।
दुनोति मन्मनः सद्यस्त्वदीयविरहानलात् ।। ८२ ।।


पुरः पपात मे दृष्टिस्त्वदीयचरणाम्बुजे ।।
नीता मया नहि क्लेशाद्द्रष्टुमन्यत्कलेवरम् ।।८३।।


प्रत्येकमङ्गं दृष्ट्वैव दत्ता शान्ते मुखाम्बुजे।।
दृष्ट्वा मुखारविन्दं च नान्यं गन्तुं च सा क्षमा ।। ८४ ।।


राधिकावचनं श्रुत्वा जहास पुरुषोत्तमः ।।
तामुवाच हितं तथ्यं श्रुतिस्मृतिनिरूपितम् ।। ८९ ।।


               ।।श्रीकृष्ण उवाच ।।
न खण्डनीयं तत्तत्र मया पूर्वं निरूपितम् ।।
तिष्ठ भद्रे क्षणं भद्रं करिष्यामि तव प्रिये ।। ८६।।


त्वन्मनोरथपूर्णस्य स्वयं कालः समागतः ।।
यस्य यल्लिखितं पूर्वं यत्र काले निरूपितम् ।। ८७ ।।


तदेव खण्डितुं राधे क्षमो नाहं च को विधिः ।।
विधातुश्च विधाताऽहं येषां यल्लेखनं कृतम् ।। ८८ ।।


ब्रह्मादीनां च क्षुद्राणां न तत्खण्ड्यं कदाचन ।।
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्माऽऽजगाम पुरतो हरेः ।। ८९ ।।


मालाकमण्डलुकर ईषत्स्मेरचतुर्मुखः ।।
गत्वा ननाम तं कृष्णं प्रतुष्टाव यथागमम्।।4.15.९०।।


साश्रुनेत्रपुलकितो भक्तिनम्रात्मकन्धरः।।
स्तुत्वा नत्वा जगद्धाता जगाम हरिसन्निधिम् ।।९१।।


पुनर्नत्वा प्रभुं भक्त्या जगाम राधिकान्तिकम् ।।
मूर्ध्ना ननाम भक्त्या च मातुस्तच्चरणाम्बुजे ।।९२।।


चकार संभ्रमेणैव जटाजालेन वेष्टितम्।।
कमण्डलुजलेनैव शीघ्रं प्रक्षालितं मुदा ।।९३।।


यथागमं प्रतुष्टाव पुटाञ्जलियुतः पुनः ।।
               ।।ब्रह्मोवाच ।। ।।
हे मातस्त्वत्पदाम्भोजं दृष्टं कृष्णप्रसादतः ।।९४।।


सुदुर्लभं च सर्वेषां भारते च विशेषतः ।।
षष्टिवर्षसहस्राणि तपस्तप्तं पुरा मया ।। ९५ ।।


भास्करे पुष्करे तीर्थे कृष्णस्य परमात्मनः ।।
आजगाम वरं दातुं वरदाता हरिः स्वयम् ।। ९६ ।।


वरं वृणीष्वेत्युक्ते च स्वाभीष्टं च वृतं मुदा ।।
राधिकाचरणाम्भोजं सर्वेषामपि दुर्लभम् ।। ९७ ।।


हे गुणातीत मे शीघ्रमधुनैव प्रदर्शय ।।
मयेत्युक्तो हरिरयमुवाच मां तपस्विनम् ।। ९८ ।।


दर्शयिष्यामि काले च वत्सेदानीं क्षमेति च ।।
नहीश्वराज्ञा विफला तेन दृष्टं पदाम्बुजम् ।। ९९ ।।


सर्वेषां वाञ्छितं मातर्गोलोके भारतेऽधुना ।।
सर्वा देव्यः प्रकृत्यंशा जन्याः प्राकृतिका ध्रुवम् ।। 4.15.१०० ।।


त्वं कृष्णाङ्गार्धसंभूता तुल्या कृष्णेन सर्वतः ।।
श्रीकृष्णस्त्वमयं राधा त्वं राधा वा हरिः स्वयम् ।। १०१ ।।


नहि वेदेषु मे दृष्ट इति केन निरूपितम् ।।
ब्रह्माण्डाद्बहिरूर्ध्वं च गोलोकोऽस्ति यथाम्बिके।१०२।

वैकुण्ठश्चाप्यजन्यश्च त्वमजन्या तथाम्बिके ।।
यथा समस्तब्रह्माण्डे श्रीकृष्णांशांशजीविनः।।१०३।।


तथा शक्तिस्वरूपा त्वं तेषु सर्वेषु संस्थिता।।
पुरुषाश्च हरेरंशास्त्वदंशा निखिलाः स्त्रियः ।।१०४।।


आत्मना देहरूपा त्वमस्याधारस्त्वमेव हि।।
अस्यानु प्राणैस्त्वं मातस्त्वत्प्राणैरयमीश्वरः ।।१०५।।


किमहो निर्मितः केन हेतुना शिल्पकारिणा ।।
नित्योऽयं च तथा कृष्णस्त्वं च नित्या तथाऽम्बिके।१०६।


अस्यांशा त्वं त्वदंशो वाऽप्ययं केन निरूपितः ।।
अहं विधाता जगतां देवानां जनकः स्वयम् ।। १०७ ।।


तं पठित्वा गुरुमुखाद्भवन्त्येव बुधा जनाः ।।
गुणानां वास्तवानां ते शतांशं वक्तुमक्षमः ।। १०८ ।।


वेदो वा पण्डितो वाऽन्यः को वा त्वां स्तोतुमीश्वरः ।।
स्तवानां जनकं ज्ञानं बुद्धिर्ज्ञानाम्बिका सदा ।। १०९ ।।


त्वं बुद्धेर्जननी मातः को वा त्वां स्तोतुमीश्वरः ।।
यद्वस्तु दृष्टं सर्वेषां तद्धि वक्तुं बुधः क्षमः ।।4.15.११०।।


यददृष्टाश्रुते वस्तु तन्निर्वक्तुं च कः क्षमः ।।
अहं महेशोऽनंतश्च स्तोतुं त्वां कोऽपि न क्षमः।। १११ ।।


सरस्वती च वेदाश्च क्षमः कः स्तोतुमीश्वरः ।।
यथागमं यथोक्तं च न मां निन्दितुमर्हसि ।। ११२ ।।


ईश्वराणामीश्वरस्य योग्यायोग्ये समा कृपा।।
जनस्य प्रतिपाल्यस्य क्षणे दोषः क्षणे गुणः ।। ११३ ।।


जननी जनको यो वा सर्वं क्षमति स्नेहतः ।।
इत्युक्त्वा जगतां धाता तस्थौ च पुरतस्तयोः ।।११४।।


प्रणम्य चरणाम्भोजे सर्वेषां वन्द्यमीप्सितम् ।।
ब्रह्मणा च कृतं स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।।११५।।


राधामाधवयोः पादे भक्तिर्दास्यं लभेद्ध्रुवम् ।।
कर्मनिर्मूलनं कृत्वा मृत्युं जित्वा सुदुर्जयम् ।।
विलङ्घ्य सर्वलोकांश्च याति गोलोकमुत्तमम्।। ११६।।


                ।।श्रीनारायण उवाच।।
ब्रह्मणः स्तवनं श्रुत्वा तमुवाच ह राधिका ।। ११७ ।।


वरं वृणु विधातस्त्वं यत्ते मनसि वर्तते ।।
राधिकावचनं श्रुत्वा तामुवाच जगद्विधिः ।। ११८ ।।


वरं च युवयोः पादपद्मभक्तिं च देहि मे ।।
इत्युक्ते विधिना राधा तूर्णमोमित्युवाच ह ।। ११९ ।।


पुनर्ननाम तां भक्त्या विधाता जगतां पतिः ।।
तदा ब्रह्मा तयोर्मध्ये प्रज्वाल्य च हुताशनम् ।4.15.१२०।


हरिं संस्मृत्य हवनं चकार विधिना विधिः।।
उत्थाय शयनात्कृष्ण उवास वह्निसन्निधौ ।। १२१ ।।


ब्रह्मणोक्तेन विधिना चकार हवनं स्वयम् ।।
प्रणमय्य पुनः कृष्णं राधां तां जनकः स्वयम् ।। १२२ ।।


कौतुकं कारयामास सप्तधा च प्रदक्षिणाम् ।।
पुनः प्रदक्षिणां राधां कारयित्वा हुताशनम् ।। १२३ ।।


प्रणमय्य ततः कृष्णं वासयामास तं विधिः ।।
तस्या हस्तं च श्रीकृष्णं ग्राहयामास तं विधिः ।। १२४।।


वेदोक्तसप्तमन्त्रांश्च पाठयामास माधवम् ।।
संस्थाप्य राधिकाहस्तं हरेर्वक्षसि वेदवित् ।। १२५ ।।


श्रीकृष्णहस्तं राधायाः पृष्ठदेशे प्रजापतिः ।।
स्थापयामास मन्त्रांस्त्रीन्पाठयामास राधिकाम् ।।१२६।।


पारिजातप्रसूनानां मालां जानुविलम्बिताम् ।।
श्रीकृष्णस्य गले ब्रह्मा राधाद्वारा ददौ मुदा ।। १२७ ।।


प्रणमय्य पुनः कृष्णं राधां च कमलोद्भवः ।।
राधागले हरिद्वारा ददौ मालां मनोहराम्।।
पुनश्च वासयामास श्रीकृष्णं कमलोद्भवः ।। १२८ ।।


तद्वामपार्श्वे राधां च सस्मितां कृष्णचेतसम् ।।
पुटाञ्जलिं कारयित्वा माधवं राधिकां विधिः ।। ।।१२९।।


पाठयामास वेदोक्तान्पञ्च मन्त्रांश्च नारद ।।
प्रणमय्य पुनः कृष्णं समर्प्य राधिकां विधिः।4.15.१३०।


कन्यकां च यथा तातो भक्त्या तस्थौ हरेः पुरः ।।
एतस्मिन्नन्तरे देवाः सानन्दपुलकोद्गमाः ।। १३१।।


दुन्दुभिं वादयामासुश्चानकं मुरजादिकम्।।
पारिजातप्रसूनानां पुष्पवृष्टिर्बभूव ह ।। १३२ ।।


जगुर्गन्धर्वप्रवरा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।।
तुष्टाव श्रीहरिं ब्रह्मा तमुवाच ह सस्मितः ।।१३३।।


युवयोश्चरणाम्भोजे भक्तिं मे देहि दक्षिणाम्।।
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा तमुवाच हरिः स्वयम् ।।१३४।।


मदीयचरणाम्भोजे सुदृढा भक्तिरस्तु ते ।।
स्वस्थानं गच्छ भद्रं ते भविता नात्र संशयः ।। १३५ ।।


मया नियोजितं कर्म कुरु वत्स ममाज्ञया ।।
श्रीकृष्णस्य वचः श्रुत्वा विधाता जगतां मुने ।। १३६ ।।


प्रणम्य राधां कृष्णं च जगाम स्वालयं मुदा ।।
गते ब्रह्मणि सा देवी सस्मिता वक्रचक्षुषा ।। ।। १३७ ।।


सा ददर्श हरेर्वक्त्रं चच्छाद व्रीडया मुखम् ।।
पुलकाङ्कितसर्वांगी कामबाणप्रपीडिता ।। १३८ ।।


प्रणम्य श्रीहरिं भक्त्या जगाम शयनं हरेः ।।
चन्दनागुरुपङ्कं च कस्तूरीकुङ्कुमान्वितम्।।१३९।।


ललाटे तिलकं कृत्वा ददौ कृष्णस्य वक्षसि ।।
सुधापूर्णं रत्नपात्रं मधुपूर्णं मनोहरम् ।। 4.15.१४० ।।


प्रददौ हरये भक्त्या बुभुजे जगतीपतिः ।।
ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम् ।। १४१ ।।


ददौ कृष्णाय सा राधा सादरं बुभुजे हरिः ।।
चखाद सस्मिता राधा हरिदत्तं सुधारसम् ।।१४२।।


ताम्बूलं तेन दत्तं च बुभुजे पुरतो हरेः ।।
कृष्णश्चर्वितताम्बूलं राधिकायै मुदा ददौ ।।१४३।।


चखाद परया भक्त्या पपौ तन्मुखपङ्कजम् ।।
राधाचर्वितताम्बूलं ययाचे मधुसूदनः ।।१४४।।


जहास न ददौ राधा क्षमेत्युक्तं तया मुदा।।
चन्दनागुरुकस्तूरीकुङ्कुमद्रवमुत्तमम् ।।
राधिकायाश्च सर्वांगे प्रददौ माधवः स्वयम् ।। १४५ ।।


यः कामो ध्यायते नित्यं यस्यैकचरणाम्बुजम् ।।
बभूव तस्य स वशो राधासंतोषकारणात् ।। १४६ ।।


यद्भृत्यभृत्यैर्मदनो जितः सर्वक्षणं मुने ।।
स्वेच्छामयो हि भगवाञ्जितस्तेन कुतूहलात् ।।१४७।।


करे धृत्वा च तां कृष्णः स्थापयामास वक्षसि ।।
चकार शिथिलं वस्त्रं चुम्बनं च चतुर्विधम् ।।१४८।।


बभूव रतियुद्धेन विच्छिन्ना क्षुद्रघण्टिका ।।
चुम्बनेनौष्ठरागश्च ह्याश्लेषेण च पत्रकम् ।।१४९।।


शृंगारेणैव कबरी सिन्दूरतिलकं मुने ।।
जगामालक्तकाङ्कश्च विपरीतादिकेन च ।।4.15.१५०।।


पुलकाङ्कितसर्वांङ्गी बभूव नवसंगमात् ।।
मूर्च्छामवाप सा राधा बुबुधे न दिवानिशम् ।।१५१।।

____________________________   
प्रत्यङ्गेनैव प्रत्यङ्गमङ्गेनाङ्गं समाश्लिषत् ।।
शृङ्गाराष्टविधं कृष्णश्चकार कामशास्त्रवित्।।१५२।।


पुनस्तां च समाश्लिष्य सस्मितां वक्रलोचनाम् ।।
क्षतविक्षतसर्वाङ्गीं नखदन्तैश्चकार ह ।।१५३।।


कङ्कणानां किङ्किणीनां मञ्जीराणां मनोहरः ।।
बभूव शब्दस्तत्रैव शृङ्गारसमरोद्भवः ।। १५४ ।।


पुनस्तां च समाकृष्य शय्यायां च निवेश्य च ।।
चकार रहितां राधां कबरीबन्धवाससा ।। १५५ ।।


निर्जने कौतुकात्कृष्णः कामशास्त्रविशारदः ।।
चूडावेषांशुकैर्हीनं चकार तं च राधिका ।।१५६।।


न कस्य कस्माद्धानिश्च तौ द्वौ कार्यविशारदौ ।।
जग्राह राधाहस्तात्तु माधवो रत्नदर्पणम् ।।१५७।।


मुरलीं माधवकराज्जग्राह राधिका बलात् ।।
चित्तापहारं राधायाश्चकार माधवो बलात् ।।१५८।।


जहार राधिका रासान्माधवस्यापि मानसम् ।।
निवृत्ते कामयुद्धे च सस्मिता वक्रलोचना।।१५९।।


प्रददौ मुरलीं प्रीत्या श्रीकृष्णाय महात्मने।।
प्रददौ दर्पणं कृष्णः क्रीडाकमलमुज्ज्वलम् ।।4.15.१६०।।


चकार कबरीं रम्यां सिन्दूरतिलकं ददौ।।
विचित्रपत्रकं वेषं चकारैवंविधं हरिः।। ।।१६१।।


विश्वकर्मा न जानाति सखीनामपि का कथा ।।
वेषं विधातुं कृष्णस्य यदा राधा समुद्यता ।। १६२ ।।


बभूव शिशुरूपं च कैशोरं च विहाय च ।।
ददर्श बालरूपं तं रुदन्तं पीडितं क्षुधा ।।१६३।।


यादृशं प्रददौ नन्दो भीतं तादृशमच्युतम् ।।
विनिश्वस्य च सा राधा हृदयेन विदूयता ।।१६४।।


इतस्ततस्तं पश्यन्ती शोकार्ता विरहातुरा ।।
उवाच कृष्णमुद्दिश्य काकूक्तिमिति कातरा ।। १६५ ।।


मायां करोषि मायेश किंकरीं कथमीदृशीम् ।।
इत्येवमुक्त्वा सा राधा पपात च रुरोद च ।। ।।१६६।।


रुरोद कृष्णस्तत्रैव वाग्बभूवाशरीरिणी ।।
कथं रोदिषि राधे त्वं स्मर कृष्णपदाम्बुजम्।।१६७।।


आरासमण्डलं यावन्नक्तमत्रागमिष्यति ।।
करिष्यसि रतिं नित्यं हरिणा सार्द्धमीप्सिताम् ।।१६८।।


छायां विधाय स्वगृहे स्वयमागत्य मा रुद ।।
कृत्वा क्रोडे च प्राणेशं मायेशं बालरूपिणम् ।। १६९ ।।


त्यज शोकं गृहं गच्छ सुन्दरीत्थं प्रबोधिता ।।
श्रुत्वैवं वचनं राधा कृत्वा क्रोडे च बालकम् ।। ।। 4.15.१७० ।।


ददर्श पुष्पोद्यानं च वनं सद्रत्नमण्डपम् ।।
तूर्णं वृन्दावनाद्राधा जगाम नन्दमन्दिरम् ।। १७१ ।।


सा मनोयायिनी देवी निमिषार्धेन नारद ।।
संसिक्तस्निग्धमधुररसना रक्तलोचना ।। १७२ ।।


यशोदायै शिशुं दातुमुद्यता सत्युवाच ह ।।
गृहीत्वैवं शिशुं स्थूलं रुदन्तं च क्षुधातुरम् ।। १७३ ।।


गोष्ठे त्वत्स्वामिना दत्तं प्राप्नोमि यातनां पथि ।।
संसिक्तं वसनं वत्से मेघाच्छन्नेऽतिदुर्दिने ।। १७४ ।।


पिच्छिले कर्दमोद्रेके यशोदा वोढुमक्षमा ।।
गृहाण बालकं भद्रे स्तनं दत्त्वा प्रबोधय ।। १७५ ।।


गृहं चिरं परित्यक्तं यामि तिष्ठ सुखं सति ।।
इत्युक्त्वा बालकं दत्त्वा जगाम स्वगृहं प्रति ।। १७६ ।।


यशोदा बालकं नीत्वा चुचुम्ब च स्तनं ददौ ।।
बहिर्निविष्टा सा राधा स्वगृहे गृहकर्मणि ।। १७७ ।।


नित्यं नक्तं रतिं तत्र चकार हरिणा सह ।।
इत्येवं कथितं वत्स श्रीकृष्णचरितं शुभम् ।।
सुखदं मोक्षदं पुण्यमपरं कथयामि ते ।। १७८ ।।

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इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे नारायणनारदसंवादे राधाकृष्णविवाहनवसंगमप्रस्तावो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ।। १५ ।।


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