शनिवार, 14 अगस्त 2021

पद्मपुराण सृष्टि खण्ड अध्याय सत्रह- एवम स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय एकसौइक्यासी ब्यासी और त्रिरासी व प्रभास महात्मयखण्ड का एक सौपैंसठ-

          (पद्मपुराण)

        *पद्मपुराणम्*


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   (प्रथम- सृष्टिखण्डम्)                 (अध्यायः १२)

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पद्म-पुराण सृष्टि की उत्पत्ति अर्थात् ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना और अनेक प्रकार के अन्य ज्ञानों से परिपूर्ण है।
 तथा अनेक विषयों के गम्भीर रहस्यों का इसमें उद्घाटन किया गया है। 
इसमें सृष्टिखंड, भूमिखंड और उसके बाद स्वर्गखण्ड महत्वपूर्ण अध्याय है।

फिर ब्रह्मखण्ड और उत्तरखण्ड के साथ क्रिया योगसार खण्ड कोभी दिया गया है। इसमें अनेक बातें ऐसी हैं जो अन्य पुराणों में भी किसी-न-किसी रूप में मिल जाती हैं।
 किन्तु पद्मपुराण में विष्णु के महत्व के साथ शंकर की अनेक कथाओं को समावेशित कर लिया गया है। 
शिव का विवाह और उसके उपरान्त अन्य ऋषि-मुनियों के कथानक तत्व विवेचन के लिए महत्वपूर्ण है।
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बहुत प्राचीन काल की बात है कि लोमहर्षण ने एकान्त में उग्रश्रवा को बुलाकर पद्म पुराण के दिव्य ज्ञान को फैलाने का आदेश दिया।
 उन्होंने कहा कि जैसे मैंने अपने गुरु व्यास से उसे सुना है, उसी तरह तुम भी इसका विस्तार करो।

 जब उग्रश्रवा ने पूछा कि ऐसे महत्वपूर्ण श्रोता कहां मिलेंगे। तब उन्होंने बताया कि बहुत पहले की बात है, प्रयागराज में अनेक ऋषि-मुनियों ने भगवान नारायण से तप के लिए पवित्र स्थान बताने के लिए कहा था। तब उन्हें नैमिषारण्य (नीमसार)नामक स्थान प्राप्त हुआ था। 
वहां अनेक ऋषि एकत्रित हुए और दिव्य ज्ञान की चर्चाएं चलती रहीं।

इधर जब उग्रश्रवा नैमिषारण्य पहुंचे तो ऋषि ने उनका स्वागत करके उनके आने का कारण पूछा। तब उन्होंने कहा कि मैं आप लोगों को इतिहास और पुराण का ज्ञान देने के लिए आया हूँ। 
तब सौनक ने उनसे पदम् पुराण सुनाने का अनुरोध किया उग्रश्रवा ने कहा कि पुराण धर्म, काम और मोक्ष का साधन है। असुरों के द्वारा वेदों का अपहरण कर लिया गया था तो उन्होंने मत्स्य का रूप धारण करके उनका उद्धार किया और वहीं पर ब्रह्मा ने उनका आगे विस्तार किया लेकिन वेदों का बहुत अधिक प्रचलन नहीं हुआ। फिर ब्रह्मा ने वेद व्यास के रूप में अवतार लिया और पुराणों के माध्यम से वेदों के ज्ञान की अभिव्यक्ति की।
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जिस तत्वज्ञान को मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ उसे या उसमें संचित कथा और ज्ञान को पदम पुराण की संज्ञा इसलिए दी गई है कि ब्रह्मा ने भगवान विष्णु के नाभि कमल से उत्पन्न होकर सृष्टि-रचना सम्बन्धी ज्ञान का विस्तार किया। 
विद्वानों के अनुसार इसमें पांच और सात खण्ड हैं। किसी विद्वान ने पांच खण्ड माने हैं और कुछ ने सात। पांच खण्ड इस प्रकार हैं-

1. सृष्टि खण्ड: इस खण्ड में भीष्म ने सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में पुलस्त्य से पूछा।
 पुलस्त्य और भीष्म के संवाद में ब्रह्मा के द्वारा रचित सृष्टि के विषय में बताते हुए  गायत्री देवी का ब्रह्मा  के साथ  विवाह  तथा शिव के विवाह आदि की भी चर्चा की।

2.भूमि खण्ड: इस खण्ड में भीष्म और पुलस्त्य के संवाद में कश्यप और अदिति की संतान, परम्परा सृष्टि, सृष्टि के प्रकार तथा अन्य कुछ कथाएं संकलित है।

3.स्वर्ग खण्ड : स्वर्ग खण्ड में स्वर्ग की चर्चा है। मनुष्य के ज्ञान और भारत के तीर्थों का उल्लेख करते हुए तत्वज्ञान की शिक्षा दी गई है।

4.ब्रह्म खण्ड: इस खण्ड में पुरुषों के कल्याण का सुलभ उपाय धर्म आदि की विवेचन तथा निषिद्ध तत्वों का उल्लेख किया गया है। 

पाताल खण्ड में राम के प्रसंग का कथानक आया है। इससे यह पता चलता है कि भक्ति के प्रवाह में विष्णु और राम में कोई भेद नहीं है। उत्तर खण्ड में भक्ति के स्वरूप को समझाते हुए योग और भक्ति की बात की गई है।
 साकार की उपासना पर बल देते हुए जलंधर के कथानक को विस्तार से लिया गया है।
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5.क्रियायोगसार खण्ड: क्रियायोग सार खण्ड में कृष्ण के जीवन से सम्बन्धित तथा कुछ अन्य संक्षिप्त बातों को लिया गया है।
 इस प्रकार यह खण्ड सामान्यत: तत्व का विवेचन करता है।
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पदम-पुराण के विषय में कहा गया है कि यह पुराण अत्यन्त पुण्य-दायक और पापों का विनाशक है। सबसे पहले इस पुराण को ब्रह्मा ने पुलस्त्य को सुनाया और पुलस्त्य ने फिर भीष्म को और भीष्म ने अत्यन्त मनोयोग से इस पुराण को सुना क्योंकि वे समझते थे कि वेदों का मर्म इस रूप में ही समझा जा सकता है।

ऋषियों ने उग्रश्रवा से कहा कि सबसे पहले तो यह बताइए कि भीष्म और पुलस्त्य दोनों का सम्मेलन कैसे हुआ ? 
और इन दोनों ने कहां पर यह ज्ञान चर्चा की। तब सूत ने उन्हें बताया कि भीष्म गंगा द्वार पर रहा करते थे और एक बार वहां घूमते-घूमते पुलस्त्य पहुंचे तो उन्होंने भीष्म से कहा कि वे ब्रह्मा की आज्ञा से उनके पास आए हैं। 
यह सुनकर भीष्म ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि वे उन्हें ब्रह्मा द्वारा रचित सृष्टि रचना के विषय में विस्तार से बताएँ। 
तब यह पदम पुराण पुलस्त्य ने भीष्म को सुनाया, और मैं आप लोगों को बताता हूँ।

भीष्म ने पुलस्त्य से कहा कि आप सबसे पहले यह बताने की कृपा करें कि ब्रह्मा के मन में संसार रचने की भावना कैसे उत्पन्न हुई ?
 यह सुनकर ऋषि भीष्म से बोले कि मनुष्य की सभी भाव शक्तियां ज्ञानगम्य और अचिन्त्य है। ब्रह्मा की सृष्टि उनके ही उपचार से उत्पन्न मानी जाती है। ब्रह्मा तो नित्य हैं किन्तु फिर भी सृष्टि उनके ही उपचार से उत्पन्न मानी जाती है। 
ब्रह्मा का सबसे पहला काल परिमाण स्वरूप बताते हुए पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि साठ घड़ी का मनुष्यों का एक दिन-रात होता है।
 पंद्रह दिन-रात का एक पक्ष। 
पक्ष दो होते हैं शुक्ल और कृष्ण। दोनों पक्षों का एक मास होता है। 
इसके उपरांत छ: मासों का एक अयन-अनय दो होते हैं-उत्तरायण और दक्षिणायन। इन दोनों अयनों का एक वर्ष होता है। 
मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन और एक रात होता है और इस तरह एक सहस्र वर्ष के सतयुग त्रेता, द्वापर और कलियुग आदि चार युग होते हैं। इन चार युगों की एक चौकड़ी के परिणाम में ब्रह्मा का एक दिन होता है।

ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं। जितने परिमाण के दिन होते हैं उतने ही परिमाण की रात्रि। इस तरह 365 दिन और रात का उनका एक वर्ष होता हैं और ऐसे 500 वर्षों की उनकी अवस्था कही गई है। इस गणना से अब तक उनकी आयु का अभी एक ही वर्ष व्यतीत हुआ है।

 ऋषि से भीष्म ने पूछा कि आप यह बताने का कष्ट करें कि सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई ? 

इस पर पुलस्त्य जी ने कहा कि बहुत पहले कल्प के अन्त में लोक को शून्य और पृथ्वी को जल में डूबी हुई देखकर ब्रह्मा ने विष्णु का स्मरण किया। विष्णु वराह का रूप धारण करके जल में डूबी हुई पृथ्वी के पास गए और जब पृथ्वी ने भगवान को अपने पास आते हुए देखा तो उनकी उपासना की और अपने उद्धार की प्रार्थना भी की। उन्होंने कहा आपने इससे पहले भी मेरा उद्धार किया है और आज फिर आप मेरा उद्धार कीजिए। यह सुनकर भगवान वराह ने भयंकर गर्जन किया और पृथ्वी पर अनेक द्वीप तथा पहाड़ों की रचना कर दी। इसके बाद उन्होंने ब्रह्मा से प्राकृत, वैकृत और नवविध सृष्टि की रचना करने के लिए कहा। 
यह सुनकर भीष्म ने इस वर्णन को विस्तार से जानने की इच्छा प्रकट की। 
तब पुलस्त्य ने कहा कि ब्रह्मा के मुख से सत्वगुण, वक्ष और जंघाओं से रजोगुण और पैरों से केवल तमोगुण से युक्त प्रजा-सृष्टि की उत्पत्ति हुई। यही प्रजा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कहलाई। इसके बाद यज्ञ की उत्पत्ति और निष्पत्ति के लिए उन्होंने मनुष्य को चार वर्गों में विभाजित कर दिया। यज्ञों से देवता लोग प्रसन्न और तृप्त होते हैं और मनुष्य भी इसी जीवन  में स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति करते हैं।
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 यज्ञ में सिद्धि देने के लिए वर्ण-व्यवस्था बनाई गई है।

ब्रह्मा ने यज्ञादि कर्म करने की सृष्टि से सांसारिक व्यवस्था की और उसके बाद उत्तम रूप से निवास करने की सृष्टि की है। फिर उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्रों के लिए प्रजापति के इन्द्र के मरुत के और गन्धर्व के लोक बनाए और उन्होंने अनेक प्रकार के अन्धकार और दु:खों को तथा अनेक नरकों को बनाया। जिससे दुष्ट व्यक्ति को दण्ड दिया जा सके। इसके बाद ब्रह्मा ने अपने ही समान नौ-भृगु, पुलस्त्य पुलह, ऋतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ मानव पुत्रों की रचना की। 
पुराणों में इन नौ ब्रह्मा-पुत्रों को ‘ब्रह्म आत्मा वै जायते पुत्र:’ ही कहा गया है।
 ब्रह्मा ने सर्वप्रथम जिन चार-सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार पुत्रों का सृजन किया, लोक में आसक्त नहीं हुए और उन्होंने सृष्टि रचना के कार्य में कोई रुचि नहीं ली। इन वीतराग महात्माओं के इस निरपेक्ष व्यवहार पर ब्रह्मा के मुख से त्रिलोकी को दग्ध करने वाला महान क्रोध उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा के उस क्रोध से एक प्रचण्ड ज्योति ने जन्म लिया। उस समय क्रोध से जलते ब्रह्मा के मस्तक से अर्धनारीश्वर रुद्र उत्पन्न हुआ।

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ब्रह्मा ने उस अर्ध-नारीश्वर रुद्र को स्त्री और पुरुष दो भागों में विभक्त कर दिया।
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प्रजापत्य कल्प में भगवान ब्रह्मा ने रुद्र रूप को ही स्व’यंभु मनु और स्त्री रूप में सतरूपा को प्रकट किया और फिर उसके बाद प्रियव्रत उत्तानपाद, प्रसूति और आकूति नाम की संतानों को जन्म दिया।

 फिर आकूति का विवाह रुचि से और प्रसूति का विवाह दक्ष से किया गया।
 दक्ष ने प्रसूति से 24 कन्याओं को जन्म दिया। इसके नाम श्रद्धा, लक्ष्मी, पुष्टि, धुति, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, ऋद्धि, और कीर्ति है। 
तेरह का विवाह धर्म से किया और फिर भृगु से ख्याति का, भव से सति का, मरीचि से सम्भूति का, अंगिरा से स्मृति का, पुलस्त्य से प्रीति का पुलह से क्षमा का, कृति से सन्नति का, अत्रि से अनसूया का, वशिष्ट से ऊर्जा का, 

वह्व से स्वाह का तथा पितरों से स्वधा का विवाह किया। 
आगे आने वाली सृष्टि इन्हीं से विकसित हुई।

इसके बाद भीष्म ने पूछा कि लक्ष्मी की उत्पत्ति के विषय में आप मुझे विस्तार से बताइए क्योंकि इस विषय में कथानक है। यह सुनकर पुलस्त्य बोले कि एक बार घूमते हुए दुर्वासा ने अपरूपा विद्याधरी के पास एक बहुत सुन्दर माला देखी। वह गन्धित माला थी। ऋषि ने उस माला को अपने जटाओं पर धारण करने के लिए मांगा और प्राप्त कर लिया। दुर्वासा ने सोचा कि यह माला प्रेम के कारण दी और वे कामातुर हो उठे। अपने काम के आवेग को रोकने के लिए इधर-उधर घूमे और घूमते हुए स्वर्ग पहुंचे। वहां उन्होंने अपने सिर से माला हटाकर इन्द्र को दे  इन्द्र
 ने उस माला को ऐरावत के गले में डाल दिया और उससे वह माला धरती पर गिर गई और पैरों से कुचली गई। दुर्वासा ने जब यह देखा कि उसकी माला की यह दुर्गति हुई तो वह क्रोधित हुए और उन्होंने इन्द्र को श्रीहीन होने का शाप दिया। जब इन्द्र ने यह सुना तो भयभीत होकर ऋषि के पास आये पर उनका शाप लौट नहीं सकता था। इसी शाप के कारण असुरों ने इन्द्र और देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। देवता ब्रह्मा की शरण में गये और उनसे अपने कष्ट के विषय में कहा।

 ब्रह्मा देवताओं को लेकर विष्णु के पास गये और उनसे सारी बात कही तब विष्णु ने देवताओं को दानव से सुलह( मेल) करके समुद्र मन्थन करने की सलाह दी और स्वयं भी सहायता का आश्वासन दिया।
 उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन से उन्हें लक्ष्मी और अमृत प्राप्त होगा। अमृत पीकर वे अजर और अमर हो जाएंगे। देवताओं ने भगवान विष्णु की बात सुनकर समुद्र मंथन का आयोजन किया। उन्होंने अनेक औषधियां एकत्रित की और समुद्र में डाली। फिर मन्थन किया गया। वासुकी नाग के मुख से निकले हुए जहर से बुझे हुए सांसों से असुरों को कष्ट होने के उपरान्त भी हिम्मत नहीं छोड़ी और फिर सारे रत्न निकले। 
अमृत कलश देवताओं के हाथ में न आकर असुरों के हाथ में आया किन्तु भगवान ने मोहिनी का रूप धारण करके कलश पर अधिकार कर लिया। मोहिनी ने ऐसा जादू डाला कि दानव पराजित हो गये और देवताओं ने उन्हें हरा कर अपना खोया हुआ वैभव फिर से प्राप्त कर लिया।
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इसके बाद पुलस्त्य ने बताया कि यह लक्ष्मी भृगु की भार्या ख्याति के उदर से पैदा हुई। भृगु और विष्णु का विवाद बहुत पुराना है। मुनि ने बताया कि लक्ष्मी ने अपनी कुमारी अवस्था में एक पुर की स्थापना की थी और विवाह के बाद वह अपने पिता को दे दिया। 
विवाह के बाद लक्ष्मी ने जब अपनी सम्पत्ति मांगी तो भृगु ने उसे नहीं लौटाया। इस पर लक्ष्मी के पति विष्णु ने सम्पत्ति लौटाने की प्रार्थना की।

भृगु ने भगवान विष्णु की भर्त्सना की और कहा कि जब वे धरती पर उत्पन्न होंगे तब नारी के सुख से वंचित रहेंगे।
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यह सुनकर भीष्म ने कहा कि आप मुझे सूर्य वंश का विवरण बताइए। तब पुलस्त्य ने सूर्य वंश का विवरण बताते हुए कहा कि वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। 
मनु ने ज्येष्ठ पुत्र इल को राज्य पर अभिषिक्त किया और स्वयं तप के लिए वन को चले गये। इल अर्थसिद्धि के लिए रथारूढ़ होकर निकले। वह अनेक राजाओं को बाधित करता हुआ भगवान शम्भु के क्रीड़ा उपवन की ओर जा निकले। उपवन से आकृष्ट होकर वह अपने अश्वारोहियों के साथ उसमें प्रविष्ट हो गये। पार्वती द्वारा विदित नियम के कारण इल और उसके सैनिक तथा अश्वादि स्त्री रूप हो गए।
 यह स्थिति देखकर इल ने पुरुषत्व के लिए भगवान शंकर की स्तुति आराधना की। भगवान शंकर प्रसन्न तो हुए परन्तु उन्होंने इल को एक मास स्त्री और एक मास पुरुष होने का विधान किया।
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स्त्री रूप में इस इल के बुध से पुरुरवा नाम वाले एक गुणी पुत्र का जन्म हुआ। इसी इल राजा के नाम से ही यह प्रदेश ‘इलावृत्त’ कहलाया। 

इसी इल के पुरुष रूप में तीन उत्कल गये और हरिताश्व-बलशाली पुत्र उत्पन्न हुए। वैवस्वत मनु के अन्य पुत्रों में से नष्यिन्त का शुक्र, नाभाग का अम्बरीष, धृष्ट के धृष्टकेतु, स्वधर्मा और रणधृष्ट, शर्याति का आनर्त पुत्र और सुकन्या नाम की पुत्री आदि उत्पन्न हुए। 
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आनर्त का रोचिमान् नामक बड़ा प्रतापी पुत्र हुआ। उसने अपने देश का नाम अनर्त रखा और कुशस्थली नाम वाली पत्नी से रेव नामक पुत्र उत्पन्न किया। इस रेव के पुत्र रैवत की पुत्री रेवती का बलराम से विवाह हुआ।

मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुंची। 
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राजा सगर के दो स्त्रियां थीं-प्रभा और भानुमति। प्रभा ने और्वाग्नि से साठ हजार पुत्र और भानुमति केवल एक पुत्र की प्राप्ति की जिसका नाम असमंजस था। 
यह कथा बहुत प्रसिद्ध है कि सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के शाप से पाताल लोक में भस्म हो गए थे और फिर असमंजस की परम्परा में भगीरथ ने गंगा को मनाकर अपने पूर्वजों का उद्धार किया था। इस तरह सूर्य वंश के अन्तर्गत अनेक यशस्वी राजा उत्पन्न हुए।

भीष्म ने आगे पूछा कि मेरे अन्य पितरों के विषय में बताने की कृपा करें। इसके उत्तर में पुलस्त्य बोले कि स्वर्ग में सात पितृगण हैं-चार मूर्तिक और तीन अमूर्तिक। इनका निवास दक्षिण दिशा में माना गया है। 

इन पितरों का संतानों के द्वारा उचित श्राद्ध होना चाहिए। श्राद्ध के तीन प्रकार बताये गये हैं, नित्य नैमित्तिक और काम्य। श्राद्ध करने वाले को चाहिए कि वह किसी वेद को जानने वाले जितेन्द्रिय ब्राह्मण को आमन्त्रित करे और दक्षिण की तरफ मुंह करके श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मण को भोजन कराए फिर उसके बाद सुन्दर वस्त्रों से सज्जित गाय या पृथ्वी (भूमि) का उदारता पूर्वक दान करें। 

श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण दिन चैत्र व भाद्र तृतीया, आश्विन की नवमी, कार्तिक शुक्ल नवमी, आषाढ़ की दसवीं, श्रावण की अष्टमी, महत्वपूर्ण है। तीर्थों में किया गया श्राद्ध विशेष फल देने वाला होता है।

इसके उपरांत भीष्म ने पुलस्त्य के चन्द्रवंश के प्रतापी राजाओं के विषय में जानना चाहा। यह सुनकर 
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पुलस्त्य ने कहा कि ब्रह्मा ने अत्रि को सृष्टि-रचना का आदेश दिया तो उन्होंने तपस्या की। 
उनकी आँखों से जल बहने लगा। जिसे ग्रहण करके दिशाएं गर्भवती हो गईं। 
लेकिन उनका तेज सहन न करने के कारण दिशाओं ने उन्हें त्याग दिया। ब्रह्मा उस बालक को रथ पर बैठाकर ले गये। उसी का नाम चन्द्र पड़ा और औषधियों ने उसे पति के रूप में स्वीकार किया।
 चन्द्र ने हजारों वर्ष तक विष्णु की उपासना की और उनसे यज्ञ में भाग ग्रहण करने का अधिकार पा लिया। 
इसके बाद चन्द्र ने एक यज्ञ आयोजित किया जिसमें अत्रि होता बने, ब्रह्मा उदगाता, विष्णु स्वयं ब्रह्मा बनें और भृगु अध्वर्यु। 
शंकर ने रक्षपाल की भूमिका निभाई और इस तरह चन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्य से परिपूर्ण हो गया।

उसने अपने गुरु की पत्नी तारा को भी अपनी सहचरी बना दिया। 
जब बृहस्पति ने तारा को लौटाने का अनुरोध किया तो चन्द्रमा ने उसकी एक भी नहीं सुनी और अपनी जिद पर अड़ा रहा तो शिव को क्रोध आ गया। उसके कारण ही चन्द्रमा ने तारा को लौटाया। 
 जब तारा के पुत्र हुआ तो उसका नाम बुध रखा गया, वह चंद्रमा का पुत्र था।

 बुद्ध से इला के गर्भ से पुरुरवा ने जन्म लिया। पुरुरवा ने उर्वशी से आठ संतानें उत्पन्न कीं। इनमें से मुख्य पुत्र आयु के पांच पुत्र हुए और उनमें रजि के सौ पुत्र हुए और जो राजेश कहलाये। 

रजि ने विष्णु को प्रसन्न करके देव असुर और मनुष्यों पर विजय पाने की शक्ति ले ली। देवताओं ने इसकी सहायता से असुरों पर विजय प्राप्त की और रजि ने इन्द्र को ही अपना पुत्र समझकर उसे राज्य दे दिया। और वन में चला गया। लेकिन बाद में रजि के अन्य पुत्रों ने अपना राज्य छीन लिया जब इन्द्र ने गुरु बृहस्पति से इसकी शिकायत की तो उन्होंने रजि के पुत्रों को धर्मभ्रष्ट होने का शाप दिया। जिससे फिर इन्द्र ने उनकी हत्या कर दी।

आयु के पहले पुत्र नहुष ने यति, ययाति, शर्याति, उत्तर, पर, अयाति और नियति सात पुत्र हुए। 
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ययाति राजा बना और उसने अपनी पहली पत्नी से द्रुह्य, अनु और पुरु तथा दूसरी देवयानी से यदु और तुरवशु पुत्र उत्पन्न किए।

भीष्म की इस वंश के विस्तार की कथा सुनाते हुए पुलस्त्य ने कहा कि एक बार देव और दानवों में युद्ध छिड़ गया। उसमें दानवों की पराजय हुई तब उसके  गुरु शुक्राचार्य ने तप किया। किन्तु उस तप से इन्द्र ने चिन्तित होकर अपनी पुत्री जयंती को शुक्राचार्य के वश में करने के लिए भेजा। जयंती ने उसकी देखभाल की और सेवा की और तपस्या के पूरे होने पर शुक्राचार्य ने शिव से वरदान प्राप्त किया। 
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जब शुक्राचार्य ने जयंती से सौ वर्ष तक साथ रहकर एकांत विहार की इच्छा प्रकट की तो शुक्राचार्य ने उसे स्वीकार कर लिया दूसरी ओर इन्द्र ने अपनी योजना की सफलता अपने गुरु को दी। 

तब देव गुरु शुक्राचार्य का रूप धारण कर दानवों के पास गये और दानव उन्हें अपना वास्तविक गुरु मानकर उनसे यज्ञ कार्य कराने लगे।

 और  इस प्रकार छल और  प्रपञ्च का क्रम चलता रहा 
यदुवंश की कथा पद्म पुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय द्वादश से सप्तदश तक चलती है ।
जिसे निम्न उपक्रम में समायोजित किया जाता है।

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                  ( पद्म पुराण)

    (प्रथम- सृष्टिखण्डम्)                 (अध्यायः १२)


       भीष्म उवाच


                   ।भीष्मोवाच।
सोमवंशः कथं जातः कथयात्र विशारद !        तद्वंशे केतुराजानो बभूवुः कीर्तिवर्द्धनाः।१।

                 (हिन्दी-अनुवाद)
 भीष्म ने कहा :-हे विद्वान, अब बताओ कि सोम वंश का उदय कैसे हुआ ? और उस वंश में किस प्रकार के  राजाओं का जन्म हुआ जिससे उसकी ख्याति बढ़ी।।१।

        पुलस्त्य उवाच

आदिष्टो ब्रह्मणा पूर्वमत्रिः सर्गविधौ पुरा    अनंतरं नाम तपः सृष्ट्यर्थं तप्तवान्विभुः ।२।
पूर्व में अत्रि को ब्रह्मा ने सृष्टि सृजन का आदेश दिया था । तब अत्रि ने सृष्टि के लिए तपस्या की। ।२।

यदानन्दकरं ब्रह्म भगवन्क्लेशनाशनं         ब्रह्मरुद्रेन्द्र सूर्याणामभ्यंतरमतींद्रियं।३।
(यह) रमणीय था, ब्रह्मा, रुद्र, इंद्र और सूर्य के निकटतम, और इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने वाला, ब्रह्मा की परेशानी को दूर करने वाला।३।


शान्तिं कृत्वात्ममनसा तदत्रिः संयमे स्थितः माहात्म्यं तपसो वापि परमानंदकारकं ।४।  मन को शांत कर अत्रि फिर संयमित रहे। तपस्या की महानता भी बहुत प्रसन्नता का कारण बनती है। ४।

यस्माद्वंशपतिः सार्द्धं समये तदधिष्ठितःतं दृष्ट्वाचष्ट सोमेन तस्मात्सोमोभवद्विभुः ।५।जब से राजवंश का मुखिया अधिष्ठित हुआ तब से यह वंश आधे से अधिक बढ़ गया और जब उन्होने यह देखकर चेष्टा की सोम के द्वारा तो उन अत्रि से सोम( चन्द्र) का जन्म हुआ। ५।
अथ सुस्राव नेत्राभ्यां जलं तत्रात्रिसंभवम्  द्योतयद्विश्वमखिलं             ज्योत्स्नया सचराचरम् ।६।
तब अत्रि की आंखों से आंसूओं की धारा बह निकली, जो अपनी चांदनी से सभी गतिशील और गतिहीन वस्तुओं को प्रकाशित कर रहा था।6।

तद्दिशो जगृहुस्तत्र स्त्रीरूपेणासहृच्छयाः        गर्भो भूत्वोदरे तासां स्थितः सोप्यत्रिसंभव:।७।महिलाओं के रूप में दिशाओं ने इसे गृहण कर लिया; यह अत्रि द्वारा उत्पन्न गर्भ भ्रूण में बदल गया और दिशाओं के गर्भाशय (उदर) में ही रह गया।७।

आशाश्च मुमुचुर्गर्भमशक्ता धारणे ततः   समादायाथ तं गर्भमेकीकृत्य चतुर्मुखः ।८।
फिर इसे धारण करने में असमर्थ दिशाओ ने इसे गिरा दिया। ब्रह्मा ने फिर भ्रूण लाकर और उसे एक साथ रखा ।८।

युवानमकरोद्ब्रह्मा सर्वायुधधरं नरम्स्यंदनेथ सहस्तेन वेदशक्तिमये प्रभुः।९।                     और (इस प्रकार) एक युवा को सभी हथियारों का उपयोग करने में कुशल बना कर रथ में बैठा दिया ।९।

आरोप्य लोकमनयदात्मीयं स पितामहः ततो ब्रह्मर्षिभिः प्रोक्तं ह्यस्मत्स्वामीभवत्वयम्।१०।

 उसे अपने हाथों से वेदों की शक्ति से भरे रथ में बिठाकर , वह उसे दुनिया में ले गया। तब ब्राह्मण  ऋषियों ने कहा: वह हमारा स्वामी हो ।।१०।

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ऋषिभिर्देवगंधर्वैरप्सरोभिस्तथैव च
स्तूयमानस्य तस्याभूदधिकं महदंतरम्।११।


तेजोवितानादभवद्भुवि दिव्यौषधीगणः
तद्दीप्तिरधिका तस्माद्रात्रौ भवति सर्वदा।१२।


तेनौषधीशः सोमोभूद्द्विजेष्वपि हि गण्यते
वेदधामा रसश्चायं यदिदं मंडलं शुभम्।१३।


क्षीयते वर्द्धते चैव शुक्ले कृष्णे च सर्वदा
विंशतिं च तथा सप्त दक्षः प्राचेतसो ददौ।१४।


रूपलावण्यसंयुक्तास्तस्मै कन्याः सुवर्चसः
ततः शक्तिसहस्राणां सहस्राणि दशैव तु।१५।


तपश्चकार शीतांशुर्विष्णुध्यानैकतत्परः
ततस्तुष्टश्च भगवांस्तस्मै नारायणो हरिः।१६।


वरं वृणीष्व चोवाच परमात्मा जनार्दनः
ततो वव्रे वरं सोमः शक्रलोके यजाम्यहम्।१७।


प्रत्यक्षमेव भोक्तारो भवंतु मम मंदिरे
राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्या ये चतुर्विधाः।१८।


रक्षपालः सुरोस्माकमास्तां शूलधरो हरः
तथेत्युक्तः समाजह्रे राजसूयं तु विष्णुना।१९।


होतात्रिर्भृगुरध्वर्युरुद्गाता च चतुर्मुखः
ब्रह्मत्वमगमत्तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम्।२०।


सदस्याः सर्वदेवास्तु राजसूयविधिः स्मृतः
वसवोध्वर्यवस्तद्वद्विश्वेदेवास्तथैव च।२१।


त्रैलोक्यं दक्षिणा तेन ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादिता
सोमः प्राप्याथदुष्प्राप्यमैश्वर्यं सृष्टिसत्कृतं।२२।


सप्तलोकैकनाथत्वं प्राप्तस्स्वतपसा तदा
कदाचिदुद्यानगतामपश्यदनेकपुष्पाभरण उपशोभाम्।२३।


बृहन्नितंबस्तनभारखेदां पुष्पावभंगेप्यतिदुर्बलांगीं
भार्यां च तां देवगुरोरनंगबाणाभिरामायत चारुनेत्रां।२४।


तारां स ताराधिपतिः स्मरार्तः केशेषु जग्राह विविक्तभूमौ सापि स्मरार्ता सहते न रेमे तद्रूपकांत्याहृतमानसैव।२५।


चिरं विहृत्याथ जगाम तारां विधुर्गृहीत्वा स्वगृहं ततोपिन तृप्तिरासीत्स्वगृहेपि तस्य तारानुरक्तस्य सुखागमेषु।२६।


बृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्धस्तद्ध्याननिष्ठैकमना बभूव शशाक शापं न च दातुमस्मै न मंत्रशस्त्राग्निविषैरनेकैः।२७।


तस्यापकर्तुं विविधैरुपायैर्नैवाभिचारैरपि वागधीशः
स याचयामास ततस्तु देवं सोमं स्वभार्यार्थमनंगतप्तः।२८।


स याच्यमानोपि ददौ न भार्यां बृहस्पतेः कामवशेन मोहितःमहेश्वरेणाथ चतुर्मुखेन साध्यैर्मरुद्भिः सह लोकपालैः।२९।


ददौ यदा तां न कथंचिदिंदुस्तदा शिवः       क्रोधपरो बभूवयो वामदेवप्रथितः पृथिव्यामनेकरुद्रार्चितपादपद्मः।३०।


ततः सशिष्यो गिरिशः पिनाकी बृहस्पतेः स्नेहवशानुबद्धःधनुर्गृहीत्वाजगवं पुरारिर्जगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः।३१।


पुलस्त्य ने कहा :

11. तब उस (सोम) का भीतरी भाग, जिसकी ऋषि, गंधर्व और अप्सराएँ प्रशंसा कर रहे थे, बहुत महान हो गया।११

12. उस बढ़ती हुई चमक से पृय्वी पर जड़ी बूटियों का समूह उत्पन्न हुआ; उसकी चमक महान है; इसलिए वह हमेशा रात में (यानी चमकता) रहता है।१२

13-15. इसलिए सोम जड़ी-बूटियों का स्वामी बन गया; वह भी "द्विजो) में गिना जाता है ; क्योंकि वह वैदिक चमक और तरल है। अंधेरे और उज्ज्वल (पखवाड़े) में शुभ होती है पर। इसका वृत कम और ज्यादा हो जाती है। 

प्रचेतस दक्ष ने उन्हें (अपनी) सत्ताईस प्रतिभाशाली बेटियाँ दीं, जो रूप और सुंदरता से संपन्न थीं और फिर दस हजार (-गुना) शक्तियां थीं।१३-१५

16-17. सोम ने विष्णु का ध्यान करने के इरादे से तपस्या की। तब भगवान, नारायण - हरि , सर्वोच्च जनार्दन उनसे प्रसन्न हुए और उनसे कहा, "वर मांगो।" तब सोम ने वरदान मांगा: “मैं इंद्र की दुनिया में एक यज्ञ करूंगा।१६-१७

१८-१ ९. ब्रह्मा के नेतृत्व में देवताओं के समूह को व्यक्तिगत रूप से मेरे घर में, राजसूय में (प्रसाद) का आनंद लेना चाहिए । त्रिशूलधारी देवता, हर, हमारे रक्षक होने चाहिए।" जब विष्णु ने कहा, "ऐसा ही रहने दो" उन्होंने राजसूय किया ।१८-१९


होतात्रिर्भृगुरध्वर्युरुद्गाता च चतुर्मुखः
ब्रह्मत्वमगमत्तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम्।२०।

20. अत्री थे होता ( यज्ञ में आहुति देनेवाला। मंत्र पढ़कर यज्ञकुंड में हवन की सामग्री डालनेवाला। विशेष—यह चार प्रधान ऋत्विजों में है जो ऋग्वेद के मंत्र पढ़ता और देवताओं का आह्वान करता है। इसके तीन पुरुष या सहायक मैत्रावरुण, अच्छावाक् और ग्रावस्तुत् यज्ञकर्ता ) (पुजारी की प्रार्थना पढ़ने वाला )

  भृगु ( अध्वर्यु -Adhvaryu) (एक स्थानापन्न पुजारी)(अध्वर + क्यच्--युच् )ततोऽन्त्या- कारलोपः -यजुर्वेदज्ञहोमकारि ऋत्विज ।

। ब्रह्मा उद्गाता ( सामवेद के मंत्रों का जाप करने वाले ) बन गए , और हरि स्वयं अधीक्षक थेेे।२०।

21. सभी (अन्य) देवता याजकों की सहायता कर रहे थे; राजसूय होने के लिए संस्कार निर्धारित (कहा) किया गया था । वसुओं और भी विश्वेदेव कार्यवाहक पुजारियों में थे।२१

22. उसने तीनों लोकों को याजकों को बलि के रूप में दिया। सोम ने अपनी तपस्या से प्राप्त किया जो वैभव प्राप्त करना कठिन था, और जिसे संसार ने सम्मानित किया, उसे सातों लोकों की प्रभुता प्राप्त हुई।२२

23-24. एक बार उन्होंने एक बगीचे में देखा कि बृहस्पति की पत्नी तारा , कई फूलों और गहनों से सजी, बड़े कूल्हों की, स्तनों के बोझ से पीड़ित, इतनी  ( नाजुक) (कि वह बर्दाश्त नहीं करेगी) फूल, कामदेव के तीरों की तरह आकर्षक और चौड़ी और सुंदर आँखें वाले थे।२३-२४

25. उस सुनसान स्थान में तारों के स्वामी ने प्रेम से मारा हुआ उसके बालों से उसे पकड़ लिया। वह भी, (समान रूप से) उसके रूप और सुन्दरता से आकर्षित मन से प्रेम-रोग, उसके साथ आनंद लेती थी।२५

२६. लंबे समय तक खेल-कूद करने के बाद सोम तारा को अपने घर ले गया; तब अपने घर में भी, वह तारा से जुड़ा हुआ था, (यौन) सुखों से संतुष्ट नहीं था।२६

बृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्धस्तद्ध्याननिष्ठैकमना बभूव शशांक शापं न च दातुमस्मै न मंत्रशस्त्राग्निविषैरनेकैः।२७।


तस्यापकर्तुं विविधैरुपायैर्नैवाभिचारैरपि वागधीशः
स याचयामास ततस्तु देवं सोमं स्वभार्यार्थमनंगतप्तः।२८।

27-28. वियोग की अग्नि से झुलसे बृहस्पति का मन उसी पर ही विचार कर रहा था। वह उसे (यानी सोम) को शाप देने में असमर्थ था, न ही (भाषण के स्वामी) कई मंत्रों, अग्निविष, आग या जहरों के माध्यम से उसे नुकसान पहुंचाने में अक्षम था; या विभिन्न चालों द्वारा या जादुई मंत्रों द्वारा। प्रेम से तड़पकर उसने सोमदेव से अपनी पत्नी को लौटाने की याचना की।२७-२८

स याच्यमानोपि ददौ न भार्यां बृहस्पतेः कामवशेन मोहितःमहेश्वरेणाथ चतुर्मुखेन साध्यैर्मरुद्भिः सह लोकपालैः।२९।

बृहस्पति द्वारा प्रार्थना किये जाते हुए भी चन्द्रमा ने बृहस्पति की पत्‍नी को कामवश मोहित होकर नहीं दिया यह प्रार्थना बृहस्पति ने शिव ब्रह्मा साध्य गण और मरुतगणों को साथ करके की थी।२९।

उसने अपने गुरु की पत्नी तारा को भी अपनी सहचरी बना दिया। 
जब बृहस्पति ने तारा को लौटाने का अनुरोध किया तो चन्द्रमा ने उसकी एक भी नहीं सुनी और अपनी जिद पर अड़ा रहा तो शिव को क्रोध आ गया। उसके कारण ही चन्द्रमा ने तारा को लौटाया।

30. जब उसने उसे ( वामदेव भी) शिव के कहने परभी नहीं दिया, जो (जिसे वामदेव भी कहा जाता है ) पृथ्वी पर प्रसिद्ध था और जिसके चरणकमलों की कई रुद्रों द्वारा पूजा की जाती थी , क्रोधित हो गया।३०।

ततः सशिष्यो गिरिशः पिनाकी बृहस्पतेः स्नेहवशानुबद्धःधनुर्गृहीत्वाजगवं पुरारिर्जगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः।३१।

31. तब, शिव त्रिशूल धारक, अपने चेलों के साथ,  बृहस्पति  के लिए प्यार से बंधे, भूतो के प्रभुओं को सहारा, और साथ साथ सिद्धों , अपने धनुष पिनाकी के साथ लड़ने के लिए चले आये ।३१।

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युद्धाय सोमेन विशेषदीप्तस्तृतीयनेत्रानल.   भीमवक्त्रःसहैव जग्मुश्च गणेश्वराणां विंशाधिका षष्टिरथोग्रमूर्तिः।३२।


यक्षेश्वराणां सगणैरनेकैर्युतोन्वगात्स्यंदनसंस्थितानां
वेतालयक्षोरगकिन्नराणां पद्मेन चैकेन तथार्बुदानाम्।३३।


लक्षैस्त्रिभिर्द्वा दशभी रथानां सोमोप्यगात्तत्र विवृद्धमन्युःशनैश्चरांगारक वृद्धतेजा नक्षत्रदैत्यासुरसैन्ययुक्तः।३४।


जग्मुर्भयं सप्त तथैव लोका धरावनद्वीपसमुद्रगर्भाः
ससोममेवाभ्यगमत्पिनाकी गृहीतदीप्तास्त्रविशालवह्निः।३५


अथाभवद्भीषण भीम सोम सैन्यद्वयस्याथ महाहवोसौअशेषसत्वक्षयकृत्प्रवृद्धस्तीक्ष्ण      प्रधानो ज्वलनैकरूपः।३६।


शस्त्रैरथान्योन्यमशेषसैन्यंद्वयोर्जगामक्षयं उग्रतीक्ष्णैः पतंति शस्त्राणि तथोज्वलानि स्वर्भूमिपातालमलं दहंति।३७।


रुद्रः क्रोधाद्ब्रह्मशिरो मुमोच सोमोपि सोमास्त्रममोघवीर्यंतयोर्निपातेनसमुद्र भूम्योरथांतरिक्षस्य च भीतिरासीत्।३८।


तदा सुयुद्धं जगतां क्षयाय प्रवृद्धमालोक्य पितामहोपिततः प्रविश्याथ कथंचिदेव निवारयामास सुरैः सहैव।३९।


अकारणं किं क्षयकृज्जनानां सोम त्वयापीदमकार्यकार्यंयस्मात्परस्त्रीहरणाय        सोम त्वया कृतं युद्धमतीव भीमम्।४०।


पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु पापोस्यलं वह्निमुखाशिनां त्वंभार्यामिमामर्पय वाक्पते:     त्वंंतव प्रमाणयन्नेव मदीय वाचम्।४१।


तथेति चोवाच हिमांशुमाली युद्धादपाक्रामदतः प्रशांतःबृहस्पतिस्तामथ गृह्य तारां हृष्टो जगाम स्वगृहं च रुद्रः ।४२।


                    पुलस्त्य उवाच
ततः संवत्सरस्यांते द्वादशादित्यसन्निभः
दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः।४३।


तारोदरविनिष्क्रान्तः कुमारस्सूर्यसन्निभः
सर्वार्थशास्त्रत्रविद्विद्वान्हस्तिशास्त्रप्रवर्त्तकः४४


नामयद्राजपुत्रोयं विश्रुतो राजवैद्यकः
राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद्राजपुत्रो बुधः स्मृतः४५


जनानां तु स तेजांसि सर्वाण्येवाक्षिपद्बली
ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवा देवर्षिभिः सह४६


बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकर्मोत्सवे तदा
पप्रच्छुस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः४७


ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत्तदा
पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयंती वरांगना४८


सोमस्येति चिरादाह ततो गृह्णाद्विधुः सुतं
बुध इत्यकरोन्नाम प्रादाद्राज्यं च भूतले४९


अभिषेकं ततः कृत्वा प्रदानमकरोद्विभुः
ग्रहमध्यं प्रदायाथ ब्रह्माब्रह्मर्षिभिर्युतः५०1.12.50


पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवांतरधीयत
इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत्५१


अश्वमेधशतंसाग्रमकरोद्यस्स्वतेजसा
पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः५२


हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य पितामहं
लोकैश्वर्यमगाद्राजन्सप्तद्वीपपतिस्तदा५३


केशिप्रभृतयो दैत्यास्तद्भृत्यत्वं समागताः
उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद्रूपमोहिता५४


सप्तद्वीपावसुमती सशैलवनकानना
धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा५५


चामरग्रहणाकीर्तिः स्वयं चैवांगवाहिका
ब्रह्मप्रसादाद्देवेंद्रो ददावर्द्धासनं तदा५६


धर्मार्थकामान्धर्मेण समवेतोभ्यपालयत्
धर्मार्थकामास्तं द्रष्टुमाजग्मुः कौतुकान्विताः५७


जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम्
भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्घ्यपाद्यादिकं ततः५८


आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषणम्
निवेश्याथाकरोत्पूजामीषद्धर्मेधिकां पुनः५९


जग्मतुस्तौ च कामार्थावतिकोपं नृपं प्रति
अर्थः शापमदात्तस्मै लोभात्त्वं नाशमेष्यसि६०


कामोप्याह तवोन्मादो भविता गंधमादने
कुमारवनमाश्रित्य वियोगाच्चोर्वशीभवात्६१


धर्मोप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि
संततिस्तव राजेंद्र यावदाचंद्रतारकम्६२


शतशो वृद्धिमायाति न नाशं भुवि यास्यति
षष्टिं वर्षाणि चोन्माद ऊर्वशीकामसंभवः६३


अचिरादेव भार्यापि वशमेष्यति चाप्सराः
इत्युक्त्वांतर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदान्वभूत्६४


अहन्यहनि देवेंद्रं द्रष्टुं याति पुरूरवाः
कदाचिदारुह्य रथं दक्षिणांबरचारिणा६५


सार्धं शक्रेण सोऽपश्यन्नीयमानामथांबरे
केशिना दानवेंद्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम्६६


तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपातनैः
पुरा शक्रोपि समरे येन वज्री विनिर्जितः६७


मित्रत्वमगमत्तेन प्रादादिंद्राय चोर्वशीं
ततःप्रभृति मित्रत्वमगमत्पाकशासनः६८


सर्वलोकेतिशयितं पुरूरवसमेव तम्
प्राह वज्री तु संतुष्टो नीयतामियमेव च६९


सा पुरूरवसः प्रीत्यै चागायच्चरितं महत्
लक्ष्मीस्वयंवरंनाम भरतेन प्रवर्तितम्७०


मेनकां चोर्वशीं रंभां नृत्यध्वमिति चादिशत्
ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी७१


सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यंती कामपीडिता
विस्मृताभिनयं सर्वं यत्पुरातनचोदितम्७२


शशाप भरतः क्रोधाद्वियोगात्तस्य भूतले
पंचपंचाशदब्दानि लताभूता भविष्यसि७३


ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्त्तारमकरोच्चिरं
शापानुभवनांते च उर्वशी बुधसूनुना७४


अजीजनत्सुतानष्टौ नामतस्तान्निबोध मे
आयुर्दृढायुर्वश्यायुर्बलायुर्धृतिमान्वसुःः७५


दिव्यजायुः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः
आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च७६


रजिर्दंडो विशाखश्च वीराः पंचमहारथाः
रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेया इति विश्रुतं७७


रजिराराधयामास नारायणमकल्मषं
तपसा तोषितो विष्णुर्वरं प्रादान्महीपतेः७८


देवासुरमनुष्याणामभूत्स विजयी तदा
अथ देवासुरं युद्धमभूद्वर्षशतत्रयम्७९


प्रह्लादशक्रयोर्भीमं न कश्चिद्विजयी तयोः
ततो देवासुरैः पृष्टः पृथग्देवश्चतुर्मुखः८०


अनयोर्विजयी कः स्याद्रजिर्यत्रेति सोब्रवीत्
जयाय प्रार्थितो राजा सहायस्त्वं भवस्व नः८१


दैत्यैः प्राह यदि स्वामी वो भवामि ततस्त्वलम्
नासुरैः प्रतिपन्नं तत्प्रतिपन्नं सुरैस्तदा८२


स्वामी भव त्वमस्माकं बलनाशय विद्विषः
ततो विनाशिताः सर्वे ये वध्या वज्रपाणिनः८३


पुत्रत्वमगमत्तुष्टस्तस्येंद्रः कर्मणा ततः
दत्त्वेंद्राय पुरा राज्यं जगाम तपसे रजिः८४


रजिपुत्रैस्तदाछिन्नं बलादिंद्रस्य वैयदा
यज्ञभागश्च राज्यं च तपोबलगुणान्वितैः८५


राज्यभ्रष्टस्ततः शक्रो रजिपुत्रनिपीडितः
प्राह वाचस्पतिं दीनः पीडितोऽस्मि रजेः सुतैः८६


न यज्ञभागो राज्यं मे पीडितस्य बृहस्पते
राज्यलाभाय मे यत्नं विधत्स्व धिषणाधिप८७


ततो बृहस्पतिः शक्रमकरोद्बलदर्पितम्
ग्रहशांतिविधानेन पौष्टिकेन च कर्मणा८८


गत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान्बृहस्पतिः
जिनधर्मं समास्थाय वेदबाह्यं स धर्मवित्८९


वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः
वेदबाह्यान्परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान्९०


जघान शक्रो वज्रेण सर्वान्धर्मबहिष्कृतान्
नहुषस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रान्सप्तैव धार्मिकान्९१


यतिर्ययातिश्शर्यातिरुत्तरः पर एव च
अयतिर्वियतिश्चैव सप्तैते वंशवर्द्धनाः९२


यतिः कुमारभावेपि योगी वैखानसोभवत्
ययातिरकरोद्राज्यं धर्मैकशरणः सदा९३


शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूद्दुहिता वृषपर्वणः
भार्गवस्यात्मजा चैव देवयानी च सुव्रता९४


ययातेः पंचदायादास्तान्प्रवक्ष्यामि नामतः
देवयानी यदुं पुत्रं तुर्वसुं चाप्यजीजनत्९५


तथा द्रुह्यमणं पूरुं शर्मिष्ठाजनयत्सुतान्
यदुः पूरूश्च भरतस्ते वै वंशविवर्द्धनाः९६


पूरोर्वंशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोसि पार्थिव
यदोस्तु यादवा जाता यत्र तौ बलकेशवौ९७


भारावतारणार्थाय पांडवानां हिताय च
यदोः पुत्रा बभूवुश्च पंच देवसुतोपमाः९८


सहस्रजित्तथा ज्येष्ठः क्रोष्टा नीलोञ्जिको रघुः
सहस्रजितो दायादः शतजिन्नाम पार्थिवः९९


शतजितश्च दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः
हैहयश्च हयश्चैव तथा तालहयश्च यः१०० 1.12.100


हैहयस्य तु दायादो धर्मनेत्रः प्रतिश्रुतः
धर्मनेत्रस्य कुंतिस्तु संहतस्तस्य चात्मजः१०१


संहतस्य तु दायादो महिष्मान्नाम पार्थिवः
आसीन्महिष्मतः पुत्रो भद्रसेनः प्रतापवान्१०२


वाराणस्यामभूद्राजा कथितः पूर्वमेव हि
भद्रसेनस्य पुत्रस्तु दुर्दमो नाम धार्मिकः१०३


दुर्दमस्य सुतो भीमो धनको नाम वीर्यवान्
धनकस्य सुता ह्यासन्चत्वारो लोकविश्रुताः१०४


कृताग्निः कृतवीर्यश्च कृतधर्मा तथैव च
कृतौजाश्च चतुर्थोभूत्कृतवीर्याच्च सोर्जुनः१०५


जातो बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरो नृपः
वर्षायुतं तपस्तेपे दुश्चरं पृथिवीपतिः१०६


दत्तमाराधयामास कार्त्तवीर्योत्रिसंभवम्
तस्मै दत्तो वरान्प्रादाच्चतुरः पुरुषोत्तमः१०७


पूर्वं बाहुसहस्रं तु स वव्रे राजसत्तमः
अधर्मं ध्यायमानस्य भीतिश्चापि निवारणम्१०८


युद्धेन पृथिवीं जित्वा धर्मेणावाप्य वै बलम्
संग्रामे वर्तमानस्य वधश्चैवाधिकाद्भवेत्१०९


एतेनेयं वसुमती सप्तद्वीपा सपत्तना
सप्तोदधि परिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता११०


जज्ञे बाहुसहस्रं च इच्छतस्तस्य धीमतः
सर्वे यज्ञा महाबाहोस्तस्यासन्भूरिदक्षिणाः१११


सर्वे कांचनयूपास्ते सर्वे कांचनवेदिकाः
सर्वे देवैश्च संप्राप्ता विमानस्थैरलंकृतैः११२


गंधर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवापि सेविताः
यस्य यज्ञे जगौ गाथा गंधंर्वो नारदस्तथा११३


कार्त्तवीर्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः
न नूनं कार्त्तवीर्यस्य गतिं यास्यंति पार्थिवाः१४


यज्ञैर्दानैस्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च
सप्तद्वीपाननुचरन्वेगेन पवनोपमः११५


पंचाशीतिसहस्राणि वर्षाणां च नराधिपः
सप्तद्वीपपृथिव्याश्च चक्रवर्ती बभूव ह११६


स एव पशुपालोभूत्क्षेत्रपालः स एव हि
स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोभवत्११७


योसौ बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा
भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनेव भास्करः११८


एष नाम मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः
एष वेगं समुद्रस्य प्रावृट्काले भजेत वै११९


क्रीडते स्वसुखा ये विप्रतिस्रोतो महीपतिः
ललनाः क्रीडता तेन प्रतिबद्धोर्मिमालिनी१२०


ऊर्मिभ्रुकुटिमाला सा शंकिताभ्येति नर्मदा
एष एव मनोर्वंशे त्ववगाहेन्महार्णवम्१२१


करेणोद्धृत्य वेगं तु कामिनीप्रीणनेन तु
तस्य बाहुसहस्रेण क्षोभ्यमाणे महोदधौ१२२


भवंति लीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः
तदूरुक्षोभचकिता अमृतोत्पादशंकिताः१२३


नता निश्चलमूर्द्धानो भवंति च महोरगाः
एष धन्वी च चिक्षेप रावणं प्रति सायकान्१२४


एष धन्वी धनुर्गृह्य उत्सिक्तं पंचभिः शरैः
लंकेशं मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात्१२५


निर्जित्य बद्ध्वा त्वानीय माहिष्मत्याम्बबंध तम्
ततो गतोहं तस्याग्रे अर्जुनं संप्रसादयन्१२६


मुमोच राजन्पौत्रं मे सख्यं कृत्वा च पार्थिवः
तस्य बाहुसहस्रस्य बभूव ज्यातलस्वनः१२७


युगांताग्नेः प्रवृत्तस्य यथा ज्यातलनिःस्वनः
अहो बलं विधेर्वीर्यं भार्गवः स यदाच्छिनत्१२८


मृधे सहस्रं बाहूनां हेमतालवनं यथा
यं वसिष्ठस्तु संक्रुद्धो ह्यर्जुनं शप्तवान्विभुः१२९


यस्माद्वनं प्रदग्धं ते विश्रुतं मम हैहय
तस्मात्ते दुष्कृतं कर्म कृतमन्यो हनिष्यति१३०


छित्वा बाहुसहस्रं ते प्रमथ्य तरसा बली
तपस्वी ब्राह्मणस्त्वां वै वधिष्यति स भार्गवः१३१


तस्य रामोथ हंतासीन्मुनिशापेन धीमतः
तस्य पुत्रशतं त्वासीत्पंच तत्र महारथाः१३२


कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो महाबल
शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टो वै कृष्ण एव च१३३


जयद्ध्वजः स वै कर्ता अवन्तिश्च रसापतिः
जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजंघो महाबलः१३४


तस्य पुत्राश्शतान्येव तालजंघा इति स्मृताः
तेषां पंचकुलान्यासन्हैहयानां महात्मनाम्१३५


वीतिहोत्राश्च संजाता भोजाश्चावंतयस्तथा
तुंडकेराश्च विक्रांतास्तालजंघाः प्रकीर्तिताः१३६


वीतिहोत्रसुतश्चापि अनंतो नाम वीर्यवान्
दुर्जयस्तस्य पुत्रस्तु बभूवामित्रकर्षणः१३७


सद्भावेन महाराजः प्रजाधर्मेण पालयन्
कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रधृत्१३८


येन सागरपर्यंता धनुषा निर्जिता मही
यस्तस्यकीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानवः१३९


न तस्य वित्तनाशः स्यान्नष्टं च लभते पुनः
कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह धीमतः
यथा यष्टा यथा दाता स्वर्गलोके महीयते१४०।

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32-34. वह, विशेष रूप से प्रतिभाशाली, एक भयानक रूप का और अपनी तीसरी आंख में आग के कारण भयानक और क्रूर, और उसके सेवकों के अस्सी स्वामी और युद्ध-रथ में बैठे यक्षों के स्वामी , और सोम भी अपने क्रोध से, और एक हजार अरबों के साथ वैताल , Yakṣas, सांप और Kinnaras , नागों का तो यह भी है, तो भी छत्तीस हजार रथ के साथ, उसकी चमक की वृद्धि हुई के साथ सनी और अंगारक वहाँ आया था, की सेना के साथ Nakṣatras , राक्षसों और fiends .

35. सातों लोक, पृथ्वी, वन, द्वीप और समुद्र के भीतरी भाग भयभीत हो गए। त्रिशूलधारी, जिसने प्रज्वलित मिसाइल और प्रचंड अग्नि को ले लिया था (लड़ाई) सोमा के पास गया।

36. फिर रुद्र और सोम की भयानक सेनाओं के बीच एक महान युद्ध हुआ। सभी प्राणियों को नष्ट करने में सक्षम, यह (अर्थात् युद्ध) गहन और पूर्व-प्रतिष्ठित अग्नि के रूप में आगे बढ़ा।

37. तेज और मार्मिक मिसाइलों के साथ दोनों की पूरी सेना का विनाश हुआ। स्वर्ग, पृथ्वी और निचले क्षेत्र को जलाने में सक्षम तेज मिसाइलों को छुट्टी दे दी गई।

38. क्रोध से रुद्र ने ब्रह्मसिरस मिसाइल छोड़ी ; सोमा ने भी अचूक शक्ति की मिसाइल 'सोम' छोड़ी। दोनों (मिसाइलों) के गिरने से समुद्र में, पृथ्वी पर, वातावरण में भय फैल गया।

39. तब उस युद्ध को बढ़ते हुए और संसार को नष्ट करने में सक्षम देखकर, ब्रह्मा ने देवताओं के साथ, वहाँ प्रवेश करके किसी तरह उसे टाल दिया।

40-41. "हे सोम, आप बिना किसी कारण के यह घृणित कार्य क्यों कर रहे हैं, जिससे लोगों का विनाश हो रहा है? चूंकि आपने किसी और की पत्नी को लेने के लिए यह भयानक युद्ध छेड़ा है, इसलिए आप लोगों के बीच एक दुष्ट ग्रह बन जाएंगे; तुम पापी हो; तुम ब्राह्मणों के खाने वालों के समान हो जाओगे। मेरे वचन का सम्मान करते हुए, इस बृहस्पति की पत्नी को उन्हें लौटा दो।"

42. सोमा शान्त होकर युद्ध से दूर रहा। बृहस्पति तारा को लेकर प्रसन्न होकर घर चले गए; वैसे ही रुद्र भी।

पुलस्त्य ने कहा :

43-45. फिर एक वर्ष के अंत में, बारह सूर्यों के समान एक लड़का, दिव्य पीले वस्त्र पहने हुए, दिव्य आभूषणों से सुशोभित, और सूर्य की तरह, तारा के लिए पैदा हुआ था। वह सभी विज्ञानों को जानता था, और हाथियों के विज्ञान के प्रतिपादक थे। राजपुत्र नामित वह एक प्रसिद्ध शाही चिकित्सक थे। राजा सोम के पुत्र होने के कारण उन्हें बुद्ध के नाम से जाना जाता था ।

४६. उस ने शक्तिशाली व्यक्ति ने सब लोगों की सारी चमक छीन ली। वहाँ ब्रह्मा आदि आये। इसी प्रकार बालक के जन्म के समय किए गए समारोह के समय देवता भी दिव्य ऋषियों के साथ बृहस्पति के घर आए।

47. देवताओं ने तारा से पूछा कि लड़का किसके द्वारा पैदा हुआ था (यानी उसके पिता कौन थे- सोम या बृहस्पति)?

48-49। वह उनसे शर्मिंदा होकर उस समय कुछ नहीं बोली। महान महिला ने, फिर से पूछे जाने पर, लंबे समय के बाद शर्म से उत्तर दिया कि पुत्र सोम का है। तब सोम ने पुत्र को लेकर उसका नाम 'बुद्ध' रखा और उसे पृथ्वी पर राज्य दिया।

50-51. तब परम भगवान ब्रह्मा ने उन्हें अभिषेक करके, उन्हें ग्रहों में एक स्थान प्रदान किया; इसे देने के बाद, वह ब्राह्मण ऋषियों के साथ, वहाँ गायब हो गए, जबकि सभी प्राणी देख रहे थे। बुद्ध ने इला के गर्भ में (अर्थात्) सर्वाधिक धार्मिक पुत्र उत्पन्न किया।

52. उसने (अर्थात् पुत्र) पूर्ण रूप से एक सौ अश्व-यज्ञ किए, और उसकी चमक के कारण पुरिरवा के रूप में जाना जाता था और सभी लोगों द्वारा सम्मानित किया जाता था।

५३. हिमालय के शिखर पर ब्रह्मा को प्रसन्न करने के बाद , उन्होंने, सात द्वीपों के स्वामी, ने दुनिया का आधिपत्य प्राप्त कर लिया।

54. केसीन और अन्य दुष्टात्माएं उसके दास बन गईं; उर्वशी उसकी सुन्दरता पर मोहित होकर उसकी पत्नी बन गई।

55. उसने सब लोगों की भलाई की कामना करते हुए, सात द्वीपों वाली पृथ्वी की रक्षा की, जिसमें पहाड़, जंगल और उपवन थे।

५६. ब्रह्मा की कृपा से (उसने प्राप्त) प्रसिद्धि जो उसकी वाहक और चौरी धारण करने वाली प्रतीक्षारत लड़की बन गई। देवताओं के स्वामी ने उसे (उसके) आधे आसन की पेशकश की।

57. उन्होंने धर्म , अर्थ और काम की समान और न्यायपूर्ण रक्षा की ।

58. धर्म , अर्थ और काम उत्सुकता से उनसे मिलने आए, यह जानने की इच्छा से कि उन्होंने उन्हें समान रूप से कैसे बनाए रखा। फिर उन्होंने भक्ति के साथ उन्हें प्रसाद, पैर धोने के लिए जल आदि अर्पित किए।

59. सोने से अलंकृत तीन आसनों को लाकर, उन्हें आसनों पर बिठाकर, उन्होंने धर्म की थोड़ी अधिक पूजा, (अर्पण) की ।

६०. काम और अर्थ तब राजा से बहुत क्रोधित हो गए; अर्थ ने उसे शाप दिया: "तुम लालच के कारण नष्ट हो जाओगे।"

६१. काम ने यह भी कहा: " उर्वशी से अलग होने के कारण कुमार के ग्रोव (पवित्र) कुमार में जाने के बाद, आप गंधमादन में पागल हो जाएंगे"।

62-64. धर्म ने भी कहा: “तुम्हारी आयु लंबी होगी और आप धार्मिक होंगे; हे राजाओं के स्वामी, जब तक सूर्य और चंद्रमा (आकाश में) रहेंगे, तब तक आपकी संतान सौ गुना बढ़ जाएगी और पृथ्वी पर नष्ट नहीं होगी। उर्वशी से उत्पन्न पागलपन साठ वर्ष तक चलेगा; और वह दिव्य अप्सरा, आपकी पत्नी, शीघ्र ही आप पर विजय प्राप्त कर लेगी"। इतना कहकर सब गायब हो गए।

65-66. पुरूरवा प्रतिदिन उर्वशी के दर्शन करने जाते थे। एक बार दक्षिण दिशा में आकाश में चलते हुए इंद्र के साथ रथ में बैठे हुए उन्होंने देखा कि उर्वशी और चित्रलेखा को राक्षसों के स्वामी केसीन द्वारा वायुमंडल में ले जाया जा रहा है।

67-68. एक युद्ध में उसे (अर्थात केसिन) परास्त कर दिया, जो पहले युद्ध में इंद्र को भी विभिन्न मिसाइलों (उस पर) फेंक कर परास्त कर चुका था, वह (यानी पुरूरवा) इंद्र के साथ मित्रवत हो गया और उसे उर्वशी दी। तभी से इंद्र उनके मित्र बन गए।

69. इंद्र ने प्रसन्न होकर, पुरूरवाओं से, दुनिया में (सभी को) श्रेष्ठ, उससे कहा: "तुम उसे ले लो"।

70. प्रेम के कारण उन्होंने भरत द्वारा रचित और लक्ष्मी - स्वयंवर नाम की एक महान कहानी पुरिरवास के लिए गाई ।

71. उसने (यानी भरत) मेनका , उर्वशी और रंभा को नृत्य करने का आदेश दिया । वहाँ उर्वशी, लक्ष्मी की भूमिका में, उचित विराम के साथ (संगीत में) नृत्य करती थीं।

72. वह नृत्य करते हुए, पुरूरवों को देखकर, प्रेम से पीड़ित हो गई और वह सभी अभिनय भूल गई जो पहले निर्देशित किया गया था।

73-74. भरत ने क्रोधित होकर उसे श्राप दिया कि उससे (अर्थात् पुरूरवास) अलग होकर वह एक लता में बदल जाएगी, पचपन वर्ष तक पृथ्वी पर रहेगी। तब उर्वशी ने उसके पास जाकर बहुत दिनों तक उसे अपना पति बना लिया। श्राप का अनुभव करने के बाद, उर्वशी ने बुद्ध के पुत्र (पुरुराव) द्वारा आठ पुत्रों को जन्म दिया।

75-77. मेरे पास से उनके नाम सुनो (जैसा कि मैं उन्हें बताता हूं)। आयु, दिधायु, वायुयु, बलायु, धृतिमान , वासु , दिव्याजय और शतायु- इन सभी में दैवीय शक्ति और जोश था। नहुष श्यु के पुत्र थे, वैसे ही वृद्धशर्मा भी थे; और राजी , दशा और विशाखा ; ये पांच वीर योद्धा थे। राजी के सौ पुत्र उत्पन्न हुए; वे राजय के नाम से जाने जाते थे ।

७८. राजी ने शुद्ध नारायण को प्रसन्न किया; विष्णु जो (इस प्रकार) तपस्या से प्रसन्न थे, ने राजा को वरदान दिया।

79. वह तब देवताओं, राक्षसों और पुरुषों का विजेता बन गया। फिर तीन सौ वर्षों तक देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध चलता रहा।

80 एक भयानक लड़ाई के बीच हुआ प्रहलाद और Sakra , और उनमें से कोई विजयी बाहर आया था। तब देवताओं और राक्षसों ने अलग-अलग ब्रह्मा से पूछा:

81. "दोनों में से कौन विजयी होगा?" उन्होंने कहा: "वह, जहां (यानी किसके पक्ष में) राजी है (विजयी होगा)।"

82. राक्षसों ने राजा से अनुरोध किया, "जीत के लिए हमारी मदद करें"। उसने कहा: “यदि मैं तेरा स्वामी हो (मैं तेरी सहायता करूंगा); अन्यथा यह पर्याप्त है (अर्थात मैं आपकी सहायता नहीं करूंगा)"। राक्षसों ने इसे स्वीकार नहीं किया; लेकिन देवताओं ने किया।

83. "हमारे स्वामी बनो और दुश्मन की सेना को नष्ट करो।" फिर उसने उन सभी को नष्ट कर दिया जो इंद्र द्वारा मारे जाने वाले थे।

84. उसके उस कार्य से इंद्र उसके पुत्र बने। फिर इंद्र को राज्य देते हुए, राजी तपस्या करने गए।

85. तब, तपस्या और शक्ति के गुण से संपन्न राजी के पुत्रों ने इंद्र से राज्य और यज्ञ में उसका हिस्सा जबरन छीन लिया।

86-87. वह, राज्य से वंचित और राजी के पुत्रों द्वारा उत्पीड़ित, असहाय होकर, बृहस्पति से कहा: "हे बृहस्पति, राजी के पुत्रों द्वारा परेशान मेम; मैं जो अन्धेर हूं, उसका न राज्य है, और न बलिदान का भाग; बुद्धि के स्वामी, मेरे लिए राज्य प्राप्त करने का प्रयास करो। ”

88. तब बृहस्पति ने ग्रहों को शांत करने और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए अनुष्ठान के माध्यम से इंद्र को शक्ति से अभिमानी बना दिया।

89-91. बृहस्पति ने राजी के पुत्रों के पास जाकर उन्हें स्तब्ध कर दिया। बुद्धि के स्वामी (अर्थात बृहस्पति) जो धर्म को जानते थे, जैनों के धर्म का सहारा लेते हुए, जो वैदिक धर्म से बाहर थे, उन्हें तीनों वेदों से गिरा दिया। उन्हें वैदिक दायरे से बाहर और विवाद से संपन्न जानकर, इंद्र ने अपने बोल्ट से उन सभी को मार डाला - जो (वैदिक) धर्म से बहिष्कृत थे। मैं तुम्हें नहुष के सात धर्मपरायण पुत्रों के बारे में बताऊंगा:

९२. यति , ययाति , शर्यति , उत्तरा और परा ; इसी प्रकार अयाति और वायति भी ; इन सातों ने जाति का प्रचार किया।

93. यति बचपन में ही लंगर बन गया था। हमेशा धर्मपरायण रहने वाले ययाति ने अपने राज्य पर शासन किया।

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94. Śarmiṣṭhā, the daughter of Vṛṣaparvan, was his wife; so also Bhārgava’s daughter Devayānī of a good vow (was his wife).

95. Yayāti had five sons; I shall mention them by names. Devayānī gave birth to a son (named) Yadu and also (another son) Vasu.

96. Śarmiṣṭhā gave birth to (three) sons: Druhyu, Aṇu and Pūru. Yadu, Pūru and Bharata continued the race.

97-98. O King, (now) I shall describe the Pūru-race, in which you are born. From Yadu the Yādavas were born, among whom were (born) Bala (-rāma) and Kṛṣṇa for taking down the burden of Pāṇḍavas and for their welfare. Yadu’s five sons were like god’s sons.

99. The eldest was Sahasrajit, then KroṣṭṛNīla, Añjika and Raghu. King named Śatajit was Sahasrajit’s son.

100. Śatajit had three extremely religious sons: HaihayaHaya and Tālahaya also.

101. Dharmanetra was the well-known son of Haihaya; Dharmanetra’s son was Kunti and his (Kunti’s) son was Saṃhata.

102-104. The king named Mahiṣmān was Saṃhata’s son. Brave Bhadrasena was the son of Mahiṣmān. He was a king in Vārāṇasī, who has already been mentioned. The religious son of Bhadrasena was Durdama by name. The terrible son of Durdama was named Dhanaka. Dhanaka had four sons well-known in the world.

105. KṛtāgniKṛtavīrya, so also Kṛtadharma; the fourth son was Kṛtaujas; that (well known) Arjuna was (the son) of Kṛtavīrya.

९४. वृषपर्वन की पुत्री शर्मिष्ठा उनकी पत्नी थीं; इसी प्रकार भार्गव की पुत्री देवयानी ने भी एक अच्छी प्रतिज्ञा की (उनकी पत्नी थी)।


95. ययाति के पांच पुत्र थे; मैं उनका उल्लेख नामों से करूंगा। देवयानी ने एक पुत्र (नाम) यदु और (एक अन्य पुत्र) वासु को भी जन्म दिया।


९६. शर्मिष्ठा ने (तीन) पुत्रों को जन्म दिया: द्रुहु, आशु और पुरु। यदु, पुरु और भरत ने दौड़ जारी रखी।


97-98. हे राजा, (अब) मैं उस पुरु-वंश का वर्णन करूंगा, जिसमें आप पैदा हुए हैं। यदु से यादवों का जन्म हुआ, जिनमें से (जन्म) बाल (-राम) और कृष्ण पांडवों का बोझ उतारने और उनके कल्याण के लिए थे। यदु के पांच पुत्र भगवान के पुत्रों के समान थे।


99. सबसे बड़े थे सहस्रजित, फिर क्रो, नील, अंजिका और रघु। शतजित नाम के राजा सहस्रजित के पुत्र थे।


100. शताजित के तीन अत्यंत धार्मिक पुत्र थे: हैहय, हया और तलहया भी।


101. धर्मनेत्र हैहया के सुप्रसिद्ध पुत्र थे; धर्मनेत्र के पुत्र कुंती थे और उनके (कुंती के) पुत्र संहत थे।


102-104. महिष्मान नाम का राजा संहत का पुत्र था। बहादुर भद्रसेन महिष्मान के पुत्र थे। वह वाराणसी में एक राजा थे, जिनका उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। भद्रसेन के धार्मिक पुत्र का नाम दुर्दामा था। दुर्दम के भयानक पुत्र का नाम धनक था। धनक के चार पुत्र थे जो संसार में विख्यात थे।


१०५. किताग्नि, कृतवीर्य, ​​वैसे ही कृतधर्म; चौथा पुत्र कतौज था; वह (प्रसिद्ध) अर्जुन कोतवीर्य का (पुत्र) था।


106. राजा अपनी हजार भुजाओं से सात द्वीपों का स्वामी हुआ। तब पृथ्वी के स्वामी ने दस हजार वर्षों तक तपस्या की।

107. कार्तवीर्य ने अत्रि से उत्पन्न दत्त को प्रसन्न किया । पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ दत्ता ने उन्हें चार वरदान दिए।

108. सबसे अच्छे राजा ने पहले एक हजार भुजाओं को चुना। (दूसरे वरदान के द्वारा उसने उसे चुना) एक दुष्ट सोच से भय उत्पन्न होगा और वह दूर हो जाएगा।

109. (तीसरे वरदान से) वह युद्ध करके पृथ्वी पर विजय प्राप्त करेगा और धार्मिक कृत्यों के माध्यम से शक्ति प्राप्त करेगा; और अतिरिक्त (अर्थात् चौथा वरदान) द्वारा वह किसी को भी मार डालेगा जो उसके सामने युद्ध में खड़ा होगा।

110. उसने अपनी वीरता से इस पृथ्वी को अपने सात द्वीपों और शहरों के साथ जीत लिया और सात समुद्रों से घिरा हुआ था।

१११. उनमें से, बुद्धिमान एक, एक हजार हथियार उसके द्वारा वांछित के रूप में उत्पादित किए गए थे; उन्होंने सभी बलिदान किए जिनमें बड़ी फीस का भुगतान किया गया था।

112. उन सभोंके सब के सोने के बलि और सोने की वेदियां थीं; सभी देवताओं ने भाग लिया और हवाई कारों में बैठे और सुशोभित हुए।

113-116. वे हमेशा गंधर्वों और आकाशीय अप्सराओं द्वारा भी भाग लेते थे। उनके बलिदान में गंधर्व और नारद ने शाही ऋषि कार्तवीर्य की महानता को देखने के बाद एक श्लोक गाया। बलिदान, उपहार, तपस्या, वीरता या विद्या के माध्यम से राजा कभी भी कार्तवीर्य के पद को प्राप्त नहीं कर पाएंगे। सात द्वीपों पर तेजी से आगे बढ़ते हुए, राजा, हवा के बराबर, पचहत्तर हजार वर्षों के लिए सात द्वीपों के साथ पृथ्वी का शासक सम्राट बन गया।

117. वह जानवरों का रक्षक बन गया; वह अकेला ही खेतों का रक्षक था; वह अकेले ही वर्षा के माध्यम से बादल बन गया और अपने परिश्रम (परिश्रम) के माध्यम से अर्जुन बन गया।

११८. वह अपनी सहस्त्र भुजाओं से, और धनुष की तानों के कारण खुरदुरी त्वचा से, सहस्र किरणों के साथ शरत्कालीन सूर्य के समान चमका।

११९. महिष्मती में वह (एक आदमी) पुरुषों के बीच महान प्रतिभा का था; बरसात के मौसम में वह समुद्र के आंदोलन को पूरा करेगा।

120. वह अपनी खुशी के लिए, करंट के खिलाफ (यानी स्पोर्टेड) ​​खेलता है; पलकों से खेलकर उसने समुद्र को बांध दिया।

121-123. नर्मदा , भयभीत और अपनी भौंहों के रूप में अपनी भौंहों की बुनाई की एक श्रृंखला पाकर उसके पास बहने लगीं। मनु के परिवार से वह अकेला ही समुद्र में डुबकी लगाता, एक हाथ से समुद्र को खींचता और सुंदर महिलाओं को प्रसन्न करके उसमें डुबकी लगाता। जब उसकी सहस्त्र भुजाओं से महान् महासागर उद्वेलित होगा, तो नीचे के क्षेत्र के बड़े-बड़े राक्षस छिप जायेंगे और गतिहीन रहेंगे।

124-128. उसकी जाँघों की हलचल से दंग रह गए, और यह संदेह करते हुए कि अमृत का मंथन किया जा रहा है, अपने सिर को गतिहीन रखते हुए नीचे झुक गए। इस धनुर्धर ने रावण के विरुद्ध बाण छोड़े । इस धनुर्धर ने धनुष लेकर (बल से) लंका- रावण के अभिमानी स्वामी को पाँच बाणों से स्तब्ध और परास्त कर दिया और उसे गिरफ्तार करके माहिष्मती के पास ले आए। तब मैं अर्जुन को प्रसन्न करने के लिए उनके पास गया; मेरे पोते (अर्थात् रावण) से मित्रता कर उसने उसे छोड़ दिया। उनके एक हजार भुजाओं वाले धनुष की ध्वनि उस अग्नि की तरह थी, जो एक युग (विश्व युग ) के अंत में पृथ्वी पर फैल जाएगी ।

१२९. ( परशुराम ) ने युद्ध में स्वर्ण ताल- वृक्षों की तरह हजार भुजाओं को काट दिया । शक्तिशाली वशिष्ठ ने क्रोधित होकर अर्जुन को श्राप दिया:

130. "चूंकि, हे हैहया, आपने मेरे प्रसिद्ध ग्रोव को जला दिया, इसलिए कोई और आपके बुरे कामों को नष्ट कर देगा।

१३१. वह शक्तिशाली तपस्वी ब्राह्मण भार्गव, आपकी हज़ार भुजाओं को शक्तिशाली रूप से काटकर (और इस प्रकार) आपको परेशान करके, आपको मार डालेंगे। ”

132-134. इस प्रकार परशुराम उस बुद्धिमान (कार्तवीर्य) के हत्यारे थे। हे बहुत शक्तिशाली ( भीम ), उसके सौ पुत्र थे; उनमें से (निम्नलिखित) पाँच महान योद्धा थे, जो मिसाइलों के विज्ञान में प्रशिक्षित थे, शक्तिशाली, बहादुर और धार्मिक: शरसेन , श्रृ ,  , कृष्ण और जयध्वज ; वह अवन्ती का निर्माता और पृथ्वी का स्वामी था। Tālajaṅgha महान पराक्रम का Jayadhvaja का बेटा था।

135. उनके सौ पुत्र तलजंग के नाम से जाने जाते थे । इन हैहयों में से पाँच परिवार थे।

136. Vītihotras पैदा हुए थे (इस परिवार में), तो भी Bhojas और Avantis , और Tuṇḍakera; (इन सभी) को तलजंग कहा जाता था।

137. वतीहोत्र का शक्तिशाली पुत्र अनंत था । उसका पुत्र दुर्जय था जिसने अपने शत्रुओं को सताया।

138-140। एक हजार भुजाओं वाले महान राजा कार्तवीर्य ने ईमानदारी से प्रजा की रक्षा की, जिन्होंने अपने धनुष से समुद्रों से घिरी पृथ्वी को जीत लिया; और जो भोर को उठकर अपके नाम का उच्चारण करता है, वह अपके धन की कभी हानि नहीं करता; वह जो खोया है उसे वापस पा लेता है। जो बुद्धिमान कार्तवीर्य के जीवन का वर्णन करता है, वह दाता या बलिदानी के रूप में स्वर्ग में सम्मानित होता है।


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इति श्रीपाद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे यदुवंशकीर्तनं नाम द्वादशोऽध्यायः(१२)






 पद्म पुराण सृष्टि खण्ड का यह अध्याय यदु के वंश का वर्णन करता है । पद्म पुराण  सबसे बड़े महापुराणों में से एक है ।

जिसमें प्राचीन एशियाई  समाज की सांस्कृतिक, परंपराओं, भूगोल, साथ ही धार्मिक तीर्थों की यात्रा) आदि  पवित्र स्थानों  के बारे में बताया गया है। यह पद्म पुराण के सृष्टि-खंड (सृजन पर खंड) का बारहवाँ  अध्याय है।

          





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पद्मपुराणम्/खण्डः १ (सृष्टिखण्डम्)/अध्यायः १३

< पद्मपुराणम्‎ | खण्डः १ (सृष्टिखण्डम्)
← अध्यायः १२ पद्मपुराणम्
अध्यायः १३
वेदव्यासः अध्यायः १४ →


पुलस्त्य उवाच
क्रोष्टोः शृणु त्वं राजेंद्र वंशमुत्तमपूरुषम्
यस्यान्ववाये संभूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः१
क्रोष्टोरेवाभवत्पुत्रो वृजिनीवान्महायशाः
तस्य पुत्रोभवत्स्वातिः कुशंकुस्तत्सुतोभवत्२
कुशंकोरभवत्पुत्रो नाम्ना चित्ररथोस्य तु
शशबिंदुरिति ख्यातश्चक्रवर्ती बभूव ह३
अत्रानुवंशश्लोकोयं गीतस्तस्य पुराभवत्
शशबिंदोस्तु पुत्राणां शतानामभवच्छतम्४
धीमतां चारुरूपाणां भूरिद्रविणतेजसाम्
तेषां शतप्रधानानां पृथुसाह्वा महाबलाः५
पृथुश्रवाः पृथुयशाः पृथुतेजाः पृथूद्भवः
पृथुकीर्तिः पृथुमतो राजानः शशबिंदवः६
शंसंति च पुराणज्ञाः पृथुश्रवसमुत्तमम्
ततश्चास्याभवन्पुत्राः उशना शत्रुतापनः७
पुत्रश्चोशनसस्तस्य शिनेयुर्नामसत्तमः
आसीत्शिनेयोः पुत्रो यः स रुक्मकवचो मतः८
निहत्य रुक्मकवचो युद्धे युद्धविशारदः
धन्विनो विविधैर्बाणैरवाप्य पृथिवीमिमाम्९
अश्वमेधे ऽददाद्राजा ब्राह्मणेभ्यश्च दक्षिणां
जज्ञे तु रुक्मकवचात्परावृत्परवीरहा१०
तत्पुत्रा जज्ञिरे पंच महावीर्यपराक्रमाः
रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः परिघो हरिः११
परिघं च हरिं चैव विदेहे स्थापयत्पिता
रुक्मेषुरभवद्राजा पृथुरुक्मस्तथाश्रयः१२
ताभ्यां प्रव्राजितो राज्याज्ज्यामघोवसदाश्रमे
प्रशांतश्चाश्रमस्थस्तु ब्राह्मणेन विबोधितः१३
जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी
नर्मदातट एकाकी केवलं वृत्तिकर्शितः१४
ऋक्षवंतं गिरिं गत्वा मुक्तमन्यैरुपाविशत्
ज्यामघस्याभवद्भार्या शैब्या परिणता सती१५
अपुत्रोप्यभवद्राजा भार्यामन्यामचिंतयन्
तस्यासीद्विजयो युद्धे तत्र कन्यामवाप्य सः१६
भार्यामुवाच संत्रासात्स्नुषेयं ते शुचिस्मिते
एवमुक्त्वाब्रवीदेनं कस्य केयं स्नुषेति वै१७
राजोवाच
यस्ते जनिष्यते पुत्रस्तस्य भार्या भविष्यति
तस्याः सा तपसोग्रेण कन्यायाः संप्रसूयत१८
पुत्रं विदर्भं सुभगं शैब्या परिणता सती
राजपुत्र्यां तु विद्वांसौ स्नुषायां क्रथकौशिकौ१९
लोमपादं तृतीयं तु पुत्रं परमधार्मिकम्
पश्चाद्विदर्भो जनयच्छूरं रणविशारदम्२०
लोमपादात्मजो बभ्रुर्धृतिस्तस्य तु चात्मजः
कौशिकस्यात्मजश्चेदिस्तस्माच्चैद्यनृपाः स्मृताः२१
क्रथो विदर्भपुत्रो यः कुंतिस्तस्यात्मजोभवत्
कुंतेर्धृष्टस्ततो जज्ञे धृष्टात्सृष्टः प्रतापवान्२२
सृष्टस्य पुत्रो धर्मात्मा निवृत्तिः परवीरहा
निवृत्तिपुत्रो दाशार्हो नाम्ना स तु विदूरथः२३
दाशार्हपुत्रो भीमस्तु भीमाज्जीमूत उच्यते
जीमूतपुत्रो विकृतिस्तस्यभीमरथः सुतः२४
अथ भीमरथस्यापि पुत्रो नवरथः किल
तस्य चासीद्दशरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः२५
तस्मात्करंभस्तस्माच्च देवरातो बभूव ह
देवक्षत्रोभवद्राजा देवरातान्महायशाः२६
देवगर्भसमो जज्ञे देवक्षत्रस्य नंदनः
मधुर्नाममहातेजा मधोः कुरुवशः स्मृतः२७
आसीत्कुरुवशात्पुत्रः पुरुहोत्रः प्रतापवान्
अंशुर्जज्ञेथ वैदर्भ्यां द्रवंत्यां पुरुहोत्रतः२८
वेत्रकी त्वभवद्भार्या अंशोस्तस्यां व्यजायत
सात्वतः सत्वसंपन्नः सात्वतान्कीर्तिवर्द्धनः२९
इमां विसृष्टिं विज्ञाय ज्यामघस्य महात्मनः
प्रजावानेति सायुज्यं राज्ञः सोमस्य धीमतः३०
सात्वतान्सत्वसंपन्ना कौसल्या सुषुवे सुतान्
तेषां सर्गाश्च चत्वारो विस्तरेणैव तान्शृणु३१
भजमानस्य सृंजय्यां भाजनामा सुतोभवत्
सृंजयस्य सुतायां तु भाजकास्तु ततोभवन्३२
तस्य भाजस्य भार्ये द्वे सुषुवाते सुतान्बहून्
नेमिं चकृकणं चैव वृष्णिं परपुरंजयं३३
ते भाजकाः स्मृता यस्माद्भजमानाद्वि जज्ञिरे
देवावृधः पृथुर्नाम मधूनां मित्रवर्द्धनः३४
अपुत्रस्त्वभवद्राजा चचार परमं तपः
पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्पृहन्३५
संयोज्य कृष्णमेवाथ पर्णाशाया जलं स्पृशन्
सा तोयस्पर्शनात्तस्य सांनिध्यं निम्नगा ह्यगात्३६
कल्याणं चरतस्तस्य शुशोच निम्नगाततः
चिंतयाथ परीतात्मा जगामाथ विनिश्चयम्३७
भूत्वा गच्छाम्यहं नारी यस्यामेवं विधः सुतः
जायेत तस्मादद्याहं भवाम्यस्य सुतप्रदा३८
अथ भूत्वा कुमारी सा बिभ्रती परमं वपुः
ज्ञापयामास राजानं तामियेष नृपस्ततः३९
अथसानवमेमासिसुषुवेसरितांवरा
पुत्रं सर्वगुणोपेतं बभ्रुं देवावृधात्परम्४०
अत्र वंशे पुराणज्ञा ब्रुवंतीति परिश्रुतम्
गुणान्देवावृधस्याथ कीर्त्तयंतो महात्मनः४१
बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः
षष्टिः शतं च पुत्राणां सहस्राणि च सप्ततिः४२
एतेमृतत्वं संप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि
यज्ञदानतपोधीमान्ब्रह्मण्यस्सुदृढव्रतः४३
रूपवांश्च महातेजा भोजोतोमृतकावतीम्
शरकान्तस्य दुहिता सुषुवे चतुरः सुतान्४४
कुकुरं भजमानं च श्यामं कंबलबर्हिषम्
कुकुरस्यात्मजो वृष्टिर्वृष्टेस्तु तनयो धृतिः४५
कपोतरोमा तस्यापि तित्तिरिस्तस्य चात्मजः
तस्यासीद्बहुपुत्रस्तु विद्वान्पुत्रो नरिः किल४६
ख्यायते तस्य नामान्यच्चंदनोदकदुंदुभिः
अस्यासीदभिजित्पुत्रस्ततो जातः पुनर्वसुः४७
अपुत्रोह्यभिजित्पूर्वमृषिभिः प्रेरितो मुदा
अश्वमेधंतुपुत्रार्थमाजुहावनरोत्तमः४८
तस्य मध्ये विचरतः सभामध्यात्समुत्थितः
अन्धस्तु विद्वान्धर्मज्ञो यज्ञदाता पुनर्वसुः४९
तस्यासीत्पुत्रमिथुनं वसोश्चारिजितः किल
आहुकश्चाहुकी चैव ख्याता मतिमतां वर५० 1.13.50
इमांश्चोदाहरंत्यत्र श्लोकांश्चातिरसात्मकान्
सोपासंगानुकर्षाणां तनुत्राणां वरूथिनाम्५१
रथानां मेघघोषाणां सहस्राणि दशैव तु
नासत्यवादिनो भोजा नायज्ञा नासहस्रदाः५२
नाशुचिर्नाप्यविद्वांसो न भोजादधिकोभवत्
आहुकां तमनुप्राप्त इत्येषोन्वय उच्यते५३
आहुकश्चाप्यवंतीषु स्वसारं चाहुकीं ददौ
आहुकस्यैव दुहिता पुत्रौ द्वौ समसूयत५४
देवकं चोग्रसेनं च देवगर्भसमावुभौ
देवकस्य सुताश्चैव जज्ञिरे त्रिदशोपमाः५५
देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः
तेषां स्वसारः सप्तैव वसुदेवाय ता ददौ५६
देवकी श्रुतदेवा च यशोदा च श्रुतिश्रवा
श्रीदेवा चोपदेवा च सुरूपा चेति सप्तमी५७
नवोग्रसेनस्य सुताः कंसस्तेषां च पूर्वजः
न्यग्रोधस्तु सुनामा च कंकः शंकुः सुभूश्च यः५८
अन्यस्तु राष्ट्रपालश्च बद्धमुष्टिः समुष्टिकः
तेषां स्वसारः पंचासन्कंसा कंसवती तथा५९
सुरभी राष्ट्रपाली च कंका चेति वरांगनाः
उग्रसेनः सहापत्यो व्याख्यातः कुकुरोद्भवः६०
भजमानस्य पुत्रोभूद्रथिमुख्यो विदूरथः
राजाधिदेवः शूरश्च विदूरथसुतोभवत्६१
राजाधिदेवस्य सुतौ जज्ञाते वीरसंमतौ
क्षत्रव्रतेतिनिरतौ शोणाश्वः श्वेतवाहनः६२
शोणाश्वस्य सुताः पंच शूरा रणविशारदाः
शमी च राजशर्मा च निमूर्त्तः शत्रुजिच्छुचिः६३
शमीपुत्रः प्रतिक्षत्रः प्रतिक्षत्रस्य चात्मजः
प्रतिक्षत्रसुतो भोजो हृदीकस्तस्य चात्मजः
हृदीकस्याभवन्पुत्रा दश भीमपराक्रमाः६४
कृतवर्माग्रजस्तेषां शतधन्वा च सत्तमः
देवार्हश्च सुभानुश्च भीषणश्च महाबलः६५
अजातश्च विजातश्च करकश्च करंधमः
देवार्हस्य सुतो विद्वान्जज्ञे कंबलबर्हिषः६६
असमौजास्ततस्तस्य समौजाश्च सुतावुभौ
अजातपुत्रस्य सुतौ प्रजायेते समौजसौ६७
समौजः पुत्रा विख्यातास्त्रयः परमधार्मिकाः
सुदंशश्च सुवंशश्च कृष्ण इत्यनुनामतः६८
अंधकानामिमं वंशं यः कीर्तयति नित्यशः
आत्मनो विपुलं वंशं प्रजामाप्नोत्ययं ततः६९
गांधारी चैव माद्री च क्रोष्टोर्भार्ये बभूवतुः
गांधारी जनयामास सुनित्रं मित्रवत्सलम्७०
माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवमीढुषं
अनमित्रं शिनिं चैव पंचात्र कृतलक्षणाः७१
अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्यापि च द्वौ सुतौ
प्रसेनश्च महावीर्यः शक्तिसेनश्च तावुभौ७२
स्यमंतकं प्रसेनस्य मणिरत्नमनुत्तमं
पृथिव्यां मणिरत्नानां राजेति समुदाहृतम्७३
हृदि कृत्वा सुबहुशो मणिं तं स व्यराजत
मणिरत्नं ययाचेथ राजार्थं शौरिरुत्तमम्७४
गोविंदश्च न तं लेभे शक्तोपि न जहार सः
कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः७५
बिले शब्दं स शुश्राव कृतं सत्त्वेन केनचित्
ततः प्रविश्य स बिलं प्रसेनो ह्यृक्षमासदत्७६
ऋक्षः प्रसेनं च तथा ऋक्षं चापि प्रसेनजित्
आसाद्य युयुधाते तौ परस्परजयेच्छया७७
हत्वा ऋक्षः प्रसेनं च ततस्तं मणिमाददात्
प्रसेनं तु हतं श्रुत्वा गोविंदः परिशंकितः७८
सत्राजित्रा तु तद्भ्रात्रा यादवैश्च तथापरैः
गोविंदेन हतो नूनं प्रसेनो मणिकारणात्७९
प्रसेनस्तु गतोरण्यं मणिरत्नेन भूषितः
तं दृष्ट्वा निजघानाथ न त्यजन्तं स्यमंतकम्८०
जघानैवाप्रदानेन शत्रुभूतं च केशवः
इति प्रवादस्सर्वत्र ख्यातस्सत्राजिता कृतः८१
अथ दीर्घेण कालेन मृगयां निर्गतः पुनः
यदृच्छया च गोविंदो बिलाभ्याशमथागमत्८२
ततश्शब्दं यथापूर्वं स चक्रे ऋक्षराड्बली
शब्दं श्रुत्वा तु गोविंदः खङ्गपाणिः प्रविश्य च८३
अपश्यज्जांबवंतं च ऋक्षराजं महाबलं
ततस्तूर्णं हृषीकेशस्तमृक्षमतिरंहसा८४
जांबवंतं स जग्राह क्रोधसंरक्तलोचनः
दृष्ट्वा चैनं तथा विष्णुं कर्मभिर्वैष्णवीं तनुं८५
तुष्टाव ऋक्षराजोपि विष्णुसूक्तेन सत्वरं
ततस्तु भगवांस्तुष्टो वरेण समरोचयत्८६
जाम्बवानुवाच
इष्टं चक्रप्रहारेण त्वत्तो मे मरणं शुभम्
कन्या चेयं मम सुता भर्त्तारं त्वामवाप्नुयात्८७
योयं मणिः प्रसेनात्तु हत्वा चैवाप्तवानहम्
स त्वया गृह्यतां नाथ मणिरेषोऽत्र वर्त्तते८८
इत्युक्तो जांबवंतं वै हत्वा चक्रेण केशवः
कृतकार्यो महाबाहुः कन्यां चैवाददौ तदा८९
ततः सत्राजिते चैतन्मणिरत्नं स वै ददौ
यल्लब्धमृक्षराजाच्च सर्वयादवसन्निधौ९०
तेन मिथ्याप्रवादेन संतप्तोयं जनार्दनः
ततस्ते यादवाः सर्वे वासुदेवमथाब्रुवन्९१
अस्माकं मनसि ह्यासीत्प्रसेनस्तु त्वया हतः
एकैकस्यास्तु सुंदर्यो दश सत्राजितः सुताः९२
सत्योत्पन्नास्सुतास्तस्य शतमेकं च विश्रुताः
विख्याताश्च महावीर्या भंगकारश्च पूर्वजः९३
सत्या व्रतवती स्वप्ना भंगकारस्य पूर्वजा
सुषुवुस्ताः कुमारांश्च शिनीवालः प्रतापवान्९४
अभंगो युयुधानश्च शिनिस्तस्यात्मजोभवत्
तस्माद्युगंधरः पुत्राश्शतं तस्य प्रकीर्तिताः९५
अनमित्राह्वयो यो वै विख्यातो वृष्णिवंशजः
अनमित्रात्शिनिर्जज्ञे कनिष्ठो वृष्णिनंदनः९६
अनमित्राच्च संजज्ञे वृष्णिवीरो युधाजितः
अन्यौ च तनयौ वीरा वृषभश्चित्र एव च९७
ऋषभः काशिराजस्य सुतां भार्यामनिंदितां
जयंतश्च जयंतीं च शुभां भार्यामविंदत९८
जयंतस्य जयंत्यां वै पुत्रः समभवत्ततः
सदा यज्वातिधीरश्च श्रुतवानतिथिप्रियः९९
अक्रूरः सुषुवे तस्मात्सुदक्षो भूरिदक्षिणः
रत्नकन्या च शैब्या च अक्रूरस्तामवाप्तवान्१०० 1.13.100
पुत्रानुत्पादयामास एकादशमहाबलान्
उपलंभं सदालंभमुत्कलं चार्य्यशैशवं१०१
सुधीरं च सदायक्षं शत्रुघ्नं वारिमेजयं
धर्मदृष्टिं च धर्मं च सृष्टिमौलिं तथैव च१०२
सर्वे च प्रतिहर्तारो रत्नानां जज्ञिरे च ते
अक्रूराच्छूरसेनायां सुतौ द्वौ कुलनंदनौ१०३
देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसंमतौ
अश्विन्यां त्रिचतुः पुत्राः पृथुर्विपृथुरेव च१०४
अश्वग्रीवो श्वबाहुश्च सुपार्श्वक गवेषणौ
रिष्टनेमिः सुवर्चा च सुधर्मा मृदुरेव च१०५
अभूमिर्बहुभूमिश्च श्रविष्ठा श्रवणे स्त्रियौ
इमां मिथ्याभिशप्तिं यो वेद कृष्णस्य बुद्धिमान्१०६
न स मिथ्याभिशापेन अभिगम्यश्च केनचित्
एक्ष्वाकी सुषुवे पुत्रं शूरमद्भुतमीढुषम्१०७
मीढुषा जज्ञिरे शूरा भोजायां पुरुषा दश
वसुदेवो महाबाहुः पूर्वमानकदुंदुभिः१०८
देवभागस्तथा जज्ञे तथा देवश्रवाः पुनः
अनावृष्टिं कुनिश्चैव नंदिश्चैव सकृद्यशाः१०९
श्यामः शमीकः सप्ताख्यः पंच चास्य वरांगनाः
श्रुतकीर्तिः पृथा चैव श्रुतदेवी श्रुतश्रवाः११०
राजाधिदेवी च तथा पंचैता वीरमातरः
वृद्धस्य श्रुतदेवी तु कारूषं सुषुवे नृपम्१११
कैकेयाच्छ्रुतकीर्तेस्तु जज्ञे संतर्दनो नृपः
श्रुतश्रवसि चैद्यस्य सुनीथः समपद्यत११२
राजाधिदेव्याः संभूतो धर्माद्भयविवर्जितः
शूरः सख्येन बद्धोसौ कुंतिभोजे पृथां ददौ११३
एवं कुंती समाख्या च वसुदेवस्वसा पृथा
कुंतिभोजोददात्तां तु पांडोर्भार्यामनिंदिताम्११४
पाण्ड्वर्थेसूत देवी सा देवपुत्रान्महारथान्
धर्माद्युधिष्ठिरो जज्ञे वाताज्जज्ञे वृकोदरः११५
इंद्राद्धनंजयश्चैव शक्रतुल्यपराक्रमः
योऽसौ त्रिपुरुषाज्जातस्त्रिभिरंशैर्महारथः११६
देवकार्यकरश्चैव सर्वदानवसूदनः
अवध्याश्चापि शक्रस्य दानवा येन घातिताः११७
स्थापितस्स तु शक्रेण लब्धवर्चास्त्रिविष्टपे
माद्रवत्यां तु जनितावश्विनाविति नः श्रुतम्११८
नकुलः सहदेवश्च रूपसत्वगुणान्वितौ
रोहिणी पौरवी नाम भार्या चानकदुंदुभेः११९
लेभे चेष्टं सुतं रामं सारणं च रणप्रियम्
दुर्धरं दमनं चैव पिंडारकमहाहनुं१२०
अथ मायात्वमावास्या देवकी या भविष्यति
तस्यां जज्ञे महाबाहुः पूर्वं तु स प्रजापतिः१२१
अनुजाताभवत्कृष्णा सुभद्रा भद्रभाषिणी
विजयो रोचमानस्तु वर्धमानश्च देवलः१२२
एते सर्वे महात्मान उपदेव्यां प्रजज्ञिरे
अगावहं महात्मानं बृहद्देवी व्यजायत१२३
बृहद्देव्यां स्वयं जज्ञे मन्दको नाम नामतः
सप्तमं देवकी पुत्रं रेमंतं सषुवे सुतम्१२४
गवेषणं महाभागं संग्रामेष्वपराजितम्
श्रुतदेव्या विहारे तु वने विचरता पुरा१२५
वैश्यायां समधाच्छौरिः पुत्रं कौशिकमग्रजम्
श्रुतंधरा तु राज्ञी तु सौरगंधपरिग्रहः१२६
पुत्रं च कपिलं चैव वसुदेवात्मजो बली
जनानां च विषादोभूत्प्रथमः स धनुर्द्धरः१२७
सौभद्रश्चाभवश्चैव महासत्वौ बभूवतुः
देवभागसुतश्चापि प्रस्तावः स बुधः स्मृतः१२८
पण्डितं प्रथमं बाहु देवश्रवसमुत्तमम्
इक्ष्वाकुकुलतो यस्य मनस्विन्या यशस्विनी१२९
निवृत्तशत्रुः शत्रुघ्नः श्रद्धा तस्मादजायत
गंडूषायामपत्यानि कृष्णस्तुष्टः शतं ददौ१३०
स चंद्रं तु महाभागं वीर्यवंतं महाबलम्
रंतिपालश्च रंतिश्च नंदनस्य सुतावुभौ१३१
शमीकपुत्राश्चत्वारो विक्रांताः सुमहाबलाः
विरजश्च धनुश्चैव व्योमस्तस्य स सृंजयः१३२
अनपत्योभवद्व्योमः सृंजयस्य धनंजयः
यो जायमानो भोजत्वं राजर्षित्वमवाप्तवान्१३३
कृष्णस्य जन्माभ्युदयं यः कीर्तयति नित्यशः
शृणोति वा नरो नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते१३४
अथ देवो महादेवः पूर्वं कृष्णः प्रजापतिः
विहारार्थं स देवोसौ मानुषेष्वप्यजायत१३५
देवक्यां वसुदेवेन तपसा पुष्करेक्षणः
चतुर्बाहुस्तु संजातो दिव्यरूपो जनाश्रयः१३६
श्रीवत्सलक्षणं देवं दृष्ट्वा देवैः सलक्षणम्
उवाच वसुदेवस्तं रूपं संहर वै प्रभो१३७
भीतोहं देव कंसस्य ततस्त्वेतद्ब्रवीमि ते
मम पुत्रा हतास्तेन श्रेष्ठाः षड्भीमविक्रमाः१३८
वसुदेववचः श्रुत्वा रूपं संहरदच्युतः
अनुज्ञाप्य तु तं शौरिर्नन्दगोपगृहेनयत्१३९
दत्वा तं नंदगोपाय रक्ष्यतामिति चाब्रवीत्
अतस्तुसर्वकल्याणं यादवानां भविष्यति१४०
अयं तु गर्भो देवक्या यावत्कंसं हनिष्यति
तावत्पृथिव्यां भविता क्षेमो भारावहः परम्१४१
ये वै दुष्टास्तु राजानस्तांस्तु सर्वान्हनिष्यति
कौरवाणां रणे भूते सर्वक्षत्रसमागमे१४२
सारथ्यमर्जुनस्यायं स्वयं देवः करिष्यति
निःक्षत्रियां धरां कृत्वा भोक्ष्यते शेषतां गताम्१४३
सर्वं यदुकुलं चैव देवलोकं नयिष्यति
भीष्म उवाच
क एष वसुदेवस्तु देवकी का यशस्विनी१४४
नंदगोपश्च कश्चैव यशोदा का महाव्रता
या विष्णुं पोषितवती यां स मातेत्यभाषत१४५
या गर्भं जनयामास या चैनं समवर्द्धयत्
पुलस्त्य उवाच
पुरुषः कश्यपश्चासावदितिस्तत्प्रिया स्मृता१४६
कश्यपो ब्रह्मणोंशस्तु पृथिव्या अदितिस्तथा
नंदो द्रोणस्समाख्यातो यशोदाथ धराभवत्१४७
अथकामान्महाबाहुर्देवक्याः समपूरयत्
ये तया कांक्षिताः पूर्वमजात्तस्मान्महात्मनः१४८
अचिरं स महादेवः प्रविष्टो मानुषीं तनुं
मोहयन्सर्वभूतानि योगाद्योगी समाययौ१४९
नष्टे धर्मे तथा यज्ञे विष्णुर्वृष्णिकुले विभुः
कर्तुं धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्१५० 1.13.150
रुक्मिणी सत्यभामा च सत्या नाग्निजिती तथा
सुमित्रा च तथा शैब्या गांधारी लक्ष्मणा तथा१५१
सुभीमा च तथा माद्री कौशल्या विजया तथा
एवमादीनि देवीनां सहस्राणि च षोडश१५२
रुक्मिणी जनयामास पुत्रान्शृणु विशारदान्
चारुदेष्णं रणेशूरं प्रद्युम्नञ्च महाबलम्१५३
सुचारुं चारुभद्रञ्च सदश्वं ह्रस्वमेव च
सप्तमञ्चारुगुप्तञ्च चारुभद्रञ्च चारुकं१५४
चारुहासं कनिष्ठञ्च कन्याञ्चारुमतीं तथा
जज्ञिरे सत्यभामाया भानुर्भीमरथः क्षणः१५५
रोहितो दीप्तिमांश्चैव ताम्रबंधो जलंधमः
चतस्रो जज्ञिरे तेषां स्वसारश्च यवीयसीः१५६
जांबवत्याः सुतो जज्ञे सांबश्चैवातिशोभनः
सौरशास्त्रस्य कर्त्ता वै प्रतिमा मंदिरस्य च१५७
मूलस्थाने निवेशश्च कृतस्तेन महात्मना
तुष्टेन देवदेवेन कुष्ठरोगो विनाशितः१५८
सुमित्रं चारुमित्रं च मित्रविंदा व्यजायत
मित्रबाहुः सुनीथश्च नाग्नजित्यां बभूवतुः१५९
एवमादीनि पुत्राणांसहस्राणि निशामय
अशीतिश्च सहस्राणां वासुदेवसुतास्तथा१६०
प्रद्युम्नस्य च दायादो वैदर्भ्यां बुद्धिसत्तमः
अनिरुद्धो रणे योद्धा जज्ञेस्य मृगकेतनः१६१
काम्या सुपार्श्वतनया सांबाल्लेभे तरस्विनम्
सत्त्वप्रकृतयो देवाः पराः पंच प्रकीर्तिताः१६२
तिस्रः कोट्यः प्रवीराणां यादवानां महात्मनां
षष्टिः शतसहस्राणि वीर्यवंतो महाबलाः१६३
देवांशाः सर्व एवेह उत्पन्नास्ते महौजसः
दैवासुरे हता ये वा असुरास्तु महाबलाः१६४
इहोत्पन्ना मनुष्येषु बाधंते सर्वमानवान्
तेषामुद्धरणार्थाय उत्पन्ना यादवे कुले१६५
कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम्
विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः१६६
निदेशस्थायिनस्तस्य ऋद्ध्यंते सर्वयादवाः
भीष्म उवाच
सप्तर्षयः कुबेरश्च यक्षो मणिधरस्तथा१६७
सात्यकिर्नारदश्चैव शिवो धन्वंतरिस्तथा
आदिदेवस्तथाविष्णुरेभिस्तु सह दैवतैः१६८
किमर्थं सहसंभूताः सुरसम्भूतयः क्षितौ
भविष्याः कति वा चास्य प्रादुर्भावा महात्मनः१६९
सर्वक्षेत्रेषु सर्वेषु किमर्थमिह जायते
यदर्थमिह संभूतो विष्णुर्वृष्ण्यंधके कुले१७०
पुनःपुनर्मनुष्येषु तन्मे त्वं ब्रूहि पृच्छतः
पुलस्त्य उवाच
शृणु भूप प्रवक्ष्यामि रहस्यातिरहस्यकम्
यथा दिव्यतनुर्विष्णुर्मानुषेष्विह जायते१७१
युगांते तु परावृत्ते काले प्रशिथिले प्रभुः
देवासुरमनुष्येषु जायते हरिरीश्वरः१७२
हिरण्यकशिपुर्दैत्यस्त्रैलोक्यस्य प्रशासिता
बलिनाधिष्ठिते चैव पुनर्लोकत्रये क्रमात्१७३
सख्यमासीत्परमकं देवानामसुरैः सह
युगाख्या दश संपूर्णा आसीदव्याकुलं जगत्१७४
निदेशस्थायिनश्चापि तयोर्देवासुरा स्वयं
बद्धो बलिर्विमर्दोयं सुसंवृत्तः सुदारुणः१७५
देवानामसुराणां च घोरः क्षयकरो महान्
कर्तुं धर्मव्यवस्थां च जायते मानुषेष्विह१७६
भृगोः शापनिमित्तं तु देवासुरकृते तदा
भीष्म उवाच
कथं देवासुरकृते हरिर्देहमवाप्तवान्१७७
दैवासुरं यथावृत्तं तन्मे कथय सुव्रत
पुलस्त्य उवाच
तेषां जयनिमित्तं वै संग्रामा स्युः सुदारुणाः१७८
अवतारा दशद्वौ च शुद्धा मन्वंतरे स्मृताः
नामधेयं समासेन शृणु तेषां विवक्षितम्१७९
प्रथमो नारसिंहस्तु द्वितीयश्चापि वामनः
तृतीयस्तु वराहश्च चतुर्थोऽमृतमंथनः१८०
संग्रामः पंचमश्चैव सुघोरस्तारकामयः
षष्ठो ह्याडीबकाख्यश्च सप्तमस्त्रैपुरस्तथा१८१
अष्टमश्चांधकवधो नवमो वृत्रघातनः
ध्वजश्च दशमस्तेषां हालाहलस्ततः परं१८२
प्रथितो द्वादशस्तेषां घोरः कोलाहलस्तथा
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नरसिंहेन सूदितः१८३
वामनेन बलिर्बद्धस्त्रैलोक्याक्रमणे पुरा
हिरण्याक्षो हतो द्वंद्वे प्रतिवादे तु दैवतैः१८४
दंष्ट्रया तु वराहेण समुद्रस्थो द्विधा कृतः
प्रह्लादो निर्जितो युद्धे इंद्रेणामृतमंथने१८५
विरोचनस्तु प्राह्लादिर्नित्यमिन्द्रवधोद्यतः
इंद्रेणैव च विक्रम्य निहतस्तारकामये१८६
अशक्नुवत्सु देवेषु त्रिपुरं सोढुमासुरम्
मोहयित्वाऽमृते पीते गोरूपेणासुरारिणा१८७
नासन्जीवयितुं शक्या भूयो भूयोमृतासुराः
निहता दानवाः सर्वे त्रैलोक्ये त्र्यंबकेण तु१८८
असुराश्च पिशाचाश्च दानवाश्चांधके वधे
हता देवमनुष्यैस्ते पितृभिश्चैव सर्वशः१८९
संपृक्तो दानवैर्वृत्रो घोरे कोलाहले हतः
तदा विष्णुसहायेन महेंद्रेण निपातितः१९०
हतस्ततो महेंद्रेण मायाछन्नस्तु योगवित्
वज्रेण क्षणमाविश्य विप्रचित्तिः सहानुगः१९१
दैत्याश्च दानवाश्चैव संयुताः कृत्स्नशस्तु ते
एते दैवाऽसुरावृत्ताः संग्रामाद्वा दशैव तु१९२
देवासुरक्षयकराः प्रजानां च हिताय वै
हिरण्यकशिपू राजा वर्षाणामर्बुदं बभौ१९३
द्विसप्ततिं तथान्यानि नियुतान्यधिकानि तु
अशीति च सहस्राणि त्रैलोक्यैश्वर्यवानभूत्१९४
पर्यायेण तु राजाभूद्बलिर्वर्षार्बुदं पुनः
षष्ठिं चैव सहस्राणि नियुतानि च विंशतिं१९५
बलिराज्याधिकारे तु यावत्कालश्च कीर्तितः
तावत्कालं तु प्रह्लादो निर्वृतो ह्यसुरैः सह१९६
जयार्थमेते विज्ञेया असुराणां महौजसः
त्रैलोक्यमिदमव्यग्रं महेंद्रेणानुपाल्यते१९७
असम्पन्नमिदं सर्वं यावद्वर्षायुतं पुनः
पर्यायेणैव सम्प्राप्ते त्रैलोक्यं पाकशासने१९८
ततोऽसुरान्परित्यज्य यज्ञो देवानगच्छत
यज्ञे देवानथ गते दितिजाः काव्यमब्रुवन्१९९
दैत्या ऊचुः-
हृतं मघवता राज्यं त्यक्त्वा यज्ञः सुरान्गतः
स्थातुं न शुक्नुमो ह्यत्र प्रविशामो रसातलम्२०० 1.13.200
एवमुक्तोब्रवीदेतान्विषण्णान्सांत्वयन्गिरा
मा भैष्ट धारयिष्यामि तेजसा स्वेन वोऽसुराः२०१
मंत्राश्चौषधयश्चैव धरायां यत्तु वर्तते
मयि तिष्ठति तत्सर्वं पादमात्रं सुरेषु वै२०२
तत्सर्वं च प्रदास्यामि युष्मदर्थे धृतं मया
ततो देवास्तुतान्दृष्ट्वा धृतान्काव्येन धीमता२०३
अमंत्रयंत देवा वै संविग्नास्तज्जिघृक्षया
काव्यो ह्येष इदं सर्वं व्यावर्तयति नो बलात्२०४
साधु गच्छामहे तूर्णं यावन्न च्यावयेत वै
प्रसह्य जित्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे२०५
ततो देवास्तु संरब्धा दानवानुपसृत्य ह
ततस्ते वध्यमानास्तैः काव्यमेवाभिदुद्रुवुः२०६
ततः काव्यस्तु तान्दृष्ट्वा तूर्णं देवैरभिद्रुतान्
रक्षाकार्येण संहृत्य देवेभ्यस्तान्सुरार्दितान्२०७
काव्यं दृष्ट्वा स्थितं देवा निर्विशंकास्तु ते जहुः
ततः काव्योनुचिंत्याथ ब्रह्मणो वचनं हितम्२०८
तानुवाच ततः काव्यः पूर्ववृत्तमनुस्मरन्
त्रैलोक्यं वो हृतं सर्वं वामनेन त्रिभिः क्रमैः२०९
बलिर्बद्धो हतो जंभो निहतश्च विरोचनः
महासुरा द्वादशसु संग्रामेषु सुरैर्हताः२१०
तैस्तैरुपायैर्भूयिष्ठा निहतास्तु प्रधानतः
केचिच्छिष्टाश्च यूयं वै युद्धं नास्तीति मे मतम्२११
नीतयो वो विधातव्या उपासे कालपर्ययात्
यास्याम्यहं महादेवं मंत्रार्थं विजयावहम्२१२
अप्रतीपांस्ततो देवान्मंत्रान्प्राप्य महेश्वरात्
योत्स्यामहे पुनर्देवैस्ततः प्राप्स्यथ वै जयम्२१३
ततस्ते कृतसंवादा देवानूचुस्तदासुराः
न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःस्सन्नाहा रथैर्विना२१४
वयं तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैस्तथा
देवास्तेषां वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं ततः२१५
ततोन्यवर्तयन्सर्वे विज्वरा मुदिताश्च ते
न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः२१६
ततस्तानब्रवीत्काव्य उपाध्वं तपसि स्थिताः
निरुत्सिक्तास्तपोयुक्ताः कालं कार्यार्थसाधकम्२१७
पितुराश्रमसंस्था वै मां प्रतीक्षथ दानवाः
तानुद्दिश्यासुरान्काव्यो महादेवं प्रपद्यत२१८
शुक्र उवाच
मंत्रानिच्छाम्यहं देव येन सन्ति बृहस्पतौ
पराभवाय देवानामसुराणां जयाय च२१९
एवमुक्तोब्रवीद्देवो व्रतं त्वं चर भार्गव
पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममधः शिराः२२०
यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मंत्रानवाप्स्यसि
तथेति समनुज्ञाप्य शुक्रस्तु भृगुनंदनः२२१
पादौ संस्पृश्य देवस्य बाढमित्यब्रवीद्वचः
व्रतं चराम्यहं देव त्वयादिष्टोद्य वै प्रभो२२२
आदिष्टो देवदेवेन कृतवान्भार्गवो मुनिः
तदा तस्मिन्गते शुक्रे असुराणां हिताय वै२२३
मंत्रार्थे तनुते काव्यो ब्रह्मचर्यं महेश्वरात्
तद्बुद्ध्वा नीतिपूर्वं वै राजन्यास्तु तदा सुखं२२४
अस्मिंश्छिद्रे तदामर्षाद्देवास्तानभिदुद्रुवुः
दंशिताः सायुधाः सर्वे बृहस्पतिपुरःसराः२२५
दृष्ट्वा सुरगणा देवान्प्रगृहीतायुधान्पुनः
उत्पेतुस्सहसा सर्वे संत्रस्तास्तान्वचोब्रुवत्२२६
दैत्या ऊचुः
न्यस्तशस्त्रा वयं देवा आचार्ये व्रतमास्थिते
दत्वा भवंतस्त्वभयं संप्राप्ता नो जिघांसया२२७
अनमर्षा वयं सर्वे त्यक्तशस्त्राश्च संस्थिताः
चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः२२८
रणे विजेतुं देवांश्च न शक्ष्यामः कथंचन
अयुद्धेन प्रपत्स्यामः शरणं काव्यमातरम्२२९
ज्ञापयामः कृच्छ्रमिदं यावन्नाभ्येति नो गुरुः
निवृत्ते च तथा शुक्रे योत्स्यामो दंशितायुधाः२३०
एवमुक्त्वा च तेन्योन्यं शरणं काव्यमातरम्
प्रापद्यंत ततो भीतास्तेभ्योऽदादभयं तु सा२३१
न भेतव्यं न भेतव्यं भयं त्यजत दानवाः
मत्सन्निधौ वर्त्ततां वो न भीर्भवितुर्महति२३२
तयाभिरक्षितांस्तांश्च दृष्ट्वा देवास्तदाऽसुरान्
अभिजग्मुः प्रसह्यैतानविचार्य बलाबलम्२३३
ततस्तान्बध्यमानांस्तु देवैर्दृष्ट्वासुरांस्तदा
देवी क्रुद्धाब्रवीद्देवान्निद्रया मोहयाम्यहम्२३४
संभृत्य सर्वसंभारान्निद्रां सा व्यसृजत्तदा
तस्तंभ देवी च बलाद्योगयुक्ता तपोधना२३५
ततस्तं स्तभितं दृष्ट्वा इन्द्रं देवाश्च मूढवत्
प्राद्रवंत ततो भीता इन्द्रं दृष्ट्वा वशीकृतम्२३६
गतेषु सुरसंघेषु विष्णुरिंद्रमभाषत
विष्णुरुवाच
मां त्वं प्रविश भद्रं ते रक्षिष्ये त्वां सुरोत्तम२३७
एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरंदरः
विष्णुसंरक्षितं दृष्ट्वा देवी क्रुद्धा वचोऽब्रवीत्२३८
एष त्वां विष्णुना सार्धं दहामि मघवन्बलात्
मिषतां सर्वभूतानां दृश्यतां मे तपोबलम्२३९
तयाभिभूतौ तौ देवाविंद्रविष्णू बभूवतुः
कथं मुच्येय सहितो विष्णुरिंद्रमभाषत२४०
इंद्रोब्रवीज्जहि ह्येनां यावन्नौ न दहेत्प्रभो
विशेषेणाभिभूतोस्मि जहीमां जहि मा चिरम्२४१
ततः समीक्ष्य विष्णुस्तांस्त्रीवधे कृच्छ्रमास्थितः
अभिध्याय ततः शक्रमापन्नं सत्वरं प्रभुः२४२
ततः स त्वरयायुक्तः शीघ्रकारी भयान्वितः
ज्ञात्वा विष्णुस्ततस्तस्याः क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम्२४३
क्रुद्धश्च चक्रमादाय शिरश्चिच्छेद वै भयात्
तं दृष्ट्वा स्त्रीवधं घोरं चुक्रोध भृगुरीश्वरः२४४
ततो हि शप्तो भृगुणा विष्णुर्भार्यावधे कृते
भृगुरुवाच
यत्त्वया जानता धर्ममवध्या स्त्री निषूदिता२४५
तस्मात्त्वं सप्तकृत्वो हि मानुषेषूपयास्यसि
ततस्तेनाभिशापेन नष्टे धर्मे पुनःपुनः२४६
लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह
अथ व्याहृत्य विष्णुं स तदादाय शिरः स्वयम्२४७
समानीय ततः कायं पाणौ गृह्येदमब्रवीत्
भृगुरुवाच
एषा त्वं विष्णुना देवि हता संजीवयाम्यहं२४८
यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोपि वा
तेन सत्येन जीवस्व यदि सत्यं ब्रवीम्यहम्२४९
ततस्तां प्रोक्ष्य शीताद्भिर्जीवजीवेति सोब्रवीत्
ततोभिव्याहृते तस्मिन्देवी संजीविता तदा२५० 1.13.250
ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव
साधुसाध्विति दृष्ट्वैव वचस्तां सर्वतोब्रुवन्२५१
एवं प्रत्याहृता तेन देवी सा भृगुणा तदा
मिषतां दैवतानां हि तदद्भुतमिवाभवत्२५२
असंभ्रांतेन भृगुणा पत्नी संजीविता पुनः
दृष्ट्वा चेंद्रो नालभत शर्म काव्यभयात्पुनः२५३
प्रजागरे ततश्चेंद्रो जयंतीमिदमब्रवीत्
संधिकामोभ्यधाद्वाक्यं स्वां कन्यां पाकशासनः२५४
इन्द्र उवाच
एष काव्यो ह्यनिंद्राय व्रतं चरति दारुणम्
तेनाहं व्याकुलः पुत्रि कृतो मतिमता दृढम्२५५
तैस्तैर्मनोनुकूलैश्च उपचारैरतंद्रिता
आराधय तथा पुत्रि यथा तुष्येत स द्विजः२५६
गच्छ त्वं तस्य दत्तासि प्रयत्नं कुरु मत्कृते
एवमुक्ता जयंती सा वचः संगृह्य वै पितुः२५७
अगच्छद्यत्र घोरं स तपो ह्यारभ्य तिष्ठति
तं दृष्ट्वा च पिबंतं सा कणधूममधोमुखम्२५८
यक्षेण पात्यमानं च कुंडधारेण पावनम्
दृष्ट्वा तं यतमानं तु देवी काव्यमवस्थितम्२५९
शत्रूपघाते श्राम्यंन्तं दुर्बलस्थितिमास्थितम्
पित्रा यथोक्तं वाक्यं सा काव्ये कृतवती तदा२६०
गीर्भिश्चैवानुकूलाभिः स्तुवंती वल्गुभाषिणी
गात्रसंवाहनैः काले सेवमाना त्वचः सुखैः२६१
व्रतचर्यानुकूलाभिरुपास्य बहुलाः समाः
पूर्णे धूमव्रते तस्मिन्घोरे वर्षसहस्रके२६२
वरेण छंदयामास शिवः प्रीतोभवत्तदा
महेश्वर उवाच
एतद्व्रतं त्वयैकेन चीर्णं नान्येन केनचित्२६३
तस्माद्वै तपसा बुद्ध्या श्रुतेन च बलेन च
तेजसा च सुरान्सर्वांस्त्वमेकोभिभविष्यसि२६४
यच्च किंचिन्मयि ब्रह्मन्विद्यते भृगुनंदन
प्रतिदास्यामि तत्सर्वं त्वया वाच्यं न कस्यचित्२६५
किं भाषितेन बहुना अवध्यस्त्वं भविष्यसि
तान्दत्वा तु वरांस्तस्मै भार्गवाय पुनः पुनः२६६
प्रजेशत्वं धनेशत्वमवध्यत्वं च वै ददौ
एतान्लब्ध्वा वरान्काव्यः संप्रहृष्टतनूरुहः२६७
एवमाभाष्य देवेशमीश्वरं नीललोहितम्
प्रज्ञान्वितस्ततस्तस्मै प्राञ्जलि प्रणतो ऽभवत्२६८
ततः सोंऽतर्हिते देवे जयंतीमिदमब्रवीत्
कस्य त्वं सुभगे का वा दुःखिते मयि दुःखिता२६९
महता तपसा युक्ता किमर्थं मां जिगीषसि
अनया संस्थिता भक्त्या प्रश्रयेण दमेन च२७०
स्नेहेन चैव सुश्रोणि प्रीतोस्मि वरवर्णिनि
किमिच्छसि वरारोहे कस्ते कामः समुद्यतः२७१
तं ते संपादयाम्यद्य यद्यपि स्यात्सुदुष्करम्
एवमुक्ताब्रवीदेनं तपसा ज्ञातुमर्हसि२७२
चिकीर्षितं हि मे ब्रह्मंस्त्वं वै वद यथातथम्
एवमुक्तोब्रवीदेनं दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा२७३
मया सह त्वं सुश्रोणि शतवर्षाणि भामिनि
सर्वभूतैरदृश्यांतः संप्रयोगमिहेच्छसि२७४
देवि इंदीवरश्यामे वरार्हे वामलोचने
एवं वृणोषि कामांस्त्वं ददे वै वल्गुभाषिते२७५
एवं भवतु गच्छाव गृहं मे मत्तकाशिनि
ततः स गृहमागम्य जयंत्या सह चोशना२७६
तया सहावसद्देव्या शतवर्षाणि भार्गवः
अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संशितव्रतः२७७
कृतार्थमागतं ज्ञात्वा शुक्रं सर्वे दितेस्सुताः
अभिजग्मुर्गृहं तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः२७८
गता यदा न पश्यंति मायया संवृतं गुरुम्
लक्षणं तस्य चाबुद्ध्वा नाद्यागच्छति नो गुरुः२७९
एवं ते स्वानि धिष्ण्यानि गताः सर्वे यथागताः
ततो देवगणास्सर्वे गत्वांगिरसमब्रुवन्२८०
दानवालये तु भगवान्गत्वा तत्र च तां चमूम्
मोहयित्वात्मवशगां क्षिप्रमेव तथा कुरु२८१
धिषणस्तान्सुरानाह एवमेव व्रजाम्यहम्
तेन गत्वा दानवेंद्रः प्रह्लादो वै वशीकृतः२८२
शुक्रो भूत्वा स्थितस्तत्र पौरोहित्यं चकार सः
स्थितो वर्षशतं साग्रमुशना तावदागतः२८३
दनुपुत्रैस्ततो दृष्टः सभायां तु बृहस्पतिः
उशना एक एवात्र द्वितीयः किमिहागतः२८४
सुमहत्कौतुकं चात्र भविता विग्रहो दृढम्
किं वदिष्यति लोकोयं द्वारि योयं व्यवस्थितः२८५
सभायामास्थितो योयं गुरुः किं नो वदिष्यति
एवं प्रजल्पतां तेषां दनूनां कविरागतः२८६
स्वरूपधारिणं तत्र दृष्ट्वासीनं बृहस्पतिम्
उवाच वचनं क्रुद्धः किमर्थं त्वमिहागतः२८७
शिष्यान्मोहयसे मे त्वं युक्तं सुरगुरोस्तव
मूढास्ते त्वां न जानंति त्वन्मायामोहिता ध्रुवम्२८८
तन्न युक्तं तव ब्रह्मन्परशिष्यप्रधर्षणम्
व्रज त्वं देवलोकं स्वं तिष्ठ धर्ममवाप्स्यसि२८९
शिष्यो हि मे कचः पूर्वं हतो दानवपुंगवैः
विद्यार्थी तनयो ब्रह्मंस्तवायोग्या गतिस्त्विह२९०
श्रुत्वा तु तस्य तद्वाक्यं स्मितं कृत्वावदद्गुरुः
संति चोराः पृथिव्यां येपरद्रव्यापहारिणः२९१
एवं विधानदृष्टाश्च रूपदेहापहारिणः
वृत्रघातेन चेंद्रस्य ब्रह्महहत्या पुराभवत्२९२
लोकायतिक शास्त्रेण भवता सा तिरस्कृता
जानामि त्वामांगिरसं देवाचार्यं बृहस्पतिम्२९३
मद्रूपधारिणं प्राप्तं सर्वे पश्यत दानवाः
एष वो मोहनायालं प्राप्तो विष्णुविचेष्टितैः२९४
तदेनं शृंखलैर्बद्ध्वा क्षिपेत लवणार्णवे
पुनरेवाब्रवीच्छुक्रः पुरोधायं दिवौकसाम्२९५
मोहितानूनमेतेन क्षयं यास्यथ दानवाः
भो अहं दानवेंद्रेह वंचितोऽस्मि दुरात्मना२९६
किमर्थं भवता त्यक्तः कृतश्चान्यः पुरोहितः
देवाचार्यॐगिरःपुत्रएषएवबृहस्पतिः२९७
वंचितोसि न संदेहो हितार्थं तु दिवौकसाम्
त्यजस्वैनं महाभाग शत्रुपक्षजयावहम्२९८
अनुशिष्यभयाद्यातः पूर्वमेवमहं प्रभो
जलमध्येस्थितः पीतो महादेवेन शंभुना२९९
उदरस्थस्य मे जातं साग्रं वर्षशतं किल
उदराच्छुक्ररूपेण शिश्नेनाहं विसर्जितः३०० 1.13.300
वरदः प्राह मां देवश्शुक्रेष्टं त्वं वरं वृणु
मयावृतो वरं राजन्देवदेवः पिनाकधृत्३०१
मनसा चिंतिता ह्यर्था मानसे ये स्थिता वराः
भवंतु मयि ते सर्वे प्रसादात्तव शंकर३०२
एवमस्त्विति देवेन प्रेषितोऽस्मि तवांतिकम्
तावदत्राभवच्चायं पुरोधास्ते बृहस्पतिः३०३
दृष्टः सत्यं दानवेंद्र मयोक्तं त्वं निशामय
बृहस्पतिस्तदा वाक्यं प्रह्लादं प्रत्यभाषत३०४
नाहमेतं प्रजानामि देवं वा दानवं नरम्
मद्रूपधारिणं राजन्वंचनार्थं तवागतम्३०५
ततस्ते दानवाः सर्वे साधुसाध्विति वादिनः
पुरोधाः पौर्विको नोस्तु यो वा को वा भवत्विति३०६
नानेन कार्यमस्माकं या तु ह्येष यथागतः
सक्रोधमशपत्काव्यो दानवेंद्रान्समागतान्३०७
त्यक्तो यथाहं युष्माभिस्तथा सर्वांश्चिरादिव
गतश्रीकान्गतप्राणान्पश्येयं दुःखजीविकान्३०८
सुघोरामापदं प्राप्तानचिरादेव सर्वशः
एवमुक्त्वा गतः काव्यो यदृच्छातस्तपोवनम्३०९
तस्मिन्गते ततः शुक्रे स्थितस्तत्र बृहस्पतिः
पालयन्दानवांस्तत्र किंचित्कालमतिष्ठत३१०
ततो बहुतिथे काले अतिक्रांते नरेश्वर
संभूय दानवाः सर्वे पर्यपृछंस्तदा गुरुम्३११
संसारेस्मिन्नसारे तु किंचिज्ज्ञानं प्रयच्छ नः
येन मोक्षं व्रजामश्च प्रसादात्तव सुव्रत३१२
ततः सुरगुरुः प्राह काव्यरूपी तदा गुरुः
ममाप्येषा मतिः पूर्वं या युष्माभिरुदाहृता३१३
क्षणं कुर्वंतु सहिताश्शुचीभूय समाहिताः
ज्ञानं वक्ष्यामि वो दैत्या अहं वै मोक्षदायि यत्३१४
एषा श्रुतिर्वैदिकी या ऋग्यजुःसामसंज्ञिता
वैश्वानरप्रसादात्तु दुःखदा प्राणिनामिह३१५
यज्ञश्राद्धं कृतं क्षुद्रैरैहिकस्वार्थतत्परैः
ये त्वमी वैष्णवा धर्मा ये च रुद्रकृतास्तथा३१६
कुधर्मा दारसहितैर्हिंसाप्रायाः कृताहितैः
अर्द्धनारीश्वरो रुद्र कथं मोक्षं गमिष्यति३१७
वृतो भूतगणैर्भूरिभूषितश्चास्थिभिस्तथा
न स्वर्गो नैव मोक्षोत्र लोकाः क्लिश्यंति वै तथा३१८
हिंसायामास्थितो विष्णुः कथं मोक्षं गमिष्यति
रजोगुणात्मको ब्रह्मा स्वां सृष्टिमुपजीवति३१९
देवर्षयोथ ये चान्ये वैदिकं पक्षमाश्रिताः
हिंसाप्रायाः सदा क्रूरा मांसादाः पापकारिणः३२०
सुरास्तु मद्यपानेन मांसादा ब्राह्मणास्त्वमी
धर्मेणानेन कः स्वर्गं कथं मोक्षं गमिष्यति३२१
यच्च यज्ञादिकं कर्म स्मार्तं श्राद्धादिकं तथा
तत्र नैवापवर्गोस्ति यत्रैषा श्रूयते श्रुतिः३२२
यज्ञं कृत्वा पशुं हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम्
यद्येवं गम्यते स्वर्गो नरकः केन गम्यते३२३
यदि भुक्तमिहान्येन तृप्तिरन्यस्य जायते
दद्यात्प्रवसतः श्राद्धं न स भोजनमाहरेत्३२४
आकाशगामिनो विप्राः पतिता मांसभक्षणात्
तेषां न विद्यते स्वर्गो मोक्षो नैवेह दानवाः३२५
जातस्य जीवितं जंतोरिष्टं सर्वस्य जायते
आत्ममांसोपमं मांसं कथं खादेत पंडितः३२६
योनिजास्तु कथं योनिं सेवंते जंतवस्त्वमी
मैथुनेन कथं स्वर्गं यास्यंते दानवेश्वर
मृद्भस्मना यत्रशुद्धिस्तत्र शुद्धिस्तु का भवेत्३२७
विपरीततमं लोकं पश्य दानव यादृशम्
विण्मूत्रस्य कृतोत्सर्गे शिश्नापाने तु शोधनम्३२८
भुक्ते वा भोजने राजन्कथं नापानशिश्नयोः३२९
क्रियते शोधनं तद्वद्विपरीता स्थितिस्त्वियम्
यत्र प्रक्षालनं प्रोक्तं तत्र तेनैव कुर्वते३३०
तारां बृंहस्पतेर्भार्यां हृत्वा सोमः पुरा गतः
तस्यां जातो बुधः पुत्रो गुरुर्जग्राह तां पुनः३३१
गौतमस्य मुनेः पत्नीमहल्यां नाम नामतः
अगृह्णात्तां स्वयं शक्रः पश्य धर्मो यथाविधः३३२
एतदन्यच्च जगति दृश्यते पापदायकम्
एवंविधो यत्र धर्मः परमार्थो मतस्तु कः३३३
वदस्व त्वं दानवेंद्र वद भूयो वदामि ते
गुरोस्तु गदितं श्रुत्वा परमार्थान्वितं वचः३३४
जातकौतूहलास्तत्र विविक्तास्तु भवार्णवात्
दानवा ऊचुः
दीक्षयस्व गुरो सर्वान्प्रपन्नान्भक्तितः स्थितान्३३५
येन वै न पुनर्मोहं व्रजामस्तव शासनात्
सुविरक्ताः स्म संसारे शोकमोहप्रदायिनि३३६
उद्धरस्व गुरो सर्वान्केशाकर्षेण कूपतः
कस्य देवस्य शरणं गच्छामो ब्राह्मणोत्तम३३७
दैवतं च प्रपन्नानां प्रकाशय महामते
स्मरणेनोपवासेन ध्यानधारणया तथा३३८
पूजोपहारे च कृते अपवर्गस्तु लभ्यते
विरक्तास्स्म कुटुंबे तु भूयो नात्र यतामहे३३९
एवं चैव गुरुश्छन्नस्तैरुक्तो दनुपुंगवैः
चिंतयामास तत्कार्यं कथमेतत्करोम्यहम्३४०
कथमेते मया पापाः कर्तव्या नरकौकसः
विडंबनाच्छ्रुतेर्बाह्यास्त्रैलोक्ये हास्यकारिणः३४१
इत्युक्त्वा धिषणो राजंश्चिन्तयामास केशवम्
तस्य तच्चिंतितं ज्ञात्वा मायामोहं जनार्दनः३४२
समुत्पाद्य ददौ तस्य प्राह चेदं बृहस्पतिम्
मायामोहोयमखिलांस्तान्दैत्यान्मोहयिष्यति३४३
भवता सहितः सर्वान्वेदमार्गबहिष्कृतान्
एवमादिश्य भगवानंतर्द्धानं जगाम ह३४४
तपस्यभिरतान्सोथ मायामोहो गतोऽसुरान्
तेषां समीपमागत्य बृहस्पतिरुवाच ह३४५
अनुग्रहार्थं युष्माकं भक्त्या प्रीतस्त्विहागतः
योगी दिगम्बरो मुण्डो बर्हिपत्रधरो ह्ययम्३४६
इत्युक्ते गुरुणा पश्चान्मायामोहोब्रवीद्वचः
भो भो दैत्याधिपतयः प्रब्रूत तपसि स्थिताः३४७
एहिकार्थं तु पारक्यं तपसः फलमिच्छथ
दानवा ऊचुः
पारक्यधर्मलाभाय तपश्चर्या हि नो मता३४८
अस्माभिरियमारब्धा किं वा तत्र विवक्षितम्
दिगंबर उवाच
कुरुध्वं मम वाक्यानि यदि मुक्तिमभीप्सथ३४९
आर्हतं सर्वमेतच्च मुक्तिद्वारमसंवृतम्
धर्माद्विमुक्तेरर्होयं नैतस्मादपरः परः३५० 1.13.350
अत्रैवावस्थिताः स्वर्गं मुक्तिं चापि गमिष्यथ
एवंप्रकारैर्बहुभिर्मुक्तिदर्शनवर्जितैः३५१
मायामोहेन ते दैत्याः वेदमार्गबहिष्कृताः
धर्मायैतदधर्माय सदेतदसदित्यपि३५२
विमुक्तये त्विदं नैतद्विमुक्तिं संप्रयच्छति
परमार्थोयमत्यर्थं परमार्थो न चाप्ययम्३५३
कार्यमेतदकार्यं हि नैतदेतत्स्फुटं त्विदम्
दिग्वाससामयं धर्मो धर्मोयं बहुवाससाम्३५४
इत्यनेकार्थवादांस्तु मायामोहेन ते यतः
उक्तास्ततोऽखिला दैत्याः स्वधर्मांस्त्याजिता नृप३५५
अर्हध्वं मामकं धर्मं मायामोहेन ते यतः
उक्तास्तमाश्रिता धर्ममार्हतास्तेन तेभवन्३५६
त्रयीमार्गं समुत्सृज्य मायामोहेन तेसुराः
कारितास्तन्मया ह्यासंस्तथान्ये तत्प्रबोधिताः३५७
तैरप्यन्ये परे तैश्च तैरन्योन्यैस्तथापरे
नमोऽर्हते चेति सर्वे संगमे स्थिरवादिनः३५८
अल्पैरहोभिः संत्यक्ता तैर्दैत्यैः प्रायशस्त्रयी
पुनश्च रक्तांबरधृन्मायामोहो जितेक्षणः३५९
सोन्यानप्यसुरान्गत्वा ऊचेन्यन्मधुराक्षरम्
स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा निर्वाणार्थाय वा पुनः३६०
तदलं पशुघातादि दुष्टधर्मैर्निबोधत
विज्ञानमयमेतद्वै त्वशेषमधिगच्छत३६१
बुध्यध्वं मे वचः सम्यग्बुधैरेवमिहोदितम्
जगदेतदनाधारं भ्रांतिज्ञानानुतत्परम्३६२
रागादिदुष्टमत्यर्थं भ्राम्यते भवसंकटे
नानाप्रकारं वचनं स तेषां मुक्तियोजितम्३६३
तथा तथावदद्धर्मं तत्यजुस्ते यथायथा
केचिद्विनिंदां वेदानां देवानामपरे नृप३६४
यज्ञकर्मकलापस्य तथा चान्ये द्विजन्मनाम्
नैतद्युक्तिसहं वाक्यं हिंसा धर्माय जायते३६५
हवींष्यनलदग्धानि फलान्यर्हंति कोविदाः
निहतस्य पशोर्यज्ञे स्वर्गप्राप्तिर्यदीष्यते३६६
स्वपिता यजमानेन किं वा तत्र न हन्यते
तृप्तये जायते पुंसो भुक्तमन्येन चेद्यदि३६७
दद्याच्छ्राद्धं प्रवसतो न वहेयुः प्रवासिनः
यज्ञैरनेकैर्देवत्वमवाप्येंद्रेण भुज्यते३६८
शम्यादि यदि चेत्काष्ठं तद्वरं पत्रभुक्पशुः
जना श्रद्धेयमित्येतदवगम्य तु तद्वचः३६९
उपेक्ष्य श्रेयसे वाक्यं रोचतां यन्मयेरितम्
न ह्याप्तवादा नभसो निपतंति महासुराः३७०
युक्तिमद्वचनं ग्राह्यं मयान्यैश्च भवद्विधैः
दानवा ऊचुः
तत्ववादे वयं सर्वे प्रपन्नास्तव भक्तितः३७१
कुरुष्वानुग्रहं चाद्य प्रसन्नोसि यदि प्रभो
संभारानाहरामोद्य दीक्षायोग्यांश्च सर्वशः३७२
प्रसादात्तव येनाशु मोक्षो हस्तगतो भवेत्
ततस्तानब्रवीत्सर्वान्मायामोहोसुरांस्तदा३७३
प्रपन्नः शासनं ह्येष मदीयो गुरुरग्र्यधीः
दीक्षां दास्यति युष्माकं निदेशान्मम सत्तमः३७४
एतान्दीक्षय भो ब्रह्मन्वचनान्मम पुत्रकान्
गते मोहे दानवास्ते भार्गवं वाक्यमब्रुवन्३७५
देहि दीक्षां महाभाग सर्वसंसारमोचनीम्
तथेत्याहोशना दैत्यान्गच्छामो नर्मदामनु३७६
भोभोस्त्यजत वासांसि दीक्षां कारयितास्मि वः
एवं ते दानवा भीष्म भृगुरूपेण धीमता३७७
आंगिरसेन ते तत्र कृता दिग्वाससोसुराः
बर्हिपिच्छध्वजं तेषां गुंजिका चारुमालिकां३७८
दत्वा चकार तेषां तु शिरसो लुंचनं ततः
केशस्योत्पाटनं चैव परमं धर्मसाधनम्३७९
धनानामीश्वरो देवो धनदः केशलुंचनात्
सिद्धिं परमिकां प्राप्ताः सदा वेषस्य धारणात्३८०
नित्यत्वं लभ्यते ह्येवं पुरा प्राहार्हतः स्वयम्
वालोत्पाटेन देवत्वं मानुषैर्लभ्यते त्विह३८१
किं न कुर्वीत तत्तस्मान्महापुण्यप्रदं यतः
मनोरथो हि देवानां लोके वै मानुषे कदा३८२
अस्मिन्स्याद्भारते वर्षे जन्मनः श्रावके कुले
तपसा युञ्ज्महेस्मान्वै केशोत्पाटनपूर्वकम्३८३
तीर्थंकराश्चतुर्विंशत्तथा तैस्तु पुरस्कृताः
छायाकृतं फणींद्रेण ध्यानमार्गप्रदर्शकम्३८४
स्तुवन्तं मंत्रवादेन स्वर्गो हस्तगतोर्हतं
मोक्षो वा भविता नूनं विचारः कोत्र कथ्यते३८५
कदा स्यामर्षयो भूत्वा सूर्याग्निसमतेजसः
जप्त्वा विरागिणश्चैवमनुपंचांगकं तथा३८६
तथा तपस्यतां मृत्युं गतानां कालपर्ययात्
पाषाणेन शिरोभग्नं भवते पुण्यकर्मणाम्३८७
अरण्ये निर्जने वासःकदा वै भविता हि नः
कर्णजप्यं श्रावकाश्च करिष्यंति समाहिताः३८८
भोभो ऋषे न गंतव्यं मोक्षमार्गी यतो भवान्
लब्धानि यानि स्थानानि भूयोवृत्तिकराणि च३८९
त्याज्यानि तेन चैतानि सत्यमेव वचो हि नः
अस्मदीयेन तपसा नियमैर्विविधैस्तथा३९०
व्रजध्वं चोत्तमं स्थानं मोक्षमार्गं च यं बुधाः
विंदंति भक्तिभावेन तपोयुक्तास्तपस्विनः३९१
अक्षेषु निग्रहो यत्र दयाभूतेषु सर्वदा
तत्तपोधर्ममित्युक्तं सर्वा चान्या विडंबना३९२
ज्ञात्वैतद्भवता साध्यं गंतव्यं परमं पदम्
यां वै तीर्थंकरा याता यां गतिं योगिनो गताः३९३
एवं वै देवताः पूर्वं विद्याधरमहोरगाः
मनोरथाभिलाषांस्ते चिंतयंतो दिवानिशम्३९४
यद्येषणा वै युष्माकं संसारविरतौ कृता
परित्यजध्वं दाराणि स्वर्गमार्गार्गलानि च३९५
यस्यां योनौ पिता यातस्तां योनिं सेवसे कथम्
आत्ममांसोपमं मांसं कथं खादंति जंतवः३९६
ततस्ते दानवा भीष्मा ऊचुः सर्वे गुरुं वचः
दीक्षस्व नो महाभाग भ्रूणकानग्रतः स्थितान्३९७
तथा कृत्वा स तानाह समयेन पुरोहितः
प्रणामो नान्यदेवेषु कर्तव्यो वः कदाचन३९८
एकस्थाने यदा भक्तं भोक्तव्यं करसंपुटे
तत्रस्थाने स्थितं तोयं केशकीटविवर्जितम्३९९
तुल्यं प्रियाप्रियं कार्यं नान्यदृष्टिहतं क्वचित्
भोक्तव्यमेतेन विभो आचारेण तथा कुरु४०० 1.13.400
भवध्वं सहिता यूयं ते तथा मोक्षभागिनः
एवमुक्त्वा स नियमान्कृत्वा तान्दनुपुंगवान्४०१
जगाम धिषणो राजन्देवलोकं दिवौकसाम्
आचचक्षे स तत्सर्वं दानवानां च कारितम्४०२
ततस्ते त्वसुरा जग्मुर्नर्मदामभितो वसन्
दृष्ट्वा तान्दानवांस्तत्र प्रह्लादेन विना कृतान्४०३
देवराजस्ततो हृष्टो नमुचिं प्राह वै वचः
हिरण्याक्षं यज्ञहनं धर्मघ्नं वेदनिंदकम्४०४
राक्षसं क्रूरकर्माणं प्रघसं विघसं तथा
मुचिं चैव तथा बाणं विरोचनमथापि वा४०५
महिषाक्षं बाष्कलं च प्रचंडं चंडकं तथा
रोचमानं तथात्युग्रं सुषेणं दानवोत्तमम्४०६
एतान्दृष्ट्वा तथा चान्यान्दानवेंद्रानथाब्रवीत्
इन्द्र उवाच
दानवेंद्राः पुरा जाताः कृतं राज्यं त्रिविष्टपे४०७
इदानीं कथमेवेदं व्रतं वेदविलोपकम्
भवद्भिः कर्तुमारब्धं नग्नमुंडिकमंडलु४०८
मयूरध्वजधारित्वं कथं चैवेह तिष्ठथ
दानवा ऊचुः
त्यक्तः सर्वासुरभाव ऋषिधर्मे वयं स्थिताः४०९
धर्मवृद्धिकरं कर्म चरामः सर्वजंतुषु
त्रैलोक्यराज्यमखिलं भुंक्ष्व शक्र व्रजस्व च४१०
तथेति चोक्त्वा मघवा पुनर्यातस्त्रिविष्टपम्
एवं ते मोहिताः सर्वे भीष्म देवपुरोधसा४११
नर्मदा सरितं प्राप्य स्थिता दानवसत्तमाः
ज्ञात्वा शुक्रेण ते सर्वे वृत्तांतमनुबोधिताः४१२
तदा त्रैलोक्यहरणे चक्रुः क्रूरां पुनर्मतिम्४१३

इति श्रीपद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे अवतारचरितंनाम त्रयोदशोऽध्यायः१३।

यह पृष्ठ अवतार (अवतार) के कार्यों का वर्णन करता है, जो कि सबसे बड़े महापुराणों में से एक, पद्म पुराण के अंग्रेजी अनुवाद का अध्याय 13 है, जिसमें प्राचीन भारतीय समाज, परंपराओं, भूगोल, साथ ही धार्मिक तीर्थों ( यात्रा ) को पवित्र स्थानों का विवरण दिया गया है। ( तीर्थ )। यह पद्म पुराण के सृष्टि-खंड (सृजन पर खंड) का तेरहवां अध्याय है, जिसमें कुल छह पुस्तकें हैं जिनमें कम से कम 50,000 संस्कृत छंद हैं।

अध्याय 13 - अवतार के कर्म (अवतार)

इस अध्याय के लिए संस्कृत पाठ उपलब्ध है ]

पुलस्त्य ने कहा :

1. हे राजाओं के राजा, क्रो के परिवार (जिसमें) उत्कृष्ट पुरुष (जन्मे) का (लेखा) सुनो । उनके परिवार में विष्णु का जन्म हुआ , जो वाणी परिवार के चिरस्थायी थे ।

2. Kroṣṭṛ से पैदा हुआ था Vṛjinīvān , महान प्रसिद्धि की। उनके पुत्र था स्वाति , और Kuśaṅku उसके (यानी स्वाति के) पुत्र थे।

3. कुशांकु के नाम से एक पुत्र चित्ररथ हुआ; उनका शंबिन्दु नाम का पुत्र एक संप्रभु सम्राट बन गया।

4-5. उनके बारे में वंशावली तालिका युक्त यह पद पहले गाया गया था। शतबिन्दु के सौ पुत्रों के सौ पुत्र हुए। उन सौ बुद्धिमान, सुंदर और महत्वपूर्ण पुत्रों में से महान धन से युक्त, पृथु नाम के बहुत शक्तिशाली राजा पैदा हुए थे ।

6. पृथुश्रवा , पृथुयण , पृथुतेजस, पृथिद्भव, पृथुकीर्ति , पृथुमाता शंबिन्दु के राजा (परिवार में) थे।

7-8. उन में अच्छी तरह से वाकिफ पुराणों Pṛthuśravas सबसे अच्छा होना करने के लिए प्रशंसा। उसके बेटे थे। (उनमें से) उष्णों ने शत्रुओं को सताया। उषाना के पुत्र का नाम सिनेयु था और वह सबसे अधिक गुणी था। सिनेयु के पुत्र का नाम रुक्माकवच था ।

9-10. युद्ध में निपुण रुक्माकवच ने धनुर्धारियों को विभिन्न बाणों से मारकर और इस पृथ्वी को प्राप्त करके अश्व-यज्ञ में ब्राह्मणों को उपहार दिए । प्रतिद्वंद्वी नायकों के हत्यारे परवीत का जन्म रुक्माकवच से हुआ था।

11. पांच बेटों उसे पैदा हुए थे जो बहुत शक्तिशाली और valourous थे: Rukmeṣu , Pṛthurukma , Jyāmagha , Parigha और हरि ।

12. पिता ने परीघ और हरि को विदेह में रखा । रुकमेशु एक राजा बन गया और पृथुरुक्मा उसके साथ रहने लगा।

13-14. इन दोनों द्वारा निर्वासित जियामाघ एक आश्रम में रहते थे। वह आश्रम में शांतिपूर्वक रहकर और एक ब्राह्मण द्वारा उत्तेजित होकर अपना धनुष लेकर ध्वजा लेकर रथ पर विराजमान होकर दूसरे देश चला गया। अकेले और निर्वाह वह पहाड़ के पास गया के अभाव में परेशान होने के नाते Ṛkṣavān के तट पर नर्मदा , दूसरों के द्वारा सुनसान, और वहाँ बैठ गया।

१५. सैब्या जियामाघ की बूढ़ी पत्नी (उम्र में) थीं।

16-17. राजा ने भी पुत्रहीन होकर दूसरी पत्नी लेने का विचार किया। उसने एक युद्ध में जीत हासिल की और युद्ध में एक युवती को सुरक्षित करते हुए उसने डर के मारे अपनी पत्नी से कहा, "हे उज्ज्वल मुस्कान, यह आपकी बहू है।" जब उसने यह कहा, तो उसने उससे कहा: “वह कौन है? किसकी बहू है?”

18-19. राजा ने उत्तर दिया, "वह उस पुत्र की पत्नी होगी जो तुझ से उत्पन्न होगा।" उस कन्या की घोर तपस्या से उस वृद्ध शैब्या ने विदर्भ नामक पुत्र को जन्म दिया ।

20. विदर्भ ने राजकुमारी, (ज्यमाघ की) बहू, दो पुत्र, क्रथ और कौशिका और बाद में तीसरे पुत्र लोमपाद नाम से उत्पन्न किया, जो अत्यंत पवित्र, बहादुर और युद्ध में कुशल था।

21. बभरू लोमपाद का पुत्र था; बभरू का पुत्र धृति था ; Kauśika का बेटा था सेडी और राजाओं ने भी कहा जाता है Caidya उससे (जन्म) कर रहे थे।

22. कुंती क्रथ का पुत्र था जो विदर्भ का पुत्र था। धृत कुंती का पुत्र था; उसी से धृण वीर श्री का जन्म हुआ।

23. सूर्य का पुत्र पवित्र निवृत्ति था , प्रतिद्वंद्वी नायकों का हत्यारा। Nivṛtti के बेटे का नाम दिया Daśārha रूप में एक ही था Vidūratha ।

24-25. दशरथ के पुत्र भीम थे ; भीम का पुत्र होना कहा जाता है Jīmūta ; जिमुत के पुत्र विकृति थे ; भीमरथ उसका पुत्र था; और Bhīmaratha के बेटे होने के लिए कहा गया था Navaratha । उनके पुत्र दशरथ थे ; उसका पुत्र शकुनि था ।

26. उससे करम्भ उत्पन्न हुआ , और उससे देवराता ; Devarāta से बहुत प्रसिद्ध पैदा हुआ था Devakṣatra ।

27. देवक्षत्र से मधु नाम के एक देवतुल्य और अत्यंत तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। कहा जाता है कि कुरुवंश का जन्म मधु से हुआ है।

28. कुरुवंश से एक वीर पुत्र पुरुहोत्र का जन्म हुआ। Puruhotra से Amsa खेल को हुआ था Vaidarbhī ।

29-30. वेत्राकी आशु की पत्नी थी; उसके सात्वत (अर्थात् विष्णु) पर ऊर्जा से संपन्न और बढ़ती हुई प्रसिद्धि से सातवत उत्पन्न हुई । एक बच्चे वाले और उदार ज्यमाघ की इस संतान को जानकर, बुद्धिमान सोम के साथ एक हो जाता है ।

31-32. कौशल्या ने शक्ति से संपन्न सातवत नामक पुत्रों को जन्म दिया। उनकी रचनाएँ (अर्थात पंक्तियाँ) चार हैं; उन्हें (जैसा कि मैं आपको बताता हूं) विस्तार से सुनें: संजय को, भजमान को भज नाम का एक पुत्र मिला। तब संजय की पुत्री से भाजक उत्पन्न हुए ।

३३. उस भज की दो पत्नियों ने कई पुत्रों को जन्म दिया: नेमिका, कृष्ण और वृि, शत्रुओं के शहरों के विजेता।

34. चूंकि वे भजमाना से पैदा हुए थे, इसलिए वे भाजक कहलाए। था Devāvṛdha Pṛthu और वह साथ दोस्ती बढ़ गई Madhus ।

35-36। यह राजा पुत्रहीन था, इसलिए 'मुझे सभी गुणों से युक्त पुत्र प्राप्त करना चाहिए' की इच्छा से और केवल कृष्ण पर ध्यान केंद्रित करके और पारणा (नदी) के जल को छूकर , उन्होंने एक महान तपस्या की। उसके पानी को छूने से नदी उसके पास आ गई।

37-38. तब नदी ने तपस्या करने वाले की भलाई की चिंता की। अपने मन में चिंता से भरे हुए उसने संकल्प किया: 'अपने आप को एक महिला में बदलकर मैं (उसके पास) जाऊंगी, जिससे एक ऐसा पुत्र (अर्थात सभी गुणों से संपन्न) पैदा होगा। इसलिए आज मैं (उसकी पत्नी बनूंगा) उसे एक पुत्र दूंगा'।

39. तब उस ने कुमारी होकर उत्तम शरीर धारण करके राजा को (अपने विषय में) बताया; राजा तब उसके लिए तरस गया।

४०. तब देववृद्ध से उस श्रेष्ठ नदी ने नौवें महीने में एक महान पुत्र को जन्म दिया। बभरू सभी गुणों से संपन्न थे।

४१. हमने सुना है कि जो लोग पुराणों को जानते हैं, वे महानिमूओं देवविद्या के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि:

42. बभरू पुरुषों में सबसे महान था; देवविध देवताओं के सदृश थे; बभरू और देववृद्ध से सत्तर हजार छह सौ पुत्र पैदा हुए और वे अमर हो गए।

43-46. भोज (प्रदर्शन करने के लिए दिया गया) बलिदान, (दान) उपहार, (अभ्यास) तपस्या, बुद्धिमान, पवित्र और बहुत मजबूत व्रत, सुंदर और बहुत उज्ज्वल (विवाहित) मुतकावती। (यह) शरकान्त की पुत्री ने चार पुत्रों को जन्म दिया: कुकरा , भजमाना, श्याम और कम्बलबरिष्ट । कुकरा के पुत्र वी और वाणी के पुत्र धोती थे। उसका पुत्र कपोतरोमन था ; और उसका पुत्र तित्तिरी था ; उनके पुत्र बाहुपुत्र थे । ऐसा कहा जाता है कि (उनका) विद्वान पुत्र नारी था ; उनका दूसरा नाम चन्दनोदकदुंदुभी कहा जाता है ।

47. उसका पुत्र अभिजीत था ; उनसे पुनर्वसु का जन्म हुआ।

48. अभिजीत पहले पुत्रहीन थे; लेकिन यह (राजा), पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ, ऋषियों द्वारा प्रोत्साहित किया गया था, उन्होंने खुशी-खुशी पुत्र प्राप्त करने के लिए अश्व-यज्ञ किया।

49. जब वह सभा में जा रहा था (यज्ञ में) तो उसमें से अंधा पुनर्वसु उत्पन्न हुआ, धर्म में पारंगत और यज्ञ में दाता।

50. कहा जाता है कि वासु के दो पुत्र थे। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, वे शुक और शुकु के नाम से जाने जाते थे ।

51-52. इस संबंध में वे बहुत ही रोचक श्लोक उद्धृत करते हैं। उनके पास दस हजार बख्तरबंद और डाक वाले रथ थे, जो बादल की तरह गरज रहे थे और उनके नीचे संलग्नक थे। Bhojas एक झूठ कभी नहीं बताया; वे बलिदान किए बिना कभी नहीं रहे; और कभी एक हजार से कम नहीं दिया।

53. भोज से अधिक पवित्र या अधिक विद्वान कोई नहीं था। कहा जाता है कि यह परिवार शुक तक आया था।

54-55. और शुक ने अपनी बहन ( अवंती- राजा को) अवंती में दे दी । और शुक की पुत्री ने दो पुत्रों को जन्म दिया; देवक और उग्रसेन जो दिव्य बच्चों की तरह थे; और देवक के जो पुत्र उत्पन्न हुए वे देवताओं के समान थे।

56. (वे थे) देववन , उपदेव , सुदेव और देवरक्षित ; उनकी सात बहनें थीं जिन्हें उन्होंने (उग्रसन) वामदेव को दिया था :

57. देवकी , श्रुतदेव , यशोदा , श्रुतिश्रवा, श्रीदेव , उपदेव और सुरप्पा सातवें थे।

58-60. उग्रसेन नौ पुत्र थे और कंस उन के बीच में सबसे बड़े थे: Nyagrodha , Sunāman , Kanka , Śaṅku , और (वह) जो (कहा जाता था) Subhū। दूसरे थे राश्रपाल ; तो भी (थे) बद्दामुनि और सामुशिका। उनकी पाँच बहनें थीं: कंस , कंसवती , सुरभि , राश्रपाली और कंक ; वे सुंदर महिलाएं थीं। उग्रसेन अपने बच्चों के साथ कुकरा (अर्थात दशरह) देश के थे।

६१. विदुरथ, योद्धाओं में सर्वश्रेष्ठ, भजमान का पुत्र था। वीर राजाधिदेव विदिरथ के पुत्र थे।

62. राजाधिदेव के दो पुत्र षोडश और श्वेतवाहन थे । वे बहादुर पुरुषों द्वारा पसंद किए गए थे, जो क्षत्रिय- व्रत को बहुत पसंद करते थे ।

63. शंभू के पांच वीर पुत्र थे जो युद्ध में कुशल थे: शमी , राजशर्मा, निमृत, शत्रुजित और सूचि ।

64. प्रतिक्षात्र सामी का पुत्र था और प्रतिक्षत्र का पुत्र भोज था और उसका पुत्र ह्दिक था । ह्दोक के भयानक वीरता के दस पुत्र थे।

65-66. उनमें कोतवर्मन सबसे बड़े थे, और सबसे अच्छे शतधनवन थे । (अन्य थे) Devārha , Subhānu , Bhīṣaṇa और Mahābala , और Ajāta , Vijāta, Kakara और Karandhama । देवराह के एक पुत्र, कंबलबरिष्ट का जन्म हुआ; (वह था) सीखा।

67. उनके दो पुत्र थे: असमौज और समौज। अजात के पुत्र के दो वीर पुत्र हुए।

68. समौजा के तीन प्रसिद्ध और अत्यंत धार्मिक पुत्र थे। क्रम में उनके नाम थे: सुदास, सुवाण और कृष्ण ।

६९. जिसने प्रतिदिन अंधक परिवार का महिमामंडन किया , उसके परिणामस्वरूप एक बड़ा परिवार और संतान थी।

70-71. क्रो की दो पत्नियाँ थीं: गांधारी और माद्री । गांधारी ने अपने मित्रों से स्नेही सुनीत्रा को जन्म दिया; माद्री ने एक पुत्र युधिजित (नाम से) को जन्म दिया , फिर देवमहुष , (तब से) अनामित्रा और शिनि को । इन पांचों के पास (उनके शरीर पर) भाग्यशाली अंक थे।

72. निघना अनामित्रा का पुत्र था; निघ्न के दो बेटे थे: दो थे प्रसेन और बहुत बहादुर शक्तिसेन ।

73. प्रसेन के पास ' स्यामंतक ' नाम का श्रेष्ठ और अनुपम रत्न था । इसे 'दुनिया के सर्वश्रेष्ठ रत्नों का राजा' कहा गया।

74. उस मणि को अपनी छाती पर धारण करने से वह कई बार चमकता था। शौरी ने अपने राजा के लिए वह उत्तम रत्न मांगा।

75. गोविंदा को भी नहीं मिला; सक्षम होते हुए भी उसने उसे नहीं छीना। किसी समय इससे सुशोभित प्रसेन शिकार करने चला गया।

76-77. उसने एक गुफा में एक निश्चित प्राणी द्वारा की गई आवाज सुनी। फिर गुफा में प्रवेश करते हुए प्रसेन का सामना एक भालू (अर्थात् जाम्बवान ) से हुआ। भालू ने प्रसेन पर हमला किया और प्रसेनजीत ने भी भालू पर हमला किया और (इस प्रकार) वे एक-दूसरे को हराने की इच्छा से लड़े।

78-79. भालू ने प्रसेन को मारकर वह मणि ले ली। यह सुनकर कि प्रसेन को मार दिया गया था, गोविंदा को उसके (यानी प्रसेन के) भाई पर संदेह था, इसलिए दूसरों को भी कि प्रसेन को गोविंदा ने मणि पाने के लिए मार डाला था।

80-81. उस उत्तम रत्न से सुशोभित प्रसेन वन को गया था; उसे देखकर जो श्यामंतक के साथ भाग लेने के लिए तैयार नहीं था, कशव ने उसे (प्रसेन) मार डाला था, क्योंकि वह मणि न देकर, अपना दुश्मन बन गया था। सत्राजीत द्वारा शुरू की गई यह अफवाह हर जगह फैल गई ।

82. फिर बहुत दिनों के बाद गोविन्द, जो फिर शिकार के लिए निकला था, संयोगवश गुफा के निकट आ गया।

८३-८४. तब भालू के उस पराक्रमी स्वामी (अर्थात् जाम्बवान) ने पहले की तरह आवाज की। गोविंदा ने आवाज सुनी और हाथ में तलवार लेकर गुफा में प्रवेश किया, उन्होंने भालू के बहुत शक्तिशाली राजा को देखा। जाम्बवान। तब हिकेश ने क्रोध से लाल अपनी आँखों से तुरंत जाम्बवान को बहुत हिंसक रूप से पकड़ लिया।

85-86. तब उन्हें विष्णु के शरीर में उनके (अतीत) कर्मों के कारण विष्णु के रूप में देखकर भालू के स्वामी ने भी विष्णुष्ट (विष्णु के सम्मान में एक स्तुति) के साथ उनकी प्रशंसा की। तब भगवान ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया।

८७. जाम्बवान ने कहा: "अपनी डिस्क के स्ट्रोक से अपने हाथों से मृत्यु को प्राप्त करना वांछनीय और शुभ है। मेरी इस कुंवारी बेटी को तुम्हें अपने पति के रूप में रखना चाहिए।

88. हे प्रभु, जो रत्न मैंने प्रसेन से प्राप्त किया था, उसका वध करके तुम उसे ले लो। मणि यहाँ है ”।

८९. केशव ने अपने चक्र से इस प्रकार बोलने वाले जाम्बवान का वध करके, शक्तिशाली भुजाओं वाले, अपने उद्देश्य को प्राप्त करके, उस कन्या को ले लिया।

90-92. तब सभी यादवों की उपस्थिति में , जनार्दन , जो झूठी अफवाह के कारण क्रोधित थे, ने सतराजीत को वह सर्वश्रेष्ठ रत्न दिया जो उन्हें भालू-राजा से प्राप्त हुआ था। तब सभी यादवों से कहा वासुदेव : "हमने सोचा था कि आप Prasena को मार डाला था।" सत्रजित के दस पत्नियों में से प्रत्येक से दस पुत्र थे।

93. उनके सत्या से एक सौ एक पुत्र उत्पन्न हुए । वे प्रसिद्ध और बहुत बहादुर थे, और भांगकार सबसे बड़े थे।

९४. सत्या, व्रतवती और स्वप्ना, भंगकार से बड़ी, ने उन लड़कों को जन्म दिया। शिनिवाला बहादुर थे।

95. योद्धा अभंग (जन्म) थे ; सीनी उसका पुत्र था; उनसे युगांधरा (जन्म हुआ था); कहा जाता है कि उसके सौ पुत्र थे।

96. उन्हें अनामित्र कहा जाता था; वेवी परिवार के वंशज के रूप में जाने जाते थे। अनामित्रा से वाणी परिवार की सबसे छोटी सदस्य िनी का जन्म हुआ।

९७. अनामित्र से फिर से युधिजित का जन्म हुआ, जो वृि परिवार का एक योद्धा था। दो अन्य बेटों को भी (Anamitra से पैदा हुए थे): Ṛṣabha और सिट्रा ।

98. शभ को अपनी पत्नी के रूप में काशीराज की प्रशंसनीय बेटी मिली , और जयंत ने अपनी पत्नी के रूप में शुभ जयंती प्राप्त की ।

99. तब जयंती से जयंत के पुत्र का जन्म हुआ। वह हमेशा बलिदान करता था, बहुत साहसी था, सीखा था और मेहमानों को प्रिय था (या वह) मेहमानों को पसंद करता था।

१००. उनसे अक्रूर , बहुत मेहनती और बड़े उपहार देने वाले पैदा हुए थे। शैब्या कुँवारियों में रत्न था; अक्रिरा ने उसे (अपनी पत्नी के रूप में) प्राप्त किया।

101-102. उस पर उन्होंने ग्यारह बहुत शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न किए: उपलंभ , सदालम्ब , उत्कल , आर्यसैणव, सुधीर , सदायक्ष, शत्रुघ्न , वरिमेजय , धर्मदी, धर्म और सिमौली।

103-106ए. और वे सभी पैदा हुए (इतने बहादुर) कि उन्होंने रत्न ले लिए। अक्रीरा से श्रृसेन को दो पुत्र, जो देवताओं के सदृश थे, और परिवार को प्रसन्न करने वाले थे: देववन और उपदेव। अकरूरा से बारह बेटे पैदा हुए थे अश्विनी : Pṛthu Vipṛthu , Aśvagrīva , Aśvabāhu , Supārśva , Gaveṣaṇa , Riṣṭanemi Suvarcas , Sudharman , Mṛdu , Abhūmi और Bahubhūmi ; और दो बेटियां: श्रवण और श्रवण ।

106बी-107ए। एक बुद्धिमान व्यक्ति, जो कृष्ण के इस झूठे आरोप के बारे में जानता है, उस पर झूठे श्राप के द्वारा कभी भी हमला नहीं किया जा सकता है।

१०७बी. ऐकिवाकि ने एक वीर पुत्र को जन्म दिया-अद्भुत मुहुष ।

108-111. भोज पर मुहुष द्वारा दस वीर पुत्र उत्पन्न हुए : वासुदेव (जन्म हुआ) पहले, (तब) शंकदुंदुभी ; इसी प्रकार देवभाग भी उत्पन्न हुआ (मुहुष द्वारा); और देवश्रव , अनावरी, कुंती, और नंदी और शाकिद्य, श्याम, शमिक (भी) जिन्हें सप्त के नाम से जाना जाता है। उनकी पाँच सुंदर पत्नियाँ थीं: श्रुतकीर्ति , पृथा , और श्रुतदेवी और श्रुतश्रवा और साथ ही राजाधिदेवी । ये पाँच वीरों की माताएँ थीं। वृद्ध की पत्नी श्रुतदेवी ने राजा करुण को जन्म दिया।

112. कैकय से श्रुतकीर्ति ने राजा संतर्दन को जन्म दिया । सुनीता का जन्म कैद्य से श्रुतश्रवास को हुआ था ।

११३. धर्म से भयविवरजीता का जन्म राजाधिदेवी को हुआ था। सुरा , दोस्ती से बंधे, को दे दिया (गोद लेने में) Pṛthā कुन्तिभोज ।

114. इस प्रकार, वासुदेव की बहन पृथा को कुंती भी कहा जाता था । कुंतीभोज ने पाण्डु को अपनी पत्नी के रूप में वह प्रशंसनीय पीठ दी ।

११५. उस रानी ने पांडु के लिए पांच बहादुर पुत्रों को जन्म दिया: युधिष्ठिर का जन्म धर्म से हुआ था; वकोदर (अर्थात् भीम) का जन्म वायु से हुआ था ।

116. धनंजय (अर्थात् अर्जुन ) की वीरता में इंद्र की तुलना इंद्र से हुई थी; वह वीर, तीन देवताओं से तीन भागों के साथ पैदा हुआ था।

११७. उसने देवताओं के लिए काम किया, और सभी राक्षसों को मार डाला; उसने उन राक्षसों को मार डाला जिन्हें इंद्र भी नहीं मार सके।

118. जिसने बल प्राप्त किया था उसे इंद्र ने स्वर्ग में रखा था। हमने सुना है कि दो बेटों पर उत्पन्न किया गया Mādravatī (द्वारा Aśvins )।

119. (वे थे) नकुल और सहदेव और सुंदर रूप और अच्छाई से संपन्न थे। Ānakadundubhi नामित एक पत्नी थी रोहिणी की पुरु परिवार।

120-121. उनका (उनसे) एक पुत्र राम था जो उन्हें प्रिय था; इसी प्रकार सरण , कैरणाप्रिया, दुर्धरा , दमन , पितरक और महानु भी । जो माया अमावस्या थी वह देवकी होगी । पहले उस पराक्रमी प्रजापति का जन्म उनसे हुआ।

122. तब उससे श्याम सुभद्रा , वाणी में अनुग्रह, का जन्म हुआ; इसी तरह (जन्म हुए) विजया , रोकमान , वर्धमान और देवल ।

123-126। इन सभी का जन्म अधीनस्थ रानी पर हुआ था। Bṛhaddevī उदार को जन्म दिया Agāvaha । वे स्वयं बृहद्देवी को मंडक नाम से पैदा हुए थे। देवकी ने अपने सातवें पुत्र रोमंत को जन्म दिया, और गवेश युद्ध में पराजित हुआ। पूर्व में वन में भटकते समय शौरी ने श्रुतादेवी के सुख-घर में ज्येष्ठ पुत्र अर्थात। वैश्य महिला पर कुसिका । श्रुतंधरा (वासुदेव की) रानियों में से एक थीं।

127. वासुदेव के पराक्रमी पुत्र कपिला ने दिव्य सुगंध वाले प्रथम धनुर्धर ने प्रजा को दु:ख दिया।

128ए. ये दोनों, अर्थात्। सौभद्र और भव बहुत ऊर्जावान थे।

128बी-129. (अस्पष्ट) देवभाग के पुत्र (नामित) प्रस्थान को बुद्ध के साथ याद किया जाता है। प्रथम और सर्वश्रेष्ठ देवश्रव ( बहू या प्रहुं?) को विद्वान कहा गया है। उनकी पुत्री यशस्विनी का जन्म इक्ष्वाकु कुल के मनस्विनी से हुआ था । (उनका पुत्र था) शत्रुघ्न।

130-13ला। (अस्पष्ट) उसके शत्रु उससे पीछे हट गए थे; वह शत्रुओं का हत्यारा था; उनसे श्रद्धा का जन्म हुआ। कृष्ण ने प्रसन्न होकर गंगा को सौ संतानें दीं , चंद्रमा के साथ, उदार, शक्तिशाली और बलवान (?)

१३१बी-१३३. नंदना के दो बेटे थे Rantipāla और Ranti -Śamīka के चार बहादुर और बहुत शक्तिशाली बेटे थे: Viraja , धनु और Vyoma और Sṛñjaya। व्योम निःसंतान था; धनंजय संजय (पुत्र) का था; वह जो भोज के रूप में पैदा हुआ था, एक शाही ऋषि बन गया।

१३४. जो व्यक्ति हमेशा कृष्ण के जन्म और उत्थान को सुनाता या सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

१३५. कृष्ण, महान देवता, पूर्व में निर्माता, पुरुषों के बीच भी पैदा हुए थे।

१३६. तपस्या के माध्यम से वासुदेव ने देवकी पर कमल-नेत्र (कृष्ण), चार भुजाओं वाले, एक दिव्य रूप और लोगों के लिए आश्रय का उत्पादन किया।

137. उसे श्रीवत्स के चिन्ह और देवताओं के सदृश देखकर , वासुदेव ने उससे कहा, "हे भगवान, अपना रूप वापस ले लो ।

१३८. हे भगवान, मैं कंस से डरता हूं, इसलिए मैं तुमसे यह कह रहा हूं। उसने भयानक वीरता के मेरे छह पूर्व-प्रतिष्ठित पुत्रों को मार डाला। ”

139. वासुदेव की बातें सुनकर अच्युत ने अपना रूप वापस ले लिया।

140. इसके लिए राजी होने के बाद, शौरी उसे चरवाहे नंदा के घर ले गया । उसने उसे नन्द के हवाले कर दिया, और उससे कहा, “उसे बचा ले; तभी सभी यादव खुश होंगे ।

१४१. जैसे ही देवकी का यह भ्रूण (अर्थात् पुत्र) कंस का वध करेगा, जगत् में सुख होगा, जो (पृथ्वी का) भार बहुत दूर कर देगा।

142. जो (अर्थात् वह) दुष्ट राजाओं को मार डालेगा, जब कौरवों के बीच युद्ध होगा जहां सभी क्षत्रिय इकट्ठे होंगे।

143. यह भगवान स्वयं अर्जुन का सारथी होगा; क्षत्रियों की पृथ्वी से छुटकारा पाने के बाद वह आराम (यानी क्षत्रिय से रहित) का आनंद लेगा और पूरी यदु- प्रजाति को दिव्य दुनिया में ले जाएगा।

भीम ने कहा :

144. यह वासुदेव कौन है? यह गौरवशाली देवकी कौन है?

145. चरवाहे नंदा कौन हैं? यशोदा कौन हैं जो व्रतों का कठोरता से पालन कर रही हैं, किसने विष्णु का पालन-पोषण किया और किसको उन्होंने अपनी माता कहा?

१४६ए. किसने (एक पुत्र) भ्रूण को जन्म दिया और उसका पालन-पोषण किया?

पुलस्त्य ने कहा :

१४६बी. कश्यप सर्वोच्च थे और अदिति को उनकी प्रिय कहा जाता है।

147. कश्यप ब्रह्म का और अदिति पृथ्वी का भाग था । नंद को बादल कहा गया और यशोदा को पृथ्वी।

१४८. उसने देवकी की कई इच्छाओं को पूरा किया, जो उसने पहले महान अजन्मे से तृप्त की थी।

149-150। शीघ्र ही वह महान देवता मानव शरीर में प्रवेश कर गया। वह (भगवान विष्णु) जादुई शक्तियों से युक्त, अपनी अलौकिक शक्तियों के साथ सभी प्राणियों को स्तब्ध कर परिवार में धार्मिकता स्थापित करने और राक्षसों को नष्ट करने के लिए आए (नीचे) जब धार्मिकता और बलिदान नष्ट हो गया था।

१५१-१५२. रुक्मणी , सत्यभामा , सत्य, तो भी Nāgnijitī और सुमित्रा , Śaibyā, गांधारी और लक्ष्मण । तो सुभीमा, माद्री, कौशल्या और विजया भी । ये और अन्य उसकी सोलह हजार पत्नियाँ थीं।

१५३. रुक्मिणी के पुत्रों के नाम सुनें: चारुदेश जो युद्धों में बहादुर थे, और बहुत पराक्रमी प्रद्युम्न ।

154. Sucāru और Cārubhadra और Sadaśva और भी Hrasva ।

155-156। सबसे छोटा चारुहास था , और एक बेटी (नाम) चारुमती थी । रोहिणी पर पैदा हुए थे भानु , Bhīmaratha, Ksana , रोहिता और Dīptimān , Tāmrabandhu, Jalandhama । उनमें से चार बेटियों का जन्म हुआ और वे छोटी थीं।

157. से जम्बवती बेहद आकर्षक पैदा हुआ था सांबा । वह सौर विज्ञान के लेखक थे, और घर में एक छवि।

158. उदार व्यक्ति ने बहुत आधार (सर्वोच्च आत्मा) में प्रवेश किया; (तब) देवताओं के देवता ने प्रसन्न होकर उसके कोढ़ का नाश किया।

159. मित्रविंदा ने सुमित्रा और चारुमित्र को जन्म दिया । से नग्नजीती पैदा हुए थे Mitrabāhu और सुनीता।

१६०. इन्हें और अन्य को हजारों (कृष्ण के) पुत्रों के रूप में जानें; वासुदेव के पुत्र अस्सी हजार हैं।

161. प्रद्युम्न का सबसे बुद्धिमान पुत्र, अर्थात। अनिरुद्ध , युद्ध में एक योद्धा और मृगकेतन (उनके बैनर पर हिरण के साथ) वैदरभी से पैदा हुए थे।

162. सुपारीव की पुत्री काम्या ने साम्बा से तरसवीन प्राप्त किया। अन्य पांचों को अच्छे स्वभाव वाले देवता घोषित किए गए।

163. महान यादवों के तीन करोड़ थे। साठ हजार बहादुर और बहुत पराक्रमी थे।

१६४-१६५. देवताओं के अंश इन सभी महान पराक्रम के रूप में पैदा हुए थे। या देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध में मारे गए शक्तिशाली राक्षस यहां पुरुषों के बीच पैदा हुए और सभी पुरुषों को परेशान किया। उनकी मुक्ति के लिए वे यादव- परिवार में पैदा हुए थे ।

166. प्रतापी यादवों के सौ परिवार थे। विष्णु उनके प्रवर्तक थे और उन्हें उनके स्वामी के रूप में रखा गया था।

167. उनके आज्ञाकारी बने रहने वाले सभी यादव समृद्ध हुए।

भीम ने कहा :

168-169। सात ऋषियों, कुबेर , Maṇidhara , Yakṣa , सत्यकी , नारद , शिव और धनवंतरी , विष्णु (अन्य) देवताओं-क्यों देवताओं के इन सभी मेजबानों पृथ्वी पर एक साथ पैदा हुए थे के साथ पहले भगवान?

170. इस महान की कितनी अभिव्यक्तियाँ होंगी? वह सभी क्षेत्रों में किस उद्देश्य के लिए पैदा हुआ है? व्यांधक परिवार में विष्णु का जन्म किस उद्देश्य से हुआ है? कृपया मुझे बताएं कि आपसे कौन पूछ रहा है।

पुलस्त्य ने कहा :

171. हे राजकुमार, सुनो, मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा रहस्य बताऊंगा कि पुरुषों के बीच एक दिव्य शरीर के विष्णु का जन्म क्यों होता है।

172. जब युग का अंत हो जाता है, और समय शिथिल हो जाता है, भगवान, हरि, देवताओं, राक्षसों या पुरुषों के बीच पैदा होते हैं,

१७३-१७४. राक्षस हिरण्यकशिपु तीनों लोकों का शासक था; फिर बाद में जब बाली तीनों लोकों का शासक था, तब राक्षसों के साथ देवताओं की महान मित्रता थी। दस पूर्ण युग बीत गए; दुनिया बेफिक्र थी।

175. देवता और राक्षस उन दोनों के आज्ञाकारी थे। बाली ( वामन द्वारा ) बंधा हुआ था । उनका विनाश अत्यंत भयानक था, (जिससे) देवताओं और राक्षसों दोनों को बहुत नुकसान हुआ।

176-177. यहाँ (इस दुनिया में) वह फिर देवताओं और पुरुषों के लिए धार्मिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए भागु के श्राप के कारण पुरुषों के बीच पैदा हुआ है ।

भीम ने कहा :

178. हरि ने देवताओं और राक्षसों के लिए एक शरीर क्यों लिया? हे शुभ मन्नत, मुझे देवताओं और राक्षसों के बीच (युद्ध का पूरा लेखा-जोखा) बताओ जैसा कि यह हुआ था।

पुलस्त्य बोला :

जीत के लिए उनके बीच भयंकर युद्ध हुए।

179. मनु के काल में दस और दो शुद्ध अवतार बताए गए हैं (ले गए हैं) । मेरे द्वारा बताए जाने के लिए उनके नाम सुनो।

180. पहला (अवतार) नरसिंह है ; और दूसरा है वामन; तीसरा है वराह और चौथा है ( के समय कृमा ) अमृत मंथन कर रहा है।

१८१. पाँचवाँ युद्ध तारकमाया का बहुत ही भयानक युद्ध है जिसमें तारक शामिल हैं । छठा को शिवक कहा जाता है; इसी प्रकार सातवां है त्रिपुरा ।

182. आठवीं की हत्या का है अन्धक , नौवें की हत्या का है Vṛtra । उनमें से दसवां हिस्सा ध्वज का है , और हलाहला उसके बगल में है।

183. बारहवें को भयानक कोल्हाला के नाम से जाना जाता है । राक्षस हिरण्यकशिपु का वध नरसिंह ने किया था।

१८४. पूर्व में बाली को तीनों लोकों पर अधिकार करने के समय वामन द्वारा बांधा गया था।

185. देवताओं ने एक मुठभेड़ में हिरण्याक्ष को मार डाला । समुद्र में रहने पर सूअर (अवतार) ने उसे दो बना दिया।

१८६. अमृत मंथन के समय (समुद्र से बाहर यानी कछुआ के रूप में अवतार के दौरान) इंद्र ने प्रह्लाद को परास्त किया । प्रहलाद का पुत्र विरोचन , हमेशा इंद्र को मारने पर आमादा था; लेकिन इंद्र ने उसे परास्त कर तारकामाया युद्ध में उसका वध कर दिया।

१८७-१८८. जब देवता देवताओं के शत्रु त्रिपुरा को जीतने में असमर्थ थे , तो उन्होंने राक्षसों को बहकाया और अमृत पी लिया और बार-बार जीवन में आए। तीनों लोकों के सभी राक्षसों को शिव ने मार डाला था।

189. अंधक देवताओं की हत्या पर, पुरुषों और पुरुषों ने हर जगह राक्षसों, भूतों और राक्षसों को मार डाला।

190. भयानक कोलाहल में वृत्र जिसे (पूर्व में) राक्षसों द्वारा (अमृत के साथ) छिड़का गया था, इंद्र ने विष्णु की मदद से मारा और नष्ट कर दिया था।

191. अपने अनुयायियों के साथ विप्रसिट्टी के पास जाकर महेंद्र ने अपने बोल्ट से उसे मार डाला जो जादुई कला जानता था और खुद को दुष्टता से छुपाता था।

192. राक्षसों और देवताओं ने जो पूरी तरह से इकट्ठे हुए थे, उन्होंने बारह युद्ध लड़े थे, जिससे देवताओं और राक्षसों का विनाश हुआ और प्राणियों की भलाई हुई।

१९३-१९४. हिरण्यकशिपु ने एक राजा के रूप में शासन किया और एक सौ बहत्तर लाख अस्सी हजार वर्षों तक तीनों लोकों में संप्रभुता का आनंद लिया।

195. बाली, बदले में, एक सौ बीस मिलियन साठ हजार वर्षों के लिए एक राजा (और शासन) बन गया।

196. प्रह्लाद ने उसी अवधि के लिए राक्षसों के साथ आनंद लिया, जैसा कि कहा जाता है कि बाली ने शासन किया था।

१९७-१९८. पराक्रमी इंद्र के इन (युद्धों) को राक्षसों पर विजय प्राप्त करने के लिए (लड़े जाने के लिए) जाना जाना चाहिए। तीनों लोकों का यह पूरा समूह तब इंद्र द्वारा संरक्षित है, जब दस हजार वर्षों तक यह समृद्ध नहीं था। जब एक समय बीतने के बाद इंद्र ने तीनों लोकों का (राज्य) प्राप्त किया, यज्ञ राक्षसों को छोड़कर देवताओं के पास गया।

199. जब यज्ञ देवताओं के पास गया, तो दिति के पुत्रों ने शुक्र से कहा :

200. “इंद्र ने हमारा राज्य छीन लिया है; यज्ञ , हमें छोड़कर, देवताओं के पास गया है। हम यहाँ नहीं रह सकते; हम निचली दुनिया में प्रवेश करेंगे।"

201. इस प्रकार संबोधित करते हुए, शुक्र ने निराश राक्षसों से कहा, उन्हें (इन) शब्दों के साथ सांत्वना दी: "डरो मत, राक्षसों, मैं अपनी ताकत के साथ तुम्हारा समर्थन करूंगा।

202. पृथ्वी पर जो कुछ मंत्र और जड़ी बूटी हैं, वह सब मेरे पास है; इसका एक हिस्सा ही देवताओं के पास है।

203. जो कुछ मेरे द्वारा तुम्हारे लिथे रखा गया है, वह सब मैं तुम्हें दूंगा। तब देवताओं ने उन्हें शुक्र द्वारा समर्थित और निराश देखकर उन्हें मारने की इच्छा से परामर्श किया:

204. “यह शुक्र अपने पराक्रम से यह सब हम से हटा लेगा। इससे पहले कि वह हमें (राज्य से) वंचित करे, हम (आगे) चलेंगे।

205. शेष (राक्षसों) को जबरन जीतकर हम उन्हें अधोलोक में भेज देंगे।

206. तब क्रोधित देवता राक्षसों के पास पहुंचे और उनके द्वारा मारे जा रहे राक्षस स्वयं शुक्र के पास पहुंचे।

207. तब काव्या (अर्थात् शुक्र) ने उन पर देवताओं द्वारा आक्रमण होते देख देवताओं द्वारा सताए गए लोगों की रक्षा के लिए उन्हें एक साथ लाया।

208ए. काव्या को देखकर वे रुक गए और देवताओं ने बिना किसी भय के उनका वध कर दिया।

208बी-210. तब काव्या ने ब्रह्म (?) के लाभकारी शब्दों पर विचार करते हुए और पूर्व खाते को याद करते हुए उनसे कहा: "वामन ने तीनों लोकों को तीन चरणों में छीन लिया; बाली बंधा हुआ था; जांभा मारा गया; विरोकाना भी मारा गया। देवताओं ने बारह युद्धों में महान राक्षसों को मार डाला।

211. विभिन्न उपायों से उनमें से कई प्रमुख राक्षस मारे गए। आप में से कुछ बच गए हैं; मुझे लगता है कि यह कोई युद्ध नहीं है।

212. आपके द्वारा राजनीतिक ज्ञान का प्रयोग किया जाना चाहिए। समय बदलने तक मैं आपके साथ खड़ा रहूंगा। मैं महादेव के पास जाउंगा (प्राप्त करने के लिए) एक मंत्र जो आपको जीत दिलाएगा ।

२१३. भगवान महेश्वर से हमारे अनुकूल मंत्रों को प्राप्त करके हम फिर से देवताओं के साथ युद्ध करेंगे; तब हमें विजय प्राप्त होगी।"

214. राज़ी होने पर (आपस में बातें करने के बाद) दुष्टात्माओं ने देवताओं से कहा: “हम सब ने अपने-अपने हथियार डाल दिए हैं; हम बिना हथियारों और रथों के हैं।

215. छाल-कपड़ों से आच्छादित, हम तपस्या करेंगे।

216. देवताओं ने उनकी बातों को सच-सच सुनकर, गर्मी से मुक्त होकर और प्रसन्न होकर वहां से सेवानिवृत्त हो गए। जब दैत्यों ने अपने शस्त्र डाल दिए, तब दैत्य भी सेवानिवृत्त हो गए।

२१७-२१८. तब काव्या ने उनसे कहा: "अभिमान से मुक्त होने और नैतिक गुणों से संपन्न होने के कारण अपने शरीर की देखभाल करने में समय व्यतीत होता है। ब्रह्मा के आश्रम में रहकर , मेरी प्रतीक्षा करो, हे राक्षसों। काव्या उन राक्षसों के लिए ब्रह्मा के पास पहुंची ।

219. शुक्र ने कहा: "देवताओं की हार और राक्षसों की जीत के लिए, हे भगवान, मुझे वे मंत्र चाहिए जो बृहस्पति के पास नहीं हैं।"

२२०. इस प्रकार भगवान ने कहा: "हे भार्गव , अपना सिर झुकाकर, आप पूरे एक हजार वर्षों तक कण्डधिम व्रत का अभ्यास करते हैं; यदि आप इसका अभ्यास करते हैं, तो भगवान आपका भला करे, आपको मंत्रों की प्राप्ति होगी।"

२२१-२२२. ब्रह्मा की आज्ञा पाकर भृगु के पुत्र शुक्र ने "ठीक है" कहकर और भगवान के चरण स्पर्श करके कहा, "हाँ, श्रीमान, मैं आपके आदेश के अनुसार व्रत का पालन करूंगा।"

२२३.-२२५. देवताओं के देवता के आदेश के अनुसार, ऋषि भार्गव ने किया (जैसा कि उन्हें बताया गया था)। फिर जब वह शुक्र राक्षसों की भलाई के लिए गया तो उसने महेश्वर से मंत्र प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन किया। तब यह जानकर कि राजनीतिक ज्ञान के कारण उनके आनंद का, इस कमजोर बिंदु पर देवताओं ने कवच और हथियारों से लैस और बृहस्पति के नेतृत्व में उन पर जोरदार हमला किया।

२२६. देवताओं के समूह को हथियार पकड़े हुए देखकर सभी राक्षस भयभीत हो गए, दृश्य में उभरे और उनसे (इन) शब्दों को कहा:

227. "हे देवताओं, जब हमारे गुरु एक मन्नत का पालन कर रहे हैं, तो हमने अपने हथियार डाल दिए हैं। हमें सुरक्षा का वादा करके अब आप हमें मारने की इच्छा से हमारे पास आए हैं।

228. हम सभी ईर्ष्या से मुक्त हैं और अपनी बाहों के साथ (यहाँ) बने हुए हैं। चिथड़े और मृग की खाल पहने हम निष्क्रिय और अधिकारहीन बने हुए हैं।

229. हम किसी भी तरह से युद्ध में देवताओं को जीतने में सक्षम नहीं हैं। ” (एक दूसरे से उन्होंने कहा:) "हम काव्या की माँ को बिना युद्ध किए आत्मसमर्पण कर देंगे।

२३०. (और) हम उसे इस दुख से परिचित कराएंगे जब तक कि हमारे गुरु वापस नहीं आते। जब शुक्र वापस आएगा, तो हम हथियारों और हथियारों से लैस होकर (देवताओं के साथ) लड़ेंगे। ”

२३१. आपस में इस प्रकार बोलते हुए, जो भयभीत थे, उन्होंने काव्या की माँ की शरण ली। उन्होंने भी उन्हें सुरक्षा प्रदान की।

232. "डरो मत; हे राक्षसों, अपना भय छोड़ दो। मेरे साथ रहो; (तब) तुम्हें कोई भय नहीं होगा।”

233. तब देवताओं ने राक्षसों को उसके द्वारा संरक्षित देखकर, और उनकी ताकत या कमजोरी का न्याय किए बिना जबरन उन पर हमला किया।

234. तब उस देवी (अर्थात् काव्या की माता) ने देवताओं द्वारा दैत्यों की हत्या को देखकर क्रोधित होकर देवताओं से कहा: "मैं तुम्हें नींद से स्तब्ध कर दूंगा।"

235. सभी सामग्रियों को इकट्ठा करके वह सो गई (देवताओं को); वह तपस्या में समृद्ध थी और ध्यान से संपन्न (उन्हें) अपनी शक्ति से स्तब्ध कर देती थी।

२३६. तब इंद्र को (काव्य की माता द्वारा) लकवाग्रस्त देखकर देवताओं की सेना भाग गई। इंद्र को वश में देखकर देवता भय से भाग खड़े हुए।

237. जब देवताओं की सेना भाग गई, तो विष्णु ने इंद्र से कहा, "मुझे दर्ज करो, भगवान तुम्हें आशीर्वाद दे, हे भगवान, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।"

238. इस प्रकार इन्द्र ने विष्णु में प्रवेश किया। उन्हें विष्णु द्वारा संरक्षित देखकर क्रोधित देवी ने (ये) शब्द कहे:

239. "हे इंद्र, अब मैं तुम्हें विष्णु के साथ बलपूर्वक जला दूंगा, जब सभी प्राणी देख रहे होंगे; मेरी तपस्या की शक्ति को देखो!"

240. दो देवता, इंद्र और विष्णु, उसके द्वारा प्रबल थे। विष्णु ने इंद्र से कहा: "मैं तुम्हारे साथ कैसे मुक्त होऊं?"

241. इंद्र ने कहा: "हे प्रभु, जब तक वह हमें नहीं जलाती, तब तक उसे मार डालो; मैं विशेष रूप से उसके द्वारा वश में हूँ; उसे मारो; देरी ना करें।"

242. तब उसे देखकर, विष्णु ने एक महिला (?) को मारने का बुरा काम करने का फैसला किया और भगवान जल्दी से परेशान इंद्र के पास पहुंचे।

243-244। तब विष्णु ने भय से मारा और गति के साथ आगे बढ़ रहा था, और देवी द्वारा किए जाने वाले क्रूर कार्य को जानकर क्रोधित हो गया, उसकी डिस्क ले ली और भय से उसका सिर काट दिया। महिला की उस भयानक हत्या को देखकर भगवान भागु क्रोधित हो गए।

245-246। तब विष्णु को अपनी पत्नी की हत्या के लिए भागु ने शाप दिया था।

भौगु ने कहा :

चूँकि तुमने धर्म को जानकर एक ऐसी स्त्री का वध किया है जिसका वध नहीं होना चाहिए था, इसलिए तुम मनुष्यों के बीच सात बार पैदा होगे।

247. फिर उस श्राप के कारण वह संसार के कल्याण के लिए मनुष्यों में बार-बार जन्म लेता है, जब उसमें से धर्म का लोप हो जाता है। फिर, विष्णु से बात करने के बाद, खुद सिर लाकर, और उसके शरीर को ले कर (सिर और शरीर) को अपने हाथ में लेकर उसने कहा:

248. "हे देवी, मैं तुम्हें पुनर्जीवित कर रहा हूं, जो विष्णु द्वारा मारे गए थे। यदि मैं पूरे पवित्र कानून को जानता हूं या इसका पालन करता हूं, और यदि मैं सच कह रहा हूं, (तुरंत) जीवित हो जाओ।

249. फिर उसने उसे ठंडे पानी से छिड़का, उसने कहा: "जीवित हो जाओ, जीवन में वापस आ जाओ।"

250. जब उन्होंने कहा (इस प्रकार) देवी जीवित हो गईं।

२५१. तब सभी प्राणियों ने उसे देखा जैसे कि नींद से जागा हो, 'अच्छा! अच्छा!' हर तरफ से।

252. इस प्रकार उस भृगु ने उस सम्मानित महिला को फिर से जीवित कर दिया। जब देवता देख रहे थे कि अद्भुत बात हुई।

253. बेफिक्र भागु ने फिर से अपनी पत्नी को जीवित किया; लेकिन यह देखकर इंद्र को काव्य के भय से सुख नहीं मिला ।

254. फिर रात में जागकर (अर्थात नींद न आने की स्थिति में) इंद्र ने शांति की इच्छा से अपनी पुत्री जयंती से (ये) शब्द कहे :

२५५. “यह काव्य इंद्र (अर्थात मुझे) को नष्ट करने के लिए एक भयानक व्रत का पालन कर रहा है। हे बेटी, उसने, बुद्धिमान ने मुझे बहुत डरा दिया है।

२५६. हे पुत्री, उसके मन को प्रसन्न करने वाली सेवा से उसे इस प्रकार तृप्त करो कि ब्राह्मण प्रसन्न हो जाए।

257-259. उसके पास जाओ; मैंने तुम्हें उसे दिया है; मेरे लिए प्रयास करो।"

अपने पिता के वचनों को भली-भांति समझकर जयंती उस स्थान पर चली गई, जहां वह भयानक मन्नत लेकर ठहरे थे। यक्ष द्वारा टपकते हुए कटोरे से गिराए गए धुएं के कणों को पीते हुए, काव्या को देखते हुए, जो (वहां) अपने दुश्मनों के विनाश के लिए प्रयास कर रहा था, कमजोर स्थिति में कम हो गया, उसने काव्या के साथ अभिनय किया। जैसा कि उसके पिता ने उसे बताया था।

२६०-२६३. मधुरभाषी कन्या ने सहृदय स्तवनों से उसकी स्तुति की। (उचित) समय पर उसने धीरे से उसके अंगों को रगड़ा, जिससे त्वचा शांत हो गई और व्रत के अभ्यास के अनुसार कई वर्षों तक उसकी सेवा की। जब वह भयानक व्रत (कहा जाता है-) धम्म एक हजार वर्षों के बाद समाप्त हो गया, शिव ने प्रसन्न होकर उसे एक वरदान दिया। महेश्वर ने कहा: "केवल तुमने ही यह व्रत किया है; किसी और ने इसे नहीं देखा है।

264. अत: अपनी तप, बुद्धि, ज्ञान और पराक्रम और तेज से तुम (सब) ही सब देवताओं पर विजय पाओगे।

265. हे भागु के पुत्र, मैं अपना सब कुछ तुझे दूंगा; इसे किसी को न बताएं। ज्यादा बोलने से क्या फायदा? आप मृत्यु के प्रति प्रतिरक्षित होंगे।"

२६६. भार्गव को वे वरदान देकर, उन्होंने उन्हें प्राणियों का आधिपत्य, धन और मृत्यु से मुक्ति भी प्रदान की।

२६७. काव्या, इन वरदानों को पाकर अपने बालों के सिरे पर खड़े होने से खुश थी।

२६८. देवताओं के देवता, भगवान शिव से इस प्रकार बोलते हुए, शुक्र, बुद्धि से संपन्न, अपनी हथेलियों को जोड़कर उसके सामने झुक गए।

२६९. फिर, जब भगवान (शिव) गायब हो गए, तो उन्होंने जयंती से यह (यानी ये शब्द) कहा: "हे शुभ, आप किसके हैं? तुम कौन हो कि जब मैं दु:ख होता हूं तब तुम दु:खी होते हो?

२७०. तुम, महान तपस्या से संपन्न, मुझे क्यों जीतना चाहते हो? आप (यहाँ) इस (अर्थात) भक्ति, सम्मान और संयम और स्नेह के साथ रहे हैं; हे तुम, आकर्षक कूल्हों की आकर्षक महिला, मैं तुमसे प्रसन्न हूं।

२७१-२७२. हे सुंदरी, तुम क्या चाहती हो? (आपके मन में) क्या इच्छा उत्पन्न हुई थी? मैं इसे पूरा करूंगा, भले ही इसे पूरा करना मुश्किल हो। ”

इस प्रकार संबोधित करते हुए, उसने उससे कहा: "आपकी तपस्या के माध्यम से आप जान सकते हैं, हे ब्राह्मण, मैं चाहता हूं कि आप मेरे लिए क्या करें। (अब) मुझे ठीक-ठीक बताओ (आप क्या करेंगे)।”

273. इस प्रकार संबोधित करते हुए, उन्होंने उसे दिव्य दृष्टि से देखते हुए उससे कहा:

274. "हे सुंदर युवती, सभी प्राणियों द्वारा अनदेखी आप एक हजार साल के लिए मेरे साथ एकता की इच्छा रखते हैं।

275. हे आदरणीय युवा दिव्य महिला, नीले कमल की तरह आकर्षक, सुंदर आँखें और मधुरभाषी इस प्रकार आप भोगों का चयन करते हैं।

276-277। यह तो हो जाने दो; हे आप बहुत सुंदर और आकर्षक महिला; हम (मेरे) घर जाएंगे।”

फिर जयंती के साथ अपने घर में आकर, भागु के पुत्र उषान, जिन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली थी, उस सम्मानित महिला के साथ सभी प्राणियों द्वारा देखे गए सौ वर्षों तक जीवित रहे।

278. दिति के सब पुत्र यह जानकर कि शुक्र अपना माल पाकर लौट आया है, प्रसन्न होकर उसके घर को गया।

279. वहां जाने के बाद जब उन्होंने अपने गुरु को नहीं देखा, जिन्होंने अपनी जादुई शक्ति से खुद को छुपाया था, और उनके (वापस आने) का कोई संकेत नहीं देखा, उन्होंने (निष्कर्ष निकाला), 'हमारा गुरु अभी तक नहीं आया है'।

२८०. और इस प्रकार वे अपने निवास स्थान को चले गए जैसे वे आए थे। तब देवताओं की सारी सेना अगिरस के पास जाकर उससे कहने लगी:

281. "हे श्रद्धेय, दुष्टात्माओं के घर में जा, और उनकी सेना को मूर्ख बनाकर शीघ्र ही उसे अपने वश में कर ले।"

२८२. बृहस्पति ने उन देवताओं से कहा: "बस इतना, (अभी) मैं जाता हूँ।" (वहां) जाकर उन्होंने राक्षसों के स्वामी प्रह्लाद को वश में कर लिया।

२८३. स्वयं को शुक्र में बदलकर, उन्होंने वहां (उनके) पुजारी के रूप में काम किया। उषान के वापस आने पर वे वहाँ पूरे सौ वर्ष रहे।

२८४-२८५. राक्षसों ने विधानसभा में बृहस्पति को देखा। "यहाँ (पहले से ही) एक उषान है। दूसरा यहाँ क्यों आया है? बड़ा आश्चर्य है; एक बड़ा झगड़ा होगा (अब); दरवाजे पर बैठे इस व्यक्ति के बारे में लोग क्या कहेंगे?

286. (और) हमारे गुरु, जो सभा में बैठे हैं, हमें क्या कहेंगे? जब दैत्य ऐसा बोल रहे थे तो कवि (वहां) आ गया।

२८७. वहाँ बृहस्पति को, जिन्होंने अपना रूप धारण कर लिया था और जो वहाँ बैठे थे, क्रोधित होकर (ये) शब्द कहे: “तुम यहाँ क्यों आए हो?

288-289। आप मेरे शिष्यों को भ्रमित कर रहे हैं। क्या यह आपके (जो हैं) देवताओं के उपदेशक के लिए उचित है? निश्चय ही तुम्हारी चालबाजी से मूढ़ होकर अज्ञानी तुम्हें पहचान नहीं पाते। तो, हे ब्राह्मण, आपके लिए यह उचित नहीं है कि आप दूसरे के शिष्यों के साथ दुर्व्यवहार करें ।

देवताओं के निवास में जाओ (और) रहो (वहाँ)। इस प्रकार (अर्थात ऐसा करने से) आपको धार्मिक पुण्य की प्राप्ति होगी।

290. हे ब्राह्मण, पहले राक्षसों में सबसे अच्छा था

आपके पुत्र और शिष्य काका को मार डाला जो यहाँ एक छात्र के रूप में आए थे। (तो) यहां आपका प्रवेश अनुचित है।"

२९१-२९३. उसकी बातें सुनकर और मुस्कुराते हुए, बृहस्पति ने कहा: "पृथ्वी पर चोर हैं, जो दूसरों का धन छीन लेते हैं; (लेकिन) ऐसे चोर (आप जैसे) दूसरे का रूप और शरीर छीनते नहीं देखे गए। पहले इंद्र ने वृत्रा का वध करके एक ब्राह्मण की हत्या की थी। आपने भौतिकवादियों (जैसे चार्वाक ) का विज्ञान (अर्थात् पढ़ाकर ) इसे पार कर लिया है । मैं तुम्हें देवताओं के उपदेशक अगिरसा बृहस्पति के रूप में जानता हूं ।

294. हे राक्षसों, तुम सब (उसे) देखते हो जो (यहाँ के बाद) मेरा रूप धारण करके आया है। विष्णु के प्रयासों से, वह आपको मोहित करने में सक्षम है, यहाँ आया है।

295. सो उसे जंजीरों से बांधकर खारे समुद्र में फेंक देना।

296. और फिर शुक्र ने कहा: "वह देवताओं का पुजारी है। उसके द्वारा स्तब्ध होकर, तुम नाश हो जाओगे, हे राक्षसों। हे राक्षसों के स्वामी, इस दुष्ट ने मुझे धोखा दिया है।

297. तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया और दूसरे याजक को ले लिया? यह केवल बृहस्पति हैं, देवताओं के गुरु और सरस्वती के पुत्र हैं ।

298. आपको देवताओं के हित में धोखा दिया गया है। इसमें तो कोई शक ही नहीं है। हे महापुरुष, उसे त्याग दो जो शत्रुओं पर विजय दिलाएगा।

299. हे प्रभु, मैं पहिले ही से अपके चेलोंकी चिन्ता करके यहां से चला गया, और जल में रहा। मैं महान भगवान शंभु के नशे में था ।

300-301. मैं वास्तव में उनके पेट में पूरे सौ साल गुजार चुका हूं। मुझे उनके द्वारा (उनके) वीर्य के रूप में उनके जनन अंग के माध्यम से छुट्टी दे दी गई थी। वरदान देने वाले देवता ने मुझ से कहा; 'शुक्र, अपनी पसंद का वरदान चुनो।' हे राजा, मैंने त्रिशूल धारण करने वाले देवताओं के देवता से एक वरदान चुना है।

३०२. 'हे शंकर , मेरे मन द्वारा भोगी गई सभी वस्तुओं और मेरे मन में रहने वाली इच्छाओं को (पूरी) अपनी कृपा से होने दो।'

303-305। यह कहते हुए कि 'ऐसा ही रहने दो', भगवान ने मुझे तुम्हारे पास भेजा; (लेकिन) इस प्रकार जब तक (मैं लौटा) मैंने वास्तव में इस बृहस्पति को आपका पुजारी बनते देखा। हे दैत्यों के स्वामी, मेरे वचन सुन।” बृहस्पति ने फिर प्रह्लाद से ये शब्द कहे: "मैं उसे नहीं पहचानता कि वह देवता है या राक्षस या मनुष्य है; हे राजा, वह मेरा रूप धारण करके तुझे धोखा देने आया है।”

306. तब सब दुष्टात्माओं ने कहा, “अच्छा कहा; हमारे पास पूर्व पुजारी होगा; वह कोई भी हो; हमारा इससे (बाद में) कोई लेना-देना नहीं है; जैसा वह आया है वैसा ही जाने दे!”

307-308। काव्या ने गुस्से में वहाँ इकट्ठे हुए सभी राक्षसों के देवताओं को शाप दिया: "चूंकि तुमने मुझे त्याग दिया है, मैं आप सभी को धन से रहित, मृत (या) लंबे समय तक दुखी जीवन व्यतीत करते हुए देखूंगा।

309. और हर हाल में तुम पर बहुत ही भयानक विपत्ति आ पड़ेगी।”

इस प्रकार बोलते हुए काव्या अपनी इच्छा से एक तपस्या-कक्ष में चली गई।

310. जब वह शुक्र (इस प्रकार) चला गया, बृहस्पति कुछ समय के लिए राक्षसों की देखभाल करते हुए वहां रहे।

311-312. हे राजा, जब एक लंबा समय बीत गया, तो सभी राक्षसों ने मिलकर बृहस्पति से पूछा: "हमें इस बेकार सांसारिक जीवन में कुछ ज्ञान (उपयोगी) दें, जिससे हम आपकी कृपा से मुक्ति प्राप्त करेंगे, हे शुभ व्रत।"

313-314. तब गुरु , देवताओं के गुरू थे, जो उस काव्य के रूप में ग्रहण किया था ने कहा, "जैसा कि आप (अब) द्वारा व्यक्त की मैं पहले से ही एक ही विचार था; तो तुम सब मिलकर, पवित्र और रचित होकर, फुरसत पाओ (ताकि), हे राक्षसों, मैं तुम्हें वह ज्ञान बताऊंगा जो तुम्हें मुक्ति देगा।

३१५. वह ज्ञान जिसे ग ( वेद ), यजुर (वेद) और साम (वेद) कहा जाता है, वह वैदिक (ज्ञान) है; और वैष्णर (परमात्मा) के पक्ष के कारण है लेकिन यह इस दुनिया में प्राणियों को दुःख का कारण बनता है।

316-318। मतलब, भौतिक आत्म-उन्नति पर इरादा, यज्ञ और श्राद्ध करना । ये निर्दयी लोग अपनी पत्नियों के साथ-साथ विष्णु और रुद्र द्वारा निर्धारित बुरी प्रथाओं का पालन करते हैं । रुद्र, जिसका आधा नर और आधा स्त्री का रूप है, जो भूतों से घिरा हुआ है और हड्डियों से सुशोभित है, वह (व्यक्ति को) कैसे मुक्ति देगा? न स्वर्ग है, न मुक्ति है। लोग यहां पीड़ित हैं।

३१९. हिंसा का अभ्यास करने वाले विष्णु किस प्रकार मुक्ति के लिए नेतृत्व करेंगे? की प्रकृति के ब्रह्मा राजाओं अपने ही संतान पर जीवन यापन।

320-321। अन्य अर्थात दिव्य ऋषि, जिन्होंने वैदिक तह का सहारा लिया है, वे हिंसा से भरे हुए हैं, हमेशा क्रूर और मांस खाते हैं; शराब पीने के कारण देवता भी पापी हैं। ये ब्राह्मण मांस भक्षक हैं। कौन करेगा और कैसे, ऐसे अनुष्ठानों द्वारा (अभ्यास) स्वर्ग में जाएगा या (प्राप्त) मुक्ति?

३२२. वे धार्मिक संस्कार जैसे यज्ञ आदि और श्रद्धा जैसे स्मृतियों आदि में जो शास्त्रों में स्वर्ग या मुक्ति की ओर ले जाने का आदेश दिया गया है, ऐसा नहीं करते हैं।

३२३. यदि किसी व्यक्ति को यज्ञ करके और पशु को मारकर खून की कीचड़ पैदा करके स्वर्ग में ले जाया जाता है, तो वह क्या (है) जिसके द्वारा एक व्यक्ति को नरक में ले जाया जाता है?

३२४. यदि किसी के खाने (भोजन) से कोई और संतुष्ट हो जाता है, तो यात्रा पर गए व्यक्ति को श्राद्ध देना चाहिए; उसे (तब) भोजन (उसके साथ) नहीं लेना चाहिए।

३२५. हे राक्षसों, (यहां तक ​​कि) ब्राह्मण आकाश में घूम रहे हैं, मांस खाकर गिरते हैं; उनके लिए यहां न तो स्वर्ग है और न ही मुक्ति (यानी वैदिकों की इस प्रणाली में )।

326. हर प्राणी के लिए जो पैदा होता है उसका जीवन प्रिय हो जाता है; बुद्धिमान मनुष्य अपने ही मांस के समान मांस कैसे खाएगा?

327. ये ( वैदिक प्रथाओं के अनुयायी ) उस महिला अंग का आनंद कैसे लेते हैं (यानी मैथुन करते हैं) जिससे वे पैदा हुए हैं? हे दैत्यों के स्वामी, मैथुन करके वे स्वर्ग कैसे जा सकते हैं? वह कौन सी पवित्रता है जो मिट्टी और राख से प्राप्त हुई है?

328-330। हे दानव, देखो यह संसार ( वैदिकों का ) कितना विकृत है! पेशाब करने के बाद या मलत्याग के बाद जनन अंग या गुदा को मिट्टी और पानी से साफ किया जाता है, लेकिन खाने के बाद मुंह के मामले में ऐसा प्रावधान नहीं किया जाता है। फिर हे राजा, पीढ़ी के अंग और गुदा एक ही तरह से साफ क्यों नहीं होते? यह स्थिति (वस्तुओं की) विकृत है (के लिए) वे सफाई नहीं करते जहां (वास्तव में) यह कहा जाता है।

331. पूर्व सोमा छीनने के बाद चले गए Tara , Bṛhaspati की पत्नी। उस पर (सोम से) एक पुत्र बुद्ध का जन्म हुआ; और गुरु ने उसे फिर स्वीकार कर लिया।

332. Sakra खुद ले गए गौतम की पत्नी का नाम दिया अहिल्या ; देखिए यह कैसी धार्मिक प्रथा है!

३३३. यह और अन्य चीजें जो पाप करती हैं, इस दुनिया में देखी जाती हैं। जब इस तरह की धार्मिक प्रथाएं मौजूद हों तो मुझे बताओ, जो सबसे ज्यादा अच्छा कहा जाता है।

334. हे दुष्टात्माओं के स्वामी, मुझ से पूछ, तो मैं तुझे फिर बताऊंगा।

बृहस्पति के सत्य वचनों को सुनकर उनमें कौतूहल सहित दैत्य उठ खड़े हुए और संसार से विरक्त होकर बोले:

335-336। "हे गुरु, हम सब को दीक्षा दे, जो तेरे निकट आए हैं, और हमारी भक्ति में दृढ़ हैं, कि तेरे उपदेश से हम फिर मोह में न पड़ें; हम इस सांसारिक अस्तित्व में दुःख और मोह के कारण बहुत अलग रहेंगे।

३३७. हे गुरु, हमारे बालों को खींचकर हमें (सांसारिक अस्तित्व के) कुएं से बाहर निकालो; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, हमें किस देवता की शरण लेनी चाहिए?

338-339। हे अति बुद्धिमान, हमें दिखाओ कि किसके पास है

आप से संपर्क किया, एक देवता को याद करके, सेवा करके या ध्यान करके, इसी तरह पूजा करने से, मुक्ति (हमारे द्वारा) प्राप्त की जाएगी। हम परिवार से नाखुश हैं, और हम यहाँ फिर से प्रयास नहीं करेंगे (अर्थात एक परिवार के लिए)।

340. जब गुरु, जो वेश में थे, को इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ राक्षसों द्वारा संबोधित किया गया था, उन्होंने उस उपक्रम के बारे में सोचा: 'मैं इसे कैसे लाऊं?

३४१. मैं उन्हें पापी (और फलस्वरूप) नरक का निवासी कैसे बना सकता हूँ, उनके उपहास के कारण और (इसलिए) तीनों लोकों में हँसे जाने के कारण वैदिक तह से बहिष्कृत?'

342-344। ऐसा कहकर (स्वयं से) बृहस्पति ने केशव (अर्थात विष्णु) का ध्यान किया। यह जानते हुए कि उनके जनार्दन के ध्यान ने मायामोह (अर्थात अपनी चाल से राक्षसों को बहकाने वाला) बनाया और उन्हें बृहस्पति के सामने प्रस्तुत किया और उनसे कहा: "आपके साथ जुड़ा यह मायामोह वैदिक पथ से बहिष्कृत सभी राक्षसों को मोहित कर देगा।" इस प्रकार निर्देश देकर प्रभु गायब हो गए।

345. वह मायामोह तपस्या में लगे राक्षसों के पास गया। बृहस्पति उनके पास पहुंचे और कहा:

346. "यह नग्न, साफ मुंडा तपस्वी, एक मोर का पंख पकड़े हुए, आपकी भक्ति से प्रसन्न होकर आप पर कृपा करने के लिए आया है।"

347-349। गुरु के इस प्रकार बोलने के बाद मायामोह ने (ये) शब्द कहे: "हे राक्षसों, आप जो तपस्या में लगे हुए हैं, (मुझे) बताएं कि क्या आप अपनी तपस्या के फल के रूप में कुछ सांसारिक या परोक्ष चाहते हैं?" राक्षसों ने उत्तर दिया: "हमारी राय में तपस्या का प्रदर्शन दूसरी दुनिया में धार्मिक योग्यता प्राप्त करने के लिए है; (इसलिए) हमने इसे शुरू कर दिया है; इस मामले में आपका क्या कहना है?" नग्न (यानी मायामोह) ने कहा: "यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो आप मेरे शब्दों के अनुसार कार्य करते हैं।

350. अरहत की सलाह के अनुसार रिहाई का पूरा दरवाजा खुला है। यह अर्हत (मार्ग) (वैदिक) पथ से मुक्ति के लिए है; उससे बड़ा कोई नहीं है।

351. यहाँ (अर्थात उसकी तह में) रहकर ही तुम स्वर्ग में पहुँचोगे और मुक्त हो जाओगे। ”

352. मायामोह (कहते हुए) द्वारा राक्षसों को वैदिक पथ से हटा दिया गया था "यह पुण्य की ओर जाता है, यह पाप को; यह अच्छा है और यह बुरा है।

353. यह रिलीज की ओर जाता है, यह रिलीज नहीं देगा; यह सर्वोच्च सत्य है।

354. यह किया जाना चाहिए; यह नहीं किया जाना चाहिए; यह यह नहीं है (अर्थात जैसा कहा जाता है वैसा ही); यह स्पष्ट है; नग्नों की यह प्रथा है, यह उन लोगों की है जो बहुत से वस्त्र पहिनते हैं।”

355. इस प्रकार मायामोह ने राक्षसों को अर्हतों की बातें बताईं , और उन्हें अपनी (पुरानी) प्रथाओं को त्याग दिया।

३५६. जब मायामोह ने उन्हें अरहत के शब्द कहे, अर्थात। 'मेरे जीवन के तरीके का सम्मान करें', उन्होंने उसका सहारा लिया और इसलिए वे अर्हतों के अनुयायी बन गए।

३५७-३५८. तीन वेदों का मार्ग छोड़ने के बाद मायामोह ने उन्हें पूरी तरह से अर्हत मार्ग में लीन कर दिया; दूसरों को भी उसके द्वारा निर्देश दिए गए थे; उन्होंने दूसरों को निर्देश दिया; ये अभी भी दूसरों को निर्देश दिया; ये अभी भी अन्य हैं। 'अरहतों को सलाम' इस प्रकार उन्होंने अपनी मंडली में दृढ़ता से बात की।

359. कुछ ही दिनों में राक्षसों ने (तीनों का मार्ग) वेदों को लगभग छोड़ दिया। मायामोह अपनी इन्द्रियों पर विजय पाकर फिर से लाल वस्त्र धारण करने वाला बन गया।

360-361। उसने भी, अन्य राक्षसों के पास जाकर, मीठे शब्द बोले: 'यदि आपको स्वर्ग में जाने या मुक्ति की इच्छा है, तो जानवरों को मारने जैसी दुष्ट प्रथाएं पर्याप्त हैं। (कृपया) समझें (इसे)। यह सब सांसारिक ज्ञान के स्वरूप का जानो।

362. मेरे शब्दों को ठीक से समझो; वे बुद्धिमानों द्वारा कहा जाता है। यह संसार निराकार है और इसमें मिथ्या ज्ञान प्रधान है।

३६३. यह आसक्ति जैसे वासनाओं से बहुत अधिक दूषित है और पुनर्जन्म के जोखिम में शामिल हो जाता है।"

३६४. उन्होंने उनकी रिहाई के लिए कई गुना शब्द इस तरह से कहे कि उन्होंने अपनी (पूर्व) प्रथाओं को छोड़ दिया। हे राजा, कुछ ने वेदों की निंदा की, जबकि अन्य ने देवताओं की निंदा की।

365. अन्य लोगों ने धार्मिक प्रथाओं के समूह और अन्य ब्राह्मणों की निंदा की। ये तार्किक तर्क हत्या से संबंधित प्रथाओं की ओर नहीं ले जाते हैं (अर्थात हत्या के खिलाफ हैं):

366-367। "हे ज्ञानियों, यदि आग में जला हुआ हवन फलदायी होता है, या यह निर्धारित किया जाता है कि बलि में मारा गया जानवर स्वर्ग प्राप्त करता है, तो बलिदान करने वाला अपने ही पिता को वहाँ (यानी बलिदान में) क्यों नहीं मारता है? यदि किसी के खाने से दूसरे को तृप्ति होती है, तो यात्रा करने वालों को श्राद्ध देना चाहिए और अपने साथ (प्रवर्धक आदि) नहीं लेना चाहिए।

368-369। अनेक यज्ञ करके देवत्व प्राप्त करने के बाद यदि इन्द्र ने शमी आदि की लकड़ी खायी तो पत्ते खाने वाला पशु निश्चय ही उत्तम है। यह जानते हुए कि उनके शब्दों को पुरुषों पर भरोसा नहीं करना है, उन्हें अनदेखा करें, और मेरे द्वारा कहे गए शब्दों को अंतिम रूप देने के लिए प्रसन्न (लेने के लिए) करें।

370. हे महाराक्षस, जिनके वचन प्रामाणिक होते हैं, वे आकाश से नहीं गिरते।

३७१. औचित्यपूर्ण शब्द मुझे और आप जैसे अन्य लोगों को स्वीकार करने चाहिए।”

राक्षसों ने कहा :

372-374. आपके द्वारा दिए गए तथ्यों के इस कथन का हम सभी श्रद्धापूर्वक सहारा ले रहे हैं। यदि आप प्रसन्न हैं, हे प्रभु, आज हम पर कृपा करें। हम दीक्षा के लिए आवश्यक सभी सामग्री लाएंगे, जिससे आपकी कृपा से हमें शीघ्र ही मुक्ति मिल जाएगी।

तब मायामोह ने इन सभी राक्षसों से कहा: "यह मेरी सबसे अच्छी बुद्धि के गुरु ने खुद को इस अनुशासन के लिए तैयार कर लिया है। मेरे निर्देश पर सबसे अच्छा आपको दीक्षा देगा: 'हे ब्राह्मण, मेरे निर्देश पर इन पुत्रों को दीक्षा दें'।

375. राक्षसों ने, जब मोहित होकर, भार्गव से (ये) शब्द कहे:

376. "हे महान, हमें दीक्षा दो, जो (हमें) पूरे सांसारिक अस्तित्व से मुक्त कर देगी।" उणों ने राक्षसों से कहा: "ठीक है, चलो (नदी) नर्मदा चलते हैं।

377. हे तू अपके वस्त्र उतार, मैं तुझे दीक्षा दूंगा।

इस प्रकार, भृगु रूप में अंगिरस के बुद्धिमान पुत्र हे भीम ने राक्षसों को नग्न कर दिया।

378-379। और उन्हें मोर के पंख, झंडे, गुंजा के पौधे के जामुन , आकर्षक माला देकर , उन्होंने उनके बालों को तोड़ दिया, (के लिए) बालों को तोड़ना (प्राप्ति) धार्मिक योग्यता का एक बड़ा साधन है।

380. भगवान कुबेर अपने बालों को तोड़ने के कारण धन के स्वामी बन गए। सदा वस्त्रहीन रहकर (भक्तों) ने महान अलौकिक शक्ति प्राप्त की।

३८१. स्वयं अरहत ने पूर्व में कहा है कि इस प्रकार (अर्थात अर्हत-अभ्यास का पालन करने से) अनंत काल प्राप्त होता है। यहां (केवल) पुरुषों को अपने बालों को तोड़कर देवत्व प्राप्त होता है।

382-383। फिर ऐसा क्यों नहीं करते क्योंकि यह महान धार्मिक पुण्य देता है? यह देवताओं की एक बड़ी इच्छा थी: 'हम भारत देश में एक आम आदमी के परिवार में कब पैदा होंगे और हमारे बाल तोड़कर तपस्या से संपन्न होंगे।'

384-385। उन्होंने चौबीस तीर्थंकरों की पूजा की थी । (उनके लिए) मंत्रों के उच्चारण के साथ स्तुति करते हुए अरहत ने नागों के स्वामी के साथ कवर किया और ध्यान का मार्ग दिखाते हुए, स्वर्ग (काफी) हाथ में था या मुक्ति आ जाएगी। उनके द्वारा कौन सा विचार व्यक्त किया गया है?

386-387. (विचार) है: सूर्य और अग्नि के समान चमक में होने के कारण हम ऋषि कब होंगे? हम कब (माध्यम से) बड़बड़ाना (मंत्र) और पांच तरीके (भक्ति के) से जुनूनी होंगे? क्‍योंकि इस प्रकार तपस्‍या करनेवाले और मृत्‍यु से मिलनेवाले धर्मियोंके सिर पत्‍थर से तोड़े जाते हैं।

388. हम एक एकान्त वन में कब निवास करेंगे? (कब) शांत आम आदमी चुपके से हमारे कानों में बड़बड़ाएगा:

389-391। 'हे ऋषि, मत जाओ, क्योंकि तुम मुक्ति के मार्ग पर एक यात्री हो। आपने जिन स्थानों को सुरक्षित किया है, वे आगे की गतिविधि (और) का कारण बनते हैं, इसलिए उन्हें छोड़ दिया जाना चाहिए- हमारे ये शब्द सत्य हैं। हमारी तपस्या और विभिन्न संयमों के माध्यम से सबसे अच्छे स्थान पर और मुक्ति के उस मार्ग के साथ जाते हैं, जो बुद्धिमान लोग तपस्या से संपन्न होकर भक्ति के माध्यम से प्राप्त करते हैं।

३९२. वह तपस्या कहलाती है जहाँ सभी प्राणियों के लिए इन्द्रियों का संयम और करुणा है; बाकी सब मजाक है'।

३९३. यह जानकर आपको उच्चतम पद प्राप्त करना चाहिए और (प्राप्त करना चाहिए) वही स्थिति जो तीर्थंकरों और तपस्वियों ने प्राप्त की है।

३९४. इस प्रकार (केवल) देवताओं, विद्याधरों और महान नागों ने पहले दिन-रात इच्छाओं का मनोरंजन किया (वह अवस्था प्राप्त की)।

३९५. यदि आपने सांसारिक जीवन के पाठ्यक्रम को समाप्त करने की इच्छा का मनोरंजन किया है तो (अपनी) पत्नियों को छोड़ दें जो स्वर्ग के मार्ग में बाधा हैं।

396. आप उस पीढ़ी के महिला अंग का आनंद कैसे लेते हैं जिसमें आपके पिता ने प्रवेश किया था (यानी सहवास था)? यह कैसे होता है कि प्राणी अपने समान मांस खाते हैं?

397. तब उन सभी भयानक राक्षसों ने गुरु से (ये) शब्द कहे: "हे महान, हमें (अपने) बच्चों को दीक्षा दे दो जो तुम्हारे सामने हैं!"

398. ऐसा करने के बाद उस समय के पुजारी ने कहा: "आपको कभी भी किसी अन्य देवता (अरहत के अलावा) को सलाम नहीं करना चाहिए।

३९९. जब आपको किसी स्थान पर खाने की आवश्यकता हो तो आपको भोजन को अपने हाथों की गुहा में रखकर खाना चाहिए और पानी को समान रूप से देखना चाहिए या अन्यथा (जो) बिना बालों और कीड़ों के और दूसरों की नज़र से दूषित नहीं होना चाहिए।

400. हे प्रभु, इस अभ्यास के अनुसार भोजन करना चाहिए। ऐसा करो। जो रिलीज के लिए फिट हैं और आपको साथ रहना चाहिए।"

401-402। हे राजकुमार, उन सर्वश्रेष्ठ राक्षसों को इस प्रकार संयम बताते हुए, गुरु स्वर्ग में गए, देवताओं के निवास और उन सभी को बताया कि उन्होंने राक्षसों को करने के लिए बनाया था।

403-406। तब राक्षस नर्मदा के पास गए और उसके पास रहने लगे। वहाँ देवताओं के स्वामी प्रह्लाद को छोड़कर उन राक्षसों को देखकर प्रसन्न होकर (ये) शब्द रो नमुचि ने कहा : इन्हें देखकर - हिरण्यकश, यज्ञों और धार्मिक प्रथाओं के विनाशक और वेदों के सेंसर , इसी तरह दुष्ट कर्मों के राक्षस प्रघास भी , और विघास , और मुचि, और बाणा और विरोकाना, महिषाक्ष , बैकल , प्रकाश , चनक , इसलिए भी चमकदार और बहुत क्रूर सुषेण , राक्षसों में सबसे अच्छा- और अन्य उसने राक्षसों के प्रभुओं से कहा:

इंद्र ने कहा :

407-408। हे राक्षसों के स्वामी, आप पुराने दिनों में पैदा हुए थे; और तू ने स्वर्ग पर राज्य किया; यह कैसे हुआ कि अब आप वेदों को नष्ट करने, (नग्न) होने, एक घड़े को साफ करने (और साथ में) मोर धारण करने और मोर को धारण करने के लिए इस व्रत का अभ्यास करने लगे हैं?

राक्षसों ने कहा :

४०९. हम अपने सभी दानवों को त्याग कर ऋषियों की इन प्रथाओं में बने रहे हैं।

410. हम सभी प्राणियों में धार्मिक प्रथाओं की वृद्धि के लिए कर्म कर रहे हैं। हे इंद्र, तीनों लोकों के राज्य का आनंद लो और (अब) प्रस्थान करो (यहाँ से)।

411. 'ठीक है' कहकर इंद्र फिर से स्वर्ग चले गए। हे भीम, वे सभी (राक्षस) इस प्रकार (बृहस्पति) देवताओं के पुजारी द्वारा स्तब्ध थे।

४१२. नर्मदा नदी में जाकर सबसे अच्छे राक्षस (वहां) रुके थे। यह सब जानकर शुक्र ने उन्हें फिर सलाह दी।

413. तब उन्होंने फिर से तीनों लोकों को जीतने के दुष्ट विचार का मनोरंजन किया।










पद्मपुराणम्/खण्डः १ (सृष्टिखण्डम्)/अध्यायः १४
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< पद्मपुराणम्‎ | खण्डः १ (सृष्टिखण्डम्)
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भीष्म उवाच
कथं त्रिपुरुषाज्जातो ह्यर्जुनः परवीरहा
कथं कर्णस्तु कानीनः सूतजः परिकीर्त्यते१
वरं तयोः कथं भूतं निसर्गादेव तद्वद
बृहत्कौतूहलं मह्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति२
पुलस्त्य उवाच
छिन्ने वक्त्रे पुरा ब्रह्मा क्रोधेन महता वृतः
ललाटे स्वेदमुत्पन्नं गृहीत्वा ताडयद्भुवि३
स्वेदतः कुंडली जज्ञे सधनुष्को महेषुधिः
सहस्रकवची वीरः किंकरोमीत्युवाच ह४
तमुवाच विरिंचस्तु दर्शयन्रुद्रमोजसा
हन्यतामेष दुर्बुद्धिर्जायते न यथा पुनः५
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा धनुरुद्यम्य पृष्ठतः
संप्रतस्थे महेशस्य बाणहस्तोतिरौद्रदृक्६
दृष्ट्वा पुरुषमत्युग्रं भीतस्तस्य त्रिलोचनः
अपक्रांतस्ततो वेगाद्विष्णोराश्रममभ्यगात्७
त्राहित्राहीति मां विष्णो नरादस्माच्च शत्रुहन्
ब्रह्मणा निर्मितः पापो म्लेच्छरूपो भयंकरः८
यथा हन्यान्न मां क्रुद्धस्तथा कुरु जगत्पते
हुंकारध्वनिना विष्णुर्मोहयित्वा तु तं नरम्९
अदृश्यः सर्वभूतानां योगात्मा विश्वदृक्प्रभुः
तत्र प्राप्तं विरूपाक्षं सांत्वयामास केशवः१०
ततस्स प्रणतो भूमौ दृष्टो देवेन विष्णुना
विष्णुरुवाच
पौत्रो हि मे भवान्रुद्र कं ते कामं करोम्यहम्११
दृष्ट्वा नारायणं देवं भिक्षां देहीत्युवाच ह
कपालं दर्शयित्वाग्रे प्रज्वलंस्तेजसोत्कटम्१२
कपालपाणिं संप्रेक्ष्य रुद्रं विष्णुरचिन्तयत्
कोन्यो योग्यो भवेद्भिक्षुर्भिक्षादानस्य सांप्रतम्१३
योग्योऽयमिति संकल्प्य दक्षिणं भुजमर्पयत्
तद्बिभेदातितीक्ष्णेन शूलेन शशिशेखरः१४
प्रावर्तत ततो धारा शोणितस्य विभोर्भुजात्
जांबूनदरसाकारा वह्निज्वालेव निर्मिता१५
निपपात कपालांतश्शम्भुना सा प्रभिक्षिता
ऋज्वी वेगवती तीव्रा स्पृशंती त्वांबरं जवात्१६
पंचाशद्योजना दैर्घ्याद्विस्ताराद्दशयोजना
दिव्यवर्षसहस्रं सा समुवाह हरेर्भुजात्१७
इयंतं कालमीशोसौ भिक्षां जग्राह भिक्षुकः
दत्ता नारायणेनाथ कापाले पात्र उत्तमे१८
ततो नारायणः प्राह शंभुं परमिदं वचः
संपूर्णं वा न वा पात्रं ततो वै परमीश्वरः१९
सतोयांबुदनिर्घोषं श्रुत्वा वाक्यं हरेर्हरः
शशिसूर्याग्निनयनः शशिशेखरशोभितः२०
कपाले दृष्टिमावेश्य त्रिभिर्नेत्रैर्जनार्दनम्
अंगुल्या घटयन्प्राह कपालं परिपूरितम्२१
श्रुत्वा शिवस्य तां वाणीं विष्णुर्धारां समाहरत्
पश्तोऽथ हरेरीशः स्वांगुल्या रुधिरं तदा२२
दिव्यवर्षसहस्रं च दृष्टिपातैर्ममंथ सः
मथ्यमाने ततो रक्ते कलिलं बुद्बुदं क्रमात्२३
बभूव च ततः पश्चात्किरीटी सशरासनः
बद्धतूणीरयुगलो वृषस्कंधोङ्गुलित्रवान्२४
पुरुषो वह्निसंकाशः कपाले संप्रदृश्यते
तं दृष्ट्वा भगवान्विष्णुः प्राह रुद्रमिदं वचः२५
कपाले भव को वाऽयं प्रादुर्भूतोऽभवन्नरः
वचः श्रुत्वा हरेरीशस्तमुवाच विभो शृणु२६
नरो नामैष पुरुषः परमास्त्रविदां वरः
भवतोक्तो नर इति नरस्तस्माद्भविष्यति२७
नरनारायणौ चोभौ युगे ख्यातौ भविष्यतः
संग्रामे देवकार्येषु लोकानां परिपालने२८
एष नारायणसखो नरस्तस्माद्भविष्यति
अथासुरवधे साह्यं तव कर्ता महाद्युतिः२९
मुनिर्ज्ञानपरीक्षायां जेता लोके भविष्यति
तेजोधिकमिदं दिव्यं ब्रह्मणः पंचमं शिरः३०
तेजसो ब्रह्मणो दीप्ताद्भुजस्य तव शोणितात्
मम दृष्टि निपाताच्च त्रीणि तेजांसि यानि तु३१
तत्संयोगसमुत्पन्नः शत्रुं युद्धे विजेष्यति
अवध्या ये भविष्यंति दुर्जया अपि चापरे३२
शक्रस्य चामराणां च तेषामेष भयंकरः
एवमुक्त्वा स्थितः शंभुर्विस्मितश्च हरिस्तदा३३
कपालस्थः स तत्रैव तुष्टाव हरकेशवौ
शिरस्यंजलिमाधाय तदा वीर उदारधीः३४
किंकरोमीति तौ प्राह इत्युक्त्वा प्रणतः स्थितः
तमुवाच हरः श्रीमान्ब्रह्मणा स्वेन तेजसा३५
सृष्टो नरो धनुष्पाणिस्त्वमेनं तु निषूदय
इत्थमुक्त्वांजलिधरं स्तुवंतं शंकरो नरम्३६
तथैवांजलिसंबद्धं गृहीत्वा च करद्वयम्
उद्धृत्याथ कपालात्तं पुनर्वचनमब्रवीत्३७
स एष पुरुषो रौद्रो यो मया वेदितस्तव
विष्णुहुंकाररचितमोहनिद्रां प्रवेशितः३८
विबोधयैनं त्वरितमित्युक्त्वान्तर्दधे हरः
नारायणस्य प्रत्यक्षं नरेणानेन वै तदा३९
वामपादहतः सोपि समुत्तस्थौ महाबलः
ततो युद्धं समभवत्स्वेदरक्तजयोर्महत्४०
विस्फारितधनुः शब्दं नादिताशेषभूतलम्
कवचं स्वेदजस्यैकं रक्तजेन त्वपाकृतम्४१
एवं समेतयोर्युद्धे दिव्यं वर्षद्वयं तयोः
युध्यतोः समतीतं च स्वेदरक्तजयोर्नृप४२
रक्तजं द्विभुजं दृष्ट्वा स्वेदजं चैव संगतौ
विचिन्त्य वासुदेवोगाद्ब्रह्मणः सदनं परम्४३
ससंभ्रममुवाचेदं ब्रह्माणं मधुसूदनः
रक्तजेनाद्य भो ब्रह्मन्स्वेदजोयं निपातितः४४
श्रुत्वैतदाकुलो ब्रह्मा बभाषे मधुसूदनम्
हरे द्यजन्मनि नरो मदीयो जीवतादयम्४५
तथा तुष्टोऽब्रवीत्तं च विष्णुरेवं भविष्यति
गत्वा तयो रणमपि निवार्याऽऽह च तावुभौ४६
अन्यजन्मनि भविता कलिद्वापरयोर्मिथः
संधौ महारणे जाते तत्राहं योजयामि वां४७
विष्णुना तु समाहूय ग्रहेश्वरसुरेश्वरौ
उक्ताविमौ नरौ भद्रौ पालनीयौ ममाज्ञया४८
सहस्रांशो स्वेदजोयं स्वकीयोंऽशो धरातले
द्वापरांतेवतार्योयं देवानां कार्यसिद्धये४९
यदूनां तु कुले भावी शूरोनाम महाबलः
तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि५० 1.14.50
उत्पत्स्यति महाभागा देवानां कार्यसिद्धये
दुर्वासास्तु वरं तस्यै मंत्रग्रामं प्रदास्यति५१
मंत्रेणानेन यं देवं भक्त्या आवाहयिष्यति
देवि तस्य प्रसादात्तु तव पुत्रो भविष्यति५२
सा च त्वामुदये दृष्ट्वा साभिलाषा रजस्वला
चिंताभिपन्ना तिष्ठंती भजितव्या विभावसो५३
तस्या गर्भे त्वयं भावी कानीनः कुंतिनंदनः
भविष्यति सुतो देवदेवकार्यार्थसिद्धये५४
तथेति चोक्त्वा प्रोवाच तेजोराशिर्दिवाकरः
पुत्रमुत्पादयिष्यामि कानीनं बलगर्वितम्५५
यस्य कर्णेति वै नाम लोकः सर्वो वदिष्यति
मत्प्रसादादस्य विष्णो विप्राणां भावितात्मनः५६
अदेयं नास्ति वै लोके वस्तु किंचिच्च केशव
एवं प्रभावं चैवैनं जनये वचनात्तव५७
एवमुक्त्वा सहस्रांशुर्देवं दानवघातिनम्
नारायणं महात्मानं तत्रैवांतर्दधे रविः५८
अदर्शनं गते देवे भास्करे वारितस्करे
वृद्धश्रवसमप्येवमुवाच प्रीतमानसः५९
सहस्रनेत्ररक्तोत्थो नरोऽयं मदनुग्रहात्
स्वांशभूतो द्वापरांते योक्तव्यो भूतले त्वया६०
यदा पांडुर्महाभागः पृथां भार्यामवाप्स्यति
माद्रीं चापि महाभाग तदारण्यं गमिष्यति६१
तस्याप्यरण्यसंस्थस्य मृगः शापं प्रदास्यति
तेन चोत्पन्नवैराग्यः शतशृगं गमिष्यति६२
पुत्रानभीप्सन्क्षेत्रोत्थान्भार्यां स प्रवदिष्यति
अनीप्संती तदा कुंती भर्त्तारं सा वदिष्यति६३
नाहं मर्त्यस्य वै राजन्पुत्रानिच्छे कथंचन
दैवतेभ्यः प्रसादाच्च पुत्रानिच्छे नराधिप६४
प्रार्थयंत्यै त्वया शक्र कुंत्यै देयो नरस्ततः
वचसा च मदीयेन एवं कुरु शचीपते६५
अथाब्रवीत्तदा विष्णुं देवेशो दुःखितो वचः
अस्मिन्मन्वंतरेऽतीते चतुर्विंशतिके युगे६६
अवतीर्य रघुकुले गृहे दशरथस्य च
रावणस्य वधार्थाय शांत्यर्थं च दिवौकसाम्६७
रामरूपेण भवता सीतार्थमटता वने
मत्पुत्रो हिंसितो देव सूर्यपुत्रहितार्थिना६८
वालिनाम प्लवंगेंद्रः सुग्रीवार्थे त्वया यतः
दुःखेनानेन तप्तोहं गृह्णामि न सुतं नरम्६९
अगृह्णमानं देवेंद्रं कारणांतरवादिनम्
हरिः प्रोचे शुनासीरं भुवो भारावतारणे७०
अवतारं करिष्यामि मर्त्यलोके त्वहं प्रभो
सूर्यपुत्रस्य नाशार्थं जयार्थमात्मजस्य ते७१
सारथ्यं च करिष्यामि नाशं कुरुकुलस्य च
ततो हृष्टोभवच्छक्रो विष्णुवाक्येन तेन ह७२
प्रतिगृह्य नरं हृष्टः सत्यं चास्तु वचस्तव
एवमुक्त्वा वरं देवः प्रेषयित्वाऽच्युतः स्वयम्७३
गत्वा तु पुंडरीकाक्षो ब्रह्माणं प्राह वै पुनः
त्वया सृष्टमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्७४
आवां कार्यस्य करणे सहायौ च तव प्रभो
स्वयं कृत्वा पुनर्नाशं कर्तुं देव न बुध्यसे७५
कृतं जुगुप्सितं कर्म शंभुमेतं जिघांसता
त्वया च देवदेवस्य सृष्टः कोपेन वै पुमान्७६
शुद्ध्यर्थमस्य पापस्य प्रायश्चित्तं परं कुरु
गृह्णन्वह्नित्रयं देव अग्निहोत्रमुपाहर७७
पुण्यतीर्थे तथा देशे वने वापि पितामह
स्वपत्न्या सहितो यज्ञं कुरुष्वास्मत्परिग्रहात्७८
सर्वे देवास्तथादित्या रुद्राश्चापि जगत्पते
आदेशं ते करिष्यंति यतोस्माकं भवान्प्रभुः७९
एकोहि गार्हपत्योग्निर्दक्षिणाग्निर्द्वितीयकः
आहवनीयस्तृतीयस्तु त्रिकुंडेषु प्रकल्पय८०
वर्तुले त्वर्चयात्मानम्मामथो धनुराकृतौ
चतुःकोणे हरं देवं ऋग्यजुःसामनामभिः८१
अग्नीनुत्पाद्य तपसा परामृद्धिमवाप्य च
दिव्यं वर्षसहस्रं तु हुत्वाग्नीन्शमयिष्यसि८२
अग्निहोत्रात्परं नान्यत्पवित्रमिह पठ्यते
सुकृतेनाग्निहोत्रेण प्रशुद्ध्यंति भुवि द्विजाः८३
पंथानो देवलोकस्य ब्राह्मणैर्दशितास्त्वमी
एकोग्निः सर्वदा धार्यो गृहस्थेन द्विजन्मना८४
विनाग्निना द्विजेनेह गार्हस्थ्यन्न तु लभ्यते
भीष्म उवाच
योऽसौ कपालादुत्पन्नो नरो नाम धनुर्द्धरः८५
किमेष माधवाज्जात उताहो स्वेन कर्मणा
उत रुद्रेण जनितो ह्यथवा बुद्धिपूर्वकम्८६
ब्रह्मन्हिरण्यगर्भोऽयमंडजातश्चतुर्मुखः
अद्भुतं पञ्चमं तस्य वक्त्रं तत्कथमुत्थितम्८७
सत्वे रजो न दृश्येत न सत्वं रजसि क्वचित्
सत्वस्थो भगवान्ब्रह्मा कथमुद्रेकमादधात्८८
मूढात्मना नरो येन हंतुं हि प्रहितो हरं
पुलस्त्य उवाच
महेश्वरहरी चैतो द्वावेव सत्पथि स्थितौ८९
तयोरविदितं नास्ति सिद्धासिद्धं महात्मनोः
ब्रह्मणः पंचमं वक्त्रमूर्द्ध्वमासीन्महात्मनः९०
ततो ब्रह्माभवन्मूढो रजसा चोपबृंहितः
ततोऽयं तेजसा सृष्टिममन्यत मया कृता९१
मत्तोऽन्यो नास्ति वै देवो येन सृष्टिः प्रवर्तिता
सह देवाः सगंधर्वाः पशुपक्षिमृगाकुलाः९२
एवं मूढः स पंचास्यो विरिंचिरभवत्पुनः
प्राग्वक्त्रं मुखमेतस्य ऋग्वेदस्य प्रवर्तकम्९३
द्वितीयं वदनं तस्य यजुर्वेदप्रवर्तकम्
तृतीयं सामवेदस्य अथर्वार्थं चतुर्थकम्९४
सांगोपांगेतिहासांश्च सरहस्यान्ससंग्रहान्
वेदानधीते वक्त्रेण पंचमेनोर्द्ध्वचक्षुषा९५
तस्याऽसुरसुराः सर्वे वक्त्रस्याद्भुतवर्चसः
तेजसा न प्रकाशंते दीपाः सूर्योदये यथा९६
स्वपुरेष्वपि सोद्वेगा ह्यवर्तंत विचेतसः
न कंचिद्गणयेच्चान्यं तेजसा क्षिपते परान्९७
नाभिगंतु न च द्रष्टुं पुरस्तान्नोपसर्पितुम्
शेकुस्त्रस्ताः सुरास्सर्वे पद्मयोनिं महाप्रभुम्९८
अभिभूतमिवात्मानं मन्यमाना हतत्विषः
सर्वे ते मंत्रयामासुर्दैवता हितमात्मनः९९
गच्छामः शरणं शंभुं निस्तेजसोऽस्य तेजसा
देवा ऊचुः
नमस्तेसर्वसत्वेश महेश्वर नमोनमः१०० 1.14.100
जगद्योने परंब्रह्म भूतानां त्वं सनातनः
प्रतिष्ठा सर्वजगतां त्वं हेतुर्विष्णुना सह१०१
एवं संस्तूयमानोसौ देवर्षिपितृदानवैः
अंतर्हित उवाचेदं देवाः प्रार्थयतेप्सितम्१०२
देवा ऊचुः
प्रत्यक्षदर्शनं दत्वा देहि देव यथेप्सितम्
कृत्वा कारुण्यमस्माकं वरश्चापि प्रदीयताम्१०३
यदस्माकं महद्वीर्यं तेज ओजः पराक्रमः
तत्सर्वं ब्रह्मणा ग्रस्तं पंचमास्यस्य तेजसा१०४
विनेशुः सर्वतेजांसि त्वत्प्रसादात्पुनः प्रभो
जायते तु यथापूर्वं तथा कुरु महेश्वर१०५
ततः प्रसन्नवदनो देवैश्चापि नमस्कृतः
जगाम यत्र ब्रह्माऽसौ रजोहंकारमूढधीः१०६
स्तुवंतो देवदेवेशं परिवार्य समाविशन्
ब्रह्मा तमागतं रुद्रं न जज्ञे रजसावृतः१०७
सूर्यकोटिसहस्राणां तेजसा रंजयन्जगत्
तदादृश्यत विश्वात्मा विश्वसृग्विश्वभावनः१०८
सपितामहमासीनं सकलं देवमंडलम्
अभिगम्य ततो रुद्रो ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्१०९
अहोतितेजसा वक्त्रमधिकं देव राजते
एवमुक्त्वाट्टहासं तु मुमोच शशिशेखरः११०
वामांगुष्ठनखाग्रेण ब्रह्मणः पंचमं शिरः
चकर्त कदलीगर्भं नरः कररुहैरिव१११
विच्छिन्नं तु शिरः पश्चाद्भवहस्ते स्थितं तदा
ग्रहमंडलमध्यस्थो द्वितीय इव चंद्रमाः११२
करोत्क्षिप्तकपालेन ननर्त च महेश्वरः
शिखरस्थेन सूर्येण कैलास इव पर्वतः११३
छिन्ने वक्त्रे ततो देवा हृष्टास्तं वृषभध्वजम्
तुष्टुवुर्विविधैस्तोत्रैर्देवदेवं कपर्दिनम्११४
देवा ऊचुः
नमः कपालिने नित्यं महाकालस्य कालिने
ऐश्वर्यज्ञानयुक्ताय सर्वभागप्रदायिने११५
नमो हर्षविलासाय सर्वदेवमयाय च
कलौ संहारकर्ता त्वं महाकालः स्मृतो ह्यसि११६
भक्तानामार्तिनाशस्त्वं दुःखांतस्तेन चोच्यसे
शंकरोष्याशुभक्तानां तेन त्वं शंकरः स्मृतः११७
छिन्नं ब्रह्मशिरो यस्मात्त्वं कपालं बिभर्षि च
तेन देव कपाली त्वं स्तुतो ह्यद्य प्रसीद नः११८
एवं स्तुतः प्रसन्नात्मा देवान्प्रस्थाप्य शंकरः
स्वानि धिष्ण्यानि भगवांस्तत्रैवासीन्मुदान्वितः११९
विज्ञाय ब्रह्मणो भावं ततो वीरस्य जन्म च
शिरो नीरस्य वाक्यात्तु लोकानां कोपशांतये१२०
शिरस्यंजलिमाधाय तुष्टावाथ प्रणम्य तम्
तेजोनिधि परं ब्रह्म ज्ञातुमित्थं प्रजापतिम्१२१
निरुक्तसूक्तरहस्यैर्ऋग्यजुः सामभाषितैः
रुद्र उवाच
अप्रमेय नमस्तेस्तु परमस्य परात्मने१२२
अद्भुतानां प्रसूतिस्त्वं तेजसां निधिरक्षयः
विजयाद्विश्वभावस्त्वं सृष्टिकर्ता महाद्युते१२३
ऊर्द्ध्ववक्त्र नमस्तेस्तु सत्वात्मकधरात्मक
जलशायिन्जलोत्पन्न जलालय नमोस्तु ते१२४
जलजोत्फुल्लपत्राक्ष जय देव पितामह
त्वया ह्युत्पादितः पूर्वं सृष्ट्यर्थमहमीश्वर१२५
यज्ञाहुतिसदाहार यज्ञांगेश नमोऽस्तु ते
स्वर्णगर्भ पद्मगर्भ देवगर्भ प्रजापते१२६
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारः स्वधा त्वं पद्मसंभव
वचनेन तु देवानां शिरश्छिन्नं मया प्रभो१२७
ब्रह्महत्याभिभूतोस्मि मां त्वं पाहि जगत्पते
इत्युक्तो देवदेवेन ब्रह्मा वचनमब्रवीत्१२८
ब्रह्मोवाच
सखा नाराणो देवः स त्वां पूतं करिष्यति
कीर्तनीयस्त्वया धन्यः स मे पूज्यः स्वयं विभुः१२९
अनुध्यातोऽसि वै नूनं तेन देवेन विष्णुना
येन ते भक्तिरुत्पन्ना स्तोतुं मां मतिरुत्थिता१३०
शिरश्छेदात्कपाली त्वं सोमसिद्धांतकारकः
कोटीः शतं च विप्राणामुद्धर्तासि महाद्युते१३१
ब्रह्महत्याव्रतं कुर्या नान्यत्किंचन विद्यते
अभाष्याः पापिनः क्रूरा ब्रह्मघ्नाः पापकारिणः१३२
वैतानिका विकर्मस्था न ते भाष्याः कथंचन
तैस्तु दृष्टैस्तथा कार्यं भास्करस्यावलोकनम्१३३
अंगस्पर्शे कृते रुद्र सचैलो जलमाविशेत्
एवं शुद्धिमवाप्नोति पूर्वं दृष्टां मनीषिभिः१३४
स भवान्ब्रह्महन्तासि शुद्ध्यर्थं व्रतमाचर
चीर्णे व्रते पुनर्भूयः प्राप्स्यसि त्वं वरान्बहून्१३५
एवमुक्त्वा गतो ब्रह्मा रुद्रस्तन्नाभिजज्ञिवान्
अचिंतयत्तदाविष्णुं ध्यानगत्या ततः स्वयं१३६
लक्ष्मीसहायं वरदं देवदेवं सनातनम्
अष्टांगप्रणिपातेन देवदेवस्त्रिलोचनः१३७
तुष्टाव प्रणतो भूत्वा शंखचक्रगदाधरम्
रुद्र उवाच
परं पराणाममृतं पुराणं परात्परं विष्णुमनंतवीर्यं१३८
स्मरामि नित्यं पुरुषं वरेण्यं नारायणं निष्प्रतिमं पुराणम्
परात्परं पूर्वजमुग्रवेगं गंभीरगंभीरधियां प्रधानम्१३९
नतोस्मि देवं हरिमीशितारं परात्परं धामपरं च धाम
परापरं तत्परमं च धाम परापरेशं पुरुषं विशालम्१४०
नारायणं स्तौमि विशुद्धभावं परापरं सूक्ष्ममिदं ससर्ज
सदास्थितत्वात्पुरुषप्रधानं शांतं प्रधानं शरणं ममास्तु१४१
नारायणं वीतमलं पुराणं परात्परं विष्णुमपारपारम्
पुरातनं नीतिमतां प्रधानं धृतिक्षमाशांतिपरं क्षितीशम्१४२
शुभं सदा स्तौमि महानुभावं सहस्रमूर्द्धानमनेकपादम्
अनंतबाहुं शशिसूर्यनेत्रं क्षराक्षरं क्षीरसमुद्रनिद्रम्१४३
नारायणं स्तौमि परं परेशं परात्परं यत्त्रिदशैरगम्यम्
त्रिसर्गसंस्थं त्रिहुताशनेत्रं त्रितत्वलक्ष्यं त्रिलयं त्रिनेत्रम्१४४
नमामि नारायणमप्रमेयं कृते सितं द्वापरतश्च रक्तम्
कलौ च कृष्णं तमथो नमामि ससर्ज यो वक्त्रत एव विप्रान्१४५
भुजांतरात्क्षत्रमथोरुयुग्माद्विशः पदाग्राच्च तथैव शूद्रान्
नमामि तं विश्वतनुं पुराणं परात्परं पारगमप्रमेयम्१४६
सूक्ष्ममूर्त्तिं महामूर्त्तिं विद्यामूर्त्तिममूर्तिकम्
कवचं सर्वदेवानां नमस्ये वारिजेक्षणम्१४७
सहस्रशीर्षं देवेशं सहस्राक्षं महाभुजम्
जगत्संव्याप्य तिष्ठंतं नमस्ये परमेश्वरम्१४८
शरण्यं शरणं देवं विष्णुं जिष्णुं सनातनम्
नीलमेघप्रतीकाशं नमस्ये शार्ङ्गपाणिनम्१४९
शुद्धं सर्वगतं नित्यं व्योमरूपं सनातनम्
भावाभावविनिर्मुक्तं नमस्ये सर्वगं हरिम्१५० 1.14.150
न चात्र किंचित्पश्यामि व्यतिरिक्तं तवाच्युत
त्वन्मयं च प्रपश्यामि सर्वमेतच्चराचरम्१५१
एवं तु वदतस्तस्य रुद्रस्य परमेष्ठिनः
इतीरितेस्तेन सनातन स्वयं परात्परस्तस्य बभूव दर्शने१५२
रथांगपाणिर्गरुडासनो गिरिं विदीपयन्भास्करवत्समुत्थितः
वरं वृणीष्वेति सनातनोब्रवीद्वरस्तवाहं वरदः समागतः१५३
इतीरिते रुद्रवरो जगाद ममातिशुद्धिर्भविता सुरेश
न चास्य पापस्य हरं हि चान्यत्संदृश्यतेग्र्यं च ऋते भवं तम्१५४
ब्रह्महत्याभिभूतस्य तनुर्मे कृष्णतां गता
शवगंधश्च मे गात्रे लोहस्याभरणानि मे१५५
कथं मे न भवेदेवमेतद्रूपं जनार्दनम्
किं करोमि महादेव येन मे पूर्विका तनूः१५६
त्वत्प्रसादेन भविता तन्मे कथय चाच्युत
विष्णुरुवाच
ब्रह्मवध्या परा चोग्रा सर्वकष्टप्रदा परा१५७
मनसापि न कुर्वीत पापस्यास्य तु भावनाम्
भवता देववाक्येन निष्ठा चैषा निबोधिता१५८
इदानीं त्वं महाबाहो ब्रह्मणोक्तं समाचर
भस्मसर्वाणि गात्राणि त्रिकालं घर्षयेस्तनौ१५९
शिखायां कर्णयोश्चैव करे चास्थीनि धारय
एवं च कुर्वतो रुद्र कष्टं नैव भविष्यति१६०
संदिश्यैवं स भगवांस्ततोंऽतर्द्धानमीश्वरः
लक्ष्मीसहायो गतवान्रुद्रस्तं नाभिजज्ञिवान्१६१
कपालपाणिर्देवेशः पर्यटन्वसुधामिमाम्
हिमवंतं समैनाकं मेरुणा च सहैव तु१६२
कैलासं सकलं विंध्यं नीलं चैव महागिरिम्
कांचीं काशीं ताम्रलिप्तां मगधामाविलां तथा१६३
वत्सगुल्मं च गोकर्णं तथा चैवोत्तरान्कुरून्
भद्राश्वं केतुमालं च वर्षं हैरण्यकं तथा१६४
कामरूपं प्रभासं च महेंद्रं चैव पर्वतम्
ब्रह्महत्याभिभूतोसौ भ्रमंस्त्राणं न विंदति१६५
त्रपान्वितः कपालं तु पश्यन्हस्तगतं सदा
करौ विधुन्वन्बहुशो विक्षिप्तश्च मुहुर्मुहुः१६६
यदास्य धुन्वतो हस्तौ कपालं पतते न तु
तदास्य बुद्धिरुत्पन्ना व्रतं चैतत्करोम्यहम्१६७
मदीयेनैव मार्गेण द्विजा यास्यंति सर्वतः
ध्यात्वैवं सुचिरं देवो वसुधां विचचार ह१६८
पुष्करं तु समासाद्य प्रविष्टोऽरण्यमुत्तमम्
नानाद्रुमलताकीर्णं नानामृगरवाकुलम्१६९
द्रुमपुष्पभरामोद वासितं यत्सुवायुना
बुद्धिपूर्वमिव न्यस्तैः पुष्पैर्भूषितभूतलम्१७०
नानागधंरसैरन्यैः पक्वापक्वैः फलैस्तथा
विवेश तरुवृंदेन पुष्पामोदाभिनंदितः१७१
अत्राराधयतो भक्त्या ब्रह्मा दास्यति मे वरम्
ब्रह्मप्रसादात्संप्राप्तं पौष्करं ज्ञानमीप्सितम्१७२
पापघ्नं दुष्टशमनं पुष्टिश्रीबलवर्द्धनम्
एवं वै ध्यायतस्तस्य रुद्रस्यामिततेजसः१७३
आजगाम ततो ब्रह्मा भक्तिप्रीतोऽथ कंजजः
उवाच प्रणतं रुद्रमुत्थाप्य च पुनर्गुरुः१७४
दिव्यव्रतोपचारेण सोहमाराधितस्त्वया
भवता श्रद्धयात्यर्थं ममदर्शनकांक्षया१७५
व्रतस्था मां हि पश्यंति मनुष्या देवतास्तथा
तदिच्छया प्रयच्छामि वरं यत्प्रवरं वरम्१७६
सर्वकामप्रसिद्ध्यर्थं व्रतं यस्मान्निषेवितम्
मनोवाक्कायभावैश्च संतुष्टेनांतरात्मना१७७
कं ददामि च वै कामं वद भोस्ते यथेप्सितम्
रुद्र उवाच
एष एवाद्य भगवन्सुपर्याप्तो महा वरः१७८
यद्दृष्टोसि जगद्वंद्य जगत्कर्तर्नमोस्तुते
महता यज्ञसाध्येन बहुकालार्जितेन च१७९
प्राणव्ययकरेण त्वं तपसा देव दृश्यते
इदं कपालं देवेश न करात्पतितं विभो१८०
त्रपाकरा ऋषीणां च चर्यैषा कुत्सिता विभो
त्वत्प्रसादाद्व्रतं चेदं कृतं कापालिकं तु यत्१८१
सिद्धमेतत्प्रपन्नस्य महाव्रतमिहोच्यताम्
पुण्यप्रदेशे यस्मिंस्तु क्षिपामीदं वदस्व मे१८२
पूतो भवामि येनाहं मुनीनां भावितात्मनाम्
ब्रह्मोवाच
अविमुक्तं भगवतः स्थानमस्ति पुरातनम्१८३
कपालमोचनं तीर्थं तव तत्र भविष्यति
अहं च त्वं स्थितस्तत्र विष्णुश्चापि भविष्यति१८४
दर्शने भवतस्तत्र महापातकिनोपि ये
तेपि भोगान्समश्नंति विशुद्धा भवने मम१८५
वरणापि असीचापि द्वे नद्यौ सुरवल्लभे
अंतराले तयोः क्षेत्रे वध्या न विशति क्वचित्१८६
तीर्थानां प्रवरं तीर्थं क्षेत्राणां प्रवरं तव
आदेहपतनाद्ये तु क्षेत्रं सेवंति मानवाः१८७
ते मृता हंसयानेन दिवं यांत्यकुतोभयाः
पंचक्रोशप्रमाणेन क्षेत्रं दत्तं मया तव१८८
क्षेत्रमध्याद्यदा गंगा गमिष्यति सरित्पतिम्
तदा सा महती पुण्या पुरी रुद्र भविष्यति१८९
पुण्या चोदङ्मुखी गंगा प्राची चापि सरस्वती
उदङ्मुखी योजने द्वे गच्छते जाह्नवी नदी१९०
तत्र वै विबुधाः सर्वे मया सह सवासवाः
आगता वासमेष्यंति कपालं तत्र मोचय१९१
तस्मिंस्तीर्थे तु ये गत्वा पिण्डदानेन वै पितॄन्
श्राद्धैस्तु प्रीणयिष्यंति तेषां लोकोऽक्षयो दिवि१९२
वाराणस्यां महातीर्थे नरः स्नातो विमुच्यते
सप्तजन्मकृतात्पापाद्गमनादेव मुच्यते१९३
तत्तीर्थं सर्वतीर्थानामुत्तमं परिकीर्तितम्
त्यजंति तत्र ये प्राणान्प्राणिनः प्रणतास्तव१९४
रुद्रत्वं ते समासाद्य मोदंते भवता सह
तत्रापि हि तु यद्दत्तं दानं रुद्र यतात्मना१९५
स्यान्महच्च फलं तस्य भविता भावितात्मनः
स्वांगस्फुटित संस्कारं तत्र कुर्वंति ये नराः१९६
ते रुद्रलोकमासाद्य मोदंते सुखिनः सदा
तत्र पूजा जपो होमः कृतो भवति देहिनां१९७
अनंतफलदः स्वर्गो रुद्रभक्तियुतात्मनः
तत्र दीपप्रदाने तु ज्ञानचक्षुर्भवेन्नरः१९८
अव्यंगं तरुणं सौम्यं रूपवंतं तु गोसुतम्
योङ्कयित्वा मोचयति स याति परमं पदम्१९९
पितृभिः सहितो मोक्षं गच्छते नात्र संशयः
अथ किं बहुनोक्तेन यत्तत्र क्रियते नरैः२०० 1.14.200
कर्मधर्मं समुद्दिश्य तदनंतफलं भवेत्
स्वर्गापवर्गयोर्हेतुस्तद्धि तीर्थम्मतं भुवि२०१
स्नानाज्जपात्तथा होमादनंतफलसाधनम्
गत्वा वाराणसीतीर्थं भक्त्या रुद्रपरायणाः२०२
ये तत्र पंचतां प्राप्ता भक्तास्ते नात्र संशयः
वसवः पितरो ज्ञेया रुद्राश्चैव पितामहाः२०३
प्रपितामहास्तथादित्या इत्येषा वैदिकी श्रुतिः
त्रिविधः पिंडदानाय विधिरुक्तो मयानघ२०४
मानुषैः पिंडादानं तु कार्यमत्रागतैस्सदा
पिंडदानं च तत्रैव स्वपुत्रैः कार्यमादरात्२०५
सुपुत्रास्ते पितॄणां तु भवंति सुखदायकाः
प्रोक्तं तीर्थं मया तुभ्यं दर्शनादपि मुक्तिदम्२०६
स्नात्वा तु सलिले तत्र मुच्यते जन्मबंधनात्
विमुक्तो ब्रह्महत्यायास्तत्र रुद्र यथासुखम्२०७
अविमुक्ते मया दत्ते तिष्ठ त्वं भार्यया सह
रुद्र उवाच
पृथिव्यां यानि तीर्थानि तेष्वहं विष्णुना सह२०८
तिष्ठामि भवतोक्तेन वर एष वृतो मया
अहं देवो महादेव आराध्यो भवता सदा२०९
वरं दास्यामि ते चाहं संतुष्टेनांतरात्मना
विष्णोश्चाहं प्रदास्यामि वरांश्च मनसीप्सितान्२१०
सुराणां चैव सर्वेषां मुनीनां भवितात्मनाम्
अहं दाता अहं याच्यो नान्यो भाव्यः कथंचन२११
ब्रह्मोवाच
एवं करिष्येहं रुद्र यत्वयोक्तं वचः शुभम्
नारायणश्च ते वाक्यं कर्ता सर्वं न संशयः२१२
विसृज्यैवं तदा रुद्रं ब्रह्मा चांतरधीयत
वाराणस्यां महादेवो गत्वा तीर्थं न्यवेशयत्२१३
इति श्रीपाद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे रुद्रस्य ब्रह्मवध्यानाशश्चतुर्दशोऽध्यायः१४

यह पृष्ठ रुद्र द्वारा ब्रह्मा के सिर को काटने का वर्णन करता है, जो कि सबसे बड़े महापुराणों में से एक, पद्म पुराण के अंग्रेजी अनुवाद का अध्याय 14 है, जिसमें प्राचीन भारतीय समाज, परंपराओं, भूगोल, साथ ही धार्मिक तीर्थस्थलों ( यात्रा ) का विवरण दिया गया है। ( तीर्थ )। यह पद्म पुराण के सृष्टि-खंड (सृजन पर खंड) का चौदहवां अध्याय है, जिसमें कुल छह पुस्तकें हैं जिनमें कम से कम 50,000 संस्कृत छंद हैं।

अध्याय 14 - रुद्र द्वारा ब्रह्मा का सिर काटना

इस अध्याय के लिए संस्कृत पाठ उपलब्ध है ]

भीम ने कहा :

1-2. मुझे बताओ कि कैसे वीर शत्रुओं के हत्यारे अर्जुन का जन्म त्रिपुरूष से हुआ था; फिर कैसे, अविवाहित स्त्री के पुत्र कर्ण को सारथी से उत्पन्न होने के रूप में जाना जाता है; कैसे बढ़ी दोनों के बीच दुश्मनी बड़ी उत्सुकता है मेरी; तो कृपया मुझे वह बताओ।

पुलस्त्य ने कहा :

3-4. पूर्व में जब उनका चेहरा फटा हुआ था, ब्रह्मा ने बड़े क्रोध से अभिभूत होकर, उनके माथे पर उत्पन्न पसीने को उठाकर जमीन पर मारा; उस पसीने से एक वीर वीर, जिसके पास अंगूठियां, बाण और एक बड़ा धनुष और एक हजार शस्त्र हैं, पैदा हुआ और उसने कहा: "मैं क्या करूँ?"

5. पॉइंटिंग, उत्साह के साथ, करने के लिए रुद्र , ब्रह्मा ने उससे कहा: "को मार डालो इस दुष्ट दिमाग एक इतना है कि वह फिर से जन्म नहीं किया जाएगा।"

6. ब्रह्मा की बात सुनकर और महेष के पीछे से धनुष उठाकर हाथ में बाण लिए और अत्यन्त क्रोधित नेत्रों से उसे मारने लगे।

7-8. उस भयानक आदमी को देखकर रुद्र भयभीत होकर वहां से तेजी से चला गया और विष्णु के आश्रम में पहुंच गया । "हे विष्णु, शत्रुओं के हत्यारे, मुझे इस आदमी से बचाओ; म्लेच्छ के रूप का यह भयानक पापी ब्रह्मा द्वारा बनाया गया है। हे जगत् के स्वामी, ऐसा कर्म करो कि वह क्रोधी मनुष्य मुझे न मार डाले।”

9-11. भगवान विष्णु, सभी प्राणियों के लिए अदृश्य (फिर भी) सब कुछ देखकर और जादुई शक्तियों से युक्त होकर उस आदमी को बहकाया , वहां आए विरुपाक्ष (यानी रुद्र) को छुपाया । भगवान विष्णु ने उसे देखा जो (विष्णु के सामने) जमीन पर झुक गया था।

विष्णु ने उससे कहा :

हे रुद्र, तुम मेरे पोते हो, मुझे बताओ कि तुम्हारी कौन सी इच्छा पूरी करनी चाहिए?

१२. भगवान विष्णु को देखकर और बहुत तेज चमकते हुए और उनकी (भीख) खोपड़ी की ओर इशारा करते हुए, उन्होंने कहा, "मुझे भीख दो"।

१३. हाथ में खोपड़ी के साथ रुद्र को देखकर विष्णु ने सोचा: 'अब भिक्षा देने के लिए और कौन (आपके अलावा) उचित होगा?'

14. यह सोचकर कि 'यह ठीक है' उसने उसे अपना दाहिना हाथ दे दिया। शिव ने उसे अपने तेज त्रिशूल से काट दिया।

15. तब यहोवा की भुजा से आग की ज्वाला से निकले हुए द्रव्य के समान लोहू की धारा बह निकली।

16. और वह खोपड़ी में से गिरा, और शंभू ने उस से बिनती की; वह सीधा, मजबूत था और गति से आकाश को छूता था।

17. विष्णु की भुजा से यह एक हजार वर्ष तक बहती थी और पचपन योजन लंबी थी और इसका विस्तार दस योजन था।

18. भगवान, भिखारी ने इतनी (लंबी) अवधि के लिए भिक्षा प्राप्त की। यह नारायण द्वारा एक उत्कृष्ट (भीख) खोपड़ी में दिया गया था (अर्थात रखा गया) ।

19. तब नारायण ने उस महान शंभु (अर्थात रुद्र) से ये शब्द कहे:

20-21. “Is the pot filled or not?” Then the great lord, hearing Viṣṇu’s words resembling the thundering of clouds, having eyes like the moon and the sun and adorned with the (crescent) moon on his head, fixing (all his) three eyes on the skull, and reaching it said to Janārdana: “The skull is full.”

22-24. Hearing those words of Śiva, Viṣṇu withdrew the stream. When Hari was observing, the lord (i. e. Rudra) churned (stirred) that blood with his finger and his glances for a thousand divine years. When the blood was (thus) churned (stirred), it gradually became first a mass, then a bubble and after that a man with a crown (on his head), with a bow, having bull-like (i.e. strong) shoulders, with two quivers tied to his back, with a finger-protector, appearing like fire, in the skull.

25. उसे देखकर भगवान विष्णु ने रुद्र से ये शब्द कहे:

26-27. "हे भव , यह कौन है ( नर ) जो उछला है?

खोपड़ी में ऊपर?" विष्णु के (इन) शब्दों को सुनकर, शिव ने उससे कहा: "हे भगवान, सुनो; यह नारा नाम का व्यक्ति है, जो महान मिसाइलों को (उपयोग) जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ है। आपने उसे नर कहा, तो वह (कहा जाएगा) नर।

28-30. नर और नारायण दोनों ही युग में और युद्धों में, देवताओं की मदद करने और लोगों की सुरक्षा में प्रसिद्ध होंगे। इसलिए, यह नर नारायण का मित्र होगा । यह महान चमक राक्षसों को मारने में आपकी मदद करेगी; वह ज्ञान की परीक्षा लेने वाला साधु और संसार में विजेता होगा। यह श्रेष्ठ चमक वाला ब्रह्मा का पांचवां सिर है।

31-33. ब्रह्मा की प्रज्वलित चमक और मेरे द्वारा डाली गई दृष्टि से उत्पन्न तीन चमकों के संयोजन से जन्मे, वह युद्ध में शत्रु पर विजय प्राप्त करेंगे। वह उन लोगों के लिए भयानक होगा जिन्हें इंद्र और (अन्य) देवताओं द्वारा नहीं मारा जा सकता है और उन अन्य लोगों के लिए भी जो इंद्र और (अन्य) देवताओं के लिए अजेय होंगे।

इतना कह कर शंभू फिर खड़ा हो गया और हरि भी अचंभित रह गया।

34-37. खोपड़ी में शेष (पुरुष) ने शिव और विष्णु की प्रशंसा की। उदार मन के नायक ने अपनी हथेलियों को आपस में जोड़कर अपने सिर पर उठाकर उनसे कहा: "मुझे क्या करना चाहिए?" इतना कहकर वह उनके सामने झुके (अर्थात विनम्र) रहे। गौरवशाली हारा ने उससे कहा: "ब्रह्मा ने अपनी चमक से हाथ में धनुष लेकर एक आदमी बनाया है। तुम उसे मार डालो"। शंकर ने इस प्रकार बोलते हुए, उस व्यक्ति के दोनों हाथों को, जो उस तरह से सन्तुष्ट थे, पकड़े हुए, और उसकी स्तुति करने वाले व्यक्ति को खोपड़ी से उठाकर फिर से ये शब्द कहे:

38-39. "यह वही भयानक आदमी है जिसके बारे में मैंने तुमसे कहा था, उसे सुलाया गया है। उसे जल्दी से जगाओ।" इतना कहकर हारा गायब हो गया। फिर नारायण की उपस्थिति में, नर द्वारा बाएं पैर से मारा गया शक्तिशाली व्यक्ति उठ खड़ा हुआ।

40-41. फिर (ब्रह्मा के) पसीने और (विष्णु) के रक्त से पैदा हुए दोनों के बीच एक महान युद्ध हुआ, जिसमें विस्तारित धनुष की ध्वनि (सभी जगह) फैल गई और पूरी पृथ्वी ध्वनि (युद्ध की) से गूंज उठी।

(विष्णु के) रक्त (अर्थात् नर) से जन्म लेने वाले ने पसीने से जन्मे व्यक्ति का कवच उतार दिया।

42-43। हे राजा, कुछ दिव्य वर्ष बीत गए जब दोनों इस प्रकार युद्ध में मिले और लड़े। (विष्णु के) रक्त से पैदा हुए दो हाथ वाले और (ब्रह्मा के) पसीने से पैदा हुए को देखकर (एक दूसरे) विष्णु का सामना करने के बाद, विचार करने के बाद, ब्रह्मा के महान निवास में चले गए।

44-46. मधुसूदन (अर्थात् विष्णु) ने, अलार्म में, ब्रह्मा से ये शब्द बोले: "हे ब्राह्मण , जो (आपके) पसीने से पैदा हुआ था, उसे आज (मेरे) रक्त से पैदा हुआ था।"

यह सुनकर ब्रह्मा जो व्यथित हो गए, ने मधुसूदन से कहा:

"हे हरि, इस मेरे आदमी को (फिर से) इस अस्तित्व में रहने दो।"

विष्णु ने प्रसन्न होकर कहा: "ऐसा ही होगा।"

४७. उनके युद्ध के मैदान में जाकर उन्हें भगाते हुए उन्होंने उन दोनों से कहा: " कलि और द्वापर युग के बीच की अवधि में, आपके अगले जन्म में (युद्ध) होगा; जब बड़ा युद्ध होगा तब मैं तुम दोनों को (लड़ाई के लिये) साथ लाऊंगा।”

48. विष्णु ने ग्रहों के स्वामी और देवताओं के स्वामी को बुलाकर उनसे कहा: "मेरी आज्ञा से इन दो अच्छे लोगों की रक्षा तुम्हारे द्वारा की जानी चाहिए।

49. हे सूर्य (हजार किरणों वाला), यह (ब्रह्मा के) पसीने से पैदा हुआ है, देवताओं की सफलता के लिए द्वापर (युग) के अंत में आपके हिस्से के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होना है।

५०. यदुओं के परिवार में बहुत पराक्रमी श्रृंग का जन्म होगा ।

51. उसकी महिमामयी पुत्री पीठा , जो पृथ्वी पर अतुलनीय है, देवताओं की सफलता के लिए पैदा होगी; और दुर्वासा उसे एक वरदान और मंत्रों का एक समूह प्रदान करेंगे:

52. 'वह (अर्थात् आप) जिस भी देवता का आह्वान करेंगे, उस देवता की कृपा से, हे आदरणीय महिला, आपको एक पुत्र की प्राप्ति होगी'।

53. हे सूर्य, वह अपने मासिक धर्म के दौरान आपको उठते हुए देखेगी; जब वह (इस प्रकार) चिंता से पीड़ित हो तो आपको उसका आनंद लेना चाहिए।

५४. देवताओं की सफलता के लिए उसके यानी कुंती के गर्भ में वह (गर्भवती और) एक अविवाहित महिला के पुत्र के रूप में पैदा होगा, हे प्रभु।

55. सूर्य, चमक का ढेर "ठीक है" कह रहा है (आगे): "युवती पर मैं एक पुत्र उत्पन्न करूंगा जो अपनी शक्ति पर गर्व करेगा।

56. और सभी लोग उसे कर्ण के नाम से संबोधित करेंगे। हे विष्णु, संसार में मेरी कृपा के कारण उसके पास शुद्ध आत्मा का कुछ भी नहीं होगा, जो ब्राह्मणों को नहीं दिया जाएगा , हे केशव ।

57. तेरे निर्देश से मैं उसको ऐसा ही पराक्रम उत्पन्‍न करूंगा।'

५८. इस प्रकार दानवों के संहारक महादेव नारायण को संबोधित करने के बाद, सूर्य वहीं गायब हो गया।

59. जब सूर्य देव, बादलों के डाकू, प्रकट हुए (विष्णु) ने अपने मन की प्रसन्नता से इंद्र से भी कहा:

६०. “हे इंद्र, यह नारा (मेरे) रक्त से मेरी कृपा से उत्पन्न हुआ है और जो मेरा एक हिस्सा है, उसे द्वापर के अंत में पृथ्वी पर आपके द्वारा रखा जाना चाहिए ।

६१. हे महानुभाव , जब पाण्डु पीठा को अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त करेगा और इसी तरह माद्री भी वह वन में जाएगा।

62. जब वह जंगल में होगा तब हिरन उसे शाप देगा; उसके द्वारा उत्पन्न घृणा के साथ वह शटंग में जाएगा ।

63. अपनी पत्नी से (दूसरे के द्वारा) पुत्र पैदा करने की इच्छा से वह उससे (ऐसा) कहेगा। तब कुंती अनिच्छुक (ऐसा करने के लिए) अपने पति (अर्थात पांडु) से कहेगी:

64. 'हे राजा, मैं नश्वर से पुत्रों की इच्छा बिल्कुल नहीं करता। हे राजा, मैं देवताओं से उनकी कृपा से पुत्र चाहता हूं।'

65. हे शंकर, तो तुम्हें नर को कुन्ती के सामने प्रस्तुत करना चाहिए जो आपसे विनती करेगा। हे प्रभु की SACI , मेरी दिशा से ऐसा करते हैं। "

66-72. तब देवताओं के दुखी प्रभु ने कहा कि (ये) विष्णु के शब्द: "जब की इस अवधि के मनु , गुजरता चौबीसवां युग आप में तो, (यानी पैदा किया जा रहा) के रूप में उतरते राम में रघु 'में, परिवार दशरथ के घर' रावण को मारने के लिए और देवताओं को शांति देने के लिए, (जबकि) सीता के लिए जंगल में घूमते हुए , सूर्य के पुत्र की भलाई के लिए, (होगा) मेरे पुत्र, वालिन को मार डाला, बंदरों का मुखिया। इस दु:ख से त्रस्त होकर मैं उस पुत्र को स्वीकार नहीं करूंगा। नारा।" देवताओं के स्वामी इंद्र से, जिन्होंने नर को स्वीकार नहीं किया और कोई अन्य कारण बताते हुए, विष्णु ने पृथ्वी का बोझ उतारने के लिए कहा: "हे भगवान, मैं सूर्य के पुत्र को नष्ट करने के लिए नश्वर संसार में अवतार लूंगा और तुम्हारे लिए बेटे की सफलता। मैं भी (अर्जुन के) सारथी के रूप में कार्य करूंगा और कुरु- परिवार का विनाश करूंगा।"

73. तब विष्णु के इन शब्दों से नर को स्वीकार करने वाले शकर प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर उसने (कहा) : “तेरी बातें सच हों।” भगवान विष्णु ने स्वयं इस प्रकार वरदान देकर (इंद्र को) भेजा और ब्रह्मा के पास जाकर कमल-नेत्र (अर्थात विष्णु) ने फिर उससे कहा:

74-85. "आपने चल और अचल तीनों लोकों का निर्माण किया है। हे प्रभु, हम दोनों आपकी (आपकी) नौकरी के निष्पादन में मदद करेंगे। हे प्रभु, आपको यह एहसास नहीं है कि आप (संसार) को स्वयं बनाने के बाद नष्ट कर रहे हैं। इस शंभू को मारने की इच्छा से, आपने निंदनीय कार्य किया है। भगवान (शिव) के लिए आपके क्रोध के कारण आपने मनुष्य को बनाया है। आपको इस पाप से मुक्त करने के लिए महान प्रायश्चित करें। हे भगवान, तीनों अग्नि को स्वीकार करते हुए , किसी पवित्र स्थान पर या किसी पवित्र क्षेत्र या जंगल में अग्नि को अर्पण करें । हे पितामह , अपनी पत्नी के साथ हमारे संरक्षण में यज्ञ करो । हे लोकों के स्वामी, सभी देवताओं, वैसे ही आदित्य और रुद्र भी आपकी आज्ञा का पालन करेंगे जैसे आप हमारे स्वामी हैं। एक है गढ़ापत्य:अग्नि, दूसरी है दक्षिणाग्नि और तीसरी है शवण्य । इन्हें तीन अग्नि-पोतों में तैयार कर लें। अक्स, यजुस और सामनों के माध्यम से एक चक्र में, धनुष जैसी आकृति में मेरी और चतुर्भुज में भगवान हारा की पूजा करें । तपस्या से अग्नि उत्पन्न करके और महान समृद्धि प्राप्त करके, आप एक हजार दिव्य वर्षों के लिए हवन करने के बाद आग को बुझा देंगे। इस संसार में अग्नि को अर्पण करने से बढ़कर पवित्र कुछ भी नहीं कहा गया है। अग्नि को अर्पण करके ब्राह्मणों को पृथ्वी पर शुद्ध किया जाता है।

ये ब्राह्मणों द्वारा देवताओं की दुनिया की ओर जाने वाले मार्ग होने का संकेत दिया गया है। एक ब्राह्मण गृहस्थ हमेशा एक आग बनाए रखनी चाहिए। बिना अग्नि के ब्राह्मण को गृहस्थ का पद प्राप्त नहीं हो सकता।

भीम ने कहा :

८६. क्या वह धनुर्धर, जिसका नाम नर है, जो खोपड़ी से निकला , माधव से पैदा हुआ था या अपने कर्मों के कारण? या वह जानबूझकर रुद्र द्वारा बनाया गया था?

87. हे ब्राह्मण, ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ , एक अंडे से निकला । वह पाँचवाँ चेहरा कैसे आया?

88. राजा (एक लौकिक गुणवत्ता-गतिविधि के कारण) में कभी नहीं देखा है सत्व (अच्छाई की गुणवत्ता), और न ही सत्व में राजाओं । सत्व में रहकर ब्रह्मा (हमेशा) के पास ( रजों की ) अधिकता कैसे हुई, जिससे उसने अपने मन को बहला-फुसलाकर हारा को मारने के लिए आदमी को भेजा?

पुलस्त्य ने कहा :

८९. महेश्वर (अर्थात् शिव) और हरि ये दोनों अच्छे मार्ग पर बने रहे।

90. दो उदार लोगों के लिए, कुछ भी जो या तो अधूरा या पूरा नहीं है, अज्ञात है। महान ब्रह्मा का पाँचवाँ चेहरा सामने आया था।

९१. तो, राजस के साथ बढ़ते हुए ब्रह्मा मोहित हो गए। उसने सोचा कि उसने अपनी चमक से सृष्टि (अर्थात संसार) की रचना की है।

92. 'मेरे अलावा कोई और देवता नहीं है, जिसने देवताओं, गंधर्वों , जानवरों, पक्षियों और हिरणों सहित सृष्टि को स्थापित किया है ।'

93. और इस प्रकार पंचमुखी ब्रह्मा बहक गए। पूर्व की ओर मुख करके उनका मुख ऋग्वेद का प्रवर्तक था ।

९४. उनके दूसरे चेहरे ने यजुर्वेद की स्थापना की । तीसरा सामवेद का प्रवर्तक था और चौथा अथर्ववेद का ।

95. पांचवें चेहरे को ऊपर की ओर देखते हुए वह अंगों (अर्थात वेदांग ) और उप-अंगों (अर्थात वेदांगों के पूरक कार्य ), इतिहास, गुप्त विज्ञान और संकलन (कानूनों) के साथ वेदों का अध्ययन करता है ।

९६. उस अद्भुत तेज के चेहरे की चमक से सभी राक्षसों और देवताओं ने सूर्योदय के समय दीपकों की तरह अपना तेज खो दिया।

97. घबराए हुए लोग अपके ही नगर में रह गए। एक ने न तो दूसरे की परवाह की और न ही अपनी ताकत से दूसरों को नाराज किया।

98. सभी भयभीत देवता उस महान भगवान ब्रह्मा के पास जाने या देखने या जाने में असमर्थ थे।

99. चमक में धुँधले वे अपने आप को पराक्रमी मानते थे। वे सब अपनी भलाई के बारे में सोचते थे—देवताओं की भलाई।

१००अ. 'हम, जिन्होंने अपने तेज से अपनी चमक खो दी है, शिव का सहारा लेंगे।'

देवताओं ने कहा :

100बी. आपको नमस्कार, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, महान देव, हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।

१०१. हे जगत् के स्रोत, हे सर्वोच्च ब्रह्म, तू नित्य है। आप, विष्णु के साथ, सभी संसारों के आधार और कारण हैं।

102. इस प्रकार देवताओं, ऋषियों, पूर्वजों और राक्षसों द्वारा स्तुति किए जाने पर, छिपे हुए, उन्होंने कहा: "हे देवताओं, अपनी इच्छित वस्तु मांगो।"

देवताओं ने कहा :

103. हे भगवान, व्यक्तिगत रूप से प्रकट होकर, हमें उतना ही दें जितना हम चाहते हैं। हम पर दया करो और हमें भी वरदान दो।

१०४. हमारे पास जो भी महान वीरता, तेज, शक्ति थी - वह सब जो ब्रह्मा ने अपने पांचवें चेहरे से ग्रहण किया है।

105. सभी चमक नष्ट हो गई हैं। हे महाप्रभु, ऐसा कर्म करो कि सब कुछ पहले जैसा हो जाए।

१०६. तब शिव, अपने चेहरे से प्रसन्न और देवताओं द्वारा भी नमस्कार करते हुए, वहाँ गए जहाँ ब्रह्मा अपने राजस गुण के अभिमान से मोहित थे।

107. (देवता) देवताओं के स्वामी की स्तुति करते हुए और उसके चारों ओर उसके पास पहुंचे। रजस गुण (अर्थात् प्रबल) में आच्छादित ब्रह्मा ने रुद्र को नहीं पहचाना जो उसके पास आए थे।

108. उस समय सभी की आत्मा, ब्रह्मांड के निर्माता और हर चीज के प्रकाशक को करोड़ों सूर्यों की अपनी चमक (उस तरह) से दुनिया को खुश करने के लिए देखा गया था।

109. तब रुद्र, ब्रह्मा के पास, सर्वशक्तिमान, देवताओं के पूरे समूह के साथ (वहां) बैठे (कहा):

110. "हे भगवान, बड़ी चमक के साथ तुम्हारा चेहरा और चमक रहा है!" इतना कहकर शिव जोर से हंस पड़े।

१११. जिस प्रकार मनुष्य ने केले के वृक्ष के भीतरी भाग को अपने नाखूनों से काट दिया, उसी प्रकार शिव ने ब्रह्मा के पांचवें सिर को बाएं अंगूठे के नाखून से काट दिया।

112. वह सिर जो तब काट दिया गया था वह शिव के हाथ में रह गया, जैसे कोई अन्य चंद्रमा ग्रहों के बीच में रहता है।

११३. महेश्वर ने अपने हाथ में सिर लेकर कैलाश पर्वत की तरह नृत्य किया, जिसमें सूर्य अपने चरम पर था।

११४. जब सिर काट दिया गया, तो देवताओं ने प्रसन्न होकर, देवताओं के देवता वीरभध्वज कपार्डिन (यानी शिव) की प्रशंसा के विभिन्न भजनों के साथ प्रशंसा की।

देवताओं ने कहा :

११५. खोपड़ी के धारक को, महान मृत्यु के नाश करने वाले को, जो वैभव और ज्ञान से संपन्न है और सभी भागों (भोग के) दाता है, को हमेशा के लिए सलाम।

११६. उसे नमस्कार है जो आनंद की चमक है, और जो सभी देवताओं से भरा है। आप कलि (युग) में संहारक हैं, इसलिए आप महाकाल के रूप में जाने जाते हैं ।

117. आप (अपने) भक्तों के कष्टों को नष्ट करते हैं; आपको दुखांत कहा जाता है (अर्थात जो सभी दुखों का अंत करता है)। जैसे ही आप अपने (अपने) भक्तों का कल्याण करते हैं, आप शंकर कहलाते हैं ।

118. हे भगवान, चूंकि आप (ब्रह्मा के) सिर को काट कर रखते हैं और खोपड़ी, इसलिए आप कपालिन हैं । हम पर वैसे ही कृपा करें जैसे आप हमारी प्रशंसा करते हैं।

119. इस प्रकार स्तुति के बाद शंकर ने मन ही मन प्रसन्न होकर देवताओं को उनके निवास स्थान पर भेज दिया और वहीं आनन्द से भर गए।

120-121. ब्रह्मा के मन और वीर के जन्म को जानकर , शिव ने लोगों के शब्दों (अर्थात अनुरोध) पर सिर फेंक दिया, उनके सिर पर अपनी हथेलियाँ रख दीं और ब्रह्मा को प्रणाम करके उनके क्रोध को शांत करने और जानने के लिए उनकी प्रशंसा की। ब्रह्म, अभिव्यक्ति, भजन, रहस्य (मंत्र) और g ( वेद ), यजुर (वेद) और साम (वेद) के ग्रंथों के साथ चमक का सबसे बड़ा भंडार :

रुद्र ने कहा :

122-123. आपको नमस्कार, हे अनंत, और सर्वोच्च की सर्वोच्च आत्मा; आप अद्भुत चीजों के मूल हैं; आप वासनाओं के अटूट खजाने हैं। आपकी सफलता के कारण आप सभी की आत्मा हैं। आप सृष्टि के रचयिता हैं, हे महान तेजस्विनी।

124. तुझे नमस्कार, हे भलाई के स्वभाव, और पृथ्वी के रूप के एक मुख वाले, हे जल में पड़े हुए, जल से उत्पन्न, और जल में निवास करने वाले, तुझे नमस्कार।

125. हे जल से उत्पन्न हुए, जिसके नेत्रों के समान फूले हुए पत्ते हैं; हे भगवन, हे प्रभु, तेरी जय हो; तुमने मुझे सृष्टि के लिए पहले बनाया था।

126. हे बलि में हवन करनेवाले, हे बलि चढ़ानेवालोंके स्वामी, तुझे नमस्कार, हे सोने, कमल, और देवताओं के भीतरी भाग, हे प्राणियोंके स्वामी!

१२७. हे कमल से उत्पन्न , आप यज्ञ, वशंकार (देवता को आहुति देने के लिए प्रयुक्त विस्मयादिबोधक वाण) और स्वाधा ( पितियों को अर्पित की गई आहुति ) हैं। हे प्रभु, मैंने देवताओं की दिशा में सिर काट दिया।

128. मैं एक ब्राह्मण की हत्या से अपमानित हूँ; हे जगत् के स्वामी, मेरी रक्षा करो।

इस प्रकार देवताओं के देवता द्वारा संबोधित, ब्रह्मा ने कहा (ये) शब्द:

ब्रह्मा ने कहा :

१२९. भगवान नारायण, (हमारे) मित्र, तुम्हें शुद्ध करेंगे । उस गुणी की महिमा करनी चाहिए। आत्मशक्ति मेरे लिए आदरणीय है।

130. वास्तव में आपको उस भगवान विष्णु ने सोचा था, इसलिए जैसे ही आप में भक्ति उत्पन्न हुई, और मेरी प्रशंसा करने की इच्छा आपके भीतर पैदा हुई।

131. सिर काटने के लिए आप कपाली हैं । आप सोम सिद्धांत के लेखक हैं । हे महान तेजोमयी, आपने सौ करोड़ ब्राह्मणों को मुक्ति दिलाई है।

१३२. ब्राह्मण को मारने के लिए आपको व्रत (प्रायश्चित का) करना चाहिए; कोई दूसरा कोर्स नहीं है। ब्राह्मणों के पापी, क्रूर हत्यारे जो पापी हैं, उनसे बात नहीं की जानी चाहिए।

133. गलत कार्य करने वाले बलिकारों से कभी बात नहीं करनी चाहिए। यदि वे एक को देखते हैं, तो सूर्य को देखना चाहिए (पाप से मुक्त होने के लिए)।

134. हे रुद्र, यदि वे किसी के शरीर को छूते हैं, तो व्यक्ति को अपने वस्त्रों के साथ पानी में प्रवेश करना चाहिए। इस प्रकार व्यक्ति को पवित्रता प्राप्त होती है जैसा कि पहले बुद्धिमानों द्वारा देखा गया था।

१३५. जैसे आप हैं, आप ब्राह्मण के हत्यारे हैं; पवित्रता (प्राप्त करने) के लिए एक व्रत का पालन करें। एक व्रत का पालन करने पर आपको कई वरदान प्राप्त होंगे।

136. ऐसा कहकर ब्रह्मा चले गए। रुद्र को यह समझ नहीं आया। फिर उन्होंने स्वयं विष्णु का ध्यान किया।

137. देवताओं के देवता त्रिलोकन (अर्थात रुद्र), शरीर के आठ अंगों के साथ झुककर, प्रणाम करते हुए, भूमि को छूते हुए, स्तुति (विष्णु), शाश्वत देवता, वरदान देने वाले, लक्ष्मी और धारक के साथ शंख, चक्र और गदा।

रुद्र ने कहा :

138-139. मैं मानसिक रूप से विष्णु नारायण को याद करता हूं जो निरंतर श्रृंखला के माध्यम से अमर हैं, जो बूढ़े हैं, जिनके पास अनंत शक्ति है, जो शाश्वत है, सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति है, अतुलनीय है, महानतम से बड़ा है, पहले जन्मा और बहुत शक्तिशाली है और है उनमें से प्रमुख जिनकी बुद्धि गूढ़ और गहन है।

140. मैं भगवान हरि, नियंत्रक, महानतम निवास, सर्वोच्च स्थान, उच्चतम और प्रतिष्ठित रिसॉर्ट, सर्वोच्च स्वामी और विशाल प्राणी को नमस्कार करता हूं।

१४१. मैं (मैं) शुद्ध प्रकृति के नारायण की प्रशंसा करता हूं, (जिसने) इस उच्च और निम्न और सूक्ष्म को बनाया। (मैं उसकी स्तुति करता हूँ जो) सदा उपस्थित (सर्वत्र) सर्वोच्च, शांत और प्रमुख व्यक्ति है। वह मेरी शरण हो।

142-143. मैं हमेशा विष्णु नारायण की स्तुति करता हूँ, अशुद्धता से मुक्त, बूढ़ा, महान से बड़ा, कोई अंत नहीं, प्राचीन, विवेकपूर्ण में प्रमुख, साहस, क्षमा और शांति के लिए दिया गया, पृथ्वी का स्वामी, शुभ, महान पराक्रम का एक हजार सिर और कई पैर और असंख्य हाथ वाले, चंद्रमा और सूर्य को अपनी आंखों के रूप में, मोबाइल और अचल की प्रकृति, समुद्र में लेटे हुए।

१४४. मैं नारायण की स्तुति करता हूं, सर्वोच्च, सर्वोच्च भगवान, महानतम से बड़ा, जिसे देवताओं द्वारा (यहां तक) नहीं किया जा सकता है, तीन रचनाओं में रहने वाले, तीन सिद्धांतों वाले, तीन में लीन और तीन आंखों वाले।

145-146। मैं में बहुत बड़ा नारायण सफेद सलाम Kṛta (युग), में लाल द्वापर (युग) और में काले काली (युग); मैं उनको प्रणाम करता हूँ जिन्होंने अपने मुख से ब्राह्मणों की रचना की। (जिसने सृष्टि की, उसे मैं प्रणाम करता हूँ) क्षत्रियों को उसकी भुजाओं से, (सृजित) वैश्यों को उसकी दोनों जाँघों से और शूद्रों को उसके पैरों की युक्तियों से। मैं उन्हें सलाम करता हूं कि ब्रह्मांड उनके शरीर के रूप में है, गहराई से सीखा और अनंत है।

१४७. मैं सूक्ष्म रूप के कमल (विष्णु) को नमस्कार करता हूं, एक महान रूप के, उनके रूप और निराकार (भी) और सभी देवताओं के कवच के रूप में सीखने वाले।

१४८. मैं एक हजार सिरों, हजार नेत्रों, विशाल भुजाओं वाले देवों (अर्थात् विष्णु) को सलाम करता हूं, वह महान देवता (संपूर्ण) संसार में व्याप्त होने के बाद शेष रह गए हैं।

१४९. मैं भगवान विष्णु को सलाम करता हूं, रक्षक, शरण, विजेता, प्राचीन, एक गहरे नीले बादल के समान और हाथ में शृंग धनुष लिए हुए।

१५०. मैं सर्वव्यापक, शुद्ध, शाश्वत, प्राचीन हरि को, अस्तित्व और गैर-अस्तित्व से मुक्त आकाश के रूप में नमस्कार करता हूं।

१५१. हे अच्युत , मुझे तुम्हारे सिवा यहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता। मैं यह सब मोबाइल और अचल (दुनिया) को आप से भरा हुआ देखता हूं।

१५२. जब वह परमेशिन (अर्थात रुद्र) इस प्रकार बोल रहा था, तो वह, शाश्वत और सर्वोच्च व्यक्ति उसके सामने व्यक्तिगत रूप से प्रकट हुआ।

१५३. वह हाथ में चक्र और गरुण को अपने आसन के रूप में लेकर, एक पर्वत को रोशन करते हुए सूर्य की तरह उठे। प्राचीन ने कहा, "मैं, वर देने वाला, आया हूं। वरदान मांगो।"

१५४. इस प्रकार (विष्णु) की प्रशंसा करने के बाद सर्वश्रेष्ठ रुद्र ने कहा: "हे देवताओं के भगवान, मुझे अत्यंत शुद्ध होने दो। मुझे तुमसे बेहतर और कुछ नहीं दिखता जो इस पाप को दूर कर दे।

१५५. एक ब्राह्मण की हत्या से प्रताड़ित मेरा शरीर काला हो गया है। मेरे शरीर से मृत शरीर की गंध से बदबू आ रही है और मेरे गहने लोहे के हैं।

१५६-१५७ए. हे जनार्दन, (मुझे बताओ) मेरा रूप ऐसा कैसे नहीं रहेगा । मुझे बताओ, हे अच्युत, हे महान भगवान, मुझे क्या करना चाहिए कि मैं आपकी कृपा से अपना पुराना शरीर प्राप्त करूं। ”

विष्णु ने कहा :

१५७बी. एक ब्राह्मण की हत्या बहुत क्रूर और अत्यधिक दर्दनाक है।

158. ऐसे पाप के बारे में मानसिक रूप से भी नहीं सोचना चाहिए। ऐसी भक्ति आपने देवताओं के वचनों के कारण व्यक्त की है।

१५९-१६०. हे पराक्रमी भुजाओं, अब वही करो जो ब्रह्मा

आपको बताया है। अपने सभी अंगों को राख से रगड़ें, (राख को रगड़कर) अपने शरीर पर तीन बार (दिन में) रगड़ें। हड्डियों को अपनी शिखा पर, अपने कानों और हाथों पर पहनें। हे रुद्र ऐसा करने से तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा।

१६१. इस प्रकार (रुद्र) को निर्देश देने के बाद, भगवान, लक्ष्मी के साथ, वहीं गायब हो गए। रुद्र को यह नहीं पता था।

१६२-१६५. उसके हाथ में खोपड़ी के साथ देवताओं का स्वामी और एक ब्राह्मण की हत्या इस पृथ्वी के ऊपर घूम (और विजिटिंग) द्वारा प्रताड़ित {पहाड़ों अर्थात।) हिमालय , Maināka साथ मेरु , कैलाश, काला , विंध्य , और महान पर्वत नीला , ( और स्थान जैसे) कांची , कां , ताम्रलिप्त , मगध, एविला, इसी तरह वत्सगुलमा , गोकर्ण , उत्तरी कुरु, भद्राश्व , केतुमाला और हेराण्यक, कामरूप , प्रभास और पर्वत महेंद्र जैसे क्षेत्र भी।, शरण नहीं मिली (कहीं भी)।

166. हमेशा अपने हाथ में खोपड़ी देखकर, वह शर्म से दूर हो गया, उसने कई बार हाथ मिलाया और बार-बार विचलित हो गया।

167. जब (सम) हाथ मिलाने के बाद भी, खोपड़ी नहीं गिरी, तो उसके दिमाग में यह आया: 'मैं इस व्रत का पालन करूंगा।

१६८. ब्राह्मण हमेशा मेरे ही मार्ग पर चलेंगे'। बहुत देर तक यही सोचकर देवता पृथ्वी पर घूमते रहे।

169-171. पर पहुँच रहा है Puṣkara , वह सबसे अच्छा वन, कई पेड़ और लताओं से भरा है और कई जानवरों की आवाज़ है, जो पेड़ों की प्रचुर मात्रा में फूल, भूमि जिनमें से फूलों के साथ डाल के रूप में यह जानबूझकर सजाया गया था था की खुशबू (साथ सुगंधित किया गया था के साथ प्रवेश किया जमीन पर), (जो भरा हुआ था) कई इत्र और रस और अन्य पके और कच्चे फल। वृक्षों के झुरमुट के फूलों की सुगन्ध पाकर वह उसमें प्रवेश कर गया।

172-173. 'ब्रह्मा मुझे एक वरदान देंगे जो उसे यहाँ प्रसन्न करेगा। ब्रह्मा की कृपा से मुझे इस पुष्कर (जंगल) के बारे में पता चला है, जो पापों को नष्ट करता है, बुराइयों को शांत करता है, और पोषण, समृद्धि और शक्ति को बढ़ाता है।'

१७४. जब वह अनंत चमक का रुद्र इस प्रकार सोच रहा था, कमल-जन्मे ब्रह्मा आए। प्रभु ने रूद्र को, जिसने झुककर प्रणाम किया था, उठाकर उससे कहा:

175-177. "ईश्वरीय मन्नत के पालन से, आपने मुझे देखने की तीव्र इच्छा के साथ, भक्ति के साथ मुझे प्रसन्न किया; क्योंकि व्रत में रहकर ही पुरुष देवताओं को देख सकते हैं। इसलिए मैं (आपकी) इच्छा के अनुसार एक उत्कृष्ट वरदान दूंगा। चूँकि आपने अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए मानसिक, शारीरिक और वाणी से और मन की प्रसन्नता से यह व्रत किया है, इसलिए मुझे बताओ कि मुझे कौन सा वरदान चाहिए, जो मुझे देना चाहिए। ”

रुद्र ने कहा :

१७८-१८३ए. यह अपने आप में एक बहुत ही पर्याप्त वरदान है कि मैं आपको देख सकता हूं, हे आप (संपूर्ण) दुनिया के लिए आदरणीय। हे जगत् के रचयिता, आपको मेरा नमस्कार। हे भगवान, आप एक लंबे समय तक किए गए एक महान बलिदान और मृत्यु (यहां तक) के कारण होने वाली तपस्या के माध्यम से देखे जाते हैं। हे सर्वशक्तिमान प्रभु, यह खोपड़ी मेरे हाथ से नहीं गिरी। जब से मैंने एक कापालिका का यह व्रत किया है (अर्थात् एक भटकते हुए ऋषि जो खोपड़ी को पकड़कर उसमें से खाते-पीते हैं) मेरे असर से ऋषियों को शर्म आती है और यह तिरस्कारपूर्ण है। आपके साथ शरण लेने वाले मेरे द्वारा किया गया यह महान व्रत (प्रतिष्ठित) पूरा हो गया है। अब मुझे बताओ। कहो कि मैं इस (खोपड़ी) को किस शुभ क्षेत्र में फेंक दूं, (करते हुए) मैं शुद्ध आत्माओं के संतों का (आंखों में) शुद्ध रहूंगा।

ब्रह्मा ने कहा :

१८३बी-१८४. अविमुक्ता भगवान का (अर्थात् पवित्र) एक प्राचीन स्थान है; वहां आपको कपालमोचन (जिसे कहा जाएगा) खोपड़ी को गिराने का पवित्र स्थान मिलेगा । आप और मैं वहीं रहते हैं। तो विष्णु भी होंगे ।

१८५. वहाँ तुम्हें देखने से जो बड़े पापी हैं वे भी मेरे धाम में भोग पाएंगे।

१८६. दो नदियों के बीच, देवताओं को प्रिय, अर्थात। वाराणसी और असी, एक ऐसा क्षेत्र होगा जहां कभी कोई हत्या नहीं होगी ।

१८७-१८८. सबसे अच्छा पवित्र स्थान और तीर्थ (में) आपका (सम्मान) सबसे अच्छा स्थान होगा। वे लोग, जो अपने शरीर के पतन से पहले, इस पवित्र स्थान का सहारा लेते हैं, अमर होकर, और कहीं से कोई भय नहीं होने पर, ब्रह्म के मार्ग पर स्वर्ग में पहुंच जाते हैं। मैंने तुम्हें यह पवित्र स्थान पाँच क्रोस माप का दिया है ।

१८९. हे रुद्र, जब गंगा पवित्र स्थान से होकर नदियों के स्वामी (अर्थात् समुद्र) तक पहुंचेगी , तो वह एक महान पवित्र शहर होगा।

190. पवित्र गंगा उत्तर की ओर (यानी बहती है) और सरस्वती पूर्व की ओर है। जाह्नवी नदी (गंगा) उत्तर की ओर दो योजन तक बहती है ।

191. वहाँ मेरे साथ सभी देवता और इंद्र आ गए हैं या आएंगे। खोपड़ी वहीं छोड़ दो।

192. जो लोग वहां जाकर अपने पूर्वजों को पीण और श्राद्ध देकर प्रसन्न करते हैं , उन्हें स्वर्ग में एक शाश्वत क्षेत्र प्राप्त होता है।

193. वाराणसी के महान पवित्र स्थान पर स्नान करने वाला एक व्यक्ति रिहा हो गया। वहाँ जाकर ही वह सात जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।

194. कहा जाता है कि वह पवित्र स्थान सभी पवित्र स्थानों में सबसे अच्छा है।

१९५-१९७. वे प्राणी, जो आपको प्रणाम करते हैं, वहीं मर जाते हैं, रुद्र (अर्थात आपकी स्थिति) प्राप्त करके, आपके साथ आनन्दित होते हैं। हे रुद्र, एक नियंत्रित मन वाला व्यक्ति वहां जो कुछ भी अर्पित करता है, वह उसे शुद्ध आत्मा का, एक महान फल देता है। जो पुरुष वहां अपने शरीर को नष्ट करने (अर्थात अपने जीवन को समाप्त करने) का संस्कार करते हैं, वे रुद्र की दुनिया में पहुंच जाते हैं और वहां हमेशा खुश रहते हैं।

198. पूजा, एक मौन प्रार्थना, वहां किया गया बलिदान स्वर्ग की ओर ले जाता है, जिसका हृदय भक्ति से भरा होता है, उसे अनन्त फल देने वाला होता है। एक दीपक चढ़ाने वाला व्यक्ति बौद्धिक दृष्टि वाला व्यक्ति होगा।

199-200। जो वहां से चला जाता है, उस पर निशान लगाकर, एक अपंग, युवा, सौम्य और अच्छे गुणों वाला बैल सर्वोच्च स्थान पर जाता है; इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह अपने पूर्वजों के साथ मोक्ष प्राप्त करता है। प्रोलिक्सिटी का क्या उपयोग है? यहाँ मनुष्य जो कुछ भी कर्म (प्राप्ति) धार्मिक योग्यता की दृष्टि से करता है, वह (उन्हें) एक शाश्वत फल देता है।

201. जो स्वर्ग और मोक्ष का कारण है, वह पृथ्वी पर पवित्र स्थान माना जाता है।

202. स्नान, प्रार्थना या यज्ञ (वहां किया गया) के माध्यम से यह ( तीर्थ ) एक चिरस्थायी फल का साधन बन जाता है।

203-204। वे भक्त, जो रुद्र में लीन हैं, जो पवित्र स्थान वाराणसी जाते हैं और वहीं मर जाते हैं, उन्हें वसु , पितृ, रुद्र और दादा-दादी और परदादा-पिता और आदित्य के रूप में माना जाना चाहिए - ऐसा वैदिक पाठ कहता है। हे पापरहित, मैंने पिंडदान करने के लिए त्रिविध संस्कार का वर्णन किया है।

205. यहां आने वाले पुरुषों को हमेशा पीतदान करना चाहिए । उनके पुत्रों को भी सम्मानपूर्वक वहां पिंडदान करना चाहिए ।

206. ऐसे अच्छे पुत्र अपने पूर्वजों को खुशी देते हैं। मैंने तुम्हें उस पवित्र स्थान के बारे में बताया है, जो देखते ही देखते अंतिम मुक्ति देता है।

207. यहां स्नान करने से मनुष्य जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है। रुद्र, मैंने तुम्हें यह पवित्र स्थान दिया है। अविमुक्ता। ब्राह्मण हत्याकांड (पाप) से मुक्त होकर वहाँ अपनी पत्नी के साथ रहते हैं।

रुद्र ने कहा :

208. मैं विष्णु के संग पृय्वी के पवित्र स्थानोंमें रहूंगा; यह वह वरदान है जिसे मैंने चुना है, जैसा आपने मुझे बताया (चुनने के लिए)।

209. मैं महान देवता हूं; आपको हमेशा मुझे प्रसन्न करना चाहिए।

२१०. मैं भी अपने मन की प्रसन्नता से तुम्हें एक वरदान दूंगा। और मैं विष्णु को भी उनके मन में वांछित वरदान दूंगा।

211. मैं सब देवताओं और शुद्ध आत्माओं के ऋषियों के द्वारा दाता हूँ, और मुझसे विनती की जा रही है; और कोई नहीं।

ब्रह्मा ने कहा :

212. हे रुद्र, मैं आपकी शुभ आज्ञा का पालन करूंगा। नारायण भी, निस्संदेह आपकी सलाह का पालन करेंगे ।

213. इस प्रकार रुद्र को हटाकर ब्रह्मा वहीं विलीन हो गए। महादेव ने वाराणसी में जाकर वहाँ डेरा डाला।











पद्मपुराणम्/खण्डः १ (सृष्टिखण्डम्)/अध्यायः १५
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भीष्म उवाच
किं कृतं ब्रह्मणा ब्रह्मन्प्रेष्य वाराणसीपुरीम्
जनार्दनेन किं कर्म शंकरेण च यन्मुने१
कथं यज्ञः कृतस्तेन कस्मिंस्तीर्थे वदस्व मे
के सदस्या ऋत्विजश्च सर्वांस्तान्प्रब्रवीहि मे२
के देवास्तर्पितास्तेन एतन्मे कौतुकं महत्
पुलस्त्य उवाच
श्रीनिधानं पुरं मेरोः शिखरे रत्नचित्रितम्३
अनेकाश्चर्यनिलयंबहुपादपसंकुलम्
विचित्रधातुभिश्चित्रं स्वच्छस्फटिकनिर्मलम्४
लतावितानशोभाढ्यं शिखिशब्दविनादितम्
मृगेन्द्ररववित्रस्त गजयूथसमाकुलम्५
निर्झरांबुप्रपातोत्थ शीकरासारशीतलम्
वाताहततरुव्रात प्रसन्नापानचित्रितम्६
मृगनाभिवरामोद वासिताशेषकाननम्
लतागृहरतिश्रान्त सुप्तविद्याधराध्वगम्७
प्रगीतकिन्नरव्रात मधुरध्वनिनादितम्
तस्मिन्ननेकविन्यास शोभिताशेषभूमिकम्८
वैराजं नाम भवनं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः
तत्र दिव्यांगनोद्गीत मधुरध्वनि नादिता९
पारिजाततरूत्पन्न मंजरीदाममालिनी
रत्नरश्मिसमूहोत्थ बहुवर्णविचित्रिता१०
विन्यस्तस्तंभकोटिस्तु निर्मलादर्शशोभिता
अप्सरोनृत्यविन्यास विलासोल्लासलासिता११
बह्वातोद्यसमुत्पन्नसमूहस्वननादिता
लयतालयुतानेक गीतवादित्र शोभिता१२
सभा कांतिमती नाम देवानां शर्मदायिका
ऋषिसंघसमायुक्ता मुनिवृंदनिषेविता१३
द्विजातिसामशब्देन नादिताऽऽनंददायिनी
तस्यां निविष्टो देवेशस्संध्यासक्तः पितामहः१४
ध्यायति स्म परं देवं येनेदं निर्मितं जगत्
ध्यायतो बुद्धिरुत्पन्ना कथं यज्ञं करोम्यहम्१५
कस्मिन्स्थाने मया यज्ञः कार्यः कुत्र धरातले
काशीप्रयागस्तुंगा च नैमिषं शृंखलं तथा१६
कांची भद्रा देविका च कुरुक्षेत्रं सरस्वती
प्रभासादीनि तीर्थानि पृथिव्यामिह मध्यतः१७
क्षेत्राणि पुण्यतीर्थानि संति यानीह सर्वशः
मदादेशाच्च रुद्रेण कृतान्यन्यानि भूतले१८
यथाहं सर्वदेवेषु आदिदेवो व्यवस्थितः
तथा चैकं परं तीर्थमादिभूतं करोम्यहम्१९
अहं यत्र समुत्पन्नः पद्मं तद्विष्णुनाभिजम्
पुष्करं प्रोच्यते तीर्थमृषिभिर्वेदपाठकैः२०
एवं चिंतयतस्तस्य ब्रह्मणस्तु प्रजापतेः
मतिरेषा समुत्पन्ना व्रजाम्येष धरातले२१
प्राक्स्थानं स समासाद्य प्रविष्टस्तद्वनोत्तमम्
नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्२२
नानापक्षिरवाकीर्णं नानामृगगणाकुलम्
द्रुमपुष्पभरामोदैर्वासयद्यत्सुरासुरान्२३
बुद्धिपूर्वमिव न्यस्तैः पुष्पैर्भूषितभूतलम्
नानागंधरसैः पक्वापक्वैश्च षडृतूद्भवैः२४
फलैः सुवर्णरूपाढ्यैर्घ्राणदृष्टिमनोहरैः
जीर्णं पत्रं तृणं यत्र शुष्ककाष्ठफलानि च२५
बहिः क्षिपति जातानि मारुतोनुग्रहादिव
नानापुष्पसमूहानां गंधमादाय मारुतः२६
शीतलो वाति खं भूमिं दिशो यत्राभिवासयन्
हरितस्निग्ध निश्छिद्रैरकीटकवनोत्कटैः२७
वृक्षैरनेकसंज्ञैर्यद्भूषितं शिखरान्वितैः
अरोगैर्दर्शनीयैश्च सुवृत्तैः कैश्चिदुज्ज्वलैः२८
कुटुंबमिव विप्राणामृत्विग्भिर्भाति सर्वतः
शोभंते धातुसंकाशैरंकुरैः प्रावृता द्रुमाः२९
कुलीनैरिव निश्छिद्रैः स्वगुणैः प्रावृता नराः
पवनाविद्धशिखरैः स्पृशंतीव परस्परम्३०
आजिघ्रंती वचाऽन्योन्यं पुष्पशाखावतंसकाः
नागवृक्षाः क्वचित्पुष्पैर्द्रुमवानीरकेसरैः३१
नयनैरिव शोभंते चंचलैः कृष्णतारकैः
पुष्पसंपन्नशिखराः कर्णिकारद्रुमाः क्वचित्३२
युग्मयुग्माद्विधा चेह शोभन्त इव दंपती
सुपुष्पप्रभवाटोपैस्सिंदुवार द्रुपंक्तयः३३
मूर्तिमत्य इवाभांति पूजिता वनदेवताः
क्वचित्क्वचित्कुंदलताः सपुष्पाभरणोज्वलाः३४
दिक्षु वृक्षेषु शोभंते बालचंद्रा इवोच्छ्रिताः
सर्जार्जुनाः क्वचिद्भान्ति वनोद्देशेषु पुष्पिताः३५
धौतकौशेयवासोभिः प्रावृताः पुरुषा इव
अतिमुक्तकवल्लीभिः पुष्पिताभिस्तथा द्रुमाः३६
उपगूढा विराजंते स्वनारीभिरिव प्रियाः
अपरस्परसंसक्तैः सालाशोकाश्च पल्लवैः३७
हस्तैर्हस्तान्स्पृशंतीव सुहृदश्चिरसंगताः
फलपुष्पभरानम्राः पनसाः सरलार्जुनाः३८
अन्योन्यमर्चयंतीव पुष्पैश्चैव फलैस्तथा
मारुतावेगसंश्लिष्टैः पादपास्सालबाहुभिः३९
अभ्याशमागतं लोकं प्रतिभावैरिवोत्थिताः
पुष्पाणामवरोधेन सुशोभार्थं निवेशिताः४०
वसंतमहमासाद्य पुरुषान्स्पर्द्धयंति हि
पुष्पशोभाभरनतैः शिखरैर्वायुकंपितैः४१
नृत्यंतीव नराः प्रीताः स्रगलंकृतशेखराः
शृंगाग्रपवनक्षिप्ताः पुष्पावलियुता द्रुमाः४२
सवल्लीकाः प्रनृत्यंति मानवा इव सप्रियाः
स्वपुष्पनतवल्लीभिः पादपाः क्वचिदावृताः४३
भांति तारागणैश्चित्रैः शरदीव नभस्तलम्
द्रुमाणामथवाग्रेषु पुष्पिता मालती लताः४४
शेखराइव शोभंते रचिता बुद्धिपूर्वकम्
हरिताः कांचनच्छायाः फलिताः पुष्पिता द्रुमाः४५
सौहृदं दर्शयंतीव नराः साधुसमागमे
पुष्पकिंजल्ककपिला गताः सर्वदिशासु च४६
कदंबपुष्पस्य जयं घोषयंतीव षट्पदाः
क्वचित्पुष्पासवक्षीबाः संपतंति ततस्ततः४७
पुंस्कोकिलगणावृक्ष गहनेष्विव सप्रियाः
शिरीषपुष्पसंकाशाः शुका मिथुनशः क्वचित्४८
कीर्तयंति गिरश्चित्राः पूजिता ब्राह्मणा यथा
सहचारिसुसंयुक्ता मयूराश्चित्रबर्हिणः४९
वनांतेष्वपि नृत्यंति शोभंत इव नर्त्तकाः
कूजंतःपक्षिसंघाता नानारुतविराविणः५० 1.15.50
कुर्वंति रमणीयं वै रमणीयतरं वनम्
नानामृगगणाकीर्णं नित्यं प्रमुदितांडजम्५१
तद्वनं नंदनसमं मनोदृष्टिविवर्द्धनम्
पद्मयोनिस्तु भगवांस्तथा रूपं वनोत्तमम्५२
ददर्शादर्शवद्दृष्ट्या सौम्ययापा पयन्निव
ता वृक्षपंक्तयः सर्वा दृष्ट्वा देवं तथागतम्५३
निवेद्य ब्रह्मणे भक्त्या मुमुचुः पुष्पसंपदः
पुष्पप्रतिग्रहं कृत्वा पादपानां पितामहः५४
वरं वृणीध्वं भद्रं वः पादपानित्युवाच सः
एवमुक्ता भगवता तरवो निरवग्रहाः५५
ऊचुः प्रांजलयः सर्वे नमस्कृत्वा विरिंचनम्
वरं ददासि चेद्देव प्रपन्नजनवत्सल५६
इहैव भगवन्नित्यं वने संनिहितो भव
एष नः परमः कामः पितामह नमोस्तु ते५७
त्वं चेद्वससि देवेश वनेस्मिन्विश्वभावन
सर्वात्मना प्रपन्नानां वांछतामुत्तमं वरम्५८
वरकोटिभिरन्याभिरलं नो दीयतां वरम्
सन्निधानेन तीर्थेभ्य इदं स्यात्प्रवरं महत्५९
ब्रह्मोवाच
उत्तमं सर्वक्षेत्राणां पुण्यमेतद्भविष्यति
नित्यं पुष्पफलोपेता नित्यसुस्थिरयौवनाः६०
कामगाः कामरूपाश्च कामरूपफलप्रदाः
कामसंदर्शनाः पुंसां तपःसिद्ध्युज्वला नृणाम्६१
श्रिया परमया युक्ता मत्प्रसादाद्भविष्यथ
एवं स वरदो ब्रह्मा अनुजग्राह पादपान्६२
स्थित्वा वर्ष सहस्रं तु पुष्करं प्रक्षिपद्भुवि
क्षितिर्निपतिता तेन व्यकंपत रसातलम्६३
विवशास्तत्यजुर्वेलां सागराः क्षुभितोर्मयः
शक्राशनि हतानीव व्याघ्र व्याला वृतानि च६४
शिखराण्यप्यशीर्यंत पर्वतानां सहस्रशः
देवसिद्धविमानानि गंधर्वनगराणि च६५
प्रचेलुर्बभ्रमुः पेतुर्विविशुश्च धरातलम्
कपोतमेघाः खात्पेतुः पुटसंघातदर्शिनः६६
ज्योतिर्गणांश्छादयंतो बभूवुस्तीव्र भास्कराः
महता तस्य शब्देन मूकांधबधिरीकृतम्६७
बभूव व्याकुलं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्
सुरासुराणां सर्वेषां शरीराणि मनांसि च६८
अवसेदुश्च किमिति किमित्येतन्न जज्ञिरे
धैर्यमालंब्य सर्वेऽथ ब्रह्माणं चाप्यलोकयन्६९
न च ते तमपश्यंत कुत्र ब्रह्मागतो ह्यभूत्
किमर्थं कंपिता भूमिर्निमित्तोत्पातदर्शनम्७०
तावद्विष्णुर्गतस्तत्र यत्र देवा व्यवस्थिताः
प्रणिपत्य इदं वाक्यमुक्तवंतो दिवौकसः७१
किमेतद्भगवन्ब्रूहि निमित्तोत्पातदर्शनम्
त्रैलोक्यं कंपितं येन संयुक्तं कालधर्मणा७२
जातकल्पावसानं तु भिन्नमर्यादसागरम्
चत्वारो दिग्गजाः किं तु बभूवुरचलाश्चलाः७३
समावृता धरा कस्मात्सप्तसागरवारिणा
उत्पत्तिर्नास्ति शब्दस्य भगवन्निः प्रयोजना७४
यादृशो वा स्मृतः शब्दो न भूतो न भविष्यति
त्रैलोक्यमाकुलं येन चक्रे रौद्रेण चोद्यता७५
शुभोऽशुभो वा शब्दोरेयं त्रैलोक्यस्य दिवौकसाम्
भगवन्यदि जानासि किमेतत्कथयस्व नः७६
एवमुक्तोऽब्रवीद्विष्णुः परमेणानुभावितः
मा भैष्ट मरुतः सर्वे शृणुध्वं चात्र कारणम्७७
निश्चयेनानुविज्ञाय वक्ष्याम्येष यथाविधम्
पद्महस्तो हि भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः७८
भूप्रदेशे पुण्यराशौ यज्ञं कर्तुं व्यवस्थितः
अवरोहे पर्वतानां वने चातीवशोभने७९
कमलं तस्य हस्तात्तु पतितं धरणीतले
तस्य शब्दो महानेष येन यूयं प्रकंपिताः८०
तत्रासौ तरुवृंदेन पुष्पामोदाभिनंदितः
अनुगृह्याथ भगवान्वनंतत्समृगांडजम्८१
जगतोऽनुग्रहार्थाय वासं तत्रान्वरोचयत्
पुष्करं नाम तत्तीर्थं क्षेत्रं वृषभमेव च८२
जनितं तद्भगवता लोकानां हितकारिणा
ब्रह्माणं तत्र वै गत्वा तोषयध्वं मया सह८३
आराध्यमानो भगवान्प्रदास्यति वरान्वरान्
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः सह तैर्देवदानवैः८४
जगाम तद्वनोद्देशं यत्रास्ते स तु कंजजः
प्रहृष्टास्तुष्टमनसः कोकिलालापलापिताः८५
पुष्पोच्चयोज्ज्वलं शस्तं विविशुर्ब्रह्मणो वनम्
संप्राप्तं सर्वदेवैस्तु वनं नंदनसंमितम्८६
पद्मिनीमृगपुष्पाढ्यं सुदृढं शुशुभे तदा
प्रविश्याथ वनं देवाः सर्वपुष्पोपशोभितम्८७
इह देवोस्तीति देवा बभ्रमुश्च दिदृक्षवः
मृगयंतस्ततस्ते तु सर्वे देवाः सवासवाः८८
अद्भुतस्य वनस्यांतं न ते ददृशुराशुगाः
विचिन्वद्भिस्तदा देवं दैवैर्वायुर्विलोकितः८९
स तानुवाच ब्रह्माणं न द्रक्ष्यथ तपो विना
तदा खिन्ना विचिन्वंतस्तस्मिन्पर्वतरोधसि९०
दक्षिणे चोत्तरे चैव अंतराले पुनः पुनः
वायूक्तं हृदये कृत्वा वायुस्तानब्रवीत्पुनः९१
त्रिविधो दर्शनोपायो विरिंचेरस्य सर्वदा
श्रद्धा ज्ञानेन तपसा योगेन च निगद्यते९२
सकलं निष्कलं चैव देवं पश्यंति योगिनः
तपस्विनस्तु सकलं ज्ञानिनो निष्कलं परम्९३
समुत्पन्ने तु विज्ञाने मंदश्रद्धो न पश्यति
भक्त्या परमया क्षिप्रं ब्रह्म पश्यंति योगिनः९४
द्रष्टव्यो निर्विकारोऽसौ प्रधानपुरुषेश्वरः
कर्मणा मनसा वाचा नित्ययुक्ताः पितामहम्९५
तपश्चरत भद्रं वो ब्रह्माराधनतत्पराः
ब्राह्मीं दीक्षां प्रपन्नानां भक्तानां च द्विजन्मनाम्९६
सर्वकालं स जानाति दातव्यं दर्शनं मया
वायोस्तु वचनं श्रुत्वा हितमेतदवेत्य च९७
ब्रह्मेच्छाविष्टमतयो वाक्पतिं च ततोऽब्रुवन्
प्रज्ञानविबुधास्माकं ब्राह्मीं दीक्षां विधत्स्व नः९८
स दिदीक्षयिषुः क्षिप्रममरान्ब्रह्मदीक्षया
वेदोक्तेन विधानेन दीक्षयामास तान्गुरुः९९
विनीतवेषाः प्रणता अंतेवासित्वमाययुः
ब्रह्मप्रसादं संप्राप्ताः पौष्करं ज्ञानमीरितम्१०० 1.15.100
यज्ञं चकार विधिना धिषणोध्वर्युसत्तमः
पद्मं कृत्वा मृणालाढ्यं पद्मदीक्षाप्रयोगतः१०१
अनुजग्राह देवांस्तान्सुरेच्छा प्रेरितो मुनिः
तेभ्यो ददौ विवेकिभ्यः स वेदोक्तावधानवित्१०२
दीक्षां वै विस्मयं त्यक्त्वा बृहस्पतिरुदारधीः
एकमग्निं च संस्कृत्य महात्मा त्रिदिवौकसाम्१०३
प्रादादांगिरसस्तुष्टो जाप्यं वेदोदितं तु यत्
त्रिसुपर्णं त्रिमधु च पावमानीं च पावनीम्१०४
स हि जाप्यादिकं सर्वमशिक्षयदुदारधीः
आपो हिष्ठेति यत्स्नानं ब्राह्मं तत्परिपठ्यते१०५
पापघ्नं दुष्टशमनं पुष्टिश्रीबलवर्द्धनम्
सिद्धिदं कीर्तिदं चैव कलिकल्मषनाशनम्१०६
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मस्नानं समाचरेत्
कुर्वंतो मौनिनो दांता दीक्षिताः क्षपितेंद्रियाः१०७
सर्वे कमंडलुयुता मुक्तकक्षाक्षमालिनः
दंडिनश्चीरवस्त्राश्च जटाभिरतिशोभिताः१०८
स्नानाचारासनरताः प्रयत्नध्यानधारिणः
मनो ब्रह्मणि संयोज्य नियताहारकांक्षिणः१०९
अतिष्ठन्दर्शनालापसंगध्यानविवर्जिताः
एवं व्रतधराः सर्वे त्रिकालं स्नानकारिणः११०
भक्त्या परमया युक्ता विधिना परमेण च
कालेन महता ध्यानाद्देवज्ञानमनोगताः१११
ब्रह्मध्यानाग्निनिर्दग्धा यदा शुद्धैकमानसाः
अविर्बभूव भगवान्सर्वेषां दृष्टिगोचरः११२
तेजसाप्यायितास्तस्य बभूवुर्भ्रांतचेतसः
ततोवलंब्य ते धैर्यमिष्टं देवं यथाविधि११३
षडंगवेदयोगेन हृष्टचित्तास्तु तत्पराः
शिरोगतैरंजलिभिः शिरोभिश्च महीं गताः११४
तुष्टुवुः सृष्टिकर्त्तारं स्थितिकर्तारमीश्वरम्
देवा ऊचुः
ब्रह्मणे ब्रह्मदेहाय ब्रह्मण्यायाऽजिताय च११५
नमस्कुर्मः सुनियताः क्रतुवेदप्रदायिने
लोकानुकंपिने देव सृष्टिरूपाय वै नमः११६
भक्तानुकंपिनेत्यर्थं वेदजाप्यस्तुताय च
बहुरूपस्वरूपाय रूपाणां शतधारिणे११७
सावित्रीपतये देव गायत्रीपतये नमः
पद्मासनाय पद्माय पद्मवक्त्राय ते नमः११८
वरदाय वरार्हाय कूर्माय च मृगाय च
जटामकुटयुक्ताय स्रुवस्रुचनिधारिणे११९
मृगांकमृगधर्माय धर्मनेत्राय ते नमः
विश्वनाम्नेऽथ विश्वाय विश्वेशाय नमोनमः१२०
धर्मनेत्रत्राणमस्मादधिकं कर्तुमर्हसि
वाङ्मनःकायभावैस्त्वां प्रपन्नास्स्मः पितामह१२१
एवं स्तुतस्तदा देवैर्ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः
प्रदास्यामि स्मृतो बाढममोघं दर्शनं हि वः१२२
ब्रुवंतु वांछितं पुत्राः प्रदास्यामि वरान्वरान्
एवमुक्ता भगवता देवा वचनमब्रुवन्१२३
एष एवाद्य भगवन्सुपर्याप्तो महान्वरः
जनितो नः सुशब्दोयं कमलं क्षिपता त्वया१२४
किमर्थं कंपिता भूमिर्लोकाश्चाकुलिताः कृताः
नैतन्निरर्थकं देव उच्यतामत्र कारणम्१२५
ब्रह्मोवाच
युष्मद्धितार्थमेतद्वै पद्मं विनिहितं मया
देवतानां च रक्षार्थं श्रूयतामत्र कारणम्१२६
असुरो वज्रनाभोऽयं बालजीवापहारकः
अवस्थितस्त्ववष्टभ्य रसातलतलाश्रयम्१२७
युष्मदागमनं ज्ञात्वा तपस्थान्निहितायुधान्
हंतुकामो दुराचारः सेंद्रानपि दिवौकसः१२८
घातः कमलपातेन मया तस्य विनिर्मितः
स राज्यैश्वर्यदर्पिष्टस्तेनासौ निहतो मया१२९
लोकेऽस्मिन्समये भक्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः
मैव ते दुर्गतिं यांतु लभंतां सुगतिं पुनः१३०
देवानां दानवानां च मनुष्योरगरक्षसाम्
भूतग्रामस्य सर्वस्य समोस्मि त्रिदिवौकसः१३१
युष्मद्धितार्थं पापोऽसौ मया मंत्रेण घातितः
प्राप्तः पुण्यकृतान्लोकान्कमलस्यास्य दर्शनात्१३२
यन्मया पद्ममुक्तं तु तेनेदं पुष्करं भुवि
ख्यातं भविष्यते तीर्थं पावनं पुण्यदं महत्१३३
पृथिव्यां सर्वजंतूनां पुण्यदं परिपठ्यते
कृतो ह्यनुग्रहो देवा भक्तानां भक्तिमिच्छताम्१३४
वनेस्मिन्नित्यवासेन वृक्षैरभ्यर्थितेन च
महाकालो वनेऽत्रागादागतस्य ममानघाः१३५
तपस्यतां च भवतां महज्ज्ञानं प्रदर्शितम्
कुरुध्वं हृदये देवाः स्वार्थं चैव परार्थकम्१३६
भवद्भिर्दर्शनीयं तु नानारूपधरैर्भुवि
द्विषन्वै ज्ञानिनं विप्रं पापेनैवार्दितो नरः१३७
न विमुच्येत पापेन जन्मकोटिशतैरपि
वेदांगपारगं विप्रं न हन्यान्न च दूषयेत्१३८
एकस्मिन्निहते यस्मात्कोटिर्भवति घातिता
एकं वेदांतगं विप्रं भोजयेच्छ्रद्धयान्वितः१३९
तस्य भुक्ता भवेत्कोटिर्विप्राणां नात्र संशयः
यः पात्रपूरणीं भिक्षां यतीनां तु प्रयच्छति१४०
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो नाऽसौ दुर्गतिमाप्नुयात्
यथाहं सर्वदेवानां ज्येष्ठः श्रेष्ठः पितामहः१४१
तथा ज्ञानी सदा पूज्यो निर्ममो निः परिग्रहः
संसारबंधमोक्षार्थं ब्रह्मगुप्तमिदं व्रतम्१४२
मया प्रणीतं विप्राणामपुनर्भवकारणम्
अग्निहोत्रमुपादाय यस्त्यजेदजितेंद्रियः१४३
रौरवं स प्रयात्याशु प्रणीतो यमकिंकरैः
लोकयात्रावितंडश्च क्षुद्रं कर्म करोति यः१४४
स रागचित्तः शृंगारी नारीजन धनप्रियः
एकभोजी सुमिष्टाशी कृषिवाणिज्यसेवकः१४५
अवेदो वेदनिंदी च परभार्यां च सेवते
इत्यादिदोषदुष्टो यस्तस्य संभाषणादपि१४६
नरो नरकगामी स्याद्यश्च सद्व्रतदूषकः
असंतुष्टं भिन्नचित्तं दुर्मतिं पापकारिणम्१४७
न स्पृशेदंगसंगेन स्पृष्ट्वा स्नानेन शुद्ध्यति
एवमुक्त्वा स भगवान्ब्रह्मा तैरमरैः सह१४८
क्षेत्रं निवेशयामास यथावत्कथयामि ते
उत्तरे चंद्रनद्यास्तु प्राची यावत्सरस्वती१४९
पूर्वं तु नंदनात्कृत्स्नं यावत्कल्पं सपुष्करम्
वेदी ह्येषा कृता यज्ञे ब्रह्मणा लोककारिणा१५० 1.15.150
ज्येष्ठं तु प्रथमं ज्ञेयं तीर्थं त्रैलोक्यपावनम्
ख्यातं तद्ब्रह्मदैवत्यं मध्यमं वैष्णवं तथा१५१
कनिष्ठं रुद्रदैवत्यं ब्रह्मपूर्वमकारयत्
आद्यमेतत्परं क्षेत्रं गुह्यं वेदेषु पठ्यते१५२
अरण्यं पुष्कराख्यं तु ब्रह्मा सन्निहितः प्रभुः
अनुग्रहो भूमिभागे कृतो वै ब्रह्मणा स्वयम्१५३
अनुग्रहार्थं विप्राणां सर्वेषां भूमिचारिणाम्
सुवर्णवज्रपर्यंता वेदिकांका मही कृता१५४
विचित्रकुट्टिमारत्नैः कारिता सर्वशोभना
रमते तत्र भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः१५५
विष्णुरुद्रौ तथा देवौ वसवोप्पश्चिनावपि  ?
मरुतश्च महेंद्रेण रमंते च दिवौकसः१५६
एतत्ते तथ्यमाख्यातं लोकानुग्रहकारणम्
संहितानुक्रमेणात्र मंत्रैश्च विधिपूर्वकम्१५७
वेदान्पठंति ये विप्रा गुरुशुश्रूषणे रताः
वसंति ब्रह्मसामीप्ये सर्वे तेनानुभाविताः१५८
भीष्म उवाच
भगवन्केन विधिना अरण्ये पुष्करे नरैः
ब्रह्मलोकमभीप्सद्भिर्वस्तव्यं क्षेत्रवासिभिः१५९
किं मनुष्यैरुतस्त्रीभिरुत वर्णाश्रमान्वितैः
वसद्भिः किमनुष्ठेयमेतत्सर्वं ब्रवीहि मे१६०
पुलस्त्य उवाच
नरैः स्त्रीभिश्च वस्तव्यं वर्णाश्रमनिवासिभिः
स्वधर्माचारनिरतैर्दंभमोहविवर्जितैः१६१
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्मभक्तैर्जितेंद्रियैः
अनसूयुभिरक्षुद्रैः सर्वभूतहिते रतैः१६२
भीष्म उवाच
किं कुर्वाणो नरः कर्म ब्रह्मभक्तस्त्विहोच्यते
कीदृशा ब्रह्मभक्ताश्च स्मृता नॄणां वदस्व मे१६३
पुलस्त्य उवाच
त्रिविधा भक्तिरुद्दिष्टा मनोवाक्कायसंभवा
लौकिकी वैदिकी चापि भवेदाध्यात्मिकी तथा१६४
ध्यानधारणया बुद्ध्या वेदार्थस्मरणे हि यत्
ब्रह्मप्रीतिकरी चैषा मानसी भक्तिरुच्यते१६५
मंत्रवेदनमस्कारैरग्निश्राद्धादिचिंतनैः
जाप्यैश्चावश्यकैश्चैव वाचिकी भक्तिरिष्यते१६६
व्रतोपवासनियतैश्चितेंद्रियनिरोधिभिः
भूषणैर्हेमरत्नाढ्यैस्तथा चांद्रायणादिभिः१६७
ब्रह्मकृच्छ्रोपवासैश्च तथाचान्यैः शुभव्रतैः
कायिकीभक्तिराख्याता त्रिविधा तु द्विजन्मनाम्१६८
गोघृतक्षीरदधिभिः रत्नदीपकुशोदकैः
गंधैर्माल्यैश्च विविधैर्धातुभिश्चोपपादितैः१६९
घृतगुग्गुलुधूपैश्च कृष्णागरुसुगंधिभिः
भूषणैर्हेमरत्नाढ्यैश्चित्राभिः स्रग्भिरेव च१७०
नृत्यवादित्रगीतैश्च सर्वरत्नोपहारकैः
भक्ष्यभोज्यान्नपानैश्च या पूजा क्रियते नरैः१७१
पितामहं समुद्दिश्य भक्तिस्सा लौकिकी मता
वेदमंत्रहविर्योगैर्भक्तिर्या वैदिकी मता१७२
दर्शे वा पौर्णमास्यां वा कर्तव्यमग्निहोत्रकम्
प्रशस्तं दक्षिणादानं पुरोडाशं चरुक्रिया१७३
इष्टिर्धृतिः सोमपानां यज्ञीयं कर्म सर्वशः
ऋग्यजुःसामजाप्यानि संहिताध्ययनानि च१७४
क्रियंते विधिमुद्दिश्य सा भक्तिर्वैदिकीष्यते
अग्नि भूम्यनिलाकाशांबुनिशाकरभास्करम्१७५
समुद्दिश्य कृतं कर्म तत्सर्वं ब्रह्मदैवतम्
आध्यात्मिकी तु द्विविधा ब्रह्मभक्तिः स्थिता नृप१७६
संख्याख्या योगजा चान्या विभागं तत्र मे शृणु
चतुर्विंशतितत्वानि प्रधानादीनि संख्यया१७७
अचेतनानि भोग्यानि पुरुषः पंचविंशकः
चेतनः पुरुषो भोक्ता न कर्ता तस्य कर्मणः१७८
आत्मा नित्योऽव्ययश्चैव अधिष्ठाता प्रयोजकः
अव्यक्तः पुरुषो नित्यः कारणं च पितामहः१७९
तत्वसर्गो भावसर्गो भूतसर्गश्च तत्त्वतः
संख्यया परिसंख्याय प्रधानं च गुणात्मकम्१८०
साधर्म्यमानमैश्वर्यं प्रधानं च विधर्मि च
कारणत्वं च ब्रह्मत्वं काम्यत्वमिदमुच्यते१८१
प्रयोज्यत्वं प्रधानस्य वैधर्म्यमिदमुच्यते
सर्वत्रकर्तृस्यद्ब्रह्मपुरुषस्याप्यकर्तृता१८२
चेतनत्वं प्रधाने च साधर्म्यमिदमुच्यते
तत्वांतरं च तत्वानां कर्मकारणमेव च१८३
प्रयोजनं च नैयोज्यमैश्वर्यं तत्वसंख्यया
संख्यास्तीत्युच्यते प्राज्ञैर्विनिश्चित्यार्थचिंतकैः१८४
इति तत्वस्य संभारं तत्वसंख्या च तत्वतः
ब्रह्मतत्वाधिकं चापि श्रुत्वा तत्वं विदुर्बुधाः१८५
सांख्यकृद्भक्तिरेषा च सद्भिराध्यात्मिकी कृता
योगजामपि भक्तानां शृणु भक्तिं पितामहे१८६
प्राणायामपरो नित्यं ध्यानवान्नियतेंद्रियः
भैक्ष्यभक्षी व्रती वापि सर्वप्रत्याहृतेंद्रियः१८७
धारणं हृदये कुर्याद्ध्यायमानः प्रजेश्वरम्
हृत्पद्मकर्णिकासीनं रक्तवक्त्रं सुलोचनम्१८८
परितो द्योतितमुखं ब्रह्मसूत्रकटीतटम्
चतुर्वक्त्रं चतुर्बाहुं वरदाभयहस्तकम्१८९
योगजा मानसी सिद्धिर्ब्रह्मभक्तिः परा स्मृता
य एवं भक्तिमान्देवे ब्रह्मभक्तः स उच्यते१९०
वृत्तिं च शृणु राजेंद्र या स्मृता क्षेत्रवासिनाम्
स्वयं देवेन विप्राणां विष्ण्वादीनां समागमे१९१
कथिता विस्तरात्पूर्वं सर्वेषां तत्र सन्निधौ
निर्ममा निरहंकारा निःसंगा निष्परिग्रहाः१९२
बंधुवर्गे च निःस्नेहास्समलोष्टाश्मकांचनाः
भूतानां कर्मभिर्नित्यैर्विविधैरभयप्रदाः१९३
प्राणायामपरा नित्यं परध्यानपरायणाः
याजिनः शुचयो नित्यं यतिधर्मपरायणाः१९४
सांख्ययोगविधिज्ञाश्च धर्मज्ञाश्छिन्नसंशयाः
यजंते विधिनानेन ये विप्राः क्षेत्रवासिनः१९५
अरण्ये पौष्करे तेषां मृतानां सत्फलं शृणु
व्रजंति ते सुदुष्प्रापं ब्रह्मसायुज्यमक्षयम्१९६
यत्प्राप्य न पुनर्जन्म लभन्ते मृत्युदायकम्
पुनरावर्तनं हित्वा ब्राह्मीविद्यां समास्थिताः१९७
पुनरावृत्तिरन्येषां प्रपंचाश्रमवासिनाम्
गार्हस्थ्यविधिमाश्रित्य षट्कर्मनिरतः सदा१९८
जुहोति विधिना सम्यङ्मंत्रैर्यज्ञे निमंत्रितः
अधिकं फलमाप्नोति सर्वदुःखविवर्जितः१९९
सर्वलोकेषु चाप्यस्य गतिर्न प्रतिहन्यते
दिव्येनैश्वर्ययोगेन स्वारूढः सपरिग्रहः२०० 1.15.200
बालसूर्यप्रकाशेन विमानेन सुवर्चसा
वृतः स्त्रीणां सहस्रैस्तु स्वंच्छदगमनालयः२०१
विचरत्यनिवार्येण सर्वलोकान्यदृच्छया
स्पृहणीयतमः पुंसां सर्वधर्मोत्तमो धनी२०२
स्वर्गच्युतः प्रजायेत कुले महति रूपवान्
धर्मज्ञो धर्मभक्तश्च सर्वविद्यार्थपारगः२०३
तथैव ब्रह्मचर्येण गुरुशुश्रूषणेन च
वेदाध्ययनसंयुक्तो भैक्ष्यवृतिर्जितेन्द्रियः२०४
नित्यं सत्यव्रते युक्तः स्वधर्मेष्वप्रमादवान्
सर्वकामसमृद्धेन सर्वकामावलंबिना२०५
सूर्येणेव द्वितीयेन विमानेनानिवारितः
गुह्यकानामब्रह्माख्य गणाः परमसंमताः२०६
अप्रमेयबलैश्वर्या देवदानवपूजिताः
तेषां स समता याति तुल्यैश्वर्यसमन्वितः२०७
देवदानवमर्त्येषु भवत्यनियतायुधः
वर्षकोटिसहस्राणि वर्षकोटिशतानि च२०८
एवमैश्वर्यसंयुक्तो विष्णुलोके महीयते
उषित्वाऽसौ विभूत्यैवं यदा प्रच्यवते पुनः२०९
विष्णुलोकात्स्वकृत्येन स्वर्गस्थानेषु जायते२१०
पुष्करारण्यमासाद्य ब्रह्मचर्याश्रमे स्थितः
अभ्यासेन तु वेदानां वसति म्रियतेपि वा२११
मृतोऽसौ याति दिव्येन विमानेन स्वतेजसा
पूर्णचंद्रप्रकाशेन शशिवत्प्रियदर्शनः२१२
रुद्रलोकं समासाद्य गुह्यकैः सह मोदते
ऐश्वर्यं महदाप्नोति सर्वस्य जगतः प्रभुः२१३
भुक्त्वा युगसहस्राणि रुद्रलोके महीयते
प्रच्युतस्तु पुनस्तस्माद्रुद्रलोकात्क्रमेण तु२१४
नित्यं प्रमुदितस्तत्र भुक्त्वा सुखमनामयम्
द्विजानां सदने दिव्ये कुले महति जायते२१५
मानुषेषु स धर्म्मात्मा सुरूपो वाक्पतिर्भवेत्
स्पृहणीयवपुः स्त्रीणाम्महाभोगपतिर्बली२१६
वानप्रस्थसमाचारी ग्राम्यौषधिविवर्जितः
सर्वलोकेषु चाप्यस्य गतिर्न प्रतिहन्यते२१७
शीर्णपर्णफलाहारः पुष्पमूलांबुभोजनः
कापोतेनाश्मकुट्टेन दंतोलूखलिकेन च२१८
वृत्युपायेन जीवेत चीरवल्कलवाससा
जटीत्रिषवणस्नायी त्यक्तदोषस्तु दंडवान्२१९
कृच्छ्रव्रतपरो यस्तु श्वपचो यदि वा परः
जलशायी पंचतपा वर्षास्वभ्रावगाहकः२२०
कीटकंटकपाषाणभूम्यां तु शयनं तथा
स्थानवीरासनरतः संविभागी दृढव्रतः२२१
अरण्यौषधिभोक्ता च सर्वभूताभयप्रदः
नित्यं धर्मार्जनरतो जितक्रोधो जितेंद्रियः२२२
ब्रह्मभक्तः क्षेत्रवासी पुष्करे वसते मुनिः
सर्वसंगपरित्यागी स्वारामो विगतस्पृहः२२३
यश्चात्र वसते भीष्म शृणु तस्यापि या गतिः
तरुणार्कप्रकाशेन वेदिकास्तंभशोभिना२२४
ब्रह्मभक्तो विमानेन याति कामप्रचारिणाम्
विराजमानो नभसि द्वितीय इव चंद्रमाः२२५
गीतवादित्रनृत्यज्ञैर्गंधर्वाप्सरसांगणैः
अप्सरोभिः समायुक्तो वर्षकोटिशतान्यसौ२२६
यस्य कस्यापि देवस्य लोकं यात्यनिवारितः
ब्रह्मणोऽनुग्रहेणैव तत्रतत्र विराजते२२७
ब्रह्मलोकाच्च्युतश्चापि विष्णुलोकं स गच्छति
विष्णुलोकात्परिभ्रष्टो रुद्रलोकं स गच्छति२२८
तस्मादपि च्युतः स्थानाद्द्वीपेषु स हि जायते
स्वर्गेषु च तथान्येषु भोगान्भुक्त्वा यथेप्सितान्२२९
भुक्त्वैश्वर्यं ततस्तेषु पुनर्मर्त्येषु जायते
राजा वा राजपुत्रो वा जायते धनवान्सुखी२३०
सुरूपः सुभगः कांतः कीर्तिमान्भक्तिभावितः
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वा क्षेत्रवासिनः२३१
स्वधर्मनिरता राजन्सुवृत्ताश्चिरजीविनः
सर्वात्मना ब्रह्मभक्ता भूतानुग्रहकारिणः२३२
पुष्करे तु महाक्षेत्रे ये वसंति मुमुक्षवः
मृतास्ते ब्रह्मभवनं विमानैर्यांति शोभनैः२३३
अप्सरोगणसंघुष्टैः कामगैः कामरूपिभिः
अथवा सर्वदीप्ताग्नौ स्वशरीरं जुहोति यः२३४
ब्रह्मध्यायी महासत्वस्स ब्रह्मभवनं व्रजेत्
ब्रह्मलोकोऽक्षयस्तस्य शाश्वतो विभवैः सह२३५
सर्वलोकोत्तमो रम्यो भवतीष्टार्थसाधकः
पुष्करे तु महापुण्ये प्राणान्ये सलिले त्यजन्२३६
तेषामप्यक्षयो भीष्म ब्रह्मलोको महात्मनाम्
साक्षात्पश्यंति ते देवं सर्वदुःखविनाशनम्२३७
सर्वामरयुतं देवं रुद्रविष्णुगणैर्युतम्
अनाशके मृताश्शूद्राः पुष्करे तु वने नराः२३८
हंसयुक्तैस्ततो यांति विमानैरर्कसप्रभैः
नानारत्नसुवर्णाढ्यैर्दृढैर्गंधाधिवासितैः२३९
अनौपम्यगुणैरन्यैरप्सरोगीतनादितैः
पताकाध्वजविन्यस्तैर्नानाघण्टानिनादितैः२४०
बह्वाश्चर्यसमोपेतैः क्रीडाविज्ञानशालिभिः
सुप्रभैर्गुणसंपन्नैर्मयूरवरवाहिभिः२४१
ब्रह्मलोके नरा धीरा रमंते नाशके मृताः
तत्रोषित्वा चिरं कालं भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान्२४२
धनी विप्नकुले भोगी जायते मर्त्यमागतः
कारीषीं साधयेद्यस्तु पुष्करे तु वने नरः२४३
सर्वलोकान्परित्यज्य ब्रह्मलोकं स गच्छति
ब्रह्मलोके वसेत्तावद्यावत्कल्पक्षयो भवेत्२४४
नैव पश्यति मर्त्यं हि क्लिश्यमानं स्वकर्मभिः
गतिस्तस्याऽप्रतिहता तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा२४५
स पूज्यः सर्वलोकेषु यशो विस्तारयन्वशी
सदाचारविधिप्रज्ञः सर्वेन्द्रिय मनोहरः२४६
नृत्यवादित्रगीतज्ञः सुभगः प्रियदर्शनः
नित्यमम्लानकुसुमो दिव्याभरणभूषितः२४७
नीलोत्पलदलश्यामो नीलकुंचितमूर्द्धजः
अजघन्याः सुमध्याश्च सर्वसौभाग्यपूरिताः२४८
सर्वैश्वर्यगुणोपेता यौवनेनातिगर्विताः
स्त्रियः सेवंति तत्रस्थाः शयने रमयंति च२४९
वीणावेणुनिनादैश्च सुप्तः संप्रतिबुध्यते
महोत्सवसुखं भुंक्ते दुःप्राप्यमकृतात्मभिः२५० 1.15.250
प्रसादाद्देवदेवस्य ब्रह्मणः शुभकारिणः
भीष्म उवाच
आचाराः परमा धर्माः क्षेत्रधर्मपरायणाः२५१
स्वधर्माचारनिरता जितक्रोधा जितेंद्रियाः
ब्रह्मलोकं व्रजंतीति नैतच्चित्रं मतं मम२५२
असंशयं च गच्छंति लोकानन्यानपि द्विजाः
विना पद्मोपवासेन तथैव नियमेन च२५३
स्त्रियो म्लेछाश्च शूद्राश्च पक्षिणः पशवो मृगाः
मूका जडान्धबधिरास्तपो नियमवर्जिताः२५४
तेषां वद गतिं विप्र पुष्करे ये त्ववस्थिताः
पुलस्त्य उवाच
स्त्रियो म्लेच्छाश्च शूद्राश्च पशवः पक्षिणो मृगाः२५५
पुष्करे तु मृता भीष्म ब्रह्मलोकं व्रजंति ते
शरीरैर्दिव्यरूपैस्तु विमानै रविसप्रभैः२५६
दिव्यव्यूहसमायुक्तैः सुवर्णवरकेतनैः
सुवर्णवज्रसोपानमणिस्तंभविभूषितैः२५७
सर्वकामोपभोगाढ्यैः कामगैः कामरूपिभिः
नानारसाढ्यं गच्छंति स्त्रीसहस्रसमाकुलाः२५८
ब्रह्मलोकं महात्मानो लोकानन्यान्यथेप्सितान्
ब्रह्मलोकाच्च्युताश्चापि क्रमाद्द्वीपेषु यांति ते२५९
कुले महति विस्तीर्णे धनी भवति स द्विजः
तिर्यग्योनि गता ये तु सर्पकीटपिपीलिकाः२६०
स्थलजा जलजाश्चैव स्वेदांडोद्भिज्जरायुजाः
सकामा वाप्यकामा वा पुष्करे तु वने मृताः२६१
सूर्यप्रभविमानस्था ब्रह्मलोकं प्रयांति ते
कलौ युगे महाघोरे प्रजाः पापसमीरिताः२६२
नान्येनास्मिन्नुपायेन धर्मः स्वर्गश्च लभ्यते
वसंति पुष्करे ये तु ब्रह्मार्चनरता नराः२६३
कलौ युगे कृतार्थास्ते क्लिश्यंत्यन्ये निरर्थकाः
रात्रौ करोति यत्पापं नरः पंचभिरिंद्रियैः२६४
कर्मणा मनसा वाचा कामक्रोधवशानुगाः
प्रातः स जलमासाद्य पुष्करे तु पितामहम्२६५
अभिगम्य शुचिर्भूत्त्वा तस्मात्पापात्प्रमुच्यते
उदयेऽर्कस्य चारभ्य यावद्दर्शनमूर्ध्वगम्२६६
मानसाख्ये प्रसंचिंत्य ब्रह्मयोगे हरेदघम्
दृष्ट्वा विरिंचिं मध्याह्ने नरः पापात्प्रमुच्यते२६७
मध्याह्नास्तमयान्तं यदिंद्रियैः पापमाचरेत्
पितामहस्य संध्यायां दर्शनादेव मुच्यते२६८
शब्दादीन्विषयान्सर्वान्भुंजानोपि सकामतः
यः पुष्करे ब्रह्मभक्तो निवसेत्तपसि स्थितः२६९
पुष्करारण्यमध्यस्थो मिष्टान्नास्वादभोजनः
त्रिकालमपि भुंजानो वायुभक्षसमो मतः२७०
वसंति पुष्करे ये तु नराः सुकृतकर्मिणः
ते लभंते महाभोगान्क्षेत्रस्यास्य प्रभावतः२७१
यथा महोदधेस्तुल्यो न चान्योऽस्ति जलाशयः
तथा वै पुष्करस्यापि समं तीर्थं न विद्यते२७२
पुष्करारण्यसदृशं तीर्थं नास्त्यधिकं गुणैः
अथ तेऽन्यान्प्रवक्ष्यामि क्षेत्रे येऽस्मिन्व्यवस्थिताः२७३
विष्णुना सहिताः सर्व इंद्राद्याश्च दिवौकसः
गजवक्त्रः कुमारश्च रेवंतः सदिवाकरः२७४
शिवदूती तथा देवी कन्या क्षेमंकरी सदा
अलं तपोभिर्नियमैः सुक्रियार्चनकारिणाम्२७५
व्रतोपवासकर्माणि कृत्वान्यत्र महांत्यपि
ज्येष्ठे तु पुष्करारण्ये यस्तिष्ठति निरुद्यमः२७६
लभते सर्वकामित्वं योऽत्रैवास्ते द्विजः सदा
पितामहसमं याति स्थानं परममव्ययम्२७७
कृते द्वादशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तु
मासेन द्वापरे भीष्म अहोरात्रेण तत्कलौ२७८
फलं संप्राप्यते लोके क्षेत्रेस्मिंस्तीर्थवासिभिः
इत्येवं देवदेवेन पुरोक्तं ब्रह्मणा मम२७९
नातः परतरं किंचित्क्षेत्रमस्तीह भूतले
तस्मात्सर्वप्रयत्नेनारण्यमेतत्समाश्रयेत्२८०
गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः
यथोक्तकारिणः सर्वे गच्छंति परमां गतिम्२८१
एकस्मिन्नाश्रमे धर्मं योऽनुतिष्ठेद्यथाविधि
अकामद्वेषसंयुक्तः स परत्र महीयते२८२
चतुष्पथाहि निःश्रेणी ब्रह्मणेह प्रतिष्ठिता
एतामाश्रित्य निश्रेणीं ब्रह्मलोके महीयते२८३
आयुषोऽपि चतुर्भागं ब्रह्मचार्यनसूयकः
गुरौ वा गुरुपुत्रे वा वसेद्धर्मार्थकोविदः२८४
कर्मातिरेकेण गुरोरध्येतव्यं बुभूषता
दक्षिणानां प्रदापी स्यादाहूतो गुरुमाश्रयेत्२८५
जघन्यशायी पूर्वं स्यादुत्थायी गुरुवेश्मनि
यच्च शिष्येण कर्त्तव्यं कार्यमासेवनादिकम्२८६
कृतमित्येव तत्सर्वं कृत्वा तिष्ठेत्तु पार्श्वतः
किंकरः सर्वकारी च सर्वकर्मसुकोविदः२८७
शुचिर्दक्षो गुणोपेतो ब्रूयादिष्टमथोत्तरम्
चक्षुषा गुरुमव्यग्रो निरीक्षेत जितेंद्रियः२८८
नाऽभुक्तवति चाश्नीयादपीतवति नो पिबेत्
न तिष्ठति तथासीत न सुप्तेनैव संविशेत्२८९
उत्तानाभ्यां च पाणिभ्यां पादावस्य मृदु स्पृशेत्
दक्षिणं दक्षिणेनैव सव्यं सव्येन पीडयेत्२९०
अभिवाद्य गुरुं ब्रूयादभिधां स्वां ब्रुवन्निति
इदं करिष्ये भगवन्निदं चापि मया कृतम्२९१
इति सर्वं च विज्ञाप्य निवेद्य गुरवे धनम्
कुर्यात्कृतं च तत्सर्वमाख्येयं गुरवे पुनः२९२
यांस्तु गंधान्रसान्वापि ब्रह्मचारी न सेवते
सेवेत तान्समावृत्य इति धर्मेषु निश्चयः२९३
ये केचिद्विस्तरेणोक्ता नियमा ब्रह्मचारिणः
तान्सर्वाननुगृह्णीयाद्भक्तश्शिष्यश्च वै गुरोः२९४
स एव गुरवे प्रीतिमुपकृत्य यथाबलम्
अग्राम्येष्वाश्रमेष्वेव शिष्यो वर्तेत कर्मणा२९५
वेदवेदौ तथा वेदान्वेदार्थांश्च तथा द्विजः
भिक्षाभुगप्यधःशायी समधीत्य गुरोर्मुखात्२९६
वेदव्रतोपयोगी च चतुर्थांशेन योगतः
गुरवे दक्षिणां दत्वा समावर्तेद्यथाविधि२९७
धर्मान्वितैर्युतो दारैरग्नीनावाह्य पूजयेत्
द्वितीयमायुषो भागं गृहमेधी समाचरेत्२९८
गृहस्थवृत्तयः पूर्वं चतस्रो मुनिभिः कृताः
कुसूलधान्या प्रथमा कुंभीधान्या द्वितीयका२९९
अश्वस्तनी तृतीयोक्ता कापोत्यथ चतुर्थिका
तासां परापरा श्रेष्ठा धर्मतो लोकजित्तमा३०० 1.15.300
षट्कर्मवर्त्तकस्त्वेकस्त्रिभिरन्यः प्रसर्पते
द्वाभ्यां चैव चतुर्थस्तु द्विजः स ब्रह्मणि स्थितः३०१
गृहमेधिव्रतादन्यन्महत्तीर्थं न चक्षते
नात्मार्थे पाचयेदन्नं न वृथा घातयेत्पशुम्३०२
प्राणी वा यदि वाप्राणी संस्काराद्यज्ञमर्हति
न दिवा प्रस्वपेज्जातु न पूर्वापररात्रयोः३०३
न भुंजीतांतराकाले नानृतं तु वदेदिह
न चाप्यश्नन्वसेद्विप्रो गृहे कश्चिदपूजितः३०४
तथास्यातिथयः पूज्या हव्यकव्यवहाः स्मृताः
वेदविद्याव्रतस्नाता श्रोत्रिया वेदपारगाः३०५
स्वकर्मजीविनोदांताः क्रियावंतस्तपस्विनः
तेषां हव्यं च कव्यं चाप्यर्हणार्थं विधीयते३०६
नश्वरैस्संप्रयातस्य स्वधर्मापगतस्य च
अपविद्धाग्निहोत्रस्य गुरोर्वालीककारिणः३०७
असत्याभिनिवेशस्य नाधिकारोस्ति कर्मणोः
संविभागोत्र भूतानां सर्वेषामेव शिष्यते३०८
तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना
विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं चामृतभोजनः३०९
अमृतं यज्ञशेषं स्याद्भोजनं हविषा समम्
संभुक्तशेषं योश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम्३१०
स्वदारनिरतो दांतो दक्षोत्यर्थं जितेंद्रियः
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमातुलातिथिसंहतैः३११
वृद्धबालातुरैर्वैद्यैर्ज्ञातिसंबंधि बांधवैः
मात्रा पित्रा च जामात्रा भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया३१२
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्
एतान्विमुच्य संवादान्सर्वपापैः प्रमुच्यते३१३
एतैर्जितैस्तु जयति सर्वलोकान्न संशयः
आचार्यो ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्य प्रभुः पिता३१४
अतिथिः सर्वलोकेश ऋत्विग्वेदाश्रयः प्रभुः
जामाताप्सरसांलोके ज्ञातयो वैश्वदेविकाः३१५
संबंधि बांधवा दिक्षु पृथिव्यां मातृमातुलौ
वृद्धबालातुराश्चैव आकाशे प्रभविष्णवः३१६
पुरोधा ऋषिलोकेशः संश्रितास्साध्यलोकपाः
अश्विलोकपतिर्वैद्यो भ्राता तु वसुलोकपः३१७
चंद्रलोकेश्वरी भार्या दुहिताप्सरसां गृहे
भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्र स्वकातनुः३१८
कायस्था दासवर्गाश्च दुहिता कृपणं परम्
तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेन्नित्यमसंज्वरः३१९
गृहधर्मरतो विद्वान्धर्मनिष्ठो जितक्लमः
नारभेद्बहुकार्याणि धर्मवान्किंचिदारभेत्३२०
गृहस्थवृत्तयस्तिस्रस्तासां निश्रेयसं परं
परस्परं तथैवाहुश्चातुराश्रम्यमेव च३२१
ये चोक्तानि यमास्तेषां सर्वं कार्यं बुभूषुणा
कुंभधान्यैरुंच्छशिलैः कापोतीं वृत्तिमाश्रितैः३२२
यस्मिंश्चैते वसंत्यर्थास्तद्राष्ट्रमभिवर्धते
पूर्वापरान्दशपरान्पुनाति च पितामहान्३२३
गृहस्थवृत्तिमप्येतां वर्तयेद्यो गतव्यथः
स चक्रधरलोकानां समानाम्प्राप्नुयाद्गतिम्३२४
जितेंद्रियाणामथवा गतिरेषा विधीयते
स्वर्गलोको गृहस्थानां प्रतिष्ठा नियतात्मनां३२५
ब्रह्मणाभिहता श्रेणी ह्येषा यस्याः प्रमुच्यते
द्वितीयां क्रमशः प्राप्य स्वर्गलोके महीयते३२६
तृतीयामपि वक्ष्यामि वानप्रस्थाश्रमं शृणु
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः३२७
अपत्यस्यैव चापत्यं वनमेव तदाश्रयेत्
गृहस्थव्रतखिन्नानां वानप्रस्थाश्रमौकसां३२८
श्रूयतां भीष्म भद्रं ते सर्वलोकाश्रयात्मनां
दीक्षापूर्वं निवृत्तानां पुण्यदेशनिवासिनां३२९
प्रज्ञाबलयुजां पुंसां सत्यशौचक्षमावतां
तृतीयमायुषो भागं वानप्रस्थाश्रमे वसन्३३०
तानेवाग्नीन्परिचरेद्यजमानो दिवौकसः
नियतो नियताहारो विष्णुभक्तिप्रसक्तिमान्३३१
तदाग्निहोत्रमात्राणि यज्ञांगानि च सर्वशः
अकृष्टं वै व्रीहियवं नीवारं विघसानि च३३२
ग्रीष्मे हविष्यं प्रायच्छेत्स माघेष्वपि पंचसु
वानप्रस्थाश्रमेप्येताश्चतस्रो वृत्तयः स्मृताः३३३
सद्यः प्रभक्षकाः केचित्केचिन्मासिकसंचयान्
वार्षिकान्संचयान्केचित्केचिद्द्वादशवार्षिकान्३३४
कुर्वन्त्यतिथिपूजार्थं यज्ञतन्त्रार्थमेव च
अभ्रावकाशा वर्षासु हेमंते जलसंश्रयाः३३५
ग्रीष्मे पंचाग्नितपसः शरद्यमृतभोजनाः
भूमौ विपरिवर्तंते तिष्ठंति प्रपदैरपि३३६
स्थानासने च वर्तन्ते वसनेष्वपि संस्थिते
दंतोलूखलिनः केचिदश्मकुट्टास्तथा परे३३७
शुक्लपक्षे पिबन्त्येके यवागूं क्वथितां क्वचित्
कृष्णपक्षे पिबंत्येके भुंजते च यथागमम्३३८
मूलैरेके फलैरेके जलैरेके दृढव्रताः
वर्त्तयंति यथान्यायं वैखानस धृतव्रताः३३९
एताश्चान्याश्च विविधा दीक्षास्तेषां मनस्विनां
चतुर्थश्चौपनिषदो धर्मः साधारणो मतः३४०
वानप्रस्थो गृहस्थश्च सततोन्यः प्रवर्त्तते
तस्मिन्नेव युगे तात विप्रैः सर्वार्थदर्शिभिः३४१
अगस्त्यश्च सप्तर्षयो मधुच्छंदो गवेषणः
सांकृतिः सदिवो भांडिर्यवप्रोथो ह्यथर्वणः३४२
अहोवीर्यस्तथा काम्यः स्थाणुर्मेधातिथिर्बुधः
मनोवाकः शिनीवाकः शून्यपालो कृतव्रणः३४३
एते कर्मसु विद्वांसस्ततः स्वर्गमुपागमन्
एते प्रत्यक्षधर्माणस्तथा यायावरागणाः३४४
ऋषीणामुग्रतपसां धर्मनैपुण्यदर्शिनाम्
सुरेश्वरं समाराध्य ब्राह्मणा वनमाश्रिताः३४५
अपास्योपरता मायां ब्राह्मणा वनमाश्रिताः
अनक्षत्रास्तथा धृष्या दृश्यन्ते प्रोषिता गणाः३४६
जरया तु परिद्यूना व्याधिना परिपीडिताः
चतुर्थं त्वाश्रमं शेषं वानप्रस्थाश्रमाद्ययुः३४७
सद्यस्कारी सुनिर्वाप्य सर्ववेदसदक्षिणाम्
आत्मयाजी सौम्यमतिरात्मक्रीडात्मसंश्रयः३४८
आत्मन्यग्निं समाधाय त्यक्त्वासर्वपरिग्रहम्
सद्यस्कश्च यजेद्यज्ञानिष्टिं चैवेह सर्वदा३४९
सदैव याजिनां यज्ञानात्मनीज्या प्रवर्त्तते
त्रीनेवाग्नींस्त्यजेत्सम्यगात्मन्येवात्मना क्षणात्३५० 1.15.350
प्राप्नुयाद्येन वा यच्च तत्प्राश्नीयादकुत्सयन्
केशलोमनखान्न्यस्येद्वानप्रस्थाश्रमे रतः३५१
आश्रमादाश्रमं सद्यः पूतो गच्छति कर्मभिः
अभयं सर्वभूतेभ्यो यो दत्वा प्रव्रजेद्द्विजः३५२
लोकास्तेजोमयास्तस्य प्रेत्य चानंत्यमश्नुते
सुशीलवृत्तो व्यपनीतकल्मषो न चेह नामुत्र चरन्तुमीहते३५३
अरोषमोहो गतसंधिविग्रहः स चेदुदासीनवदात्मचिंतया
यमेषु चैवान्यगतेषु न व्यथः स्वशास्त्रशून्यो हृदिनात्मविभ्रमः३५४
भवेद्यथेष्टागतिरात्मयाजिनी निस्संशये धर्मपरे जितेन्द्रिये
अतःपरं श्रेष्ठमतीवसद्गुणैरधिष्ठितं त्रीनतिवर्त्य चाश्रमान्३५५
चतुर्थमुक्तं परमाश्रमं शृणु प्रकीर्त्यमानं परमं परायणम्
प्राप्य संस्कारमेताभ्यामाश्रमाभ्यां ततः परम्३५६
यत्कार्यं परमात्मार्थं तत्त्वमेकमनाः शृणु
काषायं धारयित्वा तु श्रेणीस्थानेषु च त्रिषु३५७
यो व्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम्
तद्भावनेन संन्यस्य वर्तनं श्रूयतां तथा३५८
एक एव चरेद्धर्मं सिध्यर्थमसहायवान्
एकश्चरति यः पश्यन्न जहाति न हीयते३५९
अनग्निरनिकेतस्तु ग्रामं भिक्षार्थमाश्रयेत्
अश्वस्तनविधानः स्यान्मुनिर्भावसमन्वितः३६०
लघ्वाशी नियताहारः सकृदन्नं निषेवयेत्
कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहायता३६१
उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद्भिक्षु लक्षणम्
यस्मिन्वाचः प्रविशंति कूपे प्राप्ता मृता इव३६२
न वक्तारं पुनर्यांति स कैवल्याश्रमे वसेत्
नैव पश्येन्न शृणुयादवाच्यं जातु कस्यचित्३६३
ब्राह्मणानां विशेषेण नैतद्भूयात्कथंचन
यद्ब्राह्मणस्यानुकूलं तदेव सततं वदेत्३६४
तूष्णीमासीत निंदायां कुर्वन्भैषज्यमात्मनः
येन पूर्णमिवाकाशं भवत्येकेन सर्वदा३६५
शून्यं येन समाकीर्णं तं देवा ब्राह्मणं विदुः३६६
येनकेन चिदाछिन्नो येनकेन चिदाशितः
यत्र क्वचन शायी च तं देवा ब्राह्मणं विदुः३६७
अहेरिव जनाद्भीतः सुहृदो नरकादिव
कृपणादिव नारीभ्यस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः३६८
न हृष्येत विषीदेत मानितो मानितस्तथा
सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः३६९
नाभिनंदेत मरणं नाभिनंदेत जीवितम्
कालमेव निरीक्षेत निर्देशं कृषको यथा३७०
अनभ्याहतचित्तश्च दांतश्चाहतधीस्तथा
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो नरो गच्छेत्ततो दिवम्३७१
अभयं सर्वभूतेभ्यो भूतानामभयं यतः
तस्य देहविमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन३७२
यथा नागपदेऽन्यानि पदानि पदगामिनाम्
सर्वाण्येवावलीयंते तथा ज्ञानानि चेतसि३७३
एवं सर्वमहिंसायां धर्मोऽर्थश्च महीयते
मृतः स नित्यं भवति यो हिंसां प्रतिपद्यते३७४
अहिंसकस्ततः सम्यग्धृतिमान्नियतेंद्रियः
शरण्यस्सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम्३७५
एवं प्रज्ञानतृप्तस्य निर्भयस्य मनीषिणः
न मृत्युरधिकोभावः सोमृतत्वं च गच्छति३७६
विमुक्तः सर्वसंगेभ्यो मुनिराकाशवत्स्थितः
विष्णुप्रियकरः शांतस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः३७७
जीवितं यस्य धर्मार्थं धर्मोरत्यर्थमेव च
अहोरात्रादि पुण्यार्थं तं देवा ब्राह्मणं विदुः३७८
निवारितसमारंभं निर्नमस्कारमस्तुतिम्
अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः३७९
सर्वाणि भूतानि सुखं रमंते सर्वाणि दुःखानि भृशं भवंति
तेषां भवोत्पादनजातखेदः कुर्यात्तु कर्माणि च श्रद्दधानः३८०
दानं हि भूताभयदक्षिणायाः सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह
तीक्ष्णे तनुं यः प्रथमं जुहोति सोनंतमाप्नोत्यभयं प्रजाभ्यः३८१
उत्तानमास्येन हविर्जुहोति अनंतमाप्नोत्यभितः प्रतिष्ठाम्
तस्यांगसंगादभिनिष्कृतं च वैश्वानरं सर्वमिदं प्रपेदे३८२
प्रादेशमात्रं हृदभिस्रुतं यत्तस्मिन्प्राणेनात्मयाजी जुहोति
तस्याग्निहोत्रे हुतमात्मसंस्थं सर्वेषु लोकेषु सदैव तेषु३८३
देवं विधातुं त्रिवृतं सुवर्णं ये वै विदुस्तं परमार्थभूतम्
ते सर्वभूतेषु महीयमाना देवाः समर्था अमृतं व्रजंति३८४
वेदांश्च वेद्यं च विधिं च कृत्स्नमथो निरुक्तं परमार्थतां च
सर्वं शरीरात्मनि यः प्रवेद तस्याभिसर्वे प्रचरंति नित्यम्३८५
भूमावसक्तं दिवि चाप्रमेयं हिरण्मयं तं च समंडलांते
प्रदक्षिणं दक्षिणमंतरिक्षे यो वेदनाप्यात्मनि दीप्तरश्मिः३८६
आवर्तमानं च विवर्तमानं षण्नेमि यद्द्वादशारं त्रिपर्व
यस्येदमास्यं परिपाति विश्वं तत्कालचक्रं निहितं गुहायाम्३८७
यतः प्रसादं जगतः शरीरं सर्वांश्च लोकानधिगच्छतीह
तस्मिन्हि संतर्पयतीह देवान्स वै विमुक्तो भवतीह नित्यम्३८८
तेजोमयो नित्यमतः पुराणो लोके भवत्यर्थभयादुपैति
भूतानि यस्मान्नभयं व्रजंति भूतेभ्यो यो नो द्विजते कदाचित्३८९
अगर्हणीयो न च गर्हतेन्यान्स वै विप्रः प्रवरं स्वात्मनीक्षेत्
विनीतमोहोप्यपनीतकल्मषो न चेह नामुत्र च योर्थमृच्छति३९०
अरोषमोहः समलोष्टकांचनः प्रहीणशोको गतसंधिविग्रहः
अपेतनिंदास्तुतिरप्रियाप्रियश्चरन्नुदासीनवदेव भिक्षुः३९१

इति श्रीपाद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे क्षेत्रवासमाहात्म्यं नाम पंचदशोध्यायः१५

यह पृष्ठ एक पवित्र स्थान (तीर्थ) में रहने के महत्व का वर्णन करता है, जो कि सबसे बड़े महापुराणों में से एक, पद्म पुराण के अंग्रेजी अनुवाद का अध्याय 15 है, जिसमें प्राचीन भारतीय समाज, परंपराओं, भूगोल, साथ ही साथ धार्मिक तीर्थों ( यात्रा ) का विवरण दिया गया है। पवित्र स्थान ( तीर्थ )। यह पद्म पुराण के सृष्टि-खंड (सृजन पर खंड) का पंद्रहवां अध्याय है, जिसमें कुल छह पुस्तकें हैं जिनमें कम से कम 50,000 संस्कृत छंद हैं।

अध्याय 15 - पवित्र स्थान पर निवास का महत्व (तीर्थ)

इस अध्याय के लिए संस्कृत पाठ उपलब्ध है ]

भीम ने कहा :

1-3. ( रुद्र ) वाराणसी भेजकर ब्रह्मा ने क्या किया ? विष्णु ने क्या काम किया ? मुझे (भी) बताओ, हे ऋषि, शंकर ने क्या किया, उन्होंने कौन सा यज्ञ किया, और किस पवित्र स्थान पर (उन्होंने किया)। सहायक पुजारी कौन थे और कार्यवाहक पुजारी कौन थे? मुझे उन सब के बारे में बताओ। मेरी बड़ी जिज्ञासा (जानने के लिए) है कि वे कौन से देवता थे जिन्हें उन्होंने तृप्त किया।

पुलस्त्य ने कहा :

4. मेरु की चोटी पर श्रीनिधान नाम की एक नगरी है। यह रत्नों से भिन्न है; अनेक आश्चर्यों का ठिकाना है; अनेक वृक्षों से भरा हुआ है; कई खनिजों से भिन्न है और बेदाग क्रिस्टल की तरह स्पष्ट है।

5. यह लताओं के विस्तार से सुशोभित है; वह मोरों की पुकार से गूँजता है; यह (की उपस्थिति) सिंहों के कारण भयभीत है; यह हाथियों के झुंड से भरा है।

6-7. झरनों से गिरने वाले पानी से उठने वाले तेज फुहारों से यह ठंडा होता है; यह हवा के झोंकों के पेड़ों के उपवनों के मनभावन मधुशाला से भिन्न है; उसका सारा जंगल कस्तूरी के उत्तम सुगन्ध से सुगन्धित हो जाता है; अपनी लताओं के धनुष में यात्रा करने वाले विद्याधर यौन सुख के कारण होने वाली थकान के कारण सोते हैं।

8. किन्नरों के समूह द्वारा गाए जाने वाले गीतों की मधुर ध्वनि से यह गूंज रहा है । इसमें वैराजा नाम की ब्रह्मा की हवेली है , जिसके पूरे फर्श को विभिन्न व्यवस्थाओं से सजाया गया है।

9-14. इसमें कांतिमती नाम का एक हॉल है । यह दिव्य महिलाओं द्वारा गाए गए गीतों की मधुर ध्वनि के साथ गूंजता है; इसमें पारिजात के पेड़ों से अंकुरित अंकुरों की माला है ; lt रत्नों की कई किरणों से उगने वाले कई रंगों से भिन्न है; इसमें करोड़ों स्तंभ लगे हैं; यह बेदाग दर्पणों से सुशोभित है, और आकाशीय नर्तकियों द्वारा प्रस्तुत नृत्य के सुंदर आंदोलनों की महिमा के साथ; यह कई संगीत वाद्ययंत्रों द्वारा उत्पादित ध्वनियों की संख्या के साथ गूंजता है, कई गीतों और संगीत वाद्ययंत्रों के साथ विराम और समय के साथ सुशोभित होता है। यह देवताओं को आनंद देता है; यह ऋषियों के समूहों से भरा है और तपस्वियों द्वारा इसका सहारा लिया जाता है। यह ब्राह्मण ( ब्राह्मणसी द्वारा गाया गया) के ग्रंथों के साथ गूंजता हैऔर प्रसन्नता का कारण बनता है। इसमें (उनकी पत्नी) संध्या द्वारा सम्मानित (अर्थात सेवा की गई) ब्रह्मा , निवास करते थे।

15. उन्होंने इस दुनिया को बनाने वाले सर्वोच्च देवता का ध्यान किया। ध्यान करते हुए उनके मन में यह आया: 'मैं यज्ञ कैसे करूं?

१६. मैं पृथ्वी पर कहां हूं—किस स्थान पर—मैं यज्ञ करूं?

17. कां , प्रयाग , तुंग और नैमिष और शुक्ल , इसी तरह कांची , भद्रा , देविका , कुरुक्षेत्र और सरस्वती , प्रभास और अन्य पृथ्वी पर पवित्र स्थान हैं।

18. ये वे स्थान हैं जो पवित्र तीर्थ हैं और अन्य भी हैं जिन्हें रूद्र ने मेरे आदेश पर पृथ्वी पर स्थापित किया था।

19. जैसे मैं सब देवताओं में पहिला देवता ठहरा हुआ हूं, वैसे ही मैं एक बड़े पवित्र स्थान को पहिला ठहराऊंगा।

20. वह कमल, जो विष्णु की नाभि से निकला है, और जिसमें मैं पैदा हुआ था, वैदिक ग्रंथों का पाठ करने वाले ऋषियों द्वारा पुष्कर - तीर्थ कहा जाता है ।'

21. जब ब्रह्मा ऐसा सोच रहे थे, तो उनके दिमाग में यह विचार आया: 'अब मैं पृथ्वी पर जाता हूं।'

22-24. सबसे पहले उस स्थान पर पहुँचकर, वह कई पेड़ों और लताओं से भरे उस सर्वश्रेष्ठ जंगल में प्रवेश किया; अनेक पुष्पों से सुशोभित; कई पक्षियों के नोटों से भरा हुआ; कई जानवरों के समूहों के साथ भीड़; वृक्षों के प्रचुर पुष्पों के सुगन्ध से देवताओं और राक्षसों को सुगन्धित करना; इसकी जमीन फूलों से सुशोभित थी जो कि जानबूझकर वहां रखी गई थी।

25-28. (वहां के मौसम) कई इत्र और रस से पूरी तरह से आच्छादित थे, और यह छह मौसमों के फलों से भरा था, जो गंध और दृष्टि की भावना को प्रसन्न करने वाले सुनहरे रूप से संपन्न थे; जहां हवा, कृपा के रूप में, पुराने पत्तों, घास और सूखी लकड़ी और फलों को फेंक देती है; जहाँ हवा, फूलों के ढेर से सुगंध लेकर, (और) आकाश, पृथ्वी और क्वार्टरों को सुगंधित करके, ठंडी (हो रही) चलती है; (जो) हरे चमकदार बड़े वृक्षों से अलंकृत बिना किसी उद्घाटन के और कीड़ों के समूह के बिना और शीर्ष और विभिन्न नामों के साथ।

29. सर्वत्र यह ब्राह्मणों के परिवार के रूप में दिखाई देता है जिसमें स्वस्थ, सुंदर, गुणी और उज्ज्वल पुजारियों के कारण खनिजों जैसे अंकुरों से आच्छादित पेड़ होते हैं।

30-31. वे महान और दोषरहित गुणों से आच्छादित (अर्थात संपन्न) पुरुषों की तरह दिखते हैं; वे हवा के झोंकों से ऐसे उछले, जैसे वे एक दूसरे को छू रहे हों; और एक दूसरे की सुगन्ध के समान फूलदार डालियों के आभूषण पहने हुए थे।

32. कहीं-कहीं रतन के तन्तुओं वाले नाग वृक्ष ऐसे सुन्दर लगते हैं जैसे उनकी आँखों में उनकी काली पुतली अस्थिर होती है।

33. कर्णिका के पेड़ जोड़े में और दो में फूलों से भरे शीर्ष के साथ जोड़े की तरह दिखते हैं। अच्छे फूलों की प्रचुरता वाले सिंधुवर वृक्षों की पंक्तियाँ वास्तव में सिल्वन देवताओं की तरह प्रतीत होती हैं जिनकी पूजा की जाती है।

३४. स्थानों पर फूलों के आभूषणों से उज्ज्वल, (देखो) कुंड की लताएं, (देखो) युवा चंद्रमाओं की तरह (शीर्षों पर) पेड़ों पर और क्वार्टरों में उग आई हैं।

35-39. जंगल के कुछ हिस्सों में फूलदार सरजा और अर्जुन के पेड़ सफेद रेशमी कपड़ों से ढके हुए पुरुषों की तरह दिखते हैं। इसी प्रकार खिलती हुई अतिमुक्त लताओं द्वारा आलिंगन किए गए वृक्ष ऐसे लगते हैं जैसे प्रेमी अपने ही प्रियतम द्वारा आलिंगन करते हैं। साला और अशोका अपने पत्ते एक से चिपक दूसरे के साथ पेड़ के रूप में यह स्पर्श एक दूसरे के एक दूसरे के 'हाथ को छू जब वे एक लंबे समय के बाद से मिलने मित्र की तरह थे। पनासा , सरला और अर्जुन के पेड़ फलों और फूलों की प्रचुरता के कारण झुके हुए थे क्योंकि यह फूलों और फलों के साथ एक दूसरे की पूजा करते थे।

४०. साला के पेड़, अपनी भुजाओं के साथ (शाखाओं के रूप में) हवा के झोंके से स्पर्श किए गए, जैसे कि, समान भावनाओं (यानी स्नेह) के साथ आने वाले लोगों (अभिवादन करने के लिए) उठे हैं।

41-42. फूलों के आवरण के साथ, सुंदरता के लिए वहां लगाए गए पेड़, वसंत-त्योहार में पहुंच गए, जैसे कि पुरुषों के साथ (हथियार वाले) थे। उनके सिरों पर सुंदर फूलों की बहुतायत के साथ झुके हुए और हवा से उछाले गए, पेड़ पुरुषों की तरह नृत्य करते हैं, जो प्रसन्न होते हैं और जिनके सिर मालाओं से सुशोभित होते हैं।

43-47. हवा द्वारा उछाले गए फूलों की पंक्तियों वाले पेड़ अपने प्रिय के साथ पुरुषों की तरह लता के साथ नृत्य करते हैं। अपने (प्रचुर मात्रा में) फूलों के कारण झुके हुए लताओं से घिरे पेड़ धीरे-धीरे सितारों के विभिन्न समूहों के साथ शरद ऋतु के आकाश की तरह दिखाई देते हैं। पेड़ों के शीर्ष पर खिली हुई मालती लताएं आकर्षक लगती हैं जैसे जानबूझकर व्यवस्थित किए गए चैपल । सुन्दरता के धनी हरे वृक्ष, फल और फूल वाले, अच्छे मनुष्य के आने पर पुरुषों की तरह मित्रता दिखाते हैं। मधुमक्खियां, फूलों के तंतुओं के कारण, सभी दिशाओं में चलती हैं, क्योंकि यह कदंब - फूल की जीत की घोषणा कर रही थी और (अर्थात चूसने के कारण) शहद के नशे में, इधर-उधर गिरती हैं।

48-56। कहीं-कहीं नर कोयलों के झुण्ड अपने साथियों के साथ पेड़ों की घनी झाड़ियों में (देखे जाते हैं) हैं। कहीं-कहीं तोते-दंपत्ति शिर - फूल के सदृश ब्राह्मणों जैसे रोचक शब्द बोलते हैं जिनका सम्मान किया जाता है। विभिन्न प्रकार के पंखों वाले मोर अपने साथियों के साथ जंगलों के अंदरूनी हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर सजाए गए नर्तकियों की तरह नृत्य करते हैं। विभिन्न स्वरों को सुनाने वाले पक्षियों के झुंड, जानवरों के कई झुंडों से भरे हुए (पहले से ही) आकर्षक जंगल को और अधिक आकर्षक बनाते हैं और हमेशा इंद्र के समान पक्षियों को प्रसन्न करते हैं।का बगीचा और मन और आँखों को प्रसन्न करने वाला। कमल में जन्मे भगवान ने अपनी मनभावन आँखों से देखा कि यह बुराई को दूर कर रहा है, उस प्रकृति का सबसे अच्छा जंगल दर्पण जैसा दिखता है। पेड़ों की उन सभी पंक्तियों ने, भगवान ब्रह्मा को देखकर, जो इस तरह आए थे, और खुद को भक्ति के साथ उन्हें प्रस्तुत करते हुए, अपने फूलों की संपत्ति को बहा दिया। ब्रह्मा ने वृक्षों द्वारा अर्पित किए गए फूलों को स्वीकार करते हुए उनसे कहा, "तुम्हारा कल्याण हो; वरदान मांगो।" पेड़, (किसी भी) नियंत्रण से मुक्त, नम्रता के साथ (हथेलियों को शामिल करके जलाए गए) ने ब्रह्मा को प्रणाम किया: "हे भगवान, लोगों के प्रति स्नेही, जो आपकी शरण लेते हैं, आप हमेशा एक वरदान दे रहे हैं हमारे पास जंगल में रहो।

57. यही हमारी सबसे बड़ी इच्छा है; आपको नमस्कार, हे भव्य-सर।

58-59. हे देवताओं के स्वामी, हे ब्रह्मांड के निर्माता; यदि आप इस जंगल में रहते हैं, तो यह हमारे लिए आपकी शरण पाने और वरदान की इच्छा रखने के लिए सबसे अच्छा वरदान होगा। हमें यह वरदान दो- करोड़ों अन्य वरदानों से अधिक पर्याप्त। यह (जंगल) तेरे साम्हने सब पवित्र स्थानों से अधिक प्रतिष्ठित और महान होगा।”

ब्रह्मा ने कहा :

60-62। यह (स्थान) सभी पवित्र स्थानों में श्रेष्ठ और शुभ होगा। मेरी कृपा से तुम सदा फूलों और फलों से भरे रहोगे; आपके पास हमेशा बहुत स्थिर यौवन होगा; आप अपनी इच्छा पर आगे बढ़ेंगे (कर सकेंगे); आप अपनी इच्छानुसार कोई भी रूप धारण (कर सकेंगे); आप सुखद फल देंगे; तू अपनी इच्छा और इच्छा के अनुसार मनुष्यों के सामने अपने आप को प्रस्तुत करेगा (दे) पुरुषों को उनकी तपस्या की पूर्ति के लिए; आप महान ऐश्वर्य से संपन्न होंगे।

इस प्रकार वरदान देने वाले ब्रह्मा ने वृक्षों पर कृपा की।

63. एक हजार वर्ष तक (वहां) रहकर उन्होंने जमीन पर एक कमल फेंका। उसके गिरने से पृथ्वी नीचे तक कांप उठी।

64-65. उत्तेजित लहरों के साथ असहाय महासागरों ने अपनी सीमा पार कर ली। बाघों और शातिर हाथियों के कब्जे वाले हजारों पर्वत-शिखरों को इंद्र के बोल्ट के रूप में मारा गया, चकनाचूर हो गया।

66-67। देवताओं और सिद्धों की हवेली (आठ विशेष संकायों की विशेषता वाले अर्ध-दिव्य प्राणी), गंधर्वों के शहर हिल गए, हिल गए और पृथ्वी में प्रवेश कर गए। Kapota -clouds, शीथ का एक संग्रह दिखा आसमान से (यानी की वर्षा बारिश) गिर गया। प्रकाशमान समूहों को ढँकने वाले मार्मिक सूर्य थे।

68. उसकी तेज आवाज से गूंगे, अंधे और बहरे तीनों लोक भयभीत हो उठे।

69-70. सभी देवताओं और राक्षसों के शरीर और दिमाग डूब गए और यह नहीं पता था कि यह क्या था। उन सभी ने साहस जुटाकर ब्रह्मा की खोज की। उन्हें नहीं पता था कि ब्रह्मा कहाँ गए थे। (वे समझ नहीं पाए) पृथ्वी क्यों कांपती है और संकेत और संकेत क्यों दिखाई देते हैं।

७१. विष्णु वहीं गए जहां देवता ठहरे थे। उन्हें नमस्कार करते हुए देवताओं ने ये शब्द कहे:

72-73. "हे श्रद्धेय, यह शगुन और संकेतों का प्रकटीकरण क्यों है, जिसके द्वारा मृत्यु के साथ जुड़े हुए तीनों लोकों को कांपने के लिए बनाया गया है, और कल्प का अंत हो गया है और महासागरों ने अपनी सीमाओं को पार कर लिया है? स्थिर चार चौथाई हाथी अस्थिर क्यों हो गए हैं?

74-75. पृथ्वी सात समुद्रों के जल से क्यों ढकी हुई है? हे प्रभु, बिना किसी कारण के ध्वनि उत्पन्न नहीं हो सकती थी; ऐसी भयानक ध्वनि, जो जब उठी, तीनों लोकों को भयभीत कर दिया, तो यह याद नहीं किया जाता है कि यह पहले कभी नहीं हुआ था और न ही फिर होगा।

76. हे प्रभु, यदि आप जानते हैं कि यह तीनों लोकों और देवताओं के लिए शुभ या अशुभ ध्वनि है, तो हमें बताएं कि यह क्या है।

७७. इस प्रकार संबोधित करते हुए, परम द्वारा पोषित विष्णु ने कहा: "हे देवताओं, घबराओ मत; आप सब इसका कारण सुनिए।

78. यह मैं (कारण) समझकर, जैसा हुआ वैसा ही आपको अवश्य बताऊंगा।

79. विश्व के पूज्य ब्रह्मा , हाथ में कमल लिए हुए, एक अत्यंत सुंदर क्षेत्र - धार्मिक योग्यता के ढेर - में यज्ञ करने के लिए पहाड़ों की ढलान पर बस गए।

80. और उसके हाथ से कमल भूमि पर गिर पड़ा। इसने एक बड़ी आवाज की जिससे आप कांप उठे।

८१-८४. वहाँ वृक्षों द्वारा पुष्पों की सुगन्ध से अभिनन्दित होकर उन्होंने पशु-पक्षियों के साथ वन का उपकार किया और जगत् का कल्याण करने के लिए वहाँ निवास करने का आनन्द लिया। श्रद्धेय, संसार के उपकारी, उस सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्थान (जिसे पुष्कर कहते हैं) को स्थापित किया। मेरे साथ वहाँ जाकर ब्रह्मा को प्रसन्न किया । पूज्य, प्रसन्न होने पर, आपको उत्कृष्ट वरदान देंगे। ”

85-93. ऐसा कहकर, भगवान विष्णु उन देवताओं और राक्षसों के साथ उस वन-क्षेत्र में चले गए जहां ब्रह्मा रहते थे। वे प्रसन्न और अपने मन को प्रसन्न कर, और आपस में बातचीत कर रहे थे, जैसे कोयलों ​​की तरह, फूलों के ढेर और प्रशंसनीय ब्रह्मा के जंगल में प्रवेश किया। वह जंगल, सभी देवताओं द्वारा पहुंचा और इंद्र के बगीचे के समान, और कमल-लता, पशु और फूलों से समृद्ध, तब सुंदर लग रहा था। तब देवताओं ने, सभी (प्रकार के) फूलों से सजे जंगल में प्रवेश करते हुए (अपने आप से) कहा, 'भगवान यहाँ हैं'; और ब्रह्मा को देखने की इच्छा से (उसमें) भटक गए। तब सभी देवताओं ने, इंद्र के साथ, ब्रह्मा को खोजते हुए, जंगल के आंतरिक भाग को नहीं देखा। तब भगवान (ब्रह्मा) की तलाश में देवताओं ने वायु को देखा. उसने उनसे कहा, "तप के बिना तुम ब्रह्मा को नहीं देख पाओगे।" तब निराश होकर और वायु ने (उन्हें) जो कहा था, उसे ध्यान में रखते हुए, सभी देवताओं ने बार-बार ब्रह्मा को पहाड़ की ढलान पर, दक्षिण में, उत्तर में और बीच में (दोनों दिशाओं में) देखा। वायु ने फिर उनसे कहा, "विरिंचि (अर्थात ब्रह्मा) के दर्शन करने के लिए हमेशा एक तीन गुना साधन होता है। इसे आस्था से उत्पन्न ज्ञान, तपस्या और गहन और अमूर्त ध्यान से कहा जाता है। जो लोग गहन और अमूर्त ध्यान के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे ईश्वर को अंशों के साथ और बिना दोनों रूपों में देखते हैं। तपस्वी उसे अंशों से देखते हैं, जबकि ज्ञानी उसे उनके बिना देखते हैं।

९४. दूसरी ओर जब सांसारिक ज्ञान उत्पन्न होता है तो उदासीनता से देखने वाला (ब्रह्मा) नहीं देखता। जो लोग गहन और अमूर्त ध्यान के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे अपनी महान भक्ति के माध्यम से तेजी से भगवान को देखते हैं।

95. प्रकृति और पुरुष के उस अपरिवर्तनशील स्वामी को देखना चाहिए ।

९६. कर्म, मन और वाणी से सदा ईश्वर में लीन होकर, और ब्रह्मा को प्रसन्न करने के इरादे से, तपस्या का पालन करें; ईश्वर आपको आशीर्वाद देंगे। वह हमेशा सोचता है: 'मुझे उनके सामने प्रकट होना चाहिए जिन्होंने खुद को ब्रह्मा और ब्राह्मण भक्तों के सामने समर्पित कर दिया है ।'"

97-98. वायु के वचनों को सुनकर और उन्हें लाभकारी (और) समझने के लिए अपने मन के साथ (देखने) ब्रह्मा की इच्छा के साथ, उन्होंने वाणी के स्वामी ( बृहस्पति ) से कहा, "हे ज्ञान के देवता, हमें दीक्षा दें। पथ) ब्रह्मा की प्राप्ति।"

99. उन्हें (मार्ग) में दीक्षा देने की इच्छा रखते हुए, महान गुरु ने उन्हें वेदी नियमों के अनुसार दीक्षा दी।

१००. वे साधारण वस्त्र पहिने हुए और दीन होकर उसके चेले बने; उन्होंने ब्रह्मा की कृपा प्राप्त की; पुष्कर के बारे में ज्ञान (उन्हें) दिया गया था।

१०१. गुरु, सर्वश्रेष्ठ स्थानापन्न पुजारियों ने नियमों के अनुसार यज्ञ किया।

102. कमल के अभिषेक (विधि) को नियोजित करके ऋषि ने उन देवताओं की इच्छा से प्रेरित होकर, तंतुओं से भरा कमल बनाया और (इस प्रकार) देवताओं का पक्ष लिया।

१०३. अत्यंत बुद्धिमान बृहस्पति ने वेद में वर्णित नियमों को जानकर और संदेह को दूर करते हुए बुद्धिमान (देवताओं) को दीक्षा दी।

१०४-१११. उदार अगिरसा (अर्थात् गुरु) ने प्रसन्न होकर और अग्नि का अभिषेक करके, देवताओं को वेदों में निर्धारित प्रार्थनाओं को दिया (अर्थात पढ़ाया) । बहुत बुद्धिमान सिखाया एक (देवता) (वैदिक मंत्र कहा जाता है) Trisuparṇa , Trimadhu और सभी muttered प्रार्थना आदि स्नान (मंत्र के साथ) कि Āpohiṣṭhā कहा जाता है ब्रह्मा । यह पापों को दूर करता है, दुष्टों को वश में करता है, परिपूर्णता, धन और शक्ति को बढ़ाता है, सिद्धियों और प्रसिद्धि देता है, और काली के पापों को नष्ट करता है(उम्र)। तो हर हाल में वह स्नान करना चाहिए। सभी (उनमें से) मौन व्रत का पालन करते हुए स्नान करते हैं, संयमित होते हैं (व्रत के लिए), और तैयार होते हैं (स्वर के लिए), और उनकी इंद्रियों को नष्ट कर दिया जाता है (यानी अंकुश लगाया जाता है), पानी के बर्तन (उनके हाथों में) के साथ। अपने निचले वस्त्रों के सिरों को ढीला करके, माला पहने हुए, लाठी लिए हुए, छाल या लत्ता पहने हुए, बहुत उलझे हुए बालों से सजे हुए, स्नान करने और (विशेष) आसनों में लगे हुए, बहुत प्रयास के साथ ध्यान करने और सीमित भोजन की इच्छा रखने के बाद मन को ब्रह्मा के साथ मिला कर, वहाँ (किसी एक), बात, संगति या विचार (सांसारिक वस्तुओं के बारे में) से परहेज करते रहे। महान भक्ति और एक महान पवित्र उपदेश से संपन्न, उनके मन में, ध्यान के माध्यम से, भगवान का ज्ञान, (कुछ समय के अंतराल) के बाद था।

112. जब उनका मन बिल्कुल शुद्ध था, ब्रह्मा के ध्यान के माध्यम से पूरी तरह से जलकर, भगवान सभी के लिए दृश्यमान हो गए।

११३-११४. वे उसकी चमक से प्रसन्न थे (फिर भी) उनका मन व्याकुल था। तब उन्होंने अपने मन की प्रसन्नता और उस पर नीयत से साहस जुटाकर अपनी हथेलियों को अपने सिर पर रखा, और अपने सिर को जमीन पर रख दिया (अर्थात सिर झुकाकर) भगवान की स्तुति की, सृष्टि और रखरखाव के लेखक का सहारा लिया। वेद अपने छह अंगों के साथ (यानी वैदिक ग्रंथों और छह अंगों से ग्रंथों के साथ)।

देवताओं ने कहा :

115-121. हे भगवान, हम, अच्छी तरह से नियंत्रित, आपको सलाम करते हैं, ब्राह्मण , ब्रह्मा के शरीर वाले, ब्राह्मणों के अनुकूल, अजेय, बलिदान और वेदों के दाता, दुनिया के लिए दयालु, सृष्टि के रूप में, अत्यंत अपने भक्तों पर दया करो, जो वेदों के ग्रंथों के उच्चारण से प्रशंसा करते हैं, जिनके रूप में कई रूप हैं, जो सैकड़ों रूप धारण करते हैं , सावित्री और गायत्री के स्वामी , कमल पर विराजमान, (स्वयं) कमल और कमल के समान (सुंदर) मुख वाला, वरदान देने वाला, वरदान के योग्य, कर्म (दूसरा अवतार) और मोग, उलझे हुए बाल और मुकुट वाला, कलछी धारण किए हुए, चन्द्रमा और मृग के लक्षण वाले, और धर्म के नेत्रों वाले, हर नाम और ब्रह्मांड के स्वामी वाले। हे धर्मपरायण नेत्रों वाले, हमारी और अधिक रक्षा करो; हे महामहिम, हमने वाणी, मन और शरीर से आपकी शरण मांगी है।

122. ब्रह्मा, वेदों को जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ, इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुति की गई (उनसे कहा): "ठीक है, जब आपके द्वारा याद किया जाएगा तो मैं आपको दूंगा (आपको जो चाहिए); तुम मुझे देखना फलदायी होगा।

123. हे पुत्रों, मुझे बताओ कि तुम क्या चाहते हो; मैं तुम्हें उत्तम वरदान दूँगा!” इस प्रकार भगवान द्वारा संबोधित, देवताओं ने कहा (ये) शब्द:

१२४. “हे श्रद्धेय, यह अपने आप में एक महान वरदान है जो काफी है, जब आपने कमल को फेंका तो हमें एक अच्छी आवाज सुनाई दी।

125. पृथ्वी क्यों कांपने लगी? लोग परेशान क्यों थे? यह बिना किसी उद्देश्य के नहीं हो सकता। (हमें) इसका कारण बताओ, हे भगवान।"

ब्रह्मा बोले :

126. यह कमल आपके भले के लिए और देवताओं की रक्षा के लिए मेरे पास है। अब सुनिए क्या कारण था।

127. नाम से यह राक्षस वज्रनाभ बच्चों का जीवन छीन लेता है। वह पाताल लोक में आश्रय लेता रहता है।

128. तुम्हारे आगमन की सूचना पाकर, तपस्या में रहकर, अस्त्र-शस्त्र डाल कर, दुष्ट इन्द्र सहित देवताओं को भी मार डालना चाहता था।

129. मैंने कमल को गिराकर उसका विनाश किया; उसे अपने राज्य और वैभव पर गर्व था; इसलिए मैंने उसे मार डाला।

130. इस समय दुनिया में वेदों में महारत हासिल करने वाले भक्त, ब्राह्मण हैं। वे दुर्भाग्य से न मिलें, लेकिन उनका भाग्य अच्छा हो।

131. हे देवताओं, मैं देवताओं, राक्षसों, पुरुषों, सरीसृपों, मित्रों और प्राणियों की पूरी यजमान के बराबर (यानी निष्पक्ष) हूं।

132. मैंने आपकी भलाई के लिए पापी को एक मंत्र से मार डाला। इस कमल के दर्शन से ही वे धर्म लोक में पहुंचे हैं।

१३३. चूँकि मैंने कमल (यहाँ) गिराया है, इसलिए इस स्थान को पुष्कर के रूप में जाना जाएगा, एक महान, पवित्र पवित्र स्थान, धार्मिक पुण्य देने वाला।

134-135। पृथ्वी के सभी प्राणियों के लिए वह पवित्र कहा जाएगा। (i) हे देवताओं ने वृक्षों के अनुरोध पर सदा यहां रहकर भक्ति चाहने वाले भक्तों पर कृपा की है। हे पापरहितों , जब मैं यहाँ पहुँचा तो महाकाल (भी) यहाँ आए हैं।

136. तपस्या करने वालों ने महान ज्ञान का प्रदर्शन किया है, हे देवताओं; अपने और दूसरों के हित को ध्यान में रखें।

१३७. पृथ्वी पर विभिन्न रूप धारण करके आपको यह दिखाना होगा कि एक बुद्धिमान ब्राह्मण से घृणा करने वाला व्यक्ति केवल पाप से पीड़ित होता है।

138-141. करोड़ों अस्तित्व के बाद भी वह पापों से मुक्त नहीं होगा। वेद और उसके अंगों (अर्थात वेदांगों ) में महारत हासिल करने वाले ब्राह्मण को न तो मारना चाहिए और न ही दोष खोजना चाहिए ; क्योंकि यदि एक मारा जाता है, तो एक करोड़ (उनमें से) मारे जाते हैं। विश्वास के साथ भोजन करना चाहिए (कम से कम) एक ब्राह्मण जिसने वेद में महारत हासिल की है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कोई एक करोड़ ब्राह्मणों को खिलाएगा (सिर्फ एक ऐसे ब्राह्मण को खिलाकर)। जो तपस्वियों को भरपेट भिक्षा देता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और दुर्भाग्य से नहीं मिलता है। जिस प्रकार मैं, परदादी, देवताओं में सबसे बड़ा और सर्वश्रेष्ठ हूं, उसी प्रकार, एक बुद्धिमान व्यक्ति, जिसमें अपनेपन और संपत्ति की भावना नहीं होती है, वह हमेशा सम्मानित होता है।

142-148। मैंने वेदों में संरक्षित इस व्रत को, सांसारिक अस्तित्व के बंधन से मुक्ति (प्राप्त) और ब्राह्मणों के मामले में पुनर्जन्म की अनुपस्थिति के लिए प्रख्यापित किया है। जो, पवित्र अग्नि के रखरखाव को स्वीकार करने के बाद, (और) अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त नहीं करता (अर्थात नियंत्रण खो देता है), उसे छोड़ देता है, यम के सेवकों के नेतृत्व में , तुरंत रौरव के पास जाता है(नरक)। (किसी से बात करके) जो संसार के मार्ग को चकमा देता है और नीच कर्म करता है, उसका हृदय आसक्ति और कामुक भावना से भरा है, स्त्री और धन का शौकीन है, बहुत मीठी चीजें खाता है, कृषि और वाणिज्य का पालन करता है, नहीं करता है वेद को जानो और वेद की निंदा करो, और दूसरे की पत्नी का आनंद लो; ऐसे व्यक्ति से बात करने से जो इस तरह के दोषों से दूषित है, वह नरक में जाता है; इसलिए वह भी जो एक अच्छी मन्नत को बिगाड़ता है। जो तृप्त न हो, विखंडित या दुष्ट मन वाला हो और पापी हो, उसके साथ शारीरिक संपर्क नहीं करना चाहिए। यदि कोई (ऐसे व्यक्ति को) स्पर्श करता है तो वह स्नान करने के बाद शुद्ध हो जाता है।

इस प्रकार बोलते हुए, भगवान ब्रह्मा ने देवताओं के साथ वहां एक पवित्र स्थान की स्थापना की। मैं (इसके बारे में) आपको (देय) क्रम में बताऊंगा।

149-150। यह चन्द्रनादी के उत्तर में है; सरस्वती अपने पूर्व की ओर (बहती हुई) है; यह इंद्र के बगीचे से श्रेष्ठ है; और पुष्कर (तीर्थ) के साथ संपूर्ण कल्प के अंत तक वहीं रहेगा। यह संसार के रचयिता ब्रह्मा द्वारा किए गए यज्ञ की (अर्थात) वेदी है।

१५१-१५३. पहले वाले को तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ और शुद्ध करने वाले के रूप में जाना जाना चाहिए। कहा जाता है कि यह देवता ब्रह्मा के लिए पवित्र है। बीच वाला (यानी दूसरा) (विष्णु के लिए पवित्र है)। अंतिम एक देवता रुद्र के लिए पवित्र है। ब्रह्मा ने पहले फैशन (इन) किया। यह महान पवित्र स्थान अर्थात। पुष्कर नामक वन को वेदों में सबसे प्रमुख रहस्यमय क्षेत्र कहा गया है। भगवान ब्रह्मा मौजूद हैं (वहां)। स्वयं ब्रह्मा ने इस क्षेत्र का पक्ष लिया।

154-156. पृथ्वी पर घूमने वाले सभी ब्राह्मणों के पक्ष में उन्होंने भूमि को सोने और हीरे से घिरा हुआ, और एक वेदी द्वारा चिह्नित किया; उसने फर्श के विभिन्न प्रकार के गहनों से इसे सुंदर बनाया। दुनिया के पोते ब्रह्मा यहाँ रहते हैं। तो भी देवताओं विष्णु, रुद्र और वासु और दो Aśvins भी, और मरुत इंद्र के साथ यहां रहते हैं।

157-158. यह बात मैंने तुमको बताई है, जगत् पर कृपा करने का कारण। वे ब्राह्मण, जो अपने गुरुओं की सेवा में लगे हुए हैं, और जो यहां वेदों को उचित नियमों के अनुसार और वेद के भजन पाठ के क्रम में मंत्रों के साथ पढ़ते हैं, ब्रह्मा के आसपास के क्षेत्र में रहते हैं, उनकी मदद की जा रही है।

भीम ने कहा :

१५९-१६०. हे श्रद्धेय, मुझे यह सब बताओ: किस नियम का पालन करते हुए, क्षेत्र के निवासी, ब्रह्मा की दुनिया की इच्छा रखते हुए, पुष्कर वन में रहें? और यहां रहने वाले विभिन्न जातियों और जीवन के चरणों वाले (यानी संबंधित) पुरुषों या महिलाओं को क्या अभ्यास करना चाहिए?

पुलस्त्य ने कहा :

१६१-१६२. (विभिन्न) जातियों के पुरुष और महिलाएँ और जीवन के (अलग-अलग) चरणों में रहने वाले, अपने वर्ग के कर्तव्यों का पालन करने में लगे, छल और भ्रम से मुक्त, कर्म, मन और वाणी से और अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके ब्रह्मा को समर्पित, और ईर्ष्या और क्षुद्रता से मुक्त, सभी प्राणियों की भलाई में लगे हुए, यहाँ रहना चाहिए।

भीम ने कहा :

163. बताओ कौन-सा कर्म करने वाला मनुष्य ब्रह्मा का भक्त कहलाता है। मनुष्यों में ब्रह्मा के भक्त किस प्रकृति के हैं?

पुलस्त्य ने कहा :

१६४. श्रद्धांजलि तीन प्रकार की कही जाती है: मन, वाणी और शरीर से प्रभावित; तो यह भी सांसारिक, वैदिक और आत्मा से संबंधित हो सकता है।

१६५. इसे ही मानसिक श्रधांजलि कहा जाता है, जो वेद के महत्व के स्मरण में मन लगाकर (अर्थात ध्यान) ब्रह्मा के प्रति प्रेम का कारण बनता है।

१६६. मंत्रों के माध्यम से (करने के लिए) वाणी द्वारा श्रद्धांजलि, (पाठ) वैदिक ग्रंथों, पूजा, (अग्नि में अर्पण), श्राद्ध करना और विचार करना (इनके बारे में), और म्यूटिंग के माध्यम से किया जाता है आवश्यक ग्रंथ।

167-168. ब्राह्मणों के लिए शरीर द्वारा श्रद्धांजलि तीन प्रकार की बताई गई है : किचर (शारीरिक वैराग्य), (कठोर तपस्या जैसे) संतापना और अन्य, इसलिए (चंद्रमा के चरणों के आधार पर धार्मिक अनुष्ठान जैसे) चंद्रयान , व्रतों द्वारा विनियमित और इन्द्रियों को वश में करने वाले व्रत, वैसे ही ब्रह्मकुचरा- उपवास और अन्य शुभ व्रत भी।

169-171. ब्रह्मा की वह पूजा सांसारिक पूजा कही जाती है जो मनुष्य द्वारा गाय के घी , दूध और दही, रत्नों से युक्त दीपक, दरभा घास और जल, चंदन, फूल और तैयार किए गए विभिन्न खनिजों, घी, गुग्गुल से की जाती है। सुगंधित गोंद राल की तरह) और चंदन की सुगंधित धूप, सोने और गहनों से भरपूर आभूषण, और विभिन्न प्रकार की माला, नृत्य, वाद्य संगीत और गीत, सभी (प्रकार के) रत्नों के उपहार, और खाने योग्य, भोजन, भोजन और पेय के साथ।

172-176. वैदिक मंत्रोच्चार और आहुति के साथ (प्रस्तुत) को वैदिकी कहा जाता है । प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा के दिन अग्नि को अर्पण करना चाहिए; ब्राह्मणों को उपहार देने की सिफारिश की जाती है; चूर्ण चावल से बना एक बलिदान, इसलिए उबले हुए चावल, जौ और दाल का भी एक आहुति; इसी तरह पितरों के सम्मान में उन्हें खुशी देने वाला बलिदान हमेशा (माना जाता है) एक बलिदान कार्य है। तो भी (वह वैदिक श्रद्धांजलि है जिसमें) ऋग्वेद , यजुर्वेद और सामवेद के ग्रंथगुदगुदी की जाती है और वेद के स्तोत्र ग्रंथों का अध्ययन नियमों के अनुसार किया जाता है। अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, चंद्रमा और सूर्य के संबंध में किए गए सभी संस्कार देवता ब्रह्मा के हैं। हे राजा, ब्रह्मा (जिन्हें आध्यात्मिक कहा जाता है) को श्रद्धांजलि दो प्रकार की होती है: एक को सांख्य कहा जाता है और दूसरा योग से पैदा होता है ।

177-178. मुझ से इसमें विभाजन (अर्थात सांख्य ) सुनें । प्रधान जैसे ( सांख्य ) सिद्धांतों की संख्या , जो भोग की अचेतन वस्तुएं हैं, चौबीस हैं। आत्मा पच्चीसवीं है। चेतन आत्मा किसी कार्य का भोक्ता है, लेकिन उसका एजेंट नहीं।

179. आत्मा शाश्वत, अपरिवर्तनीय, नियंत्रक और नियोक्ता है; और ब्रह्मा, अव्यक्त, शाश्वत, सर्वोच्च सत्ता कारण है ।

180-182। वास्तव में सिद्धांतों, स्वभावों और प्राणियों की रचना है। सांख्य विश्लेषण करता Pradhāna (तीन) घटकों की प्रकृति का होने के लिए। यह कुछ गुणों के मामले में भगवान से मिलता जुलता है और उनसे अलग भी है। यह (समानता) कारण और ब्रह्मत्व की स्थिति कहा जाता है; की कि Pradhāna के (द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है Puruṣa ) ने अपने विषमताओं होना कहा जाता है। ब्रह्म सर्वशक्तिमान है; जबकि आत्मा अकर्ता है।

१८३. प्रधान में भावना (भगवान के साथ इसके संपर्क के कारण) को इसकी समानता (उत्तरार्द्ध के साथ) कहा जाता है। यह एक अन्य सिद्धांत ( प्रधान ) अन्य सिद्धांतों की सक्रिय संपत्ति का कारण है।

१८४. इस सिद्धांत (अन्य सिद्धांत जैसे प्रधान ) के लिए कोई उद्देश्य जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना है । ज्ञानी, जो सत्य पर विचार करता है, (इसे) सुनिश्चित करके कहता है कि यह प्रतिबिंब ( सांख्य ) है।

१८५-१८६. ज्ञानियों ने इस प्रकार सिद्धांतों के संग्रह, और उनकी संख्या को ठीक से सीख लिया है, साथ ही ब्रह्म के सिद्धांत को एक अतिरिक्त के रूप में, सत्य को समझ लिया है। सांख्य (प्रणाली) के प्रवर्तकों ने इस (प्रकार की) पूजा को आध्यात्मिक करार दिया है। योग (दर्शन) से उत्पन्न होने वाली श्रद्धांजलि को सुनें, जो ब्रह्मा को दी जाती है:

१८७-१८९. श्वास को वश में करने के लिए, सदा ध्यान करते हुए, इन्द्रियों को वश में रखते हुए, भिक्षा से प्राप्त भोजन करना, मन्नतें मानना, और अपनी सभी इन्द्रियों को वश में करना चाहिए, और अपने मन में, सृजित प्राणियों के स्वामी, पेरिकारप में बने रहना चाहिए। दिल के कमल के, लाल चेहरे वाले, सुंदर आंखें, और उनके चेहरे चारों ओर प्रकाशित, एक पवित्र धागे (चारों ओर) के साथ, उनकी कमर, चार चेहरे, चार भुजाएं, उनके हाथों से वरदान और सुरक्षा प्रदान करते हैं।

190. योगाभ्यास के कारण जो महान मानसिक सिद्धि होती है, वह ब्रह्मा को प्रणाम कहा जाता है। ब्रह्मा के प्रति ऐसी भक्ति रखने वाले को ब्रह्मभक्त (ब्रह्मा का भक्त) कहा जाता है।

१९१-१९६. हे श्रेष्ठ राजाओं, पवित्र स्थान में रहने वालों के लिए निर्धारित जीवन पद्धति को सुनो। यह पूर्व में सभी ब्राह्मणों की उपस्थिति में और विष्णु और अन्य लोगों की सभा में स्वयं भगवान द्वारा विस्तार से बताया गया था। (इस जगह के निवासियों को होना चाहिए) बिना खानदान की भावना के; अहंकार के बिना; लगाव और संपत्ति के बिना; रिश्तेदारों के मेजबान के लिए प्यार की भावना के बिना; मिट्टी, पत्थर और सोने के ढेले को समान रूप से देखना; विभिन्न अनिवार्य कृत्यों द्वारा प्राणियों को सुरक्षा प्रदान करना; हमेशा उनकी सांस को रोकने पर आमादा; और सर्वोच्च आत्मा पर ध्यान में लीन; हमेशा बलिदान और शुद्ध प्रदर्शन करना; तपस्वी प्रथाओं को दिया; सांख्य और योग (प्रणाली) के नियमों को जानना; धार्मिक प्रथाओं में अच्छी तरह से वाकिफ हैं और उनकी शंकाओं को दूर करते हैं। (इस) पवित्र स्थान में रहने वाले उन ब्राह्मणों द्वारा प्राप्त किए गए अच्छे फल को सुनें, जो इन नियमों के अनुसार यज्ञ करते हैं और पुष्कर वन में मर जाते हैं। वे ब्रह्मा के साथ पूर्ण और अटूट अवशोषण प्राप्त करते हैं, जिसे प्राप्त करना कठिन है।

१९७-२०२। ब्रह्मा में इस लीन होने के बाद, वे पुनर्जन्म से बचते हैं, और ब्रह्मा के ज्ञान में रहते हुए, उन्हें पुनर्जन्म नहीं मिलता है; अन्य जो (भ्रामक) दुनिया के (विभिन्न) चरणों में रहते हैं, उन्हें फिर से जन्म लेना पड़ता है। एक (यानी एक ब्राह्मण) गृहस्थ के स्तर के नियमों का पालन करता है, और हमेशा छह कर्तव्यों (सीखना, सिखाना, यज्ञ करना और यज्ञों में पुजारी के रूप में कार्य करना और उपहार देना और स्वीकार करना) में लगा रहता है, जिसे जब आमंत्रित किया जाता है (के रूप में कार्य करता है) एक पुजारी) एक यज्ञ में (अर्पण) ठीक से मंत्रों के साथ, सभी दुखों से मुक्त होने पर, एक बड़ा फल प्राप्त करता है। सारी दुनिया में उसकी आवाजाही कभी नहीं रुकती। दैवीय शक्ति के कारण स्वावलंबी होने के कारण वह अपनी पत्नी (या सामान) के साथ, हजारों महिलाओं से घिरे हुए, अपनी प्यारी इच्छा से स्थानों पर जा रहे थे, एक बहुत ही उज्ज्वल हवाई जहाज में, जो युवा सूर्य के समान था, निर्बाध रूप से चलता है और जैसा वह चाहता है, सभी दुनिया में। वह पुरुषों में सबसे वांछनीय हो जाता है; वह, सर्वोत्तम कर्तव्यों का पालन करते हुए, एक धनी व्यक्ति बन जाता है।

203-207। स्वर्ग से गिरकर वह एक महान परिवार में (अ) सुन्दर (व्यक्ति) के रूप में जन्म लेगा। वह नैतिक कर्तव्यों में पारंगत हो जाता है और उनके प्रति समर्पित हो जाता है; वह सभी विद्याओं के महत्व में महारत हासिल करता है। इसी प्रकार ब्रह्मचर्य, आचार्यों की सेवा, और वेदों का अध्ययन, भिक्षा पर निर्वाह, अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के साथ, हमेशा सत्य के व्रत में लगा हुआ, अपने स्वयं के कर्तव्यों में त्रुटि न करने वाला, अप्रतिबंधित (वह जाता है) एक हवाई जहाज में विष्णु की दुनिया में सभी इच्छाओं और समर्थन (यानी पूर्ति) की सभी वस्तुओं के साथ समृद्ध रूप से संपन्न, और जैसे कि यह एक और सूर्य था; वह, गुह्यकस नाम के ब्रह्म-परिचारकों के समान वैभव से संपन्न , जो बहुत सम्मानित हैं, जिनके पास अनंत शक्ति और तेज है और जो देवताओं और राक्षसों द्वारा सम्मानित हैं, उनके समान हैं।

208-213। उनके हथियार देवताओं, राक्षसों और मनुष्यों के बीच अनर्गल हैं। इस तरह वे विष्णु की दुनिया में हजारों करोड़, सैकड़ों करोड़ वर्षों के लिए सम्मानित होते हैं। इस प्रकार वहाँ बड़े वैभव के साथ रहने के बाद, जब वह फिर से विष्णु की दुनिया से गिर जाता है, तो वह अपने कर्मों से स्वर्ग में पैदा होता है; या पुष्कर वन में आकर ब्रह्मचर्य की अवस्था में आकर वेदों का अध्ययन करता रहता है; और मृत्यु के बाद, चंद्रमा की तरह शुभ देखकर, वह दिव्य हवाई जहाज से अपनी चमक के साथ पूर्णिमा-प्रकाश (रुद्र की दुनिया में) जाता है; रुद्र के लोक में पहुँचकर वह वहाँ गुह्यकों के साथ आनन्दित होता है, और सारे जगत का स्वामी होने के कारण उसे महान ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

२१४-२१७. हजारों युगों तक (इस प्रकार) भोग रहा है, वह रुद्र लोक में प्रतिष्ठित है। हमेशा वहाँ आनन्दित, ध्वनि सुख का आनंद लेते हुए और फिर उस रुद्र की दुनिया से गिरकर, वह एक दिव्य, महान ब्राह्मण परिवार में पैदा होता है। मनुष्यों के बीच वह धार्मिक आत्मा (जन्म के रूप में) सुंदर और वाणी के स्वामी के रूप में होगी; उसके पास एक ईर्ष्यापूर्ण शरीर है, वह महिलाओं का शक्तिशाली पति है, जो बहुत आनंद लेता है; वह (तब) एक एंकराइट का जीवन व्यतीत करता है और अश्लील चालों से मुक्त होता है; दैवीय लोकों में भी उसकी गति बाधित नहीं होती है।

२१८-२१९. वह सूखे पत्ते और फल, और फूल और जड़ खाता है। वह कबूतरों की तरह रहता है या उन्हें (यानी पत्ते आदि) पत्थरों से पीटता है या दांतों को मोर्टार के रूप में इस्तेमाल करता है, और लत्ता या छाल के वस्त्र पहनता है। उन्होंने बालों को उलझाया है, दिन में तीन बार स्नान किया है, सभी दोषों को त्याग दिया है और एक कर्मचारी है।

२२०. वह कुचर व्रत में तल्लीन है , भले ही वह बहिष्कृत या श्रेष्ठ (जाति) का हो। वह जल में रहता है, ( अग्नि - साधना ) तपस्या करता है, वर्षा ऋतु में वर्षा में रहता है।

221. वैसे ही वह भूमि पर पड़ा है, जो कीड़ों, कांटों और पत्थरों से भरा हुआ है; वह खड़े होने की मुद्रा में या हैम पर बैठने की मुद्रा में रहता है; वह (दूसरों के साथ लेख) साझा करता है और दृढ़ संकल्प का है।

222-225. वह जंगल में जड़ी-बूटियों को खाता है, और सभी प्राणियों को सुरक्षा देता है। वह हमेशा धार्मिक पुण्य अर्जित करने में लगा रहता है, अपने क्रोध और इंद्रियों को नियंत्रित करता है। वह ब्रह्मा का भक्त है, और पुष्कर जैसे पवित्र स्थान में रहता है। ऐसा तपस्वी सभी आसक्तियों को त्याग देता है, स्वयं में प्रसन्न होता है और इच्छाओं से मुक्त होता है। हे भीम , सुनो, यहाँ रहने वाले को क्या मार्ग मिलता है। ऐसा ब्रह्मा का भक्त, अपनी इच्छा से चलने वालों के हवाई जहाज से जाता है, जो युवा सूरज की तरह चमकता है, और उठे हुए आसन और खंभों के माध्यम से आकर्षक दिखता है; वह दूसरे चंद्रमा की तरह आकाश में चमकता है।

226-227. वे सैकड़ों करोड़ वर्षों से आकाशीय अप्सराओं की संगति में हैं जो गायन और वाद्य संगीत और नृत्य जानते हैं। वह जिस भी भगवान की दुनिया में जाता है, जाता है, वहीं ब्रह्मा की कृपा से रहता है।

228-230। ब्रह्मा की दुनिया से गिरकर, वह विष्णु की दुनिया में जाता है, और विष्णु की दुनिया से गिरकर वह रुद्रलोक जाता है ; और उस स्थान से भी गिरकर, वह दुनिया के (विभिन्न) विभागों में पैदा हुआ है, वैसे ही अन्य स्वर्गों में भी, वांछित भोगों का आनंद ले रहा है। वहाँ संपन्नता का आनंद लेने के बाद वह नश्वर के बीच एक राजा या राजकुमार या धनी या सुखी व्यक्ति के रूप में पैदा होता है - बहुत सुंदर, बहुत भाग्यशाली, प्यारा, प्रसिद्ध और भक्ति से संपन्न।

२३१-२३८. हे राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य या शूद्रसीपवित्र स्थानों में रहने वाले, अपने वर्ग के कर्तव्यों में (अभ्यास) में लगे, अच्छे व्यवहार वाले और लंबे जीवन वाले, पूरी तरह से ब्रह्मा के प्रति समर्पित, प्राणियों के प्रति दया दिखाते हुए, जो महान पवित्र स्थान में रहते हैं। पुष्कर, मृत्यु के बाद, समृद्ध रूप से सजाए गए हवाई जहाजों में ब्रह्मा के निवास पर जाएं, आकाशीय अप्सराओं के यजमानों द्वारा सुशोभित, और इच्छानुसार (रहने वालों द्वारा), और इच्छानुसार (रहने वालों द्वारा) किसी भी रूप को लेते हुए। जो बहुत पवित्र, ब्रह्मा का ध्यान करते हुए, अपने शरीर को एक धधकती हुई अग्नि में अर्पित करता है, वह ब्रह्मा के धाम में जाता है। ब्रह्मा की दुनिया, सभी दुनियाओं में सर्वश्रेष्ठ, आकर्षक और वांछित वस्तुओं को पूरा करने वाले, सभी (इसकी) महानता के साथ उनका स्थायी निवास बन जाता है। हे भीम, वे महापुरुष भी, जिन्होंने बहुत ही पुण्यपूर्ण पुष्कर में जल में अपना जीवन डाल दिया, ब्रह्मा की अविनाशी दुनिया में जाते हैं।रुद्र और विष्णु ।

२३९-२४१. शूद्र जो पुष्कर में मरते हैं, कभी हताशा पैदा नहीं करते, हंसों से जुड़े हवाई जहाज में जाते हैं, चमक में सूरज के समान, विभिन्न रत्नों और सोने से समृद्ध, मजबूत और सुगंधित, (कई) अन्य अतुलनीय गुणों के साथ, बैनर और झंडों से बंधी दिव्य कन्याओं के गीत, और कई घंटियों के साथ बजने वाले, कई चमत्कारों से संपन्न और सुखों से परिचित और बहुत तेज, गुणों से संपन्न और उत्कृष्ट मोर द्वारा वहन किए जाने वाले।

242-244। अविनाशी (पुष्कर) में मरने वाले बुद्धिमान लोग ब्रह्मा की दुनिया में आनन्दित होते हैं। वहाँ बहुत दिनों तक रहने और इच्छानुसार सुख भोगने के बाद, नश्वर आने वाला (इस दुनिया में) एक ब्राह्मण परिवार में पैदा होता है, एक धनी व्यक्ति सुखों का आनंद लेता है। एक व्यक्ति, जो पुष्कर में करिरा संस्कार पूरा करता है , सभी (अन्य) संसारों को छोड़कर ब्रह्मा की दुनिया में जाता है। वह कल्प के अंत तक ब्रह्मा की दुनिया में रहेगा ।

245. वह मनुष्य को अपने ही कर्मों से तड़पते हुए नहीं देखता। उसका मार्ग अडिग है - तिरछा, ऊपर और नीचे।

246. वह सभी लोकों में पूजनीय है, अपनी कीर्ति का प्रसार करता है और नियंत्रित करता है। उसका व्यवहार अच्छा है, वह नियमों को जानता है और उसकी सभी इंद्रियां आकर्षक हैं।

247. वह नृत्य, वाद्य संगीत में पारंगत, भाग्यशाली और सुंदर है। वह हमेशा एक अधूरे (अर्थात एक ताजा) फूल की तरह होता है, और दिव्य आभूषणों से सुशोभित होता है। वह गहरे नीले रंग के कमल की पंखुड़ियों की तरह गहरा नीला है, और उसके बाल काले और घुंघराले हैं।

248-249। वहाँ देवियाँ, जो उच्च मूल की और एक सुंदर कमर की हैं, और (जो) सभी अच्छे भाग्य से भरी हुई हैं और सभी समृद्ध गुणों से संपन्न हैं, (जो हैं) अपनी युवावस्था पर बहुत गर्व करती हैं, उनकी सेवा करती हैं और उन्हें बिस्तर पर प्रसन्न करती हैं (i) , ई. उसे यौन सुख दें)।

250-252। वह बांसुरी और बांसुरी की आवाज से नींद से जाग जाता है । स्वामी की कृपा के कारण अर्थात। ब्रह्मा, शुभ कार्यों के कर्ता, वे महान उत्सव का आनंद भोगते हैं, जो अज्ञानियों द्वारा प्राप्त करना कठिन है।

भीम ने कहा :

(अच्छा) अभ्यास एक महान धार्मिक योग्यता है; मेरे लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, कि जो लोग किसी पवित्र स्थान के प्रथागत पालन (पालन) के लिए इच्छुक हैं, जो अपने वर्ग के कर्तव्यों का पालन करने में लगे हुए हैं, और जिन्होंने अपने क्रोध और इंद्रियों पर विजय प्राप्त की है, वे ब्रह्मा की दुनिया में जाते हैं।

२५३. इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्राह्मण ब्रह्मा की प्रतीक्षा किए बिना या प्रतिबंधों का पालन किए बिना दूसरी दुनिया में भी जाते हैं।

254-255. हे ब्राह्मण, मुझे बताओ कि महिलाएं, म्लेच्छ , शूद्र, मवेशी, पक्षी और चौगुनी, (भी) गूंगे, मंद, अंधे, बहरे, जो पुष्कर में रहते हैं (लेकिन) तपस्या का अभ्यास नहीं करते हैं या प्रतिबंधों का पालन करें।

पुलस्त्य ने कहा :

256-259. हे भीम, स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र, पशु, पक्षी और चौपाइयों, जो पुष्कर में मरते हैं, वायुयानों में दिव्य शरीरों के साथ ब्रह्मा की दुनिया में जाते हैं, जो सूर्य के समान चमक में, दिव्य रूपों से संपन्न, उत्कृष्ट सुनहरे बैनर वाले, सोने की सीढ़ियों से सजाए गए हैं। हीरे और जवाहरात के खंभे के साथ, सभी सुखों में समृद्ध, इच्छा (रहने वालों की) पर चलते हुए और किसी भी रूप में (जैसा कि रहने वालों द्वारा वांछित)। हजारों महिलाओं से घिरे महान लोग, कई आकर्षणों से भरे ब्रह्मा की दुनिया में या उनकी इच्छा के अनुसार अन्य दुनिया में जाते हैं। ब्रह्मा की दुनिया से गिरकर वे अन्य स्थलीय क्षेत्रों में नियत क्रम में जाते हैं।

260-267। एक ब्राह्मण एक बड़े बड़े परिवार में अमीर (जन्म लेने) बन जाता है। साँप, कीड़े, चीटियों जैसे निम्न पशुओं के रूप में जन्म लेने वाले, इसी प्रकार भूमि में जन्मे, जल से उत्पन्न, पसीने से उत्पन्न, अण्डाकार, पौधे और जीव-जंतु, जो पुष्कर में या बिना किसी इच्छा के मर जाते हैं, ब्रह्मा की दुनिया में जाते हैं। चमक में सूर्य जैसा दिखने वाला एक विमान। कलियुग में जीव पाप से प्रेरित होते हैं। इस ( युग ) में अन्य किसी साधन से न तो धार्मिक पुण्य मिलता है और न ही स्वर्ग। उन पुरुषों के लिए जो Puṣkara में रहते हैं और में ब्रह्मा की पूजा करने पर आमादा हैं कलयुगधन्य हैं; दूसरों का कोई लक्ष्य नहीं है, वे पीड़ित हैं। मनुष्य उस पाप से मुक्त हो जाता है जो वह रात में अपनी पांचों इंद्रियों द्वारा, कर्म, विचार और वाणी से करता है और इच्छा और क्रोध के प्रभाव में होता है, जब पुष्कर के जल में जाने के बाद वह पोते (अर्थात ब्रह्मा) के पास पहुंचता है। ) और पवित्र हो जाता है। सूर्य को उसके उदय से उसके ऊपर जाने तक (आकाश में) देखने से मनुष्य का पाप दूर हो जाता है जब वह ब्रह्मा के मिलन में ध्यान करता है जिसे मानसिक (मिलन) कहा जाता है। मध्याह्न में ब्रह्मा के दर्शन करने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।

२६८. एक आदमी उस पाप से मुक्त हो जाता है जो वह दोपहर से सूर्यास्त तक करता है जब वह केवल शाम को ब्रह्मा को देखता है।

269-270। यद्यपि ब्रह्मा का वह भक्त, जो पुष्कर में रहता है, तपस्या में रहता है, ध्वनि जैसी इंद्रियों के सभी विषयों का भोग करता है, और पुष्कर वन में रहकर दिन में तीन बार भी स्वादिष्ट व्यंजन खाता है, उसे वायु पर निर्वाह करने वाले के बराबर माना जाता है।

271. जो पुरुष पुष्कर में रहते हैं, वे पवित्र कर्म करते हैं, इस पवित्र स्थान की शक्ति से महान सुख प्राप्त करते हैं।

272. जैसे महान महासागर के बराबर कोई जलाशय नहीं है, वैसे ही पुष्कर जैसा कोई पवित्र स्थान नहीं है।

२७३-२७५. पुष्कर जैसा कोई अन्य पवित्र स्थान नहीं है जो गुणों में इसे पार कर सके। मैं आपको अन्य (देवताओं) के नाम बताऊंगा जो इस पवित्र स्थान में बस गए हैं: विष्णु और इंद्र और अन्य के साथ सभी देवता; गजानन , कार्तिकेय ; सूर्य के साथ रेवंता ; शिव की दूत देवी दुर्गा , जो हमेशा कल्याणकारी हैं । देवताओं और वरिष्ठों के प्रति सम्मान और (भुगतान) अच्छे कर्म करने वालों के लिए पर्याप्त (अर्थात कोई आवश्यकता नहीं) तपस्या और संयम।

276-277। एक ब्राह्मण, जो व्रत और व्रत के रूप में इस तरह के कृत्यों को करता है, बिना कुछ किए सर्वश्रेष्ठ पुष्कर वन में रहता है, उसकी सभी इच्छाएं हमेशा यहां रहती हैं, भले ही वह यहां रहता है। वह ब्रह्मा के समान महान अविनाशी स्थान पर जाता है।

278-279। इस पवित्र स्थान के निवासी इस पवित्र स्थान (सिर्फ) में एक दिन में वह फल प्राप्त करते हैं जो बारह वर्षों में कृत (युग) में, एक वर्ष में त्रेता (युग) में और एक महीने में द्वापर (युग) में प्राप्त होता है। ) ऐसा मुझे पहले देवताओं के देवता ब्रह्मा ने बताया था।

280. पृथ्वी पर इससे श्रेष्ठ कोई दूसरा पवित्र स्थान नहीं है। इसलिए मनुष्य को सभी प्रयत्नों से इस वन का आश्रय लेना चाहिए।

२८१. एक गृहस्थ, एक ब्रह्मचारी, एक लंगर और एक भिखारी - जो (ऊपर) बताए गए हैं, वे महान पद पर पहुंच जाते हैं।

282. जो बिना किसी इच्छा या घृणा के, जीवन के एक (विशेष) चरण में धार्मिक नियमों का विधिवत पालन करता है, उसे अगले दुनिया में सम्मानित किया जाता है।

२८३. ब्रह्मा ने यहाँ चार पायदानों वाली एक सीढ़ी स्थापित की है। इस सीढ़ी का सहारा लेने वाले को ब्रह्मा की दुनिया में सम्मानित किया जाता है।

२८४. वह, जो नैतिक योग्यता और सांसारिक समृद्धि को जानता है, उसे अपने जीवन के एक चौथाई (अवधि) के लिए एक गुरु या उसके पुत्र के साथ रहना चाहिए और ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिए।

285. वह जो नैतिक कर्तव्य में उत्कृष्ट होना चाहता है, उसे एक गुरु से सीखना चाहिए; वर्तमान देना चाहिए (गुरु को); और जब बुलाया जाए तो गुरु की सहायता करनी चाहिए।

२८६. (रहते हुए) गुरु के घर में उसके पीछे सोना चाहिए और गुरु के उठने से पहले उठना चाहिए। वह सब करना चाहिए अर्थात सेवा आदि जो शिष्य को करनी चाहिए।

287. वह सब सेवा करने के बाद, उसे (गुरु) के पास खड़ा होना चाहिए। वह एक नौकर होना चाहिए, सब कुछ कर रहा हो और सभी (प्रकारों) कार्यों में कुशल हो।

288. वह शुद्ध, मेहनती, गुणों से संपन्न होना चाहिए और अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके गुरु को वांछित उत्तर देना चाहिए; उसे गुरु की ओर टकटकी लगाकर देखना चाहिए।

289-290। जब तक गुरु न खाए, तब तक वह न खाए; जब तक गुरु ने ऐसा न किया हो तब तक उसे (पानी) नहीं पीना चाहिए। गुरु के खड़े होने पर नहीं बैठना चाहिए, और जब तक गुरु सो नहीं जाता तब तक नहीं सोना चाहिए; अपने हाथों को फैलाकर (गुरु के) पैर दबाएं; और (गुरु के) दाहिने पैर को अपने दाहिने हाथ से और बाएं पैर को अपने बाएं हाथ से दबाएं।

291. अपने नाम की घोषणा करते हुए और गुरु को सलाम करते हुए कहना चाहिए, 'हे श्रद्धेय श्रीमान, मैं यह करूँगा, और मैंने यह किया है'।

292. गुरु को यह सब बताकर और धन देकर वह वह सब काम (जो उसे सौंपा गया हो) करे और गुरु को बता दे कि वह कर चुका है।

२९३. (केवल) गुरु के घर से लौटने के बाद उसे उन सभी गंधों और स्वादों का आनंद लेना चाहिए, जो एक ब्रह्मचारी को पसंद नहीं है। यह कानून की निश्चित राय है (-किताबें)।

294. गुरु के शिष्य और भक्त को ब्रह्मचारी के लिए निर्धारित सभी नियमों का विस्तार से पालन करना चाहिए।

२९५. शिष्य को स्वयं अपनी शक्ति के अनुसार अपने गुरु को स्नेह देकर, गाँव के बाहर के आश्रम में अपना कर्तव्य निभाते हुए रहना चाहिए।

296-297। इसी प्रकार नीचे पड़े ब्राह्मण को गुरु के मुख से वेद, दो वेद या (तीन) वेद सीखना चाहिए और वेद में दिए गए व्रतों का पालन करना चाहिए और गुरु को अपनी प्राप्ति का एक चौथाई हिस्सा देकर विधिवत घर लौट जाना चाहिए। उपदेशक का घर।

298. धार्मिक गुणों से युक्त पत्नी होने के कारण अग्नि का आह्वान करके उन्हें शांत करना चाहिए। (इस प्रकार) एक गृहस्थ को अपने जीवन के दूसरे भाग में व्यवहार करना चाहिए।

299-300। ऋषियों ने पूर्व में एक गृहस्थ के जीवन के चार तरीके निर्धारित किए हैं: पहला है मकई को तीन साल के लिए पर्याप्त रूप से संग्रहित करना; दूसरा मकई को एक के लिए पर्याप्त स्टोर करना है; तीसरा एक दिन के लिए पर्याप्त मकई का भंडारण करना है; चौथा है लिटिल कॉर्न को स्टोर करना। उनमें से अंतिम सबसे अच्छा है क्योंकि यह (सभी) दुनिया (उसके लिए) पर विजय प्राप्त करता है।

301. एक व्यक्ति छह कर्तव्यों का पालन करता है (अर्थात सीखना, सिखाना, त्याग करना, यज्ञ में पुजारी के रूप में कार्य करना, उपहार देना और प्राप्त करना); दूसरा अपना जीवन (निष्पादन) तीन कर्तव्यों का पालन करता है; चौथा एक (जीवन) केवल दो कर्तव्यों से। ऐसा ब्राह्मण ब्रह्म में रहता है।

302-305। गृहस्थ की मन्नत के अलावा और कोई महान पवित्र स्थान (अस्तित्व में) नहीं कहा जाता है। अपने लिए खाना नहीं बनाना चाहिए; किसी को बिना किसी कारण के किसी जानवर को नहीं मारना चाहिए, (लेकिन) एक जानवर या गैर-जानवर (उचित) पवित्रीकरण के बाद एक बलिदान (अर्थात बलिदान किया जा सकता है) का पात्र है। उसे न तो दिन में सोना चाहिए और न ही रात के पहले या आखिरी हिस्से में सोना चाहिए। उसे दो भोजन के बीच गलत समय पर भोजन नहीं करना चाहिए, और झूठ नहीं बोलना चाहिए। कोई भी ब्राह्मण जो उसके घर में आ रहा है, अनादर नहीं रहना चाहिए; और उसके मेहमान आदरणीय हैं और कहा जाता है कि वे देवताओं और अयालों को चढ़ावा चढ़ाते हैं। वे वैदिक विद्या के व्रत (अध्ययन) में नहाए हुए हैं, विद्वान हैं और वेदों में महारत हासिल कर चुके हैं।

३०६. वे अपने स्वयं के कर्तव्य से (करते हुए) अपनी आजीविका प्राप्त करते हैं, संयमित होते हैं, (अपने) काम में लगे रहते हैं और तपस्या करते हैं। देवताओं और पुतलों को चढ़ाने के लिए उनके सम्मान के लिए चढ़ावा रखा जाता है।

307-308। (परन्तु) जो नाशवान वस्तुओं में आसक्त हो गया है, और धार्मिक प्रथाओं से विचलित हो गया है, और पवित्र अग्नि रखने का व्रत तोड़ दिया है, और अपने गुरु के साथ झूठा खेलता है, और झूठ के प्रति समर्पित है, उसे इन दोनों कर्तव्यों को करने का कोई अधिकार नहीं है। (अर्थात देवताओं और पितरों को अर्पण करना) और ऐसी स्थिति में सभी प्राणियों के साथ (भोजन) बाँटना (पूर्ववत) रहता है।

309. इसी तरह एक गृहस्थ को खाना नहीं बनाने वालों को (अपने लिए) देना चाहिए। उसे हमेशा विघास होना चाहिए (जो दूसरों के खाने के अवशेषों को खाता है) और अमृत - भोजन (वह जो बलिदान के अवशेषों का स्वाद लेता है)।

310. अमृत यज्ञ के अवशेष हैं; और भोजन को यज्ञ के तुल्य बताया गया है। जो (दूसरों के द्वारा) खाया हुआ अवशेष खाता है, वह विघासां कहलाता है ।

311-313. पत्नी के प्रति समर्पित, संयमी, परिश्रमी और अपनी इन्द्रियों को बहुत वश में रखना चाहिए। उसे वृद्ध लोगों, बच्चों, बीमार व्यक्तियों, अपनी जाति के व्यक्तियों और रिश्तेदारों, अपने माता, पिता, दामाद, भाई, पुत्र, पत्नी, बेटी और नौकरों के साथ बहस नहीं करनी चाहिए। इनसे वाद-विवाद करने से (अर्थात यदि वह परहेज करता है) तो वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

314-318। इनसे जीतकर वह निस्संदेह सभी संसारों को जीत लेता है। गुरु ब्रह्मा की दुनिया के स्वामी हैं। प्रजापति के लिए जो कुछ भी पवित्र है, उसका पिता पिता है । अतिथि समस्त लोकों का स्वामी है। कार्यवाहक पुजारी वेदों का आश्रय और सर्वोच्च अधिकार है। आकाशीय अप्सराओं की दुनिया में दामाद (स्वामी) है। नातेदार सभी देवताओं के हैं। तिमाहियों में रिश्तेदार शक्तिशाली हैं। मां और मामा धरती पर शक्तिशाली हैं। बूढ़े, बच्चे और बीमार व्यक्ति आकाश में शक्तिशाली हैं। परिवार-पुजारी ऋषियों की दुनिया के स्वामी हैं। आश्रित (आकाशीय प्राणियों का विशेष वर्ग कहा जाता है) साध्यसी के शासक हैं. वैद्य अश्विनी लोक के स्वामी हैं। और भाई वसुओं की दुनिया का स्वामी है । पत्नी चन्द्र लोक की अधिष्ठात्री है। आकाशीय अप्सराओं के घर में कन्या शक्तिशाली होती है।

319. सबसे बड़ा भाई पिता के बराबर है। पत्नी और पुत्र अपने ही शरीर हैं। क्लर्क, नौकर, बेटी बहुत दयनीय हैं। इसलिए, (जब) ​​इनका अपमान किया जाए, तो उन्हें बिना क्रोधित हुए, हमेशा उनका साथ देना चाहिए।

320. गृहस्थ जीवन के प्रति समर्पित, धार्मिक कर्तव्यों में दृढ़ और निराश व्यक्ति को एक साथ कई कार्य शुरू नहीं करना चाहिए (लेकिन) कर्तव्यपरायण होकर उसे थोड़ा शुरू करना चाहिए।

321. एक गृहस्थ के निर्वाह के तरीके तीन हैं। उनका मुख्य उद्देश्य सर्वोच्च आनंद है। इसी तरह वे कहते हैं कि जीवन के चार चरण परस्पर (निर्भर) हैं।

322-323। और वह जो (गृहस्थ) बनना चाहता है, उसे निर्धारित सभी नियमों का पालन करना चाहिए। उन्हें छह दिनों के लिए (या एक वर्ष की खपत के लिए) जार में अनाज जमा करके (जीवित) रहना चाहिए, या कबूतरों की तरह अनाज इकट्ठा करके (अर्थात बहुत कम भंडारण करके) रहना चाहिए; और वह राष्ट्र, जिसमें ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति रहते हैं, समृद्ध होता है। ऐसा व्यक्ति पूर्व के दस पोतों (अर्थात पूर्वजों) और दस वंशों (पीढ़ियों) को शुद्ध करता है।

३२४. वह, जो पीड़ा से मुक्त होकर गृहस्थ के जीवन का अनुसरण करता है, उसे विष्णु लोकों के समान स्थान प्राप्त होगा।

325. या यह उनकी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने वालों की स्थिति कहा जाता है। स्वर्ग उन्हीं का वास है जो आत्मसंयमी हैं।

326. यह सीढ़ी ब्रह्मा द्वारा रखी गई है। इससे मुक्त होने पर दूसरे को नियत क्रम में प्राप्त करने पर स्वर्ग में सम्मान प्राप्त होता है।

327. मैं तीसरे का वर्णन करूंगा- एंकराइट का चरण; (सुनो न सुनो न। जब गृहस्थ अपने को झुर्रीदार और भूरे बालों से युक्त देखता है और अपने बच्चे को देखता है, तो उसे वन का ही सहारा लेना चाहिए।

328-337. हे भीम, तेरा कल्याण हो, गृहस्थ की अवस्था से विरक्त, एंकोराइट की अवस्था में रहनेवाले, समस्त लोकों के हितैषी, दीक्षा पाकर वन में जाने वालों का (लेखा) सुनो। जो पवित्र देशों में रहते हैं, जिनके पास बुद्धि की शक्ति है और जो सत्य, पवित्रता और क्षमा से संपन्न हैं। जीवन के तीसरे भाग में लंगर की अवस्था में रहते हुए, वह, एक बलिदानी, को उसी दिव्य अग्नि को जलाना चाहिए (जैसा कि वह एक गृहस्थ के रूप में प्रवृत्त था)। नियंत्रित और खाद्य (आदत) में मध्यम और समर्पित और संलग्न विष्णु, वह हर तरह से (जारी रखने के लिए) चाहिए अग्निहोत्र(पवित्र अग्नि का रखरखाव) और अन्य बलिदान की आवश्यकताएं। वह (उसे निर्वाह करना चाहिए) चावल और जौ के जंगली उगने और खाए गए भोजन की पत्तियों पर। माघ मास से ग्रीष्म ऋतु (शुरुआत) में उसे हवन करना चाहिए. निर्वाह के ये चार तरीके एंकराइट के चरण में (पाने के लिए) कहा जाता है। कुछ तुरंत खाते हैं (यानी कुछ भी स्टोर न करें); कुछ भंडार (अनाज) एक महीने तक चलने वाला, या एक साल तक चलने वाला या बारह साल तक मेहमानों और यज्ञ अनुष्ठानों के सम्मान के लिए। वर्षा ऋतु में वे आकाश के नीचे रहते हैं; सर्दियों में वे पानी का सहारा लेते हैं; गर्मियों में वे पांच अग्नि की तपस्या का अभ्यास करते हैं (अर्थात चार अग्नि चारों दिशाओं में एक के चारों ओर रखी जाती हैं और सूर्य पांचवीं अग्नि है); शरद ऋतु में वे अवांछित भिक्षा खाते हैं। वे जमीन पर लुढ़कते हैं या अपने पैरों के अग्र भाग पर खड़े होते हैं। वे स्थिर मुद्रा में या यहां तक ​​कि अपने (अपने आवास) में भी रहते हैं। कुछ अपने दांतों का उपयोग मोर्टार के लिए करते हैं, जबकि अन्य चीजों को तेज़ करने के लिए पत्थरों का उपयोग करते हैं।

338-339। कुछ लोग शुक्ल पक्ष में उबला हुआ खट्टा घी पीते हैं; या कुछ अंधेरे पखवाड़े में; या जब (और जब) उन्हें कुछ मिलता है (खाने के लिए); एंकराइट के जीवन के तरीके का अभ्यास करते हुए, और दृढ़ संकल्प के कुछ लोग जड़ों पर रहते हैं, अन्य फलों पर और (अभी भी) अन्य पानी पर रहते हैं।

340-341। ये और अन्य उन उच्च विचारों वाले लोगों के विभिन्न धार्मिक संस्कार हैं। जीवन की चौथी विधा (यानी संन्यास ) जैसा कि उपनिषदों में वर्णित है, को सार्वभौमिक कहा जाता है। एक अचोराइट के जीवन की विधा एक है; एक गृहस्थ के जीवन का दूसरा तरीका है। उसी जीवन में दूसरा (अर्थात् संन्यास ) आगे बढ़ता है (इनके बाद)। (ऐसा कहा गया है) सब कुछ देखने वाले ऋषियों ने।

342-343। ये (ऋषि) अर्थात। अगस्त्य और सात ऋषि, मधुचंददास , गवेशण , संकति, सदिव, भाती , यवप्रोथा, अथर्वण , अहोवर्य, इसलिए काम्य , स्थानु , और बुद्धिमान मेधाती , मनोवक, शृण्य, उनके कर्तव्य को जानकर , स्वर्ग , शुण्यव गए।

344-345। जो धर्म के अवतार हैं, उसी प्रकार घोर तपस्या करने वाले और धार्मिक मामलों में कौशल दिखाने वाले ऋषियों में से आवारा भिक्षुओं के समूह ने देवताओं के स्वामी को प्रसन्न करके वन का सहारा लिया है।

३४६. पश्चाताप करने वाले ब्राह्मणों ने छल का त्याग कर वन का आश्रय लिया है। आवारा और अगम्य समूह अपने घरों से दूर दिखाई दे रहे हैं।

347-349। वृद्धावस्था से पीड़ित और रोग (ब्राह्मणों) से परेशान होकर जीवन के शेष चरण में चले गए हैं। चौथा, एंकराइट से। शीघ्र कर्म करने वाला, जिसने सभी वेदों का अध्ययन (अध्ययन) किया है और (यज्ञों को) उपहारों के साथ किया है, वह सभी प्राणियों को स्वयं के रूप में देखता है; नरम दिमाग का है, अपने आप में खेल रहा है; आत्म निर्भर, स्वयं में आग लगाकर और सभी संपत्ति को त्याग कर, उसे हमेशा यज्ञ (या यज्ञ) करना चाहिए।

350-351. (मामले में) जो लोग हमेशा यज्ञ करते हैं, वह स्वयं में चला जाता है एक उपयुक्त समय पर उसे अपनी व्यक्तिगत आत्मा के साथ तीनों अग्नि को सर्वोच्च आत्मा में समर्पित करना चाहिए। उसे निन्दा किए बिना, जो कुछ भी मिलता है, उसे किसी भी रूप में खाना चाहिए। जो जीवन के (तीसरे) चरण से प्यार से जुड़ा हुआ है। एंकराइट के सिर और शरीर के अन्य हिस्सों के बालों को हटा देना चाहिए।

352-359. वह अपने कर्मों से तुरन्त शुद्ध होकर जीवन की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाता है। वह ब्राह्मण, जो सभी प्राणियों को सुरक्षा प्रदान करने के बाद संसार को त्याग देता है, मृत्यु के बाद चमकदार दुनिया में जाता है और अनंत को प्राप्त करता है। वह एक अच्छे चरित्र का और अपने पापों को दूर करने के साथ, इस या अगले दुनिया में या तो आनंद नहीं लेता है। क्रोध और मोह से मुक्त, बिना मित्रता या कलह के, वह आत्म-ध्यान के परिणामस्वरूप उदासीन रहता है। वह दूसरों की मृत्यु से विचलित नहीं होता है; मानसिक रूप से अपने शास्त्रों के प्रति उदासीन है और स्वयं (समझने) में गलती नहीं करता है। उसके लिए, संदेह से मुक्त, सभी प्राणियों को स्वयं के रूप में देखना, और धर्म के इरादे से और उसकी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के साथ, अधिग्रहण (वस्तुओं का) उसकी इच्छा के अनुकूल हो जाता है (अर्थात चीजें अपने स्वयं के पाठ्यक्रम ले सकती हैं)। अब जीवन के उस चौथे चरण का (विवरण) सुनें, जिसे (मेरे द्वारा) वर्णित किया जा रहा है, जिसे सबसे बड़ा चरण कहा जाता है। यह सर्वोच्च लक्ष्य है, जीवन के बहुत ही श्रेष्ठ (अन्य) चरण। उस बात को ध्यान से सुनें जो परम आत्मा के लिए (पहुंच) की जानी चाहिए और जिसे दो चरणों (अर्थात् एक गृहस्थ और लंगर की) से शुद्धिकरण प्राप्त हुआ है और (जो किया जाना चाहिए) उनके बाद। सुनें कि वह तीन चरणों में लाल वस्त्र धारण करता है (अर्थात जो तपस्वी को स्वीकार करता है) -अद्वितीय चरण - और उस विचार (त्याग के) के साथ (सब कुछ) त्याग कर, व्यवहार करता है; किसी और के साथ नहीं, उसे अकेले ही धार्मिकता का अभ्यास करना चाहिए। वह, जो एक समझदार व्यक्ति है, जो स्वयं (धार्मिकता) का अभ्यास करता है, वह (किसी को भी नहीं छोड़ता है और न ही किसी चीज में कमी है)। जीवन के बहुत अधिक श्रेष्ठ (अन्य) चरण। उस बात को ध्यान से सुनें जो परम आत्मा के लिए (पहुंच) की जानी चाहिए और जिसे दो चरणों (अर्थात् एक गृहस्थ और लंगर की) से शुद्धिकरण प्राप्त हुआ है और (जो किया जाना चाहिए) उनके बाद। सुनें कि वह तीन चरणों में लाल वस्त्र धारण करता है (अर्थात जो तपस्वी को स्वीकार करता है) -अद्वितीय चरण - और उस विचार (त्याग के) के साथ (सब कुछ) त्याग कर, व्यवहार करता है; किसी और के साथ नहीं, उसे अकेले ही धार्मिकता का अभ्यास करना चाहिए। वह, जो एक समझदार व्यक्ति है, जो स्वयं (धार्मिकता) का अभ्यास करता है, वह (किसी को भी नहीं छोड़ता है और न ही किसी चीज में कमी है)। जीवन के बहुत अधिक श्रेष्ठ (अन्य) चरण। उस बात को ध्यान से सुनें जो परम आत्मा के लिए (पहुंच) की जानी चाहिए और जिसे दो चरणों (अर्थात् एक गृहस्थ और लंगर की) से शुद्धिकरण प्राप्त हुआ है और (जो किया जाना चाहिए) उनके बाद। सुनें कि वह तीन चरणों में लाल वस्त्र धारण करता है (अर्थात जो तपस्वी को स्वीकार करता है) -अद्वितीय चरण - और उस विचार (त्याग के) के साथ (सब कुछ) त्याग कर, व्यवहार करता है; किसी और के साथ नहीं, उसे अकेले ही धार्मिकता का अभ्यास करना चाहिए। वह, जो एक समझदार व्यक्ति है, जो स्वयं (धार्मिकता) का अभ्यास करता है, वह (किसी को भी नहीं छोड़ता है और न ही किसी चीज में कमी है)। उसके लिए जो परम आत्मा के लिए (पहुंच) किया जाना चाहिए और जिसे दो चरणों (अर्थात एक गृहस्थ और लंगर के) से शुद्धिकरण प्राप्त हुआ है और (जो किया जाना चाहिए) उनके बाद। सुनें कि वह तीन चरणों में लाल वस्त्र धारण करता है (अर्थात जो तपस्वी को स्वीकार करता है) -अद्वितीय चरण - और उस विचार (त्याग के) के साथ (सब कुछ) त्याग कर, व्यवहार करता है; किसी और के साथ नहीं, उसे अकेले ही धार्मिकता का अभ्यास करना चाहिए। वह, जो एक समझदार व्यक्ति है, जो स्वयं (धार्मिकता) का अभ्यास करता है, वह (किसी को भी नहीं छोड़ता है और न ही किसी चीज में कमी है)। उसके लिए जो परम आत्मा के लिए (पहुंच) किया जाना चाहिए और जिसे दो चरणों (अर्थात एक गृहस्थ और लंगर के) से शुद्धिकरण प्राप्त हुआ है और (जो किया जाना चाहिए) उनके बाद। सुनें कि वह तीन चरणों में लाल वस्त्र धारण करता है (अर्थात जो तपस्वी को स्वीकार करता है) -अद्वितीय चरण - और उस विचार (त्याग के) के साथ (सब कुछ) त्याग कर, व्यवहार करता है; किसी और के साथ नहीं, उसे अकेले ही धार्मिकता का अभ्यास करना चाहिए। वह, जो एक समझदार व्यक्ति है, जो स्वयं (धार्मिकता) का अभ्यास करता है, वह (किसी को भी नहीं छोड़ता है और न ही किसी चीज में कमी है)। जो तपस्या को स्वीकार करता है)—अद्वितीय चरण—और उस विचार (त्याग) के साथ (सब कुछ) त्याग कर, व्यवहार करता है; किसी और के साथ नहीं, उसे अकेले ही धार्मिकता का अभ्यास करना चाहिए। वह, जो एक समझदार व्यक्ति है, जो स्वयं (धार्मिकता) का अभ्यास करता है, वह (किसी को भी नहीं छोड़ता है और न ही किसी चीज में कमी है)। जो तपस्या को स्वीकार करता है)—अद्वितीय चरण—और उस विचार (त्याग) के साथ (सब कुछ) त्याग कर, व्यवहार करता है; किसी और के साथ नहीं, उसे अकेले ही धार्मिकता का अभ्यास करना चाहिए। वह, जो एक समझदार व्यक्ति है, जो स्वयं (धार्मिकता) का अभ्यास करता है, वह (किसी को भी नहीं छोड़ता है और न ही किसी चीज में कमी है)।

360-363. न अग्नि को बनाए रखने, न रहने के लिए, उसे भिक्षा के लिए (केवल) गाँव का सहारा लेना चाहिए। एक तपस्वी विचारों (उपयुक्त) से संपन्न, उसे भविष्य के लिए कुछ भी नहीं रखना चाहिए। उसे कम खाना चाहिए, भोजन (आदतों) पर नियंत्रण रखना चाहिए, और एक बार (दिन में) भोजन करना चाहिए। उसे (भीख माँगना-) कटोरा लेना चाहिए, पेड़ों की जड़ों में रहना चाहिए, लत्ता पहनना चाहिए, और बिलकुल अकेला रहना चाहिए। उसे सभी प्राणियों के प्रति उदासीन होना चाहिए। ये एक तपस्वी के लक्षण हैं। वह, जिसके पास शब्द शवों के रूप में जाते हैं (हैं) एक कुएं में, और जो उनका उच्चारण करता है (अर्थात वह जो सभी आलोचनाओं के लिए बहरा है) उसके पास कभी नहीं लौटता है उसे तपस्वी अवस्था में रहना चाहिए। उसे न तो देखना चाहिए और न ही वह सुनना चाहिए जो दूसरों को बताने के योग्य नहीं है।

३६४. यह विशेष रूप से ब्राह्मणों के मामले में किसी भी कारण से होना चाहिए; उसे हमेशा वही बोलना चाहिए जो एक ब्राह्मण को पसंद हो।

३६५. खुद की देखभाल करते हुए उसे (दूसरों द्वारा) निंदा किए जाने पर चुप रहना चाहिए; ताकि उसके एक होने से सारा स्थान भर जाए।

३६६. भगवान उसे एक ब्राह्मण के रूप में देखते हैं, जिसने एक शून्य को भर दिया है।

३६७. देवता उसे एक ब्राह्मण के रूप में देखते हैं, जो अपने आप को किसी भी चीज़ से ढक लेता है, और कुछ भी खाकर संतुष्ट हो जाता है।

३६८. भगवान उसे एक ब्राह्मण के रूप में देखते हैं, जो एक सर्प की तरह, लोगों से डरता है, या जो, अच्छे दिल के आदमी की तरह, नरक में गिरने से डरता है, या जो एक नीच व्यक्ति की तरह डरता है महिलाओं की।

३६९. सम्मानित होने पर न तो हर्षित होना चाहिए और न ही अपमानित होने पर निराश होना चाहिए। देवता उसे एक ब्राह्मण के रूप में देखते हैं, जो सभी प्राणियों को सुरक्षा प्रदान करता है।

370. उसे न तो मृत्यु का स्वागत करना चाहिए और न ही जीवन का। उसे बस भाग्य का निरीक्षण करना चाहिए जैसे एक बैल (अपने मालिक के) आदेश की प्रतीक्षा करता है।

३७१. तब (ऐसे) मन से अप्रभावित, संयमी और बुद्धिहीन होकर सभी पापों से मुक्त होकर मनुष्य स्वर्ग को जाता है।

३७२. जिसे सभी प्राणियों से भय नहीं है और जो प्राणियों को सुरक्षा प्रदान करता है, और जो शरीर में (अर्थात जीवित रहते हुए) मुक्त हो जाता है, उसे कहीं से भी भय नहीं होता है।

३७३. जिस प्रकार हाथी के पदचिन्हों के नीचे दूसरों के पदचिन्ह (अर्थात् लुप्त) होते हैं, उसी प्रकार उसके हृदय में सभी प्रकार का ज्ञान निहित है।

३७४. इस प्रकार सब कुछ, इसलिए पवित्रता और सांसारिक समृद्धि, जब हानिरहित (अभ्यास की जाती है) बढ़ जाती है; जो दूसरों का अहित करता है, वह सदा मरा हुआ है।

375. तो जो (किसी को) कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है, जो उचित रूप से साहसी है, जिसने अपनी इंद्रियों को नियंत्रित किया है। और जो सभी प्राणियों की शरणस्थली है, वह श्रेष्ठ पद को प्राप्त करता है।

376. इस प्रकार, बुद्धिमान के लिए, जो ज्ञान से संतुष्ट है, जो निडर है, मृत्यु कोई अतिरिक्त शर्त नहीं है; और, वह अमरता तक पहुँच जाता है।

३७७. देवता उसे एक ब्राह्मण के रूप में देखते हैं, जो सभी आसक्तियों से मुक्त ऋषि है, अंतरिक्ष की तरह रहता है, वही करता है जो विष्णु को प्रिय और शांत होता है।

३७८. देवता उसे एक ब्राह्मण के रूप में देखते हैं, जिसका जीवन धर्मपरायणता के लिए है, और जिसकी धर्मपरायणता स्नेह के लिए है; और जिनके दिन और रात नेक कामों के लिए हैं।

३७९. देवता उसे एक ब्राह्मण के रूप में देखते हैं, जो (सभी) कार्यों से दूर रहता है, जो अभिवादन और प्रशंसा से बचता है, जो अप्रभावित रहता है, और (जिसके प्रभाव) कम हो जाते हैं।

380. सभी प्राणी खुशी से आनंद लेते हैं; सभी दुख अत्यधिक हैं; उनके जन्म देने से निराश होकर उन्हें अपने कर्मों (अर्थात कर्तव्य) को विश्वास के साथ करना चाहिए।

३८१. उनका उपहार प्राणियों को सुरक्षा प्रदान करना है; यह दुनिया के सभी (अन्य) उपहारों से श्रेष्ठ है। जो सबसे पहले अपने शरीर को कठोरता के लिए अर्पित करता है, वह प्राणियों से अनंत सुरक्षा प्राप्त करता है।

382. वह अपने मुंह से खुले दिमाग से अर्पण करता है (यानी वह केवल मौखिक रूप से यज्ञ करता है)। वह हर जगह एक अंतहीन अवधि के लिए एक उच्च स्थान प्राप्त करता है। यह सब उसके शरीर के संपर्क के कारण निकला है; वैष्णर (परमात्मा) तक पहुँच गया है ।

383. जो कुछ भी, वह अपने लिए बलिदान करता है, अपने दिल में चढ़ाता है, जो अंगूठे और तर्जनी के बीच की अवधि के माप के (यानी) फैल गया है, आत्मा में रहता है, सभी लोगों की उपस्थिति में साथ में देवताओं

३८४. जो लोग त्रिगुणात्मक सूक्ष्म देवता को जानते हैं, जो सर्वोच्च वस्तु बन गए हैं, सभी लोकों में सम्मानित (और) शक्तिशाली देवता बनकर अमरत्व को प्राप्त होते हैं।

३८५. जो अपनी आत्मा में वेदों को पाता है, जो जाना जाता है, संपूर्ण संस्कार, व्युत्पत्ति संबंधी व्याख्याएं और सर्वोच्च सत्य को पाता है, उसके द्वारा हमेशा सभी चलते हैं।

386-388। जो प्रज्वलित किरणों से युक्त है, वह समय के उस चक्र को जानता है, जो जमीन से नहीं चिपकता, जिसे आकाश में नहीं मापा जा सकता, जो परिक्रमा में स्वर्ण है, जो वायुमण्डल में दक्षिण में है, अपने में नहीं। , जो घूम रहा है और घूम रहा है, जिसमें छह गिरियां और तीन अवधि हैं, जिसके उद्घाटन में सब कुछ गिरता है (अर्थात शामिल है), एक गुफा में रखा गया है (अर्थात अस्पष्ट है), जिसके पक्ष में वह जानता है संसार के शरीर और यहां के सभी लोगों में, वह इसमें देवताओं को प्रसन्न करता है और (इस प्रकार) नित्य मुक्त हो जाता है।

389-390। सांसारिक वस्तुओं के भय के कारण वह संसार में तेजस्वी, सर्वव्यापी, शाश्वत और निकट (परमात्मा) बन जाता है; जिससे (अर्थात्) प्राणी भयभीत नहीं होते, न ही वह सत्ता से ऊब जाता है, कि ब्राह्मण, निन्दा न होते हुए, दूसरों की निन्दा नहीं करता; उसे अपनी आत्मा में बहुत झांकना चाहिए। अपने भ्रम को दूर करने और पापों को नष्ट करने के साथ, वह वांछित के रूप में इस दुनिया और अगले में कठोर हो जाता है।

३९१. क्रोध और मोह से मुक्त, मिट्टी और सोने के एक ढेले पर समान रूप से देखने पर, उसके दुःख को नष्ट कर दिया, उसकी दोस्ती और झगड़ा बंद हो गया, निंदा या प्रशंसा से मुक्त, प्रिय या अप्रिय कुछ भी नहीं होने के कारण, वह एक उदासीन उदासीन है ( दुनिया के लिए)।





पद्मपुराणम्/खण्डः १ (सृष्टिखण्डम्)/अध्यायः १६

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भीष्म उवाच
यदेतत्कथितं ब्रह्मंस्तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्
कमलस्याभिपातेन तीर्थं जातं धरातले१
तत्रस्थेन भगवता विष्णुना शंकरेण च
यत्कृतं मुनिशार्दूल तत्सर्वं परिकीर्त्तय२
कथं यज्ञो हि देवेन विभुना तत्र कारितः
के सदस्या ऋत्विजश्च ब्राह्मणाः के समागताः३
के भागास्तस्य यज्ञस्य किं द्रव्यं का चदक्षिणा
का वेदी किं प्रमाणं च कृतं तत्र विरंचिना४
यो याज्यः सर्वदेवानां वेदैः सर्वत्र पठ्यते
कं च काममभिध्यायन्वेधा यज्ञं चकार ह५
यथासौ देवदेवेशो ह्यजरश्चामरश्च ह
तथा चैवाक्षयः स्वर्गस्तस्य देवस्य दृश्यते६
अन्येषां चैव देवानां दत्तः स्वर्गो महात्मना
अग्निहोत्रार्थमुत्पन्ना वेदा ओषधयस्तथा७
ये चान्ये पशवो भूमौ सर्वे ते यज्ञकारणात्
सृष्टा भगवतानेन इत्येषा वैदिकी श्रुतिः८
तदत्र कौतुकं मह्यं श्रुत्वेदं तव भाषितम्
यं काममधिकृत्यैकं यत्फलं यां च भावनां९
कृतश्चानेन वै यज्ञः सर्वं शंसितुमर्हसि
शतरूपा च या नारी सावित्री सा त्विहोच्यते१०
भार्या सा ब्रह्मणः प्रोक्ताः ऋषीणां जननी च सा
पुलस्त्याद्यान्मुनीन्सप्त दक्षाद्यांस्तु प्रजापतीन्११
स्वायंभुवादींश्च मनून्सावित्री समजीजनत्
धर्मपत्नीं तु तां ब्रह्मा पुत्रिणीं ब्रह्मणः प्रियः१२
पतिव्रतां महाभागां सुव्रतां चारुहासिनीं
कथं सतीं परित्यज्य भार्यामन्यामविंदत१३
किं नाम्नी किं समाचारा कस्य सा तनया विभोः
क्व सा दृष्टा हि देवेन केन चास्य प्रदर्शिता१४
किं रूपा सा तु देवेशी दृष्टा चित्तविमोहिनी
यां तु दृष्ट्वा स देवेशः कामस्य वशमेयिवान्१५
वर्णतो रूपतश्चैव सावित्र्यास्त्वधिका मुने
या मोहितवती देवं सर्वलोकेश्वरं विभुम्१६
यथा गृहीतवान्देवो नारीं तां लोकसुंदरीं
यथा प्रवृत्तो यज्ञोसौ तथा सर्वं प्रकीर्तय१७
तां दृष्ट्वा ब्रह्मणः पार्श्वे सावित्री किं चकार ह
सावित्र्यां तु तदा ब्रह्मा कां तु वृत्तिमवर्त्तत१८
सन्निधौ कानि वाक्यानि सावित्री ब्रह्मणा तदा
उक्ताप्युक्तवती भूयः सर्वं शंसितुमर्हसि१९
किं कृतं तत्र युष्माभिः कोपो वाथ क्षमापि वा
यत्कृतं तत्र यद्दृष्टं यत्तवोक्तं मया त्विह२०
विस्तरेणेह सर्वाणि कर्माणि परमेष्ठिनः
श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण विधेर्यज्ञविधिं परं२१
कर्मणामानुपूर्व्यं च प्रारंभो होत्रमेव च
होतुर्भक्षो यथाऽचापि प्रथमा कस्य कारिता२२
कथं च भगवान्विष्णुः साहाय्यं केन कीदृशं
अमरैर्वा कृतं यच्च तद्भवान्वक्तुमर्हति२३
देवलोकं परित्यज्य कथं मर्त्यमुपागतः
गार्हपत्यं च विधिना अन्वाहार्यं च दक्षिणम्२४
अग्निमाहवनीयं च वेदीं चैव तथा स्रुवम्
प्रोक्षणीयं स्रुचं चैव आवभृथ्यं तथैव च२५
अग्नींस्त्रींश्च यथा चक्रे हव्यभागवहान्हि वै
हव्यादांश्च सुरांश्चक्रे कव्यादांश्च पितॄनपि२६
भागार्थं यज्ञविधिना ये यज्ञा यज्ञकर्मणि
यूपान्समित्कुशं सोमं पवित्रं परिधीनपि२७
यज्ञियानि च द्रव्याणि यथा ब्रह्मा चकार ह
विबभ्राज पुरा यश्च पारमेष्ठ्येन कर्मणा२८
क्षणा निमेषाः काष्ठाश्च कलास्त्रैकाल्यमेव च
मुहूर्तास्तिथयो मासा दिनं संवत्सरस्तथा२९
ऋतवः कालयोगाश्च प्रमाणं त्रिविधं पुरा
आयुः क्षेत्राण्यपचयं लक्षणं रूपसौष्ठवम्३०
त्रयो वर्णास्त्रयो लोकास्त्रैविद्यं पावकास्त्रयः
त्रैकाल्यं त्रीणि कर्माणि त्रयो वर्णास्त्रयो गुणाः३१
सृष्टा लोकाः पराः स्रष्ट्रा ये चान्येनल्पचेतसा
या गतिर्धर्मयुक्तानां या गतिः पापकर्मणां३२
चातुर्वर्ण्यस्य प्रभवश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता
चतुर्विद्यस्य यो वेत्ता चतुराश्रमसंश्रयः३३
यः परं श्रूयते ज्योतिर्यः परं श्रूयते तपः
यः परं परतः प्राह परं यः परमात्मवान्३४
सेतुर्यो लोकसेतूनां मेध्यो यो मेध्यकर्मणाम्
वेद्यो यो वेदविदुषां यः प्रभुः प्रभवात्मनाम्३५
असुभूतश्च भूतानामग्निभूतोग्निवर्चसाम्
मनुष्याणां मनोभूतस्तपोभूतस्तपस्विनाम्३६
विनयो नयवृत्तीनां तेजस्तेजस्विनामपि
इत्येतत्सर्वमखिलान्सृजन्लोकपितामहः३७
यज्ञाद्गतिं कामन्वैच्छत्कथं यज्ञे मतिः कृता
एष मे संशयो ब्रह्मन्नेष मे संशयः परः३८
आश्चर्यः परमो ब्रह्मा देवैर्दैत्यैश्च पठ्यते
कर्मणाश्चर्यभूतोपि तत्त्वतः स इहोच्यते३९
पुलस्त्य उवाच
प्रश्नभारो महानेष त्वयोक्तो ब्रह्मणश्च यः
यथाशक्ति तु वक्ष्यामि श्रूयतां तत्परं यशः४०
सहस्रास्यं सहस्राक्षं सहस्रचरणं च यम्
सहस्रश्रवणं चैव सहस्रकरमव्ययम्४१
सहस्रजिह्वं साहस्रं सहस्रपरमं प्रभुं
सहस्रदं सहस्रादिं सहस्रभुजमव्ययम्४२
हवनं सवनं चैव हव्यं होतारमेव च
पात्राणि च पवित्राणि वेदीं दीक्षां चरुं स्रुवम्४३
स्रुक्सोममवभृच्चैव प्रोक्षणीं दक्षिणा धनम्
अद्ध्वर्युं सामगं विप्रं सदस्यान्सदनं सदः४४
यूपं समित्कुशं दर्वी चमसोलूखलानि च
प्राग्वंशं यज्ञभूमिं च होतारं बन्धनं च यत्४५
ह्रस्वान्यतिप्रमाणानि प्रमाणस्थावराणि च
प्रायश्चित्तानि वाजाश्च स्थंडिलानि कुशास्तथा४६
मंत्रं यज्ञं च हवनं वह्निभागं भवं च यं
अग्रेभुजं होमभुजं शुभार्चिषमुदायुधं४७
आहुर्वेदविदो विप्रा यो यज्ञः शाश्वतः प्रभुः
यां पृच्छसि महाराज पुण्यां दिव्यामिमां कथां४८
यदर्थं भगवान्ब्रह्मा भूमौ यज्ञमथाकरोत्
हितार्थं सुरमर्त्यानां लोकानां प्रभवाय च४९
ब्रह्माथ कपिलश्चैव परमेष्ठी तथैव च
देवाः सप्तर्षयश्चैव त्र्यंबकश्च महायशाः५० 1.16.50
सनत्कुमारश्च महानुभावो मनुर्महात्मा भगवान्प्रजापतिः
पुराणदेवोथ तथा प्रचक्रे प्रदीप्तवैश्वानरतुल्यतेजाः५१
पुरा कमलजातस्य स्वपतस्तस्य कोटरे
पुष्करे यत्र संभूता देवा ऋषिगणास्तथा५२
एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः
पुराणं कथ्यते यत्र वेदस्मृतिसुसंहितं५३
वराहस्तु श्रुतिमुखः प्रादुर्भूतो विरिंचिनः
सहायार्थं सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थितः५४
विस्तीर्णं पुष्करे कृत्वा तीर्थं कोकामुखं हि तत्
वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुहस्तश्चितीमुखः५५
अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः
अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदांगः श्रुतिभूषणः५६
आज्यनासः स्रुवतुंडः सामघोषस्वनो महान्
सत्यधर्ममयः श्रीमान्कर्मविक्रमसत्कृतः५७
प्रायश्चित्तनखो धीरः पशुजानुर्मखाकृतिः
उद्गात्रांत्रो होमलिंगो फलबीजमहौषधिः५८
वाय्वंतरात्मा मंत्रास्थिरापस्फिक्सोमशोणितः
वेदस्कंधो हविर्गंधो हव्यकव्यातिवेगवान्५९
प्राग्वंशकायो द्युतिमान्नानादीक्षाभिरर्चितः
दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान्६०
उपाकर्मेष्टिरुचिरः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः
छायापत्नीसहायो वै मणिशृंगमिवोच्छ्रितः६१
सर्वलोकहितात्मा यो दंष्ट्रयाभ्युज्जहारगाम्
ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः६२
ततो जगाम निर्वाणं पृथिवीधारणाद्धरिः
एवमादिवराहेण धृत्वा ब्रह्महितार्थिना६३
उद्धृता पुष्करे पृथ्वी सागरांबुगता पुरा
वृतः शमदमाभ्यां यो दिव्ये कोकामुखे स्थितः६४
आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्दैवतैः सह
रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः६५
दिग्भिर्विदिग्भिः पृथिवी नदीभिः सह सागरैः
चराचरगुरुः श्रीमान्ब्रह्मा ब्रह्मविदांवरः६६
उवाच वचनं कोकामुखं तीर्थं त्वया विभो
पालनीयं सदा गोप्यं रक्षा कार्या मखे त्विह६७
एवं करिष्ये भगवंस्तदा ब्रह्माणमुक्तवान्
उवाच तं पुनर्ब्रह्मा विष्णुं देवं पुरः स्थितम्६८
त्वं हि मे परमो देवस्त्वं हि मे परमो गुरुः
त्वं हि मे परमं धाम शक्रादीनां सुरोत्तम६९
उत्फुल्लामलपद्माक्ष शत्रुपक्ष क्षयावह
यथा यज्ञेन मे ध्वंसो दानवैश्च विधीयते७०
तथा त्वया विधातव्यं प्रणतस्य नमोस्तु ते
विष्णुरुवाच
भयं त्यजस्व देवेश क्षयं नेष्यामि दानवान्७१
ये चान्ते विघ्नकर्तारो यातुधानास्तथाऽसुराः
घातयिष्याम्यहं सर्वान्स्वस्ति तिष्ठ पितामह७२
एवमुक्त्वा स्थितस्तत्र साहाय्येन कृतक्षणः
प्रववुश्च शिवा वाताः प्रसन्नाश्च दिशो दश७३
सुप्रभाणि च ज्योतींषि चंद्रं चक्रुः प्रदक्षिणम्
न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रसेदुश्चापि सिंधवः७४
नीरजस्का भूमिरासीत्सकला ह्लाददास्त्वपः
जग्मुः स्वमार्गं सरितो नापि चुक्षुभुरर्णवाः७५
आसन्शुभानींद्रियाणि नराणामंतरात्मनाम्
महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरवाचयन्७६
यज्ञे तस्मिन्हविः पाके शिवा आसंश्च पावकाः
प्रवृत्तधर्मसद्वृत्ता लोका मुदितमानसाः७७
विष्णोः सत्यप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधना गिरः
ततो देवाः समायाता दानवा राक्षसैस्सह७८
भूतप्रेतपिशाचाश्च सर्वे तत्रागताः क्रमात्
गंधर्वाप्सरसश्चैव नागा विद्याधरागणाः७९
वानस्पत्याश्चौषधयो यच्चेहेद्यच्च नेहति
ब्रह्मादेशान्मारुतेन आनीताः सर्वतो दिशः८०
यज्ञपर्वतमासाद्य दक्षिणामभितोदिशम्
सुरा उत्तरतः सर्वे मर्यादापर्वते स्थिताः८१
गंधर्वाप्सरसश्चैव मुनयो वेदपारगाः
पश्चिमां दिशमास्थाय स्थितास्तत्र महाक्रतौ८२
सर्वे देवनिकायाश्च दानवाश्चासुरागणाः
अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा सुप्रीतास्ते परस्परम्८३
ऋषीन्पर्यचरन्सर्वे शुश्रूषन्ब्राह्मणांस्तथा
ऋषयो ब्रह्मर्षयश्च द्विजा देवर्षयस्तथा८४
राजर्षयो मुख्यतमास्समायाताः समंततः
कतमश्च सुरोप्यत्र क्रतौ याज्यो भविष्यति८५
पशवः पक्षिणश्चैव तत्र याता दिदृक्षवः
ब्राह्मणा भोक्तुकामाश्च सर्वे वर्णानुपूर्वशः८६
स्वयं च वरुणो रत्नं दक्षश्चान्नं स्वयं ददौ
आगत्यवरुणोलोकात्पक्वंचान्नंस्वतोपचत्८७
वायुर्भक्षविकारांश्च रसपाची दिवाकरः
अन्नपाचनकृत्सोमो मतिदाता बृहस्पतिः८८
धनदानं धनाध्यक्षो वस्त्राणि विविधानि च
सरस्वती नदाध्यक्षो गंगादेवी सनर्मदा८९
याश्चान्याः सरितः पुण्याः कूपाश्चैव जलाशयाः
पल्वलानि तटाकानि कुंडानि विविधानि च९०
प्रस्रवाणि च मुख्यानि देवखातान्यनेकशः
जलाशयानि सर्वाणि समुद्राः सप्तसंख्यकाः९१
लवणेक्षुसुरासर्पिर्दधिदुग्धजलैः समम्
सप्तलोकाः सपातालाः सप्तद्वीपाः सपत्तनाः९२
वृक्षा वल्ल्यः सतृणानि शाकानि च फलानि च
पृथिवीवायुराकाशमापोज्योतिश्च पंचमम्९३
सविग्रहाणि भूतानि धर्मशास्त्राणि यानि च
वेदभाष्याणि सूत्राणि ब्रह्मणा निर्मितं च यत्९४
अमूर्तं मूर्तमत्यन्तं मूर्तदृश्यं तथाखिलम्
एवं कृते तथास्मिंस्तु यज्ञे पैतामहे तदा९५
देवानां संनिधौ तत्र ऋषिभिश्च समागमे
ब्रह्मणो दक्षिणे पार्श्वे स्थितो विष्णुः सनातनः९६
वामपार्श्वे स्थितो रुद्रः पिनाकी वरदः प्रभुः
ऋत्विजां चापि वरणं कृतं तत्र महात्मना९७
भृगुर्होतावृतस्तत्र पुलस्त्योध्वर्य्युसत्तमः
तत्रोद्गाता मरीचिस्तु ब्रह्मा वै नारदः कृतः९८
सनत्कुमारादयो ये सदस्यास्तत्र ते भवन्
प्रजापतयो दक्षाद्या वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः९९
ब्रह्मणश्च समीपे तु कृता ऋत्विग्विकल्पना
वस्त्रैराभरणैर्युक्ताः कृता वैश्रवणेन ते१०० 1.16.100
अंगुलीयैः सकटकैर्मकुटैर्भूषिता द्विजाः
चत्वारो द्वौ दशान्ये च त षोडशर्त्विजः१०१
ब्रह्मणा पूजिताः सर्वे प्रणिपातपुरःसरम्
अनुग्राह्यो भवद्भिस्तु सर्वैरस्मिन्क्रताविह१०२
पत्नी ममैषा सावित्री यूयं मे शरणंद्विजाः
विश्वकर्माणमाहूय ब्रह्मणः शीर्षमुंडनं१०३
यज्ञे तु विहितं तस्य कारितं द्विजसत्तमैः
आतसेयानि वस्त्राणि दंपत्यर्थे तथा द्विजैः१०४
ब्रह्मघोषेण ते विप्रा नादयानास्त्रिविष्टपम्
पालयंतो जगच्चेदं क्षत्रियाः सायुधाः स्थिताः१०५
भक्ष्यप्रकारान्विविधिन्वैश्यास्तत्र प्रचक्रिरे
रसबाहुल्ययुक्तं च भक्ष्यं भोज्यं कृतं ततः१०६
अश्रुतं प्रागदृष्टं च दृष्ट्वा तुष्टः प्रजापतिः
प्राग्वाटेति ददौ नाम वैश्यानां सृष्टिकृद्विभुः१०७
द्विजानां पादशुश्रूषा शूद्रैः कार्या सदा त्विह
पादप्रक्षालनं भोज्यमुच्छिष्टस्य प्रमार्जनं१०८
तेपि चक्रुस्तदा तत्र तेभ्यो भूयः पितामहः
शूश्रूषार्थं मया यूयं तुरीये तु पदे कृताः१०९
द्विजानां क्षत्रबन्धूनां बन्धूनां च भवद्विधैः
त्रिभ्यश्शुश्रूषणा कार्येत्युक्त्वा ब्रह्मा तथाऽकरोत्११०
द्वाराध्यक्षं तथा शक्रं वरुणं रसदायकम्
वित्तप्रदं वैश्रवणं पवनं गंधदायिनम्१११
उद्योतकारिणं सूर्यं प्रभुत्वे माधवः स्थितः
सोमः सोमप्रदस्तेषां वामपक्ष पथाश्रितः११२
सुसत्कृता च पत्नी सा सवित्री च वरांगना
अध्वर्युणा समाहूता एहि देवि त्वरान्विता११३
उत्थिताश्चाग्नयः सर्वे दीक्षाकाल उपागतः
व्यग्रा सा कार्यकरणे स्त्रीस्वभावेन नागता११४
इहवै न कृतं किंचिद्द्वारे वै मंडनं मया
भित्त्यां वैचित्रकर्माणि स्वस्तिकं प्रांगणेन तु११५
प्रक्षालनं च भांडानां न कृतं किमपि त्विह
लक्ष्मीरद्यापि नायाता पत्नीनारायणस्य या११६
अग्नेः पत्नी तथा स्वाहा धूम्रोर्णा तु यमस्य तु
वारुणी वै तथा गौरी वायोर्वै सुप्रभा तथा११७
ऋद्धिर्वैश्रवणी भार्या शम्भोर्गौरी जगत्प्रिया
मेधा श्रद्धा विभूतिश्च अनसूया धृतिः क्षमा११९
गंगा सरस्वती चैव नाद्या याताश्च कन्यकाः
इंद्राणी चंद्रपत्नी तु रोहिणी शशिनः प्रियाः१२०
अरुंधती वसिष्ठस्य सप्तर्षीणां च याः स्त्रियः
अनसूयात्रिपत्नी च तथान्याः प्रमदा इह१२१
वध्वो दुहितरश्चैव सख्यो भगिनिकास्तथा
नाद्यागतास्तु ताः सर्वा अहं तावत्स्थिता चिरं१२२
नाहमेकाकिनी यास्ये यावन्नायांति ता स्त्रियः
ब्रूहि गत्वा विरंचिं तु तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्१२३
सर्वाभिः सहिता चाहमागच्छामि त्वरान्विता
सर्वैः परिवृतः शोभां देवैः सह महामते१२४
भवान्प्राप्नोति परमां तथाहं तु न संशयः
वदमानां तथाध्वर्युस्त्यक्त्वा ब्रह्माणमागतः१२५
सावित्री व्याकुला देव प्रसक्ता गृहकर्माणि
सख्यो नाभ्यागता यावत्तावन्नागमनं मम१२६
एवमुक्तोस्मि वै देव कालश्चाप्यतिवर्त्तते
यत्तेद्य रुचितं तावत्तत्कुरुष्व पितामह१२७
एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा किंचित्कोपसमन्वितः
पत्नीं चान्यां मदर्थे वै शीघ्रं शक्र इहानय१२८
यथा प्रवर्तते यज्ञः कालहीनो न जायते
तथा शीघ्रं विधित्स्व त्वं नारीं कांचिदुपानय१२९
यावद्यज्ञसमाप्तिर्मे वर्णे त्वां मा कृथा मनः
भूयोपि तां प्रमोक्ष्यामि समाप्तौ तु क्रतोरिह१३०
एवमुक्तस्तदा शक्रो गत्वा सर्वं धरातलं
स्त्रियो दृष्टाश्च यास्तेन सर्वाः परपरिग्रहाः१३१
आभीरकन्या रूपाढ्या सुनासा चारुलोचना
न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च पन्नगी१३२
न चास्ति तादृशी कन्या यादृशी सा वरांगना
ददर्श तां सुचार्वंगीं श्रियं देवीमिवापराम्१३३
संक्षिपन्तीं मनोवृत्ति विभवं रूपसंपदा
यद्यत्तु वस्तुसौंदर्याद्विशिष्टं लभ्यते क्वचित्१३४
तत्तच्छरीरसंलग्नं तन्वंग्या ददृशे वरम्
तां दृष्ट्वा चिंतयामास यद्येषा कन्यका भवेत्१३५
तन्मत्तः कृतपुण्योन्यो न देवो भुवि विद्यते
योषिद्रत्नमिदं सेयं सद्भाग्यायां पितामहः१३६
सरागो यदि वा स्यात्तु सफलस्त्वेष मे श्रमः
नीलाभ्र कनकांभोज विद्रुमाभां ददर्श तां१३७
त्विषं संबिभ्रतीमंगैः केशगंडे क्षणाधरैः
मन्मथाशोकवृक्षस्य प्रोद्भिन्नां कलिकामिव१३८
प्रदग्धहृच्छयेनैव नेत्रवह्निशिखोत्करैः
धात्रा कथं हि सा सृष्टा प्रतिरूपमपश्यता१३९
कल्पिता चेत्स्वयं बुध्या नैपुण्यस्य गतिः परा
उत्तुंगाग्राविमौ सृष्टौ यन्मे संपश्यतः सुखं१४०
पयोधरौ नातिचित्रं कस्य संजायते हृदि
रागोपहतदेहोयमधरो यद्यपि स्फुटम्१४१
तथापि सेवमानस्य निर्वाणं संप्रयच्छति
वहद्भिरपि कौटिल्यमलकैः सुखमर्प्यते१४२
दोषोपि गुणवद्भाति भूरिसौंदर्यमाश्रितः
नेत्रयोर्भूषितावंता वाकर्णाभ्याशमागतौ१४३
कारणाद्भावचैतन्यं प्रवदंति हि तद्विदः
कर्णयोर्भूषणे नेत्रे नेत्रयोः श्रवणाविमौ१४४
कुंडलांजनयोरत्र नावकाशोस्ति कश्चन
न तद्युक्तं कटाक्षाणां यद्द्विधाकरणं हृदि१४५
तवसंबंधिनोयेऽत्र कथं ते दुःखभागिनः
सर्वसुंदरतामेति विकारः प्राकृतैर्गुणैः१४६
वृद्धे क्षणशतानां तु दृष्टमेषा मया धनम्
धात्रा कौशल्यसीमेयं रूपोत्पत्तौ सुदर्शिता१४७
करोत्येषा मनो नॄणां सस्नेहं कृतिविभ्रमैः
एवं विमृशतस्तस्य तद्रूपापहृतत्विषः१४८
निरंतरोद्गतैश्छन्नमभवत्पुलकैर्वपुः
तां वीक्ष्य नवहेमाभां पद्मपत्रायतेक्षणाम्१४९
देवानामथ यक्षाणां गंधर्वोरगरक्षसाम्
नाना दृष्टा मया नार्यो नेदृशी रूपसंपदा१५० 1.16.150
त्रैलोक्यांतर्गतं यद्यद्वस्तुतत्तत्प्रधानतः
समादाय विधात्रास्याः कृता रूपस्य संस्थितिः१५१
इंद्र उवाच
कासि कस्य कुतश्च त्वमागता सुभ्रु कथ्यताम्
एकाकिनी किमर्थं च वीथीमध्येषु तिष्ठसि१५२
यान्येतान्यंगसंस्थानि भूषणानि बिभर्षि च
नैतानि तव भूषायै त्वमेतेषां हि भूषणम्१५३
न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च पन्नगी
किन्नरी दृष्टपूर्वा वा यादृशी त्वं सुलोचने१५४
उक्ता मयापि बहुशः कस्माद्दत्से हि नोत्तरम्
त्रपान्विता तु सा कन्या शक्रं प्रोवाच वेपती१५५
गोपकन्या त्वहं वीर विक्रीणामीह गोरसम्
नवनीतमिदं शुद्धं दधि चेदं विमंडकम्१५६
दध्ना चैवात्र तक्रेण रसेनापि परंतप
अर्थी येनासि तद्ब्रूहि प्रगृह्णीष्व यथेप्सितम्१५७
एवमुक्तस्तदा शक्रो गृहीत्वा तां करे दृढम्
अनयत्तां विशालाक्षीं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः१५८
नीयमाना तु सा तेन क्रोशंती पितृमातरौ
हा तात मातर्हा भ्रातर्नयत्येष नरो बलात्१५९
यदि वास्ति मया कार्यं पितरं मे प्रयाचय
स दास्यति हि मां नूनं भवतः सत्यमुच्यते१६०
का हि नाभिलषेत्कन्या भर्तांरं भक्तिवत्सलम्
नादेयमपि ते किंचित्पितुर्मे धर्मवत्सल१६१
प्रसादये तं शिरसा मां स तुष्टः प्रदास्यति
पितुश्चित्तमविज्ञाय यद्यात्मानं ददामि ते१६२
धर्मो हि विपुलो नश्येत्तेन त्वां न प्रसादये
भविष्यामि वशे तुभ्यं यदि तातः प्रदास्यति१६३
इत्थमाभाष्यमाणस्तु तदा शक्रोऽनयच्च ताम्
ब्रह्मणः पुरतः स्थाप्य प्राहास्यार्थे मयाऽबले१६४
आनीतासि विशालाक्षि मा शुचो वरवर्णिनि
गोपकन्यामसौ दृष्ट्वा गौरवर्णां महाद्युतिम्१६५
कमलामेव तां मेने पुंडरीकनिभेक्षणाम्
तप्तकांचनसद्भित्ति सदृशा पीनवक्षसम्१६६
मत्तेभहस्तवृत्तोरुं रक्तोत्तुंग नखत्विषं
तं दृष्ट्वाऽमन्यतात्मानं सापि मन्मनथचरम्१६७
तत्प्राप्तिहेतु क धिया गतचित्तेव लक्ष्यते
प्रभुत्वमात्मनो दाने गोपकन्याप्यमन्यत१६८
यद्येष मां सुरूपत्वादिच्छत्यादातुमाग्रहात्
नास्ति सीमंतिनी काचिन्मत्तो धन्यतरा भुवि१६९
अनेनाहं समानीता यच्चक्षुर्गोचरं गता
अस्य त्यागे भवेन्मृत्युरत्यागे जीवितं सुखम्१७०
भवेयमपमानाच्च धिग्रूपा दुःखदायिनी
दृश्यते चक्षुषानेन यापि योषित्प्रसादतः१७१
सापि धन्या न संदेहः किं पुनर्यां परिष्वजेत्
जगद्रूपमशेषं हि पृथक्संचारमाश्रितम्१७२
लावण्यं तदिहैकस्थं दर्शितं विश्वयोनिना
अस्योपमा स्मरः साध्वी मन्मथस्य त्विषोपमा१७३
तिरस्कृतस्तु शोकोयं पिता माता न कारणम्
यदि मां नैष आदत्ते स्वल्पं मयि न भाषते१७४
अस्यानुस्मरणान्मृत्युः प्रभविष्यति शोकजः
अनागसि च पत्न्यां तु क्षिप्रं यातेयमीदृशी१७५
कुचयोर्मणिशोभायै शुद्धाम्बुज समद्युतिः
मुखमस्य प्रपश्यंत्या मनो मे ध्यानमागतम्१७६
अस्यांगस्पर्शसंयोगान्न चेत्त्वं बहु मन्यसे
स्पृशन्नटसि तर्हि न त्वं शरीरं वितथं परम्१७७
अथवास्य न दोषोस्ति यदृच्छाचारको ह्यसि
मुषितः स्मर नूनं त्वं संरक्ष स्वां प्रियां रतिम्१७८
त्वत्तोपि दृश्यते येन रूपेणायं स्मराधिकः
ममानेन मनोरत्न सर्वस्वं च हृतं दृढम्१७९
शोभा या दृश्यते वक्त्रे सा कुतः शशलक्ष्मणि
नोपमा सकलं कस्य निष्कलंकेन शस्यते१८०
समानभावतां याति पंकजं नास्य नेत्रयोः
कोपमा जलशंखेन प्राप्ता श्रवणशंङ्खयोः१८१
विद्रुमोप्यधरस्यास्य लभते नोपमां ध्रुवम्
आत्मस्थममृतं ह्येष संस्रवंश्चेष्टते ध्रुवम्१८२
यदि किंचिच्छुभं कर्म जन्मांतरशतैः कृतम्
तत्प्रसादात्पुनर्भर्ता भवत्वेष ममेप्सितः१८३
एवं चिंतापराधीना यावत्सा गोपकन्यका
तावद्ब्रह्मा हरिं प्राह यज्ञार्थं सत्वरं वचः१८४
देवी चैषा महाभागा गायत्री नामतः प्रभो
एवमुक्ते तदा विष्णुर्ब्रह्माणं प्रोक्तवानिदम्१८५
तदेनामुद्वहस्वाद्य मया दत्तां जगत्प्रभो
गांधर्वेण विवाहेन विकल्पं मा कृथाश्चिरम्१८६
अमुं गृहाण देवाद्य अस्याः पाणिमनाकुलम्
गांधेर्वेण विवाहेन उपयेमे पितामहः१८७
तामवाप्य तदा ब्रह्मा जगादाद्ध्वर्युसत्तमम्
कृता पत्नी मया ह्येषा सदने मे निवेशय१८८
मृगशृंगधरा बाला क्षौमवस्त्रावगुंठिता
पत्नीशालां तदा नीता ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः१८९
औदुंबेरण दंडेन प्रावृतो मृगचर्मणा
महाध्वरे तदा ब्रह्मा धाम्ना स्वेनैव शोभते१९०
प्रारब्धं च ततो होत्रं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः
भृगुणा सहितैः कर्म वेदोक्तं तैः कृतं तदा
तथा युगसहस्रं तु स यज्ञः पुष्करेऽभवत्१९१

इति श्रीपाद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे गायत्रीसंग्रहोनाम षोडशोऽध्यायः१६



अध्याय 16 - गायत्री की प्राप्ति

भीम ने कहा :

1-2. हे ब्राह्मण , (अब) कि आपने मुझे पवित्र स्थान का उत्कृष्ट महत्व बताया है, कि पवित्र स्थान कमल के पतन से पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न हुआ था, ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ, मुझे वह सब बताओ जो पूज्य हैं विष्णु और शंकर , जो वहां रहे, ने किया।

3. (बताओ) सर्वशक्तिमान भगवान द्वारा यज्ञ कैसे किया गया। सदस्य कौन थे? पुजारी कौन थे? कौन से ब्राह्मण वहाँ पहुँचे?

4. बलिदान के कौन से हिस्से थे? सामग्री क्या थी? बलि शुल्क क्या था? वेदी क्या थी? ब्रह्मा ने (वेदी का) क्या उपाय अपनाया था?

५. किस इच्छा का मनोरंजन करते हुए, ब्रह्मा, जिसे सभी देवताओं द्वारा यज्ञ किया जाता है और जिसे सभी वेदों द्वारा वर्णित किया गया है , यज्ञ किया था?

6-11. जैसे यह देवता, देवताओं का स्वामी, अविनाशी और अमर है, वैसे ही स्वर्ग भी उसके लिए अविनाशी है। महान ने अन्य देवताओं को भी स्वर्ग प्रदान किया है। वेद और जड़ी-बूटियाँ अग्नि के लिए आहुति के लिए आई हैं। वैदिक ग्रंथों में कहा गया है कि पृथ्वी पर जितने भी अन्य जानवर (देखे गए) हैं, वे सभी इस भगवान द्वारा बलिदान के लिए बनाए गए हैं। आपकी ये बातें सुनकर मुझे इस विषय में जिज्ञासा हुई है। कृपया मुझे वह सब बताएं कि उन्होंने किस इच्छा, किस फल और किस विचार से यज्ञ किया था। यहां कहा गया है कि सौ रूपों वाली महिला सावित्री है । उन्हें ब्रह्मा की पत्नी और ऋषियों की माता कहा जाता है। सावित्री ने पुलस्त्य और अन्य जैसे सात ऋषियों को जन्म दिया और सृजित प्राणियों के स्वामी जैसेदक्ष ।

12-17. सावित्री भी को जन्म दिया मानुस की तरह Svāyambhuva । यह कैसे हुआ कि ब्राह्मण को प्रिय, ब्रह्मा ने उस धार्मिक रूप से विवाहित धन्य पत्नी को त्याग दिया, पुत्रों से संपन्न, समर्पित (अपने पति के लिए), एक अच्छी प्रतिज्ञा और आकर्षक रूप से मुस्कुराते हुए, और दूसरी पत्नी को ले लिया? (दूसरी पत्नी का) नाम क्या था? उसका आचरण कैसा था? वह किस स्वामी की पुत्री थी? उसे प्रभु ने कहाँ देखा था? उसे किसने दिखाया? उसने मन को मोहित करके किस रूप में देखा—देखकर देवताओं का स्वामी वासना के प्रभाव में आया? (क्या) वह, हे ऋषि, जिसने देवताओं के सर्वशक्तिमान स्वामी, सावित्री से श्रेष्ठ रंग और सुंदरता में आकर्षित किया था? मुझे बताओ कि कैसे भगवान ने उस महिला को दुनिया में सबसे सुंदर स्वीकार किया, और बलिदान कैसे आगे बढ़ा।

18. सावित्री ने उसे ब्रह्मा के पास देखकर क्या किया? और उस समय सावित्री के प्रति ब्रह्मा का क्या दृष्टिकोण था?

19. कृपया (मुझे) वह सब बताएं - सावित्री ने, जिन्हें ब्रह्मा ने संबोधित किया था, फिर से कौन से शब्द बोले?

20-28. तुमने वहाँ क्य किया? (क्या आपने व्यक्त किया) क्रोध या (क्या आपने दिखाया) धैर्य? जो कुछ तू ने किया, और जो देखा, और जो कुछ अभी मैं ने तुझ से पूछा है, और यहोवा के सब काम मैं विस्तार से सुनना चाहता हूं। तो भी (मैं सुनना चाहता हूं) बलिदान के महान प्रदर्शन को पूरी तरह से। तो कृत्यों का क्रम और उनकी शुरुआत भी। इसी तरह (मैं इसके बारे में सुनना चाहता हूं) यज्ञ , [१] बलि पुजारी का भोजन। सबसे पहले किसकी पूजा की गई? आदरणीय विष्णु (कार्य) कैसे किया? किसने किसकी मदद की पेशकश की? कृपया (भी) मुझे बताएं कि देवताओं ने क्या किया। कैसे (अर्थात् क्यों) ब्रह्मा ने दैवीय दुनिया को छोड़कर नश्वर दुनिया में (नीचे) आया? (कृपया) मुझे यह भी बताएं कि कैसे उन्होंने (निर्धारित) संस्कार के अनुसार तीन अग्नि की स्थापना की, अर्थात। गृहस्थ की नित्य अग्नि, दक्षिणी अग्नि जिसे अन्वाहाहार्य कहा जाता हैऔर पवित्र अग्नि। कैसे उन्होंने यज्ञ की वेदी, यज्ञ की कलछी, [२] अभिषेक के लिए जल, लकड़ी की करछुल [३] , हवन के लिए सामग्री तैयार की। उसी प्रकार उस ने तीन बलि और हव्योंके भाग को किस रीति से तैयार किया; कैसे उसने देवताओं को देवताओं के लिए चढ़ावे का प्राप्तकर्ता बनाया, [4] और पुतलों को उनके लिए प्रसाद के प्राप्तकर्ता, [5] विभिन्न (छोटे) बलिदानों के लिए बलिदान की प्रक्रिया के अनुसार किए गए (शेयर) बलिदान में। (तो कृपया मुझे भी बताएं) कि कैसे ब्रह्मा ने यज्ञ सामग्री जैसे बांधने वाले पदों, पवित्र ईंधन और दरभा (घास), सोम को बनाया (तैयार), इसी प्रकार कुण्डा घास की दो धारियाँ , [६] और डंडियाँ यज्ञ की अग्नि के चारों ओर रखी गईं । [७] (मुझे यह भी बताएं) कि वह अपने सर्वोच्च कार्य के माध्यम से पहले कैसे चमकता था।

29-38. एक महान मन के निर्माता, पूर्व में बनाए गए क्षण, टिमटिमाते हुए, काठ , कला , तीन बार, मुहूर्त , तिथियां, महीने, दिन, वर्ष, मौसम, समय पर मंत्र [8], तीन गुना पवित्र अधिकार (अर्थात शास्त्र), जीवन, पवित्र स्थान, कमी, संकेत और रूप की उत्कृष्टता। (उसने) तीन जातियों, तीन लोकों, तीन विद्याओं (अर्थात वेद) और तीन अग्नि, तीन काल, तीन (प्रकार) कृत्यों, तीन जातियों और तीन घटकों को बनाया, इसलिए श्रेष्ठ और अन्य दुनिया। (उसने निर्धारित किया) उन लोगों द्वारा अनुसरण किया गया जो (अर्थात अभ्यास) धार्मिकता से संपन्न हैं, इसलिए पापपूर्ण कार्यों के लिए भी। वह चार जातियों का कारण है, चार जातियों का रक्षक, जो (अर्थात वह) चार विद्याओं (अर्थात वेदों) का ज्ञाता है, जीवन के चार चरणों का आश्रय है, उसे सर्वोच्च कहा जाता है प्रकाश और उच्चतम तप, उच्चतम से बड़ा है, जो (स्वयं) सर्वोच्च (आत्मा) है और स्वयंभू है, दुनिया के सेतुओं (रूप में) का सेतु है, पवित्र कर्मों के योग्य है, वेदों के ज्ञाता, रचयिता के स्वामी, प्राणियों के प्राण हैं, अग्नि के समान प्रखर लोगों की अग्नि है, जो पुरुषों का मन है, तपस्या है जो लोग इसका अभ्यास करते हैं, उनमें से विवेकपूर्ण की लज्जा, और तेज की चमक; इस प्रकार दुनिया के पोते ने यह सब बनाया। (कृपया बताएं) मुझे बलिदान के परिणामस्वरूप किस मार्ग की इच्छा थी और उसने कैसे यज्ञ करने का निर्णय लिया। यह, हे ब्राह्मण, मेरा संदेह है - यह मेरा महान संदेह है । (कृपया बताएं) मुझे बलिदान के परिणामस्वरूप किस मार्ग की इच्छा थी और उसने कैसे यज्ञ करने का निर्णय लिया। यह, हे ब्राह्मण, मेरा संदेह है - यह मेरा महान संदेह है । (कृपया बताएं) मुझे बलिदान के परिणामस्वरूप किस मार्ग की इच्छा थी और उसने कैसे यज्ञ करने का निर्णय लिया। यह, हे ब्राह्मण, मेरा संदेह है - यह मेरा महान संदेह है ।

39. उच्चतम ब्रह्मा को देवताओं और राक्षसों द्वारा एक आश्चर्य कहा जाता है। यद्यपि वह अपने (अद्भुत) कर्मों के कारण अद्भुत है, वह यहाँ वास्तव में ऐसा (अर्थात एक आश्चर्य) वर्णित है।

पुलस्त्य बोला :

40-49. ब्रह्मा के बारे में आपके द्वारा पूछे गए प्रश्नों का भार बहुत बड़ा है। मैं अपनी क्षमता के अनुसार बताऊंगा (अर्थात आपके प्रश्नों का उत्तर दूंगा)। उसकी महान महिमा सुनो। (उसके बारे में सुनें) जिसका वेदों को जानने वाले ब्राह्मण वर्णन करते हैं (इस प्रकार): उसके एक हजार मुंह, एक हजार आंखें, एक हजार पैर, एक हजार कान, एक हजार हाथ हैं। (वह) अपरिवर्तनीय है, उसके पास एक हजार भाषाएं हैं, (वह है) हजार गुना, हजार गुना महान स्वामी, वह दाता है (में) एक हजार (तरीके), हजारों की उत्पत्ति है, और एक अपरिवर्तनीय एक हजार है हथियार। (वह) हवन, सोम रस निकालने , भेंट और पुजारी। (वह है) बर्तन, कुश घास के ब्लेड जो यज्ञों में घी को शुद्ध करने और छिड़कने में उपयोग किए जाते हैं, वेदी, दीक्षा, चावल, जौ और दाल की आहुति देवताओं और पितरों को भेंट करने के लिए, बलि की कलछी, साथ ही बलि की आग पर घी डालने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी की सीढ़ी , सोम , आहुति, पवित्र पानी, [9] (का भुगतान) बलि फीस, स्थानापन्न पुजारी, ब्राह्मण में निपुण के लिए पैसे sama - वेद , सदस्य (वर्तमान बलिदान पर), चैंबर, विधानसभा, बांधने के बाद, पवित्र ईंधन , चम्मच [१०] , मूसल और गारा, वह कमरा जिसमें बलि देने वाले के मित्र और परिवार इकट्ठे होते हैं, बलि की भूमि, गर्म-पुजारी, बंधन, छोटे (या) (उचित-) आकार की निर्जीव वस्तुएं (जैसे मिट्टी, पत्थर), दरभ , इसलिए वैदिक भजन, यज्ञ, अग्नि के साथ एक आहुति की पेशकश, अग्नि का भाग , और वह जो श्रेष्ठता है, जो पहले भोग करता है, यज्ञ का भोक्ता। वह एक शुभ चमक वाला है, जिसने अपना हथियार, बलिदान और शाश्वत स्वामी उठाया है। (मैं आपको बताऊंगा), हे महान राजा, यह दिव्य खाता जिसके बारे में आप (मुझसे) पूछ रहे हैं और जिस कारण भगवान ब्रह्मा ने पृथ्वी पर यज्ञ किया, देवताओं और प्राणियों की भलाई के लिए और दुनिया के उत्पादन के लिए .

50-51. ब्रह्मा, कपिला , और विष्णु, देवता, सात ऋषि, महान पराक्रम के शिव , उच्च आत्मा मनु , श्रद्धेय रचनाकार, ये सभी चमक में आग के समान प्राचीन भगवान द्वारा बनाए गए थे।

52-53. पूर्व में जब कमल-जन्मे (ब्रह्मा) अपने निवास में तपस्या कर रहे थे - पुंकार में - जहाँ देवताओं और ऋषियों के समूह उत्पन्न हुए थे, उनके उच्च आत्मा वाले प्रकटीकरण को पौष्करक कहा जाता है, जिसके बारे में पुराण , अच्छी तरह से सहमत है वेदों और स्मृतियों के साथ सुनाया जाता है।

54-67. वहाँ शास्त्रों के मुख वाला एक वराह प्रकट हुआ। देवताओं के भगवान ने सूअर के रूप का सहारा लिया, पुष्कर में एक व्यापक पवित्र स्थान बनाया - क्योंकि यह एक लाल कमल का उद्घाटन है - स्वयं को ब्रह्मा की सहायता के लिए प्रकट किया। उनके पैर वेदों के रूप में, नुकीले बन्धन पदों के रूप में, हाथ यज्ञ के रूप में, मुख आयताकार [11] के रूप में , जीभ अग्नि के रूप में, बाल दरभों के रूप में थे। , पवित्र ग्रंथों के रूप में सिर और महान तपस्या थी (उसके श्रेय के लिए)। दिन और रात के रूप में उनकी आंखें थीं, दिव्य थे, वेदों के शरीर और शास्त्रों के आभूषण थे, घी के रूप में एक नाक थी, एक बलि की कलछी का मुंह था, सामन् की ध्वनि से महान था. वह सत्य से परिपूर्ण था, वैभव से युक्त था, और अपने कदमों और कदमों से सुशोभित था। उसके पास प्रायश्चित के रूप में कीलें थीं, और वह दृढ़ था; जानवरों के रूप में घुटने और बलि की आकृति थी; उद्घाटी थी-पुजारी ने अपनी आंत के रूप में, अपने जननांग अंग के रूप में बलिदान किया था; वह फलों और बीजों वाला एक बड़ा पौधा था; उसके मन में वायु, हडि्डयों के समान स्तुति, होठों के समान जल और सोम का लहू था; उसके कंधे वेद थे, उसके पास यज्ञों की सुगंध थी; वह देवताओं और पितरों को चढ़ाए जाने के साथ बहुत तेज था। उनका शरीर यज्ञ कक्ष था जिसके स्तंभ पूर्व की ओर मुड़े हुए थे; वह उज्ज्वल था; और दीक्षाओं से सजाया गया था; वह, एक चिंतनशील संत, उसके हृदय के रूप में बलिदान शुल्क था; और वह महान यज्ञों से भरा हुआ था। वह उपकर्म [१२] के यज्ञ समारोह के कारण आकर्षक थे । उनके पास सोम-यज्ञों के प्रारंभिक संस्कारों के रूप में आभूषण थे। [13]वह अपनी पत्नी के साथ उसकी छाया की तरह था, और एक जवाहरात की तरह ऊंचा था। जिसने लोगों के हित को देखा, उसने अपने नुकीले से पृथ्वी का उत्थान किया। तब वह, पृथ्वी का धारक, पृथ्वी को उसके स्थान पर लाकर, पृथ्वी को बनाए रखने से संतुष्ट हो गया। इस प्रकार, पहले वराह ने ब्रह्मा की भलाई की इच्छा रखते हुए, पृथ्वी को जब्त कर लिया, जो पहले समुद्र के पानी में नीचे चली गई थी। ब्रह्मा, लाल कमल के उद्घाटन पर शेष, शांति और संयम से आच्छादित, चल और अचल के स्वामी, वैभव से संपन्न, वेदों को जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ , आदित्य जैसे देवताओं के साथ [१४] ] , वसुओं [15] , Sādhyas [16] , मरुत[17] , रुद्र [18] सबसे -इस मित्र, तो भी द्वारा Yakṣas , राक्षसों और Kinnaras , दिशाओं और मध्यवर्ती दिशा-निर्देश, महासागरों के साथ पृथ्वी पर नदियों, कहा इन शब्दों (सूअर के रूप में विष्णु के लिए): "हे भगवान, आप हमेशा पवित्र स्थान कोकामुख (यानी पुष्कर) कीदेखभाल और रक्षाकरेंगे; यहाँ, बलिदान पर आप (बलिदान की) सुरक्षा करेंगे। ”

६८. तब उन्होंने ब्रह्मा से कहा: "आदरणीय, मैं ऐसा करूँगा"। ब्रह्मा ने फिर से भगवान विष्णु से कहा जो उनके सामने खड़े थे:

69-76. "हे सर्वश्रेष्ठ देवताओं, तुम मेरे सबसे बड़े देवता हो, तुम मेरे सबसे अच्छे गुरु हो; आप मेरे सर्वोच्च सहारा हैं और शंकर केऔर दूसरे। हे खिले हुए, बेदाग कमल के समान नेत्रों वाले, शत्रु का संहार करने वाले, ऐसा कर्म करना कि दैत्य मेरे सामने झुके हुए मेरे यज्ञ का नाश न करें। आपको मेरा नमस्कार।" विष्णु ने कहा: "हे देवताओं के भगवान, अपना भय छोड़ दो; मैं उन सभी (जैसे) बुरी आत्माओं और राक्षसों को नष्ट कर दूंगा जो बाधा उत्पन्न करेंगे।" ऐसा कहकर वह, जिसने (ब्रह्मा) की सहायता करने का वचन लिया था, वहीं रह गया। शुभ हवाएं चलीं और दस चौथाई उज्ज्वल थे। बहुत चमकीले प्रकाशमान चन्द्रमा के चक्कर लगा रहे थे। ग्रहों में (कोई) संघर्ष नहीं था, और समुद्र शांत हो गए थे। जमीन धूल रहित थी; जल ने सब को आनन्द दिया; नदियों ने अपने मार्ग का अनुसरण किया; समुद्र उत्तेजित नहीं थे; नियंत्रित दिमाग वाले पुरुषों की इंद्रियां भलाई के लिए अनुकूल होती हैं। महान संत, दुःख से मुक्त,

77. उस यज्ञ में हवन-यज्ञ शुभ थे, लोग सदाचारी और प्रसन्नचित्त चित्त वाले थे।

78-89. एक सत्य व्रत के विष्णु के वचनों को सुनकर, (उनके) शत्रुओं को मारने के बारे में, राक्षसों और बुरी आत्माओं के साथ देवता (वहां) पहुंचे। आत्माएं, भूत-प्रेत-सभी वहां एक के बाद एक आए; इसी तरह गंधर्व , [१९] आकाशीय अप्सराएं , नाग और विद्याधरों के समूह [२०] (वहां पहुंचे)। ब्रह्मा के आदेश से, हवा सभी दिशाओं से, पेड़ों को लेकर आई [21]और जड़ी-बूटियाँ जो कामना करती थीं और जो नहीं आना चाहती थीं। दक्षिण दिशा की ओर यज्ञ पर्वत पर पहुँचकर सभी देवता उत्तर में सीमा पर्वत पर ही रहे। उस महान यज्ञ में, गंधर्व, आकाशीय अप्सराएँ और ऋषि, जिन्होंने पश्चिमी दिशा का सहारा लेकर वेदों में महारत हासिल की थी, वहीं रहे। देवताओं के सभी समूहों, सभी राक्षसों और बुरी आत्माओं के यजमानों ने अपने क्रोध को छिपाए रखा और परस्पर स्नेही थे। उन सभी ने ऋषियों की प्रतीक्षा की और ब्राह्मणों की सेवा की। प्रमुख ऋषि, ब्राह्मण ऋषि, ब्राह्मण और दिव्य ऋषि, इसलिए भी शाही ऋषि सभी पक्षों से आए थे। (सभी जानने के लिए उत्सुक थे) यह यज्ञ किस देवता के लिए किया जाएगा? जानवर और पक्षी, इसे देखने की इच्छा से, इसलिए खाने के इच्छुक ब्राह्मण और सभी जातियां उचित क्रम में वहां आई थीं।वरुण ने स्वयं (चयन) में सावधानी बरती कि सर्वश्रेष्ठ भोजन दिया। वरुण-देवी से आने के बाद उन्होंने अपने हिसाब से पका हुआ भोजन तैयार किया। वायु ने विभिन्न प्रकार के भोजन और सूर्य ने द्रव्यों को पचा लिया। भोजन के पाचक सोम और बुद्धि के दाता बृहस्पति (थे) उपस्थित थे। धन का स्वामी (देखभाल) धन, और विभिन्न प्रकार के वस्त्र देने वाला। सरस्वती , नदियों के प्रमुख, नर्मदा के साथ देवी गंगा (वहां आई थीं)।

90-111. अन्य सभी शुभ नदियाँ, कुएँ और झीलें, ताल और तालाब, कुएँ किसी देवता या पवित्र उद्देश्य के लिए समर्पित, देवताओं द्वारा खोदी गई कई मुख्य धाराएँ, इसलिए पानी के सभी जलाशय और संख्या में समुद्र; नमक, गन्ना, मादक शराब, दूध और पानी के साथ शुद्ध मक्खन और दही (वहां थे); सात लोक और सात निचले लोक, और सात द्वीप और नगर; पेड़ और लताएँ, घास और फलों के साथ सब्जियाँ; पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि पाँचवें (तत्व) के रूप में - ये तत्व; इसलिए भी जो भी कानून के कोड थे (वहां थे), वेदों, सूत्रों पर ग्लोसव्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे; (इस प्रकार) अशरीरी, देहधारी और अत्यंत देहधारी, वैसे ही सब (जो था) दृश्यमान- (इस प्रकार) ब्रह्मा द्वारा निर्मित सभी (वस्तुएं) (वहां मौजूद थे)। इस प्रकार जब उस समय देवताओं की उपस्थिति में और ऋषियों की संगति में पोते का बलिदान किया गया था, शाश्वत विष्णु ब्रह्मा के दाहिने हाथ पर बने रहे। रुद्र , त्रिशूल धारक, वरदान दाता, भगवान, ब्रह्मा के बाईं ओर रहे। महान आत्मा (ब्रह्मा) ने भी पुजारियों को यज्ञ में भाग लेने के लिए चुना। Bhṛgu आधिकारिक पुजारी की प्रार्थना पढ़ने के रूप में चुना गया था Ṛgveda [22] ; पुलस्त्य को सर्वश्रेष्ठ अध्वर्यु [23] पुजारी चुना गया। मारिसिक(के रूप में चुना गया था) उदगाती [२४] पुजारी (जो सामवेद के भजनों का जाप करता है ) और नारद (चुना गया) ब्रह्मा पुजारी। सनत्कुमार और अन्य सदस्य (यज्ञ सभा के) थे, इसलिए दक्ष जैसे प्रजापति और ब्राह्मणों से पहले की जातियाँ (बलिदान में शामिल हुईं); ब्रह्मा के पास पुजारियों की (बैठने की) व्यवस्था की गई थी। वे कुबेर द्वारा वस्त्र और आभूषणों से संपन्न थे. ब्राह्मणों को कंगन और पट्टियों के साथ अंगूठियों से सजाया गया था। ब्राह्मण चार, दो और दस (इस प्रकार कुल मिलाकर) सोलह थे। उन सभी को ब्रह्मा ने नमस्कार के साथ पूजा की थी। (उसने उनसे कहा): "हे ब्राह्मणों, इस यज्ञ के दौरान तुम्हें मुझ पर कृपा करनी चाहिए; यह मेरी पत्नी सावित्री है; तुम मेरी शरण हो।'' विश्वकर्मन को बुलाने के बाद , ब्राह्मणों ने ब्रह्मा का सिर मुंडवा लिया, क्योंकि यह एक यज्ञ में (प्रारंभिक के रूप में) रखा गया था। ब्राह्मण जोड़े (अर्थात ब्रह्मा और सावित्री) के लिए भी (सुरक्षित) सन के कपड़े। ब्राह्मण वहाँ रह गए (अर्थात ब्राह्मणों ने भर दिया) स्वर्ग को वेदों की ध्वनि (पाठ की) से भर दिया; kṣatriyas हथियारों इस दुनिया की रक्षा करने के साथ वहां बने रहे; Vaisyasविभिन्न प्रकार के भोजन तैयार किए; उस समय बड़े स्वाद से भरपूर भोजन और खाने की चीज़ें भी बनाई जाती थीं; इसे पहले अनसुना और अनदेखा देखकर, ब्रह्मा प्रसन्न हुए; भगवान, निर्माता, ने वैश्यों को प्राग्वान नाम दिया । (ब्रह्मा ने इसे रखा:) 'यहाँ शूद्रों को हमेशा ब्राह्मणों के चरणों की सेवा करनी होती है; उन्हें अपने पैर धोने होंगे, उनके द्वारा बचा हुआ खाना (अर्थात ब्राह्मण) और शुद्ध (जमीन आदि) करना होगा। वहाँ भी उन्होंने (ये बातें) कीं; फिर उनसे कहा, "मैंने तुम्हें ब्राह्मणों, क्षत्रिय भाइयों और तुम्हारे जैसे (अन्य) भाइयों की सेवा करने के लिए चौथे स्थान पर रखा है ; तीनों की सेवा करनी है।" ऐसा कहकर ब्रह्मा ने शंकर को भी नियुक्त किया और इन्द्र को भीद्वार-अधीक्षक के रूप में, वरुण जल देने के लिए, कुबेर धन वितरित करने के लिए, हवा सुगंध देने के लिए, सूर्य प्रकाश व्यवस्था करने के लिए और विष्णु (प्रमुख) अधिकारी के रूप में रहे। सोम के दाता चंद्रमा ने बाईं ओर पथ का सहारा लिया।

112-125. सावित्री, उनकी सुंदर पत्नी, जिन्हें अच्छी तरह से सम्मानित किया गया था, को अध्वर्यु ने आमंत्रित किया था : "मैडम, जल्दी आओ, सभी आग बढ़ गई है (यानी अच्छी तरह से प्रज्वलित हैं), दीक्षा का समय आ गया है।" वह कुछ काम करने में तल्लीन थी, तुरंत नहीं आई, जैसा कि आमतौर पर महिलाओं के साथ होता है। “मैंने यहाँ द्वार पर कोई सजावट नहीं की है; मैंने दीवार पर चित्र नहीं बनाए हैं; मैंने आंगन में स्वस्तिक [25] नहीं खींचा है । यहां गमलों की सफाई ही नहीं की गई है। लक्ष्मी ने की पत्नी है नारायण के रूप में अभी तक नहीं आया है। तो अग्नि की पत्नी स्वाहा भी ; और यमरोड़ा, यम की पत्नी; गौरी, वरुण की पत्नी; सिद्धि , कुबेर की पत्नी; गौरी, शंभू की पत्नी, प्रिय दुनिया के लिए। इसी तरह बेटियां मेधा , श्रद्धा , विभूति , अनश्या , धृति , काममा और गंगा और सरस्वती नदियां अभी तक नहीं आई हैं। इंद्राणी , और चंद्रमा की पत्नी रोहिणी , चंद्रमा को प्रिय । इसी तरह, वशिष्ठ की पत्नी अरुंधती ; इसलिए भी सात ऋषियों की पत्नियों, और अनासुया, अत्रीकी पत्नी और अन्य महिलाएं, बहुएं, बेटियां, दोस्त, बहनें अभी तक नहीं आई हैं। मैं अकेला यहां (उनकी प्रतीक्षा में) लंबे समय तक रहा हूं। जब तक वे स्त्रियाँ न आ जाएँ, मैं अकेली नहीं जाऊँगी। जाओ और ब्रह्मा से कुछ देर रुकने को कहो। मैं शीघ्र ही सब (उन स्त्रियों) के साथ आऊँगा; हे उच्च बुद्धि वाले, देवताओं से घिरे हुए, आप महान कृपा प्राप्त करेंगे; मैं भी वैसा ही करूंगा; इसमें कोई संदेह नहीं।" उसे इस तरह बात करते हुए छोड़कर अध्वर्यु ब्रह्मा के पास आए।

१२६-१२७. "हे भगवान, सावित्री व्यस्त है; वह घरेलू काम में लगी हुई है। मैं तब तक नहीं आऊँगा जब तक मेरे मित्र न आ जाएँ—उसने मुझसे ऐसा ही कहा है। हे प्रभु, समय बीत रहा है। हे पोते, आज जो चाहो करो।”

128-130. इस प्रकार, ब्रह्मा ने थोड़ा क्रोधित होकर संबोधित किया और इंद्र से कहा: "हे शंकर, मेरे लिए एक और पत्नी जल्दी से यहाँ ले आओ। वह जल्दी करो जिससे बलिदान (ठीक से) आगे बढ़े और देर न हो; जब तक बलि न हो जाए, तब तक मेरे लिथे कोई स्त्री ले आओ; मैं तुम्हारी याचना कर रहा हूँ; मेरे लिए अपना मन बनाओ; बलिदान समाप्त होने के बाद मैं उसे फिर से मुक्त कर दूंगा।"

131. इस प्रकार संबोधित करते हुए, इंद्र ने पूरी पृथ्वी पर (यानी घूमते हुए) महिलाओं को देखा, (लेकिन) वे सभी दूसरों की पत्नियां थीं।

132-133. There was a cowherd’s daughter, endowed with beauty, of a fine nose and charming eyes. No goddess, no Gandharva woman, no demoness, no female serpent, no maiden was like that excellent lady. He saw her of a charming form, like another goddess Lakṣmī, and curtailing (i.e. distracting) the powers of the mind’s functions by means of the wealth of her beauty.

134-137. Whatever object distinguished by beauty is found anywhere, every such excellent object was seen to be attached to the lady with a slim body. Seeing her Indra thought: ‘If she is a maiden, then on the earth no other god is more meritorious than I. This is that gem of a lady, for whom, if the grandsire longs, then this my exertion would be fruitful.’

138. उसने उसे नीले आकाश की सुंदरता, एक सुनहरा कमल और एक मूंगा, (अर्थात) उसके अंगों, बालों, गालों, आंखों और होंठों के माध्यम से चमकते हुए और एक सेब की अंकुरित कली के समान देखा- लकड़ी या अशोक का पेड़।

139. 'वह सृष्टिकर्ता द्वारा कैसे बनाई गई थी, उसके दिल में जलती हुई डार्ट और उसकी आंखों में आग की लपटों (जुनून के) के ढेर के साथ, बिना समानता देखे?

140-151. अगर उसने उसे अपने विचार के अनुसार बनाया है तो यह उसके कौशल का सर्वोच्च उत्पाद है। ये दो ऊँचे नुकीले स्तन (उसके द्वारा) बनाए गए हैं; जिसे (अर्थात उन्हें) देखकर मुझे आनंद आ रहा है। किसके दिल में उन्हें देखकर महान आश्चर्य उत्पन्न नहीं होगा? यद्यपि यह होंठ स्पष्ट रूप से जुनून (भी, लाली) से प्रबल है, फिर भी यह अपने भोक्ता को बहुत खुशी देगा। बाल टेढ़े होने के बावजूद (अर्थात घुंघराले बाल) सुख दे रहे हैं। एक दोष भी, जब वह प्रचुर सुंदरता का सहारा लेता है, तो वह गुण प्रतीत होता है। (उसकी) आँखों के सजे हुए कोने कानों तक (अर्थात उसके पास पहुँचे हुए) आ गए हैं; (और इसके लिए) कारण विशेषज्ञ सुंदरता को प्रेम की (बहुत) भावना के रूप में वर्णित करते हैं। उसकी आँखें उसके कानों के आभूषण हैं (और) उसके कान उसकी आँखों के आभूषण हैं। यहां न तो इयररिंग्स की गुंजाइश है और न ही कोलिरियम की। दिल को दो (भागों) में बांटना उसकी निगाहों को शोभा नहीं देता। जो लोग आपके संपर्क में आते हैं, वे कैसे दुख बांट सकते हैं (अर्थात हैं)? (यहां तक ​​कि) एक विकृति प्राकृतिक गुणों के साथ सर्व-सुंदर (संपर्क में) हो जाती है। मैंने अपनी सैकड़ों बड़ी-बड़ी आँखों का मूल्यवान अधिकार देखा है। यह उनके कौशल की सीमा है जिसे निर्माता ने इस सुंदर रूप को बनाने में बखूबी प्रदर्शित किया है। वह अपने सुंदर कृत्यों (अर्थात गतियों) के माध्यम से पुरुषों के मन में प्रेम पैदा करती है।' उसका शरीर, जिसकी चमक इस प्रकार सोचकर दूर हो गई थी, लगातार उठती हुई भयावहता से ढका हुआ था। उसे नए सोने की तरह आकर्षण, और कमल-पत्तियों की तरह लंबी आंखों को देखकर (उसने सोचा:) 'मैंने देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, सांपों और राक्षसों की कई महिलाओं को देखा है, लेकिन सौंदर्य का ऐसा धन कहीं नहीं देखा।

इंद्र ने कहा :

152-155। हे आकर्षक भौहों वाले, मुझे बताओ- तुम कौन हो? आप किससे संबंधित हैं? तुम कहाँ से आए हो? आप बीच सड़क पर क्यों खड़े हैं? ये आभूषण जो तुम्हारे शरीर में उत्साह बढ़ाते हैं और जिन्हें तुम धारण करते हो, वे तुम्हें शोभा नहीं देते; (बल्कि) आप उन्हें सजाते हैं। हे सुन्दर नेत्रों वाली, न देवी, न गंधर्व स्त्री, न दैत्य , न नाग नागिन, न किन्नर स्त्री तुम्हारे समान सुन्दर दिखाई दी। मेरे द्वारा बार-बार बोले जाने पर भी आप उत्तर क्यों नहीं देते?

और उस कुमारी ने घबराहट और कांप से अभिभूत होकर इंद्र से कहा:

१५६-१५७. "हे योद्धा, मैं एक ग्वाला-युवती हूँ; मैं दूध, यह शुद्ध मक्खन, और मलाई से भरा दही बेचता हूँ। आप जो स्वाद चाहते हैं - दही या छाछ का - इसे (मुझे) बताओ, जितना चाहो ले लो।"

158. इस प्रकार (उनके द्वारा) संबोधित करते हुए, इंद्र ने दृढ़ता से उसका हाथ पकड़ लिया, और उस बड़ी आंखों वाली महिला को (उस स्थान पर) ले आए जहां ब्रह्मा तैनात थे।

159. वह अपके माता पिता के लिथे रोती या, जिसे वह ले जाता या। 'हे पिता, हे माता, हे भाई, यह आदमी मुझे (दूर) जबरन ले जा रहा है।'

160-161। (उसने इंद्र से कहा): "यदि आपको मुझसे कुछ करना है, तो मेरे पिता से अनुरोध करें। वह मुझे तुम्हें दे देगा; मैं सच कह रहा हूँ। कौन सी युवती आसक्ति से स्नेही पति की लालसा नहीं करती? हे मेरे पिता, हे धर्म में लगे रहने वाले, तुझ से कुछ भी ग्रहण न किया जाएगा।

१६२-१६३. मैं सिर झुकाकर उसे प्रायश्चित करूंगा, और वह प्रसन्न होकर मुझे (मुझे तुझे) अर्पित करेगा। यदि मैं अपने पिता के मन को जाने बिना अपने आप को आपको अर्पित कर दूं, तो मेरी अधिकांश धार्मिक योग्यता नष्ट हो जाएगी और इसलिए मैं आपको खुश नहीं कर पाऊंगा। यदि (केवल) मेरे पिता मुझे आपके सामने प्रस्तुत करते हैं तो मैं अपने आप को आपके अधीन कर दूंगा। ”

164-168. भले ही शकरा को उसके द्वारा संबोधित किया जा रहा था, फिर भी वह उसे ले गया, और उसे ब्रह्मा के सामने रखकर कहा: "हे बड़ी आंखों वाली महिला, मैं आपको इसके लिए लाया हूं (भगवान); हे उत्तम वर्ण के तू शोकित न हो।” ग्वाले की पुत्री को गोरे रंग और महान् तेजोमयी देखकर, उसने (अर्थात् ब्रह्मा) उसे कमल के समान नेत्रों वाली, स्वयं लक्ष्मी समझी। गर्म सोने की दीवार के हिस्से के समान, उसने भी, उसे एक मोटी छाती वाले, नशे में हाथियों की सूंड की तरह गोल जांघों के साथ, लाल और चमकीले नाखूनों की चमक के साथ, खुद को एनिमेटेड (की भावना) के रूप में देखा। ) प्यार। उसे (अपने पति के रूप में) सुरक्षित करने की इच्छा से ग्वाला-युवती बेसुध दिखाई दी। उसने यह भी सोचा (यानी उसके पास) खुद को (उसे) देने का अधिकार है। (उसने खुद से कहा :)

169-180। 'यदि वह मेरी सुन्दरता के कारण मेरे होने की जिद करता है, तो मुझ से बढ़कर और कोई सौभाग्यशाली नहीं है। जब से उसने मुझे देखा, वह मुझे ले आया। यदि मैं उसे छोड़ दूं तो मैं मर जाऊंगा; यदि मैं उसे न छोड़ूं, तो मेरा जीवन सुखी होगा; और अपमान के कारण मैं—अपना रूप निन्दा करके—दुख का कारण बनूंगा (दूसरों को); वह जिस भी स्त्री को अपनी आंखों से कृपा दृष्टि से देखता है, वह भी धन्य हो जाती है। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है; (तब) उसके बारे में क्या जिसे वह गले लगाता है? दुनिया की सारी सुंदरता विभिन्न तरीकों से चली गई है (यानी अलग-अलग जगहों पर बनी हुई है); (अब) ब्रह्मांड की उत्पत्ति (यानी निर्माता) ने सुंदरता को एक ही स्थान पर प्रकट किया है। वह कामदेव से ही तुलनीय है; कामदेव की तुलना उनकी प्रतिभा के कारण अच्छी है। मैं इस दु:ख (अपना) का त्याग करता हूँ। (जीवन में जो कुछ भी मिलता है) उसका कारण न तो पिता है और न ही माता। अगर वह मुझे स्वीकार नहीं करता है या मुझसे थोड़ी बात नहीं करता है, तो मैं उसके लिए तरसता हूं, मुझे दुःख के कारण मृत्यु मिल जाएगी। जब यह निर्दोष अपनी पत्नी के पास जाता है (अर्थात अपनी पत्नी के लिए पति के रूप में कार्य करता है), तो शुद्ध कमल की तरह ऐसा तेज (कारण) स्तनों पर रत्नों की कृपा होगी। उसे देखकर मेरा मन चिंतन में आ गया है। (वह अपने मन से कहती है:) यदि आप उसके शरीर के स्पर्श और संपर्क पर ध्यान नहीं देते हैं, तो, आप (ऐसे) एक उत्कृष्ट शरीर को नहीं छूते हुए, व्यर्थ भटक रहे हैं। या यह उसकी गलती नहीं है; क्‍योंकि तुम अपनी प्रिय इच्‍छा पर विचरण करते हो। हे कामदेव, तुम सचमुच लुट गए हो। अपने प्रिय की रक्षा करें उसे देखकर मेरा मन चिंतन में आ गया है। (वह अपने मन से कहती है:) यदि आप उसके शरीर के स्पर्श और संपर्क पर ध्यान नहीं देते हैं, तो, आप (ऐसे) एक उत्कृष्ट शरीर को नहीं छूते हुए, व्यर्थ भटक रहे हैं। या यह उसकी गलती नहीं है; क्‍योंकि तुम अपनी प्रिय इच्‍छा पर विचरण करते हो। हे कामदेव, तुम सचमुच लुट गए हो। अपने प्रिय की रक्षा करें उसे देखकर मेरा मन चिंतन में आ गया है। (वह अपने मन से कहती है:) यदि आप उसके शरीर के स्पर्श और संपर्क पर ध्यान नहीं देते हैं, तो, आप (ऐसे) एक उत्कृष्ट शरीर को नहीं छूते हुए, व्यर्थ भटक रहे हैं। या यह उसकी गलती नहीं है; क्‍योंकि तुम अपनी प्रिय इच्‍छा पर विचरण करते हो। हे कामदेव, तुम सचमुच लुट गए हो। अपने प्रिय की रक्षा करेंरति , चूंकि, हे कामदेव, वह सुन्दरता में आपसे श्रेष्ठ दिखता है। उसने निश्चय ही मेरे मन का मणि और मेरी सारी संपत्ति छीन ली है। चंद्रमा पर जो सुंदरता उसके चेहरे पर दिखाई देती है, उसे कोई कैसे (ढूंढ सकता है)? धब्बे वाली वस्तु और धब्बेदार वस्तु के बीच तुलना करना उचित नहीं है।

१८१-१८३. कमल की आँखों से समानता नहीं होती। जल-शंख की तुलना उसके शंख (समान) कानों से कैसे की जा सकती है? यहां तक ​​कि एक मूंगा भी निश्चित रूप से अपने होंठ के समान नहीं होता है। उसमें अमृत का वास है। वह निश्चित रूप से अमृत के प्रवाह का कारण बनता है। यदि मैंने अपने पूर्व के सैकड़ों जन्मों में कोई शुभ कार्य किया है, तो उसकी शक्ति के कारण, जिसे मैं चाहता हूं, वह मेरा पति हो'।

१८४-१८७. जब वह ग्वाला-युवती इस प्रकार विचार में लीन होने के कारण स्वयं से परे हो गई, तो ब्रह्मा ने जल्दी से विष्णु से यज्ञ के लिए (तेजी से) ये शब्द कहे: "और यह है, हे भगवान, गायत्री नाम की देवी , परम धन्य हैं।" जब ये शब्द बोले गए, तो विष्णु ने ब्रह्मा से ये शब्द कहे: "हे संसार के स्वामी, आज गंधर्व - शैली (विवाह की) में शादी करो, जिसे मैंने तुम्हें दिया है। अब और संकोच न करें। हे प्रभु, बिना विचलित हुए, उसके इस हाथ को स्वीकार करो।" (तब) पोते ने उससे गंधर्व- शैली के विवाह में विवाह किया।

१८८-१९१. उसे (अपनी पत्नी के रूप में) प्राप्त करने के बाद, ब्रह्मा ने सबसे अच्छे अध्वर्यु- पुजारियों से कहा: "मैंने इस महिला को अपनी पत्नी के रूप में लिया है; उसे मेरे घर में रख दो।" वेदों के पुजारी, तब उस युवती को, हिरण के सींग को पकड़े हुए और रेशमी वस्त्र पहने हुए, उस कक्ष में ले गए, जो बलिदान करने वाले की पत्नी के लिए था। ऑडुंबरा कर्मचारियों के साथ ब्रह्मा (हाथ में और) हिरण-छिपे से ढके हुए, यज्ञ में वहां चमके, जैसे कि वह अपनी चमक के साथ थे। तब ब्राह्मणों ने, भृगु के साथ, वेदों में बताए अनुसार यज्ञ शुरू किया। फिर वह यज्ञ पुष्कर- तीर्थ में एक हजार युग तक चला (अर्थात जारी रहा) ।

फुटनोट और संदर्भ:

[1] :

होत्रा : आहुति के रूप में (घी के रूप में) अर्पित करने योग्य कोई भी वस्तु ।

[2] :

श्रुवा : एक बलि की कलछी।

[३] :

श्रुक : एक प्रकार की लकड़ी की करछुल, जिसका उपयोग यज्ञ की अग्नि में घी डालने के लिए किया जाता है। यह आमतौर पर पलाना या खदीरा से बना होता है। श्रुवा : एक बलि की कलछी।

[४] :

हव्य : देवताओं को भेंट।

[५] :

काव्या : पितरों को भेंट।

[६] :

पवित्रा : कुण्डा घास की दो कलियाँ जो यज्ञ में घी को शुद्ध करने और छिड़कने के लिए प्रयोग की जाती हैं।

[7] :

परिधि : पालना जैसे पवित्र वृक्ष की एक छड़ी यज्ञ की अग्नि के चारों ओर रखी जाती है।

[८] :

योग : मंत्र।

[९] :

प्रोक्ष : पवित्र जल ।

[१०] :

दरवे : कलछी , चम्मच।

[११] :

सिटी : चतुष्कोणीय भुजाओं वाला एक आयताकार।

[१२] :

उपकर्म : प्रारंभ में किया जाने वाला एक संस्कार।

[13] :

प्रवरग्य: सोम-यज्ञ के लिए एक प्रारंभिक समारोह। उपकर्म : प्रारंभ में किया जाने वाला एक संस्कार।

[14] :

आदित्य : वे बारह सूर्य हैं और माना जाता है कि वे केवल ब्रह्मांड के विनाश पर ही चमकते हैं।

[१५] :

वसुस : वे देवताओं के एक वर्ग हैं; वे संख्या में आठ हैं: प, ध्रुव, सोम, धारा या धव, अनिला, अनल, प्रत्युष और प्रभास।

[१६] :

साध्य : खगोलीय प्राणियों का एक वर्ग।

[17] :

मारुत : देवताओं का एक वर्ग। साध्य : खगोलीय प्राणियों का एक वर्ग।

[१८] :

रुद्र : देवताओं के एक समूह का नाम, संख्या में ग्यारह, शिव या शंकर के निम्न रूप माने जाते हैं, जिन्हें समूह का मुखिया कहा जाता है।

[१९] :

गंधर्व : देवताओं का एक वर्ग जो देवताओं के गायक या संगीतकार के रूप में माना जाता है और लड़कियों को अच्छी और सहमत आवाज देने के लिए कहा जाता है।

[20] :

विद्याधर : अर्ध-दिव्य प्राणियों या अर्ध-देवताओं का एक वर्ग। हिमालय को उनका पसंदीदा अड्डा माना जाता है। जब भी वे नश्वर द्वारा किए गए असाधारण पुण्य के किसी भी कार्य को देखते हैं, तो उन्हें स्वर्गीय फूलों की वर्षा के रूप में वर्णित किया जाता है। कहा जाता है कि वे हवा में घूमते हैं।

[२१] :

वानस्पतिया : एक पेड़, जिसका फल फूल से उत्पन्न होता है जैसे आम।

[22] :

Hotṛ : एक बलि पुजारी, विशेष रूप से वह जो यज्ञ में ऋग्वेद की प्रार्थनाओं का पाठ करता है।

[२३] :

अध्वर्यु : एक कार्यवाहक पुजारी।

[२४] :

उद्घाटी : यज्ञ में चार प्रमुख पुजारियों में से एक; जो सामवेद के मंत्रों का जाप करता है।

[२५] :

स्वस्तिक : एक प्रकार का चिन्ह जो सौभाग्य को दर्शाता है।






अध्याय 16 - गायत्री की प्राप्ति

भीम ने कहा :

1-2. हे ब्राह्मण , (अब) कि आपने मुझे पवित्र स्थान का उत्कृष्ट महत्व बताया है, कि पवित्र स्थान कमल के पतन से पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न हुआ था, ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ, मुझे वह सब बताओ जो पूज्य हैं विष्णु और शंकर , जो वहां रहे, ने किया।

3. (बताओ) सर्वशक्तिमान भगवान द्वारा यज्ञ कैसे किया गया। सदस्य कौन थे? पुजारी कौन थे? कौन से ब्राह्मण वहाँ पहुँचे?

4. बलिदान के कौन से हिस्से थे? सामग्री क्या थी? बलि शुल्क क्या था? वेदी क्या थी? ब्रह्मा ने (वेदी का) क्या उपाय अपनाया था?

५. किस इच्छा का मनोरंजन करते हुए, ब्रह्मा, जिसे सभी देवताओं द्वारा यज्ञ किया जाता है और जिसे सभी वेदों द्वारा वर्णित किया गया है , यज्ञ किया था?

6-11. जैसे यह देवता, देवताओं का स्वामी, अविनाशी और अमर है, वैसे ही स्वर्ग भी उसके लिए अविनाशी है। महान ने अन्य देवताओं को भी स्वर्ग प्रदान किया है। वेद और जड़ी-बूटियाँ अग्नि के लिए आहुति के लिए आई हैं। वैदिक ग्रंथों में कहा गया है कि पृथ्वी पर जितने भी अन्य जानवर (देखे गए) हैं, वे सभी इस भगवान द्वारा बलिदान के लिए बनाए गए हैं। आपकी ये बातें सुनकर मुझे इस विषय में जिज्ञासा हुई है। कृपया मुझे वह सब बताएं कि उन्होंने किस इच्छा, किस फल और किस विचार से यज्ञ किया था। यहां कहा गया है कि सौ रूपों वाली महिला सावित्री है । उन्हें ब्रह्मा की पत्नी और ऋषियों की माता कहा जाता है। सावित्री ने पुलस्त्य और अन्य जैसे सात ऋषियों को जन्म दिया और सृजित प्राणियों के स्वामी जैसेदक्ष ।

12-17. सावित्री भी को जन्म दिया मानुस की तरह Svāyambhuva । यह कैसे हुआ कि ब्राह्मण को प्रिय, ब्रह्मा ने उस धार्मिक रूप से विवाहित धन्य पत्नी को त्याग दिया, पुत्रों से संपन्न, समर्पित (अपने पति के लिए), एक अच्छी प्रतिज्ञा और आकर्षक रूप से मुस्कुराते हुए, और दूसरी पत्नी को ले लिया? (दूसरी पत्नी का) नाम क्या था? उसका आचरण कैसा था? वह किस स्वामी की पुत्री थी? उसे प्रभु ने कहाँ देखा था? उसे किसने दिखाया? उसने मन को मोहित करके किस रूप में देखा—देखकर देवताओं का स्वामी वासना के प्रभाव में आया? (क्या) वह, हे ऋषि, जिसने देवताओं के सर्वशक्तिमान स्वामी, सावित्री से श्रेष्ठ रंग और सुंदरता में आकर्षित किया था? मुझे बताओ कि कैसे भगवान ने उस महिला को दुनिया में सबसे सुंदर स्वीकार किया, और बलिदान कैसे आगे बढ़ा।

18. सावित्री ने उसे ब्रह्मा के पास देखकर क्या किया? और उस समय सावित्री के प्रति ब्रह्मा का क्या दृष्टिकोण था?

19. कृपया (मुझे) वह सब बताएं - सावित्री ने, जिन्हें ब्रह्मा ने संबोधित किया था, फिर से कौन से शब्द बोले?

20-28. तुमने वहाँ क्य किया? (क्या आपने व्यक्त किया) क्रोध या (क्या आपने दिखाया) धैर्य? जो कुछ तू ने किया, और जो देखा, और जो कुछ अभी मैं ने तुझ से पूछा है, और यहोवा के सब काम मैं विस्तार से सुनना चाहता हूं। तो भी (मैं सुनना चाहता हूं) बलिदान के महान प्रदर्शन को पूरी तरह से। तो कृत्यों का क्रम और उनकी शुरुआत भी। इसी तरह (मैं इसके बारे में सुनना चाहता हूं) यज्ञ , [१] बलि पुजारी का भोजन। सबसे पहले किसकी पूजा की गई? आदरणीय विष्णु (कार्य) कैसे किया? किसने किसकी मदद की पेशकश की? कृपया (भी) मुझे बताएं कि देवताओं ने क्या किया। कैसे (अर्थात् क्यों) ब्रह्मा ने दैवीय दुनिया को छोड़कर नश्वर दुनिया में (नीचे) आया? (कृपया) मुझे यह भी बताएं कि कैसे उन्होंने (निर्धारित) संस्कार के अनुसार तीन अग्नि की स्थापना की, अर्थात। गृहस्थ की नित्य अग्नि, दक्षिणी अग्नि जिसे अन्वाहाहार्य कहा जाता हैऔर पवित्र अग्नि। कैसे उन्होंने यज्ञ की वेदी, यज्ञ की कलछी, [२] अभिषेक के लिए जल, लकड़ी की करछुल [३] , हवन के लिए सामग्री तैयार की। उसी प्रकार उस ने तीन बलि और हव्योंके भाग को किस रीति से तैयार किया; कैसे उसने देवताओं को देवताओं के लिए चढ़ावे का प्राप्तकर्ता बनाया, [4] और पुतलों को उनके लिए प्रसाद के प्राप्तकर्ता, [5] विभिन्न (छोटे) बलिदानों के लिए बलिदान की प्रक्रिया के अनुसार किए गए (शेयर) बलिदान में। (तो कृपया मुझे भी बताएं) कि कैसे ब्रह्मा ने यज्ञ सामग्री जैसे बांधने वाले पदों, पवित्र ईंधन और दरभा (घास), सोम को बनाया (तैयार), इसी प्रकार कुण्डा घास की दो धारियाँ , [६] और डंडियाँ यज्ञ की अग्नि के चारों ओर रखी गईं । [७] (मुझे यह भी बताएं) कि वह अपने सर्वोच्च कार्य के माध्यम से पहले कैसे चमकता था।

29-38. एक महान मन के निर्माता, पूर्व में बनाए गए क्षण, टिमटिमाते हुए, काठ , कला , तीन बार, मुहूर्त , तिथियां, महीने, दिन, वर्ष, मौसम, समय पर मंत्र [8], तीन गुना पवित्र अधिकार (अर्थात शास्त्र), जीवन, पवित्र स्थान, कमी, संकेत और रूप की उत्कृष्टता। (उसने) तीन जातियों, तीन लोकों, तीन विद्याओं (अर्थात वेद) और तीन अग्नि, तीन काल, तीन (प्रकार) कृत्यों, तीन जातियों और तीन घटकों को बनाया, इसलिए श्रेष्ठ और अन्य दुनिया। (उसने निर्धारित किया) उन लोगों द्वारा अनुसरण किया गया जो (अर्थात अभ्यास) धार्मिकता से संपन्न हैं, इसलिए पापपूर्ण कार्यों के लिए भी। वह चार जातियों का कारण है, चार जातियों का रक्षक, जो (अर्थात वह) चार विद्याओं (अर्थात वेदों) का ज्ञाता है, जीवन के चार चरणों का आश्रय है, उसे सर्वोच्च कहा जाता है प्रकाश और उच्चतम तप, उच्चतम से बड़ा है, जो (स्वयं) सर्वोच्च (आत्मा) है और स्वयंभू है, दुनिया के सेतुओं (रूप में) का सेतु है, पवित्र कर्मों के योग्य है, वेदों के ज्ञाता, रचयिता के स्वामी, प्राणियों के प्राण हैं, अग्नि के समान प्रखर लोगों की अग्नि है, जो पुरुषों का मन है, तपस्या है जो लोग इसका अभ्यास करते हैं, उनमें से विवेकपूर्ण की लज्जा, और तेज की चमक; इस प्रकार दुनिया के पोते ने यह सब बनाया। (कृपया बताएं) मुझे बलिदान के परिणामस्वरूप किस मार्ग की इच्छा थी और उसने कैसे यज्ञ करने का निर्णय लिया। यह, हे ब्राह्मण, मेरा संदेह है - यह मेरा महान संदेह है । (कृपया बताएं) मुझे बलिदान के परिणामस्वरूप किस मार्ग की इच्छा थी और उसने कैसे यज्ञ करने का निर्णय लिया। यह, हे ब्राह्मण, मेरा संदेह है - यह मेरा महान संदेह है । (कृपया बताएं) मुझे बलिदान के परिणामस्वरूप किस मार्ग की इच्छा थी और उसने कैसे यज्ञ करने का निर्णय लिया। यह, हे ब्राह्मण, मेरा संदेह है - यह मेरा महान संदेह है ।

39. उच्चतम ब्रह्मा को देवताओं और राक्षसों द्वारा एक आश्चर्य कहा जाता है। यद्यपि वह अपने (अद्भुत) कर्मों के कारण अद्भुत है, वह यहाँ वास्तव में ऐसा (अर्थात एक आश्चर्य) वर्णित है।

पुलस्त्य बोला :

40-49. ब्रह्मा के बारे में आपके द्वारा पूछे गए प्रश्नों का भार बहुत बड़ा है। मैं अपनी क्षमता के अनुसार बताऊंगा (अर्थात आपके प्रश्नों का उत्तर दूंगा)। उसकी महान महिमा सुनो। (उसके बारे में सुनें) जिसका वेदों को जानने वाले ब्राह्मण वर्णन करते हैं (इस प्रकार): उसके एक हजार मुंह, एक हजार आंखें, एक हजार पैर, एक हजार कान, एक हजार हाथ हैं। (वह) अपरिवर्तनीय है, उसके पास एक हजार भाषाएं हैं, (वह है) हजार गुना, हजार गुना महान स्वामी, वह दाता है (में) एक हजार (तरीके), हजारों की उत्पत्ति है, और एक अपरिवर्तनीय एक हजार है हथियार। (वह) हवन, सोम रस निकालने , भेंट और पुजारी। (वह है) बर्तन, कुश घास के ब्लेड जो यज्ञों में घी को शुद्ध करने और छिड़कने में उपयोग किए जाते हैं, वेदी, दीक्षा, चावल, जौ और दाल की आहुति देवताओं और पितरों को भेंट करने के लिए, बलि की कलछी, साथ ही बलि की आग पर घी डालने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी की सीढ़ी , सोम , आहुति, पवित्र पानी, [9] (का भुगतान) बलि फीस, स्थानापन्न पुजारी, ब्राह्मण में निपुण के लिए पैसे sama - वेद , सदस्य (वर्तमान बलिदान पर), चैंबर, विधानसभा, बांधने के बाद, पवित्र ईंधन , चम्मच [१०] , मूसल और गारा, वह कमरा जिसमें बलि देने वाले के मित्र और परिवार इकट्ठे होते हैं, बलि की भूमि, गर्म-पुजारी, बंधन, छोटे (या) (उचित-) आकार की निर्जीव वस्तुएं (जैसे मिट्टी, पत्थर), दरभ , इसलिए वैदिक भजन, यज्ञ, अग्नि के साथ एक आहुति की पेशकश, अग्नि का भाग , और वह जो श्रेष्ठता है, जो पहले भोग करता है, यज्ञ का भोक्ता। वह एक शुभ चमक वाला है, जिसने अपना हथियार, बलिदान और शाश्वत स्वामी उठाया है। (मैं आपको बताऊंगा), हे महान राजा, यह दिव्य खाता जिसके बारे में आप (मुझसे) पूछ रहे हैं और जिस कारण भगवान ब्रह्मा ने पृथ्वी पर यज्ञ किया, देवताओं और प्राणियों की भलाई के लिए और दुनिया के उत्पादन के लिए .

50-51. ब्रह्मा, कपिला , और विष्णु, देवता, सात ऋषि, महान पराक्रम के शिव , उच्च आत्मा मनु , श्रद्धेय रचनाकार, ये सभी चमक में आग के समान प्राचीन भगवान द्वारा बनाए गए थे।

52-53. पूर्व में जब कमल-जन्मे (ब्रह्मा) अपने निवास में तपस्या कर रहे थे - पुंकार में - जहाँ देवताओं और ऋषियों के समूह उत्पन्न हुए थे, उनके उच्च आत्मा वाले प्रकटीकरण को पौष्करक कहा जाता है, जिसके बारे में पुराण , अच्छी तरह से सहमत है वेदों और स्मृतियों के साथ सुनाया जाता है।

54-67. वहाँ शास्त्रों के मुख वाला एक वराह प्रकट हुआ। देवताओं के भगवान ने सूअर के रूप का सहारा लिया, पुष्कर में एक व्यापक पवित्र स्थान बनाया - क्योंकि यह एक लाल कमल का उद्घाटन है - स्वयं को ब्रह्मा की सहायता के लिए प्रकट किया। उनके पैर वेदों के रूप में, नुकीले बन्धन पदों के रूप में, हाथ यज्ञ के रूप में, मुख आयताकार [11] के रूप में , जीभ अग्नि के रूप में, बाल दरभों के रूप में थे। , पवित्र ग्रंथों के रूप में सिर और महान तपस्या थी (उसके श्रेय के लिए)। दिन और रात के रूप में उनकी आंखें थीं, दिव्य थे, वेदों के शरीर और शास्त्रों के आभूषण थे, घी के रूप में एक नाक थी, एक बलि की कलछी का मुंह था, सामन् की ध्वनि से महान था. वह सत्य से परिपूर्ण था, वैभव से युक्त था, और अपने कदमों और कदमों से सुशोभित था। उसके पास प्रायश्चित के रूप में कीलें थीं, और वह दृढ़ था; जानवरों के रूप में घुटने और बलि की आकृति थी; उद्घाटी थी-पुजारी ने अपनी आंत के रूप में, अपने जननांग अंग के रूप में बलिदान किया था; वह फलों और बीजों वाला एक बड़ा पौधा था; उसके मन में वायु, हडि्डयों के समान स्तुति, होठों के समान जल और सोम का लहू था; उसके कंधे वेद थे, उसके पास यज्ञों की सुगंध थी; वह देवताओं और पितरों को चढ़ाए जाने के साथ बहुत तेज था। उनका शरीर यज्ञ कक्ष था जिसके स्तंभ पूर्व की ओर मुड़े हुए थे; वह उज्ज्वल था; और दीक्षाओं से सजाया गया था; वह, एक चिंतनशील संत, उसके हृदय के रूप में बलिदान शुल्क था; और वह महान यज्ञों से भरा हुआ था। वह उपकर्म [१२] के यज्ञ समारोह के कारण आकर्षक थे । उनके पास सोम-यज्ञों के प्रारंभिक संस्कारों के रूप में आभूषण थे। [13]वह अपनी पत्नी के साथ उसकी छाया की तरह था, और एक जवाहरात की तरह ऊंचा था। जिसने लोगों के हित को देखा, उसने अपने नुकीले से पृथ्वी का उत्थान किया। तब वह, पृथ्वी का धारक, पृथ्वी को उसके स्थान पर लाकर, पृथ्वी को बनाए रखने से संतुष्ट हो गया। इस प्रकार, पहले वराह ने ब्रह्मा की भलाई की इच्छा रखते हुए, पृथ्वी को जब्त कर लिया, जो पहले समुद्र के पानी में नीचे चली गई थी। ब्रह्मा, लाल कमल के उद्घाटन पर शेष, शांति और संयम से आच्छादित, चल और अचल के स्वामी, वैभव से संपन्न, वेदों को जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ , आदित्य जैसे देवताओं के साथ [१४] ] , वसुओं [15] , Sādhyas [16] , मरुत[17] , रुद्र [18] सबसे -इस मित्र, तो भी द्वारा Yakṣas , राक्षसों और Kinnaras , दिशाओं और मध्यवर्ती दिशा-निर्देश, महासागरों के साथ पृथ्वी पर नदियों, कहा इन शब्दों (सूअर के रूप में विष्णु के लिए): "हे भगवान, आप हमेशा पवित्र स्थान कोकामुख (यानी पुष्कर) कीदेखभाल और रक्षाकरेंगे; यहाँ, बलिदान पर आप (बलिदान की) सुरक्षा करेंगे। ”

६८. तब उन्होंने ब्रह्मा से कहा: "आदरणीय, मैं ऐसा करूँगा"। ब्रह्मा ने फिर से भगवान विष्णु से कहा जो उनके सामने खड़े थे:

69-76. "हे सर्वश्रेष्ठ देवताओं, तुम मेरे सबसे बड़े देवता हो, तुम मेरे सबसे अच्छे गुरु हो; आप मेरे सर्वोच्च सहारा हैं और शंकर केऔर दूसरे। हे खिले हुए, बेदाग कमल के समान नेत्रों वाले, शत्रु का संहार करने वाले, ऐसा कर्म करना कि दैत्य मेरे सामने झुके हुए मेरे यज्ञ का नाश न करें। आपको मेरा नमस्कार।" विष्णु ने कहा: "हे देवताओं के भगवान, अपना भय छोड़ दो; मैं उन सभी (जैसे) बुरी आत्माओं और राक्षसों को नष्ट कर दूंगा जो बाधा उत्पन्न करेंगे।" ऐसा कहकर वह, जिसने (ब्रह्मा) की सहायता करने का वचन लिया था, वहीं रह गया। शुभ हवाएं चलीं और दस चौथाई उज्ज्वल थे। बहुत चमकीले प्रकाशमान चन्द्रमा के चक्कर लगा रहे थे। ग्रहों में (कोई) संघर्ष नहीं था, और समुद्र शांत हो गए थे। जमीन धूल रहित थी; जल ने सब को आनन्द दिया; नदियों ने अपने मार्ग का अनुसरण किया; समुद्र उत्तेजित नहीं थे; नियंत्रित दिमाग वाले पुरुषों की इंद्रियां भलाई के लिए अनुकूल होती हैं। महान संत, दुःख से मुक्त,

77. उस यज्ञ में हवन-यज्ञ शुभ थे, लोग सदाचारी और प्रसन्नचित्त चित्त वाले थे।

78-89. एक सत्य व्रत के विष्णु के वचनों को सुनकर, (उनके) शत्रुओं को मारने के बारे में, राक्षसों और बुरी आत्माओं के साथ देवता (वहां) पहुंचे। आत्माएं, भूत-प्रेत-सभी वहां एक के बाद एक आए; इसी तरह गंधर्व , [१९] आकाशीय अप्सराएं , नाग और विद्याधरों के समूह [२०] (वहां पहुंचे)। ब्रह्मा के आदेश से, हवा सभी दिशाओं से, पेड़ों को लेकर आई [21]और जड़ी-बूटियाँ जो कामना करती थीं और जो नहीं आना चाहती थीं। दक्षिण दिशा की ओर यज्ञ पर्वत पर पहुँचकर सभी देवता उत्तर में सीमा पर्वत पर ही रहे। उस महान यज्ञ में, गंधर्व, आकाशीय अप्सराएँ और ऋषि, जिन्होंने पश्चिमी दिशा का सहारा लेकर वेदों में महारत हासिल की थी, वहीं रहे। देवताओं के सभी समूहों, सभी राक्षसों और बुरी आत्माओं के यजमानों ने अपने क्रोध को छिपाए रखा और परस्पर स्नेही थे। उन सभी ने ऋषियों की प्रतीक्षा की और ब्राह्मणों की सेवा की। प्रमुख ऋषि, ब्राह्मण ऋषि, ब्राह्मण और दिव्य ऋषि, इसलिए भी शाही ऋषि सभी पक्षों से आए थे। (सभी जानने के लिए उत्सुक थे) यह यज्ञ किस देवता के लिए किया जाएगा? जानवर और पक्षी, इसे देखने की इच्छा से, इसलिए खाने के इच्छुक ब्राह्मण और सभी जातियां उचित क्रम में वहां आई थीं।वरुण ने स्वयं (चयन) में सावधानी बरती कि सर्वश्रेष्ठ भोजन दिया। वरुण-देवी से आने के बाद उन्होंने अपने हिसाब से पका हुआ भोजन तैयार किया। वायु ने विभिन्न प्रकार के भोजन और सूर्य ने द्रव्यों को पचा लिया। भोजन के पाचक सोम और बुद्धि के दाता बृहस्पति (थे) उपस्थित थे। धन का स्वामी (देखभाल) धन, और विभिन्न प्रकार के वस्त्र देने वाला। सरस्वती , नदियों के प्रमुख, नर्मदा के साथ देवी गंगा (वहां आई थीं)।

90-111. अन्य सभी शुभ नदियाँ, कुएँ और झीलें, ताल और तालाब, कुएँ किसी देवता या पवित्र उद्देश्य के लिए समर्पित, देवताओं द्वारा खोदी गई कई मुख्य धाराएँ, इसलिए पानी के सभी जलाशय और संख्या में समुद्र; नमक, गन्ना, मादक शराब, दूध और पानी के साथ शुद्ध मक्खन और दही (वहां थे); सात लोक और सात निचले लोक, और सात द्वीप और नगर; पेड़ और लताएँ, घास और फलों के साथ सब्जियाँ; पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि पाँचवें (तत्व) के रूप में - ये तत्व; इसलिए भी जो भी कानून के कोड थे (वहां थे), वेदों, सूत्रों पर ग्लोसव्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे; (इस प्रकार) अशरीरी, देहधारी और अत्यंत देहधारी, वैसे ही सब (जो था) दृश्यमान- (इस प्रकार) ब्रह्मा द्वारा निर्मित सभी (वस्तुएं) (वहां मौजूद थे)। इस प्रकार जब उस समय देवताओं की उपस्थिति में और ऋषियों की संगति में पोते का बलिदान किया गया था, शाश्वत विष्णु ब्रह्मा के दाहिने हाथ पर बने रहे। रुद्र , त्रिशूल धारक, वरदान दाता, भगवान, ब्रह्मा के बाईं ओर रहे। महान आत्मा (ब्रह्मा) ने भी पुजारियों को यज्ञ में भाग लेने के लिए चुना। Bhṛgu आधिकारिक पुजारी की प्रार्थना पढ़ने के रूप में चुना गया था Ṛgveda [22] ; पुलस्त्य को सर्वश्रेष्ठ अध्वर्यु [23] पुजारी चुना गया। मारिसिक(के रूप में चुना गया था) उदगाती [२४] पुजारी (जो सामवेद के भजनों का जाप करता है ) और नारद (चुना गया) ब्रह्मा पुजारी। सनत्कुमार और अन्य सदस्य (यज्ञ सभा के) थे, इसलिए दक्ष जैसे प्रजापति और ब्राह्मणों से पहले की जातियाँ (बलिदान में शामिल हुईं); ब्रह्मा के पास पुजारियों की (बैठने की) व्यवस्था की गई थी। वे कुबेर द्वारा वस्त्र और आभूषणों से संपन्न थे. ब्राह्मणों को कंगन और पट्टियों के साथ अंगूठियों से सजाया गया था। ब्राह्मण चार, दो और दस (इस प्रकार कुल मिलाकर) सोलह थे। उन सभी को ब्रह्मा ने नमस्कार के साथ पूजा की थी। (उसने उनसे कहा): "हे ब्राह्मणों, इस यज्ञ के दौरान तुम्हें मुझ पर कृपा करनी चाहिए; यह मेरी पत्नी सावित्री है; तुम मेरी शरण हो।'' विश्वकर्मन को बुलाने के बाद , ब्राह्मणों ने ब्रह्मा का सिर मुंडवा लिया, क्योंकि यह एक यज्ञ में (प्रारंभिक के रूप में) रखा गया था। ब्राह्मण जोड़े (अर्थात ब्रह्मा और सावित्री) के लिए भी (सुरक्षित) सन के कपड़े। ब्राह्मण वहाँ रह गए (अर्थात ब्राह्मणों ने भर दिया) स्वर्ग को वेदों की ध्वनि (पाठ की) से भर दिया; kṣatriyas हथियारों इस दुनिया की रक्षा करने के साथ वहां बने रहे; Vaisyasविभिन्न प्रकार के भोजन तैयार किए; उस समय बड़े स्वाद से भरपूर भोजन और खाने की चीज़ें भी बनाई जाती थीं; इसे पहले अनसुना और अनदेखा देखकर, ब्रह्मा प्रसन्न हुए; भगवान, निर्माता, ने वैश्यों को प्राग्वान नाम दिया । (ब्रह्मा ने इसे रखा:) 'यहाँ शूद्रों को हमेशा ब्राह्मणों के चरणों की सेवा करनी होती है; उन्हें अपने पैर धोने होंगे, उनके द्वारा बचा हुआ खाना (अर्थात ब्राह्मण) और शुद्ध (जमीन आदि) करना होगा। वहाँ भी उन्होंने (ये बातें) कीं; फिर उनसे कहा, "मैंने तुम्हें ब्राह्मणों, क्षत्रिय भाइयों और तुम्हारे जैसे (अन्य) भाइयों की सेवा करने के लिए चौथे स्थान पर रखा है ; तीनों की सेवा करनी है।" ऐसा कहकर ब्रह्मा ने शंकर को भी नियुक्त किया और इन्द्र को भीद्वार-अधीक्षक के रूप में, वरुण जल देने के लिए, कुबेर धन वितरित करने के लिए, हवा सुगंध देने के लिए, सूर्य प्रकाश व्यवस्था करने के लिए और विष्णु (प्रमुख) अधिकारी के रूप में रहे। सोम के दाता चंद्रमा ने बाईं ओर पथ का सहारा लिया।

112-125. सावित्री, उनकी सुंदर पत्नी, जिन्हें अच्छी तरह से सम्मानित किया गया था, को अध्वर्यु ने आमंत्रित किया था : "मैडम, जल्दी आओ, सभी आग बढ़ गई है (यानी अच्छी तरह से प्रज्वलित हैं), दीक्षा का समय आ गया है।" वह कुछ काम करने में तल्लीन थी, तुरंत नहीं आई, जैसा कि आमतौर पर महिलाओं के साथ होता है। “मैंने यहाँ द्वार पर कोई सजावट नहीं की है; मैंने दीवार पर चित्र नहीं बनाए हैं; मैंने आंगन में स्वस्तिक [25] नहीं खींचा है । यहां गमलों की सफाई ही नहीं की गई है। लक्ष्मी ने की पत्नी है नारायण के रूप में अभी तक नहीं आया है। तो अग्नि की पत्नी स्वाहा भी ; और यमरोड़ा, यम की पत्नी; गौरी, वरुण की पत्नी; सिद्धि , कुबेर की पत्नी; गौरी, शंभू की पत्नी, प्रिय दुनिया के लिए। इसी तरह बेटियां मेधा , श्रद्धा , विभूति , अनश्या , धृति , काममा और गंगा और सरस्वती नदियां अभी तक नहीं आई हैं। इंद्राणी , और चंद्रमा की पत्नी रोहिणी , चंद्रमा को प्रिय । इसी तरह, वशिष्ठ की पत्नी अरुंधती ; इसलिए भी सात ऋषियों की पत्नियों, और अनासुया, अत्रीकी पत्नी और अन्य महिलाएं, बहुएं, बेटियां, दोस्त, बहनें अभी तक नहीं आई हैं। मैं अकेला यहां (उनकी प्रतीक्षा में) लंबे समय तक रहा हूं। जब तक वे स्त्रियाँ न आ जाएँ, मैं अकेली नहीं जाऊँगी। जाओ और ब्रह्मा से कुछ देर रुकने को कहो। मैं शीघ्र ही सब (उन स्त्रियों) के साथ आऊँगा; हे उच्च बुद्धि वाले, देवताओं से घिरे हुए, आप महान कृपा प्राप्त करेंगे; मैं भी वैसा ही करूंगा; इसमें कोई संदेह नहीं।" उसे इस तरह बात करते हुए छोड़कर अध्वर्यु ब्रह्मा के पास आए।

१२६-१२७. "हे भगवान, सावित्री व्यस्त है; वह घरेलू काम में लगी हुई है। मैं तब तक नहीं आऊँगा जब तक मेरे मित्र न आ जाएँ—उसने मुझसे ऐसा ही कहा है। हे प्रभु, समय बीत रहा है। हे पोते, आज जो चाहो करो।”

128-130. इस प्रकार, ब्रह्मा ने थोड़ा क्रोधित होकर संबोधित किया और इंद्र से कहा: "हे शंकर, मेरे लिए एक और पत्नी जल्दी से यहाँ ले आओ। वह जल्दी करो जिससे बलिदान (ठीक से) आगे बढ़े और देर न हो; जब तक बलि न हो जाए, तब तक मेरे लिथे कोई स्त्री ले आओ; मैं तुम्हारी याचना कर रहा हूँ; मेरे लिए अपना मन बनाओ; बलिदान समाप्त होने के बाद मैं उसे फिर से मुक्त कर दूंगा।"

131. इस प्रकार संबोधित करते हुए, इंद्र ने पूरी पृथ्वी पर (यानी घूमते हुए) महिलाओं को देखा, (लेकिन) वे सभी दूसरों की पत्नियां थीं।

132-133. There was a cowherd’s daughter, endowed with beauty, of a fine nose and charming eyes. No goddess, no Gandharva woman, no demoness, no female serpent, no maiden was like that excellent lady. He saw her of a charming form, like another goddess Lakṣmī, and curtailing (i.e. distracting) the powers of the mind’s functions by means of the wealth of her beauty.

134-137. Whatever object distinguished by beauty is found anywhere, every such excellent object was seen to be attached to the lady with a slim body. Seeing her Indra thought: ‘If she is a maiden, then on the earth no other god is more meritorious than I. This is that gem of a lady, for whom, if the grandsire longs, then this my exertion would be fruitful.’

138. उसने उसे नीले आकाश की सुंदरता, एक सुनहरा कमल और एक मूंगा, (अर्थात) उसके अंगों, बालों, गालों, आंखों और होंठों के माध्यम से चमकते हुए और एक सेब की अंकुरित कली के समान देखा- लकड़ी या अशोक का पेड़।

139. 'वह सृष्टिकर्ता द्वारा कैसे बनाई गई थी, उसके दिल में जलती हुई डार्ट और उसकी आंखों में आग की लपटों (जुनून के) के ढेर के साथ, बिना समानता देखे?

140-151. अगर उसने उसे अपने विचार के अनुसार बनाया है तो यह उसके कौशल का सर्वोच्च उत्पाद है। ये दो ऊँचे नुकीले स्तन (उसके द्वारा) बनाए गए हैं; जिसे (अर्थात उन्हें) देखकर मुझे आनंद आ रहा है। किसके दिल में उन्हें देखकर महान आश्चर्य उत्पन्न नहीं होगा? यद्यपि यह होंठ स्पष्ट रूप से जुनून (भी, लाली) से प्रबल है, फिर भी यह अपने भोक्ता को बहुत खुशी देगा। बाल टेढ़े होने के बावजूद (अर्थात घुंघराले बाल) सुख दे रहे हैं। एक दोष भी, जब वह प्रचुर सुंदरता का सहारा लेता है, तो वह गुण प्रतीत होता है। (उसकी) आँखों के सजे हुए कोने कानों तक (अर्थात उसके पास पहुँचे हुए) आ गए हैं; (और इसके लिए) कारण विशेषज्ञ सुंदरता को प्रेम की (बहुत) भावना के रूप में वर्णित करते हैं। उसकी आँखें उसके कानों के आभूषण हैं (और) उसके कान उसकी आँखों के आभूषण हैं। यहां न तो इयररिंग्स की गुंजाइश है और न ही कोलिरियम की। दिल को दो (भागों) में बांटना उसकी निगाहों को शोभा नहीं देता। जो लोग आपके संपर्क में आते हैं, वे कैसे दुख बांट सकते हैं (अर्थात हैं)? (यहां तक ​​कि) एक विकृति प्राकृतिक गुणों के साथ सर्व-सुंदर (संपर्क में) हो जाती है। मैंने अपनी सैकड़ों बड़ी-बड़ी आँखों का मूल्यवान अधिकार देखा है। यह उनके कौशल की सीमा है जिसे निर्माता ने इस सुंदर रूप को बनाने में बखूबी प्रदर्शित किया है। वह अपने सुंदर कृत्यों (अर्थात गतियों) के माध्यम से पुरुषों के मन में प्रेम पैदा करती है।' उसका शरीर, जिसकी चमक इस प्रकार सोचकर दूर हो गई थी, लगातार उठती हुई भयावहता से ढका हुआ था। उसे नए सोने की तरह आकर्षण, और कमल-पत्तियों की तरह लंबी आंखों को देखकर (उसने सोचा:) 'मैंने देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, सांपों और राक्षसों की कई महिलाओं को देखा है, लेकिन सौंदर्य का ऐसा धन कहीं नहीं देखा।

इंद्र ने कहा :

152-155। हे आकर्षक भौहों वाले, मुझे बताओ- तुम कौन हो? आप किससे संबंधित हैं? तुम कहाँ से आए हो? आप बीच सड़क पर क्यों खड़े हैं? ये आभूषण जो तुम्हारे शरीर में उत्साह बढ़ाते हैं और जिन्हें तुम धारण करते हो, वे तुम्हें शोभा नहीं देते; (बल्कि) आप उन्हें सजाते हैं। हे सुन्दर नेत्रों वाली, न देवी, न गंधर्व स्त्री, न दैत्य , न नाग नागिन, न किन्नर स्त्री तुम्हारे समान सुन्दर दिखाई दी। मेरे द्वारा बार-बार बोले जाने पर भी आप उत्तर क्यों नहीं देते?

और उस कुमारी ने घबराहट और कांप से अभिभूत होकर इंद्र से कहा:

१५६-१५७. "हे योद्धा, मैं एक ग्वाला-युवती हूँ; मैं दूध, यह शुद्ध मक्खन, और मलाई से भरा दही बेचता हूँ। आप जो स्वाद चाहते हैं - दही या छाछ का - इसे (मुझे) बताओ, जितना चाहो ले लो।"

158. इस प्रकार (उनके द्वारा) संबोधित करते हुए, इंद्र ने दृढ़ता से उसका हाथ पकड़ लिया, और उस बड़ी आंखों वाली महिला को (उस स्थान पर) ले आए जहां ब्रह्मा तैनात थे।

159. वह अपके माता पिता के लिथे रोती या, जिसे वह ले जाता या। 'हे पिता, हे माता, हे भाई, यह आदमी मुझे (दूर) जबरन ले जा रहा है।'

160-161। (उसने इंद्र से कहा): "यदि आपको मुझसे कुछ करना है, तो मेरे पिता से अनुरोध करें। वह मुझे तुम्हें दे देगा; मैं सच कह रहा हूँ। कौन सी युवती आसक्ति से स्नेही पति की लालसा नहीं करती? हे मेरे पिता, हे धर्म में लगे रहने वाले, तुझ से कुछ भी ग्रहण न किया जाएगा।

१६२-१६३. मैं सिर झुकाकर उसे प्रायश्चित करूंगा, और वह प्रसन्न होकर मुझे (मुझे तुझे) अर्पित करेगा। यदि मैं अपने पिता के मन को जाने बिना अपने आप को आपको अर्पित कर दूं, तो मेरी अधिकांश धार्मिक योग्यता नष्ट हो जाएगी और इसलिए मैं आपको खुश नहीं कर पाऊंगा। यदि (केवल) मेरे पिता मुझे आपके सामने प्रस्तुत करते हैं तो मैं अपने आप को आपके अधीन कर दूंगा। ”

164-168. भले ही शकरा को उसके द्वारा संबोधित किया जा रहा था, फिर भी वह उसे ले गया, और उसे ब्रह्मा के सामने रखकर कहा: "हे बड़ी आंखों वाली महिला, मैं आपको इसके लिए लाया हूं (भगवान); हे उत्तम वर्ण के तू शोकित न हो।” ग्वाले की पुत्री को गोरे रंग और महान् तेजोमयी देखकर, उसने (अर्थात् ब्रह्मा) उसे कमल के समान नेत्रों वाली, स्वयं लक्ष्मी समझी। गर्म सोने की दीवार के हिस्से के समान, उसने भी, उसे एक मोटी छाती वाले, नशे में हाथियों की सूंड की तरह गोल जांघों के साथ, लाल और चमकीले नाखूनों की चमक के साथ, खुद को एनिमेटेड (की भावना) के रूप में देखा। ) प्यार। उसे (अपने पति के रूप में) सुरक्षित करने की इच्छा से ग्वाला-युवती बेसुध दिखाई दी। उसने यह भी सोचा (यानी उसके पास) खुद को (उसे) देने का अधिकार है। (उसने खुद से कहा :)

169-180। 'यदि वह मेरी सुन्दरता के कारण मेरे होने की जिद करता है, तो मुझ से बढ़कर और कोई सौभाग्यशाली नहीं है। जब से उसने मुझे देखा, वह मुझे ले आया। यदि मैं उसे छोड़ दूं तो मैं मर जाऊंगा; यदि मैं उसे न छोड़ूं, तो मेरा जीवन सुखी होगा; और अपमान के कारण मैं—अपना रूप निन्दा करके—दुख का कारण बनूंगा (दूसरों को); वह जिस भी स्त्री को अपनी आंखों से कृपा दृष्टि से देखता है, वह भी धन्य हो जाती है। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है; (तब) उसके बारे में क्या जिसे वह गले लगाता है? दुनिया की सारी सुंदरता विभिन्न तरीकों से चली गई है (यानी अलग-अलग जगहों पर बनी हुई है); (अब) ब्रह्मांड की उत्पत्ति (यानी निर्माता) ने सुंदरता को एक ही स्थान पर प्रकट किया है। वह कामदेव से ही तुलनीय है; कामदेव की तुलना उनकी प्रतिभा के कारण अच्छी है। मैं इस दु:ख (अपना) का त्याग करता हूँ। (जीवन में जो कुछ भी मिलता है) उसका कारण न तो पिता है और न ही माता। अगर वह मुझे स्वीकार नहीं करता है या मुझसे थोड़ी बात नहीं करता है, तो मैं उसके लिए तरसता हूं, मुझे दुःख के कारण मृत्यु मिल जाएगी। जब यह निर्दोष अपनी पत्नी के पास जाता है (अर्थात अपनी पत्नी के लिए पति के रूप में कार्य करता है), तो शुद्ध कमल की तरह ऐसा तेज (कारण) स्तनों पर रत्नों की कृपा होगी। उसे देखकर मेरा मन चिंतन में आ गया है। (वह अपने मन से कहती है:) यदि आप उसके शरीर के स्पर्श और संपर्क पर ध्यान नहीं देते हैं, तो, आप (ऐसे) एक उत्कृष्ट शरीर को नहीं छूते हुए, व्यर्थ भटक रहे हैं। या यह उसकी गलती नहीं है; क्‍योंकि तुम अपनी प्रिय इच्‍छा पर विचरण करते हो। हे कामदेव, तुम सचमुच लुट गए हो। अपने प्रिय की रक्षा करें उसे देखकर मेरा मन चिंतन में आ गया है। (वह अपने मन से कहती है:) यदि आप उसके शरीर के स्पर्श और संपर्क पर ध्यान नहीं देते हैं, तो, आप (ऐसे) एक उत्कृष्ट शरीर को नहीं छूते हुए, व्यर्थ भटक रहे हैं। या यह उसकी गलती नहीं है; क्‍योंकि तुम अपनी प्रिय इच्‍छा पर विचरण करते हो। हे कामदेव, तुम सचमुच लुट गए हो। अपने प्रिय की रक्षा करें उसे देखकर मेरा मन चिंतन में आ गया है। (वह अपने मन से कहती है:) यदि आप उसके शरीर के स्पर्श और संपर्क पर ध्यान नहीं देते हैं, तो, आप (ऐसे) एक उत्कृष्ट शरीर को नहीं छूते हुए, व्यर्थ भटक रहे हैं। या यह उसकी गलती नहीं है; क्‍योंकि तुम अपनी प्रिय इच्‍छा पर विचरण करते हो। हे कामदेव, तुम सचमुच लुट गए हो। अपने प्रिय की रक्षा करेंरति , चूंकि, हे कामदेव, वह सुन्दरता में आपसे श्रेष्ठ दिखता है। उसने निश्चय ही मेरे मन का मणि और मेरी सारी संपत्ति छीन ली है। चंद्रमा पर जो सुंदरता उसके चेहरे पर दिखाई देती है, उसे कोई कैसे (ढूंढ सकता है)? धब्बे वाली वस्तु और धब्बेदार वस्तु के बीच तुलना करना उचित नहीं है।

१८१-१८३. कमल की आँखों से समानता नहीं होती। जल-शंख की तुलना उसके शंख (समान) कानों से कैसे की जा सकती है? यहां तक ​​कि एक मूंगा भी निश्चित रूप से अपने होंठ के समान नहीं होता है। उसमें अमृत का वास है। वह निश्चित रूप से अमृत के प्रवाह का कारण बनता है। यदि मैंने अपने पूर्व के सैकड़ों जन्मों में कोई शुभ कार्य किया है, तो उसकी शक्ति के कारण, जिसे मैं चाहता हूं, वह मेरा पति हो'।

१८४-१८७. जब वह ग्वाला-युवती इस प्रकार विचार में लीन होने के कारण स्वयं से परे हो गई, तो ब्रह्मा ने जल्दी से विष्णु से यज्ञ के लिए (तेजी से) ये शब्द कहे: "और यह है, हे भगवान, गायत्री नाम की देवी , परम धन्य हैं।" जब ये शब्द बोले गए, तो विष्णु ने ब्रह्मा से ये शब्द कहे: "हे संसार के स्वामी, आज गंधर्व - शैली (विवाह की) में शादी करो, जिसे मैंने तुम्हें दिया है। अब और संकोच न करें। हे प्रभु, बिना विचलित हुए, उसके इस हाथ को स्वीकार करो।" (तब) पोते ने उससे गंधर्व- शैली के विवाह में विवाह किया।

१८८-१९१. उसे (अपनी पत्नी के रूप में) प्राप्त करने के बाद, ब्रह्मा ने सबसे अच्छे अध्वर्यु- पुजारियों से कहा: "मैंने इस महिला को अपनी पत्नी के रूप में लिया है; उसे मेरे घर में रख दो।" वेदों के पुजारी, तब उस युवती को, हिरण के सींग को पकड़े हुए और रेशमी वस्त्र पहने हुए, उस कक्ष में ले गए, जो बलिदान करने वाले की पत्नी के लिए था। ऑडुंबरा कर्मचारियों के साथ ब्रह्मा (हाथ में और) हिरण-छिपे से ढके हुए, यज्ञ में वहां चमके, जैसे कि वह अपनी चमक के साथ थे। तब ब्राह्मणों ने, भृगु के साथ, वेदों में बताए अनुसार यज्ञ शुरू किया। फिर वह यज्ञ पुष्कर- तीर्थ में एक हजार युग तक चला (अर्थात जारी रहा) ।

फुटनोट और संदर्भ:

[1] :

होत्रा : आहुति के रूप में (घी के रूप में) अर्पित करने योग्य कोई भी वस्तु ।

[2] :

श्रुवा : एक बलि की कलछी।

[३] :

श्रुक : एक प्रकार की लकड़ी की करछुल, जिसका उपयोग यज्ञ की अग्नि में घी डालने के लिए किया जाता है। यह आमतौर पर पलाना या खदीरा से बना होता है। श्रुवा : एक बलि की कलछी।

[४] :

हव्य : देवताओं को भेंट।

[५] :

काव्या : पितरों को भेंट।

[६] :

पवित्रा : कुण्डा घास की दो कलियाँ जो यज्ञ में घी को शुद्ध करने और छिड़कने के लिए प्रयोग की जाती हैं।

[7] :

परिधि : पालना जैसे पवित्र वृक्ष की एक छड़ी यज्ञ की अग्नि के चारों ओर रखी जाती है।

[८] :

योग : मंत्र।

[९] :

प्रोक्ष : पवित्र जल ।

[१०] :

दरवे : कलछी , चम्मच।

[११] :

सिटी : चतुष्कोणीय भुजाओं वाला एक आयताकार।

[१२] :

उपकर्म : प्रारंभ में किया जाने वाला एक संस्कार।

[13] :

प्रवरग्य: सोम-यज्ञ के लिए एक प्रारंभिक समारोह। उपकर्म : प्रारंभ में किया जाने वाला एक संस्कार।

[14] :

आदित्य : वे बारह सूर्य हैं और माना जाता है कि वे केवल ब्रह्मांड के विनाश पर ही चमकते हैं।

[१५] :

वसुस : वे देवताओं के एक वर्ग हैं; वे संख्या में आठ हैं: प, ध्रुव, सोम, धारा या धव, अनिला, अनल, प्रत्युष और प्रभास।

[१६] :

साध्य : खगोलीय प्राणियों का एक वर्ग।

[17] :

मारुत : देवताओं का एक वर्ग। साध्य : खगोलीय प्राणियों का एक वर्ग।

[१८] :

रुद्र : देवताओं के एक समूह का नाम, संख्या में ग्यारह, शिव या शंकर के निम्न रूप माने जाते हैं, जिन्हें समूह का मुखिया कहा जाता है।

[१९] :

गंधर्व : देवताओं का एक वर्ग जो देवताओं के गायक या संगीतकार के रूप में माना जाता है और लड़कियों को अच्छी और सहमत आवाज देने के लिए कहा जाता है।

[20] :

विद्याधर : अर्ध-दिव्य प्राणियों या अर्ध-देवताओं का एक वर्ग। हिमालय को उनका पसंदीदा अड्डा माना जाता है। जब भी वे नश्वर द्वारा किए गए असाधारण पुण्य के किसी भी कार्य को देखते हैं, तो उन्हें स्वर्गीय फूलों की वर्षा के रूप में वर्णित किया जाता है। कहा जाता है कि वे हवा में घूमते हैं।

[२१] :

वानस्पतिया : एक पेड़, जिसका फल फूल से उत्पन्न होता है जैसे आम।

[22] :

Hotṛ : एक बलि पुजारी, विशेष रूप से वह जो यज्ञ में ऋग्वेद की प्रार्थनाओं का पाठ करता है।

[२३] :

अध्वर्यु : एक कार्यवाहक पुजारी।

[२४] :

उद्घाटी : यज्ञ में चार प्रमुख पुजारियों में से एक; जो सामवेद के मंत्रों का जाप करता है।

[२५] :

स्वस्तिक : एक प्रकार का चिन्ह जो सौभाग्य को दर्शाता है।



अध्याय 17 - सावित्री के श्राप और गायत्री के वरदान

भीम ने कहा :

1-3. हे श्रेष्ठ ब्राह्मण , फिर यज्ञ में क्या आश्चर्य था? रुद्र वहाँ कैसे रहा ? देवताओं में सर्वश्रेष्ठ विष्णु भी वहां कैसे रहते थे? ( ब्रह्मा की) पत्नी के रूप में तैनात गायत्री ने वहाँ क्या किया ? हे मुनि, (गायत्री की जब्ती के बारे में) जानकर अच्छे आचरण के चरवाहों ने क्या किया? मुझे यह कहानी बताओ—क्या हुआ और ग्वालों और ब्रह्मा ने क्या किया। मुझे (जानने के लिए) एक बड़ी जिज्ञासा है।

पुलस्त्य बोला :

4-7. हे राजा, मैं तुझे वे अद्भुत बातें बताऊंगा जो बलिदान के समय हुई थीं। एकाग्रता से सुनें। रुद्र ने (यज्ञ) सभा में जाने के बाद एक बड़ा आश्चर्य किया। देवता (अर्थात् रुद्र) निंदनीय रूप धारण करके वहाँ ब्राह्मणों के पास आए । चूंकि विष्णु ने एक महत्वपूर्ण स्थान पर कब्जा कर लिया था, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया (रुद्र को सभा में प्रवेश करने से रोकने के लिए)। चरवाहे लड़के और सभी चरवाहे ग्वालों के खोने के बारे में जान कर ब्रह्मा के पास आ गए।

8-10. उसे कमरबंद (कमर) बंधा हुआ देखकर, और यज्ञ की सीमा पर बैठे हुए (गवाहे रो पड़े)। तब माँ (रोई): "हे बेटी"; पिता (रोया): "हे बेटी"; भाई (रोते हुए): "हे बहन"; दोस्त (रोया) स्नेह के साथ: "हे दोस्त, लाल राल के साथ चिह्नित, सुंदर को कौन लाया? अपना वह कपड़ा हटा रहे हैं जिसने आप पर कंबल डाला है? हे पुत्री, किसने तुम्हारे उलझे बालों में लाल डोरी बाँधी है?” ऐसी बातें सुनकर हरि ने स्वयं (अपने पिता से) कहा:

11-20. "हम उसे यहां लाए और उसे ( ब्रह्मा की) पत्नी के रूप में नियुक्त किया । कन्या ब्रह्मा से जुड़ी हुई है। शोक मत करो। वह शुभ है, और सभी के लिए सौभाग्य का कारण है। और परिवार के लिए खुशी की; अगर वह शुभ नहीं होती, तो वह (बलिदान) सभा में कैसे आती? यह जानकर, हे धन्य, शोक मत करो। इस प्रकार आपकी बेटी बहुत भाग्यशाली है (अ) वह भगवान ब्रह्मा के पास आई है। आपकी पुत्री ने वह स्थान प्राप्त किया है जिसमें ब्राह्मणों ने परम आत्मा तथा वेदों के आचार्यों का चिन्तन किया है।, प्राप्त नहीं किया, नहीं मिला। आपको एक अच्छे आचरण वाले धार्मिक व्यक्ति और धर्म के प्रति समर्पित होने के कारण, मैंने यह बेटी ब्रह्मा को दी है। उसके द्वारा दिव्य और समृद्ध दुनिया में जाने से मुक्त हो गया। एक दिव्य मिशन की पूर्ति के लिए मैं आपके परिवार में जन्म लूंगा। यह सिर्फ एक खेल होगा। जब नंद और अन्य लोग पृथ्वी पर पैदा होंगे, मैं उनके बीच रहूंगा। तेरी सभी बेटियाँ मेरे साथ रहेंगी। कोई पाप, कोई द्वेष और द्वेष नहीं होगा। ग्वालों या पुरुषों को भी कोई भय नहीं होगा। इस कृत्य के परिणामस्वरूप (ब्रह्मा से विवाह करने के कारण) यह (आपकी बेटी) कोई पाप नहीं करेगा।" विष्णु के (इन) शब्दों को सुनकर, (उन सभी को) उन्हें प्रणाम करके (स्थान) छोड़ दिया।

21. ( पिता ने कहा :) “मुझे वह वरदान लेने दो जो तुमने मुझे दिया है। आप हमारे परिवार में धार्मिक योग्यता लाने वाला अवतार लेंगे।

22-28. केवल तेरी दृष्टि से ही हम स्वर्गवासी होंगे; और यही मेरी बेटी मेरे परिवार के सदस्यों के साथ मुझे मुक्त करेगी। हे स्वामी, देवताओं के स्वामी, आप हमें ऐसा ही वरदान दें।” भगवान विष्णु ने स्वयं ग्वालों को प्रसन्न किया। अपने बाएं हाथ के माध्यम से (यानी लहराते हुए) ब्रह्मा ने भी उसी विचार का संचार किया। उत्तम वर्ण की स्त्री गायत्री, ग्वाला-पुत्री, अपने सम्बन्धियों को देखकर लज्जित हुई, उनसे मिली और उन सभी को अपने बाएँ हाथ से प्रणाम करते हुए बोली: “तुम्हें (समाचार) किसने बताया कि तुम इस स्थान पर आए हो। ? हे माता, ब्रह्मा के पास आकर मैं यहीं रह गया हूं। मैंने आज अपने पति के रूप में पूरे विश्व का स्वामी प्राप्त किया है। तुम मेरे लिए शोक मत करो, न मेरे पिता, और न ही मेरे संबंध। मेरे दोस्तों के समूह और बच्चों सहित मेरी बहनों को मेरी सुरक्षा के बारे में बताएं (अर्थात मैं ठीक हूं);

29. जब उन सभी को छोड़ दिया था, कि गायत्री, एक आकर्षक कमर की, ब्रह्मा के साथ जगह पर चला गया हो रही है [1] तैयार किया और बलिदान के लिए संलग्न, शॉन वहाँ।

30. ब्राह्मणों ने ब्रह्मा से वरदान मांगा। (उन्होंने कहा): "हमें वांछित वरदान दो"। ब्रह्मा ने भी उन्हें मनचाहा वरदान दिया।

३१. उस देवी गायत्री ने भी (ब्रह्मा द्वारा) प्रदान की गई सहमति के लिए अपनी सहमति दी थी; और वह अच्छी औरत भी यज्ञ में देवताओं के पास ही रही।

32-37. वह बलिदान सौ से अधिक दिव्य वर्षों तक जारी रहा; और शिव , एक बड़ी खोपड़ी (भीख के कटोरे के रूप में) लेकर और पांच सिरों से अलंकृत होकर भिक्षा के लिए यज्ञ के स्थान पर आए। द्वार पर खड़े होकर, पुजारियों और सदस्यों (यज्ञ सभा के) ने उन्हें फटकार लगाई: "आप, वेदों के व्याख्याकारों द्वारा निंदा किए गए, यहां कैसे पहुंचे?" महेश्वर (अर्थात् शिव) को ब्राह्मणों द्वारा निंदा किए जाने के बाद एक मुस्कान के साथ उन सभी ब्राह्मणों से कहा गया: "पोते के इस बलिदान पर, जो सभी को प्रसन्न करता है, कोई और नहीं, बल्कि मुझे, दूर किया जा रहा है, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों।" शिव [2]उनके द्वारा कहा गया था: "खाना खाओ और फिर जाओ"। शिव ने भी उनसे कहा: "हे ब्राह्मणों, मैं (भोजन) खाकर निकल जाऊँगा।" ऐसा कहकर वह खोपड़ी को अपने सामने रखकर वहीं बैठ गया।

38-41. उनके उस कृत्य को देखकर भगवान (अर्थात् शिव) ने कुटिलता से कार्य किया। खोपड़ी को जमीन पर छोड़कर ब्राह्मणों की ओर देखते हुए उन्होंने कहा: "हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मैं स्नान के लिए (पवित्र स्थान) पुष्कर जा रहा हूं "। उनके द्वारा कहा जा रहा है 'जल्दी जाओ', भगवान चले गए; वह देवताओं को मूर्ख बनाकर उत्सुकता से आकाश में रहा। जब शिव स्नान के लिए पुष्कर गए थे, ब्रह्मा ने जल्द ही कहा: "जब यज्ञ सभा में खोपड़ी है तो यहां यज्ञ कैसे किया जा सकता है? खोपड़ी में गंदी चीजें हैं।”

42-48. सभा में एक ब्राह्मण ने कहा: "मैं खोपड़ी को फेंक दूंगा"। उस सदस्य (अर्थात उस ब्राह्मण) ने उसे अपने हाथ से उठाया और फेंक दिया। तभी वहां एक और खोपड़ी दिखाई दी; फिर से उठाया गया; इस प्रकार दूसरा, तीसरा...बीस...तीस...पचास...सौ...हजार...दस हजार (खोपड़ियां वहां दिखाई दीं)। सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणों को खोपड़ी का कोई अंत नहीं मिला। पुष्कर वन में पहुँचकर, और भगवान शिव को प्रणाम करके उन्होंने उन्हें वैदिक प्रार्थनाओं के साथ प्रस्तुत किया; और सब ने मिलकर उसे बहुत प्रसन्‍न किया। तब शिव स्वयं प्रसन्न हुए। तब शिव उनकी भक्ति के परिणामस्वरूप उनके सामने प्रकट हुए। तब उस देवता ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कहा, उनकी भक्ति के कारण विनम्र (उनके लिए): "खोपड़ी के बिना, पिसे हुए चावल से बना बलिदान और बर्तनों में चढ़ाया जाता है [3], तैयार नहीं किया जा सकता। हे ब्राह्मणों, जैसा मैं तुमसे कहता हूँ वैसा ही करो; (मेरे लिए रखें) एक अच्छी तरह से पेश किया गया हिस्सा। अगर ऐसा किया जाता है तो मेरे सभी निर्देशों का पालन किया जाएगा।"

49-50। ब्राह्मणों ने कहा: "ठीक है, हम आपके निर्देशों का पालन करेंगे"। भगवान ने अपने हाथ में खोपड़ी के साथ, महान पोते से कहा: "हे ब्रह्मा, वह वरदान मांगो जो तुम अपने दिल को प्रिय हो। हे प्रभु, मैं तुझे सब कुछ दूंगा। ऐसा कुछ भी नहीं है जो मैं नहीं दे सकता”।

51-60. ब्रह्मा ने कहा: "जैसा कि मुझे दीक्षित किया गया है, और मैं यहाँ यज्ञ सभा में बैठा हूँ, मैं आपसे कोई वरदान स्वीकार नहीं करूँगा । जो मुझे यहां मांगेगा, मैं वह सब दूंगा जो वह चाहता है।" इस प्रकार यज्ञ में बोलने वाले वरदानी पोते को "ठीक है" कहकर रुद्र ने उनसे वरदान मांगा। फिर, जब मनु- काल बीत गया, तो भगवान ने स्वयं (यज्ञ किया) उसी तरह। शंभु:ब्रह्मा (स्थान) के उत्तर में अपने लिए एक स्थान निर्धारित किया। वह, भगवान, जिसे चार वेदों का भी पूरा ज्ञान था, (उस समय) शहर को देखने गया था। (सुनकर) ब्राह्मणों की बात सुनकर वे जिज्ञासावश यज्ञ सभा में गए। उसी पागल पोशाक में ब्रह्मा के निवास (पहने) में प्रवेश करने वाले महेश्वर को सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणों ने देखा। कोई उस पर हंसा तो कोई उसकी निंदा कर रहा था। इसी प्रकार अन्य ब्राह्मणों ने पागल (शिव) पर धूल झोंक दी। अन्य शक्तिशाली ब्राह्मणों ने, अपनी शक्ति पर गर्व करते हुए, उनका उपहास किया, और अपने हाथों से (विभिन्न) चिन्ह बनाकर उन्हें मिट्टी और डंडों से पीटा। तो अन्य लड़कों ने भी (और) उसके पास (और) उसे अपने उलझे हुए बालों से पकड़कर उससे पूछा: “किसने तुम्हें यह मन्नत मानने का निर्देश दिया? यहाँ सुंदर स्त्रियाँ हैं; आप उनके लिए आए हैं। कौन सा उपदेशक,

61-74. ( शिव ने उत्तर दिया :) “मेरा जनक अंग ब्रह्मा का रूप है; और मेरा पुडेन्डम मुलिब्रे विष्णु है; यह बीज बोना है; नहीं तो दुनिया भुगतेगी। यह पुत्र मेरे द्वारा उत्‍पन्‍न हुआ, और उसी से मैं उत्‍पन्‍न हुआ; सृष्टि महादेव (अर्थात शिव) के लिए है; (मेरी) पत्नी हिमालय पर बनी है ; उमा रुद्र को दी गई थी; बताओ (मुझे) वह किसकी बेटी है। तुम मूर्खों, तुम नहीं जानते (यह); प्रभु यह आपको बोलें (अर्थात् समझाएं)। "(इस) पाठ्यक्रम का पालन ब्रह्मा द्वारा नहीं किया गया था, न ही यह विष्णु द्वारा दिखाया गया था; न ही यह ब्रह्मा के हत्यारे शिव द्वारा दिखाया गया था।" “कैसे (ऐसा है) आप भगवान की निंदा कर रहे हैं? आज आपको हमारे द्वारा मारा जाना चाहिए ”। हे राजा, शंकर:, इस प्रकार ब्राह्मणों द्वारा पीटा जा रहा है, मुस्कुराया और सभी ब्राह्मणों (वहां) से कहा: "हे ब्राह्मणों, क्या तुमने मुझे उस उन्मत्त व्यक्ति को नहीं पहचाना, जिसने अपना होश खो दिया है? आप सभी दयालु हैं और (मेरे साथ) मित्रता में बने रहे हैं।” सबसे अच्छा ब्राह्मण की चाल से स्तब्ध हाराएक ब्राह्मण का वेश धारण करके (अर्थात्) बोलना (अर्थात् देना) और हाथ, पैर, मुट्ठियों, डंडों और कोहनियों से वार करने वाले को, जिसने पागल का वेश धारण किया था, पीटा। इस प्रकार ब्राह्मणों से तंग आकर वह क्रोधित हो गया। तब उन्हें भगवान (अर्थात शिव द्वारा) शाप दिया गया था: "आप वेदों द्वारा त्याग दिए जाएंगे, आपके उलझे हुए बाल खड़े होंगे, बलिदान से गिरेंगे, दूसरों की पत्नियों का आनंद लेंगे, (वेश्याओं की कंपनी) में प्रसन्न होंगे और जुए में, तेरे माता-पिता त्याग दिए जाएंगे। पुत्र को माता-पिता का धन या ज्ञान नहीं मिलेगा और आप सभी को अपनी इंद्रियों से स्तब्ध होकर, और दूसरों के भोजन पर निर्भर होकर, रुद्र जैसी भिक्षा प्राप्त हो सकती है। ऐसा (ऐसे) व्यवहार करने वाले और धर्मपरायण होने के कारण, तुम मेरे नहीं हो; परन्तु जिन ब्राह्मणों ने मुझ पर दया की, उनके पास धन, पुत्र, दासी, दास और छोटे पशु होंगे।

75-93. इस तरह एक श्राप और वरदान देकर भगवान गायब हो गए। जब वह चला गया, तो ब्राह्मणों ने उसे भगवान शंकर मानकर उसकी तलाश करने की कोशिश की; लेकिन जब उन्होंने उसे नहीं पाया, तो वे स्वयंभू धार्मिक अनुष्ठानों से संपन्न होकर पुष्कर वन में आ गए। प्रमुख सरोवर में स्नान कर ब्राह्मणों ने रुद्र के सौ (नामों) का उच्चारण किया। प्रार्थना के बड़बड़ाने के अंत में, भगवान (अर्थात शिव) ने उनसे स्वर्गीय स्वर में बात की: "यहां तक ​​कि एक स्वतंत्र बातचीत में भी मैंने कभी झूठ नहीं कहा; तो कैसे (मैं ऐसा करूँगा) जब मैंने अपनी इंद्रियों पर अंकुश लगा लिया है? मैं तुम्हें फिर से सुख प्रदान करूंगा। वेद (अर्थात वैदिक ज्ञान) जो ब्राह्मण शांत, संयमी, मेरे प्रति समर्पित और मुझमें स्थिर (दिमाग) हैं, उनका धन और संतान नहीं छीनी जाएगी। उन (ब्राह्मणों) के लिए कुछ भी अशुभ नहीं है जो पवित्र अग्नि को बनाए रखने में लगे हुए हैं, जनार्दन को समर्पित हैं(अर्थात विष्णु), ब्रह्मा (और) सूर्य की पूजा करें - चमक का ढेर, और जिनके मन संतुलन में स्थिर हैं। ” ये बातें कहकर वह चुप हो गया। सभी (ब्राह्मण) महान देवता (अर्थात् शिव) से वरदान और कृपा प्राप्त करके (उस स्थान) जहां ब्रह्मा (रहने) गए थे। वे, ब्रह्मा को प्रसन्न करते हुए, उनके सामने बने रहे। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर उनसे कहा: "मुझसे भी एक वर चुन लो।" ब्रह्मा के इन वचनों से वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रसन्न हुए । (उन्होंने आपस में कहा:) "हे ब्राह्मणों, ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर हमें कौन सा वरदान मांगना चाहिए? आइए, इस वरदान के फलस्वरुप पवित्र अग्नि, वेदों, विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और संतानों से संबंधित (अर्थात) संसार की रक्षा करें। जब ब्राह्मण इस प्रकार (आपस में) बात कर रहे थे तो वे क्रोधित हो गए; "तुम कौन हो? यहाँ कौन प्रमुख हैं? हम यहां श्रेष्ठ हैं।" अन्य ब्राह्मणों ने कहा: "नहीं, (ऐसा नहीं है)।" ब्राह्मणों को जो वहां थे और क्रोध से भरे हुए थे, देखकर ब्रह्मा ने उनसे कहा: "चूंकि आप यज्ञ सभा से तीन समूहों में बने रहे, इसलिए, ब्राह्मण, आप में से एक समूह को बुलाया जाएगाअमूलिका ; जो तटस्थ रहे, वे उदासीन कहलाएंगे ; तीसरा समूह, हे ब्राह्मणों, उन लोगों में से होगा जिनके पास हथियार हैं और जिन्होंने खुद को तलवारों से लैस किया है और उन्हें कौशिकी कहा जाएगा । यह स्थान, इस प्रकार तीन तरीकों से (तीन समूहों द्वारा) कब्जा कर लिया गया है, पूरी तरह से आपका होगा। यहां की प्रजा (जीवित) बाहर से (अर्थात बाहरी लोगों द्वारा) 'संसार' कहलाएगी; विष्णु निश्चित रूप से इस अज्ञात स्थान की देखभाल करेंगे। मेरे द्वारा दिया गया यह स्थान सदा बना रहेगा और पूर्ण होगा।” ऐसा कहकर ब्रह्मा ने यज्ञ की समाप्ति का विचार किया। ये सभी ब्राह्मण जो (कुछ समय पहले) क्रोध और ईर्ष्या से भरे हुए थे, एक साथ मेहमानों को खिलाया और वैदिक अध्ययन में तल्लीन हो गए।

94-99। यह पुष्कर, जिसे ब्रह्म भी कहा जाता है, एक महान पवित्र स्थान है। उस पवित्र स्थान में रहने वाले शांत ब्राह्मणों के लिए ब्रह्मा की दुनिया में कुछ भी हासिल करना मुश्किल नहीं है। हे श्रेष्ठ राजा, बारह वर्षों के बाद अन्य पवित्र स्थानों पर होने वाली किसी वस्तु की पूर्ति केवल छह महीने के भीतर ही इन पवित्र स्थानों पर होती है, अर्थात। कोकामुख , कुरुक्षेत्र , नैमिष जहां ऋषियों की मण्डली है, वाराणसी , प्रभास , वैसे ही बदरीकाश्रम , और गंगाद्वार , प्रयाग , और उस बिंदु पर जहां गंगा समुद्र से मिलती है, रुद्रकोशी , विरुपा, इसलिए मित्रवण भी [४] ; (मनुष्य के उद्देश्य की पूर्ति के बारे में) इसमें कोई संदेह नहीं है कि आदमी धार्मिक अध्ययन के लिए इच्छुक है। पुष्कर सभी पवित्र स्थानों में सबसे बड़ा और सबसे अच्छा है; यह हमेशा पोते (यानी ब्रह्मा) को समर्पित सम्माननीय लोगों द्वारा सम्मानित किया जाता है।

100-118. इसके बाद मैं आपको ब्रह्मा के साथ (यानी सावित्री और ब्रह्मा के बीच) सावित्री के मजाक के कारण हुए महान विवाद के बारे में बताऊंगा ।

सावित्री के जाने के बाद, सभी देवियाँ वहाँ आईं। ख्याति से उत्पन्न भृगु की पुत्री , अर्थात। लक्ष्मी , (हमेशा) सफल, हमेशा (सावित्री) द्वारा आमंत्रित किया गया, जल्दी से वहाँ आ गया। बहुत गुणी मदीरा , योगनिद्रा (नींद और जागने के बीच की स्थिति) और समृद्धि की दाता ; श्री, कमल, भूति , कीर्ति और उच्च मन में रहने वाली श्रद्धा : पोषण और संतुष्टि देने वाली ये सभी देवीएँ (वहाँ) पहुँची थीं; सती , दक्ष की बेटी, शुभ पार्वतीया उमा, तीनों लोकों में सबसे सुंदर महिला, महिलाओं को सौभाग्य (विधवापन की अनुपस्थिति) दे रही है; सावित्री के शुभ निवास में जया और विजया , मधुचन्दा, अमरावती , सुप्रिया , जनकान्त (सब इकट्ठे हुए थे)। वे, जिन्होंने उत्तम वस्त्र और आभूषण धारण किए हुए थे, गौरी के साथ पहुंचे थे । (ऐसी स्त्रियाँ थीं) शकरा, पुलोमन की पुत्री, आकाशीय अप्सराओं के साथ; स्वाहा , स्वधा और धूमोर , एक सुंदर चेहरे की; यकी और राक्षसी और बहुत धनी गौरी; मनोजवा , वायु की पत्नी, औरसिद्धि , कुबेर की प्रिय (पत्नी) ; तो भी देवताओं की बेटियों और Dānava को -ladies प्रिय Danu वहाँ आया था। सात ऋषियों की महान सुंदर पत्नियाँ, [५] उसी तरह बहनें, बेटियाँ और विद्याधरियों की सेना ; Rākṣasīs , पितर और अन्य विश्व माताओं की बेटियों। सावित्री ने युवा विवाहित महिलाओं और बहुओं के साथ (बलिदान के स्थान पर) जाने की इच्छा की; इसी प्रकार अदिति के समान दक्ष की सभी बेटियाँ भीऔर अन्य आए थे। पवित्र महिला अर्थात। ब्रह्मा की पत्नी (सावित्री), उनके निवास के रूप में कमल होने के कारण, उनसे घिरी हुई थीं। कोई सुन्दर स्त्री हाथ में मिठाई लिये हुए थी, कोई फलों से भरी टोकरी लेकर ब्रह्मा के पास पहुंचा। इसी तरह अन्य लोग भीगे हुए अनाज की माप कर रहे हैं; इसी प्रकार एक सुन्दर स्त्री ने भी नाना प्रकार के अनार, सिट्रोन लिये हुए; दूसरे ने बाँस की टहनियाँ लीं, वैसे ही कमल, और केसर, जीरा-बीज, खजूर; दूसरे ने सारे नारियल ले लिए; (दूसरा) अंगूर (-रस) से भरा बर्तन लिया; इसी प्रकार अंगक का पौधा, विभिन्न प्रकार के कपूर-फूल और शुभ गुलाब सेब; इसी प्रकार किसी और ने अखरोट, हरड़ और सिट्रोन को भी लिया; एक सुंदर स्त्री ने पके बिल्व- फल और चपटे चावल लिए; किसी और ने कपास ले ली-बत्ती और केसरिया रंग का वस्त्र। सभी शुभ और सुन्दर स्त्रियाँ इन और अन्य वस्तुओं को टोकरियों में रख कर सावित्री के साथ वहाँ पहुँचीं।

119-120। सावित्री को वहाँ देखकर पुरन्दर डर गए; ब्रह्मा (भी) अपना चेहरा लटकाए हुए (सोचते हुए) वहीं रहे: 'वह (अब) मुझसे क्या कहेगी?' विष्णु और रुद्र शर्मिंदा थे, इसलिए अन्य सभी ब्राह्मण भी; सदस्य (यज्ञ सभा के) और अन्य देवता भयभीत थे।

121-122. संस, पोते, भतीजे, मामा, भाई, तो भी देवताओं नामित Ṛbhus और अन्य देवताओं के सभी सावित्री क्या कहेंगे (फिर) के रूप में शर्मिंदा रहे।

123-124। वहाँ जो बातें कर रहे थे, उनकी बातें सुनकर ग्वाले बेटियाँ ब्रह्मा के पास चुप रहीं। 'सबसे अच्छे रंग की महिला, हालांकि (मुख्य) पुजारी द्वारा बुलाई गई थी, वह नहीं आई; (इसलिए) इंद्र एक और चरवाहे लाए (और) विष्णु ने स्वयं उसे ब्रह्मा के सामने पेश किया।

125-129. वह बलिदान पर कैसे (व्यवहार) कर रही होगी? बलिदान कैसे पूरा होगा?' जब वे इस प्रकार सोच रहे थे, कमल में रहने वाले (ब्रह्मा की पत्नी) ने प्रवेश किया। ब्रह्मा उस समय सदस्यों (यज्ञ सभा के), पुजारियों और देवताओं से घिरे हुए थे। वेदों में महारत हासिल करने वाले ब्राह्मण अग्नि को अर्पण कर रहे थे। चरवाहे, कक्ष में शेष (बलि पत्नी के लिए) और एक हिरण के सींग और एक कमरबंद, और रेशमी कपड़ों में पहने हुए, सर्वोच्च स्थान पर ध्यान किया। वह अपने पति के प्रति वफादार थी, उसका पति उसका जीवन था; वह प्रमुखता से बैठी थी; वह सुंदरता से संपन्न थी; चमक में वह सूर्य के समान थी: उसने वहां की सभा को सूर्य के तेज के रूप में प्रकाशित किया।

130. याजकों ने बलि के जानवरों के धधकते हुए भाग की भी पूजा की।

१३१-१३६. बलि के समय कुछ अंश प्राप्त करने के इच्छुक देवताओं ने तब कहा: "(बलिदान) में देरी नहीं होनी चाहिए; (किसी कार्य के लिए) देर से किया गया, उसका (वांछित) फल नहीं देता है; यही वह नियम है जो वेदों में सभी विद्वानों द्वारा देखा जाता है।" जब दो दूध (-बर्तन) तैयार हो गए, तो भोजन संयुक्त रूप से पकाया गया, और जब ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया, अध्वर्युजिसे अर्पण किया गया था, वह वहाँ आया था, और प्रवरज्ञ वेदों में कुशल ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था; खाना बनाया जा रहा था। यह देखकर देवी (सावित्री) ने क्रोधित होकर ब्रह्मा से कहा, जो (यज्ञ) सत्र में चुपचाप बैठे थे: "यह क्या कुकर्म तुम करने वाले हो, कि वासना के द्वारा तुमने मुझे त्याग दिया और पाप किया है? वह, जिसे तुमने अपने सिर पर रखा है (अर्थात जिसे तुमने इतना महत्व दिया है) मेरे पैर की धूल से भी तुलनीय नहीं है। ऐसा (बलिदान) सभा में एकत्रित लोग कहते हैं। यदि तुम चाहो तो उन लोगों की उस आज्ञा का पालन करो जो (समान) देवता हैं।

137-141. सुंदरता के लिए अपनी लालसा के माध्यम से आपने वह किया है जिसकी लोगों द्वारा निंदा की जाती है; हे यहोवा, तू अपने पुत्रों और अपने पौत्रों से लज्जित नहीं हुआ; मुझे लगता है कि आपने यह निंदनीय कार्य जुनून के माध्यम से किया है; आप देवताओं के पोते और ऋषियों के परदादा हैं! अपने ही शरीर को देखकर आपको शर्म कैसे नहीं आई? आप लोगों के लिए हास्यास्पद हो गए हैं और मुझे नुकसान पहुंचाया है। अगर यह आपकी दृढ़ भावना है, तो हे भगवान, (अकेले) जियो; आपको नमस्कार (अलविदा); मैं अपने दोस्तों को अपना चेहरा कैसे दिखाऊंगा? मैं लोगों को कैसे बताऊं कि मेरे पति ने (एक और महिला को) अपनी पत्नी के रूप में लिया है?”

ब्रह्मा ने कहा :

१४२-१४४. दीक्षा के तुरंत बाद, पुजारियों ने मुझसे कहा: पत्नी के बिना बलिदान नहीं किया जा सकता है; अपनी पत्नी को जल्दी लाओ। यह (अन्य) पत्नी इंद्र द्वारा लाई गई थी, और मुझे विष्णु द्वारा प्रस्तुत की गई थी; (तो) मैंने उसे स्वीकार कर लिया; हे सुंदर भौहें, मैंने जो किया है उसके लिए मुझे क्षमा करें। हे अच्छी मन्नत के, मैं तुम्हें इस तरह फिर से गलत नहीं करूंगा। मुझे क्षमा कर, जो तेरे चरणों में गिरे हैं; आपको मेरा नमस्कार।

पुलस्त्य ने कहा :

इस प्रकार संबोधित करते हुए, वह क्रोधित हो गई, और ब्रह्मा को श्राप देने लगी:

145-148। "यदि मैंने तपस्या की है, यदि मैंने ब्राह्मणों के समूहों में अपने गुरुओं को प्रसन्न किया है, और विभिन्न स्थानों पर, ब्राह्मण आपकी पूजा कभी नहीं करेंगे, सिवाय आपकी वार्षिक पूजा (जो गिरती है) कार्तिक के महीने में जो ब्राह्मण करेंगे (अकेले) ) बलि चढ़ाएं, परन्तु अन्य मनुष्यों को पृथ्वी पर किसी अन्य स्थान पर न चढ़ाएं।" ब्रह्मा को ये शब्द कहते हुए, उसने इंद्र से कहा जो पास में था: "हे शंकर , तुम ग्वाले को ब्रह्मा के पास ले आए। चूंकि यह एक तुच्छ कर्म था, इसलिए आपको इसका फल प्राप्त होगा।

१४९. जब आप युद्ध में (लड़ाई के लिए तैयार) खड़े होंगे, तो आप अपने दुश्मनों से बंधे होंगे और बहुत (दयनीय) दुर्दशा में कम हो जाएंगे।

१५०. बिना किसी संपत्ति के, अपनी ऊर्जा खोकर, एक बड़ी हार का सामना करने के बाद, आप अपने दुश्मन के शहर में रहेंगे, (लेकिन) जल्द ही रिहा हो जाएंगे।"

१५१-१५३. इंद्र को श्राप देकर (इस प्रकार) देवी ने विष्णु से (ये शब्द) बोले: "जब, भृगु के श्राप के कारण आप नश्वर संसार में जन्म लेंगे, तो आप वहां (अर्थात उस अस्तित्व में) अलगाव के दर्द का अनुभव करेंगे। अपनी पत्नी से। तेरी पत्नी को तेरा शत्रु समुद्र के पार ले जाएगा; तुम शोक से व्याकुल मन से नहीं जानोगे (वह किसके द्वारा ली गई है) और बड़ी विपत्ति के बाद तुम अपने भाई के साथ दुखी होओगे।

154-156. जब आप यदु- परिवार में जन्म लेंगे , तो आपका नाम कृष्ण होगा ; और पशुओं का सेवक होकर बहुत दिन तक भटकता रहेगा।” तब क्रोधित व्यक्ति ने रुद्र से कहा: "जब तुम दारुवन में रहोगे , तब, हे रुद्र, क्रोधित ऋषि तुम्हें शाप देंगे; हे खोपड़ी-धारक, मतलब एक, आप हमारे बीच से एक महिला को छीनना चाहते हैं; इसलिए, तुम्हारा यह अहंकारी उत्पादक अंग आज जमीन पर गिरेगा।

157-160। पुरुषार्थ से रहित आप ऋषियों के श्राप से ग्रसित होंगे। गंगाद्वार में रहने वाली आपकी पत्नी आपको सांत्वना देगी।" "हे अग्नि , आप पहले मेरे पुत्र भागु द्वारा सर्व-उपभोक्ता बनाए गए थे, हमेशा धर्मी। मैं (तुम्हें) कैसे जलाऊँ जो पहले ही उससे जल चुके हैं? हे अग्नि, कि रुद्र आपको अपने वीर्य से डुबो देगा, और आपकी जीभ (यानी आपकी लौ) बलिदान के लिए उपयुक्त चीजों का उपभोग करते समय अधिक जलेगी। ” सावित्री ने उन सभी ब्राह्मणों और पुजारियों को शाप दिया, जो अपने पति को लूटने के लिए बलि के पुजारी बन गए थे, और जो बिना किसी कारण के जंगल में चले गए थे:

१६१. “केवल लोभ के द्वारा सभी पवित्र और पवित्र स्थानों का सहारा लें; आप हमेशा दूसरों के भोजन से ही संतुष्ट होंगे (जब आप प्राप्त करेंगे); परन्तु अपने घरों में भोजन से तृप्त नहीं होगा।

१६२-१६४. जो बलिदान नहीं करना है उसका त्याग करके और जो तिरस्कारपूर्ण है उसे स्वीकार करके, धन अर्जित करके और इसे व्यर्थ खर्च कर-उससे (आपके) शवों को बिना अनुष्ठान के (उन्हें अर्पित किया जा रहा) केवल दिवंगत आत्माएं होंगी। ” इस प्रकार उस क्रोधित (सावित्री) ने इन्द्र को, इसी प्रकार विष्णु, रुद्र, अग्नि, ब्रह्मा तथा समस्त ब्राह्मणों को भी श्राप दिया।

१६५-१६६. इस प्रकार उन्हें श्राप देकर वह (बलिदान) सभा से बाहर चली गई। प्रमुख पुष्कर में पहुँचकर, वह (वहाँ) बस गई। उसने लक्ष्मी से कहा जो हँस रही थी और इंद्र की सुंदर पत्नी और युवा महिलाओं से भी (वहां): "मैं वहां जाऊंगी जहां मुझे कोई आवाज नहीं सुनाई देगी।"

167. तब वे सभी महिलाएं अपने-अपने घर चली गईं। सावित्री, जो क्रोधित थीं, उन्हें भी श्राप देने लगीं।

168. "चूंकि इन दिव्य महिलाओं मुझे छोड़ दिया और चले गए हैं, मैं, जो अत्यंत नाराज़ हूँ, शाल मैं उन्हें भी अभिशाप:

169-171. लक्ष्मी कभी एक स्थान पर नहीं रहती। वह क्षुद्र और चंचल है, वह मूर्खों के बीच, बर्बरों और पर्वतारोहियों के बीच, मूर्खों और अभिमानियों के बीच रहेगी; उसी प्रकार (मेरे) श्राप के कारण, तुम (अर्थात् लक्ष्मी) शापित और दुष्टों जैसे नीच व्यक्तियों के साथ रहोगी।”

१७२-१७४. इस प्रकार (लक्ष्मी करने के लिए) एक अभिशाप दिया करने के बाद, वह शापित इंद्राणी : "जब इंद्र, अपने पति, द्वारा (का पाप) उत्पीड़ित एक ब्राह्मण के हत्या, दुखी हो जाएगा, और जब उसके राज्य से छीन लिया हो जाएगा Nahuṣa , वह करेगा , तुम्हें देखकर, तुम्हारे लिए पूछो। (वह कहेगा) 'मैं इन्द्र हूँ; यह कैसे हो गया कि यह बचकानी (महिला) मेरी प्रतीक्षा नहीं करती है? यदि मुझे शचि (अर्थात् इंद्रा) प्राप्त नहीं हुई तो मैं सभी देवताओं को मार डालूंगा। तब तू जिसे भागना होगा, और भयभीत और शोकित होगा , मेरे शाप के परिणामस्वरूप, हे दुष्ट आचरण और अभिमानी (एक) बृहस्पति के घर में रहेगा ।

175-1 78. तब उसने देवताओं की सभी पत्नियों पर एक शाप दिया: "इन सभी (महिलाओं) को बच्चों से स्नेह नहीं मिलेगा; वे दिन-रात (दु:ख के साथ) झुलसे रहेंगे और उनका अपमान किया जाएगा और उन्हें 'बंजर' कहा जाएगा।" उत्तम वर्ण की गौरी को भी सावित्री ने श्राप दिया था। वह, जो रो रही थी, विष्णु ने देखा और उसने उसे तसल्ली दी: "हे बड़ी आँखों वाले, रो मत; तुम सदा शुभ हो, (कृपया) चलो; (बलिदान) सभा में प्रवेश करना, अपनी कमरबंद और रेशमी वस्त्र सौंपना; हे ब्रह्मा की पत्नी, दीक्षा ग्रहण करो, मैं तुम्हारे चरणों को प्रणाम करता हूँ।"

179. इस प्रकार उस ने उस से कहा, मैं जैसा तू कहेगा वैसा ही करूंगा; और मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ मुझे कोई आवाज़ न सुनाई देगी।”

180-215। इतना कहकर वह उस स्थान से चली गई और एक पर्वत पर चढ़कर वहीं रही। बड़ी भक्ति के साथ उसके सामने रहकर, विष्णु ने हाथ जोड़कर और झुककर उसकी स्तुति की।

सावित्री के १०८ नाम देखें ]

२१६-२१९. सावित्री ने एक अच्छे व्रत के रूप में, विष्णु से कहा, जो उसकी प्रशंसा कर रहे थे: "बेटा, तुमने मेरी प्रशंसा की है; आप अजेय होंगे; अपने लहंगे में तू अपक्की पत्नी के संग रहेगा, जो अपके पिता और माता को प्रिय है; और वह, जो यहां आकर इस स्तुति से मेरी स्तुति करता है, सब पापों से मुक्त होकर सर्वोच्च स्थान पर जाएगा। हे पुत्र, ब्रह्मा के यज्ञ में जाओ और उसे पूरा करो । कुरुक्षेत्र और प्रयाग में, मैं भोजन का दाता होऊंगा; और मेरे पति के पास रहकर वही करो जो तू ने कहा है।”

220. विष्णु, इस प्रकार संबोधित करते हुए, ब्रह्मा की उत्कृष्ट (यज्ञ) सभा में गए। जब सावित्री चली गई। गायत्री ने (ये) शब्द कहे:

२२१. “ऋषि मेरे पति की उपस्थिति में कहे गए मेरे शब्दों को सुनें- मैं जो कुछ भी प्रसन्न और वरदान देने के लिए तैयार हूं, वह कहो।

222-223। (वे) पुरुष (जो), भक्ति से संपन्न, ब्रह्मा की पूजा करते हैं, उनके पास वस्त्र, अनाज, पत्नियां, सुख और धन होगा; इसी तरह (उनके पास) उनके घर में अखंड सुख और (उनके) बेटे और पोते होंगे। लंबे समय तक (खुशी) भोगने के बाद, वे अंत में (अपने जीवन के) मोक्ष को प्राप्त करेंगे। ”

पुलस्त्य ने कहा :

२२४-२२५. एकाग्र मन से, स्थापित होने के बाद प्राप्त होने वाले फल को, पूरी सावधानी के साथ और पवित्र नियम (ब्रह्मा की छवि) के अनुसार सुनो। इस स्थापना से मनुष्य को वह फल प्राप्त होता है, जो समस्त यज्ञों, तप, दान, पवित्र स्थानों और वेदों के फल से करोड़ गुना श्रेष्ठ है।

226-227. हे राजा, वह व्यक्ति, जो पूर्णिमा के दिन भक्ति के साथ उपवास करता है और पहले दिन (यानी पूर्णिमा के दिन के बाद का दिन) ब्रह्मा की पूजा करता है, हे महान-सशस्त्र (अर्थात शक्तिशाली) उस स्थान पर जाता है ब्राह्मण ; और जो पुजारियों के माध्यम से उसकी पूजा करता है वह विशेष रूप से विरिंची (या) वासुदेव (यानी आत्माओं के स्वामी) के पास जाता है।

228-239। कार्तिक मास में निर्धारित है भगवान का रथ-जुलूस; करना (अर्थात लेना) जो भक्ति के साथ मनुष्य ब्रह्मा की दुनिया में पहुँचते हैं। कार्तिक की पूर्णिमा के दिन, सावित्री के साथ, सड़क के किनारे, कई संगीत वाद्ययंत्रों के साथ, ब्रह्मा का जुलूस निकालना चाहिए, हे श्रेष्ठ राजा। उसे पूरे शहर में लोगों (यानी नागरिकों) के साथ (यानी ब्रह्मा की छवि को जुलूस में निकालना) चाहिए। फिर इस प्रकार बारात निकालकर उसे स्नान कराना चाहिए। ब्राह्मणों को खाना खिलाकर और पहले अग्नि की पूजा करने के बाद, उन्हें शुभ संगीत वाद्ययंत्रों की आवाज़ के साथ रथ में भगवान की छवि रखनी चाहिए। रथ के सामने, पवित्र नियम के अनुसार, अग्नि की पूजा की, और ब्राह्मणों के आशीर्वाद का आह्वान किया, और 'यह एक शुभ दिन है' को तीन बार दोहराते हुए, और भगवान की (छवि) को रथ में रखते हुए, वह रात में कई शो और वेदों की ध्वनि (पाठ) के माध्यम से जागते रहना चाहिए। हे राजा, भगवान को जगाकर, और सुबह में, ब्राह्मणों को उनकी क्षमता के अनुसार कई प्रकार के भोजन के साथ खिलाया, और, हे राजा, पूजा करके, पवित्र सूत्र के पाठ और स्पष्ट मक्खन के साथ और दूध, और पवित्र नियमों के अनुसार; इसलिए भी, पवित्र नियम के अनुसार, ब्राह्मणों के आशीर्वाद का आह्वान किया, और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उन्हें शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (यानी जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वारा ब्राह्मणों को उनकी क्षमता के अनुसार कई प्रकार के भोजन के साथ खिलाया, और, हे राजा, पूजा करके, पवित्र सूत्र के पाठ के साथ, और स्पष्ट मक्खन और दूध के साथ, और पवित्र नियमों के अनुसार; इसलिए भी, पवित्र नियम के अनुसार, ब्राह्मणों के आशीर्वाद का आह्वान किया, और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उन्हें शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (यानी जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वारा ब्राह्मणों को उनकी क्षमता के अनुसार कई प्रकार के भोजन के साथ खिलाया, और, हे राजा, पूजा करके, पवित्र सूत्र के पाठ के साथ, और स्पष्ट मक्खन और दूध के साथ, और पवित्र नियमों के अनुसार; इसलिए भी, पवित्र नियम के अनुसार, ब्राह्मणों के आशीर्वाद का आह्वान किया, और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उन्हें शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (यानी जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वारा और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उसे शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (अर्थात जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वारा और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उसे शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (अर्थात जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वाराअथर्ववेद , जिसमें (अर्थात जानने) कई श्लोक हैं और पुजारियों द्वारा - सामवेद के जाप । उसे इस प्रकार शहर के चारों ओर सर्वोच्च देवता के रथ को एक समान मार्ग पर ले जाना चाहिए। हे वीर, अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले शूद्र द्वारा रथ को नहीं हिलाना है ; और कोई ज्ञानी नहीं, वरन भोजक रथ पर चढ़ेगा ।

240-253। हे राजा, वह सावित्री को ब्रह्मा के दाहिनी ओर, भोजक को अपनी बाईं ओर और कमल को अपने सामने रखें। इस प्रकार हे वीर, तुरही और शंख की कई आवाजों के साथ, बुद्धिमान व्यक्ति को, पूरे शहर के चारों ओर रथ को घुमाने के बाद, पूजा के कार्य के रूप में रोशनी लहराते हुए (भगवान की छवि) को उचित स्थान पर रखना चाहिए। वह, जो इस तरह की बारात निकालता है, या जो इसे भक्ति के साथ देखता है या जो रथ को खींचता है, वह ब्रह्मा के स्थान पर जाता है। जो कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ब्रह्मा के हॉल (अर्थात् मंदिर) में प्रकाश करता है और पहले दिन (कार्तिक के) चन्दन, फूल और नए वस्त्रों से स्वयं को प्रणाम करता है, वह ब्रह्मा के स्थान पर पहुंच जाता है। यह एक बहुत ही पवित्र दिन है, जिस पर बाली के [6]राज्य की स्थापना की थी। यह दिन हमेशा ब्रह्मा को बहुत प्रिय होता है। इसे बाली कहा जाता है । जो इस दिन ब्रह्मा की और विशेष रूप से स्वयं की पूजा करता है, वह असीमित तेज के विष्णु के उच्चतम स्थान को जाता है। हे शक्तिशाली भुजाओं वाले, चैत्र का पहला दिन शुभ और उत्तम है। वह, सबसे अच्छा आदमी, जो इस दिन, एक चांडल को छूता है और स्नान करता है, उसे कोई पाप नहीं है, कोई मानसिक पीड़ा या शारीरिक रोग नहीं हैं; इसलिए स्नान करना चाहिए (इस दिन) या यह एक मूर्ति के सामने रोशनी की दिव्य तरंग है, जो सभी रोगों को नष्ट कर देती है। हे राजा, वह सभी गायों और भैंसों को निकाल दे; फिर (घर) के बाहर उसे सभी वस्त्रों आदि के साथ एक धनुषाकार द्वार बनाना चाहिए। इसी तरह, हे कुरु के पालनकर्ता-परिवार, उसे ब्राह्मणों को भोजन देना चाहिए । हे कुरु-परिवार के वंशज, मैंने पहले कार्तिक, शिव और चैत्र के महीनों में इन तीन दिनों के बारे में बताया है , हे राजा; स्नान, उपहार देना (इन दिनों) (देना) सौ गुना पुण्य। हे राजा, कार्तिक का (पहला) दिन राजा बलि के लिए शुभ है, और पशुओं के लिए फायदेमंद है!

गायत्री ने कहा :

254-255. हे कमल से उत्पन्न, (यद्यपि) सावित्री ने कहा कि ब्राह्मण कभी भी तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, (फिर भी) मेरे वचनों को सुनकर वे तुम्हारी पूजा करेंगे; यहाँ (अर्थात् इस संसार में) भोगों को भोगकर वे परलोक में मोक्ष प्राप्त करेंगे। इसे श्रेष्ठ दृष्टि (-बिंदु) जानकर वह प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देगा।

256. हे इंद्र, मैं तुम्हें एक वरदान दूंगा: जब तुम अपने शत्रुओं द्वारा गिरफ्तार किए जाओगे, तो ब्रह्मा, शत्रु के धाम में जाकर तुम्हें मुक्त कर देंगे।

257. अपने शत्रु के विनाश के कारण, आपको बहुत खुशी होगी और आपको अपना (राजधानी-) शहर वापस मिल जाएगा जो (आपने) खो दिया था। तीनों लोकों में तुम्हारा बिना किसी कष्ट के एक महान राज्य होगा।

२५८-२५९. हे विष्णु, जब आप पृथ्वी पर अवतार लेंगे, तो आप अपने भाई के साथ, अपनी पत्नी के अपहरण आदि के कारण बहुत दुःख का अनुभव करेंगे। आप अपने शत्रु को मारकर अपनी पत्नी को देवताओं की उपस्थिति में बचाएंगे। उसे स्वीकार करने और राज्य पर फिर से शासन करने के बाद, तुम स्वर्ग में जाओगे।

२६०. आप ग्यारह हजार साल के लिए (शासन) करेंगे और (तब) स्वर्ग में जाएंगे। आप दुनिया में बहुत प्रसिद्धि का आनंद लेंगे, और लोगों से प्यार करेंगे।

२६१. हे भगवान, जो लोग राम के रूप (अर्थात अवतार) में आपके द्वारा मुक्ति प्राप्त करेंगे, उनके पास संतनिका नामक प्रसिद्ध लोक होंगे (अर्थात जाएंगे) ।

262-265. तब वरदान देने वाली गायत्री ने रुद्र से कहा: "वे पुरुष, जो आपके जननांग अंग (फालुस के रूप में) की पूजा करेंगे, भले ही वह गिर गया हो, शुद्ध होकर और पुण्य अर्जित करके, स्वर्ग (यानी आनंद) का हिस्सा होगा। आपके जनन अंग की उपासना करने से पुरुष जो अवस्था प्राप्त करते हैं, वह (अर्थात्) पवित्र अग्नि को धारण करने या उसमें हवन करने में नहीं हो सकती। जो लोग सुबह-सुबह बिल्व-पत्र से आपके जननांग (फल्लस के रूप में) की पूजा करेंगे, वे रुद्र की दुनिया का आनंद लेंगे। ”

266-267। "हे अग्नि, तुम भी शिवभक्त का दर्जा पाकर शोधक बनो। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब आप प्रसन्न होते हैं तो देवता प्रसन्न होते हैं। प्रसाद देवताओं द्वारा आपके (केवल) द्वारा प्राप्त किया जाता है। निश्चय ही जब तुम प्रसन्न होगे, तो वे प्रसन्न होकर (प्रसाद) भोगेंगे; इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि वैदिक कथन ऐसा ही है।"

तब गायत्री ने उन सभी ब्राह्मणों से ये शब्द कहे :

268-284। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सभी पवित्र स्थानों पर आपको प्रसन्न करने वाले पुरुष वैराज नामक स्थान पर जाएंगे(अर्थात् ब्रह्मा)। विभिन्न प्रकार के भोजन और कई उपहार देने के बाद, और (मनुष्यों को) प्रसन्न करके वे देवताओं के देवता बन जाते हैं। देवता तुरंत प्रसाद का आनंद लेते हैं और पुरुष तुरंत (अर्थात) उन लोगों के मुंह में (अर्थात) प्रसाद का आनंद लेते हैं, जो सबसे अच्छे ब्राह्मण हैं, क्योंकि आप अकेले ही तीनों लोकों को बनाए रखने में सक्षम हैं - इसमें कोई संदेह नहीं है। श्वास के संयम से तुम सब शुद्ध हो जाओगे; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, विशेष रूप से पुष्कर में स्नान करने और वेदों की माता (अर्थात् गायत्री) का बखान (नाम) करने के बाद उपहार प्राप्त करने के लिए आपको पाप नहीं लगेगा। पुष्कर में भोजन (ब्राह्मणों को) अर्पित करने से सभी देवता प्रसन्न होते हैं। यदि (मनुष्य) एक ब्राह्मण को खिलाता है, तो भी उसे एक करोड़ का फल मिलता है। पुरुष (नाश) उनके सभी पापों जैसे कि एक ब्राह्मण की हत्या और उनके द्वारा किए गए अन्य बुरे कर्मों को एक ब्राह्मण के हाथ में पैसा देकर। मेरे सम्मान में बड़बड़ाने के लिए प्रार्थनाओं का उपयोग करके उनकी तीन बार पूजा की जानी है। उस क्षण (सम) ब्राह्मण की हत्या जैसा पाप नष्ट हो जाता है। गायत्री दस अस्तित्वों (या) के दौरान किए गए पापों को एक हजार अस्तित्वों और तीन युगों के हजार समूहों के दौरान भी नष्ट कर देती है। इस प्रकार मेरे सम्मान में प्रार्थनाओं को जानकर और गुनगुनाते हुए आप हमेशा के लिए शुद्ध हो जाएंगे। इसमें कोई संदेह या कोई झिझक नहीं है। सिर झुकाकर, (मेरी) प्रार्थना विशेष रूप से तीन अक्षरों वाले 'm' के उच्चारण के साथ, आप निस्संदेह शुद्ध हो जाएंगे। मैं (गायत्री मीटर के) आठ अक्षरों में रहा हूं। यह संसार मुझमें व्याप्त है। सभी शब्दों से सुशोभित मैं वेदों की जननी हूँ। श्रेष्ठ ब्राह्मण भक्ति से मेरा नाम जपने से सफलता प्राप्त करेंगे। मेरे नाम का जप करने से आप सभी की महिमा होगी। एक अच्छी तरह से नियंत्रित ब्राह्मण जिसमें गायत्री का सार होता है, वह चार वेदों को जानने, सब कुछ खाने और सभी चीजों को बेचने से बेहतर है। चूँकि सभा में सावित्री ने ब्राह्मणों को श्राप दिया था, यहाँ जो कुछ भी दिया या चढ़ाया जाता है, वह सब अटूट हो जाता है। इसलिए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मैंने (यह) वरदान दिया है । जो ब्राह्मण पवित्र अग्नि के रखरखाव के लिए समर्पित हैं और तीन बार (अर्थात सुबह, दोपहर और शाम) यज्ञ करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियों के साथ स्वर्ग में जाएंगे। एक अच्छी तरह से नियंत्रित ब्राह्मण जिसमें गायत्री का सार होता है, वह चार वेदों को जानने, सब कुछ खाने और सभी चीजों को बेचने से बेहतर है। चूँकि सभा में सावित्री ने ब्राह्मणों को श्राप दिया था, यहाँ जो कुछ भी दिया या चढ़ाया जाता है, वह सब अटूट हो जाता है। इसलिए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मैंने (यह) वरदान दिया है । जो ब्राह्मण पवित्र अग्नि के रखरखाव के लिए समर्पित हैं और तीन बार (अर्थात सुबह, दोपहर और शाम) यज्ञ करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियों के साथ स्वर्ग में जाएंगे। एक अच्छी तरह से नियंत्रित ब्राह्मण जिसमें गायत्री का सार होता है, वह चार वेदों को जानने, सब कुछ खाने और सभी चीजों को बेचने से बेहतर है। चूँकि सभा में सावित्री ने ब्राह्मणों को श्राप दिया था, यहाँ जो कुछ भी दिया या चढ़ाया जाता है, वह सब अटूट हो जाता है। इसलिए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मैंने (यह) वरदान दिया है । जो ब्राह्मण पवित्र अग्नि के रखरखाव के लिए समर्पित हैं और तीन बार (अर्थात सुबह, दोपहर और शाम) यज्ञ करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियों के साथ स्वर्ग में जाएंगे।

२८५-२९३. इस प्रकार पुष्कर में इंद्र, विष्णु, रुद्र, अग्नि, ब्रह्मा और ब्राह्मणों को एक उत्कृष्ट वरदान देकर, गायत्री ब्रह्मा के पक्ष में रही। तब गणों ने लक्ष्मी को श्राप का कारण बताया। ब्रह्मा की प्यारी पत्नी गायत्री ने इन सभी युवतियों और लक्ष्मी को दिए गए कई शापों के बारे में जानकर उन्हें वरदान दिया: "सभी को हमेशा प्रशंसनीय बनाना, और धन से आकर्षक दिखना, आप सभी को प्रसन्न करते हैं , चमक जाएगा। हे पुत्री, जिस पर भी तुम दृष्टि करोगे, वह सब (अर्थात् है) धार्मिक पुण्य का भागी होगा; परन्तु तुम्हारे द्वारा छोड़े गए वे सब दु:ख का अनुभव करेंगे। वे अकेले (जिन पर आप कृपा करते हैं) (अर्थात उच्च में पैदा होंगे) जाति और (कुलीन) परिवार, (होगा) धार्मिकता, हे आकर्षक चेहरे वाले। वे अकेले ही सभा में चमकेंगे और (वे अकेले) राजाओं द्वारा देखे जाएंगे। श्रेष्ठ ब्राह्मण केवल उन्हीं की याचना करेंगे, और केवल उनके प्रति विनम्र होंगे। 'आप हमारे भाई, पिता, गुरु और रिश्तेदार भी हैं। इसमें तो कोई शक ही नहीं है। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। जब मैं तुम्हें देखता हूं तो मेरी दृष्टि स्पष्ट और सुंदर हो जाती है; मेरा मन बहुत प्रसन्न है, मैं तुम्हें सच और सच ही बता रहा हूँ'। ऐसे शब्द लोगों को प्रसन्न करते हैं, क्या वे, अच्छे लोग, जिन्हें आप ने देखा है, सुनेंगे।

294-299। नहुष, इन्द्रपद प्राप्त करके आपसे विनती करेगा। पापी, अगस्त्य के शब्दों के माध्यम से , आपके द्वारा, एक सर्प में परिवर्तित होने के बाद, उससे अनुरोध करेगा: 'हे ऋषि, मैं अभिमान के माध्यम से बर्बाद हो गया हूं; मेरी शरण बनो (यानी मेरी मदद करो)'। तब श्रद्धेय ऋषि, उनके (अर्थात् नहुष) के इन शब्दों से उनके हृदय में दया करते हुए, उनसे ये शब्द कहेंगे: 'एक राजा, आपके परिवार का सम्मान, आपके परिवार में पैदा होगा। आपको (अर्थात्) नाग के रूप में देखकर वह आपके श्राप को तोड़ देगा। तब तुम अपने नाग के राज्य को त्याग कर फिर से स्वर्ग में जाओगे'। हे सुन्दर नेत्रों वाले, मेरे वरदान के फलस्वरुप तुम फिर अपने पति के साथ स्वर्ग को प्राप्त होगे, जिसने अश्व-यज्ञ किया होगा।

पुलस्त्य बोला :

300-302। तब (गायत्री) ने देवताओं की सभी पत्नियों को संबोधित किया, जो प्रसन्न हुई: "भले ही आपके कोई संतान न होगी, आप दुखी नहीं होंगे"। तब गायत्री खुशी से बढ़ी, गौरी को भी सलाह दी। ब्रह्मा की उच्च मन की प्रिय पत्नी ने वरदान देकर यज्ञ की सिद्धि की कामना की। रुद्र ने उस प्रकार वरदान देने वाली गायत्री को देखकर उसे प्रणाम किया और इन शब्दों से उसकी स्तुति की:

रुद्र ने कहा :

303-317. वेदों की माता, और आठ अक्षरों से शुद्ध, आपको मेरा नमस्कार। आप गायत्री हैं, जो लोगों को कठिनाइयों को पार करने में मदद करती हैं, और सात प्रकार की वाणी [7], स्तुति से युक्त सभी ग्रंथ, इसलिए सभी छंद, समान रूप से सभी अक्षर और संकेत, सभी ग्रंथ जैसे ग्लॉस, इसलिए सभी उपदेश, और सभी अक्षर। हे देवी, आपको मेरा नमस्कार। तुम गोरे और गोरे रूप के हो, और तुम्हारा मुख चन्द्रमा के समान है। आपके पास बड़े-बड़े बाहें हैं, जो केले-पेड़ों के अंदरूनी हिस्सों की तरह नाजुक हैं; तुम अपने हाथ में एक हिरण का सींग और एक अत्यंत स्वच्छ कमल धारण करते हो; तू ने रेशमी वस्त्र पहिन लिए हैं, और ऊपर का वस्त्र लाल है। आप हार से सुशोभित हैं, जो आपके गले में चंद्रमा की किरणों की तरह चमकीला है। आप दिव्य झुमके वाले कानों से सुशोभित हैं। आप चंद्रमा के साथ प्रतिद्वंद्विता वाले चेहरे से चमकते हैं। आप बेहद शुद्ध मुकुट वाले हेयर-बैंड के साथ आकर्षक लगते हैं। नागों के फनों के समान तुम्हारी भुजाएँ स्वर्ग को सुशोभित करती हैं। आपके आकर्षक और गोलाकार स्तनों के निप्पल भी समान हैं। पेट पर ट्रिपल गुना अत्यंत निष्पक्ष कूल्हों और कमर के साथ विभाजन पर गर्व करता है। आपकी नाभि गोलाकार, गहरी है और शुभता का संकेत देती है। आपके पास विशाल कूल्हे और कमर और आकर्षक नितंब हैं; तुम्हारी दो जांघें बहुत सुंदर और गोल हैं; आपके घुटने और पैर अच्छे हैं। आप जैसे हैं, आप तीनों लोकों को धारण करते हैं, और आपसे अनुरोध सत्य हैं (अर्थात निश्चित रूप से कृपालु हैं)। आप बहुत भाग्यशाली, वरदान देने वाले और उत्तम वर्ण के होंगे। पुष्कर की यात्रा आपको देखकर फलदायी होगी। महीने की पूर्णिमा के दिन आपको पहली आराधना मिलेगी तुम्हारी दो जांघें बहुत सुंदर और गोल हैं; आपके घुटने और पैर अच्छे हैं। आप जैसे हैं, आप तीनों लोकों को धारण करते हैं, और आपसे अनुरोध सत्य हैं (अर्थात निश्चित रूप से कृपालु हैं)। आप बहुत भाग्यशाली, वरदान देने वाले और उत्तम वर्ण के होंगे। पुष्कर की यात्रा आपको देखकर फलदायी होगी। महीने की पूर्णिमा के दिन आपको पहली आराधना मिलेगी तुम्हारी दो जांघें बहुत सुंदर और गोल हैं; आपके घुटने और पैर अच्छे हैं। आप जैसे हैं, आप तीनों लोकों को धारण करते हैं, और आपसे अनुरोध सत्य हैं (अर्थात निश्चित रूप से कृपालु हैं)। आप बहुत भाग्यशाली, वरदान देने वाले और उत्तम वर्ण के होंगे। पुष्कर की यात्रा आपको देखकर फलदायी होगी। महीने की पूर्णिमा के दिन आपको पहली आराधना मिलेगीज्येषा ; और जो लोग तेरे पराक्रम को जानकर तेरी उपासना करेंगे, उन्हें पुत्रों और धन की कुछ घटी न होगी। आप उन लोगों के लिए सर्वोच्च सहारा हैं जो एक जंगल में या एक महान समुद्र में डूबे हुए हैं; या जिन्हें डाकुओं ने पकड़ रखा है। आप ही सफलता, धन, साहस, कीर्ति, लज्जा का भाव, विद्या, शुभ नमस्कार, बुद्धि, गोधूलि, प्रकाश, निद्रा और संसार के अंत में विनाश की रात भी हैं। आप अम्बा , कमला , माता, ब्राह्मण और दुर्गा हैं ।

318-331। आप सभी देवताओं की माता, गायत्री और एक उत्कृष्ट महिला हैं। आप जया, विजया (अर्थात दुर्गा), और पूणी (पोषण) और तुशी हैं(संतुष्टि), क्षमा और दया। आप सावित्री से छोटे हैं और हमेशा ब्रह्मा के प्रिय रहेंगे । तुम्हारे अनेक रूप हैं, एक सार्वभौम रूप; आपकी आकर्षक आंखें हैं और आप ब्रह्मा के साथ चलते हैं; आप सुंदर रूप के हैं, आपकी आंखें बड़ी हैं और आप अपने भक्तों के महान रक्षक हैं। हे महान देवी, आप शहरों में, पवित्र आश्रमों में और जंगलों और पार्कों में रहते हैं। आप उन सभी स्थानों पर ब्रह्मा के बाईं ओर रहते हैं जहाँ वे रहते हैं। ब्रह्मा के दाहिनी ओर सावित्री है, और ब्रह्मा (सावित्री और आप) के बीच हैं। तू बलि की वेदी पर है, और याजकों का बलिदान तू ही है; तुम राजाओं की जीत और समुद्र की सीमा हो। हे ब्रह्मचारिणी, आप (वह जो है) दीक्षा, और महान सौंदर्य के रूप में देखे जाते हैं; आप प्रकाशमानियों की चमक हैं और नारायण में रहने वाली देवी लक्ष्मी हैं । आप ऋषियों की क्षमा की दिव्य शक्ति हैं, और रोहिणी हैंनक्षत्रों के बीच। तुम राजद्वारों, पवित्र स्थानों और नदियों के संगम पर रहते हो। आप पूर्णिमा में पूर्णिमा के दिन हैं, और विवेक में बुद्धि हैं, और क्षमा और साहस हैं। आप एक उत्कृष्ट रंग के हैं, महिलाओं के बीच देवी उमा के रूप में जाने जाते हैं। आप इंद्र के आकर्षक दृश्य हैं, और इंद्र के निकट हैं। आप ऋषियों के धर्मी दृष्टिकोण हैं, और देवताओं के प्रति समर्पित हैं। आप कृषकों की जोत भूमि हैं, और प्राणियों की भूमि (या भूमि) हैं। आप (विवाहित) महिलाओं को विधवापन की अनुपस्थिति का कारण बनते हैं, और हमेशा धन और अनाज देते हैं। पूजा करने से रोग, मृत्यु और भय का नाश होता है। हे देवी, शुभ वस्तुएं देने वाली, यदि कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन आपकी ठीक से पूजा की जाए, तो आप सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। जो मनुष्य इस स्तुति का बार-बार पाठ करता या सुनता है, अपने सभी उपक्रमों में सफलता प्राप्त करता है; इसमें कोई संदेह नहीं।

गायत्री ने कहा :

हे पुत्र, तूने जो कहा है वह पूरा होगा। आप विष्णु सहित सभी स्थानों पर उपस्थित रहेंगे।

फुटनोट और संदर्भ:

[1] :

यज्ञवाण : यज्ञ के लिए तैयार और बंद स्थान।

[2] :

कपार्डिन : शंकर का एक विशेषण। कपर्दा: लट और उलझे हुए बाल, विशेष रूप से शंकर के।

[३] :

Puroḍāa : पिसे हुए चावल से बना एक बलिदान और कपाल या बर्तन में चढ़ाया जाता है ।

[४] :

मित्रावन : एक जंगल का नाम।

[५] :

सप्तर्षि : सात मुनि अर्थात् मरीचि, अत्रि, अगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ।

[६] :

बाली : प्रह्लाद के पुत्र विरोचन के पुत्र, मनाया गया दानव। जब विष्णु, कश्यप और अदिति के पुत्र के रूप में, बाली के पास आए, उनकी उदारता के लिए उल्लेख किया, और उनसे प्रार्थना की कि वह तीन चरणों में जितनी पृथ्वी को कवर कर सकते हैं, और जब उन्होंने पाया कि तीसरे स्थान पर रखने के लिए कोई जगह नहीं है कदम रखा, उसने इसे बाली के सिर पर लगाया और उसे अपने सभी सैनिकों के साथ पाताल भेज दिया और उसे अपना शासक बनने दिया।

[7] :

सप्तविधि वान : भारतीय सरगम ​​के सात नोटों का प्रतिनिधित्व करने लगता है।



अध्याय 17 - सावित्री के श्राप और गायत्री के वरदान

इस अध्याय के लिए संस्कृत पाठ उपलब्ध है ]

भीम ने कहा :

1-3. हे श्रेष्ठ ब्राह्मण , फिर यज्ञ में क्या आश्चर्य था? रुद्र वहाँ कैसे रहा ? देवताओं में सर्वश्रेष्ठ विष्णु भी वहां कैसे रहते थे? ( ब्रह्मा की) पत्नी के रूप में तैनात गायत्री ने वहाँ क्या किया ? हे मुनि, (गायत्री की जब्ती के बारे में) जानकर अच्छे आचरण के चरवाहों ने क्या किया? मुझे यह कहानी बताओ—क्या हुआ और ग्वालों और ब्रह्मा ने क्या किया। मुझे (जानने के लिए) एक बड़ी जिज्ञासा है।

पुलस्त्य बोला :

4-7. हे राजा, मैं तुझे वे अद्भुत बातें बताऊंगा जो बलिदान के समय हुई थीं। एकाग्रता से सुनें। रुद्र ने (यज्ञ) सभा में जाने के बाद एक बड़ा आश्चर्य किया। देवता (अर्थात् रुद्र) निंदनीय रूप धारण करके वहाँ ब्राह्मणों के पास आए । चूंकि विष्णु ने एक महत्वपूर्ण स्थान पर कब्जा कर लिया था, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया (रुद्र को सभा में प्रवेश करने से रोकने के लिए)। चरवाहे लड़के और सभी चरवाहे ग्वालों के खोने के बारे में जान कर ब्रह्मा के पास आ गए।

8-10. उसे कमरबंद (कमर) बंधा हुआ देखकर, और यज्ञ की सीमा पर बैठे हुए (गवाहे रो पड़े)। तब माँ (रोई): "हे बेटी"; पिता (रोया): "हे बेटी"; भाई (रोते हुए): "हे बहन"; दोस्त (रोया) स्नेह के साथ: "हे दोस्त, लाल राल के साथ चिह्नित, सुंदर को कौन लाया? अपना वह कपड़ा हटा रहे हैं जिसने आप पर कंबल डाला है? हे पुत्री, किसने तुम्हारे उलझे बालों में लाल डोरी बाँधी है?” ऐसी बातें सुनकर हरि ने स्वयं (अपने पिता से) कहा:

11-20. "हम उसे यहां लाए और उसे ( ब्रह्मा की) पत्नी के रूप में नियुक्त किया । कन्या ब्रह्मा से जुड़ी हुई है। शोक मत करो। वह शुभ है, और सभी के लिए सौभाग्य का कारण है। और परिवार के लिए खुशी की; अगर वह शुभ नहीं होती, तो वह (बलिदान) सभा में कैसे आती? यह जानकर, हे धन्य, शोक मत करो। इस प्रकार आपकी बेटी बहुत भाग्यशाली है (अ) वह भगवान ब्रह्मा के पास आई है। आपकी पुत्री ने वह स्थान प्राप्त किया है जिसमें ब्राह्मणों ने परम आत्मा तथा वेदों के आचार्यों का चिन्तन किया है।, प्राप्त नहीं किया, नहीं मिला। आपको एक अच्छे आचरण वाले धार्मिक व्यक्ति और धर्म के प्रति समर्पित होने के कारण, मैंने यह बेटी ब्रह्मा को दी है। उसके द्वारा दिव्य और समृद्ध दुनिया में जाने से मुक्त हो गया। एक दिव्य मिशन की पूर्ति के लिए मैं आपके परिवार में जन्म लूंगा। यह सिर्फ एक खेल होगा। जब नंद और अन्य लोग पृथ्वी पर पैदा होंगे, मैं उनके बीच रहूंगा। तेरी सभी बेटियाँ मेरे साथ रहेंगी। कोई पाप, कोई द्वेष और द्वेष नहीं होगा। ग्वालों या पुरुषों को भी कोई भय नहीं होगा। इस कृत्य के परिणामस्वरूप (ब्रह्मा से विवाह करने के कारण) यह (आपकी बेटी) कोई पाप नहीं करेगा।" विष्णु के (इन) शब्दों को सुनकर, (उन सभी को) उन्हें प्रणाम करके (स्थान) छोड़ दिया।

21. ( पिता ने कहा :) “मुझे वह वरदान लेने दो जो तुमने मुझे दिया है। आप हमारे परिवार में धार्मिक योग्यता लाने वाला अवतार लेंगे।

22-28. केवल तेरी दृष्टि से ही हम स्वर्गवासी होंगे; और यही मेरी बेटी मेरे परिवार के सदस्यों के साथ मुझे मुक्त करेगी। हे स्वामी, देवताओं के स्वामी, आप हमें ऐसा ही वरदान दें।” भगवान विष्णु ने स्वयं ग्वालों को प्रसन्न किया। अपने बाएं हाथ के माध्यम से (यानी लहराते हुए) ब्रह्मा ने भी उसी विचार का संचार किया। उत्तम वर्ण की स्त्री गायत्री, ग्वाला-पुत्री, अपने सम्बन्धियों को देखकर लज्जित हुई, उनसे मिली और उन सभी को अपने बाएँ हाथ से प्रणाम करते हुए बोली: “तुम्हें (समाचार) किसने बताया कि तुम इस स्थान पर आए हो। ? हे माता, ब्रह्मा के पास आकर मैं यहीं रह गया हूं। मैंने आज अपने पति के रूप में पूरे विश्व का स्वामी प्राप्त किया है। तुम मेरे लिए शोक मत करो, न मेरे पिता, और न ही मेरे संबंध। मेरे दोस्तों के समूह और बच्चों सहित मेरी बहनों को मेरी सुरक्षा के बारे में बताएं (अर्थात मैं ठीक हूं);

29. जब उन सभी को छोड़ दिया था, कि गायत्री, एक आकर्षक कमर की, ब्रह्मा के साथ जगह पर चला गया हो रही है [1] तैयार किया और बलिदान के लिए संलग्न, शॉन वहाँ।

30. ब्राह्मणों ने ब्रह्मा से वरदान मांगा। (उन्होंने कहा): "हमें वांछित वरदान दो"। ब्रह्मा ने भी उन्हें मनचाहा वरदान दिया।

३१. उस देवी गायत्री ने भी (ब्रह्मा द्वारा) प्रदान की गई सहमति के लिए अपनी सहमति दी थी; और वह अच्छी औरत भी यज्ञ में देवताओं के पास ही रही।

32-37. वह बलिदान सौ से अधिक दिव्य वर्षों तक जारी रहा; और शिव , एक बड़ी खोपड़ी (भीख के कटोरे के रूप में) लेकर और पांच सिरों से अलंकृत होकर भिक्षा के लिए यज्ञ के स्थान पर आए। द्वार पर खड़े होकर, पुजारियों और सदस्यों (यज्ञ सभा के) ने उन्हें फटकार लगाई: "आप, वेदों के व्याख्याकारों द्वारा निंदा किए गए, यहां कैसे पहुंचे?" महेश्वर (अर्थात् शिव) को ब्राह्मणों द्वारा निंदा किए जाने के बाद एक मुस्कान के साथ उन सभी ब्राह्मणों से कहा गया: "पोते के इस बलिदान पर, जो सभी को प्रसन्न करता है, कोई और नहीं, बल्कि मुझे, दूर किया जा रहा है, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों।" शिव [2]उनके द्वारा कहा गया था: "खाना खाओ और फिर जाओ"। शिव ने भी उनसे कहा: "हे ब्राह्मणों, मैं (भोजन) खाकर निकल जाऊँगा।" ऐसा कहकर वह खोपड़ी को अपने सामने रखकर वहीं बैठ गया।

38-41. उनके उस कृत्य को देखकर भगवान (अर्थात् शिव) ने कुटिलता से कार्य किया। खोपड़ी को जमीन पर छोड़कर ब्राह्मणों की ओर देखते हुए उन्होंने कहा: "हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मैं स्नान के लिए (पवित्र स्थान) पुष्कर जा रहा हूं "। उनके द्वारा कहा जा रहा है 'जल्दी जाओ', भगवान चले गए; वह देवताओं को मूर्ख बनाकर उत्सुकता से आकाश में रहा। जब शिव स्नान के लिए पुष्कर गए थे, ब्रह्मा ने जल्द ही कहा: "जब यज्ञ सभा में खोपड़ी है तो यहां यज्ञ कैसे किया जा सकता है? खोपड़ी में गंदी चीजें हैं।”

42-48. सभा में एक ब्राह्मण ने कहा: "मैं खोपड़ी को फेंक दूंगा"। उस सदस्य (अर्थात उस ब्राह्मण) ने उसे अपने हाथ से उठाया और फेंक दिया। तभी वहां एक और खोपड़ी दिखाई दी; फिर से उठाया गया; इस प्रकार दूसरा, तीसरा...बीस...तीस...पचास...सौ...हजार...दस हजार (खोपड़ियां वहां दिखाई दीं)। सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणों को खोपड़ी का कोई अंत नहीं मिला। पुष्कर वन में पहुँचकर, और भगवान शिव को प्रणाम करके उन्होंने उन्हें वैदिक प्रार्थनाओं के साथ प्रस्तुत किया; और सब ने मिलकर उसे बहुत प्रसन्‍न किया। तब शिव स्वयं प्रसन्न हुए। तब शिव उनकी भक्ति के परिणामस्वरूप उनके सामने प्रकट हुए। तब उस देवता ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कहा, उनकी भक्ति के कारण विनम्र (उनके लिए): "खोपड़ी के बिना, पिसे हुए चावल से बना बलिदान और बर्तनों में चढ़ाया जाता है [3], तैयार नहीं किया जा सकता। हे ब्राह्मणों, जैसा मैं तुमसे कहता हूँ वैसा ही करो; (मेरे लिए रखें) एक अच्छी तरह से पेश किया गया हिस्सा। अगर ऐसा किया जाता है तो मेरे सभी निर्देशों का पालन किया जाएगा।"

49-50। ब्राह्मणों ने कहा: "ठीक है, हम आपके निर्देशों का पालन करेंगे"। भगवान ने अपने हाथ में खोपड़ी के साथ, महान पोते से कहा: "हे ब्रह्मा, वह वरदान मांगो जो तुम अपने दिल को प्रिय हो। हे प्रभु, मैं तुझे सब कुछ दूंगा। ऐसा कुछ भी नहीं है जो मैं नहीं दे सकता”।

51-60. ब्रह्मा ने कहा: "जैसा कि मुझे दीक्षित किया गया है, और मैं यहाँ यज्ञ सभा में बैठा हूँ, मैं आपसे कोई वरदान स्वीकार नहीं करूँगा । जो मुझे यहां मांगेगा, मैं वह सब दूंगा जो वह चाहता है।" इस प्रकार यज्ञ में बोलने वाले वरदानी पोते को "ठीक है" कहकर रुद्र ने उनसे वरदान मांगा। फिर, जब मनु- काल बीत गया, तो भगवान ने स्वयं (यज्ञ किया) उसी तरह। शंभु:ब्रह्मा (स्थान) के उत्तर में अपने लिए एक स्थान निर्धारित किया। वह, भगवान, जिसे चार वेदों का भी पूरा ज्ञान था, (उस समय) शहर को देखने गया था। (सुनकर) ब्राह्मणों की बात सुनकर वे जिज्ञासावश यज्ञ सभा में गए। उसी पागल पोशाक में ब्रह्मा के निवास (पहने) में प्रवेश करने वाले महेश्वर को सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणों ने देखा। कोई उस पर हंसा तो कोई उसकी निंदा कर रहा था। इसी प्रकार अन्य ब्राह्मणों ने पागल (शिव) पर धूल झोंक दी। अन्य शक्तिशाली ब्राह्मणों ने, अपनी शक्ति पर गर्व करते हुए, उनका उपहास किया, और अपने हाथों से (विभिन्न) चिन्ह बनाकर उन्हें मिट्टी और डंडों से पीटा। तो अन्य लड़कों ने भी (और) उसके पास (और) उसे अपने उलझे हुए बालों से पकड़कर उससे पूछा: “किसने तुम्हें यह मन्नत मानने का निर्देश दिया? यहाँ सुंदर स्त्रियाँ हैं; आप उनके लिए आए हैं। कौन सा उपदेशक,

61-74. ( शिव ने उत्तर दिया :) “मेरा जनक अंग ब्रह्मा का रूप है; और मेरा पुडेन्डम मुलिब्रे विष्णु है; यह बीज बोना है; नहीं तो दुनिया भुगतेगी। यह पुत्र मेरे द्वारा उत्‍पन्‍न हुआ, और उसी से मैं उत्‍पन्‍न हुआ; सृष्टि महादेव (अर्थात शिव) के लिए है; (मेरी) पत्नी हिमालय पर बनी है ; उमा रुद्र को दी गई थी; बताओ (मुझे) वह किसकी बेटी है। तुम मूर्खों, तुम नहीं जानते (यह); प्रभु यह आपको बोलें (अर्थात् समझाएं)। "(इस) पाठ्यक्रम का पालन ब्रह्मा द्वारा नहीं किया गया था, न ही यह विष्णु द्वारा दिखाया गया था; न ही यह ब्रह्मा के हत्यारे शिव द्वारा दिखाया गया था।" “कैसे (ऐसा है) आप भगवान की निंदा कर रहे हैं? आज आपको हमारे द्वारा मारा जाना चाहिए ”। हे राजा, शंकर:, इस प्रकार ब्राह्मणों द्वारा पीटा जा रहा है, मुस्कुराया और सभी ब्राह्मणों (वहां) से कहा: "हे ब्राह्मणों, क्या तुमने मुझे उस उन्मत्त व्यक्ति को नहीं पहचाना, जिसने अपना होश खो दिया है? आप सभी दयालु हैं और (मेरे साथ) मित्रता में बने रहे हैं।” सबसे अच्छा ब्राह्मण की चाल से स्तब्ध हाराएक ब्राह्मण का वेश धारण करके (अर्थात्) बोलना (अर्थात् देना) और हाथ, पैर, मुट्ठियों, डंडों और कोहनियों से वार करने वाले को, जिसने पागल का वेश धारण किया था, पीटा। इस प्रकार ब्राह्मणों से तंग आकर वह क्रोधित हो गया। तब उन्हें भगवान (अर्थात शिव द्वारा) शाप दिया गया था: "आप वेदों द्वारा त्याग दिए जाएंगे, आपके उलझे हुए बाल खड़े होंगे, बलिदान से गिरेंगे, दूसरों की पत्नियों का आनंद लेंगे, (वेश्याओं की कंपनी) में प्रसन्न होंगे और जुए में, तेरे माता-पिता त्याग दिए जाएंगे। पुत्र को माता-पिता का धन या ज्ञान नहीं मिलेगा और आप सभी को अपनी इंद्रियों से स्तब्ध होकर, और दूसरों के भोजन पर निर्भर होकर, रुद्र जैसी भिक्षा प्राप्त हो सकती है। ऐसा (ऐसे) व्यवहार करने वाले और धर्मपरायण होने के कारण, तुम मेरे नहीं हो; परन्तु जिन ब्राह्मणों ने मुझ पर दया की, उनके पास धन, पुत्र, दासी, दास और छोटे पशु होंगे।

75-93. इस तरह एक श्राप और वरदान देकर भगवान गायब हो गए। जब वह चला गया, तो ब्राह्मणों ने उसे भगवान शंकर मानकर उसकी तलाश करने की कोशिश की; लेकिन जब उन्होंने उसे नहीं पाया, तो वे स्वयंभू धार्मिक अनुष्ठानों से संपन्न होकर पुष्कर वन में आ गए। प्रमुख सरोवर में स्नान कर ब्राह्मणों ने रुद्र के सौ (नामों) का उच्चारण किया। प्रार्थना के बड़बड़ाने के अंत में, भगवान (अर्थात शिव) ने उनसे स्वर्गीय स्वर में बात की: "यहां तक ​​कि एक स्वतंत्र बातचीत में भी मैंने कभी झूठ नहीं कहा; तो कैसे (मैं ऐसा करूँगा) जब मैंने अपनी इंद्रियों पर अंकुश लगा लिया है? मैं तुम्हें फिर से सुख प्रदान करूंगा। वेद (अर्थात वैदिक ज्ञान) जो ब्राह्मण शांत, संयमी, मेरे प्रति समर्पित और मुझमें स्थिर (दिमाग) हैं, उनका धन और संतान नहीं छीनी जाएगी। उन (ब्राह्मणों) के लिए कुछ भी अशुभ नहीं है जो पवित्र अग्नि को बनाए रखने में लगे हुए हैं, जनार्दन को समर्पित हैं(अर्थात विष्णु), ब्रह्मा (और) सूर्य की पूजा करें - चमक का ढेर, और जिनके मन संतुलन में स्थिर हैं। ” ये बातें कहकर वह चुप हो गया। सभी (ब्राह्मण) महान देवता (अर्थात् शिव) से वरदान और कृपा प्राप्त करके (उस स्थान) जहां ब्रह्मा (रहने) गए थे। वे, ब्रह्मा को प्रसन्न करते हुए, उनके सामने बने रहे। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर उनसे कहा: "मुझसे भी एक वर चुन लो।" ब्रह्मा के इन वचनों से वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रसन्न हुए । (उन्होंने आपस में कहा:) "हे ब्राह्मणों, ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर हमें कौन सा वरदान मांगना चाहिए? आइए, इस वरदान के फलस्वरुप पवित्र अग्नि, वेदों, विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और संतानों से संबंधित (अर्थात) संसार की रक्षा करें। जब ब्राह्मण इस प्रकार (आपस में) बात कर रहे थे तो वे क्रोधित हो गए; "तुम कौन हो? यहाँ कौन प्रमुख हैं? हम यहां श्रेष्ठ हैं।" अन्य ब्राह्मणों ने कहा: "नहीं, (ऐसा नहीं है)।" ब्राह्मणों को जो वहां थे और क्रोध से भरे हुए थे, देखकर ब्रह्मा ने उनसे कहा: "चूंकि आप यज्ञ सभा से तीन समूहों में बने रहे, इसलिए, ब्राह्मण, आप में से एक समूह को बुलाया जाएगाअमूलिका ; जो तटस्थ रहे, वे उदासीन कहलाएंगे ; तीसरा समूह, हे ब्राह्मणों, उन लोगों में से होगा जिनके पास हथियार हैं और जिन्होंने खुद को तलवारों से लैस किया है और उन्हें कौशिकी कहा जाएगा । यह स्थान, इस प्रकार तीन तरीकों से (तीन समूहों द्वारा) कब्जा कर लिया गया है, पूरी तरह से आपका होगा। यहां की प्रजा (जीवित) बाहर से (अर्थात बाहरी लोगों द्वारा) 'संसार' कहलाएगी; विष्णु निश्चित रूप से इस अज्ञात स्थान की देखभाल करेंगे। मेरे द्वारा दिया गया यह स्थान सदा बना रहेगा और पूर्ण होगा।” ऐसा कहकर ब्रह्मा ने यज्ञ की समाप्ति का विचार किया। ये सभी ब्राह्मण जो (कुछ समय पहले) क्रोध और ईर्ष्या से भरे हुए थे, एक साथ मेहमानों को खिलाया और वैदिक अध्ययन में तल्लीन हो गए।

94-99। यह पुष्कर, जिसे ब्रह्म भी कहा जाता है, एक महान पवित्र स्थान है। उस पवित्र स्थान में रहने वाले शांत ब्राह्मणों के लिए ब्रह्मा की दुनिया में कुछ भी हासिल करना मुश्किल नहीं है। हे श्रेष्ठ राजा, बारह वर्षों के बाद अन्य पवित्र स्थानों पर होने वाली किसी वस्तु की पूर्ति केवल छह महीने के भीतर ही इन पवित्र स्थानों पर होती है, अर्थात। कोकामुख , कुरुक्षेत्र , नैमिष जहां ऋषियों की मण्डली है, वाराणसी , प्रभास , वैसे ही बदरीकाश्रम , और गंगाद्वार , प्रयाग , और उस बिंदु पर जहां गंगा समुद्र से मिलती है, रुद्रकोशी , विरुपा, इसलिए मित्रवण भी [४] ; (मनुष्य के उद्देश्य की पूर्ति के बारे में) इसमें कोई संदेह नहीं है कि आदमी धार्मिक अध्ययन के लिए इच्छुक है। पुष्कर सभी पवित्र स्थानों में सबसे बड़ा और सबसे अच्छा है; यह हमेशा पोते (यानी ब्रह्मा) को समर्पित सम्माननीय लोगों द्वारा सम्मानित किया जाता है।

100-118. इसके बाद मैं आपको ब्रह्मा के साथ (यानी सावित्री और ब्रह्मा के बीच) सावित्री के मजाक के कारण हुए महान विवाद के बारे में बताऊंगा ।

सावित्री के जाने के बाद, सभी देवियाँ वहाँ आईं। ख्याति से उत्पन्न भृगु की पुत्री , अर्थात। लक्ष्मी , (हमेशा) सफल, हमेशा (सावित्री) द्वारा आमंत्रित किया गया, जल्दी से वहाँ आ गया। बहुत गुणी मदीरा , योगनिद्रा (नींद और जागने के बीच की स्थिति) और समृद्धि की दाता ; श्री, कमल, भूति , कीर्ति और उच्च मन में रहने वाली श्रद्धा : पोषण और संतुष्टि देने वाली ये सभी देवीएँ (वहाँ) पहुँची थीं; सती , दक्ष की बेटी, शुभ पार्वतीया उमा, तीनों लोकों में सबसे सुंदर महिला, महिलाओं को सौभाग्य (विधवापन की अनुपस्थिति) दे रही है; सावित्री के शुभ निवास में जया और विजया , मधुचन्दा, अमरावती , सुप्रिया , जनकान्त (सब इकट्ठे हुए थे)। वे, जिन्होंने उत्तम वस्त्र और आभूषण धारण किए हुए थे, गौरी के साथ पहुंचे थे । (ऐसी स्त्रियाँ थीं) शकरा, पुलोमन की पुत्री, आकाशीय अप्सराओं के साथ; स्वाहा , स्वधा और धूमोर , एक सुंदर चेहरे की; यकी और राक्षसी और बहुत धनी गौरी; मनोजवा , वायु की पत्नी, औरसिद्धि , कुबेर की प्रिय (पत्नी) ; तो भी देवताओं की बेटियों और Dānava को -ladies प्रिय Danu वहाँ आया था। सात ऋषियों की महान सुंदर पत्नियाँ, [५] उसी तरह बहनें, बेटियाँ और विद्याधरियों की सेना ; Rākṣasīs , पितर और अन्य विश्व माताओं की बेटियों। सावित्री ने युवा विवाहित महिलाओं और बहुओं के साथ (बलिदान के स्थान पर) जाने की इच्छा की; इसी प्रकार अदिति के समान दक्ष की सभी बेटियाँ भीऔर अन्य आए थे। पवित्र महिला अर्थात। ब्रह्मा की पत्नी (सावित्री), उनके निवास के रूप में कमल होने के कारण, उनसे घिरी हुई थीं। कोई सुन्दर स्त्री हाथ में मिठाई लिये हुए थी, कोई फलों से भरी टोकरी लेकर ब्रह्मा के पास पहुंचा। इसी तरह अन्य लोग भीगे हुए अनाज की माप कर रहे हैं; इसी प्रकार एक सुन्दर स्त्री ने भी नाना प्रकार के अनार, सिट्रोन लिये हुए; दूसरे ने बाँस की टहनियाँ लीं, वैसे ही कमल, और केसर, जीरा-बीज, खजूर; दूसरे ने सारे नारियल ले लिए; (दूसरा) अंगूर (-रस) से भरा बर्तन लिया; इसी प्रकार अंगक का पौधा, विभिन्न प्रकार के कपूर-फूल और शुभ गुलाब सेब; इसी प्रकार किसी और ने अखरोट, हरड़ और सिट्रोन को भी लिया; एक सुंदर स्त्री ने पके बिल्व- फल और चपटे चावल लिए; किसी और ने कपास ले ली-बत्ती और केसरिया रंग का वस्त्र। सभी शुभ और सुन्दर स्त्रियाँ इन और अन्य वस्तुओं को टोकरियों में रख कर सावित्री के साथ वहाँ पहुँचीं।

119-120। सावित्री को वहाँ देखकर पुरन्दर डर गए; ब्रह्मा (भी) अपना चेहरा लटकाए हुए (सोचते हुए) वहीं रहे: 'वह (अब) मुझसे क्या कहेगी?' विष्णु और रुद्र शर्मिंदा थे, इसलिए अन्य सभी ब्राह्मण भी; सदस्य (यज्ञ सभा के) और अन्य देवता भयभीत थे।

121-122. संस, पोते, भतीजे, मामा, भाई, तो भी देवताओं नामित Ṛbhus और अन्य देवताओं के सभी सावित्री क्या कहेंगे (फिर) के रूप में शर्मिंदा रहे।

123-124। वहाँ जो बातें कर रहे थे, उनकी बातें सुनकर ग्वाले बेटियाँ ब्रह्मा के पास चुप रहीं। 'सबसे अच्छे रंग की महिला, हालांकि (मुख्य) पुजारी द्वारा बुलाई गई थी, वह नहीं आई; (इसलिए) इंद्र एक और चरवाहे लाए (और) विष्णु ने स्वयं उसे ब्रह्मा के सामने पेश किया।

125-129. वह बलिदान पर कैसे (व्यवहार) कर रही होगी? बलिदान कैसे पूरा होगा?' जब वे इस प्रकार सोच रहे थे, कमल में रहने वाले (ब्रह्मा की पत्नी) ने प्रवेश किया। ब्रह्मा उस समय सदस्यों (यज्ञ सभा के), पुजारियों और देवताओं से घिरे हुए थे। वेदों में महारत हासिल करने वाले ब्राह्मण अग्नि को अर्पण कर रहे थे। चरवाहे, कक्ष में शेष (बलि पत्नी के लिए) और एक हिरण के सींग और एक कमरबंद, और रेशमी कपड़ों में पहने हुए, सर्वोच्च स्थान पर ध्यान किया। वह अपने पति के प्रति वफादार थी, उसका पति उसका जीवन था; वह प्रमुखता से बैठी थी; वह सुंदरता से संपन्न थी; चमक में वह सूर्य के समान थी: उसने वहां की सभा को सूर्य के तेज के रूप में प्रकाशित किया।

130. याजकों ने बलि के जानवरों के धधकते हुए भाग की भी पूजा की।

१३१-१३६. बलि के समय कुछ अंश प्राप्त करने के इच्छुक देवताओं ने तब कहा: "(बलिदान) में देरी नहीं होनी चाहिए; (किसी कार्य के लिए) देर से किया गया, उसका (वांछित) फल नहीं देता है; यही वह नियम है जो वेदों में सभी विद्वानों द्वारा देखा जाता है।" जब दो दूध (-बर्तन) तैयार हो गए, तो भोजन संयुक्त रूप से पकाया गया, और जब ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया, अध्वर्युजिसे अर्पण किया गया था, वह वहाँ आया था, और प्रवरज्ञ वेदों में कुशल ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था; खाना बनाया जा रहा था। यह देखकर देवी (सावित्री) ने क्रोधित होकर ब्रह्मा से कहा, जो (यज्ञ) सत्र में चुपचाप बैठे थे: "यह क्या कुकर्म तुम करने वाले हो, कि वासना के द्वारा तुमने मुझे त्याग दिया और पाप किया है? वह, जिसे तुमने अपने सिर पर रखा है (अर्थात जिसे तुमने इतना महत्व दिया है) मेरे पैर की धूल से भी तुलनीय नहीं है। ऐसा (बलिदान) सभा में एकत्रित लोग कहते हैं। यदि तुम चाहो तो उन लोगों की उस आज्ञा का पालन करो जो (समान) देवता हैं।

137-141. सुंदरता के लिए अपनी लालसा के माध्यम से आपने वह किया है जिसकी लोगों द्वारा निंदा की जाती है; हे यहोवा, तू अपने पुत्रों और अपने पौत्रों से लज्जित नहीं हुआ; मुझे लगता है कि आपने यह निंदनीय कार्य जुनून के माध्यम से किया है; आप देवताओं के पोते और ऋषियों के परदादा हैं! अपने ही शरीर को देखकर आपको शर्म कैसे नहीं आई? आप लोगों के लिए हास्यास्पद हो गए हैं और मुझे नुकसान पहुंचाया है। अगर यह आपकी दृढ़ भावना है, तो हे भगवान, (अकेले) जियो; आपको नमस्कार (अलविदा); मैं अपने दोस्तों को अपना चेहरा कैसे दिखाऊंगा? मैं लोगों को कैसे बताऊं कि मेरे पति ने (एक और महिला को) अपनी पत्नी के रूप में लिया है?”

ब्रह्मा ने कहा :

१४२-१४४. दीक्षा के तुरंत बाद, पुजारियों ने मुझसे कहा: पत्नी के बिना बलिदान नहीं किया जा सकता है; अपनी पत्नी को जल्दी लाओ। यह (अन्य) पत्नी इंद्र द्वारा लाई गई थी, और मुझे विष्णु द्वारा प्रस्तुत की गई थी; (तो) मैंने उसे स्वीकार कर लिया; हे सुंदर भौहें, मैंने जो किया है उसके लिए मुझे क्षमा करें। हे अच्छी मन्नत के, मैं तुम्हें इस तरह फिर से गलत नहीं करूंगा। मुझे क्षमा कर, जो तेरे चरणों में गिरे हैं; आपको मेरा नमस्कार।

पुलस्त्य ने कहा :

इस प्रकार संबोधित करते हुए, वह क्रोधित हो गई, और ब्रह्मा को श्राप देने लगी:

145-148। "यदि मैंने तपस्या की है, यदि मैंने ब्राह्मणों के समूहों में अपने गुरुओं को प्रसन्न किया है, और विभिन्न स्थानों पर, ब्राह्मण आपकी पूजा कभी नहीं करेंगे, सिवाय आपकी वार्षिक पूजा (जो गिरती है) कार्तिक के महीने में जो ब्राह्मण करेंगे (अकेले) ) बलि चढ़ाएं, परन्तु अन्य मनुष्यों को पृथ्वी पर किसी अन्य स्थान पर न चढ़ाएं।" ब्रह्मा को ये शब्द कहते हुए, उसने इंद्र से कहा जो पास में था: "हे शंकर , तुम ग्वाले को ब्रह्मा के पास ले आए। चूंकि यह एक तुच्छ कर्म था, इसलिए आपको इसका फल प्राप्त होगा।

१४९. जब आप युद्ध में (लड़ाई के लिए तैयार) खड़े होंगे, तो आप अपने दुश्मनों से बंधे होंगे और बहुत (दयनीय) दुर्दशा में कम हो जाएंगे।

१५०. बिना किसी संपत्ति के, अपनी ऊर्जा खोकर, एक बड़ी हार का सामना करने के बाद, आप अपने दुश्मन के शहर में रहेंगे, (लेकिन) जल्द ही रिहा हो जाएंगे।"

१५१-१५३. इंद्र को श्राप देकर (इस प्रकार) देवी ने विष्णु से (ये शब्द) बोले: "जब, भृगु के श्राप के कारण आप नश्वर संसार में जन्म लेंगे, तो आप वहां (अर्थात उस अस्तित्व में) अलगाव के दर्द का अनुभव करेंगे। अपनी पत्नी से। तेरी पत्नी को तेरा शत्रु समुद्र के पार ले जाएगा; तुम शोक से व्याकुल मन से नहीं जानोगे (वह किसके द्वारा ली गई है) और बड़ी विपत्ति के बाद तुम अपने भाई के साथ दुखी होओगे।

154-156. जब आप यदु- परिवार में जन्म लेंगे , तो आपका नाम कृष्ण होगा ; और पशुओं का सेवक होकर बहुत दिन तक भटकता रहेगा।” तब क्रोधित व्यक्ति ने रुद्र से कहा: "जब तुम दारुवन में रहोगे , तब, हे रुद्र, क्रोधित ऋषि तुम्हें शाप देंगे; हे खोपड़ी-धारक, मतलब एक, आप हमारे बीच से एक महिला को छीनना चाहते हैं; इसलिए, तुम्हारा यह अहंकारी उत्पादक अंग आज जमीन पर गिरेगा।

157-160। पुरुषार्थ से रहित आप ऋषियों के श्राप से ग्रसित होंगे। गंगाद्वार में रहने वाली आपकी पत्नी आपको सांत्वना देगी।" "हे अग्नि , आप पहले मेरे पुत्र भागु द्वारा सर्व-उपभोक्ता बनाए गए थे, हमेशा धर्मी। मैं (तुम्हें) कैसे जलाऊँ जो पहले ही उससे जल चुके हैं? हे अग्नि, कि रुद्र आपको अपने वीर्य से डुबो देगा, और आपकी जीभ (यानी आपकी लौ) बलिदान के लिए उपयुक्त चीजों का उपभोग करते समय अधिक जलेगी। ” सावित्री ने उन सभी ब्राह्मणों और पुजारियों को शाप दिया, जो अपने पति को लूटने के लिए बलि के पुजारी बन गए थे, और जो बिना किसी कारण के जंगल में चले गए थे:

१६१. “केवल लोभ के द्वारा सभी पवित्र और पवित्र स्थानों का सहारा लें; आप हमेशा दूसरों के भोजन से ही संतुष्ट होंगे (जब आप प्राप्त करेंगे); परन्तु अपने घरों में भोजन से तृप्त नहीं होगा।

१६२-१६४. जो बलिदान नहीं करना है उसका त्याग करके और जो तिरस्कारपूर्ण है उसे स्वीकार करके, धन अर्जित करके और इसे व्यर्थ खर्च कर-उससे (आपके) शवों को बिना अनुष्ठान के (उन्हें अर्पित किया जा रहा) केवल दिवंगत आत्माएं होंगी। ” इस प्रकार उस क्रोधित (सावित्री) ने इन्द्र को, इसी प्रकार विष्णु, रुद्र, अग्नि, ब्रह्मा तथा समस्त ब्राह्मणों को भी श्राप दिया।

१६५-१६६. इस प्रकार उन्हें श्राप देकर वह (बलिदान) सभा से बाहर चली गई। प्रमुख पुष्कर में पहुँचकर, वह (वहाँ) बस गई। उसने लक्ष्मी से कहा जो हँस रही थी और इंद्र की सुंदर पत्नी और युवा महिलाओं से भी (वहां): "मैं वहां जाऊंगी जहां मुझे कोई आवाज नहीं सुनाई देगी।"

167. तब वे सभी महिलाएं अपने-अपने घर चली गईं। सावित्री, जो क्रोधित थीं, उन्हें भी श्राप देने लगीं।

168. "चूंकि इन दिव्य महिलाओं मुझे छोड़ दिया और चले गए हैं, मैं, जो अत्यंत नाराज़ हूँ, शाल मैं उन्हें भी अभिशाप:

169-171. लक्ष्मी कभी एक स्थान पर नहीं रहती। वह क्षुद्र और चंचल है, वह मूर्खों के बीच, बर्बरों और पर्वतारोहियों के बीच, मूर्खों और अभिमानियों के बीच रहेगी; उसी प्रकार (मेरे) श्राप के कारण, तुम (अर्थात् लक्ष्मी) शापित और दुष्टों जैसे नीच व्यक्तियों के साथ रहोगी।”

१७२-१७४. इस प्रकार (लक्ष्मी करने के लिए) एक अभिशाप दिया करने के बाद, वह शापित इंद्राणी : "जब इंद्र, अपने पति, द्वारा (का पाप) उत्पीड़ित एक ब्राह्मण के हत्या, दुखी हो जाएगा, और जब उसके राज्य से छीन लिया हो जाएगा Nahuṣa , वह करेगा , तुम्हें देखकर, तुम्हारे लिए पूछो। (वह कहेगा) 'मैं इन्द्र हूँ; यह कैसे हो गया कि यह बचकानी (महिला) मेरी प्रतीक्षा नहीं करती है? यदि मुझे शचि (अर्थात् इंद्रा) प्राप्त नहीं हुई तो मैं सभी देवताओं को मार डालूंगा। तब तू जिसे भागना होगा, और भयभीत और शोकित होगा , मेरे शाप के परिणामस्वरूप, हे दुष्ट आचरण और अभिमानी (एक) बृहस्पति के घर में रहेगा ।

175-1 78. तब उसने देवताओं की सभी पत्नियों पर एक शाप दिया: "इन सभी (महिलाओं) को बच्चों से स्नेह नहीं मिलेगा; वे दिन-रात (दु:ख के साथ) झुलसे रहेंगे और उनका अपमान किया जाएगा और उन्हें 'बंजर' कहा जाएगा।" उत्तम वर्ण की गौरी को भी सावित्री ने श्राप दिया था। वह, जो रो रही थी, विष्णु ने देखा और उसने उसे तसल्ली दी: "हे बड़ी आँखों वाले, रो मत; तुम सदा शुभ हो, (कृपया) चलो; (बलिदान) सभा में प्रवेश करना, अपनी कमरबंद और रेशमी वस्त्र सौंपना; हे ब्रह्मा की पत्नी, दीक्षा ग्रहण करो, मैं तुम्हारे चरणों को प्रणाम करता हूँ।"

179. इस प्रकार उस ने उस से कहा, मैं जैसा तू कहेगा वैसा ही करूंगा; और मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ मुझे कोई आवाज़ न सुनाई देगी।”

180-215। इतना कहकर वह उस स्थान से चली गई और एक पर्वत पर चढ़कर वहीं रही। बड़ी भक्ति के साथ उसके सामने रहकर, विष्णु ने हाथ जोड़कर और झुककर उसकी स्तुति की।

सावित्री के १०८ नाम देखें ]

२१६-२१९. सावित्री ने एक अच्छे व्रत के रूप में, विष्णु से कहा, जो उसकी प्रशंसा कर रहे थे: "बेटा, तुमने मेरी प्रशंसा की है; आप अजेय होंगे; अपने लहंगे में तू अपक्की पत्नी के संग रहेगा, जो अपके पिता और माता को प्रिय है; और वह, जो यहां आकर इस स्तुति से मेरी स्तुति करता है, सब पापों से मुक्त होकर सर्वोच्च स्थान पर जाएगा। हे पुत्र, ब्रह्मा के यज्ञ में जाओ और उसे पूरा करो । कुरुक्षेत्र और प्रयाग में, मैं भोजन का दाता होऊंगा; और मेरे पति के पास रहकर वही करो जो तू ने कहा है।”

220. विष्णु, इस प्रकार संबोधित करते हुए, ब्रह्मा की उत्कृष्ट (यज्ञ) सभा में गए। जब सावित्री चली गई। गायत्री ने (ये) शब्द कहे:

२२१. “ऋषि मेरे पति की उपस्थिति में कहे गए मेरे शब्दों को सुनें- मैं जो कुछ भी प्रसन्न और वरदान देने के लिए तैयार हूं, वह कहो।

222-223। (वे) पुरुष (जो), भक्ति से संपन्न, ब्रह्मा की पूजा करते हैं, उनके पास वस्त्र, अनाज, पत्नियां, सुख और धन होगा; इसी तरह (उनके पास) उनके घर में अखंड सुख और (उनके) बेटे और पोते होंगे। लंबे समय तक (खुशी) भोगने के बाद, वे अंत में (अपने जीवन के) मोक्ष को प्राप्त करेंगे। ”

पुलस्त्य ने कहा :

२२४-२२५. एकाग्र मन से, स्थापित होने के बाद प्राप्त होने वाले फल को, पूरी सावधानी के साथ और पवित्र नियम (ब्रह्मा की छवि) के अनुसार सुनो। इस स्थापना से मनुष्य को वह फल प्राप्त होता है, जो समस्त यज्ञों, तप, दान, पवित्र स्थानों और वेदों के फल से करोड़ गुना श्रेष्ठ है।

226-227. हे राजा, वह व्यक्ति, जो पूर्णिमा के दिन भक्ति के साथ उपवास करता है और पहले दिन (यानी पूर्णिमा के दिन के बाद का दिन) ब्रह्मा की पूजा करता है, हे महान-सशस्त्र (अर्थात शक्तिशाली) उस स्थान पर जाता है ब्राह्मण ; और जो पुजारियों के माध्यम से उसकी पूजा करता है वह विशेष रूप से विरिंची (या) वासुदेव (यानी आत्माओं के स्वामी) के पास जाता है।

228-239। कार्तिक मास में निर्धारित है भगवान का रथ-जुलूस; करना (अर्थात लेना) जो भक्ति के साथ मनुष्य ब्रह्मा की दुनिया में पहुँचते हैं। कार्तिक की पूर्णिमा के दिन, सावित्री के साथ, सड़क के किनारे, कई संगीत वाद्ययंत्रों के साथ, ब्रह्मा का जुलूस निकालना चाहिए, हे श्रेष्ठ राजा। उसे पूरे शहर में लोगों (यानी नागरिकों) के साथ (यानी ब्रह्मा की छवि को जुलूस में निकालना) चाहिए। फिर इस प्रकार बारात निकालकर उसे स्नान कराना चाहिए। ब्राह्मणों को खाना खिलाकर और पहले अग्नि की पूजा करने के बाद, उन्हें शुभ संगीत वाद्ययंत्रों की आवाज़ के साथ रथ में भगवान की छवि रखनी चाहिए। रथ के सामने, पवित्र नियम के अनुसार, अग्नि की पूजा की, और ब्राह्मणों के आशीर्वाद का आह्वान किया, और 'यह एक शुभ दिन है' को तीन बार दोहराते हुए, और भगवान की (छवि) को रथ में रखते हुए, वह रात में कई शो और वेदों की ध्वनि (पाठ) के माध्यम से जागते रहना चाहिए। हे राजा, भगवान को जगाकर, और सुबह में, ब्राह्मणों को उनकी क्षमता के अनुसार कई प्रकार के भोजन के साथ खिलाया, और, हे राजा, पूजा करके, पवित्र सूत्र के पाठ और स्पष्ट मक्खन के साथ और दूध, और पवित्र नियमों के अनुसार; इसलिए भी, पवित्र नियम के अनुसार, ब्राह्मणों के आशीर्वाद का आह्वान किया, और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उन्हें शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (यानी जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वारा ब्राह्मणों को उनकी क्षमता के अनुसार कई प्रकार के भोजन के साथ खिलाया, और, हे राजा, पूजा करके, पवित्र सूत्र के पाठ के साथ, और स्पष्ट मक्खन और दूध के साथ, और पवित्र नियमों के अनुसार; इसलिए भी, पवित्र नियम के अनुसार, ब्राह्मणों के आशीर्वाद का आह्वान किया, और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उन्हें शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (यानी जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वारा ब्राह्मणों को उनकी क्षमता के अनुसार कई प्रकार के भोजन के साथ खिलाया, और, हे राजा, पूजा करके, पवित्र सूत्र के पाठ के साथ, और स्पष्ट मक्खन और दूध के साथ, और पवित्र नियमों के अनुसार; इसलिए भी, पवित्र नियम के अनुसार, ब्राह्मणों के आशीर्वाद का आह्वान किया, और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उन्हें शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (यानी जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वारा और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उसे शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (अर्थात जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वारा और इसे एक शुभ दिन घोषित करने के बाद उसे शहर के माध्यम से रथ को ले जाना चाहिए (अर्थात जुलूस में ले जाना)। ब्रह्मा के रथ को चारों वेदों में पढ़े हुए ब्राह्मणों द्वारा स्थानांतरित (अर्थात घसीटा) जाना चाहिए; वैसे ही, हे बहादुर, कुशल लोगों द्वाराअथर्ववेद , जिसमें (अर्थात जानने) कई श्लोक हैं और पुजारियों द्वारा - सामवेद के जाप । उसे इस प्रकार शहर के चारों ओर सर्वोच्च देवता के रथ को एक समान मार्ग पर ले जाना चाहिए। हे वीर, अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले शूद्र द्वारा रथ को नहीं हिलाना है ; और कोई ज्ञानी नहीं, वरन भोजक रथ पर चढ़ेगा ।

240-253। हे राजा, वह सावित्री को ब्रह्मा के दाहिनी ओर, भोजक को अपनी बाईं ओर और कमल को अपने सामने रखें। इस प्रकार हे वीर, तुरही और शंख की कई आवाजों के साथ, बुद्धिमान व्यक्ति को, पूरे शहर के चारों ओर रथ को घुमाने के बाद, पूजा के कार्य के रूप में रोशनी लहराते हुए (भगवान की छवि) को उचित स्थान पर रखना चाहिए। वह, जो इस तरह की बारात निकालता है, या जो इसे भक्ति के साथ देखता है या जो रथ को खींचता है, वह ब्रह्मा के स्थान पर जाता है। जो कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ब्रह्मा के हॉल (अर्थात् मंदिर) में प्रकाश करता है और पहले दिन (कार्तिक के) चन्दन, फूल और नए वस्त्रों से स्वयं को प्रणाम करता है, वह ब्रह्मा के स्थान पर पहुंच जाता है। यह एक बहुत ही पवित्र दिन है, जिस पर बाली के [6]राज्य की स्थापना की थी। यह दिन हमेशा ब्रह्मा को बहुत प्रिय होता है। इसे बाली कहा जाता है । जो इस दिन ब्रह्मा की और विशेष रूप से स्वयं की पूजा करता है, वह असीमित तेज के विष्णु के उच्चतम स्थान को जाता है। हे शक्तिशाली भुजाओं वाले, चैत्र का पहला दिन शुभ और उत्तम है। वह, सबसे अच्छा आदमी, जो इस दिन, एक चांडल को छूता है और स्नान करता है, उसे कोई पाप नहीं है, कोई मानसिक पीड़ा या शारीरिक रोग नहीं हैं; इसलिए स्नान करना चाहिए (इस दिन) या यह एक मूर्ति के सामने रोशनी की दिव्य तरंग है, जो सभी रोगों को नष्ट कर देती है। हे राजा, वह सभी गायों और भैंसों को निकाल दे; फिर (घर) के बाहर उसे सभी वस्त्रों आदि के साथ एक धनुषाकार द्वार बनाना चाहिए। इसी तरह, हे कुरु के पालनकर्ता-परिवार, उसे ब्राह्मणों को भोजन देना चाहिए । हे कुरु-परिवार के वंशज, मैंने पहले कार्तिक, शिव और चैत्र के महीनों में इन तीन दिनों के बारे में बताया है , हे राजा; स्नान, उपहार देना (इन दिनों) (देना) सौ गुना पुण्य। हे राजा, कार्तिक का (पहला) दिन राजा बलि के लिए शुभ है, और पशुओं के लिए फायदेमंद है!

गायत्री ने कहा :

254-255. हे कमल से उत्पन्न, (यद्यपि) सावित्री ने कहा कि ब्राह्मण कभी भी तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, (फिर भी) मेरे वचनों को सुनकर वे तुम्हारी पूजा करेंगे; यहाँ (अर्थात् इस संसार में) भोगों को भोगकर वे परलोक में मोक्ष प्राप्त करेंगे। इसे श्रेष्ठ दृष्टि (-बिंदु) जानकर वह प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देगा।

256. हे इंद्र, मैं तुम्हें एक वरदान दूंगा: जब तुम अपने शत्रुओं द्वारा गिरफ्तार किए जाओगे, तो ब्रह्मा, शत्रु के धाम में जाकर तुम्हें मुक्त कर देंगे।

257. अपने शत्रु के विनाश के कारण, आपको बहुत खुशी होगी और आपको अपना (राजधानी-) शहर वापस मिल जाएगा जो (आपने) खो दिया था। तीनों लोकों में तुम्हारा बिना किसी कष्ट के एक महान राज्य होगा।

२५८-२५९. हे विष्णु, जब आप पृथ्वी पर अवतार लेंगे, तो आप अपने भाई के साथ, अपनी पत्नी के अपहरण आदि के कारण बहुत दुःख का अनुभव करेंगे। आप अपने शत्रु को मारकर अपनी पत्नी को देवताओं की उपस्थिति में बचाएंगे। उसे स्वीकार करने और राज्य पर फिर से शासन करने के बाद, तुम स्वर्ग में जाओगे।

२६०. आप ग्यारह हजार साल के लिए (शासन) करेंगे और (तब) स्वर्ग में जाएंगे। आप दुनिया में बहुत प्रसिद्धि का आनंद लेंगे, और लोगों से प्यार करेंगे।

२६१. हे भगवान, जो लोग राम के रूप (अर्थात अवतार) में आपके द्वारा मुक्ति प्राप्त करेंगे, उनके पास संतनिका नामक प्रसिद्ध लोक होंगे (अर्थात जाएंगे) ।

262-265. तब वरदान देने वाली गायत्री ने रुद्र से कहा: "वे पुरुष, जो आपके जननांग अंग (फालुस के रूप में) की पूजा करेंगे, भले ही वह गिर गया हो, शुद्ध होकर और पुण्य अर्जित करके, स्वर्ग (यानी आनंद) का हिस्सा होगा। आपके जनन अंग की उपासना करने से पुरुष जो अवस्था प्राप्त करते हैं, वह (अर्थात्) पवित्र अग्नि को धारण करने या उसमें हवन करने में नहीं हो सकती। जो लोग सुबह-सुबह बिल्व-पत्र से आपके जननांग (फल्लस के रूप में) की पूजा करेंगे, वे रुद्र की दुनिया का आनंद लेंगे। ”

266-267। "हे अग्नि, तुम भी शिवभक्त का दर्जा पाकर शोधक बनो। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब आप प्रसन्न होते हैं तो देवता प्रसन्न होते हैं। प्रसाद देवताओं द्वारा आपके (केवल) द्वारा प्राप्त किया जाता है। निश्चय ही जब तुम प्रसन्न होगे, तो वे प्रसन्न होकर (प्रसाद) भोगेंगे; इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि वैदिक कथन ऐसा ही है।"

तब गायत्री ने उन सभी ब्राह्मणों से ये शब्द कहे :

268-284। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सभी पवित्र स्थानों पर आपको प्रसन्न करने वाले पुरुष वैराज नामक स्थान पर जाएंगे(अर्थात् ब्रह्मा)। विभिन्न प्रकार के भोजन और कई उपहार देने के बाद, और (मनुष्यों को) प्रसन्न करके वे देवताओं के देवता बन जाते हैं। देवता तुरंत प्रसाद का आनंद लेते हैं और पुरुष तुरंत (अर्थात) उन लोगों के मुंह में (अर्थात) प्रसाद का आनंद लेते हैं, जो सबसे अच्छे ब्राह्मण हैं, क्योंकि आप अकेले ही तीनों लोकों को बनाए रखने में सक्षम हैं - इसमें कोई संदेह नहीं है। श्वास के संयम से तुम सब शुद्ध हो जाओगे; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, विशेष रूप से पुष्कर में स्नान करने और वेदों की माता (अर्थात् गायत्री) का बखान (नाम) करने के बाद उपहार प्राप्त करने के लिए आपको पाप नहीं लगेगा। पुष्कर में भोजन (ब्राह्मणों को) अर्पित करने से सभी देवता प्रसन्न होते हैं। यदि (मनुष्य) एक ब्राह्मण को खिलाता है, तो भी उसे एक करोड़ का फल मिलता है। पुरुष (नाश) उनके सभी पापों जैसे कि एक ब्राह्मण की हत्या और उनके द्वारा किए गए अन्य बुरे कर्मों को एक ब्राह्मण के हाथ में पैसा देकर। मेरे सम्मान में बड़बड़ाने के लिए प्रार्थनाओं का उपयोग करके उनकी तीन बार पूजा की जानी है। उस क्षण (सम) ब्राह्मण की हत्या जैसा पाप नष्ट हो जाता है। गायत्री दस अस्तित्वों (या) के दौरान किए गए पापों को एक हजार अस्तित्वों और तीन युगों के हजार समूहों के दौरान भी नष्ट कर देती है। इस प्रकार मेरे सम्मान में प्रार्थनाओं को जानकर और गुनगुनाते हुए आप हमेशा के लिए शुद्ध हो जाएंगे। इसमें कोई संदेह या कोई झिझक नहीं है। सिर झुकाकर, (मेरी) प्रार्थना विशेष रूप से तीन अक्षरों वाले 'm' के उच्चारण के साथ, आप निस्संदेह शुद्ध हो जाएंगे। मैं (गायत्री मीटर के) आठ अक्षरों में रहा हूं। यह संसार मुझमें व्याप्त है। सभी शब्दों से सुशोभित मैं वेदों की जननी हूँ। श्रेष्ठ ब्राह्मण भक्ति से मेरा नाम जपने से सफलता प्राप्त करेंगे। मेरे नाम का जप करने से आप सभी की महिमा होगी। एक अच्छी तरह से नियंत्रित ब्राह्मण जिसमें गायत्री का सार होता है, वह चार वेदों को जानने, सब कुछ खाने और सभी चीजों को बेचने से बेहतर है। चूँकि सभा में सावित्री ने ब्राह्मणों को श्राप दिया था, यहाँ जो कुछ भी दिया या चढ़ाया जाता है, वह सब अटूट हो जाता है। इसलिए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मैंने (यह) वरदान दिया है । जो ब्राह्मण पवित्र अग्नि के रखरखाव के लिए समर्पित हैं और तीन बार (अर्थात सुबह, दोपहर और शाम) यज्ञ करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियों के साथ स्वर्ग में जाएंगे। एक अच्छी तरह से नियंत्रित ब्राह्मण जिसमें गायत्री का सार होता है, वह चार वेदों को जानने, सब कुछ खाने और सभी चीजों को बेचने से बेहतर है। चूँकि सभा में सावित्री ने ब्राह्मणों को श्राप दिया था, यहाँ जो कुछ भी दिया या चढ़ाया जाता है, वह सब अटूट हो जाता है। इसलिए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मैंने (यह) वरदान दिया है । जो ब्राह्मण पवित्र अग्नि के रखरखाव के लिए समर्पित हैं और तीन बार (अर्थात सुबह, दोपहर और शाम) यज्ञ करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियों के साथ स्वर्ग में जाएंगे। एक अच्छी तरह से नियंत्रित ब्राह्मण जिसमें गायत्री का सार होता है, वह चार वेदों को जानने, सब कुछ खाने और सभी चीजों को बेचने से बेहतर है। चूँकि सभा में सावित्री ने ब्राह्मणों को श्राप दिया था, यहाँ जो कुछ भी दिया या चढ़ाया जाता है, वह सब अटूट हो जाता है। इसलिए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मैंने (यह) वरदान दिया है । जो ब्राह्मण पवित्र अग्नि के रखरखाव के लिए समर्पित हैं और तीन बार (अर्थात सुबह, दोपहर और शाम) यज्ञ करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियों के साथ स्वर्ग में जाएंगे।

२८५-२९३. इस प्रकार पुष्कर में इंद्र, विष्णु, रुद्र, अग्नि, ब्रह्मा और ब्राह्मणों को एक उत्कृष्ट वरदान देकर, गायत्री ब्रह्मा के पक्ष में रही। तब गणों ने लक्ष्मी को श्राप का कारण बताया। ब्रह्मा की प्यारी पत्नी गायत्री ने इन सभी युवतियों और लक्ष्मी को दिए गए कई शापों के बारे में जानकर उन्हें वरदान दिया: "सभी को हमेशा प्रशंसनीय बनाना, और धन से आकर्षक दिखना, आप सभी को प्रसन्न करते हैं , चमक जाएगा। हे पुत्री, जिस पर भी तुम दृष्टि करोगे, वह सब (अर्थात् है) धार्मिक पुण्य का भागी होगा; परन्तु तुम्हारे द्वारा छोड़े गए वे सब दु:ख का अनुभव करेंगे। वे अकेले (जिन पर आप कृपा करते हैं) (अर्थात उच्च में पैदा होंगे) जाति और (कुलीन) परिवार, (होगा) धार्मिकता, हे आकर्षक चेहरे वाले। वे अकेले ही सभा में चमकेंगे और (वे अकेले) राजाओं द्वारा देखे जाएंगे। श्रेष्ठ ब्राह्मण केवल उन्हीं की याचना करेंगे, और केवल उनके प्रति विनम्र होंगे। 'आप हमारे भाई, पिता, गुरु और रिश्तेदार भी हैं। इसमें तो कोई शक ही नहीं है। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। जब मैं तुम्हें देखता हूं तो मेरी दृष्टि स्पष्ट और सुंदर हो जाती है; मेरा मन बहुत प्रसन्न है, मैं तुम्हें सच और सच ही बता रहा हूँ'। ऐसे शब्द लोगों को प्रसन्न करते हैं, क्या वे, अच्छे लोग, जिन्हें आप ने देखा है, सुनेंगे।

294-299। नहुष, इन्द्रपद प्राप्त करके आपसे विनती करेगा। पापी, अगस्त्य के शब्दों के माध्यम से , आपके द्वारा, एक सर्प में परिवर्तित होने के बाद, उससे अनुरोध करेगा: 'हे ऋषि, मैं अभिमान के माध्यम से बर्बाद हो गया हूं; मेरी शरण बनो (यानी मेरी मदद करो)'। तब श्रद्धेय ऋषि, उनके (अर्थात् नहुष) के इन शब्दों से उनके हृदय में दया करते हुए, उनसे ये शब्द कहेंगे: 'एक राजा, आपके परिवार का सम्मान, आपके परिवार में पैदा होगा। आपको (अर्थात्) नाग के रूप में देखकर वह आपके श्राप को तोड़ देगा। तब तुम अपने नाग के राज्य को त्याग कर फिर से स्वर्ग में जाओगे'। हे सुन्दर नेत्रों वाले, मेरे वरदान के फलस्वरुप तुम फिर अपने पति के साथ स्वर्ग को प्राप्त होगे, जिसने अश्व-यज्ञ किया होगा।

पुलस्त्य बोला :

300-302। तब (गायत्री) ने देवताओं की सभी पत्नियों को संबोधित किया, जो प्रसन्न हुई: "भले ही आपके कोई संतान न होगी, आप दुखी नहीं होंगे"। तब गायत्री खुशी से बढ़ी, गौरी को भी सलाह दी। ब्रह्मा की उच्च मन की प्रिय पत्नी ने वरदान देकर यज्ञ की सिद्धि की कामना की। रुद्र ने उस प्रकार वरदान देने वाली गायत्री को देखकर उसे प्रणाम किया और इन शब्दों से उसकी स्तुति की:

रुद्र ने कहा :

303-317. वेदों की माता, और आठ अक्षरों से शुद्ध, आपको मेरा नमस्कार। आप गायत्री हैं, जो लोगों को कठिनाइयों को पार करने में मदद करती हैं, और सात प्रकार की वाणी [7], स्तुति से युक्त सभी ग्रंथ, इसलिए सभी छंद, समान रूप से सभी अक्षर और संकेत, सभी ग्रंथ जैसे ग्लॉस, इसलिए सभी उपदेश, और सभी अक्षर। हे देवी, आपको मेरा नमस्कार। तुम गोरे और गोरे रूप के हो, और तुम्हारा मुख चन्द्रमा के समान है। आपके पास बड़े-बड़े बाहें हैं, जो केले-पेड़ों के अंदरूनी हिस्सों की तरह नाजुक हैं; तुम अपने हाथ में एक हिरण का सींग और एक अत्यंत स्वच्छ कमल धारण करते हो; तू ने रेशमी वस्त्र पहिन लिए हैं, और ऊपर का वस्त्र लाल है। आप हार से सुशोभित हैं, जो आपके गले में चंद्रमा की किरणों की तरह चमकीला है। आप दिव्य झुमके वाले कानों से सुशोभित हैं। आप चंद्रमा के साथ प्रतिद्वंद्विता वाले चेहरे से चमकते हैं। आप बेहद शुद्ध मुकुट वाले हेयर-बैंड के साथ आकर्षक लगते हैं। नागों के फनों के समान तुम्हारी भुजाएँ स्वर्ग को सुशोभित करती हैं। आपके आकर्षक और गोलाकार स्तनों के निप्पल भी समान हैं। पेट पर ट्रिपल गुना अत्यंत निष्पक्ष कूल्हों और कमर के साथ विभाजन पर गर्व करता है। आपकी नाभि गोलाकार, गहरी है और शुभता का संकेत देती है। आपके पास विशाल कूल्हे और कमर और आकर्षक नितंब हैं; तुम्हारी दो जांघें बहुत सुंदर और गोल हैं; आपके घुटने और पैर अच्छे हैं। आप जैसे हैं, आप तीनों लोकों को धारण करते हैं, और आपसे अनुरोध सत्य हैं (अर्थात निश्चित रूप से कृपालु हैं)। आप बहुत भाग्यशाली, वरदान देने वाले और उत्तम वर्ण के होंगे। पुष्कर की यात्रा आपको देखकर फलदायी होगी। महीने की पूर्णिमा के दिन आपको पहली आराधना मिलेगी तुम्हारी दो जांघें बहुत सुंदर और गोल हैं; आपके घुटने और पैर अच्छे हैं। आप जैसे हैं, आप तीनों लोकों को धारण करते हैं, और आपसे अनुरोध सत्य हैं (अर्थात निश्चित रूप से कृपालु हैं)। आप बहुत भाग्यशाली, वरदान देने वाले और उत्तम वर्ण के होंगे। पुष्कर की यात्रा आपको देखकर फलदायी होगी। महीने की पूर्णिमा के दिन आपको पहली आराधना मिलेगी तुम्हारी दो जांघें बहुत सुंदर और गोल हैं; आपके घुटने और पैर अच्छे हैं। आप जैसे हैं, आप तीनों लोकों को धारण करते हैं, और आपसे अनुरोध सत्य हैं (अर्थात निश्चित रूप से कृपालु हैं)। आप बहुत भाग्यशाली, वरदान देने वाले और उत्तम वर्ण के होंगे। पुष्कर की यात्रा आपको देखकर फलदायी होगी। महीने की पूर्णिमा के दिन आपको पहली आराधना मिलेगीज्येषा ; और जो लोग तेरे पराक्रम को जानकर तेरी उपासना करेंगे, उन्हें पुत्रों और धन की कुछ घटी न होगी। आप उन लोगों के लिए सर्वोच्च सहारा हैं जो एक जंगल में या एक महान समुद्र में डूबे हुए हैं; या जिन्हें डाकुओं ने पकड़ रखा है। आप ही सफलता, धन, साहस, कीर्ति, लज्जा का भाव, विद्या, शुभ नमस्कार, बुद्धि, गोधूलि, प्रकाश, निद्रा और संसार के अंत में विनाश की रात भी हैं। आप अम्बा , कमला , माता, ब्राह्मण और दुर्गा हैं ।

318-331। आप सभी देवताओं की माता, गायत्री और एक उत्कृष्ट महिला हैं। आप जया, विजया (अर्थात दुर्गा), और पूणी (पोषण) और तुशी हैं(संतुष्टि), क्षमा और दया। आप सावित्री से छोटे हैं और हमेशा ब्रह्मा के प्रिय रहेंगे । तुम्हारे अनेक रूप हैं, एक सार्वभौम रूप; आपकी आकर्षक आंखें हैं और आप ब्रह्मा के साथ चलते हैं; आप सुंदर रूप के हैं, आपकी आंखें बड़ी हैं और आप अपने भक्तों के महान रक्षक हैं। हे महान देवी, आप शहरों में, पवित्र आश्रमों में और जंगलों और पार्कों में रहते हैं। आप उन सभी स्थानों पर ब्रह्मा के बाईं ओर रहते हैं जहाँ वे रहते हैं। ब्रह्मा के दाहिनी ओर सावित्री है, और ब्रह्मा (सावित्री और आप) के बीच हैं। तू बलि की वेदी पर है, और याजकों का बलिदान तू ही है; तुम राजाओं की जीत और समुद्र की सीमा हो। हे ब्रह्मचारिणी, आप (वह जो है) दीक्षा, और महान सौंदर्य के रूप में देखे जाते हैं; आप प्रकाशमानियों की चमक हैं और नारायण में रहने वाली देवी लक्ष्मी हैं । आप ऋषियों की क्षमा की दिव्य शक्ति हैं, और रोहिणी हैंनक्षत्रों के बीच। तुम राजद्वारों, पवित्र स्थानों और नदियों के संगम पर रहते हो। आप पूर्णिमा में पूर्णिमा के दिन हैं, और विवेक में बुद्धि हैं, और क्षमा और साहस हैं। आप एक उत्कृष्ट रंग के हैं, महिलाओं के बीच देवी उमा के रूप में जाने जाते हैं। आप इंद्र के आकर्षक दृश्य हैं, और इंद्र के निकट हैं। आप ऋषियों के धर्मी दृष्टिकोण हैं, और देवताओं के प्रति समर्पित हैं। आप कृषकों की जोत भूमि हैं, और प्राणियों की भूमि (या भूमि) हैं। आप (विवाहित) महिलाओं को विधवापन की अनुपस्थिति का कारण बनते हैं, और हमेशा धन और अनाज देते हैं। पूजा करने से रोग, मृत्यु और भय का नाश होता है। हे देवी, शुभ वस्तुएं देने वाली, यदि कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन आपकी ठीक से पूजा की जाए, तो आप सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। जो मनुष्य इस स्तुति का बार-बार पाठ करता या सुनता है, अपने सभी उपक्रमों में सफलता प्राप्त करता है; इसमें कोई संदेह नहीं।

गायत्री ने कहा :

हे पुत्र, तूने जो कहा है वह पूरा होगा। आप विष्णु सहित सभी स्थानों पर उपस्थित रहेंगे।

फुटनोट और संदर्भ:

[1] :

यज्ञवाण : यज्ञ के लिए तैयार और बंद स्थान।

[2] :

कपार्डिन : शंकर का एक विशेषण। कपर्दा: लट और उलझे हुए बाल, विशेष रूप से शंकर के।

[३] :

Puroḍāa : पिसे हुए चावल से बना एक बलिदान और कपाल या बर्तन में चढ़ाया जाता है ।

[४] :

मित्रावन : एक जंगल का नाम।

[५] :

सप्तर्षि : सात मुनि अर्थात् मरीचि, अत्रि, अगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ।

[६] :

बाली : प्रह्लाद के पुत्र विरोचन के पुत्र, मनाया गया दानव। जब विष्णु, कश्यप और अदिति के पुत्र के रूप में, बाली के पास आए, उनकी उदारता के लिए उल्लेख किया, और उनसे प्रार्थना की कि वह तीन चरणों में जितनी पृथ्वी को कवर कर सकते हैं, और जब उन्होंने पाया कि तीसरे स्थान पर रखने के लिए कोई जगह नहीं है कदम रखा, उसने इसे बाली के सिर पर लगाया और उसे अपने सभी सैनिकों के साथ पाताल भेज दिया और उसे अपना शासक बनने दिया।

[7] :

सप्तविधि वान : भारतीय सरगम ​​के सात नोटों का प्रतिनिधित्व करने लगता है।





स्कन्दपुराणम्/खण्डः ७ (प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्यम्/अध्यायः १६५

॥ ईश्वर उवाच ॥ ॥
ततो गच्छेन्महादेवि सावित्रीं लोकमातरम् ॥
महा पापप्रशमनीं सोमेशादीशदिक्स्थिताम् ॥ १ ॥
संयतात्मा नरः पश्येत्तत्र तां नियतात्मवान् ॥ २ ॥
ब्रह्मणा यष्टुकामेन सावित्री सहधर्मिणी ॥
कृता तां बलतो ज्ञात्वा गायत्रीं कोपमाविशत् ॥ ३ ॥
ततः संत्यज्य सा देवी ब्रह्माणं कमलोद्भवम् ॥
सपत्नीरोषसन्तप्ता प्रभासं क्षेत्रमाश्रिता ॥ ४ ॥
तपः करोति विपुलं देवैरपि सुदुःसहम् ॥
तत्र स्थले स्थिता देवी साऽद्यापि प्रियदर्शना ॥ ५ ॥
॥ श्रीदेव्युवाच ॥ ॥
किमर्थं सा परित्यक्ता सावित्री ब्रह्मणा पुरा ॥
गायत्री च कथं प्राप्ता केन चास्य निवेदिता ॥ ६ ॥
कीदृशीं तां च गायत्रीं लब्धवान्पद्मसंभवः ॥
यस्तां पत्नीं समुत्सृज्य तस्यामेव मनो दधौ ॥ ७ ॥
कस्य सा दुहिता देव किमर्थं च विवाहिता ॥
एतन्मे कौतुकं सर्वं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥ ॥
॥ ईश्वर उवाच ॥ ॥
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सावित्र्याश्चरितं महत् ॥
यथा सा ब्रह्मणा त्यक्ता गायत्री च विवाहिता ॥ ९ ॥
पुरा बुद्धिः समुत्पन्ना ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥
इति वेदा मया प्रोक्ता यज्ञार्थं नात्र संशयः ॥ 7.1.165.१० ॥
यज्ञैः संतर्पिता देवा वृष्टिं दास्यंति भूतले ॥
ततश्चौषधयः सर्वा भविष्यंति धरातले ॥ ११ ॥
तस्मात्संजायते शुक्रं शुक्रात्सृष्टिः प्रवर्तते ॥
सृष्ट्यर्थं सर्वलोकानां ततो यज्ञं करोम्यहम् ॥ १२ ॥
दृष्ट्वा मां यज्ञ आसक्तं ये च विप्रा धरातले ॥
ते यज्ञान्प्रचरिष्यंति शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १३ ॥
एवं स निश्चयं कृत्वा यज्ञार्थं सुरसुंदरि ॥
तीर्थं निवेशयामास पुष्करं नाम नामतः ॥ १४ ॥
यज्ञवाटो महांस्तत्र आसीत्तस्य महात्मनः ॥
तत्र देवर्षयः सर्वे देवाः सेन्द्रपुरोगमाः ॥ १५ ॥
समायाता महादेवि यज्ञे पैतामहे तदा ॥
पुण्यास्तेऽपि द्विजश्रेष्ठास्तत्रर्त्विजः प्रजज्ञिरे ॥ १६ ॥
सावित्री लोकजननी पत्नी तस्य महात्मनः ॥
गृहकार्ये समासक्ता दीक्षा कालव्यतिक्रमात् ॥
अध्वर्युणा समाहूता सावित्री वाक्यमब्रवीत् ॥ १७ ॥
॥ सावित्र्युवाच ॥ ॥
अद्यापि न कृतो वेषो न गृहे गृहमण्डनम् ॥
लक्ष्मीर्नाद्यापि संप्राप्ता न भवानी न जाह्नवी ॥ १८ ॥
न स्वाहा न स्वधा चैव तथा चैवाप्यरुंधती ॥
इन्द्राणी देवपत्न्योऽन्याः कथमेकाकिनी व्रजे ॥ १९ ॥
उक्तः पितामहो गत्वा पुलस्त्येन महात्मना ॥
सावित्री देव नायाति प्रसक्ता गृहकर्मणि ॥ 7.1.165.२० ॥
त्वत्पत्नी किमिदं कर्म फलेन संप्रवर्तते ॥
तच्छ्रुत्वा दीक्षितो वाचं शिखी मुंडी मृगाजिनी ॥ २१ ॥
पत्नीकोपेन संतप्तः प्राह देवं पुरंदरम् ॥ २२ ॥
गच्छ मद्वचनाच्छक्र पत्नीमन्यां कुतश्चन ॥
गृहीत्वा शीघ्रमागच्छ न स्यात्कालात्ययो यथा ॥ २३ ॥
जगाम बलहा तूर्णं वचनात्परमेष्ठिनः ॥
अपश्यमानः कांचित्स्त्रीं या योग्या हंसवाहने ॥ २४ ॥
अथ शापाद्बिभीतेन सहस्राक्षेण धीमता ॥
दृष्टा गोपालकन्यैका रूपयौवनशालिनी ॥ २५ ॥
बिभ्रती तत्र पूर्णं सा कुम्भं कन्येत्यचोदयत् ॥
तां गृहीत्वा ततः शक्रः समायाद्यत्र दीक्षितः ॥
 देवदेवश्चतुर्वक्त्रो विष्णुरुद्रसमन्वितः ॥ २६ ॥
संप्रदानं तु कृतवान्कन्याया मधुसूदनः ॥२७॥
प्रेरितः शंकरेणैव ब्रह्मा देवर्षिभिस्तथा॥
परिणीयतां ततो दीक्षां तस्याश्चक्रे यथात्मनः ॥२८ ॥
ततः प्रवर्तितो यज्ञः सर्वकामसमन्वितः ॥२९॥
अत्रिर्होतार्चिकस्तत्र पुलस्त्योऽध्वर्युरेव च॥
उद्गाताऽथो मरीचिश्च ब्रह्माहं सुरपुंगवः॥7.1.165.३०॥
सनत्कुमारप्रमुखाः सदस्यास्तस्य निर्मिताः॥
वस्त्रैराभरणैर्युक्ता मुकुटैरंगुलीयकैः ॥ ३१ ॥
भूषिता भूषणोपेता एकैकस्य पृथक्पृथक् ॥
त्रयस्त्रयः पृष्ठतोऽन्ये ते चैवं षोडशर्त्विजः ॥३२॥
प्रोक्ता भवद्भि र्यज्ञेऽस्मिन्ननुगृह्योऽस्मि सर्वदा ॥
पत्नी ममेयं गायत्री यज्ञेऽस्मिन्ननुगृह्यताम् ॥ ३३ ॥
मृदुवस्त्रधरां साक्षात्क्षौमवस्त्रावगुण्ठिताम् ॥
निष्क्रम्य पत्नीशालात ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः ॥ ३४ ॥
औदुम्बरेण दण्डेन संवृतो मृगचर्मणा ॥
तया सार्धं प्रविष्टश्च ब्रह्मा तं यज्ञमण्डपम् ॥३५॥
॥ ईश्वर उवाच ॥ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु संप्राप्ता देवयोषितः ॥
संप्राप्ता यत्र सावित्री यज्ञे तस्मिन्निमंत्रिताः ॥ ३६ ॥
भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना विष्णुपत्नी यशस्विनी ॥
आमन्त्रिता सा लक्ष्मीश्च तत्रायाता त्वरान्विता ॥ ३७ ॥
तत्र देवी महाभागा योगनिद्रादिभूषिता ॥
देवी कांतिस्तथा श्रद्धा द्युतिस्तुष्टिस्तथैव च ॥ ३८ ॥
सती या दक्षतनया उमा या पार्वती शुभा ॥
त्रैलोक्यसुन्दरी देवी स्त्रीणां सौभाग्यदायका ॥३९॥
जया च विजया चैव गौरी चैव महाधना ॥
मनोजवा वायुपत्नी ऋद्धिश्च धनदप्रिया ॥ 7.1.165.४० ॥
देवकन्यास्तथाऽऽयाता दानव्यो दनुवंशजाः ॥
सप्तर्षीणां तथा पत्न्य ऋषीणां च तथैव च ॥ ४१ ॥
प्लवा मित्रा दुहितरो विद्याधरगणास्तथा ॥
पितरो रक्षसां कन्यास्तथाऽन्या लोकमातरः ॥ ४२ ॥
वधूभिश्चैव मुख्याभिः सावित्री गन्तुमिच्छति ॥
अदित्याद्यास्तथा देव्यो दक्षकन्याः समागताः ॥ ४३ ॥
ताभिः परिवृता सार्धं ब्रह्माणी कमलालया ॥
काश्चिन्मोदकमादाय काश्चित्पूपं वरानने ॥ ४४ ॥
फलानि तु समादाय प्रयाता ब्रह्मणोऽन्तिकम् ॥
आढकीश्चैव निष्पावान्राजमाषांस्तथाऽपराः ॥ ४५ ॥
दाडिमानि विचित्राणि मातुलिंगानि शोभने॥
करीराणि तथा चान्या गृहीत्वा करमर्दकान्॥४६॥
कौसुंभं जीरकं चैव खर्जूरं चापरास्तथा॥
उततीश्चापरा गृह्य नालिकेराणि चापराः॥४७॥
द्राक्षया पूरितं चाम्रं शृङ्गाराय यथा पुरा॥
कर्बुराणि विचित्राणि जंबूकानि शुभानि च॥४८॥
अक्षोडामलकान्गृह्य जंबीराणि तथा पराः ॥
बिल्वानि परिपक्वानि चिर्भटानि वरानने ॥ ४९ ॥
अन्नपानाधिकाराणि बहूनि विविधानि च ॥
शर्करापुत्तलीं चान्या वस्त्रे कौसुम्भके तथा ॥ 7.1.165.५० ॥
एवमादीनि चान्यानि गृह्य पूर्वे वरानने ॥
सावित्र्या सहिताः सर्वाः संप्राप्तास्तु तदा शुभाः ॥ ५१ ॥
सावित्रीमागतां दृष्ट्वा भीतस्तत्र पुरंदरः ॥
अधोमुखः स्थितो ब्रह्मा किमेषा मां वदिष्यति ॥ ५२ ॥
त्रपान्वितौ विष्णुरुद्रौ सर्वे चान्ये द्विजातयः ॥
सभासदस्तथा भीतास्तथैवान्ये दिवौकसः ॥ ५३ ॥
पुत्रपौत्रा भागिनेया मातुला भ्रातरस्तथा ॥
ऋतवो नाम ये देवा देवानामपि देवताः ॥ ५४ ॥
विलक्षास्तु तथा सर्वे सावित्री किं वदिष्यति ॥
ब्रह्मवाक्यानि वाच्यानि किं नु वै गोपकन्यया ॥ ॥ ५५ ॥
मौनीभूतास्तु शृण्वानाः सर्वेषां वदतां गिरः ॥
अध्वर्युणा समाहूता नागता वरवर्णिनी ॥ ५६ ॥
शक्रेणान्या तथाऽऽनीता दत्ता सा विष्णुना स्वयम् ॥
अनुमोदिता च रुद्रेण पित्रा दत्ता स्वयं तथा ॥ ५७ ॥
कथं सा भविता यज्ञः समाप्तिं वा कथं व्रजेत् ॥
एवं चिन्तयतां तेषां प्रविष्टा कमलालया ॥ ५८ ॥
वृतो ब्रह्मा भार्यया स ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः ॥
हूयन्ते चाग्नयस्तत्र ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ ५९ ॥
पत्नीशाले तथा गोपी रौप्यशृंगा समेखला ॥
क्षौमवस्त्रपरीधाना ध्यायन्ती परमेश्वरम् ॥ 7.1.165.६० ॥
पतिव्रता पतिप्राणा प्राधान्येन निवेशिता ॥
कृपान्विता विशालाक्षी तेजसा भास्करोपमा ॥ ६१ ॥
द्योतयंती सदस्तत्र सूर्यस्येव यथा प्रभा ॥
ज्वलमानस्तथा वह्निर्भ्रमंते चर्त्विजस्तथा ॥ ६२ ॥
पशूनामवदानानि गृह्णंति द्विजसत्तमाः ॥
प्राप्ता भागार्थिनो देवा विलंबसमयोऽभवत् ॥ ६३ ॥
कालहीनं न कर्तव्यं कृतं न फलदं भवेत् ॥
वेदेष्वयमधीकारो दृष्टः सर्वो मनीषिभिः ॥ ६४ ॥
प्रवर्ग्ये क्रियमाणे तु ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥
क्षीरद्वये हूयमाने मंत्रेणाध्वर्युणा तथा ॥ ६५ ॥
उपहूतोपहूतेन आगतेषु द्विजन्मसु ॥
क्रियमाणे तथा भक्ष्ये दृष्ट्वा देवी क्रुधान्विता ॥
उवाच देवी ब्रह्माणं सदोमध्ये तु मौनिनम् ॥ ६६ ॥
किमेवं बुध्यते देव कृतमेतद्विचेष्टितम् ॥
मां परित्यज्य यः कामात्कृतवानसि किल्बिषम् ॥ ६७ ॥
न तुल्या पादरजसा समा साऽधिशिरः कृता ॥ ६८ ॥
यद्वदंति नराः सर्वे संगताः सदसि स्थिताः ॥
आश्चर्यं च प्रभूणां तु कुरुते यं यमिच्छति ॥ ६९ ॥
भवता रूपलोभेन कृतं कर्म विगर्हितम् ॥ 7.1.165.७० ॥
न पुत्रेषु कृता लज्जा पौत्रेषु च न ते विभो ॥
कामकारकृतं मन्ये ह्येतत्कर्म विगर्हितम् ॥ ७१ ॥
पितामहोऽसि देवानामृषीणां प्रपितामहः ॥
कथं न ते त्रपा जाता आत्मनः पश्यतस्तनुम् ॥ ७२ ॥
लोकमध्ये कृतं हास्यमिह चैव विगर्हितः ॥
यद्येष ते स्थितो भावस्तिष्ठ देव नमोऽस्तु ते ॥७३॥
अहं कथं सखीनां तु दर्शयिष्यामि वै मुखम् ॥
भर्त्रा मे विहिता पत्नी कथमेतदहं वदे ॥ ७४ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥
ऋत्विग्भिरहमाज्ञप्तो दीक्षा कालोऽतिवर्तते ॥
पत्नीं विना न होमोत्र शीघ्रं पत्नीमिहानय ॥ ७५ ॥
शक्रेणैषा समानीता दत्ता चैवाऽथ विष्णुना ॥
गृहीता च मया त्वं हि क्षमस्वैकं मया कृतम् ॥
न चापराध्यं भूयोऽन्यं करिष्ये तव सुव्रते ॥ ७६ ॥
॥ ईश्वर उवाच ॥ ॥
एवमुक्ता तदा क्रुद्धा ब्रह्माणं शप्तुमुद्यता॥
यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं गुरवो यदि तोषिताः ॥ ७७ ॥
सर्वब्राह्मणशालासु स्थानेषु विविधेष्वपि ॥
न तु ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यंति कदाचन ॥ ॥ ७८ ॥
ऋते वै कार्तिकीमेकां पूजां सांवत्सरीं तव ॥
करिष्यंति द्विजाः सर्वे सत्येनानेन ते शपे ॥
एतद्बुद्ध्वा न कोपोस्तु हतो हन्ति न संशयः ॥ ॥ ७९ ॥


                 ॥ सावित्र्युवाच ॥ ॥
भोभोः शक्र त्वयानीता आभीरी 
 यस्मादीदृक्कृतं कर्म तस्मात्त्वं लप्स्यसे फलम् ॥7.1.165.८०॥

यदा संग्राममध्ये त्वं स्थाता शक्र भविष्यसि ॥
तदा त्वं शत्रुभिर्बद्धो नीतः परमिकां दशाम् ॥ ८१ ॥
अकिंचनो नष्टसुतः शत्रूणां नगरे स्थितः॥
पराभवं महत्प्राप्य अचिरादेव मोक्ष्यसे ॥ ८२ ॥
शक्रं शप्त्वा तदा देवी विष्णुं चाऽथ वचोब्रवीत् ॥ ८३ ॥
गुरुवाक्येन ते जन्म यदा मर्त्ये भवि ष्यति ॥
भार्याविरहजं दुःखं तदा त्वं तत्र भोक्ष्यसे ॥ ८४ ॥
हृतां शत्रुगणैः पत्नीं परे पारे महोदधेः ॥
न च त्वं ज्ञायसे सीतां शोकोपहचेतनः ॥ ८५ ॥
भ्रात्रा सह परां काष्ठामापदं दुःखितस्तथा ॥
पशूनां चैव संयोगश्चिरकालं भविष्यति ॥ ८६ ॥
तथाऽऽह रुद्रं कुपिता यदा दारुवने स्थितः ॥
तदा ते मुनयः क्रुद्धाः शापं दास्यंति ते हर ॥ ८७ ॥
भोभोः कापालिक क्षुद्र पत्न्योऽस्माकं जिहीर्षसि ॥
तदेतद्भूषितं लिंग भूमौ रुद्र पतिष्यति ॥ ८८ ॥
विहीनः पौरुषेण त्वं मुनिशापाच्च पीडितः ॥
गंगातीरे स्थिता पत्नी सा त्वामाश्वासयिष्यति ॥ ८९ ॥
अग्ने त्वं सर्वभक्षोऽसि पूर्वं पुत्रेण मे कृतः ॥
भ्रूणहा धर्म इत्येष कथं दग्धं दहाम्यहम् ॥ 7.1.165.९० ॥
जातवेदस रुद्रस्त्वां रेतसा प्लावयिष्यति ॥
मेध्येषु च कृतज्वाला ज्वालया त्वां ज्वलिष्यति ॥ ९१ ॥
ब्राह्मणानृत्विजः सर्वान्सावित्री ह्यशपत्तदा ॥ ९२ ॥
प्रतिग्रहाग्निहोत्राश्च वृथा दारा वृथाश्रमाः ॥
सदा क्षेत्राणि तीर्थानि लोभादेव गमिष्यथ ॥ ९३ ॥
परान्नेषु सदा तृप्ता अतृप्ताः स्वगृहेषु च ॥
अयाज्ययाजनं कृत्वा कुत्सितस्य प्रतिग्रहम् ॥ ९४ ॥
वृथा धनार्जनं कृत्वा व्यवश्चैव तथा वृथा ॥
मृतानां तेन प्रेतत्वं भविष्यति न संशयः ॥ ९५ ॥
एवं शक्रं तथा विष्णुं रुद्रं वै पावकं तथा ॥
ब्रह्माणं ब्राह्मणांश्चैव सर्वांस्तानशपत्तदा ॥ ९६ ॥
शापं दत्त्वा तथा तेषां तदा सावस्थिता स्थिरा ॥ ९७ ॥
लक्ष्मीः प्राह सखीं तां च इन्द्राणी च वरानना ॥
अन्या देव्यस्तथा प्राहुः साऽऽह स्थास्यामि नात्र वै ॥
तत्र चाहं गमिष्यामि यत्र श्रोष्ये न तु ध्वनिम् ॥ ९८ ॥
ततस्ताः प्रमदाः सर्वाः प्रयाताः स्वं निकेतनम् ॥
सावित्री कुपिता तासां पुनः शापाय चोद्यता ॥ ९९ ॥
यस्मान्मां संपरित्यज्य गतास्ता देवयोषितः ॥
तासामपि तथा शापं प्रदास्ये कुपिता भृशम् ॥ 7.1.165.१०० ॥
नैकत्र वासो लक्ष्म्यास्तु भविष्यति कदाचन ॥
रुद्रापि चंचला तावन्मूर्खेषु च वसिष्यसि ॥ १०१ ॥
म्लेच्छेषु पर्वतीयेषु कुत्सिते कुष्ठिते तथा ॥
वाचाटे चावलिप्ते च अभिशस्ते दुरात्मनि ॥
एवंविधे नरे तुभ्यं वसतिः शापकारिता ॥ १०२ ॥
शापं दत्त्वा ततस्तस्या इन्द्राणीमशपत्तदा ॥ १०३ ॥
त्वष्टुर्वाचा गृहीतेन्द्रे पत्यौ ते दुष्टकारिणि ॥
नहुषाय गते राज्ये दृष्ट्वा त्वां याचयिष्यति ॥ ॥ १०४ ॥
अहमिन्द्रः कथं चैषा नोपतिष्ठति चालसा ॥
सर्वान्देवान्हनिष्यामि लप्स्ये नाहं शचीं यदि ॥ १०५ ॥
नष्टा त्वं च तदा शस्ता वने महति दुःखिता ॥
वसिष्यसि दुराचारे शापेन मम गर्विते ॥ १०६ ॥
देवभार्यासु सर्वासु तदा शापमयच्छत ॥ १०७ ॥
न चापत्यकृता प्रीतिः सर्वास्वेव भविष्यति ॥
दह्यमाना दिवारात्रौ वंध्याशब्देन दुःखिताः ॥१०८॥
गौरीमेवं तथा शप्त्वा सा देवी वरवर्णिनी ॥
उच्चै रुरोद सावित्री भर्तृ यज्ञाद्बहिः स्थिता ॥ १०९ ॥
रोदमाना तु सा दृष्टा विष्णुना च प्रसादिता ॥
मा रोदीस्त्वं विशालाक्षि एह्यागच्छ सदः शुभे ॥ 7.1.165.११० ॥
प्रविष्टा च शुभे यागे मेखलां क्षौमवाससी ॥
गृहाण दीक्षां ब्रह्माणि पादौ ते प्रणमे शुभे ॥ १११ ॥
एवमुक्ताऽब्रवीदेनं नाहं कुर्यां वचस्तव ॥
तत्राहं च गमिष्यामि यत्र श्रोष्ये न च ध्वनिम् ॥ ११२ ॥
एतावदुक्त्वा व्यरमदुच्चैः स्थाने क्षितौ स्थिता ॥ ११३ ॥
विष्णुस्तदग्रतः स्थित्वा बद्ध्वा च करसंपुटम् ॥
तुष्टाव प्रणतो भूत्वा भक्त्या परमया युतः ॥ ११४ ॥
॥ विष्णुरुवाच ॥ ॥
नमोऽस्तु ते महादेवि भूर्भुवःस्वस्त्रयीमयि ॥
सावित्रि दुर्गतरिणि त्वं वाणी सप्तधा स्मृता ॥ ११५ ॥
सर्वाणि स्तुतिशास्त्राणि लक्षणानि तथैव च ॥
भविष्या सर्वशास्त्राणां त्वं तु देवि नमोऽस्तु ते ॥ ॥ ११६ ॥
श्वेता त्वं श्वेतरूपासि शशांकेन समानना ॥
शशिरश्मिप्रकाशेन हरिणोरसि राजसे ॥
दिव्यकुंडलपूर्णाभ्यां श्रवणाभ्यां विभूषिता ॥ ॥ ११७ ॥
त्वं सिद्धिस्त्वं तथा ऋद्धिः कीर्तिः श्रीः संततिर्मतिः ॥
संध्या रात्रि प्रभातस्त्वं कालरात्रिस्त्वमेव च ॥ ११८ ॥
कर्षुकाणां यथा सीता भूतानां धारिणी तथा ॥
एवं स्तुवंतं सावित्री विष्णुं प्रोवाच सुव्रता ॥ ११९ ॥
सम्यक्स्तुता त्वया पुत्र अजेयस्त्वं भविष्यसि ॥
अवतारे सदा वत्स पितृमातृसु वल्लभः ॥ 7.1.165.१२० ॥
अनेन स्तवराजेन स्तोष्यते यस्तु मां सदा ॥
सर्वदोषविनिर्मुक्तः परं स्थानं गमिष्यति ॥ १२१ ॥
गच्छ यज्ञं चिरं तस्य समाप्तिं नय पुत्रक ॥ १२२ ॥
कुरुक्षेत्रे प्रयागे च भविष्ये यज्ञकर्मणि ॥
समीपगा स्थिता भर्तुः करिष्ये तव भाषितम् ॥ १२३ ॥
एवमुक्तो गतो विष्णुर्ब्रह्मणः सद उत्तमम् ॥
सावित्री तु समायाता प्रभासे वरवर्णिनि ॥१२४॥
गतायामथ सावित्र्यां गायत्री वाक्यमब्रवीत् ॥१२५॥
शृण्वंतु मुनयो वाक्यं मदीयं भर्तृसन्निधौ ॥
यदहं वच्मि संतुष्टा वरदानाय चोद्यता ॥ १२६ ॥
ब्रह्माणं पूजयिष्यंति नरा भक्तिसमन्विताः ॥
तेषां वस्त्रं धनं धान्यं दाराः सौख्यं सुताश्च वै ॥ १२७ ॥
अविच्छिन्नं तथा सौख्यं गृहं वै पुत्रपौत्रिकम् ॥
भुक्त्वाऽसौ सुचिरं कालं ततो मोक्षं गमिष्यति ॥१२८॥
शक्राहं ते वरं वच्मि संग्रामे शत्रुभिः सह ॥
तदा ब्रह्मा मोचयिता गत्वा शत्रुनिकेतनम् ॥ १२९ ॥
सपुत्रशत्रुनाशात्त्वं लप्स्यसे च परं मुदम् ॥
अकंटकं महद्राज्यं त्रैलोक्ये ते भविष्यति ॥ 7.1.165.१३० ॥
मर्त्यलोके यदा विष्णो ह्यवतारं करिष्यसि ॥
भ्रात्रा सह परं दुःखं स्वभार्या हरणं च यत् ॥ १३१ ॥
हत्वा शत्रुं पुनर्भार्यां लप्स्यसे सुरसन्निधौ ॥
गृहीत्वा तां पुनः प्राज्यं राज्यं कृत्वा गमिष्यसि ॥ १३२ ॥
एकादश सहस्राणि कृत्वा राज्यं पुनर्दिवम्॥
ख्यातिस्ते विपुला लोके चानुरागो भविष्यति॥ १३३ ॥
गायत्री ब्राह्मणांस्तांश्च सर्वानेवाब्रवीदिदम् ॥१३४ ॥
युष्माकं प्रीणनं कृत्वाऽ तृप्तिं यास्यंति देवताः॥
भवंतो भूमिदेवा वै सर्वे पूज्या भविष्यथ ॥ १३५ ॥
युष्माकं पूजनं कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः॥
प्राणायामेन चैकेन सर्वमेतत्तरिष्यथ॥१३६॥
प्रभासे तु विशेषेण जप्त्वा मां वेदमातरम्॥
प्रतिग्रहकृतान्दोषान्न प्राप्स्यध्वं द्विजोत्तमाः॥१३७ ॥
पुष्करे चान्नदानेन प्रीताः सर्वे च देवताः ॥
एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवतिभोजिता ॥ १३८ ॥
ब्रह्महत्यादिपापानि दुरितानि च यानि च ॥
तरिष्यंति नराः सर्वे दत्ते युष्मत्करे धने ॥ १३९ ॥
महीयध्वे तु जाप्येन प्राणायामैस्त्रिभिः कृतैः ॥
ब्रह्महत्यासमं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ 7.1.165.१४० ॥
दशभिर्जन्मजनितं शतेन तु पुरा कृतम् ॥
त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हंति किल्बिषम् ॥ १४१ ॥
एवं ज्ञात्वा सदा पूज्या जाप्ये च मम वै कृते ॥
भविष्यध्वं न सन्देहो नात्र कार्या विचारणा ॥ १४२ ॥
ओंकारेण त्रिमात्रेण सार्धेन च विशेषतः ॥
पूज्याः सर्वे न सन्देहो जप्त्वा मां शिरसा सह ॥ १४३ ॥
अष्टाक्षरस्थिता चाहं जगद्व्याप्तं मया त्विदम् ॥
माताऽहं सर्ववेदानां वेदैः सर्वैरलङ्कता ॥ १४४॥
जत्वा मां परमां सिर्द्धि पश्यन्ति द्विजसत्तमाः ॥
प्राधान्यं मम जाप्येन सर्वेषां वो भविष्यति ॥ १४५ ॥
गायत्रीसारमात्रोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः॥
नायंत्रितश्चतुर्वेदः सर्वाशी सर्वविक्रयी॥१४६॥
यस्माद्भवतां सावित्र्या शापो दत्तो सदे त्विह॥
अत्र दत्तं हुतं चापि सर्वमक्षयकारकम्॥
दत्तो वरो मया तेन युष्माकं द्विजसत्तमाः ॥ १४७ ॥
अग्निहोत्रपरा विप्रास्त्रिकालं होमदायिनः ॥
स्वर्गं ते तु गमिष्यंति एकविंशतिभिः कुलैः ॥ १४८ ॥
एवं शक्रे च विष्णौ च रुद्रे वै पावके तथा ॥
ब्रह्मणो ब्रह्मणानां च गायत्री सा वरं ददौ ॥
तस्मिन्काले वरं दत्त्वा ब्रह्मणः पार्श्वगाऽभवत् ॥ १४९ ॥
हरिणा तु समाख्यातं लक्ष्म्याः शापस्य कारणम् ॥
युवतीनां च सर्वासां शापस्तासां पृथक्पृथक् ॥ 7.1.165.१५० ॥
लक्ष्म्यास्तदा वरं प्रादाद्गायत्री ब्रह्मणः प्रिया ॥ १५१ ॥
अकुत्सिताः सदा पुत्रि तव वासेन शोभने ॥
भविष्यति न संदेहः सर्वेभ्यः प्रीतिदायकाः ॥ १५२ ॥
ये त्वया वीक्षिताः सर्वे सर्वे वै पुण्यभाजनाः ॥
तेषां जातिः कुलं शीलं धर्मश्चैव वरानने ॥ १५३ ॥
परित्यक्तास्त्वया ये तु ते नरा दुःखभागिनः ॥
सभायां ते न शोभन्ते मन्यन्ते न च पार्थिवैः ॥ १५४ ॥
आशिषश्चैव तेषां तु कुर्वते वै द्विजोत्तमाः ॥
सौजन्यं तेषु कुर्वन्ति नप्ता भ्राता पिता गुरुः ॥ १५५ ॥
बांधवोऽसि न संदेहो न जीवेऽहं त्वया विना ॥
त्वयि दृष्टे प्रसन्ना मे दृष्टिर्भवति शोभना ॥
मनः प्रसीदतेऽत्यर्थं सत्यंसत्यं वदामि ते ॥ १५६ ॥
एवंविधानि वाक्यानि त्वया दृष्ट्या निरीक्षिते ॥
सज्जनास्ते वदिष्यन्ति जनानां प्रीतिदायकाः ॥ १५७ ॥
इन्द्राणि नहुषः प्राप्य स्वर्गं त्वां याचयिष्यति ॥
अदृष्ट्वा तु हतः पापो अगस्त्यवचनाद्द्रुतम्॥ १५८ ॥
सर्पत्वं समनुप्राप्य प्रार्थयिष्यति तं मुनिम् ॥
दर्पेणाहं विनष्टोऽस्मि शरणं मे मुने भव ॥ १५९ ॥
वाक्येन तेन तस्यासौ नृपस्य भगवानृषिः ॥
कृत्वा मनसि कारुण्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 7.1.165.१६० ॥
उत्पत्स्यति कुले राजा त्वदीये कुरुनंदन ॥
सार्पं कलेवरं दृष्ट्वा प्रश्नैस्त्वामुद्धरिष्यति ॥ १६१ ॥
सोऽप्यजगरतां त्यक्त्वा पुनः स्वर्गं गमिष्यति ॥
अश्वमेधे कृते भर्त्रा सह यासि पुनर्दिवि ॥
प्राप्स्यसे वर दानेन ममानेन सुलोचने ॥ १६२ ॥
देवपत्न्यस्तदा सर्वास्तुष्टया परिभाषिताः ॥
अपत्यैरपि हीनाः स्युर्नैव दुःखं भविष्यति ॥ १६३ ॥
इति दत्त्वा वरान्देवी गायत्री लोकसंमता ॥
जगामादर्शनं देवी सर्वेषां पश्यतां तदा ॥ १६४ ॥
सावित्री तु तदा देवी प्रभासं क्षेत्रमागता ॥
कृतस्मरस्य शृङ्गे तु श्रीसोमेश्वरपूर्वतः ॥ १६५ ॥
मन्वन्तरे चाक्षुषे च द्वितीये द्वापरे शुभे ॥
तत्र यज्ञः समारब्धो ब्रह्मणा लोककारिणा ॥ १६६ ॥
यज्ञे याता महात्मानो देवाः सप्तर्षयो वराः ॥
स्वायंभुवे तु ये शस्ताः शप्तास्ते चाभवन्पुरा ॥ १६७ ॥
तस्मात्कालात्समारभ्य प्रभासं क्षेत्रमाश्रिताः ॥ १६८ ॥
सावित्री लोकजननी लोकानुग्रहकारिणी ॥
यस्तां पूजयते भक्त्या पक्षमेकं निरंतरम् ॥
ब्रह्मपूजाविधानेन तस्य पुत्रो ध्रुवो भवेत् ॥ १६९ ॥
पाण्डुकूपे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा लिंगानि पञ्च वै ॥
पाण्डवैः स्थापितानीह दृष्ट्वा यज्ञफलं लभेत् ॥ 7.1.165.१७० ॥
ज्येष्ठस्य पूर्णिमायां तु सावित्रीस्थलसंनिधौ ॥
पठेद्यो ब्रह्मसूक्तानि मुच्यते सर्वपातकैः ॥ १७१ ॥
एतत्ते सर्वविख्यातमाख्यातं कल्मषापहम् ॥
यश्चेदं शृणुयाद्भक्त्या स गच्छेत्परमं पदम् ॥ १७२
इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये सावित्रीमाहात्म्यवर्णनंनाम पञ्चषष्ट्युतरशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥

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इसका हिन्दी अनुवाद भेजो स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय १८१ को


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स्कन्दपुराणम्/खण्डः ६ (नागरखण्डः)/अध्यायः १८१


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॥ सूत उवाच ॥ ॥

एतस्मिन्नंतरे सर्वेर्नागरैर्ब्राह्मणोत्तमैः ॥

प्रेषितो मध्यगस्तत्र गर्तातीर्थसमुद्भवः ॥ १ ॥

रेरे मध्यग गत्वा त्वं ब्रूहि तं कुपितामहम् ॥

विप्रवृत्ति प्रहंतारं नीतिमार्गविवर्जितम् ॥ २ ॥

एतत्क्षेत्रं प्रदत्तं नः पूर्वेषां च द्विजन्मनाम् ॥

महेश्वरेण तुष्टेन पूरिते सर्पजे बिले ॥ ३ ॥

तस्य दत्तस्य चाद्यैव पितामहशतं गतम् ॥

पंचोत्तरमसन्दिग्धं यावत्त्वं कुपितामह ॥ ४ ॥

न केनापि कृतोऽस्माकं तिरस्कारो यथाऽधुना ॥

त्वां मुक्त्वा पापकर्माणं न्यायमार्गविवर्जितम् ॥ ५ ॥

नागरैर्ब्राह्मणैर्बाह्यं योऽत्र यज्ञं समाचरेत् ॥

श्राद्धं वा स हि वध्यः स्यात्सर्वेषां च द्विजन्मनाम् ॥ ६ ॥

न तस्य जायते श्रेयस्तत्समुत्थं कथंचन ॥

एतत्प्रोक्तं तदा तेन यदा स्थानं ददौ हि नः ॥ ७ ॥

तस्माद्यत्कुरुषे यज्ञं ब्राह्मणैर्नागरैः कुरु ॥

नान्यथा लप्स्यसे कर्तुं जीवद्भिर्नागरैर्द्विजैः ॥ ८ ॥

एवमुक्तस्ततो गत्वा मध्यगो यत्र पद्मजः ॥

यज्ञमण्डपदूरस्थो ब्राह्मणैः परिवारितः ॥ ९ ॥

यत्प्रोक्तं नागरैः सर्वैः सविशेषं तदा हि सः ॥

तच्छ्रुत्वा पद्मजः प्राह सांत्वपूर्वमिदं वचः ॥ ६.१८१.१० ॥

मानुषं भावमापन्न ऋत्विग्भिः परिवारितः ॥

त्वया सत्यमिदं प्रोक्तं सर्वं मध्यगसत्तम ॥ ११ ॥

किं करोमि वृताः सर्वे मया ते यज्ञकर्मणि ॥

ऋत्विजोऽध्वर्यु पूर्वा ये प्रमादेन न काम्यया ॥ १२ ॥

तस्मादानय तान्सर्वानत्र स्थाने द्विजोत्तमान् ॥

अनुज्ञातस्तु तैर्येन गच्छामि मखमण्डपे ॥ १३ ॥ ॥

॥ मध्यग उवाच ॥ ॥

त्वं देवत्वं परित्यज्य मानुषं भावमाश्रितः ॥

तत्कथं ते द्विजश्रेष्ठाः समागच्छंति तेंऽतिकम् ॥ १४ ॥

श्रेष्ठा गावः पशूनां च यथा पद्मसमुद्भव ॥

विप्राणामिह सर्वेषां तथा श्रेष्ठा हि नागराः ॥ १५ ॥

तत्माच्चेद्वांछसि प्राप्तिं त्वमेतां यज्ञसंभवाम् ॥

तद्भक्त्यानागरान्सर्वान्प्रसादय पितामह ॥ १६ ॥

॥ सूत उवाच ॥ ॥

तच्छ्रुत्वा पद्मजो भीत ऋत्विग्भिः परिवारितः ॥

जगाम तत्र यत्रस्था नागराः कुपिता द्विजाः ॥१७॥

प्रणिपत्य ततः सर्वान्विनयेन समन्वितः ॥

प्रोवाच वचनं श्रुत्वा कृतांजलिपुटः स्थितः॥१८॥

जानाम्यहं द्विजश्रेष्ठाः क्षेत्रेऽस्मिन्हाट केश्वरे ॥

युष्मद्बाह्यं वृथा श्राद्धं यज्ञकर्म तथैव च ॥ १९ ॥

कलिभीत्या मयाऽऽनीतं स्थानेऽस्मिन्पुष्करं निजम् ॥

तीर्थं च युष्मदीयं च निक्षेपोऽ यंसमर्पितः ॥ ६.१८१.२० ॥

ऋत्विजोऽमी समानीता गुरुणा यज्ञसिद्धये ॥

अजानता द्विजश्रेष्ठा आधिक्यं नागरात्मकम् ॥ २१ ॥

तस्माच्च क्षम्यतां मह्यं यतश्च वरणं कृतम् ॥

एतेषामेव विप्राणामग्निष्टोमकृते मया ॥ २२ ॥

एतच्च मामकं तीर्थं युष्माकं पापनाशनम् ॥

भविष्यति न सन्देहः कलिकालेऽपि संस्थिते ॥ २३ ॥

॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥ ॥

यदि त्वं नागरैर्बाह्यं यज्ञं चात्र करिष्यसि ॥

तदन्येऽपि सुराः सर्वे तव मार्गानुयायि नः ॥

भविष्यन्ति तथा भूपास्तत्कार्यो न मखस्त्वया ॥ २४ ॥

यद्येवमपि देवेश यज्ञकर्म करिष्यसि ॥

अवमन्य द्विजान्सर्वाक्षिप्रं गच्छास्मदंतिकात् ॥ २५ ॥

॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥

अद्यप्रभृति यः कश्चिद्यज्ञमत्र करिष्यति ॥

श्राद्धं वा नागरैर्बाह्यं वृथा तत्संभविष्यति ॥२६॥

नागरोऽपि च यो न्यत्र कश्चिद्यज्ञं करिष्यति ॥

एतत्क्षेत्रं परित्यज्य वृथा तत्संभविष्यति ॥ २७ ॥

मर्यादेयं कृता विप्रा नागराणां मयाऽधुना ॥

कृत्वा प्रसादमस्माकं यज्ञार्थं दातुमर्हथ ॥

अनुज्ञां विधिवद्विप्रा येन यज्ञं करोम्यहम् ॥ २८ ॥

॥ सूत उवाच ॥ ॥

ततस्तैर्ब्राह्मणैस्तुष्टैरनुज्ञातः पितामहः ॥

चकार विधिवद्यज्ञं ये वृता ब्राह्मणाश्च तैः ॥ २९ ॥

विश्वकर्मा समागत्य ततो मस्तकमण्डनम् ॥

चकार ब्राह्मणश्रेष्ठा नागराणां मते स्थितः ॥ ६.१८१.३० ॥

ब्रह्मापि परमं तोषं गत्वा नारदमब्रवीत् ॥

सावित्रीमानय क्षिप्रं येन गच्छामि मण्डपे ॥ ३१ ॥

वाद्यमानेषु वाद्येषु सिद्धकिन्नरगुह्यकैः ॥

गन्धर्वैर्गीतसंसक्तैर्वेदोच्चारपरैर्द्विजैः ॥

अरणिं समुपादाय पुलस्त्यो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३२ ॥

पत्नी ३ पत्नीति विप्रेन्द्राः प्रोच्चैस्तत्र व्यवस्थिताः ॥ ३३ ॥

एतस्मिन्नंतरे ब्रह्मा नारदं मुनिसत्तमम्॥

संज्ञया प्रेषयामास पत्नी चानीयतामिति ॥ ३४ ॥

सोऽपि मंदं समागत्य सावित्रीं प्राह लीलया ॥

युद्धप्रियोंऽतरं वांछन्सावित्र्या सह वेधसः [। ३५ ॥

अहं संप्रेषितः पित्रा तव पार्श्वे सुरेश्वरि ॥

आगच्छ प्रस्थितः स्नातः सांप्रतं यज्ञमण्डपे ॥ ३६ ॥

परमेकाकिनी तत्र गच्छमाना सुरेश्वरि ॥

कीदृग्रूपा सदसि वै दृश्यसे त्वमनाथवत् ॥ ३७ ॥

तस्मादानीयतां सर्वा याः काश्चिद्देवयोषितः ॥

याभिः परिवृता देवि यास्यसि त्वं महामखे ॥ ३८ ॥

एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठो नारदो मुनिसत्तमः ॥

अब्रवीत्पितरं गत्वा तातांबाऽऽकारिता मया ॥ ३९ ॥

परं तस्याः स्थिरो भावः किंचित्संलक्षितो मया ॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ततो मन्युसमन्वितः॥६.१८१.४॥।

पुलस्त्यं प्रेषयामास सावित्र्या सन्निधौ ततः ॥

गच्छ वत्स त्वमानीहि स्थानं सा शिथिलात्मिका ॥

सोमभारपरिश्रांतं पश्य मामूर्ध्वसंस्थितम्॥४१॥

एष कालात्ययो भावि यज्ञकर्मणि सांप्रतम्॥

यज्ञयानमुहूर्तोऽयं सावशेषो व्यवस्थितः ॥४२॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुलस्त्यः सत्वरं ययौ ॥

सावित्री तिष्ठते यत्र गीतनृत्यसमाकुला ॥ ४३ ॥

ततः प्रोवाच किं देवि त्वं तिष्ठसि निराकुला ॥

यज्ञयानोचितः कालः सोऽयं शेषस्तु तिष्ठति ॥४४॥

तस्मादागच्छ गच्छामस्तातः कृच्छ्रेण तिष्ठति॥

सोमभारार्द्दितश्चोर्ध्वं सर्वैर्देवैः समावृतः ॥४५॥

॥ सावित्र्युवाच ॥ ॥

सर्वदेववृतस्तात तव तातो व्यवस्थितः ॥

एकाकिनी कथं तत्र गच्छाम्यहमनाथवत् ॥४६॥

तद्ब्रूहि पितरं गत्वा मुहूर्तं परिपाल्यताम् ॥४७॥

यावदभ्येति शक्राणी गौरी लक्ष्मीस्तथा पराः॥

देवकन्याः समाजेऽत्र ताभिरेष्याम्यह८द्रुतम् ॥ ४८ ॥

सर्वासां प्रेषितो वायुर्निमत्रणकृते मया ॥

आगमिष्यन्ति ताः शीघ्रमेवं वाच्यः पिता त्वया ॥४९॥

॥ सूत उवाच ॥ ॥

सोऽपि गत्वा द्रुतं प्राह सोमभारार्दितं विधिम्॥

नैषाभ्येति जगन्नाथ प्रसक्ता गृहकर्मणि ॥ ६.१८१.५० ॥

सा मां प्राह च देवानां पत्नीभिः सहिता मखे ॥

अहं यास्यामि तासां च नैकाद्यापि प्रदृश्यते ॥ ५१ ॥

एवं ज्ञात्वा सुरश्रेष्ठ कुरु यत्ते सुरोचते ॥

अतिक्रामति कालोऽयं यज्ञयानसमुद्रवः ॥

तिष्ठते च गृहव्यग्रा सापि स्त्री शिथिलात्मिका ॥ ५२ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य पुलस्त्यस्य पितामहः ॥

समीपस्थं तदा शक्रं प्रोवाच वचनं द्विजाः ॥ ५३ ॥

॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥

शक्र नायाति सावित्री सापि स्त्री शिथिलात्मिका ॥

अनया भार्यया यज्ञो मया कार्योऽयमेव तु ॥ ५४ ॥

गच्छ शक्र समानीहि कन्यां कांचित्त्वरान्वितः ॥

यावन्न क्रमते कालो यज्ञयानसमुद्भवः ॥ ५५ ॥

पितामहवचः श्रुत्वा तदर्थं कन्यका द्विजाः ॥

शक्रेणासादिता शीघ्रं भ्रममाणा समीपतः ॥ ५६ ॥

अथ तक्रघटव्यग्रमस्तका तेन वीक्षिता ॥

कन्यका गोपजा तन्वी चंद्रास्या पद्मलोचना ॥ ५७ ॥

सर्वलक्षणसंपूर्णा यौवनारंभमाश्रिता ॥

सा शक्रेणाथ संपृष्टा का त्वं कमललोचने ॥ ५८ ॥

कुमारी वा सनाथा वा सुता कस्य ब्रवीहि नः ॥ ५९ ॥

॥ कन्यो वाच ॥ ॥

गोपकन्यास्मि भद्रं ते तक्रं विक्रेतुमागता ॥

यदि गृह्णासि मे मूल्यं तच्छीघ्रं देहि मा चिरम् ॥ ६.१८१.६० ॥

तच्छ्रुत्वा त्रिदिवेन्द्रोऽपि मत्वा तां गोपकन्यकाम् ॥

जगृहे त्वरया युक्तस्तक्रं चोत्सृज्य भूतले ॥ ६१ ॥

अथ तां रुदतीं शक्रः समादाय त्वरान्वितः ॥

गोवक्त्रेण प्रवेश्याथ गुह्येनाकर्षयत्ततः ॥ ६२ ॥

एवं मेध्यतमां कृत्वा संस्नाप्य सलिलैः शुभैः ॥

ज्येष्ठकुण्डस्य विप्रेन्द्राः परिधाय्य सुवाससी ॥ ६३ ॥

ततश्च हर्षसंयुक्तः प्रोवाच चतुराननम् ॥

द्रुतं गत्वा पुरो धृत्वा सर्वदेवसमागमे ॥ ६४ ॥

कन्यकेयं सुरश्रेष्ठ समानीता मयाऽधुना ॥

तवार्थाय सुरूपांगी सर्वलक्षणलक्षिता ॥ ६५ ॥

गोपकन्या विदित्वेमां गोवक्त्रेण प्रवेश्य च ॥

आकर्षिता च गुह्येन पावनार्थं चतुर्मुख ॥ ६६ ॥

॥ श्रीवासुदेव उवाच ॥ ॥

गवां च ब्राह्मणानां च कुलमेकं द्विधा कृतम् ॥

एकत्र मंत्रास्तिष्ठंति हविरन्यत्र तिष्ठति ॥ ६७ ॥

धेनूदराद्विनिष्क्रांता तज्जातेयं द्विजन्मनाम् ॥

अस्याः पाणिग्रहं देव त्वं कुरुष्व मखाप्तये ॥ ६८

यावन्न चलते कालो यज्ञयानसमुद्भवः ॥ ६९ ॥

॥ रुद्र उवाच ॥ ॥

प्रविष्टा गोमुखे यस्मादपानेन विनिर्गता ॥

गायत्रीनाम ते पत्नी तस्मादेषा भविष्यति ॥ ६.१८१.७० ॥

॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॥

वदन्तु ब्राह्मणाः सर्वे गोपकन्याप्यसौ यदि ॥

संभूय ब्राह्मणीश्रेष्ठा यथा पत्नी भवेन्मम ॥ ७१ ॥

॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥ ॥

एषा स्याद्ब्राह्मणश्रेष्ठा गोपजातिविवर्जिता ॥

अस्मद्वाक्याच्चतुर्वक्त्र कुरु पाणिग्रहं द्रुतम् ॥ ७२ ॥

॥ सूत उवाच ॥ ॥

ततः पाणिग्रहं चक्रे तस्या देवः पितामहः ॥

कृत्वा सोमं ततो मूर्ध्नि गृह्योक्तविधिना द्विजाः ॥ ७३ ॥

संतिष्ठति च तत्रस्था महादेवी सुपावनी ॥

अद्यापि लोके विख्याता धनसौभाग्यदायिनी ॥ ॥ ७४ ॥

यस्तस्यां कुरुते मर्त्यः कन्यादानं समाहितः ॥

समस्तं फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ७९ ॥

कन्या हस्तग्रहं तत्र याऽऽप्नोति पतिना सह ॥

सा स्यात्पुत्रवती साध्वी सुखसौभाग्यसंयुता ॥ ७६ ॥

पिंडदानं नरस्तस्यां यः करोति द्विजोत्तमाः ॥

पितरस्तस्य संतुष्टास्तर्पिताः पितृतीर्थवत् ॥ ७७ ॥


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इति श्रीस्कादे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां षष्ठे नागरखण्डे हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये गायत्रीविवाहे गायत्रीतीर्थमाहात्म्यवर्णनंनामैकाशीत्युत्तरशततमोअध्यायः ॥ १८१ ॥


स्कन्दपुराणम्/खण्डः ६ (नागरखण्डः)/अध्यायः १८२

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॥ सूत उवाच ॥ ॥

एवं पत्नीं समासाद्य गायत्रीं चतुराननः ॥

संप्रहृष्टमना भूत्वा प्रस्थितो यज्ञमण्डपम् ॥ १ ॥

गायत्र्यपि समादाय मूर्ध्नि तामरणिं मुदा ॥

प्रतस्थे संपरित्यज्य गोपभावं विगर्हितम् ॥ २ ॥

वाद्यमानेषु वाद्येषु ब्रह्मघोषे दिवंगते ॥

कलं प्रगायमानेषु गन्धर्वेषु समंततः ॥ ३ ॥

सर्वदेवद्विजोपेतः संप्राप्तो यज्ञमण्डपे ॥

गायत्र्या सहितो ब्रह्मा मानुषं भावमाश्रितः ॥ ४ ॥

एतस्मिन्नंतरे चक्रे केशनिर्वपणं विधेः ॥

विश्वकर्मा नखानां च गायत्र्यास्तदनंतरम् ॥ ५ ॥

औदुम्बरं ततो दण्डं पुलस्त्योऽस्मै समाददे ॥

एणशृंगान्वितं चर्म मन्त्रवद्विजसत्तमाः ॥ ६ ॥

पत्नीशालां गृहीत्वा च गायत्रीं मौनधारिणीम् ॥

मेखलां निदधे चान्यां कट्यां मौंजीमयीं शुभाम् ॥ ७ ॥

ततश्चक्रे परं कर्म यदुक्तं यज्ञमंडपे ॥

ऋत्विग्भिः सहितो वेधा वेदवाक्यसमादृतः ॥ ८ ॥

प्रवर्ग्ये जायमाने च तत्राश्चर्यमभून्महत् ॥

जाल्मरूपधरः कश्चिद्दिग्वासा विकृताननः ॥ ९ ॥

कपालपाणिरायातो भोजनं दीयतामिति ॥

निषेध्यमानोऽपि च तैः प्रविष्टो याज्ञिकं सदः ॥

स कृत्वाऽटनमन्याय्यं तर्ज्यमानोऽपि तापसैः ॥ ६.१८२.१० ॥

॥ सदस्या ऊचुः ॥ ॥

कस्मात्पापसमेतस्त्वं प्रविष्टो यज्ञमण्डपे ॥

कपाली नग्नरूपो यो यज्ञकर्मविवर्जितः ॥ ११ ॥

तस्माद्गच्छ द्रुतं मूढ यावद्ब्रह्मा न कुप्यति ॥

तथाऽन्ये ब्राह्मणश्रेष्ठास्तथा देवाः सवासवाः ॥ १२ ॥

॥ जाल्म उवाच ॥ ॥

ब्रह्मयज्ञमिमं श्रुत्वा दूरादत्र समागतः ॥

बुभुक्षितो द्विजश्रेष्ठास्तत्किमर्थं विगर्हथ ॥ १३ ॥

दीनांधैः कृपणैः सवैर्स्तर्पितैः क्रतुरुच्यते ॥

अन्यथाऽसौ विनाशाय यदुक्तं ब्राह्मणैर्वचः ॥१४॥

अन्नहीनो दहेद्राष्टं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः ॥

याज्ञिकं दक्षिणा हीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ॥ १५ ॥

॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥ ॥

यदि त्वं भोक्तुकामस्तु समायातो व्रज द्रुतम् ॥

एतस्यां सत्रशालायां भुञ्जते यत्र तापसाः ॥

दीनान्धाः कृपणाश्चैव ततः क्षुत्क्षामकंठिताः ॥ १६ ॥

अथवा धनकामस्त्वं वस्त्रकामोऽथ तापस ॥

व्रज वित्तपतिर्यत्र दानशालां समाश्रितः ॥ १७ ॥

अनिंद्योऽयं महामूर्ख यज्ञः पैतामहो यतः ॥

अर्चितः सर्वतः पुण्यं तत्किं निन्दसि दुर्मते ॥ १८ ॥

॥ सूत उवाच ॥ ॥

एवमुक्तः कपालं स परिक्षिप्य धरातले ॥

जगामादर्शनं सद्यो दीपवद्द्विजसत्तमाः ॥ १९ ॥

॥ ऋत्विज ऊचुः ॥ ॥

कथं यज्ञक्रिया कार्या कपाले सदसि स्थिते ॥

परिक्षिपथ तस्मात्तु एवमूचुर्द्विजोत्तमाः ॥ ६.१८२.२० ॥

अथैको बहुधा प्रोक्तः सदस्यैश्च द्विजोत्तमैः ॥

दण्डकाष्ठं समुद्यम्य प्रचिक्षेप बहिस्तथा ॥ २१ ॥

अथान्यत्तत्र संजातं कपालं तादृशं पुनः ॥

तस्मिन्नपि तथा क्षिप्ते भूयोऽन्यत्समपद्यत ॥ २२ ॥

एवं शतसहस्राणि ह्ययुतान्यर्बुदानि च ॥

तत्र जातानि तैर्व्याप्तो यज्ञवाटः समंततः ॥ २३ ॥

हाहाकारस्ततौ जज्ञे समस्ते यज्ञमण्डपे ॥

दृष्ट्वा कपालसंघांस्तान्यज्ञ कर्मप्रदूषकान्॥ २४ ॥

अथ संचिंतयामास ध्यानं कृत्वा पितामहः ॥

हरारिष्टं समाज्ञाय तत्सर्वं हृष्टरूपधृक् ॥ २५ ॥

कृतांजलिपुटो भूत्वा ततः प्रोवाच सादरम्॥

महेश्वरं समासाद्य यज्ञवाटसमाश्रितम्॥ २६ ॥

किमिदं युज्यते देव यज्ञेऽस्मिन्कर्मणः क्षतिः ॥

तस्मात्संहर सर्वाणि कपालानि सुरेश्वर ॥ २७ ॥

यज्ञकर्मविलोपोऽयं मा भूत्त्वयि समागते ॥ २८ ॥

ततः प्रोवाच संक्रुद्धो भगवाञ्छशिशेखरः ॥

तन्ममेष्टतमं पात्रं भोजनाय सदा स्थितम्॥ २९ ॥

एते द्विजाधमाः कस्माद्विद्विषंतिपितामह ॥

तथा न मां समुद्दिश्य जुहुवुर्जातवेदसि ॥ ६.१८२.३० ॥

यथान्यादेवता स्तद्वन्मन्त्रपूतं हविर्विधे ॥

तस्माद्यदि विधे कार्या समाप्तिर्यज्ञकर्मणि ॥ ३१ ॥

तत्कपालाश्रितं हव्यं कर्तव्यं सकलं त्विदम् ॥

तथा च मां समु द्दिश्य विशषाज्जातवेदसि ॥ ३२ ॥

होतव्यं हविरेवात्र समाप्तिं यास्यति क्रतुः ॥

नान्यथा सत्यमेवोक्तं तवाग्रे चतुरानन ॥ ३३ ॥

॥ पितामह उवाच ॥ ॥

रूपाणि तव देवेश पृथग्भूतान्यनेकशः ॥

संख्यया परिहीनानि ध्येयानि सकलानि च ॥ ३४ ॥

एतन्महाव्रतं रूपमाख्यातं ते त्रिलोचन ॥

नैवं च मखकर्म स्यात्तत्रैव च न युज्यते ॥ ३५ ॥

अद्यैतत्कर्म कर्तुं च श्रुतिबाह्यं कथंचन ॥

तव वाक्यमपि त्र्यक्ष नान्यथा कर्तुमु त्सहे ॥ ३६ ॥

मृन्मयेषु कपालेषु हविः श्राप्यं सुरेश्वर ॥

अद्यप्रभृति यज्ञेषु पुरोडाशात्मिकं द्विजैः ॥

तवोद्देशेन देवेश होतव्यं शतरुद्रि यम् ॥ ३७ ॥

विशेषात्सर्वयज्ञेषु जप्यं चैव विशेषतः ॥

कपालानां तु द्वारेण त्वया रूपं निजं कृतम् ॥ ३८ ॥

प्रकटं च सुरश्रेष्ठ कपाले श्वरसंज्ञितः ॥

तस्मात्त्वं भविता रुद्र क्षेत्रेऽस्मिन्द्वादशोऽपरः ॥ ३९ ॥

अत्र यज्ञं समारभ्य यस्त्वां प्राक्पूजयिष्यति ॥

अविघ्नेन मख स्तस्य समाप्तिं प्रव्रजिष्यति ॥ ६.१८२.४० ॥

एवमुक्ते ततस्तेन कपालानि द्विजोत्तमाः ॥

तानि सर्वाणि नष्टानि संख्यया रहितानि च ॥ ४१ ॥

ततो हृष्टश्चतुर्वक्त्रः स्थापयामास तत्क्षणात् ॥

लिगं माहेश्वरं तत्र कपालेश्वरसंज्ञितम् ॥ ४२ ॥

अब्रवीच्च ततो वाक्यं यश्चैतत्पूजयिष्यति ॥

मम कुण्डत्रये स्नात्वा स यास्यति परां गतिम्॥ ४३ ॥

शुक्लपक्षे चतुर्दश्यां कार्तिके जागरं तु यः ॥

करिष्यति पुनश्चास्य लिंगस्य सुसमाहितः ॥

आजन्मप्रभवात्पापात्स विमुक्तिमवाप्स्यति ॥ ४४ ॥

एवमुक्तेऽथ विधिना प्रहृष्टस्त्रिपुरांतकः ॥

यज्ञमण्डपमासाद्य प्रस्थितो वेदिसंनिधौ ॥ ४५ ॥

ब्राह्मणैश्च ततः कर्म प्रारब्धं यज्ञसम्भवम् ॥

विस्मयोत्फुल्लनयनैर्नमस्कृत्य महेश्वरम् ॥ ४६ ॥

॥ सूत उवाच ॥ ॥

एवं च यज तस्तस्य चतुर्वक्त्रस्य तत्र च ॥

ऋषीणां कोटिरायाता दक्षिणापथवासिनाम् ॥ ४७ ॥

श्रुत्वा पैतामहं यज्ञं कौतुकेन समन्विताः ॥

कीदृशो भविता यज्ञो दीक्षितो यत्र पद्मजः ॥ ४८८ ॥

कीदृक्क्षेत्रं च तत्पुण्यं हाटकेश्वरसंज्ञितम् ॥

कीदृशास्ते च विप्रेन्द्रा ऋत्विजस्तत्र ये स्थिताः ॥ ४९ ॥

अथ ते सुपरिश्रांता मध्यंदिनगते रवौ ॥

रविवारेण संप्राप्ते नक्षत्रे चाश्विसंस्थिते ॥ ६.१८२.५० ॥

वैवस्वत्यां तिथौ चैव प्राप्ता घर्मपीडिताः ॥

कंचिज्जलाशयं प्राप्य प्रविष्टाः सलिलं शुभम् ॥ ५१ ॥

शंकुकर्णा महाकर्णा वकनासास्तथापरे ॥

महोदरा बृहद्दन्ता दीर्घोष्ठाः स्थूलमस्तकाः॥५२॥

चिपिटाक्षास्तथा चान्ये दीर्घग्रीवास्तथा परे॥

कृष्णांगाः स्फुटितैः पादैर्नखैर्दीर्घैः समुत्थितैः॥५३॥

ततो यावद्विनिष्क्रांताः प्रपश्यन्ति परस्परम्॥

तावद्वैरूपस्यनिर्मुक्ताः संजाताः कामसन्निभाः॥५४॥

ततो विस्मयमापन्ना मिथः प्रोचुः प्रहर्षिताः॥

रूपव्यत्ययमालोक्य ज्ञात्वा तीर्थं तदुत्तमम्॥

अत्र स्नानादिदं रूपमस्माभिः प्राप्तमुत्तमम्॥५५॥

यस्मात्तस्मादिदं तीर्थं रूपतीर्थं भविष्यति॥

त्रैलोक्ये सकले ख्यातं सर्वपातकनाशनम्॥५६॥

येऽत्र स्नानं करिष्यन्ति श्रद्धया परया युताः॥

सुरूपास्ते भविष्यंति सदा जन्मनि जन्मनि॥५७॥

पितॄंश्च तर्पयिष्यन्ति य त्र श्रद्धासमन्विताः॥

जलेनापि गयाश्राद्धात्ते लप्स्यन्ते धिकं फलम्॥५८॥

येऽत्र रत्नप्रदानं च प्रकरिष्यन्ति मानवाः॥

भविष्यंति न संदेहो राजानस्ते भवेभवे॥५९॥

स्थास्यामो वयमत्रैव सांप्रतं कृतनिश्चयाः॥

न यास्यामो वयं तीर्थं यद्यपि स्यात्सुशोभनम्॥६.१८२.६०॥

एवमुक्त्वाऽथ व्यभजंस्तत्सर्वं मुनयश्च ते॥

यज्ञोपवीतमात्राणि स्वानि तीर्थानि चक्रिरे॥६१॥

सूत उवाच॥

अद्यापि च द्विजश्रेष्ठास्तत्र तीर्थे जगद्गुरुः॥

प्रथमं स्पृशते तोयं नित्यं स्याद्दयितं शुभम्॥६२॥

निष्कामस्तु पुनर्मर्त्यो यः स्नानं तत्र श्रद्धया।.

कुरुते स परं श्रेयः प्राप्नुयात्सिद्धिलक्षणम्॥६३॥

एवं ते मुनयः सर्वे विभज्य तन्महत्सरः॥

सायंतनं च तत्रैव कृत्वा कर्म सुविस्तरम्॥६४.॥

ततो निशामुखे प्राप्ता यत्र देवः पितामहः॥

दीक्षितस्त्वथ मौनी च यज्ञमण्डपसंश्रितः॥६५॥

तं प्रणम्य ततः सर्वे गता यत्रर्त्विजः स्थिताः॥

उपविष्टाः परिश्रान्ता दिवा यज्ञियकर्मणा॥६६॥

इन्द्रादिकैः सुरैर्भक्त्या मृद्यमानाङ्घ्रयः स्थिताः॥

अभिवाद्याथ तान्सर्वानुपविष्टास्ततो ग्रतः॥६७॥

चक्रुश्चाथ कथाश्चित्रा यज्ञकर्मसमुद्भवाः॥

सोमपानस्य संबन्धो व्यत्ययं च समुद्भवम्॥६८॥

उद्गातुः प्रभवं चैव तथाध्वर्योः परस्परम्॥

प्रोचुस्ते तत्त्वमाश्रित्य तथान्ये दूषयन्ति तत्॥६९॥

अन्ये मीमांसकास्तत्र कोपसंरक्तलोचनाः।.

हन्युस्तेषां मतं वादमाश्रिता वाग्विचक्षणाः॥ ६.१८२.७०॥

परिशिष्टविदश्चान्ये मध्यस्था द्विजसत्तमाः॥

प्रोचुर्वादं परित्यज्य साभिप्रायं यथोदितम्॥७१॥

महावीरपुरोडाशचयनप्रमुखांस्तथा॥

विवादांश्चक्रिरे चान्ये स्वंस्वं पक्षं समाश्रिताः॥७२॥

एवं सा रजनी तेषामतिक्रान्ता द्विजन्मनाम्।७३॥

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां षष्ठे नागरखण्डे हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये रूपतीर्थोत्पत्तिपूर्वकप्रथमयज्ञदिवसवृत्तान्तवर्णनंनाम द्व्यशीत्युत्तरशततमोऽध्यायः॥१८२॥



स्कन्दपुराणम्/खण्डः ६ (नागरखण्डः)/अध्यायः १८३


< स्कन्दपुराणम्‎ | खण्डः ६ (नागरखण्डः)

                 सूत उवाच॥

द्वितीये दिवसे प्राप्ते यज्ञकर्मसमुद्भवे॥

द्वादश्यामभवत्तत्र शृणुध्वं तद्द्विजोत्तमाः॥

वृत्तान्तं सर्वदेवानां महाविस्मयकारकम् ॥ १ ॥

मखकर्मणि प्रारब्ध ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः ॥

जलसर्पं समादाय बटुः कश्चित्सुनर्मकृत् ॥ २ ॥

प्रविश्याथ सदस्तत्र तं सर्पं ब्राह्मणान्तिके ॥

चिक्षेप प्रहसंश्चैव सर्वदुःखभयंकरम् ॥ ३ ॥

ततस्तु डुण्डुभस्तूर्णं भ्रममाण इतस्ततः ॥

विप्राणां सदसिस्थानां सक्तानां यज्ञकर्मणि ॥ ४ ॥

अहो होतुः स्थिते प्रैषे दीर्घसत्रसमुद्भवे ॥

स सर्पो वेष्टयामास तस्य गात्रं समंततः ॥ ५ ॥

न चचाल निजस्थानात्प्रायश्चित्तविभीषया ॥

नोवाच वचनं सोऽत्र चयनन्यस्तलोचनः ॥ ६ ॥

हाहाकारो महाञ्जज्ञे एतस्मिन्नंतरे द्विजाः ॥

तस्मिन्सदसि विप्राणां विषा ढ्याहिप्रशंकया ॥ ७ ॥

हाहाकारो महानासीत्तं दृष्ट्वा सर्पवेष्टितम् ॥

तस्य पुत्रो विनीतात्मा मैत्रावरुणकर्मणि ॥ ९ ॥

संस्थितस्तेन संदृष्टः पिता सर्पाभिवेष्टितः ॥

ज्ञात्वा तु चेष्टितं तस्य भये सर्पसमुद्भवे ॥

शशाप क्रोधसंयुक्तस्ततस्तं स बटुं मुनिः ॥ ९ ॥

यस्मात्पाप त्वया सर्पः क्षिप्तः सदसि दुर्मते ॥

तस्माद्भव द्रुतं सर्पो मम वाक्यादसंशयम् ॥ ६.१८३.१० ॥

॥ बटुरुवाच ॥ ॥

हास्येन जलसर्पोऽयं मया मुक्तोऽत्र लीलया ॥

न ते तातं समुद्दिश्य तत्किं मां शपसि द्विज ॥ ११ ॥

एतस्मिन्नंतरे मुक्त्वा तस्य गात्रं स पन्नगः ॥

जगामान्यत्र तस्यापि सर्पत्वं समपद्यत ॥ १२ ॥

सोऽपि सर्पत्वमापन्नः सनातनसुतो बटुः ॥

दुःखशोकसमापन्नो ब्राह्मणैः परिवेष्टितः ॥ १३ ॥

अथ गत्वा भृगुं सोऽपि बाष्पव्याकुललोचनः ॥

प्रोवाच गद्गदं वाक्यं प्रणिपत्य पुरःसरः ॥ १४ ॥

सनातनसुतश्चास्मि पौत्रस्तु परमेष्ठिनः ॥

शप्तस्तव सुतेनास्मि च्यवनेन महात्मना ॥ १५ ॥

निर्दोषो ब्राह्मणश्रेष्ठ तस्माच्छापात्प्ररक्ष माम् ॥

तच्छ्रुत्वा च्यवनं प्राह कृपाविष्टो भृगुः स्वयम् ॥१६॥

अयुक्तं विहितं तात यच्छप्तोऽयं बटुस्त्वया॥

न मां धर्षयितुं शक्तो विषाढ्योऽपि भुजंगमः ॥१७॥

किं पुनर्जलसर्पोऽयं निर्विषो रज्जुसंनिभः ॥

न मामुद्दिश्य निर्मुक्तः सर्पोऽनेन द्विजन्मना ॥

शापमोक्षं कुरुष्वास्य तस्माच्छीघ्रं द्विजन्मनः ॥ १९ ॥

॥ च्यवन उवाच ॥ ॥

यदि त्यजति मर्यादामब्धिः शैत्यं व्रजेद्रविः ॥

उष्णत्वं च क्षपानाथस्तन्मे स्यादनृतं वचः ॥ १९ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्वयमेव पितामहः ॥

तत्रायातः स्थितो यत्र स पौत्रः सर्परूपधृक् ॥ ६.१८३.२० ॥

प्रोवाच न विषादस्ते पुत्र कार्यः कथंचन ॥

यत्सर्पत्वमनुप्राप्तः शृणुष्वात्र वचो मम ॥ २१ ॥

पुरा संस्रष्टुकामोऽहं नागानां नवमं कुलम् ॥

तद्भविष्यति त्वत्पार्श्वात्समर्यादं धरातले ॥ २२ ॥

मन्त्रौषधियुजां पुंसां न पीडामाचरिष्यति ॥

संप्राप्स्यति परां पूजां समस्ते जगतीतले ॥ २३ ॥

अत्राऽस्ति सुशुभं तोयं हाटकेश्वरसंज्ञिते ॥

क्षेत्रे तत्र समावासः पुत्र कार्यस्त्वया सदा ॥ २४ ॥

तत्रस्थस्य तपस्थस्य नागः कर्कोटको निजम् ॥

तव दास्यति सत्कन्यां ततः सृष्टिर्भविष्यति ॥ २५ ॥

नवमस्य कुलस्यात्र समर्यादस्य भूतले ॥

श्रावणे कृष्णपक्षे तु संप्राप्ते पंचमीदिने ॥ २६ ॥

संप्राप्स्यति परां पूजां पृथिव्यां नवमं कुलम् ॥

अद्यप्रभृति तत्तोयं नागतीर्थमिति स्मृतम् ॥२७॥

ख्यातिं यास्यति भूपृष्ठे सर्वपातकनाशनम्॥

येऽत्र स्नानं करिष्यंति संप्राप्ते पंचमीदिने ॥२८॥

न तेषां वत्सरंयावद्भविष्यत्यहिजं भयम् ॥

विषार्द्दितस्तु यो मर्त्यस्तत्र स्नानं करिष्यति ॥२९॥

तत्क्षणान्निर्विषो भूत्वा संप्राप्स्यति परं सुखम् ॥

पुत्रकामा तु या नारी पंचम्यां भास्करोदये ॥६.१८३.३॥।

करिष्यति तथा स्नानं फलहस्ता प्रभक्तितः ॥

भविष्यति च सा शीघ्रं वंध्याऽपि च सुपुत्रिणी ॥३१॥

॥ सूत उवाच ॥ ॥

एवं प्रवदतस्तस्य ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥

अन्ये नागाः समायातास्तत्र यज्ञे निमंत्रिताः ॥ ३२ ॥

वासुकिस्तक्षकश्चैव पुण्डरीकः कृशोदरः ॥

कम्बलाश्वतरौ नागौ शेषः कालिय एव च ॥ ३३ ॥

ते प्रणम्य वचः प्रोचुः प्रोच्चैर्देवं पितामहम् ॥

तवादेशाद्वयं प्राप्ता यज्ञेऽत्र प्रपितामह॥३४॥

साहाय्यार्थं तदादेशो दीयतां प्रपितामह॥

येन कुर्मो वयं शीघ्रं नागराज्ये ह्यधिष्ठिताः ॥३५॥

ब्रह्मोवाच ॥ साहाय्यमेतदस्माकं भवदीयं महोरगाः ॥

गत्वानेन समं शीघ्रं नागराजेन तिष्ठत॥३६॥

नागतीर्थे ततः स्थेयं सर्वैस्तत्र समास्थितैः ॥३७॥

यः कश्चिन्मम यज्ञेऽत्र दुष्टभावं समाश्रितः ॥

समागच्छति विघ्नाय रक्षणीयः स सत्वरम् ॥३८॥

राक्षसो वा पिशाचो वा भूतो वा मानुषोऽपि वा ॥

एतत्कृत्यतमं नागा मम यज्ञस्य रक्षणम् ॥ ३९ ॥

तथा यूयमपि प्राप्ते मासि भाद्रपदे तथा ॥

पंचम्यां कृष्णपक्षस्य तत्र पूजामवाप्स्यथ ॥ ६.१८३.४० ॥

॥ सूत उवाच ॥ ॥

बाढमित्येव ते प्रोच्य प्रणिपत्य पितामहम् ॥

सनातनसुतोपेता नागतीर्थं समाश्रिताः ॥ ४१

ततःप्रभृति तत्तीर्थं नागतीर्थ मिति स्मृतम् ॥

कामप्रदं च भक्तानां नराणां स्नानकारिणाम् ॥ ४२ ॥

यस्तत्र कुरुते स्नानं सकृद्भक्त्या समन्वितः ॥नान्वयेऽपि भयं तस्य जाय ते सर्पसंभवम् ॥ ४३ ॥

तत्र यच्छति मिष्टान्नं द्विजानां सज्जनैः सह ॥पूजयित्वा तु नागेंद्रान्सनातनपुरःसरान् ॥ ४४ ॥

सप्तजन्मांतरं यावन्न स दौःस्थ्यमवाप्नुयात् ॥भूतप्रेतपिशाचानां शाकिनीनां विशेषतः ॥     न च्छिद्रं न च रोगाश्च नाधयो न रिपोर्भयम् ॥ ४५॥

यश्चैतच्छृणुयाद्भक्त्या वाच्यमानं द्विजोत्तमाः ॥सोऽपि संवत्सरं यावत्पन्नगैर्न च पीड्यते।४६॥

सर्पदष्टस्य यस्यैतत्पुरतः पठ्यते भृशम् ॥नागतीर्थस्य माहात्म्यं काल दष्टोऽपि जीवति।४७॥

पुस्तके लिखितं चैतन्नागतीर्थसमुद्भवम् ॥माहात्म्यं तिष्ठते यत्र न सर्पस्तत्र तिष्ठति।४८ ॥

________________

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां षष्ठे नागरखण्डे हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये नागतीर्थोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनंनाम त्र्यशीत्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥

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सहस्राक्षं त्वया कष्टं मन्मखे विपुलं कृतम् ॥आनीता च तथा पत्नी गायत्री च सुमध्यमा ॥ ६.१९०.५० ॥ (स्कन्द  नागर खण्ड अध्याय 190




सृष्ट्यर्थं भगवान्विष्णुः सविता स प्रकीर्तितः ।।

सर्वलोकप्रसवनात्सविता स तु कीर्त्यते ।। ८ ।।

यतस्तद्देवदेवत्या सावित्रीत्युच्यते ततः ।।

गानाद्वा त्रायते यस्माद्गायत्री वा तदा स्मृता ।। ९ ।।

एतस्मात्कारणाद्राजन्सावित्री कीर्तिता मया ।।

तव धर्मभृतां श्रेष्ठ नित्यं वैष्णवकर्मसु ।। 1.165.१० ।।


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