बुधवार, 7 दिसंबर 2022

"परशुराम और सहस्रबाहू की पैराणिक गाथा"

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"प्रस्तुतिकरण- यादव योगेश कुमार "रोहि"

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा।जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे।।1-65-4

वे भगवान् सहस्र बाहू  विष्णु के अंश से उत्पन्न हुए थे । और स्वयं दत्तात्रेय  ने उनकी तपस्या से प्रभावित होकर उन्हें स्वेक्षा से वरदान दिया था। 

दस वरदान जिन भगवान् दत्तात्रेय ने  कार्तवीर्यार्जुन  को प्रदान किये थे वे इस प्रकार है।
1- ऐश्वर्य शक्ति प्रजा पालन के योग्य हो, किन्तु अधर्म न बन जावे।
2- दूसरो के मन की बात जानने का ज्ञान हो।
3- युद्ध में कोई सामना न कर सके।
4- युद्ध के समय उनकी सहत्र भुजाये प्राप्त हो, उनका भार  न लगे 
5- पर्वत 'आकाश" जल" पृथ्वी और पाताल में अविहत गति हो।
6-मेरी मृत्यु अधिक श्रेष्ठ हाथो से हो।
7-कुमार्ग में प्रवृत्ति होने पर सन्मार्ग का उपदेश प्राप्त हो।
8- श्रेष्ठ अतिथि की निरंतर प्राप्ति होती रहे।
9- निरंतर दान से धन न घटे।
10- स्मरण मात्र से धन का आभाव दूर हो जावे एवं भक्ति बनी रहे। 
मांगे गए वरदानों से स्वतः सिद्ध हो जाता है कि सहस्त्रबाहु अर्जुन अर्थात् कार्तवीर्यार्जुन -ऐश्वर्यशाली, प्रजापालक, धर्मानुसार आचरण करने  वाले, शत्रु के मन की बात जान लेने वाले, हमेशा सन्मार्ग में विचरण करने वाले, अतिथि सेवक, दानी महापुरुष थे, जिन्होंने अपने शौर्य पराक्रम से पूरे विश्व को जीत लिया और चक्रवर्ती सम्राट बने।
पृथ्वी लोक मृत लोक है, यहाँ जन्म लेने वाला कोई भी अमरत्व को प्राप्त नहीं है, यहाँ तक की दुसरे समाज के लोग जो परशुराम को भगवान् की संज्ञा प्रदान करते है और सहस्त्रबाहु को कुछ और की संज्ञा प्रदान कर रहे है, परशुराम द्वारा निसहाय लोगों/क्षत्रियों अबोध शिशुओ का अनावश्यक बध करना जैसे कृत्यों से ही क्षुब्ध होकर त्रेतायुग में भगवान् राम जी ने उनसे अमोघ शक्ति वापस ले ली थी।

और उन्हें तपस्या हेतु बन जाना पड़ा, वे भी अमरत्व को प्राप्त नहीं हुए। 
भगवान् श्री रामचंद्र जी द्वारा अमोघ शक्ति वापस ले लेना ही सिद्ध करता है की, परशुराम जी सन्मार्ग पर स्वयं नहीं चल रहे थे।
एक समाज द्वारा दुसरे समाज के लोगो की भावनाओं को कुरेदना तथा भड़काना सभ्य समाज के प्राणियों, विद्वानों को शोभा नहीं देता है। 
महाराज कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन हमारे लिए पूज्यनीय थे, पूज्यनीय रहेगे।

परशुराम ने केवल उनकी सहस्र भुजाओं का उच्छेदन भले ही कर दिया हो परन्तु उनका बध कभी नहीं हुआ -

महाराज सहस्रार्जुन जी का वध नही हुआ। अंत समय मे उन्होने समाधि ले ली।
इसकी व्याख्या कई पौराणिक कथाओ में की गयी है।

साक्ष्य के रूप मे माहेश्वर स्थित श्री राजराजेश्वर समाधि मंदिर, प्रामाणिक साक्ष्य है।
श्री राजराजेश्वर कार्तवीर्यार्जुन मंदिर में समाधि पर अनंत काल से (11) अखंड दीपक प्रज्ज्वलित है।

यहाँ शिवलिंग स्थापित है जिसमें श्री कार्तवीर्यार्जुन की आत्म-ज्योति ने प्रवेश किया था। उनके पुत्रध्वज के राज्याभिषेक के बाद उन्होने यहाँ योग समाधि ली थी। 
मन्त्रमहोदधि के अनुसार श्री कार्तवीर्यार्जुन को दीपक प्रिय है इसलिए समाधि के पास 11अखंड दीपक जल रहे हैं।
दूसरी ओर दीपक जलने से यह भी सिद्ध होता है की यह समाधि श्री कार्तवीर्यार्जुन की है।

भारतीय समाज मे स्मारक को पूजने की परम्परा नही है परन्तु महेश्वर के मन्दिर में अनंत काल से पूजन परंपरा और अखंड दीपक जलते रहे हैं।
अतएव कार्तवीर्यार्जुन के वध की मान्यता निरधार व कपोल कल्पित है।

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"महाभारत ग्रन्थ और भारतीय पुराणों में वर्णित जिन क्षत्रियों को परशुराम द्वारा मारने की बात हुई है वे सहस्रबाहू के वंशज हैहय वंश के यादव ही थे ।

भार्गवों- जमदग्नि, परशुराम आदि और हैहयवंशी यादवों की शत्रुता का कारण बहुत गूढ़ है । जमदग्नि और सहस्रबाहू परस्पर हमजुल्फ( साढू संस्कृत रूप- श्यालिबोढ़्री ) थे। परशुराम की माता रेणुका और सहस्रबाहू की पत्नी वेणुका सगी बहिनें थी और  स्वयं परशुराम की उत्पत्ति सहस्रबाहु के द्वारा गुप्त यौन-सम्बन्ध से हुई थी।

परशुराम की अवैध सम्बन्धों से हुई उत्पत्ति को छुपाने के लिए इसके विपरीत सहस्रबाहू के वंशजों की काल्पनिक कथाऐं का सृजन शास्त्रीय सिद्धान्तों की तिलाञ्जलि देकर किया गया। 

इसी तथ्य की पड़ताल में हम शास्त्रीय विश्लेषण करेंगे-

'परशुराम ने कहा★  हे ! धर्मिष्ठ राजेन्द्र! तुम तो चन्द्ररवंश में उत्पन्न हुए हो और विष्णु के अंशभूत बुद्धिमान दत्तात्रेय के शिष्य हो।

शृणु राजेन्द्र धर्मिष्ठ चन्द्रवंशसमुद्भव।विष्णोरंशस्य शिष्यस्त्वं दत्तात्रेयस्य धीमतः।५४ 

ब्रह्मवैवर्तपुराण गणपति खण्ड अध्याय (35)

तुम स्वयं विद्वान हो और वेदज्ञों के मुख से तुमने वेदों का श्रवण भी किया है; फिर भी तुम्हें इस समय सज्जनों को विडम्बित करने वाली दुर्बुद्धि कैसे उत्पन्न हो गयी ? 

तुमने पहले लोभवश निरीह ब्राह्मण की हत्या कैसे कर डाली ?

जिसके कारण सती-साध्वी ब्राह्मणी शोक-संतप्त होकर पति के साथ सती हो गयी। भूपाल!           इन दोनों के वध से परलोक में तुम्हारी क्या गति होगी ? यह सारा संसार तो कमल के पत्ते पर पड़े हुए जल की बूँद की तरह मिथ्या ही है। सुयश को अथवा अपयश, उसकी तो कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। अहो! सत्पुरुषों की दुष्कीर्ति हो, इससे बढ़कर और क्या विडम्बना होगी ? कपिला कहाँ गयी, तुम कहाँ गये, विवाद कहाँ गया और मुनि कहाँ चले गये; परंतु एक विद्वान राजा ने जो कर्म कर डाला, वह हलवाहा भी नहीं कर सकता।

मेरे धर्मात्मा पिता ने तो तुम-जैसे नरेश को उपवास करते देखकर भोजन कराया और तुमने उन्हें वैसा फल दिया! राजन? तुमने शास्त्रों का अध्ययन किया है, तुम प्रतिदिन ब्राह्मणों को विधिपूर्वक दान देते हो और तुम्हारे यश से सारा जगत व्याप्त है। फिर बुढ़ापे में तुम्हारी अपकीर्ति कैसे हुई ? 

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परशुराम -  कार्तवीर्य्य अर्जुन की प्रशंसा करते हुए कहते हैं।

(प्राचीन काल के वन्दीगण ऐसा कहते हैं कि भूतल पर कार्तवीर्यार्जुन के समान दाता, सर्वश्रेष्ठ, धर्मात्मा, यशस्वी, पुण्यशाली और उत्तम बुद्धिसम्पन्न न कोई हुआ है और न आगे होगा।

    लक्ष्मीनारायणसंहिता - खण़्डः १(कृतयुगसन्तानः).अध्यायः ४५८

                    लेखकः →

             ★श्रीनारायण उवाच★

शृणु लक्ष्मि! माधवांशः पर्शुराम उवाच तम् ।

कार्तवीर्य रणमध्ये धर्मभृतं वचो यथा ।१।

शृणु राजेन्द्र! धर्मिष्ठ चन्द्रवंशसमुद्भव ।

विष्णोरंशस्य शिष्यस्त्वं दत्तात्रेयस्य धीमतः।२।

कथे दुर्बुद्धिमाप्तस्त्वमहनो वृद्धभूसुरम् ।

ब्राह्मणी शोकसन्तप्ता भर्त्रा सार्धे गता सती।३।

किं भविष्यति ते भूप परत्रैवाऽनयोर्वधात् ।

क्व गता कपिला सा ते कीदृक् कूलं भविष्यति।४।

यत्कृतं तु त्वया राजन् हालिको न करिष्यति।

सत्कीर्तिश्चाथदुष्कीर्तिःकथामात्राऽवशेषिता।५।

त्वया कृतो घोरतरस्त्वन्यायस्तत्फलं लभ ।

उत्तरं देहि राजेन्द्र समाजे रणमूर्धनि ।। ६ ।।

कार्तवीर्याऽर्जुनः श्रुत्वा प्रवक्तुमुपचक्रमे।

शृणु राम हरेरंशस्त्वमप्यसि न संशयः।७।

सद्बुद्ध्या कर्मणा ब्रह्मभावनां करोति यः ।

स्वधर्मनिरतः शुद्धो ब्राह्मणः स प्रकीर्त्यते ।८।

अन्तर्बहिश्च मननात् कुरुते फलदां क्रियाम् ।

मौनी शश्वद् वदेत् काले हितकृन्मुनिरुच्यते।९।

स्वर्णे लोष्टे गृहेऽरण्ये पंके सुस्निग्धचन्दने ।

रामवृत्तिः समभावो योगी यथार्थ उच्यते ।। 1.458.10।

सर्वजीवेषु यो विष्णुं भावयेत् समताधिया।

हरौ करोति भक्तिं च हरिभक्तः स उच्यते।११।

राष्ट्रीयाः शतशश्चापि महाराष्ट्राश्च वंगजाः।गौर्जराश्च कलिंगाश्च रामेण व्यसवः कृताः।५२।

द्वादशाक्षौहिणीः रामो जघान त्रिदिवानिशम् ।

तावद्राजा कार्तवीर्यः श्रीलक्ष्मीकवचं करे ।।५३।।

बद्ध्वा शस्त्रास्त्रसम्पन्नो रथमारुह्य चाययौ ।

युयुधे विविधैरस्त्रैर्जघान ब्राह्मणान् बहून्।५४।

तावत् ध्यातोऽर्जुनगुरुर्दत्तात्रेयः समागतः।

ददौ शूलं हि रामस्य नाशार्थं कृष्णवर्म च।८५।।

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जग्राह राजा शूलं तश्चिक्षेप रामकन्धरे।

मूर्छामवाप रामः सः पपात श्रीहरिं स्मरन्।८६।

ब्राह्मणं जीवयामास शंभुर्नारायणाज्ञया ।

चेतनां प्राप्य च रामोऽग्रहीत् पाशुपतं यदा।८७।

दत्तात्रेयेण दत्तेन सिद्धाऽस्त्रेणाऽर्जुनस्तु तम् ।जडीचकार तत्रैव स्तम्भितो राम एव वै।८८।

श्रीकृष्णरक्षितं भूपं ददर्श कृष्णवर्म च ।

ददर्शाऽपि भ्रमत्सुदर्शनं रक्षाकरं रिपोः ।८९।

वैसे भी परशुराम का स्वभाव ब्राह्मण ऋषि जमदग्नि से नहीं अपितु सहस्रबाहु से मेल खाता है विज्ञान की भाषा में इसे ही जेनेटिक अथवा आनुवंशिक गुण कहते हैं ।

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विदित हो कि सहस्रबाहू की पत्नी वेणुका और परशुराम की माता तथा पिता जमदग्नि की पत्नी रेणुका सगी बहिनें थी।
रेणुका सहस्रबाहू के पौरुष और पराक्रम पर आसक्त और उसकी भक्त थी । 
जबकि जमदग्नि ऋषि निरन्तर साधना में संलग्न रहते थे। वे अपनी पत्नी को कभी पत्नी का सुख नहीं दे पाते थे ।

राजा रेणु की पुत्री होने से रेणुका में रजोगुण की अधिकता होने के कारण से वह रति तृष्णा से पीड़ित रहती थी । और सहस्र बाहु से प्रणय निवेदन जब कभी करती रहती  थी परन्तु सहस्रबाहू एक धर्मात्मा राजा ही नही सम्राट भी था । 
परन्तु पूर्वज ययाति की कथाओं ने उन्हें भी सहमत कर दिया जब शर्मिष्ठा दासी ने उन ययाति से एकान्त में प्रणय निवेदन किया था और उसे पीड़ा निवारक बताया था ।
उसी के परिणाम स्वरूप रेणुका का एकान्त प्रणय निवेदन सहस्रबाहू ने भी स्वीकार कर लिया परिणाम स्वरूप परशुराम की उत्पत्ति हुई । परशुराम अपने चार भाईयों सबसे छोटे थे ।
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रेणुका राजा प्रसेनजित अथवा राजा रेणु की कन्या थीं जो परशुराम की माता और जमदग्नि ऋषि की पत्नी थीं, जिनके पाँच पुत्र थे।

विशेष—रेणुका विदर्भराज की कन्या और जमदग्नि ऋषि की पत्नी थी। एक बार ये गंगास्नान करने गई। वहा राजा चित्ररथ को स्त्रियों के साथ जलक्रीड़ा करते हुए देख रेणुका ने देख लिए तो रेणुका के मन में रति पिपासा  जाग्रत हो गयी। 
चित्ररथ भी एक यदुवंश के राजा थे ; जो विष्णु पुराण के अनुसार रुषद्रु और भागवत के अनुसार विशदगुरु के पुत्र थे।

एक बार ऋतु काल  में सद्यस्नाता रेणुका राजा चित्ररथ पर मुग्ध हो गयी। उसके आश्रम पहुँचने पर  जमदग्नि  मुनि को रेणुका और चित्ररथ की  समस्त घटना ज्ञात हो गयी। 

उन्होंने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चार बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। 

अन्त में  परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उसे वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने पहले वर से माँ का पुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों को क्षमा कर देने के लिए कहा।

जमदग्नि ऋषि ने परशुराम से कहा कि वो अमर रहेगा। कहते हैं कि यह रेणुका (पद्म) कमल से उत्पन्न अयोनिजा थीं। प्रसेनजित इनके पोषक पिता थे। सन्दर्भ- (महाभारत-  अरण्यपर्व- अध्याय-११६ )

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"परन्तु  उपर्युक्त आख्यानक के कुछ पहलू विचारणीय  हैं। जैसे कि रेणुका का कमल से उत्पन्न होना, और जमदग्नि के द्वारा उसका पुनर्जीवित करना ! दोनों ही घटनाऐं  प्रकृति के सिद्धान्त के विरुद्ध होने से काल्पनिक हैं । जैसा की पुराणों में अक्सर किया जाता है ।

और तृतीय आख्यानक यह है  कि  "भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को  परशुराम का उत्पन्न होना  है।

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"गर्भस्थ शिशुओं की हत्या करना विष्णु अवतारी का गुण नहीं हो सकता है।

महाभारत शान्तिपर्व में परशुराम किस प्रकार हैहयवंश के यदुवंशीयों की स्त्रियों के गर्भस्थ शिशुओं की हत्या करते हैं ?
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"मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि।भयात्क्षत्रियवीराणां पर्वतं समुपाश्रितः।59।

"सा पुनःक्षत्रियशतैःपृथिवी सर्वतः स्तृता।परावसोर्वचःश्रुत्वा शस्त्रं जग्राह भार्गवः।60।

"ततो ये क्षत्रिया राजञ्शतशस्तेन वर्जिताः। ते विवृद्धा महावीर्याः पृथिवीपतयोऽभवन्।61।

"स पुनस्ताञ्जघान् आशु बालानपि नराधिप गर्भस्थैस्तु मही व्याप्ति पुनरेवाभवत्तदा ।62।)

"जातंजातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह।अरक्षंश्च सुतान्कांश्चित्तदाक्षत्रिय योषितः।63।

"त्रिःसप्तकृत्वःपृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः।दक्षिणामश्वमेधान्ते कश्यपायाददत्ततः।64।

सन्दर्भ:-(महाभारत शान्ति                पर्व अध्याय ४८)

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"अर्थ- मैं तो समझता हूँ कि तुमने क्षत्रिय वीरों के भय से ही पर्वत की शरण ली है।  इस समय पृथ्वी पर सब और पुनः सैकडों क्षत्रिय भर गये हैं।राजन् ! परावसु की बात सुनकर भृगुवंशी परशुराम ने पुनः शस्त्र उठा लिया। पहले उन्होंने जिन सैकडों क्षत्रियों को छोड़ दिया था, वे ही बढ़कर महापराक्रमी भूपाल बन बैठे थे। 

"नरेश्वर! उन्होंने पुन: उन सबके छोटे-छोटे शिशुओं तक शीघ्र ही मार डाला जो बच्चे गर्भ में रह गये थे, उन्हीं से पुनः यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी।परशुराम एक एक गर्भ के उत्पन्न होने पर पुनः उसका वध कर डालते थे।उस समय क्षत्राणियाँ कुछ ही पुत्रों को बचा सकीं थी।

 राजन् ! तदनन्तर कुछ क्षत्रियों को बचाये रखने की इच्छा से कश्यपजी ने स्रुक् ( स्रुवा)लकड़ी की बनी हुई एक प्रकार की छोटी करछी जिससे हवनादि में घी की आहुति देते हैं। उसको लिये हुए हाथ से संकेत करते हुए यह बात कही- मुने ! अब तुम दक्षिण समुद्र के तट पर चले जाओ। अब कभी मेरे राज्य में निवास न करना।

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(ब्रह्म वैवर्त पुराण गणपति खण्ड अध्याय (४०)
में भी वर्णन है कि २१ बार पृथ्वी से क्षत्रिय को नष्ट कर दिया और उन क्षत्रियों की पत्नीयों के गर्भस्थ शिशुओं की हत्या कर दी!
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"एवं त्रिस्सप्तकृत्वश्च क्रमेण च वसुन्धराम् ।।
रामश्चकार निर्भूपां लीलया च शिवं स्मरन् ।। ७३ ।।
"गर्भस्थं मातुरङ्कस्थं शिशुं वृद्धं च मध्यमम्।
जघान क्षत्रियं रामः प्रतिज्ञापालनाय वै।७४। __________________

सन्दर्भ- कालिकापुराण अध्यायः (८३) मेेंं परशुराम जन्म की कथा वर्णित है।   

              "त्र्यशीतितमोऽध्यायः।83।
                    "और्व्व उवाच"
"अथ काले व्यतीते तु जमदग्निर्महातपाः।
विदर्भराजस्य सुतां प्रयत्नेन जितां स्वयम्।१।

अर्थ-
"भार्यार्थं प्रतिजग्राह रेणुकां लक्षणान्विताम्।
सा तस्मात् सुषुवे षत्रांश्चतुरो वेदसम्मितान्।२।
अर्थ-

"रुषण्वन्तं सुषेणां च वसुं विश्वावसुं तथा।पश्चात् तस्यां स्वयं जज्ञे भगवान् परशुराम:।३।

अर्थ-

"कार्तवीर्यवधायाशु शक्राद्यैः सकलैः सुरैः।
याचितः पंचमः सोऽभूत् रामाह्वयस्तु सः।४।

"भारावतरणार्थाय जातः परशुना सह।
सहजं परशुं तस्य न जहाति कदाचन।५।
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"अयं निजपितामह्याश्चरुभुक्तिविपर्ययात्।
ब्राह्मणःक्षत्रियाचारो रामोऽभूतक्रूरकर्मकृत्।६।

"स वेदानखिलान् ज्ञात्वा धनुर्वेदं च सर्वशः।
सततं कृतकृत्योऽभूद् वेदविद्याविशारदः।७।
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"एकदा तस्य जननी स्नानार्थं रेणुका गता।
गङ्गातोये ह्यथापश्यन्नाम्ना चित्ररथं नृपम्।८।

"भार्याभिः सदृशीभिश्च जलक्रीडारतं शुभम्।
सुमालिनं सुवस्त्रं तं तरुणं चन्द्रमालिनम्।९।
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"तथाविधं नृपं दृष्ट्वा सञ्जातमदना भृशम्।
रेणुका स्पृहयामास तस्मै राज्ञे सुवर्चसे।१०।

"स्पृहायुतायास्तस्यास्तु संक्लेदःसमजायत।
विचेतनाम्भसा क्लिन्ना त्रस्ता सा स्वाश्रमं ययौ।११।
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"अबोधि जमदग्निस्तां रेणुकां विकृतां तथा।
धिग् धिक्काररतेत्येवं निनिन्द च समन्ततः।१२।
"ततः स तनयान् प्राह चतुरः प्रथमं मुनिः।
रुषण्वत्प्रमुखान् सर्वानेकैकं क्रमतो द्रुतम्।१३।
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"छिन्धीमां पापनिरतां रेणुकां व्यभिचारिणीम्।
ते तद्वचो नैव चक्रुर्मूकाश्चासन् जडा इव।१४।

"कुपितो जमदग्निस्ताञ्छशापेति विचेतसः।
गाधिं नृपतिशार्दूलं स चोवाच नृपो मुनिम्।१५।

"भवध्वं यूयमाचिराज्जडा गोबुद्धिगर्धिताः।अथाजगाम चरमो जामदग्न्येऽतिवीर्यवान्।। ८३.१६ ।।

"तं च रामं पिता प्राह पापिष्ठां छिन्धि मातरम्।स भ्रातृंश्च तथाभूतान् दृष्ट्वा ज्ञानविवर्जितान्।१७ ।                    "पित्रा शप्तान् महातेजाः प्रसूं परशुनाच्छिनत्। रामेण रेणुकां छिन्नां दृष्ट्वा विक्रोधनोऽभवत्।१८।

"जमदग्निः प्रसन्नःसन्निति वाचमुवाच ह।
प्रीतोऽस्मिपुत्रभद्र ते यत्त्वया मद्वचःकृतम्।१९।
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"तस्मादिष्टान् वरान् कामांस्त्वं वै वरय साम्प्रतम्।
स तु रामो वरान् वव्रे मातुरुत्थानमादितः।२०।

वधस्यास्मरणं तस्या भ्रातृणां शपमोचनम्।
मातृहत्याव्यपनयं युद्धे सर्वत्र वै जयम्।२१।
आयुः कल्पान्तपर्यन्तं क्रमाद् वै नृपसत्तम।
सर्वान् वरान् स प्रददौ जमदग्निर्महातपाः।२२। 
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"सुप्तोत्यितेव जननी रेणुका च तदाभवत्।
वधं न चापि सस्मार सहजा प्रकृतिस्थिता।२३।

युद्धे जयं चिरायुष्यं लेभे रामस्तदैव हि।
मातृहत्याव्यपोहाय पिता तं वाक्यमव्रवीत्।२४।
न पुत्र वरदानेन मातृहत्यापगच्छति।
तस्मात् त्वं ब्रह्मकुण्डायगच्छस्नातुं च तज्जले।२५।
तत्र स्नात्वा मुक्तपापो नचिरात् पुनरेष्यसि।
जगद्धिताय पुत्र त्वं ब्रह्मकुण्डं व्रज द्रुतम्।२६।
स तस्य वचन श्रुत्वा रामः परशुधृक् तदा।
उपदेशात् पितुर्घातो ब्रह्मकुण्डं वृषोदकम्।२७।
तत्र स्नानं च विधिवत् कृत्वा धौतपरश्वधः।
शरीरान्निःसृतां मातृहत्यां सम्यग् व्यलोकयत्।२८।
जातसंप्रत्ययः सोऽथ तीर्थमासाद्य तद्वरम्।
वीथीं परशुना कृत्वा ब्रह्मपुत्रमवाहयत्।२९ ।
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ब्रह्मकुण्डात् सृतःसोऽथ कासारे लोहिताह्वये।
कैलासोपत्यकायां तु न्यपतद् ब्रह्मणःसुतः।३०।

तस्यापि सरसस्तीरे समुत्थाय महाबलः।
कुठारेण दिशं पूर्वामनयद् ब्रह्मणः सुतम्।३१।
ततः परत्रापि गिरिं हेमशृङ्गं विभिद्य च।
कामरूपान्तरं पीठमावहद्यदमुं हरिः।३२।
तस्य नाम स्वयं चक्रे विधिर्लोहितगङ्गकम्।
लोहितात् सरसो जातो लोहिताख्यस्ततोऽभवत्।३३।
स कामरूपमखिलं पीठमाप्लाव्य वारिणा।
गोपयन् सर्वतीर्थानि दक्षिणं याति सागरम्।३४।
प्रागेव दिव्ययमुनां स त्यक्त्वा ब्रह्मणः सुतः।
पुनः पतति लौहित्ये गत्वा द्वादशयोजनम्।३५। चैत्रे मासि सिताष्टम्यां यो नरो नियतेन्द्रियः।      चैत्रं तु सकलं मासं शुचिः प्रयतमानसः।३६। स्नाति लौहित्यतोये तु स याति ब्रह्मणः पदम्।  लौहित्यतोये यः स्नाति स कैवल्यमवाप्नुयात्।३७ ।इति ते कथितं राजन् यदर्थं मातरं पुरा।            अहन् वीरोजामदग्न्यो यस्माद् वाक्रूरकर्मकृत्।३८।इदं तु महदाख्यानं यः शृणोति दिने दिने।            स दीर्घायुः प्रमुदितो बलवानभिजायते।३९।          इति ते कथितं राजञ्छरीरार्धं यथाद्रिजा।शम्भोर्जहार वेतालभैरवौ च यथाह्वयौ।४०।       यस्य वा तनयौ जातौ यथा यातौ गणेशताम्।किमन्यत् कथये तुभ्यं तद्वदस्व नृपोत्तम।४१।

               ★मार्कण्डेय उवाच★
इत्यौर्व्वस्य च संवादः सगरेम महात्मना।
योऽसौ कायार्धहरणं शम्भोर्गिरिजया कृतः।४२।
सर्वोऽद्य कथितो विप्राः पृष्टं यच्चान्यदुत्तमम्।
सिद्धस्य भैरवाख्यस्य पीठानां च विनिर्णयम्।४३।
भृङ्गिणश्च यथोत्पत्तिर्महाकालस्य चैव हि।
उक्तं हि वः किमन्यत् तु पृच्छन्तु द्विजसत्तमाः४४।
इति सकलसुतन्त्रं तन्त्रमन्त्रावदातं बहुतरफलकारि  प्राज्ञविश्रामकल्पम्।
उपनिषदमवेत्य ज्ञानमार्गेकतानं स्रवति स इह नित्यं यः पठेत् तन्त्रमेतत्।८३.४५ ।

"इति श्रीकालिकापुराणे          त्र्यशीतितमोऽध्यायः।८३।

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"महाभारत के अरण्यपर्व वनपर्व के अनुसार परशुराम का जन्म"

           ★वैशंपायन उवाच★

स तत्र तामुषित्वैकां रजनीं पृथिवीपतिः।             तापसानां परं चक्रे सत्कारं भ्रातृभिः सह। 1।लोमशस्तस्य तान्सर्वानाचख्यौ तत्र तापसान्।भृगूनङ्गिरसश्चैव वसिष्ठानथ काश्यपान् ।2।तान्समेत्य सा राजर्षिरभिवाद्य कृताञ्जलिः।   रामस्यानुचरं वीरमपृच्छदकृतव्रणम् ।3।           कदा नु रामो भगवांस्तापसो दर्शयिष्यति।           तमहं तपसा युक्तं द्रष्टुमिच्छामि भार्गवम् ।4।   

               „अकृतव्रण उवाच„

आयानेवासि विदितो रामस्य विदितात्मनः।         प्रीतिस्त्वयि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शयिष्यति ।5।चतुर्दशीमष्टमीं च रामं पश्यन्ति तापसाः।              अस्यां रात्र्यां व्यतीतायां भवित्री श्वश्चतुर्दशी।6।ततो द्रक्ष्यसि रामं त्वं कृष्णाजिनजटाधरम्'।7।

              ★युधिष्ठिर उवाच★

भवाननुगतो रामं जामदग्न्यं महाबलम्।           प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पूर्ववृत्तस्य कर्मणः ।7।         स भवान्कथयत्वद्य यथा रामेण निर्जिताः।           आहवे क्षत्रियाः सर्वे कथं केन च हेतुना ।8।                          अकृतव्रण उवाच

[हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम्।           भृगूणां राजशार्दूल वंशे जातस्य भारत ।9।रामस्य जामदग्न्यस्य चरितं देवसम्मितम्।     हैहयाधिपतेश्चैव कार्तवीर्यस् भारत।10।    रामेण चार्जुनो नाम हैहयाधिपतिर्हतिः।                तस्य बाहुशतान्यासंस्त्रीणि सप्त च पाण्डव11 दत्तात्रेयप्रसादेन विमानं काञ्चनं तथा।                   ऐश्वर्यं सर्वभूतेषु पृथिव्यां पृथिवीपते ।12।अव्घाहतगतिश्चैव रथस्तस्य महात्मनः।                 रथेन तेन तु सदावरदानेन वीर्यवान् ।13।     ममर्द देवान्यक्षांश्च ऋषींश्चैव समन्ततः।              भूतांश्चैव स सर्वांस्तु पीडयामास सर्वतः।14।      ततो देवाः समेत्याहुर्ऋषयश्च महाव्रताः।               देवदेवं सुरारिघ्नं विष्णुं सत्यपराक्रमम्।भगवन्भूतरार्थमर्जुनं जहि वै प्रभो ।15।        विमानेन च दिव्येन हैहयाधिपतिः प्रभुः।          शचीसहायं क्रीडन्तं धर्षयामास वासवम्।16।ततस्तु भगवान्देवः शक्रेण सहितस्तदा।कार्तवीर्यविनाशार्थं मन्त्रयामास भारत ।17।यत्तद्भूतहितं कार्यं सुरेन्द्रेण निवेदितम्।          संप्रतिश्रुत्य तत्सर्वं भगवाँल्लोकपूजितः।        जगाम बदरीं रम्यां स्वमेवाश्रममण्डलम् ।18।

एतस्मिन्नेव काले तु पृथिव्यां पृथिवीपतिः।]कान्यकुब्जे महानासीत्पार्थिवः सुमहाबलः।                                          गाधीति विश्रुतो लोके वनवासं जगाम ह ।19।    वने तु तस्य वसतः कन्या जज्ञेऽप्सरःसमा।ऋचीको भार्गवस्तां च वरयामास भारत ।20।             तमुवाच ततो गाधिर्ब्राह्मणं संशितव्रतम्।उचितं नः कुले किंचित्पूर्वैर्यत्संप्रवर्तितम् ।21।                 एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम्।      सहस्रं वाजिनां शुक्लमिति विद्धि द्विजोत्तम |22।न चापि भगवान्वाच्योदीयतामिति भार्गव।            देया मे दुहिता चैव त्वद्विधाय महात्मने ।23।

                  !ऋचीक उवाच!                      एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम्।दास्याम्यश्वसहस्रं ते मम भार्या सुताऽस्तु ते ।24।

                  ।।गाधिरुवाच।                    ददास्यश्वसहस्रं मे तव भार्या सुताऽस्तु मे' ।-25

                  अकृतव्रण उवाच। 

स तथेति प्रतिज्ञाय राजन्वरुणमब्रवीत्।          एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम्।सहस्रं वाजिनामेकं शुल्कार्थं प्रतिदीयताम्।26।तस्मै प्रादात्सहस्रं वै वाजिनां वरुणस्तदा।तदश्वतीर्थं विख्यातमुत्थिता यत्र ते हयाः।27।गङ्गायां कान्यकुब्जे वै ददौ सत्यवतीं तदा।          ततो गाधिः सुतां चास्मै जन्याश्चासन्सुरास्तदा।28।लब्धं हयसहस्रं तु तां च दृष्ट्वा दिवौकसः।     विस्मयं परमं जग्मुस्तमेव दिवि संस्तुवन्' ।29।

धर्मेण लब्ध्वा तां भार्यामृचीको द्विजसत्तमः।यथाकामं यथाजोषं तया रेमे सुमध्यया ।30।        तं विवाहे कृतेराजन्सभार्यमवलोककः।       आजगाम भृगुश्रेष्ठः पुत्रं दृष्ट्वा ननन्द च ।31

भार्यापती तमासीनं भृगुं सुरगणार्चितम्।    अर्चित्वा पर्युपासीनौ प्राञ्जली तस्थतुस्तदा ।32। ततः स्नुषां स भगवान्प्रहृष्टो भृगुरब्रवीत्।            वरं वृणीष्व सुभगे दाता ह्यस्मि तवेप्सितम् ।33।सा वै प्रसादयाभास तं गुरुं पुत्रकारणात्।आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ।34।                          "भृगुरुवाच".                          ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय वै।आलिङ्गेतां पृथग्वृक्षौ साऽस्वत्थं त्वमुदुम्बरम् ।35।चरुद्वयमिदं भद्रे जनन्याश्च तवैव च।विश्वमावर्तयित्वा तु मया यत्नेन साधितम् ।36।प्राशितव्यं प्रयत्नेन तेत्युक्त्वाऽदर्शनं गतः।आलिङ्गने चरौ चैव चक्रतुस्ते विपर्ययम् ।37।    ततः पुन स भगवान्काले बहुतिथे गते।     दिव्यज्ञानाद्विदित्वा तु भगवानागतः पुनः ।38।अथोवाच महातेजा भृगुः सत्यवतीं श्नुषाम् ।39।उपयुक्तश्चरुर्भद्रे वृक्षे चालिङ्गनं कृतम्।             विपरीतेन ते सुभ्रूर्मात्रा चैवासि वञ्चिता ।40।

क्षत्रियो ब्राह्मणाचारो मातुस्तव सुतो महान्।         भविष्यति महावीर्यः साधूनां मार्गमास्थितः

41ततः प्रसादयामास श्वशुरं सा पुनःपुनः।              न मे पुत्रो भवेदीदृक्कामं पौत्रो भवेदिति ।42।

एवमस्त्विति सा तेन पाण्डव प्रतिनन्दिता।       कालं प्रतीक्षती गर्भं धारयामास यत्नतः ।3-116-43

जमदग्निं ततः पुत्रं जज्ञे सा काल आगते।           तेजसा वर्चसा चैव युक्तं भार्गवनन्दनम् ।44।

स वर्धमानस्तेजस्वी वेदस्याध्ययनेन च। बहूनृषीन्महातेजाः पाण्डवेयात्यवर्तत ।45

तं तु कृत्स्नो धनुर्वेदः प्रत्यभाद्भरतर्षभ। चतुर्विधानि चास्त्राणि भास्करोपमवर्चसम् ।। 3-116-46

   ।।इति श्रीमन्महाभारते         अरण्यपर्वणितीर्थयात्रापर्वणि   षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ।। 116 ।।

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            अकृतव्रण उवाच।
स वेदाध्ययने युक्तो जमदग्निर्महातपाः।
तपस्तेपे ततो देवान्नियमाद्वशमानयत् ।1।


स प्रसेनजितं राजन्नधिगम्य नराधिपम्।
रेणुकां वरयामास स च तस्मै ददौ नृपः।2।

रेणुकां त्वथ संप्राप्य भार्यां भार्गवनन्दनः।
आश्रमस्थस्तया सार्धं तपस्तेपेऽनुकूलया ।।3।

तस्याः कुमाराश्चत्वारो जज्ञिरे रामपञ्चमाः।
सर्वेषामजघन्यस्तु राम आसीञ्जघन्यजः ।।4।

फलाहारेषु सर्वेषु गतेष्वथ सुतेषु वै।
रेणुका स्नातुमगमत्कदाचिन्नियतव्रता ।।5।

सा तु चित्ररथं नाम मार्तिकावतकं नृपम्।
ददर्श रेणुका राजन्नागच्छन्ती यदृच्छया ।।6।

क्रीडन्तं सलिले दृष्ट्वा सभार्यं पद्ममालिनम्।
ऋद्धिमन्तं ततस्तस्य स्पृहयामास रेणुका ।।7।

व्यभिचाराच्च तस्मात्सा क्लिन्नाम्भसि विचेतना।
अन्तरिक्षान्निपतिता नर्मदायां महाह्रदे ।।8।

उतीर्य चापि सा यत्नाज्जगाम भरतर्षभ'।
प्रविवेशाश्रमं त्रस्ता तां वै भर्तान्वबुध्यत ।।9।

स तां दृष्ट्वाच्युतांधैर्याद्ब्राह्म्या लक्ष्म्या विवर्जिताम्।
श्रिक्‌शब्देन महातेजा गर्हयामास वीर्यवान् ।10।

ततो ज्येष्ठो जामदग्न्यो रुमण्वान्नाम नामतः।
आजगाम सुषेणश्च वसुर्विश्वावसुस्तथा ।।11।

तानानुपूर्व्याद्भगवान्वधे मातुरचोदयत्।
न च ते जातसंमोहाः किंचिदूचुर्विचेतसः ।12।

ततः शशाप तान्क्रोधात्ते शप्ताश्चैतनां जहुः।
मृगपक्षिसधर्माणः क्षिप्रमासञ्जडोपमाः ।।13।

ततो रामोऽभ्ययात्पश्चादाश्रमं परवीरहा।
तमुवाच महामन्युर्जमदग्निर्महातपाः ।।14।

जहीमां मातरं पापां मा च पुत्र व्यथां कृथाः।
तत आदाय परशुं रामो मातु शिरोऽहरत् ।।15।

ततस्तस्य महाराज जमदग्नेर्महात्मनः।
कोपोऽभ्यगच्छत्सहसा प्रसन्नश्चाब्रवीदिदम् ।16।

ममेदं वचनात्तात कृतं ते कर्म दुष्करम्।
वृणीष्व कामान्धर्मज्ञ यावतो वाञ्छसे हृदा ।17।

स वव्रे मातुरुत्थानमस्मृतिं च वधस्य वै।
पापेन तेन चास्पर्शं भ्रातॄणां प्रकृतिं तथा ।18।

अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे दीर्घमायुश्च भारत।
ददौ च सर्वान्कामांस्ताञ्जमदग्निर्महातपाः।19।

कदाचित्तु तथैवास्य विनिष्क्रान्ताः सुताः प्रभो।
अथानूपपतिर्वीरः कार्तवीर्योऽभ्यवर्तत ।।20।

तमाश्रमपदं प्राप्तमृषिरर्ध्यात्समार्चयत्।
स युद्धमदसंमत्तो नाभ्यनन्दत्तथाऽर्चनम् ।21।

प्रमथ्य चाश्रमात्तस्माद्धोमधेनोस्ततोबलात्।
जहार वत्सं क्रोशन्त्या बभञ्ज च महाद्रुमान् 22।

आगताय च रामाय तदाचष्ट पिता स्वयम्।
गां च रोरुदतीं दृष्ट्वा कोपो रामं समाविशत्।
स मन्युवशमापन्नः कार्तवीर्यमुपाद्रवत् ।।23।

तस्याथ युधि विक्रम्य भार्गवः परवीरहा।
चिच्छेद निशितैर्भल्लैर्बाहून्परिघसंनिभान् ।।24।

सहस्रसंमितान्राजन्प्रगृह्य रुचिरं धनुः।
अभिभूतः स रामेण संयुक्तः कालधर्मणा ।।25।

अर्जुनस्याथ दायादा रामेण कृतमन्यवः।
आश्रमस्थं विना रामं जमदग्निमुपाद्रवन् ।।26।

ते तं जघ्नुर्महावीर्यमयुध्यन्तं तपस्विनम्।
असकृद्रामरामेति विक्रोशन्तमनाथवत् ।।27।

कार्तवीर्यस्य पुत्रास्तु जमदग्निं युधिष्ठिर।
घातयित्वा शरैर्जग्मुर्यथागतमरिंदमाः ।।28।

अपक्रान्तेषु वै तेषु जमदग्नौ तथा गते।
समित्पाणिरुपागच्छदाश्रमं भृगुनन्दनः ।।29।प्रथम स्कन्ध: तृतीय अध्याय श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः तृतीय अध्यायः श्लोक 15-31 का हिन्दी अनुवाद-

 चाक्षुस मन्वन्तर के अन्त में जब सारी त्रिलोकी समुद्र में डूब रही थी, तब विष्णु ने मत्स्य के रूप में दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वीरूपी नौका पर बैठाकर अगले मन्वन्तर के अधिपति वैवस्वत मनु की रक्षा की।

 जिस समय देवता और दैत्य समुद्र-मन्थन कर रहे थे, उस समय ग्यारहवाँ अवतार धारण करके कच्छप रूप से भगवान ने मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया। 

बारहवीं बार धन्वन्तरि के रूप में अमृत लेकर समुद्र से प्रकट हुए और तेरहवीं बार मोहिनी रूप धारण करके दैत्यों को मोहित करते हुए देवताओं को अमृत पिलाया। 

चौदहवें अवतार में उन्होंने नरसिंह रूप धारण किया और अत्यन्त बलवान दैत्यराज हिरण्यकशिपु की छाती अपने नखों से अनायास इस प्रकार फाड़ डाली, जैसे चटाई बनाने वाला सींक को चीर डालता है। 

पंद्रहवीं बार वामन का रूप धारण करके भगवान दैत्यराज बलि के यज्ञ में गये। वे चाहते तो थे त्रिलोकी का राज्य, परन्तु माँगी उन्होंने केवल तीन पग पृथ्वी।        ____    

सोलहवें परशुराम अवतार में जब उन्होंने देखा कि राजा लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये हैं, तब क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया।

 इसके बाद सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भ से पराशरजी के द्वारा वे व्यास के रूप में अवतीर्ण हुए, उस समय लोगों की समझ और धारणाशक्ति को देखकर आपने वेदरूप वृक्ष की कई शाखाएँ बना दीं। 

अठारहवीं बार देवताओं का कार्य सम्पन्न करने की इच्छा से उन्होंने राजा के रूप में रामावतार ग्रहण किया और सेतुबन्धन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत-सी लीलाएँ कीं।

 उन्नीसवें और बीसवें अवतारों में उन्होंने यदुवंश में बलराम और श्रीकृष्ण के नाम से प्रकट होकर पृथ्वी का भार उतारा। 

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उसके बाद कलियुग आ जाने पर मगध देश (बिहार) में देवताओं के द्वेषी दैत्यों को मोहित करने के लिये अजन के पुत्ररूप में आपका बुद्धावतार होगा। 

इसके भी बहुत पीछे जब कलियुग का अन्त समीप होगा और राजा लोग प्रायः लुटेरे हो जायेंगे, तब जगत् के रक्षक भगवान विष्णुयश नामक ब्राह्मण के घर कल्कि रूप में अवतीर्ण होंगे।

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शौनकादि ऋषियों ! जैसे अगाध सरोवर से हजारों छोटे-छोटे नाले निकलते हैं, वैसे ही सत्त्वनिधि भगवान श्रीहरि के असंख्य अवतार हुआ करते हैं। 

ऋषि, मनु, देवता, प्रजापति, मनुपुत्र और जितने भी महान् शक्तिशाली हैं, वे सब-के-सब भगवान के ही अंश हैं। ये सब अवतार तो भगवान के अंशावतार अथवा कलावतार हैं, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान (अवतारी) ही हैं। 

जब लोग दैत्यों के अत्याचार से व्याकुल हो उठते हैं, तब युग-युग में अनेक रूप धारण करके भगवान उनकी रक्षा करते हैं। 

भगवान के दिव्य जन्मों की यह कथा अत्यन्त गोपनीय-रहस्यमयी है; जो मनुष्य एकाग्रचित्त से नियमपूर्वक सायंकाल और प्रातःकाल प्रेम से इसका पाठ करता है, वह सब दुःखों से छूट जाता है।

 प्राकृत स्वरूपरहित चिन्मय भगवान का जो यह स्थूल जगदाकार रूप है, यह उनकी माया के महत्तत्त्वादि गुणों से भगवान में ही कल्पित है। 

जैसे बादल वायु के आश्रय रहते हैं और धूसर पना धूल में होता है, परन्तु अल्पबुद्धि मनुष्य बादलों का आकाश में और धूसरपने का वायु में आरोप करते हैं- वैसे ही अविवेकी पुरुष सबके साक्षी आत्मा में स्थूल दृश्यरूप जगत् का आरोप करते हैं।

सोलहवें परशुराम अवतार में जब उन्होंने देखा कि राजा लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये हैं, तब क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया। जैसा कि महाभारत में वर्णित है

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शास्त्रों के गले और दोगले विधान -

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा।
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे।।-4
•-पूर्वकाल में जमदग्निनन्दन परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय रहित करके उत्तम पर्वत महेन्द्र पर तपस्या की थी। 4।

तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति।
ब्राह्मणान्क्षत्रिया राजन्सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः।।1-65-5

•-उस समय जब भृगुनन्दन ने इस लोक को क्षत्रिय शून्य कर दिया था, क्षत्रिय-नारियों पुत्र की अभिलाषा से ब्राह्मणों की शरण ग्रहण की थी। 5।

ताभिः सह समापेतुर्ब्राह्मणाः संशितव्रताः।
ऋतावृतौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा।। 1-65-6

•-वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण केवल ऋतुकाल में ही उनके साथ मिलते थे; । राजन! उन सहस्रों क्षत्राणियों ने ब्राह्मणों से गर्भ धारण किया।6।

तेभ्यश्च तेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ताः सहस्रशः।
ततः सुषुविरे राजन्क्षत्रियान्वीर्यवत्तरान्।। 1-65-7
 •-ब्राह्मणों द्वारा क्षत्राणियों के गर्भ से  हजारों वीर्यवान् क्षत्रिय संतान की उत्पत्ति और वृद्धि हुई। 7।

कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये।
एवं तद्ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः।। 1-65-8

•-पुनः क्षत्रिय कुल वृद्धि के लिये अत्यन्त बलशाली क्षत्रियकुमारों और कुमारियों को जन्म दिया। 8।

जातं वृद्धं च धर्मेण सुदीर्घेणायुषान्वितम्।
चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्ब्राह्मणोत्तराः।। 1-65-9

•-तदनन्तर जगत में पुनः ब्राह्मण प्रधान चारों वर्ण प्रतिष्ठित हुए। ये सब दीर्घजीवी धर्म पूर्वक बुढ़ापे को प्राप्त करते 9।

अभ्यगच्छन्नृतौ नारीं न कामान्नानृतौ तथा।
तथैवान्यानि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि।। 1-65-10

•-उस समय बस लोग ऋतुकाल में ही पत्नि समागम करते थे; केवल कामनावश या ऋतुकाल के बिना नहीं करते थे। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदि की योनि में पड़े हुए जीव भी ऋतुकाल में ही अपनी स्त्रियाँ से संयोग करते थे।
10।

ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तत्तथा भरतर्षभ।
ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः।। ( 1-65-11)

•-भरतश्रेष्ठ! उस समय धर्म का आश्रय लेने से सब लोग सहस्र एवं शतवर्षों तक जीवित रहते थे और उत्तरोत्तर उन्नति करते थे।11।

ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपरायणाः।
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः।।1-65-12

•-भूपाल! उस समय की प्रजा धर्म एवं व्रत के पालन में तत्पर रहती थी; अतः सभी लोग रोगों तथा मानसिक चिन्ताओं से मुक्त रहते थे।12।

अथेमां सागरोपान्तां गां गजेन्द्रगताखिलाम्।
अध्यतिष्ठत्पुनः क्षत्रं सशैलवनपत्तनाम्।।1-65-13।

•-गजराज के समान गमन करने वाले राजा जनमेजय! तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्र से घिरी हुई पर्वत, वन और नगरों सहित इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर पुनः क्षत्रिय जाति का ही अधिकार हो गया। 13।

प्रशासति पुनः क्षत्रे धर्मेणेमां वसुन्धराम्।
ब्राह्मणाद्यास्ततो वर्णा लेभिरे मुदमुत्तमाम्।। 1-65-14
जब पुनः क्षत्रिय शासक धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन करने लगे, तब ब्राह्मण आदि वर्णों को बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। 14।

कामक्रोधोद्भवान्दोषान्निरस्य च नराधिपाः।
धर्मेण दण्डं दण्डेषु प्रणयन्तोऽन्वपालयन्।। 1-65-15

•-उन दिनों राजा लोग काम और क्रोधजनित दोषों को दूर करके दण्डनीय अपराधियों को धर्मानुसार दण्ड देते हुए पृथ्वी का पालन करते थे। 15।

तथा धर्मपरे क्षत्रे सहस्राक्षः शतक्रतुः।
स्वादु देशे च काले च ववर्षाप्याययन्प्रजाः।।1-65-16

•-इस तरह धर्मपरायण क्षत्रियों के शासन में सारा देश-काल अत्यन्त रुचिकर प्रतीत होने लगा। 
उस समय सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र समय पर वर्षा करके प्रजाओं का पालन करते थे। 16।

न बाल एव म्रियते तदा कश्चिज्जनाधिप।
न च स्त्रियं प्रजानाति कश्चिदप्राप्तयौवनाम्।। 1-65-17

•-राजन! उन दिनों कोई भी बाल्यावस्था में नहीं मरता था। कोई भी पुरुष युवावस्था प्राप्त हुए बिना स्त्री-सुख का अनुभव नहीं करता था। 17।

एवमायुष्मतीभिस्तु प्रजाभिर्भरतर्षभ।
इयं सागरपर्यन्ता ससापूर्यत मेदिनी।। 1-65-18

•-ऐसी व्यवस्था हो जाने से समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी दीर्घकाल तक जीवित रहने वाली प्रजाओं से भर गयी।। 18।

ईजिरे च महायज्ञैः क्षत्रिया बहुदक्षिणैः।
साङ्गोपनिषदान्वेदान्विप्राश्चाधीयते तदा।। (1-65-19)

•-क्षत्रिय लोग बहुत-सी दक्षिणा बाले ‘बड़े-बड़े यज्ञों द्वारा यजन करते थे। ब्राह्मण अंगों और उपनिषदों सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करते थे। 19।

महाभारत आदिपर्व  अंशावतरण नामक उपपर्व का  (चतुःषष्टितम )(64) अध्‍याय: 
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अब प्रश्न यह भी उठता है  !
कि जब धर्मशास्त्र इस बात का विधान करते हैं 

कि ब्राह्मण की चार पत्नीयाँ हो सकती हैं उनमें से दो पत्नीयाँ ब्राह्मणी और क्षत्राणी के गर्भ से ब्राह्मण ही उत्पन्न होगा और शेष दो वैश्याणी और शूद्राणी के गर्भ से जो पुत्र होंगे वे ; ब्राह्मणत्व से रहित माता की जाति के ही समझे जाते हैं --

कि इसी महाभारत के अनुशासन पर्व में दानधर्म नामक उपपर्व के अन्तर्गत (वर्णसंकरकथन) नामक( अड़तालीसवाँ अध्याय) में यह  वर्णन है ।
देखें निम्न श्लोक -

भार्याश्चतश्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते ।
आनुपूर्व्याद् द्वेयोर्हीनौ मातृजात्यौ प्रसूयत: ।।४।।
(महाभारत अनुशासन पर्व का दानधर्म नामक उपपर्व)

कि ब्राह्मण की चार पत्नीयाँ हो सकती हैं उनमें से दो पत्नीयाँ ब्राह्मणी और क्षत्राणी के गर्भ से सन्तान केवल  ब्राह्मण ही उत्पन्न होगी !
और शेष दो वैश्याणी और शूद्राणी पत्नीयों के गर्भ से जो सन्तान  होंगी  वे ; ब्राह्मणत्व से रहित माता की जाति की ही समझी जाएगी --।।४।।
इसी अनुशासन पर्व के इसी अध्याय में वर्णन है कि 

"तिस्र: क्षत्रियसम्बन्धाद्  द्वयोरात्मास्य जायते।
हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृति: ।।७।।

अर्थ:-क्षत्रिय से क्षत्रियवर्ण की स्त्री और वैश्यवर्ण की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है ; वह क्षत्रिय वर्ण का होता है ।तीसरी पत्नी शूद्रा के गर्भ से हीन वर्ण वाले  शूद्र उत्पन्न होते हैं जिन्हें उग्र कहते हैं यह स्मृति (धर्मशास्त्र)का कथन है।७।

(महाभारत अनुशासन पर्व में दानधर्म नामक उपपर्व के अन्तर्गत वर्णसंकरकथन नामक अड़तालीसवाँ अध्याय का सप्तम श्लोक -) (पृष्ठ संख्या- ५६२५) गीता प्रेस का संस्करण)

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मनुस्मृति- में भी देखें निम्न श्लोक

यथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्मास्य जायते ।आनन्तर्यात्स्वयोन्यां तु तथा बाह्येष्वपि क्रमात् ।।10/28

अर्थ- जिस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों में से दो में से दो में अपनी समान उत्पन्न होता है उसी तरह आनन्तर (खारिज) जाति में भी क्रम से होता है।१०/२८

न ब्राह्मणक्षत्रिययोरापद्यपि हि तिष्ठतोः ।कस्मिंश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते 3/14
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 महाभारत के  उपर्युक्त अनुशासन पर्व से उद्धृत और आदिपर्व  से उद्धृत  क्षत्रियों के नाश के वाद क्षत्राणीयों में  बाह्मणों के संयोग से उत्पन्न पुत्र पुत्री क्षत्रिय किस विधान से हुई  दोनों तथ्य परस्पर विरोधी होने से क्षत्रिय उत्पत्ति का प्रसंग काल्पनिक व मनगड़न्त ही है ।

मिध्यावादीयों ने मिथकों की आड़ में अपने स्वार्थ को दृष्टि गत करते हुए आख्यानों की रचना की ---

कौन यह दावा कर सकता  है ? कि ब्राह्मणों से क्षत्रियों की पत्नीयों में  क्षत्रिय ही कैसे उत्पन्न हुए ? 
 किस सिद्धांत के अनुसार   क्या पुरोहित जो कह दे वही सत्य गो जाएगा  ?

 तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति।
ब्राह्मणान्क्षत्रिया राजन्सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः।।1-65-5

ताभिः सह समापेतुर्ब्राह्मणाः संशितव्रताः।
ऋतावृतौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा।। 1-65-6

तेभ्यश्च तेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ताः सहस्रशः।
ततः सुषुविरे राजन्क्षत्रियान्वीर्यवत्तरान्।। 1-65-7

पूर्वकाल में जमदग्निनन्दन परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय रहित करके उत्तम पर्वत महेन्द्र पर तपस्या की थी। 
उस समय जब भृगुनन्दन ने इस लोक को क्षत्रिय शून्य कर दिया था, क्षत्रिय-नारियों पुत्र की अभिलाषा से ब्राह्मणों की शरण ग्रहण की थी। 

नर- शार्दूल ! वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण केवल ऋतुकाल में ही उनके साथ मिलते थे; । राजन! उन सहस्रों क्षत्राणियों ने ब्राह्मणों से गर्भ धारण किया और पुनः क्षत्रिय कुल वृद्धि के लिये अत्यन्त बलशाली क्षत्रियकुमारों और कुमारियों को जन्म दिया। 

इस प्रकार तपस्वी ब्राह्मणों द्वारा क्षत्राणियों के गर्भ से धर्मपूर्वक क्षत्रिय संतान की उत्पत्ति और वृद्धि हुई। 
वे सब संतानें दीर्घायु होती थी। श्लोक - (5-6-7)

प्रधानता बीज की होती है नकि खेत की 
क्यों कि दृश्य जगत में फसल का निर्धारण बीज के अनुसार ही होता है नकि स्त्री रूपी खेत के अनुसार--
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प्रस्तुति करण :- यादव योगेश कुमार रोहि-
सम्पर्क सूत्र :- 8077160219

महाभारत आदिपर्व  अंशावतरण नामक उपपर्व का  (चतुःषष्टितम )(64) अध्‍याय: 

महाभारत: आदि पर्व: चतुःषष्टितम अध्‍याय: श्लोक 1-19 का हिन्दी अनुवाद :-
जिसमें ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रिय वंश की उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समय के धार्मिक राज्य का वर्णन है ; 
असुरों का जन्म और उनके भार से पीड़ित पृथ्वी का ब्रह्मा जी की शरण में जाना तथा ब्रह्मा जी का देवताओं को अपने अंश से पृथ्वी पर जन्म लेने का आदेश का वर्णन है ।

जनमेजय बोले- ब्रह्मन् ! आपने यहाँ जिन राजाओं के नाम बताये हैं और जिन दूसरे नरेशों के नाम यहाँ नहीं लिये हैं, उन सब सहस्रों राजाओं का मैं भलि-भाँति परिचय सुनना चाहता हूँ। महाभाग!

वे देवतुल्य महारथी इस पृथ्वी पर जिस उद्देश्‍य की सिद्धि के लिये उत्पन्न हुए थे, उसका यथावत वर्णन कीजिये।

वैशम्पायन जी ने कहा- राजन! यह देवताओं का रहस्य है, ऐसा मैंने सुन रखा है। 
स्वयंभू ब्रह्मा जी  को नमस्कार करके आज उसी रहस्य का तुमने वर्णन करूंगा। 
____________   
पूर्वकाल में जमदग्निनन्दन परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय रहित करके उत्तम पर्वत महेन्द्र पर तपस्या की थी। 
उस समय जब भृगुनन्दन ने इस लोक को क्षत्रिय शून्य कर दिया था, क्षत्रिय-नारियों पुत्र की अभिलाषा से ब्राह्मणों की शरण ग्रहण की थी। 

नररत्न ! वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण केवल ऋतुकाल में ही उनके साथ मिलते थे; ! राजन ! उन सहस्रों क्षत्राणियों ने ब्राह्मणों के द्वार गर्भ धारण किया और पुनः क्षत्रिय कुल वृद्धि के लिये अत्यन्त बलशाली क्षत्रियकुमारों और कुमारियों को जन्म दिया। 

इस प्रकार तपस्वी ब्राह्मणों द्वारा क्षत्राणियों के गर्भ से धर्मपूर्वक क्षत्रिय संतान की उत्पत्ति और वृद्धि हुई। 
वे सब संतानें दीर्घायु होती थी।
तदनन्तर जगत में पुनः ब्राह्मण प्रधान चारों वर्ण प्रतिष्ठित हुए। 
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उस समय बस लोग ऋतुकाल में ही पत्नी समागम करते थे; केवल कामनावश या ऋतुकाल के बिना नहीं करते थे। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदि की योनि में पड़े हुए जीव भी ऋतुकाल में ही अपनी स्त्रियाँ से संयोग करते थे।

भरतश्रेष्ठ ! उस समय धर्म का आश्रय लेने से सब लोग सहस्र एवं शतवर्षों तक जीवित रहते थे और उत्तरोत्तर उन्नति करते थे।

भूपाल ! उस समय की प्रजा धर्म एवं व्रत के पालन में तत्पर रहती थी; अतः सभी लोग रोगों तथा मानसिक चिन्ताओं से मुक्त रहते थे।

गजराज के समान गमन करने वाले राजा जनमेजय ! तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्र से घिरी हुई पर्वत, वन और नगरों सहित इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर पुनः क्षत्रिय जाति का ही अधिकार हो गया। 

जब पुनः क्षत्रिय शासक धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन करने लगे, तब ब्राह्मण आदि वर्णों को बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। 
उन दिनों राजा लोग काम और क्रोधजनित दोषों को दूर करके दण्डनीय अपराधियों को धर्मानुसार दण्ड देते हुए पृथ्वी का पालन करते थे। 

इस तरह धर्मपरायण क्षत्रियों के शासन में सारा देश-काल अत्यन्त रुचिकर प्रतीत होने लगा। 

उस समय सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र समय पर वर्षा करके प्रजाओं का पालन करते थे। 

राजन ! उन दिनों कोई भी बाल्यावस्था में नहीं मरता था। कोई भी पुरुष युवावस्था प्राप्त हुए बिना स्त्री-सुख का अनुभव नहीं करता था। भरतश्रेष्ठ! 

ऐसी व्यवस्था हो जाने से समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी दीर्घकाल तक जीवित रहने वाली प्रजाओं से भर गयी। क्षत्रिय लोग बहुत-सी दक्षिणा बाले ‘बड़े-बड़े यज्ञों द्वारा यजन करते थे। ब्राह्मण अंगों और उपनिषदों सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करते थे। १- से १९ तक का अनुवाद -
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"अब प्रश्न यह उठता है;  कि जब धर्म शास्त्रों जैसे मनुस्मृति आदि स्मृतियों और महाभारत में भी विधान वर्णित है कि ब्राह्मण की चार पत्नीयाँ होती हैं उनमें दो पत्नीयों क्रमश: ब्राह्मणी और क्षत्राणी के गर्भ से ब्राह्मण के द्वारा जो सन्तान उत्पन्न होती है वह वर्ण से ब्राह्मण ही होती है तो परशुराम द्वारा मारे गये क्षत्रियों की विधवाऐं जब ऋतुकाल में सन्तान की इच्छा से आयीं तो वे सन्तानें क्षत्रिय क्यों हुई उन्हें तो ब्राह्मण होना चाहिए जैसे की शास्त्रों का वर्ण-व्यवस्था के विषय में सिद्धान्त भी है । देखें निम्न सन्दर्भों में

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"भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते । आनुपूर्व्याद् द्वेयोर्हीनौ मातृजात्यौ प्रसूयत: ।।४।।

(महाभारत -अनुशासन पर्व का दानधर्म नामक उपपर्व)

अब प्रश्न यह भी उठता है कि जब धर्मशास्त्र इस बात का विधान करते हैं कि  जैसा कि मनुस्मृति आदि में और     इसी महाभारत के अनुशासन पर्व में दानधर्म नामक उपपर्व के अन्तर्गत (वर्णसंकरकथन) नामक(अड़तालीसवाँ अध्याय) में वर्णन है ।


जिस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों में से दो में से दो में अपनी नाईं उत्पन्न होता है उसी तरह आनन्तर (खारिज) जाति में भी क्रम से होता है।(मनुस्मृति)

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तिस्र: क्षत्रियसम्बन्धाद्  द्वयोरात्मास्य जायते।
हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृति: ।।७।।

अर्थ:-क्षत्रिय से  क्षत्रियवर्ण की स्त्री और वैश्यवर्ण की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है वह क्षत्रिय वर्ण का होता है ।तीसरी पत्नी शूद्रा के गर्भ से हीन वर्ण वाले  शूद्र उत्पन्न होते हैं जिन्हें उग्र कहते हैं यह स्मृति (धर्मशास्त्र)का कथन है।७।

(महाभारत अनुशासन पर्व में दान धर्म नामक उप पर्व के अन्तर्गत वर्णसंकरकथन नामक अड़तालीसवाँ अध्याय का सप्तम श्लोक -) (पृष्ठ संख्या- ५६२५) गीता प्रेस का संस्करण)

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ये श्लोक महाभारत के आदिपर्व के हैं ये क्या यह दावा कर सकते हैं कि ब्राह्मणों से क्षत्रियों की पत्नीयों में  क्षत्रिय ही कैसे उत्पन्न हुए ? किस सिद्धांत के अनुसार  क्या पुरोहित जो कह दे वही सत्य है ?


तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति।
ब्राह्मणान्क्षत्रिया राजन्सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः।।-5

ताभिः सह समापेतुर्ब्राह्मणाः संशितव्रताः।
ऋतावृतौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा।। 6

तेभ्यश्च तेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ताः सहस्रशः।
ततः सुषुविरे राजन्क्षत्रियान्वीर्यवत्तरान्।।-7

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मनुस्‍मृति का सबसे ज्‍यादा आपत्तिजनक अध्याय

मनुस्‍मृति का सबसे आपत्तिजनक पहलू यह है कि इसके अध्याय 10 के श्‍लोक संख्‍या 11 से 50 के बीच समस्‍त द्विज को छोड़कर समस्‍त हिन्‍दू जाति को नाजायज संतान बताया गया है। मनु के अनुसार नाजायज जाति दो प्रकार की होती है।

  1. अनुलोम संतान – उच्‍च वर्णीय पुरूष का निम्‍न वर्णीय महिला से संभोग होने पर उत्‍पन्‍न संतान
  2. प्रतिलाेम संतान – उच्‍च वर्णीय महिला का निम्‍न वर्णीय पुरूष से संभोग होने पर उत्‍पन्‍न संतान

मनुस्‍मति के अनुसार कुछ जाति की उत्‍पत्ति आप इस तालिका से समझ सकते हैं।

पुरुष की जातिमहिला की जातिसंतान की जाति
ब्राम्‍हणक्षत्रियमुर्धवस्तिका १
क्षत्रियवैश्‍यमहिश्‍वा २
वैश्‍यशूद्रकायस्‍थ ३
ब्राम्‍हणवैश्‍यअम्‍बष्‍ठ ४
क्षत्रियब्राम्‍हणसूत ५
वैश्‍यक्षत्रियमगध ६
शूद्रक्षत्रियछत्‍ता ७
वैश्‍यब्राम्‍हणवैदह ८
शूद्रब्राम्‍हणचाण्‍डाल९
निषादशूद्रपुक्‍कस१०
शूद्रनिषादकुक्‍कट११
छत्‍ताउग्रश्‍वपाक१२
वैदहअम्‍बष्‍ठवेण१३
ब्राम्‍हणउग्रआवृत१४
ब्राम्‍हणअम्‍बष्‍ठ
आभीर१५

वैश्य-                व्रात्य-                  सात्वत १६

क्षत्र-                 करणी                  राजपूत १७

क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रो बभूव ह ।।
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तितः।  
(ब्रह्मवैवर्तपुराण - ब्रह्मखण्ड1.10.110) 

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जो राजपूत स्वयं को क्षत्रिय मानते हैं शास्त्रों में उन्हें भी वर्णसंकर और शूद्र धर्मी कहा है ।

विशेष– यद्यपि सात्वत आभीर ही थे जो यदुवंश से सम्बन्धित थे। परन्तु मूर्खता की हद नहीं इन्हें भी वर्णसंकर  बना दिया।

इसी प्रकार औशनस एवं शतपथ ब्राम्‍हण ग्रंथ में भी जाति की उत्‍पत्ति का यही आधार बताया गया है जिसमें चामार, ताम्रकार, सोनार, कुम्‍हार, नाई, दर्जी, बढई धीवर एवं तेली शामिल है।

ब्राह्मणादुग्रकन्यायां आवृतो नाम जायते ।आभीरोऽम्बष्ठकन्यायां आयोगव्यां तु धिग्वणः।10/15 मनुस्मृति अध्याय १०)

अर्थ- ब्राह्मण से उग्र जाति की कन्या में आवृत उत्पन्न होता है । और आभीर ब्राह्मण से अम्बष्ठ कन्या में उत्पन्न होता है और आयोगव्या में ब्राह्मण से धिग्वण उत्पन्न होता है ।

विदित हो की भागवत धर्म के सूत्रधार सात्ववत जो  यदु के पुत्र माधव के पुत्र सत्वत् (सत्त्व) की सन्तान थे जिन्हें 

इतिहास में आभीर रूप में भी जाना गया ये सभी वृष्णि कुल से सम्बन्धित रहे । जैसा की नन्द को गर्ग सहिता में आभीर रूप में सम्बोधित किया गया है ।

"क्रोष्टा के कुल  में  आगे  चलकर सात्वत का जन्म हुआ। उनके सात पुत्र थे उनमे से एक का  नाम वृष्णि था। वृष्णि से  वृष्णिवंश  चला। इस वंश में भगवान श्रीकृष्ण अवतरित हुये।

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"आभीरस्यापि नन्दस्य पूर्वं पुत्रः प्रकीर्तितः ॥
वसुदेवो मन्यते तं मत्पुत्रोऽयं गतत्रपः॥१४॥

गर्गसंहिता -खण्डः ७ (विश्वजित्खण्डः)/अध्यायः ०७
इति श्रीगर्गसंहितायां श्रीविश्वजित्खण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे गुर्जरराष्ट्राचेदिदेशगमनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
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नारद और बहुलाक्ष ( मिथिला) के राजा में संवाद चलता है तब नारद बहुलाक्ष से  शिशुपाल और उद्धव के संवाद का वर्णन करते हैं 
 अर्थात् यहाँ संवाद में ही संवाद है। 👇

तथा द्वारिका खण्ड में यदुवंश के गोलों को आभीर कहा है।
गर्गसंहिता में द्वारिका खण्ड के बारहवें अध्याय में सोलहवें श्लोक में वर्णन है कि  इन्द्र के कोप से यादव अहीरों की रक्षा करने वालो में और गुरु माता द्विजों को उनके पुत्रों को खोजकर लाकर देने वालों में कृष्ण आपको बारम्बार नमस्कार है !
 ऐसा वर्णन है

यादवत्राणकर्त्रे च शक्राद् आभीर रक्षिणे।गुरु मातृ द्विजानां च पुत्रदात्रे नमोनमः ।।१६।।

अर्थ:- दमघोष पुत्र  शिशुपाल  उद्धव जी से कहता हैं कि कृष्ण वास्तव में नन्द अहीर का पुत्र है ।
उसे वसुदेव ने वरबस अपना पुत्र माने लिया है उसे इस बात पर तनिक भी लाज ( त्रप) नहीं आती है।

और जब वर्णसंकर जातियों की उत्पत्ति भी नहीं हुई थी तब भी आभीर जाति उपस्थित थी।

-वेदों की अधिष्ठात्री देवी गायत्री को इस सहस्र नाम स्त्रोतों में कहीं गोपी तो कहीं अभीरू तथा कहीं यादवी भी कहा है ।

★- यद्यपि पद्म पुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय (१६) तथा नान्दी पुराण और स्कन्द पुराण के नागर खण्ड  में माता गायत्री को आभीर कन्या और गोप कन्या भी कहा है।  क्यों कि गोप " आभीर का ही पर्याय है और ये ही यादव थे  । यह तथ्य स्वयं पद्मपुराण में वर्णित है ।

प्राचीन काल में जब एक बार पुष्कर क्षेत्र में ब्रह्मा जी यज्ञ के लिए सावित्री को बुलाने के लिए इन्द्र को उनके पास भेजते हैं ; तो वे उस समय ग्रह कार्य में संलग्न होने के कारण तत्काल नहीं आ सकती थी परन्तु उन्होंने इन्द्र से कुछ देर बाद आने के लिए कह दिया - परन्तु यज्ञ का मुहूर्त न निकल जाए इस कारण से ब्रह्मा जी ने इन्द्र को पृथ्वी लोक से ही यज्ञ हेतु सहचारिणी के होने के लिए किसी  अन्या- कन्या को ही लाने के लिए कहा ! 

तब इन्द्र ने गायत्री नाम की आभीर कन्या को संसार में सबसे सुन्दर और विलक्षण पाकर ब्रह्मा जी की सहचारिणी के रूप में उपस्थित किया !

यज्ञ सम्पन्न होने के कुछ समय पश्चात जब ब्रह्मा जी की पूर्व पत्नी सावित्री यज्ञ स्थल पर उपस्थित हुईं तो उन्होंने ने ब्रह्मा जी के साथ गायत्री माता को पत्नी रूप में देखा तो सभी ऋभु नामक देवों  ,विष्णु और शिव नीची दृष्टि डाले हुए हो गये परन्तु वह सावित्री समस्त देवताओं की इस कार्य में करतूत जानकर    उनके प्रति क्रुद्ध होकर  इस यज्ञ कार्य के सहयोगी समस्त देवताओं, शिव और विष्णु को शाप देने लगी और आभीर कन्या गायत्री को अपशब्द में कहा कि तू गोप, आभीर कन्या होकर किस प्रकार मेरी सपत्नी बन गयी  

तभी अचानक इन्द्र और समस्त देवताओं को सावित्री ने शाप दिया इन्द्र को शाप देकर सावित्री विष्णु को शाप देते हुए बोली तुमने इस पशुपालक गोप- आभीर कन्या को मेरी सौत बनाकर अच्छा नहीं किया तुम भी तोपों के घर में यादव कुल में जन्म ग्रहण करके जीवन में पशुओं के पीछे भागते रहो और तुम्हारी पत्नी लक्ष्मी का तुमसे दीर्घ कालीन वियोग हो जाय । ।

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विष्णु के यादवों के वंश में गोप बन कर आना तथा गायत्री को ही दुर्गा सहस्रनाम में गायत्री और वेद माता तथा यदुवंश समुद्भवा  कहा जाना और फिर गायत्री सहस्रनाम मैं गायत्री को यादवी, माधवी और गोपी कहा जाना यादवों के आभीर और गोप होने का प्रबल शास्त्रीय और पौराणिक सन्दर्भ है ।

यादव गोप ही थे जैसा कि अन्य पुराणों में स्वयं वसुदेव और कृष्ण को गोप कहा गया है ।

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वैश्यात्तु जायते व्रात्यात्सुधन्वाचार्य एव च ।          कारुषश्च विजन्मा च मैत्रः सात्वत एव च ।।10/23 (मनुस्मृति अध्याय १०)

अर्थ- वैश्य वर्ण के ब्रात्य से स्वजातीय स्त्री से उत्पन्न पुत्र को सुधन्वाचार्य, कारुष्य, विजन्मा, मैत्र और सात्वत कहते हैं।

वैश्य वर्ण की एक ही जाति की स्त्री से उत्पन्न ब्रती पुत्र को सुधनवाचार्य, करुषी, विजन्मा, मैत्र और सात्वत कहा जाता है।

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जबकि हरिवंश पुराण और भागवत पुराण में सात्ववत यदु के पुत्र माधव के सत्त्व नामक पुत्र की सन्तानें थी ।

स यदुर्माधवे राज्यं विसृज्य यदुपुंगवे।                  त्रिविष्टपं गतो राजा देहं त्यक्त्वा महीतले।।36।।

बभूव माधवसुत: सत्त्वतो नाम वीर्यवान्।सत्त्ववृत्तिर्गुणोपेतो राजा राजगुणे स्थित:।।37।।

सत्त्वतस्य सुतो राजा भीमो नाम महानभूत्।              येन भैमा: सुसंवृत्ता: सत्त्वतात् सात्त्वता: स्मृता:।।38।।

राज्ये स्थिते नृपे तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति।        शत्रुघ्नो लवणं हत्वा् चिच्छेद स मधोर्वनम्।।39।।

तस्मिन् मधुवने स्थाने पुरीं च मथुरामिमाम्।    निवेशयामास विभु: सुमित्रानन्दवर्धन:।।40।।

जब वे राजा यदु अपने बड़े पुत्र यदुकुल पुंगव माधव को अपना राज्य दे इस भूतल पर शरीर का परित्याग करके स्वर्ग को चले गये।

माधव का पराक्रमी पुत्र सत्त्व नाम से विख्यात हुआ। वे गुणवान राजा सत्त्वसत राजोचित गुणों से प्रतिष्ठित थे और सदा सात्त्विक वृत्ति से रहते थे।

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सत्त्व के पुत्र महान राजा भीम हुए, जिनसे भावी पीढ़ी के लोग ‘भैम’ कहलाये।

सत्त्वत से उत्पन्न होने के कारण उन सबको ‘सात्त्वत’ भी माना गया है।

जब राजा भीम आनर्त देश के राज्य पर प्रतिष्ठित थे, उन्हीं दिनों अयोध्या में भगवान श्रीराम भूमण्डल के राज्य का शासन करते थे।

अत: गायत्री वेदों की जब अधिष्ठात्री देवी है और ब्रह्मा की पत्‍नी रूप में वेद शक्ति है ।

तो आभीर ब्राह्मण से अम्बष्ठ कन्या में कैसे उत्पन्न हो गये ?

वास्तव में अहीरों को मनुस्मृति कार ने वर्णसंकर इसी लिए वर्णित किया ताकि इन्हें हेय सिद्ध करके इन पर शासन  किया जा सके ।

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कार्तवीर्य अर्जुन सहस्त्रबाहु कहलाते थे। श्री श्रीराम साठे ने लिखा है कि हैहयवंशी राजा दुर्दम से लेकर सहस्त्रार्जुन  हैहय लोग काठियावाड  से काशी तक के प्रदेश में उदण्ड  बनकर रहते थे।

राजा दुर्दम के समय से ही उनका अपने भार्गव पुरोहितों से किसी कारण झगड़ा हुआ। 

इन पुरोहितों में से एक की पत्नी ने विन्ध्य वन में और्व को जन्म दिया। 

और्व का वंश इस प्रकार चला - और्व --> ऋचिक --> जमदग्नि --> परशुराम। कार्तवीर्य अर्जुन ने इन्ही जमदग्नि की हत्या कर दी थी।

तब जामदग्न्य परशुराम के नेतृत्व में वशिष्ठ और भार्गव पुरोहितों ने इक्कीस बार हैहयों को पराजित किया। अंततः सहस्त्रार्जुन की मृत्यु हुई। 

प्राचीन भारतीय इतिहास का यह प्रथम महायुद्ध था। श्री साठे ने ही लिखा है कि परशुराम का समय महाभारत युद्ध पूर्व 17 वीं पीढ़ी का है।

धरती को क्षत्रियविहीन करने के संकल्प के साथ परशुराम के लगातार 21 आक्रमणों से भयत्रस्त होकर अनेक क्षत्रिय पुरुष व स्त्रियाँ यत्र-तत्र छिप कर रहने लगी थी।
                   

                मनुस्मृति में लिखा है -

कोचिद्याता मरूस्थल्यां सिन्धुतीरे परंगता।  
महेन्द्रादि रमणकं देशं चानु गता परे  ।।1।।

यथ दक्षिणतोभूत्वा विन्ध्य मुल्लंघ्यं सत्वरं।  
ययो रमणकं देशं तत्रव्या क्षत्रिया अपि  ।।2।।

सूर्यवंश्या भयो दिव्यानास्तं दृष्टवाभ्यवदन्मिथः।
 समा यातो यमधुनां जीवननः कथं भवेत् ।।3।।

समेव्य निश्चितं सर्वैर्जीवनं वैश्य धर्मतः। 
 इत्यापणेसु राजन्यास्ते चक्रु क्रय विक्रयम ।।4।।

 अर्थात, "कोई मरुस्थली में, कोई समुद्र के किनारे गए।  कोई महेन्द्र पर्वत पर और कोई रमणक देश में पहुँचे, तब वहाँ के सूर्यवंशी क्षत्रिय भय से व्याकुल होकर बोले कि अब यहाँ भी परशुराम आ गए, अब हमारा जीवन कैसे बचेगा? तब सबों ने घबरा कर तत्काल क्षत्रिय धर्म को छोड़ कर अन्य वैश्य वृत्तियों का अवलंबन किया। "

 परशुराम के भय के कारण क्षत्रियों के पतन का विवरण महाभारत में भी उपलब्ध है -

"जातं-जातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह।           अरक्षंश्च सुतान कांश्चित तदा क्षत्रिययोषितः।63।।"

परशुराम, एक-एक गर्भ के उत्पन्न होने पर पुनः उसका वध कर डालते थे। उस समय क्षत्राणियाँ कुछ ही पुत्रों को बचा सकी थी।

                     -पृथिव्युवाच -

"सन्ति ब्रह्मन मया स्त्रीषु क्षत्रियपुंगवा ।।74।। हैहयानां कुले जातास्ते संरक्षन्तु मां मुने। 

पृथ्वी बोली - ब्रह्मन! मैंने स्त्रियों में कई क्षत्रियपुंगव छिपा रखे हैं।  मुने! वे सब हैहयकुल में उत्पन्न हुए हैं, जो मेरी रक्षा कर सकते हैं।

"अस्ति पौरवदायादो विदुरथसुतः प्रभो ।।75।। 
ऋक्षै संवर्धितो विप्र ऋक्षवत्यथ पर्वते। 

- प्रभो ! उनके अलावा पुरुवंशी विदुरथ का भी एक पुत्र जीवित है, जिसे ऋक्षवान पर्वत पर रीक्षों ने पालकर बड़ा किया है।

"तथानुकम्पमानेन यज्वनाथमितौजसा ।।76।। पराशरेण दायादः सौदासस्याभिरक्षितः। 
सर्वकर्माणि कुरुते शूद्रवत तस्य स द्विजः ।।77।। सर्वकर्मेत्यभिख्यातः स मां रक्षतु पार्थिवः ।।77 1/2।

 - इसी प्रकार अमित शक्तिशाली यज्ञपरायण महर्षि पराशर ने दयावश सौदास के पुत्र की जान बचायी है, वह राजकुमार द्विज होकर भी शूद्रवत सब कर्म करता है, इसलिए 'सर्वकर्मा' नाम से विख्यात है। वह राजा होकर मेरी रक्षा करें।
"वृह्द्रथों महातेजा भूरिभूतिपरिष्कृतः ।।81।। गोलांगूलैर्महाभागो गृध्रकूटे अभिरक्षितः |

- महातेजस्वी वृहद्रथ महान ऐश्वर्य से संपन्न हैं।  उन्हें गृध्रकूट पर्वत पर गोलांगूलों ने बचाया था।

मरुत्तस्यान्ववाये च रक्षिता: क्षत्रियात्मजा: ||82|| मरुत्पतिसमा वीर्ये समुद्रेणाभिरक्षिता: |

  - राजा मरुत के वंश के भी कई बालक सुरक्षित हैं, जिनकी रक्षा समुद्र ने की है | उन सबका पराक्रम देवराज इन्द्र के तुल्य है|

एते क्षत्रियदायादास्तत्र तत्र परिश्रुता: ||द्योकारहेमकारादिजातिं नित्यं  समाश्रिता: ||83 1/2||

  - ये सभी क्षत्रिय बालक जहाँ-तहाँ विख्यात हैं| वे शिल्पी और सुनार आदि जातियों के आश्रित होकर रहते हैं|
महाभारत के उसी प्रसंग  में यह भी लिखा है की जब पृथ्वी ने कश्यपजी से राजाओं को बुलानो को कहा, तब -

"ततः पृथिव्या निर्दिष्टास्तान  समानीय कश्यप: | अभ्यषीन्चन्मही पालां क्षत्रियां वीर्यसम्मतान ||

 - अर्थात् तब पृथ्वी को बताये हुए पराक्रमी राजाओं को बुलाकर कश्यपजी ने उन महाबली राजाओं को फिर से राज्यों में अभिषिक्त किया |"

कालान्तर में ये क्षत्रिय उपनिवेश कहलाए, जिनका किंचित् वर्णन मत्स्यपुराण  में है।

 इनके क्रमशः कुरु, पांचाल, शाल्व, सजांगल, शूरसेन, भद्रकार, बाह्य, सहपठाच्चर, मत्स्य, किरात, कुन्ती, कुन्तल, काशी, काशल, आवंत, कलिंग, मूक, अन्धक, बाह्लीक, बाढ़धान, आभीर, कालयोतक, पुरन्ध्र, शूद्र, पल्लव, आत्तखंडिक, गांधार, यवन, सिन्धु, सौवीर, भद्रक, शक, द्रुह्य, पुलिंद, पारद, आहारमूर्त्तिक, रामठ, कंठकार, कैकेय, दशनायक, कम्बोज, दरद, बर्बर, पह्लव, अत्रि, भरद्वाज, प्रस्थल, कसेरक, बहिर्गिरी, प्लवंग, मातंग, यमक, मालवर्णक, सुह्म, पुण्डर, विदेह, ताम्रलिप्तक, शाल्व, मागध, गोनर्द, पाण्ड्य, केरल, चोल, कुल्य, सेतुक, भूषिक, कुपथ, शबर, पुलिन्द, विदर्भ, विन्ध्यमुलिक, दण्डक, कुलीय, विराल, अश्मक, भोगवर्धन, तैतिरिक, नासिक्य, भारूकच्छ, माहेय, सरस्वत, काच्छीक,सौराष्ट्र, आनर्त्त, अर्बुद, मालव, करुष, मेकल, उत्कल, औंड्र, माष, दशार्ण, भोज, किष्किंधक,तोशल, कोशल, त्रैपुर, वैदिश, तुभूर, तुम्बर, पद्गम, नैषध, अरूप, शौण्डीकेर, वितिहोत्र, अवन्ति, निराहार, सर्वग, अपथ, कुथप्रावरण, ऊर्णादर्व, समुद्रक, त्रिगर्त, मंडल और चमार - इस प्रकार कुल 129 प्रदेशों के नाम आये हैं |

कर्म आधारित भारतीय संस्कृति की रचना होने के कारण सहज ही, क्रियालोप होने के आधार पर क्षत्रियों के पतन का उल्लेख मनुस्मृति में भी किया गया है -

"शनकैस्तु क्रियालोपादिमा: क्षत्रियजातिय: | वृषलत्वं गता जाके ब्रह्मणादर्शनेन च ||
पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविड़ा: काम्बोजा यवना: शका: | पारदा: पह्लवाश्चीना: किरातादरदा: खशा: ||"

अर्थात्, "पौण्ड्रक, औड्र, द्रविड़, कम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, दारद और खश - ये क्षत्रिय जातियाँ (उपनयनादि) क्रियालोप होने से एवं ब्राह्मण का दर्शन न होने के कारण (अध्ययन आदि के अभाव में) इस लोक में शूद्रत्व को प्राप्त होती हैं|" - इससे क्षत्रियों के अधोपतन की बात सिद्ध होती है|

यद्यपि असंख्य जनजातियों द्वारा स्वयं को क्षत्रिय घोषित किये जाने के प्रमाण मिलते हैं, जिनका उल्लेख आगे किया जायेगा ।परन्तु, अत्यंत कालातीत होने के बावजूद कतिपय जातियाँ अपने को 'हैहयवंशी' भी कहती हैं|

डा. बी. पी. केसरी ने घासीराम कृत 'नागवंशावली झूमर' के अध्याय 4, पृष्ठ 82 से संदर्भित निम्न दोहे के अनुसार कोराम्बे (राँची) के रक्सेल राजाओं को हैहयवंशी कहा है   -

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ब्रह्म वैवर्त पुराण( गणपति खण्ड)
3.35.६० ।।
अधीतं विधिवद्दत्तं ब्राह्मणेभ्यो दिने दिने ।।
जगते यशसा पूर्णमयशो वार्द्धके कथम् ।।६१ ।।

दाता वरिष्ठो धर्म्मिष्ठो यशस्वी पुण्यवान्सुधीः ।।
कार्त्तवीर्यार्जुनसमो न भूतो न भविष्यति ।६२।

पुरातना वदन्तीति बन्दिनो धरणीतले ।।
यो विख्यातः पुराणेषु तस्य दुष्कीर्त्तिरीदृशी । ६३ ।

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(ब्रह्म वैवर्त पुराण गणपति खण्ड अध्याय ३६)

"दृष्ट्वा तं योद्धुमायान्तं राजानश्च महारथाः।।
आययुः समरं कर्त्तुं कार्त्तवीर्य्यं निवार्य्य च। ११
।।

कान्यकुब्जाश्च शतशः सौराष्ट्राः शतशस्तथा ।।
राष्ट्रीयाः शतशश्चैव वीरेन्द्राः शतशस्तथा ।१२।।

"सौम्या वाङ्गाश्च शतशो महाराष्ट्रास्तथा दश ।।
तथा गुर्जरजातीयाः कलिङ्गाः शतशस्तथा ।। ।। १३ ।।

कृत्वा तु शरजालं च भृगुश्चिच्छेद तत्क्षणम् ।।
तं छित्त्वाऽभ्युत्थितो रामो नीहारमिव भास्करः ।। १४ ।।

त्रिरात्रं युयुधे रामस्तैः सार्द्धं समराजिरे ।।
द्वादशाक्षौहिणीं सेनां तथा चिच्छेद पर्शुना ।१५ ।।

रम्भास्तम्भसमूह च यथा खड्गेन लीलया ।।
छित्त्वा सेनां भूपवर्गं जघान शिवशूलतः ।।१६।।

"सर्वांस्तान्निहतान्दृष्ट्वा सूर्य्यवंशसमुद्भवः ।।
आजगाम सुचन्द्रश्च लक्ष राजेन्द्रसंयुतः ।१७ ।।

द्वादशाक्षौहिणीभिश्च सेनाभिः सह संयुगे।
कोपेन युयुधे रामं सिंहं सिंहो यथा रणे ।१८।

भृगुः शङ्करशूलेन नृपलक्षं निहत्य च ।।
द्वादशाक्षौहिणीं सेनामहन्वै पर्शुना बली ।१९।

निहत्य सर्वाः सेनाश्च सुचन्द्रं युयुधे बली ।।
नागास्त्रं प्रेरयामास निहृतं तं भृगुः स्वयम् । 3.36.२०।
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< श्रीमद्भागवतपुराणम्‎ | स्कन्धः १
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अध्यायः ३
वेदव्यासः स्कन्धः १, अध्यायः ४ →
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      {श्रीमद्भागवतपुराणम्-स्कन्धः१}
                  ।सूत उवाच।
                   (अनुष्टुप् छन्द) 
जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः।          संभूतं षोडशकलं आदौ लोकसिसृक्षया।१॥ यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वतः। नाभिह्रदाम्बुजादासीद् ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः॥२॥ यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः।         तद् वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम्।३॥

         (इंद्रवंशा-छन्द) 
 पश्यन्त्यदोरूपमदभ्रचक्षुषा सहस्रपादोरुभुजाननाद्‍भुतम् ।
सहस्रमूर्धश्रवणाक्षिनासिकं
  सहस्रमौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत् ॥४॥
       (अनुष्टुप् छन्द) 
एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् । यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥५॥        स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमाश्रितः।          चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥६॥ द्वितीयं तु भवायास्य रसातलगतां महीम्। उद्धरिष्यन् उपादत्त यज्ञेशः सौकरं वपुः ॥७॥ तृतीयं ऋषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।            तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः॥८॥      तुर्ये धर्मकलासर्गे नरनारायणौ ऋषी । भूत्वात्मोपशमोपेतं अकरोद् दुश्चरं तपः॥९॥ पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् । प्रोवाचासुरये सांख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम्॥१०॥ षष्ठे अत्रेरपत्यत्वं वृतःप्राप्तोऽनसूयया। आन्वीक्षिकीमलर्कायप्रह्लादादिभ्य ऊचिवान्॥११। ततः सप्तम आकूत्यां रुचेर्यज्ञोऽभ्यजायत । स यामाद्यैः सुरगणैःअपात् स्वायंभुवान्तरम्।।१२॥ अष्टमे मेरुदेव्यां तु नाभेर्जात उरुक्रमः ।      दर्शयन्वर्त्म धीराणां सर्वाश्रम नमस्कृतम् ॥१३॥ ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः । दुग्धेमामोषधीर्विप्राः तेनायं स उशत्तमः॥१४॥    रूपं स जगृहे मात्स्यं चाक्षुषोदधिसंप्लवे। नाव्यारोप्य महीमय्यां अपाद् वैवस्वतं मनुम्॥१५॥ सुरासुराणां उदधिं मथ्नतां मन्दराचलम् ।           दध्रे कमठरूपेण पृष्ठ एकादशे विभुः॥१६॥ धान्वन्तरंद्वादशमंत्रयोदशममेव च। अपाययत्सुरान्अन्यान् मोहिन्यामोहयन्स्त्रिया।१७॥ 
चतुर्दशंनारसिंहंबिभ्रद् दैत्येन्द्रमूर्जितम् ।          ददार करजैरुरौ एरकां कटकृत् यथा॥१८॥
 पञ्चदशं वामनकं कृत्वागादध्वरं बलेः।        पदत्रयं याचमानः प्रत्यादित्सुस्त्रिविष्टपम्॥१९॥ अवतारे षोडशमे पश्यन् ब्रह्मद्रुहो नृपान् । त्रिःसप्तकृत्वःकुपितोनिःक्षत्रां अकरोन्महीम्॥२०॥ ततः सप्तदशेजातःसत्यवत्यांपराशरात् ।          चक्रे वेदतरोः शाखादृष्ट्वापुंसोऽल्पमेधसः॥२१॥ 
नरदेवत्वमापन्नः सुरकार्यचिकीर्षया । समुद्रनिग्रहादीनि चक्रे वीर्याण्यतःपरम्॥२२॥ एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी । रामकृष्णाविति भुवो भगवान् अहरद्भरम्॥२३॥ ततःकलौसंप्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्। बुद्धोनाम्नांजनसुतःकीकटेषु भविष्यति॥२४॥ अथासौ युगसंध्यायां दस्युप्रायेषु राजसु। जनिताविष्णुयशसोनाम्नाकल्किर्जगत्पतिः॥२५॥ अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेःसत्त्वनिधेर्द्विजाः। यथाविदासिनःकुल्याःसरसः स्युः सहस्रशः॥२६॥ ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः।             कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः तथा ॥२७॥       एते चांशकलाःपुंसःकृष्णस्तु भगवान्स्वयम् । इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥२८॥ जन्म गुह्यं भगवतो य एतत्प्रयतो नरः। सायंप्रातर्गृणन्भक्त्यादुःखग्रामाद् विमुच्यते॥ २९॥ एतद् रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥३०॥      यथा नभसि मेघौघो रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।           एवं द्रष्टरि दृश्यत्वं आरोपितं अबुद्धिभिः॥३१॥      अतः परं यदव्यक्तं अव्यूढगुणबृंहितम्। अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यत् पुनर्भवः॥३२। यत्रेमे सदसद् रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा । अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥३३॥ यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः।               संपन्न एवेति विदुः महिम्नि स्वे महीयते ॥३४ ॥ एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च।     वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः॥३५ ॥
         (उपेंद्रवज्रा छन्द) 
स वा इदं विश्वममोघलीलः
 सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽस्मिन्।
भूतेषु चान्तर्हित आत्मतंत्रः
 षाड्वर्गिकं जिघ्रति षड्गुणेशः॥३६॥
न चास्य कश्चिन्निपुणेन धातुःअवैति जन्तुः    कुमनीष ऊतीः।
नामानि रूपाणि मनोवचोभिः
 सन्तन्वतो नटचर्यामिवाज्ञः॥३७॥
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स वेदधातुःपदवींपरस्य
 दुरन्तवीर्यस्य रथाङ्गपाणेः।
योऽमाययासन्ततयानुवृत्त्या    भजेततत्पादसरोजगन्धम्॥३८॥
अथेह धन्या भगवन्त इत्थं   यद्‌वासुदेवेऽखिललोकनाथे।
कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं
न यत्रभूयःपरिवर्तउग्रः॥३९॥
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इदं भागवतंनाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवान् ऋषिः॥४०॥ (अनुष्टुप -छन्द)
 निःश्रेयसाय लोकस्य धन्यं स्वस्त्ययनं महत् । तदिदं ग्राहयामास सुतं आत्मवतां वरम् ॥४१॥ सर्ववेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम्।             स तु संश्रावयामास महाराजं परीक्षितम्॥४२ ॥ प्रायोपविष्टं गङ्गायां परीतं परमर्षिभिः ।           कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिःसह ॥४३॥ कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः।            तत्र कीर्तयतो विप्रा विप्रर्षेर्भूरितेजसः॥४४॥       अहं चाध्यगमं तत्र निविष्टस्तद् अनुग्रहात्।      सोऽहं वः श्रावयिष्यामि यथाधीतं यथामति॥४५॥
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इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ 
हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥
अनुवाद-
भगवान के अवतारों का वर्णन  करते हुए श्रीसूत जी कहते हैं- सृष्टि के आदि में भगवान ने लोकों के निर्माण की इच्छा की। इच्छा होते ही उन्होंने महतत्त्व आदि तत्वों से निष्पन्न पुरुष रूप ग्रहण किया। उसमें दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत- ये सोलह कलाएँ थीं। उन्होंने कारण-जल में शयन करते हुए जब योगनिद्रा का विस्तार किया, तब उनके नाभि-सरोवर में से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से प्रजापतियों के अधिपति ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए।

भगवान के उस विराट् रूप के अंग-प्रत्यंग में ही समस्त लोकों की कल्पना की गयी है, वह भगवान का विशुद्ध सत्त्वमय श्रेष्ठ रूप है। योगी लोग दिव्यदृष्टि से भगवान के उस रूप का दर्शन करते हैं। भगवान का वह रूप हजारों पैर, जाँघें, भुजाएँ और मुखों के कारण अत्यन्त विलक्षण है; उसमें सहस्रों सिर, हजारों कान, हजारों आँखें और हजारों नासिकाएँ हैं। हजारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डल आदि आभूषणों से वह उल्लसित रहता है। भगवान का यही पुरुष रूप जिसे नारायण कहते हैं, अनेक अवतारों का अक्षय कोष है- इसी से सारे अवतार प्रकट होते हैं। इस रूप के छोटे-से-छोटे अंश से देवता, पशु-पक्षी और मनुष्यादि योनियों की सृष्टि होती है। उन्हीं प्रभु ने पहले कौमार सर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार- इन चार ब्राह्मणों के रूप में अवतार ग्रहण अत्यन्त कठिन अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया। दूसरी बार इस संसार के कल्याण के लिये समस्त यज्ञों के स्वामी उन भगवान ने ही रसातल में गयी हुई पृथ्वी को निकाल लाने के विचार से सूकर( सूअर) रूप ग्रहण किया। ऋषियों की सृष्टि में उन्होंने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और
 "सात्वत- तन्त्र का (जिसे ‘नारद-पांचरात्र’ कहते हैं) उपदेश किया; उसमें कर्मों के द्वारा किस प्रकार कर्म बन्धन से मुक्ति मिलती है, इसका वर्णन है। 
 धर्मपत्नी मूर्ति के गर्भ से उन्होंने नर-नारायण के रूप में चौथा अवतार ग्रहण किया। इस अवतार में उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियों का सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की। पाँचवें अवतार में वे सिद्धों के स्वामी कपिल के रूप में प्रकट हुए और तत्त्वों का निर्णय करने वाले सांख्य-शास्त्र का, जो समय के फेर से लुप्त हो गया था, आसुरि नामक ब्राह्मण को उपदेश किया। अनसूया के वर माँगने पर छठे अवतार में वे अत्रि की सन्तान- दत्तात्रेय हुए।
 इस अवतार में उन्होंने अलर्क एवं प्रह्लाद आदि को ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया। सातवीं बार रुचि प्रजापति की आकूति नामक पत्नी से यज्ञ के रूप में उन्होंने अवतार ग्रहण किया और अपने पुत्र यम आदि देवताओं के साथ स्वायम्भुव मन्वन्तर की रक्षा की।
राजा नाभि की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभदेव के रूप में भगवान ने आठवाँ अवतार ग्रहण किया। इस रूप में उन्होंने परमहंसों का वह मार्ग, जो सभी आश्रमियों के लिये वन्दनीय है, दिखाया। ऋषियों की प्रार्थना से नवीं बार वे राजा पृथु के रूप में अवतीर्ण हुए। शौनकादि ऋषियों ! इस अवतार में उन्होंने पृथ्वी से समस्त ओषधियों का दोहन किया था, इससे यह अवतार सबके लिये बड़ा ही कल्याणकारी हुआ।
चाक्षुस मन्वन्तर के अन्त में जब सारी त्रिलोकी समुद्र में डूब रही थी, तब उन्होंने मत्स्य के रूप में दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वीरूपी नौका पर बैठाकर अगले मन्वन्तर के अधिपति वैवस्वत मनु की रक्षा की। जिस समय देवता और दैत्य समुद्र-मन्थन कर रहे थे, उस समय ग्यारहवाँ अवतार धारण करके कच्छप रूप से भगवान ने मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया। बारहवीं बार धन्वन्तरि के रूप में अमृत लेकर समुद्र से प्रकट हुए और तेरहवीं बार मोहिनी रूप धारण करके दैत्यों को मोहित करते हुए देवताओं को अमृत पिलाया। चौदहवें अवतार में उन्होंने नरसिंह रूप धारण किया और अत्यन्त बलवान दैत्यराज हिरण्यकशिपु की छाती अपने नखों से अनायास इस प्रकार फाड़ डाली, जैसे चटाई बनाने वाला सींक को चीर डालता है। पंद्रहवीं बार वामन का रूप धारण करके भगवान दैत्यराज बलि के यज्ञ में गये। वे चाहते तो थे त्रिलोकी का राज्य, परन्तु माँगी उन्होंने केवल तीन पग पृथ्वी। सोलहवें परशुराम अवतार में जब उन्होंने देखा कि राजा लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये हैं, तब क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया। इसके बाद सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भ से पराशरजी के द्वारा वे व्यास के रूप में अवतीर्ण हुए, उस समय लोगों की समझ और धारणाशक्ति का देखकर आपने वेदरूप वृक्ष की कई शाखाएँ बना दीं। अठारहवीं बार देवताओं का कार्य सम्पन्न करने की इच्छा से उन्होंने राजा के रूप में रामावतार ग्रहण किया और सेतुबन्धन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत-सी लीलाएँ कीं।

उन्नीसवें और बीसवें अवतारों में उन्होंने यदुवंश में बलराम और श्रीकृष्ण के नाम से प्रकट होकर पृथ्वी का भार उतारा। 
उसके बाद कलियुग आ जाने पर मगध देश (बिहार) में देवताओं के द्वेषी दैत्यों को मोहित करने के लिये अजन के पुत्ररूप में आपका बुद्धावतार होगा। 
इसके भी बहुत पीछे जब कलियुग का अन्त समीप होगा और राजा लोग प्रायः लुटेरे हो जायेंगे, तब जगत् के रक्षक भगवान विष्णुयश नामक ब्राह्मण के घर कल्कि रूप में अवतीर्ण होंगे।

शौनकादि ऋषियों! जैसे अगाध सरोवर से हजारों छोटे-छोटे नाले निकलते हैं, वैसे ही सत्त्वनिधि भगवान श्रीहरि के असंख्य अवतार हुआ करते हैं। ऋषि, मनु, देवता, प्रजापति, मनुपुत्र और जितने भी महान् शक्तिशाली हैं, वे सब-के-सब भगवान के ही अंश हैं। ये सब अवतार तो भगवान के अंशावतार अथवा कलावतार हैं, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान (अवतारी) ही हैं। जब लोग दैत्यों के अत्याचार से व्याकुल हो उठते हैं, तब युग-युग में अनेक रूप धारण करके भगवान उनकी रक्षा करते हैं। भगवान के दिव्य जन्मों की यह कथा अत्यन्त गोपनीय-रहस्यमयी है; जो मनुष्य एकाग्रचित्त से नियमपूर्वक सायंकाल और प्रातःकाल प्रेम से इसका पाठ करता है, वह सब दुःखों से छूट जाता है। प्राकृत स्वरूपरहित चिन्मय भगवान का जो यह स्थूल जगदाकार रूप है, यह उनकी माया के महत्तत्त्वादि गुणों से भगवान में ही कल्पित है। जैसे बादल वायु के आश्रय रहते हैं और धूसर पना धूल में होता है, परन्तु अल्पबुद्धि मनुष्य बादलों का आकाश में और धूसरपने का वायु में आरोप करते हैं- वैसे ही अविवेकी पुरुष सबके साक्षी आत्मा में स्थूल दृश्यरूप जगत् का आरोप करते हैं।
इस स्थूल रूप से परे भगवान का एक सूक्ष्म अव्यक्त रूप है- जो न तो स्थूल की तरह आकारादि गुणों वाला है और न देखने, सुनने में ही आ सकता है; वही सूक्ष्म शरीर है। आत्मा का आरोप या प्रवेश होने से यही जीव कहलाता है और इसी का बार-बार जन्म होता है।
उपर्युक्त सूक्ष्म और स्थूल शरीर अविद्या से ही आत्मा में आरोपित हैं। जिस अवस्था में आत्मस्वरूप के ज्ञान से यह आरोप दूर हो जाता है, उसी समय ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। तत्त्वज्ञानी लोग जानते हैं कि जिस समय यह बुद्धिरूपा परमेश्वर की माया निवृत्त हो जाती है, उस समय जीव परमानन्दमय हो जाता है और अपनी स्वरूप-महिमा में प्रतिष्ठित होता है। वास्तव में जिनके जन्म नहीं हैं और कर्म भी नहीं हैं, उन हृदयेश्वर भगवान के अप्राकृत जन्म और कर्मों का तत्त्वज्ञानी लोग इसी प्रकार वर्णन करते हैं; क्योंकि उनके जन्म और कर्म वेदों के अत्यन्त गोपनीय रहस्य हैं।
भगवान की लीला अमोघ है। वे लीला से ही इस संसार का सृजन, पालन और संहार करते हैं, किंतु इसमें आसक्त नहीं होते। प्राणियों के अन्तःकरण में छिपे रहकर ज्ञानेन्द्रिय और मन के नियन्ता के रूप में उनके विषयों को ग्रहण भी करते हैं, परंतु उनसे अलग रहते हैं, वे परम स्वतन्त्र हैं- ये विषय कभी उन्हें लिप्त नहीं कर सकते। जैसे अनजान मनुष्य जादूगर अथवा नट के संकल्प और वचनों से की हुई करामात को नहीं समझ पाता, वैसे ही अपने संकल्प और वेदवाणी के द्वारा भगवान के प्रकट किये हुए इन नाना नाम और रूपों को तथा उनकी लीलाओं को कुबुद्धि जीव बहुत-सी तर्क-युक्तियों के द्वारा नहीं पहचान सकता। चक्रपाणि भगवान की शक्ति और पराक्रम अनन्त है- उनकी कोई थाह नहीं पा सकता। वे सारे जगत् के निर्माता होने पर भी उससे सर्वथा परे हैं। उनके स्वरूप को अथवा उनकी लीला के रहस्य को वही जान सकता है, जो नित्य-निरन्तर निष्कपट भाव से उनके चरणकमलों की दिव्य गन्ध का सेवन करता है- सेवा भाव से उनके चरणों का चिन्तन करता रहता है।
शौनकादि ऋषियों ! आप लोग बड़े ही सौभाग्यशाली तथा धन्य हैं जो इस जीवन में और विघ्न-बाधाओं से भरे इस संसार में समस्त लोकों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से वह सर्वात्मक आत्मभाव, वह अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं, जिससे फिर इस जन्म-मरण रूप संसार के भयंकर चक्र में नहीं पड़ना होता।
भगवान वेदव्यास ने यह वेदों के समान भगवच्चरित्र से परिपूर्ण भागवत नाम का पुराण बनाया है। उन्होंने इस श्लाघनीय, कल्याणकारी और महान् पुराण को लोगों के परम कल्याण के लिये अपने आत्मज्ञान शिरोमणि पुत्र को ग्रहण कराया। इसमें सारे वेद और इतिहासों का सार-सार संग्रह किया गया है। शुकदेव जी ने राजा परीक्षित् को यह सुनाया। उस समय वे परमर्षियों से घिरे हुए आमरण अनशन का व्रत लेकर गंगा तट पर बैठे हुए थे। भगवान श्रीकृष्ण जब धर्म, ज्ञान आदि के साथ अपने परम धाम को पधार गये, तब इस कलियुग में जो लोग अज्ञानरूपी अन्धकार से अंधे हो रहे हैं, उनके लिये यह पुराणरूपी सूर्य इस समय प्रकट हुआ है। शौनकादि ऋषियों! जब महातेजस्वी श्रीशुकदेव जी महाराज वहाँ इस पुराण की कथा कह रहे थे, तब मैं भी वहाँ बैठा था। वहीं मैंने उनकी कृपापूर्ण अनुमति से इसका अध्ययन किया। मेरा जैसा अध्ययन है और मेरी बुद्धि ने जितना जिस प्रकार ग्रहण किया है, उसी के अनुसार इसे मैं आप लोगों को सुनाउँगा।
श्रीमद्‌भागवत महापुराण पारमह संहित का प्रथमस्कन्ध नैमिषीयोपाख्यान नामक तृतीयोऽध्यायः॥३॥ 


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उभयोः सेनयोर्युद्धमभवत्तत्र नारद ।
पलायिता रामशिष्या भ्रातरश्च महाबलाः।
क्षतविक्षतसर्वाङ्गाः कार्त्तवीर्य्यप्रपीडिताः ।९।
नृपस्य शरजालेन रामः शस्त्रभृतां वरः।
न ददर्श स्वसैन्यं च राजसैन्यं तथैव च। 3.40.१०।
चिक्षेप रामश्चाग्नेयं बभूवाग्निमयं रणे ।
निर्वापयामास राजा वारुणेनैव लीलया ।११।
चिक्षेप रामो गान्धर्वं शैलसर्पसमन्वितम् ।
वायव्येन महाराजः प्रेरयामास लीलया ।१२।
चिक्षेप रामो नागास्त्रं दुर्निवार्य्यं भयंकरम् ।
गारुडेन महाराजः प्रेरयामास लीलया ।१३।
माहेश्वरं च भगवांश्चिक्षेप भृगुनन्दनः।
निर्वापयामासराजा वैष्णवास्त्रेण लीलया।१४।
ब्रह्मास्त्रं चिक्षिपे रामो नृपनाशाय नारद ।
ब्रह्मास्त्रेणचशान्तं तत्प्राणनिर्वापणं रणे ।१५।
दत्तदत्तं च यच्छूलमव्यर्थं मन्त्रपूर्वकम्।
जग्राह राजा परशुरामनाशाय संयुगे ।१६।
शूलं ददर्श रामश्च शतसूर्य्यसमप्रभम् ।
प्रलयाग्रिशिखोद्रिक्तं दुर्निवार्यं सुरैरपि ।१७।
पपात शूलं समरे रामस्योपरि नारद ।
मूर्च्छामवाप स भृगुः पपात च हरिं स्मरन् ।१८ ।
पतिते तु तदा रामे सर्वे देवा भयाकुलाः।
आजग्मुः समरं तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।१९।
शङ्करश्च महाज्ञानी महाज्ञानेन लीलया।
ब्राह्मणं जीवयामास तूर्णं नारायणाज्ञया। 3.40.२०।
स्रोत-(ब्रह्मवैवर्तपुराण- गणपतिखण्ड अध्यायय-४०)
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अनुवाद- व 
भावार्थः-
हे नारद ! अनन्तर दोनों ओर के सैनिको में भयंकर युद्ध. आरम्भ हुआ. , जिसमें परशुराम के शिष्यगण और महावली भ्राता गण भगवान कार्तवीर्य से अतिपीडित एवं छिन्नभिन्न होकर भाग निकले ।९।
राजा कार्तवीर्य के बाणजाल से आछन्न होने के कारण परशुराम अपनी सेना और राजा कार्तवीर्य की सेना को नही देख सके ।१०।
पश्चात परशुराम ने युद्ध में आग्नेय बाण का प्रयोग किया , जिसमें सब कुछ अग्निमय हो गया , राजा कार्तवीर्य ने वारुण बाण द्वारा उसे लीला की भाँति
शान्त कर दिया ।११। परशुराम ने पर्वत-सर्प युक्त गांन्धर्व अस्त्र का प्रयोग किया जिसे कार्तवीर्य अर्जुन ने वायव्य बाण द्वारा समाप्त कर दिया ।१२।फिर परशुराम ने अनिवार्य एंव भयंकर नागास्त्र का प्रयोग किया , जिसे महाराजा सहस्रबाहु ने गरूणास्त्र द्वारा बिना यत्न के ही नष्ट कर दिया ।१३।
भृगु नन्दन परशुराम ने माहेश्वर अस्त्र का प्रयोग किया जिसे महाराजा ने वैष्णव अस्त्र द्वारा लीलापूर्बक समाप्त कर दिया ।१४। हे नारद् !! अनन्तर परशुराम ने कार्तवीर्य के विनाशार्थ ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया , कार्तवीर्य महाराजा ने भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर उस प्राणनाशक को भी युद्ध में शान्त कर दिया ।१५। तब महाराज कार्तवीर्य जी ने उस रण में परशुराम के वधा के लिए दत्तात्रेय द्वारा प्रदत शूल का मन्त्र पूर्वक उपयोग (सन्धान) किया , जो कभी भी व्यर्थ ना होने वाला था ।१६।परशुराम ने उस सैकडो सूर्य के समान कान्तिपूर्ण प्रलय कालीन अग्निशिखा से  आप्लायित और देवो के लिये भी दुर्निवार उस शूल को देखा ।१७। हे नारद ! परशुराम के ऊपर वह शूल गिरा, जिससे भगवान् का स्मरण करते हुए परशुराम मूर्छित होगये ।१८
 परशुराम के गिर जाने के वाद समस्त देव गण व्याकुल हो गये , उस समय युद्ध स्थल में ब्रह्मा विष्णु एवं महेश्वर भी आ गये।।१९।
नारायण की आज्ञा से महाज्ञानी शिव ने अपने महाज्ञान द्वारा लीला पूर्वक परशुराम को पुन: जीवित कर दिया ।२०।
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