रविवार, 18 दिसंबर 2022

शूद्र-


शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति पर एक प्रासंगिक विश्लेषण आवश्यक है।

विश्व-सांस्कृतिक अन्वेषणों के पश्चात् जो एक तथ्य पूर्णतः प्रमाणित हुआ है। वह यह है कि जिस वर्ण व्यवस्था को मनु का विधान कह कर रूढ़िवादी पुरोहितों द्वारा भारतीय संस्कृति के प्राणों में प्रतिष्ठित किया गया था ; और जिसके आधार पर शूद्र जनजाति के लिए दमनकारी विधान बनाकर उस विधान को धार्मिक और ईश्वरीय परिधान का रूप देकर भारतीय समाज पर आरोपित भी किया गया था।  वही वर्ण व्यवस्था केवल भारतीय पुरोहितों का आविष्कार थी। किसी ईश्वर अथवा मनु का आविष्कार नहीं भारतीय वर्णन व्यवस्था  जिसका प्रादुर्भाव ईसापूर्व० सप्तम सदी में हुआ था। जबकि  ईसा पूर्व आठवीं- नौवीं सदी में शूद्र शब्द एक जातिविशेष का विशेषण था।  और यही महाभारत काल भी था भले ही इसके घटित समय को परम्परागत पुरोहित लोगों द्वारा  साढ़े पाँच हजार वर्ष प्राचीन बता दिया जाए ! इस वर्ण व्यवस्था का आधार भी ईरानी समाज की वर्ग व्यवस्था है । वर्ण और वर्ग में अन्तर रेखाऐं सुदीर्घ है । जहाँ वर्ग व्यवस्था केवल व्यक्ति के व्यवसाय पर अवलम्बित है अर्थात् व्यक्ति अपनी रुचि और योग्यता के अनुरूप व्यवसाय या कर्म या कैरियर के अनुरूप कर्मक्षेत्र का चुनाव कर जीवन -यापन  कर सकता है।  यह इसका मौलिक चुनाव है। वहीं वर्ण व्यवस्था को केवल जन्म और जाति के आधार पर पुश्तैनी मान्यताओं में बाँध दिया गया।  वर्ण-व्यवस्था ईश्वरीय विधान नहीं है। उसकी प्राचीनता भी पूर्णतः संदिग्ध ही है , प्राचीनता केवल कुछ हजार वर्ष अर्थात् ई०पू० सप्तम सदी के समकक्ष की मानी जा सकती है।

 क्यों कि भारतीय पुरोहितों के यजमान देव-संस्कृति के अनुयायीयों का आगमन सुमेरियन, बैबीलॉनियन संस्कृतियों को आत्म सात करते हुए ईरानी के रास्ते भारत में हुआ।

ईरानी असुर संस्कृतियों के अनुयायीयों थे । उन्होंने कभी भी देव-संस्कृति को सम्मान नहीं दिया यह तो इतिहास में स्पष्ट है।  असुरमहत् (अहुरमज्दा) ईरानीयों का परम आराध्य था । "अवेस्ताएजैन्द" में  देव शब्द "दएव" के रूप में दुष्ट ,विधर्मी और अधम व्यक्ति का वाचक है । इस सांस्कृतिक व्युत्क्रम का समय लगभग 2050 से ई०पू० 1500 तक का कालखण्ड है।                देव संस्कृति के अनुयायी बाल्टिक सागर के तटवर्ती क्षेत्रों में बस हुए थे ये स्वयं को देवताओं की सन्तान मानते थे। यही क्षेत्र आज का स्कैनण्डिनैविया है। 

वर्ण- व्यवस्था के विषय में आज जैसा आदर्श पुरोहितों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।  वह यथार्थ मूलक नहीं और ये लोगों तो आदर्श प्रस्तुत करेंगे ही क्यों कि वर्ण व्यवस्था का विधायक ही ब्राह्मण या पुरोहित हैं । वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।  उनके अधिकार बहुत और कर्तव्य बहुत कम ही हैं।  कुछ तथाकथित रूढ़वादी आज तक वर्णव्यवस्था को ईश्वर का समाजिक विधान बताते नहीं थकते हैं। । वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था का स्वरूप स्वभाव प्रवृत्ति और कर्म गत भले ही रहा हो ! परन्तु कालान्तरण में यह व्यवस्था जाति अर्थात् जन्ममूलक हो गयी शूद्र भारतीय समाज व्यवस्था में चतुर्थ वर्ण या जाति के रूप में मान्यता प्राप्त जन समुदाय है।  आश्चर्य की बात तो यह है कि संस्कृत भाषा के वैय्याकरणों ने भी शूद्र शब्द की सम्यक् व्युत्पत्ति नहीं कर पायी क्यों कि यह शब्द भारतीय की अपेक्षा यूरोपीय अधिक है।  इस शब्द की उत्पत्ति मूलत: विदेशी है अर्थात् ये भी स्कॉटलेण्ड के निवासी तथा ड्रयूड (Druids) कबीले से सम्बद्ध है । 

जिन्हें भारतीय पुराणों में द्रविड कहा गया । और संभवत: एक पराजित जन जाति का मूल नाम था। अब पराजित कैसे हुए यह भी एक रहस्य है।

किसी को हराने के लिए या परास्त करने के लिए व्यक्ति छल" बल" और अक्ल में से किसी का भी सहारा  लेता  ही है । क्यों जिनके पास बल और अक्ल न हो तो प्रकृति ने उन्हें छल शक्ति तो दी ही है । और चालाकी को आप पूर्णत:  बुद्धिमानी नहीं मान सकते हैं।  और इसी चालाकी और  फरेब के बल पर शूद्र जन जाति को परास्त किया गया । 

यद्यपि ज्ञान के क्षेत्र में प्राचीन विश्व में द्रविड संस्कृति सर्वोपरि व अद्वितीय थी।   देव संस्कृतियों के अनुयायी जिन्हें अनावश्यक रूप से आर्य बनाने की षड्यन्त्र कारी योजना बनायी गयी जो शास्त्रीय विधानों आज कृषि पशुपालन वृत्तियों को हेय और त्याज्य मानकर वर्णन करते हैं।  ये देव या सुर जनजाति बहुतायत में शाखा जर्मन जाति से सम्बद्ध है; यह तथ्य भी प्रमाणिकता के दायरे में आ गयें हैं । 

क्यों कि स्वीडन अथवा स्वर्की का प्राचीनत्तम जनजाति स्वीयर थी जिसे भारतीय पुरोहितों ने सुर कहा है। परन्तु देव संस्कृतियों के अनुयायी और द्रविडों की देव सूची समान ही थी । यही धारा आगे चल कर सुर -असुर में परिणति हुई । और इनके पूर्वज भी एक ही थे । 

अब शूद्र शब्द का पौराणिक व्युपत्ति पर बात करते हैं ।

भारतीय पौराणिक सन्दर्भ के अनुसार शूद्र शब्द का व्युपत्ति पर वायु पुराण का कथन है कि " शोक करके द्रवित होने वाले परिचर्यारत व्यक्ति को शूद्र कहते हैं । 

"भविष्यपुराण में कहा गया कि " श्रुति की द्रुति (अवशिष्टांश) प्राप्त करने वाले शूद्र कहलाए" तो वैदिक परम्परा अथर्ववेद में कल्याणी वाक (वेद) का श्रवण शूद्रों को विहित था। इस प्रकार के वर्णन भी मिलते हैं । एक परम्परा है कि ऐतरेय ब्राह्मण का रचयिता महीदास इतरा (शूद्र) का पुत्र था। किन्तु बाद में वेदाध्ययन का अधिकार शूद्रों से ले लिया गया। ये तथ्य कहाँ तक सत्य हैं कहा नहीं जा सकता है । ये केवल काल्पनिक पुट हैं । शूद्र जनजाति का उल्लेख;- विश्वइतिहास कार डायोडोरस, टॉल्मी और ह्वेन त्सांग भी करते हैं। आर्थिक स्थिति के आधार पर आकलन करें तो। उत्तर वैदिक काल में शूद्र की स्थिति दास की थी अथवा नहीं । इस विषय में निश्चित नहीं कहा जा सकता। यद्यपि वर्ण-व्यवस्था में यह कर्मकार और परिचर्या करने वाला वर्ग था। ज़िमर और रामशरण शर्मा क्रमश: शूद्रों को मूलत: भारतवर्ष में प्रथमागत आर्यस्कन्ध, क्षत्रिय, ब्राहुई भाषी और आभीर संबद्ध मानते हैं। शूद्र शब्द का व्युत्पत्यर्थ निकालने के भारतीय पुरोहितों द्वारा जो प्रयास हुए हैं, वे अनिश्चित से लगते हैं ; और उनसे वर्ण की समस्या को सुलझाने में शायद ही कोई सहायता मिलती है।इन पुरे हितों द्वारा बादरायण का काल्पनिक आरोपण करके शूद्र शब्द की काल्पनिक व अव्याकरणिक व्युत्पत्ति करने की असफल चेष्टा भी दर्शनीय है 👇 :--  इन पुरोहितों के अनुसार सबसे पहले 'वेदान्त सूत्र' में बादरायण ने इस दिशा में प्रयास किया था। इसमें 'शूद्र' शब्द को दो भागों में विभक्त कर दिया गया है- 'शुक्’ और ‘द्र’, शुच् और द्रु क्रियामूल या धातु हैं । बादरायण भी दो धातुओं से एक शब्द की व्युपत्ति करते हैं -जो व्याकरण संगत नहीं । शु का पूर्व रूप आशु जो और द्रु -जो ‘द्रु’ धातु से बना है और जिसका अर्थ है, दौड़ना है । इसकी टीका करते हुए । शंकराचार्य ने इस बात की तीन वैकल्पिक व्याख्याएँ की हैं कि जानश्रुति शूद्र क्यों कहलाया -

 रैक्व एक तत्वज्ञानी ऋषि थे। वे वायु को सृष्टि का आदिकारण मानते हैं (छांदोग्य, ४-३-१-२)। गाड़ी के नीचे निवास करने के कारण रेक्व 'सयुग्वा' कहलाए (पद्म.उ. १७६)। जनश्रुति है कि राजा मृगया के समय दो हंसों के वार्तालाप में इनके पुण्य की प्रशंसा सुन, ढूँढ़ता हुआ आया और इन्हें बहुमूल्य दान देना चाहा परन्तु उसे अस्वीकार कर इन्होने उल्टे उन्हें ही अपनी गाड़ी दान में दे दी। तदनन्तर राजा ने अपनी कन्या तथा एक गाँव (स्कंद पुरान ३-१-२६) इन्हें दान में देकर तत्वज्ञान का उपदेश ग्रहण किया।

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 'वह शोक के अन्दर दौड़ गया’, - ‘वह शोक निमग्न हो गया’:--- (शुचम् अभिदुद्राव) ‘उस पर शोक दौड़ आया’, - ‘उस पर सन्ताप छा गया’ (शुचा वा अभिद्रुवे) ‘अपने शोक के मारे वह रैक्व दौड़ गया’ (शुचा वा रैक्वम् अभिदुद्राव)। शंकर का निष्कर्ष है कि शूद्र, शब्द के विभिन्न अंगों की व्याख्या करने पर ही उसे समझा जा सकता है, अन्यथा नहीं। बादरायण द्वारा 'शूद्र' शब्द की व्युत्पत्ति और शंकर द्वारा उसकी व्याख्या दोनों ही वस्तुत: असंतोषजनक और असंगत ही हैं। ये केवल काल्पनिक उड़ाने मात्र हैं 


। कहा जाता है कि शंकर ने जिस जानश्रुति का उल्लेख किया है, वह अथर्ववेद में वर्णित उत्तर - पश्चिम भारत के निवासी महावृषों पर राज्य करता था। यह अनिश्चित है कि वह 'शूद्र वर्ण' का था, वह या तो 'शूद्र जनजाति' का था या उत्तर-पश्चिम की किसी जाति का था, जिसे ब्राह्मण लेखकों ने शूद्र के रूप में चित्रित किया है। पाणिनि के अनुसार पाणिनि के व्याकरण में 'उणादिसूत्र' के लेखक ने इस शब्द की ऐसी ही व्यत्पत्ति की है, जिसमें शूद्र शब्द के दो भाग किए गए हैं, अर्थात् धातु 'शुच्' या( शुक् र ) प्रत्यय ‘र’ –शूद्र परन्तु इसकी व्याख्या करना कठिन है और यह व्युत्पत्ति भी काल्पनिक और अस्वाभाविक लगती है। पुराणों के अनुसार पुराणों में जो परम्पराएँ हैं, उनसे भी शूद्र शब्द 'शुच्' धातु से सम्बद्ध जान पड़ता है, जिसका अर्थ होता है, संतप्त होना। कहा जाता है कि ‘जो खिन्न हुए और भागे, शारीरिक श्रम करने के अभ्यस्त थे तथा दीन-हीन थे, उन्हें शूद्र बना दिया गया’। किन्तु शूद्र शब्द की ऐसी व्याख्या उसके व्युत्पत्यर्थ बताने की अपेक्षा परवर्ती काल में शूद्रों की स्थिति पर ही प्रकाश डालती है। ये व्युत्पत्तियाँ पूर्व - दुराग्रहों से प्रेरित अधिक हैं । बौद्धों द्वारा प्रस्तुत व्याख्या भी ब्राह्मणों की व्याख्या की ही तरह काल्पनिक मालूम होती है। क्योंकि यहाँ भी ब्राह्मण वाद का संक्रमण हो गया था बुद्ध के अनुसार जिन व्यक्तियों का आचरण आतंकपूर्ण और हीन कोटि का था वे सुद्द[कहलाने लगे और इस तरह सुद्द, संस्कृत-शूद्र शब्द रूप में है । यदि मध्यकाल के बौद्ध शब्दकोश में शूद्र शब्द क्षुद्र का पर्याय बन गया,और इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि शूद्र शब्द क्षुद्र से बना है अमान्य है । सॉग्डियन से इसका साम्य दर्शनीय है। यद्यपि ब्राह्मणों और परवर्ती ब्राह्मण संक्रमण से ग्रसित बौद्धों की दोनों ही व्युत्पत्तियाँ भाषाविज्ञान की दृष्टि से असंतोषजनक हैं । किन्तु फिर भी महत्त्वपूर्ण हैं,( क्योंकि उनसे प्राचीन काल में 'शूद्र वर्ण' के प्रति प्रचलित भारतीय ब्राह्मण समाज की धारणा का आभास मिलता है) समाज का प्रभाव:------ ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत व्युत्पत्ति में शूद्रों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया गया है, किन्तु बौद्ध व्युत्पत्ति में समाज में उनकी हीनता और न्यूनता का ) पर कालान्तरण में भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था की विकृति -पूर्ण परिणति जाति वाद के रूप में हुई.. । (ऋग्वेद में एक ऋचा है - (कारुर् अहम् ततो भिषग् उपल प्रक्षिणी नना) अर्थात् मैं करीगर हूँ पिता वैद्य और माता पीसने वाली है- ✊कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना । नानाधियोवसूयवोऽनु गा इव तस्थिमन्द्रायेन्दो परि स्रव ।। (ऋग्वेद 9.112.3) मैं कारीगर हूँ , मेरे पिता वैद्य हैं, मेरी माता अनाज को पीसती है. हम सब इस समाज के पोषण में एक गौ की भांति अपना अपना अपना योगदान करते हैं. यह ऋचा इस तथ्य की सूचक है , कि देव-संस्कृति के अनुयायीयों का प्रवास जब मैसॉपोटामियन संस्कृतियों के सम्पर्क में था । तो वर्ण-व्यवस्था न हो कर समाज में वर्ग-व्यवस्था ही थी । एक परिवार में लोग तरह तरह के कार्य करते थे । मैसॉपोटामिया की पुरातन कथाओं का समायोजन ईरानी आर्यों की कथाओं से हो जाता है । ये दौनों आर्य ही कालान्तरण में असुर और देव कहलाए । यद्यपि आर्य शब्द का प्रयोग सैमेटिक असुर जनजाति के लिए हुआ है । तब तक समाज में कोई वर्ण-व्यवस्था नहीं थी केवल वर्ग-व्यवस्था अवश्य थी । हाँ गॉलों की ड्रयूड( Druids ) संस्कृति के चिर प्रतिद्वन्द्वी जर्मनिक जन-जातियाँ से सम्बद्ध आर्यों का जब भू-मध्य-रेखीय देश भारत में प्रवेश हुआ तो यहाँ गॉल जन-जाति के अन्य रूप भरत (Britons) और स्वयं गॉल जन-जाति के लोग कोेल (कोरी) पहले से रहते थे ।

 और कोलों को शूद्र नाम दिया गया ।जो वस्त्रों का परम्परा गत रूप से सीवन करते थे । इन्हें ही शूद्र या सेवक ( सीवन करने वाला कहा गया ) संस्कृत तथा यूरोभाषाओं में सीव और शुच् दौनों धातुओं का अर्थ है सीवन करना / सिलना।आज तक विद्यमान है।

 स्मृतियों में शूद्रों को दृष्टि गत रखते हुए उनके दमन के लिए विधान बनाए गये ।। मनु -स्मृति तथा आपस्तम्ब गृह्य शूत्रों ने भी प्रायः जाति गत वर्ण व्यवस्था का ही अनुमोदन किया है। इन ग्रन्थों का लेखन कार्य तो अर्वाचीन ही है । प्राचीन नहीं । ब्राह्मण शासक पुष्यमित्र सुँग के शासन काल में स्मृति-ग्रन्थों का रचना हुई । कभी मनु के नाम पर मनुस्मृति लिखी गयी । क्योंकि मनु सम्पूर्ण द्रविड और जर्मनिक जन-जातियाँ के आदि पुरुष थे । वर्तमान में मनु के नाम पर ग्रन्थ मनु-स्मृति जो शूद्रों के दमन और नियन्त्रण को लक्ष्य करके योजना बद्ध तरीके से लिपिबद्ध है । यह केवल पुष्यमित्र सुंग ई०पू०१८४ के समकालिक रचना है । मनु स्मृति के कुछ अमानवीय रूप भी आलोचनीय हैं ।

 मनुस्मृति में वर्णित है – 👇 " शक्तिनापि हि शूद्रेण न कार्यो धन सञ्चय: शूद्रो हि धनम् असाद्य ब्राह्मणानेव बाधते ।। १०/१२६ ________ अर्थात् शक्ति शाली होने पर भी शूद्र के द्वारा धन सञ्चय नहीं करना चाहिए ; क्योंकि धनवान बनने पर शूद्र ब्राह्मणों को बाधा पहँचाते हैं।

 ------------------------------------------------------------------ विस्त्रब्धं ब्राह्मण: शूद्राद् द्रव्योपादाना माचरेत् । नहि तस्यास्ति किञ्चितस्वं भर्तृहार्य धनो हि स:।। ८/४१६ 

________ अर्थात् शूद्र द्वारा अर्जित धन को ब्राह्मण निर्भीक होकर से सकता है । क्योंकि शूद्र को धन रखने का अधिकार नहीं है । उसका धन उसको स्वामी के ही अधीन होता है 

----------------------------------------------------------------- नाम जाति ग्रहं तु एषामभिद्रोहेण कुर्वत: । निक्षेप्यो अयोमय: शंकुर् ज्वलन्नास्ये दशांगुल : ।।८/२१७ अर्थात् कोई शूद्र द्रोह (बगावत) द्वारा ब्राह्मण क्षत्रिय तथा वैश्य वर्ग का नाम उच्चारण भी करता है तो उसके मुंह में दश अंगुल लम्बी जलती हुई कील ठोंक देनी चाहिए । ------------------------------------------------------------------- एकजातिर्द्विजातिस्तु वाचा दारुण या क्षिपन् । जिह्वया: प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि स:।८/२६९ _____ अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय तथा वैश्य वर्ग को यदि अपशब्द बोल जाए तो उस शूद्र की जिह्वा काट लेनी चाहिए । तुच्छ वर्ण का होने के कारण उसे यही दण्ड मिलना चाहिए । 

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पाणिमुद्यम्य दण्डं वा पाणिच्छेदनम् अर्हति । पादेन प्रहरन्कोपात् पादच्छेदनमर्हति ।।२८०। ___________ 

अर्थात् शूद्र अपने जिस अंग से द्विज को मारेउसका वही अंग काटना चाहिए । यदि द्विज को मानने के लिए हाथ उठाया हो अथवा लाठी तानी हो तो उसका हाथ काट देना चाहिए और क्रोध से ब्राह्मण को लात मारे तो उसका पैर काट देना चाहिए ।

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 ब्राह्मणों के द्वारा यदि कोई बड़ा अपराध होता है तो उसका केवल मुण्डन ही दण्ड है । बलात्कार करने पर भी ब्राह्मण को इतना ही दण्ड शेष है । __________________________________________ 

"मौण्ड्य प्राणान्तिको दण्डो ब्राह्मणस्य विधीयते। इतरेषामं तु वर्णानां दण्ड: प्राणान्तिको भवेत् ।।३७९।।

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 न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्व पापेषु अपि स्थितम् । राष्ट्राद् एनं बाहि: कुर्यात् समग्र धनमक्षतम् ।।३८०।। अर्थात् ब्राह्मण के सिर के बाल मुड़ा देना ही उसका प्राण दण्ड है । परन्तु अन्य वर्णों को प्राण दण्ड देना चाहिए । सब प्रकार के पाप में रत होने पर भी ब्राह्मण का बध कभी न करें।उसे धन सहित बिना मारे अपने देश से विकास दें । ------------------------------------------------------------------- ब्राह्मणों द्वारा अन्य वर्ण की कन्याओं के साथ व्यभिचार करने को भी कर्तव्य इन स्मृति-ग्रन्थों में नियत है तथा यह विधान घोषित किया गया कि :---- "उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति ।। शुल्कं दद्यात् सेवमानस्तु :समामिच्छेत्पिता यदि।।३६६। ______ अर्थात् उत्तम वर्ण (ब्राह्मण)जाति के पुरुष के साथ सम्भोग करने की इच्छा से उस ब्राह्मण आदि की सेवा करने वाली कन्या को राजा कुछ भी दण्ड न करे । पर उचित वर्ण की कन्या का हीन जाति के साथ जाने पर राजा उचित नियमन करे । उत्तम वर्ण की कन्या के साथ सम्भोग करने वाला नीच वर्ण का व्यक्ति वध के योग्य है ।। समान वर्ण की कन्या के साथ सम्भोग करने वाला , यदि उस कन्या का पिता धन से सन्तुष्ट हो तो पुरुष उस कन्या से धन देकर विवाह कर ले । ------------------------------------------------------------------- पुष्य मित्र सुंग काल का सामाजिक विधान और भी देखिए – सह आसनं अभिप्रेप्सु: उत्कृष्टस्यापकृष्टज: । कटयां कृतांको निवास्य: स्फिर्च वास्यावकर्तयेत्।।२८१।। अवनिष्ठीवती दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेत् नृप: । अवमूत्रयतो मेढमवशर्धयतो गुदम् ।।२८२।। _______________________________________ अर्थात् जो शूद्र वर्ण का व्यक्ति ब्राह्मण आदि वर्णों के साथ आसन पर बैठने की इच्छा करता है; तो राजा उसके कमर में छिद्र करके देश से निकाल दे । अथवा उसके नितम्ब का मास कटवा ले राजा ब्राह्मण के ऊपर थूकने वाले अहंकारी के दौनों ओष्ठ तथा मूत्र विसर्जन करने वाला लिंग और अधोवायु करने वाला मल- द्वार भी कटवा दे ------------------------------------------------------------------- क्या मनु ने ये अमानवीय विधान समाज के लिए निर्धारित किए होंगे ? समस्या यह है कि हमारा दलित समाज मनु-स्मृति को मनु द्वारा लिखित मानता है । जबकि मनु का प्रादुर्भाव भारतीय धरा पर कभी हुआ ही नहीं:-देखें , क्योंकि पुष्यमित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मण समाज ने उसे मनु के नाम पर रच दिया है । अब इन लोगों ने राम और कृष्ण को भी ब्राह्मण समाज द्वारा बल-पूर्वक आरोपित वर्ण व्यवस्था का पोषक वर्णित कर दिया है । जबकि वस्तु स्थिति इसको विपरीत है । कृष्ण को ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के ९६ वें सूक्त में असुर या अदेव के रूप में वर्णित किया गया है । और देव संस्कृतियों के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में कृष्ण उपस्थित हैं । राम का वर्णन भी सुमेरियन बैबीलॉनियन दक्षणी अमेरिका मिश्र ईरानी ईराक तखा थाईलेण्ड इण्डोनेशिया आदि में है । मनु के विषय में भी सभी धर्म - मतावलम्बी अपने अपने पूर्वाग्रह से ग्रस्त मिले , किसी ने मनु को अयोध्या का आदि पुरुष कहा , तो किसी ने हिमालय का अधिवासी कहा है । ________________________________________ ..परन्तु सत्य के निर्णय निश्पक्षता के सम धरातल पर होते हैं , न कि पूर्वाग्रह के -ऊबड़ खाबड़ स्थलों पर " -------------------------------------------------------------- विश्व की सभी महान संस्कृतियों में मनु का वर्णन किसी न किसी रूप में अवश्य हुआ है ! परन्तु भारतीय संस्कृति में यह मान्यता अधिक प्रबल तथा पूर्णत्व को प्राप्त है । इसी आधार पर काल्पनिक रूप से ब्राह्मण समाज द्वारा वर्ण-व्यवस्था का समाज पर आरोपण कर दिया गया , जो.. वैचारिक रूप से तो सम्यक् था । परन्तु जाति अथवा जन्म के आधार पर दोष-पूर्ण व अवैज्ञानिक ही था । ... इसी वर्ण-व्यवस्था को ईश्वरीय विधान सिद्ध करने के लिए काल्पनिक रूप से ब्राह्मण समाज ने मनु-स्मृति की रचना की । .. जिसमें तथ्य समायोजन इस प्रकार किया गया कि स्थूल दृष्टि से कोई बात नैतिक रूप से मिथ्या प्रतीत न हो । यह कृति पुष्यमित्र सुंग (ई०पू०१८४) के समकालिक, उसी के निर्देशन में ब्राह्मण समाज द्वारा रची गयी है । परन्तु मनु भारतीय धरा की विरासत नहीं थे । और ना हि अयोध्या उनकी जन्म भूमि थी । प्राचीन काल में एशिया - माइनर ---(छोटा एशिया), जिसका ऐतिहासिक नाम करण अनातोलयियो के रूप में भी हुआ है । यूनानी इतिहास कारों विशेषत: होरेडॉटस् ने अनातोलयियो के लिए एशिया माइनर शब्द का प्रयोग किया है । जिसे आधुनिक काल में तुर्किस्तान अथवा टर्की नाम से भी जानते हैं । .. यहाँ की पार्श्व -वर्ती संस्कृतियों में मनु की प्रसिद्धि उन सांस्कृतिक-अनुयायीयों ने अपने पूर्व- जनियतृ Pro -Genitorके रूप में स्वीकृत की है ! मनु को पूर्व- पुरुष मानने वाली जन-जातियाँ प्राय: भारोपीय वर्ग की भाषाओं का सम्भाषण करती रहीं हैं । _______________________________________ वस्तुत: भाषाऐं सैमेटिक वर्ग की हो अथवा हैमेटिक वर्ग की अथवा भारोपीय , सभी भाषाओं मे समानता का कहीं न कहीं सूत्र अवश्य है । जैसा कि मिश्र की संस्कृति में मिश्र का प्रथम पुरूष जो देवों का का भी प्रतिनिधि था , । वह मेनेस् (Menes)अथवा मेनिस् Menis संज्ञा से अभिहित था मेनिस ई०पू० 3150 के समकक्ष मिश्र का प्रथम शासक था , और मेंम्फिस (Memphis) नगर में जिसका निवास था । , मेंम्फिस... प्राचीन मिश्र का महत्वपूर्ण नगर जो नील नदी की घाटी में आबाद है । तथा यहीं का पार्श्वर्ती देश फ्रीजिया (Phrygia)के मिथकों में .मनु का वर्णन मिऑन (Meon)के रूप में है । मिऑन अथवा माइनॉस का वर्णन ग्रीक पुरातन कथाओं में क्रीट के प्रथम राजा के रूप में है , जो ज्यूस तथा यूरोपा का पुत्र है ।

 ............. और यहीं एशिया- माइनर के पश्चिमीय समीपवर्ती लीडिया( Lydia) देश वासी भी इसी मिअॉन (Meon) रूप में मनु को अपना पूर्व पुरुष मानते थे। इसी मनु के द्वारा बसाए जाने के कारण लीडिया देश का प्राचीन नाम मेअॉनिया Maionia भी था . ग्रीक साहित्य में विशेषत: होमर के काव्य में --- मनु को (Knossos) क्षेत्र का का राजा बताया गया है ... .कनान देश की कैन्नानाइटी(Canaanite ) संस्कृति में बाल -मिऑन के रूप में भारतीयों के बल और मनु (Baal- meon)और यम्म (Yamm) देव के रूप मे वैदिक देव यम से साम्य विचारणीय है- ।

 यम:---- यहाँ भी भारतीय पुराणों के समान यम का उल्लेख यथाक्रम नदी ,समुद्र ,पर्वत तथा न्याय के अधिष्ठात्री देवता के रूप में हुआ है ....कनान प्रदेश से ही कालान्तरण में सैमेटिक हिब्रु परम्पराओं का विकास हुआ था । केवल पुष्यमित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मण समाज द्वारा बनाया गया कल्पित उपाख्यान है । शूद्रों की तप साधना को प्रतिबन्धित करने के लक्ष्य से -- वर्ण-व्यवस्था वस्तुत वर्ग व्यवस्था थी । जो व्यक्ति के स्वेैच्छिक व्यवसाय पर आधारित थी । , परन्तु आर्यों की सामाजिक प्रणाली में वर्ण व्यवस्था का प्रादुर्भाव कब हुआ ? और कहाँ से हुआ ? काल्पनिक रूप से शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति बौद्ध काल के परवर्ती चरण में की गयी -- _______________________________________ जो इस प्रकार है! शूद्र–" शुच--रक् पृषो० चस्य दः दीर्घश्च । १ चतुर्थे वर्णे स्त्रियां टाप् । ______________ सेवक शब्द का मूल अर्थ भी देखें:--- सीव्यति सिव--ण्वुल् । १ सीवनकर्त्तरि (दरजी) सेव--ण्वुल् । २ भृत्ये ३ दासे ४ अनुचरे च त्रि० मेदिनी कोश । यद्यपि शुच् धातु का एक अर्थ शूचिकर्मणि भी है । 




 *syu- syū-, also sū:-, Proto-Indo-European root meaning "to bind, sew." It forms all or part of: accouter; couture; hymen; Kama Sutra; seam; sew; souter; souvlaki; sutra; sutile; suture. It is the hypothetical source of/evidence for its existence is provided by: Sanskrit sivyati "sews," sutram "thread, string;" Greek hymen "thin skin, membrane," hymnos "song;" Latin suere "to sew, sew together;" Old Church Slavonic šijo "to sew," šivu "seam;" Lettish siuviu, siuti "to sew," siuvikis "tailor;" Russian švec "tailor;" Old English siwian "to stitch, sew, mend, patch, knit together .. ________________________________________  शुट्र लोग गॉल अथवा ड्रयूडों की ही एक शाखा थी जो परम्परागत से चर्म के द्वार वस्त्रों का निर्माण और व्यवसाय करती थी ... (.Shouter a race who had sewed Shoes and Vestriarium..for nordic Germen tribes is called Souter or shouter . souter souter "maker or mender of shoes, _______ " O.E. sutere, from L. sutor "shoemaker," from suere "to sew, stitch" (see SEW (Cf. sew)). souteneursouth Look at other dictionaries: Souter — is a surname, and may refer to:* Alexander Souter, Scottish biblical scholar * Brian Souter, Scottish businessman * Camille Souter, Irish painter * David Souter, Associate Justice of the Supreme Court of the United States * David Henry Souter,… … Wikipedia souter — ● souter verbe transitif (de soute) Fournir ou recevoir à bord le combustible nécessaire aux chaudières ou aux moteurs d un navire. _______ ⇒SOUTER, verbe trans. Souter — Sou ter, n. [AS. s?t?re, fr. It. sutor, fr. suere to sew.] A shoemaker; a cobbler. [Obs.] Chaucer. [1913 Webster] There is no work better than another to please God: . . . to wash dishes, to be a souter, or an apostle, all is one. Tyndale. [1913… … The Collaborative International Dictionary of English … English World dictionary Souter — This unusual and interesting name is of Anglo Saxon origin, and is an occupational surname for a shoemaker or a cobbler. The name derives from the Old English pre 7th Century word sutere , from the Latin sutor , shoemaker, a derivative of suere … Surnames reference souter — noun Etymology: Middle English, from Old English sūtere, from Latin sutor, from suere to sew more at sew Date: before 12th century chiefly Scottish shoemaker … New Collegiate Dictionary Souter — biographical name David 1939 American jurist … New Collegiate Dictionary souter — /sooh teuhrdd/, n. Scot. and North Eng. a person who makes or repairs shoes; cobbler; shoemaker. Also, soutter. [bef. 1000; ME sutor, OE sutere < L sutor, equiv. to su , var. s. of su(ere) to SEW1 tor TOR] * * * … Universalium Souter — /sooh teuhr/, , MODx. *eu-(vest) _________ संस्कृत भाषा में वस्त्र शब्द का विकास - इयु (उ) व का सम्प्रसारण रूप है । Proto-Indo-European root meaning "to dress," with extended form *wes- (2) "to clothe." It forms all or part of: divest; exuviae; invest; revetment; transvestite; travesty; vest; vestry; wear. संस्कृत भाषा में भृ धारण करना । It is the hypothetical source of/evidence for its existence is provided by: Hittite washshush "garments," washanzi "they dress;" Sanskrit vaste "he puts on," vasanam "garment;" Avestan vah-; वह (वस) Greek esthes "clothing," hennymi "to clothe," eima "garment;" Latin vestire "to clothe;" Welsh gwisgo, Breton gwiska; Old English werian "to clothe, put on, cover up," wæstling "sheet, blanket." ..... ... यूरोप की संस्कृति में वस्त्र बहुत बड़ी अवश्यकता और बहु- मूल्य सम्पत्ति थे .। ..क्यों कि शीत का प्रभाव ही यहाँ अत्यधिक था... . उधर उत्तरी-जर्मन के नार्वे आदि संस्कृतियों में इन्हें सुटारी (Sutari ) के रूप में सम्बोधित किया जाता था । यहाँ की संस्कृति में इनकी महानता सर्व विदित है यूरोप की प्राचीन सांस्कृतिक भाषा लैटिन में यह शब्द ...सुटॉर.(Sutor ) के रूप में है .। ...तथा पुरानी अंग्रेजी (एंग्लो-सेक्शन) में यही शब्द सुटेयर -Sutere -के रूप में है.. । जर्मनों की प्राचीनत्तम शाखा गॉथिक भाषा में यही शब्द सूतर (Sooter )के रूप में है... विदित हो कि गॉथ जर्मन आर्यों का एक प्राचीन राष्ट्र है । जो विशेषतः बाल्टिक सागर के दक्षिणी किनारे पर अवस्थित है ।  ...परन्तु हमारा वर्ण्य विषय शूद्रों से ही सम्बद्ध है । लैटिन भाषा में शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन क्रिया स्वेयर -- Suere = to sew( सीवन करना )- सिलना अथवा ,वस्त्र -वपन करना ....... विदित हो कि संस्कृत भाषा में भी शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति शुट्र शब्द के समान है । देखें (श्वि द्रा क )= शूद्र .. अर्थात् श्वि धातु संज्ञा करणे में द्रा क प्रत्यय परे करने पर शूद्र शब्द बनता है ! कहीं कहीं भागुरि आचार्य के मतानुसार कोश कारों ने ....शुच् = शूचि कर्मणि धातु में संज्ञा भावे रक् प्रत्यय करने पर दीर्घ भाव में इस शब्द की व्युत्पत्ति-सिद्ध की है । ...और इस शब्द का पर्याय सेवक शब्द है .......जिसका भी मूल अर्थ होता है... वस्त्रों का सीवन sewing ..करने वाला .. souter (n.)सुट्र --- "maker or mender of shoes," Old English sutere, from Latin sutor "shoemaker," from suere "to sew, stitch" (from PIE root *syu- "to bind, sew"). ----------------------------------------------------------------- विचार केवल संक्षेप में ही व्यक्त करुँगा ! भारतीय आर्यों ने अपने आगमन काल में भारतीय धरा पर द्रविडों की शाखा कोलों को ही शूद्रों की प्रथम संज्ञा प्रदान की थी । ....जिन्हें दक्षिण भारत में चोल .या चौर तथा चोड्र भी कहा गया था .. कोरी- जुलाहों के रूप में आज तक ये लोग वस्त्रों का परम्परागत रूप से निर्माण करते चले आरहे हैं । बौद्ध काल के बाद में लिपि- बद्ध ग्रन्थ पुराणों आदि में शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति- करने के काल्पनिक निरर्थक प्रयास भी किये गये --- जो वस्तुत असत्य ही हैं क्योंकि सत्य केवल एक रूप में होता है । और असत्य अनेक वैकल्पिक रूपों में होता है । बौद्ध काल में भी इसी शब्द की व्युत्पत्ति- पर कोई सत्य प्रकाश नहीं पड़ता है । 

वे शूद्र को सुद्द कहते थे .. कहीं क्षुद्र शब्द से इसका तादात्म्य स्थापित करने की चेष्टा की गयी .. यह बहुत ही विस्मय पूर्ण है कि यहाँ दो धातुऐं के योग से शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति-की गयी है । जो कि पाणिनीय व्याकरण के सिद्धान्तों के प्रतिकूल है क्योंकि कृदन्त शब्द पदों की व्युत्पत्ति- एक ही धातु से होती है , दो धातुओं से नहीं .. संस्कृत में भी इसी शब्द का कोई व्युत्पत्ति-परक (Etymological)--प्राचीन आधार नहीं है । वस्तुत: ब्राह्मण समाज के लेखक इस शब्द को जो अर्थ देना चाहते हैं , वह केवल प्रचलित समाज में शूद्रों के प्रति परम्परागत मनोवृत्ति का प्रकाशन मात्र है । इतना ही नहीं विकृितियों की सरहद तो यहाँ पर पार हो गयी जब शूद्रों की ईश्वरीय उत्पत्ति का वैदिक सिद्धान्त भी सृजित कर लिया गया .. 

देखें ---- ब्राह्मणोsस्य मुखं आसीद् ,बाहू राजन्य:कृत: । उरू तदस्ययद् वैश्य: पद्भ्याम् शूद्रोsजायत ।। ____________________________ _______ ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ९०वें सूक्त का १२वाँ श्लोक .. शूद्रों की उत्पत्ति ईश्वर के पैरों से करा कर उनके लिए आजीवन ब्राह्मण के पैरों तले पड़े रहने का कर्तव्य नियत कर दिया गया ..... निश्चित रूप से इससे बड़ा संसार का कोई जघन्य पाप कर्म नहीं था । शूद्रों के लिए धार्मिक मान्यताओं की मौहर लगाकर ब्राह्मणों की पद-प्रणतिपरक दासता पूर्ण विधान पारित किये गये थे । कि शूद्र आजीवन ब्राह्मण तथा उनके अंग रक्षक क्षत्रियों के पैरों की सेवा करते रहें ... उनके पैरों के लिए जूते चप्पल बनाते रहें ... यह निश्चित रूप से ब्राह्मण की बुद्धि महत्ता नहीं था अपितु चालाकी से पूर्ण कपट और दोखा था । इस कृत्य के लिए ईश्वर भी क्षमा नहीं करेंगे ।



...  । ईरानी आर्यों ने इन्हीं वस्त्र निर्माण कर्ता शूद्रों को वास्तर्योशान अथवा वास्त्रोपश्या के रूप में अपनी वर्ण व्यवस्था में वर्गीकृत किया था । फारसी धर्म की अर्वाचीन पुस्तकों में भी आर्यों के इन चार वर्णों का वर्णन कुछ नाम परिवर्तन के साथ है ---जैसे देखें नामामिहाबाद पुस्तक के अनुसार १ ---- होरिस्तान. जिसका पहलवी रूप है अथर्वण जिसे वेदों मैं अथर्वा कहा है .. २-----नूरिस्तान ..जिसका पहलवी रूप रथेस्तारान ...जिसका वैदिक रूप रथेष्ठा तथा ३---रोजिस्तारान् जिसका पहलवी रूप होथथायन था तथा ४---चतुर्थ वर्ण पोरिस्तारान को ही वास्तर्योशान कहा गया है !!!! 


---------------------------------------------------------- - सत्य के अन्वेषण में प्रमाण ही ढ़ाल हैं ,जो वितण्डावाद के वाग्युद्ध हमारी रक्षा करता है ~| अथवा हम कहें कि विवादों के भ्रमर में प्रमाण पतवार हैं , अथवा पाँडित्यवाद के संग्राम में सटीक तर्क रोहि किसी अस्त्र से कम नहीं हैं। मैं दृढ़ता से अब भी कहुँगा।

 सांस्कृतिक और ऐतिहासिक ,गतिविधियाँ कभी भी एक-भौमिक नहीं, अपितु विश्व-व्यापी होती है ! क्यों कि इतिहास अन्तर्निष्ठ प्रतिक्रिया नहीं है. इतिहास एक वैज्ञानिक व गहन विश्लेषणात्मक तथ्यों का निश्पक्ष विवरण है "" विद्वान् इस तथ्य पर अपनी प्रतिक्रियाऐं अवश्य दें ...

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