शनिवार, 19 जून 2021

गोत्र की अवधारणा-

बहुत ही उम्दा और सदा रहने वाली मुस्कराहट आपकी ग़मों की कराहटों को भी एहसास नहीं होने देती और संकटों की घड़ी में भी रोने नहीं देती आप एक जीवन्त सन्त की साधना और गरिमा हैं ।

हम आपको तह ए दिल से नमन करते हैं । गुरु जी सुमन्त कुमार यादव "जौरा"

पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, तथा नान्दी उपपुराण आदि पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी की पत्नी गायत्री देवी हैं, पुराणों के ही अनुसार ब्रह्मा जी ने एक और स्त्री से विवाह किया था जिनका नाम माँ सावित्री है। 

इतिहास अनुसार यह गायत्री देवी राजस्थान के पुष्कर की रहने वाली थी जो वेदज्ञान में पारंगत होने के कारण महान मानी जाती थीं। 

कहा जाता है एक बार पुष्‍कर में ब्रह्माजी को एक यज्ञ करना था और उस समय उनकी पत्नीं सावित्री उनके साथ नहीं थी तो उन्होंने गायत्री से विवाह कर यज्ञ संपन्न किया। 
लेकिन बाद में जब सावित्री को पता चला तो उन्होंने सभी देवताओं सहित ब्रह्माजी को श्राप दे दिया।
तब उस शाप का निवारण निवारण भी आभीर कन्या गायत्री ने किया जो ब्रह्मा जी की द्वितीय पत्नी थी ।
तब अहीरों में कोई गोत्र या प्रवर नहीं था ।
पद्म पुराण सृष्टि खण्ड अध्याय सत्रह में गायत्री यदुवंश कन्या-

पद्म पुराण सृष्टि खण्ड अध्याय सत्रहवाँ -

भीष्म उवाच–
तस्मिन्यज्ञे किमाश्चर्यं तदासीद्द्विजसत्तम
कथं रुद्रः स्थितस्तत्र विष्णुश्चापि सुरोत्त्तमः।१।
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गायत्र्या किं कृतं तत्र पत्नीत्वे स्थितया तया
आभीरैः किं सुवृत्तज्ञैर्ज्ञात्वा तैश्च कृतं मुने।२।

एतद्वृत्तं समाचक्ष्व यथावृत्तं यथाकृतम्
आभीरैर्ब्रह्मणा चापि ममैतत्कौतुकं महत्।३।

पुलस्त्य उवाच–
तस्मिन्यज्ञे यदाश्चर्यं वृत्तमासीन्नराधिप
कथयिष्यामि तत्सर्वं शृणुष्वैकमना नृृप।४।

रुद्रस्तु महदाश्चर्यं कृतवान्वै सदो गतः
निंद्यरूपधरो देवस्तत्रायाद्द्विजसन्निधौ।५।

विष्णुना न कृतं किंचित्प्राधान्ये स यतः स्थितः
नाशं तु गोपकन्याया ज्ञात्वा गोपकुमारकाः।६।

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गोप्यश्च तास्तथा सर्वा आगता ब्रह्मणोंतिकम्
दृष्ट्वा तां मेखलाबद्धां यज्ञसीमव्यस्थिताम्।७।


हा पुत्रीति तदा माता पिता हा पुत्रिकेति च
स्वसेति बान्धवाः सर्वे सख्यः सख्येन हा सखि।८।


केन त्वमिह चानीता अलक्तांका तु संदरी
शाटीं निवृत्तां कृत्वा तु केन युक्ता च कंबली।९।


केन चेयं जटा पुत्रि रक्तसूत्रावकल्पिता
एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वोवाच स्वयं हरिः।१०।


इह चास्माभिरानीता पत्न्यर्थं विनियोजिता
ब्रह्मणालंबिता बाला प्रलापं मा कृथास्त्विह।११।

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पुण्या चैषा सुभाग्या च सर्वेषां कुलनंदिनी
पुण्या चेन्न भवत्येषा कथमागच्छते सदः।१२।

एवं ज्ञात्वा महाभाग न त्वं शोचितुमर्हसि
कन्यैषा ते महाभागा प्राप्ता देवं विरिंचनम्।१३।

योगिनो योगयुक्ता ये ब्राह्मणा वेदपारगाः
न लभंते प्रार्थयन्तस्तां गतिं दुहिता गता।१४।

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धर्मवंतं सदाचारं भवंतं धर्मवत्सलम्
मया ज्ञात्वा ततः कन्या दत्ता चैषा विरंचयेे।१५।

अनया तारितो गच्छ दिव्यान्लोकान्महोदयान्
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।

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अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति
यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।

करिष्यंति तदा चाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः
युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यंति मया सह।१८।

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तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः
करिष्यंति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः।१९।

न चास्या भविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्
श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोः प्रणिपत्य ययुस्तदा।२०।


एवमेष वरो देव यो दत्तो भविता हि मे
अवतारः कुलेस्माकं कर्तव्यो धर्मसाधनः।२१।

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भवतो दर्शनादेव भवामः स्वर्गवासिनः
शुभदा कन्यका चैषा तारिणी मे कुलैः सह।२२।


एवं भवतु देवेश वरदानं विभो तव
अनुनीतास्तदा गोपाः स्वयं देवेन विष्णुना।२३।

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ब्रह्मणाप्येवमेवं तु वामहस्तेन भाषितम्
त्रपान्विता दर्शने तु बंधूनां वरवर्णिनी।२४।

कैरहं तु समाख्याता येनेमं देशमागताः
दृष्ट्वा तु तांस्ततः प्राह गायत्री गोपकन्यका।२५।

वामहस्तेन तान्सर्वान्प्राणिपातपुरःसरम्
अत्र चाहं स्थिता मातर्ब्रह्माणं समुपागता।२६।

भर्ता लब्धो मया देवः सर्वस्याद्यो जगत्पतिः
नाहं शोच्या भवत्या तु न पित्रा न च बांधवैः।२७।

सखीगणश्च मे यातु भगिन्यो दारकैः सह
सर्वेषां कुशलं वाच्यं स्थितास्मि सह दैवतैः।२८।

गतेषु तेषु सर्वेषु गायत्री सा सुमध्यमा
ब्रह्मणा सहिता रेजे यज्ञवाटं गता सती।२९।


याचितो ब्राह्मणैर्ब्रह्मा वरान्नो देहि चेप्सितान्
यथेप्सितं वरं तेषां तदा ब्रह्माप्ययच्छत।३०।

तया देव्या च गायत्र्या दत्तं तच्चानुमोदितम्
सा तु यज्ञे स्थिता साध्वी देवतानां समीपगा।३१।

दिव्यंवर्षशतं साग्रं स यज्ञो ववृधे तदा
यज्ञवाटं कपर्दी तु भिक्षार्थं समुपागतः।३२।

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बृहत्कपालं संगृह्य पंचमुण्डैरलंकृतः
ऋत्विग्भिश्च सदस्यैश्च दूरात्तिष्ठन्जुगुप्सितः३३


ब्रह्मा के पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियों के वंश का वर्णन महाभारत शान्ति पर्व के ‘मोक्षधर्म पर्व’ के अंतर्गत अध्याय 208 के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियों के वंश का वर्णन इस प्रकार है।

- भीष्‍म द्वारा ब्रह्मा के पुत्र का वर्णन युधिष्ठिर ने पूछा– भरतश्रेष्‍ठ! पूर्वकाल में कौन कौन से लोग प्रजापति थे और प्रत्‍येक दिशा में किन-किन महाभाग महर्षियों की स्थिति मानी गयी है। भीष्‍म जी ने कहा– 

भरतश्रेष्‍ठ! इस जगत में जो प्रजापति रहे हैं तथा सम्‍पूर्ण दिशाओं में जिन-जिन ऋषियों की स्थिति मानी गयी है, उन सबको जिनके विषय में तुम मुझसे पूछते हो; मैं बताता हूँ, सुनो।

एकमात्र सनातन भगवान स्‍वयम्‍भू ब्रह्मा सबके आदि हैं। स्‍वयम्‍भू ब्रह्मा के सात महात्‍मा पुत्र बताये गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा महाभाग वसिष्‍ठ।
ये सभी स्‍वयम्‍भू ब्रह्मा के समान ही शक्तिशाली हैं। पुराण में ये साम ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। अब मैं समस्‍त प्रजापतियों का वर्णन आरम्‍भ करता हूँ। 

अत्रिकुल मे उत्‍पन्‍न जो सनातन ब्रह्मयोनि भगवान प्राचीनबर्हि हैं, उनसे प्रचेता नाम वाले दस प्रजापति उत्‍पन्‍न हूँ।

उन दसों के एकमात्र पुत्र दक्ष नाम से प्रसिद्ध प्रजापति हैं। उनके दो नाम बताये जाते है – ‘दक्ष’ और ‘क’ मरीचि के पुत्र जो कश्यप है, उनके भी दो नाम माने गये हैं। कुछ लोग उन्‍हें अरिष्टनेमि कहते हैं और दूसरे लोग उन्‍हें कश्यप के नाम से जानते हैं। 

अत्रि के औरस पुत्र श्रीमान और बलवान राजा सोम हुए, जिन्‍होंने सहस्‍त्र दिव्‍य युगों तक भगवान की उपासना की थी। प्रभो! भगवान अर्यमा और उनके सभी पुत्र-ये प्रदेश (आदेश देनेवाले शासक) तथा प्रभावन (उत्‍तम स्रष्टा) कहे गये हैं। धर्म से विचलित न होने वाले युधिष्ठिर! शशबिन्‍दु के दस हजार स्त्रियाँ थी। 
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अत्रि ऋषि की उत्पत्ति-
अथाभिध्यायतः सर्गं दश पुत्राः प्रजज्ञिरे ।
भगवत् शक्तियुक्तस्य लोकसन्तानहेतवः ॥ २१ ॥

मरीचिरत्र्यङ्‌गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
भृगुर्वसिष्ठो दक्षश्च दशमस्तत्र नारदः ॥ २२ ॥

उत्सङ्गान्नारदो जज्ञे दक्षोऽङ्गुष्ठात्स्वयम्भुवः ।
प्राणाद्वसिष्ठः सञ्जातो भृगुस्त्वचि करात्क्रतुः ॥ २३ ॥

पुलहो नाभितो जज्ञे पुलस्त्यः कर्णयोः ऋषिः ।
अङ्‌गिरा मुखतोऽक्ष्णोऽत्रिः मरीचिर्मनसोऽभवत् ॥ २४ ॥

धर्मः स्तनाद् दक्षिणतो यत्र नारायणः स्वयम् ।
अधर्मः पृष्ठतो यस्मात् मृत्युर्लोकभयङ्करः ॥ २५ ॥

हृदि कामो भ्रुवः क्रोधो लोभश्चाधरदच्छदात् ।
आस्याद् वाक्सिन्धवो मेढ्रान् निर्‌ऋतिः पायोरघाश्रयः ॥ २६ ॥

छायायाः कर्दमो जज्ञे देवहूत्याः पतिः प्रभुः ।
मनसो देहतश्चेदं जज्ञे विश्वकृतो जगत् ॥ २७ ॥

वाचं दुहितरं तन्वीं स्वयम्भूर्हरतीं मनः ।
अकामां चकमे क्षत्तः सकाम इति नः श्रुतम् ॥ २८ ॥

तमधर्मे कृतमतिं विलोक्य पितरं सुताः ।
मरीचिमुख्या मुनयो विश्रम्भात् प्रत्यबोधयन् ॥ २९ ॥

नैतत्पूर्वैः कृतं त्वद्ये न करिष्यन्ति चापरे ।
यस्त्वं दुहितरं गच्छेः अनिगृह्याङ्गजं प्रभुः ॥ ३० ॥

तेजीयसामपि ह्येतन्न सुश्लोक्यं जगद्‍गुरो ।
यद्‌वृत्तमनुतिष्ठन् वैन्वै लोकः क्षेमाय कल्पते ॥ ३१

तस्मै नमो भगवते य इदं स्वेन रोचिषा ।
आत्मस्थं व्यञ्जयामास स धर्मं पातुमर्हति ॥ ३२ ॥

स इत्थं गृणतः पुत्रान् पुरो दृष्ट्वा प्रजापतीन् ।
प्रजापतिपतिस्तन्वं तत्याज व्रीडितस्तदा ।
तां दिशो जगृहुर्घोरां नीहारं यद्विदुस्तमः ॥ ३३ ॥

कदाचिद् ध्यायतः स्रष्टुः वेदा आसंश्चतुर्मुखात् ।
कथं स्रक्ष्याम्यहं लोकाम् समवेतान् यथा पुरा ॥ ३४ ॥

चातुर्होत्रं कर्मतन्त्रं उपवेदनयैः सह ।
धर्मस्य पादाश्चत्वारः तथैवाश्रमवृत्तयः ॥ ३५ ॥

                ।।विदुर उवाच ।।
स वै विश्वसृजामीशो वेदादीन् मुखतोऽसृजत् ।
यद् यद् येनासृजद् देवस्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥ ३६ ॥

                 ।।मैत्रेय उवाच ।।
ऋग्यजुःसामाथर्वाख्यान् वेदान् पूर्वादिभिर्मुखैः ।
शास्त्रमिज्यां स्तुतिस्तोमं प्रायश्चित्तं व्यधात्क्रमात् ॥ ३७ ॥

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तृतीय स्कन्ध: द्वादश अध्याय श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: द्वादश अध्यायः श्लोक 21-37 का हिन्दी अनुवाद -

इसके पश्चात् जब भगवान् की शक्ति से सम्पन्न ब्रह्मा जी ने सृष्टि के लिए संकल्प किया, तब उनके दस पुत्र और उत्पन्न हुए। उनसे लोक की बहुत वृद्धि हुई।

 उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष और दसवें नारद थे। 

इसमें नारद जी प्रजापति ब्रह्मा जी की गोद से, दक्ष अँगूठे से, वसिष्ठ प्राण से, भृगु त्वचा से, क्रतु हाथ से, पुलह नाभि से, पुलस्त्य ऋषि कानों से, अंगिरा मुख से, अत्रि नेत्रों से और मरीचि मन से उत्पन्न हुए।

फिर उनके दायें स्तन से धर्म उत्पन्न हुआ, जिनकी पत्नी मूर्ति से स्वयं नारायण अवतीर्ण हुए तथा उनकी पीठ से अधर्म का जन्म हुआ और उससे संसार को भयभीत करने वाला मृत्यु उत्पन्न हुआ।

 इसी प्रकार ब्रह्मा जी के हृदय से काम, भौहों से क्रोध, नीचे के होंठ से लोभ, मुख से वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती, लिंग से समुद्र, गुदा से पाप का निवास स्थान (राक्षसों का अधिपति) निर्ऋति। 

छाया से देवहूति के पति भगवान् कर्दमजी उत्पन्न हुए। इस तरह यह सारा जगत् जगत्कर्ता ब्रह्मा जी के शरीर और मन से उत्पन्न हुआ। 

विदुर जी ! भगवान् ब्रह्मा की कन्या सरस्वती बड़ी ही सुकुमारी और मनोहारी थी।
हमने सुना है-एक बार उसे देखकर ब्रह्मा जी काममोहित हो गये थे, यद्यपि वह स्वयं वासनाहीन थीं।
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उन्हें ऐसा अधर्ममय संकल्प करते देख, उनके पुत्र मरीचि आदि ऋषियों ने उन्हें विश्वासपूर्वक समझाया।

 ‘पिताजी! आप समर्थ हैं, फिर भी अपने मन में उत्पन्न हुए काम के वेग को न रोककर पुत्रीगमन्-जैसा दुस्तर पाप करने का संकल्प कर रहे हैं। 

ऐसा तो आपसे पूर्ववर्ती किसी भी ब्रह्मा ने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा।

 जगद्गुरो! आप-जैसे तेजस्वी पुरुषों को भी ऐसा काम शोभा नहीं देता; क्योंकि आप लोगों के आचरणों का अनुसरण करने से ही तो संसार का कल्याण होता है। 

जिन भगवान् ने अपने स्वरूप में स्थित इस जगत् को अपने ही तेज से प्रकट किया है, उनें नमस्कार है। 

इस समय वे ही धर्म की रक्षा कर सकते हैं’। अपने पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियो को अपने सामने इस प्रकार कहते देख प्रजापतियों के पिता ब्रह्मा जी बड़े लज्जित हुए और उन्होंने उस शरीर को उसी समय छोड़ दिया।
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 तब उस घोर शरीर को दिशाओं ने ले लिया।
 वही कुहरा हुआ, जिसे अन्धकार भी कहते है। 

एक बार ब्रह्मा जी यह सोच रहे थे कि ‘मैं पहले की तरह सुव्यवस्थित रूप से सब लोकों की रचना किस प्रकार करूँ?’ इसी समय उनके चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए।

इनके सिवा उपवेद, न्यायशास्त्र, होता, उद्गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा- इन चार ऋत्विजों के कर्म, यज्ञों का विस्तार, धर्म के चार चरण और चारों आश्रम तथा उनकी वृत्तियाँ-ये सब भी ब्रह्मा जी के मुखों से ही उत्पन्न हुए।

(भागवतपुराणस्कन्ध तृतीय अध्याय-१२)
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उनमें से प्रत्‍येक के गर्भ से एक-एक हजार पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। इस प्रकार उन महात्‍मा के एक करोड़ पुत्र थे। वे उनके सिवा किसी दूसरे प्रजापति की इच्‍छा नहीं करते थे।
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 प्राचीनकाल के ब्राह्मण अधिकांश प्रजा की उत्‍पत्ति शशबिन्‍दु यादव से ही बताते हैं। प्रजापति का वह महान वंश ही वृष्णिवंश का उत्‍पादक हुआ।

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संस्कृत कोश गन्थों सं में गोत्र के विकसित अर्थ अनेक हैं जैसे  १.संतान । २. नाम । ३. क्षेत्र । ४.(रास्ता) वर्त्म । ५. राजा का छत्र । 
६. समूह । जत्था । गरोह । ७. वृद्धि । बढ़ती । ८. संपत्ति । धन । दौलत । ९. पहाड़ । 
१०. बंधु । भाई । 
११. एक प्रकार का जातिविभाग । १२. वंश । कुल । कानदान । 
१३. कुल या वंश की संज्ञा जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है । 
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विशेष—ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य द्विजातियों में उनके भिन्न भिन्न गोत्रों की संज्ञा उनके मूल पुरुष या गुरु ऋषयों के नामों के अनुसार है ।

सगोत्र विवाह भारतीय वैदिक परम्परा में यम के समय से निषिद्ध माना जाता है।
यम ने ही संसार में धर्म की स्थापना की यम का वर्णन विश्व की अनेक प्राचीन संस्कृतियों में हुआ है ।
जैसे कनानी संस्कृति ,नॉर्स संस्कृति ,मिश्र संस्कृति ,तथा फारस की संस्कृति और भारतीय संस्कृति आदि-
 
यम से पूर्व स्त्री और पुरुष जुड़वाँ  बहिन भाई के रूप में जन्म लेते थे । 
परन्तु यम ने इस विधान को मनुष्यों के लिए निषिद्ध कर दिया ।
केवल पक्षियों और कुछ अन्य जीवों में ही यह रहा । 
यही कारण है कि मनु और श्रद्धा भाई बहिन भी थे ।
मनुष्यों के युगल स्तन ग्रन्थियाँ इसका प्रमाण हैं । 
ऋग्वेद में यम-यमी संवाद भी यम से पूर्व की दाम्पत्य व्यवस्था का प्रमाण है ।
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एक ही गोत्र के   लड़का लड़की का भाई -बहन होने से  विवाह भी निषिद्ध ही है।
यद्यपि  गोत्र शब्द का प्रयोग वंश के अर्थ में  वैदिक ग्रंथों मे कहीं दिखायी नही देता।
ऋग्वेद में गोत्र शब्द का प्रयोग गायों को रखने के स्थान के एवं मेघ के अर्थ में हुआ है।

गोसमूह के अर्थ में गोत्र-

त्वं गोत्रमङ्गिरोभ्योऽवृणोरपोतात्रये शतदुरेषु गातुवित् ।

ससेन चिद्विमदायावहो वस्वाजावद्रिं वावसानस्य नर्तयन् ॥

— ऋग्वेद १/५१/३॥

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 - पदपाठ

त्वम् । गोत्रम् । अङ्गिरःऽभ्यः । अवृणोः । अप । उत । अत्रये । शतऽदुरेषु । गातुऽवित् ।

ससेन । चित् । विऽमदाय । अवहः । वसु । आजौ । अद्रिम् । ववसानस्य । नर्तयन् ॥३।

सायण भाष्य-

हे इन्द्र “त्वं “गोत्रम् अव्यक्तशब्दवन्तं वृष्ट्युदकस्यावरकं मेघम् “अङ्गिरोभ्यः अङ्गिरसामृषीणामर्थाय "अप "अवृणोः अपवरणं कृतवानसि । वृष्टेरावरकं मेघं वज्रेणोद्घाट्य वर्षणं कृतवानसीत्यर्थः। यद्वा । (गोत्रं गोसमूहं) पणिभिरपहृतं गुहासु निहितम् अङ्गिरोभ्यः ऋषिभ्यः अप अवृणोः गुहाद्वारोद्घाटनेन प्रकाशयः । "उत अपि च "अत्रये महर्षये । कीदृशाय । “शतदुरेषु शतद्वारेषु यन्त्रेष्वसुरैः पीडार्थं प्रक्षिप्ताय "गातुवित् मार्गस्य लम्भयिताभूः । तथा “विमदाय “चित् विमदनाम्ने महर्षयेऽपि "ससेन अन्नेन युक्तं “वसु धनम् “अवहः प्रापितवान् । तथा “आजौ संग्रामे जयार्थं "ववसानस्य निवसतो वर्तमानस्यान्यस्यापि स्तोतुः "अद्रिं वज्रं “नर्तयन् रक्षणं कृतवानसीति शेषः । अतस्तव महिमा केन वर्णयितुं शक्यते इति भावः ॥ गोत्रम् ।' गुङ् अव्यक्ते शब्दे । औणादिकः त्रप्रत्ययः । यद्वा । खलगोरथात्' इत्यनुवृत्तौ ‘ इनित्रकट्यचश्च' (पा. सू. ४. २. ५१) इति समूहार्थे त्रप्रत्ययः । शतदुरेषु । शतं दुरा द्वाराण्येषाम् । द्वृ इत्येके । द्वर्यन्ते संव्रियन्ते इति दुराः। घञर्थे कविधानम्' इति कप्रत्ययः। छान्दसं संप्रसारणं परपूर्वत्वम् । तच्च यो ह्युभयोः स्थाने भवति स लभतेऽन्यतरेणापि व्यपदेशम् इति • उरण् रपरः ' ( पाणिनि सूूूूत्र १. १. ५१ ) इति रपरं भवति । 

यद्वा । द्वारशब्दस्यैव छान्दसं संप्रसारणं द्रष्टव्यम् । गातुवित् । ‘गाङ् गतौ' । अस्मात् ‘कमिमनिजनिभागापायाहिभ्यश्च' (उ. सू. १. ७२ ) इति तुप्रत्ययः । तं वेदयति लम्भयतीति गातुवित् । ‘विद्लृ लाभे' । अन्तर्भावितण्यर्थात् क्विप् । कृदुत्तरपदप्रकृतिस्वरत्वम्। ससेन । ससम् इति अन्ननाम । ‘ससं नमः आयुः' (नि.२.७.२१) इति तन्नामसु पाठात् । आजिः इति संग्रामनाम । “आहवे आजौ ' (नि. २. १७. ८) इति तत्र पाठात् । अद्रिम् । अत्ति भक्षयति वैरिणम् इति अद्रिर्वज्रः । ‘ अदिशदिभूशुभिभ्यः क्रिन्' इति क्रिन्प्रत्ययः । नित्त्वादाद्युदात्तत्वम् । यास्कस्त्वेवम् अद्रिशब्दं व्याचख्यौ- अद्रिरादृणात्यनेनापि वात्तेः स्यात् ' ( निरु. ४. ४ ) इति । ववसानस्य । ‘वस निवासे । कर्तरि ताच्छीलिकः चानश् । 'बहुलं छन्दसि ' इति शपः श्लुः । द्विर्भावहलादिशेषौ । चित्वादन्तोदात्तत्वम् 

इसको निघण्टु (मेघः । इति निघण्टुः । १ । १० । ) तथा सायण के भाष्य में मेघ का अर्थ दिया है। यथा सायणभाष्य से :

हे इन्द्र “त्वं “गोत्रम् अव्यक्तशब्दवन्तं वृष्ट्युदकस्यावरकं मेघम् “अङ्गिरोभ्यः अङ्गिरसामृषीणामर्थाय "अप "अवृणोः अपवरणं कृतवानसि । वृष्टेरावरकं मेघं वज्रेणोद्घाट्य वर्षणं कृतवानसीत्यर्थः। यद्वा

मेघ के अर्थ में ऋग्वेद में "गोत्र" के प्रयोग का भी उदाहरण :

'यथा कण्वे मघवन्मेधे अध्वरे दीर्घनीथे दमूनसि ।

यथा गोशर्ये असिषासो अद्रिवो मयि गोत्रं हरिश्रियम् ॥

— ऋग्वेद ८/५०/१०॥

सायण-भाष्य

हे अद्रिवः वज्रिवन् इन्द्र मेधे यज्ञे यथा येन प्रकारेण कण्वे एतन्नामके ऋषौ निमित्ते हरिश्रियम् । हरिः जगत्तापहर्त्री हरितवर्णा वा श्रीः जललक्ष्मीर्यस्य तादृशम् । गोत्रं मेघम् असिसासः दत्तवानसि । ईदृशे कण्वे अध्वरे । ध्वरतिर्हिंसाकर्मा । तद्रहिते दीर्घनीथे दीर्घं स्वर्लोकपर्यन्तं नीथं हविः प्रापणं यस्य तथाभूते । पुनः कीदृशे । दमूनसि दानमनसि उदारे । यथा च गोशर्ये एतन्नामके ऋषौ मेघं दत्तवानसि तथा मयि पुष्टिगौ हरिश्रियं गोत्रं देहि। यथा तयोरनुग्रहदृष्ट्या मेघवृष्टिं कृतवानसि तथा मय्यपि कृपादृष्ट्या अभिलषितवृष्टिं कुर्वित्यभिप्रायः ॥ ॥ १७ ॥

इसके अर्थ में समय के साथ विस्तार हुआ है।

गौशाला एक बाड़ अथवा परिसीमा में निहित स्थान है। इस शब्द का क्रमिक विकास गौशाला से उसके साथ रहने वाले परिवार अथवा कुल  के रूप में हुआ।

इसमें विस्तार से गोत्र को विस्तार, वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त किया जाने लगा।

गोत्र का अर्थ पौत्र तथा उनकी सन्तान के अर्थ में भी है । इस आधार पर यह वंश तथा उससे बने कुल-प्रवर की भी द्योतक है।

 यह किसी व्यक्ति की पहचान, उसके नाम को भी बताती है तथा गोत्र के आधार पर कुल तथा कुलनाम बने हैं।

इसे समयोपरांत विभिन्न गुरुओं के कुलों (यथा कश्यप, षाण्डिल्य, भरद्वाज आदि) को पहचानने के लिए भी प्रयोग किया जाने लगा। 

क्योंकि शिक्षणकाल में सभी शिष्य एक ही गुरु के आश्रम एवं गोत्र में ही रहते थे, अतः सगोत्र हुए।

 यह इसकी कल्पद्रुम में दी गई व्याख्या से स्पष्ट होता है :

गोत्रम्, क्ली, गवते शब्दयति पूर्ब्बपुरुषान् यत् । इति भरतः ॥ (गु + “गुधृवीपतीति ।” उणादि । ४ । १६६ । इति त्रः ) तत्पर्य्यायः । सन्ततिः २ जननम् ३ कुलम् ४ अभिजनः ५ अन्वयः ६ वंशः ७ अन्ववायः ८ सन्तानः ९ । इत्यमरः । २ । ७ । १ ॥ आख्या । (यथा, कुमारे । ४ । ८ । “स्मरसि स्मरमेखलागुणैरुत गोत्रस्खलितेषु बन्धनम् ॥”) सम्भावनीयबोधः । काननम् । क्षेत्रम् । वर्त्म । इति मेदिनी कोश । २६ ॥

 छत्रम् । इति हेमचन्द्रःकोश ॥ संघः । वृद्धिः । इति शब्दचन्द्रिका ॥ वित्तम् । इति विश्वः ॥

यह व्यवस्था विभिन्न जीवों में विभेद करने के लिए भी प्रयोग होती है।

गोत्र का परिसीमन के आधार पर क्षेत्र, वन, भूमि, मार्ग भी इसका अर्थ है (मेदिनीकोश) 

तथा उणादि सूत्र "गां भूमिं त्रायते त्रैङ् पालने क" से गोत्र का अर्थ (गो=भूमि तथा त्र=पालन करना, त्राण करना) के आधार पर भूमि के रक्षक अर्थात पर्वत, वन क्षेत्र, बादल आदि है।

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गो अथवा गायों की रक्षा हेतु ऋग्वेद में इसका अर्थ गौशाला निहित है,।

तथा वह सभी व्यक्ति जो परिवार के रूप में इससे जुडे हैं वह भी गोत्र ही कहलाए।

इसके विस्तार के अर्थ से यह वित्त (सम्पदा), अनेकता, वृद्धि, सम्भावनाओं का ज्ञान आदि के अर्थ में भी प्रकाशित हुआ है।

तथा हेमचंद्र के अनुसार इसका  एक अर्थ  छतरी( छत्र भी है।

क्योंकि उस वैदिक समय  में गोत्र नहीं थे ।
गोत्रों की अवधारणा परवर्ती काल की है । सपिण्ड (सहोदर भाई- बहिन ) के विवाह निषेध के बारे में ऋग्वेद 10 वें मण्डल के_1-से लेकर  14 वें सूक्तों में यम -यमी जुड़वा भाई-बहिन के सम्वाद के रूप में एक आख्यान द्वारा पारस्परिक अन्तरंगो के सम्बन्ध में  उसकी नैतिकता और अनैतिकता को लेकर संवाद मिलता है।

यमी अपने सगे भाई यम से  संतान उत्पन्न करने की प्रबल इच्छा प्रकट करती है। 
परन्तु यम उसे यह अच्छे तरह से समझाता है ,कि ऐसा मैथुन सम्बन्ध अब प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होता है।
और जो इस प्रकार संतान उत्पन्न करते हैं वे घोर पाप करते हैं.
सलक्षमा यद्विषुरुषा भवाति” ऋ10/10/2 (“सलक्ष्मा सहोदर बहन से पीडाप्रद संतान उत्पन्न होने की सम्भावना होती है”)‌

न वा उ ते तन्वा तन्वं सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात् ।
अन्येन मत्प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत् ॥१२॥

पदान्वय-

न । वै । ऊं इति । ते । तन्वा । तन्वम् । सम् । पपृच्याम् । पापम् । आहुः । यः । स्वसारम् । निऽगच्छात् ।

अन्येन । मत् । प्रऽमुदः । कल्पयस्व । न । ते । भ्राता । सुऽभगे । वष्टि । एतत् ॥१२।

सायण-भाष्य

यमो यमीं प्रत्युक्तवान् । हे यमि “ते तव “तन्वा शरीरेण “तन्वम् आत्मीयं शरीरं “न “वै “सं पपृच्यां नैव संपर्चयामि । नैवाहं त्वां संभोक्तुमिच्छामीत्यर्थः । “यः भ्राता “स्वसारं भगिनीं “निगच्छात् नियमेनोपगच्छति । संभुङ्त्श इत्यर्थः । तं “पापं पापकारिणम् “आहुः । शिष्टा वदन्ति । एतज्ज्ञात्वा हे “सुभगे सुष्ठु भजनीये हे यमि त्वं “मत् मत्तः “अन्येन त्वद्योग्येन पुरुषेण सह “प्रमुदः संभोगलक्षणान् प्रहर्षान् “कल्पयस्व समर्थय । “ते तव “भ्राता यमः “एतत् ईदृशं त्वया सह मैथुनं कर्तुं “न “वष्टि न कामयते । नेच्छति ॥


पापमाहुर्य: सस्वारं निगच्छात” ऋ10/10/12 ( “जो अपने सगे बहन भाई से संतानोत्पत्ति करते हैं, भद्र जन उन्हें पापी कहते हैं)

इस विषय पर स्पष्ट जानकारी पाणिनी कालीन भारत से भी मिलती है.
अष्टाध्यायी के अनुसार “ अपत्यं पौत्र प्रभृति यद गोत्रम् “ एक पुर्वज अथवा पूर्वपुरुष  के पौत्र परपौत्र आदि जितनी संतान होगी वह एक गोत्र की कही जायेगी.
यहां पर सपिण्ड का उद्धरण करना आवश्यक हो जाता है.
सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते !
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदन !! “
मनु स्मृति –5/60
(सपिण्डता) सहोदरता (सप्तमे पुरुषे) सातवीं पुरुष में (पीढ़ी में ) (विनिवर्तते) छूट जाती है।

 (जन्म नाम्नोः) जन्म और नाम दोनों के (आवेदने)  जानने  से, (समान-उदक भावः तु) आपस में  (जलदान)का व्यवहार भी छूट जाता है।
 इसलिये सूतक में सम्मिलित होना भी आवश्यक नहीं समझा गया।
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सगापन तो सातवीं पीढी में समाप्त हो जाता है. 

आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) गुण - मानव के ।गोत्र निर्धारण की व्याख्या करता है ।।

जीवविज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत आनुवंशिकता -उत्तराधिकारिता ( जेनेटिक्स हेरेडिटी) तथा जीवों की विभिन्नताओं (वैरिएशन) का अध्ययन किया जाता है।

आनुवंशिकता के अध्ययन में' ग्रेगर जॉन मेंडेल "जैसे यूरोपीय जीववैज्ञानिकों  की मूलभूत उपलब्धियों को आजकल आनुवंशिकी के अंतर्गत समाहित कर लिया गया है। 

विज्ञान की भाषा में प्रत्येक सजीव प्राणी का निर्माण मूल रूप से कोशिकाओं द्वारा ही हुआ होता है। अत: कोशिका जीवन की शुक्ष्म इकाई है ।

इन कोशिकाओं में कुछ  गुणसूूूूूत्र (क्रोमोसोम) पाए जाते हैं। इनकी संख्या प्रत्येक जाति (स्पीशीज) में निश्चित होती है। 

इन गुणसूत्रों के अन्दर माला की मोतियों की भाँति कुछ (डी .एन. ए .) की रासायनिक इकाइयाँ पाई जाती हैं जिन्हें जीन कहते हैं। 

यद्यपि  डी.एन.ए और आर.एन.ए दोनों ही न्यूक्लिक एसिड होते हैं।

 इन दोनों की रचना "न्यूक्लिओटाइड्स"   से होती है जिनके निर्माण में कार्बन शुगर, फॉस्फेट और नाइट्रोजन बेस (आधार) की मुख्य भूमिका होती है।

डीएनए जहाँ आनुवंशिक गुणों का वाहक होता है और कोशिकीय कार्यों के संपादन के लिए कोड प्रदान करता है वहीँ आर.एन.ए की भूमिका उस कोड  (संकेतावली)

को प्रोटीन में परिवर्तित करना होता है। दोेैनों ही तत्व जैनेटिक संरचना में अवयव हैं ।

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आनुवंशिक कोड (Genetic Code) डी.एन.ए और बाद में ट्रांसक्रिप्शन द्वारा बने (M–RNA )पर नाइट्रोजन क्षार का विशिष्ट अनुक्रम (Sequence) है,

 जिनका अनुवाद प्रोटीन के संश्लेषण के लिए एमीनो अम्ल के रूप में किया जाता है। 

एक एमिनो अम्ल निर्दिष्ट करने वाले तीन नाइट्रोजन क्षारों के समूह को कोडन, कोड या प्रकुट (Codon) कहा जाता है।

और ये जीन, गुणसूत्र के लक्षणों अथवा गुणों के प्रकट होने, कार्य करने और अर्जित करने के लिए उत्तरदायी होते हैं।

इस विज्ञान का मूल उद्देश्य आनुवंशिकता के ढंगों (पद्धति) का अध्ययन करना है ।

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गुणसूत्रों के पुनर्संयोजन के फलस्वरूप एक ही पीढी की संतानें भी भिन्न हो सकती हैं।

समस्त जीव, चाहे वे जन्तु हों या वनस्पति, अपने पूर्वजों के यथार्थ प्रतिरूप होते हैं। 

वैज्ञानिक भाषा में इसे 'समान से समान की उत्पति' (लाइक बिगेट्स लाइक) का सिद्धान्त कहते हैं। 

आनुवंशिकी के अन्तर्गत कतिपय कारकों का विशेष रूप से अध्ययन किया जाता है। जो निम्नलिखित हैं।

  • प्रथम कारक आनुवंशिकता है। किसी जीव की आनुवंशिकता उसके जनकों (पूर्वजों या माता पिता) की जननकोशिकाओं द्वारा प्राप्त रासायनिक सूचनाएँ होती हैं।

  •  जैसे कोई प्राणी किस प्रकार परिवर्धित होगा, इसका निर्धारण उसकी आनुवंशिकता ही करेगी।
  • दूसरा कारक विभेद है जिसे हम किसी प्राणी तथा उसकी सन्तान में पाते  हैं।
  •  प्रायः सभी जीव अपने माता पिता या कभी कभी बाबा, दादी या उनसे पूर्व की पीढ़ी के लक्षण प्रदर्शित करते हैं।
  •  ऐसा भी सम्भव है कि उसके कुछ लक्षण सर्वथा नवीन हों।
  •  इस प्रकार के परिवर्तनों या विभेदों के अनेक कारण होते हैं।
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जीवों का परिवर्धन तथा उनके परिवेश अथवा पर्यावरण (एन्वाइरनमेंट) पर भी निर्भर करता है। 

प्राणियों के परिवेश अत्यन्त जटिल होते हैं; इसके अंतर्गत जीव के वे समस्त पदार्थ तत्व बल  तथा अन्य सजीव प्राणी (आर्गेनिज़्म) समाहित हैं, जो उनके जीवन को प्रभावित करते रहते हैं।

वैज्ञानिक इन समस्त कारकों का सम्यक्‌ अध्ययन करता है, एक वाक्य में हम यह कह सकते हैं कि आनुवंशिकी वह विज्ञान है, जिसके अन्तर्गत आनुवंश्किता के कारण जीवों तथा उनके पूर्वजों (या संततियों) में समानता तथा विभेदों, उनकी उत्पत्ति के कारणों और विकसित होने की संभावनाओं का अध्ययन किया जाता है।

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पैतृक गुणसूत्रों के पुनर्संयोजन के फलस्वरूप एक ही पीढी की संतानें भी भिन्न हो सकती हैं।

 उत्परिवर्तन की प्रक्रिया-। 

जीन दोहराव अतिरेक(आवश्यकता से अधिक होने का भाव, गुण या स्थिति / आधिक्य )आदि प्रदान करके विविधीकरण की अनुमति देता है।

एक जीन जीव को नुकसान पहुंचाए बिना अपने मूल कार्य को मूक( म्यूट ) और खो सकता है।

डी़.एन.ए प्रतिकृति की प्रक्रिया के दौरान, दूसरी स्ट्रैंड(  रस्सी का बल)के बहुलकीकरण में कभी-कभी त्रुटियां होती हैं। 

म्यूटेशन नामक ये त्रुटियां किसी जीव के फेनोटाइप को प्रभावित कर सकती हैं।

फिनोटाइप(phenotype) क्या है ?

लक्षण प्रारूप या फिनोटाइप समलक्षी जीवो के विभिन्न गुणों जैसे आकार,आकृति,रंग तथा स्वभाव आदि को व्यक्त करता है।

जीनोटाइप(genotype)

जीव प्रारूप या जीनोटाइप जीनी संरचना जीव के जैनिक संगठन को व्यक्त करता है,।

जो कि उसमें विभिन्न लक्षणों को निर्धारित करता है।

फेनोटाइप और जीनोटाइप में अन्तर  "लक्षण 'प्ररूप और जीव प्ररूप में अन्तर-

फेनोटाइप(लक्षण   प्ररूप) जीनोटाइप(जीव प्ररूप)
यह जीवों के विभिन्न गुण आकार,आकृति,रंग तथा स्वभाव को व्यक्त करता है।यह जैनिक संगठन को व्यक्त करता है जो उसमे विभिन्न लक्षणों को निर्धारित करता है।
जीवो को प्रत्यक्ष देखने से ही समलक्षणी का पता चल जाता है।इस संरचना को जीवो की पूर्वज -कथा या संतति के आधार पर ही स्थापित किया जा सकता है।
समान समलक्षणी वाले जीवों की जीनी संरचना समान हो भी सकती और नहीं भी।समान जीनी संरचना वाले जीवों के एक ही पर्यावरण में होने पर उनका समलक्षणी भी समान होता है।
इनके व्यक्त करने का आधार दृश्य संरचना(देखकर) है।इनका आधार जीन संरचना है।
उम्र के साथ बदलते  रहते हैं।यह पूरी उम्र एक समान होते है।

खासकर अगर वे एक जीन के प्रोटीन कोडिंग अनुक्रम के भीतर होती हैं।

डी.एन.ए पोलीमरेज़ की "प्रूफरीडिंग" क्षमता के कारण, प्रत्येक 10–100 मिलियन बेस में त्रुटि दर आमतौर पर बहुत कम होती है।

 डी.एन.ए में परिवर्तन की दर को बढ़ाने वाली प्रक्रियाओं को उत्परिवर्तजन कहा जाता है: 

उत्परिवर्तजन रसायन डी.एन.ए प्रतिकृति में त्रुटियों को बढ़ावा देते हैं, अक्सर आधार-युग्मन की संरचना में हस्तक्षेप करके, जबकि यूवी विकिरण डी.एन.ए संरचना को नुकसान पहुंचाकर उत्परिवर्तन को प्रेरित करता है।

डीएनए के लिए रासायनिक क्षति स्वाभाविक रूप से होती है और कोशिकाएँ बेमेल और टूटने की मरम्मत के लिए डी.एन.ए मरम्मत तंत्र का उपयोग करती हैं। 

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हालांकि, मरम्मत हमेशा मूल अनुक्रम को पुनर्स्थापित नहीं करती है।

डीएनए और पुनः संयोजक जीनों के आदान-प्रदान के लिए क्रोमोसोमल क्रॉसओवर का उपयोग करने वाले जीवों में, अर्धसूत्रीविभाजन के दौरान संरेखण में त्रुटियां भी उत्परिवर्तन का कारण बन सकती हैं। 

क्रॉसओवर में त्रुटियां विशेष रूप से होने की संभावना है जब समान अनुक्रम पार्टनर गुणसूत्रों को गलत संरेखण को अपनाने का कारण बनाते हैं; 

यह जीनोम में कुछ क्षेत्रों को इस तरह से उत्परिवर्तन के लिए अधिक प्रवण बनाता है। 

ये त्रुटियां डीएनए अनुक्रम में बड़े संरचनात्मक परिवर्तन पैदा करती हैं - दोहराव, व्युत्क्रम, संपूर्ण क्षेत्रों का विलोपन - या विभिन्न गुणसूत्रों (गुणसूत्र अनुवाद) के बीच अनुक्रमों के पूरे भागों का आकस्मिक विनिमय।

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प्राकृतिक चयन और विकास -

उत्परिवर्तन एक जीव के जीनोटाइप को बदल देते हैं और कभी-कभी यह विभिन्न फेनोटाइप को प्रकट करने का कारण बनता है। 

अधिकांश उत्परिवर्तन एक जीव के फेनोटाइप, स्वास्थ्य या प्रजनन फिटनेस  (शारीरिक रूप से उपयुक्त) बहुत कम प्रभाव डालते हैं। 

कई पीढ़ियों से, जीवों के जीनोम में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकता है,।

 जिसके परिणामस्वरूप गोत्र विकास होता है। अनुकूलन नामक प्रक्रिया में, लाभकारी उत्परिवर्तन के लिए चयन एक प्रजाति को उनके पर्यावरण में जीवित रहने के लिए बेहतर रूप में विकसित करने का कारण बन सकता है।

विभिन्न प्रजातियों के जीनोम के बीच की होमोलॉजी की तुलना करके, उनके बीच विकासवादी दूरी की गणना करना संभव है।

 और जब वे अलग हो सकते हैं। आनुवंशिक तुलना को आमतौर पर फेनोटाइपिक विशेषताओं की तुलना में प्रजातियों के बीच संबंधितता को चिह्नित करने का एक अधिक सटीक तरीका माना जाता है।

 प्रजातियों के बीच विकासवादी दूरी का उपयोग विकासवादी वृक्ष बनाने के लिए किया जा सकता है; ये वृक्ष समय के साथ सामान्य वंश और प्रजातियों के विचलन का प्रतिनिधित्व करते हैं,।

 हालांकि वे असंबंधित प्रजातियों (क्षैतिज जीन स्थानांतरण और बैक्टीरिया में सबसे आम के रूप में ज्ञात) के बीच आनुवंशिक सामग्री के हस्तांतरण को नहीं दिखाते हैं

आधुनिक जेनेटिक अनुवांशिक विज्ञान के अनुसार (inbreeding multiplier) अंत:प्रजनन से उत्पन्न विकारों की सम्भावना का वर्धक गुणांक इकाई से अर्थात एक से कम सातवीं पीढी मे जा कर ही होता है.
गणित के समीकरण के अनुसार इसे समझे-
अंत:प्रजनन विकार गुणांक= (0.5)raised to the power N x100, ( N पीढी का सूचक है,)
पहली पीढी मे N=1,से यह गुणांक 50 होगा, छटी पीढी मे N=6 से यह गुणांक 1.58 हो कर भी इकाई से बडा रहता है. सातवी पीढी मे जा कर N=7 होने पर ही यह अंत:पजनन गुणांक 0.78 हो कर इकाई यानी एक से कम हो जाता है।
तात्पर्य स्पष्ट है कि सातवी पीढी के बाद ही अनुवांशिक रोगों की सम्भावना समाप्त होती है।
यह एक अत्यंत विस्मयकारी आधुनिक विज्ञान के अनुरूप सत्य है जिसे हमारे ऋषियो ने सपिण्ड विवाह निषेध कर के बताया था।

सगोत्र विवाह से शारीरिक रोग , अल्पायु , कम बुद्धि, रोग निरोधक क्षमता की कमी, अपंगता, विकलांगता सामान्य विकार होते हैं. ।

सपिण्ड विवाह निषेध भारतीय वैदिक परम्परा की विश्व भर मे एक अत्यन्त आधुनिक विज्ञान से  समर्थित/अनुमोदित व्यवस्था है.। 
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प्राचीन सभ्यता चीन, कोरिया, इत्यादि मे भी गोत्र /सपिण्ड विवाह अमान्य है. परन्तु मुस्लिम और दूसरे पश्चिमी सभ्यताओं मे यह विषय आधुनिक विज्ञान के द्वारा ही लाया जाने के प्रयास चल रहे हैं.
 एक जानकारी भारत वर्ष के कुछ मुस्लिम समुदायों के बारे मे भी पता चली है. 
ये मुसलमान भाई मुस्लिम धर्म मे जाने से पहले के अपने हिंदु गोत्रों को अब भी याद रखते हैं, और विवाह सम्बंध बनाने समय पर सगोत्र विवाह नही करते.
आधुनिक अनुसंधान और सर्वेक्षणों के अनुसार फिनलेंड मे कई शताब्दियों से चले आ रहे शादियों के रिवाज मे अंत:प्रजनन के कारण ढेर सारी ऐसी बीमारियां सामने आंयी हैं जिन के बारे वैज्ञानिक अभी तक कुछ भी नही जान पाए हैं।

माना जाता है, कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र हुए, भृगु,अंगिरा, मरीचि और अत्रि।
भृगु के कुल मे जमदग्नि, अंगिरा के कुल में गौतम और भरद्वाज,मरीचि के कश्यप,वसिष्ट, एवं अत्रि के विश्वामित्र हुए.
इस प्रकार जमदग्नि, गौतम, भरद्वाज, कश्यप, वसिष्ट, अगस्त्य और विश्वामित्र ये सात ऋषि आगे चल कर गोत्रकर्ता या वंश चलाने वाले हुए. 
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गौत्र एक अवधारणा का आधार यह भी तथ्य है ।
अत्रि के विश्वामित्र के साथ एक और भी गोत्र चला बताते हैं.इस प्रकार के विवरण से प्राप्त होती है आदि ऋषियों के आश्रम के नाम.अपने नाम के साथ गुरु शिष्य परम्परा, पिता पुत्र परम्परा आदि, अपने नगर, क्षेत्र, व्यवसाय समुदाय के नाम जोड कर बताने की प्रथा चल पडी थीं.

 परन्तु वैवाहिक सम्बंध के लिए सपिंड की सावधानी सदैव वांछित रहती है. 
आधुनिक काल मे जनसंख्या वृद्धि से उत्तरोत्तर समाज, आज इतना बडा हो गया है कि सगोत्र होने पर भी सपिंड न होंने की सम्भावना होती है।
.इस लिए विवाह सम्बंध के लिए आधुनिक काल मे अपना गोत्र छोड देना आवश्यक नही रह गया है.

 परंतु सगोत्र होने पर सपिण्ड की परीक्षा आवश्यक हो जाती है.यह इतनी सुगम नही होती. सात पीढी पहले के पूर्वजों की जानकारी साधारणत: उपलब्ध नही रहती. इसी लिए सगोत्र विवाह न करना ही ठीक माना जाता है.
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इसी लिए 1955 के हिंदु विवाह सम्बंधित कानून मे सगोत्र विवाह को भारतीय न्याय व्यवस्था मे अनुचित नही माना गया.

परंतु अंत:प्रजनन की रोक के लिए कुछ मार्ग निर्देशन भी किया गया है.
वैदिक सभ्यता मे हर जन को उचित है के अपनी बुद्धि का विकास अवश्य करे. इसी लिए गायत्री मंत्र सब से अधिक महत्वपूर्ण माना और पाया जाता है.

निष्कर्ष यह निकलता है कि सपिण्ड विवाह नही करना चाहिये. गोत्र या दूसरे प्रचलित नामों, उपाधियों को बिना विवेक के सपिण्ड निरोधक नही समझना चाहिये.

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ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्तं दशम जिसमें यम यमी का संवाद है ।

           ← ऋग्वेदः - मण्डल १०

नवमीवर्ज्यानामयुजां षष्ठ्याश्च वैवस्वती यमी ऋषिका। 

षष्ठीवर्ज्यानां युजां नवम्याश्च वैवस्वतो यमः ऋषिः। । त्रिष्टुप्, १३ विराट्स्थाना

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ओचित्सखायं सख्या ववृत्यां तिरःपुरूचिदर्णवं जगन्वान् ।
पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः ॥१॥

इस सूक्त की ऋचा में विवस्वान ( सूर्य) के पुत्र और पुत्री यम तथा यमी का संवाद है । वे दोनों भाई बहिन हैं इस ऋचा में यमी ने यम से कहा निर्जन प्रदेश वाले और बहुत विस्तृत समुद्र के मध्य द्वीप में उपस्थित हुई मैं यमी तुम श्रेष्ठ पुरुष की माता की गर्भावस्था से लेकर सखा रूप में यम का वरण करती हूँ। जो स्त्री और पुरुष की पारस्परिक सम्बन्ध से उत्पन्न प्रेमकामना की तृप्ति के लिए वरण करती हूँ। अर्थात सम्मुख स्थित होकर लज्जा त्याग कर में आपके साथ सहवास करती हूँ।

धर्म की गति तीव्र होती है । इस न्याय से काम ( रति-) की गति तीव्र है ।हम दोनों के होने वाले पुत्र को पिता रूप तुम्हारे लिए पृथ्वी पर मेरे उदर में उत्कृष्ट सर्व गुण सम्पन्न गर्भ रूप पुत्र को प्रजापति हम दोनों के अनुसार पुत्र जन्म के लिए हम दोनों का ध्यान करते हुए धारण करें । जैसा कि ऋचा का कथन है कि प्रजापति तुम्हारे वीर्यपात में सहायक हों और विधाता तुम्हारे गर्भ को धारण करे ।


सायणभाष्यम्

‘ओ चित्' इति चतुर्दशर्चं दशमं सूक्तम् । अत्रानुक्रम्यते- ओ चित् षळूना वैवस्वतयोर्यमयम्योः संवादः षष्ठ्ययुग्भिर्यमी मिथुनार्थं यमं प्रोवाच स तां नवमीयुग्भिरनिच्छन् प्रत्याचष्टे ' इति ।

 ततः षष्ठ्यां प्रथमातृतीयाद्ययुक्षु विवस्वतः पुत्री यम्यृषिर्यमो देवता । 'यस्य वाक्यं स ऋषिर्या तेनोच्यते सा देवता' इति न्यायात्। तथा नवम्यां द्वितीयाचतुर्थीप्रभृतिषु युक्षु वैवस्वतो यम ऋषिर्यमी देवता । अनादेशपरिभाषया त्रिष्टुप् । गतो विनियोगः ॥

अत्रास्मिन् सूक्ते वैवस्वतयोर्यमयम्योः संवाद उच्यते । अस्यामृचि यमं प्रति यमी प्रोवाच । "तिरः =अन्तर्हितमप्रकाशमानम् । निर्जनप्रदेशमित्यर्थः । 

“पुरु “चित् बह्वपि विस्तीर्णं च “अर्णवं समुद्रैकदेशमवान्तरद्वीपं “जगन्वान् गतवती यमी । “चित् =इति पूजार्थे । पूजितमिष्टम् । श्रेष्ठमित्यर्थः। “सखायं गर्भवासादारभ्य सखीभूतं यमं “सख्या सख्याय स्त्रीपुरुषसंपर्कजनितमित्रत्वाय “ओ “ववृत्याम् आवर्तयामि । 

आभिमुख्येन स्थित्वा लज्जां परित्यज्य त्वत्संभोग करोमीत्यर्थः ।

 ‘धर्मस्य त्वरिता गतिः' इति न्यायेन कामस्य त्वरितत्वात् । अपि च “पितुः आवयोर्भविष्यतः पुत्रस्य पितृभूतस्य तवार्थाय “अधि “क्षमि =अधि पृथिव्याम् । 

पदों का  अन्वयार्थ-

अत्रास्मिन् सूक्ते वैवस्वतयोर्यमयम्योः संवाद उच्यते । अस्यामृचि यमं प्रति यमी प्रोवाच । "तिरः अन्तर्हितमप्रकाशमानम् । निर्जनप्रदेशमित्यर्थः । “पुरु “चित् बह्वपि विस्तीर्णं च “अर्णवं समुद्रैकदेशमवान्तरद्वीपं “जगन्वान् गतवती यमी । “चित् इति पूजार्थे । पूजितमिष्टम् । श्रेष्ठमित्यर्थः। “सखायं गर्भवासादारभ्य सखीभूतं यमं “सख्या सख्याय स्त्रीपुरुषसंपर्कजनितमित्रत्वाय “ओ “ववृत्याम् आवर्तयामि । आभिमुख्येन स्थित्वा लज्जां परित्यज्य त्वत्संभोग करोमीत्यर्थः । ‘धर्मस्य त्वरिता गतिः' इति न्यायेन कामस्य त्वरितत्वात् । अपि च “पितुः आवयोर्भविष्यतः पुत्रस्य पितृभूतस्य तवार्थाय “अधि “क्षमि अधि पृथिव्याम् । 

पृथिवीस्थानीये ममोदर इत्यर्थः । “प्रतरं प्रकृष्टम्। सर्वगुणोपेतमित्यर्थः । “नपातं गर्भलक्षणमपत्यं “वेधाः विधाता प्रजापतिः “दीध्यानः आवयोरनुरूपस्य पुत्रस्य जननार्थमावां ध्यायन “आ “दधीत। ‘प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ' (ऋ. सं. १०. १८४. १) इत्युक्तत्वात् ॥ ।

पद का अर्थान्वय- -(पुरु) स्वर्ग / प्रचुर। अपने प्रकाश और तेज से अनेक पृथिवी आदि लोकों को (चित्) -  चेतानेवाले सूर्य ने (तिरः) तारण करने वाला । सुविस्तृत (अर्णवम्) जलमय ।समुुुद्र ।अन्तरिक्ष को जब (जगन्वान्) प्राप्त कियाा /गया ।

 (सख्या) सखिपन के द्वारा (सखायम्) तुझ सखारूप पति को (आववृत्याम्-उ) वरण करती हूँ,  (अधिक्षमि) इस पृथिवीतल पर नीचे आवें, 
 (प्रतरम्) दुःख से तराने तथा पितृ-ऋण से अनृण करानेवाली योग्य सन्तान को (दीध्यानः) लक्ष्य में रखते हुए (वेधाः) ब्रह्मा  (पितुः नपातम्) अपने पिता के पौत्र अर्थात् निजपुत्र को (आदधीत) गर्भाधान रीति से मेरे में स्थापन करो, यह मेरा प्रस्ताव है ॥१॥

२“अर्णवं समुद्रैकदेशमवान्तरद्वीपम्”समीक्षा−यहाँ ‘अर्णवम्’ का अर्थ ‘अवान्तरद्वीपम्’ अत्यन्त गौणलक्षण में ही हो सकता है। 

जगन्वान् गतवती यमी” यहाँ जगन्वान् पुल्लिङ्ग को स्त्रीलिङ्ग का विशेषण करना शब्द के साथ बलात्कार ही है।
४−“ओववृत्याम्=आवर्त्तयामि=त्वत्सम्भोगं करोमि” यहाँ “त्वत्सम्भोगं करोमि=तेरा सम्भोग करती हूँ” 
५−“पितुः=आवयोर्भविष्यतः पुत्रस्य पितृभूतस्य तवार्थाय=हम दोनों के होनेवाले पुत्र का तुझ पितृरूप के निमित्त” 
।६−अधिक्षमि=अधि पृथिव्यां पृथिवीस्थानीयनभोदरे इत्यर्थः”= “पृथिवीस्थानीय नभोदर में।” द्वीपान्तर में स्थिति और नभोदर में गर्भाधान हो, 
।७−“पुत्रस्य जननार्थमावां ध्यायन्नादधीत प्रजापतिः=पुत्रजननार्थ हम दोनों का ध्यान करता हुआ प्रजापति गर्भाधान करे” 
-प्रस्ताव और प्रार्थना पति से और आधान करे प्रजापति ! ॥१॥

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न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति  
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥२॥


सायणभाष्य-यम आत्मानं परोक्षीकृत्य यमीं प्रत्युवाच । हे यमि “ते तव “सखा गर्भवासलक्षणेन सखीभूतो यमः “एतत् ईदृशं त्वयोक्तं स्त्रीपुरुषलक्षणं "सख्यं “न “वष्टि न कामयते । 

“यत् यस्मात् कारणात् यमी “सलक्ष्मा समानयोनित्वलक्षणा “विषुरूपा भगिनीत्वाद्विषमरूपा “भवाति भवति । तस्मान्न वष्टीत्यर्थः ।

 इदानीं 'तिरः पुरू चिदर्णवं जगन्वान्' इत्यस्य प्रतिवचनमुच्यते ।

 “महः =महतः “असुरस्य =प्राणवतः प्रज्ञावतो वा प्रजापतेः “पुत्रासः पुत्रभूताः “वीराः ।

 ‘वीरो वीरयत्यमित्रान् वेतेर्वा स्याद्गतिकर्मणो वीरयतेर्वा' (निरु. १. ७) इति निरुक्तम् । 

शत्रूणां विविधमीरयितारः “धर्तारः धारयितारः “दिवः द्युलोकस्य । प्रदर्शनमेतत् । द्युप्रभृतीनां लोकानामित्यर्थः

"यम ने स्वयं को  परोक्ष मानकर यमी को उत्तर दिया । हे यमी गर्भवास में तुम्हारा साथ रहने वाला तुम्हारा सखा यम तुम्हारे द्वारा कहे हुए धर्म- निषिद्ध कर्म को नहीं चाहता है । क्योंकि यमी समान गोत्र वाली होने से  भिन्न स्वरूप वाली अगम्या है। इसलिए यम यमी के साथ सम्पर्क नहीं चाहता है । इस समय यह निर्जन प्रदेश नहीं है । क्यों प्राणवान और प्रज्ञावान् वरुण ( प्रजापति ) के लोक को धारण करने वाले वीर शत्रुओं के विनाशक हो कर मुझ यम को देखते हैं ।

पदार्थान्वय– - हे यमी ! (ते) तेरा (सखा) ‘मैं’ यह पति (एतत् सख्यम्) इस गर्भाधानसम्बन्धी मित्रता को (न वष्टि) नहीं चाहता (यत्) क्योंकि गर्भाधान में पत्नी (सलक्ष्मा) समान लक्षणवाली अर्थात समान गुण की और (विषुरूपा) विशेष रूपवती अर्थात् सुन्दरी (भवाति) होनी चाहिये,
 
 (उर्विया) पृथिवी और द्युलोक के मध्य में (दिवः-धर्तारः) जो प्रकाश को धारण कर रहे हैं, तथा (महः-पुत्रासः) महान् प्रजापति के पुत्र और
 (असुरस्य वीराः) असुर के वीर सैनिक, 
असुर शब्द वरुण अथवा परमप्राणवान और प्रज्ञावान् ईश्वरीय सत्ता का वाचक है ।  जो धर्म और संसार की व्यवस्था  संचालक है ।
 (परिख्यन्) निन्दा कर डालें, ॥२॥

 (सायणभाष्य)−“सखा=गर्भवासलक्षणेन”  तथा “सलक्ष्मा= समानयोनित्वलक्षण; विषुरूपा भगिनीत्वात् विषमरूपा” 
 
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उशन्ति घाते अमृतास एतदेकस्य चित्त्यजसं मर्त्यस्य 
नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्वमा विविश्याः ॥३॥

सायण-भाष्य –

पुनरपि यमी यमं प्रत्युवाच । “घ इति निपातोऽप्यर्थे । हे यम “ते प्रसिद्धाः "अमृतासः प्रजापत्यादयो देवा अपि “एतत् (ईदृशं शास्त्रेणागम्यत्वेनोक्तं )“त्यजसम्। त्यज्यते परस्मै प्रदीयते इति त्यजसं दुहितृभगिन्यादिस्त्रीजातम् । "उशन्ति कामयन्ते । “एकस्य “चित् सर्वस्य जगतः मुख्यस्यापि प्रजापत्यादेः स्वदुहितृभगिन्यादीनां संबन्धोऽस्तीति शेषः । अतः कारणात् “ते तव “मनः चित्तम् “अस्मे अस्माकम् । ममेत्यर्थः। “मनसि चित्ते “नि “धायि निधीयताम् । अहं त्वां कामये त्वं मामपि कामयस्वेत्यर्थः । अपि च । “जन्युः इति लुप्तोपममेतत् । जन्युरिव यथा जनयिता प्रजापतिः -“पतिः भर्ता भूत्वा स्वदुहितुः शरीरं संभोगेनाविष्टवान् तथा त्वमपि मम पतिर्भूत्वा “तन्वं मदीयं शरीरम् “आ “विविश्याः संभोगेनाविश । योनौ प्रजननप्रक्षेपोपगूहनचुम्बनादिना मां संभुङ्क्ष्वेत्यर्थः ॥

अर्थानुवाद-

फिर भी यमी ने यम से कहा  ! वे प्रसिद्ध प्रजापति और देवता शास्त्र द्वारा ऐसे अगम्य होने से बताए हुए पुत्री एवं बहिन आदि से उत्पन्न मनुष्य को चाहते हैं । अकेले तथा सब जगत के मुख्य होते हुए भी प्रजापति का अपनी  पुत्री और बहिन आदि के साथ यौन सम्बन्ध प्रकाशित ही है ।

इस लिए तुम्हारा चित मेरे चित में स्थापित हो । अर्थात् मैं यमी तुम्हें चाहती हूँ और तुम भी मुझे चाहो 

जैसे प्रजापति ने पिता होकर भी अपनी पुत्री के शरीर में संभोग द्वारा प्रवेश किया था । वैसे यम तुम मेरे पति होकर संभोग द्वारा मेरे शरीर में प्रवेश करो ।

अर्थात  मेरी यौनि में अपना लिंग डालकर मेरा आलिंगन और चुम्बन करो -

पदार्थान्वय -हे पते द्युतिमन्दिवस ! पूर्वोक्त यह विचारणा तो विवाहसम्बन्ध से पहिले ही करनी चाहिये, न कि अब, क्योंकि दाम्पत्यसम्बन्धकाल अर्थात् विवाहकाल में तो मैं इस प्रकार काले रङ्ग की और विपरीत गुणवाली न थी, किन्तु आप जैसी सुन्दरी और समानगुणवाली थी। हे पते ! दैविक नियमों का उल्लङ्घन करने में किसी का भी सामर्थ्य नहीं है, अतः दाम्पत्य सम्बन्ध के अनन्तर इस मेरी पूर्वोक्त सामयिक स्थिति में शङ्का नहीं करनी चाहिए और जो आपने यह कहा है कि ये जो ‘दिवो धर्तारः’ देवादि हमारी निन्दा करेंगे, सो नहीं, किन्तु (ते) वे (अमृतासः) अमरधर्मी  (एतत्) यह (उशन्ति) चाहते हैं, कि (घ) इस ऐसी अवस्था में भी (एकस्य मर्त्यस्य) एक सन्तान का (चित्) तो अवश्य ही (त्यजसम्) गर्भाधान द्वारा मेरे प्रति त्याग हो, ऐसा इनको भी इष्ट है, क्योंकि दाम्पत्यकाल के अनन्तर दैव से उत्पन्न हुआ दोष न देखना चाहिये, अपितु एक सन्तान के लिये तो निःशङ्क गर्भाधान करना ही उचित है, इसलिये जो (ते) तेरा (मनः) मन है, उसको (अस्मे) हमारे (मनसि) मन में (निधायि) स्थिर कर अर्थात् मेरे मनोभाव के अनुकूल अपना मनोभाव बना और (जन्युः) पुनर्नव रूप में प्रकट होनेवाले (पतिः) तू मेरे पति (तन्वम्) मेरी काया में (आविविश्याः) सुतरां सम्यक् प्रकार से प्रवेश कर ॥३॥
समीक्षा (सायण भाष्य)−“एकस्य चित्सर्वस्य जगतो मुख्यस्यापि प्रजापत्यादेः स्वदुहितृभगिन्यादीनां सम्बन्धोऽस्तीति शेषः” ‘एकस्य चित्’ यहाँ एक का अर्थ मुख्य करके प्रजापति आदि का अप्रासङ्गिक अध्याहार किया है। तथा ‘जन्युरिति लुप्तोपममेतत् जन्युरिव यथा जनयिता प्रजापतिः’ यहाँ प्रथम तो लुप्तोपमा गौरव है, दूसरे ‘जायते-इति जन्युः=जन्+युच् से युच् प्रत्यय हुआ है, णिजन्त से नहीं। जो यह जनयिता अर्थ किया है। 
जन--युच् बा०--न अनादेशः । १ धातरि २ वह्नौ ३ प्राणिनि च ४-जनयिता।

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न यत्पुरा चकृमा कद्ध नूनमृता वदन्तो अनृतं रपेम ।
गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नो नाभिः परमं जामि तन्नौ ॥४॥

सायण-भाष्य-

यमो यमीं पुनर्रूमीते । “पुरा पूर्वं प्रजापतिः यत् अगम्यागमनमपरिमितसामर्थ्योपेतत्वात् कृतवान् तथा वयं “न “चकृम नाकुर्म । वयम् “ऋता ऋतानि सत्यानि “वदन्तः ब्रुवन्तः “अनृतम् असत्यं “कद्ध कदा खलु “नूनं निश्चितं “रपेम वदेम । न कदाचिदपीत्यर्थः । अगम्यागमनं न कुर्म इति यावत् । अपि च “अप्सु । अन्तरिक्षनामैतत् । अन्तरिक्षे स्थितः “गन्धर्वः गवां रश्मीनामुदकानां वा धारयिता आदित्यः “अप्या अन्तरिक्षस्था “सा प्रसिद्धा “योषा आदित्यस्य भार्या सरण्यूः “च “नः नावावयोः “नाभिः उत्पत्तिस्थानम् । मातापितरावित्यर्थः । तत् तस्मात् कारणात् “नौ आवयोः “जामि बान्धवमुत्कृष्टम्। एवं सत्यावयोरगम्यागमनरूपत्वात् कर्तुमयुक्तं तस्मादेतन्न करोमीत्यभिप्रायः ॥

पदार्थान्वय -हे प्रिये पत्नि ! (पुरा) पूर्व दाम्पत्यकाल में (ऋता वदन्तः) वेदमन्त्रों को उच्चारण करते हुए अर्थात् प्रजोत्पत्ति-निमित्त ईश्वरीय नियमों को स्वीकारते हुए (यत्) जो गार्हस्थ्य अर्थात् सन्तानोत्पादकरूप व्रत (चकृम) हम ने किया था, उसको (नूनम्) आज (अनृतम्)  निषेधवचन (न) नहीं (रपेम) कह सकते, 

अर्थात् हे प्राणप्रिये ! मैंने यह निश्चय किया है कि हमने जो दाम्पत्य वेदमन्त्रों-ईश्वरीय नियमों से गर्भाधान के लिये प्रतिज्ञाबद्ध किया था, सो उसको उल्लङ्घन से इस समय नकाररूप अर्थात् निषेधरूप अशास्त्रवचन कथंचित् नहीं बोल सकते, किन्तु गर्भाधान के लिये उद्यत हैं। प्रत्युत (गन्धर्वः) गर्भाधान सम्बन्ध का इच्छुक मैं तेरा पति (अप्सु) अन्तरिक्ष में (योषा च) और तू गर्भाधान को चाहनेवाली मेरी पत्नी भी (अप्या) अन्तरिक्ष में है, एवं हम दोनों ही जलप्रवाह की नाई निरन्तर गति कर रहे हैं तथा जिस पृथिवी के नीचे ऊपर की ओर हम दोनों की (नाभिः) नाभि है, क्योंकि अरारूप धुरी की नाई दिन और रात हम दोनों पति-पत्नी इस पृथिवी के चारों ओर चक्र काटते हैं, (तत्) बस वह यह (नौ) हम दोनों के मध्य में (परमम्) अत्यन्त (जामि) असमानजातीय-व्यवधायक अर्थात् गर्भाधानक्रिया में रुकावट डालनेवाला पदार्थ है, क्योंकि दो व्यक्तियों के संयोगाभाव का कारण व्यवधायक मध्य में बैठा हुआ असमानजातीय ही होता है, जैसे ‘नुद’ में “न्द्” इन दोनों हलों के संयोग का व्यवधायक-असमानजातीय ‘उ’ अच् है। हे प्रिये। मैं गर्भाधान संयोग के लिये उद्यत हूँ, किन्तु यह पृथिवी दोनों के मध्य में स्थित हुई गर्भाधान संयोग की अत्यन्त बाधक है। जिसके चारों ओर हम दोनों दैविक नियम से घूमते हैं। हा ! शोक, क्या करें, हम दोनों ही यहाँ विवश हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः -विवाह वेदमन्त्रों द्वारा प्रतिज्ञापूर्वक हो, प्रतिज्ञाओं का उल्लङ्घन कभी न हो। कारणवश दूर-दूर पर भी स्नेहसमाचार बना रहे। दिन-रात पृथिवी के साथ समकक्ष में होते हैं, पर उनके ओर-छोर मिले रहते हैं, यही प्रातः-सायं कहलाते हैं ॥४॥

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गर्भे नु नौ जनिता दम्पती कर्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः ।
नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथिवी उत द्यौः ॥५॥

त्वष्टा रूपाणां कर्ता सविता सर्वेषां शुभाशुभस्य प्रेरकः “विश्वरूपः सर्वात्मकः “देवः दानादिगुणयुक्तः “जनिता जनयिता प्रजापतिः “गर्भे “नु गर्भावस्थायामेव “नौ आवां “दंपती जायापती “कः कृतवान् एकोदरे सहवासित्वात् । “अस्य प्रजापतेः “व्रतानि कर्माणि “नकिः “प्र “मिनन्ति न केचित् प्रहिंसन्ति । न लोपयन्तीत्यर्थः । अतः कारणाद्गर्भावस्थायामेवावयोः प्रजापतिकृते दंपतित्वे सति संभोगं कुर्वित्यर्थः । अपि च “नौ आवयोः “अस्य इदं मातुरुदरे सहवासजनितं दंपतित्वं “पृथिवी भूमिः “वेद जानाति । "उत अपि च “द्यौः द्युलोकोऽपि जानाति ॥ ॥ ६ ॥

पदार्थान्वय-(विश्वरूपः) संसार को प्रकट करनेवाला (त्वष्टा) सबके कृत्यों का नियामक (सविता) विवस्वान् (कः) प्रजापति (देवः) देव (गर्भे नु) गर्भ में ही अर्थात् पृथिवीतल पर आने से पूर्व ही (नौ) हम दोनों को (दम्पती) पति-पत्नी (जनिता) बना चुका है।
 हा ! दैव नियम कैसे हैं ? कि पूर्व ही से दाम्पत्य सिद्ध होने पर भी मैं गर्भाधानरहित या सन्तानशून्य रह जाऊँ। हा ! मुझे यह दुःख सहन नहीं होता है। हम प्रजापति के सम्पादित दाम्पत्यफल के बिना ही इस घने दुःखपङ्क में रह जावेंगे। (नकिः) तो फिर (अस्य) इस प्रजापति के (व्रतानि) सारे नियम (प्रमिनन्ति) टूट जाने चाहिए । क्योंकि हम तो झूठ बोलते ही नहीं कि हमारा दाम्पत्य प्रजापति ने स्थिर किया था, जिसके गर्भाधानफल के लिये हम विलाप कर रहे हैं, अपितु (अस्य) इस प्रजापति का (पृथ्वी-उत-द्यौः) द्यावापृथिवी यह एक मिथुन अर्थात् जोड़ा भी (नौ) हम दोनों ‘दिन-रात’ के समान दाम्पत्य को (वेद) जानता है, क्योंकि हमारे दोनों के विवाह को इस जोड़े ने देखा है, अतः यह द्यावापृथिवी मिथुन भी हमारा साक्षी है ॥५॥

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को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत् ।
बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन् ॥६॥

प्रथमस्याह्नः संबन्धि “अस्य इदमन्योन्यसंगमनं “कः वेद जानाति । प्रथमेऽहनि यत्क्रियते तदनुमानमाश्रित्य न कश्चिदपि ज्ञातुं शक्नोतीत्यर्थः । “इह अस्मिन् प्रदेशे प्रत्यक्षतः “क “ईम् इदं संगमनं “ददर्श पश्यति “कः “प्र “वोचत् प्रख्यापयति । न कोऽपीत्यर्थः । “मित्रस्य “वरुणस्य मित्रावरुणयोः “बृहत् महत् “धाम स्थानमहोरात्रं यदस्ति तत्र “नॄन् मनुष्यान् “वीच्या नरकेण हे “आहनः आहन्तर्मर्यादया हिंसितः । स्वकृतशुभाशुभकर्मापेक्षया मनुष्यादिप्राणिनां नरकपातेन स्वर्गप्रापणेन निग्रहानुग्रहयोः कर्तरित्यर्थः । एवंभूत हे यम त्वं “कदु “ब्रवः किं वा ब्रवीषि ।।

पदार्थान्वयभाषाः -हे दिवस ! यद्यपि द्यावापृथिवी मिथुन हमारा साक्षी है, प्रत्युत हा ! (इह) हमारे साथ सम्बन्ध रखनेवाले इस अन्तरिक्ष में (अस्य प्रथमस्य-अह्नः) इस प्रथम दिन अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में हुए इस विवाह को (कः) कौन (वेद) जानता है ? अर्थात् कोई नहीं जानता और (ईम्) उस गत विवाह को (कः) किसने (ददर्श) देखा है, तथा (कः) कौन ही (प्रवोचत्) सुनकर कह सके कि हाँ इनका विवाह हुआ, अर्थात् कोई नहीं, क्योंकि संसार प्रत्यक्षवादी है। जो कुछ प्रत्यक्ष देखता है, उसी को कहता है। (मित्रस्य) मित्र का और (वरुणस्य) वरुण का (धाम) स्थान (बृहत्) दूर है। (आहनः) हे हृदयपीडक पते ! (कत्) कैसे (उ) ही कोई उस स्थान को जाकर वहाँ के (नॄन्) मनुष्यों को (वीच्य) सम्मुख करके उनको (ब्रवः) हमारा यह दुःख-वृत्तान्त कहे। मित्र अर्थात् सूर्य तेरा पिता पूर्व दिशा में और वरुण मेरा पिता पश्चिम में है। इस प्रकार अत्यन्त दूर हम दोनों के इन पितृकुलों में जाकर जो इस दुःखवृत्तान्त को सुना सके, ऐसा हमें कोई नहीं दिखलाई पड़ता। दिन का पिता मित्र ‘सूर्य’ और रात्रि का पिता वरुण है ॥६॥

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यमस्य मा यम्यं काम आगन्समाने योनौ सहशेय्याय ।
जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद्वृहेव रथ्येव चक्रा ॥७॥

यमस्य तव "कामः अभिलाषः “यम्यं यमीं “मा मां प्रति “आगन् आगच्छतु । ममोपरि तव यमस्य संभोगेच्छा जायतामित्यर्थः । किमर्थम् । “समाने “योनौ एकस्मिन् स्थाने शय्याख्ये “सहशेय्याय सहशयनार्थम् । तदनन्तरं पूर्णमनोरथा सती “जायेव “पत्ये यथा भार्या पत्युरर्थाय परया प्रीत्या विश्वस्ता सती रतिकामा स्वशरीरं प्रकाशयति एवं “तन्वम् आत्मीयं शरीरं “रिरिच्यां विविच्याम् । त्वदर्थं प्रकाशयेयमित्यर्थः । किंच । 'चित् इति पूरणः । “वि “वृहेव । ‘वृहू उद्यमने' । धर्मार्थकामान् विविधमुद्यच्छावः । तत्र दृष्टान्तः । “रथ्येव “चक्रा । रथस्यावयवभूते चक्रे यथा रथमुद्यच्छतस्तद्वत् ॥

पदार्थान्वयभाषाः -(समाने योनौ) संभोग में (सहशेय्याय) मिलकर सोने के लिये (यमस्य) तुझ यम  की (मा यम्यम्) मुझ यमी  को (कामः) कामना( sex) (आगन्) प्राप्त हुई कि (जायेव) पुत्रजनन में योग्य स्त्री के समान अर्थात् इस समय मैं जाया-गर्भधारण में समर्थ सन्तानोत्पत्र करने योग्य हूँ। ब्राह्मणवचन के अनुसार गर्भधारण करने योग्य स्त्री को जाया कहते हैं, कन्या या वृद्धा को नहीं, इसलिये गर्भधारण करने योग्य स्त्री को जैसे अनुष्ठान करना चाहिए, उसी प्रकार अनुष्ठान करती हुई (पत्ये) पति के लिये अर्थात् पूर्वोक्त जन्यु-गर्भाधान कराने में योग्य निज पति के लिए (तन्वम्) अपने शरीर को (रिरिच्यां) समर्पण कर ही दूँ। इसलिये कि (विवृहेव रथ्येव चक्रा) गार्हस्थ्यभार को हम दोनों रथ के पहियों के समान उठा ले चलें ॥७॥

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न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति ।
अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा ॥८॥

यम्या प्रख्यातो यमः पुनराह । “इह अस्मिँल्लोके “देवानां संबन्धिनः “ये “स्पशः अहोरात्रादयश्चाराः “चरन्ति सर्वेषां शुभाशुभलक्षणकर्मप्रत्यवेक्षणार्थं परिभ्रमन्ति “एते चाराः क्षणमात्रमपि चरणव्यापाररहिताः “न “तिष्ठन्ति । “न “नि मिषन्ति मेषणं न कुर्वन्ति । शुभमशुभं वा यः करोति तं निरीक्षन्ते चेत्यर्थः । हे “आहनः ममापहन्त्रि असह्यभाषणेन दुःखयित्रि त्वं “मत् मत्तः “अन्येन त्वत्सदृशेन सह “तूयं क्षिप्रं “याहि संगच्छ । गत्वा च "तेन “वि “वृह धर्मार्थकामानुद्यच्छ । तत्र दृष्टान्तः । “रथ्येव “चक्रा । यथा रथावयवभूते चक्रे रथमुद्यच्छतस्तद्वत् ॥


पदार्थान्वय- -हे यमी ! जो तुझने विलाप करते हुए  कहा है कि ‘बृहन्मित्रस्य वरुणस्य  धाम कदु ब्रवः=मित्र और वरुण हमारे पितृस्थान दूर हैं, कौन वहाँ हमारे दुःख को सुनावे’ यद्यपि मित्र और वरुण के उस दूर धाम को जानेवाले भी हैं तो सही, (ये) जो (इह) यहाँ अन्तरिक्ष में (चरन्ति) चलते हैं, प्रत्युत वे (देवानाम्)  देवों के (स्पशः) गुप्तचर   हैं ।
और एक देव का दूसरे देव के पास वृत्तान्त पहुँचाते हुए हरकारों के समान हैं, (एते) ये (न तिष्ठन्ति) न विराम करते हैं (न निमिषन्ति) न ही मार्ग को छोड़कर इधर-उधर उन्मार्ग में चेष्टा करते हैं, तब हे रात्रि ! हम दोनों के दुःखमय वृत्तान्त को कौन ले जावे और कौन दुःख का सन्देश हम दोनों के पितृकुलों में सुनावे अथवा कौन हमें दुःख से छुडावें, अहो ! (आहनः) हे हृदयपीडिके ! यह तो असाध्य दुःख है, इसलिये (मत्) मुझ से भिन्न (अन्येन) जो कोई अन्य पुरुष तुझे दिखलाई पड़े, उसके साथ (तूयम्) शीघ्र (याहि) तू समागम को प्राप्त हो (तेन) उसी के साथ (विवृह) गार्हस्थ्यभार को उठा और (रथ्येव चक्रा) रथ के पहियों के समान वहन कर ॥८॥

॥ समीक्षा (सायणभाष्य)-‘ये स्पशोऽहोरात्रादयश्चाराश्चरन्ति” यहाँ यम-यमी को सायण दिन-रात नहीं समझते हैं, 


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रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत्सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात् ।
दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य बिभृयादजामि ॥९॥

रात्रिभिः "अहभिः अहोरात्रयोः “अस्मै यमाय कल्पितं भागं सर्वो यजमानः “दशस्येत् प्रयच्छतु । “सूर्यस्य संबन्धि “चक्षुः तेजः "मुहुः मुहुः अस्मै यमाय “उन्मिमीयात् उदेतु। “दिवा “पृथिव्या द्यावापृथिवीभ्यां सह “मिथुना मिथुनौ “सबन्धू समानबन्धू अहोरात्रे अस्मै यमाय । एतज्ज्ञात्वा इयं “यमीः “यमस्य “अजामि अभ्रातरं “बिभृयात् धारयतु । यानेन परिगृह्णात्वित्यर्थः ।।

हे प्रिये ! यद्यपि यह सम्भव है कि प्रजापति देव (अस्मै) इस जामिरूप बहिन ।
 जामि–(जम--इन् )नि० वृद्धिः । १ भगिन्यां २ कुलस्त्रियां, अमरः ३ दुहितरि, ४ स्नुषायां, ५ 
 (दशस्येत्) सूक्ष्म बनाकर हमारे बीच में से अलग कर दे। वह इस प्रकार कि (रात्रीभिः) रात्रिगण से (अहभिः) अहगर्ण से, अर्थात् अहोरात्रगण से इस पृथिविलोक के स्थितिसमय को समाप्त करके पृथक् कर दे, तब हम दोनों का सङ्गम होना सम्भव है, क्योंकि यह स्थितिसमय कालगणना से समाप्त हो सकता है और वह कालगणना रात्रिगण और अहर्गण से हो सकती है।

 वह ऐसे कि (सूर्यस्य) सूर्यदेव की (चक्षुः) दर्शनरश्मि (मुहुः) बारम्बार (उन्मिमीयात्) उगाली ले, लोकदृष्टि से प्रकट हो, जिससे लोग सूर्यप्रकाश के दर्शन से दिन-रात की गणना करते जावें, तब (दिवा पृथिव्या) द्यावापृथिवी के समान (मिथुना) मिथुन (सबन्धू) समानाङ्ग-एकाङ्ग-सङ्गत हो जावें, (यमीः) यमी आप र (यमस्य) मुझ यम के (अजामि) व्यवधायाकाभावता-बिना रुकावट के संयोग को (बिभृयात्) धारण कर सकें ॥९॥
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आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि ।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत् ॥१०॥

यत्र येषु कालेषु “जामयः भगिन्यः “अजामि अभ्रातरं पतिं “कृणवन् करिष्यन्ति “ता तानि “उत्तरा उत्तराणि “युगानि कालविशेषाः “आ “गच्छान् आगमिष्यन्ति। “घ इति पूरणः । यस्मादेवं तस्माद्धे “सुभगे त्वमिदानीं “मत् मत्तः “अन्यं “पतिं भर्तारम् “इच्छस्व कामयस्व । तदनन्तरं “वृषभाय तव योनौ रेतः सेक्त्रे पुरुषाय आत्मीयं “बाहुम् उप “बर्बृहि। शयनकाल उपबर्हणं कुरु ॥ 

किन्तु हे बहिन ! (ता) वे (युगानि) युग-अवसर (घ) तो (उत्तरा) बहुत काल के अनन्तर (आगच्छात्) आवेंगे (यत्र) जब कि ये (जामयः) बहिन  (अजामि) जो बहिन नहो पत्नी  कर्म (करिष्यन्ति) करेंगे। परन्तु हे यमी ! तब तक तुझ पुत्राभिलाषिणी से बिना गार्हस्थ्य के ठहरना दुष्कर है, इसलिये मैं पुत्रोत्पत्र करने में असमर्थ होता हुआ तुझे आज्ञा देता हूँ कि (सुभगे) हे प्यारी ! (वृषभाय) वीर्य प्रदान करने में समर्थ पुरुष के लिये (बाहुम्) अपनी भुजा को (उपबर्बृहि) फैल और (मत्) मुझ दिन से (अन्यम्) भिन्न (पतिम्) पुरुष को (इच्छस्व) स्वीकार कर ॥१०॥

(सायणभाष्य)-“यत्र येषु कालेषु जामयो भगिन्यो-अज्राम्यभ्रातरं पतिं कृण्वन्करिष्यन्ति” यमी जो सायण के मत में भगिनी है, वह इसी वैदिक समय में ही सम्भोग करने को तैयार है, ।।१०॥
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किं भ्रातासद्यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निरृतिर्निगच्छात् ।
काममूता बह्वेतद्रपामि तन्वा मे तन्वं सं पिपृग्धि ॥११॥

यमी यमेन प्रत्याख्याता पुनराह । “यत् यस्मिन् भ्रातरि सति स्वस्रादिकम् “अनाथं नाथरहितं भवति सः “भ्राता “किम् “असत् किं भवति । न भवतीत्यर्थः । किंच यस्यां भगिन्यां सत्यां भ्रातरं “निर्ऋतिः दुःखं “निगच्छात् नियमेन गच्छति प्राप्नोति सा “स्वसा “किमु किं वा भवति । भ्रातृभगिन्योश्च परस्परं प्रीतिर्येन केनचिदुपायेनावश्यं कार्येत्यभिप्रायः। साहं “काममूता कामेन मूर्च्छिता सती “बहु नानाप्रकारम् “एतत् ईदृशमुक्तं वक्ष्यमाणं च “रपामि प्रलपामि । एतज्ज्ञात्वा “मे मम “तन्वा शरीरेण “तन्वं शरीरं “सं “पिपृग्धि संपर्चय । संभोगेन संश्लेषय। मां सम्यग्भुङ्क्ष्वेत्यर्थः ॥

यमी यम से पुन: कहती है 

हे दिवस ! दैवकृत आपत्ति से शरीर संयोगसंबन्ध में (किम्) क्या अब आप (भ्राता) भाई (असत्) हो गये हो ? (यत्) जिससे इस प्रकार (अनाथम्) आपकी ओर से अनाथता-अपतिपन (भवाति) हो जावे, और जो मैं तेरी पत्नी हूँ (किमु) क्या इस समय (स्वसा-असत्) बहिन हो गयी (यत्) जिस से (निर्ऋतिः) बिना संभोग के (निगच्छात्) मेरी काया से अपनी काया को (काममूता) सम्पृक्त कर अर्थात् मिलादे ॥११

 (सायणभाष्य)−“यस्मिन् भ्रातरि सति स्वसादिकमनाथं नाथरहितं भवाति-भवति स भ्राता किमसत् किं भवति न भवतीत्यर्थः किं च यस्यां भगिन्यां सत्यां भ्रातरं निर्ऋतिर्दुःखं निगच्छात् नियमेन गच्छति प्राप्नोति सा किमु किंवा भवति।” 
इस स्थान पर सायण की खींचतान की कोई सीमा नहीं रह गई। “अनाथम्” क्रियाविशेषण को ‘स्वसा’ का विशेषण करता है परन्तु ‘अनाथम्’ शब्द नपुंसकलिङ्ग है और ‘स्वसा’ शब्द स्त्रीलिङ्ग है, 
इसलिए ‘आदिकम्’ शब्द अधिक जोड़कर ‘स्वसादिकम्’ लिखता है। यहाँ पर क्या भ्राता के साथ स्वसा से भिन्न-व्यक्ति का भी सम्बन्ध है, जो ‘आदिकम्’ पद अधिक जोड़ा है ? यदि ‘आदिकम्’ से ‘दुहिता’ ‘माता’ भी सम्बन्ध रखते हैं, तब तो भ्राता नहीं होगा, अपितु दुहिता के साथ पिता और माता के साथ पुत्र का सम्बन्ध होगा, अतः यह कल्पना निर्बल है। तथा ‘वह ऐसा भ्राता न होने के बराबर ही है, जिसके होते हुए बहिन अनाथ रहे’ यह हेतु भी निरथर्क है, क्योंकि वह यम उस यमी को अविवाहित रहने का उपदेश तो दे ही नहीं रहा था।

सायण-भाष्य–

यमो यमीं प्रत्युक्तवान् । हे यमि “ते तव “तन्वा शरीरेण “तन्वम् आत्मीयं शरीरं “न “वै “सं पपृच्यां नैव संपर्चयामि । नैवाहं त्वां संभोक्तुमिच्छामीत्यर्थः । “यः भ्राता “स्वसारं भगिनीं “निगच्छात् नियमेनोपगच्छति । संभुङ्त्श इत्यर्थः । तं “पापं पापकारिणम् “आहुः । शिष्टा वदन्ति । एतज्ज्ञात्वा हे “सुभगे सुष्ठु भजनीये हे यमि त्वं “मत् मत्तः “अन्येन त्वद्योग्येन पुरुषेण सह “प्रमुदः संभोगलक्षणान् प्रहर्षान् “कल्पयस्व समर्थय । “ते तव “भ्राता यमः “एतत् ईदृशं त्वया सह मैथुनं कर्तुं “न “वष्टि न कामयते । नेच्छति ॥

हे रात्रे ! हाँ ठीक है कि दैवकृत आपद् से इस समय सम्भोग में असमर्थ होने से तथा नियोग की अनुज्ञा दे देने से ‘किं भ्राताऽसत्’ इस वचनानुसार शरीरसंयोगसम्बन्ध में वस्तुतः मैं भ्राता ही हो चुका हूँ और तू बहिन हो चुकी है, इसलिए (ते) तेरी (तन्वा) काया के साथ (तन्वम्) अपनी काया को (न वा-उ) बिल्कुल नहीं (सम्पपृच्याम्) मिलाऊँ, क्योंकि (यः) जो (स्वसारम्) बहिन के साथ (निगच्छात्) विषयभोग करे (पापमाहुः) भद्रजन उसको पाप कहते हैं, अतः (सुभगे) हे देवि ! (मत्) मुझसे (अन्येन) भिन्न पुरुष के साथ (प्रमुदः) पुत्रोत्पादन-सम्बन्धी भोग (कल्पयस्व) सम्पादन कर, मैं (ते) तेरा (भ्राता) प्रासङ्गिक-प्रसङ्गप्राप्त भाई (एतत्-न वष्टि) इस तेरे आग्रह किये भोग को नहीं चाहता ॥१२॥

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लता और वृक्ष की उपमा-


बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम ।
अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् ॥१३॥

यमी प्रत्युवाच । हे “यम त्वं “बतः दुर्बलः असि । “बत इति निपातः खेदानुकम्पयोः । अनुकम्प्यश्चासि । “ते त्वदीयं “मनः मनोगतं संकल्पं “हृदयं “च बुद्धिगतमध्यवसायं च “नैव “अविदाम वयं न जानीम एव । मत्तः “अन्या काचित् स्त्री “त्वां “परि “ष्वजाते “किल । तत्र दृष्टान्तद्वयमुच्यते । “कक्ष्येव “युक्तम् । यथा कक्ष्या रज्जुर्युक्तमात्मना संबद्धमश्वं परिष्वजते तद्वत् । “लिबुजेव “वृक्षम् । यथा लिबुजा व्रततिर्गाढं वृक्षं परिष्वजते तद्वच्च अन्यस्यां स्त्रियामासक्तस्त्वं मां परिष्वङ्क्तुं नेच्छसीत्यर्थः 

पदार्थान्वय -(यम) यम ! (बत) हा ! दुःख है कि तू (बतः) विवश (असि) है, क्योंकि दैवकृत बाधा को सहसा कोई भी नहीं हटा सकता, इसलिए (ते) तेरे (मनः) मन (च) और (हदयम्) वक्षःस्थल को मैंने (न-एव) नहीं (अविदाम) प्राप्त किया (अन्या किल) मुझ से भिन्न कोई भी स्त्री (कक्ष्या-इव-युक्तम्) कक्ष-काँख में बंधी पेटी के समान सम्यक्प्रकार से (त्वाम्) तुझ को (परिष्वजाते) आलिङ्गन करे अथवा (लिबुजा इव वृक्षम्) जैसे लता वृक्ष को लिपटती है, वैसे तुझ से भी लिपटे ॥१३॥

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अन्यमू षु त्वं यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् ।
तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥१४॥

सायण-भाष्य-

यमः पुनरप्याह । हे "यमि “त्वम् “अन्यमु अन्यं पुरुषमेव “सु सुष्ठु परिष्वज । “अन्य “उ अन्योऽपि पुरुषः “त्वां “परि “ष्वजाते । तत्र दृष्टान्तः । “लिबुजेव “वृक्षम् । यथा वल्ली गाढं वृक्षं परिष्वजते तद्वत् । तथा सति । वाशब्दः समुच्चये । “त्वं “तस्य च पुरुषस्य “मनः “इच्छ कामय । तस्य त्वं वशवर्तिनी भवेत्यर्थः। “सः च पुरुषः “तव मन इच्छतु । “अध अथ परस्परवशवर्तित्वानन्तरं त्वं तेन सह "सुभद्रां सुकल्याणीं “संविदं परस्परसंभोगसुखसंवित्तिं कृणुष्व कुरुष्व ।।

पदार्थान्वय  -(यमि) हे यमी ! (सु) हाँ तेरा पूर्वोक्त वचन ठीक है, अतः (त्वम्) तू भी (अन्यम् उ) अन्य पुरुष को (लिबुजा-इव वृक्षम्) लता की नाई वृक्ष को आलिङ्गन कर तथा (अन्य उ) वह अन्य पुरुष भी (त्वाम्) तुझको (परिष्वजाते) आलिङ्गन करे (त्वं वा) और तू (तस्य) उस पुरुष के (मनः) मन को (इच्छ) चाह (सः वा) और वह पुरुष (तव) तेरे मन की चाह करे (अधा) इस के अनन्तर (संविदम्) नियोगरूप प्रतिज्ञा को (सुभद्राम्) अच्छे कल्याणयुक्त अर्थात् सुसन्तानवाली (कृणुष्व) बना ॥१४॥
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प्रस्तुति करण :– यादव योगेश कुमार रोहि  सम्पर्क सूत्र-8077160219

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