रविवार, 18 फ़रवरी 2024

भाषा उत्पत्ति और सिद्धान्त- २-


भय + आतुर = भयातुर 
भाव + आवेश  = भावावेश 
मरण + आसन्न  = मरणासन्न 
फल + आगम  = फलागम 
रस + आस्वादन = रसास्वादन 
रस + आत्मक = रसात्मक 
रस + आभास = रसाभास 
राम + आधार = रामाधार 
लोप + आमुद्रा = लोपामुद्रा 
वज्र + आघात = वज्राघात 
स + आश्चर्य = साश्चर्य 
साहित्य +आचार्य = साहित्याचार्य 
सिंह + आसन = सिंहासन 
____
( आ + अ   = आ )
विद्या + अर्थी  =  विद्यार्थी    
भाषा + अन्तर = भाषान्तर 
रेखा + अंकित = रेखांकित 
रेखा + अंश = रेखांश 
लेखा + अधिकारी = लेखाधिकारी 
विद्या +अर्थी = विद्यार्थी 
शिक्षा +अर्थी = शिक्षार्थी 
सभा + अध्यक्ष = सभाध्यक्ष 
सीमा + अन्त = सीमान्त 
आशा + अतीत = आशातीत 
कृपा + आचार्य = कृपाचार्य 
कृपा + आकाँक्षी = कृपाकाँक्षी 
तथा + आगत = तथागत 
महा + आत्मा = महात्मा 
_______
( आ + आ  = आ ) 
मदिरा + आलय  = मदिरालय 
महा + आशय = महाशय 
महा +आत्मा = महात्मा 
राजा + आज्ञा = राजाज्ञा 
लीला+ आगार = लीलागार 
वार्ता +आलाप = वार्तालाप 
विद्या +आलय = विद्यालय 
शिला + आसन = शिलासन 
शिक्षा + आलय = शिक्षालय 
क्षुधा + आतुर = क्षुधातुर 
क्षुधा +आर्त = क्षुधार्त 
_______
 ( इ + इ  = ई  ) 
कवि + इन्द्र  = कवीन्द्र
मुनि + इंद्र  = मुनींद्र  
रवि + इंद्र = रवींद्र   
अति + इव = अतीव  
अति + इन्द्रिय = अतीन्द्रिय 
गिरि +  इंद्र = गिरीन्द्र
प्रति + इति = प्रतीत 
हरि  + इच्छा = हरीच्छा 
फणि + इन्द्र  = फणीन्द्र 
यति + इंद्र = यतीन्द्र 
अति + इत  = अतीत 
अभि + इष्ट = अभीष्ट 
प्रति + इति = प्रतीति 
प्रति + इष्ट = प्रतीष्ट
प्रति + इह = प्रतीह    
_______ 
 ( इ  + ई  = ई ) 
गिरि + ईश  = गिरीश   
मुनि + ईश  = मुनीश 
रवि + ईश  = रवीश 
हरि + ईश = हरीश 
कपि+ ईश = कपीश 
कवी + ईश = कवीश 
________
 ( ई + ई  = ई ) 
सती + ईश  = सतीश             
मही + ईश्वर  = महीश्वर  
रजनी + ईश = रजनीश 
________
( ई + इ  = ई ) 
मही + इंद्र   = महीन्द्र   
_______
( उ + उ  = ऊ )         
गुरु + उपदेश = गुरूपदेश      
भानु + उदय  = भानूदय  
विधु + उदय = विधूदय  
सु + उक्ति = सूक्ति 
लघु + उत्तरीय = लघूत्तरीय   
____
  उ  +  = ऊ )
लघु + ऊर्मि = लघूर्मि   
__
( ऊ + उ = ऊ )
वधू  + उत्सव = वधूत्सव  
____
 ( ऊ + ऊ = ऊ )   
भू  + ऊर्जा  = भूर्जा            
भू + ऊर्ध्व  = भूर्ध्व 
 ( ऋ + ऋ = ऋृ ) 
पितृ + ऋण  = पितृण  
मातृ + ऋण  = मातृण  ।
________
गुणसन्धि  अदेङ्गुणःअचि असवर्णे-(इउॠऌ)एषांस्थाने(एओअर् 'अल्') एतेगुणसंज्ञाभवन्ति
गुण_सन्धि:
सूत्र- अदेङ् गुणः ( 1/1/2 )
सूत्रार्थ—यह सूत्र गुण संज्ञा करने वाला सूत्र है । यह सूत्र गुण संज्ञक वर्णों को बताता है ।
(अत् एङ् च गुणसञ्ज्ञः स्यात्)
ह्रस्व अकार और एङ् ( अ, ए, ओ ) वर्ण  गुण संज्ञक वर्ण है।
व्याख्या :-अ या आ के साथ इ या ई के मेल से ‘ए’ , अ या आ के साथ उ या ऊ के मेल से ‘ओ’ तथा अ या आ के साथ ऋ के मेल से ‘अर्’ बनता है ।
यथा :–
१.अ/आ + इ/ई = ए
सुर + इन्द्र: = सुरेन्द्र: ,तरुण+ईशः= तरुणेश:
रामा +ईशः = रमेशः ,स्व + इच्छा = स्वेच्छा,
नेति = न + इति, भारतेन्दु:= भारत + इन्दु:
नर + ईश: = नरेश: , सर्व + ईक्षण: = सर्वेक्षण:
प्रेक्षा = प्र + ईक्षा ,महा + इन्द्र: = महेन्द्र:
यथा +इच्छा = यथेच्छा ,राजेन्द्र: = राजा + इन्द्र:
यथेष्ट = यथा + इष्ट:, राका + ईश: = राकेश:
द्वारका +ईश: = द्वारकेश:, रमेश: = रमा + ईश:
मिथिलेश: = मिथिला + ईश:।
_____
२.अ/आ + उ/ऊ = ओ
पर+उपकार: = परोपकारः, सूर्य + उदय: = सूर्योदय:
प्रोज्ज्वल: = प्र + उज्ज्वल: ,
सोदाहरण: = स +उदाहरण:
अन्त्योदय: = अन्त्य + उदय: ,जल + ऊर्मि: = जलोर्मि:
समुद्रोर्मि: = समुद्र + ऊर्मि:, जलोर्जा = जल + ऊर्जा
महा + उदय:= महोदय: ,यथा+उचित = यथोचित:
शारदोपासक: = शारदा + उपासक:
महोत्सव: = महा + उत्सव:
गंगा + ऊर्मि: = गंगोर्मि: ,महोरू: = महा + ऊरू:।
____
३.अ /आ + ऋ = अर्
देव + ऋषि: = देवर्षि: ,शीत + ऋतु: = शीतर्तु:
सप्तर्षि: = सप्त + ऋषि: ,उत्तमर्ण:= उत्तम + ऋण:
महा + ऋषि: = महर्षि: ,राजर्षि: = राजा + ऋषि: आदि 
प्रश्न - गुण स्वर सन्धि किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित समझाइए ।  
उत्तर -  यदि  'अ'  या 'आ' के बाद 'इ' या 'ई'   'उ' या 'ऊ'  और ऋ आए तो दोनों मिलकर क्रमशः 'ए' 'ओ'  और अर  हो जाता है । इस मेल को गुण स्वर संधि कहते हैं । 

अ + इ = ए
 + उ = ओ
आ  + इ = ए
  +   = 
अ + ई = ए
 + ऋ= अर 
आ + ई = ए
आ + ऋ = अर्
अ + उ = ओ

गुण स्वर संधि के नियम
जैसे -
( अ  + इ = ए ) 
देव + इन्द्र  = देवेन्द्र   
सुर + इंद्र = सुरेंद्र 
भुजग + इन्द्र  = भुजगेन्द्र 
बाल + इंद्र = बालेन्द्र
मृग + इंद्र = मृगेंद्र 
योग + इंद्र = योगेंद्र 
राघव +इंद्र  = राघवेंद्र 
विजय + इच्छा = विजयेच्छा 
शिव + इंद्र = शिवेंद्र 
वीर + इन्द्र = वीरेन्द्र 
शुभ + इच्छा = शुभेच्छा 
ज्ञान + इन्द्रिय = ज्ञानेन्द्रिय 
खग + ईश = खगेश 
खग = इंद्र = खगेन्द्र 
गज + इंद्र = गजेंद्र 

( आ  + इ = ए ) 
महा + इंद्र = महेंद्र 
यथा + इष्ट  = यथेष्ट 
रमा + इंद्र = रमेंद्र 
 राजा + इंद्र = राजेंद्र 

( अ + ई  = ए ) 
गण + ईश  = गणेश         
ब्रज + ईश = ब्रजेश  
भव + ईश  = भवेश
भुवन + ईश्वर  = भुवनेश्वर 
भूत + ईश = भूतेश 
भूत + ईश्वर  = भूतेश्वर 
रमा + ईश  = रमेश 
राम + ईश्वर = रामेश्वर 
लोक +ईश = लोकेश 
वाम + ईश्वर = वामेश्वर 
सर्व + ईश्वर = सर्वेश्वर 
सुर + ईश = सुरेश
ज्ञान + ईश =ज्ञानेश 
ज्ञान+ईश्वर = ज्ञानेश्वर 
उप + ईच्छा = उपेक्षा 
एक + ईश्वर = एकेश्वर 
कमल +ईश = कमलेश  

( आ + ई  = ए ) 
महा + ईश  = महेश 
रमा + ईश  = रमेश  
राका + ईश = राकेश  
लंका + ईश्वर = लंकेश्वर 
उमा = ईश = उमेश     
   
( अ + उ = ओ )
वीर + उचित = वीरोचित 
भाग्य + उदय = भाग्योदय   
मद + उन्मत्त  = मदोन्मत्त 
सूर्य + उदय  = सूर्योदय  
फल + उदय  = फलोदय   
फेन + उज्ज्वल  = फेनोज्ज्वल 
यज्ञ +  उपवीत  = यज्ञोपवीत 
लोक + उक्ति = लोकोक्ति 
लुप्त + उपमा = लुप्तोपमा  
 लोक+उत्तर = लोकोत्तर  
वन + उत्सव = वनोत्सव 
वसंत +उत्सव = वसंतोत्सव 
विकास + उन्मुख = विकासोन्मुख 
विचार + उचित = विचारोचित 
षोड्श + उपचार = षोड्शोपचार 
सर्व + उच्च = सर्वोच्च 
सर्व + उदय = सर्वोदय 
सर्व + उत्तम = सर्वोत्तम 
हर्ष + उल्लास = हर्षोल्लास 
हित + उपदेश = हितोपदेश
आत्म +उत्सर्ग = आत्मोत्सर्ग 
आनन्द + उत्सव = आनन्दोत्सव 
गंगा + उदक = गंगोदक  

( अ  + ऊ  = ओ )
समुद्र + ऊर्मि = समुद्रोर्मि 
( आ  + ऊ  = ओ )
गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि 

( आ + उ = ओ )
महा + उत्सव  = महोत्सव 
महा + उदय = महोदय 
महा = उपदेश = महोपदेश 
यथा + उचित  = यथोचित 
लम्बा + उदर = लम्बोदर 
विद्या + उपार्जन = विद्योपार्जन  

( अ + ऋ = अर् ) 
देव + ऋषि  = देवर्षि        
ब्रह्म +  ऋषि = ब्रह्मर्षि 
सप्त + ऋषि = सप्तर्षि 

 ( आ + ऋ = अर् ) 
महा + ऋषि  = महर्षि 
राजा + ऋषि  = राजर्षि    ।
____
वृद्धिरेचि-वृद्धि_स्वर_सन्धि
वृद्धि हो जाती है  आत् ( अ'आ) के  बाद ऐच् (एऐओऔ) से परे अच् ( स्वर) होने पर।
अर्थात् आ, ऐ, और औ वर्ण वृद्धि संज्ञक वर्ण है ।
_
वृद्धिः आत् ऐच् = वृद्धिरादैच्  अचि।

 वृद्धि_स्वर_संधि*
सूत्र :- (वृद्धिरेचि) ।
वृद्धिः आत् ऐच् = वृद्धिरादैच्  अचि।
वृद्धि हो जाती है  आत् ( अ'आ) के  बाद ऐच् (एऐओऔ) से परे अच् ( स्वर) होने पर।
अर्थात् आ, ऐ, और औ वर्ण वृद्धि संज्ञक वर्ण है ।

व्याख्या :- अ या आ के परे यदि ए या ऐ रहे तो (ऐ) और ओ या औ रहे तो (औ) हो जाता है।
१.अ/आ + ए/ऐ =ऐ
२.अ/आ + ओ/औ = औ
यथा :-
अद्यैव = अद्य + एव
मतैक्यम्= मत + ऐक्यम्
पुत्रैषणा = पुत्र + एषणा
सदैव =सदा + एव
तदैव=तदा+एव
वसुधैव= वसुधा + एव
एकैक:= एक + एक:
महैश्वर्यम्= महा + ऐश्वर्यम्
गंगौघ:= गंगा + ओघ:
महौषधि:= महा +औषधि:
महौजः = महा +ओजः *आदि* ।
प्रश्न - वृद्धि स्वर सन्धि  किसे कहते  हैं ? उदाहरण सहित समझाइए । 
उत्तर- यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'ए' या 'ऐ' रहे तो 'ऐ'  एवं  'ओ' और 'औ' रहे तो 'औ' बन जाता है ।  इसे वृध्दि स्वर सन्धि कहते हैं ।  जैसे -

अ + ए  = ऐ
अ + ऐ = ऐ
आ + ए  = ऐ
आ + ऐ  = ऐ
अ  + ओ = औ
आ + ओ = औ
अ + औ = औ
आ + औ = औ

वृद्धि स्वर संधि के नियम
( अ + ए  = ऐ ) 
एक + एक  =  एकैक   
( अ + ऐ = ऐ )      
मत + ऐक्य  = मतैक्य 
हित + ऐषी = हितैषी 
 ( आ + ए  = ऐ ) 
तथा + एव  = तथैव         
सदा  + एव  = सदैव 
वसुधा +एव = वसुधैव   
( आ + ऐ  = ऐ )       
महा + ऐश्वर्य  = महैश्वर्य  
( अ  + ओ = औ ) 
दन्त + ओष्ठ = दँतौष्ठ 
वन + ओषधि = वनौषधि
परम + ओषधि = परमौषधि   
( आ + ओ = औ )   
महा + ओषधि  = महौषधि  
गंगा + ओध = गंगौध 
महा + ओज  = महौज 
( आ + औ = औ ) 
महा + औषध   = महौषध   ।

_____   
यण् सन्धिसम्प्रसारण संज्ञा सूत्र—इग्यणः सम्प्रसारणम्  ( 1/1/45 )
यण_संधि 
3- सम्प्रसारण संज्ञा 
सूत्र—इग्यणः सम्प्रसारणम् ( 1/1/45 )
सूत्रार्थ—यण् का अर्थात् य,र,ल,व के स्थान पर इक् अर्थात् इ,उ,ऋ,लृ हो जाना सम्प्रसारण कहलाता है ।

जहाँ-जहाँ भी सम्प्रसारण का उच्चारण हो , वहाँ-वहाँ यण् के स्थान पर इक् होना समझा जाय।

उदाहरण— वच् धातु   में 'व'  वर्ण का सम्प्रसारण उ' होकर रूप "उक्त" बना।
 (वच्+रक्त= उक्त)
 (यज् + क्त =  इष्ट)
 (वह् + क्त= ऊढ़)
उदाहरण— वच् धातु   में 'व'  वर्ण का सम्प्रसारण उ' होकर रूप "उक्त" बना।
 (यज्+क्त=इष्ट)
(वच्+रक्त= उक्त)
 (वह् + क्त= ऊढ़)
वह-प्रापणे ज्ञानार्थत्वात्  कर्त्तरि क्त (वह् +क्त)

*सूत्र:- इको_यणचि।*
*इक्- इ, उ ,ऋ ,लृ*
| | | |
*यण्- य, व ,र , ल*
*व्यख्या:-*
(क) इ, ई के आगे कोई विजातीय (असमान) स्वर होने पर इ /ई का ‘य्’ हो जाता है।
#यथा:-
यदि + अपि = यद्यपि,
इति + आदि:= इत्यादि:
प्रति +एकम् = प्रत्येकं 
नदी + अर्पणम् = नद्यर्पणम्
वि + आसः = व्यासः
देवी + आगमनम् = देव्यागमनम्।
(ख) उ, ऊ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर उ/ ऊ का ‘व्’ हो जाता है।
यथा:-
अनु + अय:= अन्वय:
सु + आगतम् = स्वागतम्
अनु + एषणम् = अन्वेषणम्
(ग) ‘ऋ’ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर ऋ का ‘र्’ हो जाता है।
यथा:-
मातृ+आदेशः = मात्रादेशः
पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा
धातृ + अंशः = धात्रंशः
(घ) लृ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर लृ का 'ल'हो जाता है ।
यथा:- लृ +आकृति:=लाकृतिः *आदि।*

प्रश्न - यण  स्वर संधि किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित समझाइए । 
उत्तर - यदि 'इ' या 'ई', 'उ' या 'ऊ'  और ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आये तो 'इ' और 'ई' का 'य' , 'उ' और 'ऊ' का 'व'  तथा ऋ का 'र' हो जाता है । इसे यण स्वर संधि कहते हैं । 

 + अ = य
इ + आ = या
इ + ए  = ये
इ + उ  = यु
 + आ = या
इ + ऊ  = यू 
  +    = यै
उ + अ  = व
उ + आ  = वा
 + आ  = वा
उ + ई   = वी 
उ + इ    = वि
   +     = वे
  +    = वै 
ऋ  + अ  = 
ऋ + आ = रा
ऋ  + इ   = रि


यण स्वर संधि के कुछ नियम
जैसे -
( इ + अ = य )
यदि + अपि = यद्यपि 
वि +अर्थ = व्यर्थ 
आदि + अन्त = आद्यंत 
अति +अन्त = अत्यन्त 
अति + अधिक = अत्यधिक 
अभि + अभागत = अभ्यागत 
गति + अवरोध = गत्यवरोध 
ध्वनि + अर्थ = ध्वन्यर्थ 
( इ + ए  = ये )  
प्रति + एक  = प्रत्येक 
(इ +आ = या  )         
अति + आवश्यक  = अत्यावश्यक 
वि + आपक = व्यापक   
वि + आप्त = व्याप्त
वि+आकुल = व्याकुल 
वि+आयाम = व्यायाम 
वि + आधि  = व्याधि 
वि+ आघात = व्याघात 
अति +आचार = अत्याचार  
इति + आदि = इत्यादि 
गति + आत्मकता  = गत्यात्मकता 
ध्वनि + आत्मक = ध्वन्यात्मक 
(ई +आ = या  ) 
सखी + आगमन = सख्यागमन      
 ( इ + उ  = यु  ) 
अति + उत्तम  = अत्युत्तम 
वि + उत्पत्ति = व्युत्पत्ति
अभि + उदय = अभ्युदय 
ऊपरि + उक्त = उपर्युक्त 
प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर  
 ( इ + ऊ  = यू  )  
वि + ऊह = व्यूह  
नि + ऊन = न्यून 
 ( ई  + ऐ   = यै ) 
देवी + ऐश्वर्य = देव्यैश्वर्य    
( उ + अ  = व ) 
अनु + अव  = अन्वय  
मनु + अन्तर  = मन्वन्तर   
सु + अल्प = स्वल्प 
सु + अच्छ = स्वच्छ          
 ( उ + आ  = वा ) 
सु   + आगत   = स्वागत       
मधु + आचार्य  = मध्वाचार्य 
मधु + आसव  = मध्वासव 
लघु + आहार = लघ्वाहार 
( उ + इ    = वि ) 
अनु + इति  = अन्विति 
( उ + ई   = वी  ) 
अनु + वीक्षण = अनुवीक्षण 
 ( ऊ + आ  = वा ) 
वधू +आगमन = वध्वागमन
 ( उ   + ए    = वे ) 
अनु + एषण = अन्वेषण 
 ( ऊ  + ऐ   = वै ) 
वधू +ऐश्वर्य = वध्वैश्वर्य 
( ऋ  + अ  = र ) 
पितृ +अनुमति = पित्रनुमति 
( ऋ  + आ  = रा ) 
मातृ  + आनंद  = मात्रानन्द 
मातृ + आज्ञा = मात्राज्ञा  
 ( ऋ  + इ   = रि ) 
मातृ + इच्छा = मात्रिच्छा  ।
_
अयादि सन्धि -अयादि_सन्धि: -
सूत्र:-एचोऽयवायावः।
व्याख्या:-*ए, ऐ, ओ, औ के परे अन्य किसी स्वर के मेल पर ‘ए’ के स्थान पर ‘अय्’; ‘ऐ’ के स्थान
पर ‘आय्’; ओ के स्थान पर ‘अव्’ तथा ‘औ’ के स्थान पर ‘आव्’ हो जाता है ।
_______
ए ऐ ओ औ।
| | | |
अय् आय् अव् आव्
____
         -🌿★-🌿 

🌿 *उदाहरणानि :-*
शे + अनम् = शयनम् - (ए + अ = अय् +अ)
ने + अनम् = नयनम् - (ए + अ = अय्+अ)
चे + अनम् = चयनम् - (ए + अ = अय्अ)
शे + आनम् = शयानम् - (ए + आ = अय्अ)
नै + अक: = नायक: - (ऐ + अ = आय्अ)
गै + अक: = गायक: - (ऐ + अ = आय्अ)
गै + इका = गायिका - (ऐ + इ = आय्अ)
पो + अनम् = पवनम् - (ओ + अ = अव्अ)
भो + अनम् =भवनम् - (ओ + अ = अव्अ)
पो + इत्र: = पवित्रः - ( ओ + इ = अव्इ)
पौ + अक: = पावक: - (औ + अ = आव्अ)
शौ + अक: = शावक: - (औ + अ = आव्अ)
भौ + उक: = भावुकः - (औ +उ= आव् उ)
धौ + अक: = धावक: - (औ + अ = आव्अ)
आदि ।
प्रश्न - अयादि संधि किसे कहते हैं ? उदहारण सहित समझाइए । 
उत्तर - यदि 'ए' 'ऐ' 'ओ' 'औ' के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो 'ए' का 'अय्', 'ऐ' का 'आय्' , 'ओ' का अव्  तथा 'औ' का 'आव्' हो जाता है । इस परिवर्तन को अयादि सन्धि कहते हैं । 

 ए  + अ  = अय्
ऐ + अ = आय् 
ऐ  + इ   = आयि
ओ  + अ  = अव् 
ओ  + इ  = अव्
ओ + ई  = अवी
औ + अ  = आव्
औ + इ   = आवि
औ + उ  = आवु

अयादि स्वर संधि के कुछ नियम
जैसे - 
( ए  + अ  =अय) 
ने + अन  =  नयन 
शे +अन = शयन   
( ऐ  + अ  = आय )       
नै  + अक  = नायक  
शै +अक = शायक 
गै + अक = गायक 
गै + अन = गायन  
 ( ऐ  + इ   = आयि  ) 
नै + इका = नायिका 
गै + इका = गायिका      
( ओ  + अ  = अव ) 
पो + अन   = पवन          
भो + अन = भवन 
श्रो + अन = श्रवण 
भो + अति = भवति 
( ओ  + इ  = अव ) 
पो + इत्र = पवित्र  
( ओ + ई  = अवी  ) 
गो  + ईश  = गवीश 
( औ + अ  = आव ) 
सौ  + अन   =  सावन      
रौ + अन = रावण 
सौ + अक = शावक 
श्रौ अन = श्रावण 
धौ + अक = धावक 
पौ + अक = पावक 
पौ + अन = पावन
शौ + अक = शावक 
( औ + इ   = आवि ) 
नौ + इक = नाविक 
( औ + उ  = आवु ) 
भौ + उक = भावुक 

___________
पूर्वरूप सन्धि — एङ: पदान्तादति)- संस्कृत व्याकरणम्
एङ पदान्तादति) होता है। यह  स्वर संधि के भागो में से एक है। 

सौ+अन् =स्+अ+ (अ+व-ओ)+अन्= साव् +अन्-सावन यहाँ भी गुण सन्धि का ही  प्रभाव है 
  नियम-
नियम - पद( क्रिया पद आख्यातिक) अथवा नामिकपद के अन्त में अगर "ए" अथवा "ओ" हो और उसके परे 'अकार' हो तो उस अकार का लोप हो जाता है। लोप होने पर अकार का जो चिन्ह रहता है उसे ( ऽ ) 'लुप्ताकार' या 'अवग्रह' कहते हैं; वह लग जाता है ।
पूर्वरूप  संधि के उदाहरण
ए / ओ + अकार = ऽ --> कवे + अवेहि = कवेऽवेहि
ए / ओ + अकार = ऽ --> प्रभो + अनुग्रहण = प्रभोऽनुग्रहण
ए / ओ + अकार = ऽ --> लोको + अयम् = लोकोSयम् 
ए / ओ + अकार = ऽ --> हरे + अत्र = हरेSत्र

(यह सन्धि आयदि सन्धि का अपवाद भी होती है)।
क्योंकि यहाँ केवल पदान्तों की सन्धि का विधान है    जबकि अयादि में धातु अथवा उपसर्ग आदि अपद रूपों के अन्त में अयादि सन्धि का विधान है ।

 नामिकपदरूप- बालके+ सर्वनामपदरूप-अस्मिन् =बालकेऽस्मिन्
जबकि निम्न सन्धियों में अपद(धातु और प्रत्यय रूप होने से पूर्व रूप सन्धि नहीं हुई है।        
धातु रूप -ने  + प्रत्यय रूप-अनम् =नयनम्
धातु रूप -सौ  + प्रत्यय रूप- अन्   = सावन      
धातु रूप -रौ +  प्रत्यय रूप- अन् = रावण 
धातु रूप - सौ +प्रत्यय रूप- अक: = शावक: 
धातु रूप - श्रौ प्रत्यय रूप- अन् = श्रावण 
धातु रूप - धौ + प्रत्यय रूप-  अक: = धावक: 
धातु रूप - पौ +  प्रत्यय रूप- अक := पावक: 
धातु रूप - पौ + प्रत्यय रूप-  अन् = पावन
धातु रूप -शौ +. प्रत्यय रूप- अक: = शावक: 
__
यदि यहाँ पदों की सन्धि नहीं होती तो पूर्वरूप का विधान ही होगा। क्यों कि 'धातु और 'प्रत्यय अथवा उपसर्ग पद नहीं होते हैं । विशेषत: सन्धि का आधार पूर्व पद ही है क्यों कि -
_____
 यहाँ दोनों पद हैं ।
१-तौ+आगच्छताम्=वे दोनों आयें।
=तावागच्छताम् 
______
२-बालको + अवदत् -बालक बोला।
=बालकोऽवदत् 
_____
★-स:+अथ।
सोऽथ -वह अब।
★-सोऽहम्-वह  मैं हूँ।
पूर्वरूप सन्धि केवल पदान्त में  'एकार अथवा 'ओकार होने पर ही होती है । अन्यथा नहीं -
_____

विशेष -धातुओं से ल्युट् प्रत्यय जोड़ा जाता है। इसका ‘यु’ भाग शेष रह है तथा ‘ल’ और ‘ट्’ का लोप हो जाता है। ‘यु’ के स्थान पर ‘अन’ आदेश हो जाता है। ‘अन’ ही धातुओं के साथ जुड़ता है। (कृत् प्रत्यय) ल्युट् – प्रत्ययान्त शब्द’ प्रायः नपुंसकलिङ्ग में होते हैं
__
पूर्वरूप संधि के हरे+ ए=हरये(ए+ए) अ+इ=ए+ अ+इ वस्तुत: यहाँ गुण सन्धि का ही प्रभाव है ।

हरे+ ए=हरये(ए+ए) अ+इ=ए+ अ+इ वस्तुत: यहाँ गुण सन्धि का ही प्रभाव है ।

सौ+अन् =स्+अ+ (अ+व-ओ)+अन्= साव् +अन्-सावन यहाँ भी गुण सन्धि का ही  प्रभाव है

सौ+अन् =स्+अ+ (अ+व-ओ)+अन्= साव् +अन्-सावन यहाँ भी गुण सन्धि का ही  प्रभाव है 

___________
पररूप सन्धि-एडि पररूपम्, संस्कृत व्याकरण--

इस पृष्ठ पर हम पररूप संधि का विश्लेषण करेंगे !
पररूप संधि के नियम
नियम -  यदि उपसर्ग के अन्त में"अ" अथवा "आ" हो और उसके परे 'एकार/ओकार' हो तो उस उपसर्ग के अ' आकार विलय निर्विकार रूप से  क्रिया के आदि में होता  है। 
पररूप संधि के उदाहरण
प्र + एजते = प्रेजते 
उप + एषते = उपेषते 
परा + ओहति = परोहति 
प्र + ओषति = प्रोषति 
उप + एहि = उपेहि

यह संधि -वृद्धि संधि का अपवाद भी होती है।
क्योंकि यहाँ पूर्व पद में उपसर्ग और उत्तर पद में क्रियापद होता है ।

जबकि वृद्धि सन्धि में केवल प्र उपसर्ग के पश्चात ऋच्छति = में (प्र+ऋ) प्रार्च्छति।  उप+ ऋ)-उपार्च्छति यहाँ पर रूप सन्धि का पूर्व पद उपसर्ग होते हुए भी वृद्धि सन्धि हो जाती है ।

पर रूप सन्धि केवल अकारान्त उपसर्ग होने पर केवल ए-आदि अथवा ओ-आदि क्रिया पदों में ही होती है । अन्यथा वृद्धि सन्धि होगी।
 जैसे प्र+एजते= प्रेजते। उप +ओषति=उपोषति। आदि रूप में पर रूप सन्धि ही है ।
मम+एव=ममैव। (प्र+ऋच्छति)= प्रार्च्छति।

जबकि पूर्वरूप सन्धि का विधान अपदान्त रूपों में ही होता है । और वह भी दो ह्रस्व अ' स्वरों के मध्य में विसर्ग (:) आने पर पूर्व स्वर को ओ' और पश्चात्‌ 
(ऽ) ये प्रश्लेष चिन्ह लगता है ।
___
 प्रकृतिभाव-सन्धि-सूत्र –( ईदूदेेद् -द्विवचनम् प्रगृह्यम्)-
. प्रकृति भाव सन्धि –
सूत्र –( ईदूदेेद् द्विवचनम् प्रगृह्यम्)
ईकारान्त, ऊकारान्त, एकारान्त द्विवचन से परे कोई भी अच् हो तो वहां सन्धि नहीं होती।
मुनी + इमौ = मुनीइमौ
कवी + आगतौ = कवीआगतौ
लते + इमे = लतेइमे
विष्णू + इमौ = विष्णूइमौ
अमू + अश्नीतः = अमूअश्नीतः
कवी + आगच्छतः = कवीआगच्छतः
नेत्रे + आमृशति = नेत्रेआमृशति
वटू + उच्छलतः = वटूउच्छलतः

स्वर संधि - अच् संधि
दीर्घ संधि - अक: सवर्णे दीर्घ:
गुण संधि - आद्गुण:
वृद्धि संधि - वृद्धिरेचि
यण् संधि - इकोऽयणचि
अयादि संधि - एचोऽयवायाव:
पूर्वरूप संधि - एडः पदान्तादति
पररूप संधि - एडि पररूपम्
प्रकृति भाव संधि - ईद्ऊद्ऐद द्विवचनम् प्रग्रह्यम्
_____

💐वृत्ति अनचि च  8|4|47
अच् परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि। इति धकारस्य द्वित्व।

अर्थ–अच् -(अ'इ'उ'ऋ'ऌ'ए'ऐ'ओ'औ) से परे यर्—( अन्त:स्थ-यवरल तथा अनुनासिक' वर्ग के प्रथम' द्वितीय'तृतीय'चतुर्थ और उष्म वर्ण)  प्रत्याहार का विकल्प से द्वित्व हो जाता है
यर्(य,व,र,ञ्,म्,ङ्,ण्,न्,झ,भ,घ,ढ,ध,ज,ब,ग,ड,द,ख,फ,छ,ठ,थ,च,ट,त,क,प,श,ष,स) प्रत्याहार हो तो विकल्प से द्वित्व हो जाता है-
 💐★-•परन्तु यदि यर् प्रत्याहार से परे अक् (अ,इ,उ,ऋ,लृ,) प्रत्याहार हो तो द्वित्व नहीं होता है।
  💐- कृष्णः" इत्यत्र ऋकारात् परः यर्-वर्णः षकारः अस्ति । तस्मात् परः स्वरः नास्ति, अतः षकारस्य अनेन सूत्रेण विकल्पेन द्वित्वं भवितुं शक्यते । यथा - कृष्ष्णः ।

सूत्रच्छेदः—अनचि (सप्तम्येकवचनम्) , च (अव्ययम्)अनुवृत्तिःवा  8|4|45 (अव्ययम्) , यरः  8|4|45 (षष्ठ्येकवचनम्) , द्वे  8|4|46 (प्रथमाद्विवचनम्) , अचः  8|4|46 (पञ्चम्येकवचनम्)अधिकारःपूर्वत्रासिद्धम्  8|2|1> संहितायाम्  8|2|108
सम्पूर्णसूत्र-अचः यरः अनचि द्वे वा संहितायाम्

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सम्पूर्णसूत्रम्अचः यरः अनचि द्वे वा संहितायाम्
अनुवृत्तिःवा  8|4|45 (अव्ययम्) , यरः  8|4|45 (षष्ठ्येकवचनम्) , द्वे  8|4|46 (प्रथमाद्विवचनम्) , अचः  8|4|46 (पञ्चम्येकवचनम्)
अधिकारःपूर्वत्रासिद्धम्  8|2|1> संहितायाम्  8|2|108
सम्पूर्णसूत्रम्अचः यरः अनचि द्वे वा संहितायाम्
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सूत्रच्छेदःअनचि (सप्तम्येकवचनम्) , च (अव्ययम्)
अनुवृत्तिःवा  8|4|45 (अव्ययम्) , यरः  8|4|45 (षष्ठ्येकवचनम्) , द्वे  8|4|46 (प्रथमाद्विवचनम्) , अचः  8|4|46 (पञ्चम्येकवचनम्)
अधिकारःपूर्वत्रासिद्धम्  8|2|1> संहितायाम्  8|2|108
सम्पूर्णसूत्रम्अचः यरः अनचि द्वे वा संहितायाम्
सूत्रार्थः
अचः परस्य यरः अनचि परे विकल्पेन द्वित्वं भवति ।

"अनच्" इत्युक्ते "न अच्" । स्वरात् परस्य यर्-वर्णस्य अग्रे स्वरः नास्ति चेत् विकल्पेन द्वित्वं भवति इत्यर्थः । यथा -👇

वृत्ति:-अच: परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि। इति धकारस्य द्वित्वम्।
अर्थ:- अच् से परे
__
यर्(य,व,र,ञ्,म्,ङ्,ण्,न्,झ,भ,घ,ढ,ध,ज,ब,ग,ड,द,ख,फ,छ,ठ,थ,च,ट,त,क,प,श,ष,स) प्रत्याहार हो तो विकल्प से द्वित्व हो जाता है- परन्तु यदि यर् प्रत्याहार से परे अक् (अ,इ,उ,ऋ,लृ,) प्रत्याहार हो तो द्वित्व नहीं होता है।

(1) "कृष्णः" इत्यत्र ऋकारात् परः यर्-वर्णः षकारः अस्ति । तस्मात् परः स्वरः नास्ति, अतः षकारस्य अनेन सूत्रेण विकल्पेन द्वित्वं भवितुं शक्यते । यथा - कृष्ष्णः ।

2) "मति + अत्र" अस्मिन् यण्-सन्धौ इकारस्य यणादेशे कृते "मत्य् + अत्र" इति स्थिते अनेन सूत्रेण तकारस्य विकल्पेन द्वित्वं कृत्वा "मत्यत्र, मत्त्यत्र" एते द्वे रूपे सिद्ध्यतः ।

अत्र वार्त्तिकत्रयम् ज्ञातव्यम् 

यणो मयो द्वे वाच्ये । अस्य वार्त्तिकस्य अर्थद्वयम् भवति -
अ) (यणः इति पञ्चमी, मयः इति षष्ठी इति स्वीकृत्य) - यण्-वर्णात् परस्य मय्-वर्णस्य विकल्पेन द्वित्वं भवति । यथा - उल्क्का, वाल्म्मिकी ।

(ब) (यणः इति षष्ठी , मयः इति पञ्चमी इति स्वीकृत्य) - मय्-वर्णात् परस्य यण्-वर्णस्य विकल्पेन द्वित्वं भवति । यथा - दध्य्यत्र, मध्व्वत्र ।

(2) शरः खयः द्वे वाच्ये । अस्यापि वार्त्तिकस्य अर्थद्वयम् भवति -
अ) (शरः इति पञ्चमी, खयः इति षष्ठी इति स्वीकृत्य) - शर्-वर्णात् परस्य खय्-वर्णस्य विकल्पेन द्वित्वं भवति । यथा - स्थ्थाली, स्थ्थाता ।
ब) (शरः इति षष्ठी , खयः इति पञ्चमी इति स्वीकृत्य) - खय्-वर्णात् परस्य शर्-वर्णस्य विकल्पेन द्वित्वं भवति । यथा - क्ष्षीरम्, अप्स्सरा ।

अवसाने च - अवसाने परे हल्-वर्णस्य विकल्पेन द्वित्वम् भवति । यथा - रामात्, रामात्त् ।

ज्ञातव्यम् -
1. अस्मिन् सूत्रे निर्दिष्टः स्थानी "यर्" वर्णः अस्ति । यर्-प्रत्याहारे हकारम् विहाय अन्यानि सर्वाणि व्यञ्जनानि समावेश्यन्ते । अतः हकारस्य अनेन सूत्रेण द्वित्वं न विधीयते ।

2. यर्-प्रत्याहारे वस्तुतः रेफः समाविष्टः अस्ति, परन्तु अचो रहाभ्यां द्वे 8|4|46 अचः परः रेफः आगच्छति चेत् तस्मात् परस्य यर्-वर्णस्य द्वित्वं भवति । अतः अचः परस्य रेफस्य अपि अनेन सूत्रेण द्वित्वं न विधीयते ।
3. एकस्य वर्णस्य स्थाने यदा वर्णद्वयं विधीयते, तदा द्वित्वं भवति इति उच्यते । तत्र कोऽपि वर्णः "पूर्ववर्णः" तथा कोऽपि वर्णः "अनन्तरम् आगतः" नास्ति । अतः द्वित्वे कृते "नूतनरूपेण प्रवर्तितः वर्णः कः" तथा "पूर्वं विद्यमानः वर्णः कः" इति प्रश्नः एव अयुक्तः अस्ति । द्वित्व

4. "कृष्ष्ण" इत्यत्र पुनः अनचि च 8|4|47 इत्यनेन षकारस्य द्वित्वं कर्तुम् शक्यते वा? एवं कुर्मश्चेत् अनन्तकालयावत् द्वित्त्वमेव भवेत् इति दोषः उद्भवति । अस्य परिहारार्थम् लक्ष्ये लक्षं सकृदेव प्रवर्तते

अस्याः परिभाषायाः प्रयोगः क्रियते । "लक्ष्य" इत्युक्ते स्थानी । "लक्ष" इत्युक्ते सूत्रम् । "सकृतम्" इत्युक्ते एकवारम् । अतः अनया परिभाषया एतत् ज्ञायते, यत् एकस्मिन् स्थले (इत्युक्ते एकस्य स्थानिनः विषये) कस्यचन सूत्रस्य एकवारमेव प्रयोगः भवितुम् अर्हति । अतःअनचि च 8|4|47 इत्यनेन एकवारं द्वित्वं भवति चेत् पुनः तस्मिन् एव स्थानिनि अनेन सूत्रेण द्वित्वं न भवति ।

काशिकावृत्तिः
अचः इति वर्तते, यरः इति च। अनच्परस्य अच उत्तरस्य यरो द्वे वा भवतः। दद्ध्यत्र। मद्ध्वत्र। अचः इत्येव, स्मितम्। ध्मातम्।

यणो मयो द्वे भवत इति वक्तव्यम्। केचिदत्र यणः इति पञ्चमी, मयः इति षष्ठी इति व्याचक्षते। तेषाम् उल्क्का, वल्म्मीकः इत्युदाहरणम्। अपरे तु मयः इति पञ्चमी, यणः इति षष्ठी इति। तेषाम् दध्य्यत्र, मध्व्वत्र इत्युदाहरणम्। शरः खयो द्वे भवत इति वक्तव्यम्। अत्र अपि यदि शरः इति पञ्चमी, खयः इति षष्ठी, तदा स्त्थाली, स्त्थाता इति उदाहरणम्। अथवा खय उत्तरस्य शरो द्वे भवतः। वत्स्सः। इक्ष्षुः। क्ष्षीरम्। अप्स्सराः। अवसाने च यरो द्वे भवत इति वक्तव्यम्। वाक्क, वाक्। त्वक्क्, त्वक्। षट्ट्, षट्। तत्त्, तत्।

अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि। इति धकारस्य द्वित्वेन सुध्ध्य् उपास्य इति जाते॥
महाभाष्यम्
अनचि च ।। द्विर्वचने यणो मयः।। द्विर्वचने यणो मय इति वक्तव्यम्।। किमुदाहरणम्?।। यदि यण इति पञ्चमी मय इति षष्ठी उल्क्का वल्म्मीकमित्युदाहरणम्।। अथ मय इति पञ्चमी यण इति षष्ठी दध्य्यत्र मध्व्यत्रेत्युदाहरणम्?।।शरःखयः।। शरःखय इति वक्तव्यम्।। किमुदाहरणम्?।। यदिशर इति पञ्जमीखयःथ्द्य;ति षष्ठी स्थ्थाली स्थ्थाता इत्युदाहरणम्। अथ खय इति पञ्जमी शर इति षष्ठी स्थ्थाली स्थ्थाता इत्युदाहरणम्। अथ खय इति पञ्चमी शर इति षष्ठी, वत्स्स(र)ः क्ष्षीरम् अपस्सरा इत्युदाहरणम्। ।। अवसाने च।। अवसाने च द्वे भवत इति वक्तव्यम्। वाक्क्। वाक्। त्वक्क् त्वक्। स्रुक्क्स्रुक्।। तत्तर्हि वक्तव्यम्?।। न वक्तव्यम्

  नायं प्रसज्यप्रतिषेधः-अचि नेति।। किं तर्हि?।। पर्युदासोऽयं यदन्यदच इति।।

सूत्रच्छेदःवान्तः (प्रथमैकवचनम्) , यि (सप्तम्येकवचनम्) , प्रत्यये (सप्तम्येकवचनम्)
अनुवृत्तिःएचः  6|1|78 (षष्ठ्येकवचनम्)
अधिकारःसंहितायाम्  6|1|72
_______
💐↔👇वान्तो यि प्रत्यय ।।6/1/79।। एचो८यवायावो वान्तो यि प्रत्यय"

 💐↔👇वान्तो यि प्रत्यय ।।6/1/79।। एचोऽयवायावो वान्तो यि प्रत्यय"
सम्पूर्णसूत्रम् एचोयवायावो यि-प्रत्यये वान्तः
संहियाताम्
 
 वृत्ति—

 :-यकारादौ प्रत्यये परे ओदौतोरव् आव् एतौ स्त:। गत्यम् ।नाव्यम् ।
____       
 अर्थ:- यकार आदि प्रत्यय परेे होने पर (ओ' औ )के स्थान पर क्रमश: अव् और आव् आदेश हो जाता है।
जैसे गो+ यम् = गव्यम् । नौ+ यम् = नाव्यम्

सूत्रार्थः-

ओकार-औकारयोः यकारादि-प्रत्यये परे क्रमेण अव्/आव् आदेशाः भवन्ति ।
अर्थ:- यकार आदि प्रत्यय परेे होने पर ओ औ के स्थान पर क्रमश: अव् और आव् आदेश हो जाता है।
जैसे गो+ यम् = गव्यम् । नौ+ यम् = नाव्यम्
सूत्रार्थः-
ओकार-औकारयोः यकारादि-प्रत्यये परे क्रमेण अव्/आव् आदेशाः भवन्ति ।
__
अस्मिन् सूत्रे यद्यपि "एच्" इत्यस्य अनुवृत्तिः क्रियते, तथापि आदेशः "वान्तः" (= वकारान्तः) अस्ति, अतः केवलं ओकार-औकारयोः विषये एव अस्य सूत्रस्य प्रयोगः भवति ।

यदि ओकारात् / औकारात् परः यकारादि-प्रत्ययः आगच्छति, तर्हि ओकारस्य स्थाने अव्-आदेशः तथा औकारस्य स्थाने आव्-आदेशः विधीयते ।

 यथा -
👇

(1) गो + यत् [गोपसोर्यत् 4|3|160 इत्यनेन यत्-प्रत्ययः]
→ गव् + य [वान्तो यि प्रत्यये 6|1|79 इति ओकारस्य अव्-आदेशः]
→ गव्य

(2) नौ + यत् [नौवयोधर्मविषमूल... 4|4|91 इति यत्-प्रत्ययः]
→ नाव् + यत् [वान्तो यि प्रत्यये 6|1|79 इति औकारस्य आव्-आदेशः]
→ नाव्य

(3) बभ्रु + यञ् [मधुबभ्र्वोर्ब्राह्मणकौशिकयोः 4|1|106 इति यञ्-प्रत्ययः]
→ बाभ्रु + यञ् [तद्धितेष्वचामादेः 7|2|117 इति आदिवृद्धिः ]
→ बाभ्रो + यञ् [ओर्गुणः 6|4|146 इत्यनेन गुणः]
→ बाभ्रव् + य [वान्तो यि प्रत्यये 6|1|79 इति ओकारस्य अव्-आदेशः]
→ बाभ्रव्य

अत्र वार्तिकद्वयं ज्ञातव्यम् । एतौ द्वौ अपि वार्तिकौ "यूति" शब्दस्य विषये वदतः । "यूति" इति शब्दः ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च 3|3|97 अनेन सूत्रेण निपात्यते । यद्यपि अयं शब्दः प्रत्ययः नास्ति, "गो + यूति" इत्यत्र कासुचन स्थितिषु गो-शब्दस्य ओकारस्य अवादेशं कृत्वा "गव्यूति" इति रूपं सिद्ध्यति । अस्यैव विषये एते द्वे वार्तिके वदतः -

1. गोर्यूतौ छन्द स्युपसङ्ख्यानम् । इत्युक्ते, वेदेषु "यूति"-शब्दे परे गो-शब्दस्य ओकारस्य स्थाने अव्-इति वान्तादेशः भवति । यथा - "आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्" (ऋग्वेदः - 3.62.16) - अत्र "गव्यूति" इति शब्दः प्रयुक्तः अस्ति । अत्र गव्यूति इत्युक्ते गावः यस्मिन् भूमौ चरन्ति सा ।

2. अध्वपरिमाणे च । इत्युक्ते, मार्गपरिमाणम् (= अन्तरस्य गणना) दर्शयितुम् "गो + युति" इत्यस्य लौकिकसंस्कते अपि वान्तादेशः क्रियते । यथा - "गव्यूतिमात्रम् अध्वानं गतः" (सः केवलं "एकगव्युति" अन्तरं गतवान् - इत्यर्थः । अद्यतनपरिमाणे 4 गव्युतिः = 1 योजनम् = 9.09 miles = 14.6 Km).

ज्ञातव्यम् - "गो + युति" इत्यत्र ओकारस्य अव्-आदेशे कृते लोपः शाकल्यस्य 8|3|19 इत्यनेन प्राप्तः वैकल्पिकः यकारलोपः न भवति । (अस्मिन् विषये भाष्ये किमपि उक्तम् नास्ति । कौमुद्यां दीक्षितः प्रश्लेषस्य आधारं स्वीकृत्य अस्य स्पष्टीकरणं दातुम् प्रयतते । परन्तु अस्मिन् विषये शास्त्रे भिन्नानि मतानि सन्ति ।)
_____ 
An ओकार and an औकार are respectively converted to अव् and आव् when followed by a यकारादि प्रत्यय.
काशिकावृत्तिः

अक्षादूहिन्यामुपसंख्यानम् ।। वार्तिक अक्षौहिणी सैना –
अक्ष शब्द के अन्तिम "अ वर्ण से ऊहिनी शब्द का आदि ऊकार परे होने पर पूर्व तथा पर के स्थान पर वृद्धि का आदेश हो जाता है- ।
तब रूप बनेगा अक्ष+ ऊहिनी =अक्षौहिणी ।

वृत्ति- अच: पराभ्यां रेफ हकाराभ्यां परस्य यस्य यरो द्वे वा स्त: ।गौर्य्यौ।
अर्थ-अच् ( स्वर) से परे जो रेफ या हकार हो उससे परे यर् को विकल्प से द्वित्व होता है- यथा -
गौर्य्यौ–गौर + यो =गौर्यौ । इस विग्रह दशा में गौर की गौ में औ अच् है- ।तथा इससे परे रेफ(र्) है- उससे परे यकार है- ।अत: यकार का विकल्प से द्वित्व होगा।
द्वित्व पक्ष में गौर् +य + र्यौ =गौर्य्यौ रूप बनेगा तथा द्वित्व के अभाव में गोर्यो रूप बनेगा।

💐↔"। वान्तो यि प्रत्यय"

अर्थात्:- यकारादि प्रत्यय परे होने पर 'ओ' औ' के स्थान पर क्रमश:अव् और आव् हो जाता है।

नो + यम् =नाव्यम् ।  इस स्थिति में नो के ओकार को यकारादि  "वान्तो यि प्रत्यये " सूत्र से यम् यकारादि प्रत्यय परे होने से अव् आदेश हुआ।
न्+ ओ+ यम् = परस्पर संयोजन के पश्चात "नव्यम्" रूप बना।

इसी प्रकार नौ + यम् इस स्थिति में नौ के औकार को "वान्तो यि प्रत्यये "सूत्र से यम् यकारादि प्रत्यय परेे होने से आव् आदेश हुआ । परस्पर संयोजन के पश्चात "नाव्यम्" रूप बना।
____
काशिका-वृत्तिः

अचो रहाभ्यां द्वे ८।४।४६

यरः इति वर्तते। अच उत्तरौ यौ रेफहकारौ ताभ्याम् उत्तरस्य यरो द्वे भवतः। अर्क्कः मर्क्कः। ब्रह्म्मा। अपह्न्नुते। अचः इति किम्? किन् ह्नुते। किम् ह्मलयति।
____
लघु-सिद्धान्त-कौमुदी

अचो रहाभ्यां द्वे ६०, ८।४।४५

अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः। गौर्य्यौ। (न समासे)। वाप्यश्वः॥
______
सिद्धान्त-कौमुदी

अचो रहाभ्यां द्वे २६९, ८।४।४५

अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः । हर्य्यनुभवः । नह्य्यस्ति ॥

न्यासः

अचो रहाभ्यां द्वे। , ८।४।४५

"अच उत्तरौ यौ रेफहकारौ" इति। एतेनाच इति रहोर्विशेषणमिति दर्शयति। "आन्यामुत्तरस्य यरः" इति। अनेनापि रहौ यर्विशेषणमिति। "बर्क्कः" इति। "अर्च पूजायाम्()" (धा।प।२०४),धञ्(), "चजोः कुधिण्णयतोः" ७।३।५२ इति कुत्वम्()। "मर्क्कः" इति। मर्चिः सौत्रो दातुः, तस्मात्? इण्()भीकापाशस्यर्तिमर्चिभ्यः कन्()" (द।उ।३।२१) इति कन्(), "चोः कुः" ८।२।३० इति कुत्वम्()। अत्राकारादुत्तरो रेफः, तस्मादपि परः ककारो यरिति। "ब्राहृआ" इति। अत्राप्यकारादेवाच्च उत्तरो हकारः, तस्मादपि परो मकारो यरिति। "अपह्तुते" इति। अत्राप्यकारादुत्तरो हकारः, पूर्ववच्छपो लुक्(), तस्मात्? परस्य नकारस्य द्विर्वचनम्()। "किन्()ह्नुते" इति। अत्राच उत्तरो हकारो न भवतति नकारो न द्विरुच्यते। "किम्()ह्रलयति" इति। "ह्वल ह्रल सञ्चलने" (धा।पा।८०५,८०६), हेतुमण्णिच। "ज्वलह्वलह्रलनमामनुपसर्गाद्वा" ["ज्वलह्नलह्वल"--प्रांउ।पाठः] (धा।पा।८१७ अनन्तरम्()) इति मित्त्वम्(), "मितां ह्यस्वः" ६।४।९२ इति ह्यस्वत्वम्()॥

___
-बाल मनोरमा
अचो रहाभ्यां द्वे ६०, ८।४।४५

अचो रहाभ्यां द्वे। यरोऽनुनासिक इत्यतो यर इति षष्ठ()न्तं वेति चानुवर्तते। अच इति दिग्योगे पञ्चमी। "पराभ्या"मिति शेषः। रहाभ्यामित्यपि पञ्चमी। "परस्ये"ति शेषः। तदाह--अचः पराभ्यामित्यादिना। हय्र्यनुभव इति। हरेरनुभव इति विग्रहः। हरि-अनुभव इति स्थिते रेफादिकारस्य यण्। तस्य द्वित्वम्। अथ हकारात्परस्योदाहरति--न ह्य्यस्तीति। नहि--अस्तीति स्थिते हकारादिकारस्य यण्। तस्य द्वित्वम्। इहोभयत्र यकारस्य अचः परत्वाऽभावादच्परकत्वाच्च द्वित्वमप्राप्तं विधीयते। अत्राऽनचि चेति रेफहकारयोर्द्वित्वं न भवति। द्वित्वप्रकरणे रहाभ्यामिति रेफत्वेन हकारत्वेन च साक्षाच्छ()तेन निमित्तभावेन तयोर्यर्शब्दबोधितकार्यभाक्त्वबाधात्, "श्रुतानुमितयोः श्रुतं बलीय" इति न्यायात्। हर्? य्? य् अनुभवः, नह् य् य् अस्ति इति स्थिते।
______
तत्त्व-बोधिनी

अचो रहाभ्यां द्वे ।।, ८।४।४५

★-अर्थ-अच् ( स्वर) से परे जो रेफ या हकार हो उससे परे यर् को विकल्प से द्वित्व होता है-गौर्य्यौ।
___
वृत्ति- अच: पराभ्यां रेफ हकाराभ्यां परस्य यस्य यरो द्वे वा स्त: ।गौर्य्यौ।
अर्थ-अच् ( स्वर) से परे जो रेफ या हकार हो उससे परे यर् को विकल्प से द्वित्व होता है- यथा -
गौर्य्यौ–गौर + यो =गौर्यौ । इस विग्रह दशा में गौर की गौ में औ अच् है- ।तथा इससे परे रेफ(र्) है- उससे परे यकार है- ।अत: यकार का विकल्प से द्वित्व होगा।
द्वित्व पक्ष में गौर् +य + र्यौ =गौर्य्यौ रूप बनेगा तथा द्वित्व के अभाव में गोर्यो रूप बनेगा।

सूत्रच्छेदःएति-एधति-ऊठ्सु (सप्तमीबहुवचनम्)
अनुवृत्तिःआत्  6|1|87  (पञ्चम्येकवचनम्) , एचि  6|1|88 (सप्तम्येकवचनम्) , वृद्धिः  6|1|88 (प्रथमैकवचनम्)
अधिकारःसंहितायाम्  6|1|72> एकः पूर्वपरयोः  6|1|84
सम्पूर्णसूत्रम् आत् एचि एति-एधति-ऊठ्सु एकः पूर्वपरयोः वृद्धिः
सूत्रार्थः
अवर्णात् परस्य इण्-धातोः एध्-धातोः एच्-वर्णे परे तथा ऊठ्-शब्दे परे पूर्वपरयोः एकः वृद्धि-आदेशः भवति ।
यदि अकारात् / आकारात् परः -
(1) इण्-धातोः एकारादि /ऐकारादि / ओकारादि /औकारादि रूपम् आगच्छति, अथवा
(2) एध्-धातोः एकारादि /ऐकारादि / ओकारादि /औकारादि रूपम् आगच्छति, अथवा
(3) "ऊठ्" अयम् शब्दः आगच्छति, तर्हि -
पूर्वपरयोः स्थाने एकः वृद्धि-एकादेशः भवति ।

उदाहरणानि -

(1) उप + एति → उपैति ।
एत्येधत्यूठ्सु।।6/1/87।।–वृद्धि: एचि एति एधते ' ऊठसु"
वृत्ति-अवर्णादेजाधोरेत्येधत्योरूठि च परे वृद्धिरेकादेश:स्यात्।पररूप गुणापवाद: उपैति।उपैधते।प्रष्ठौह:।।एजाद्यो: किम्?उपेत: ।मा भवान् प्रेदिधत्।
अर्थ-अ वर्ण से परे यदि एच् प्रत्याहार आदि में वाली 'इण्' तथा एड्• धातु हो अथवा ऊठ हो तो पूर्व एवं पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश होता है ।यथा उपैति।उपैधते प्रष्ठौह:।
____
उपैति –उप+ एति इस विग्रह दशा में अ के पश्चात एजादि 'ए' परे है अत: एडि्•पररूपम् से पर रूप होता है परन्तु उसका अपवाद करके ' एत्येधत्यूठसु' इस सूत्र से पूर्व 'अ और 'ए  के स्थान पर 'ऐ वृद्धि होगयी तत्पश्चात परस्पर संयोजन के बाद उपैति सन्धि-का का पद सिद्ध होता है ।

उपैधते–उप+एधते ,इस अवस्थाओं में अ' के पश्चात ए' परे होने के कारण प्राप्त था।
किन्तु उसका बाधन कर 'एत्येधत्यूठसु' सूत्र द्वारा अ+ए के स्थान पर ऐ वृद्धि एकादेश होता है उप–अ+ए+धते=उप +ऐ+धते ।उपैधते ।संयोजन के उपरीन्त हुआ।
__
प्रष्ठौह–प्रष्ठ+ऊह: इस विग्रह दशा में प्रष्ठ में अन्तिम वर्ण अकार है उससे परे ऊह का ऊकार है । अत: इस स्थान पर अ+ ऊ के स्थान पर आद्गुण: प्राप्त था परन्तु उसे बाध कर एत्येधत्यूठसु' सूत्र से अ+ ऊ के स्थान पर औ वृद्धि एकादेश होता है।प्रष्ठ+अ+ऊ+ह: = प्रष्ठ् +औ+ह: परस्पर संयोजन करने पर प्रष्ठौह: सन्धि-का रूप हुआ।

उपसर्गाद् ऋति धातौ।।6/1/91। अर्थात् उपसर्गाद् ऋति परे वृद्धि: एकादेश ।
वृत्ति–अवर्णान्तादुपसर्गाद् ऋकारादौ धातौ परे वृद्धिरेकादेश: स्यात् । प्रार्च्छति । उपार्च्छति

प्रार्च्छति – प्र+ ऋच्छति विग्रह पद  में प्र' उपसर्ग में अ' अन्त में है ।उससे परे ऋ है ।
अत: उपसर्गाद् ऋति परे ऋति धातौ' सूत्र से परे (अ+ऋ+ च्छति ) इस स्थिति में पूर्व एवं पर अ+ऋ=आर् वृद्धि हुई। प् +र् +आर्+ च्छति संयोजन करने पर प्रार्च्छति सन्धि पद सिद्ध होगा ।

अक्षादूहिन्यामुपसंख्यानम्।। वार्तिक
अक्षौहिणी सेना।
अर्थ:-अक्ष शब्द के अन्तिम अ वर्ण से ऊहिनी शब्द का आदि ऊकार परे होने पर पूर्व तथा पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश होता है।
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💐↔टि-स(अपवाद)सूत्र – (‘अचोऽन्त्यादि टि’) 

★-•इसका अर्थ यह है कि पहले वर्ण समुदाय के अंत में जो अच् है, वह दूसरे वर्ण समुदाय की शुरुआत में होने पर उसका लोप (हटा दिया जाता है) हो जाता है। 
सूत्र – (‘अचोऽन्त्यादि टि’  ) इसका अर्थ यह है कि पहले वर्ण समुदाय के अंत में जो अच् है, वह दूसरे वर्ण समुदाय की शुरुआत में होने पर उसका लोप (हटा दिया जाता है) हो जाता है।
शक + अन्धु = शकन्धु (अ का लोप)
पतत् + अञ्जलि = पतञ्जलि (अत् का लोप)
मनस् + ईषा = मनीषा (अस् का लोप)
कर्क + अन्धु = कर्कन्धु (अ का लोप)
सार + अंग = सारंग
सीमा + अन्त = सीमन्त / सीमान्त
हलस् + ईषा = हलीषा
कुल + अटा = कुलटा

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-★-अचोन्तयादि टि।। (1/1/64)
वृत्ति:- अचां मध्ये योन्त्य: स आदिर्यस्य तट्टि संज्ञं स्यात् ।
★•अर्थ :- अचों में जो अन्तिम अच् जिसके आदि में है उसकी टि संज्ञा होती है ।
जैसे - मनस् शब्द का नकार में संपृक्त अ है । यह यकार के पूर्व है अतएव अस् की टि संज्ञा प्रस्तुत सूत्र से होगी ।

(27)अचोन्तयादि टि ।। 1/1/64 ।
वृत्ति:- अचां मध्ये यो ८न्त्य: स आदिर्यस्य तट्टि संज्ञं स्यात् ।
अर्थ :- अचों में जो अन्तिम अच् जिसके आदि में है उसकी टि संज्ञा होती है ।जैसे - मनस् शब्द का नकार में संपृक्त अ है । यह यकार के पूर्व है अतएव अस् की टि संज्ञा प्रस्तुत सूत्र से होगी ।

(28) शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम् ।।वार्तिक।
वृत्ति:- तच्च टे शकन्धु: ।कर्कन्धु: । कुलटा। मनीषा ।आकृतिगणो८यम् ।मार्तण्ड:।
अर्थ:-शकन्धु आदि शब्दों में ( उनकी सिद्धि के अनुरूप) पररूप कहना चाहिए वह पररूप टि ' और अच् ' के स्थान पर समझना चाहिए । यथा

शकन्धु:-शक +अन्धु: । इस विग्रह दशा में शक् शब्द के अन्तिम क में अ' स्वर वर्ण है  वह टि' है तथा अन्धु: का अकार परे है । यहाँ (अ+अ)=अ पररूप प्रस्तुत वार्तिक से हुआ। परस्पर संयोजन करने पर
(शक्+ अ+अ+न्धु: ) शकन्धु: सन्धि पद बनेगा  इसी प्रकार कर्कन्धु: बनेगा ।यह दीर्घ स्वर सन्धि का अपवाद है।

मनीषा:- मनस् +ईषा  इस अवस्था में ' अचो८न्यादि टि ' सूत्र से मनस् की मन् +(अस् ) टि को ईषा के ई के स्थान पर' शकन्ध्वादिषु पररूप वाच्यम् ' वार्तिक से ई पररूप एकादेश होता है ।( मन् + अस् + ई+ई +षा ) परस्पर संयोजन करने पर मनीषा पद बना ।

ओम् च आङ् च ओमाङौ, तयोः ॰ इतरेतरद्वन्द्वः॥

अर्थः॥

ओमि आङि च परतः अवर्णात् पूर्वपरयोः स्थाने पररूपमेकादेशः भवति, संहितायां विषये॥


💐↔


कन्या + ओम् = कन्योम् इत्यवोचत्। आ + ऊढा = ओढा, अद्य + ओढा = अद्योढा, कदोढा, तदोढा॥
___
काशिका-वृत्तिः

ओमाङोश् च ६।१।९५

आतित्येव। अवर्णान्तातोमि आङि च परतः पूर्वपरयोः स्थाने पररूपम् एकादेशो भवति। का ओम् इत्यवोचत्, कोम् इत्यवोचत्। योम् इत्यवोचत्। आगि खल्वपि आ ऊढा ओढा। अद्य ओढा अद्योढा। कदा ओढा कदोढा। तदा ओढा तदोढा। वृद्धिरेचि ६।१।८५ इत्यस्य पवादः। इह तु आ ऋश्यातर्श्यात्, अद्य अर्श्यातद्यर्श्यातिति अकः सवर्णे दीर्घत्वं बाधते।
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लघु-सिद्धान्त-कौमुदी

ओमाङोश्च ४०, ६।१।९२

ओमि आङि चात्परे पररूपमेकादेशः स्यात्। शिवायोंं नमः। शिव एहि॥
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सिद्धान्त-कौमुदी

ओमाङोश्च ४०, ६।१।९२

ओमि आङि चात्परे पररूपमेकादेशः स्यात् । शिवायों नमः । शिव एहि । शिवेहि ॥

________
अचो रहाभ्याम् द्वे ।।8/4/46 ।।   
अचो रहाभ्याम् द्वे ।।8/4/46 ।वृत्ति–अच्  पराभ्यां रेफ हकाराभ्यां परस्य यस्य यरो द्वे वा स्त: । गौर्यौ ।आर्य्य ।।
👇↔ अच् ( स्वर)से परे जो रेफ या हकार हो उससे परे यर् को विकल्प से द्वित्व होता  है।
यथा :-गौर+ यो  इस विग्रह दशा में -गौर  की गौ में औ अच् है- तथा परे रेफ(र्) इससे परे यकार है- इसलिए यकार को विकल्प से द्वित्व होगा।
द्वितीय पक्ष में गौर्+ य+र्यौ= गौर्य्यौ रूप बनेगा तथा द्वित्व के अभाव में गोर्यो रूप बनेगा।
💐↔ 
👇वृत्ति–अच्  पराभ्यां रेफ हकाराभ्यां परस्य यस्य यरो द्वे वा स्त: । गौर्यौ ।आर्य्य ।
👇↔ अच् ( स्वर)से परे जो रेफ या हकार हो उससे परे यर् को विकल्प से द्वित्व होता  है।
यथा :-गौर+ यो  इस विग्रह दशा में -गौर  की गौ में औ अच् है- तथा परे रेफ(र्) इससे परे यकार है- इसलिए यकार को विकल्प से द्वित्व होगा।
द्वितीय पक्ष में गौर्+ य+र्यौ= गौर्य्यौ रूप बनेगा तथा द्वित्व के अभाव में गोर्यो रूप बनेगा।

💐↔

 अचः किम्? "ह्लुते" इत्यादौ नकारस्य माभूत्।

8|4|44   SK 112  शात्‌  
सूत्रच्छेदःशात् (पञ्चम्येकवचनम्)
अनुवृत्तिःश्चुः  8|4|40 (प्रथमैकवचनम्) , न  8|4|42 (अव्ययम्) , तोः  8|4|43 (षष्ठ्येकवचनम्)

अधिकारःपूर्वत्रासिद्धम्  8|2|1> संहितायाम्  8|2|108
सम्पूर्णसूत्रम्शात् तोः श्चुः न
सूत्रार्थः
शकारात् परस्य तवर्गीयवर्णस्य श्चुत्वम् न भवति ।
शकारात् परः तवर्गीयवर्णः आगच्छति चेत् स्तोः श्चुना श्चुः 8|4|41 इत्यनेन निर्दिष्टस्य श्चुत्वस्य अनेन सूत्रेण निषेधः उच्यते ।
यथा - प्रच्छँ (ज्ञीप्सायाम्) धातोः यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ् 3|3|90 अनेन नङ्-प्रत्ययः भवति -
प्रच्छ् + नङ्
→ प्रश् + न [च्छ्वोः शूडनुनासिके च 6|4|19 इति च्छ्-इत्यस्य नकारादेशः]
→ प्रश्न । श्चुना
यह श्चुत्व सन्धि-का अपवाद है- ।

___
अयोगवाह-
अक्षरसमाम्नायसूत्रेषु “अइउण्” इत्यादिषु चतुर्दशसु नास्ति योगः इति अयोग पाठादिरूपः संबन्धो येषां ते तथापि वाहयन्ति षत्वणत्वादिकार्य्यादिकं निष्पादयन्ति वाहेः अच् कर्म्मधारय अयोगवाहअनुस्वारो विसर्गश्च + कँपौ चैव पराश्रितौ । अयोगवाहाविज्ञेया” इति शिक्षाकृदुपदिष्टेषु अनुस्वारविसर्गादिषु ...

जिनका  चौदह माहेश्वर-सूत्रो में योग नहीं है वह फिर भी वहन करते हैं षत्व' णत्व'आदि कार्यों को पूरा करता है अथवा(वाह् + अच्)= वाह करता है 
वह अयोह वाह है ।
______
वह वर्ण जिनका पाठ अक्षरसमाम्नाय सूत्र में नहीं है । विशेषत:—ये किसी किसी के मत से अनुस्वार, विसर्ग जिह्वामूलीयस्य :क   :ख   :प   :फ   ये छै: वर्ण हैं ।अनुस्वार विसर्ग के अतिरिक्त जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय भी अयोगवाह है ।
__________

व्यञ्जन-सन्धि का विधान
व्यञ्जन सन्धि -
प्रतिपादन -💐↔👇
शात् ८।४।४४ ।।
वृत्तिः-शात्‌ परस्य तवर्गस्य श्चुत्वं न स्यात्।।
विश्न: । प्रश्न।
व्याख्यायित :-शकार के परवर्ती तवर्ग के स्थान पर चवर्ग नहीं होता है ।
आशय यह कि शकार (श्  वर्ण) से परे तवर्ग ( त थ द ध न ) के स्थान पर स्तो: श्चुनाश्चु: से जो चवर्ग हो सकता है- वह इस सूत्र शात्‌ के कारण नहीं होगा।
अत: यह सूत्र " श्चुत्वं विधि का अपवाद " है-।
__________
काशिका-वृत्तिः
शात् ८।४।४४
तोः इति वर्तते। शकारादुत्तरस्य तवर्गस्य यदुक्तं तन् न भवति। प्रश्नः। विश्नः।
न्यासः
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💐↔शात् ६३/ ८/४४३ 
"विश्नः, प्रश्नः" इति।
"विच्छ गतौ" (धा।पा।१४२३) "प्रच्छ ज्ञीप्सायाम्()" (धा।पा।१४१३), पूर्ववन्नङ्(), "च्छ्वोः शूडनुनासिके च" ६।४।१९ इति च्छकारस्य शकारः। यद्यपि

प्रश्ने चासन्नकाले" ३।२।११७ इति निपतनादेव शात्परस्य तदर्गस्य चुत्वं न भवतीत्यैषोऽर्थो लभ्यते, तथापि मन्दधियां प्रतिपत्तिगौरवपरीहारार्थमिदमारभ्यते। अथ वा"अवाधकान्यपि निपातनानि भवन्ति"
(पु।प।वृ।१९) इत्युक्तम्()।
___________
यद्येतन्नारभ्यते, प्रश्ञः, विश्ञ इत्यपि रूपं सम्भाव्येत॥
यदि यह अपवाद नियम नहीं होता तो प्रश्न  का रूप प्रश्ञः और विश्न का रूप विश्ञ होता  
_________
लघु-सिद्धान्त-कौमुदी
💐↔शात् ६३, ८।४।४३
शात्परस्य तवर्गस्य चुत्वं न स्यात्। विश्नः। प्रश्नः॥
सिद्धान्त-कौमुदी
शात् ६३, ८।४।४३
शात्परस्य तवर्गस्य श्चुत्वं न स्यात् । विश्नः । प्रश्नः ।
________
💐↔न पदान्ताट्टोरनाम् ।।8/4/42 ।।
वृत्ति:-पदान्ताट्टवर्गात्परस्या८नाम: स्तो: ष्टुर्न स्यात्।
पदान्त में  टवर्ग होने पर भी  ष्टुत्व सन्धि का विधान नहीं होता है ।👇
अर्थात् – पद के अन्त में टवर्ग से नाम शब्द  के नकार को छोड़कर अन्य सकार तथा तवर्ग को षकार तथा टवर्ग नहीं होता है ।
पदान्त का विपरीत धात्वान्त /मूलशब्दान्त है ।
आशय यह है कि यदि पदान्त  में टवर्ग आये तथा उसके परे नाम शब्द के नकार के अतिरिक्त सकार या तवर्ग आये तो उसके स्थान पर अर्थात् "स"  के  स्थान पर "ष" और वर्ग के स्थान पर टवर्ग नहीं होगा जैसे 👇
षट् सन्त: ।
षट् ते ।पदान्तात् किम् ईट्टे ।
टे: किम् ? सर्पिष्टम् ।
व्याख्या :- पद के अन्त में टवर्ग से नाम शब्द  के नकार को छोड़कर अन्य सकार तथा तवर्ग को षकार तथा टवर्ग नहीं होता है ।
आशय यह है कि यदि पदान्त  में टवर्ग आये तथा उसके परे नाम के नकार के अतिरिक्त सकार या तवर्ग आये तो उसके स्थान पर अर्थात् स के  स्थान पर ष और तवर्ग के स्थान पर टवर्ग नहीं होगा ।
अर्थात् षट् नाम = "षण्णाम "तो हो जाएगा क्यों कि यह संज्ञा पद है।
प्रस्तुत सूत्र "ष्टुत्व सन्धि का अपवाद है " ।
यथा:-षट्+ सन्त: यहाँ पर पूर्व पदान्त में टवर्ग का "ट" है तथा इसके परे सकार होने से "ष्टुनाष्टु: सूत्र से ष्टुत्व प्राप्त था।
परन्तु प्रस्तुत सूत्र से उसे बाध कर ष्टुत्व कार्य निषेध कर दिया।

परिणाम स्वरूप "षट् सन्त:"  रूप बना रहा।
अब यहाँ समस्या यह है कि वर्तमान सूत्र में पदान्त टवर्ग किस  प्रयोजन से कहा ?
यदि टवर्ग मात्र कहते तो क्या प्रयोजन की सिद्धि नहीं थी।
इसका समाधान करते हुए कहते हैं कि यदि पदान्त न कहते तो (ईडते) ईट्टे :- मैं स्तुति करता हूँ। के प्रयोग में अशुद्धि हो जाती ।
ईड् + टे इस विग्रह अवस्था में ष्टुत्व का निषेध नहीं होता।और तकार को टकार होकर ईट्टे रूप बना यह क्रिया पद है।
एक अन्य तथ्य यह भी है कि इस सूत्र में तवर्ग का ग्रहण क्यों हुआ है
मात्रा न' पदान्तानाम् कहते तो क्या हानि थी? इसका समाधान यह है कि यदि टवर्ग का ग्रहण नहीं किया जाता तो  पद के अन्त में षकार से परे भी स्तु को ष्ठु होने का निषेध हो जाता।
षट् षण्टरूप बन जाता ।
५:-अनाम्नवति नगरीणामिति वाच्यम्।।
वृत्ति -षष्णाम्। षण्णवतिः। षण्णगरी।
काशिका-वृत्तिः
न पदान्ताट् टोरनाम् ८।४।४२
पदान्ताट् टवर्गादुत्तरस्य स्तोः ष्टुत्वं न भवति नाम् इत्येतद् वर्जयित्वा। श्वलिट् साये। मधुलिट् तरति। पदान्तातिति किम्? ईड स्तुतौ ईट्टे। टोः इति किम्? सर्पिष्टमम्। अनाम् इति किम्? षण्णाम्।
अत्यल्पम् इदम् उच्यते। अनाम्नवतिनगरीणाम् इति वक्तव्यम्। षण्णाम्। षण्णवतिः। षण्णगरी।
वृत्ति:-षष्णाम ।षष्णवति:।षण्णगर्य:।
व्याख्या:- पद के अन्त में तवर्ग से परे नाम ,नवति, और नगरी शब्दों के नकार को त्यागकर स ' तथा तवर्ग को  षकार और टवर्ग हो ।
आशय यह कि पाणिनि मुनि ने 'न' पदान्ताट्टोरनाम् सूत्र में केवल नाम के नकार को ही ष्टुत्व निषेध से अलग किया गया था।
अत: नवति और नगरी शब्दों में ष्टुत्व निषेध प्राप्त होने से दोष पूर्ण सिद्धि  होती थी ।
इस दोष का निवारण करने के लिए वार्तिक कार कात्यायन ने वार्तिक बनाया। कि नाम के नकार को ही ष्टुत्व निषेध से मुक्त नहीं करना चाहिए अपितु नवति और नगरी शब्दों को ही ष्टुत्व निषेध से मुक्त कर देना चाहिए अतएव नाम नवति और नगरी आदि शब्दों में तो ष्टुत्व विधि होनी चाहिए।
__________
(तो:षि- 8/4/53 )
 तो: षि। 8/4/53 ।
वृत्ति:- तवर्गस्य षकारे परे न ष्टुत्वम् सन्,षष्ठ: यह ष्टुत्व सन्धि विधायक सूत्र का बाधक है।इस लिए षण्षण्ठ नहीं होगा ।
"तवर्गस्य षकारे परे न ष्टुत्वम् सन्,षष्ठ: 
★-यह ष्टुत्व सन्धि विधायक सूत्र का बाधक है। इस लिए षण्षण्ठ नहीं होगा" 

💐↔पूर्व सवर्ण सन्धि:- उद: परयो: स्थास्तम्भो: पूर्वस्य 8/4/61..
वृत्ति:- उद: परयो: स्थास्तम्भो पूर्वसवर्ण: ।
स्था और स्तम्भ को उद् उपसर्ग से परे हो जाने पर पूर्व- सवर्ण होता है।
उत् + स्थान = उत्थान ।
कपि + स्थ = कपित्थ ।
अश्व + स्थ =अश्वत्थ ।
तद् + स्थ = तत्थ । 

काशिका-वृत्तिः
उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य ८।४।६१
सवर्णः इति वर्तते। उदः उत्तरयोः स्था स्तम्भ इत्येतयोः पूर्वसवर्णादेशो भवति। उत्थाता। उत्थातुम्। उत्थातव्यम्। स्तम्भेः खल्वपि उत्तम्भिता।
उत्तम्भितुम्। उत्तम्भितव्यम्। स्थास्तम्भोः इति किम्? उत्स्नाता।
उदः पूर्वसवर्नत्वे स्कन्देश् छन्दस्युपसङ्ख्यानम्।
अग्ने दूरम् उत्कन्दः।
 रोगे च इति वक्तव्यम्। उत्कन्दको नाम रोगः। कन्दतेर् वा धात्वन्तरस्य एतद् रूपम्।
काशिका-वृत्तिः
काशिका-वृत्तिः
झयो हो ऽन्यतरस्याम् ८।४।६२
झयः उत्तरस्य पूर्वसवर्णादेशो भवति अन्यतरस्याम्। वाग्घसति, वाघसति। स्वलिड् ढसति, श्वलिड् हसति। अग्निचिद् धसत्। अग्निचिद् हसति। सोमसुद् धसति, सोमसुद् हसति। त्रिष्टुब् भसति, त्रिष्टुब् हसति। झयः इति किम्? प्राङ् हसति। भवान् हसति।
न्यासः
झयो होऽन्यतरस्याम्?। , ८।४।६१
"वाग्धसति" इत्यादावुदाहरणे हकारस्य महाप्राणस्यान्तरतम्यात्? तादृश एव घकारादयो वर्गचतुर्था भवन्ति। अन्यतरस्यांग्रहणं पूर्वविध्योर्नित्यत्वज्ञापनार्थम्()॥
लघु-सिद्धान्त-कौमुदी
झयो होऽन्यतरस्याम् ७५, ८।४।६१
झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः। नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य तादृशो वर्गचतुर्थः। वाग्घरिः, वाघरिः॥
सिद्धान्त-कौमुदी
★-झयो होऽन्यतरस्याम् ७५, ८।४।६१
★-झयो होऽन्यतरस्याम् ७५, ८।४।६१
झयः परस्य हस्य पूर्वसवर्णो वा स्यात् । घोषवति नादवतो महाप्राणस्य संवृतकण्ठस्य हस्य तादृशो वर्गचतुर्थं एवादेशः । वाग्घरिः । वाग्घरिः ।।
अर्थात् झयो होऽन्यतरस्याम् ७५, (८।४।६१)
वृत्ति:- झय: परस्य हस्य वा पूर्व सवर्ण:
नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य तादृशो वर्ग चतुर्थ:
वाग्घरि : वाग्हरि:।
व्याख्या:- झय्  (झ् भ् घ् ढ् ध् ज्  ब्  ग् ड् द् ख् फ् छ् ठ् थ् च् ट् त् व् क् प् ) प्रत्याहार के वर्ण के पश्चात यदि 'ह' वर्ण आये तो उसके स्थान पर विकल्प से पूर्व सवर्ण आदेश हो जाता है ।उसका आशय यह है कि यदि वर्ग का प्रथम , द्वितीय ,तृत्तीय , तथा चतुर्थ वर्ण के बाद 'ह'

आये तो उसके स्थान पर विकल्प से पूर्व सवर्ण हो जाता है । अर्थात् गुणकृत यत्नों के सादृश्य से समान आदेश होगा।
यह पूर्व सवर्ण विधायक सूत्र है यथा–वाक् +'हरि : इस दशा में 'झलांजशो८न्ते' सूत्र से ककार को गकार जश् हुआ तब वाग् + 'हरि रूप बनेगा। फिर  झयो होऽन्यतरस्याम्  सूत्र से वाघरि रूप बना।
काशिका-वृत्तिः
शश्छो ऽटि ८।४।६३
झयः इति वर्तते, अन्यतरस्याम् इति च। झय उत्तरस्य शकारस्य अटि परतः छकरादेशो भवति अन्यतरस्याम्। वाक् छेते, वाक् शेते। अग्निचिच् छेते, अग्निचित् शेते। सोमसुच् छेते, सोमसुत् शेते। श्वलिट् छेते, श्वलिट् शेते। त्रिष्टुप् छेते, त्रिष्टुप् शेते। छत्वममि इति वक्तव्यन्। किं प्रयोजनम्? तच्छ्लोकेन, तच्छ्मश्रुणा इत्येवम् अर्थम्।
न्यासः
__________

↔💐↔शश्छोऽटि। , ८।४।६२( छत्व सन्धि )
वृत्ति:- झय: परस्य शस्य छो वा८टि।
तद् + शिव इत्यत्र दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते खरि चेति जकारस्य टकार :-
तच्छिव: तश्चिव:।
व्याख्या:-झय् ( झ् भ् घ् ढ् ध् ज्  ब्  ग् ड् द् ख् फ् छ् ठ् थ् च् ट् त् व् क् प ) के वर्ण से परे यदि शकार आये तथा उससे भी परे अट्( अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ ह य व र )
प्रत्याहार आये तो विकल्प से शकार को छकार हो जाता है अर्थात् शर्त यह है कि पदान्त झय् प्रत्याहार वर्ण से परे शकार आये तो उसे विकल्प से छकार हो जाएगा यदि अट् परेे होगा तब ।
प्रयोग:- यह सूत्र छत्व सन्धि का विधायक सूत्र है यथा तद् + शिव = तच्छिव  तद् + शिव इस विग्रह अवस्था में सर्वप्रथम "स्तो: श्चुना श्चु:" सूत्र प्रवृत्त होता है – तज् +शिव:।तत्पश्चात "खरि च" सूत्र प्रवृत्त होता है तथा शकार से भी परे अट् "इ" है ।
अतएव प्रस्तुत सूत्र द्वारा विकल्प से शकार को छकार हो जाएगा।  तद्+ शिव =तच्छिव ।विकल्प भाव में तच्शिव: रूप बनेगा।
इसी सन्दर्भों में कात्यायन ने एक वार्तिक पूरक के रूप में जोड़ा है 
छत्वममीति वाच्यम्( वार्तिक)"
वृत्ति:-  तच्छलोकेन।
व्याख्या:-यह वार्तिक है इसका आशय है कि पदान्त झय् प्रत्याहार के वर्ण से परे शकार को छकार अट् प्रत्याहार परे होने की अपेक्षा अम् प्रत्याहार ( अ,इ,उ,ऋ,ऌ,ए,ओ,ऐ,औ,ह,य,व,र,ल,ञ् म् ड्• ण्  न् ) परे होने पर छत्व होना चाहिए 
पाणिनि मुनि द्वारा कथित "शश्छोऽटि" सूत्र से तच्छलोकेन आदि की सिद्धि नहीं हो कही थी अतएव इनकी सिद्धि के लिए कात्यायन ने यह वार्तिक बनाया।
प्रयोग:- यह सूत्र पूरक सूत्र है । इसके द्वारा पाणिनि द्वारा छूटे शब्दों की सिद्धि की जाती है ।
"छत्वममीति धक्तव्यण्()" इति। अमि परतश्छत्वं भवतीत्येतदर्थरूपं व्याख्येयमित्यर्थः। तत्रेदं व्याख्यानम्()--"शश्छः" इति योगविभागः क्रियते, तेनाट्प्रत्याहारेऽसन्निविष्टे लकारादावपि भविष्यति, अतोऽटीत्यतिप्रसङ्गनिरासार्थो द्वितीयो योगः--तेनाट()एव परभूते, नान्यनेति। योगवभागकरणसामथ्र्याच्चाम्प्रत्याहारान्तर्गतेऽनट()दि क्वचिद्भवत्येव। अन्यथा योगविभागकरणमनर्थकं स्यात्()। अमीति नोक्तम्(), वैचित्र्यार्थम्()। अत्र "वा पदान्तस्य" ८।४।५८ इत्यतः पदान्तग्रहणमनुवत्र्तते, झयो विशेषणार्थम्()। तेन "शि तुक्()" ८।३।३१ इत्यत्र तुकः पूर्वान्तकरणं छत्वार्थमुपपन्नं भवति; "डः सि धुट्()" (८।३।२९) इत्यतो धुङ्ग्रहणानुवृत्तेः परस्या सिद्धत्वात्? पूर्वान्तकरणमनर्थकं स्यात्()॥
लघु-सिद्धान्त-कौमुदी-
शश्छोऽटि ७६, ८।४।६२
झयः परस्य शस्य छो वाटि। तद् शिव इत्यत्र दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते खरि चेति जकारस्य चकारः। तच्छिवः, तच्शिवः। (छत्वममीति वाच्यम्) तच्छ्लोकेन॥
सिद्धान्त-कौमुदी
शश्छोऽटि ७६, ८।४।६२
पदान्ताज्झयः परस्य शस्य छो वा स्यादटि । दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते--।
बाल-मनोरमा
शश्छोऽटि १२१, ८।४।६२
शश्छोऽटि। "झय" इति पञ्चम्यन्तमनुवर्तते। "श" इति षष्ठ()एकवचनम्। तदाह--झयः परस्येति। "तद्-शिव" इति स्थिते दकारस्य चुत्वेन जकारे कृते जकारस्य चकार इत्यन्वयः।
तत्त्व-बोधिनी
शाश्छोऽटि ९६, ८।४।६२
शाश्छोऽटि। इह पदान्तादित्यनुवत्र्य "पदान्ताज्झय" इति व्याख्येयम्, तेनेह न, "मध्वश्चोतन्त्यभितो विरप्शम्"। विपूर्वाद्रपेरौणादिकः शः।
छत्वममीति। "शश्छोऽटी"ति सूत्रं "शश्छोऽमी"ति पठनीयमित्यर्थः। तच्छ्लोकेनेति। "तच्छ्मश्रुणे"त्याद्यप्युदाहर्तव्यम्॥
काशिका-वृत्तिः
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★-मो राजि समः क्वौ ८।३।२५।
मो राजि समः क्वौ ८।३।२५
वृत्ति:- क्विवन्ते राजतौ परे समो मस्य म एव स्यात् ।
राज+ क्विप् = राज् ।
सम् के मकार को मकार ही होता है  यदि क्विप् प्रत्ययान्त  राज् परे होता है ।आशय यह कि अनुस्वारः नहीं होता ।
प्रयोग:- यह अनुस्वार का निषेध करता है- अतएव अपवाद सूत्र है ।यथा सम्+ राट् = यहाँ सम के मकार को को क्विप् प्रत्ययान्त राज् धातु का राट् है अतएव अनुस्वार नहीं होगा तथा सम्राट् रूप बनेगा ।

वस्तुत राज् का राड् तथा राट् रूप राज् के "र" वर्ण का संक्रमण रूप है ।
समो मकारस्य मकारः आदेशो भवति राजतौ क्विप्प्रत्ययान्ते परतः। सम्राट्। साम्राज्यम्। मकारस्य मकारवचनम् अनुस्वारनिवृत्त्यर्थम्। राजि इति किम्? संयत्। समः इति किम्? किंराट्। क्वौ इति किम्? संराजिता। संराजितुम्। संराजितव्यम्।
खरवसानयोर्विसर्जनीय: 8/3/15
वृत्ति:-खरि अवसाने च पदान्तस्य रेफस्य विसर्ग: ।
व्याख्या :- पद के अन्त में "र" वर्ण ही पदान्त हो तो दौनों स्थितियों "र" हो तथा उससे परे "खर"  प्रत्याहार का वर्ण हो अथवा "र" ही पदान्त हो तो दौनों स्थितियों में "र" वर्ण को विसर्ग हो जाता है;यथा संर + स्कर्त्ता =सं : स्कर्त्ता : ।
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💐↔षत्व विधान सन्धि :- "विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद ' कु( कखगघड•) 'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न  कोई। स्वर 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्'  के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।
शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु।हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु ।परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 
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परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु ।
परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 
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💐↔षत्व विधान सन्धिइक्कु हयण्सि षत्व :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद ' कु( कखगघड•) ह तथा यण्प्रत्याहार के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न  किसी स्वर 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्'  के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है । 
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शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु।
'हरि+ सु = हरिषु । भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु ।
 :- परन्तु  आ स्वरों के बाद 'स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है ।
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💐↔णत्व विधान सन्धि
:- रषऋनि  नस्य णत्वम भवति। अर्थात् मूर्धन्य टवर्गीय रषऋ से परे 'न' वर्ण हो तो 'न'वर्ण का 'ण वर्ण हो जाता है।
यदि र ष और ऋ तथा न के बीच में स्वर कवर्ग पवर्ग य् व् र् ल्  और ह् और अनुस्वार भी आ जाए तो भी 'न '  को 'ण'' हो जाता है । जैसे रामे + न = रामेण । मृगे+ न = मृगेण ।
परन्तु पद के अन्त वाले 'न'को ण नहीं होता है ।जैसे रिपून् ।रामान्। गुरून्। इत्यादि ।
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💐↔विसर्ग सन्धि के विधान :-
💐↔विसर्ग सन्धि के विधान :-
यदि विसर्ग के बाद "क" "ख" "प" "फ" वर्ण आऐं
तो विसर्गों (:) के स्वरूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । 

अर्थात् विसर्ग यथावत् ही रहते हैं । क्यों कि इन वर्गो के सकार नहीं होते हैं -
 परन्तु इण्को: सूत्र कुछ सन्धियों में षकार हो जाता है ।
जैसे-
कवि: + खादति = कवि: खादति ।
बालक: + पतति = बालक: पतति ।
गुरु : + पाठयति  = गुरु: पाठयति ।
वृक्ष: + फलति = वृक्ष: फलति ।                          मन:+ कामना=मन: कामना।
यदि विसर्ग से पहले "अ " स्वर हो और विसर्ग के बाद भी "अ" स्वर वर्ण हो । विसर्ग के स्थान पर 'ओ' हो जाता है।यह पूर्वरूप सन्धि विधायक सूत्र है
इसमें "अ" स्वर वर्ण के स्थान पर प्रश्लेष(ऽं अथवा ८ ) का चिह्न लगाते हैं ।।
बाल: + अस्ति = __ ।
मूर्ख: + अपि   = मूर्खो८पि।
शिव: + अर्च्य: =शिवो८र्च्य: ।
क: +अपि = को८पि ।
सूत्रम्- 
खरवसानयोर्विसर्जनीय: ।।08/03/15।।
खरि अवसाने च पदान्‍तस्‍य रेफस्‍य विसर्ग: । 

व्‍याख्‍या - 
पदस्‍य अन्तिम 'र्'कारस्‍य अनन्‍तरं खर् (वर्गणां 1, 2, श, ष, स) वर्णा: भवन्‍तु अथवा अवसानं (किमपि न) भवतु चेत् 'र्'कारस्‍य विसर्ग: (:) भवति ।

हिन्‍दी - 
पद के अन्तिम र् से परे यदि खर् प्रत्‍याहार के वर्ण (वर्ग के प्रथम और द्वितीय अक्षर तथा स, श, ष) हों अथवा कि कुछ भी न हो तो 'र्'कार के स्‍थान पर विसर्ग (:) परिवर्तन होता है ।

वार्तिकम् - संपुकानां सो वक्‍तव्‍य: ।।

व्‍याख्‍या - सम्, पुम्, कान् च शब्‍दानां विसर्गस्‍य स्‍थाने 'स्'कार: भवति ।

उदाहरणम् - 
सम् + स्‍कर्ता = संस्‍स्‍कर्ता (सँस्‍स्‍कर्ता) ।।

हिन्‍दी - 
सम्, पुम् और कान् शब्‍दों के विसर्ग के स्‍थान पर 'स्'कार होता है ।

इति

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💐↔ 
विसर्गस्यलोप -💐↔विसर्ग का लोप ।
-विसर्गस्यलोप - परन्तु यदि विसर्ग से पहले "अ" स्वर वर्ण हो और विसर्ग के बाद "अ" स्वर वर्ण के अतिरिक्त कोई भी अन्य स्वर ( आ, इ,ई,उ,ऊ,ए,ऐ,ओ,औ,) हो तो विसर्गों का सन्धि करने पर  लोप हो जाता है ।
जैसे-•
सूर्य: + आगच्छति = सूर्य आगच्छति।
बालक: + आयाति = बालक आयाति।
चन्द्र: + उदेति = चन्द्र उदेति।
💐↔यदि विसर्गों के पूर्व "अ" हो और बाद में किसी वर्ग का तीसरा ,चौथा व पाँचवाँ वर्ण अथवा अन्त:स्थ वर्ण ( य,र,ल,व) अथवा 'ह' वर्ण हो  तो पूर्व वर्ती "अ"  और विसर्ग से मिलकर 'ओ' बन जाता है। जैसे 👇
बाल:+ गच्छति = बालोगच्छति।
श्याम:+ गच्छति। = श्यामोगच्छति।
मूर्ख: + याति = मूर्खो याति।
धूर्त: + हसति = धूर्तो हसति।
कृष्ण: + नमति =कृष्णो नमति।
लोक: + रुदति= लोको रुदति।
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💐↔परन्तु यदि विसर्गों से पूर्व 'आ' और बाद में कोई स्वर वर्ण.(अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ऋृ,ऌ,ए,ऐ,ओ,औ )अथवा वर्ग का तीसरा, चौथा व पाँचवाँ वर्ण और कोई अन्त:स्थ (य,र,ल,व)अथवा'ह'वर्ण हो तो विसर्गों का लोप हो जाता है।
जैसे- 👇
पुरुषा: +आयान्ति = पुरुषा आयान्ति।
बालका: + गच्छन्ति = बालका गच्छन्ति।
नरा: + नमन्ति =नरा नमन्ति।

विशेष:-देवा:+अवन्ति= देवा अवन्ति फिर पूर्वरूप देवा८वन्ति रूप-
_______       
💐↔परन्तु यदि विसर्गों से पूर्व ( 'इ'  'ई ' उ ' ऊ 'ऋ 'ऋृ 'ए ' ऐ 'ओ 'औ ')आदि में से कोई स्वर हो और विसर्ग के बाद में किसी वर्ग का तीसरा चौथा व पाँचवाँ अथवा कोई स्वर अथवा अन्त:स्थ  (य,र,ल,व )  अथवा 'ह' महाप्राण वर्ण हो तो विसर्ग का ( र् ) वर्ण बन जाता है।
यदि "अ"तथा "आ" स्वरों को छोड़कर कोई अन्य स्वर -(इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ऋृ,ऌ,ए,ऐ,ओ,औ )के पश्चात्  विसर्ग(:)हो तथा विसर्ग के पश्चात कोई भी स्वर(अ,आ,इ,ई,उ,ऋ,ऋृ,ऌ,ऊ,ए,ऐओ,औ) अथवा कोई वर्ग का तीसरा,चौथा,-(झ-भ-घ-ढ-ध) पाँचवाँ वर्ण-(ञ-म-ङ-ण-न) अथवा कोई अन्त:स्थ-(य-र-ल-व) और "ह" वर्ण हो तो विसर्ग का रेफ(र्) हो जाता है । और सजुष् शब्द के ष् वर्ण का र् (रेफ)वर्ण हो जाता है। यह नियम "ससजुषोरु:" सूत्र का विधायक है ।
जैसे- 
'हरि: + आगच्छति = हरिरागच्छति। (हरिष्+)
कवि: + गच्छति =  कविर्गच्छति। (कविष्+)
गुरो: + आदेश: = गुरोरादेश: । (गुरोष्+)
गौष्+इयम्=गौरियम्। (गौर्+)
हरे:+ दर्शनम्।=हरेर्दर्शनम्। (हरेष्+)
पितुष्+आज्ञया=पितुराज्ञया।(पितु:+)
दुष्+लभ्।=दुर्लभ। (दु:+)
नि:+जन:=निर्जन: ।( निष्+जन:)
निष् +दय:=निर्दय:।(नि:)
दुष्+आराध्य:=दुराराध्य:।
निष्+आश्रित:=निराश्रित:।
कविष्+हसति=कविर्हसति।
मुनिष्+आगत:=मुनिरागत:।
मुनिष्+इव=मुनिरिव।
प्रभोष्+आज्ञा=प्रभोराज्ञा।
विधेष्+आज्ञा=विधेराज्ञा।
रवेष्+दर्शनम्=रवेर्दर्शनम्।
इन्दोष्+उदय:=इन्दोरुदय।
तयोष्+आज्ञा=तयोराज्ञा।
धेनुष्+एषा =धेनुरेषा।
हरिष् +याति=हरिर्याति।
कविष्+अयम् =कविरयम्।
मन:+ कामना= मनस्कामना।
पुर:+ कार= पुरस्कार ।
___
विशेष-इण् -
(इण्=इ , उ, ऋ , लृ , ए , ओ , ऐ , औ,ह्, य्,व, र्, ल्)
 कु(क,ख,ग,घ,ङ्,)से परे "सकार" का "षकार" आदेश हो जाता है इण्को:आदेशप्रत्ययो:८/३५७/५९) इण्को (८-३-५७)-आदेशप्रत्ययो: (८-३-५९) । तस्मात् इण्को परस्य (१) अपदान्तस्य आदेशस्य (२) प्रत्यय अवयवश्च "स: स्थाने मूर्धन्य " आदेश: भवति।(सिद्धान्त कौमुदी)
इण्को: ।५७। वि०-इण्को:५।१। स० इण् च कुश्च एतयो: समाहार:-इण्कु तस्मात् -इण्को: (समाहारद्वन्द्व:)।

संस्कृत-अर्थ-इण्कोरित्यधिकारो८यम् आपादपरिसमाप्ते:।इतो८ग्रे यद् वक्ष्यति इण: कवर्गाच्च परं तद् भवतीति वेदितव्यम्। यथा वक्ष्यति आदेशप्रत्ययो: ८/३/५९/इति उदाहरण :- सिषेव ।सुष्वाप। अग्निषु। वायुषु। कर्तृषु ।गीर्षु ।धूर्षु ।वाक्षु ।त्वक्षु ।

 हिन्दी अर्थ:- इण्को: इण् कु- (क'ख'ग'घ'ड॒॰)तृतीय पाद की समाप्ति पर्यन्त पाणिनि मुनि इससे आगे और परे जो कहेंगे वह इण् और कवर्ग से परे होता है ऐसा जानें जैसाकि आचार्य पाणिनि कहेंगे आदेशप्रत्ययो:८/३/५९/ इण् और कवर्ग से परे आदेश और प्रत्यय के सकार का मूर्धन्य षकार हो जाता है ।
__
पूर्वम्: ८।२।६५अनन्तरम्: ८।२।६७
प्रथमावृत्तिः
सूत्रम्॥ ससजुषो रुः॥ ८।२।६६
पदच्छेदः॥ स-सजुषोः ६।२ रुः १।१ पदस्य ६।१ ८।१।१६
समासः॥
सश्च सजुष च स-सजुषौ तयोः ॰ इतरेतरद्वन्द्वः
अर्थः॥
स-कारान्तस्य पदस्य सजुष् इत्येतस्य च रुः भवति
उदाहरणम्॥
सकारान्तस्य - अग्निरत्र, वायुरत्र। सजुषः - सजूरृषिभिः, सजूर्देवेभिः।
काशिका-वृत्तिः
ससजुषो रुः ८।२।६६
सकारान्तस्य पदस्य सजुषित्येतस्य च रुः भवति। सकारान्तस्य अग्निरत्र। वायुरत्र।

सजुषः सजूरृतुभिः। सजूर्देवेभिः। जुषेः क्विपि सपूर्वस्य रुपम् एतत्।
लघु-सिद्धान्त-कौमुदी
समजुषो रुः १०५, ८।२।६६
पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुः स्यात्॥
सश्च सजूश्च ससजुषौ, तयोरिति विग्रहः।
न्यासः
ससजुषो रुः। , ८।२।६६
"सजूः" इति। "जुषी प्रीतिसेवनयोः" (धा।पा।१२८८), सह जषत इति क्विप्(), उपपदसमासः, "सहस्य सः संज्ञायाम्()" ६।३।७७ इति सभावः।
रुत्वे कृते "र्वोरुपधायाः" ८।२।७६ इति दीर्घः। सजुवो ग्रहणमसकारान्तार्थम्()। योगश्चायं जश्त्वापवादः॥
बाल-मनोरमा
ससजुषो रुः १६१, ८।२।६६
ससजुषो रुः। ससजुषो रु रिति छेदः। "रो रि"इति रेफलोपः।
सश्च सजूश्च ससजुषौ, तयोरिति विग्रहः। रुविधौ उकार इत्।
तत्फलं त्वनुपदमेव वक्ष्यते। "स" इति सकारो विविक्षितः।
अकार उच्चारणार्थः। पदस्येत्यधिकृतं सकारेण सजुष्शह्देन च विशेष्यते। ततस्त दन्तविधिः।
सकारान्तं सजुष्()शब्दान्तं च यत् पदं तस्य रुः स्यादित्यर्थः।
सच "अलोऽन्त्ये"त्यन्त्यस्य भवति।
तत्फलितमाह-पदान्तस्य सस्येति।
सजुष्()शब्दस्य चेति। सजुष्शब्दान्तं यत् पदं तदन्तस्य । ततश्च सजुषौ सजुष इत्यत्र षकारस्य न रुत्वम्, पदान्तत्वाभावात्। "सजुष्()शब्दान्तं यत् पदं तदन्तस्य षकारस्येत्यर्थः। ततस्च सजुषौ सजुष इत्यत्र षकारस्य न रुत्वम्, पदान्तत्वाभावात्। "सजुष्शब्दान्तं यत्पद"मिति तदन्तविधिना परमसजूरित्यत्र नाव्याप्तिः।
न च सजूरित्यत्राव्याप्तिः शङ्क्या, व्यपदेशिवद्भावेन तदन्तत्वात्।
व्यपदेशिवद्भावो।ञप्रातिपदिकेन" इति "ग्रहणवता प्रातिपदिकेन तदन्तविधिर्न" इति च पारिभाषाद्वयं "प्रत्ययग्रहणे यस्मा"दितिविषयं, नतु येन विधिरितिविषयमिति "असमासे निष्कादिभ्यः" इति सूत्रे भाष्ये स्पष्टम्। ननु शिवसिति सकारस्य "झलाञ्जशोन्ते" इति जश्त्वेन दकारः स्यात्, जश्त्वं प्रति रुत्वस्य परत्वेऽपि असिद्धत्वादित्यत आह--जश्त्वापवाद इति। तथा च रुत्वस्य निरवकाशत्वान्नासिदधत्वमिति भावः। तदुक्तं भाष्ये "पूर्वत्रासिद्धे नास्ति विप्रतिषेधोऽभावादुत्तरस्ये"ति , "अपवादो वचनप्रामाण्यादि"ति च।
तत्त्व-वोधिनी
ससजुषो रुः १३२, ८।२।६६
ससजुषो रुः। "पदस्ये"त्यनुवृतं ससजूभ्र्यां विशेष्यते, विशेषणेन तदन्तविधिः। न च सजूःशब्दांशे "ग्रहणवता प्रतिपदिकेन तदन्तविधिर्ने"ति निषेधः शङ्क्यः, तस्य प्रत्ययविधिविषयकत्वात्। सान्तं सजुष्शब्दान्तं च यत्पदं तस्य रुः स्यात्स चाऽलोन्त्यस्य। एवं स्थिते फलितमाह-पदान्तस्य सस्येति। सजुष्शब्दस्येति।
तदन्तस्य पदस्येत्यर्थः। तेन "सुजुषौ" "सजुष" इत्यत्रापि नातिव्याप्तिः। नच "सजू"रित्यत्राऽव्याप्तिः, "व्यपदेशिवद्भावोऽप्रातिदिकेने"ति निषेधादिति वाच्यं, तस्यापि प्रत्ययविधिविषयकत्वात्। अतएव "व्यपदेशिवद्भावोऽप्रातिपदिकेने"ति "ग्रहणवते"ति च परिभाषाद्वयमपि प्रत्ययविधिविषयकमिति "दिव उ"त्सूत्रे हरदत्तेनोक्तम्। कैयटहरदत्ताभ्यामिति तु मनोरमायां स्थितम्। तत्र कैयटेनानुक्तत्वात्कैयटग्रहणं प्रमादपतिततमिति नव्याः। केचित्तु "दिव उ"त्सूत्रं यस्मिन्निति बहुव्रीहिरयं, सूत्रसमुदायश्चान्यपदार्थः। तथाच "दिव उ"त्सूत्रशब्देन "द्वन्द्वे चे"ति सूत्रस्यापि क्रोटीकारात्तत्र च कैयटेनोक्तत्वान्नोक्तदोष इति कुकविकृतिवत्क्लेशेन मनोरमां समर्थयन्ते।
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अधुना अपवादत्रयं वक्तव्यम्‌—
१. रेफान्तानि अव्ययानि
प्रातः इच्छति → प्रात इच्छति = दोषः
“प्रात इच्छति" तु अतः परस्य विसर्जनीयस्य आचि लोपः इति सूत्रम्‌ अनुसृत्य भवति स्म, परन्तु अत्र दोषः |
प्रातः इच्छति → प्रातरिच्छति = साधु
अत्र नियमः यत्‌ यत्र रेफान्तानि अव्ययानि सन्ति, तत्र केवलं भाट्टसूत्रेषु प्रथमसूत्रं कार्यं करोति | 
अन्यत्र सर्वत्र रेफः एव आदिष्टः | 
अतः रेफान्त-अव्ययानां कृते सूत्राणि २ -५ इत्येषां स्थाने रेफः एव भवति |
प्रातः तिष्ठति → प्रातस्तिष्ठति = साधु
इदं उदाहरणं प्रथमसूत्रेण (विसर्जनीयस्य सः खरि कखपफे तु विसर्गः इत्यनेन) प्रवर्तते; अन्यत्र सर्वत्र रेफः |
अव्ययस्य अन्ते विसर्गः अस्ति चेत्‌, तस्य अव्ययस्य प्रातिपदिकं ज्ञेयम्‌ | रेफान्तं प्रातिपदिकम्‌ अस्ति चेत्‌, तर्हि तद्‌ अव्ययम्‌ अपवादभूतम्‌ अस्ति इति धेयम्‌ |
 यथा प्रातः इत्यस्य प्रातिपदिकं प्रातर्‍; पुनः इत्यस्य प्रातिपदिकं पुनर्‍; अन्तः इत्यस्य प्रातिपदिकम्‌ अन्तर् | इमानि अव्ययानि रेफान्तानि अतः अपवादभूतानि | परन्तु प्रातिपदिकं रेफान्तं नास्ति चेत्‌, तर्हि सामान्यैः सूत्रैः क्रमः प्रवर्तते | यथा "अतः" रेफान्तं नास्ति |
अतः इच्छति → "अतरिच्छति" = दोषः
अतः इच्छति → अत इच्छति = साधु (अतः परस्य विसर्जनीयस्य आचि लोपः इति सूत्रम्‌)
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२- एषः सः

सः तिष्ठति → सस्तिष्ठति = दोष:
एषः सः इति द्वि पदे विशेषे | तयोः कृते चतुर्थसूत्रेण अति उत्वं भवति | अन्यत्र सर्वत्र लोप एव |
सः तिष्ठति → स तिष्ठति = साधु
अतः पञ्चमे सोपाने यथा बालः इत्यादयः लघु-अकारान्तशब्दाः, एषः-सः इति द्वयोरपि अत्र विसर्गलोपः 
एषः इच्छति → एष इच्छति*
एषः आगच्छति → एष आगच्छति*
*यथा पञ्चमे सोपाने, अत्रापि अन्यः विकल्पः अस्ति 'एषयिच्छति', 'एषयागच्छति' | 
भोभगोअघोअपूर्वस्य योशि (८.३.१७), लोपः शाकल्यस्य (८.३.१९) इति सूत्राभ्याम्‌ | अयं विकल्पः विरलतया उपयुज्यते |
धेयं यत्‌ एषः सः इति द्वयोः पदयोः कृते अतः परस्य विसर्जनीयस्य अति हशि च उत्वम् इति सूत्रेण अति उत्वं भवति, परन्तु हशि उत्वं न भवति अपि तु लोप एव |
सः गच्छति → सो गच्छति = दोषः
सः गच्छति → स गच्छति = साधु
अत्‌ परे अस्ति चेत्‌, तर्हि अति उत्वं भवति—
सः अपि → सोऽपि = साधु
'सः एषः' इति यथा, तथा 'यः' नास्ति | 'यः' इति शब्दस्य यथासामान्यं भाट्टसूत्रेषु सूत्र-१,४,५ इत्येषां साधारणरूपाणि | यस्तिष्ठति | यो गच्छति | य इच्छति |
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३. रेफः + रेफः = पूर्वदीर्घत्वं रेफलोपः च
हरिः रमते → हरिर्रमते = दोषः
रेफस्य रेफे परे पूर्वदीर्घत्वं रेफलोपः च | उदाहरणे, पूर्वं यः इकारः अस्ति, तस्य दीर्घत्वं भवति | इ → ई इति |
हरिः रमते → इचः परस्य विसर्जनीयस्य रेफः अखरि इत्यनेन → हरिर्‍ + रमते → रेफस्य लोपः, पूर्वदीर्घत्वम्‌ → हरी + रमते → हरीरमते |
तथैव पुनः रमते → रेफान्तम्‌ अव्ययम् अतः विसर्गसन्धौ रेफादेशः → पुनर्‍ + रमते → पुना + रमते → पुनारमते |
पुनः रेफान्तम्‌ अव्ययम्‌ अतः अत्रापि रेफः आयाति; रेफस्य रेफे परे रेफलोपः पूर्वदीर्घत्वं च इति धेयम्‌ |
इति विसर्गसन्धेः समग्रं चिन्तनम्‌ समाप्तम्‌ | इदं च लौकिकं चिन्तनं, व्यावहारिकं चिन्तन्तम्‌ | सम्प्रति यावत्‌ परिशीलितं व्यवहारे, तत्‌ शास्त्रीयरीत्या कथं सिध्यति इति जानीयाम |
यदि विसर्ग से पहले ‘अ’ अथवा ‘आ’ आए तथा बाद में भिन्न स्वर या कोई घोष वर्ण हो तो विसर्ग का लोप (हट जाना) हो जाता है।
रामः + इच्छति = रामिच्छन्ति
सुतः + एव = सुतेव
सूर्यः + उदयति = सूर्युदयति
अर्जुनः + उवाच्च = अर्जुनुवाच्च
नराः + ददन्ति = नराददन्ति
देवाः + अत् = देवात्
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सूत्र – ससजुषोरूः
यदि विसर्ग से पहले ‘अ’ अथवा ‘आ’ से भिन्न कोई स्वर हो वह बाद में कोई स्वर या घोष वर्ण हो तो विसर्ग ‘र’ में परिवर्तित हो जाता है।
मुनिः + अत्र = मुनिरत्र
रविः + उदेति = रविरुदेति
निः + बलः = निर्बलः
कविः + याति = कविर्याति
धेनुः + गच्छति = धेनुर्गच्छति
नौरियम् = नौः + इयम्
गौरयम् = गौ + अयम्
श्रीरेषा = श्रीः + ऐसा

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4. सूत्र – रोरि
यदि पहले शब्द के अन्त में ‘र्’ आए तथा दूसरे शब्द के पूर्व में ‘र्’ आ जाए तो पहले ‘र्’ का लोप हो जाता है तथा उससे पहले जो स्वर हो वह दीर्घ स्वर में परिवर्तित हो जाता है।
निर् + रसः = नीरसः
निर् + रवः = नीरवः
निर् + रजः = नीरजः
प्रातारमते = प्रातर् + रमते
गिरीरम्य = गिरिर् + रम्य
अंताराष्ट्रीय = अंतर् + राष्ट्रीय
शिशूरोदिति = शिशुर् + रोदिति
हरीरक्षति = हरिर् + रक्षति
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5. सूत्र- द्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः
  रेफाकार अथाव ढ़कार से परे यदि ढ़कार हो तो पूर्व ढ़कार से पहले वाला अण्-(अइउ) स्वर दीर्घ हो जाता है तथा पूर्व ‘ढ़्’ का लोप हो जाता है।
लिढ़् + ढः = लीढ़ः
लिढ़् + ढ़ाम् = लीढ़ाम्
अलिढ़् + ढ़ः = अलीढ़ः
लिढ़् + ढ़ेः = लीढ़ेः
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6. सूत्र- विसर्जनीयस्य स
यदि विसर्ग से पहले कोई स्वर हो तथा बाद में
च या छ हो तो विसर्ग ‘श’ में परिवर्तित हो जाता है।
त या थ हो तो विसर्ग ‘स’ में परिवर्तित हो जाता है।
ट या ठ हो तो विसर्ग ‘ष’ में परिवर्तित हो जाता है।
कः + चौरः = कश्चौरः
बालकः + चलति = बालकश्चलति
कः + छात्रः = कश्छात्रः
रामः + टीकते = रामष्टीकते
धनुः + टंकारः = धनुष्टंकारः
मनः + तापः = मनस्तापः
नमः + ते = नमस्ते
रामः + तरति = रामस्तरति
पदार्थाः + सप्त = पदार्थास्सप्त
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7. सूत्र- वाशरि
यदि विसर्ग से पहले कोई स्वर है और बाद में शर् हो तो विकल्प से विसर्ग, विसर्ग ही रहता है।
दुः + शासन = दुःशासन/ दुश्शासन
बालः + शेते = बालःशेते/ बालश्शेते
देवः + षष्ठः = देवःषष्ठः/ देवष्षष्ठः
प्रथर्मः + सर्गः = प्रथर्मःसर्ग/ प्रथर्मस्सर्गः
निः + सन्देह = निःसंदेह/ निस्सन्दह
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एष: और स: के विसर्ग का नियम-💐↔
एष: और स: के विसर्ग का नियम – एष: और स: के विसर्गों का लोप हो जाता है  यदि इन विसर्गों के बाद कोई व्यञ्जन वर्ण  जैसेेे. :-

स: + कथयति = स कथयति।
एष: + क:= एष क:।
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नियम-र्(अथवा) विसर्ग (:) के स्थान पर र् के पश्चात यदि र् आता है तो प्रथम र् का लोप होकर उस र् से पूर्व आने वाले स्वर - (अइउ) की दीर्घ हो जाता है। 
💐↔रोरि ,ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घो८ण: – अर्थ:- "र से र' वर्ण परे होने पर पूर्व 'र लोप होकर(अ,इ,उ) स्वरों का दीर्घ स्वर हो जाता है।
यदि विसर्ग के बाद र् आता है  तो विसर्ग का लोप हो जाता है और विसर्ग का लोप हो जाने के कारण उससे पहले आने वाले ( अ , इ, उ, का दीर्घ रूप आ,ई,ऊ हो जाता है।
जैसे- 
अन्त:+राष्ट्रीय=अन्ताराष्ट्रीय।अन्तर्+
पुनः + रमते = पुनारमते । पुनर्+
कवि: + राजते =कवीराजते ।कविर्+
'हरि+रम्य= हरी रम्य।हरिर्+
शम्भु: + राजते = शम्भूराजते । शम्भुष्+। शम्भुर्+
👇जश्त्व सन्धि विधान :- 
"पदान्त जश्त्व सन्धि"💐↔झलां जशो८न्ते।
जब पद ( क्रियापद) या (संज्ञा पद) अन्त में  वर्गो के पहले, दूसरे,तीसरे,और चौथे वर्ण के बाद कोई भी स्वर या वर्ग का  वर्ण हो जाता है तब "पदान्त जश्त्व सन्धि" होती है ।
अर्थात् पद के अन्त में वर्गो का पहला , दूसरा, तीसरा , और चौथे वर्ण आये अथवा कोई भी स्वर , अथवा कोई अन्त:स्थ आये परन्तु केवल ऊष्म वर्ण  न आयें तो वर्ग का तीसरा वर्ण (जश्= जबगडदश्) हो जाता है।
उदाहरण (Example):-
जगत् + ईश = जगदीश: ।
वाक् + दानम्= वाग्दानम्।
वाक् + ईश : = वागीश ।
अच्+ अन्त = अजन्त ।
एतत् + दानम्= एतद् दानम् ।
तत्+एवम् =तदेवम् ।                                               जगत् +नाथ=जगद्+नाथ=जगन्नाथ ।
💐↔अपादान्त जश्त्व सन्धि - जब अपादान्त  में। अर्थात् (धात्वान्त) अथवा मूूूूल शब्दान्त  में वर्गो के पहले दूसरे और चौथे वर्ण के बाद वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण अथवा अन्त:स्थ ( य,र,ल,व ) में से कोई वर्ण हो तो पहले वर्ण को उसी वर्ग का तीसरा वर्ण हो जाता है ।
उदाहरण( Example )
लभ् + ध : = लब्ध: । (धातुु रूप)
उत् + योग = उद्योग :। (उपसर्ग रूप)
पृथक् +भूमि = पृथग् भूमि: । (मूलशब्द)
महत् + जीवन = महज्जीवनम्।(मूलशब्द)
सम्यक् + लाभ = सम्यग् लाभ :।(मूलशब्द)
क्रुध् + ध: = क्रुद्ध:।(धातुु रूप)
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प्रत्यय लगे हुए वाक्य में प्रयुक्त शब्द अथवा क्रिया  रूप पद कहलाते हैं ।
ये क्रिया पद और  संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि आठ प्रकार के होते हैं ।
संज्ञा
सर्वनाम
विशेषण और
क्रिया।
2. अविकारी-जो शब्द प्रयोगानुसार परिवर्तित नहीं होते, वे शब्द ‘अविकारी शब्द’ कहलाते हैं। धीरे-धीरे, तथा, अथवा, और, किंतु, वाह !, अच्छा ! ये सभी अविकारी शब्द हैं। इनके भी मुख्य रूप से चार भेद हैं :
क्रियाविशेषण
समुच्चयबोधक
संबंधबोधक और
विस्मयादिबोधक।
(विभक्त्यन्तशब्दभेदे “सुप्तिङन्तं पदम्” ) ।
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चर्त्व सन्धि विधान-( खरि च)
"झय् का चय् हो जाता है झय् से परे खर् होने पर "।
परिभाषा:- जब वर्ग के पहले, दूसरे , तीसरे और चौथे वर्ण के बाद वर्ग का पहला  दूसरा वर्ण अथवा ऊष्म वर्ण श्  ष्  स्  हो तो पहले वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का पहला वर्ण जाता है तब "चर्त्व सन्धि होती" है ।
लभ् + स्यते  = लप्स्यते ।
उद् + स्थानम् = उत्थानम् ।
उद् + पन्न:=उत्पन्न:।
युयुध्+ सा = युयुत्सा ।
एतत् + कृतम् = एतत् कृतम्।
तत् + पर: =तत्पर: ।
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'छत्व सन्धि' विधान:- सूत्र-।शश्छोऽटि।
शश्छोऽटि (८.४.६३) = पदान्तस्य झयः- ( झभघढधजबगडदखफछठथचटतकप) उत्तरस्य शकारस्य अटि-(अइउऋऌएओऐऔहयवर) परे छकारादेशो भवति अन्यतरस्याम्‌ | 
अन्वयार्थ:-शः षष्ठ्यन्तं, छः प्रथमान्तम्‌, अटि सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्‌-।
छत्व सन्धि विधान :- 
अर्थ-•यदि पूर्व पद के अन्त में पाँचों वर्गों के  प्रथम, द्वितीय तृतीय और चतुर्थ) का कोई वर्ण हो और उत्तर पद के पूर्व (आदि) में शिकार '(श) और इस श' के पश्चात कोई स्वर अथवा अन्त:स्थ  ल" को छोड़कर महाप्राण 'ह'-(य'व'र' ह)हो तो श वर्ण का छ वर्ण भी हो जाता है । 
वैसे भी तवर्ग का चवर्ग श्चुत्व सन्धि रूप में (स्तो: श्चुना श्चु:) सूत्र हो जाता है  ।
परिभाषा:- यदि त् अथवा न् वर्ण के बाद  "श"  वर्ण आए और "श" के बाद कोई स्वर अथवा कोई अन्त:स्थ (य, र , व , ह )वर्ण हो तो
'श' वर्ण को विकल्प से छकार (छ) हो जाता है  और स्तो: श्चुना श्चु: - सूत्र के नियम से 'त्' को 'च्'  और 'न्' को 'ञ्' हो जाता है जैसे :- 
सत् +शास्त्र = सच्छास्त्र ।
धावन् + शशक: = धावञ्छशक: ।
श्रीमत्+शंकर=श्रीमच्छङ्कर।
१- तत्+शिव= त् के बाद श्  तथा श के बाद 'इ स्वर आने पर श' के स्थान पर 'छ्' वर्ण हो जाता है । रूप होगा सन्धि का तत्छिव  (तत् + छिव) तत्पश्चात ्( श्चुत्व सन्धि) करने पर बनेगा रूप तच्+ छिव (तत्छिव).             

२-एतत्+शान्तम्= त् के बाद श् और श् के बाद 'आ' स्वर आने से  श्'  के स्थान पर छ्' वर्ण हो जाता है। रूप बनेगा एतत् +छान्तम्- तत्पश्चात श्चुत्व सन्धि से आगामी रूप होगा (एतच्छान्तम्)
३-तत् +श्व: पूर्व पद के अन्त में त्  और उसके पश्चात उत्तर पद के प्रारम्भ में श्' और उसके बाद अन्त:स्थ 'व' आने पर श्' के स्थान पर छ' (श्चुत्व सन्धि) से हो जाता है ।  तत् + छ्व: + तत्छव: फिर श्चुत्व सन्धि) से तच्छ्व: रूप होगा।
       (- प्रत्याहार-)
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........माहेश्वर सूत्र कुल १४ हैं, इन सूत्रों से कुल ४१ प्रत्याहार बनते हैं। एक प्रत्याहार उणादि सूत्र ( १.१.१४ ) "ञमन्ताड्डः" से ञम् प्रत्याहार और एक वार्तिक से "चयोः द्वितीयः शरि पौष्करसादेः" ( ८.४.४७ ) से बनता है । इस प्रकार कुल ४३ प्रत्याहार हो जाते हैं।
प्रश्न : ----- "प्रत्याहार" किसे कहते हैं ?
उत्तर : ----- "प्रत्याहार" संक्षेप करने को कहते हैं। अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के ७१ वें सूत्र " आदिरन्त्येन सहेता " ( १-१-७१ ) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का पाणिनि मुनिने निर्देश किया है।
आदिरन्त्येन सहेता ( १-१-७१ ) :- ( आदिः + अन्त्येन इता + सह )
........आदि वर्ण अन्तिम इत् वर्ण के साथ मिलकर “ प्रत्याहार ” बनाता है । जो आदि वर्ण एवं इत्सञ्ज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए सभी वर्णों का समष्टि रूप में बोध कराता है।
........जैसे "अण्" कहने से अ, इ, उ तीन वर्णों का ग्रहण होता है, "अच्" कहने से "अ" से "च्" तक सभी स्वरों का ग्रहण होता है। "हल्" कहने से सारे व्यञ्जनों का ग्रहण होता है।
इन सूत्रों से सैंकडों प्रत्याहार बन सकते हैं, किन्तु पाणिनि मुनि ने अपने उपयोग के लिए ४१ प्रत्याहारों का ही ग्रहण किया है। प्रत्याहार दो तरह से दिखाए जा सकते हैं --
(०१) अन्तिम अक्षरों के अनुसार और (०२) आदि अक्षरों के अनुसार।
इनमें से अन्तिम अक्षर से प्रत्याहार बनाना अधिक उपयुक्त है और अष्टाध्यायी से अनुसार है।
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अन्तिम अक्षर के अनुसार ४३ प्रत्याहार सूत्र सहित
(क.) अइउण् ----- इससे एक प्रत्याहार बनता है ।....(०१) " अण् " ----- उरण् रपरः । ( १.१.५० )
(ख.) ऋलृक् ----- इससे तीन प्रत्याहार बनते हैं ।
........(०२) " अक् " ----- अकः सवर्णे दीर्घः ।                ( ६.१.९७ ), 
........(०३) " इक् " ----- इको गुणवृद्धी । ( १.१.३ ), 
........(०४) " उक् " ----- उगितश्च । ( ४.१.६ )
(ग) एओङ् ----- इससे एक प्रत्याहार बनता है ।
........(०५) " एङ् " ----- एङि पररूपम् । ( ६.१.९१ )
(घ) ऐऔच् ----- इससे चार प्रत्याहार बनते हैं ।
........(०६) " अच् " ----अचोSन्त्यादि टि । ( १.१.६३ ), 
.......(०७) " इच् " --- इच एकाचोSम्प्रत्ययवच्च । (६.३.६६ ), 
........(०८) " एच् " ----- एचोSयवायावः । ( ६.१.७५ ), 
........(०९) " ऐच् " ----- वृद्धिरादैच् । ( १.१.१ ),
(ङ) हयवरट् ----- इससे एक प्रत्याहार बनता है । 
...(१०) " अट् " ----- शश्छोSटि । ( ८.४.६२ )
(च) लण् ----- इससे तीन प्रत्याहार बनते हैं ।
........(११) " अण् " ----- अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः । (१.१.६८ ), 
........(१२) " इण् " ----- इण्कोः । ( ८.३.५७ ), 
........(१३) " यण् " ----- इको यणचि । ( ६.१.७४ )

(छ) ञमङणनम् ----- इससे चार प्रत्याहार बनते हैं ।
........(१४) " अम् " ----- पुमः खय्यम्परे । ( ८.३.६ ), 
........(१५) " यम् " ----- हलो यमां यमि लोपः ।               ( ८.४.६३ ), 
........(१६) " ङम् " ----- ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम् । ( ८.३.३२ ), 
........(१७) " ञम् " ----- ञमन्ताड्डः । ( उणादि सूत्र — १.१.१४ )

(ज) झभञ् ----- इससे एक प्रत्याहार बनता है । 
........(१८) " यञ् " ----- अतो दीर्घो यञि ।                   ( ७.३.१०१ )

(झ) घढधष् ----- इससे दो प्रत्याहार बनते हैं ।
........(१९) "झष् " और 
........(२०) " भष् " ----- एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः । ( ८.२.३७ )

(ञ) जबगडदश् ----- इससे छः प्रत्याहार बनते हैं ।
........(२१) " अश् " ----- भोभगोSघो अपूर्वस्य योSशि । ( ८.३.१७ ), 
........(२२) " हश् " ----- हशि च । ( ६.१.११० ), 
........(२३) " वश् " ----- नेड् वशि कृति । ( ७.२.८ ), 
........(२४) " झश् ", 
........(२५) " जश् " ----- झलां जश् झशि ।                 ( ८.४.५२ ), 
........(२६) " बश् " ----- एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः । ( ८.२.३७ )

(ट) खफछठथचटतव् --- इससे एक प्रत्याहार बनता है । 
........(२७) " छव् " ----- नश्छव्यप्रशान् । ( ८.३.७ )

(ठ) कपय् ----- इससे पाँच प्रत्याहार बनते हैं ।
........(२८) " यय् " ---- अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ।    ( ८.४.५७ ), 
........(२९) " मय् " ----- मय उञो वो वा । ( ८.३.३३ ), 
........(३०) " झय् " ----- झयो होSन्यतरस्याम् । ( ८.४.६१ ), 
........(३१) " खय् " ----- पुमः खय्यम्परे । ( ८.३.६ ), 
........(३२) " चय् " ----चयो द्वितीयः शरि पौषकरसादेः । (वार्तिकः--- ८.४.४७ ),

(ड) शषसर् ----- इससे पाँच प्रत्याहार बनते हैं ।
........(३३) " यर् " ----- यरोSनुनासिकेSनुनासिको वा । ( ८.४.४४ ), 
........(३४) " झर् " ----- झरो झरि सवर्णे । ( ८.४.६४ ), 
........(३५) " खर् " ----- खरि च । ( ८.४.५४ ), 
........(३६) " चर् " ----- अभ्यासे चर्च । ( ८.४.५३ ), 
........(३७) " शर् " ----- वा शरि । ( ८.३.३६ ),
(ढ) हल् ----- इससे छः प्रत्याहार बनते हैं ।
........(३८) " अल् " ----- अलोSन्त्यात् पूर्व उपधा ।  (१.१.६४ ), 
........(३९) " हल् " ----- हलोSनन्तराः संयोगः ।  (१.१.५७ ), 
........(४०) " वल् " ----- लोपो व्योर्वलि । ( ६.१.६४ ), 
........(४१) " रल् " ----- रलो व्युपधाद्धलादेः सश्च ।  (१.२.२६ ), 
........(४२) " झल् " ----- झलो झलि । ( ८.२.२६ ), 
........(४३) " शल् " ----- शल इगुपधादनिटः क्सः । ( ३.१.४५ )

आदि वर्ण के अनुसार ४३ प्रत्याहार
........(क) अकार से ८ प्रत्याहारः---(१) अण्, (२) अक्, (३) अच्, (४) अट्, (५) अण्, (६) अम्, (७) अश्, (८) अल्,

........(ख) इकार से तीन प्रत्याहारः--(९) इक्, (१०) इच्, (११) इण्,
........(ग) उकार से एक प्रत्याहारः--(१२) उक्,
........(घ) एकार से दो प्रत्याहारः---(१३) एङ्, (१४) एच्,
........(ङ) ऐकार से एकः---(१५) ऐच्,
........(च) हकार से दो---(१६) हश्, (१७) हल्,
........(छ) यकार से पाँच---(१८) यण्, (१९) यम्, (२०) यञ्, (२१) यय्, (२२) यर्,
........(ज) वकार से दो---(२३) वश्, (२४) वल्,
........(झ) रेफ से एक---(२५) रल्,
........(ञ) मकार से एक---(२६) मय्,
........(ट) ङकार से एक---(२७) ङम्,
........(ठ) झकार से पाँच---(२८) झष्, (२९) झश्, (३०) झय्, (३१) झर्, (३२) झल्,
........(ड) भकार से एक---(३३) भष्,
........(ढ) जकार से एक--(३४) जश्,
........(ण) बकार से एक---(३५) बश्,
........(त) छकार से एक---(३६) छव्,
........(थ) खकार से दो---(३७) खय्, (३८) खर्,
........(द) चकार से एक---(३९) चर्,
........(ध) शकार से दो---(४०) शर्, (४१) शल्,

इसके अतिरिक्त 

........(४२) ञम्--- एक उणादि का और 
........(४३) चय्---एक वार्तिक का, 

कुल ४३ प्रत्याहार हुए।
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वर्णविभागः  
वर्णाः द्विविधम् । स्वराः व्यञ्जनानि च इति ।
अर्थ:-(वर्ण दो प्रकार के होते हैं स्वर और व्यञ्जन)
स्वराः 
अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ - इत्येते नव स्वराः । तेषु अ, इ, उ, ऋ - स्वराणां दीर्घरूपाणि सन्ति - आ, ई, ऊ, ॠ । अतः स्वराः त्रयोदश । अ, इ, उ, ऋ, लृ - एते पञ्च ह्रस्वस्वराः । 
अन्ये दीर्घस्वराः। एतेषु- (ए, ऐ, ओ, औ )- एते संयुक्तस्वराः सन्ध्य्क्षराणि इति वा निर्दिश्यन्ते । स्वराणाम् उच्चारणाय स्वीक्रियमाणं कालमितिम् अनुसृत्य स्वराः ह्रस्वः, दीर्घः, प्लुतः इति त्रिधा विभक्ताः सन्ति ।
एकमात्रो भवेद् ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घम् उच्यते । त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ॥१।
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येष
ां स्वराणाम् उच्चारणाय एकमात्रकालः भवति ते ह्रस्वाः स्वराः । उदाहरण।- (अ, इ)
येषां स्वराणाम् उच्चारणाय द्विमात्रकालः भवति ते दीर्घाः स्वराः । उदाहरण - (आ, ई)
येषां स्वराणाम् उच्चारणाय द्विमात्रकालाद् अपेक्षया अधिकः कालः भवति ते प्लुताः स्वराः । उदाहरण।। - (आऽ, ईऽ)
संयुक्ताक्षरं / सन्ध्यक्षरं नाम स्वरद्वयेन अक्षरद्वयेन सम्पन्नः स्वरः अक्षरम् वा । उदाहरण । - (ए = अ + इ) अथवा अ + ई /आ + इ / आ + ई ।
 ऐ = अ + ए / आ + ए, । ओ=अ + उ / अ + ऊ / आ + उ / आ + ऊ, औ = अ + ओ / आ + औ
व्यञ्जनानि-
उपरि दर्शितेषु माहेश्वरसूत्रेषु पञ्चमसूत्रतः अन्तिमसूत्रपर्यन्तं व्यञ्जनानि उक्तानि । व्यञ्जनानि (३३) । तानि वर्गीयव्यञ्जनानि अवर्गीयव्यञ्जनानि इति द्विधा । क्-तः म्-पर्यन्तं वर्गीयव्यञ्जनानि । अन्यानि अवर्गीव्यञ्जनानि ।
वर्गीयव्यञ्जनानि-
१-कण्ठ्यः - क् ख् ग् घ् ङ् - एते कवर्गः - कण्ठ्यः - एतेषाम् उच्चारणस्थानं कण्ठः।
२-तालव्यः -च् छ् ज् झ् ञ् - एते चवर्गः - तालव्यः - एतेषाम् उच्चारणावसरे जिह्वा तालव्यस्थानं स्पृशति।
३-मूर्धन्यः-ट् ठ् ड् ढ् ण् - एते टवर्गः - मूर्धन्यः - एतेषाम् उच्चारणावसरे मूर्धायाः स्थाने भारः भवति।

४-दन्त्यः-त् थ् द् ध् न् - एते तवर्गः - दन्त्यः - एतेषाम् उच्चारणावसरे जिह्वा दन्तान् स्पृशति।
५-औष्ठ्य। प् फ् ब् भ् म् -औष्ठौ एते पवर्गः एतेषाम् उच्चारणावसरे  परस्परं स्पृशतः।
_____
वर्गीयव्यञ्जनेषु प्रतिवर्गस्य आदिमवर्णद्वयं खर्वर्णाः / कर्कशव्यञ्जनानि ।
(वर्ग के प्रारम्भिक दो वर्ण खर अथवा-
 कर्कश वर्ण होते हैं )
अन्तिमवर्णद्वयं हश्वर्णाः / मृदु व्यञ्जनानि ।
(अन्तिम दो वर्ण ही अथवा मृदु होते हैं )
अवर्गीयव्यञ्जनानि-
(य् र् ल् व्) - अन्तस्थवर्णाः(श् ष् स् ह् )- ऊष्मवर्णाः
अवर्गीयव्यञ्जनेषु श् ष् स् - एते कर्कशव्यञ्जनानि । अवशिष्टानि मृदुव्यञ्जनानि ।

प्रतिवर्गस्य प्रथमं तृतीयं पञ्चमं च व्यञ्जनं य् र् ल् व् च अल्पप्राणाः ।
अर्थ: •प्रत्येक वर्ग का प्रथम तृतीय पञ्चम व्यञ्जन और अन्त:स्थ अल्पप्राण होते हैं ।।
 अवशिष्टाः महाप्राणाः ।अर्थ• अवशेेेष ( बचे हुए) वर्ण महाप्राण हैं ।
प्रत्येकस्य वर्गस्य पञ्चमं व्यञ्जनं (ङ् ञ् ण् न् म्) अनुनासिकम् इति उच्यते । कण्ठादिस्थानं नासिका - इत्येतेषां साहाय्येन अनुनासिकाणाम् उच्चारणं भवति ।
अनुस्वारः, विसर्गः👇। अ इ उ । और ये परवर्ती 'इ' तथा 'उ' स्वर भी केवल 'अ' स्वर के उदात्त व( ऊर्ध्वगामी ) 'उ' । 
तथा अनुदात्त व (निम्न गामी) 'इ' के रूप में हैं । 
ऋ तथा ऌ स्वर न होकर क्रमश पार्श्वविक तथा आलोडित रूप है।

 जो उच्चारण की दृष्टि से मूर्धन्य तथा वर्त्स्य 
( दन्तमूलीय रूप ) है । अब 'ह' वर्ण महाप्राण है । 
जिसका उच्चारण स्थान  काकल है ।

 👉👆👇-मूलत: ध्वनि के प्रतीक तो 28 हैं । 
(अं) अम् इत्येषः अनुस्वारः । अस्य चिह्नमस्ति उपरिलिख्यमानः बिन्दुः । अः इत्येषः विसर्गः । अस्य चिह्नमस्ति वर्णस्य पुरतः लिख्यमानं बिन्दुद्वयम् । क् ख् - वर्णयोः पृष्ठतः विद्यमानः विसर्गः जिह्वामूलीयः इति कथ्यते ।
 प् फ् - वर्णयोः पृष्ठतः विद्यमानः विसर्गः उपध्मानीयः इति कथ्यते ।
___________       
संस्कृत व्याकरण के कुछ पारिभाषिक शब्द-
१-विकरण
विकरण- व्याकरण में क्रियारूपों की रचना के समय धातु और कालवाचक लकार प्रत्ययों के मध्य में रखे जानेवाले विंशिष्ट गणद्योतक प्रत्यय अथवा चिह्न।

अध्याय-पञ्चविञ्शति (25)


आगमप्रकरणम् मण्डूकोपनिषद-
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥१॥
अर्थ:-ओ३म्  अक्षर यह  सर्वस्व है। इसकी स्पष्ट व्याख्या है । जो कुछ अतीत, वर्तमान और भविष्य है, वही "ओ३म्"  ही है । जो समय की त्रिगुणात्मक अवधारणा से परे है, वह भी वास्तव में "ओ३म्"  ही है ।१। (मण्डूकोपनिषद)-
भारतीय संस्कृति मौलिक संस्कृति होते हुए भी विश्व की अन्य  संस्कृतियों की उपजीवी है। जैसे यूरोपीय, सेैमेटिक और हैमेटिक -हिब्रू आदि भारतीय संस्कृति अपने प्रारम्भिक रूप में इनकी सहवर्ती  भी रही है। सम्भवत: इस बात के अधिक साक्ष्य हैं कि विश्व की कभी एक ही  समष्टि संस्कृति थी । जो कालान्तर में जलवायु" देश, परिस्थितियों और प्रव्रजन के परिणाम स्वरुप  व्यतिरेक (वैषम्य) होने से अनेक रूपों में उद्भासित हुई। भारतीय पुराणों में जो  पात्र और देव सूचीयाँ हैं उसका तादात्म्य सुदूर मैसोपोटामिया ( ईरान -ईराक) से लेकर मिश्र , यूनान, जर्मन और उत्तरी ध्रुवीय देश सुदूर नॉर्स तक व्याप्त है। इन्हीं एकरूपतामूलक सांस्कृतिक सन्दर्भों का यहाँ आंशिक रूप से प्रकाशन किया गया है। इस प्रकरण को "ओ३म्" शब्द की व्याख्या से प्रारम्भ करते है।
"ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वेदेवास आगत  दाश्वांसो दाशुषः सुतम्॥७॥ 
अनुवाद:-हे विश्वदेवा ! आप सबकी रक्षा करने वाले, सभी प्राणीयों के आधारभूत और सभी को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। अत: आप इस सोम युक्त हवि देने वाले यजमान के यज्ञ में पधारें।[ऋग्वेद 1.3.7]
हे विश्वेदेवा ! तुम रक्षक, धारणकर्ता और दाता हो। इसलिए इस हविदाता के यज्ञ को प्राप्त होओ। ऋग्वेद 1/3/7  यजुर्वेद -अध्याय »7 ऋचा » 33 में समान है।
"सायण भाष्य-१-हे “विश्वदेवासः =एतन्नामका देवविशेषाः २-“दाशुषः-दाता का =हविर्दत्तवतो यजमानस्य  ३-“सुतम्= अभिषुतं सोमं प्रति ।
४-“आगत= आगच्छत । ते च देवाः ५-"ओमासः =रक्षकाः ५“चर्षणीधृतः= मनुष्याणां धारकाः ६-“दाश्वांसः =फलस्य दातारः । ‘मनुष्याः' इत्यादिषु पञ्चविंशतिसंख्याकेषु मनुष्यनामसु चर्षणिशब्दः ( नि. २. ३. ८) पठितः।
‘अश्विनौ' इत्यादिष्वेकत्रिंशत्संख्याकेषु देवविशेषनामसु • विश्वेदेवाः साध्याः' (नि, ५. ६. २७ ) इति पठितम् । एतामृचं यास्क एवं व्याख्यातवान्-‘ अवितारो वा अवनीया वा मनुष्यधृतः सर्वे च देवा इहागच्छत दत्तवन्तो दत्तवतः सुतमिति तदेतदेकमेव वैश्वदेवं गायत्रं तृचं दशतयीषु विद्यते यत्तु किंचिद्बहुदैवतं तद्वैश्वदेवानां स्थाने युज्यते यदेव विश्वलिङ्गमिति शाकपूणिः । (निरु.१२.४० ) इति ।

अत्र विश्वशब्दः सर्वशब्दपर्याय इति यास्कस्य मतम् । देवविशेषस्यैवासधारणं लिङ्गमिति शाकपूणेर्मतम् "अवन्ति इति ओमासः देवाः । ‘मन् ' इत्यनुवृत्तौ ‘अविसिवि सिशुषिभ्यः कित्' (उ. सू. १. १४१ ) इति मन्प्रत्ययः"
 ज्वरत्वरस्रिव्यविभवामुपधायाश्च' (पाणिनीय सूक्त ६.४.२०) इति ऊठ्। मनः कित्त्वेऽपि बाहुलकत्वाद्गुणः । ‘आज्ज़सेरसुक्’ (पाणिनीय सू. ७. १.५०) इति जसेः वसु गा अहम् आमन्त्रिताद्युदात्तत्वम्। चर्षणयो मनुष्याः। तान् वृष्टिदानादिना धारयन्तीति चर्षणीधृतः देवाः । पूर्वस्यामन्त्रितस्य सामान्यवचनस्य ‘विभाषितं विशेषवचने बहुवचनम् ' ( पा. सू. ८. १, ७४ ) इति अविद्यमानवत्वप्रतिषेधात् अपादादित्वेन निघातः ननु अत एव विद्यमानवत्वात् ‘सुबामन्त्रिते°'( पाणिनीय सू. २. १. २) इति पराङ्गवत्वेनैकपदीभावात् पदादपरत्वेन कथं निघात इति चेत् , न । ‘वत्करणं स्वाश्रयमपि यथा स्यात् '( पाणिनीय म. ८. १.७२ ) इति वचनात् पदभेदप्रयुक्तस्य । निघातस्याप्युपपत्तेः । ऐकपद्येऽप्याद्युदात्तत्वे ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' (पा. सू. ६. १. १५८ ) इति सुतरामेव निघातो भविष्यति। इत्थमेव तर्हि द्रवत्पाणी शुभस्पती' इत्यत्रापि पराङ्गवत्त्वेनैकपद्यादुत्तरस्य शेषनिघातप्रसङ्ग इति चेत्, न । तत्र पराङ्गवद्भावस्य परेण ' आमन्त्रितं पूर्वमविद्यमानवत् ' ( पा. सू. ८. १. ७२ ) इत्यविद्यमानवद्भावेन बाधितत्वात् । इह पुनः ‘विभाषितं विशेषवचने बहुवचनम् । इत्यविद्यमानवत्त्वस्य निषेधात् । पूर्वस्याप्यामन्त्रितस्य विद्यमानवत्वात् पराङ्गवत्त्वं स्वीकृतमिति वैषम्यम् । विश्वे । पादादित्वादाद्युदात्तः । गणदेवतावचनश्चात्र विश्वशब्दो न सर्वं शब्दपर्याय इति विशेष्यपरतया सामान्यवचनत्वात् "ओमासः इत्यनेन न सामानाधिकरण्यम् । सामानाधिकरण्ये हि पूर्वस्य पादस्य पराङ्गवद्भावे सति ‘मित्रावरुणावृतावृधौ ' इत्यादाविव अत्राप्यामन्त्रिताद्युदात्तता न स्यात् । विश्वे इत्यस्य विशेषणं देवासः इति । दीव्यन्तीति देवाः प्रकाशवन्तः । ननु अवयवप्रसिद्धेः समुदायप्रसिद्धिर्बलीयसी' (परिभा° ९८) इति रूढ एवार्थों देवशब्दस्य ग्राह्यो न यौगिकः । यौगिकत्वे ह्यवयवार्थानुसंधानव्यवधानेन प्रतिपत्तिर्विक्षिप्ता स्यात् । समुदायप्रसिद्धौ तु न विक्षेप इति चेत्, न । समुदायप्रसिद्धौ हि देवशब्दस्य सामान्यपरतया विशेषवचनत्वाभावात् ‘विभाषितं विशेषवचने बहुवचनम्' इत्यनेनानिषिद्धत्वात् विश्वे इत्यस्याविद्यमानवत्वेन शुभस्पती इति पदवत् देवासः इत्यस्यापि आद्युदात्तत्वं स्यात् । स्वरानुसारेण च रूढित्यागेनापि देवशब्दस्य योगस्वीकारो युक्त एव । आ गत आगच्छत । ‘बहुलं छन्दसि' (पा. सू. २. ४. ७३) इति शपो लुकि सति ‘अनुदात्तोपदेश' (पा. सू. ६. ४. ३७ ) इत्यादिना मकारलोपः । आङः पदात्परत्वात् निघातः । दाश्वांसः । ‘दाशृ दाने ' इत्यस्य क्वसौ “ दाश्वान् साह्वान् मीढ्वांश्च ' (पा. सू. ६. १. १२ ) इति निपातनात् क्रादिनियमप्राप्तः इडागमो (पा. सू. ७. २. १३) द्विर्वचनं च न भवति । प्रत्ययस्वरेण क्वसोरुदात्तत्वम् । दाशुष इत्यत्र ‘वसोः संप्रसारणम् ' ( पा. सू. ६. ४. १३१ ) इति संप्रसारणम् । ‘ संप्रसारणाच्च' (पा. सू. ६ १. १०८) इति पूर्वरूपत्वम् । “ आदेशप्रत्यययोः' (पा. सू. ८. ३. ५९ ) इति षत्वम् ॥
 "ओमन्वत् ओमयुक्ते रक्षके “ओमन्वन्तं चक्रथुः सप्त वध्रय” ऋ० १०/३९/९ । 
"उपर्युक्त ऋचाओं में ओमास: और ओमन्वत् पद का अर्थ = रक्षक सायण ने किया है । ओ३म् शब्द प्लुत स्वर से युक्त शब्द है; जिसकी व्युत्पत्ति  अव् - रक्षणे धातु में + मन् उणादि प्रत्यय करने से हुई है। प्लुत स्वर है जिसमें तीन मात्राओं का योग होता है; जिसका प्रयोग किसी को दूर से सम्बोधित करने के लिए होता है। व्याकरण शास्त्र में उच्चारण के काल भेद से वर्ण चार प्रकार के निश्चित किये गये हैं।
"एकमात्रो भवेद् ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते । त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनं चार्द्धमात्रकम्” 
 " छन्दोमञ्जरी- प्रचीनकारिका । 
अर्थात एक मात्रा का समय ह्रस्व, द्विमात्रा का समय दीर्घ, और तीन मात्रा का समय प्लुत है। और व्यञ्जन की अर्द्ध मात्रा होती है और वे विना स्वर संयोग के बोले नहीं जा सकते हैं। और इसी लिए ओ३म् शब्द के मध्य में(३)का अंक तीन मात्राओं का प्रतीक है।
विदित हो कि "ओ३म्" की रक्षण क्रिया ईश्वरीय सत्ता का मौलिक गुण है। अत: "ओ३म्"  ईश्वर का वाचक है।
" सेल्ट के द्रविड पुरोहितों में "ओ३म्" "ओघम्" के रूप में भाषा और वाणी के देव का वाचक है।-
"ओ३म्" शब्द  की अवधारणा के मूल श्रोत द्रविडों की सांस्कृतिक अभिव्यञ्जना में निहित हैं। प्रख्यात ओघम वर्णमाला के विद्वान (आर•ए•एस मैकलिस्टर) द्वारा प्रस्तुत एक तीसरा सिद्धान्त एक समय में प्रभावशाली था,परन्तु आज विद्वान इसके बहुत कम पक्ष में  हैं। एक विद्वान"मैकलिस्टर का मानना ​​था कि "ओघम" का आविष्कार पहली बार सिसालपाइन गॉल में लगभग 600 ईसा पूर्व में गॉलिश ड्र्यूडों द्वारा हाथ के संकेतों की एक गुप्त

प्रणाली के रूप में किया गया था, और उस समय यह उत्तरी इटली में वर्तमान ग्रीक वर्णमाला के एक रूप से प्रेरित थे। इस सिद्धांत के अनुसार, वर्णमाला को मौखिक रूप में या केवल लकड़ी पर प्रसारित किया गया था, जब तक कि इसे प्रारंभिक ईसाई आयरलैंड में पत्थर के शिलालेखों पर लिखित रूप में नहीं रखा गया था।
(सैल्ट जन जाति के धर्म साधना के रहस्यमयी अनुष्ठानों में  इसी कारण से आध्यात्मिक और तान्त्रिक क्रियाओं को प्रभावात्मक बनाने के लिए ओघम् (ogham) शब्द का दृढता से दैवीय उच्चारण विधान किया जाता था । यह बात है कई सहस्राब्दी पूर्व की कि उनका विश्वास था )
"कि इस प्रकार आउमा (Ow-ma) अर्थात् जिसे भारतीय देव संस्कृतियों के अनुयायी ने ओ३म् रूप में साहित्य और कला के ज्ञान के उत्प्रेरक और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया था वह ओ३म् प्रणवाक्षर नाद- ब्रह्म स्वरूप है
"पशुओं में गाय ही है जो ओ३म् का शुद्ध उचारण करती है।  विदित हो कि सेल्टिक संस्कृति में ओग्मा: भाषण और भाषा का देव है।
इतिहासकार- वेस्ली हूपर के अनुसार ~ "तूता दे दानान "(दनु की सन्तानें) की कहानी में,  हम ऐसे कई सेल्टिक देवी-देवताओं को संज्ञान में लाते हैं। "दग्दा और दनु के कई पुत्र और पुत्रियाँ थीं जिनमें से एक का नाम ओग्मा भी था जो सबसे गोरा था। भारतीय पुराणों में "दनु" का उल्लेख दानवों की माता और कश्यप की पत्नी  रूप में हुआ है। जोकि दक्ष की एक पुत्री है।"दक्षकन्याभेदे सा च कश्यपर्षिपत्नी दानवमाता " दक्ष की कन्या और महर्षि कश्यप की पत्नी दानवों की माता का दनु है। सेल्टिक मिथको के अनुसार "ओघमा" को काव्य- कौशल और लेखन की क्षमता का उपहार मिला था। यह अक्सर कहा जाता था कि उसके बालों से सूरज की किरणें निकली और जैसा कि "पीटर बेरेसफोर्ड एलिस" अपनी किताब" द क्रॉनिकल्स ऑफ द सेल्ट्स " में लिखते हैं, 'उसे सनी काउंटेनेंस का (ओग्मा ग्रियन-एनीएकग) कहा जाता था।' वास्तव में यह देव इतना प्रतिभाशाली था कि उसने मनुष्य के लिए ओघम के नाम पर भाषण लिखने की एक पद्धति का विचार किया। यह उपहार ओग्मा के धूपदार चेहरे की किरणों से अवतरित किया गया। कहा जाता है कि ओग्मा ने कई भाषाओं और कविताओं की सृष्टि की थी जिसमें उन्होंने प्रकाश की किरणों के माध्यम से मनुष्यों को ये सब सिखायी।"ओगमा की इस प्रेरणा को तब से अवेन(Awen)  के रूप में जाना जाता है और अक्सर इसे कवियों और लेखकों द्वारा समान रूप से लागू किया जाता है।  और भारतीय संस्कृति में भी आजतक  "ओ३म्" शब्द का उच्चारण किसी भी धार्मिक पाठ की समाप्ति और प्रारम्भ करने पर धार्मिक ग्रन्थों में अवशिष्ट है। 
"द्रविड-बनाम द्रूइड-(DRUIDS) ओ३म् की व्युत्पत्ति- मूलक व्याख्या 
"ओ३म्" शब्द की व्युत्पत्ति- एक वैश्विक विश्लेषण यादव योगेश कुमार 'रोहि' के द्वारा 
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प्राचीन भारतीय देव संस्कृतियों की मान्यताओं के अनुसार इस ओ३म्' के उच्चारण प्रभाव से  सम्पूर्ण भाषा की आक्षरिक सम्पत्ति (syllable prosperity) यथावत् रहती है। ओघम् का मूर्त प्रारूप (🌞) सूर्य के आकार या सादृश्य पर था। जैसी कि प्राचीन पश्चिमीय संस्कृतियों की भी ये मान्यताऐं  हैं। वास्तव में ओघम् (ogham) से बुद्धि उसी प्रकार नि:सृत होती है- जैसे सूर्य से उसका प्रकाश प्राचीन मध्य मिश्र के लीबिया प्रान्त में तथा थीब्ज में यही (आमोन् रा) (ammon- ra )के रूप में था। यद्यपि कुछ ईसाई और इस्लामिक विद्वान (अमोन रा) और आमीन का  कोई सम्बन्ध भले ही न मानते हों।
परन्तु अमोन रा का प्रारम्भिक रूप अमोन है जो मिश्र की संस्कृति और सभ्यता का सबसे प्रतिष्ठित देव है । वह मिश्र में भाषा कविता और साहित्य संरक्षण के देव है। जो वस्तुत: भारतीय मिथकों में भी  ओ३म् शब्द का विकास क्रम कुछ ऐसा ही है। ओ३म् एक अनाहत नाद है । जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में  निरन्तर गुञ्जायमान है । सूर्य में  नें निरन्तर यह ओ३म् ध्वनि निनादित है। -़ रवि सूर्रय का विशेषण इसी कारण से है क्यों कि रव नाद का वाचक शब्द है। रवि का  के तादात्मय मिश्र के "रा" से प्रस्तावित है। आधुनिक अनुसन्धानों के अनुसार भी अमेरिकीय अन्तरिक्ष यान -प्रक्षेपण संस्थान के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य में अजस्र रूप से निनादित "ओ३म् प्लुत स्वर का श्रवण किया है । पाणिनि ने "ओ३म् शब्द को धातुज मानकर उसकी व्युत्पत्ति "अव् धातु से उणादि "मन् प्रत्यय परक की है ।
"अव् धातु के धातुपाठ निम्न (19) अर्थ हैं ।
१-रक्षण,२-गति,३-कान्ति,४-प्रीति,५-तृप्ति,६-अवगम,७-प्रवेश,८-श्रवण,९-स्वाम्यर्थ,१०-याचना,११-क्रिया,१२-इच्छा,१३-दीप्ति,१४-अवाप्ति, १५-आलिङ्गन,१६-हिंसा,१७-दान,१८-भाग,१९- वृद्धिषु। इनमें रक्षण कान्ति दीप्ति अवाप्ति और वृद्धि आदि अर्थ ईश्वरीय सत्ताओं के वाचक हैं। और रवि संज्ञा भी है ।

ओ३म् इस समग्र सृष्टि के आदि में प्रादुर्भूत एक अनाहत निरन्तर अनुनिनादित नाद है । ऐसा लगता कि उस अनन्त सत्ता का जैसे प्रकृति से साक्षात् संवाद है । (ॐ ) शब्द को भारतीयों ने सर्वाधिक पवित्र शब्द तथा ईश्वर का वाचक माना ,उस ईश्वर का वाचक जो अनन्त है । यजुर्वेद के अध्याय ४०की  १७ वीं  ऋचा में कहा गया है "ओम खम् ब्रह्म  ओम ही नाद ब्रह्म है। प्राचीन भारतीय संस्कृति में सूर्य का वाचक रवि शब्द भी है । मिश्र की संस्कृति में जिसे रा रहा गया है ।
लैटिन भाषा में (omnis) सम्पूर्णता का वाचक है। रविः अदादौ रु शब्दे । रू धातु का परस्मैपदीय प्रथम पुरुष एक वचन का रूप है रौति अर्थात् जो ध्वनि करता है । (रूयते स्तूयते इति  रवि:। रु + “ अच  इः ।“ उणाणि सूत्र ४।१३८। इति इः)  सूर्य्यः अर्कवृक्षः।  इत्यमरःकोश ॥ 
सूर्य्यस्य भोग्यं दिनं वार रूपम् ॥ 
यथा “ रवौ वर्ज्ज्यं चतुःपञ्च सोमे सप्त द्बयं तथा “इत्यादिवारवेलाकथने समयप्रदीपः ॥
पौराणिक ग्रन्थों में रविः शब्द की काल्पनिक व्युपत्ति की गयी है  वह भी अव् धातु से । देखें ''रवि'' ¦ पु॰ (अव्--इन् रुट्च्)१ सूर्य्ये । ज२ अर्कवृक्षे च“अचिरात्तु प्रकाशेन अवनात् स रविः स्मृतः” मत्स्यपुराणतन्नामनिरुक्तिः। अर्थात् मत्स्य पुराण में रवि शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए बताया है कि दीर्घ काल से प्रकाश के द्वारा जो रक्षा करता है वह रवि है ।
अव् धातु का एक अर्थ -रक्षा करना भी है ।
वस्तुत यह व्युत्पत्ति आनुमानिक व काल्पनिक है  वस्तुस्थिति तो यह है कि रवि ध्वनि-परक विशेषण है। रवि संज्ञा का विकास  "रौति इति -रवि  यहशब्द रु-शब्दे धातु से  व्युत्पन्न है । अर्थात्‌ सूर्य के विशेषण ओ३म्'और -रवि ध्वनि अनुकरण मूलक हैं। सैमेटिक -- सुमेरियन ,हिब्रू आदि संस्कृतियों में हैमेटिक "ओमन् शब्द "आमीन के रूप में है। तथा रब़ का अर्थ नेता तथा महान होता हेै। जैसे रब्बी यहूदीयों का धर्म गुरू है ।अरबी भाषा में रब़ -- ईश्वर का वाचक है। अमोन तथा रा प्रारम्भ में पृथक पृथक देव  थे। और दौनों सूर्य सत्ता के वाचक थे । मिश्र की संस्कृति में ये दौनों कालान्तरण में एक रूप होकर (अमॉन रॉ )  में परिवर्तित हो गये और अत्यधिक पूज्य हुए ! क्योंकी प्राचीन मिश्र के लोगों की मान्यता थी कि (अमोन-रॉ) ही सारे विश्व में प्रकाश और ज्ञान का प्रसारण है। मिश्र की परम्पराओ से ही यह शब्द मैसोपोटामिया की सैमेटिक हिब्रु आदि परम्पराओं में निर्यात होकर प्रतिष्ठित हुआ जो क्रमशः यहूदी ( वैदिक यदुः ) के वंशज थे  । इन्हीं से ईसाईयों में आमेन (Amen ) तथा  ईसाईयों से अ़रबी भाषा में  आमीन् !! (ऐसा ही हो ) एक स्वीकारात्मक अव्यय के रूप में धार्मिक रूप इबादतो में प्रतिष्ठित हो गया।  इतना ही नहीं जर्मन लोग मनु के वंशज ओ३म् का सम्बोधन omi /ovin  के रूप में अपने ज्ञान के देव वॉडेन ( woden) के लिए  करते थे। क्यों कि वह भी ज्ञान का संरक्षक देव था। जो भारतीयों में  बुध ज्ञान का देवता था इसी बुधः का दूसरा सम्बोधन  जर्मन वर्ग की भाषासओं में (OUVIN ) ऑविन भी था। यही (woden) ही  अंग्रेजी में (Goden) होते हुए अन्त में आज( God ) बन गया है।जिससे कालान्तर में गॉड (god )शब्द बना है। जो फ़ारसी में (ख़ुदा) के रूप में प्रतिष्ठित हैं।यद्यपि कुछ यूरोपीय भाषाविद् गॉड शब्द की व्युत्पत्ति आदि जर्मनिक शब्द -guthan- गुथान से मानते हैं यह उनका अनुमान ही है । ऑक्सफोर्ड एटिमोलॉजी इंग्लिश डिक्शनरी में गॉड(God)  शब्द की व्युत्पत्ति क्रम निम्नलिखित रूप में दर्शाया गया है। "Old English god "supreme being the Christian God word;  from Proto-Germanic word  *guthan (गुथान) its too (source also of Old Saxon, Old Frisian, Dutch god, Old High German got, German Gott, Old Norse guð, Gothic guþ), which is of uncertain origin;  perhaps from Proto Indo Europion- *ghut-घुत "that which is invoked-"जिसका आह्वान किया गया हो  (who has been summoned) जिसे आहूत किया गया हो। (source also of Old Church Slavonic zovo "to call," Sanskrit huta- "invoked," an epithet of Indra) from root *gheu(e)- "to call, invoke." The notion could be "divine entity summoned to a sacrifice."
हिब्रू भाषा का यहोवा शब्द भी सम्भवत: वैदिक यह्व: का प्रतिरूप है। जिसकी व्युत्पत्ति अनिश्चित सी है। सस्कृत कोशकार भी यह्व: शब्द की व्युत्पत्ति का विवरण सन्तोष जनक रूप में उद्धृत नही करते हैं। वाचस्पत्यम् कोशकार यह्व: शब्द को यज्-  धातु परक मानकर यज्ञ धातु में उणादि प्रत्यय वन् लगाकर करता है। जबकि ह्वे-आह्वान करना धातु यह्व में स्पष्ट परिलक्षित है। शब्दकोशीय व्युत्पत्ति देंखे-

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 यह्व: (यजतीति - यज + वन्=  शेवायह्वजिह्वाग्रीवाप्वामीवाः । “ उणादि १ ।  १५४ ।  इति वन्प्रत्ययेन निपातितः । )  यक्षमानः ।  इत्युणादिकोषः ॥  (त्रि  महान् ।  यथा   ऋग्वेदे । ३। १ । १२। “ उदुस्रिया जनिता यो जजानापां गर्भो नृतमो यह्वो अग्निः । “ यह्वो महान् । “  इति तद्भाष्ये सायणः ॥
परन्तु  " यह्व:य ह्वयते -जिस का आह्वान किया गया हो- "त्वं देवानामसि यह्व होता स एनान्यक्षीषितो यजीयान् ॥३॥ ऋग्वेद-10/110/3
"अबो॑ध्य॒ग्निः स॒मिधा॒ जना॑नां॒ प्रति॑ धे॒नुमि॑वाय॒तीमु॒षासं॑ ।य॒ह्वा इ॑व॒ प्र व॒यामु॒ज्जिहा॑नाः॒ प्र भा॒नवः॑ सिस्रते॒ नाक॒मच्छ॑ ॥१।।(ऋग्वेद -5/1/1)
वस्तुत: यहाँ उस यहोवा का वर्णन है जो सिनाई पर्वत पर मूसा को जलती झाड़ियो
में से आवाज देता है। जिसमें अग्नि का भी गुण है और आह्वान करने वाले का भी ।
विदित हो कि गॉड शब्द ; पुरानी इंग्लिश  "सर्वोच्च अस्तित्व, अथवा ईश्वर का वाचक है।; ईसाई गॉड प्रोटो-जर्मनिक ★-guthan- (गुथान) जो कि  (ओल्ड सैक्सन, ओल्ड फ़्रिसियाई, डच में गॉड, है। ओल्ड हाई जर्मन गॉट, जर्मन गॉट, ओल्ड नॉर्स गुड, गॉथिक गुउ का भी स्रोत) , जो अनिश्चित मूल का है; शायद मूल भारोपीय धातु ( मूल) हूत(ह्वे--क्त संप्रसारणम् । "जो आह्वान किया जाता है" से 
(ओल्ड चर्च स्लावोनिक ज़ोवो का स्रोत भी "कॉल करने के लिए," संस्कृत हुता- "आमंत्रित," है जो  इंद्र का एक विशेषण भी है )
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परन्तु गॉड शब्द की यह व्युत्पत्ति भी आनुमानिक व सिद्धान्त विहीन ही है। सम्भव यह भी है कि संस्कृत भाषा मे स्वतस्( स्व+तसिल्-) से फारसी ख़ुदा और खुद शब्द विकसित हुए हों और ख़ुदा ही अंग्रेजी में गॉड हो गया है।
सीरिया की सुरीली संस्कृति में यह  ओ३म् शब्द ऑवम् ( aovm ) हो गया है। वेदों में (ओमान्) शब्द बहुतायत से "रक्षक" के रूप में आया है । यद्यपि ओ३म् एक विस्मयादि बोधक अव्यय भी है। इसी का दूसरा नाम प्रणव है।
ओङ्कारः, पुं० (ओम् + कार प्रत्ययः ) प्रणवः । इत्यमरः कोश॥ (यथाह स्मृतिः जेेैसा कि स्मृतिग्रन्थों में कहा है गया है।
“ओङ्कारः पूर्व्वमुच्चार्य्यस्ततो वेदमधीयते” ओङ्कारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा ।
कण्ठं भित्त्वा विनिर्ज्जातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ”। इति व्याकरणटीकायां दुर्गादासःकृत।
व्याकरण टीकाकार दुर्गादास लिखते है कि  "(ओङ्कार) तथा "(अथ) ये दौनों शब्द पूर्व काल में ब्रह्मा के कण्ठ के भेदन करके उत्पन्न हुए अत: ये मांगलिक हैं। परन्तु यह भारतीय संस्कृति में तो यह भी मान्यता है। कि शिव (ओ३म्) ने ही पाणिनी को ध्वनि समाम्नाय के रूप में चौदह माहेश्वर सूत्रों की वर्णमाला प्रदान की ! 
जिससे सम्पूर्ण भाषा व्याकरण का निर्माण हुआ ।
पाणिनी पणि अथवा ( phoenici) पुरोहित थे जो मेसोपोटामिया की सैमेटिक शाखा के ही लोग थे। ये लोग द्रविडों से सम्बद्ध थे। 
और इन्होंने ही देश - दुनिया को भाषाओं का उपहार दिया। वस्तुत: यहाँ इन्हें द्रुज संज्ञा से अभिहित किया गया था । द्रविडों को  कही ड्रूयूड तो कहीं द्रुज भी कहा गया है। यह द्रुज जनजाति प्राचीन इज़राएल जॉर्डन लेबनॉन में तथा सीरिया में आज तक प्राचीन सांस्कृतिक मान्यताओं को सञ्जोये हुए है।  भले ही ईसाईयत और इस्लामिक प्रभावों से इनमें कुछ भौतिक परिवर्तन हुआ हो। परन्तु द्रुजों की जो प्राचीन मान्यत थी  वह आज भी है कि आत्मा अमर है तथा मनुष्य का  पुनर्जन्म कर्म फल के भोग के लिए होता है ।
ठीक यही मान्यता बाल्टिक सागर के तटवर्ति ( द्रयूड- पुरोहितों( druid prophet,s ) में प्रबल रूप  में मान्य  थी ! विदित हो कि फॉनिशियन ही वैदिक कालीन पणि लोग थे जो समुद्री यात्राओं द्वारा दूर देशों में व्यापार करते थे। द्रविड पहले पुरोहित थे जिन्होंने द्रव अथवा पदार्थ के साथ वृक्षों का भी जीवन विश्लेषण किया।  द्रविड फॉनिशयनों के सहवर्ती या उनसे सम्बन्धित थे। केल्ट ,वेल्स ब्रिटॉनस् आदि ने इस वर्णमाला को द्रविडों से ग्रहण किया था  और द्रविडों ने पणियों अथवा फॉनिशियनें से  ग्रहण किया।
"द्रविड अपने समय के सबसे बडे़ द्रव्य-वेत्ता और तत्व दर्शी थे ! जैसा कि द्रविड नाम से ही उनके नाम की सार्थकता  ध्वनित होती है। 

(द्रविड   द्रव + विद --  समाक्षर लोप से "द्रविड" शब्द का विकास हुआ .) ऊँ एक प्लुत स्वर है जो सृष्टि का आदि कालीन प्राकृतिक ध्वनि रूप है जिसमें सम्पूर्ण वर्णमाला समाहित है। इसके अवशेष एशिया - माइनर की पार्श्ववर्ती आयोनिया ( प्राचीन यूनान ) की संस्कृति में भी प्राप्त हुए है। यूनानी देव संस्कृति अनुयायी थे ज्यूस( द्यौस) और पॉसीडन ( पूषण अथवा विष्णु) की साधना के अवसर पर अमोनॉस (amonos) का उच्चारण करते थे। दर असल "एम्मोन" मिस्र के संप्रभु सूर्य-देव की ग्रीक और रोमन अवधारणा का नाम (Amun)(शाब्दिक रूप से "छिपा हुआ" कहा जाता है), भी "Amen"-Ra". यह वे जीवन के देवता, मेढा  के सिर वाले देवत्व के साथ भ्रमित थे, जिनकी लीबिया

में एक शानदार अभयारण्य में पूजा की जाती थी। 
ज्यूस( द्योस) बृहस्पति का नामान्तरण है तो पॉसीडन वैदिक देव (पूषण )का नामान्तरण है‌।
पूषण सूर्य का वाचक है। पुराणानुसार बारह अदित्यों में से एक। एक वैदिक देवता जिनकी भावना भिन्न भिन्न रूपों मे पाई जाती है। कहीं वे सूर्य के रूप में (लोकलोचन), कहीं पशुओं के पोषक के रूप में, कहीं धनरक्षक के रूप में ओर कहीं सोम के रूप में पाए जाता है।"इसी प्रकार प्राचीन सेल्टिक सभ्यता के दिशा-निर्देशकों को 'द्रविड' (Druids)  के नाम से अभिहित किया जाता है।  भारत के ब्राह्मणो में एक वर्ग द्राविड़ कहलाता है (देखें- ब्राह्मणों का वर्गीकरण 'पंचगौड़'  एवं 'पञ्चद्राविड़',)। 'द्रविड' (अथवा 'द्रुइड') का सेल्टिक भाषा में अर्थ है- '
ओक या बलूत के जंगलों में घूमने वाले उपदेशक और ओक या बलूत के पेड़ को ही द्रव कहा जाता है ग्रीक भाषा में द्रविड वन्य संस्कृति के प्रसारक   के रूप में कार्य करते थे।ये द्रव को जानते थे इस लिए इनको द्रविद-द्रविड कहा गया।
"ये द्रूड  प्राचीन सेल्टिक सभ्यता के संरक्षक थे। जनता के सभी वर्ग उनका बड़ा सम्मान करते थे।वे ही सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत, सभी प्रकार के विवादों में न्यायकर्ता भी थे । 
वे अपराधियों को दंड भी दे सकते थे। परन्तु वे युद्घ में भाग नहीं लेते थे, न सरकार को कोई कर देते थे।
वर्ष में एक बार ये द्रविड़ आल्पस पर्वत के परम्परागत रूप से उत्तर-पूर्व में किसी पवित्र स्थल पर इकट्ठा होते थे। इस प्रकार के धार्मिक वार्षिक सम्मेलन प्राचीनत्तम फ्रॉन्स( गॉल-Gaul) देश में भी होते थे । जहाँ अनातोलिया से लेकर आयरलैंड तक के द्रविड़ इकट्ठा होकर अपना प्रमुख पुरोहित चुनते थे। वहीं सब प्रतिनिधियों के बीच नीति विषयक बातें होती थीं। समस्त विवादों का, जो उन्हें सौंपे जाते, वे सम्यक्  निर्णय करते थे। ये वैसे ही सम्मेलन थे जैसे भारत में कुंभ मेले के अवसर पर सन्तों मनीषियों द्वारा होते थे।  वे साधारणतया अपने कर्मकाण्ड एवं पठन-पाठन बस्ती से दूर निर्जन जंगल में करते थे। द्रविड़ आत्मा की अनश्वरता और पुनर्जन्म पर दृढ़ विश्वास करते थे ,और मानते थे कि आत्मा एक शरीर से  दूसरे नवीन  शरीर (कलेवर) में प्रवेश करती है। इन देवमूर्तियों का वे पूजन भी करते थे। आंग्ल विश्वकोश के अनुसार- 'बहुत से विद्वान यह विश्वास करते हैं कि भारत के हिंदु ब्राह्मण और पश्चिमी प्राचीन सभ्यता के सेल्टिक 'द्रविड़' एक ही हिंदु-यूरोपीय पुरोहित वर्ग के अवशेष हैं।'
सेल्टिक सभ्यता के द्रविड़ (द्रुइड) के बारे में विद्वानों ने प्रारंभिक खोजों में 'उनके समय, उनकी दंतकथाओं, मान्यताओं, और  धारणाओं आदि के अध्ययन से यही निष्कर्ष निकाला कि वे भारत से आए दार्शनिक पुरोहित थे। वे भारत के ब्राह्मण थे अथवा भारत में यूरोपीय देशों से भारत में आये थे, जो उत्तर में साइबेरिया ('शिविर' देश) रूस से लेकर सुदूर पश्चिम आयरलैंड तक पहुँचे, जिन्होंने भारतीय सभ्यता को पश्चिम के सुदूर छोर तक पहुँचाया।' श्री पुरूषोत्तम नागेश ओक ने अपनी पुस्तक 'वैदिक विश्व-राष्ट्र का इतिहास' में यह संकेत किया है  जो कि उनका अपना पूर्वाग्रह ही है (देखें- अध्याय २३ और २४ पर इनका विवरण दिया है ), हैं।
वे उस समाज के पुरोहित, अध्यापक, गुरू, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, पंचांगकर्ता, खगोल ज्योतिषी, भविष्यवेत्ता, मंत्रद्रष्टा, वंदपाठी, धार्मिक क्रियाओं की परिपाटी चलाने वाले; प्रायश्चित आदि का निर्णय लेने वाले गुरूजन थे। यूरोप में उस शब्द का उच्चारण 'द्रुइड' रूढ़ है।'
भारतीय पुराणों में  जिस ओ३म् (ऊँ) शब्द के उच्चारण करने पर शूद्र अथवा निम्न समझी जाने वाली जन-जातियाें की जिह्वा का रूढि वादी परम्पराओं के अनुगामी पुरोहितों  द्वारा उच्छेदन तक करने का विधान पारित किया गया था।  उसी ओ३म् शब्द का प्रादुर्भाव उसी द्रविड संस्कृति से हुआ जो आज शूद्र वर्ण में समाहित कि गयी हैं। जिनके लिए उनका "ओ३म् शब्द के उच्चारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया हो । आज हम उस शब्द की जन्म-कुण्डली खोलेंने का प्रयास करेंगे -सर्वप्रथम हम यह प्रकाशिका कर दें कि द्रविड शब्द यूरोपीय इतिहास में ड्रयूड् नाम से  (Druid) हैं। और यही लोग प्राचीनत्तम विश्व में द्रव- ( जल, वायु आकाश , अग्नि और वनस्पति) के विद-वेत्ता थे  तथा वन्य संस्कृतियों के सूत्रधार व जन्मदाता थे ।
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सर्व-प्रथम हम विचार करते हैं "ओ३म्" शब्द के विकास की पृष्ठ-भूमि पर- विश्व इतिहास के सांस्कृतिक अन्वेषणों के उपरान्त कुछ तथ्यों से हम अवगत हुए । जैसे -सैल्ट जन जाति के धर्म साधना के रहस्य मय धार्मिक अनुष्ठानों में इसी  ओघम (OGHUM) शब्द का हुंकार नुमा उच्चारण आध्यात्मिक और तान्त्रिक क्रियाओं को प्रभावात्मक बनाने के लिए  दृढता से उच्चारण विधान किया जाता था । तो इसी के समानान्तरण मिश्र , असीरिया , असीरिया  स्वीडन या जर्मनिक ,आयोनिया , हिब्रूू सुमेरियन,

बैबीलोनियन आदि में भी कुछ अन्तर के साथ यह शब्द विद्यमान था।
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ड्रयूडस(Druids) संस्कृति के  विश्वास करने वालों का मत था !  कि इस प्रकार आउ-मा (Ow- ma) अर्थात् जिसे भारतीय आर्यों  ने "ओ३म्" रूप में साहित्य ,कला और ज्ञान के उत्प्रेरक और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
अर्थात्  प्राचीन भारतीय देव संस्कृति के अनुयायीयों की मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण भाषा की आक्षरिक सम्पत्ति ( syllable prosperity ) ओ३म् के उच्चारण से  यथावत् रहती है ! इसी लिए धार्मिक पास के प्रारम्भ और समापन पर ओ३म् का उच्चारण अनिवार्य है।
ये ड्रयूडस् पुरोहित भी  इसी प्रकार की  भारतीयों के समान मान्यता स्थापित किए हुए थे।
प्राचीनत्तम फ्रॉन्स की संस्कृतियों में 'ओघम्' का मूर्त प्रारूप 🌞 सूर्य के आकार के सादृश्य पर था। जैसा कि प्राचीन पश्चिमीय संस्कृतियों की मान्यताऐं भी हैं । वास्तव में ओघम् (ogham )से बुद्धि उसी प्रकार  नि:सृत होती है जैसे सूर्य से उसका प्रकाश । प्राचीन मध्य मिश्र के लीबिया प्रान्त में तथा थीब्ज में भी द्रविड संस्कृति का यही ऑघम शब्द  (आमोन् -रा) ( ammon - ra ) के रूप में था । जो वस्तुत: ओ३म् -रवि के तादात्मयी
रूप में प्रस्तावित है। किसी भी संस्कृत के प्रतिष्ठित वैय्याकरणिक के द्वारा रवि शब्द की व्युत्पत्ति ध्वनि-विवृति मूलक रूप में नहीं की गयी।  'परन्तु हमारी मान्यता तो  रवि ( सूर्य) के ध्वनि अनुकरण मूलक रूप पर आग्रहीत थी।
आधुनिक अनुसन्धानों के अनुसार भी अमेरिकीय अन्तरिक्ष यान - प्रक्षेपण संस्थान (नासा)
के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य में अजस्र रूप से निनादित "ओ३म्" प्लुत स्वर का श्रवण किया है ।
वस्तुत: हर गतिशील चीज में ध्वनि होना स्वाभाविक ही है। सुमेरियन एवं सैमेटिक हिब्रू आदि परम्पराओं  में रब़ अथवा रब्बी शब्द का अर्थ - नेता तथा महान एवं गुरू होता हेै ! जैसे रब्बी यहूदीयों का धर्म गुरू है। अरबी भाषा में रब़ ईश्वर का वाचक है । क्यों कि  नेता अथवा मार्गदर्शक ईश्वर का प्रतिनिधित्व करता है।जैसा कि अरबी वाक्य- "रब्बुल अल अलामीन" का  मतलब " ईश्वर सम्पूर्ण संसार का रक्षक है ।
अमीन शब्द (अरबी:जुबान में है ( آمین)  आमीन का शाब्दिक अर्थ है "ऐसा हो सकता है" या "ऐसा ही है"। यह भाषाई तौर पर एक "स्वीकृति बोधक अव्यय" है । अरबी हिब्रू और संस्कृत में भी आमीन का यही अर्थ है।
मुसलमानों में शब्द आमिन का प्रयोग आमतौर पर उसी शब्द के साथ किया जाता है जिसका अर्थ है "मुझे जवाब दें", और वाक्यांश "इलाही अमीन" (अरबी: الهی آمین; अर्थ: हे मेरे भगवान ! मुझे जवाब दें) कुरान शरीफ की आयतों को पढ़ते समय इबादत की ताकीद के लिए आमीन ( ऐसा ही हो) का उच्चारण आज तक किया जाता है 
आधुनिक काल में यह आमीन सम्बोधन सैमेटिक परम्पराओं के अनुयायी( यहूदी, ईसाई और इस्लामिक )लोगों के बीच बहुत आम है। 
इसका उपयोग अंग्रेजी में अमेन के रूप में किया जाता है (अर्थ: तो यह हो -it be so)है। वस्तुत: अमेन हिब्रू बाइबिल में वर्णित रूप है ।

शिया  शरीयत  में, प्रार्थनाओं में कुरान 1 (सूर अल-हम्द) को पढ़ने के बाद "अमीन" न कहने पर कि प्रार्थना को शरीयती तौर पर अमान्य कर दिया गया है। इसी लिए "आमीन" कहना अनिवार्य है।
हिब्रू परम्पराओं से ही यह अरब की रबायतों में कायम हुआ। और हिब्रू में, शब्द "अमीन" को सबसे पहले "सही" और "सत्य" नामक विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता था,।
लेकिन  ईसाई धर्मगुरु यशायाह की किताब के मुताबिक इसका उपयोग संज्ञा के रूप में किया जाता था। यह शब्द फिर हिब्रू में एक (invariant) ऑपरेटर (अर्थात्, "वास्तव में" और "निश्चित रूप से")के अर्थ में परिवर्तित हो गया। 
"इस आमीन का  उद्धरण  बाइबिल में 30 बार और तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के यूनानी अनुवाद में 33 बार किया गया है।
इतिहास की पहली पुस्तक वेद  और किंग्स बुक्स जैसी पहली पुस्तक में इस शब्द की घटना से पता चलता है। कि यह शब्द यहूदी प्रार्थनाओं और अनुष्ठानों में चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से पहले भी इस्तेमाल किया गया था।
 प्राचीन यहूदी परम्परा में, इस शब्द का उपयोग प्रार्थना की  शुरुआत या प्रार्थना के अन्त में किया गया था। 
अब यहूदी यादवों का ही वैदिक तथा पश्चिमी इतर रूप था । ये लोग गाय और बैल की पूजा करते थे। यहूदियों की प्रार्थनाओं, और भजनों के अन्त में इस आमीन की पुनरावृत्ति प्रासंगिक सामग्रियों की पुष्टि और समर्थन हेतु  दोनों रूपों में थी , और आमीन उम्मीद की अभिव्यक्ति थी कि हर कोई अमेन का उल्लेख करने के दौरान अभ्यास के आशीर्वाद साझा कर सकता है।

अमेन ( आमीन) का मिलान वेल्श संस्कृति के अवेन (Awen)से भी प्रस्तावित है । अमेन के विषय में पूर्व में वर्णन कर चुके हैं ।
तलमूद और अन्य यहूदी परम्पराओं की अवधि में, यह महत्वपूर्ण था कि विभिन्न स्थितियों में  "आमीन" शब्द का उपयोग कैसे किया जाए, और ऐसा माना जाता था कि भगवान की किसी भी प्रार्थना के लिए "आमीन" कहना होता है जो जिससे ईश्वर को सम्बोधित किया जाता है।

ईसाई धर्म में आमीन-–
यहूदी परम्पराओं को ईसाई चर्चों में अपना रास्ता मिला। "अमीन" शब्द का प्रयोग नए नियम में 119 बार किया गया था, जिनमें से 52 मामले यहूदी धर्म में  इसका उपयोग कैसे किया जाता था उससे सम्बन्धित है। 
नए नियम के माध्यम से, आमून शब्द ने दुनिया की लगभग सभी मुख्य भाषाओं में प्रवेश किया।
शब्द, अमीन, जैसा कि नए नियम में प्रयोग किया गया है, उसमें इसके चार अर्थ हैं -
पावती और अनुमोदन; एक प्रार्थना में समझौता या भागीदारी, और किसी के प्रतिज्ञा की अभिव्यक्ति। दिव्य प्रतिक्रिया का अनुरोध, जिसका अर्थ है: "हे भगवान! स्वीकार करें या जवाब दें !" अर्थात् एवं अस्तु !(निश्चय ही एसा   हो )एक प्रार्थना या प्रतिज्ञा की पुष्टि, जिसका अर्थ है: "तो यह हो" (आज शब्द को दो अर्थों को इंगित करने के लिए प्रार्थनाओं के अंत में उपयोग किया जाता है)।एक विशेषता या यीशु मसीह का नाम ।अरबी में चूंकि इस्लाम के उद्भव से पहले यहूदी धर्म और नाज़रेन ईसाई धर्म दोनों अरब प्रायद्वीप में प्रसारित थे। इसलिए यह संभव है कि मक्का और मदीना समेत अरब, इससे परिचित थे, हालांकि जहालत( अज्ञान) काल की कविताओं में इसका कोई निशान नहीं मिला है।
यह शब्द कुरान में नहीं होता है, लेकिन प्रारंभिक मुस्लिम शब्द से निश्चित रूप से परिचित थे। 
पैगंबर मुहम्मद ने शब्द का प्रयोग किया, लेकिन ऐसा लगता है कि शुरुआती मुस्लिम शब्द के अर्थ के बारे में निश्चित नहीं थे, क्योंकि पैगंबर ने उन्हें एक स्पष्टीकरण और शब्द की व्याख्या दी (यह कहकर कि "अमीन एक है अपने वफादार सेवकों पर दिव्य डाक टिकट ")
और 'अब्द अल्लाह बी. अल-अब्बास " ने शब्द का व्याकरणिक विवरण देने की पहली कोशिश की। कुरान के निष्कर्षों में
यह शब्द कुरान 10:88 और 89 के मंजिलों (उत्थानों) में उल्लिखित है। 
कुरान के लगभग सभी exegetes के अनुसार, जब पैगंबर मूसा (ए) फिरौन को शाप दिया, वह और उसके भाई, भविष्यवक्ता हारून (ए) , शब्द अमेन उद्धृत किया। 'परन्तु मूसा यहूदियों के पैगम्बर थे मुसलमानों के नहीं । मूसा प्रार्थना में आमीन का हवाला देते हुए कहते हैं।
सुन्नी मुस्लिम इस शब्द का हवाला देते हैं, अमीन, प्रार्थना में कुरान 1 को कविता के जवाब के रूप में पढ़ने के बाद, "हमें सही मार्ग दिखाएं", (कुरान, 1: 6)। यदि उपासक अपनी प्रार्थना व्यक्तिगत रूप से कहता है, तो वे स्वयं को इस शब्द का हवाला देते हैं, और यदि वे एक मंडली में प्रार्थना कहते हैं, जब प्रार्थना के नेता कुरान 1 को पढ़ना समाप्त कर देते हैं, तो सभी अनुयायियों ने एक साथ आमीन को  उद्धृत करते हैं। 
शिया न्यायविदों का कहना है कि प्रार्थना में अमीन का हवाला देते हुए यह अमान्य है, क्योंकि यह प्रार्थना में एक विधर्मी अभ्यास है जिसे पैगंबर की परंपरा में पुष्टि नहीं माना जाता है।
टिप्पणियाँ-
↑ यशायाह 65:16
↑ धन्य है यहोवा, इस्राएल का परमेश्वर, अनन्तकाल से अनन्तकाल तक। "तब सभी लोगों ने कहा" 
आमीन! 
पाणिनीय धातु पाठ में अव् धातु के अनेक अर्थ हैं
 अव्-- --१ रक्षक २ गति ३ कान्ति४ प्रीति ५ तृप्ति ६ अवगम ७ प्रवेश ८ श्रवण ९ स्वामी १० अर्थ ११ याचन १२ क्रिया १३ इच्छा १४ दीप्ति १५ अवाप्ति १६ आलिड्.गन १७ हिंसा १८ आदान १९ भाव वृद्धिषु ( १/३९६/  भाषायी रूप में ओ३म् एक अव्यय ( interjection) है ।
जिसका अर्थ है -- ऐसा ही हो ! ( एवमस्तु !) it be so इसका अरबी़ तथा हिब्रू रूप है आमीन् ।

लौकिक संस्कृत में ओमन् ( ऊँ) का अर्थ--- औपचारिकपुष्टि करण अथवा मान्य स्वीकृति का वाचक है ---
मालती माधव ग्रन्थ में १/७५ पृष्ट पर-- ओम इति उच्यताम् अमात्यः" तथा साहित्य दर्पण ---  द्वित्तीयश्चेदोम् इति ब्रूम १/""
ईरानीयों 'ने भी ओ३म्' शब्द को अपने मिथकों में स्थापित किया ।
Yadav Yogesh Kumar "Rohi" ★ 
आमीन के अर्थ सामान्यत:
तथास्तु, पुष्टि की धार्मिक घोषणा
यह लेख विस्मयादिबोधक के बारे में है। अन्य प्रयोगों के लिए, आमीन (बहुविकल्पी) देखें।
आमीन (हिब्रू: אָמֵן, ʾāmēn; प्राचीन यूनानी: ἀμήν, amḗn; शास्त्रीय सिरिएक: ܐܡܝܢ, 'amīn; अरबी: آمين, ʾāmīn) प्रतिज्ञान की एक इब्राहीमी घोषणा है जो पहले हिब्रू बाइबिल में पाई जाती है, और बाद में नई बाइबिल में पाई जाती है। वसीयतनामा। इसका उपयोग यहूदी, ईसाई और मुस्लिम प्रथाओं में समापन शब्द के रूप में या प्रार्थना की प्रतिक्रिया के रूप में किया जाता है। हिब्रू से, इस शब्द को बाद में अरबी धार्मिक शब्दावली में अपनाया गया और अरबी मूल( ء م ن) में

समतल किया गया, जो हिब्रू के समान अर्थ है। विस्मयादिबोधक ईसाई और इस्लामिक शब्दकोशों में होता है, आमतौर पर प्रार्थना में, साथ ही साथ धर्मनिरपेक्ष रूप से, हालांकि कम सामान्य रूप से, ताकि पूर्ण पुष्टि या सम्मान का संकेत दिया जा सके। धार्मिक ग्रंथों में, यह बाइबिल के अरबी अनुवादों में और कुरान के पारंपरिक रूप से पहले अध्याय को पढ़ने के बाद होता है, जो औपचारिक रूप से धार्मिक प्रार्थनाओं के समान है।
कुछ थियोसोफिस्टों के बीच लोकप्रिय, इतिहास के एफ्रोसेंट्रिक सिद्धांतों के समर्थक, और गूढ़ ईसाई धर्म के अनुयायी यह अनुमान है कि आमीन मिस्र के देवता अमुन (जिसे कभी-कभी आमीन भी कहा जाता है) के नाम से व्युत्पन्न है। पूर्वी धर्मों के कुछ अनुयायियों का मानना ​​है कि आमीन की जड़ें हिंदू संस्कृत शब्द ओम् से जुड़ी हैं। ऐसी बाहरी व्युत्पत्तियाँ मानक व्युत्पत्ति संबंधी संदर्भ कार्यों में शामिल नहीं हैं। इब्रानी शब्द, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, एलेफ से शुरू होता है, जबकि मिस्र का नाम योध से शुरू होता है।फ्रेंच में, हिब्रू शब्द "आमीन को कभी-कभी आइंसी सोइट- इल (ainsi soit-il.) इस फ्रेंच वाक्य का अंग्रेजी अनुवाद है।
 - so be it जिसका अर्थ है "ऐसा ही हो।भाषाविद् "घिलाड ज़करमैन" का तर्क है कि, हालेलूजाह के मामले में, आमीन शब्द को आम तौर पर अनुवाद द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जाता है क्योंकि वक्ता प्रतिष्ठित होने में विश्वास करते हैं, उनकी धारणा है कि ध्वनि के बीच संबंध के बारे में कुछ आंतरिक तारतम्य है।हस्ताक्षरकर्ता (शब्द) और यह क्या दर्शाता है (इसका अर्थ): देखें- हिब्रू बाइबिल अध्याय भजन 62 psalms- (भजन) -
 यह शब्द हिब्रू बाइबिल में 30 बार आया है; अकेले व्यवस्था-विवरण में 12 बार  यह शब्द भजन संहिता 27:15 से शुरू। निश्चित वाक्यांश 'आमीन, आमीन' पांच बार देखा जाता है - भजन संहिता 41:13; 72:19; 89:52; गिनती 5:22; नहेमायाह 8:6. इसका अनुवाद यशायाह 65:16 में दो बार 'सत्य' के रूप में किया गया है। आमीन के तीन अलग-अलग बाइबिल उपयोगों पर ध्यान दिया जा सकता है:
आरंभिक आमीन, दूसरे वक्ता के शब्दों का संदर्भ देना और एक सकारात्मक वाक्य का परिचय देना, उदाहरण 
1 राजा 1:36 
 संदर्भ   क्रॉसरेफ   कॉम   हिब्रू 
श्लोक-यहोयादा के पुत्र बनायाह ने राजा को उत्तर दिया, “आमीन ! मेरे प्रभु राजा का परमेश्वर यहोवा ऐसा ही प्रचार करे। 
अलग अलग प्रकरणों में "आमीन,  शब्द प्रयोग- फिर से दूसरे वक्ता के शब्दों का जिक्र करते हुए लेकिन पूरक सकारात्मक वाक्य के बिना, उदाहरण-
नहेमायाह 5:13 
"फिर मैं ने अपक्की गोद झाड़कर कहा, इसी रीति से जो कोई अपके अपके घर से और परिश्रम से झाड़ता है, जो इस वचन को पूरा न करे, वह इसी रीति से झाड़ा जाए, और छूछा हो जाए। और सारी मण्डली ने कहा, "आमीन ! और यहोवा की स्तुति की। और लोगों ने इस वचन के अनुसार किया। अन्तिम आमीन, वक्ता में कोई बदलाव नहीं, जैसा कि स्तोत्र के पहले तीन खंडों की सदस्यता में है।
"न्यू टेस्टामेंट में, ग्रीक शब्द ἀμήν-आमीन्) का उपयोग विश्वास की अभिव्यक्ति के रूप में या एक पूजन विधि के एक भाग के रूप में किया जाता है। यह एक परिचयात्मक शब्द के रूप में भी प्रकट हो सकता है, विशेष रूप से यीशु के कथनों में। हिब्रू में शुरुआती "आमीन के विपरीत, जो पहले से कही गई किसी बात को संदर्भित करता है, इसका उपयोग यीशु द्वारा इस बात पर जोर देने के लिए किया जाता है कि वह क्या कहने वाला है (ἀμὴν λέγω, "वास्तव में मैं तुमसे कहता हूं"),  ग्रीक भाषा में ये वाक्य अमेन के अर्थ को व्यक्त करते हैं- Ἀμὴν.λέγω=amēnlegō - वास्तविक रूप से मै कहता हूँ।
" रेमंड ब्राउन का कहना है कि चौथे सुसमाचार में आमीन का यीशु का अजीबोगरीब और प्रामाणिक स्मरण इस बात की पुष्टि है कि वह जो कहने जा रहा है -वह पिता की ओर से एक प्रतिध्वनि है। सिनॉप्टिक गोस्पेल्स में यह शब्द 52 बार आया है; जॉन के सुसमाचार में 25 बार हैं। किंग जेम्स बाइबिल में, आमीन शब्द कई संदर्भों में देखा जाता है। उल्लेखनीय लोगों में शामिल हैं:
यहूदी धर्म यह भी देखें: बरखाह § आमीन पढ़ना
हालांकि आमीन, यहूदी धर्म में, आमतौर पर एक आशीर्वाद की प्रतिक्रिया के रूप में उपयोग किया जाता है। यह अक्सर हिब्रू बोलने वालों द्वारा घोषणा के अन्य रूपों (धार्मिक संदर्भ के बाहर सहित) की पुष्टि के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
यहूदी रैबिनिकल कानून में एक व्यक्ति को विभिन्न संदर्भों में आमीन कहने की आवश्यकता होती है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के आरंभ में, मंदिर में इकट्ठे हुए यहूदियों ने एक पुजारी द्वारा की गई एक महिमा या अन्य प्रार्थना के अंत में "आमीन" का जवाब दिया। ईसाइयों द्वारा आमीन के इस यहूदी पूजाविधिक उपयोग को अपनाया गया था। लेकिन यहूदी कानून में भी व्यक्तियों को आमीन का जवाब देने की आवश्यकता होती है, जब भी वे एक गैर-विद्रोही सेटिंग में

भी एक आशीर्वाद सुनाते हैं।
तल्मूद सजातीय रूप से सिखाता है कि आमीन शब्द אל מלך נאמן (ʾएल मेलेख नेमैन,- "भगवान, भरोसेमंद राजा") के लिए एक संक्षिप्त शब्द है, वाक्यांश शमा को पढ़ने से पहले एक व्यक्ति द्वारा चुपचाप पढ़ा जाता है।

यहूदी आमतौर पर शब्द के हिब्रू उच्चारण का उपयोग करते हैं: /ɑːˈmɛn/ ah-MEN (इज़राइली और सेफ़र्दी) या /ɔːmeɪn/ a-MAYN (अशकेनाज़ी)।

ईसाई धर्म में आमीन-
"आमीन" का उपयोग आम तौर पर ईसाई पूजा में- प्रार्थनाओं और भजनों के समापन शब्द और मजबूत समझौते की अभिव्यक्ति के रूप में अपनाया गया है।  
आमीन का उपयोग मानक, अंतर्राष्ट्रीय फ्रेंच में भी किया जाता है, लेकिन काजुन फ्रेंच में 'आइंसी सोइट-इल ("ऐसा ही हो")  प्रयोग किया जाता है।
इस्लाम में आमीन -
अरबी में आमीन।( آمين) इस्लामिक इबादत में, ; प्रार्थना का समापन करते समय, विशेष रूप से एक दुआ  के बाद या कुरान की पहली सूरह "अल फातिहा" का पाठ करते हुए किया जाता है, जैसा कि प्रार्थना (सलात) में होता है, और दूसरों की प्रार्थना के लिए एक सहमति के रूप में भी आमीन का प्रयोग होता है।
अरबी शब्दकोष  ʾāmīn को अनिवार्य मौखिक संज्ञा के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसका अर्थ  उत्तर है (यानी, किसी की प्रार्थना को पूरा करने के लिए भगवान से प्रार्थना करना)। इसलिए, यह सख्ती से प्रार्थनाओं को समाप्त करने या पुष्टि की घोषणा करने के लिए अंतिम रूप में उपयोग किया जाता है। 
सेल्टिक धर्म में ओघमा-
सेल्टिक धारमिक ग्रन्थों में ओघम अनेक रूपों में परिलक्षित है परन्तु यह मुख्यत: भाषा और वाणी का ही अधिष्ठाता देव है।   
ओग्मा -एक  प्राचीन आयरिश देव जिसे मानव रूप में चित्रित किया गया था। वह भी ओ३म् का प्रतिरूप है। ओग्मा में युद्ध की ललक इतनी तीव्र थी कि उसे सैन्य कार्रवाई के लिए सही समय आने तक अन्य योद्धाओं द्वारा जंजीर में बांधकर रखा जाता था।
"ओघम" नामक एक  लिपि जो आयरिश लेखन प्रणाली के रूप में हैं। जो चौथी शताब्दी ईस्वी से अपनी तिथि निर्धारित करती है।  उनके सेल्टिक समकक्ष ओग्मीऑस(0gmios) की तरह वह वाक्पटुता के देव थे। सेल्टिक(Celtic) धर्म में इसकी प्रवृत्ति से अवगत हों ! 
ओघम लेखन में , ओघम की ओगम  के रूप में भी  वर्तनी  लिखी जाती है,  ओघम वस्तुत: चौथी शताब्दी ईस्वी से वर्णानुक्रमिक आयरलैण्ड की लिपि है। जिसका उपयोग लिखने के लिए उपयोग की जाती है। ओघम शब्द का उपयोग  आयरिश के पत्थर के स्मारकों पर चित्रित भाषाएं आयरिश परंपरा के अनुसार,  लकड़ी के टुकड़ों पर लिखने के लिए भी किया जाता था, लेकिन इसका कोई भौतिक प्रमाण नहीं है। अपने सरलतम रूप में, ओघम में स्ट्रोक( कलम) चलाने के चार सेट या निशान होते हैं , प्रत्येक सेट में एक से पांच स्ट्रोक से बने पांच अक्षर होते हैं, इस प्रकार 20 अक्षर होते हैं। ये एक पत्थर के किनारे पर उकेरे गए थे, अक्सर लंबवत या दाएं से बाएं। पांच प्रतीकों का पांचवां सेट, जिसे आयरिश परंपरा में forfeda ("अतिरिक्त अक्षर"),कहा जाता है ऐसा  प्रतीत होता है कि इसका बाद का विकास है। ओघम की उत्पत्ति विवाद में है
कुछ विद्वान रूनिक और अंततः इट्रस्केन वर्णमाला के साथ  इसका एक संबंध देखते हैं, जबकि अन्य का कहना है कि यह केवल लैटिन वर्णमाला का रूपांतरण है ।
रूनिक  वर्णमालाएँ प्राचीनकालीन यूरोप में कुछ जर्मैनी भाषाओं के लिए इस्तेमाल होने वाली वर्णमालाओं को कहा जाता था जो 'रून' नामक अक्षर प्रयोग करती थीं। समय के साथ जैसे-जैसे यूरोप में ईसाईकरण हुआ और लातिनी भाषा धार्मिक भाषा बन गई तो इन भाषाओं ने रोमन लिपि को अपना लिया और रूनी लिपियों का प्रयोग घटता गया।
इत्रस्की सभ्यता प्राचीन इटली की एक सभ्यता थी जो पश्चिमोत्तरी इटली में सन् ८०० ईसापूर्व से आरम्भ हुई। लगभग २०० वर्षों तक इसका प्रभुत्व रहा और लगभग सन् ४०० ईसापूर्व के बाद इसके रोमन साम्राज्य में विलय हो जाने के संकेत मिलते हैं। 
तथ्य यह है कि इसमें एच और जेड के संकेत हैं, जो आयरिश में उपयोग नहीं किए जाते हैं, विशुद्ध रूप से आयरिश मूल के विपरीत बोलते हैं। ओघम में शिलालेख बहुत ही कम हैं, आमतौर पर जनन मामले में एक नाम और संरक्षक शामिल हैं; वे भाषाई रुचि के हैं क्योंकि वे किसी भी अन्य स्रोत द्वारा प्रमाणित किए जाने की तुलना में आयरिश भाषा के पहले के राज्य को दिखाते हैं और शायद चौथी शताब्दी के विज्ञापन से तारीख. ज्ञात 375 से अधिक ओघम शिलालेखों में से लगभग 300 आयरलैंड से हैं
सेल्टिक धर्म
सेल्ट्स,  प्राचीन इंडो-यूरोपियन लोग, जो चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान अपने प्रभाव और क्षेत्रीय विस्तार के चरम पर पहुंच गए थे । ये लोग ब्रिटेन से एशिया माइनर (तुर्की) तक यूरोप की लंबाई तक फैले हुए थे । तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से उनका इतिहास पतन   और विघटन भरा रहा है, और जूलियस सीज़र की गॉल (58-51 ईसा पूर्व ) की विजय के साथ सेल्टिक स्वतंत्रता यूरोपीय महाद्वीप पर  आकर समाप्त हो

गई। ब्रिटेन और आयरलैंड में यह पतन अधिक धीमी गति से आगे बढ़ा, लेकिन राजनीतिक अधीनता के दबावों के कारण पारम्परिक संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त हो गई;  और आज सेल्टिक भाषाएँ केवल पश्चिमी देशों में ही बोली जाती हैं। यूरोप की परिधि , आयरलैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और ब्रिटनी के प्रतिबंधित क्षेत्रों में   ब्रिटेन (इस अंतिम उदाहरण में मोटे तौर पर चौथी से सातवीं शताब्दी ईस्वी तक सेल्ट भाषा का विस्तार हुआ। ब्रिटेन से आप्रवासन के परिणामस्वरूप यह अन्यत्र भी पहुँची। 
इसलिए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि सेल्ट्स के अस्थिर और असमान इतिहास ने उनकी संस्कृति और धर्म के दस्तावेज़ीकरण को प्रभावित किया है ।
ऐतिहासिक-सूत्र- 
दो मुख्य प्रकार के स्रोत सूचना प्रदान करते हैं एक सेल्टिक धर्म: महाद्वीपीय यूरोप और रोमन ब्रिटेन के सेल्ट्स से जुड़े मूर्तिकला स्मारक और दूसरे द्वीपीय सेल्टिक साहित्य जो मध्ययुगीन काल से लेखन में बचे हैं । दोनों स्रोत यद्यपि व्याख्या में समस्याएं पैदा करते हैं।अधिकांश स्मारक और उनके साथ शिलालेख, के हैं रोमन काल-सेल्टिक और रोमन देवताओं के बीच काफी हद तक समन्वयवाद को दर्शाता है:-
Awen isa WelshCornish and Breton word for"inspiration" (and typically poetic inspiration).In Welsh mythologyawen is the inspiration of the poets, or bards; or, in its personification, Awen is the inspirational muse of creative artists in general.
The inspired individual (often a poet or a soothsayer) is described as an awenyddNeo-Druids define awen as "flowing energy," or "a force that flows with the essence of life."In current usage, awen is sometimes ascribed to musicians and poets. It is also used as female given name.It appears in the third stanza of Hen Wlad fy Nhadau, the national anthem of Wales.
Etymology-
Awen derives from the Indo-European Hebrew root *Aw (अव्) meaning 'live', and has the same root as the word awel meaning 'breath ' Inhale, and  in Welsh  'wind' or 'gale' in Cornish.
Historical attestation-
The first recorded attestation of the word occurs in NenniusHistoria Brittonum, a Latin text of c. 796, based in part on earlier writings by the Welsh monk, Gildas. It occurs in the phrase 'Tunic talhaern tat aguen in poemate claret' (Talhaern the father of the muse was then renowned in poetry) where the Old Welsh word aguen (awen) occurs in the Latin text describing poets from the sixth century.
It is also recorded in its current form in (Canu Llywarch Hen) (9th or 10th century ?) where Llywarch says 'I know by my awen' indicating it as a source of instinctive knowledge.
On connections between awen as poetic inspiration and as an infusion from the divine, The Book of Taliesin often implies this. A particularly striking example is contained in the lines:
*ban pan doeth peir
ogyrwen awen teir*

-literally “the three elements of inspiration that came, splendid, out of the cauldron” but implicitly “that came from God” as ‘peir’ (cauldron) can also mean ‘sovereign’ often with the meaning ‘God’.
____
 It is the “three elements” that is cleverly worked in here as awen was sometimes characterised as consisting of three sub-divisions (*‘ogyrwen’) so “the ogyrwen of triune inspiration”, perhaps suggesting the Trinity.
There are fifteen occurrences of the word awen in (The Book of Taliesin) as well as several equivalent words or phrases, such as ogyrven which is used both as a division of the awen (‘Seven score ogyrven which are in awen, shaped in Annwfn’) as well as an alternative word for awen itself.
The poem Armes Prydain (The Prophecies of Britain) begins with the phrase ‘Awen foretells …and it is repeated later in the poem.
 The link between poetic inspiration and divination is implicit in the description of the Awenyddion given by Gerald of Wales in the 12th century and the link between bardic expression and prophecy is a common feature of much early verse in Wales and elsewhere
A poem in The Black Book of Carmarthen by an unidentified bard, but addressed to Cuhelyn Fardd (1100-1130) asks God to allow the awen to flow so that ‘inspired song from Ceridwen will shape diverse and well-crafted verse’. This anticipates much poetry from identified bards of the Welsh princes between circa 1100-1300 which juggles the competing claims of

the Celtic Church with the source of the awen in the Cauldron of Ceridwen.
So Llywarch ap Llywelyn (1173-1220) – also known as ‘Prydydd y Moch’ – can address his patron Llywelyn ap Iorwerth like this:
'I greet my lord, bring awen’s great greeting
Words from Ceridwen I compose
Just like Taliesin when he freed Elffin'.
The same poet also penned the linesThe Lord God grant me sweet awenAs from the Cauldron of Ceridwen' 
Elidr Sais (c. 1195-1246), ‘singing to Christ’, wrote'Brilliant my poetry after MyrddinShining forth from the cauldron
of awen' 
Dafydd Benfras (1220-1258) included both Myrddin (Merlin) and Aneirin in his backward glance:
'Full of awen as Myrddin desiredSinging praise as Aneirin before mewhen he sang of ‘Gododdin’.' 
Later in the Middle Ages the identification of the source of the Awen begins to shift from Ceridwen to more orthodox christian sources such as the Virgin Mary, the saints, or directly from God. A full discussion can be found in Awen y Cynfeirdd a’r Gogynfeirdd by Y Chwaer Bosco. The Bardic Grammars of the later Middle Ages identify ‘The Holy Spirit’ as the proper source of the awen. The 15th century bard Sion Cent argued that God is the only source and dismissed the “lying awen” of bards who thought otherwise as in his dismissive lines
A claimant false this awen is found Born of hell’s furnace underground Such a focus on an unmediated source was picked up by the eighteenth century Unitarian Iolo Morgannwg (Edward Williams, 1747-1826) who was able to invent the awen symbol /|\, suggesting that it was an ancient druidic sign of “the ineffable name of God, being the rays of the rising sun at the equinoxes and solstices, conveying into focus the eye of light”.
Giraldus Cambrensis referred to those inspired by the awen as "awenyddion" in his Description of Wales (1194):
THERE are certain persons in Cambria, whom you will find nowhere else, called Awenyddion, or people inspired; when consulted upon any doubtful event, they roar out violently, are rendered beside themselves, and become, as it were, possessed by a spirit. They do not deliver the answer to what is required in a connected manner; but the person who skilfully observes them, will find, after many preambles, and many nugatory and incoherent, though ornamented speeches, the desired explanation conveyed in some turn of a word: they are then roused from their ecstasy, as from a deep sleep, and, as it were, by violence compelled to return to their proper senses. After having answered the questions, they do not recover till violently shaken by other people; nor can they remember the replies they have given. If consulted a second or third time upon the same point, they will make use of expressions totally different; perhaps they speak by the means of fanatic and ignorant spirits. These gifts are usually conferred upon them in dreams: some seem to have sweet milk or honey poured on their lips; others fancy that a written schedule is applied to their mouths and on awaking they publicly declare that they have received this gift.
(Chapter XVI: Concerning the soothsayers of this nation, and persons as it were possessed) 
In 1694, the Welsh poet Henry Vaughan wrote to his cousin, the antiquary John Aubrey, in response to a request for some information about the remnants of Druidry in existence in Wales at that time, saying
… the antient Bards … communicated nothing of their knowledge, butt by way of tradition: which I suppose to be the reason that we have no account left nor any sort of remains, or other monuments of their learning of way of living. As to the later Bards, you shall have a most curious Account of them. 
This vein of poetrie they called Awen, which in their language signifies rapture, or a poetic furore & (in truth) as many of them as I have conversed with are (as I may say) gifted or inspired with it.

I was told by a very sober, knowing person (now dead) that in his time, there was a young lad fatherless & motherless, soe very poor that he was forced to beg; butt att last was taken up by a rich man, that kept a great stock of sheep upon the mountains not far from the place where I now dwell who cloathed him & sent him into the mountains to keep his sheep. There in Summer time following the sheep & looking to their lambs, he fell into a deep sleep in which he dreamt, that he saw a beautiful young man with a garland of green leafs upon his head, & an hawk upon his fist: with a quiver full of Arrows att his back, coming towards him (whistling several measures or tunes all the way) att last lett the hawk fly att him, which (he dreamt) gott into his mouth & inward parts, & suddenly awaked in a great fear & consternation: butt possessed with such a vein, or gift of poetrie, that he left the sheep & went about the Countrey, making songs upon all occasions, and came to be the most famous Bard in all the Countrey in his time.
— Henry Vaughan, in a letter to John Aubrey, October 1694
Modern Druidic symbol
In some forms of modern Druidism, the term is symbolized by an emblem showing three straight lines that spread apart as they move downward, drawn within a circle or a series of circles of varying thickness, often with a dot, or point, atop each line. The British Druid Order attributes the symbol to Iolo Morganwg; it has been adopted by some Neo-Druids.
According to Jan MorrisIolo Morganwg did in fact create what is now called "The Awen" as a symbol for the Gorsedd Cymru, the secret society of Welsh poets, writers, and musicians that he claimed to have rediscovered, but in fact created himself. Morganwg, whose own beliefs were, according to Marcus Tanner, beliefs were
,__________
 "a compound of Christianity and Druidism, Philosophy and Mysticism", explained the Awen symbol as follows, "And God vocalizing His Name said /|\, and with the Word all the world sprang into being, singing in ecstasy of joy /|\ and repeating the name of the Deity."
__*____★
The Order of Bards, Ovates and Druids (OBOD) describe the three lines as rays emanating from three points of light, with those points representing the triple aspect of deity and, also, the points at which the sun rises on the equinoxes and solstices – known as the Triad of the Sunrises. The emblem as used by the OBOD is surrounded by three circles representing the three circles of creation.
Various modern Druidic groups and individuals have their own interpretation of the awen.              The three lines relate to earth, sea and air; body, mind and spirit; or love, wisdom and truth*.  It is also said that the awen stands for not simply inspiration, but for inspiration of truth; without awen one cannot proclaim truth. The three foundations of awen are the understanding of truth, the love of truth, and the maintaining of truth.
A version of the awen was approved by the United States Department of Veterans Affairs in early 2017 as an emblem for veteran headstones.
_____  
    References सन्दर्भ-
[1]
"Welsh National Anthem"Wales websiteWelsh Government. 2016. Retrieved 23 October 2016.
[2]
Dr Ken George,Gerlyver Meur, Kesva an Taves Kernewek (Cornwall) 1993, p81.
[3]
Canu Llywarch Hen ed. Ifor Williams Cardiff, 1935
[4]
Haycock. Marged (ed)Legendary Poems from the Book of Taliesin (CMCS, Aberystwyth,2007 p.296
[5]
Haycock, Marged (ed) Legendary Poems from The Book of Taliesin (Aberystwyth, 2007)
[6]
Armes Prydain  (ed) Ifor Williams and Rachel Bromwich (Dublin, 1982)
[7]
Haycock, Marged (ed)Prophecies from The Book of Taliesin (Aberystwyth, 2013)
[8]
Llyfr Du Caerfyrddin ed. A O H Jarman (Cardiff, 1982)
[9]
"Cyhoeddiadau - Prifysgol Cymru".

[10]
"Cyhoeddiadau - Prifysgol Cymru".
[11]
"Cyhoeddiadau - Prifysgol Cymru".
[12]
'Awen y Cynfeirdd a’r Gogynfeirdd’ by Y Chwaer Bosco, Beirdd a Thywysogion (Cardiff, 1996)
[13]
Gramadegau’r Pencerddiaid ed. G. J. Williams ac E J Jones (Cardiff, 1934)
[14]
Idris Bell, translation of Thomas Parry’s History of Welsh Literature (Oxford, 1955)
[15]
Ceri W Lewis ‘Iolo Morgannwg and Strict Metre Poetry’ in A Rattleskull Genius ed. Geraint H Jenkins (Cardiff, 2005)
[16]
Gerald of Wales Description of Wales and the Journey Through Wales trans Lewis Thorpe, Penguin, various editions
[17]
"Early Modern Letters Online". Bodleian Library. Retrieved 17 July 2013.
[18]
"Awen - The Holy Spirit of Druidry - The British Druid Order"The British Druid Order.
[19]
Jan Morris (1984), The Matter of Wales: Epic Views of a Small CountryOxford University Press. Page 155.
[20]
Marcus Tanner (2004), The Last of the CeltsYale University Press. Page 191.
[21]
Jan Morris (1984), The Matter of Wales: Epic Views of a Small CountryOxford University Press. Page 155.
[22]
Order of Bards, Ovates & Druids (2001). "Approaching The Forest: Gwers 2, Pg. 24". Oak Tree Press.
[23]
J. Williams Ab Ithel, Ed. "The Barddas of Iolo Morganwg, Vol. I"
[24]
Terrence P. Hunt, "Druid symbol approved for use on veteran headstones", The Wild Hunt, January 24, 2017
Kenneth Jackson, Tradition in Early Irish Prophecy, Man, Vol. 34, (May 1934), pp. 67–70.
___
"Ave-Latin greeting, meaning "hail" or "be well"

This article is about the Roman salutation)
Ave is a Latin word, used by the Romans as a salutation and greeting, meaning  'hailth'=(नमस्कार करना)
It is the singular imperative form of the verb avēre, which meant 'to be well';
 thus one could translate it literally as 'be well' or 'farewell'.
___

"HAVE" Mosaic outside the House of the Faun, Pompeii, reflecting the less formal variant of ave.
Etymology
"Ave" is likely borrowed with an unspelled /h/ from Punic *ḥawe (“live , 2sg. imp.), cognate to Hebrew חוה‎ (“Eve”) and as (avō) from Punic *ḥawū (2pl. imp.), from Semitic root ḥ-w-y (live).

The form might have been contaminated by "avē", the second-person singular present imperative of avēre (first-person aveō), meaning to be well/to fare well. Indeed, its long vowel also ended up short via iambic shortening; this would explain the reluctance to spell the aspirate, as well as its interpretation as a verb form.
Attested since Plautus.
Use-The Classical Latin pronunciation of ave is [ˈaweː]. As far back as the first century AD, the greeting in popular use had the form have (pronounced [ˈhawɛ] or perhaps [ˈhaβ‌ɛ]), with the aspirated initial syllable and the second syllable shortened, for which the most explicit description has been given by Quintilian in his Institutio Oratoria.
While have would be informal in part because it has the non-etymological aspiration, centuries later, any and all aspiration would instead completely disappear from popular speech, becoming an artificial and learned feature.
Ave in Ecclesiastical Latin is [ˈave], and in English, it tends to be pronounced /ˈɑːveɪ/ AH-vay.

The term was notably used to greet .
the Caesar or other authorities. Suetonius recorded that on one occasion, naumachiarii—captives and criminals fated to die fighting during mock naval encounters—addressed Claudius Caesar with the words "Ave Caesar! Morituri te salutant!" ('Hail स्वास्थ्य, Caesar! Those who are about to die salute you !') in an attempt to avoid death. 
The expression is not recorded as being used in Roman times on any other occasion.

The Vulgate version of the Annunciation translates the salute of the angel to Mary, Mother of Jesus as "ave, gratia plena" ('Hail, full of grace'). The phrase "Hail Mary" (Ave Maria) is a Catholic Marian prayer that has inspired authors of religious music.

Fascist regimes during the 20th century also adopted the greeting. It was also distinctly used during the National Socialist Third Reich in the indirect German translation, heil.
__
Ave is not to be confused with Latin ave as the vocative singular of avus, अव्वुस- meaning grandfather/forebear, or ave as the ablative singular of (avis= meaning bird.
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Awen is a Welsh, Cornish and Breton word for"inspiration" (and typically poetic inspiration).
In Welsh mythology, awen is the inspiration of the poets, or bards; or, in its personification, Awen is the inspirational muse of creative artists in general.
The inspired individual (often a poet or a soothsayer) is described as an awenydd. Neo-Druids define awen as "flowing energy," or "a force that flows with the essence of life."
In current usage, awen is sometimes ascribed to musicians and poets. 
It is also used as female given name.
It appears in the third stanza of Hen Wlad fy Nhadau, the national anthem of Wales.
Etymology★
Awen derives from the Indo-European Hebrew root *Aw (अव्) meaning 'live', and has the same root as the word awel meaning 'breath ' Inhale, and  in Welsh  'wind' or 'gale' in Cornish.
Historical attestation
The first recorded attestation of the word occurs in Nennius' Historia Brittonum, a Latin text of c. 796, based in part on earlier writings by the Welsh monk, Gildas. 
It occurs in the phrase 'Tunic talhaern tat aguen in poemate claret' (Talhaern the father of the muse was then renowned in poetry) where the Old Welsh word aguen (awen) occurs in the Latin text describing poets from the sixth century.
It is also recorded in its current form in (Canu Llywarch Hen) (9th or 10th century ?) where Llywarch says 'I know by my awen' indicating it as a source of instinctive knowledge.
On connections between awen as poetic inspiration and as an infusion from the divine, The Book of Taliesin often implies this. A particularly striking example is contained in the lines:
*ban pan doeth peir
ogyrwen awen teir*
-literally “the three elements of inspiration that came, splendid, out of the cauldron” but implicitly “that came from God” as ‘peir’ (cauldron) can also mean ‘sovereign’ often with the meaning ‘God’.
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 It is the “three elements” that is cleverly worked in here as awen was sometimes characterised as consisting of three sub-divisions (*‘ogyrwen’) so “the ogyrwen of triune inspiration”, perhaps suggesting the Trinity.
There are fifteen occurrences of the word awen in (The Book of Taliesin) as well as several equivalent words or phrases, such as ogyrven which is used both as a division of the awen (‘Seven score ogyrven which are in awen, shaped in Annwfn’) as well as an alternative word for awen itself.
The poem Armes Prydain (The Prophecies of Britain) begins with the phrase ‘Awen foretells …and it is repeated later in the poem.
The link between poetic inspiration and divination is implicit in the description of the Awenyddion given by Gerald of Wales in the 12th century and the link between bardic expression and prophecy is a common feature of much early verse in Wales and elsewhere
A poem in The Black Book of Carmarthen by an unidentified bard, but addressed to Cuhelyn Fardd (1100-1130) asks God to allow the awen to flow so that ‘inspired song from Ceridwen will shape diverse and well-crafted verse’. This anticipates much poetry from identified bards of the Welsh princes between circa 1100-1300 which juggles the competing claims of the Celtic Church with the source of the awen in the Cauldron of Ceridwen.

 So Llywarch ap Llywelyn (1173-1220) – also known as ‘Prydydd y Moch’ – can address his patron Llywelyn ap Iorwerth like this:

'I greet my lord, bring awen’s great greeting
Words from Ceridwen I compose
Just like Taliesin when he freed Elffin'.
The same poet also penned the lines
'The Lord God grant me sweet awen
As from the Cauldron of Ceridwen' 
___
Elidr Sais (c. 1195-1246), ‘singing to Christ’, wrote

'Brilliant my poetry after Myrddin
Shining forth from the cauldron of awen' 
Dafydd Benfras (1220-1258) included both Myrddin (Merlin) and Aneirin in his backward glance:
'Full of awen as Myrddin desired
Singing praise as Aneirin before me
when he sang of ‘Gododdin’.' 
Later in the Middle Ages the identification of the source of the Awen begins to shift from Ceridwen to more orthodox christian sources such as the Virgin Mary, the saints, or directly from God. A full discussion can be found in Awen y Cynfeirdd a’r Gogynfeirdd by Y Chwaer Bosco. The Bardic Grammars of the later Middle Ages identify ‘The Holy Spirit’ as the proper source of the awen. The 15th century bard Sion Cent argued that God is the only source and dismissed the “lying awen” of bards who thought otherwise as in his dismissive lines

A claimant false this awen is found
Born of hell’s furnace underground
Such a focus on an unmediated source was picked up by the eighteenth century Unitarian Iolo Morgannwg (Edward Williams, 1747-1826) who was able to invent the awen symbol /|\, suggesting that it was an ancient druidic sign of “the ineffable name of God, being the rays of the rising sun at the equinoxes and solstices, conveying into focus the eye of light”.
Giraldus Cambrensis referred to those inspired by the awen as "awenyddion" in his Description of Wales (1194):
THERE are certain persons in Cambria, whom you will find nowhere else, called Awenyddion, or people inspired; when consulted upon any doubtful event, they roar out violently, are rendered beside themselves, and become, as it were, possessed by a spirit. They do not deliver the answer to what is required in a connected manner; but the person who skilfully observes them, will find, after many preambles, and many nugatory and incoherent, though ornamented speeches, the desired explanation conveyed in some turn of a word: they are then roused from their ecstasy, as from a deep sleep, and, as it were, by violence compelled to return to their proper senses. After having answered the questions, they do not recover till violently shaken by other people; nor can they remember the replies they have given. If consulted a second or third time upon the same point, they will make use of expressions totally different; perhaps they speak by the means of fanatic and ignorant spirits. These gifts are usually conferred upon them in dreams: some seem to have sweet milk or honey poured on their lips; others fancy that a written schedule is applied to their mouths and on awaking they publicly declare that they have received this gift.
(Chapter XVI: Concerning the soothsayers of this nation, and persons as it were possessed) 

In 1694, the Welsh poet Henry Vaughan wrote to his cousin, the antiquary John Aubrey, in response to a request for some information about the remnants of Druidry in existence in Wales at that time, saying
 the antient Bards … communicated nothing of their knowledge, butt by way of tradition: which I suppose to be the reason that we have no account left nor any sort of remains, or other monuments of their learning of way of living. As to the later Bards, you shall have a most curious Account of them. 

This vein of poetrie they called Awen, which in their language signifies rapture, or a poetic furore & (in truth) as many of them as I have conversed with are (as I may say) gifted or inspired with it. I was told by a very sober, knowing person (now dead) that in his time, there was a young lad fatherless & motherless, soe very poor that he was forced to beg; butt att last was taken up by a rich man, that kept a great stock of sheep upon the mountains not far from the place where I now dwell who cloathed him & sent him into the mountains to keep his sheep. There in Summer time following the sheep & looking to their lambs, he fell into a deep sleep in which he dreamt, that he saw a beautiful young man with a garland of green leafs upon his head, & an hawk upon his fist: with a quiver full of Arrows att his back, coming towards him (whistling several measures or tunes all the way) att last lett the

hawk fly att him, which (he dreamt) gott into his mouth & inward parts, & suddenly awaked in a great fear & consternation: butt possessed with such a vein, or gift of poetrie, that he left the sheep & went about the Countrey, making songs upon all occasions, and came to be the most famous Bard in all the Countrey in his time.

— Henry Vaughan, in a letter to John Aubrey, October 1694
Modern Druidic symbol

Awen of Iolo Morganwg.
In some forms of modern Druidism, the term is symbolized by an emblem showing three straight lines that spread apart as they move downward, drawn within a circle or a series of circles of varying thickness, often with a dot, or point, atop each line. The British Druid Order attributes the symbol to Iolo Morganwg; it has been adopted by some Neo-Druids.

According to Jan Morris, Iolo Morganwg did in fact create what is now called "The Awen" as a symbol for the Gorsedd Cymru, the secret society of Welsh poets, writers, and musicians that he claimed to have rediscovered, but in fact created himself. Morganwg, whose own beliefs were, according to Marcus Tanner, beliefs were,
 "a compound of Christianity and Druidism, Philosophy and Mysticism", explained the Awen symbol as follows, "And God vocalizing His Name said /|\, and with the Word all the world sprang into being, singing in ecstasy of joy /|\ and repeating the name of the Deity."

__*____★
The Order of Bards, Ovates and Druids (OBOD) describe the three lines as rays emanating from three points of light, with those points representing the triple aspect of deity and, also, the points at which the sun rises on the equinoxes and solstices – known as the Triad of the Sunrises. The emblem as used by the OBOD is surrounded by three circles representing the three circles of creation.

Various modern Druidic groups and individuals have their own interpretation of the awen.              The three lines relate to earth, sea and air; body, mind and spirit; or love, wisdom and truth*.  It is also said that the awen stands for not simply inspiration, but for inspiration of truth; without awen one cannot proclaim truth. The three foundations of awen are the understanding of truth, the love of truth, and the maintaining of truth.
A version of the awen was approved by the United States Department of Veterans Affairs in early 2017 as an emblem for veteran headstones.
_____  
References सन्दर्भ-

[1]
"Welsh National Anthem". Wales website. Welsh Government. 2016. Retrieved 23 October 2016.
[2]
Dr Ken George,Gerlyver Meur, Kesva an Taves Kernewek (Cornwall) 1993, p81.
[3]
Canu Llywarch Hen ed. Ifor Williams Cardiff, 1935
[4]
Haycock. Marged (ed)Legendary Poems from the Book of Taliesin (CMCS, Aberystwyth,2007 p.296
[5]
Haycock, Marged (ed) Legendary Poems from The Book of Taliesin (Aberystwyth, 2007)
[6]
Armes Prydain  (ed) Ifor Williams and Rachel Bromwich (Dublin, 1982)
[7]
Haycock, Marged (ed)Prophecies from The Book of Taliesin (Aberystwyth, 2013)
[8]
Llyfr Du Caerfyrddin ed. A O H Jarman (Cardiff, 1982)
[9]
"Cyhoeddiadau - Prifysgol Cymru".
[10]
"Cyhoeddiadau - Prifysgol Cymru".
[11]
"Cyhoeddiadau - Prifysgol Cymru".
[12]
'Awen y Cynfeirdd a’r Gogynfeirdd’ by Y Chwaer Bosco, Beirdd a Thywysogion (Cardiff, 1996)
[13]
Gramadegau’r Pencerddiaid ed. G. J. Williams ac E J Jones (Cardiff, 1934)
[14]
Idris Bell, translation of Thomas Parry’s History of Welsh Literature (Oxford, 1955)
[15]
Ceri W Lewis ‘Iolo Morgannwg and Strict Metre Poetry’ in A Rattleskull Genius ed. Geraint H Jenkins (Cardiff, 2005)
[16]
Gerald of Wales Description of Wales and the Journey Through Wales trans Lewis Thorpe, Penguin, various editions
[17]
"Early Modern Letters Online". Bodleian Library. Retrieved 17 July 2013.
[18]
"Awen - The Holy Spirit of Druidry - The British Druid Order". The British Druid Order.

[19]
Jan Morris (1984), The Matter of Wales: Epic Views of a Small Country, Oxford University Press. Page 155.
[20]
Marcus Tanner (2004), The Last of the Celts, Yale University Press. Page 191.
[21]
Jan Morris (1984), The Matter of Wales: Epic Views of a Small Country, Oxford University Press. Page 155.
[22]
Order of Bards, Ovates & Druids (2001). "Approaching The Forest: Gwers 2, Pg. 24". Oak Tree Press.
[23]
J. Williams Ab Ithel, Ed. "The Barddas of Iolo Morganwg, Vol. I"
[24]
Terrence P. Hunt, "Druid symbol approved for use on veteran headstones", The Wild Hunt, January 24, 2017
Kenneth Jackson, Tradition in Early Irish Prophecy, Man, Vol. 34, (May 1934), pp. 67–70.
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Ave-Latin greeting, meaning "hail" or "be well" This article is about the Roman salutation. For the Spanish high speed rail network, 
Ave is a Latin word, used by the Romans as a salutation and greeting, meaning 'hailthy'. 

It is the singular imperative form of the verb avēre, which meant 'to be well';
 thus one could translate it literally as 'be well' or 'farewell'.
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"HAVE" Mosaic outside the House of the Faun, Pompeii, reflecting the less formal variant of ave.
Etymology
"Ave" is likely borrowed with an unspelled /h/ from Punic *ḥawe (“live , 2sg. imp.), cognate to Hebrew חוה‎ (“Eve”) and as (avō) from Punic *ḥawū (2pl. imp.), from Semitic root ḥ-w-y (live).
The form might have been contaminated by "avē", the second-person singular present imperative of avēre (first-person aveō), meaning to be well/to fare well. Indeed, its long vowel also ended up short via iambic shortening; this would explain the reluctance to spell the aspirate, as well as its interpretation as a verb form. Attested since Plautus.
Use-
The Classical Latin pronunciation of ave is [ˈaweː]. As far back as the first century AD, the greeting in popular use had the form have (pronounced [ˈhawɛ] or perhaps [ˈhaβ‌ɛ]), with the aspirated initial syllable and the second syllable shortened, for which the most explicit description has been given by Quintilian in his Institutio Oratoria.
While have would be informal in part because it has the non-etymological aspiration, centuries later, any and all aspiration would instead completely disappear from popular speech, becoming an artificial and learned feature.

Ave in Ecclesiastical Latin is [ˈave], and in English, it tends to be pronounced /ˈɑːveɪ/ AH-vay.

The term was notably used to greet .
the Caesar or other authorities. Suetonius recorded that on one occasion, naumachiarii—captives and criminals fated to die fighting during mock naval encounters—addressed Claudius Caesar with the words "Ave Caesar! Morituri te salutant!" ('Hail स्वास्थ्य, Caesar! Those who are about to die salute you !') in an attempt to avoid death. 
The expression is not recorded as being used in Roman times on any other occasion.

The Vulgate version of the Annunciation translates the salute of the angel to Mary, Mother of Jesus as "ave, gratia plena" ('Hail, full of grace'). The phrase "Hail Mary" (Ave Maria) is a Catholic Marian prayer that has inspired authors of religious music.

Fascist regimes during the 20th century also adopted the greeting. It was also distinctly used during the National Socialist Third Reich in the indirect German translation, heil.
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Ave is not to be confused with Latin ave as the vocative singular of avus, अव्वुस- meaning grandfather/forebear, or ave as the ablative singular of (avis= meaning bird.
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एवेन "प्रेरणा" (और आमतौर पर काव्यात्मक प्रेरणा) के लिए एक वेल्श, कोर्निश और ब्रेटन शब्द है।
वेल्श पौराणिक कथाओं में, अवन- कवियों, या बार्डों (भाटों)की प्रेरणा है; या, इसके अवतार में, एवेन सामान्य रूप से रचनात्मक कलाकारों का प्रेरक विचार है।
प्रेरित व्यक्ति (अक्सर एक कवि या भविष्यवक्ता) को एक अजीब व्यक्ति के रूप में वर्णित किया जाता है।

नियो-ड्र्यूड्स एवेन को "प्रवाहित ऊर्जा" या "जीवन के सार के साथ बहने वाली शक्ति" के रूप में परिभाषित करते हैं।
वर्तमान उपयोग में, अवेन को कभी-कभी संगीतकारों और कवियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।
यह महिला के नाम के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। यह वेल्स के राष्ट्रीय गान (हेन व्लाद फे न्हादाऊ) के तीसरे पद में प्रकट होता है।

( शब्द व्युत्पत्ति)-
एवेन इंडो-यूरोपीय हिब्रू मूल का शब्द है। * ओ Awe- (अव्) धातु से निकला है जिसका अर्थ है 'लाइव',  जीवन धारण करना- और इसका वही मूल शब्द है जो एवेल शब्द का अर्थ है 'साँस लेना', और वेल्श में कोर्निश में 'हवा' या गेल- 'आंधी' का वाचक है।

ऐतिहासिक प्रमाण-
इस शब्द का पहला रिकॉर्ड सत्यापन किया गया  नेनियस के हिस्टोरिया ब्रिटोनम में ,जो 796 ईस्वी सदी का एक लैटिन पाठ है।
यह वेल्श भिक्षु, गिल्डस द्वारा पहले के लेखन पर आधारित है। यह 'ट्यूनिक तालहेर्न टैट( एगुएन) इन पोमेटेट क्लैरट' (म्यूज के पिता तल्हार्न तब कविता में प्रसिद्ध थे) इस वाक्यांश में होता है, जहां छठी शताब्दी के कवियों का वर्णन करने वाले लैटिन पाठ में ओल्ड वेल्श शब्द एगुएन (एवेन) ही होता है।

यह अपने वर्तमान रूप में (कैनू लिलीवार्च हेन) (9 वीं या 10 वीं शताब्दी ?) में भी दर्ज किया गया है, जहां लिलीवार्च कहते हैं, 'मैं अपने अवेन द्वारा जानता हूं' इसे वह  सहज ज्ञान के स्रोत के रूप में इंगित करता है।
काव्यात्मक प्रेरणा के रूप में और परमात्मा से प्रेरणा के रूप में एवेन के बीच संबंधों पर, "द बुक ऑफ टैलिएसिन "का अर्थ अक्सर यही होता है।  उसका एक विशेष रूप से आकर्षक उदाहरण इन पंक्तियों में निहित है:
* पान पान पीर करता है
ऑगिरवेन एवेन टीयर*
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-शाब्दिक रूप से "प्रेरणा के तीन तत्व जो आए, शानदार, कड़ाही से बाहर" लेकिन निहित रूप से "जो भगवान से आया" 'पीर' (कौलड्रॉन) के रूप में 'ईश्वर' के अर्थ के साथ अक्सर 'संप्रभु' का अर्थ भी हो सकता है।
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यह "तीन तत्व" है जिसे चतुराई से यहां क्रियान्वित किया गया है क्योंकि एवेन को कभी-कभी तीन उप-विभाजनों (* 'ओगिरवेन') के रूप में वर्णित किया गया था, इसलिए एवेन= "त्रिकोणीय प्रेरणा (ओग्यर्वेन)का , शायद ट्रिनिटी का सुझाव दे रहा है।
एवेन शब्द (द बुक ऑफ टैलिएसिन) के साथ-साथ कई समकक्ष शब्दों या वाक्यांशों में पन्द्रह घटनाएं में  हैं, जैसे कि ऑगिरवेन, जो कि एवेन के विभाजन के रूप में दोनों का उपयोग किया जाता है ('सात स्कोर ओग्रिवेन जो एवेन में हैं, ऐनवफन में आकार दिया गया है) ') साथ ही (awen) के लिए एक वैकल्पिक शब्द है।

आर्म्स प्राइडेन (ब्रिटेन की भविष्यवाणियां) कविता 'एवेन भविष्यवाणी करता है ...' वाक्यांश के साथ शुरू होती है और इसे बाद में कविता में दोहराया जाता है।
12 वीं शताब्दी में( जेराल्ड ऑफ वेल्स) द्वारा दिए गए अवेनीडियन के विवरण में काव्यात्मक प्रेरणा और अटकल के बीच की कड़ी निहित है और बर्दिक अभिव्यक्ति और भविष्यवाणी के बीच की कड़ी  तथा वेल्स और अन्य जगहों में बहुत प्रारंभिक कविता की एक सामान्य विशेषता है।

(द ब्लैक बुक ऑफ कार्मार्थन) में एक कविता अज्ञात बार्ड (भाटों) द्वारा लिखी गई है, लेकिन कुहेलिन फर्ड (1100-1130) को संबोधित करते हुए भगवान से जागृति को प्रवाहित करने की अनुमति देने के लिए कहा जाता है।  ताकि 'सेरिडवेन से प्रेरित गीत विविध और अच्छी तरह से तैयार की गई कविता को आकार दे सके'। यह लगभग 1100-1300 के बीच वेल्श राजकुमारों के पहचाने गए चारणों से बहुत कविता का अनुमान लगाता है जो सेरिडवेन के काल्ड्रॉन में एवेन के स्रोत के साथ सेल्टिक चर्च के प्रतिस्पर्धी दावों को तोड़ता है।

बाद में मध्य युग में एवेन के स्रोत की पहचान सेरिडेवेन से अधिक रूढ़िवादी ईसाई स्रोतों जैसे कि वर्जिन मैरी, संतों या सीधे भगवान से स्थानांतरित होने लगती है।
विद्वान- (वाई च्वाएर बोस्को" द्वारा अवेन वाई सिनफीर्ड ए'आर गोगिनफीर्ड) में एक पूर्ण चर्चा पाई जा सकती है। बाद के मध्य युग के बार्डिक व्याकरण( 'द होली स्पिरिट') की पहचान जागरण के उचित स्रोत के रूप में करते हैं। 
15 वीं शताब्दी के (बार्ड सायन सेंट) ने तर्क दिया कि ईश्वर ही एकमात्र स्रोत है और उन चारणों के "झूठ बोलने वाले अवेन" को खारिज कर दिया, जो अन्यथा अपनी खारिज करने वाली पंक्तियों के रूप में सोचते थे।
एक दावेदार झूठा यह अवेन पाया जाता है
भूमिगत नरक की भट्टी से पैदा हुआ एक गैर-मध्यस्थ स्रोत पर इस तरह का ध्यान अठारहवीं शताब्दी के यूनिटेरियन इओलो मॉर्गनवग (एडवर्ड विलियम्स, 1747-1826) द्वारा उठाया गया था।

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 जो एवेन प्रतीक /|\ का आविष्कार करने में सक्षम थे। वे यह सुझाव देते हुए कि यह "अवर्णनीय नाम" का एक प्राचीन भगवान का ड्र्यूडिक संकेत था। उगते सूरज की किरणें होने के नाते विषुव और संक्रांति पर, ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रकाश की आंख ।
जिराल्डस कैंब्रेन्सिस ने अपने  "एकाउण्ट ऑफ (वेल्स वेल्स का विवरण) (1194) में एवेन से प्रेरित लोगों को "एवेनीडियन" के रूप में संदर्भित किया:
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कैम्ब्रिया में कुछ ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें आप कहीं और नहीं पाएंगे, जिन्हें अवेनेडियॉन अथवा  प्रेरित लोग; ​कहा जाता है। जब किसी भी संदिग्ध घटना के बारे में उनसे सलाह ली जाती है, तो वे हिंसक रूप से दहाड़ते हैं, खुद से अलग हो जाते हैं, और मानो किसी आत्मा के वश में हो जाते हैं। वे संबंधित तरीके से जो आवश्यक है उसका उत्तर नहीं देते हैं; लेकिन जो व्यक्ति कुशलता से उनका निरीक्षण करता है, वह कई प्रस्तावनाओं के बाद, और कई बेकार और असंगत, अलंकृत भाषणों के बाद, एक शब्द के किसी मोड़ में व्यक्त की गई वांछित व्याख्या को सही  पाएगा: वे तब से जगे हुए हैं उनका परमानंद, एक गहरी नींद के रूप में, और, जैसा कि हिंसा से उनके उचित होश में लौटने के लिए मजबूर किया गया था। सवालों के जवाब देने के बाद, वे तब तक नहीं उबरते जब तक कि अन्य लोग उन्हें हिंसक रूप से हिला न दें; न ही वे अपने द्वारा दिए गए उत्तरों को याद रख सकते हैं। यदि एक ही बिंदु पर दूसरी या तीसरी बार परामर्श किया जाता है, तो वे पूरी तरह से भिन्न भावों का उपयोग करेंगे; शायद वे कट्टर और अज्ञानी आत्माओं के माध्यम से बोलते हैं। ये उपहार आमतौर पर उन्हें सपनों में दिए जाते हैं:।
 कुछ लोगों को लगता है कि उनके होठों पर मीठा दूध या शहद डाला गया है; दूसरों को लगता है कि उनके मुंह पर एक लिखित अनुसूची लागू की जाती है और जागने पर वे सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि उन्हें यह उपहार ईश्वर से  मिला है।
(अध्याय XVI: इस राष्ट्र के ज्योतिषियों और व्यक्तियों के बारे में जैसा कि यह था)
1694 में, वेल्श कवि 'हेनरी वॉन' ने अपने चचेरे भाई, पुरातनपंथी जॉन ऑब्रे को उस समय वेल्स में मौजूद ड्रुइड्री के अवशेषों के बारे में यह कहते हुए  कुछ जानकारी के अनुरोध के जवाब में लिखा था, "प्राचीन भाटों ने अपने ज्ञान के बारे में कुछ भी नहीं बताया, लेकिन परम्परा के माध्यम से: जो मुझे लगता है कि इसका कारण है यह ह्  हमारे पास कोई विवरण नहीं बचा है और न ही किसी प्रकार के अवशेष, या उनके जीने के तरीके के अन्य स्मारक ही हैं। जहां तक ​​बाद के चारणों का संबंध है, आपके पास उनका सबसे दिलचस्प लेखा-जोखा होगा।
कविता की इस नस को उन्होंने अवेन कहा, जो उनकी भाषा में उत्साह का प्रतीक है।
या एक काव्यात्मक उपद्रव और (सच में) उनमें से कई के साथ मैंने बातचीत की है (जैसा कि मैं कह सकता हूं) उपहार या इससे प्रेरित हैं। मुझे एक बहुत ही शांत, जानकार व्यक्ति (अब मृत) द्वारा बताया गया था कि उनके समय में, एक युवा बालक पिताहीन और मातृहीन था, इतना गरीब था कि उसे भीख माँगने के लिए मजबूर होना पड़ा; लेकिन आखिर में एक अमीर आदमी ने ले लिया, जिसने पहाड़ों पर भेड़ों का एक बड़ा झुंड रखा था, जहां मैं अब रहता हूंउसे कपड़े पहनाए और अपनी भेड़-बकरियाँ रखने के लिए पहाड़ों पर भेज दिया।वहाँ गर्मियों के समय में भेड़ों का पीछा करते हुए और उनके मेमनों को देखते हुए, वह एक गहरी नींद में गिर गया जिसमें उसने सपना देखा, कि उसने एक सुंदर युवक को उसके सिर पर हरी पत्तियों की माला और उसकी मुट्ठी पर एक बाज देखा: तीरों से भरा तरकश उसकी पीठ पर आ रहा है, उसकी ओर आ रहा है (कई सीटी बजा रहा हैउपाय या धुन सभी तरह से) अंत में बाज को उस पर उड़ने दें, जो (उसने सपना देखा) उसके मुंह और अंदरूनी हिस्सों में घुस गया, और अचानक एक बड़े भय और घबराहट में जाग गया: बट ऐसी नस, या कविता के उपहार के साथ , कि वह भेड़ों को छोड़कर देश में फिरने लगा, और सब पर गीत गाने लगाअवसर, और अपने समय में सभी देशों में सबसे प्रसिद्ध बार्ड बन गए।— हेनरी वॉन, जॉन ऑब्रे को लिखे एक पत्र में, अक्टूबर 1694
आधुनिक ड्र्यूडिज़्म के कुछ रूपों में, शब्द को तीन सीधी रेखाओं को दर्शाने वाले प्रतीक द्वारा दर्शाया गया है।, जो नीचे की ओर बढ़ने पर अलग-अलग फैलती हैं, एक वृत्त के भीतर खींची जाती हैं या अलग-अलग मोटाई के घेरे की एक श्रृंखला होती है, अक्सर एक बिंदु या बिंदु के साथ, प्रत्येक रेखा के ऊपर .
 ब्रिटिश ड्र्यूड ऑर्डर प्रतीक को इओलो मॉर्गनग को श्रेय देता है; इसे कुछ नियो-ड्र्यूड्स द्वारा अपनाया गया है।

यद्यपि पाणिनि के द्वारा भाषा का उत्पत्ति मूलक विश्लेषण के सन्दर्भों में जो माहेश्वर सूत्र की रचना की गयी है वह अभी भी संशोधन की अपेक्षा रखता है ।
"और इन सूत्रों में  अभी और संशोधन- अपेक्षित है। यदि ये सूत्र शिव से प्राप्त होते तो इनमें चार सन्धि स्वर ( संयुक्त स्वर)  ए,ऐ,ओ,औ का समावेश कदापि नहीं होता !
तथा अन्त:स्थ वर्ण ( य,व,र,ल ) भी न होते ! क्यों कि ये भी सन्धि- संक्रमण स्वर ही हैं। जिनकी कोई मौलिक व्युत्पत्ति नहींव है:-
जो क्रमश: (इ+अ=य) (उ+अ=व) (ऋ+अ=र)
(ऌ+अ= ल) इसके अतिरिक्त  "" महाप्राण भी ह्रस्व "" का घर्षित गत्यात्मक रूप है ;दौनों कण्ठ से उच्चारित हैं ।
यदि "अ" ह्रस्व स्वर स्पन्दन (धड़कन) है तो "ह" श्वाँस है। समग्र वर्णमाला में अनिवार्य भूमिका है ।
केवल वर्ग के प्रथम  वर्ण  ( कचटतप) ही सघोष अथवा नादित होकर तृतीय रूप में उद्भासित होते हैं । अन्यथा 👇
प्रथम चरण :–
(क्+ह्=ख्) 
(च्+ह् =छ्) 
(ट्+ह्=ठ्)
(त्+ह्=थ्) 
(प्+ह्=फ्) ।
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द्वित्तीय -चरण:–
♪(क् + नाद युक्त निम्न वाही घर्षण = ग्  )
♪( च्+ नाद युक्त निम्न वाही घर्षण = ज् )
♪(ट्+नाद युक्त निम्न वाही घर्षण = ठ् )
♪( त्+ नाद युक्त निम्न वाही घर्षण =द् )
♪(प् +नाद युक्त निम्न वाही घर्षण =ब् )
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तृतीय -चरण:–
(ग्+ह्=घ्) 
(ज्+ह् =झ्) 
(ड्+ह्=ढ्)
(द्+ह्=ध्) 
(ब्+ह्=भ्) ।
और इन स्पर्श - व्यञ्जनों में जो प्रत्येक वर्ग का अनुनासिक वर्ण ( ञ ङ ण न म  ) है
वह वस्तुत: केवल अनुस्वार का अथवा "म"/ "न"
का स्व- वर्गीय रूप है ।
यहाँ केवल "न" का रूपान्तरण है ।
जब यही "न" मूर्धन्य हुआ तो लृ के रूप में स्वर बन गया👇👆यद्यपि "ऋ" तथा "ऌ" स्वर न होकर क्रमश पार्श्वविक तथा आलोडित रूप है ।
(न=ल=र) तीनों वर्णों का विकास "अ" वर्ण का पार्श्वविक आलोडित रूप है जो उच्चारण की दृष्टि से मूर्धन्य तथा वर्त्स्य ( दन्तमूलीय रूप ) है ।
अंग्रेजी में सभी अनुनासिक वर्ण (An) से अनुवादित हैं । अत: स्पर्श व्यञ्जन वर्णों में
क, च ,ट ,त, प, न, ही मूल वर्ण हैं ।
ऊष्म वर्णों में केवल  "स" वर्ण मूल है ।
"ष" और "श" वर्ण तो सकार के क्रमश टवर्गीय और च वर्गीय होने पर बनते हैं ।
अंग्रेजी में अथवा यूरोपीय भाषाओं में तवर्ग का शीत जलवायु के प्रभाव से अभाव है ।
अत: अंग्रेजी में केवल शकार (श)और षकार (ष)
क्रमश "Sh"  और "Sa" का नादानुवाद होंगे।
तवर्ग के न होने से सकार (स) उष्म वर्ण उच्चारित नहीं होगा ।
अब आगे के चरणों में संयुक्त व्यञ्जन वर्णों की व्युत्पत्ति का विवरण है ।👇
सर्वप्रथम पाणिनीय माहेश्वर सूत्रों का विवरण प्रस्तुत कहते हैं ।________
पाणिनि के माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या 14 है ; जो निम्नलिखित हैं: 👇 
१. अइउण्।  २. ॠॡक्।  ३. एओङ्। ४ . ऐऔच्। ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्।  ८.  झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्।  ११. खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३. शषसर्। १४. हल्।
स्वर वर्ण:–अ इ उ ॠ ॡ एओ ऐ औ य व र ल  ।
अनुनासिक वर्ण:– ञ ङ ण न म।
वर्ग के चतुर्थ वर्ण :- झ भ घ ढ ध  ।
वर्ग के तृतीय वर्ण:–ज ब ग ड द ।
वर्ग के द्वित्तीय वर्ण:- ख फ छ ठ थ ।
वर्ग के प्रथम वर्ण :- च ट त क प ।
अन्त में ऊष्म वर्ण :- श, ष, स ,
महाप्राण  वर्ण :-"ह"
 उपर्युक्त्त 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों (अक्षरसमाम्नाय) को एक विशिष्ट प्रकार से संयोजित किया गया है।
फलतः, पाणिनि को शब्दों के निर्वचन या नियमों मे जब भी किन्ही विशेष वर्ण समूहों (एक से अधिक) के प्रयोग की आवश्यकता होती है, वे उन वर्णों (अक्षरों) को माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाकर संक्षेप मे ग्रहण करते हैं। माहेश्वर सूत्रों को इसी कारण ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी कहते हैं। प्रत्याहार बनाने की विधि तथा संस्कृत व्याकरण मे उनके बहुविध प्रयोगों को आगे दर्शाया गया है।
इन 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के समस्त वर्णों को समावेश किया गया है।
प्रथम 4 सूत्रों (अइउण् – ऐऔच्) में स्वर वर्णों तथा शेष 10 सूत्र व्यंजन वर्णों की गणना की गयी है। संक्षेप में स्वर वर्णों को अच् एवं व्यंजन वर्णों को हल् कहा जाता है। अच् एवं हल् भी प्रत्याहार हैं।
प्रत्याहार की अवधारणा :- प्रत्याहार का अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन।
अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘आदिरन्त्येन सहेता’ (१-१-७१) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का पाणिनि ने निर्देश किया है।
आदिरन्त्येन सहेता (१-१-७१): (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण (सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदि वर्ण एवं इत्संज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में (collectively) बोध कराता है। उदाहरण: अच् = प्रथम माहेश्वर सूत्र ‘अइउण्’ के आदि वर्ण ‘अ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ऐऔच्’ के अन्तिम वर्ण ‘च्’ से योग कराने पर अच् प्रत्याहार बनता है।

यह अच् प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है।
अतः, अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ।
इसी तरह हल् प्रत्याहार की सिद्धि ५ वें सूत्र हयवरट् के आदि अक्षर ह को अन्तिम १४ वें सूत्र हल् के अन्तिम अक्षर (या इत् वर्ण) ल् के साथ मिलाने (अनुबन्ध) से होती है।
फलतः, हल् = ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ब ग ड द, ख फ छ ठ थ च ट त, क प, श ष स, ह।
उपर्युक्त सभी 14 सूत्रों में अन्तिम वर्ण (ण् क् च् आदि हलन्त वर्णों ) को पाणिनि ने इत् की संज्ञा दी है। इत् संज्ञा होने से इन अन्तिम वर्णों का उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिए केवल अनुबन्ध (Bonding) हेतु किया जाता है, लेकिन व्याकरणीय प्रक्रिया मे इनकी गणना नही की जाती है |
अर्थात् इनका प्रयोग नहीं होता है। _______
अ इ उ ऋ लृ मूल स्वर हैं परन्तु
अ ही मूल स्वर है यही जब ऊर्ध्व गामी रूप में "उ" होता है तो अधो गामी रूप में "इ" होता है ।
ऋ और ऌ वर्णों के विषय में  हम पहले विश्लेषण कर चुके हैं ।
केवल " अ" स्वर से ही सभी स्वरों का प्रस्फुटन हुआ है ।
परन्तु ए ,ओ ,ऐ,औ ये सन्ध्याक्षर होने से मौलिक नहीं अपितु इनका निर्माण हुआ है ।
माहेश्वर सूत्रों में समायोजित करने की इनकी कोई आवश्यकता नहीं ।
जैसे क्रमश:(अ+ इ = ए )तथा (अ + उ =ओ )
संयुक्त स्वरों के रूप में गुण सन्धि के रूप में उद्भासित होते हैं ।
अतः स्वर तो केवल तीन ही मान्य हैं ।👇
। अ इ उ । और ये परवर्ती इ तथा उ स्वर भी केवल अ स्वर के उदात्त( ऊर्ध्वगामी ) उ । तथा (अधो गामी) इ । के रूप में हैं ।
ऋ तथा ऌ स्वर नहीं होकर क्रमश पार्श्वविक तथा आलोडित रूप है । जो उच्चारण की दृष्टि से मूर्धन्य तथा वर्त्स्य ( दन्तमूलीय रूप ) है ।
इनका विकास भी अनुनासिक "न" वर्ण से हुआ है।
अब "ह" वर्ण महाप्राण है । जिसका उच्चारण स्थान काकल है ।
यह भी "अ" का घर्षित गत्यात्मक
काकलीय रूप है ।
तीन स्वर:- अ + इ+ उ ।
छ: व्यञ्जन :-क च ट त प न ।
एक ऊष्म :- स ।
पार्श्वविक तथा आलोडित स्वर वर्ण लृ  ऋ।
ये पार्श्वविक तथा आलोडित वर्ण "न" अनुनासिक के क्रमश वर्त्स्य  और मूर्धन्य रूप है ।
मूल वर्ण तो आठ ही हैं ।
👉👆👇परन्तु पाणिनीय मान्यताओं के विश्लेषण स्वरूप  मूलत: ध्वनि के प्रतीक तो 28 हैं ।
परन्तु पाणिनी ने अपने शिक्षा शास्त्र में (64) चतु:षष्टी वर्णों की रचना दर्शायी है ।
२२ अच् ( स्वर) :– अ आ आ३, इ ई ई३, उऊऊ३,
ए ए३, ऐ ऐ३, ओ ओ३ ,औ औ३,  ऋ ऋृ ऋृ३, ऌ ऌ३।
२५ हल् ( व्यञ्जन) :- कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग।
४ अन्त:स्थ ( Interior / Semi Vowel):-
(य र ल व) ।
३ ऊष्म वर्ण :– श , ष , स ।
१ महाप्राण :- "ह"
१ दु: स्पृष्ट वर्ण है :- ळ ।
इस प्रकार हलों की संख्या ३४ है ।
अयोगवाह का पाणिनीय अक्षरसमाम्नाय में कहीं वर्णन नहीं है.
जिनमें चार तो शुद्ध अयोगवाह हैं ।
(अनुस्वार ां , ) (विसर्ग ा: )  (जिह्वया मूलीय ≈क) (उपध्मानीय ≈प )
चार यम संज्ञक :- क्क्न, ख्ख्न ,ग्ग्न,घ्घ्न।
इस प्रकार 22
+34+8+= 63 ।
परन्तु तीन स्वर :– १-उदात्त २-अनुदात्त तथा ३-स्वरित
के सहित पच्चीस हैं ।
पच्चीस स्वर ( प्रत्येक स्वर के उदात्त (ऊर्ध्वगामी) अनुदात्त( निम्न गामी) तथा स्वरित( मध्य गामी) फिर इन्हीं के अनुनासिक व निरानुनासिक रूप इस प्रकार से प्रत्येक ह्रस्व स्वर के पाँच रूप हुए )
तो इस प्रकार से स्वरों के 110 रूप हो जाते हैं।22×5
________
इस प्रकार कुल योग (25) हुआ ।
क्यों कि मूल स्वर पाँच ही हैं । 5×5=25 _______
और पच्चीस स्पर्श व्यञ्जन कवर्ग ।चवर्ग ।टवर्ग ।तवर्ग । पवर्ग। = 25।
तेरह (13) स्फुट वर्ण ( आ ई ऊ ऋृ लृ ) (ए ऐ ओ औ ) ( य व र ल) ( चन्द्रविन्दु ँ ) अनुस्वार तथा विसर्ग।
अनुसासिक के रूप होने से पृथक रूप से गणनीय नहीं हैं ।
पाणिनीय शिक्षा में कहा कि ---त्रिषष्टि चतु: षष्टीर्वा वर्णा शम्भुमते मता: ।
स्वर (Voice) या कण्ठध्वनि की उत्पत्ति उसी प्रकार के कम्पनों से होती है जिस प्रकार वाद्ययन्त्र से ध्वनि की उत्पत्ति होती है।
अत: स्वरयन्त्र और वाद्ययन्त्र की रचना में भी कुछ समानता के सिद्धान्त हैं।
वायु के वेग से बजनेवाले वाद्ययन्त्र के समकक्ष मनुष्य तथा अन्य स्तनधारी प्राणियों में निम्नलिखित अंग होते हैं :👇 ________
1. कम्पक (Vibrators) इसमें स्वर रज्जुएँ (Vocal cords) भी सम्मिलित हैं।
2. अनुनादक अवयव (resonators) इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :
(क.) नासा ग्रसनी (nasopharynx),

(ख.) ग्रसनी (pharynx),
(ग.) मुख (mouth),
(घ.) स्वरयंत्र (larynx),
(च.) श्वासनली और श्वसनी (trachea and bronchus)
(छ. )फुफ्फुस (फैंफड़ा )(lungs),
(ज.) वक्षगुहा (thoracic cavity)।
3. स्पष्ट उच्चारक (articulators)अवयव :- इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :
क. जिह्वा (tongue),
ख. दाँत (teeth),
ग. ओठ (lips),
घ. कोमल तालु (soft palate),
च. कठोर तालु (मूर्धा )(hard palate)। __________
दार्शनिक सिन्द्धान्तों के अनुसार 👇
♪ स्वर की उत्पत्ति में उपर्युक्त अव्यव निम्नलिखित प्रकार से कार्य करते हैं :
जीवात्मा द्वारा प्रेरित वायु फुफ्फुस से नि:सृत होकर जब उच्छ्वास की अवस्था में संकुचित होता है।
तब उच्छ्वसित वायु वायुनलिका से होती हुई स्वरयन्त्र तक पहुंचती है,
जहाँ उसके प्रभाव से स्वरयंत्र में स्थिर स्वररज्जुएँ कम्पित होने लगती हैं,
जिसके फलस्वरूप स्वर की उत्पत्ति होती है।
ठीक इसी समय अनुनादक अर्थात् स्वरयन्त्र का ऊपरी भाग, ग्रसनी, मुख तथा नासा अपनी अपनी क्रियाओं द्वारा स्वर में विशेषता तथा मृदुता उत्पन्न करते हैं।
इसके उपरान्त उक्त स्वर का शब्द उच्चारण के रूपान्तरण उच्चारक अर्थात् कोमल, कठोर तालु, जिह्वा, दन्त तथा ओष्ठ आदि अवयव करते हैं।
इन्हीं सब के सहयोग से स्पष्ट शुद्ध स्वरों की उत्पत्ति होती है।
स्वरयंत्र--- अवटु (thyroid) उपास्थि वलथ (Cricoid) उपास्थि स्वर रज्जुऐं ये संख्या में चार होती हैं ; जो स्वरयन्त्र के भीतर सामने से पीछे की ओर फैली रहती हैं।
यह एक रेशेदार रचना है जिसमें अनेक स्थिति स्थापक रेशे भी होते हैं।
देखने में उजली तथा चमकीली मालूम होती है।
इसमें ऊपर की दोनों तन्त्रियाँ गौण तथा नीचे की मुख्य कहलाती हैं।
इनके बीच में त्रिकोण अवकाश होता है जिसको कण्ठ-द्वार (glottis) कहते हैं।
इन्हीं रज्जुओं के खुलने और बन्द होने से नाना प्रकार के विचित्र स्वरों की उत्पत्ति होती है।
स्वर की उत्पत्ति में स्वररज्जुओं की गतियाँ (movements)-- श्वसन काल में रज्जुद्वार खुला रहता है और चौड़ा तथा त्रिकोणकार होता है।
श्वाँस लेने में यह कुछ अधिक चौड़ा (विस्तृत) तथा श्वाँस छोड़ने में कुछ संकीर्ण (संकुचित) हो जाता है।
बोलते समय रज्जुएँ आकर्षित होकर परस्पर सन्निकट आ जाती हैं ;और उनका द्वार अत्यंत संकीर्ण हो जाता है।
जितना ही स्वर उच्च होता है, उतना ही रज्जुओं में आकर्षण अधिक होता है और द्वारा उतना ही संकीर्ण हो जाता है। 
स्वरयन्त्र की वृद्धि के साथ साथ स्वररज्जुओं की लंबाई बढ़ती है ; जिससे युवावस्था में स्वर भारी हो जाता है। स्वररज्जुएँ स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक लंबी होती हैं।
इसी लिए पुरुषों का स्वर मन्द्र सप्तक पर आधारित है और स्त्रियों का स्वर तार सप्तक पर आधारित है। 
स्वरों की उत्पत्ति का मानव शास्त्रीय सिद्धान्त -- उच्छ्वसित वायु के वेग से जब स्वर रज्जुओं का कम्पन होता है ; तब स्वर की उत्पत्ति होती है।
यहाँ स्वर मूलत: एक ही प्रकार का उत्पन्न होता है किन्तु आगे चलकर तालु, जिह्वा, दन्त और ओष्ठ आदि अवयवों के सम्पर्क से उसमें परिवर्तन आ जाता है।
ये ही उसके विभिन्न प्रारूपों के साँचें है ।
स्वररज्जुओं के कम्पन से उत्पन्न स्वर का स्वरूप निम्लिखित तीन बातों पर आश्रित है :👇 _______ 
1. प्रबलता (loudness) - यह कम्पन तरंगों की उच्चता के अनुसार होता है।
2. तारत्व (Pitch) - यह कम्पन तरंगों की संख्या के अनुसार होता है।
3. गुणता (Quality) - यह गुञ्जनशील स्थानों के विस्तार के अनुसार बदलता रहता है;
और कम्पन तरंगों के स्वरूप पर निर्भर करता है।
"अ" स्वर का उच्चारण तथा "ह" महाप्राण वर्ण का उच्चारण श्रोत समान है ।
कण्ठ तथा काकल ।________
नि: सन्देह काकल कण्ठ का पार्श्ववर्ती है और "अ" तथा "ह" सम्मूलक सजातिय बन्धु हैं।
जैसा कि संस्कृत व्याकरण में रहा भी गया है ।
अकुह विसर्जनीयीनांकण्ठा ।
अर्थात् अ स्वर , कवर्ग :- ( क ख ग घ ड्•)
तथा विसर्ग(:) , "ह" ये सभीे वर्ण कण्ठ से उच्चारित होते हैं ।
अतः "ह" महाप्राण " भी "अ " स्वर के घर्षण से ही विकसित रूप है । 👇
अ-<हहहहह... ।
अतः "ह" भी मौलिक नहीं है। इसका विकास भी "अ" स्वर से हुआ ।
अत: हम इस "ह" वर्ण को भी मौलिक वर्णमाला में समावेशित नहीं करते हैं।_______य, व, र ,ल , ये अन्त:स्थ वर्ण हैं ; स्वर और व्यञ्जनों के मध्य में होने से ये अन्त:स्थ हैं।
क्यों कि अन्त: का अर्थ  मध्य ( Inter) और स्थ का अर्थ स्थित रहने वाला ।ये अन्त:स्थ वर्ण क्रमश: गुण सन्ध्याक्षर या स्वरों के विरीत संरचना वाले हैं । 👇

जैसे :-  इ+अ = य ।  अ+इ =ए ।      उ+अ = व। अ+उ= ओ।    ________  ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्। स्पर्श व्यञ्जनों सभी अनुनासिक अपने अपने वर्ग के अनुस्वार अथवा नकार वर्ण का प्रतिनिधित्व करते  हैं । ८. झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्। ११. खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३. शषसर्।    
उष्म वर्ण श, ष, स, वर्ण क्रमश: चवर्ग , टवर्ग और चवर्ग के सकार क प्रतिनिधित्व करते हैं ।
जैसे पश्च । पृष्ठ ।पस्त परास्त ।
यहाँ क्रमश चवर्ग के साथ तालव्य श उष्म वर्ण है।
टवर्ग के साथ मूर्धन्य ष उष्म वर्ण है ।
तथा तवर्ग के साथ दन्त्य स उष्म वर्ण है । _______👇 यूरोपीय भाषाओं में विशेषत: अंग्रेजी आदि में जो रोमन लिपि में है वहाँ तवर्ग का अभाव है ।
अतः त थ द ध  तथा स वर्णो को नहीं लिख सकते हैं । क्यों कि वहाँ की शीत जलवायु के कारण जिह्वा का रक्त सञ्चरण (गति) मन्द रहती है ।और तवर्ग की की उच्चारण तासीर ( प्रभाव ) सम शीतोष्ण जल- वायवीय है । अतः "श्" वर्ण  के लिए  Sh तथा "ष्" वर्ण के  S वर्ण रूपान्तरित हो सकते हैं ।
तवर्ग तथा "स" वर्ण शुद्धता की कषौटी पर पूर्णत: निषिद्ध व अमान्य ही  हैं ।  
१४. हल्। तथा पाणिनि माहेश्वर सूत्रों में एक "ह" वर्ण केवल हलों के विभाजन के लिए है । इस प्रकार वर्ण जो ध्वनि अंकन के रूप हैं । मौलिक रूप में केवल 28 वर्ण हैं । जो ध्वनि के मुल रूप के द्योतक हैं । ________
1. बाह्योष्ठ्य (exo-labial)
2. अन्तःओष्ठ्य (endo-labial)
3. दन्त्य  (dental)
4. वर्त्स्य  (alveolar)
5.  पश्च वर्त्स्य (post-alveolar)
6. प्रतालव्य( prä-palatal )
7. तालव्य (palatal)
8. मृदुतालव्य (velar)
9. अलिजिह्वीय (uvular)
10.ग्रसनी से (pharyngal)
11.श्वासद्वारीय (glottal)
12.उपजिह्वीय (epiglottal)
13.जिह्वामूलीय (Radical)
14.पश्चपृष्ठीय (postero-dorsal)
15.अग्रपृष्ठीय (antero-dorsal)
16.जिह्वापाग्रीय (laminal)
17.जिह्वाग्रीय (apical)
18.उप जिह्विय( sub-laminal) ________
स्वनविज्ञान के सन्दर्भ में,
मुख गुहा के उन 'लगभग अचल' स्थानों को उच्चारण बिन्दु (articulation point या place of articulation) कहते हैं; जिनको 'चल वस्तुएँ' छूकर जब ध्वनि मार्ग में बाधा डालती हैं तो उन व्यंजनों का उच्चारण होता है।
उत्पन्न व्यञ्जन की विशिष्ट प्रकृति मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करती है- उच्चारण स्थान, उच्चारण विधि और स्वनन (फोनेशन)।
मुख गुहा में 'अचल उच्चारक' मुख्यतः मुखगुहा की छत का कोई भाग होता है जबकि 'चल उच्चारक' मुख्यतः जिह्वा, नीचे वाला ओष्ठ (ओठ), तथा श्वाँस -द्वार (ग्लोटिस)आदि  हैं।
व्यञ्जन वह ध्वनि है जिसके उच्चारण में वायु अबाध गति से न निकलकर मुख के किसी भाग:- (तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि) से या तो पूर्ण अवरुद्ध होकर आगे बढ़ती है या संकीर्ण मार्ग से घर्षण करते हुए या पार्श्व मार्ग से निकलती है ।
इस प्रकार वायु मार्ग में पूर्ण या अपूर्ण अवरोध उपस्थित होता है।
तब व्यञ्जन ध्वनियाँ प्रादुर्भूत ( उत्पन्न) होती हैं ।
हिन्दी व्यञ्जनों का वर्गीकरण---- व्यञ्जनों का वर्गीकरण मुख्य रूप से स्थान और प्रयत्न के आधर पर किया जाता है।
व्यञ्जनों के उत्पन्न होने के स्थान से सम्बन्धित व्यञ्जन को आसानी से पहचाना जा सकता है।
इस दृष्टि से हिन्दी व्यञ्जनों का वर्गीकरण इस प्रकार है- उच्चारण स्थान (ध्वनि वर्ग) उच्चरित ध्वनि--👇 द्वयोष्ठ्य:- ,प , फ, ब, भ, म दन्त्योष्ठ्य :-,फ़ दन्त्य :-,त, थ, द, ध वर्त्स्य :-न, स, ज़, र, ल, ळ मूर्धन्य :-ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, र, ष कठोर :-तालव्य श, च, छ, ज, झ कोमल तालव्य :-क, ख, ग, घ, ञ, ख़, ग़ पश्च-कोमल-तालव्य:-  क़ वर्ण है।
स्वरयन्त्रामुखी:-. "ह" वर्ण है ।
"ह" ध्वनि महाप्राण है इसका विकास "अ" स्वर से हुआ है ।
जैसे धड़कन (स्पन्दन) से श्वाँस का जैसे धड़कन (स्पन्दन) से श्वाँस का अन्योन्य सम्बन्ध है उसी प्रकार "अ" और "ह"  वर्ण हैं।
"ह" वर्ण का उच्चारण स्थान काकल है ।
काकल :--- गले में सामने की ओर निकल हुई हड्डी । कौआ ।
घण्टी । टेंटुवा आदि नाम इसके साधारण भाषा में हैं।
शब्द कोशों में इसका अर्थ :-
१. काला कौआ ।
२. कंठ की मणि या गले की मणि ।
उच्चारण की प्रक्रिया के आधार पर व्यञ्जनों का  वर्गीकरण--👇
उच्चारण की प्रक्रिया या प्रयत्न के परिणाम-स्वरूप उत्पन्न व्यञ्जनों का वर्गीकरण इस प्रकार है- स्पर्श : उच्चारण अवयवों के स्पर्श करने तथा सहसा खुलने पर जिन ध्वनियों का उच्चारण होता है उन्हें स्पर्श कहा जाता है।

विशेषत: जिह्वा का अग्र भाग जब मुख के आन्तरिक भागों का उच्चारण करता है ।
क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ और क़ सभी ध्वनियाँ स्पर्श हैं।
च, छ, ज, झ को पहले 'स्पर्श-संघर्षी' नाम दिया जाता था ; लेकिन अब सरलता और संक्षिप्तता को ध्यान में रखते हुए इन्हें भी स्पर्श व्यञ्जनों के वर्ग में रखा जाता है।
इनके उच्चारण में उच्चारण अवयव सहसा खुलने के बजाए धीरे-धीरे खुलते हैं।
मौखिक व नासिक्य :- व्यञ्जनों के दूसरे वर्ग में मौखिक व नासिक्य ध्वनियां आती हैं।
हिन्दी में ङ, ञ, ण, न, म  व्यञ्जन नासिक्य हैं।
इनके उच्चारण में श्वासवायु नाक से होकर निकलती है, जिससे ध्वनि का नासिकीकरण होता है।
इन्हें 'पञ्चमाक्षर' भी कहा जाता है।
और अनुनासिक भी  -- इनके स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग सुविधजनक माना जाता है।
वस्तुत ये सभीे प्रत्येक वर्ग के  पञ्चम् वर्ण "न" अथवा "म" के ही रूप हैं ।
परन्तु सभी केवल अपने स्ववर्गीय वर्णों के सानिध्य में आकर "न" वर्ण का रूप प्रकट करते हैं ।
जैसे :-  कवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- अड्•क, सड्•ख्या ,अड्•ग , लड्•घन ।
चवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- चञ्चल, पञ्छी ,पिञ्जल अञ्झा ।
टवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- कण्टक,  कण्ठ, अण्ड ,. पुण्ढीर ।
तवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- तन्तु , पन्थ ,सन्दीपन,  अन्ध ।
पवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- पम्प , गुम्फन , अम्बा, दम्भ । ________
इन व्यंजनों को छोड़कर अन्य सभी व्यञ्जन मौखिक हैं।
उष्म वर्ण - उष्म व्यञ्जन :- उष्म का अर्थ होता है- गर्म। जिन वर्णो के उच्चारण के समय वायु मुख के विभिन्न भागों से टकरा कर और श्वाँस में गर्मी पैदा कर , ध्वनि समन्वित होकर बाहर निकलती उन्हें उष्म व्यञ्जन कहते है।
वस्तुत इन उष्म वर्णों का प्रयोजन अपने वर्ग के अनुरूप  सकारत्व का प्रतिनिधित्व करना है ।
तवर्ग - त थ द ध न का उच्चारण स्थान दन्त्य होने से "स" उष्म वर्ण है ।
और यह हमेशा तवर्ग के वर्णों के साथ प्रयोग होता है। जैसे - अस्तु, वस्तु,आदि-- इसी प्रकार टवर्ग - ट ठ ड ढ ण का उच्चारण स्थान मूर्धन्य होने से "ष" उष्म वर्ण ये सभी सजातिय हैं।
जैसे - कष्ट ,स्पष्ट पोष्ट ,कोष्ठ आदि चवर्ग -च छ ज झ ञ का  तथा "श" का उच्चारण स्थान तालव्य होने से ये परस्पर सजातिय हैं ।
जैसे- जैसे- पश्चात् , पश्च ,आदि इन व्यञ्जनों के उच्चारण के समय वायु मुख से रगड़(घर्षण) खाकर ऊष्मा पैदा करती है अर्थात् उच्चारण के समय मुख से गर्म वायु निकलती है।
उष्म व्यञ्जनों का उच्चारण एक प्रकार की रगड़ या घर्षण से उत्पत्र उष्म वायु से होता हैं।
ये भी चार व्यञ्जन होते है- श, ष, स, ह।
________
1- पार्श्विक : इन व्यञ्जनों के उच्चारण में श्वास -वायु जिह्वा के दोनों पार्श्वों (अगल-बगल) से निकलती है।
'ल' ऐसी ही  पार्श्विक ध्वनि है। अर्ध स्वर : इन ध्वनियों के उच्चारण में उच्चारण अवयवों में कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता तथा श्वासवायु अवरोधित नहीं रहती है।
हिन्दी में य, व ही अर्धस्वर की श्रेणि में हैं।
2-लुण्ठित :- इन व्यञ्जनों के उच्चारण में जिह्वा वर्त्स्य (दन्त- मूल या मसूड़े) भाग की ओर उठती है।
हिन्दी में 'र' व्यञ्जन इसी तरह की ध्वनि है।
3- उत्क्षिप्त :- जिन व्यञ्जन ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा का अग्र भाग (नोक) कठोर तालु के साथ झटके से टकराकर नीचे आती है, उन्हें उत्क्षिप्त कहते हैं।
ड़ और ढ़ ऐसे ही व्यञ्जन हैं। जो अंग्रेजी' में क्रमश (R) तथा ( Rh ) वर्ण से बनते हैं ।
घोष और अघोष वर्ण– व्यञ्जनों के वर्गीकरण में स्वर-तन्त्रियों की स्थिति भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
इस दृष्टि से व्यञ्जनों को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है :- घोष और अघोष।                        जिन व्यञ्जनों के उच्चारण में स्वर-तन्त्रियों में कम्पन होता है, उन्हें घोष या सघोष कहा जाता हैं। दूसरे प्रकार की ध्वनियाँ अघोष कहलाती हैं।स्वर-तन्त्रियों की अघोष स्थिति से अर्थात् जिनके उच्चारण में कम्पन नहीं होता उन्हें अघोष व्यञ्जन कहा जाता है। ________
घोष - अघोष ग, घ,   ङ,क, ख ज,झ,   ञ,च, छ ड, द,   ण, ड़, ढ़,ट, ठ द, ध,   न,त, थ ब, भ,   म, प, फ य,  र,   ल, व, ह ,श, ष, स ।
प्राणतत्व के आधर पर भी व्यञ्जन का वर्गीकरण किया जाता है।
प्राण का अर्थ है - श्वास -वायु  जिन व्यञ्जन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास बल अधिक लगता है उन्हें महाप्राण और जिनमें श्वास बल का प्रयोग कम होता है उन्हें अल्पप्राण व्यञ्जन कहा जाता है।
पञ्चम् वर्गों में दूसरी और चौथी ध्वनियाँ महाप्राण हैं। हिन्दी के ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ, ड़, ढ़ - व्यञ्जन महाप्राण हैं।

वर्गों के पहले, तीसरे और पाँचवें वर्ण अल्पप्राण हैं।
क, ग, च, ज, ट, ड, त, द, प, ब, य, र, ल, व, ध्वनियाँ इसी अल्प प्रमाण वर्ग की हैं।
वर्ण यद्यपि स्वर और व्यञ्जन दौनों का वाचक है । परन्तु जब व्यञ्जन में स्वर का समावेश होता है; तब वह अक्षर होता है ।
(अक्षर में स्वर ही मेरुदण्ड अथवा कशेरुका है।________
भाषाविज्ञान में 'अक्षर' या शब्दांश (अंग्रेज़ी रूप (syllable) सिलेबल) ध्वनियों की संगठित इकाई को कहते हैं।
किसी भी शब्द को अंशों में तोड़कर बोला जा सकता है और शब्दांश ही अक्षर है ।
शब्दांश :- शब्द के वह अंश होते हैं जिन्हें और अधिक छोटा नहीं बनाया जा सकता यदि छोटा किया तो  शब्द की ध्वनियाँ बदल जाती हैं।
उदाहरणतः 'अचानक' शब्द के तीन शब्दांश हैं - 'अ', 'चा' और 'नक'।
यदि रुक-रुक कर 'अ-चा-नक' बोला जाये तो शब्द के तीनों शब्दांश खंडित रूप से देखे जा सकते हैं।
लेकिन शब्द का उच्चारण सुनने में सही प्रतीत होता है। अगर 'नक' को आगे तोड़ा जाए तो शब्द की ध्वनियाँ ग़लत हो जातीं हैं - 'अ-चा-न-क'. इस शब्द को 'अ-चान-क' भी नहीं बोला जाता क्योंकि इस से भी उच्चारण ग़लत हो जाता है।
यह क्रिया उच्चारण बलाघात पर आधारित है ।कुछ छोटे शब्दों में एक ही शब्दांश होता है, जैसे 'में', 'कान', 'हाथ', 'चल' और 'जा'. कुछ शब्दों में दो शब्दांश होते हैं, जैसे 'चलकर' ('चल-कर'), खाना ('खा-ना'), रुमाल ('रु-माल') और सब्ज़ी ('सब-ज़ी')।
कुछ में तीन या उस से भी अधिक शब्दांश होते हैं, जैसे 'महत्त्वपूर्ण' ('म-हत्व-पूर्ण') और 'अन्तर्राष्ट्रीय' ('अंत-अर-राष-ट्रीय')।
एक ही आघात या बल में बोली जाने वाली या उच्चारण की जाने वाली ध्वनि या ध्वनि समुदाय की इकाई को अक्षर कहा जाता है।
इकाई की पृथकता का आधार स्वर या स्वर-रत (Vocoid) व्यञ्जन होता है। व्यञ्जन ध्वनि किसी उच्चारण में स्वर का पूर्व या पर अंग बनकर ही आती है। अक्षर में स्वर ही मेरुदण्ड अथवा कशेरुका है।
अक्षर से स्वर को न तो पृथक्‌ ही किया जा सकता है और न बिना स्वर या स्वरयुक्त व्यञ्जन के द्वारा अक्षर का निर्माण ही सम्भव है।
उच्चारण में यदि व्यञ्जन मोती की तरह है तो स्वर धागे की तरह।
यदि स्वर सशक्त सम्राट है तो व्यञ्जन अशक्त राजा।
इसी आधार पर प्रायः अक्षर को स्वर का पर्याय मान लिया जाता है, किन्तु ऐसा है नहीं, फिर भी अक्षर निर्माण में स्वर का अत्यधिक महत्व होता है।
जिसमें व्यञ्जन ध्वनियाँ भी अक्षर निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं। अंग्रेजी भाषा में न, र, ल,  जैसे एन ,आर,एल, आदि ऐसी व्यञ्जन ध्वनियाँ स्वरयुक्त भी उच्चरित होती हैं एवं स्वर-ध्वनि के समान अक्षर निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं।
अंग्रेजी सिलेबल के लिए हिन्दी में अक्षर शब्द का प्रयोग किया जाता है। ________
ध्वनि उत्पत्ति- सिद्धान्त----- 👇
मानव एवं अन्य जन्तु ध्वनि को कैसे सुनते हैं?
ध्वनि तरंग कर्णपटल का स्पर्श करती है , कान का पर्दा, कान की वह मेकेनिज्म जो ध्वनि को संकेतों में बदल देती है।
श्रवण तंत्रिकाएँ,  (पर्पल): ध्वनि संकेत का आवृति स्पेक्ट्रम, तन्त्रिका में गया संकेत) ही शब्द है । भौतिक विज्ञान में - ध्वनि (Sound) एक प्रकार का कम्पन या विक्षोभ है जो किसी ठोस, द्रव या गैस से होकर सञ्चारित होती है।
किन्तु मुख्य रूप से उन कम्पनों को ही ध्वनि कहते हैं जो मानव के कान (Ear) से सुनायी पडती हैं।
ध्वनि की प्रमुख विशेषताएँ--- ध्वनि एक यान्त्रिक तरंग है न कि विद्युतचुम्बकीय तरंग। (प्रकाश विद्युतचुम्बकीय तरंग है।
ध्वनि के सञ्चरण के लिये माध्यम की जरूरत होती है। ठोस, द्रव, गैस एवं प्लाज्मा में ध्वनि का सञ्चरण सम्भव है।
निर्वात में ध्वनि का सञ्चरण नहीं हो सकता।
द्रव, गैस एवं प्लाज्मा में ध्वनि केवल अनुदैर्घ्य तरंग  (longitudenal wave) के रूप में चलती है जबकि ठोसों में यह अनुप्रस्थ तरंग (transverse wave) के रूप में भी संचरण कर सकती है।
अनुदैर्घ्य तरंग:--- जिस माध्यम में ध्वनि का सञ्चरण होता है यदि उसके कण ध्वनि की गति की दिशा में ही कम्पन करते हैं तो उसे अनुदैर्घ्य तरंग कहते हैं!
अनुप्रस्थ तरंग:- जब माध्यम के कणों का कम्पन ध्वनि की गति की दिशा के लम्बवत होता है तो उसे अनुप्रस्थ तरंग कहते है।
सामान्य ताप व दाब (NTP) पर वायु में ध्वनि का वेग लगभग  343 मीटर प्रति सेकेण्ड होता है।
बहुत से वायुयान इससे भी तेज गति से चल सकते हैं उन्हें सुपरसॉनिक विमान कहा जाता है।
मानव कान लगभग २० हर्ट्स से लेकर २० किलोहर्टस (२०००० हर्ट्स) आवृत्ति की ध्वनि तरंगों को ही सुन सकता है।

बहुत से अन्य जन्तु इससे बहुत अधिक आवृत्ति की तरंगों को भी सुन सकते हैं।
जैसे चमकाधड़ एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाने पर ध्वनि का परावर्तन एवं अपवर्तन होता है। माइक्रोफोन ध्वनि को विद्युत उर्जा में बदलता है; लाउडस्पीकर विद्युत उर्जा को ध्वनि उर्जा में बदलता है।
किसी भी तरंग (जैसे ध्वनि) के वेग, तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति में निम्नलिखित संबन्ध होता है:-
{\displaystyle \lambda ={\frac {v}{f}}} जहाँ v तरंग का वेग, f आवृत्ति तथा : {\displaystyle \lambda } तरंगदर्ध्य है।
आवृत्ति के अनुसार वर्गीकर--- अपश्रव्य (Infrasonic) 20 Hz से कम आवृत्ति की ध्वनि मानव को सुनाई नहीं देती, श्रव्य (sonic) 20 Hz से 20 kHz, के बीच की आवृत्तियों वाली ध्वनि सामान्य मानव को सुनाई देती है।
पराश्रव्य (Ultrasonic) 20 kHz से 1,6 GHz के बीच की आवृत्ति की ध्वनि मानव को सुनाई नहीं पड़ती, अतिध्वनिक (Hypersonic) 1 GHz से अधिक आवृत्ति की ध्वनि किसी माध्यम में केवल आंशिक रूप से ही संचरित (प्रोपेगेट) हो पाती है।
ध्वनि और प्रकाश का सम्बन्ध शब्द और अर्थ के सामान्य या शरीर और आत्मा के समान जैविक सत्ता का आधार है ।
ध्वनि के विषय में दार्शनिक व ऐैतिहासिक मत -
_________
"सृष्टि के प्रारम्भ में ध्वनि का प्रादुर्भाव ओ३म् के रूप में हुआ ओ३म् शब्द की व्युत्पत्ति"----
एक वैश्विक विश्लेषण करते हैं ओ३म् की अवधारणा द्रविडों की सांस्कृतिक अभिव्यञ्जना है; वे नि: सन्देह फॉनिशियन जन-जाति के सहवर्ती अथवा सजातिय बन्धु रहे होंगे ।
क्यों दौनों का सांस्कृतिक समीकरण है।
द्रविड द्रव (पदार्थ ) अथवा जल तत्व का विद =वेत्ता ( जानकार) द्रव+विद= समाक्षर लोप (Haplology) के द्वारा निर्मित रूप द्रविद -द्रविड है !
ये बाल्टिक सागर के तटवर्ती -संस्कृतियों जैसे प्राचीन फ्रॉञ्च ( गॉल) की सैल्टिक (कैल्टिक) जन-जाति में  द्रूयूद (Druid) रूप में हैं ।
कैल्ट जन जाति के धर्म साधना के रहस्य मय अनुष्ठानों में इसी कारण से आध्यात्मिक और तान्त्रिक क्रियाओं को प्रभावात्मक बनाने के लिए ओघम् (ogham) शब्द का दृढता से उच्चारण विधान किया जाता था ! कि  उनका विश्वास था !
कि इस प्रकार (Ow- ma) अर्थात् जिसे भारतीय आर्यों ने ओ३म् रूप में साहित्य और कला के ज्ञान के उत्प्रेरक और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया था वह ओ३म् प्रणवाक्षर नाद- ब्रह्म स्वरूप है।
और उनका मान्यता भी थी.. प्राचीन भारतीय आर्य मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण भाषा की आक्षरिक सम्पत्ति (syllable prosperity) यथावत् रहती है इसके उच्चारण प्रभाव से ओघम् का मूर्त प्रारूप सूर्य के आकार के सादृश्य पर था।
जैसी कि प्राचीन पश्चिमीय संस्कृतियों की मान्यताऐं भी हैं ... वास्तव में ओघम् (ogham से बुद्धि उसी प्रकार नि:सृत होती है . जैसे सूर्य से प्रकाश प्राचीन मध्य मिश्र के लीबिया प्रान्त में तथा थीब्ज में यही आमोन् रा (ammon- ra) के रूप ने था ..जो वस्तुत: ओ३म् -रवि के तादात्मय रूप में प्रस्तावित है।
आधुनिक अनुसन्धानों के अनुसार भी अमेरिकीय अन्तरिक्ष यान - प्रक्षेपण संस्थान के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य में अजस्र रूप से निनादित ओ३म् प्लुत स्वर का श्रवण किया है।
सैमेटिक -- सुमेरियन हिब्रू आदि संस्कृतियों में ओमन् शब्द आमीन के रूप में है ।
तथा रब़ का अर्थ .नेता तथा महान होता हेै ! जैसे रब्बी यहूदीयों का धर्म गुरू है .. अरबी भाषा में..रब़ -- ईश्वर का वाचक है .अमोन तथा रा प्रारम्भ में पृथक पृथक थे ।दौनों सूर्य सत्ता के वाचक थे।
मिश्र की संस्कृति में ये दौनों कालान्तरण में एक रूप होकर अमॉन रॉ के रूप में अत्यधिक पूज्य हुए .. क्यों की प्राचीन मिश्र के लोगों की मान्यता थी कि अमोन -- रॉ.. ही सारे विश्व में प्रकाश और ज्ञान का कारण है,  मिश्र की परम्पराओ से ही यह शब्द मैसोपोटामिया की सैमेटिक हिब्रु परम्पराओं में प्रतिष्ठित हुआ जो क्रमशः यहूदी ( वैदिक यदुः ) के वंशज थे।
इन्हीं से ईसाईयों में (Amen) तथा अ़रबी भाषा में यही आमीन् ! (ऐसा ही हो ) होगया है इतना ही नहीं जर्मन आर्य ओ३म् का सम्बोधन (omi /ovin )या के रूप में अपने ज्ञान के देव वॉडेन ( woden) के लिए सम्बोधित करते करते थे जो भारतीयों का बुध ज्ञान का देवता था! इसी बुधः का दूसरा सम्बोधन ouvin ऑविन् भी था यही (woden) अंग्रेजी में (Goden) बन गया था।
जिससे कालान्तर में गॉड(God )शब्द बना है जो फ़ारसी में ख़ुदा के रूप में प्रतिष्ठित हैं ! सीरिया की सुर संस्कृति में यह शब्द ऑवम् ( aovm ) हो गया है ; वेदों में ओमान् शब्द बहुतायत से रक्षक ,के रूप में आया है । भारतीय संस्कृति में मान्यता है कि शिव ( ओ३ म) ने ही पाणिनी को ध्वनि समाम्नाय के रूप में चौदह माहेश्वर सूत्रों की वर्णमाला प्रदान की !




रविवार, 18 फ़रवरी 2024 इतिहास के बिखरे हुए पन्ने"-★

भाषा उत्पत्ति और सिद्धान्त-४--


जिससे सम्पूर्ण भाषा व्याकरण का निर्माण हुआ । पाणिनी पणि अथवा ( phoenici) पुरोहित थे जो मेसोपोटामिया की सैमेटिक शाखा के लोग थे ये यद्यपि पाणिनि के द्वारा भाषा का उत्पत्ति मूलक विश्लेषण के सन्दर्भों में जो माहेश्वर सूत्र की रचना की गयी है वह अभी भी संशोधन की अपेक्षा रखता है ।
"और इन सूत्रों में  अभी और संशोधन- अपेक्षित है। यदि ये सूत्र शिव से प्राप्त होते तो इनमें चार सन्धि स्वर ( संयुक्त स्वर)  ए,ऐ,ओ,औ का समावेश कदापि नहीं होता !
तथा अन्त:स्थ वर्ण ( य,व,र,ल ) भी न होते ! क्यों कि ये भी सन्धि- संक्रमण स्वर ही हैं। जिनकी कोई मौलिक व्युत्पत्ति नहींव है:-
जो क्रमश: (इ+अ=य) (उ+अ=व) (ऋ+अ=र)
(ऌ+अ= ल) इसके अतिरिक्त  "" महाप्राण भी ह्रस्व "" का घर्षित गत्यात्मक रूप है ;दौनों कण्ठ से उच्चारित हैं ।
यदि "अ" ह्रस्व स्वर स्पन्दन (धड़कन) है तो "ह" श्वाँस है। समग्र वर्णमाला में अनिवार्य भूमिका है ।
केवल वर्ग के प्रथम  वर्ण  ( कचटतप) ही सघोष अथवा नादित होकर तृतीय रूप में उद्भासित होते हैं । अन्यथा 👇
प्रथम चरण :–
(क्+ह्=ख्) 
(च्+ह् =छ्) 
(ट्+ह्=ठ्)
(त्+ह्=थ्) 
(प्+ह्=फ्) ।
________
द्वित्तीय -चरण:–
♪(क् + नाद युक्त निम्न वाही घर्षण = ग्  )
♪( च्+ नाद युक्त निम्न वाही घर्षण = ज् )
♪(ट्+नाद युक्त निम्न वाही घर्षण = ठ् )
♪( त्+ नाद युक्त निम्न वाही घर्षण =द् )
♪(प् +नाद युक्त निम्न वाही घर्षण =ब् )
_________
तृतीय -चरण:–
(ग्+ह्=घ्) 
(ज्+ह् =झ्) 
(ड्+ह्=ढ्)
(द्+ह्=ध्) 
(ब्+ह्=भ्) ।
और इन स्पर्श - व्यञ्जनों में जो प्रत्येक वर्ग का अनुनासिक वर्ण ( ञ ङ ण न म  ) है
वह वस्तुत: केवल अनुस्वार का अथवा "म"/ "न"
का स्व- वर्गीय रूप है ।
यहाँ केवल "न" का रूपान्तरण है ।
जब यही "न" मूर्धन्य हुआ तो लृ के रूप में स्वर बन गया👇👆यद्यपि "ऋ" तथा "ऌ" स्वर न होकर क्रमश पार्श्वविक तथा आलोडित रूप है ।
(न=ल=र) तीनों वर्णों का विकास "अ" वर्ण का पार्श्वविक आलोडित रूप है जो उच्चारण की दृष्टि से मूर्धन्य तथा वर्त्स्य ( दन्तमूलीय रूप ) है ।
अंग्रेजी में सभी अनुनासिक वर्ण (An) से अनुवादित हैं । अत: स्पर्श व्यञ्जन वर्णों में
क, च ,ट ,त, प, न, ही मूल वर्ण हैं ।
ऊष्म वर्णों में केवल  "स" वर्ण मूल है ।
"ष" और "श" वर्ण तो सकार के क्रमश टवर्गीय और च वर्गीय होने पर बनते हैं ।
अंग्रेजी में अथवा यूरोपीय भाषाओं में तवर्ग का शीत जलवायु के प्रभाव से अभाव है ।
अत: अंग्रेजी में केवल शकार (श)और षकार (ष)
क्रमश "Sh"  और "Sa" का नादानुवाद होंगे।
तवर्ग के न होने से सकार (स) उष्म वर्ण उच्चारित नहीं होगा ।
अब आगे के चरणों में संयुक्त व्यञ्जन वर्णों की व्युत्पत्ति का विवरण है ।👇
सर्वप्रथम पाणिनीय माहेश्वर सूत्रों का विवरण प्रस्तुत कहते हैं ।________
पाणिनि के माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या 14 है ; जो निम्नलिखित हैं: 👇 
१. अइउण्।  २. ॠॡक्।  ३. एओङ्। ४ . ऐऔच्। ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्।  ८.  झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्।  ११. खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३. शषसर्। १४. हल्।
स्वर वर्ण:–अ इ उ ॠ ॡ एओ ऐ औ य व र ल  ।
अनुनासिक वर्ण:– ञ ङ ण न म।
वर्ग के चतुर्थ वर्ण :- झ भ घ ढ ध  ।
वर्ग के तृतीय वर्ण:–ज ब ग ड द ।
वर्ग के द्वित्तीय वर्ण:- ख फ छ ठ थ ।
वर्ग के प्रथम वर्ण :- च ट त क प ।
अन्त में ऊष्म वर्ण :- श, ष, स ,
महाप्राण  वर्ण :-"ह"
 उपर्युक्त्त 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों (अक्षरसमाम्नाय) को एक विशिष्ट प्रकार से संयोजित किया गया है।
फलतः, पाणिनि को शब्दों के निर्वचन या नियमों मे जब भी किन्ही विशेष वर्ण समूहों (एक से अधिक) के प्रयोग की आवश्यकता होती है, वे उन वर्णों (अक्षरों) को माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाकर संक्षेप मे ग्रहण करते हैं। माहेश्वर सूत्रों को इसी कारण ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी कहते हैं। प्रत्याहार बनाने की विधि तथा संस्कृत व्याकरण मे उनके बहुविध प्रयोगों को आगे दर्शाया गया है।
इन 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के समस्त वर्णों को समावेश किया गया है।
प्रथम 4 सूत्रों (अइउण् – ऐऔच्) में स्वर वर्णों तथा शेष 10 सूत्र व्यंजन वर्णों की गणना की गयी है। संक्षेप में स्वर वर्णों को अच् एवं व्यंजन वर्णों को हल् कहा जाता है। अच् एवं हल् भी प्रत्याहार हैं।
प्रत्याहार की अवधारणा :- प्रत्याहार का अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन।
अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘आदिरन्त्येन सहेता’ (१-१-७१) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का पाणिनि ने निर्देश किया है।

आदिरन्त्येन सहेता (१-१-७१): (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण (सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदि वर्ण एवं इत्संज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में (collectively) बोध कराता है। उदाहरण: अच् = प्रथम माहेश्वर सूत्र ‘अइउण्’ के आदि वर्ण ‘अ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ऐऔच्’ के अन्तिम वर्ण ‘च्’ से योग कराने पर अच् प्रत्याहार बनता है।
यह अच् प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है।
अतः, अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ।
इसी तरह हल् प्रत्याहार की सिद्धि ५ वें सूत्र हयवरट् के आदि अक्षर ह को अन्तिम १४ वें सूत्र हल् के अन्तिम अक्षर (या इत् वर्ण) ल् के साथ मिलाने (अनुबन्ध) से होती है।
फलतः, हल् = ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ब ग ड द, ख फ छ ठ थ च ट त, क प, श ष स, ह।
उपर्युक्त सभी 14 सूत्रों में अन्तिम वर्ण (ण् क् च् आदि हलन्त वर्णों ) को पाणिनि ने इत् की संज्ञा दी है। इत् संज्ञा होने से इन अन्तिम वर्णों का उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिए केवल अनुबन्ध (Bonding) हेतु किया जाता है, लेकिन व्याकरणीय प्रक्रिया मे इनकी गणना नही की जाती है |
अर्थात् इनका प्रयोग नहीं होता है। _______
अ इ उ ऋ लृ मूल स्वर हैं परन्तु
अ ही मूल स्वर है यही जब ऊर्ध्व गामी रूप में "उ" होता है तो अधो गामी रूप में "इ" होता है ।
ऋ और ऌ वर्णों के विषय में  हम पहले विश्लेषण कर चुके हैं ।
केवल " अ" स्वर से ही सभी स्वरों का प्रस्फुटन हुआ है ।
परन्तु ए ,ओ ,ऐ,औ ये सन्ध्याक्षर होने से मौलिक नहीं अपितु इनका निर्माण हुआ है ।
माहेश्वर सूत्रों में समायोजित करने की इनकी कोई आवश्यकता नहीं ।
जैसे क्रमश:(अ+ इ = ए )तथा (अ + उ =ओ )
संयुक्त स्वरों के रूप में गुण सन्धि के रूप में उद्भासित होते हैं ।
अतः स्वर तो केवल तीन ही मान्य हैं ।👇
। अ इ उ । और ये परवर्ती इ तथा उ स्वर भी केवल अ स्वर के उदात्त( ऊर्ध्वगामी ) उ । तथा (अधो गामी) इ । के रूप में हैं ।
ऋ तथा ऌ स्वर नहीं होकर क्रमश पार्श्वविक तथा आलोडित रूप है । जो उच्चारण की दृष्टि से मूर्धन्य तथा वर्त्स्य ( दन्तमूलीय रूप ) है ।
इनका विकास भी अनुनासिक "न" वर्ण से हुआ है।
अब "ह" वर्ण महाप्राण है । जिसका उच्चारण स्थान काकल है ।
यह भी "अ" का घर्षित गत्यात्मक
काकलीय रूप है ।
तीन स्वर:- अ + इ+ उ ।
छ: व्यञ्जन :-क च ट त प न ।
एक ऊष्म :- स ।
पार्श्वविक तथा आलोडित स्वर वर्ण लृ  ऋ।
ये पार्श्वविक तथा आलोडित वर्ण "न" अनुनासिक के क्रमश वर्त्स्य  और मूर्धन्य रूप है ।
मूल वर्ण तो आठ ही हैं ।
👉👆👇परन्तु पाणिनीय मान्यताओं के विश्लेषण स्वरूप  मूलत: ध्वनि के प्रतीक तो 28 हैं ।
परन्तु पाणिनी ने अपने शिक्षा शास्त्र में (64) चतु:षष्टी वर्णों की रचना दर्शायी है ।
२२ अच् ( स्वर) :– अ आ आ३, इ ई ई३, उऊऊ३,
ए ए३, ऐ ऐ३, ओ ओ३ ,औ औ३,  ऋ ऋृ ऋृ३, ऌ ऌ३।
२५ हल् ( व्यञ्जन) :- कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग।
४ अन्त:स्थ ( Interior / Semi Vowel):-
(य र ल व) ।
३ ऊष्म वर्ण :– श , ष , स ।
१ महाप्राण :- "ह"
१ दु: स्पृष्ट वर्ण है :- ळ ।
इस प्रकार हलों की संख्या ३४ है ।
अयोगवाह का पाणिनीय अक्षरसमाम्नाय में कहीं वर्णन नहीं है.
जिनमें चार तो शुद्ध अयोगवाह हैं ।
(अनुस्वार ां , ) (विसर्ग ा: )  (जिह्वया मूलीय ≈क) (उपध्मानीय ≈प )
चार यम संज्ञक :- क्क्न, ख्ख्न ,ग्ग्न,घ्घ्न।
इस प्रकार 22
+34+8+= 63 ।
परन्तु तीन स्वर :– १-उदात्त २-अनुदात्त तथा ३-स्वरित
के सहित पच्चीस हैं ।
पच्चीस स्वर ( प्रत्येक स्वर के उदात्त (ऊर्ध्वगामी) अनुदात्त( निम्न गामी) तथा स्वरित( मध्य गामी) फिर इन्हीं के अनुनासिक व निरानुनासिक रूप इस प्रकार से प्रत्येक ह्रस्व स्वर के पाँच रूप हुए )
तो इस प्रकार से स्वरों के 110 रूप हो जाते हैं।22×5
________
इस प्रकार कुल योग (25) हुआ ।
क्यों कि मूल स्वर पाँच ही हैं । 5×5=25 _______
और पच्चीस स्पर्श व्यञ्जन कवर्ग ।चवर्ग ।टवर्ग ।तवर्ग । पवर्ग। = 25।
तेरह (13) स्फुट वर्ण ( आ ई ऊ ऋृ लृ ) (ए ऐ ओ औ ) ( य व र ल) ( चन्द्रविन्दु ँ ) अनुस्वार तथा विसर्ग।
अनुसासिक के रूप होने से पृथक रूप से गणनीय नहीं हैं ।
पाणिनीय शिक्षा में कहा कि ---त्रिषष्टि चतु: षष्टीर्वा वर्णा शम्भुमते मता: ।
स्वर (Voice) या कण्ठध्वनि की उत्पत्ति उसी प्रकार के कम्पनों से होती है जिस प्रकार वाद्ययन्त्र से ध्वनि की उत्पत्ति होती है।
अत: स्वरयन्त्र और वाद्ययन्त्र की रचना में भी कुछ समानता के सिद्धान्त हैं।

वायु के वेग से बजनेवाले वाद्ययन्त्र के समकक्ष मनुष्य तथा अन्य स्तनधारी प्राणियों में निम्नलिखित अंग होते हैं :👇 ________
1. कम्पक (Vibrators) इसमें स्वर रज्जुएँ (Vocal cords) भी सम्मिलित हैं।
2. अनुनादक अवयव (resonators) इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :
(क.) नासा ग्रसनी (nasopharynx),
(ख.) ग्रसनी (pharynx),
(ग.) मुख (mouth),
(घ.) स्वरयंत्र (larynx),
(च.) श्वासनली और श्वसनी (trachea and bronchus)
(छ. )फुफ्फुस (फैंफड़ा )(lungs),
(ज.) वक्षगुहा (thoracic cavity)।
3. स्पष्ट उच्चारक (articulators)अवयव :- इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :
क. जिह्वा (tongue),
ख. दाँत (teeth),
ग. ओठ (lips),
घ. कोमल तालु (soft palate),
च. कठोर तालु (मूर्धा )(hard palate)। __________
दार्शनिक सिन्द्धान्तों के अनुसार 👇
♪ स्वर की उत्पत्ति में उपर्युक्त अव्यव निम्नलिखित प्रकार से कार्य करते हैं :
जीवात्मा द्वारा प्रेरित वायु फुफ्फुस से नि:सृत होकर जब उच्छ्वास की अवस्था में संकुचित होता है।
तब उच्छ्वसित वायु वायुनलिका से होती हुई स्वरयन्त्र तक पहुंचती है,
जहाँ उसके प्रभाव से स्वरयंत्र में स्थिर स्वररज्जुएँ कम्पित होने लगती हैं,
जिसके फलस्वरूप स्वर की उत्पत्ति होती है।
ठीक इसी समय अनुनादक अर्थात् स्वरयन्त्र का ऊपरी भाग, ग्रसनी, मुख तथा नासा अपनी अपनी क्रियाओं द्वारा स्वर में विशेषता तथा मृदुता उत्पन्न करते हैं।
इसके उपरान्त उक्त स्वर का शब्द उच्चारण के रूपान्तरण उच्चारक अर्थात् कोमल, कठोर तालु, जिह्वा, दन्त तथा ओष्ठ आदि अवयव करते हैं।
इन्हीं सब के सहयोग से स्पष्ट शुद्ध स्वरों की उत्पत्ति होती है।
स्वरयंत्र--- अवटु (thyroid) उपास्थि वलथ (Cricoid) उपास्थि स्वर रज्जुऐं ये संख्या में चार होती हैं ; जो स्वरयन्त्र के भीतर सामने से पीछे की ओर फैली रहती हैं।
यह एक रेशेदार रचना है जिसमें अनेक स्थिति स्थापक रेशे भी होते हैं।
देखने में उजली तथा चमकीली मालूम होती है।
इसमें ऊपर की दोनों तन्त्रियाँ गौण तथा नीचे की मुख्य कहलाती हैं।
इनके बीच में त्रिकोण अवकाश होता है जिसको कण्ठ-द्वार (glottis) कहते हैं।
इन्हीं रज्जुओं के खुलने और बन्द होने से नाना प्रकार के विचित्र स्वरों की उत्पत्ति होती है।
स्वर की उत्पत्ति में स्वररज्जुओं की गतियाँ (movements)-- श्वसन काल में रज्जुद्वार खुला रहता है और चौड़ा तथा त्रिकोणकार होता है।
श्वाँस लेने में यह कुछ अधिक चौड़ा (विस्तृत) तथा श्वाँस छोड़ने में कुछ संकीर्ण (संकुचित) हो जाता है।
बोलते समय रज्जुएँ आकर्षित होकर परस्पर सन्निकट आ जाती हैं ;और उनका द्वार अत्यंत संकीर्ण हो जाता है।
जितना ही स्वर उच्च होता है, उतना ही रज्जुओं में आकर्षण अधिक होता है और द्वारा उतना ही संकीर्ण हो जाता है। 
स्वरयन्त्र की वृद्धि के साथ साथ स्वररज्जुओं की लंबाई बढ़ती है ; जिससे युवावस्था में स्वर भारी हो जाता है। स्वररज्जुएँ स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक लंबी होती हैं।
इसी लिए पुरुषों का स्वर मन्द्र सप्तक पर आधारित है और स्त्रियों का स्वर तार सप्तक पर आधारित है। 
स्वरों की उत्पत्ति का मानव शास्त्रीय सिद्धान्त -- उच्छ्वसित वायु के वेग से जब स्वर रज्जुओं का कम्पन होता है ; तब स्वर की उत्पत्ति होती है।
यहाँ स्वर मूलत: एक ही प्रकार का उत्पन्न होता है किन्तु आगे चलकर तालु, जिह्वा, दन्त और ओष्ठ आदि अवयवों के सम्पर्क से उसमें परिवर्तन आ जाता है।
ये ही उसके विभिन्न प्रारूपों के साँचें है ।
स्वररज्जुओं के कम्पन से उत्पन्न स्वर का स्वरूप निम्लिखित तीन बातों पर आश्रित है :👇 _______ 
1. प्रबलता (loudness) - यह कम्पन तरंगों की उच्चता के अनुसार होता है।
2. तारत्व (Pitch) - यह कम्पन तरंगों की संख्या के अनुसार होता है।
3. गुणता (Quality) - यह गुञ्जनशील स्थानों के विस्तार के अनुसार बदलता रहता है;
और कम्पन तरंगों के स्वरूप पर निर्भर करता है।
"अ" स्वर का उच्चारण तथा "ह" महाप्राण वर्ण का उच्चारण श्रोत समान है ।
कण्ठ तथा काकल ।________
नि: सन्देह काकल कण्ठ का पार्श्ववर्ती है और "अ" तथा "ह" सम्मूलक सजातिय बन्धु हैं।
जैसा कि संस्कृत व्याकरण में रहा भी गया है ।
अकुह विसर्जनीयीनांकण्ठा ।
अर्थात् अ स्वर , कवर्ग :- ( क ख ग घ ड्•)
तथा विसर्ग(:) , "ह" ये सभीे वर्ण कण्ठ से उच्चारित होते हैं ।
अतः "ह" महाप्राण " भी "अ " स्वर के घर्षण से ही विकसित रूप है । 👇
अ-<हहहहह... ।

अतः "ह" भी मौलिक नहीं है। इसका विकास भी "अ" स्वर से हुआ ।
अत: हम इस "ह" वर्ण को भी मौलिक वर्णमाला में समावेशित नहीं करते हैं।_______य, व, र ,ल , ये अन्त:स्थ वर्ण हैं ; स्वर और व्यञ्जनों के मध्य में होने से ये अन्त:स्थ हैं।
क्यों कि अन्त: का अर्थ  मध्य ( Inter) और स्थ का अर्थ स्थित रहने वाला ।ये अन्त:स्थ वर्ण क्रमश: गुण सन्ध्याक्षर या स्वरों के विरीत संरचना वाले हैं । 👇
जैसे :-  इ+अ = य ।  अ+इ =ए ।      उ+अ = व। अ+उ= ओ।    ________  ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्। स्पर्श व्यञ्जनों सभी अनुनासिक अपने अपने वर्ग के अनुस्वार अथवा नकार वर्ण का प्रतिनिधित्व करते  हैं । ८. झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्। ११. खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३. शषसर्।    
उष्म वर्ण श, ष, स, वर्ण क्रमश: चवर्ग , टवर्ग और चवर्ग के सकार क प्रतिनिधित्व करते हैं ।
जैसे पश्च । पृष्ठ ।पस्त परास्त ।
यहाँ क्रमश चवर्ग के साथ तालव्य श उष्म वर्ण है।
टवर्ग के साथ मूर्धन्य ष उष्म वर्ण है ।
तथा तवर्ग के साथ दन्त्य स उष्म वर्ण है । _______👇 यूरोपीय भाषाओं में विशेषत: अंग्रेजी आदि में जो रोमन लिपि में है वहाँ तवर्ग का अभाव है ।
अतः त थ द ध  तथा स वर्णो को नहीं लिख सकते हैं । क्यों कि वहाँ की शीत जलवायु के कारण जिह्वा का रक्त सञ्चरण (गति) मन्द रहती है ।और तवर्ग की की उच्चारण तासीर ( प्रभाव ) सम शीतोष्ण जल- वायवीय है । अतः "श्" वर्ण  के लिए  Sh तथा "ष्" वर्ण के  S वर्ण रूपान्तरित हो सकते हैं ।
तवर्ग तथा "स" वर्ण शुद्धता की कषौटी पर पूर्णत: निषिद्ध व अमान्य ही  हैं ।  
१४. हल्। तथा पाणिनि माहेश्वर सूत्रों में एक "ह" वर्ण केवल हलों के विभाजन के लिए है । इस प्रकार वर्ण जो ध्वनि अंकन के रूप हैं । मौलिक रूप में केवल 28 वर्ण हैं । जो ध्वनि के मुल रूप के द्योतक हैं । ________
1. बाह्योष्ठ्य (exo-labial)
2. अन्तःओष्ठ्य (endo-labial)
3. दन्त्य  (dental)
4. वर्त्स्य  (alveolar)
5.  पश्च वर्त्स्य (post-alveolar)
6. प्रतालव्य( prä-palatal )
7. तालव्य (palatal)
8. मृदुतालव्य (velar)
9. अलिजिह्वीय (uvular)
10.ग्रसनी से (pharyngal)
11.श्वासद्वारीय (glottal)
12.उपजिह्वीय (epiglottal)
13.जिह्वामूलीय (Radical)
14.पश्चपृष्ठीय (postero-dorsal)
15.अग्रपृष्ठीय (antero-dorsal)
16.जिह्वापाग्रीय (laminal)
17.जिह्वाग्रीय (apical)
18.उप जिह्विय( sub-laminal) ________
स्वनविज्ञान के सन्दर्भ में,
 मुख गुहा के उन 'लगभग अचल' स्थानों को उच्चारण बिन्दु (articulation point या place of articulation) कहते हैं; जिनको 'चल वस्तुएँ' छूकर जब ध्वनि मार्ग में बाधा डालती हैं तो उन व्यंजनों का उच्चारण होता है।
उत्पन्न व्यञ्जन की विशिष्ट प्रकृति मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करती है- उच्चारण स्थान, उच्चारण विधि और स्वनन (फोनेशन)।
मुख गुहा में 'अचल उच्चारक' मुख्यतः मुखगुहा की छत का कोई भाग होता है जबकि 'चल उच्चारक' मुख्यतः जिह्वा, नीचे वाला ओष्ठ (ओठ), तथा श्वाँस -द्वार (ग्लोटिस)आदि  हैं।
व्यञ्जन वह ध्वनि है जिसके उच्चारण में वायु अबाध गति से न निकलकर मुख के किसी भाग:- (तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि) से या तो पूर्ण अवरुद्ध होकर आगे बढ़ती है या संकीर्ण मार्ग से घर्षण करते हुए या पार्श्व मार्ग से निकलती है ।
इस प्रकार वायु मार्ग में पूर्ण या अपूर्ण अवरोध उपस्थित होता है।
तब व्यञ्जन ध्वनियाँ प्रादुर्भूत ( उत्पन्न) होती हैं ।
हिन्दी व्यञ्जनों का वर्गीकरण---- व्यञ्जनों का वर्गीकरण मुख्य रूप से स्थान और प्रयत्न के आधर पर किया जाता है।
व्यञ्जनों के उत्पन्न होने के स्थान से सम्बन्धित व्यञ्जन को आसानी से पहचाना जा सकता है।
इस दृष्टि से हिन्दी व्यञ्जनों का वर्गीकरण इस प्रकार है- उच्चारण स्थान (ध्वनि वर्ग) उच्चरित ध्वनि--👇 द्वयोष्ठ्य:- ,प , फ, ब, भ, म दन्त्योष्ठ्य :-,फ़ दन्त्य :-,त, थ, द, ध वर्त्स्य :-न, स, ज़, र, ल, ळ मूर्धन्य :-ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, र, ष कठोर :-तालव्य श, च, छ, ज, झ कोमल तालव्य :-क, ख, ग, घ, ञ, ख़, ग़ पश्च-कोमल-तालव्य:-  क़ वर्ण है।
स्वरयन्त्रामुखी:-. "ह" वर्ण है ।
"ह" ध्वनि महाप्राण है इसका विकास "अ" स्वर से हुआ है ।
जैसे धड़कन (स्पन्दन) से श्वाँस का जैसे धड़कन (स्पन्दन) से श्वाँस का अन्योन्य सम्बन्ध है उसी प्रकार "अ" और "ह"  वर्ण हैं।
"ह" वर्ण का उच्चारण स्थान काकल है ।
काकल :--- गले में सामने की ओर निकल हुई हड्डी । कौआ ।

घण्टी । टेंटुवा आदि नाम इसके साधारण भाषा में हैं।
शब्द कोशों में इसका अर्थ :-
१. काला कौआ ।
२. कंठ की मणि या गले की मणि ।
उच्चारण की प्रक्रिया के आधार पर व्यञ्जनों का  वर्गीकरण--👇
उच्चारण की प्रक्रिया या प्रयत्न के परिणाम-स्वरूप उत्पन्न व्यञ्जनों का वर्गीकरण इस प्रकार है- स्पर्श : उच्चारण अवयवों के स्पर्श करने तथा सहसा खुलने पर जिन ध्वनियों का उच्चारण होता है उन्हें स्पर्श कहा जाता है।
विशेषत: जिह्वा का अग्र भाग जब मुख के आन्तरिक भागों का उच्चारण करता है ।
क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ और क़ सभी ध्वनियाँ स्पर्श हैं।
च, छ, ज, झ को पहले 'स्पर्श-संघर्षी' नाम दिया जाता था ; लेकिन अब सरलता और संक्षिप्तता को ध्यान में रखते हुए इन्हें भी स्पर्श व्यञ्जनों के वर्ग में रखा जाता है।
इनके उच्चारण में उच्चारण अवयव सहसा खुलने के बजाए धीरे-धीरे खुलते हैं।
मौखिक व नासिक्य :- व्यञ्जनों के दूसरे वर्ग में मौखिक व नासिक्य ध्वनियां आती हैं।
हिन्दी में ङ, ञ, ण, न, म  व्यञ्जन नासिक्य हैं।
इनके उच्चारण में श्वासवायु नाक से होकर निकलती है, जिससे ध्वनि का नासिकीकरण होता है।
इन्हें 'पञ्चमाक्षर' भी कहा जाता है।
और अनुनासिक भी  -- इनके स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग सुविधजनक माना जाता है।
वस्तुत ये सभीे प्रत्येक वर्ग के  पञ्चम् वर्ण "न" अथवा "म" के ही रूप हैं ।
परन्तु सभी केवल अपने स्ववर्गीय वर्णों के सानिध्य में आकर "न" वर्ण का रूप प्रकट करते हैं ।
जैसे :-  कवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- अड्•क, सड्•ख्या ,अड्•ग , लड्•घन ।
चवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- चञ्चल, पञ्छी ,पिञ्जल अञ्झा ।
टवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- कण्टक,  कण्ठ, अण्ड ,. पुण्ढीर ।
तवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- तन्तु , पन्थ ,सन्दीपन,  अन्ध ।
पवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:- पम्प , गुम्फन , अम्बा, दम्भ । ________
इन व्यंजनों को छोड़कर अन्य सभी व्यञ्जन मौखिक हैं।
उष्म वर्ण - उष्म व्यञ्जन :- उष्म का अर्थ होता है- गर्म। जिन वर्णो के उच्चारण के समय वायु मुख के विभिन्न भागों से टकरा कर और श्वाँस में गर्मी पैदा कर , ध्वनि समन्वित होकर बाहर निकलती उन्हें उष्म व्यञ्जन कहते है।
वस्तुत इन उष्म वर्णों का प्रयोजन अपने वर्ग के अनुरूप  सकारत्व का प्रतिनिधित्व करना है ।
तवर्ग - त थ द ध न का उच्चारण स्थान दन्त्य होने से "स" उष्म वर्ण है ।
और यह हमेशा तवर्ग के वर्णों के साथ प्रयोग होता है। जैसे - अस्तु, वस्तु,आदि-- इसी प्रकार टवर्ग - ट ठ ड ढ ण का उच्चारण स्थान मूर्धन्य होने से "ष" उष्म वर्ण ये सभी सजातिय हैं।
जैसे - कष्ट ,स्पष्ट पोष्ट ,कोष्ठ आदि चवर्ग -च छ ज झ ञ का  तथा "श" का उच्चारण स्थान तालव्य होने से ये परस्पर सजातिय हैं ।
जैसे- जैसे- पश्चात् , पश्च ,आदि इन व्यञ्जनों के उच्चारण के समय वायु मुख से रगड़(घर्षण) खाकर ऊष्मा पैदा करती है अर्थात् उच्चारण के समय मुख से गर्म वायु निकलती है।
उष्म व्यञ्जनों का उच्चारण एक प्रकार की रगड़ या घर्षण से उत्पत्र उष्म वायु से होता हैं।
ये भी चार व्यञ्जन होते है- श, ष, स, ह।
________
1- पार्श्विक : इन व्यञ्जनों के उच्चारण में श्वास -वायु जिह्वा के दोनों पार्श्वों (अगल-बगल) से निकलती है।
'ल' ऐसी ही  पार्श्विक ध्वनि है। अर्ध स्वर : इन ध्वनियों के उच्चारण में उच्चारण अवयवों में कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता तथा श्वासवायु अवरोधित नहीं रहती है।
हिन्दी में य, व ही अर्धस्वर की श्रेणि में हैं।
2-लुण्ठित :- इन व्यञ्जनों के उच्चारण में जिह्वा वर्त्स्य (दन्त- मूल या मसूड़े) भाग की ओर उठती है।
हिन्दी में 'र' व्यञ्जन इसी तरह की ध्वनि है।
3- उत्क्षिप्त :- जिन व्यञ्जन ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा का अग्र भाग (नोक) कठोर तालु के साथ झटके से टकराकर नीचे आती है, उन्हें उत्क्षिप्त कहते हैं।
ड़ और ढ़ ऐसे ही व्यञ्जन हैं। जो अंग्रेजी' में क्रमश (R) तथा ( Rh ) वर्ण से बनते हैं ।
घोष और अघोष वर्ण– व्यञ्जनों के वर्गीकरण में स्वर-तन्त्रियों की स्थिति भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
इस दृष्टि से व्यञ्जनों को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है :- घोष और अघोष।                        जिन व्यञ्जनों के उच्चारण में स्वर-तन्त्रियों में कम्पन होता है, उन्हें घोष या सघोष कहा जाता हैं। दूसरे प्रकार की ध्वनियाँ अघोष कहलाती हैं।स्वर-तन्त्रियों की अघोष स्थिति से अर्थात् जिनके उच्चारण में कम्पन नहीं होता उन्हें अघोष व्यञ्जन कहा जाता है। ________

घोष - अघोष ग, घ,   ङ,क, ख ज,झ,   ञ,च, छ ड, द,   ण, ड़, ढ़,ट, ठ द, ध,   न,त, थ ब, भ,   म, प, फ य,  र,   ल, व, ह ,श, ष, स ।
प्राणतत्व के आधर पर भी व्यञ्जन का वर्गीकरण किया जाता है।
प्राण का अर्थ है - श्वास -वायु  जिन व्यञ्जन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास बल अधिक लगता है उन्हें महाप्राण और जिनमें श्वास बल का प्रयोग कम होता है उन्हें अल्पप्राण व्यञ्जन कहा जाता है।
पञ्चम् वर्गों में दूसरी और चौथी ध्वनियाँ महाप्राण हैं। हिन्दी के ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ, ड़, ढ़ - व्यञ्जन महाप्राण हैं।
वर्गों के पहले, तीसरे और पाँचवें वर्ण अल्पप्राण हैं।
क, ग, च, ज, ट, ड, त, द, प, ब, य, र, ल, व, ध्वनियाँ इसी अल्प प्रमाण वर्ग की हैं।
वर्ण यद्यपि स्वर और व्यञ्जन दौनों का वाचक है । परन्तु जब व्यञ्जन में स्वर का समावेश होता है; तब वह अक्षर होता है ।
(अक्षर में स्वर ही मेरुदण्ड अथवा कशेरुका है।________
भाषाविज्ञान में 'अक्षर' या शब्दांश (अंग्रेज़ी रूप (syllable) सिलेबल) ध्वनियों की संगठित इकाई को कहते हैं।
किसी भी शब्द को अंशों में तोड़कर बोला जा सकता है और शब्दांश ही अक्षर है ।
शब्दांश :- शब्द के वह अंश होते हैं जिन्हें और अधिक छोटा नहीं बनाया जा सकता यदि छोटा किया तो  शब्द की ध्वनियाँ बदल जाती हैं।
उदाहरणतः 'अचानक' शब्द के तीन शब्दांश हैं - 'अ', 'चा' और 'नक'।
यदि रुक-रुक कर 'अ-चा-नक' बोला जाये तो शब्द के तीनों शब्दांश खंडित रूप से देखे जा सकते हैं।
लेकिन शब्द का उच्चारण सुनने में सही प्रतीत होता है। अगर 'नक' को आगे तोड़ा जाए तो शब्द की ध्वनियाँ ग़लत हो जातीं हैं - 'अ-चा-न-क'. इस शब्द को 'अ-चान-क' भी नहीं बोला जाता क्योंकि इस से भी उच्चारण ग़लत हो जाता है।
यह क्रिया उच्चारण बलाघात पर आधारित है ।कुछ छोटे शब्दों में एक ही शब्दांश होता है, जैसे 'में', 'कान', 'हाथ', 'चल' और 'जा'. कुछ शब्दों में दो शब्दांश होते हैं, जैसे 'चलकर' ('चल-कर'), खाना ('खा-ना'), रुमाल ('रु-माल') और सब्ज़ी ('सब-ज़ी')।
कुछ में तीन या उस से भी अधिक शब्दांश होते हैं, जैसे 'महत्त्वपूर्ण' ('म-हत्व-पूर्ण') और 'अन्तर्राष्ट्रीय' ('अंत-अर-राष-ट्रीय')।
एक ही आघात या बल में बोली जाने वाली या उच्चारण की जाने वाली ध्वनि या ध्वनि समुदाय की इकाई को अक्षर कहा जाता है।
इकाई की पृथकता का आधार स्वर या स्वर-रत (Vocoid) व्यञ्जन होता है। व्यञ्जन ध्वनि किसी उच्चारण में स्वर का पूर्व या पर अंग बनकर ही आती है। अक्षर में स्वर ही मेरुदण्ड अथवा कशेरुका है।
अक्षर से स्वर को न तो पृथक्‌ ही किया जा सकता है और न बिना स्वर या स्वरयुक्त व्यञ्जन के द्वारा अक्षर का निर्माण ही सम्भव है।
उच्चारण में यदि व्यञ्जन मोती की तरह है तो स्वर धागे की तरह।
यदि स्वर सशक्त सम्राट है तो व्यञ्जन अशक्त राजा।
इसी आधार पर प्रायः अक्षर को स्वर का पर्याय मान लिया जाता है, किन्तु ऐसा है नहीं, फिर भी अक्षर निर्माण में स्वर का अत्यधिक महत्व होता है।
जिसमें व्यञ्जन ध्वनियाँ भी अक्षर निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं। अंग्रेजी भाषा में न, र, ल,  जैसे एन ,आर,एल, आदि ऐसी व्यञ्जन ध्वनियाँ स्वरयुक्त भी उच्चरित होती हैं एवं स्वर-ध्वनि के समान अक्षर निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं।
अंग्रेजी सिलेबल के लिए हिन्दी में अक्षर शब्द का प्रयोग किया जाता है। ________
ध्वनि उत्पत्ति- सिद्धान्त----- 👇
मानव एवं अन्य जन्तु ध्वनि को कैसे सुनते हैं?
ध्वनि तरंग कर्णपटल का स्पर्श करती है , कान का पर्दा, कान की वह मेकेनिज्म जो ध्वनि को संकेतों में बदल देती है।
श्रवण तंत्रिकाएँ,  (पर्पल): ध्वनि संकेत का आवृति स्पेक्ट्रम, तन्त्रिका में गया संकेत) ही शब्द है । भौतिक विज्ञान में - ध्वनि (Sound) एक प्रकार का कम्पन या विक्षोभ है जो किसी ठोस, द्रव या गैस से होकर सञ्चारित होती है।
किन्तु मुख्य रूप से उन कम्पनों को ही ध्वनि कहते हैं जो मानव के कान (Ear) से सुनायी पडती हैं।
ध्वनि की प्रमुख विशेषताएँ--- ध्वनि एक यान्त्रिक तरंग है न कि विद्युतचुम्बकीय तरंग। (प्रकाश विद्युतचुम्बकीय तरंग है।
ध्वनि के सञ्चरण के लिये माध्यम की जरूरत होती है। ठोस, द्रव, गैस एवं प्लाज्मा में ध्वनि का सञ्चरण सम्भव है।
निर्वात में ध्वनि का सञ्चरण नहीं हो सकता।
द्रव, गैस एवं प्लाज्मा में ध्वनि केवल अनुदैर्घ्य तरंग  (longitudenal wave) के रूप में चलती है जबकि ठोसों में यह अनुप्रस्थ तरंग (transverse wave) के रूप में भी संचरण कर सकती है।
अनुदैर्घ्य तरंग:--- जिस माध्यम में ध्वनि का सञ्चरण होता है यदि उसके कण ध्वनि की गति की दिशा में ही कम्पन करते हैं तो उसे अनुदैर्घ्य तरंग कहते हैं!

अनुप्रस्थ तरंग:- जब माध्यम के कणों का कम्पन ध्वनि की गति की दिशा के लम्बवत होता है तो उसे अनुप्रस्थ तरंग कहते है।
सामान्य ताप व दाब (NTP) पर वायु में ध्वनि का वेग लगभग  343 मीटर प्रति सेकेण्ड होता है।
बहुत से वायुयान इससे भी तेज गति से चल सकते हैं उन्हें सुपरसॉनिक विमान कहा जाता है।
मानव कान लगभग २० हर्ट्स से लेकर २० किलोहर्टस (२०००० हर्ट्स) आवृत्ति की ध्वनि तरंगों को ही सुन सकता है।
बहुत से अन्य जन्तु इससे बहुत अधिक आवृत्ति की तरंगों को भी सुन सकते हैं।
जैसे चमकाधड़ एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाने पर ध्वनि का परावर्तन एवं अपवर्तन होता है। माइक्रोफोन ध्वनि को विद्युत उर्जा में बदलता है; लाउडस्पीकर विद्युत उर्जा को ध्वनि उर्जा में बदलता है।
किसी भी तरंग (जैसे ध्वनि) के वेग, तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति में निम्नलिखित संबन्ध होता है:-
{\displaystyle \lambda ={\frac {v}{f}}} जहाँ v तरंग का वेग, f आवृत्ति तथा : {\displaystyle \lambda } तरंगदर्ध्य है।
आवृत्ति के अनुसार वर्गीकर--- अपश्रव्य (Infrasonic) 20 Hz से कम आवृत्ति की ध्वनि मानव को सुनाई नहीं देती, श्रव्य (sonic) 20 Hz से 20 kHz, के बीच की आवृत्तियों वाली ध्वनि सामान्य मानव को सुनाई देती है।
पराश्रव्य (Ultrasonic) 20 kHz से 1,6 GHz के बीच की आवृत्ति की ध्वनि मानव को सुनाई नहीं पड़ती, अतिध्वनिक (Hypersonic) 1 GHz से अधिक आवृत्ति की ध्वनि किसी माध्यम में केवल आंशिक रूप से ही संचरित (प्रोपेगेट) हो पाती है।
ध्वनि और प्रकाश का सम्बन्ध शब्द और अर्थ के सामान्य या शरीर और आत्मा के समान जैविक सत्ता का आधार है ।
ध्वनि के विषय में दार्शनिक व ऐैतिहासिक मत -
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"सृष्टि के प्रारम्भ में ध्वनि का प्रादुर्भाव ओ३म् के रूप में हुआ ओ३म् शब्द की व्युत्पत्ति"----
एक वैश्विक विश्लेषण करते हैं ओ३म् की अवधारणा द्रविडों की सांस्कृतिक अभिव्यञ्जना है; वे नि: सन्देह फॉनिशियन जन-जाति के सहवर्ती अथवा सजातिय बन्धु रहे होंगे ।
क्यों दौनों का सांस्कृतिक समीकरण है।
द्रविड द्रव (पदार्थ ) अथवा जल तत्व का विद =वेत्ता ( जानकार) द्रव+विद= समाक्षर लोप (Haplology) के द्वारा निर्मित रूप द्रविद -द्रविड है !
ये बाल्टिक सागर के तटवर्ती -संस्कृतियों जैसे प्राचीन फ्रॉञ्च ( गॉल) की सैल्टिक (कैल्टिक) जन-जाति में  द्रूयूद (Druid) रूप में हैं ।
कैल्ट जन जाति के धर्म साधना के रहस्य मय अनुष्ठानों में इसी कारण से आध्यात्मिक और तान्त्रिक क्रियाओं को प्रभावात्मक बनाने के लिए ओघम् (ogham) शब्द का दृढता से उच्चारण विधान किया जाता था ! कि  उनका विश्वास था !
कि इस प्रकार (Ow- ma) अर्थात् जिसे भारतीय आर्यों ने ओ३म् रूप में साहित्य और कला के ज्ञान के उत्प्रेरक और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया था वह ओ३म् प्रणवाक्षर नाद- ब्रह्म स्वरूप है।
और उनका मान्यता भी थी.. प्राचीन भारतीय आर्य मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण भाषा की आक्षरिक सम्पत्ति (syllable prosperity) यथावत् रहती है इसके उच्चारण प्रभाव से ओघम् का मूर्त प्रारूप सूर्य के आकार के सादृश्य पर था।
जैसी कि प्राचीन पश्चिमीय संस्कृतियों की मान्यताऐं भी हैं ... वास्तव में ओघम् (ogham से बुद्धि उसी प्रकार नि:सृत होती है . जैसे सूर्य से प्रकाश प्राचीन मध्य मिश्र के लीबिया प्रान्त में तथा थीब्ज में यही आमोन् रा (ammon- ra) के रूप ने था ..जो वस्तुत: ओ३म् -रवि के तादात्मय रूप में प्रस्तावित है।
आधुनिक अनुसन्धानों के अनुसार भी अमेरिकीय अन्तरिक्ष यान - प्रक्षेपण संस्थान के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य में अजस्र रूप से निनादित ओ३म् प्लुत स्वर का श्रवण किया है।
सैमेटिक -- सुमेरियन हिब्रू आदि संस्कृतियों में ओमन् शब्द आमीन के रूप में है ।
तथा रब़ का अर्थ .नेता तथा महान होता हेै ! जैसे रब्बी यहूदीयों का धर्म गुरू है .. अरबी भाषा में..रब़ -- ईश्वर का वाचक है .अमोन तथा रा प्रारम्भ में पृथक पृथक थे ।दौनों सूर्य सत्ता के वाचक थे।
मिश्र की संस्कृति में ये दौनों कालान्तरण में एक रूप होकर अमॉन रॉ के रूप में अत्यधिक पूज्य हुए .. क्यों की प्राचीन मिश्र के लोगों की मान्यता थी कि अमोन -- रॉ.. ही सारे विश्व में प्रकाश और ज्ञान का कारण है,  मिश्र की परम्पराओ से ही यह शब्द मैसोपोटामिया की सैमेटिक हिब्रु परम्पराओं में प्रतिष्ठित हुआ जो क्रमशः यहूदी ( वैदिक यदुः ) के वंशज थे।
इन्हीं से ईसाईयों में (Amen) तथा अ़रबी भाषा में यही आमीन् ! (ऐसा ही हो ) होगया है इतना ही नहीं जर्मन आर्य ओ३म् का सम्बोधन (omi /ovin )या के रूप में अपने ज्ञान के देव वॉडेन ( woden) के लिए सम्बोधित करते करते थे जो भारतीयों का बुध ज्ञान का देवता था! इसी बुधः का दूसरा सम्बोधन ouvin ऑविन् भी था यही (woden) अंग्रेजी में (Goden) बन गया था।

जिससे कालान्तर में गॉड(God )शब्द बना है जो फ़ारसी में ख़ुदा के रूप में प्रतिष्ठित हैं ! सीरिया की सुर संस्कृति में यह शब्द ऑवम् ( aovm ) हो गया है ; वेदों में ओमान् शब्द बहुतायत से रक्षक ,के रूप में आया है । भारतीय संस्कृति में मान्यता है कि शिव ( ओ३ म) ने ही पाणिनी को ध्वनि समाम्नाय के रूप में चौदह माहेश्वर सूत्रों की वर्णमाला प्रदान की !
जिससे सम्पूर्ण भाषा व्याकरण का निर्माण हुआ । पाणिनी पणि अथवा ( phoenici) पुरोहित थे जो मेसोपोटामिया की सैमेटिक शाखा के लोग थे 

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