बुधवार, 8 दिसंबर 2021

बुद्धि लब्धि का इतिहास-


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बुद्धि (Intelligence) वह मानसिक शक्ति है जो वस्तुओं एवं तथ्यों को समझने, उनमें आपसी सम्बन्ध खोजने तथा तर्कपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में प्राणी की सहायक होती है। 

यह 'भावना' और अन्तःप्रज्ञा ) अथवा सहज बोध या  कहें सहज-ज्ञान से भी  भिन्न तत्व है ।

अन्य शब्दों में यह प्रतिभा= (Intuition/इंट्युसन) से भी अलग है। 

बुद्धि ही मनुष्य को नवीन परिस्थितियों को ठीक से समझने और उसके साथ अनुकूलित (adapt) होने में सहायता करती है। 

बुद्धि को 'सूचना के प्रसंस्करण की योग्यता' की तरह भी समझा जा सकता है।

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प्रस्तावना - 

प्राचीन काल से ही बुद्धि ज्ञानात्मक क्रियाओं में चर्चा का विषय रही है। 

बुद्धि की चेतना वाणी कि प्रखरता और स्पष्टता मैं निहित  है।

व्यक्ति के वाक्चातुर्य से ही बुद्धि की गुणवत्ता का संज्ञान हो जाता है। वाणी की प्रखरता प्राणी चेतना के समानान्तर है ।

इसी के कारण ही मानव अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ माना जाता है क्यों कि मनुष्य की वाणी सभी प्राणीयों से विशेष और उत्कृष्ट है । 

मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी बुद्धि चर्चा का विषय रही है। 

हजारों वर्ष पूर्व से ही व्यक्तियों को बुद्धि के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बांटा गया था।

(कुछ व्यक्ति बुद्धिमान कहलाते हैं, कुछ कम बुद्धि के, कुछ मूढ बुद्धि के तो कुछ जड़ बुद्धि के भी कहलाते हैं।)

परन्तु बुद्धि के स्वरूप को समझना बड़ा कठिन है।

बुद्धि के स्वरूप पर प्राचीन काल से ही मतभेद चले आ रहे हैं ; तथा आज भी मनोवैज्ञानिकों तथा शिक्षाविदों के लिए भी बुद्धि तत्व वाद-विवाद का विषय बना हुआ है। 

19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध से भी बुद्धि के स्वरूप को समझने हेतु मनोवैज्ञानिकों ने प्रयास प्रारम्भ किए परन्तु वे भी इसमें सफल नहीं हुए तथा बुद्धि की सर्वसम्मत परिभाषा न दे सके।

"वर्तमान में भी बुद्धि के स्वरूप के सम्बंध में मनोवैज्ञानिकों के विचारों में असमानता है। अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि के स्वरूप को अलग-अलग ढंग से पारिभाषित किया।

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भारतीय शास्त्रों नें बुद्धि के स्वरूप की मीमांसा जो की है ; वह बड़ी दार्शनिक है ।

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अंतःकरण:–  जिसका अर्थ है आंतरिक अंग या आंतरिक साधन) भारतीय दर्शन में एक अवधारणा है, जो मन के चार स्तरों की समग्रता का वर्णन करती है, 

अर्थात् बुद्धि =(बुद्धि या मन की निर्णय शक्ति) और मनस्= (मन की मनन शक्ति) 

अंतःकरण के चित भाग को जिसमें चेतना का समायोजन है और , जो मन का पुनर्जन्म वाला भाग भी  है ।

वेदान्त साहित्य में, यह अंतःकरण नाम का (आंतरिक अंग) चार भागों में व्यवस्थित है:

१-अहंकार (अहंकार) -  जिसके द्वारा शरीर के साथ 'मैं' के रूप में आत्मा (स्वयं) की पहचान करता है।

- बुद्धि (बुद्धि) -निर्णय लेने की क्रिया को नियंत्रित करती है।

३-मनस् (मन) - संकल्प के मूर्तरूप (इच्छा) को नियंत्रित करता है

३-चित्त (स्मृति) - याद रखने और भूलने से संबंधित है चेतना का प्रतिरूप है यह चित जन्मान्तरण के संस्कारों का समुच्चय है

जिसमें संचित क्रियमाण और प्रारब्ध सभी संस्कार जन्मान्तरणों से विद्यमान होते हैं ।

एक अन्य विवरण में कहा गया है कि यह  "अंतःकरण" मन और भावनाओं सहित संपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को संदर्भित करता है, 

जैसा कि ऊपर वर्णित है, कि जो मन के स्तरों की रचना करता है , जिन्हें एक इकाई के रूप में वर्णित किया गया है जो समग्र रूप से एक साथ काम करने वाले सभी भागों के साथ कार्य करता है वही अन्त:करण है ।

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चित्त का स्वरूप :-

चित्त अन्तः करण का ही एक अंग है जिसमें हमारे सभी संस्कारों, स्मृतियों का संग्रह (संचयन)  होता है इसी लिए इसकी चित संज्ञा है। यह चित्त सत्त्वगुण, रजोगुण, और तमोगुण से मिलकर बना एक संस्कारमयी अन्त:करण का रूप है । 

जिससे चित्त तीन प्रकार के स्वभाव वाला  ( प्रकाशशील, गतिशील, और स्थैर्यशील अथवा जड़ रूप है।

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इसी त्रिगुणात्मक स्वभाव के कारण चित्त के तीन रूप होते हैं;- 1. प्रख्या, 2. प्रवृति, और  3. स्थिति ।

‘प्रख्या’ सत्त्वगुण प्रधान,‘ तो रजोगुण प्रधान, प्रवृत्ति’ है  व ‘स्थिति’ तमोगुण प्रधान होती है।

प्रख्या’★- :- जब चित्त में सत्त्वगुण की प्रधानता होती है तो उसमें  ज्ञान  का प्रकाश होने से व्यक्ति में धर्म, ज्ञान, और वैराग्य की उत्पत्ति होती है।  इस अवस्था में व्यक्ति शुभ कार्यों में प्रवृत (लगता ) रहता है।

यह बुद्धि  प्रभा। कांति। दीप्ति वाली होने से प्रख्यात है ।

प्रवृत्ति’★- :- जब चित्त में रजोगुण  की प्रधानता होती है तो व्यक्ति श्रमशील स्वभाव वाला होता है जिसके फलस्वरूप वह  समाज में मान– सम्मान, धन– दौलत, यश– कीर्ति  को प्राप्त करने में प्रवृत्त रहता है।

स्थिति’ ★- :- जब व्यक्ति के चित्त में तमोगुण प्रधान होता है तो वह आलस्य, प्रमाद, तंद्रा, अज्ञान, व अकर्मण्यता आदि भावों में प्रवृत्त होता है। इस अवस्था में वह अज्ञानता के वशीभूत  होकर सभी निकृष्ट  ( दूषित ) कार्य करता है ।

१.वेदांतसार के अनुसार अंतःकरण की चार वृत्तियाँ है— मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार । संकल्प विकल्पात्मक वृत्ति को मन कहते है , निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि कहते है । 

और इन्हीं दोनों के अंतर्गत जन्मान्तरण के कर्म संस्कार मय वृत्ति को चित्त और अभिमानात्मक वृत्ति को अंहकार कहते हैं ।

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 पंचदशी में इंद्रियो के नियंता मन ही को अंतःकरण माना है ।

 आंतरिक व्यापार में मन स्वतंत्र है, पर बाह्य व्यापार में इंद्रियाँ परतंत्र हैं । पंचभूतों की गुणसमष्टि से अंतःकरण उत्पन्न होता है जिसकी दो  मुख्य वृत्तियाँ हैं :- १-मन और २-बुद्धि । 

मन  मननात्मक वृत्ति और बुद्धि निश्चयात्मक वृत्ति है । 

वेदांत में प्राण को मन का प्राण कहा है । मृत्यु होने पर मन इसी प्राण में लय हो जाता है । इसपर शंकराचार्य कहते हैं कि प्राण में मन की वृत्ति लय हो जाती है, उसका स्वरूप नहीं । क्षणिकवादी बौद्ध चित्त ही को आत्मा मानते हैं।

वे कहते हैं कि जिस प्रकार अग्नि अपने को प्रकाशित करके दूसरी वस्तु को भी प्रकाशित करती है, उसी प्रकार चित्त भी करता है । 

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 बौद्ध लोग-     

चित्त के चार भेद करते हैं—१-कामावचर २-रूपावचर, ३-अरूपावचर औऱ ४-लोकोत्तर ।

चार्वाक के मत से मन ही आत्मा है । योग के आचार्य पतञ्जलि चित्त को स्वप्रकाश स्वीकार नहीं  करते । 

वे चित्त को दृश्य और जड़ पदार्थ मानकर एक  अलग प्रकाशक का रूप मानते हैं जिसे आत्मा कहते हैं ।

 उनके विचार में प्रकाश्य और प्रकाशक के संयोग से प्रकाश होता है, ।

अत: कोई वस्तु अपने ही साथ संयोग नहीं कर सकती ।

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योगसूत्र के अनुसार चित्तवृत्ति पाँच प्रकार की है-प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।

योग के अनुसार चित्त की अवस्था जो पाँच प्रकार की मानी गई है—१-क्षिप्त, २-मूड़, ३-विक्षिप्त, ४-एकाग्र और ५-निरुद्ध। 

तीन प्रमाण-

प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द प्रमाण;

 (एक में दूसरे का भ्रम—विपर्यय);         (स्वरूप ज्ञान के बिना कल्पना— विकल्प;) (सब विषयों के अभाव का बोध—निद्रा)   और कालांतर में पूर्व अनुभव का आरोप स्मृति कहलाता है !  यह चित्त का स्वरूप है इसमें अनेक कर्म संस्कारों समुच्चय है । 

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पञ्चदशी तथा दार्शनिक ग्रंथों में मन या चित्त का स्थान हृदय  लिखा है । पर आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान अंत:करण के सारे व्यापारों का स्थान मस्तिष्क में मानता है जो मस्तिष्क सब ज्ञानतंतुओं का केंद्रस्थान है ।

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खोपड़ी के अंदर जो टेढ़ी मेढ़ी गुरियों की सी बनावट होती है, वही अंत:करण है । 

उसी के सूक्ष्म मज्जा-तंतु-जाल और कोशों की क्रिया द्वारा सारे मानसिक व्यापार होते हैं 

भौतिकवादी वैज्ञानिकों के मत से चित्त, मन या आत्मा कोई पृथक् वस्तु नहीं है, 

केवल व्यापार- विशेष का नाम है, जो छोटे जीवों में बहुत ही अल्प परिमाण में होता है और बड़े जीवों में क्रमश:बढ़ता जाता है । 

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इस व्यापार का प्राणरस( जीवदृव्य) (प्रोटोप्लाज्म) के कुछ विकारों के साथ नित्य संबंध है । 

प्राणरस के ये विकार अत्यंत निम्न श्रेणी के जीवों में प्राय: शरीरभर में होते हैं; पर उच्च कशेरुकीय प्राणियों में क्रमश: इन विकारों के लिये विशेष स्थान नियत होते जाते हैं और उनसे इंद्रियों तथा मस्तिष्क की सृष्टि होती है ।

चित  वह मानसिक शक्ति है जिससे धारणा, भावना आदि की जाती हैं । अंत:करण । जी । मन आदि इसके नाम हैं ।

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इसके अलावा, जब मन के स्तर को शरीर मानते हैं, तो वे इस प्रकार  हैं: 

विशेष—वेदांती लोग मनुष्य में पाँच कोशों की कल्पना करते हैं— १-अन्नमयकोश, २-प्राणमयकोश, ३-मनोमयकोश, ४-विज्ञानमयकोश और ५-आनन्दमयकोश ।

अन्न से उत्पन्न और अन्न ही के आधार पर रहने के कारण वह  अन्नमय  हैं । पंच कर्मोंद्रियों के सहित प्राण, अपान आदि पंचप्राणों को प्राणमय कोश कहते हैं, 

जिसके साथ मिलकर देह सब क्रियाएँ करती है । श्रोत्र, चक्षु आदि पाँच ज्ञानद्रियों के सहित मन को मनोमय कोश कहते हैं । यही मनोमय कोश अविद्या रूप है और इसी से सांसारिक विषयों की प्रतीति होती है । 

पंच ज्ञानेद्रियों के सहित बुद्धि को विज्ञानमय कोश कहते हैं । यही विज्ञानमय कोश कर्तृत्व, भोक्तृत्व सुख- दुःख आदि अहंकारविशिष्ट पुरुष के संसार का कारण है । 

सत्वगुणविशिष्ट परमात्मा के आवरक का नाम आनंदमय कोश है 

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मन, बुद्धि, चित्त, प्राण, तन्मात्राओं तथा इन्द्रियों में अन्तर और इनका पारस्परिक सम्बन्ध  

नवागन्तुक अध्यात्म की ओर आने वाले लोगों को लगता है कि मन की शक्ति सबसे बड़ी है, जबकि ऐसा नहीं है।

यह भ्रम इसीलिए होता है क्योंकि उन्हें परिभाषाओं का स्पष्टीकरण ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। जैसे बुद्धि की स्थिति मन से परे है  ।

और बुद्धि से परे चित की स्थिति है और यह चित्त ही आत्मा से संपृक्त होकर चेतना और प्रेरक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है इससे परे अहंकार है जो आत्मा को सीमित स्वरूप का बोध कराता है । 

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(अत: मन सबसे शक्तिशाली तत्व नहीं है। मन वकील है, वह तर्क वितर्क ही करता है। वह मोलभाव करता है, सङ्कल्प विकल्प करता है। इसीलिए वह सबसे शक्तिशाली नहीं है।

 जो विचारों को निर्णय करती है वह  बुद्धि न्यायधीश है ।) 

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प्राणशक्ति जिसमें हो वही प्राणी है। इस प्राण शक्ति का प्रत्यक्ष रूप श्वास है और यही श्वास जब विशेष रूप में शरीर से नियंत्रित और स्वचालित

न होकर मन से संचालित होने लगे तो प्राणायाम हो गया।  प्राण का जीवात्मा से यही सम्बन्ध है कि यह शरीर में आत्मा की ऊर्जा को प्रसारित करने का कार्य करता है।

प्राण शरीर और आत्मा के बीच सम्पर्क का माध्यम है। 

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यद्यपि कोमा ( निश्चेतना) और निद्रा मस्तिष्क की क्रमश कृत्रिम और प्राकृतिक प्रक्रियां हैं 

निद्रा काल मैं प्राण तो शरीर नें रहता है परन्तु चेतना चित्त मैं विलीन हो जाती है ।

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प्राण या विकास भोजन और आयु ते अनुपात से होता है ।

जैसे विकलांग के भी पैर होते हैं, गूंगे का भी वाक्-शक्ति होती है  लेकिन वह उस स्तर पर क्रियाशील नहीं रहता।

आत्मा और शरीर के मध्य जिस स्तर का प्राण चाहिए, उतनी पर्याप्त प्राण शक्ति न रहने को ही मैंने प्राण का अभाव बताया है, क्योंकि ऐसे में शरीर आत्मा की ऊर्जा से संचालित होने वाले मुख्य कार्य नहीं कर पाता।

यह प्राण पन्द्रह सप्ताह में अचानक से निर्मित देह में मस्तिष्क के आधार पर व्याप्त हो जाता है।

यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते 

अन्वय-

यत् प्राणेन न प्राणिति। येन प्राणः प्रणीयते। तत् एव त्वं ब्रह्म विद्धि। यत् इदं उपासते इदं न ॥

 'वह' जो श्वास के द्वारा श्वास नहीं लेता,जिसके द्वारा प्राण-वायु स्वयं अपने पथ पर आगे ले जाया जाता है, 'उसे' ही तुम 'ब्रह्म' जानो, न कि इसे जिसकी मनुष्य यहां उपासना करते हैं।

 अथवा, ''जिसका व्यक्ति मन के द्वारा चिन्तन नहीं करता है ।''
 अथवा, ''जिसे व्यक्ति चक्षु के द्वारा नहीं देखता है 
अथवा, ''जिसका व्यक्ति कर्ण के द्वारा श्रवण नहीं करता है । ''
अथवा, ''जिसका व्यक्ति श्वास के द्वारा श्वसन नहीं करता।'' (अर्थात् सूँघता नहीं है।)'

प्राण वह तत्व है, जिसकी उपस्थिति से शरीर की चैतन्यता प्रत्यक्ष होती है।

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वायु पुराण में जीवन प्रक्रिया के विकास का वर्णन इस प्रकार है ।

                      ।।वायुरुवाच ।।
न चैवमागतो ज्ञानाद्रागात् कर्म्म समाचरेत्।
राजसं तामसं वापि भुक्त्वा तत्रैव युज्यते।१४.१।

तथा सुकृतकर्म्मा तु फलं स्वर्गे समश्रुते।
तस्मात् स्थानात् पुनर्भ्रष्टो मानुष्यमनुपद्यते ।। १४.२ ।।

तस्माद्ब्रह्म परं सूक्ष्मं ब्रह्म शाश्वतमुच्यते।
ब्रह्म एव हि सेवेत ब्रह्मैव परमं सुखम् ।।१४.३।।

परिश्रमस्तु यज्ञानां महतार्थेन वर्त्तते।
भूयो मृत्युवशं याति तस्मान्मोक्षः परं सुखम् ।। १४.४।।

अथ वै ध्यानसंयुक्तो ब्रह्मयज्ञपरायणः ।
न स स्याद् व्यापितुं शक्यो मन्वन्तरशतैरपि ।। १४.५ ।।

दृष्ट्वा तु पुरुषं दिव्यं विश्वाख्यं विश्वरूपिणम्।
विश्वपाद शिरोग्रीवं विश्वेशं विश्वभावनम्।
विश्वगन्धं विश्वमाल्यं विश्वाम्बरधरं प्रभुम् ।१४.६।

गोभिर्मही संयतते पतत्रिणं महात्मानं परममतिं वरेण्यम्।
कविं पुराणमनुशासितारं सूक्ष्माच्च सूक्ष्मं महतो महान्तम्।
योगेन पश्यन्ति न चक्षुषा तं निरिन्द्रियं पुरुषं रुक्मवर्णम् ।। १४.७ ।।

अलिङ्गिनं पुरुषं रुक्मवर्णं सलिङ्गिनं निर्गुणं चेतनं च।
नित्यं सदा सर्वगतन्तु शौचं पश्यन्ति युक्त्या ह्यचलं प्रकाशम् ।। १४.८ ।।

तद्भावितस्तेजसा दीप्यमानः अपाणिपादोदरपार्श्वजिह्वः।
अतीन्द्रियोऽद्यापि सुसूक्ष्म एकः पश्यत्यचक्षुः स श्रृणोत्यकर्णः ।। १४.९ ।।

नास्यास्त्यबुद्धं न च बुद्धिरस्ति स वेद सर्वं न च वेदवेद्यः।
तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तं सचेतनं सर्व्वगतं सुसूक्ष्मम् ।। १४.१० ।।

तामाहुर्मुनयः सर्व्वे लोके प्रसवधर्मिणीम्।
प्रकृतिं सर्व्वभूतानां युक्ताः पश्यन्ति चेतसा ।। १४.११ ।।

सर्व्वतः पाणिपादान्तं सर्व्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्व्वतः श्रुति (म) माँल्लोके सर्व्वमावृत्य तिष्ठति ।। १४.१२ ।।

युक्ता योगेन चेशानं सर्व्वतश्च सनातनम्।
पुरुषं सर्व्वभूतानां तस्माद्ध्याता न मुह्यते।१४.१३।

भूतात्मानं महात्मानं परमात्मानमव्ययम्।
सर्व्वात्मानं परं ब्रह्म तद्वै ध्यात्वा न मुह्यति। १४.१४।

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पवनो हि यथा ग्राह्यो विचरन् सर्व्वमूर्तिषु।
पुरि शेते तथाभ्रे च तस्मात् पुरुष उच्यते।
अथ चेल्लुप्तधर्म्मात्तु सविशेषैश्च कर्म्माभिः ।। १४.१५ ।।

ततस्तु ब्रह्म योन्यां वै शुक्रशोणितसंयुतम्।
स्त्रीपुमांसप्रयोगेण जायते हि पुनः पुनः।१४.१६ ।।
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ततस्तु गर्भकाले तु कलनं नाम जायते।
कालेन कलनञ्चापि बुद्बुदश्च प्रजायते।१४.१७ 

मृत्पिण्डस्तु यथा चक्रे चक्रवातेन पीडितः।
हस्ताभ्यां क्रियमाणस्तु विश्वत्वमुपगच्छति। १४.१८ ।।

एवमात्मास्थिसंयुक्तो वायुना समुदीरितः।
जायते मानुषस्तत्र यथा रूपं तथा मनः।१४.१९ ।।

वायुः सम्भवते तेषां वातात् सञ्जायते जलम्।
जलात्संभवति प्राणः प्राणाच्छुक्रं विवर्द्धते। १४.२० ।।

रक्तभागास्त्रयस्त्रिंशच्छुक्र भागाश्चतुर्द्दश।
भागतोऽर्द्धपलं कृत्वा ततो गर्भे निषेवते ।१४.२१

 रक्तभागास्त्रयस्त्रिंशच्छुक्र भागाश्चतुर्द्दश।भागतोऽर्द्धपलं कृत्वा ततो गर्भे निषेवते।१४.२१।


ततस्तु गर्भसंयुक्तः पञ्चभिर्वायुभिर्वृतः।
पितुः शरीरात् प्रत्यङ्गरूपमस्योपजायते ।१४.२२।

ततोऽस्य मातुराहारात् पीतलीढप्रवेशितम्।
नाभि स्रोतःप्रवेशेन प्राणाधारो हि देहिनाम् ।। १४.२३ ।।

नवमासान् परिक्लिष्टः संवेष्टितशिरोधरः ।
वेष्टितः सर्व्वगात्रैश्च अपर्य्यायक्रमागतः।
नवमासोषितश्चैव योनिच्छिद्रादवाङ्‌मुखः ।। १४.२४ ।।

ततस्तु कर्म्मभिः पापैर्निरयं प्रतिपद्यते।
असिपत्रवनञ्चैव शाल्मलीच्छेदभेदयोः।१४.२५।

तत्र निर्भर्त्सनञ्चैव तथा शोणितभोजनम् ।
एतास्तु यातन् घोराः कुम्भीपाकसुदुःसहाः ।।
१४.२६ ।।

यथा ह्यापस्तु विच्छिन्नाः स्वरूपमुपयान्ति वै ।
तस्माच्छिन्नाश्च भिन्नाश्च यातनास्थानमागतः ।। १४.२७ ।।

एवं जीवस्तु तैः पापैस्तप्यमानः स्वयं कृतैः ।
प्राप्नुयात् कर्म्मभिर्दुःखं शेषं वा यादि चेतरम् ।। १४.२८ ।।

एकेनैव तु गन्तव्यं सर्व्वमृत्युनिवेशनम्।
एकनैव च भोक्तव्यं तस्मात् सुकृतमाचरेत् ।। १४.२९ ।।

न ह्येनं प्रस्थितं कश्चिद्गच्छन्तमनुगच्छति।
यदनेन कृतं कर्म्म तदेनमनुगच्छति ।१४.३०।

ते नित्यं यमविषये विभिन्नदेहाः क्रोशन्तः सततमनिष्टसंप्रयोगैः।
शुष्यन्ते परिगतवेदनाशरीराः बह्वीभिः सुभृशमधर्म्मयातनाभिः ।। १४.३१ ।।

कर्मणाः मनसा वाचा यदभीष्टं निषेव्यते।
तत् प्रसद्य हरेत् पापं तस्मात्‌ सुकृतमाचरेत् ।। १४.३२ ।।

यादृग् जातानि पापानि पूर्व्वं कर्म्माणि देहिनः।
संसारं तामसं तादृक् षह्‌विधं प्रतिपद्यते ।। १४.३३ ।।

मानुष्यं पशुभावञ्च पशुभावान्मृगो भवेत्।
मृगत्वात् पक्षिभावन्तु तस्माच्चैव सरीसृपः ।। १४.३४ ।।

सरीसृपत्वाद्गच्छोद्धि।
स्थावरत्वन्न संशयः।
स्थावरत्वं पुनः प्राप्तो
यावदुन्मिषते नरः।
कुलालचकवद्भान्तस्तत्रैवपरिकीर्तितः।१४.३५।

इत्येवं हि मनुष्यादिः संसारे स्थावरान्तके।
विज्ञेयस्तामसो नाम तत्रैव परिवर्त्तते ।। १४.३६।

सात्त्विकश्चापि संसारो ब्रह्मादिः परिकीर्त्तितः।
पिशाचान्तः सविज्ञेयः स्वर्गस्थानेषु देहिनाम् ।। १४.३७ ।।

ब्राह्मे तु केवलं सत्त्वं स्थावरे केवलं तमः।
चतुर्द्दशानां स्थानानां मध्ये विष्टम्भकं रजः।
मर्मसु च्छिद्यमानेषु वेदनार्त्तस्य देहिनः।१४.३८ 

ततस्तु परमं ब्रह्म कथं विप्रः स्मरिष्यति ।
संस्कारात् पूर्वधर्मस्य भावनायां प्रणोदितः।
मानुष्यं भजते नित्यं तस्मान्नित्यं समादधेत् ।। १४.३९ ।।

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते पाशुपतयोगो नाम चतुर्द्दशोऽध्यायः ।। १४ ।।

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जल से प्राण उत्पन्न होता है और यह प्राण ही आगे प्रजनन शक्ति का धारक भी है।

किन्तु केवल जल से नहीं, अपितु जलयुक्त देह से ही यह वायुरूप में उत्पन्न होता है।

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प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम् ।
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु त्वसत्स्विव ॥ १,२३८.१२ ॥

श्रीगरुडमहापुराणम् २३९

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे ब्रह्मगीतासारवर्णनं -२३८वाँ अध्यायः

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यमाश्च नियमाः प्रोक्ताः प्राणायामं निबोधत ।
प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम् ।। ११.३०

( कूर्मपुराण उत्तर भाग ११ वाँ अध्याय)

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धारण करने का कार्य पहले इंद्रियों के माध्यम से मन में जाता है। 

वहां मन में उहापोह होता है, जिसके बाद अधिक शुद्ध होकर वह तथ्य बुद्धि के पास अर्थविज्ञान हेतु जाता है। 

अर्थविज्ञान दृढ़ होने पर अहंकार तत्व उसे चित्त को साक्षी और संग्रहण हेतु निमित्त बनाकर आचरण में प्रवृत्त करता है। 

इस पूरी प्रक्रिया में लगे सभी मन आदि तत्वों की श्रृंखला या समूह की 'धी' संज्ञा है। 

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यदि मन के मध्य हुए उह एवं अपोह (उहापोह या पक्षापक्ष) में धर्म का पक्ष अर्थविज्ञान से सिद्ध हुआ तो उसे सुधी या विवेक कहते हैं। 

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शास्त्रों का आश्रय लेकर ही धर्म और अधर्म दोनों किये जा सकते हैं, बुद्धि की निश्चयात्मिका शक्ति का पलड़ा जिधर भारी हुआ, उधर से धर्म और न हुआ तो अधर्म का । 

यदा पुनर्निश्चिनुते तदा सा स्याद्बुद्धिसंज्ञा।

(प्रपञ्चसारतंत्र, प्रथम पटल,१०३)

निश्चयात्मिका होने पर प्रकृति की बुद्धि संज्ञा होती है। जब इसके निश्चय का माध्यम आत्मोद्धूत होता है तब यह स्वप्रत्यनेया है, अन्यथा परप्रत्यनेया।

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स्वप्रत्यनेया :- वामदेव एवं दत्तात्रेय जी की ब्रह्मज्ञान हेतु बुद्धि की अन्तःस्थित प्रेरणा।

परप्रत्यनेया :- नचिकेता एवं इन्द्र आदि की ब्रह्मज्ञान हेतु बुद्धि की बाह्याचारों (यमराज एवं उमा) से उद्भूत प्रेरणा।

परेण धाम्ना समनुप्रबुद्धा मनस्तदा सा तु महाप्रभावा,

यदा तु सङ्कल्पविकल्पकृत्या यदा पुनर्निश्चिनुते तदा सा।

स्याद्बुद्धिसंज्ञा च यदा प्रवेत्ति ज्ञातारमात्मानमहंकृतिः स्यात्,

तदा यदा सा त्वभिलीयतेऽन्तश्चित्तं च निर्धारितमर्थमेषा॥

(प्रपञ्चसारतंत्र, प्रथम पटल, १०२-१०३)

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साक्षी, कारण तथा अंतर्यामी के रूप में परं धाम चिद्रूप पुरुष के साथ सम्बद्ध महाप्रभावशालिनी यह प्रकृति जब संकल्प-विकल्प करती है तब इसे मन कहा जाता है।

 निश्चयात्मिका होने पर बुद्धि 

और कर्तापन के अभिमान से युक्त होकर पुरुष के स्थान पर स्वयं को कर्ता मानने पर अहंकार कहलाती है। 

साक्षीभूत आत्मा में लीन होने पर इसी प्रकृति की चित्त संज्ञा हो जाती है।

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संस्कार उन सूक्ष्म स्मृतियों को कहते हैं जो हमारे कर्मफल के कारण हमारे चित्त में सुरक्षित हो जाते हैं। 

वे भौतिक शरीर के नष्ट होने पर भी समाप्त नहीं होते और नवीन शरीर के साथ पुनः जागृत होते हैं।  

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इन संस्कारों के दो भेद होते हैं, आगत एवं अर्जित।

आगत संस्कार पिछले कर्मफल के समूह होते हैं जो प्रारब्ध रूप में साथ चलते हैं। 

अर्जित संस्कारों के चार समान भाग होते हैं :-

१-अपनी स्वयं की बुद्धि जो वस्तुतः आगत संस्कारों से प्रेरित होती है।

२-जीवन के अलग अलग परिस्थितियों में बिताए गए समय के अनुसार मिली चित्तवृत्तियां।

३-साथ में बिताए गए कर्मचारी, सहपाठी, पड़ोसी, गुरुजन आदि की संगति के प्रभाव।

४-आहार, चिंतन, आदि के कारण बने शरीर में ऊर्जा प्रवाह आदि।

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आप अपने नेत्र खुले रहेंगे तो आप ही केवल सबको देख सकते हैं।

ऐसे ही जिसे आत्मबोध होगा केवल वही सभी को ब्रह्म देख सकता है। लेकिन आप यदि घर  में आंख खोलकर एक बार देख लें और फिर बाहर  खड़े होकर बन्द कर दें तो आपको बाहर  नहीं दिखेगा। 

ऐसे ही आत्मबोध जिस रूप में हुआ है उसी रूप में आपको ब्रह्मदर्शन होगा। 

जिस जिस स्थान या रूपभेद में आपने नहीं खोला, वहां नहीं दिखेगा।

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अद्वैतं ते परं रूपं वेदागमसुनिश्चितम्।            नमामो ब्रह्म विज्ञानगम्यं परम गोपितम्॥

सृष्ट्यर्थं सशरीरा त्वं प्रधानं पुरुष: स्वयम्।    कल्पितं श्रुतिभिस्तेन द्वैतरूपा त्वमुच्यसे॥_____________________________

ब्रह्म अद्वैत है, यही परमसत्य है किंतु जब वह सृष्टि हेतु सगुण रूप धारण करता है तो हम उसे द्वैत के रूप में कल्पित कर लेते हैं ऐसा वेद और तन्त्र का निश्चय है।

(महाभागवत में द्वैताद्वैत की शंका के सन्दर्भ में त्रिदेवों का एकमत से निर्णय)

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जैसे स्फटिक के ऊपर लाल फूल रखने से स्फटिक भी लाल वर्ण का प्रतीत होने लगा लगता है वैसे ही बुद्धि और इन्द्रिय के सानिध्य से आत्मा की भी वैसी ही विकृतियुक्त प्रतीति होती है।

 वस्तुतः मन, बुद्धि एवं अहंकार ही फल के भोक्ता हैं किंतु उनसे अपने आप को भिन्न न मानने के कारण वह उपभोग आत्मा को प्राप्त होते प्रतीत होते हैं :-

बुद्धीन्द्रियादिसामीप्यादात्मनोऽपि तथा गतिः।मनोबुद्धिरहंकारो जीवस्य सहकारिणः॥

स्वकर्मवशतस्तात फलभोक्तार एव ते।            सर्वं वैषयिकं तात सुखं वा दुःखमेव वा॥

(महाभागवत)

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जैसे जल के साथ ठंडक हो जाने से हम उसे बर्फ के रूप में ठोस देखने लगते हैं ऐसे ही मन आदि से युक्त होकर आत्मा भी सविकार लगने लगता है। 

जल का गुण ही शीतलता है। बर्फ में उसका गुण ठंडक नहीं, तुषार कहाता है।

जल में तुषार या ऊष्मा की प्रतीति शीत या ताप आदि गुणों के कारण है जबकि शीतलता उसका सहज स्वभाव है।

 ऐसे ही आत्मा जब चित्त आदि से युक्त होती है तो उपभोक्ता के जैसे प्रतिभासित होती है। 

जैसे रस्सी में सांप की प्रतीति होने पर भय लगता है किंतु आपके भय के कारण रस्सी आपको काट नहीं सकती, भले ही आपका भय कितना भी वास्तविक क्यों न हो, ऐसे ही आत्मा केवल सुख दुख आदि का उपभोग करने वाली लगती है।

चाहे वह अनुभव कितना भी वास्तविक क्यों न लगे, उसका प्रभाव आत्मा पर नहीं पड़ता यदि वह मोहमुक्त है तो।

ज्ञान ही ब्रह्म है और ज्ञान का अभाव ही अज्ञान है। अज्ञान कोई अलग तत्व नहीं है।

अज्ञान एक स्थिति है जो माया से निर्मित है। आप स्वयं को देह से भिन्न नहीं देख पा रहे जबकि ज्ञानी देख पा रहा है। 

इसीलिए भ्रम के कारण आपने अनेकों जन्मों में मृत्यु का स्वाद चखा है और उसके अनुभव से परिचित होने के कारण भय लगता है। 

ऊपर हमने योगदर्शन की इसी बात को अभिनिवेश के नाम से कहा।

भ्रम से ही भय होता है। यह भ्रम ही है कि आप देह हैं।

यह भी भ्रम ही है कि आपकी मृत्यु होती है। आपको ज्ञात नहीं कि आप देह नहीं हैं, और मृत्यु देह की होती है।

 इसीलिए भ्रम से भय होता है।, ज्ञान से अभय होता है। 

जैसे स्वप्न में भोजन करने से यहां पेट नहीं भरता। स्वप्न में नहाने से यहां नहीं भीगते, वैसे ही जगत के भोगों के प्रति आत्मा निर्लेप रहती है।

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 महाप्रभावा यदा तु सङ्कल्पविकल्पकृत्या

(प्रपञ्चसार तन्त्र में 

लेकिन मन से बड़ी बुद्धि है क्योंकि वह निर्णय देती है, निश्चयात्मिका शक्ति की स्वामिनी होने से बुद्धि, मनरूपी वकील से बड़ी है, वह न्यायाधीश है।

यदा पुनर्निश्चिनुते तदा सा स्याद्बुद्धिसंज्ञा
(प्रपञ्चसार तन्त्र में )

हालांकि बुद्धि की अपेक्षा चित्त की प्रधानता है, साक्षीभाव का स्वामी होने से, वृत्तियों का संग्राहक होने से वह बुद्धि से भी श्रेष्ठ है।

यदा सा त्वभिलीयतेऽन्तश्चित्तं च निर्धारितमर्थमेषा॥
(प्रपञ्चसार तन्त्र में )

आद्यशंकराचार्य जी ने कहा है :- चिदचिद्ग्रंथिश्चेतस्तत्

जब शक्ति चेतन के अंदर होती है, तो उस शक्ति को माया और चेतन को ब्रह्म कहते हैं। और यदि बाहर रहती है, तो अविद्या कहाती है।

 यह अविद्या योगदर्शन में वर्णित अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश आदि के साथ रहने वाली पहली अविद्या नाम वाली क्लेश है जो मोक्ष में बाधक है। इस समय उसी चेतन की जीव संज्ञा होती है।

 इसी व्यतिक्रम में मायाकृत जड़ और ब्रह्मांश जीव के मध्य जो ग्रंथि है, वह चित्त है और वही सबसे शक्तिशाली है। 

वह सबसे शक्तिशाली इसीलिए है क्योंकि मन, बुद्धि आदि के लीन हो जाने पर भी वह मोक्षप्राप्ति तक बना रहता है :- अक्षयं ज्ञेयमामोक्षात्।

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चित्त के अधीन बुद्धि है और बुद्धि के अधीन मन है, मन के अधीन प्राणशक्ति है जो तन्मात्राओं का नियंत्रण करता है।

उन तन्मात्राओं से इंद्रियां कार्य करती हैं जो देह के चैतन्यमय होने का अनुभव कराती हैं।

प्राणानां आध्यात्मिकानामिन्द्रियाणां पतिर्मुख्यः प्राणः
(महाभारत)
इंद्रियों का स्वामी प्राणवायु है। यह दो प्रकार की होती है, मुख्य और क्षुद्र। 

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मुख्य प्राणों में प्राण:- अपान, व्यान, समान और उदान होते हैं।

क्षुद्र प्राण:- में नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय होते हैं। 

ये पूरे शरीर का नियंत्रण कक्ष के समान हैं।

छींक आने से लेकर भूख लगने तक, पलक झपकने से लेकर हृदय धड़कने तक, प्रसव कराने से लेकर बाल बढ़ने तक गर्मी या ठंड लगने से उंगलियों को चटकाने तक, भोजन पचाने से लेकर शौच कराने तक का काम ये सब संचालित करती हैं।

इसमें पुनः प्राण, अपान, व्यान आदि के भी सात सात भेद होते हैं।
उदाहरण के लिए प्राण शक्ति के प्रथम भेद यानी मुख्य प्राणों में प्रथम प्राण के भी उर्ध्वनामक अग्नि, प्रौढ़नामक आदित्य, अभ्यूढ़ नामक चन्द्रमा, विभुनामक पवमान अथवा वायु, योनिनामक अप् अथवा जल, प्रियनामक पशु, और अपरिमित नामक प्रजा आदि प्रकार होते हैं।

सप्त प्राणाः सप्तापानाः सप्त व्यानाः ॥
योऽस्य प्रथमः प्राण ऊर्ध्वो नामायं सो अग्निः॥


योऽस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो नामासौ स आदित्यः।।
योऽस्य तृतीयः प्राणोऽभ्यूढो नामासौ स चन्द्रमाः ॥
योऽस्य चतुर्थः प्राणो विभूर्नामायं स पवमानः
योऽस्य पञ्चमः प्राणो योनिर्नाम ता इमा आपः
योऽस्य षष्ठः प्राणः प्रियो नाम त इमे पशवः ॥
योऽस्य सप्तमः प्राणोऽपरिमितो नाम ता इमाः प्रजाः ॥
(अथर्ववेद)

इसमें भी एक  प्रकार आपके इन्द्रिय, मन, आदि पर बहुत शूक्ष्म प्रभाव डालता है। जैसे प्राणशक्ति का प्रथम प्रकार (मुख्य) के भी प्रथम प्रकार प्राणवायु का जो छठा भेद है, जिसे हमने प्रियनामक पशु संज्ञक कहा, उसे ही कारण आपके दिमाग में लज्जा, भय अथवा लोभ जैसी भावनाएं आती हैं।

इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने तीसरे अध्याय में कहा :-

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इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥

बाह्य परिच्छिन्न और स्थूल देह की अपेक्षा सूक्ष्म अन्तरस्थ और व्यापक आदि गुणों से युक्त होनेके कारण श्रोत्रादि पञ्च ज्ञानेन्द्रियोंको पर अर्थात् श्रेष्ठ कहते हैं।

तथा इन्द्रियोंकी अपेक्षा संकल्पविकल्पात्मक मन को श्रेष्ठ कहते हैं और मन की अपेक्षा निश्चयात्मिका बुद्धि को श्रेष्ठ बताते हैं।

 एवं जो बुद्धिपर्यन्त समस्त दृश्य पदार्थों के अन्तरव्यापी है।

 जिसके विषय में कहा है कि उस आत्माको इन्द्रियादि आश्रयों से युक्त काम ज्ञानावरण द्वारा मोहित किया करता है वह (बुद्धि का द्रष्टा चेतन) है।

मन की शक्ति सङ्कल्प विकल्प करने की है, निर्णय लेने की, निश्चय करने की नहीं।
सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि।
(छान्दोग्योपनिषत्)

इसी प्रकार मन से जो श्रेष्ठता से युक्त है, वह बुद्धि तर्क वितर्क नहीं करती, वह निर्णय देती है, निश्चय करती है। तो क्या सङ्कल्प विकल्प, तर्क वितर्क करने वाला मन छोटा हो गया, महत्वहीन हो गया ? नहीं ऐसा नहीं है।

तानि ह वा एतानि सङ्कल्पैकायनानि सङ्कल्पात्मकानि सङ्कल्पे प्रतिष्ठितानि समकॢपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समकल्पन्तापश्च तेजश्च तेषाँ सङ्कॢप्त्यै वर्षँ सङ्कल्पते वर्षस्य सङ्कॢप्त्या अन्नँ सङ्कल्पतेऽन्नस्य सङ्कॢप्त्यै प्राणाः सङ्कल्पन्ते प्राणानाँ सङ्कॢप्त्यै मन्त्राः सङ्कल्पन्ते मन्त्राणाँ सङ्कॢप्त्यै कर्माणि सङ्कल्पन्ते कर्मणां सङ्कॢप्त्यै लोकः सङ्कल्पते लोकस्य सङ्कॢप्त्यै सर्वँ सङ्कल्पते स एष सङ्कल्पः सङ्कल्पमुपास्स्वेति 
(छान्दोग्योपनिषत्)

सङ्कल्प की शक्ति अद्भुत है। सङ्कल्प विकल्प, तर्क वितर्क, उहापोह (आज की भाषा में साईंटिफिक रिसर्च) की शक्ति के ही कारण आकाश, पृथ्वी, अंतरिक्ष, प्रकाश, ध्वनि, तरंग, अन्न, अनेकों प्रकार की प्राण शक्ति आदि का ज्ञान सम्भव है।

 इससे मन प्राण, शरीर आदि को निर्देश कर पाता है, इसी ज्ञान के कारण सही निर्णय तक पहुंचकर कर्म करने की योग्यता आती है, इसीलिए इस शक्ति की, मन की अधिवक्ता शक्ति को धारण करना चाहिए।

तन्मात्रा वह माध्यम है जिससे इंद्रियों को अपने सम्बंधित विषयों को ग्रहण करने की शक्ति मिलती हैं। जैसे आप अपने वाहन के माध्यम से गंतव्य तक जाते हैं वैसे ही इंद्रियों को अपने विषय तक पहुंचने के लिए तन्मात्रा की आवश्यकता होती है।

उदाहरण के लिए, नेत्र रूपी इन्द्रिय, रूप तन्मात्रा के माध्यम में दृश्य रूपी विषय को ग्रहण करती है। अथवा कर्ण रूपी इन्द्रिय, शब्द तन्मात्रा के माध्यम से ध्वनि रूपी विषय को ग्रहण करती है। यदि तन्मात्रा न रहे तो आंख और कान रहने पर भी व्यक्ति अंधा या बहरा हो जाएगा।

अपने शरीर की तन्मात्रा का संचालन प्राण करता है। वही इंद्रियों के तन्मात्रा से प्राप्त विषयों को मन तक ले जाता है।

जैसे जब शरीर की ऊर्जा क्षीण होती है तो कृकल नाम का क्षुद्र प्राणवायु मन को यह सन्देश देता है कि भूख लग रही है और तब वह ऐसे हॉरमोन या रसायन को निकालता है जिससे व्यक्ति की भोजन करने की इच्छा होती है।

ऐसे ही जब हमारी आंखों को पलक झपकाना होता है तो यहां कूर्म नामक क्षुद्र प्राणवायु कार्य करता है।

जम्हाई लेने के लिए देवदत्त नामक क्षुद्र प्राणवायु का प्रयोग किया जाता है। 

ऊपर हमने सभी के नाम और विभाजन लिखे हुए हैं।

कूर्म उन्मीलने तु सः। कृकलः क्षुतकायैव देवदत्तो विजृंभणे॥
(लिंगपुराण)

इन्द्रिय और विषय की कड़ी तन्मात्रा है, यहां विषय छोटा है और इन्द्रिय बड़ी।

 इन्द्रिय और मन की कड़ी प्राणवायु है, यहां इन्द्रिय छोटा है और मन बड़ा।

धी और आत्मा की कड़ी चित्त है, यहां धी छोटी है और आत्मा बड़ी। 

इसी बात को संक्षेप में हमने ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के श्लोक का उदाहरण देकर कहा है।

सामान्य रूप से धी शब्द का प्रयोग बुद्धि के लिए किया जाता हूं किन्तु वास्तव में धी के गुणों और चर्चा करें तो यहां इंद्रियों की ग्रहण शक्ति, मन की तर्क वितर्क की शक्ति, बुद्धि की निर्णयशक्ति और चित्त की साक्षीभाव की शक्ति सब सम्मिलित है, इसीलिए कह सकते हैं ।

कि किसी भी वस्तु को देखने या सुनने के बाद, सोचने विचारने के बाद, निर्णय लेकर क्रियान्वयन करने तक की प्रक्रिया में लगे समस्त तत्वों का समूह ही धी कहाता है।
अष्टाभिर्गुणैः शुश्रूषा श्रवणं ग्रहणं धारणमूहनमपोहनं विज्ञानं तत्त्वज्ञानं चेति तैः॥
(महाभारत)

इस धी के लक्षण में ऊपर दिए सूत्र में विज्ञान शब्द भी आया है। इस विज्ञान से जो वस्तु हम नहीं जानते, जिस बात का हमें बोध नहीं होता, वो बात भी हम जान जाते हैं, उस बात का निश्चयात्मिका रीति से बोध भी हमें हो जाता है, यह हमारे सनातन धर्म का उद्घोष है।
अविज्ञातस्य विज्ञानं विज्ञातस्य च निश्चयः
(अग्निपुराण)

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मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बुद्धि की परिभाषा -

मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि की परिभाषाओं को तीन वर्गों में रखा है-

  1. बुद्धि -सामान्य योग्यता है।
  2. बुद्धि- दो या तीन योग्यताओं का योग है।
  3. बुद्धि- समस्त विशिष्ट योग्यताओं का योग है।

इन तीन वर्गों के अन्तर्गत बुद्धि को जिस तरह पारिभाषित किया गया उनका उल्लेख इस प्रकार है-

बुद्धि -सामान्य योग्यता -

इस प्रकार की विचारधारा को मानने वाले मनोवैज्ञानिक (टर्मन, एम्बिगास, स्टाऊट, बर्ट गॉल्टन स्टर्न )आदि हैं।

इन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बुद्धि व्यक्ति की सामान्य योग्यता है, जो उसकी हर क्रिया में पायी जाती है। इन मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि की परिभाषा इस प्रकार प्रस्तुत की है-

  • टर्मन (Termn) के अनुसार अमूर्त वस्तुओं के सम्बंध में विचार करने की योग्यता ही बुद्धि है।
(Intelligence is the ability to carry out abstract thinking)

अतः टर्मन के अनुसार बुद्धि समस्या को हल करने की योग्यता है।

  • एबिंगास (Ebbinghous) के अनुसार, बुद्धि विभिन्न भागों को मिलाने की शक्ति है।
(Intelligence is the power of combining parts.)
  • गाल्टन (Galton) के अनुसार, बुद्धि विभेद करने एवं चयन करने की शक्ति है।
(Intelligence is the power of discrimination and selection.)
  • स्टर्न (Stern) के मतानुसार, नवीन परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की योग्यता ही बुद्धि है।
(Intelligence is the ability to adjust oneself to a new situation.)

बुद्धि- दो या तीन योग्यताओं का योग है

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इस प्रकार की विचारधारा को मानने वालों में (स्टेनफोर्ड बिने) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बिने (Binet) के अनुसार,'

बुद्धि तर्क, निर्णय एवं आत्म आलोचन की योग्यता एवं क्षमता है।

(Intelligence is the ability and capacity to reason well to judge well and to be self-critical.)

बुद्धि -समस्त विशिष्ट योग्यताओं का योग है। 

बुद्धि के इस वर्ग की परिभाषाओं के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार की विशिष्ट योग्यताओं के योग को बुद्धि की संज्ञा दी है। 

इन विचारों को मानने वाले थार्नडाइक, थर्स्टन, थॉमसन, वेस्लर तथा स्टोडार्ड हैं।

उत्तम क्रिया करने तथा नई परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की योग्यता को बुद्धि कहते हैं
(Intelligence is the ability to make good responses and is demonstrated by the capacity to deal affectivity with new

situations.)

  • स्टोडार्ड (Stoddard) के मतानुसार,
बुद्धि (क) कठिनता (ख) जटिलता (ग) अमूर्तता (घ) आर्थिकता (ङ) उद्देश्य प्राप्यता (च) सामाजिक मूल्य तथा (छ) मौलिकता से सम्बंधित समस्याओं को समझने की योग्यता है।
(Intelligence is the ability to understand problems that are characterised by (a) difficulty (b) complexity (c) abstractness (d)

economy (e) adaptations to a goal (f) social value and (g) commergence of originals under such conditions that demand a concentration of energy and resistance to emotional forces.)

बुद्धि के सिद्धान्त -★

बुद्धि के स्वरूप एवं बुद्धि के सिद्धान्त (Theories of Intelligence) - 

दोनों ही बुद्धि के विषय के बारे में विचार प्रकट करते हैं परन्तु फिर भी दोनों में भिन्नता दृष्टिगत होती है। बुद्धि के सिद्धान्त उसकी संरचना को स्पष्ट करते हैं जबकि स्वरूप उसके कार्यों पर प्रकाश डालते हैं।

गत शताब्दी के प्रथम दशक से ही विभिन्न देशों के मनोवैज्ञानिकों में इस बात की रूचि बढ़ी की बुद्धि की संरचना कैसी है तथा इसमें किन-किन कारकों का समावेश है।

इन्हीं प्रश्नों के परिणाम स्वरूप विभिन्न कारकों के आधार पर बुद्धि की संरचना की व्याख्या होने लगी। 

अमेरिका के थार्सटन, थार्नडाईक, थॉमसन आदि मनोवैज्ञानिकों ने कारकों (factors) के आधार पर 'बुद्धि के स्वरूप' विषय में अपने-अपने विचार व्यक्त किये।

इसी तरह फ्रांस में अल्फ्रेड बिने, ब्रिटेन में स्पीयरमेन ने भी बुद्धि के स्वरूप के बारे में अपने विचार प्रस्तुत किये।

बिने का एक-कारक सिद्धान्त-

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एक-कारक सिद्धान्त (Uni-factor Theory) का प्रतिपादन फ्रांस के मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड बिने (Alfred Binet) ने किया तथा अमेरिका के मनोवैज्ञानिक टर्मन तथा जर्मनी के मनोवैज्ञानिक एंबिगास ने इसका समर्थन किया। 

(इस सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि वह शक्ति है जो समस्त मानसिक कार्यों को प्रभावित करती है। इस सिद्धान्त के अनुयाइयों ने बुद्धि को समस्त मानसिक कार्यों को प्रभावित करने वाली एक शक्ति के रूप में माना है।

 उन्होंने यह भी माना है कि बुद्धि समग्र रूप वाली होती है और व्यक्ति को एक विशेष कार्य करने में अग्रसित करती है। 

यह एक एकत्व का खंड है जिसका विभाजन नहीं किया जा सकता है।

 इस सिद्धान्त के अनुसार यदि व्यक्ति किसी एक विशेष क्षेत्र में निपुण है तो वह अन्य क्षेत्रों में भी निपुण रहेगा। 

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इसी एक कारकीय सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए 

१-बिने ने "बुद्धि को व्याख्या-और निर्णय की योग्यता माना है"।

२- टर्मन ने "इसे विचार करने की योग्यता माना है तथा 

३-".स्टर्न ने  इसे नवीन परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की योग्यता के रूप में माना है"।

द्वितत्व सिद्धान्त -

द्वितत्व सिद्धान्त (Bi-factor Theory) के प्रवर्तक ब्रिटेन के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्पीयर मेन हैं।

 उन्होंने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों तथा अनुभवों के आधार पर बुद्धि के इस द्वि-तत्व सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। 

उनके मतानुसार बुद्धि दो शक्तियों के रूप में है या बुद्धि की संरचना में दो कारक हैं। 

इनमें से एक को उन्होंने 'सामान्य बुद्धि' (General or G-factor) तथा दूसरे कारक को 'विशिष्ट बुद्धि' (Specific S- factor) कहा है। 

सामान्य कारक से उनका तात्पर्य यह है कि सभी व्यक्तियों में कार्य करने की एक सामान्य योग्यता होती है। 

अतः प्रत्येक व्यक्ति कुछ सीमा तक प्रत्येक कार्य कर सकता है। ये कार्य उसकी सामान्य बुद्धि के कारण ही होते हैं।

 सामान्य कारक व्यक्ति की सम्पूर्ण मानसिक एवं बौद्धिक क्रियाओं में पाया जाता है परन्तु यह विभिन्न मात्राओं में होता है।

 बुद्धि का यह सामान्य कारक जन्मजात होता है तथा व्यक्तियों को सफलता की ओर इंगित करता है।

व्यक्ति की विशेष क्रियाएं बुद्धि के एक विशेष कारक द्वारा होती है।

 यह कारक बुद्धि का विशिष्ट कारक (specific factor) कहलाता है।

 एक प्रकार की विशिष्ट क्रिया में बुद्धि का एक विशिष्ट कारक कार्य करता है तो दूसरी क्रिया में दूसरा विशिष्ट कारक।

 अतः भिन्न-भिन्न प्रकार की विशिष्ट क्रियाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार के विशिष्ट कारकों की आवश्यकता होती है।

 ये विशिष्ट कारक भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। इसी कारण वैयक्तिक भिन्नताएं पाई जाती हैं।

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बुद्धि के सामान्य कारक जन्मजात होते हैं जबकि विशिष्ट कारक अधिकांशतः अर्जित होते हैं।

बुद्धि के इस दो-कारक सिद्धान्त के अनुसार सभी प्रकार की मानसिक क्रियाओं में बुद्धि के सामान्य कारक कार्य करते हैं ।

जबकि विशिष्ट मानसिक क्रियाओं में विशिष्ट कारकों को स्वतंत्र रूप से काम में लिया जाता है। व्यक्ति के एक ही क्रिया में एक या कई विशिष्ट कारकों की आवश्यकता होती है।

परन्तु प्रत्येक मानसिक क्रिया में उस क्रिया से संबंधित विशिष्ट कारक के साथ-साथ सामान्य कारक भी आवश्यक होते हैं। 

जैसे- सामान्य विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, दर्शन एवं शास्त्र अध्ययन जैसे विषयों को जानने और समझने के लिए सामान्य कारक महत्वपूर्ण समझे जाते हैं वहीं यांत्रिक, हस्तकला, कला, संगीत कला जैसे विशिष्ट विषयोंं को जानने ओर समझने के लिए विशिष्ट कारकों की प्रमुख रूप से आवश्यकता होती है।

 इससे स्पष्ट है कि किसी विशेष विषय या कला को सीखने के लिए दोनों कारकों का होना अत्यन्त अनिवार्य है।

त्रिकारक बुद्धि सिद्धान्त-★


  1. सामान्य कारक
  2. विशिष्ट कारक
  3. समूह कारक

सम्मिलित किये गये हैं।

स्पीयरमेन के विचार में सामान्य तथा विशिष्ट कारकों के अतिरिक्त समूह कारक भी समस्त मानसिक क्रियाओं में साथ रहता है। 

कुछ विशेष योग्यताएं जैसे यांत्रिक योग्यता, आंकिक योग्यता, शाब्दिक योग्यता, संगीत योग्यता, स्मृति योग्यता, तार्किक योग्यता तथा बौद्धिक योग्यता आदि के संचालन में समूह कारक भी विशेष भूमिका निभाते हैं। 

समूह कारक स्वयं अपने आप में कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखता बल्कि विभिन्न विशिष्ट कारकों तथा सामान्य कारक के मिश्रण से यह अपना समूह बनाता है। 

इसीलिए इसे समूह कारक कहा गया है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस सिद्धान्त में किसी प्रकार की नवीनता नहीं है।

 थार्नडाइक जैसे मनोवैज्ञानिकों ने इस सिद्धान्त की आलोचना करते हुए कहा है कि समूह कारक कोई नवीन कारक नहीं है ।

अपितु यह सामान्य एवं विशिष्ट कारकों का मिश्रण मात्र है।

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थार्नडाइक का बहुकारक बुद्धि सिद्धान्त-

थार्नडाइक ने अपने सिद्धान्त में बुद्धि को विभिन्न कारकों का मिश्रण माना है। जिसमें कई योग्यताएं निहित होती हैं।

उनके अनुसार किसी भी मानसिक कार्य के लिए, विभिन्न कारक एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। थार्नडाइक ने पूर्व सिद्धान्तों में प्रस्तुत 'सामान्य कारकों' की आलोचना की और अपने सिद्धान्त में सामान्य कारकों की जगह मूल कारकों (Primary factors) तथा सर्वनिष्ठ कारकों (कॉमन फैक्टर्स) का उल्लेख किया।

 मूल कारकों में मूल मानसिक योग्यताओं को सम्मिलित किया है। ये योग्यताएं जैसे- शाब्दिक योग्यता, आंकिक योग्यता, यांत्रिक योग्यता, स्मृति योग्यता, तार्किक योग्यता तथा भाषण देने की योग्यता आदि हैं। 

उनके अनुसार ये योग्यताएं व्यक्ति के समस्त मानसिक कार्यों को प्रभावित करती है।

थार्नडाइक इस बात को भी मानते हैं कि हर व्यक्ति में कोई न कोई विशिष्ट योग्यता अवश्य पायी जाती है। 

परन्तु उनका यह भी मानना है कि व्यक्ति की एक विषय की योग्यता से दूसरे विषय में योग्यता का अनुमान लगाना कठिन है। जैसे कि एक व्यक्ति यांत्रिक कला में प्रवीण है तो यह आवश्यक नहीं कि वह संगीत में भी निपुण होगा।

 उनके अनुसार जब दो मानसिक क्रियाओं के प्रतिपादन में यदि धनात्मक सहसंबंध पाया जाता है तो उसका अर्थ व्यक्ति में सर्वनिष्ट कारक भी हैं। ये उभयनिष्ठ कारक कितनी मात्रा में हैं यह सहसंबंध की मात्रा से ज्ञात हो सकता है।

थार्नडाइक ने बुद्धि को तीन प्रकार का बताया है ।

1-मूर्त बुद्धि- जैसे राजगीर इंजीनियर
2-अमूर्त बुद्धि-डाक्टर चित्रकार मनोवैज्ञानिक
3-सामाजिक बुद्धि- नेता समाजसेवी

थर्स्टन का समूह कारक बुद्धि सिद्धान्त-

थर्स्टन (Thurston) के समूह कारक बुद्धि सिद्धान्त (Group factors Intelligence Theory) के अनुसार बुद्धि न तो सामान्य कारकों का प्रदर्शन है, न ही विभिन्न विशिष्ट कारकों का, अपितु इसमें कुछ ऐसी निश्चित मानसिक क्रियाएं होती हैं जो सामान्य रूप से मूल कारकों में सम्मिलित होती है। 

ये मानसिक क्रियाएं समूह का निर्माण करती हैं जो मनोवैज्ञानिक एवं क्रियात्मक एकता प्रदान करते हैं। 

थर्स्टन ने अपने सिद्धान्त को कारक विश्लेषण के आधार पर प्रस्तुत किया। उनके अनुसार बुद्धि की संरचना कुछ मौलिक कारकों के समूह से होती है। दो या अधिक मूल कारक मिलकर एक समूह का निर्माण कर लेते हैं जो व्यक्ति के किसी क्षेत्र में उसकी बुद्धि का प्रदर्शन करते हैं। इन मौलिक कारकों में उन्होंने आंकिक योग्यता, प्रत्यक्षीकरण की योग्यता (Perceptual ability), शाब्दिक योग्यता (Verbal ability), दैशिक योग्यता (Spatial ability), शब्द प्रवाह (Word fluency), तर्क शक्ति और स्मृति शक्ति (mental power) को मुख्य माना।

थर्स्टन ने यह स्पष्ट किया कि बुद्धि कई प्रकार की योग्यताओं का मिश्रण है जो विभिन्न समूहों में पाई जाती है। उनके अनुसार मानसिक योग्यताएं क्रियात्मक रूप से स्वतंत्र है फिर भी जब ये समूह में कार्य करती है तो उनमें परस्पर संबंध या समानता पाई जाती है। 

कुछ विशिष्ट योग्यताएं एक ही समूह की होती हैं और उनमें आपस में सह-संबंध पाया जाता है। जैसे विज्ञान विषयों के समूह में भौतिक, रसायन, गणित तथा जीव-विज्ञान भौतिकी एवं रसायन आदि।

 इसी प्रकार संगीत कला को प्रदर्शित करने के लिए तबला, हारमोनियम, सितार आदि बजाने में परस्पर सह-संबंध रहता है।

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थॉमसन का प्रतिदर्श सिद्धान्त-

थॉमसन (Thomson) ने बुद्धि के प्रतिदर्श सिद्धान्त (Sampling Theory of Intelligence) को प्रस्तुत किया। 

उनके मतानुसार व्यक्ति का प्रत्येक कार्य निश्चित योग्यताओं का प्रतिदर्श होता है। किसी भी विशेष कार्य को करने में व्यक्ति अपनी समस्त मानसिक योग्यताओं में से कुछ का प्रतिदर्श के रूप में चुनाव कर लेता है।

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 इस सिद्धान्त में उन्होंने सामान्य कारकों (G-factors) की व्यावहारिकता को महत्व दिया है। थॉमसन के अनुसार व्यक्ति का बौद्धिक व्यवहार अनेक स्वतंत्र योग्यताओं पर निर्भर करता है परन्तु परीक्षा करते समय उनका प्रतिदर्श ही सामने आता है।

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कैटल का बुद्धि सिद्धान्त-

रेमण्ड वी. केटल (1971) ने दो प्रकार की सामान्य बुद्धि का वर्णन किया है। ये हैं फ्लूड (Fluid) तथा क्रिस्टलाईज्ड (Crystallized)। उनके अनुसार बुद्धि की फ्लूड सामान्य योग्यता वंशानुक्रम कारकों पर निर्भर करती है।

 जबकि क्रिस्टलाईज्ड योग्यता अर्जित कारकों के रूप में होती है। 

फ्लूड सामान्य योग्यता मुख्य रूप से संस्कृति युक्त, गति-स्थितियों तथा नई स्थितियों के अनुकूलता वाले परीक्षणों में पाई जाती है। क्रिस्टलाईज्ड सामान्य योग्यता अर्जित सांस्कृतिक उपलब्धियों, कौशलताओं तथा नई स्थिति से सम्बंधित वाले परीक्षणों में एक कारक के रूप में मापी जाती है। 

फ्लूड सामान्य योग्यता (gf) को शरीर की वंशानुक्रम विभक्ता के रूप में लिया जा सकता है जो जैवरासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा संचालित होती है।

 जबकि क्रिस्टलाईज्ड सामान्य योग्यता (gc) सामाजिक अधिगम एवं पर्यावरण प्रभावों से संचालित होती है। 

केटल के अनुसार फ्लुड सामान्य बुद्धि वंशानुक्रम से सम्बिंधत है तथा जन्मजात होती है जबकि क्रिस्टलाईज्ड सामान्य बुद्धि अर्जित है।


बर्ट तथा वर्नन का पदानुक्रमित बुद्धि सिद्धान्त-

बर्ट एवं वर्नन (Burt and Vernon's 1965) ने पदानुक्रमित बुद्धि सिद्धान्त (Hirarchical Theory of Intelligence) का प्रतिपादन किया। बुद्धि सिद्धान्तों के क्षेत्र में यह नवीन सिद्धान्त माना जाता है। इस सिद्धान्त में बर्ट एवं वर्नन ने मानसिक योग्यताओं को क्रमिक महत्व प्रदान किया है। उन्होंने मानसिक योग्यताओं को चार स्तरों पर विभिक्त किया-

  • (१) सामान्य मानसिक योग्यता
  • (2) मुख्य समूह कारक
  • (3) लघु समूह कारक
  • (4) विशिष्ट मानसिक योग्यता

सामान्य मानसिक योग्यताओं में भी योग्यताओं को उन्होंने स्तरों के आधार पर दो वर्गां में विभाजित किया। पहले वर्ग में उन्होंने क्रियात्मक (Practical), यांत्रिक (Machenical) एवं शारीरिक योग्यताओं को रखा है। इस मुख्य वर्ग को उन्होंने k.m. नाम दिया। योग्यताओं के दूसरे समूह में उन्होंने शाब्दिक (Verbal), आंकिक तथा शैक्षिक योग्यताओं को रखा है और इस समूह को उन्होंने v.ed. नाम दिया है। अंतिम स्तर पर उन्होंने विशिष्ट मानसिक योग्यताओं को रखा जिनका सम्बंध विभिन्न ज्ञानात्मक क्रियाओं से है।

इस सिद्धान्त की नवीनता एवं अपनी विशेष योग्यताओं के कारण कई मनोवैज्ञानिकों का ध्यान इसकी ओर आकर्षित हुआ है।

गिलफोर्ड का त्रि-आयाम बुद्धि सिद्धान्त-

गिलफोर्ड (Guilford 1959, 1961, 1967) तथा उसके सहयोगियों ने तीन मानसिक योग्यताओं के आधार पर बुद्धि संरचना की व्याख्या प्रस्तुत की। 

गिलफोर्ड का यह बुद्धि संरचना सिद्धान्त त्रि-विमीय बौद्धिक मॉडल (Three Dimentional model) कहलाता है।

 उन्होंने बुद्धि कारकों को तीन श्रेणियों में बांटा है, अर्थात् मानसिक योग्यताओं को तीन विमाओं (डाइमेंशन्स) में बांटा है। ये हैं-

  • संक्रिया (Operation)
  • विषय-वस्तु (Contents)
  • उत्पाद (Products)

कारक विश्लेषण (Factor Analysis) से बुद्धि की ये तीनों विमाएं पर्याप्त रूप से भिन्न है। 5×4×6=120 तत्वों में वर्गीकृत किया गया है

बहुबुद्धि सिद्धान्त-

इन सबके अलावा बुद्धि का एक सिद्धान्त है जिसे 'हॉवर्ड गार्डनर' ने प्रतिपादित किया, इसे बहुबुद्धि सिद्धान्त कहा जाता है।

 इसके अनुसार हर इंसान मे अलग प्रकार की बुद्धि होती है,जैसे कोई संगीत मे पारंगत हो सकता है तो कोई अभिनय मे तो कोई लेखन मे,कोई तार्किक क्षमता मे आदि।

 इन्होंने बुद्धि के इस सिद्धान्त को समझाने के लिए इसे नौ क्षेत्रों मे विभाजित किया है जो इस प्रकार हैं- 

1-भाषागत

2-तार्किक-गणितीय

3-देैशिक

4-संगीतात्मक

5-शारीरिक-गतिसंवेदी

6-अंतर्वैयक्तिक

7-अन्तः व्यक्ति

8-प्रकृतिवादी

9-अस्तित्ववादी

गार्डनर ने अपनी पुस्तक "फ्रेम्स ऑफ माइंड : द थ्योरी ऑफ मल्टीपल इंटेलिजेंस" में इसे काफी अच्छे से विस्तारपूर्वक बताया है।

"सन्दर्भ"

  1.  Sternberg RJ; Salter W (1982). Handbook of human intelligence. Cambridge, UK: Cambridge University Press. OCLC 11226466 38083152 8170650 |oclc= के मान की जाँच करें (मदद)आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-521-29687-0.
  2.  Binet, Alfred (1916) [1905]. "New methods for the diagnosis of the intellectual level of subnormals"The development of intelligence in children: The Binet-Simon Scale. E.S. Kite (Trans.). Baltimore: Williams & Wilkins. पपृ॰ 37–90. मूल से 19 जून 2010 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 10 जुलाई 2010originally published as Méthodes nouvelles pour le diagnostic du niveau intellectuel des anormaux. L'Année Psychologique, 11, 191-244
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कई अलग मानकीकृत परीक्षणों से प्राप्त एक गणना है;  जिससे बुद्धि का आकलन किया जाता है।

 हालांकि "IQ" शब्द का उपयोग आमतौर पर अब भी होता है किन्तु, 

वेक्स्लर एडल्ट इंटेलिजेंस स्केल

वेचस्लेर एडल्ट इंटेलिजेंस स्केल ( WAIS ) एक है बुद्धि परीक्षण को मापने के लिए तैयार किया गया खुफिया और संज्ञानात्मक क्षमता वयस्कों और पुराने किशोरों में। 

 मूल( WAIS ) को फरवरी १९५५ में डेविड वेक्स्लर द्वारा प्रकाशित किया गया था , जो १९३९ में जारी वेक्स्लर-बेलेव्यू इंटेलिजेंस स्केल के संशोधन के रूप में था। 

यह वर्तमान में अपने चौथे संस्करण ( WAIS-IV ) में जारी है। 

यह 2008 में पियर्सन द्वारा , और दुनिया में वयस्कों और बड़े किशोरों दोनों के लिए सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला आईक्यू टेस्ट है। 

अगले संस्करण के लिए डेटा संग्रह ( WAIS 5) 2016 में शुरू हुआ और 2020 के वसंत में समाप्त होने की उम्मीद है। 

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WAIS की स्थापना वेक्स्लर की बुद्धि की परिभाषा पर की गई है , जिसे उन्होंने "... किसी व्यक्ति की उद्देश्यपूर्ण ढंग से कार्य करने, तर्कसंगत रूप से सोचने और अपने पर्यावरण से प्रभावी ढंग से निपटने की वैश्विक क्षमता" के रूप में परिभाषित किया है।

उनका मानना ​​था कि बुद्धि विशिष्ट तत्वों से बनी होती है जिन्हें अलग किया जा सकता है, परिभाषित किया जा सकता है और बाद में मापा जा सकता है। हालाँकि, ये व्यक्तिगत तत्व पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं थे, लेकिन सभी परस्पर जुड़े हुए थे। उनका तर्क, दूसरे शब्दों में, यह है कि सामान्य बुद्धि विभिन्न विशिष्ट और परस्पर संबंधित कार्यों या तत्वों से बनी होती है जिन्हें व्यक्तिगत रूप से मापा जा सकता है। 

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यह सिद्धांत बिनेट पैमाने से काफी भिन्न था , जिसे वेक्स्लर के दिनों में, आमतौर पर खुफिया परीक्षण के संबंध में सर्वोच्च अधिकार माना जाता था। 1937 में जारी बिनेट स्केल के एक बड़े पैमाने पर संशोधित नए संस्करण को डेविड वेक्स्लर (जिसके बाद मूल वेक्स्लर-बेलेव्यू इंटेलिजेंस स्केल और आधुनिक वेक्स्लर एडल्ट इंटेलिजेंस स्केल IV का नाम दिया गया है) से काफी आलोचना मिली ।

  • वेक्स्लर गैर-बौद्धिक कारकों की अवधारणा के लिए एक बहुत प्रभावशाली वकील थे, और उन्होंने महसूस किया कि 1937 के बिनेट पैमाने ने इन कारकों को पैमाने में शामिल करने का अच्छा काम नहीं किया (गैर-बौद्धिक कारक चर हैं जो समग्र स्कोर में योगदान करते हैं। बुद्धि, लेकिन बुद्धि से संबंधित वस्तुओं से नहीं बने हैं। इनमें आत्मविश्वास की कमी, असफलता का डर, दृष्टिकोण आदि जैसी चीजें शामिल हैं)।
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  • वेक्स्लर बिनेट परीक्षण द्वारा दिए गए एक अंक के विचार से सहमत नहीं थे। 
  • वेक्स्लर ने तर्क दिया कि बिनेट स्केल आइटम वयस्क परीक्षार्थियों के लिए मान्य नहीं थे क्योंकि आइटम विशेष रूप से बच्चों के उपयोग के लिए चुने गए थे। 
  • "बिनेट स्केल का गति पर जोर, समयबद्ध कार्यों के साथ पूरे पैमाने पर बिखरे हुए, पुराने वयस्कों को अनावश्यक रूप से विकलांग करने के लिए।" 
  • वेक्स्लर का मानना ​​था कि "मानसिक आयु मानदंड स्पष्ट रूप से वयस्कों पर लागू नहीं होते हैं।" 
  • वेक्स्लर ने तत्कालीन मौजूदा बिनेट पैमाने की आलोचना की क्योंकि "यह नहीं माना जाता था कि बौद्धिक प्रदर्शन एक व्यक्ति के बड़े होने पर बिगड़ सकता है।" 

१९३७ के बिनेट परीक्षण की इन आलोचनाओं ने १९३९ में जारी वेक्स्लर-बेलेव्यू पैमाने का निर्माण करने में मदद की। 

हालाँकि, वर्तमान में WAIS-IV ने इनमें से कई आलोचनाओं का खंडन किया है, जिसमें एक समग्र स्कोर को शामिल करते हुए, कई समय के कार्यों का उपयोग करते हुए, बौद्धिक पर ध्यान केंद्रित किया गया है। 

आइटम और अन्य तरीके। हालांकि इस पैमाने को संशोधित किया गया है (जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान दिन WAIS-IV), वेक्स्लर ने तर्क दिया कि कई मूल अवधारणाएं मनोवैज्ञानिक परीक्षण में मानक बन गई हैं , जिसमें बिंदु-पैमाने की अवधारणा और प्रदर्शन-पैमाने की अवधारणा शामिल है। 


WAIS को शुरू में Wechsler- Bellevue Intelligence Scale (WBIS) के संशोधन के रूप में बनाया गया था , जो 1939 में Wechsler द्वारा प्रकाशित परीक्षणों की एक बैटरी थी। WBIS उप-परीक्षणों से बना था जो उस समय के विभिन्न अन्य खुफिया परीक्षणों में पाया जा सकता था, जैसे रॉबर्ट यरकेस का सेना परीक्षण कार्यक्रम और बिनेट - साइमन स्केल। WAIS को पहली बार फरवरी 1955 में डेविड वेक्स्लर द्वारा जारी किया गया था । 


क्योंकि वेक्स्लर परीक्षणों में गैर-मौखिक आइटम ( प्रदर्शन स्केल के रूप में जाना जाता है ) के साथ-साथ सभी परीक्षार्थियों के लिए मौखिक आइटम शामिल थे, और क्योंकि लुईस टर्मन के स्टैनफोर्ड-बिनेट इंटेलिजेंस स्केल का 1960 का रूप पिछले संस्करणों की तुलना में कम सावधानी से विकसित किया गया था, फॉर्म WAIS के I ने 1960 के दशक तक लोकप्रियता में स्टैनफोर्ड-बिनेट परीक्षणों को पीछे छोड़ दिया। 

WAIS-R, WAIS का एक संशोधित रूप, 1981 में जारी किया गया था और इसमें छह मौखिक और पांच प्रदर्शन उप-परीक्षण शामिल थे। मौखिक परीक्षण थे: सूचना, समझ, अंकगणित, अंक अवधि, समानताएं और शब्दावली। प्रदर्शन उप-परीक्षण थे: पिक्चर अरेंजमेंट, पिक्चर कंप्लीशन, ब्लॉक डिजाइन, ऑब्जेक्ट असेंबली और डिजिट सिंबल। एक मौखिक आईक्यू, प्रदर्शन आईक्यू और पूर्ण पैमाने पर आईक्यू प्राप्त किया गया। 

इस संशोधित संस्करण ने नया वैधता डेटा प्रदान नहीं किया, लेकिन मूल WAIS के डेटा का उपयोग किया; हालाँकि नए मानदंड प्रदान किए गए, सावधानीपूर्वक स्तरीकृत किए गए। 


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 जो गौस्सियन बेल कर्व (Gaussian bell curve) किसी विषय के प्रति झुकाव पर नापे गये रैंक के आधार पर किया जाता है, जिसमें केन्द्रीय मान (औसत IQ)100 होता है और मानक विचलन 15 होता है।

हालांकि विभिन्न परीक्षणों में मानक विचलन अलग-अलग हो सकते हैं।

एक बहुत बड़ी आबादी के IQs एक सामान्य वितरण के साथ मोडेल्ड किया जा सकता है।
बौद्धिक स्तर (IQ) की गणना को रुग्णता और मृत्यु दर , अभिभावकों की सामाजिक स्थिति और काफी हद तक पैतृक बौद्धिक स्तर (IQ) जैसे कारकों के साथ जोड़कर देखा जाता है। 

जबकि उसकी विरासत लगभग एक सदी से जांची जा चुकी है फिर भी इस बात को लेकर विवाद बना हुआ है कि उसकी कितनी विरासत ग्राह्य है और विरासत के तंत्र अभी भी बहस के विषय बने हुए हैं।

IQ की गणनाएं कई संदर्भों में प्रयुक्त की जाती है: शैक्षणिक उपलब्धियों अथवा विशेष जरूरतों से जुड़े भविष्यवक्ताओं, लोगों में (IQ) स्तर के अध्ययन तथा( IQ) के स्कोर तथा अन्य परिवर्तनों के बीच के सम्बंध का अध्ययन करने वाले समाज विज्ञानियों और किये गये कार्य और उससे हुई आय का भविष्यफल बताने वाले लोगों द्वारा किया जाता है।

कई समुदायों का औसत IQ स्कोर 20 वीं सदी के पहले दशकों में प्रति दशक तीन अंक के दर से बढ़ा है जिसमें से ज्यादातर वृद्धि IQ रेंज के उत्तरार्द्ध में हुई, जिसे फ्लीन इफेक्ट कहते हैं। 

यह विवाद का विषय है कि अंकों में यह परिवर्तन बौद्धिक क्षमता की वास्तविकता को दर्शाते हैं या फिर यह महज अतीत या वर्तमान के परीक्षण की सिलसिलेवार समस्याएं हैं।


आधुनिक IQ (बौद्धिक स्तर) के अंक जो एक सामान्य दृष्टांत के अंक के रैंक पर आधारित हैं, वे कुल प्राप्तांक के गणितीय रूपांतर हैं।
आधुनिक अंक कई बार "डेविएंस (विचलन) IQ" के रूप में संदर्भित होते रहे हैं, जबकि पुरानी पद्धति में उम्र विशेष से सम्बंधित अंकों को "अनुपातिक IQ." के रूप में संदर्भित किया जाता रहा है।

बेल कर्व के बीच के पास दो तरीकों के परिणाम एक जैसे निकलते हैं, लेकिन बौद्धिक उपहार को पुराने IQ अनुपात में अधिक अंक मिलते थे। उदाहरण के तौर पर पर मर्लिन वोस सावंत को लिया जा सकता है, जो गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में दिखाई दिये, उन्हें IQ अनुपात में 240 अंक प्राप्त हुए थे।

हालांकि यह अंक निकालने के लिए का मतलब है बिनेट फार्मूला का प्रयोग किया गया था।

 जिसमें मानसिक उम्र और वास्तविक उम्र का अनुपात निकाला गया था (और वह भी सिर्फ एक बच्चे के लिए).गौससियन कर्वे मॉडल में यह 7.9 स्तर का विचलन एक अपवाद है।
 और यह उच्चता एक बड़ी संख्या वाले जनसमुदाय के ज्यादातर लोगों के लिए असंभव है, जिनका IQ सामान्य वितरण वाला है।
 इसके अतिरिक्त, वेचस्लेर जैसे IQ परीक्षण IQ के 145 अंकों से बाहर जाकर अन्तर को दृढ़ता से प्रकट नहीं करते हैं, जिसकी उच्चतम सीमा का प्रभाव चिंता का विषय बना हआ है।

वेचस्लेर का एडल्ट इंटेलिजेंस स्केल (WAIS) के प्रकाशन के बाद से लगभग सभी बौद्धिकता मानकों ने अंकों के आबंटन के लिए सामान्य वितरण प्रणाली को अपनाया है।

 सामान्य अंक आबंटन विधि के लिए "बौद्धिक स्तर" शब्द का इस्तेमाल बैद्धिकता की माप का अशुद्ध विवरण और एक त्रुटिपूर्ण गणितीय कथ्य बनाता है, ।

लेकिन "I.Q." शब्द का अब भी बोलचाल में प्रचलन है और उसका इस्तेमाल वर्तमान में उपयोग में आने वाले सभी बौद्धिक पैमानों के लिए होता है।



मुख्य लेख: Inheritance of intelligence
जीनोटाइप (आनुवांशिकता सम्बंधी) और पर्यावरण की भूमिका (प्रकृति और पोषण) IQ के निर्धारण में क्या होती है इसकी समीक्षा प्लोमिन एट अल में की गयी है।

हाल के समय तक आनुवांशिकता -(आनुवांशिकता) का अधिकतर अध्ययन बच्चों में किया जाता था। विभिन्न अध्ययनों से संयुक्त राज्य अमरीका में IQ आनुवांशिकता 0.4 और 0.8 के बीच पायी गयी।
 
यह एक अध्ययन पर आधारित है, जिसमें आधे से थोड़ा कम या वास्तव में आधे से अधिक IQ विविधता उन बच्चों के अध्ययन में पायी गयी जिनमें परिवर्तन के लिए जीनोटाइप का बदलाव जिम्मेदार है।

बाकी की वजह पर्यावरण परिवर्तन और माप की त्रुटियां हैं।

 इसका मतलब यह निकला कि आनुवांशिकता की रेंज 0.8 से 0.4 अंक है और IQ के लिए आनुवांशिकता "पर्याप्त" जिम्मेदार है।

प्रतिबंध का IQ की रेंज पर क्या प्रभाव पड़ता है इसका अध्ययन मैट मैकगुए और उनके सहयोगियों ने किया है, जिन्होंने यह लिखा है कि "माता-पिता और परिवार की रोकटोक की मनोग्रंथि और परिवार के दत्तक भाई के पारस्परिक संबंध का कोई प्रभाव नहीं पड़ता...IQ."दूसरी ओर एरिक तुर्खेइमेर, अन्द्रेअना हले, मेरी वाल्ड्रन, ब्रायन डी ओनोफ्रियो, इरविंग आई.गोट्समैन द्वारा 2003 में किये गये एक अध्ययन में यह कहा गया है कि IQ के अनुपात में अन्तर का कारण जीन और पर्यावरण सामाजिक आर्थिक स्थितियों की भिन्नता है।
 
उन्होंने पाया कि गरीब परिवारों में IQ के मामले में 60% का अन्तर है। यह अध्ययन 7 साल के जुड़वां बच्चों पर किया गया, जो एक साझा पर्यावरण में रखे गये थे और उनके जीन का योगदान शून्य के करीब था।

यह अपेक्षा उचित होगी कि आनुवांशिक प्रभावों का IQ जैसी विशिष्टता पर तब प्रभाव कम महत्वपूर्ण हो जाता है जब उम्र के साथ-साथ कोई अनुभव अर्जित करता है।

हैरानी की बात तो यह है कि ठीक इसके विपरीत होता है.

शैशव में आनुवांशिकता का असर 20% जितना कम होता है, बचपन की मध्यावस्था में लगभग 40% और वयस्कता अवधि में वह 80% के उच्च स्तर तक पहुंच जाता है।

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की 1995 में "इंटेलिजेंस: नोंस एंड अननोंस" के लिए गठित टास्क फोर्स इस नतीजे पर पहुंची कि श्वेत जनसंख्या का आनुवांशिक IQ "75 के आसपास" है। 

मिनेसोटा के जुड़वां बच्चों के अलग पालन-पोषण के अध्ययन के अलावा 1979 में 100 सेट जुड़वां बच्चों के अलग-अलग पालन-पोषण का कई सालों तक किये गये अध्ययन का निष्कर्ष निकला कि IQ के आबंटन में आनुवांशिकता सम्बद्ध है। 

जुड़वां बच्चों के IQ पर जन्म से पहले के मां के वातावरण का प्रभाव है जिससे इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि अलग-अलग पालन-पोषण के बावजूद जुड़वां बच्चों के बीच में IQ का पारस्परिक सम्बंध इतना पुष्ट क्यों है।

आनुवांशिकता की व्याख्या करते समय कई और बिन्दु हैं जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए:

एक उच्च आनुवांशिकता का तात्पर्य यह नहीं है कि पर्यावरण की विशेषता का विकास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता अथवा उसमें अध्ययन शामिल नहीं है।

 उदाहरण के लिए शब्दावली का विस्तार काफी हद तक आनुवांशिकता से जुड़ा है (और सामान्य बुद्धि के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है) हालांकि किसी भी व्यक्ति की शब्दावली का प्रत्येक शब्द सीखा हुआ होता है। 

किसी भी समाज में प्रत्येक के पर्यावरण से जु़ड़े कई शब्द उपलब्ध होते हैं, विशेष तौर पर उन व्यक्तियों के लिए जो उन्हें ग्रहण करने के लिए बाहर से प्रेरित हैं, लेकिन शब्दों को सीखने की संख्या उनके आनुवांशिक प्रवृत्तियों पर काफी हद तक निर्भर करती है।

एक सामान्य त्रुटि यह मानने में हो रही है कि कुछ आनुवांशिक आवश्यक तौर पर अपरिवर्तनीय है। जैसा कि पहले उल्लेख हुआ है आनुवंशिक विशेषताएं पैतृक गुण सीखने पर निर्भर करती हैं और वे अन्य पर्यावरणीय प्रभाव पर भी निर्भर करती हैं। 

"
आनुवांशिकता के महत्व को कम किया जा सकता है यदि जनसमुदाय के पर्यावरण आबंटन (या जीन में) में व्यापक तौर पर बदलाव किया जाये तो. 

उदाहरण के लिए, एक गरीबी भरे या दमनात्मक पर्यावरण में एक विशेषता का विकास विफल हो सकता है और व्यक्तिगत परिवर्तन सीमित हो जाता है।

आनुवांशिकता की भिन्नताओं में अंतर विकसित और विकासशील देशों के बीच पाए जाते हैं।
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 यह आनुवांशिकता के अनुमानों को प्रभावित करता है।  एक अन्य उदाहरण है Phenylketonuria (फेनील्यकेटोनुरिया),=
फेनिलएलनिन यह एक चयापचय का एक आनुवंशिक विकार है , जिसका इलाज न होने पर, विषाक्त चयापचय उत्पादों के संचय के माध्यम से शिशुओं में गंभीर मानसिक मंदता का कारण बनता है।।★

फेनिलकेटोनुरियस)

(दवा) एक चयापचय विकार जिसमें व्यक्तियों में लीवर एंजाइम फेनिलएलनिन हाइड्रॉक्सिलेज़ (पीएएच) की कमी होती है, जो अमीनो एसिड फेनिलएलनिन को मेटाबोलाइज़ करने के लिए आवश्यक होता है
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 जिन लोगों को यह आनुवांशिक विकार था वे पहले मानसिक विकलांगता का शिकार बने.
आज इसे संशोधित आहार लेकर रोका जा सकता है।


दूसरी ओर कई प्रभावी पर्यावरण परिवर्तन हैं जो आनुवांशिकता में बिल्कुल बदलाव नहीं लाते.

यदि पर्यावरण की विशेषता में सुधार को इस प्रकार विकसित किया जाये कि जनसमुदाय के सभी सदस्य उससे समान रूप से प्रभावित हों, जिसका मतलब यह है कि आनुवांशिक विशेषता का महत्व बिना किसी बदलाव के बढ़ जायेगा (क्योंकि जनसमुदाय के व्यक्तियों के बीच अन्तर वही रहेगा) यह प्रत्यक्ष तौर पर ऊंचाई के मामले में हुआ: कद का सम्बंध आनुवांशिकता से अधिक है लेकिन औसत ऊंचाई में वृद्धि जारी रहती है।


यहां तक कि विकसित देशों में भी एक समूह विशेष की उच्च आनुवांशिक विशेषता को समूहों में अन्तर के स्रोत के आवश्यक निहितार्थ के तौर पर नहीं अपनाया गया।







बचपन में संगीत-प्रशिक्षण भी IQ को बढ़ाने में सहायक होता है।
 हाल के अध्ययन से यह पता चला है कि किसी व्यक्ति की कार्यकारी स्मृति का उपयोग करने के प्रशिक्षण से भी उसके IQ में वृद्धि हो सकती है।

पारिवारिक पर्यावरण संपादित करें
विकसित दुनिया में कुछ अध्ययनों में व्यक्तित्व लक्षण बताते हैं कि उम्मीदों के विपरीत पर्यावरणीय प्रभाव वास्तव में उन पर पड़ता है जो उस परिवार से सम्बद्ध नहीं होते हुए भी उसी परिवार में पलते हैं (दत्तक भाई बहन) वे यदि दूसरे परिवार में पलते तो दूसरे परिवार के बच्चों की तरह होते.



बच्चों के IQ पर कुछ परिवार के प्रभाव होते हैं, जिसके लिए विचार-विभिन्नता की एक चौथाई की गुंजाइश रखी जानी चाहिए, बहरहाल, वयस्कता में दृष्टिकोण का यह पारस्परिक संबंध शून्य हो जाता है।

 IQ से जुड़े गोद लेने से सम्बंधित अध्ययन बताते हैं कि किशोरावस्था के बाद गोद लेने वाले भाई बहन का IQ अजनबी लोगों से नहीं मिलता जुलता है (IQ का पारस्परिक सम्बंध शून्य के पास), जबकि सभी भाई बहन में IQ का पारस्परिक सम्बंध 0.6 है।



(0.86) और वह अलग दिखने वाले (भाईयों) जुड़वां बच्चों के IQ के करीब था जिनका पालन पोषण साथ साथ हुआ था (0.6) यह गोद लिये बच्चों के IQ से काफी अधिक है (~0.0).[7]

पक्षपातपूर्ण पुराने अध्ययन? 
स्टूलमिलर (1999)
ने पाया कि पारिवारिक वातावरण में प्रतिबंध की जो सीमा होती है वह गोद लेने के मामले में भी वही रहती है जो गोद लेने वाले परिवारों में रहती है, उदाहरण के लिए तत्कालीन आम जनसमुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, जबकि पिछले अध्ययनों में साझा परिवार के माहौल की भूमिका को बहुत बढ़ाचढ़ा कर पेश किया गया था। 

गोद लेने में सुधार की सीमा के अध्ययन में सुधार से संकेत मिलते है क्योंकि सामाजिक-आर्थिक स्थिति IQ के परिवर्तन के लिए 50% तक जिम्मेदार होती है।
हालांकि, गोद लेने के मामले में IQ की सीमा पर प्रतिबंध के प्रभाव का अध्ययन मैट मैकग्यू और उनके सहयोगियों ने किया है, जिन्होंने लिखा है कि "माता-पिता की रोकटोक की मनोग्रंथि और परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की सीमा का गोद लिये बच्चे के आई क्यू (IQ) के पारस्परिक सम्बंध पर (में) असर नहीं डालते.ब॒

एरिक तुर्खेइमेर और उनके सहयोगियों ने (2003)गोद लेने का ही अध्ययन नहीं किया, बल्कि अमरीका के गरीब परिवारों को शामिल किया है।

 निष्कर्ष कहता है कि IQ के अनुपात का अन्तर जीन और पर्यावरण के सामाजिक-आर्थिक स्थिति में बदलाव के कारण आई अस्थिरता की वजह से बदलता रहता है।

 मॉडल का सुझाव है कि गरीब परिवारों में IQ में 60% का अन्तर होता है जिसके लिए साझा परिवार का वातावरण जिम्मेदार होता है और जीन का योगदान शून्य के करीब होता है, जबकि संपन्न परिवारों में परिणाम लगभग बिल्कुल विपरीचच७] उनका सुझाव है कि साझा पर्यावरणीय कारकों की भूमिका के अध्ययन को पिछले अध्ययनों में कम करके आंका गया है, जो अक्सर समृद्ध मध्य वर्ग के परिवारों का अध्ययन है

मातृक (भ्रूण सम्बंधी) पर्यावरण संपादित करें
डेवलिन और उनके सहयोगियों का एक मेटा-विश्लेषण नेचर (1997)के पृष्ठ 212 पर प्रकाशित है।


 इसमें पिछले अध्ययनों के पर्यावरणीय प्रभाव के लिए एक वैकल्पिक मॉडल का मूल्यांकन किया गया है और पाया गया है कि यह आंकड़ा आमतौर पर इस्तेमाल किये गये 'पारिवारिक-पर्यावरण' मॉडल से बेहतर है। साझा मातृक (भ्रूण सम्बंधी) पर्यावरण का प्रभाव, जिसे अक्सर नगण्य माना जाता है, जुड़वां बच्चों के सहप्रसारण के लिए 20% और भाई बहनों के बीच में 5% के लिए जिम्मेदार होता है और जीन का प्रभाव तदनुसार कम दो परिमाणों में कम हो जाता है और आनुवांशिकता का प्रभाव कम से कम 50% से कम हो जाता है।

बौचार्ड और मैकग्यू ने 2003 में लेख की समीक्षा करते हुए तर्क दिया है कि आनुवांशिकता के महत्व के बारे में डेवलिन का निष्कर्ष पिछली रिपोर्टों से काफी अलग नहीं है और उनका जन्म के पूर्व का निष्कर्ष पिछली रिपोर्टों का खंडन करता है।[25] वे लिखते हैं कि:

चिपुएर एट अल. और लोएहलिन का निष्कर्ष है कि प्रसव के बाद के बजाए जन्म के पूर्व का वातावरण सबसे महत्वपूर्ण है। डेवलिन एट अल. का निष्कर्ष है कि जन्म के पूर्व का वातावरण जुड़वां बच्चे के IQ में समानता में योगदान देता है, यह एक ऐसा उल्लेखनीय लेख है जो विशेष रूप से जन्म के पूर्व के प्रभाव के बारे में एक व्यापक प्रयोग को सिद्ध करता है। प्राइज (Price) (1950) में 50 साल से भी पहले प्रकाशित एक विस्तृत समीक्षा में तर्क दिया गया है कि लगभग सभी MZ जुड़वां बच्चों के जन्म के पूर्व का प्रभाव समानताएं पैदा करने के बजाय मतभेद पैदा करता है। चूंकि 1950 का इस विषय पर लेख काफी विस्तृत था इसलिए संपूर्ण ग्रंथ की पूरी सूची प्रकाशित नहीं की गयी। यह लेख अंततः 260 अतिरिक्त संदर्भों के साथ 1978 में प्रकाशित हुआ। उस समय प्राइज ने पहले के निष्कर्ष को दोहराया था।

 1978 की समीक्षा पिछला शोध ही है जो मुख्यतः प्राइज (Price) की परिकल्पना को पुष्ट करता है।

डिकेंस और फ्लीन मॉडल -

डिकेंस और फ्लीन की मान्यता है कि साझा परिवार के पर्यावरण की अनुपस्थिति के तर्क को समय में बंटे समूहों पर भी समान रूप से लागू करना चाहिए। इसका फ्लीन इफेक्ट ने खण्डन किया है। यहां परिवर्तन इतनी जल्दी हुआ है कि उसे आनुवांशिक पैतृक अनुकूलन से समझाया गया है। इस विडंबना की व्याख्या आनुवांशिकता के लिए अपनाये जाने वाले मानकों के आधार पर की जा सकती है, इसमें जहां IQ पर जीनोटाइप का प्रत्यक्ष प्रभाव शामिल है, वहीं अप्रत्यक्ष प्रभाव भी शामिल है, जिसमें जीनोटाइप पर्यावरण परिवर्तन से IQ को प्रभावित करता है। 

इस प्रकार जिनके पास उच्च IQ है वे बाहर उत्तेजक वातावरण की तलाश करते हैं जिससे फिर उनका IQ बढ़ता है।

 प्रत्यक्ष प्रभाव आरम्भ में बहुत कम होता है लेकिन प्रतिक्रिया के परिणाम IQ में व्यापक अन्तर पैदा करते हैं।

 अपने मॉडल में एक पर्यावरण उत्तेजना IQ पर एक बहुत बड़ा प्रभाव डालता है। यह वयस्कों में भी हो सकता है, लेकिन उत्तेजना जारी न रहे तो यह प्रभाव पर क्षीण भी हो सकता है (मॉडल को संभवित कारकों को शामिल करने के लिए अपनाया जा सकता है, उदाहरण के लिए बचपन में पोषण, जिसका प्रभाव स्थायी होता है). फ्लीन इफेक्ट के प्रभाव को आम तौर पर सभी के लिए अधिक उत्तेजक पर्यावरण से समझाया जा सकता है।

 लेखकों का सुझाव है कि IQ वृद्धि के लक्ष्य वाले कार्यक्रमों को लम्बे समय तक IQ अर्जित करने वाले कार्यक्रम के तौर पर प्रस्तुत किया जाये और बच्चों को यह सिखाया जाये कि वे कार्यक्रम के बाहर ज्ञान-संबंधी अनुभव की नकल करें जिससे उनके IQ का निर्माण होगा, जब वे कार्यक्रम में रहें उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया जाये कि कार्यक्रम छोड़ने के बाद भी वे लम्बे समय तक नकल जारी रखे

IQ और मस्तिष्क
 
मुख्य लेख: Neuroscience and intelligence
2004 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया, इर्विने (Irvine) के डिपार्टमेन्ट ऑफ़ पेड्रियाटिक्स एंड कालेजेस के मनोविज्ञान के प्रोफेसर रिचर्ड हैएर और यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू मैक्सिको ने मस्तिष्क की संरचनात्मक छवियों को प्राप्त करने के लिए MRI का उपयोग 47 सामान्य वयस्कों पर किया और उनके मानक IQ परीक्षण भी किये।

 अध्ययन से साबित हुआ कि ऐसा प्रतीत होता है कि सामान्य मानव बुद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि दिमाग में ग्रे मैटर (भूरे पदार्थ) ऊतकों की मात्रा कितनी है और उसका स्थान कहां है और यह भी साबित हुआ कि ऐसा लगता है कि दिमाग के ग्रे मैटर में से केवल 6 प्रतिशत का सम्बंध ही IQ से होता है।

सूचनाओं के विभिन्न स्रोत एक ही बिन्दु की ओर इशारा करते हैं कि ललाट अंश तरल बौद्धिकता के लिए महत्वपूर्ण हैं। परीक्षण में पाया गया है कि ललाट अंश के क्षतिग्रस होने से तरल बौद्धिकता विकृत हो जाती है। 

(डंकन एट अल. 1995.) ललाट के ग्रे की मात्रा (थाम्पसन एट अल. 2001) और सफेद पदार्थ (स्चोएनेमान्न एट अल. 2005) भी सामान्य बुद्धि के साथ जुड़े रहे हैं। इसके अलावा हाल ही के तन्त्रिकाओं की तस्वीर के अध्ययन ने पार्श्व ललाट के वल्कल की संगति को सीमित कर दिया है। डंकन और उनके सहयोगियों ने (2000) पोजीट्रान एमिशन टोमोग्राफी का प्रयोग करके बताया है कि समस्या को सुलझाने के कार्यों का बहुत गहरा पारस्परिक सम्बंध IQ से होता है और वह पार्श्व ललाट वल्कल को भी सक्रिय करता है। हाल ही में ग्रे और उनके सहयोगियों ने (2003) कार्यात्मक चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (fMRI) का इस्तेमाल कर यह दर्शाया कि वह व्यक्ति जो किसी एक काम में अधिक दक्ष हो, विरोध करने पर व्याकुल हो जाता है, उसकी कार्य स्मृति की आवश्यकतानुसार उसका उच्चतर IQ और पार्श्व ललाट की गतिविधि बढ़ जाती है। इस विषय की व्यापक समीक्षा के लिए देखें ग्रे और थाम्पसन (2004)

एक अध्ययन में 307 बच्चों (आयु छह से उन्नीस साल) की मस्तिष्क संरचना का आकार चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग का उपयोग (MRI) को मापने और उनकी मौखिक और गैर-मौखिक क्षमता के आकलन के लिए किया गया।
 (शॉ एट अल.2006).अध्ययन में इस बात के संकेत मिले हैं कि IQ और वल्कल की संरचना के बीच एक रिश्ता होता है-चारित्रिक विशेषता में बदलाव समूह में उन्नत IQ के अंकों के आधार पर होता है, जो कम उम्र में पतली वल्कल से शुरू होता है और बाद में किशोर वय में औसत से मोटा हो जाता है।

2006 में एक डच परिवार के अध्ययन के अनुसार CHRM2 जीन और बुद्धि के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण सम्बद्धता है। इस अध्ययन से निष्कर्ष निकलता है कि CHRM2 जीन के क्रोमोजोम 7 और प्रदर्शन IQ के बीच एक साहचर्य है, जिसकी माप वेच्स्लेर एडल्ट इंटेलिजेंस स्केल-संशोधित से की गयी है। 

डच परिवार के अध्ययन में 304 परिवारों के 667 व्यक्तियों के उदाहरण का इस्तेमाल किया गया था।

 ऐसी ही सम्बद्धता स्वतंत्र रूप से मिनेसोटा जुड़वां और परिवारिक अध्ययन (कमिंग्स एट अल.2003) और वाशिंगटन विश्वविद्यालय के मनश्चिकित्सा विभाग द्वारा किये गये अध्ययन में पायी गयी।

महत्वपूर्ण चोटें मस्तिष्क के एक भाग को पृथक कर देती हैं, विशेष रूप से जो कम उम्र में लगती हैं, हालांकि वे IQ को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर सकतीं हैं।

अध्ययन में विवादास्पद विचारों के सम्बंध में परस्पर विरोधी निष्कर्ष निकले हैं कि मस्तिष्क के आकार का पारस्परिक सकारात्मक सम्बंध IQ के साथ है। जेनसेन और रीड ने दावा किया है कि गैर-रोगविज्ञान विषयों में कोई सीधा पारस्परिक संबंध नहीं होता.

 हाल ही में हुए एक और मेटा-विश्लेषण की राय इससे भिन्न है।

तंत्रिका नमनीयता और बुद्धि के अन्तर के सम्बंध को समझने के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, और इस दृष्टिकोण को हाल ही में कुछ प्रयोगसिद्ध समर्थन मिले हैं।

IQ के रुझान -
मुख्य लेख: Flynn effect
बीसवीं सदी के बाद से IQ अंकों में प्रति दशक लगभग तीन IQ अंकों की औसत दर से दुनिया के अधिकांश भागों में वृद्धि हुई है।

 इस प्रक्रिया को फ्लाइन इफेक्ट (उर्फ "लिन-फ्लाइन इफेक्ट") का नाम रिचर्ड लिन और जेम्स आर.फ्लाइन के नाम पर दिया गया है। सुधार की व्याख्याओं में पोषण, छोटे परिवारों का चलन, बेहतर शिक्षा, अधिक पर्यावरण जटिलता और भिन्नाश्रय शामिल है।

 कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि आधुनिक शिक्षा के कारण IQ की दिशा में अधिक सुधार हुआ है इसलिए उसे उच्च अंक मिले हैं लेकिन जरूरी नहीं है कि बुद्धिमत्ता आवश्यक तौर पर बढ़ी हो। 

परिणामस्वरूप, परीक्षण में नियमित रूप से औसत 100 अंक प्राप्त करने के लिए पुनः सामान्यीकृत किया जाता है, उदाहरण के लिए WISC-R (1974), WISC-III (1991) और WISC-IV (2003). यह समायोजन विशेष समय के परिवर्तन से सम्बंधित है, जिसमें अंकों की तुलना लम्बवत की जाती है।

कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि फ्लाइन (Flynn) इफेक्ट कुछ विकसित देशों, यूनाइटेड किंगडम में 1980 के दशक के शुरू में और मध्य डेनमार्क तथा नॉर्वे में 1990 के दशक में संभवतः खत्म हो गया था।

परिवर्तनशीलता -
हालांकि आम तौर पर अडिग विश्वास किया जाता है और हाल के अनुसंधान से भी पता है कि कुछ मानसिक गतिविधियां दिमाग की सूचना प्रक्रिया की क्षमता को बदल सकती हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि समय के साथ बौद्धिकता में तब्दीली लायी जा सकती है या उसे बदला जा सकता है। 

मस्तिष्क को अब अच्छी तरह से एक तंत्रिकाजाल के तौर पर समझ लिया गया है और इसलिए कई बार ज्यादा आज्ञाकारी बनाने के लिए बदलाव के बारे में सोचा जाता है।


 पशुओं के तंत्रिका विज्ञान के अध्ययन से संकेत मिलता है कि चुनौतीपूर्ण गतिविधियां मस्तिष्क के जीन की अभिव्यक्ति के स्वरूप में बदलाव ला सकती हैं।

 (सांचे के लिए डेगूस के प्रशिक्षणऔर इरिकी के मकाक बंदरों पर किये गये पूर्ववर्ती शोध में मस्तिष्क में परिवर्तन के संकेत मिले हैं।)

यूनिवर्सिटीज ऑफ़ मिशिगन की एक टीम और बर्न के समर्थकों द्वारा युवा वयस्कों पर अप्रैल 2008 में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि विशेष रूप से रूप-रेखा के अनुसार स्मृति प्रशिक्षण कार्य में बौद्धिक तरल पदार्थ के हस्तांतरण की संभावना रहती है।

इसके अलावा अनुसंधान के लिए प्रकृति, प्रस्तावित स्थानान्तरण की सीमा और अवधि के निर्धारण की आवश्यकता होगी.

अन्य प्रश्नों में, यह देखना रह जाता है कि क्या बौद्धिकता के तरल पदार्थ के अन्य परीक्षणों के परिणाम भी मैट्रिक्स परीक्षण के अध्ययन के परिणाम जैसे विस्तृत हैं और यदि हां तो प्रशिक्षण के बाद बौद्धिकता के तरल पदार्थ के मानक शैक्षणिक और व्यावसायिक उपलब्धियों के साथ अपना पारस्परिक संबंध बनाए रखते हैं अथवा बौद्धिकता के तरल पदार्थ के गुण संभावित सक्रियता या अन्य कार्यों में परिवर्तन में भूमिका निभाते हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि प्रशिक्षण के समय की अवधि का विस्तार टिकाऊ है अथवा नहीं.

तरल बौद्धिक पदार्थ और सघन बौद्धिक की शीर्ष क्षमता 26 वर्ष होती है। जिसमें बाद में धीमी गति से गिरावट आती है।

सामूहिक मतभेद ★
बुद्धिमत्ता के अध्ययन के जुड़े सबसे विवादास्पद मुद्दों में वह अवलोकन है जिससे बुद्धि को मापा जाता है जैसे IQ अंक, जो जनसमुदाय में अलग-अलग होता है। हालांकि इन मतभेदों में से कुछ के अस्तित्व के बारे में कुछ विद्वानों में बहस चल रही है और कारणों को लेकर शिक्षाविदों और सार्वजनिक क्षेत्र में अत्यधिक विवाद है।

स्वास्थ्य ★
मुख्य लेख: Health and intelligence
एक उच्च IQ वाला व्यक्ति आम तौर पर ऐसा व्यक्ति है जो कम वयस्क रुग्णता का शिकार है और जिसकी मृत्यु दर अधिक है। जो ज़ख्म-संबंधी तनाव के बाद के विकार,[47]

और एक प्रकार के पागलपन[48][49] से ग्रस्त और उच्च IQ समूह में कम प्रबल है। किसी व्यक्ति में किसी बड़े अवसादग्रस्तता वाले प्रकरण के मध्य में उस व्यक्ति की तुलना में निम्न IQ दिखायी देता है जो बगैर कम संज्ञानात्मक क्षमता के लक्षण व बिना अवसाद वाले बराबर की मौखिक बौद्धिकता के व्यक्ति हैं।[50][51]

स्कॉटलैंड में 11,282 व्यक्तियों के एक अध्ययन में जो, 1950 और 1960 के दशक में 7, 9 और 11 वर्ष की उम्र के बच्चों की बुद्धि परीक्षण पर आधारित है, में पाया गया कि बचपन के IQ अंक और अस्पताल में दाखिल किये गये चोटिल वयस्कों के IQ अंकों के बीच 'उलटी रैखिक संगति' है। बचपन के IQ और चोट के ठीक होने के बाद भी खतरे के बने रहने के कारकों के बीच वही सम्बंध है, जो बच्चे में सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण बने रहते हैं।[52] स्कॉटलैंड के अनुसंधान में यह भी दर्शाया गया है कि 15 अंक कम IQ वाले 76 लोगों के जीने की संभावना का पांचवां हिस्सा कम था, जबकि 30 अंक कम पाने वालों की संख्या उच्च IQ वालों से 37% कम थी, जिनका उतनी अवधि तक जीने का अवसर था।[53]

IQ में कमी अल्जाइमर रोग की शुरुआत को दर्शाता है, जिसमें आगे चलकर डेमेंटिया (जड़बुद्धिता या मनोभ्रंश) और इस बीमारी के दूसरे रूप सामने आते हैं। 2004 के एक अध्ययन में सर्विल्ला (Cervilla) और उनके सहयोगियों ने दर्शाया कि संज्ञानात्मक क्षमता के परीक्षण ने ऐसी जानकारियां उपलब्ध करायी हैं जिससे मनोभ्रंश के हमले के एक दशक से भी पहले उसकी भविष्यवाणी की जा सकती है।[54] बहरहाल, उच्च स्तर की संज्ञानात्मक क्षमता वाले व्यक्तियों के रोग निर्णय का एक अध्ययन 120 या उससे अधिक लोगों के IQ पर किया गया।[55] मरीजों के रोग का निर्णय आदर्श मानक के अनुसार नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उसे एक उच्च IQ मानक से समायोजित करना चाहिए, जो किसी व्यक्ति की उच्च क्षमता के स्तर के विरुद्ध बदलाव को माप सके.सन् 2000 में व्हाल्ले (Whalley) और उनके सहयोगियों का न्यूरोलॉजी पत्रिका में एक आलेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने बचपन की मानसिक क्षमता और बाद में शुरू होने वाले मनोभ्रंश के बीच संबंध की पड़ताल की है। अध्ययन से पता चला कि अन्य बच्चों की तुलना में उन बच्चों का मानसिक क्षमता अंक उल्लेखनीय रूप से कम है जो अंततः बाद में शुरू होने वाले मनोभ्रंश के शिकार हुए.[56]

संज्ञानात्मकता को क्षति करने के कई महत्वपूर्ण कारक हो सकते हैं, खासकर यदि वह गर्भावस्था और बचपन के दौरान हुई हो, जब मस्तिष्क का विकास हो रहा होता है और रक्त-मस्तिष्क बाधा कम प्रभावी होती है। इस तरह की परेशानी कई बार स्थायी हो सकती है या बाद में विकास के साथ कई बार आंशिक या पूरी तरह उसकी भरपाई हो सकती है। कई हानिकारक तत्व भी जुड़ सकते हैं जिससे अधिक परेशानी की आशंका रहती है।

विकसित देशों ने कई स्वास्थ्य नीतियों को कार्यान्वित किया है ताकि उन पोषक तत्वों और विषाक्त पदार्थों के बारे में पता लगाया जा सके जो संज्ञानात्मक क्रिया को प्रभावित करते हैं। इनमें कुछ हैं खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए आवश्यक कानून की पकड़ को मजबूत करना, प्रदूषकों के सुरक्षित स्तर की स्थापना के लिए कानून, (जैसे सीसा, पारा और आर्गनोक्लोराइड्स).बच्चों की संज्ञानात्मक क्षति में कमी लाने के लिए व्यापक नीति की सिफारिश का प्रस्ताव किया गया है।[57]

किसी के स्वास्थ्य पर बौद्धिकता के प्रभाव के सम्बंध में एक ब्रिटिश अध्ययन मे पाया गया है कि बचपन के उच्च IQ का पारस्परिक सम्बंध वयस्क होने के बाद उसके शाकाहारी हो जाने से है। [58] एक अन्य ब्रिटिश अध्ययन में कहा गया है कि बचपन में उच्च IQ का पारस्परिक उल्टा सम्बंध धूम्रपान की संभावना से है।[59]

लिंग -
मुख्य लेख: Sex and intelligence
पुरुषों और महिलाओं की विशेष योग्यता के परीक्षण में सांख्यिकीय औसत अंकों में काफी अंतर पाया गया है।[60][61] अध्ययनों में इस बात की भी व्याख्या की गयी है कि औरतों की तुलना में पुरुषों के प्रदर्शन में लगातार काफी अन्तर आता है (उदाहरण के लिए, पुरुष के अंक का विस्तार पूरे स्पेक्ट्रम (वर्णक्रम) की सीमाओं में बिखरा हुआ है)[62]

लिंग भेद का IQ जांच के इन मामलों में काफी महत्व है लेकिन इनमें लिंग के आधार का औसत नहीं निकाला गया है हालांकि लगातार अन्तर को नहीं हटाया गया है। क्योंकि परीक्षण परिभाषित करते हैं कि कोई औसत अन्तर नहीं है और इस सम्बंध में एक वक्तव्य में कहा गया है कि किसी एक लिंग के व्यक्ति में दूसरे लिंग के व्यक्ति से अधिक बुद्धि होने की बात अर्थहीन है। हालांकि कुछ लोगों ने इस तरह का दावा किया है और इस सम्बंध में आधारहीन IQ परीक्षण भी किये गए हैं। उदाहरण के लिए मेडिकल छात्रों ने परीक्षण के आधार पर दावा किया है कि महिलाओं के मुकाबले पुरूष तीन से चार IQ अंक आगे निकल गये हालांकि IQ के नतीजों में इससे ज्यादा के अन्तर की उम्मीद की जा सकती है,[63] या फिर जहां विभिन्न परिपक्वता उम्र के लिए 'सुधार' किया गया हो। [64]

नस्ल 
मुख्य लेख: Race and intelligence
1996 में बौद्धिकता को लेकर गठित व अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन द्वारा प्रायोजित टास्क फोर्स की जांच का निष्कर्ष निकाला गया है कि नस्लों में IQ के मामले में काफी भिन्नताएं हैं।[9] इस बदलाव के पीछे के कारणों के निर्धारण की समस्या IQ में "प्रकृति और पोषण" के योगदान के प्रश्न से सम्बंधित है। ज्यादातर वैज्ञानिकों का मानना है कि आनुवंशिकता और पर्यावरण के योगदान के विश्लेषण के लिए तथ्य अपर्याप्त हैं। वंशानुगत आधार को मजबूत मानने वाले उल्लेखनीय शोधकर्ताओं में सबसे प्रमुख आर्थर जेन्सेन हैं। इसके विपरीत मिशिगन विश्वविद्यालय के लम्बे अरसे तक निदेशक रहे रिचर्ड निस्बेट का तर्क है कि बुद्धिमत्ता पर्यावरण से जुड़ा हुआ मामला है और उसका आधार वे मानक हैं, जो अन्य की तुलना में कुछ निश्चित प्रकार की "बुद्धिमत्ता" (मानकीकृत परीक्षणों पर सफलता) के पक्षधर हैं।

हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक संपादकीय, जिसका शीर्षक "All Brains Are the Same Color"(सभी दिमागों का एक ही रंग) है, में डॉ॰निस्बेट ने इस कल्पना के खिलाफ दलील दी है कि अश्वेतों और गोरों के बीच IQ में अन्तर का कारण आनुवांशिक है। उन्होंने इस बात पर गौर किया कि दशकों से अनुसंधान ने इस दावे का दृढ़ता के साथ समर्थन नहीं किया कि संयुक्त राज्य अमरीका की एक नस्ल सहज बुद्धि के संदर्भ में जैविक रूप से कमतर है। इसके विपरीत, वे तर्क देते हैं, "गोरे अपनी बातें बेहद समझदारी के साथ रखते हैं, समानताओं की बेहतर पहचान की क्षमता रखते हैं और बेहतर उपमाओं की दक्षता वाले हैं, जब शाब्दिक ज्ञान और अवधारणाओं के समाधान की आवश्यकता होती है तो अश्वेतों की तुलना में गोरों को इसके लिए उपयुक्त माने जाने की संभावना रहती है। (एक उदाहरण एक शब्द का प्रयोग सादृश्य है "boat (नाव) के बजाय yacht (नौका)", लेकिन जब इस तर्क से शब्दों और विचारों का परीक्षण अश्वेतों और गोरों पर समान रूप से किया गया तो पाया गया कि दोनों ही इसमें समान रूप से अच्छे हैं और ज्ञात हुआ कि दोनों में कोई अन्तर नहीं है। हरेक नस्ल में, पूर्व ज्ञान से भविष्यवाणी की जानकारी और उसका तर्क होता है, लेकिन नस्लों के बीच अन्तर केवल पूर्व ज्ञान का ही होता है।

IQ के साथ सकारात्मक पारस्परिक सम्बंध संपादित करें
जहां IQ को कई बार स्वयं उसके ही अन्त के रूप में देखा जाता है, विद्वानों का IQ पर किया गया कार्य काफी हद तक IQ की वैधता पर केंद्रित है, IQ का पारस्परिक सम्बंध उस परिणाम से है जो नौकरी के निष्पादन, सामाजिक विकृतियों या शैक्षणिक उपलब्धि में दिखायी देता है।

विभिन्न IQ परीक्षणों में विभिन्न परिणामों को लेकर अपनी वैधताएं हैं। परंपरागत रूप से IQ और उसके परिणामों के पारस्परिक सम्बंध को भविष्यवाणी के साधन के रूप में देखा जाता है लेकिन पाठकों को ठोस विज्ञानों और सामाजिक विज्ञानों की भविष्यवाणियों में अन्तर को समझना चाहिए।

अन्य परीक्षण संपादित करें
एक अध्ययन में पाया गया है कि g (जनरल इंटेलिजेंस फैक्टर) और SAT का पारस्परिक संबंध .82 अंक[65] का है जबकि दूसरे में पाया गया कि g और GCSE के बीच पारस्परिक सबंध के अंक.81 हैं।

डेअरी और उनके सहयोगियों के अनुसार IQ (सामान्य संज्ञानात्मक क्षमता) और उपलब्धि परीक्षण का पारस्परिक सम्बंध अंक .81 है, सामान्य संज्ञानात्मक क्षमता में अन्तर का प्रतिशत "गणित में 58.6%, अंग्रेजी में 48% और कला तथा डिजाइन में 18.1% है".[67]

नौकरी में प्रदर्शन 
श्मिट (Schmidt) और हंटर (Hunter) के अनुसार बिना पूर्व अनुभव वाले कर्मचारी को नौकरी पर रखना सबसे अधिक मान्य भविष्य अनुमान है, जो भावी प्रदर्शन के अनुमान की एक सामान्य मानसिक योग्यता है।

नौकरी में काम के प्रदर्शन के सम्बंध में भावी अनुमान में IQ की वैधता सभी अध्ययनों में शून्य से ऊपर पायी गयी है, किन्तु विभिन्न अध्ययनों में उसमें काम के प्रकार को लेकर अन्तर पाया गया है, जिसकी सीमा 0.2 से 0.6 अंक के बीच है।
 जहां IQ का पारस्परिक सम्बंध विचार से बहुत मजबूत है वहीं मोटर गाड़ी चलाने के कार्य से बहुत कम है[70] जबकि IQ-परीक्षण अंक सभी पेशों में कामकाज की भविष्यवाणी के लिए है।
उनका कहना है कि उच्च शिक्षित गतिविधियों (अनुसंधान, प्रबंधन) में IQ अंक पर्याप्त प्रदर्शन के लिए बाधक हैं, जबकि न्यूनतम कुशलता की गतिविधियों जैसे एथलेटिक शक्ति (हाथों की ताकत, गति, सहनशक्ति और समन्वय) में और बेहतर प्रदर्शन की संभावना रहती है।[68]

IQ और कार्य प्रदर्शन के बीच कारण सम्बंधी दिशा निर्धारित करने के लिए वाटकिंस एवं अन्य लोगों द्वारा किये गये लम्बवत अध्ययन में यह सुझाया गया है कि, हालांकि IQ भविष्य की शैक्षणिक उपलब्धि को प्रभावित करने वाला कारण होता है लेकिन शैक्षणिक उपलब्धि भविष्य के IQ अंकों पर अधिक प्रभाव नहीं डालती तरीना
 एइलीन रोहडे (Treena Eileen Rohde) और ली ऐनी थामसन (Lee Anne Thompson) लिखते हैं कि सामान्य संज्ञानात्मक क्षमता नहीं बल्कि विशिष्ट क्षमता अंक अकादमिक उपलब्धि की संभावना तय करते हैं, इस अपवाद के साथ कि प्रसंस्करण गति और स्थानिक क्षमता से सामान्य संज्ञानात्मक क्षमता के प्रभाव से परे SAT गणित पर प्रदर्शन का अनुमान लगाया जा सकता है।

'अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन' की रिपोर्ट इंटेलिजेंस : 

नोंस एंड अननोंस में कहा गया है कि अन्य वैयक्तिक चारित्रिक विशेषताएं जैसे पारस्परिक कौशल, व्यक्तित्व पहलू आदि संभवतः बराबर या अधिक महत्व के होते हैं, लेकिन उनका आकलन करने के लिए इस समय हमारे पास उसके बराबर विश्वासयोग्य उपकरण नहीं हैं।

हालांकि, अभी हाल ही में, अन्य लोगों का तर्क है कि ज्यादातर व्यावसायिक कार्य मानकीकृत या स्वचालित हैं और IQ रैंक एक स्थिर माप है जिसका समय के साथ दृढ़ पारस्परिक सम्बंध है जो लोगों के कई सकारात्मक व्यक्तिगत गुण के साथ जुड़ा हुआ है। यह सबसे अच्छा उपकरण सबसे अच्छा काम पाने का निर्धारण करता है और कैरियर में किसी भी स्तर पर नौकरी पाने में मददगार है, अनुभव की स्वतंत्रता, व्यक्तित्व पूर्वाग्रह या किसी औपचारिक प्रशिक्षण से यह कोई भी प्राप्त कर सकता है।
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कुछ शोधकर्ताओं का दावा है "आर्थिक दृष्टि से यह प्रतीत होता है कि IQ अंक के पैमाने का सीमांत मूल्य कुछ कम हो रहा है। 

इसका पर्याप्त होना काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन यह इतना और इतना अधिक है कि आप उसे खरीद नहीं सकते."

अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि क्षमता और रोजगार के लिए प्रदर्शन के बीच सीधा संबंध है, ऐसा सभी IQ स्तरों पर होता है, IQ स्तर में वृद्धि सहायक होती है जो प्रदर्शन को बढ़ाती है।[75]द बेल कर्व के सह-लेखक चार्ल्स मर्रे (Charles Murray) ने पाया कि IQ पर पारिवारिक पृष्ठभूमि की आय का स्वतंत्र रूप से काफी प्रभाव पड़ता है

उपर्युक्त दो सिद्धांतों पर एक साथ बात करें तो बहुत उच्च IQ का काम के प्रदर्शन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है, लेकिन थोड़े अधिक IQ से आय अधिक नहीं होती (और कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि बहुत अधिक IQ वालों को कुछ कम IQ वालों की अपेक्षा कम आय होती है।
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'द अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन' की रिपोर्ट इंटेलिजेंस : 
नोंस एंड अननोंस में कहा गया है कि IQ अंक में एक चौथाई योगदान सामाजिक स्थिति के अन्तर और एक-छठा हिस्सा आय के अन्तर का होता है।

 पैतृक के सांख्यिकी नियंत्रण SES ने भविष्यफल बताने वाली इस शक्ति की दिशा को खत्म कर दिया। मनोमितीय बुद्धिमानी सामाजिक परिणामों पर प्रभाव डालने वाले कई बड़े कारकों में से केवल एक कारक दिखायी देता है।

कुछ अध्ययनों का दावा है कि IQ का आय के अन्तर में केवल छठवें हिस्से के बराबर योगदान होता है उसका कारण केवल यह है कि ज्यादातर अध्ययन युवा वयस्कों पर आधारित हैं।

 (जिनमें से कई अपनी शिक्षा अभी पूरी भी नहीं कर पाये थे). द g फैक्टर के पृष्ठ 568 पर आर्थर जेनेसेन ने दावा किया है कि यद्यपि IQ और आय के पारस्परिक सम्बंध का औसत 0.4 तक सीमित है, मध्यम (छठा हिस्सा या 16% का अन्तर), संबंध उम्र के साथ बढ़ता है और बीच की उम्र में शिखर तक पहुंचता है, जब लोग अपने कैरियर की अधिकतम क्षमता तक पहुंच चुके होते हैं। अ कोश्चन ऑफ़ इंटेलिजेंस पुस्तक में डैनियल सेलिग्मन ने हवाला देते हुए IQ आय का परस्पर सम्बंध 0.5 (25% का अन्तर) बताया है।

2002 में किये गये एक अध्ययन
 में गैर-IQ कारकों के आय पर प्रभाव के कारणों की जांच की गयी और निष्कर्ष निकाला कि किसी को खानदान की विरासत से मिले धन, नस्ल और शिक्षा, आय का निर्धारण करने में IQ से अधिक महत्वपूर्ण कारक हैं। उदाहरण के लिए 2004 के अफ्रीकी अमरीकी श्रमिक की मध्य औसत अमरीकी अल्पसंख्यक समूह में एशियाई अमरीकियोंके बाद सर्वाधिक थी और अल्पसंख्यक समूहों के बीच सिर्फ एशियाई अमरीकी ही अधिकतर सफेदपोश (ह्वाइट-कॉलर) पेशों से सम्बद्ध थे (प्रबंधन और सम्बंधित क्षेत्रों में) हालांकि अफ्रीकी और एशियाई अमरीकियों के बीच IQ में उल्लेखनीय अन्तर है।

IQ के साथ अन्य पारस्परिक सम्बंध संपादित करें
इसके अतिरिक्त, IQ और उसके पारस्परिक सम्बंध स्वास्थ्य, हिंसक अपराध, देश का सकल उत्पाद और सरकार की प्रभावकारिता ऐसे विषय हैं जो इंटेलिजेंस में 2006 में प्रकाशित एक आलेख के विषय हैं। इस आलेख ने संघीय सरकार की शैक्षिक प्रगति के राष्ट्रीय मूल्यांकन के गणित और पाठ परीक्षण के अंकों को स्रोत के रूप में अपनाकर अमरीकी देश के IQ के औसत को नीचे ला दिया। 

उसमें बाल अपराधों की बड़ी संख्या वाली एक डेनिश उदाहरण के IQ पारस्परिक सम्बंध का उल्लेख है, जो -0.19 अंक है और सामाजिक वर्ग नियंत्रण में पारस्परिक सम्बंध गिरकर-0.17 अंक हो जाता है।
 इसी प्रकार, पारस्परिक समंबध का सबसे "नकारात्मक परिणाम" आम तौर पर 0.20 अंक से कम का अन्तर है, जिसका मतलब है कि परीक्षण अंक अपने कुल अन्तर से 4%से भी कम अंक से जुड़े हुए हैं। यह जान लेना ज़रूरी है कि मनोमितीय क्षमता और सामाजिक परिणामों के बीच परोक्ष सम्बंध हो सकते हैं। खराब शैक्षिक प्रदर्शन के कारण बच्चे अलग-थलग महसूस कर सकते हैं। नतीजतन, उनके अन्य बच्चों की तुलना में अपराधी व्यवहार में संलग्न होने की संभावना अधिक हो सकती है।[9]

IQ का कुछ रोगों के साथ पारस्परिक नकारात्मक सम्बन्ध भी है।

तम्ब्स एट अल .[83] (Tambs et al.) ने पाया है कि व्यावसायिक स्थिति, शिक्षा प्राप्ति और IQ व्यक्तिगत आनुवांशिक गुण हैं और आगे पाया कि "आनुवंशिक अन्तर शैक्षणिक योग्यता... प्राप्ति को प्रभावित करता है और व्यावसायिक स्थिति में उसका योगदान लगभग आनुवांशिक अन्तर का एक चौथायी होता है।

 अमरीकी भाई बहन का एक उदाहरण देकर रोवे एट अल.(Rowe et al) की रिपोर्ट कहती है कि शिक्षा और आय में असमानता के मुख्य कारक जींस और साझा पर्यावरण हैं, जिन्होंने सहायक की भूमिका निभायी.
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सार्वजनिक नीति -
मुख्य लेख: Intelligence and public policy
संयुक्त राज्य अमरीका में कुछ सरकारी नीतियों और सैन्य सेवाओं से सम्बंधित कानून, शिक्षा, सार्वजनिक लाभ, अपराधऔर रोजगार जिसमें किसी व्यक्ति का IQ शामिल हो अथवा उसके निर्धारण में समान मान दंड अपनाये गये हों.हालांकि 1971 में रोजगार में नस्लीय अल्पसंख्यकों के प्रति पृथकतावादी रवैये को न्यूनतम करने के उद्देश्य से अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने कुछेक विरल मामलों को छोड़कर रोजगार में IQ परीक्षा के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया.[89] अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ सरकारी नीतियां लागू की गयीं, जैसे पोषण में सुधार लाने और न्यूरोटाक्सिन (नसों में नशे का इंजेक्शन लेना) पर रोक लगाकर बौद्धिकता को बढ़ावा दिया गया या उसमें गिरावट रोकने का लक्ष्य रखा गया।

आलोचना और विचार
उच्च IQ समाज 
मुख्य लेख: High IQ society
मेनसा एक सामाजिक संगठन है और कई देशों में हार्ड कॉपी का प्रकाशक है। 

वह उन लोगों की सदस्यता निर्धारित करता है जिन्होंने IQ बेल कर्व के परीक्षण में उच्च अंक लेकर 98वां प्रतिशतक अर्जित करने की मान्यता प्राप्त की है। (उदाहरण के लिए मेनसा इंटरनेशनल के साथ ही साथ कई अन्य विशिष्ट समूहों का दावा 98 वें परसेंटाइल से अधिक का है)

पॉप संस्कृति का उपयोग -
कई वेबसाइटें और पत्रिकाएं IQ शब्द का उपयोग तकनीकी या लोकप्रिय ज्ञान के कई विषयों के सदंर्भ में करती हैं जिसका सम्बंध बुद्धिमत्ता से नहीं होता, जिनमें सेक्स, ताश के पत्तों का खेल  और अमरीकी फुटबॉल अन्य विस्तृत विविधता के विषयों में शामिल है।

 ये परीक्षण आमतौर पर मानकीकृत नहीं हैं और बुद्धिमत्ता की सामान्य परिभाषा में फिट नहीं बैठते हैं।वेच्स्लेर वयस्क बुद्धिमत्ता स्केल, वेच्स्लेर बाल बुद्धिमत्ता स्केल फॉर चिल्ड्रेन, स्टैनफोर्ड बिनेट, संज्ञानात्मक क्षमताओं के लिए वुडकॉक-जॉनसन III
 टेस्ट अथवा कॉफमन एसेसमेंट बैटरी फॉर चिल्ड्रेन-II उन कुछ बुद्धिमत्ता परीक्षणों में से एक हैं जिन्होंने इस दिशा में न सिर्फ बेहतर कार्य किया है बल्कि आदर्श स्थापित किया है, संभवतः हजारों कथित "IQ टेस्ट" इंटरनेट पर पाए जाते हैं, लेकिन उन परीक्षणों में भी उन्हीं गुणकों (जैसे तरल और सघन बुद्धिमत्ता, कार्य स्मृति और पसंद) का सहारा लिया जाता है जो पूर्व में किये गये बुद्धिमत्ता परीक्षणों में शुद्ध विश्लेषण को प्रस्तुत करने वाले गुणक विश्लेषक माने जाते थे। सैकड़ों ऑनलाइन परीक्षण यह दावा करके अपना बाजार नहीं बनाते कि वे IQ परीक्षण कर रहे हैं, एक अंतर यह है कि दुर्भाग्य से वह आम लोगों द्वारा किया जाता है इसलिए खो जाता है।

बुद्धि का आकलन:

  • 1905 में, अल्फ्रेड बिने और थियोडोर साइमन ने औपचारिक रूप से बुद्धि को मापने का पहला सफल प्रयास किया।
  • 1908 में, जब पैमाने को संशोधित किया गया था, तो उन्होंने मानसिक आयु (एमए) की अवधारणा दी, जो कि उस आयु वर्ग के लोगों के सापेक्ष एक व्यक्ति के बौद्धिक विकास की एक माप है।

Key Points

  • 5 वर्ष की मानसिक आयु का अर्थ है कि एक बुद्धि परीक्षण पर एक बच्चे का प्रदर्शन 5 वर्ष के बच्चों के समूह के औसत प्रदर्शन स्तर के बराबर है।
  • कालानुक्रमिक आयु (CA) जन्म से जैविक आयु है।
  • एक उज्ज्वल बच्चे की मानसिक आयु उसकी कालानुक्रमिक आयु​ से अधिक होती है; एक सुस्त बच्चे के लिए, मानसिक आयु, कालानुक्रमिक आयु​ से कम होती है।
  • अवरोध को बिने और साइमन द्वारा कालानुक्रमिक आयु से दो वर्ष कम मानसिक आयु के रूप में परिभाषित किया गया था। 

Important Points

  • 1912 में, एक जर्मन मनोवैज्ञानिक विलियम स्टर्न ने बुद्धि लब्धि (आईक्यू) की अवधारणा को तैयार किया।
  • आईक्यू मानसिक आयु को कालानुक्रमिक आयु से विभाजित करने और 100 से गुणा करने को संदर्भित करता है।
  • IQ = 

  • १००दशमलव बिंदु को हटाने के लिए 100 संख्या का उपयोग गुणक के रूप में किया जाता है।
  • जब मानसिक आयु, कालानुक्रमिक आयु के बराबर होती है, तो आईक्यू, 100 के बराबर होता है।
  • यदि मानसिक आयु, कालानुक्रमिक आयु से अधिक है, तो आईक्यू, 100 से अधिक होता है।
  • जब मानसिक आयु, कालानुक्रमिक आयु से कम होती है, तो आईक्यू, 100 से कम हो जाता है।

इसलिए, बुद्धि लब्धि (आईक्यू) की अवधारणा को विलियम स्टर्न द्वारा दिया गया था।


बुद्धि के सिद्धांत हमें बुद्धि की संरचना का ज्ञान कराते है। 

बुद्धि की संरचना के द्वारा हमें यह मालूम होता है कि बुद्धि किन किन तत्वों या घटकों से मिलकर बनी है। इन घटकों की संख्या, क्रम तथा शक्ति विभिन्न विद्वानों ने अलग अलग बताई है। घटकों या खंडो के आधार पर बुद्धि के निम्नांकित सिद्धांत है -

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1) एक तत्व सिद्धांत 
2) द्वि तत्व सिद्धांत
3) बहु तत्व सिद्धांत
4) संघ सतात्मक सिद्धांत
5) बहु मानसिक योग्यता का सिद्धांत
6) क्रमिक महत्व का सिद्धांत
7) त्रियामी बुद्धि का सिद्धांत 

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1) एक तत्व सिद्धांत : इस सिद्धांत का प्रतिपादन अल्फ्रेड बिने ने किया। बाद में अमेरिका मनोवैज्ञानिक टरमन एवं स्टर्न तथा जर्मन मनोवैज्ञानिक एबिंहास ने इसका समर्थन किया। इस विचारधारा के अनुयायियों के अनुसार बुद्धि को समस्त मानसिक  कार्यों को प्रभावित करने वाली शक्ति माना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार बुद्धि एक ऐसी केंद्रीय शक्ति है, जो हमारी सभी मानसिक क्रियाओं का संचालन करती है।

 यदि कोई व्यक्ति किसी एक काम को बहुत अच्छी प्रकार से करता है, तो वह दूसरा काम भी उतनी अच्छी प्रकार से कर सकेगा । परंतु यह सिद्धांत सर्वमान्य नही हो गया।
 

 द्वि तत्व सिद्धांत : इग्लैंड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्पीयमैन ने द्वि तत्व सिद्धांत का निर्माण किया है। इस सिद्धांत के अनुसार बुद्धि दो तत्वों से मिलकर बनी है। 

एक सामान्य तत्व (G) तथा दूसरा विशेष तत्व (S) । सामान्य तत्व सभी बुद्धिमान लोगों में समान रूप से होता है। 

किन्तु विशेष तत्व भिन्न भिन्न व्यक्तियों में कम या अधिक मात्रा में होता है। एक गणितज्ञ में विशेष प्रकार की गणित की बुद्धि होती है।

 इसके अतिरिक्त उसमें सामान्य बुद्धि  भी होती है। स्पीयमैन  के मतानुसार सामान्य तत्व का तो एक में दूसरे विषय में संक्रमण हो जाता हैं, परंतु विशेष तत्व का नहीं । 

वही बालक आगे जाकर जीवन में सफल होते हैं, जिनमें सामान्य तत्व पाया जाता है। 

स्पीयमैन ने बुद्धि के इस तत्व 'G' को मानसिक शक्ति माना है।

3) बहु तत्व सिद्धांत : इस सिद्धांत के अनुसार बुद्धि विभिन्न कारकों का मिश्रण है, जिसमें कई योग्यताएं निहित होती है।

 किसी भी मानसिक कार्य में विभिन्न कारक मिलकर , एक साथ कार्य करते हैं। थार्नडाइक न बुद्धि के सामान्य कारकों की घोर आलोचना की। 

उन्होंने मानसिक योग्यताओं की व्याख्या में मूल कारकों एवं सामान्य कारकों का उल्लेख किया। उनके अनुसार विभिन्न मूल मानसिक योग्यताएं जैसे - आंकिक योग्यता, शाब्दिक योग्यता आदि व्यक्ति के समस्त मानसिक कार्यों को प्रभावित करती है।

4) संघ सतात्मक सिद्धांत : इस सिद्धांत के समर्थक स्कॉटलैंड के विख्यात मनोवैज्ञानिक गाॅउफ्रे थामसन हैं। 

इनके विचारानुसार मनुष्य की बुद्धि कई प्रकार की योग्यताओं से मिलकर बनती है। 

इन योग्यताओं में आपस में समानता होती है। 

भिन्न भिन्न समूहों की योग्यताओं में आपस में समानता नहीं रहती है। उदाहरणार्थ साहित्यिक समूह के अंतर्गत कविता , कहानी , निबंध इत्यादि में परस्पर संबंध रहेगा ।

 परंतु इन विषयों का विज्ञान के समूह के साथ कोई संबंध नहीं रहेगा । 

5) बहु मानसिक योग्यता का सिद्धांत : फैली ने अपने ग्रंथ एजुकेशन साइकोलॉजी में बुद्धि निर्माण हेतु अधोलिखित नौ योग्यताओं का उल्लेख किया है -
1) सामाजिक योग्यता
2) यांत्रिक योग्यता
3) शाब्दिक योग्यता
4) सांख्यिकी योग्यता
5) रुचि 
6) शारीरिक क्षमता
7) क्रियात्मक योग्यता 
8) संगीतात्मक योग्यता 
9) प्रक्षेपण योग्यता

6) क्रमिक महत्व का सिद्धांत : प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बर्ट तथा वर्नन ने बुद्धि संबंधी जिस नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया है , उसके अनुसार मानसिक योग्यताओं को भिन्न भिन्न स्तर प्रदान किए गए हैं -
प्रथम स्तर : सामान्य मानसिक योग्यता संबंधी है।
द्वितीय स्तर : सामान्य मानसिक योग्यता के दो प्रकार यथा 
क) क्रियात्मक , यांत्रिक , स्थानिक तथा शारीरिक योग्यता 
ख) शाब्दिक , सांख्यिक तथा शैक्षिक योग्यता है।
तृतीय स्तर : इन दोनों वर्गों की योग्यताओं का अनेक मानसिक योग्यताओं में विभाजन करना। 

7) बुद्धि का त्रियामी सिद्धांत या गिलफोर्ड का सिद्धांत: बुद्धि की संरचना प्रतिमान का प्रतिपादन गिलफॉर्ड और उनके साथियों ने दक्षिण कैलिफोर्निया की लॉस एंजिलिस स्थित मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला में विभिन्न परीक्षणों के तत्व विश्लेषणों के आधार पर किया था। 


बुद्धि की संरचना के प्रतिमान के विचारों को अनेक परीक्षणों के तत्व विश्लेषण के आधार पर 1950 में सूत्रित किया गया और बाद में इसे सफलतापूर्वक परिष्कृत और संशोधित किया गया । गिलफोर्ड का मत है कि मन की संरचना कम से कम तीन आयामों द्वारा हुई है। न कि बुद्धि के बहुआयामी  प्रतिमान द्वारा । 


प्रतिमान बौद्धिक योग्यताओं का त्रिमार्गीय वर्गीकरण है -  जैसे 1) सांक्रियाए 2) विषयवस्तु और 3) उत्पाद । 
गिलफोर्ड के अनुसार प्रत्येक बौद्धिक आयाम भिन्नता लिए हुए है।

 जिनकी निशानदेही तत्व विश्लेषण द्वारा संभव है। वर्तमान समय में स्पष्ट हुआ है कि आपस में समानता रखने के कारण बुद्धि के तीनों आयामों का वर्गीकरण संभव है।






संक्षिप्त परिचय
          चार्ल्स स्पीयरमैन

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 (1863 से 1945), एक ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक थे। वह मूल रूप से एक सैन्य इंजीनियर थे। उन्होंने सेना से त्याग पत्र देकर विल्हेम वुंड्ट के तहत प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का अध्ययन करने का फैसला किया और 1906 में पीएचडी की डिग्री हासिल की। ​​
उन्होंने 1907 में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में दाखिला लिया और 1932 में मनोविज्ञान के प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत्त होने तक बने रहे

 स्पीयरमैन ने एक बार कहा था कि "हर सामान्य पुरुष, महिला और बच्चा ... किसी-न-किसी चीज में एक प्रतिभाशाली होता है ... बस जरूरत है उसकी प्रतिभा को खोजने की ..."। उन्होंने सांख्यिकीय विश्लेषण में महारत हासिल करते हुए रैंक सहसंबंध विधि (Rank Correlation Method) के विकास के साथ और कारक विश्लेषण (Factor Analysis) विधि के शुरुआती संस्करण का विकास किया। उन्हें मनोवैज्ञानिक परीक्षण आंदोलन का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने बुद्धि के  सामान्य (general, g) कारक की खोज की और बुद्धि का एक सिद्धांत प्रस्तावित किया। जिसे स्पीयरमैन का बुद्धि सिद्धांत कहा जाता है।


सिद्धांत—★
1927 में उन्होंने बुद्धि का एक दो-कारक सिद्धांत प्रस्तावित किया। उन्होंने नई-नई खोजी गई सांख्यिकीय विश्लेषण पद्धति जिसे कारक विश्लेषण (Factor Analysis) के रूप में जाना जाता है का उपयोग करके अपने सिद्धांत को विकसित किया । 
उन्होंने प्रस्तावित किया कि बुद्धि में दो क्षमताएं या कारक शामिल होते हैं यानी एक सामान्य कारक (स-कारक) (g-factor) और कुछ विशिष्ट कारक (वि-कारक) (S-Factor)। दोनों बुद्धि परीक्षणों द्वारा मापने योग्य हैं।


(i)  स-कारक (g-factor) – सामान्य या जन्मज (देशज-Native) बुद्धि के रूप में भी जाना जाता है। तर्क करने और समस्याओं के समाधान करने की क्षमता जिसमे ऐसे मानसिक ऑपरेशन शामिल होते हैं जो सभी प्रकार के कार्यों के निष्पादन के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार होते हैं। 

स-कारक मनोवैज्ञानिक अवधारणा के रूप में एक व्यक्ति के विभिन्न संज्ञानात्मक कार्यों पर निष्पादन के लिए जिम्मेदार समग्र मानसिक क्षमता को संदर्भित करता या दर्शाता है। 
यह जन्मजात क्षमता होती है और काफी हद तक जीवन भर स्थिर रहती है। 
हर व्यक्ति में स-कारक की अलग-अलग मात्रा होती है। यह माना जाता है कि जितना ज्यादा ‘स’-कारक होगा समग्र बुद्धि भी उतनी ही बेहतर होगी।


(ii) वि-कारक (S-Factor) – इस करक को कई विशिष्ट क्षमताओं के रूप में भी जाना जाता है। विशिष्ट क्षेत्रों जैसे गायन, विज्ञान, वास्तुकला, एथलेटिक्स, खेल, कला आदि में उत्कृष्टता प्राप्त करने की क्षमता को वि-कारक (S-Factor) कहा जाता है ।
 ये विशिष्ट क्षमताएं लोगों को अपने संबंधित अनुक्षेत्र या ज्ञानक्षेत्र (Domain) में उत्कृष्टता प्राप्त करने का जरिया होती हैं। वि-कारक एक प्रकार से ऐसी सीखी गई गतिशील क्षमताएँ होती हैं जो समय के साथ संशोधित (modify) की जा सकती हैं। 
हर व्यक्ति में बुद्धि की ये क्षमता हर एक गतिविधि में भिन्न होती है। 
विशिष्ट या वि-क्षमताओं की संख्या अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग मात्रा में कम या ज्यादा हो सकती है।

निष्कर्ष—★
बुद्धि की सम्पूर्ण अवधारणा ‘स’-कारक और ‘वि’-कारक/ कारकों का कुल योग होती है। ‘स’-कारक स्थिर और जन्मजात होते है जबकि ‘वि’-कारक/ कारकों को सीखा और अधिग्रहित (acquire) किया जाता है। सामान्य कार्यों के लिए ‘स’-कारक जिम्मेदार होता है जबकि विशिष्ट कार्यों के लिए ‘वि’-कारक। ‘स’-कारक विशिष्ट क्षमताओं में भी पाया जाता है। उदाहरण के लिए एक महान हॉकी खिलाड़ी के पास ‘स’+‘वि’ (खिलाड़ी) दोनों प्रकार की बुद्धि होती है और इसी प्रकार एक उत्कृष्ट लेखक के पास भी ‘स’+‘वि’ (लेखन) दोनों प्रकार की बुद्धि होती है।
      
सन्दर्भ :
1.

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