बुधवार, 7 नवंबर 2018

राम कथा के थाई लैंड अध्याय से ...

राम कथा के दर्शन थाई लैंड से
भारत के बाहर थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है l वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज ” राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम कहा जाता है l*

*भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास*
वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रन्थ होने के साथ एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे, रामायण के बालकाण्ड के सर्ग, 70 / 71 और 73 में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है, जिसका सारांश है।

मिथिला के राजा सीरध्वज थे, जिन्हें लोग विदेह भी कहते थे उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा ( सुनयना ) था, जिनकी पुत्री सीता जी थीं, जिनका विवाह राम से हुआ था l राजा जनक के कुशध्वज नामके भाई थे l इनकी राजधानी सांकाश्य नगर थी जो इक्षुमती नदी के किनारे थी l इन्होंने अपनी बेटी उर्मिला लक्षमण से, मांडवी भरत से, और श्रुतिकीति का विवाह शत्रुघ्न से करा दी थी l केशव दास रचित ”रामचन्द्रिका“ पृष्ठ 354 (प्रकाशन संवत 1715) के अनुसार, राम और सीता के पुत्र लव और कुश, लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु , भरत और मांडवी के पुत्र पुष्कर और तक्ष, शत्रुघ्न और श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात हुए थे l

*भगवान राम के समय ही राज्यों बँटवारा*
पश्चिम में लव को लवपुर (लाहौर ), पूर्व में कुश को कुशावती, तक्ष को तक्षशिला, अंगद को अंगद नगर, चन्द्रकेतु को चंद्रावतीl कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नाग वंशी कन्या से विवाह किया था l थाईलैंड के राजा उसी कुश के वंशज हैंl इस वंश को “चक्री वंश कहा जाता है l चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है, और विष्णु का आयुध चक्र है इसी लिए थाईलेंड के लॉग चक्री वंश के हर राजा को “राम” की उपाधि देकर नाम के साथ संख्या दे देते हैं l जैसे अभी राम (9 th ) राजा हैं जिनका नाम “भूमिबल अतुल्य तेज ” है।

*थाईलैंड की अयोध्या*
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंग्रेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं, क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है , इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिल कर बना है, देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है “क्रुंग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महा तिलक भव नवरत्न रजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तिय विष्णु कर्म प्रसिद्धि ”

थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों का प्रयोग किया गया हैl इस नाम की एक और विशेषता ह l इसे बोला नहीं बल्कि गा कर कहा जाता हैl कुछ लोग आसानी के लिए इसे “महेंद्र अयोध्या ” भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या l थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं l

*असली राम राज्य थाईलैंड में है*
बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं, इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है l वहां के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है, थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है बल्कि उन्हें झुक कर खडे़ होना पड़ता है. उनकी तीन पुत्रियों में से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

*थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है*
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं, फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है l जिसे थाई भाषा में ”राम कियेन” कहते हैं l जिसका अर्थ राम कीर्ति होता है, जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है l इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी, जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था l थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ, क्योंकि वहां भारत की तरह दोगले हिन्दू नहीं है, जो नाम के हिन्दू हैं, हिन्दुओं के दुश्मन यही लोग हैं l

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है l राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं-
1. राम (राम)
2. लक (लक्ष्मण)
3. पाली (बाली)
4. सुक्रीप (सुग्रीव)
5. ओन्कोट (अंगद)
6. खोम्पून ( जाम्बवन्त )
7. बिपेक ( विभीषण )
8. तोतस कन (दशकण्ठ) रावण
9. सदायु ( जटायु )
10. सुपन मच्छा (शूर्पणखा)
11. मारित ( मारीच )
12. इन्द्रचित (इंद्रजीत) मेघनाद

*थाईलैंड में हिन्दू देवी देवता*
थाईलैंड में बौद्ध बहुसंख्यक और हिन्दू अल्प संख्यक हैं l वहां कभी सम्प्रदायवादी दंगे नहीं हुए l थाई लैंड में बौद्ध भी जिन हिन्दू देवताओं की पूजा करते है, उनके नाम इस प्रकार हैं
1. ईसुअन (ईश्वन) ईश्वर शिव
2. नाराइ (नारायण) विष्णु
3. फ्रॉम (ब्रह्म) ब्रह्मा
4. इन ( इंद्र )
5. आथित (आदित्य) सूर्य
6 . पाय ( पवन ) वायु

*थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़*
गरुड़ एक बड़े आकार का पक्षी है, जो लगभग लुप्त हो गया है l अंगरेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The Brahminy Kite ) कहा जाता है, इसका वैज्ञानिक नाम “Haliastur Indus” है l फ्रैंच पक्षी विशेषज्ञ मथुरिन जैक्स ब्रिसन ने इसे सन 1760 में पहली बार देखा था, और इसका नाम Falco Indus रख दिया था, इसने दक्षिण भारत के पाण्डिचेरी शहर के पहाड़ों में गरुड़ देखा था l इस से सिद्ध होता है कि गरुड़ काल्पनिक पक्षी नहीं है l इसीलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ को विष्णु का वाहन माना गया है l चूँकि राम विष्णु के अवतार हैं, और थाईलैंड के राजा राम के वंशज है, और बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं, इसलिए उन्होंने ”गरुड़” को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है l यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है।

सुवर्णभूमि हवाई अड्डा----
हम इसे हिन्दुओं की कमजोरी समझें या दुर्भाग्य, क्योंकि हिन्दू बहुल देश होने पर भी देश के कई शहरों के नाम मुस्लिम हमलावरों या बादशाहों के नामों पर हैं l यहाँ ताकि राजधानी दिल्ली के मुख्य मार्गों के नाम तक मुग़ल शाशकों के नाम पर हैं l
जैसे हुमायूँ रोड, अकबर रोड, औरंगजेब रोड इत्यादि, इसके विपरीत थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे का नाम सुवर्ण भूमि हैl यह आकार के मुताबिक दुनिया का दूसरे नंबर का एयर पोर्ट है l
इसका क्षेत्रफल 563,000 स्क्वेअर मीटर है। इसके स्वागत हाल के अंदर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ हैl पौराणिक कथा के अनुसार देवोँ और ससुरों ने अमृत निकालने के लिए समुद्र का मंथन किया था l इसके लिए रस्सी के लिए वासुकि नाग, मथानी के लिए मेरु पर्वत का प्रयोग किया था l नाग के फन की तरफ असुर और पुंछ की तरफ देवता थेl मथानी को स्थिर रखने के लिए कच्छप के रूप में विष्णु थेl जो भी व्यक्ति इस ऐयर पोर्ट के हॉल जाता है वह यह दृश्य देख कर मन्त्र मुग्ध हो जाता है।

इस लेख का उदेश्य लोगों को यह बताना है कि असली सेकुलरज्म क्या होता है, यह थाईलैंड से सीखो l अपनी संस्कृति की उपेक्षा कर के कोई भी समाज अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकती।
आजकल सेकुलर गिरोह के मरीच सनातन संस्कृति की उपेक्षा और उपहास एक सोची समझी साजिश के तहत कर रहे हैं और अपनी संस्कृति से अनजान नवीन पीढ़ी अन्धो की तरह उनका अनुकरण कर रही है।
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भारत से सदैव अलग एक देश थाईलेंड , जहाँ के बैंकाक और पटाया को भारत से प्रति वर्ष लगभग 3 करोड़ लोग मसाज और सैंडविच मसाज तथा ऐय्याशी करने जाते हैं वहाँ एक अयोध्या भी है जो भारत स्थित अयोध्या से करीब 400 साल पहले की निर्मित है।

"रामायण" सर्वप्रथम महर्षि वाल्मिकी द्वारा लिखी गयी परन्तु भारतीय समाज में उसे श्रृद्धा के रूप में मुगल शहंशाह अकबर की बादशाहत में गोस्वामी तुलसीदास के लिखे "रामचरित्र मानस" के बाद ही लिया गया।

फैज़ाबाद स्थित अयोध्या के भवनों , कनक मंदिर , राम जानकी मंदिर , हनुमान गढ़ी इत्यादि समेत पूरी अयोध्या का निर्माण भी मुग़ल शहंशाह अकबर के दौर में ही हुआ यह आर्किलाजिकल सर्वे की रिपोर्ट भी कहती है और भवन निर्माण विशेषज्ञ भी कहते हैं।

अर्थात भारत स्थित अयोध्या का निर्माण सन 1500 ईस्वी में तब किया गया जब गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित्र मानस अकबर के शहंशाह रहते लोकप्रिय हुई।

थाईलैंड की राजधानी बैंकाक से 80 किमी दूर स्थिति यह "अयोध्या" सन 1285 से भी पहले की है इसका सबूत यह है कि वहाँ सन् 1285 ईस्वी में लिखा एक शिलालेख मिला है जो आज भी बैंकाक के राष्ट्रीय संग्राहलय में रखा हुआ है। इसमें राम के जीवन से जुडी घटनाओं और भौगोलिक क्षेत्रों का विवरण मिलता है।

आपको संभवतः पता नहीं होगा तो बताता चलूं कि दुनिया में देह व्यापार के सबसे बड़े बाज़ारों में शामिल थाईलैंड में आज भी संवैधानिक रूप में "रामराज्य" है। बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग वहां अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं , इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है l

वहाँ आज भी 'राम दशम' का राज है जो अपने आप को भगवान राम का वंशज मानते हैं। "वजीरालंगकोर्न" यानी 'राम दशम' 16 अक्टूबर 2017 को 64 वर्ष की आयु में लेकिन अपने पिता की मृत्यु के 50 दिवसीय शोक के बाद 1 दिसंबर 2016 को राजगद्दी पर आसीन हुए थे। थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई थी।

खैर , अयोध्या पर आते हैं

थाईलैंड का प्राचीन नाम "सियाम" था ! यह ऐतिहासिक सच है कि सन् 1612 तक सियाम की राजधानी अयोध्या ही थी। लोग इसे वहाँ की भाषा "अयुतथ्या" के नाम से जानते हैं। सन् 1612 ईस्वी में थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक शिफ्ट की गई थी।

इस स्थान पर "यूनेस्को" के संरक्षण में आज भी पुरातात्विक साक्ष्यों की खोज में खुदाई का काम चल रहा है। इस पुरानी अयोध्या की इमारतों की भव्यता देखने लायक है।
भगवान श्री राम से संबंधित इतने भव्य साक्ष्य तो भारत में भी उपलब्ध नहीं है।

पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर थाईलेंड(सियाम) में स्थित अयोध्या को ही यूनेस्को ने असली मानते हुए अपनी वैश्विक पैत्रक (Patriarchy) लिस्ट में जगह दी है। इसके लिए जो भारत का दावा था कि असली अयोध्या उसके यहाँ फैजाबाद में स्थित है उसे "यूनेस्को" ने खारिज कर दिया था।

थाईलैंड के लोग इसे "महेंद्र अयोध्या" भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या l थाईलैंड के जितने भी राम (राजा) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं l

सनातन धर्म के "भगवान राम" के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं।

थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ "रामायण" है l जिसे थाई भाषा में 'रामिकिन्ने' कहते हैं l जिसका अर्थ "राम-कीर्ति" होता है।

थाईलैंड में "रामिकिन्ने" जो आज वर्तमान में चलन में है उसको अलग-अलग समय में तेरहंवी सदी से पंद्रहवी सदी तक लिखी गयी थी। परन्तु थाईलैंड की लोक कथाओं में और कला में इसका मंचन चौदहवी सदी से शुरू हो चूका था।इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में बैंकॉक के "राजप्रसाद" में लगी आग में नष्ट हो गयी थी।

थाई लैंड में 'रामिकिन्ने' पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है।

रामिकिन्ने के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं-
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राम (राम) , सीदा(सीता) ,लक (लक्ष्मण) , पाली (बाली) ,थोत्स्रोत(दशरथ) , सुक्रीप (सुग्रीव),ओन्कोट (अंगद) ,खोम्पून (जाम्बवन्त), बिपेक (विभीषण), तोसाकन्थ(दशकण्ठ) रावण , सदायु (जटायु) सुपन मच्छा (शूर्पणखा) , मारित (मारीच) इन्द्रचित (इंद्रजीत) मेघनाद , फ्र पाई(वायुदेव) फरयु नदी, थाई लोक नाम(सरयू)।

थाई "रामिकिन्ने" में हनुमान की पुत्री और विभीषण की पत्नी का नाम भी है, जो भारत के लोग नहीं जानते l

थाईलैंड में लोक किद्वंतियों के अनुसार राम जिसे वो Phra Ram लिखते है यानि भगवान राम के भाई लक्ष्मण का जिक्र मिलता है। इनकी कथा में दो अन्य भाइयों "भरत और शत्रुघ्न" का जिक्र नहीं है।

कथा में दो अन्य भाइयों "भरत और शत्रुघ्न" का जिक्र नहीं है।

थाईलैंड की अयोध्या की रामायण भी कुछ अलग है।

पंद्रहवी सदी के रिकॉर्ड के मुताबिक़ राजा राम ने १२८३ ईस्वी में ही "लोंग्का" यानि "लंका" के राजा बोर्रोम तराई लोखंत का अंत कर अयोध्या पे कब्ज़ा किया था। लोंग्का या लंग्कसुम के साम्राज्य का विस्तार काफी बड़ा था। इनकी अयोध्या के साथ लड़ाई होने के आलेख मिलते है। थाई साहित्य में इसे दानवों का राज्य बताया गया था। जिसके राजा थर्मन यानि रावण थे। थर्मन ने ही राजा राम के पिता थोत्स्रोत यानि बोले तो दसरथ को हराया था। हारने के बाद थोत्सरोत सुखोध्या छोड़ कर विष्णुलोक चले गए और वहां वो एक मंदिर में पुजारी बन कर रहे थे। जब थोत्सरोत का पता थर्मन को लगा तो उसने विष्णुलोक के राजा को सन्देश भिजवाया जिसके बाद वो अपने परिवार सहित किष्किन्धा की तरफ चले गए। जहाँ से राजा राम ने ही १२८३ में राज्य को जीता और अयोध्या की स्थापना की थी।

तो सवाल यह उठता है कि क्या गोस्वामी तुलसीदास ने थाईलैंड की अयोध्या में प्रचलित मान्यताओं में संसोधन करके "रामचरित" मानस लिखा ? और उसी आधार पर वर्तमान की अयोध्या का निर्माण हुआ ?

युनेस्को की मानें तो श्रीराम भारत के हैं ही नहीं बल्कि वह "थाईलैंड" में जन्में थे और वहीं उनका राज था। राम पर भारत का दावा यूनेस्को खारिज भी कर चुका है , यह आपको ना मीडिया बताएगी ना अदालत और ना सरकार।

सबसे महत्वपुर्ण बात यह है कि 95% बौद्ध लोगों की आबादी वाले थाईलैंड में अयोध्या और राम से जुड़े सभी भवन , मंदिर और अवशेष सुरक्षित ही नहीं बल्कि सरकारी संरक्षण में हैं , वहाँ के राम से जुड़े मंदिर में धोखे से रात के अंधेरे में कभी किसी की मुर्ति रख कर जन्म भी नहीं कराया गया।

इसके बावजूद कि सम्राट अशोक के वंशज को मारकर गद्दी पर बैठे ब्राम्हण शासक पुष्यमित्र षुंग ने निर्ममता से भारत में बौद्ध धर्म का खात्मा कर दिया।

सवाल अब यह है कि राम जी पैदा कहाँ हुए ?

•थाईलैंड स्थिति अयोध्या के चित्रों का श्रोत यूनेस्को की वेबसाईट से....
राम एक ऐतिहासिक विवरण :---- विवेचक यादव योगेश कुमार 'रोहि'
(राम एक इतिहास )
राम के जीवन को सदियों से भारतीय ही नहीं , अपितु  माया आदि अन्य देशों की संस्कृति में भी आदर्श और पवित्र माना जाता हैं | राम शब्द हमारे अभिवादन के रूप मे समाचरित हो चुका है ।
भारतीय परम्पराओं में जीवन यात्रा का अन्तिम  विदाई शब्द राम राम शब्दावृत्ति के रूप में रूढ़ हो गया है  ।
राम उस निराकार ब्रह्म का भी वाचक शब्द है ;जो सर्वत्र व्याप्त  है।. (रमते इति ।  रम् + अण् ।  रम्यतेऽनेन सम्पूर्णेषु चराचरेषु ।
(रम् + घञ् वा  ) १:- मनोज्ञः (यथा   बृहत्संहितायाम् ।  १९ / ५  “ गावः प्रभूतपयसो नयनाभिरामा रामा रतैरविरतं रमयन्ति रामान् “ ) सितः ,असितः  इति मेदिनी कोश    २७ ॥
(रम--कर्त्तरि घञ् अण् वा ):---अर्थात् रम् धातु में कर्ता के अर्थ में अण् अथवा घञ् प्रत्यय करने पर राम:  शब्द बनता है ।
संस्कृत साहित्य में राम शब्द इन मानवों के नामीय रूप में रूढ़ है :---जो पौराणिक कथाओं में प्रसिद्ध रहे हैं ।
देखें---
१ परशुरामे २ दशरथ- ज्येष्ठपुत्रे श्रीरामे ३ बलरामे च “भार्गवो राघवो गोपस्त्रयो रामाः पकीर्त्तिता”
अग्नि सर्वत्र व्याप्त है अत: राम शब्द अग्नि का भी वाचक है ।
वह्नि:--- पु० रामशब्द- निरुक्तिः “रापब्दा विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचकः “विश्वानाधीश्वरो यो हि तेन रामः प्रकोर्त्तित” ब्रह्मवैवर्त जन्म खण्ड ११० अध्याय
४ मनोहरे ५ सिते ६ असिते च त्रि० मेदिनी कोश ।
मेदिनी संस्कृत भाषा के कोश में
राम का अर्थ १- सुन्दर २- श्वेत ३- अश्वेत अर्थ भी है । ७ वास्तूकशाके ८ कुष्ठे (कुड़) न० मेदिनी कोश
तमालपत्रे न०  ।
रम् :-- क्रीडायाम् आत्मने पदीय व परस्मैपदीय दौनों क्रिया रूप
अनुदात्तोऽनुदात्तेत् ( रमते रेमे रेमिषे रेमिध्वे ) क्रादिनियमादिट् ( रन्ता रंस्यते रमताम् अरमत रमेत रंसीष्ट अरंस्त रिरंसते रंरम्यते रंरन्ति ररंतः )

राम के चरित्र और नाम रूप की इतनी अर्थ व्यापकता होने पर भी -
कुछ विधर्मी और नास्तिकों द्वारा श्री राम पर शम्बूक नामक एक शुद्र का हत्यारा होने का आक्षेप लगाया जाता हैं।
वाल्मीकि-रामायण में यह उत्तर- काण्ड का प्रकरण
पुष्य-मित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मणों ने शूद्रों को लक्ष्य करके यह मनगढ़न्त रूप  से  राम-कथा से सम्बद्ध कर दिया ---
ताकि लोक में इसे सत्य माना जाय  !
इतनी ही नहीं वाल्मीकि-रामायण के अयोध्या काण्ड १०९ वें सर्ग ३४ वें श्लोक में जावालि ऋषि के साथ सम्वाद रूप में राम के मुख से बुद्ध को चौर तथा नास्तिक कहलवाया गया देखें---
वाल्मीकि-रामायण अयोध्या काण्ड १०९ वें सर्ग का ३४ वाँ श्लोक--
यथा ही चौर स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि -
परन्तु राम एक ऐतिहासिक चरित्र हैं |
संसार में अब तक ३०० रामायण की कथाएें लिखी जा चुकी हैं ।
वेदों में राम का वर्णन है ।
वेद में श्रीरामोपासना की प्राचीनता बतायी गयी है। ऋग्वेद के १०४१७ मन्त्रों से १५५ मन्त्रों, एक मन्त्र वाजसनेयी संहिता से तथा एक अन्यत्र संहिता से लेकर, नीलकण्ठ-सूरि ने ’मन्त्ररामायण’ नामक एक प्रख्यात रचना की थी ।
जिस पर’मन्त्ररहस्य-प्रकाशिका’ नामक स्वोपज्ञ व्याख्या भी की थी। इससे प्रमाणित होता है कि सृष्टि के प्राचीन काल से ही श्रीरामोपासना सतत चली आ रही है। अब इस रामोपासना की अविच्छिन्नता पर विचार करते हैं। उपनिषदों में भी श्रीराम-मन्त्र का वर्णन आया है।
श्रीरामतापिनी उपनिषद की चतुर्थ कण्डिका-
“श्रीरामस्यमनुंकाश्यांजजापवृषभध्वजः। मन्वन्तरसहस्रैस्तुजपहोमार्चनादिभिः॥
ऋग्वेद के दशम् मण्डल के तृतीय सूक्त के तृतीय ऋचा में राम कथा का विवरण है :---
भद्रो भद्रया सचमान आगात्स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात्।
सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्वितिष्ठन्रुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात्॥
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(ऋग्वेद १०।३।३)
भावार्थ: श्री रामभद्र (भद्र) सीता जी के साथ (भद्रया) [ वनवास के लिए ] तैयार होकर (सचमान ) दण्डकारण्य वन (स्वसारं) यहाँ पत्नी अर्थ में  )जब आये थे (आगात्) , तब (पश्चात ) कपट वेष में कामुक (जारो) रावण सीता जी का हरण करने के लिए आया था (अभ्येति ), उस समय अग्नि देव हीं सीता जी के साथ थे ( अर्थात स्वयं सीता माँ अग्नि में स्थित हो चुकी थी राम जी के कहे अनुसार), अब रावण वध के पश्चात, देदीप्यमान तथा लोहितादी वर्णों वाली ज्वालाओं से युक्त स्वयं अग्नि देव हीं (सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्वितिष्ठन्रुशद्भिर्वर्णैरभि) हीं शुभ-लक्षणों से युक्त कान्तिमयी सीता जी के साथ [सीता जी का निर्दोषत्व सिद्ध करने के लिए] श्री राम के सम्मुख उपस्थित हुए (राममस्थात्) |
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काशी में श्रीराममन्त्र को शिवजी ने जपा, तब भगवान् श्रीरामचन्द्र प्रसन्न होकर बोले:-
“वेत्तोवाब्रह्मणोवापियेलभन्तेषडक्षरम्।जीवन्तोमन्त्रसिद्धाःस्युर्मुक्तामांप्राप्नुवन्तिते॥
-रा. ता. उ. ।४।७॥“
अर्थात्- हे शिवजी! आप से या ब्रह्मा से जो कोई षडक्षर-मन्त्र को लेंगे, वे मेरे धाम को प्राप्त होंगे। पुराणों,पाञ्चरात्रादि ग्रन्थों में भी रामोपासना का विधिवत् वर्णन पाया जाता है। अगस्त्यसंहिता, जो रामोपासना का प्राचीनतम आगम ग्रन्थ है, के १९ वें अध्याय तथा २५ वें अध्याय में भी रामोपासना का वर्णन पाया जाता है। बृहद्ब्रह्मसंहिता के द्वितीय पाद अध्याय ७, पद्म पुराण उत्तर खण्ड अध्याय २३५ तथा बृहन्नारदीयपुराण पूर्व भाग के अध्याय ३७ से यह स्पष्ट हो जाता है कि श्रीरामोपासना तीनों युगों में होती आयी है। इस तथ्य से सम्बन्धित कुछ वाक्यों का अब हम सिंहावलोकन करते हैं। महारामायण (और ऐसे और भी ग्रन्थों में) तो स्पष्टतः- श्रीरामजी ही स्वयं भगवान् हैं ऐसा कहा है:-
“भरणःपोषणाधारःशरण्यःसर्वव्यापकः।करुणःषड्गुणैःपूर्णोरामस्तुभगवान्स्वयं॥
-(महारामायण)”
इसी सन्दर्भ में याज्ञवल्क्य संहिता की यह पंक्ति भी उल्लेखनीय है:-
पूर्णःपूर्णावतारश्चश्यामोरामोरघूत्तमः।अंशानृसिंहकृष्णाद्याराघवोभगवान्स्वयं॥
-(याज्ञवल्क्यसं., ब्रह्मसंहिता)
पुराणों में तिलक स्वरूप श्रीमद्भागवतम् में इस से सम्बद्ध कुछेक प्रसङ्ग देखें:-
किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरणसन्निकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान् सह किम्पुरुषैरविरतभक्तिरुपास्ते ॥
-(श्रीमद्भा. ५।१९।१॥)
(अर्थात्, किम्पुरुष वर्ष में श्रीलक्ष्मणजी के बड़े भाई आदिपुरुष, सीताहृदयाभिराम भगवान् श्री रामजी के चरणों की सन्निधि के रसिक परम भागवत हनुमान् जी अन्य किन्नरों के साथ अविचल भक्तिभाव से उनकी उपासना करते हैं।) दक्षिणीय अमेरिका की माया सभ्यता में राम और सीता को आज भी मेक्सिको के एजटेक समाज के लोग "रामसितवा " उत्सव के रूप में स्मरण करते हैं ,
यूरोपीय इतिहास कार व पुरातात्विक विशेषज्ञ डा०मार्टिन का विवरण है कि पूर्व से लंका मार्ग से होते हुए माया सभ्यता के लोग  मैक्सिको( दक्षि़णीय अमेरिका में बसे !
एजटेक पुरातन कथाओं में वर्णन है कि उस देश में 
प्रथम:   एक लम्बी दाढ़ी ,ऊँचे कद़ तथा श्वेत वर्ण का एक पूर्वज किसी अज्ञात स्थान से आया ।
जिसने इस देश में कृषि शिल्प तथा शिक्षा एवं संस्कृति और सभ्यता का विकास किया ।
माया पुरातन कथाओं में उस महान आत्मा का नाम  क्वेट - सालकटली है ।
क्वेट सालकटली का तादात्म्य  राम के समकालिक  श्वेत साल कटंकट से प्रस्तावित है ।
गहन काल गणना के द्वारा राम का समय ७००० हजार वर्ष पूर्व निश्चित होता है ,परन्तु रूढ़ि वादी परम्परा राम का समय ९००००० वर्ष मानती है ।
श्रीरामचन्द्र जी का काल पुराणों के अनुसार करोड़ो वर्षों पुराना हैं। हमारा आर्याव्रत देश में महाभारत युद्ध के काल के पश्चात और उसमें भी विशेष रूप से पिछले २५०० वर्षों में अनेक परिवर्तन हुए हैं जैसे ईश्वरीय वैदिक धर्म का लोप होना और मानव निर्मित मत मतान्तर का प्रकट होना जिनकी अनेक मान्यतें वेद विरुद्ध थी। ऐसा ही एक मत था वाममार्ग जिसकी मान्यता थी की माँस, मद्य, मीन आदि से ईश्वर की प्राप्ति होती हैं।
वाममार्ग के समर्थकों ने जब यह पाया की जनमानस में सबसे बड़े आदर्श श्री रामचंद्र जी हैं इसलिए जब तक उनकी अवैदिक मान्यताओं को श्री राम के जीवन से समर्थन नहीं मिलेगा तब तक उनका प्रभाव नहीं बढ़ेगा। इसलिए उन्होंने श्री राम जी के सबसे प्रमाणिक जीवन चरित वाल्मीकि रामायण में यथानुसार मिलावट आरंभ कर दी जिसका परिणाम आपके सामने हैं।
महात्मा बुद्ध के काल में इस प्रक्षिप्त भाग के विरुद्ध"दशरथ जातक" के नाम से ग्रन्थ की स्थापना करी जिसमें यह सिद्ध किया की श्री राम पूर्ण रूप से अहिंसा व्रत धारी थे और भगवान बुद्ध पिछले जन्म में राम के रूप में जन्म ले चुके थे। कहने का अर्थ यह हुआ की जो भी आया उसने श्री राम जी की अलौकिक प्रसिद्धि का सहारा लेने का प्रयास लेकर अपनी अपनी मान्यताओं का प्रचार करने का पूर्ण प्रयास किया।
यही से प्रक्षिप्त श्लोकों की रचना आरंभ हुई।

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