मंगलवार, 27 नवंबर 2018

यादवों का व्रज क्षेत्र की परिसीमा करौली का इतिहास--- धर्म्मपाल से लेकर अर्जुन पाल तक ---- प्रस्तुति-करण:- यादव योगेश कुमार "रोहि" (भाग द्वितीय)

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अहीर वस्तुत पापी , लोभी या चोर उच्चके कभी नहीं होते हैं । 

क्योंकि तुलसी जैसे रूढ़ वादी सन्त कवि से भी नहीं रहा गया तो वह भी अहीरों के विषय में कह गये "निर्मल मन अहीर निज दासा तुलसी जैसे-रूढि वादी कवि भी अहीरों की प्रशंसा करने से अपने आप को नहीं रोक पाए हैं देखें--- रामचरित मानस का उत्तर काण्ड --👇

 तेइ तृन हरित चरै जब गाई। 

  भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥

 नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। 

निर्मल मन अहीर निज दासा॥6॥ 

भावार्थ:-उन्हीं (धर्माचार रूपी) हरे तृणों (घास) को जब वह गो चरे और आस्तिक भाव रूपी छोटे बछड़े को पाकर वह पेन्हावे।

 निवृत्ति (सांसारिक विषयों से और प्रपंच से हटना) नोई (गो के दुहते समय पिछले पैर बाँधने की रस्सी) है, विश्वास (दूध दुहने का) बरतन है, निर्मल (निष्पाप) मन जो स्वयं अपना दास है।

 (अपने वश में है), दुहने वाला अहीर है॥6॥ यहाँ भी तुलसी दास ने संकेत किया है कि अहीर किसी का गुलाम नहीं होता वह तो अपना ही मन मौजी है ।

 और हरियाणा के  बहुतायत जाट , अहीर तथा गुजरात के  बहुतायत गूज़र (गौश्चर:) इन्हीं यदुवंशी गोपों की बिखरी हुई शाखाऐं हैं ।

 ---जो गौ- चारण करते करते आज कृषि करते हैं । और ये ही भारतीय कृषि का आधार स्तम्भ हैं।

 आधुनिक काल में भी कुछ रूढि वादी काशी ब्राण्ड ब्राह्मण तथा राजपूत अहीर ,जाट तथा गूजरों को हीनता की दृष्टि से देखते हैं । 

अहीर शब्द प्राचीनत्तम है जब जाट और गुर्जर जैसे- शब्द भी अस्तित्व में नहीं थे यादव किसी के साथ विश्वास घात कभी नहीं करते थे । 

क्यों कि यह क्षात्र-धर्म के विरुद्ध भी था । गर्ग संहिता अश्व मेध खण्ड अध्याय 60,41,में यदुवंशी गोपों ( अहीरों) की कथा सुनने और गायन करने से मनुष्यों के सब पाप नष्ट हो जाते हैं ; ऐसा वर्णन है ।

 गोप शूद्र नहीं अपितु स्वयं में क्षत्रिय ही हैं । जैसा की संस्कृति साहित्य का इतिहास 368 पर वर्णित है👇 

अस्त्र हस्ताश़्च धन्वान: संग्रामे सर्वसम्मुखे ।

 प्रारम्भे विजिता येन स: गोप क्षत्रिय उच्यते ।।

और गर्ग सहिता में वर्णन है 👇

 यादव: श्रृणोति चरितं वै गोलोकारोहणं हरे : मुक्ति यदूनां गोपानं सर्व पापै: प्रमुच्यते ।102। 

अर्थात् जिसके हाथों में अस्त्र एवम् धनुष वाण हैं ---जो युद्ध को प्रारम्भिक काल में ही विजित कर लेते हैं वह गोप क्षत्रिय ही कहे जाते हैं । 

जो मनुष्य गोप अर्थात् आभीर (यादवों )के चरित्रों का श्रवण करता है । 

वह समग्र पाप-तापों से मुक्त हो जाता है ।।102। महाभारत के मूसल पर्व में आभीर शब्द के द्वारा अर्जुन को परास्त कर लूट लेने की घटना वर्णित की गयी है । निश्चित रूप से वह मूल भाव से मेल नहीं खाती है । क्योंकि यहाँ अर्जुन और यादवों (गोपों) के युद्ध की पृष्ठ-भूमि का वर्णन नहीं है ; और अहीरों को अशुभ-दर्शी तथा पापकर्म करनेवाला, लोभी के रूप में वर्णन करना महाभारत कार की अहीरों के प्रति विकृतिपूर्ण अभिव्यक्ति मात्र है ।

 इसी प्रकार का वर्णन विष्णु पुराण आदि में भी है । इतना ही नहीं भागवतपुराण में तो पुराण कार ने आभीर शब्द के स्थान पर गोप शब्द के प्रयोग द्वारा गोपों को अर्जुन सहित गोपिकाओं को लूटने वाला बता गया है । और गोपों को दुष्ट विशेषण से अभिव्यक्ति किया है । अहीरों अथवा गोपों ने अर्जुन सहित कृष्ण की 16000 गोपिकाओं के रूप में पत्नियों को लूटा था अथवा नहीं ऐसा वर्णन मात्र कल्पना रञ्जित ही है । 

निश्चित रूप से गोपों द्वारा अर्जुन को परास्त करने की घटना तो रही होगी ; परन्तु स्त्रीयाँ लूटने और धन लूटने की घटना काल्पनिक व मनगढ़न्त ही हैं ।

 कुछ मूर्ख रूढ़ि वादी ब्राह्मणों ने यादवों के प्रति द्वेष स्वरूप गलत रूप में उन्हें प्रस्तुत करने के लिए ही बहुत सी काल्पनिक घटनाओं का समायोजन इनके साथ कर दिया है। 

क्योंकि अर्जुन और यादवों (गोपों) के मध्य पूर्व -युद्ध की पृष्ठ-भूमि को वर्णित ही नहीं किया है । यादवों की किसी कन्या का अपहरण उस समय उनकी प्रतिष्ठा का विषय था ।

 जैसा कि हर स्वाभिमानी समाज का होता भी है ।

 अब गोपों ने भी एक स्त्री के अप हरण में अर्जुन के साथ चलने वाली हजारों स्त्रीयों का अपहरण किया !

 और वे स्त्रीयाँ वृष्णि वंशी गोपों की पत्नी रूप में गोपिकाऐं ही थीं । तब भी आश्चर्य क्या ? 

परन्तु इनकी घटनाओं के विस्तार में कल्पना मात्र ही है । क्योंकि गोप गोपिकाओं का अपहरण क्यों करने लगे ? और आपको बतादें कि नन्द ही गोप नहीं थे अपितु यदुवंशी होने से वसुदेव और कृष्ण भी गोप थे महाभारत के खिल-भाग हरिवंश पुराण में इसका प्रमाण देखें---👇 प्रथम दृष्ट्या तो ये देखें-- कि वसुदेव को गोप कहा है। यहाँ हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किया जाता है । ।

वसुदेवदेवक्यौ च कश्यपादिती।

 तौच वरुणस्य गोहरणात् ब्रह्मणः शापेन गोपालत्वमापतुः। यथाह (हरिवंश पुराण :- ५६ अध्याय ) "इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत । गावां कारणत्वज्ञ:कश्यपे शापमुत्सृजन् ।२१ येनांशेन हृता गाव: कश्यपेन महर्षिणा । स तेन अंशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति।२२ द्या च सा सुरभिर्नाम अदितिश्च सुरारिण: ते८प्यमे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यत:।।२३ ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि संस्यते। स तस्य कश्यस्यांशस्तेजसा कश्यपोपम: ।२४ वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले । गिरिगोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरत: ।२५। तत्रासौ गौषु निरत: कंसस्य कर दायक:। तस्य भार्याद्वयं जातमदिति सुरभिश्च ते ।२६। देवकी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्यभृत् ।२७। सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति। गीता प्रेस गोरखपुर की हरिवंश पुराण 'की कृति में श्लोक संख्या क्रमश: 32,33,34,35,36,37,तथा 38 पर देखें--- अनुवादक पं० श्री राम नारायण दत्त शास्त्री पाण्डेय "राम" "ब्रह्मा जी का वचन " नामक 55 वाँ अध्याय। उपर्युक्त संस्कृत भाषा का अनुवादित रूप इस प्रकार है :-हे विष्णु ! महात्मा वरुण के ऐसे वचनों को सुनकर तथा इस सन्दर्भ में समस्त ज्ञान प्राप्त करके भगवान ब्रह्मा ने कश्यप को शाप दे दिया और कहा ।२१। कि हे कश्यप अापने अपने जिस तेज से प्रभावित होकर वरुण की उन गायों का अपहरण किया है । उसी पाप के प्रभाव-वश होकर तुम भूमण्डल पर तुम अहीरों (गोपों) का जन्म धारण करें ।२२। तथा दौनों देव माता अदिति और सुरभि तुम्हारी पत्नीयाें के रूप में पृथ्वी पर तुम्हरे साथ जन्म धारण करेंगी।२३। इस पृथ्वी पर अहीरों ( ग्वालों ) का जन्म धारण कर महर्षि कश्यप दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि सहित आनन्द पूर्वक जीवन यापन करते रहेंगे । हे राजन् वही कश्यप वर्तमान समय में वसुदेव गोप के नाम से प्रसिद्ध होकर पृथ्वी पर गायों की सेवा करते हुए जीवन यापन करते हैं। मथुरा के ही समीप गोवर्धन पर्वत है; उसी पर पापी कंस के अधीन होकर वसुदेव गोकुल पर राज्य कर रहे हैं। कश्यप की दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि ही क्रमश: देवकी और रोहिणी के नाम से अवतीर्ण हुई हैं २४-२७। (उद्धृत सन्दर्भ --) यादव योगेश कुमार' रोहि' की शोध श्रृंखलाओं पर आधारित--- पितामह ब्रह्मा की योजना नामक ३२वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या २३० अनुवादक -- पं० श्रीराम शर्मा आचार्य " ख्वाजा कुतुब संस्कृति संस्थान वेद नगर बरेली संस्करण) अब कृष्ण को भी गोपों के घर में जन्म लेने वाला बताया गया है। देखें👇 गोप अयनं य: कुरुते जगत: सार्वलौकिकम् । स कथं गां गतो देशे विष्णुर्गोपर्त्वमागत: ।।९। अर्थात्:-जो प्रभु भूतल के सब जीवों की रक्षा करनें में समर्थ है । वे ही प्रभु विष्णु इस भूतल पर आकर गोप (आभीर) क्यों हुए ? अर्थात् अहीरों के घर में जन्म क्यों ग्रहण किया ? ।९। हरिवंश पुराण "वराह ,नृसिंह आदि अवतार नामक १९ वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या १४४ (ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण) सम्पादक पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य . तथा गीता प्रेस गोरखपुर की हरिवंश पुराण की कृति में भी वराहोत्पत्ति वर्णन " नामक पाठ चालीसवाँ अध्याय में है और इतना ही नहीं समस्त ब्राह्मणों की आराध्या ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सत्ता गायत्री भी नरेन्द्र सेन अहीर की कन्या हैं । और उसका वर्णन भी आभीर तथा गोप शब्द के पर्याय वाची रूप में वर्णित किया है । तथा हरिवंश पुराणों में ही अन्यत्र भी कृष्ण ने अपना जन्म अहीरों में माना है ।👇 एतदर्थं च वासो८यं वज्रे८स्मिन् गोप जन्म च। अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थ दुरात्मनाम्।। 58।। इस लिए व्रज में मेरा निवास हुआ और इसलिए मैेने अहीरों (गोपों)में अवतार ग्रहण किया है कुमार्ग पर स्थित हुए सभी दुरात्माओं का दमन करने के लिए यहाँ मेरा अवतार हुआ है ।। हरिवंश पुराण -विष्णु पर्व बाल चरित यमुना वर्णन नामक ग्यारह वाँ अध्याय )पृष्ठ संख्या 318 गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण और इतना ही नहीं समस्त ब्राह्मणों की आराध्या ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी गायत्री भी नरेन्द्र सेन अहीर की ही कन्या हैं । और उसका वर्णन भी आभीर तथा गोप शब्द के पर्याय वाची रूप में वर्णित किया है । और अनेक भारतीय पुराणों में जैसे अग्नि- पुराण,पद्मपुराण आदि में अहीरों को देवताओं के रूप में अवतरित किया है ; और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी गायत्री को भी नरेन्द्र सेन अहीर की कन्या के रूप में भी वर्णन किया गया है। वहाँ भी अहीर (आभीर) तथा गोप शब्द परस्पर पर्याय वाची रूप में वर्णित हैं। पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय 16 में गायत्री को नरेन्द्र सेन आभीर (अहीर)की कन्या के रूप में वर्णित किया गया है ।👇 " स्त्रियो दृष्टास्तु यास्त्व , सर्वास्ता: सपरिग्रहा : आभीरः कन्या रूपाद्या शुभास्यां चारू लोचना ।७। न देवी न च गन्धर्वीं , नासुरी न च पन्नगी । वन चास्ति तादृशी कन्या , यादृशी सा वराँगना ।८। अर्थात् जब इन्द्र ने पृथ्वी पर जाकर देखा तो वे पृथ्वी पर कोई सुन्दर और शुद्ध कन्या न पा सके परन्तु एक नरेन्द्र सेन आभीर की कन्या गायत्री को सर्वांग सुन्दर और शुद्ध देखकर आश्चर्य चकित रह गये ।७। उसके समान सुन्दर कोई देवी न कोई गन्धर्वी न सुर और न असुर की स्त्री ही थी और नाहीं कोई पन्नगी (नाग कन्या ) ही थी। इन्द्र ने तब उस कन्या गायत्री से पूछा कि तुम कौन हो ? और कहाँ से आयी हो ? और किस की पुत्री हो ८। गोप कन्यां च तां दृष्टवा , गौरवर्ण महाद्युति:। एवं चिन्ता पराधीन ,यावत् सा गोप कन्यका ।।९ ।।

पद्म पुराण सृष्टि खण्ड अध्याय १६ १८२ श्लोक में इन्द्र ने कहा कि तुम बड़ी रूप वती हो , गौरवर्ण वाली महाद्युति से युक्त हो इस प्रकार की गौर वर्ण महातेजस्वी कन्या को देखकर इन्द्र भी चकित रह गया कि यह गोप कन्या इतनी सुन्दर है !👇 यहाँ विचारणीय तथ्य यह भी है कि पहले आभीर-कन्या शब्द गायत्री के लिए आया है फिर गोप कन्या शब्द । अत: अहीर और गोप शब्द परस्पर पर्याय हैं । वस्तुत आभीर और गोप शब्द परस्पर पर्याय वाची हैं पद्म पुराण में पहले आभीर- कन्या शब्द आया है फिर गोप -कन्या भी गायत्री के लिए .. तथा अग्नि पुराण मे भी आभीरों (गोपों) की कन्या गायत्री को कहा है । और सुनो !गो-पालन यदु वंश की परम्परागत वृत्ति ( कार्य ) होने से ही भारतीय इतिहास में यादवों को गोप ( गो- पालन करने वाला ) कहा गया है । वैदिक काल में ही यदु को दास सम्बोधन के द्वारा असुर संस्कृति से सम्बद्ध मानकर ब्राह्मणों की अवैध वर्ण-व्यवस्था ने शूद्र श्रेणि में परिगणित किया था । तो यह दोष ब्राह्मणों का ही है यादवों का कदापि नहीं यदु की गोप वृत्ति को प्रमाणित करने के लिए ऋग्वेद की ये ऋचा सम्यक् रूप से प्रमाण है । ऋग्वेद भारतीय संस्कृति में ही नहीं अपितु विश्व- संस्कृतियों में प्राचीनत्तम है । " उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे । (ऋ०10/62/10) अर्थात् यदु और तुर्वसु नामक दौनों दास गायों से घिरे हुए हैं ; गो-पालन शक्ति के द्वारा सौभाग्य शाली हैं हम उनका वर्णन करते हैं । (ऋ०10/62/10/) विशेष:- व्याकरणीय विश्लेषण - उपर्युक्त ऋचा में दासा शब्द प्रथमा विभक्ति के अन्य पुरुष का द्विवचन रूप है ।
क्योंकि वैदिक भाषा ( छान्दस् ) में प्राप्त दासा द्विवचन का रूप पाणिनीय द्वारा संस्कारित भाषा लौकिक संस्कृत में दासौ रूप में है ।
परिविषे:-परित: चारौ तरफ से व्याप्त ( घिरे हुए) स्मद्दिष्टी स्मत् दिष्टी सौभाग्य शाली अथवा अच्छे समय वाले द्विवचन रूप ।
गोपर् ईनसा सन्धि संक्रमण रूप गोपरीणसा :- गो पालन की शक्ति के द्वारा । गोप: ईनसा का सन्धि संक्रमण रूप हुआ गोपरीणसा जिसका अर्थ है शक्ति को द्वारा गायों का पालन करने वाला । अथवा गो परिणसा गायों से घिरा हुआ यदु: तुर्वसु: च :- यदु और तुर्वसु दौनो द्वन्द्व सामासिक रूप ।
मामहे :- मह् धातु का उत्तम पुरुष आत्मने पदीय बहुवचन रूप अर्थात् हम सब वर्णन करते हैं । अब हम इस तथ्य की विस्तृत व्याख्या करते हैं । यहाँ एक तथ्य विचारणीय है कि असुर शब्द का पर्याय वैदिक सन्दर्भों में दास शब्द है । दास शब्द देव संस्कृति के विरुद्ध रहने वाले दाहिस्तान Dagestan को निवासीयों का विशेषण है ।
---जो ईरानी असुर संस्कृति के अनुयायी तथा अहुर-मज्दा (असुर महत्) में आस्था रखने वाले हैं । पुराणों में भी कहीं गोपों को क्षत्रिय कहा गया है; तो स्मृति-ग्रन्थों में उन्हीं गोपो को शूद्र रूप में वर्णित कर दिया है । अब स्मृति-ग्रन्थों में गोपों को शूद्र कह कर वर्णित किया गया है। यह भी देखें--- इसकी आँशिक वर्णन हम ऊपर कर चुके हैं । यहाँ भी कुछ देखें---👇
व्यास -स्मृति )तथा सम्वर्त -स्मृति में एक स्थान पर लिखा है । स्मृति-ग्रन्थों की रचना काशी में में बारहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में लिखीं गयी । गोपों में हीन भावना भलने के लिए उन्हें शूद्र कन्या में क्षत्रिय से उत्पन्न कर दिया । 👇 "
क्षत्रियात् शूद्र कन्यानाम् समुत्पन्नस्तु य: सुत: । स गोपाल इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशय: अर्थात् क्षत्रिय से शूद्र की कन्या में उत्पन्न होने वाला पुत्र गोपाल अथवा गोप होता है । और विप्रों के द्वारा उनके यहाँ भोजान्न होता है इसमें संशय नहीं .... फिर पाराशर स्मृति में वर्णित है कि..गोप अर्थात् अहीर शूद्र हैं । वर्द्धकी नापितो गोप: आशाप: कुम्भकारक: । वणिक् किरात: कायस्थ: मालाकार: कुटुम्बिन: एते चान्ये च बहव शूद्र:भिन्न स्व कर्मभि: चर्मकारो भटो भिल्लो रजक: पुष्करो नट: वरटो मेद। चाण्डालदास श्वपचकोलका: ।।११।। एतेsन्त्यजा समाख्याता ये चान्ये च गवार्शना: एषां सम्भाषणाद् स्नानंदर्शनादर्क वीक्षणम् ।।१२।। वर्द्धकी (बढ़ई) , नाई , गोप , आशाप , कुम्हार ,वणिक् ,किरात , कायस्थ, माली , कुटुम्बिन, ये सब अपने कर्मों से भिन्न बहुत से शूद्र हैं । चमार ,भट, भील ,धोवी, पुष्कर, नट, वरट, मेद , चाण्डाल ,दाश,श्वपच , तथा कोल (कोरिया)ये सब अन्त्यज कहे जाते हैं । और अन्य जो गोभक्षक हैं वे भी अन्त्यज होते हैं । इनके साथ सम्भाषण करने पर स्नान कर सूर्य दर्शन करना चाहिए तब शुद्धि होती है ।👇
जब रूढि वादी ब्राह्मणों को लगा कि अहीरों की प्रतिष्ठा हम ब्राह्मणों से भी अधिक हो रही है ।तब ब्राह्मणों ने कपट प्रपञ्च के द्वारा अहीरों को शूद्र, दस्यु अथवा हेय रूप में वर्णित किया। स्मृतियों की रचना काशी में हुई , वर्ण-व्यवस्था का पुन: दृढ़ता से विधान पारित करने के लिए काशी के इन ब्राह्मणों ने रूढ़ि वादी पृथाओं के पुन: संचालन हेतु स्मृति -ग्रन्थों की रचना की जो पुष्यमित्र सुंग की परम्पराओं के अनुगामी थे । देखें--- निम्न श्लोक दृष्टव्य है इस सन्दर्भ में..👇
" वाराणस्यां सुखासीनं वेद व्यास तपोनिधिम् । पप्रच्छुमुर्नयोSभ्येत्य धर्मान् वर्णव्यवस्थितान् ।।१।। अर्थात् वाराणसी में सुख-पूर्वक बैठे हुए तप की खान वेद व्यास से ऋषियों ने वर्ण-व्यवस्था के धर्मों को पूछा । निश्चित रूप इन विरोधाभासी तथ्यों से ब्राह्मणों के विद्वत्व की पोल खुल गयी है । जिन्होंने योजना बद्ध विधि से समाज में ब्राह्मण वर्चस्व स्थापित कर के लिए सारे -ग्रन्थों पर व्यास की मौहर लगाकर अपना ही स्वार्थ सिद्ध किया है । देव संस्कृति के विरोधी दास अथवा असुरों की प्रशंसा असंगत बात है ; अत:मह् धातु का अर्थ प्रशंसायाम् के सन्दर्भों में नहीं है ऋग्वेद के प्राय: ऋचाओं में यदु और तुर्वसु का वर्णन नकारात्मक रूप में ही हुआ है ! दास शब्द ईरानी भाषाओं में दाहे शब्द के रूप में विकसित है । नि:सन्देह जिस यदु वंश में गायत्री सदृश्या ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी का जन्म नरेन्द्र सेन अहीर के घर में हुआ हो । और उन्हीं अहीरों के समाज में कृष्ण का जन्म हुआ हो फिर अहीरों को मूर्खों की उपधियाँ क्यों दी गयी ? अहीरों को पृथ्वी पर ईश्वरीय शक्तियाँ का रूप माना गया है । समस्त ब्राह्मणों की साधनाऐं गायत्री के द्वारा सिद्ध होने वाली हैं और वह गायत्री नरेन्द्र सेन अहीर की कन्या है । कुछ पुराणों ने गोपों (यादवों ) को क्षत्रिय भी स्वीकार किया है । ब्रह्म पुराण में वर्णन है कि 👇 " नन्द क्षत्रियो गोपालनाद् गोप : अर्थात् नन्द क्षत्रिय गोपलन करने ही गोप कहलाते हैं ।
( इति ब्रह्म पुराण) और भागवतपुराण में भी यही संकेत मिलता है गर्ग संहिता का उद्धरण हम लिख चुके हैं । भागवतपुराण के यद्यपि बहुतायत अंश प्रक्षिप्त (नकली) है । कुछ यादव विरोधी भागवतपुराण के प्रक्षिप्त नकली अंश उद्धृत करके कहते हैं कि कहते हैं कि वसुदेव और नन्द भाई नहीं थे ! परन्तु भागवतपुराण में ही वसुदेव नन्द को अपना भाई कहते हैं।👇 यदुकुलावतंस्य वरीयान् गोप: के रूप में वर्णित किया है भागवतपुराण के दशम् स्कन्ध अध्याय 5 में नन्द के विषय में वर्णन है । यदुकुलावतंस्य वरीयान् गोप: पञ्च प्राणतुल्येषु । पञ्चसुतेषु मुख्यमस्य नन्द राज:। 67। प्रसिद्ध पर्जन्य गोप के प्रणों के सामान -प्रिय पाँच पुत्र थे जिसमें नन्द राय मुख्य थे ।👇 वसुदेव उपश्रुत्वा,भ्रातरं नन्दमागतम् । पूज्य:सुखमाशीन: पृष्टवद् अनामयम् आदृत:।47। भा०10/5/20/22 यहाँ स्मृतियों के विधान के अनुसार अनामयं शब्द से कुशलक्षेम क्षत्रिय जाति से पूछी जाती है । ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत् बाहु जात: अनामयं । वैश्य सुख समारोग्यं , शूद्र सन्तोष नि इव च।63। ब्राह्मण: कुशलं पृच्छेत् क्षात्र बन्धु: अनामयं । वैश्य क्षेमं समागम्यं, शूद्रम् आरोग्यम् इव च।64। संस्कृत ग्रन्थ नन्द वंश प्रदीप में वर्णित है कि नन्द का जन्म यदुवंशी देवमीढ़ के वंश में हुआ । नन्द का जन्म यदुवंशी देवमीढ़ के वंश में हुई 👇 " नन्दोत्पत्तिरस्ति तस्युत, यदुवंशी नृपवरं देवमीढ़ वंशजात्वात ।65। अब ब्रह्माण्डपुराण के उत्तरखण्ड राधा - हृदय अध्याय 6 में वर्णित है कि " जज्ञिरे वृष्णि कुलस्थ, महात्मनो महोजस: नन्दाद्या वेशाद्या: श्री दामाश्च सबालक: ।68। अर्थात् यदुवंश की वृष्णि शाखा में उत्पन्न नन्द आदि गोप तथा श्री दामा गोप आदि बालक सहित थे ब्रह्म वैवर्त पुराण श्री कृष्ण जन्म खण्ड अ०13,38,39,में सर्वेषां गोप पद्मानां गिरिभानुश्च भाष्कर: पत्नी पद्मावते समा तस्य नाम्ना पद्मावती सती ।। तस्या: कन्या यशोदात्वं लब्धो नन्दश्च वल्लभा: ।94। जब गर्गाचार्य नन्द जी के घर गोकुल में राम और श्याम का नामकरण संस्कार करने गए थे ; तब गर्ग ने कहा कि नन्द जी और यशोदा तुम दोनों उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हो; यशोदा तुम्हारे पिता का नाम गिरिभानु गोप है और माता का नाम पद्मावती सती है तुम नन्द जी को पति रूप पाकर कृतकृत्य हो गईं हो! कुछ कथा- वाचक ---जो कृष्ण चरित्र के विवरण के लिए भागवतपुराण को आधार मानते हैं तो भागवतपुराण भी स्वयं ही परस्पर विरोधाभासी तथ्यों को समायोजित किए हुए है ।👇 रोहिण्यास्तनय: प्रोक्तो राम: संकर्षस्त्वया । देवक्या गर्भसम्बन्ध: कुतो देहान्त विना ।।८ (भागवतपुराण दशम् स्कन्ध अध्याय प्रथम) भगवन् आपने बताया कि बलराम रोहिणी के पुत्र थे ।इसके बाद देवकी के पुत्रों में आपने उनकी गणना क्यों की ? दूसरा शरीर धारण किए विना दो माताओं का पुत्र होना कैसे सम्भव है? तब द्वित्तीय अध्याय श्लोक संख्या 8 में शुकदेव परिक्षित को इसका उत्तर देते हुए कहते हैं ।👇 भगवानपि विश्वात्मा विदित्वा कंसजं भयम् । यदूनां निजनाथानां योग मायां समादिशत् ।6। गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोप गोभिरलंकृतम्। रोहिणी वसुदेवस्य भार्या८८स्ते नन्द गोकुले ।। अन्याश्च कंस संविग्ना विवरेषु वसन्ति हि ।।7
देवक्या जठरे गर्भं शेषाख्यं धाम मामकम् । तत् संनिकृष्य रोहिण्या उदरे संनिवेशय ।।8 अथाहमंशभागेन देवक्या: पुत्रतां शुभे ! प्राप्स्यामि त्वं यशोदायां नन्दपत्न्यां भविष्यसि ।9। अर्थात् विश्वात्मा भागवान् ने देखा कि मुझे हि अपना स्वामी और सब कुछ मानने वाले यदुवंशी गोप कंस के द्वारा बहुत ही सताए जी रहे हैं। तब उन्होंने अपनी योगमाया को आदेश दिया।6। कि देवि ! कल्याणि तुम व्रज में जाओ वह प्रदेश गोपों और गोओं से सुशोभित है । वहाँ नन्द बाबा के गोकुल में वसुदेव की पत्नी रोहिणी गुप्त स्थान पर रह रही हैं। कंस के भय से उनकी और भी पत्नियाँ कंस से डर कर नन्द के सानिध्य में छिपकर रह रहीं हैं 7।। इस समय मेरा अंश जिसे शेष कहते हैं ; देवकी के उदर में गर्भ रूप में स्थित है ! उस गर्भ को तुम वहाँ से निकाल कर गोकुल में रोहिणी के उदर में रख दो ।8। कल्याणि ! अब ---मैं अपने समस्त ज्ञान बल आदि अंशों के साथ देवकी का पुत्र बनुँगा और तुम नन्द की पत्नी यशोदा के गर्भ से जन्म लेना !9। प्रथम बात तो यहाँ यह प्रक्षिप्त है कि(गर्भ अन्तरण )की घटना प्राकृतिक नियमों के विपरीत हो गयी ! ---जो कि असम्भव है।उस युग में वह भी प्राकृतिक सिद्धान्तों के पूर्णत विरुद्ध ! अब भागवतपुराण में परस्पर विरोधाभासी प्रसंग वर्णित करते हैं ---जो संकर्षण शब्द की व्युत्पत्ति-के सन्दर्भ में है ।👇 गर्भ संकर्षणात् तं वै प्राहु: संकर्षणं भुवि । रामेति लोकरमणाद् बलं बलवदुच्छ्रयात् ।13। अर्थात् देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में खींच खींचे जाने के कारण शेष जी को लोग संसार में संकर्षण कहेंगे । अब दशम् स्कन्ध के अष्टम् अध्याय में पहले क्या लिखा है --दौनों की तुलना करें ! भागवतपुराण में गर्गाचार्य संकर्षण शब्द की व्युत्पत्ति-मूलक विश्लेषण (Etymological Analization )ही अवैज्ञानिक व असंगत है प्रस्तुत करते हैं । अयं हि रोहिणी पुत्रो रमयन् सुहृदो गुणै:! आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् बलं विदु: यदूनामपृथग्भावात् संकर्षणमुशन्त्युत।।12 गर्गाचार्य कहते हैं कि यह रोहिणी का पुत्र है इसलिए इसका नाम रौहिणेय भी होगा । यह अपने लगे सम्बन्धियों और मित्रों को अपने गुणों से अत्यन्त आनन्दित करेगा । 


यद्यपि  अहीरों से करौली के जादौंनों की उत्पत्ति हुई 
करौली के जादौनों का उदय  आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध  नवीं सदी के पूर्वार्द्ध में  मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से हुआ जो दशवें अहीर राजा थे ।⬇🔄

राजा धर्मपाल बाद ईस्वी  सन्  879 में इच्छपाल (ऋच्छपाल) मथुरा के शासक हुए ।

 
इनके ही दो पुत्र थे  प्रथम  पुत्र ब्रहमपाल जो मथुरा के शासक थे  हुए दूसरे पुत्र विनायक
पाल  जो महुबा (मध्यप्रदेश) के शासक हुए 

विजयपाल भी करौली के यादव अहीरों की जादौंन शाखा का मूल पुरुष/ आदि पुरुष/ संस्थापक विजयपाल माना गया परन्तु इतिहास में  ब्रह्मपाल ही मान्य हैं 

 विजयपाल जिसने 1040 ईस्वी में अपने राज्य की राजधानी मथुरा से हटाकर बयाना
( विजय मंदिर गढ़) को बनाया ------------


प्रथम भाग .... _________________________
प्रेषक:- यादव योगेश कुमार "रोहि"

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