मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

सुमेरियन पुराणों से भारतीय देवों का उदय-


















































ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल में देव संस्कृति केअनुयायीयो का जीवन संचरण-


सूर्यवंशी राजाओं का राज्य विस्तार:-

महर्षि मरीचि से कश्यप ऋषि की उत्पत्ति हुई और कश्यप और उनकी पत्नी अदिति से विवस्वान की उत्पत्ति हुई विवस्वान और संज्ञा से वैवस्वत मनु की उत्पत्ति हुई।

मनु मानवों के पहले राजा हुए। 

महाराजा मनु और श्रद्धा के दस पुत्र इक्ष्वाकु ,नृग ,शर्याति ,दिष्ट ,धृष्ट ,करूष ,नरिष्यन्त ,पृषध्र ,नभग ,कवि और एक पुत्री इला हुई।

 मनु का एक अन्य पुत्र सुद्दुम्न का भी वर्णन है।



            (श्रीशुक उवाच 8.13)
मनुर्विवस्वतः पुत्रः श्राद्धदेव इति श्रुतः
सप्तमो वर्तमानो यस्तदपत्यानि मे शृणु ।१।

इक्ष्वाकुर्नभगश्चैव धृष्टः शर्यातिरेव च
नरिष्यन्तोऽथ नाभागः सप्तमो दिष्ट उच्यते ।२।

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तरूषश्च पृषध्रश्च दशमो वसुमान्स्मृतः
मनोर्वैवस्वतस्यैते दशपुत्राः परन्तप ।३।

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः
अश्विनावृभवो राजन्निन्द्रस्तेषां पुरन्दरः ।४।

कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वामित्रोऽथ गौतमः
जमदग्निर्भरद्वाज इति सप्तर्षयः स्मृताः ।५।

अत्रापि भगवज्जन्म कश्यपाददितेरभूत्
आदित्यानामवरजो विष्णुर्वामनरूपधृक् ।६।

सङ्क्षेपतो मयोक्तानि सप्तमन्वन्तराणि ते
भविष्याण्यथ वक्ष्यामि विष्णोः शक्त्यान्वितानि च ।७।

विवस्वतश्च द्वे जाये विश्वकर्मसुते उभे
संज्ञा छाया च राजेन्द्र ये प्रागभिहिते तव ।८।

तृतीयां वडवामेके तासां संज्ञासुतास्त्रयः
यमो यमी श्राद्धदेवश्छायायाश्च सुताञ्छृणु ।९।

सावर्णिस्तपती कन्या भार्या संवरणस्य या
शनैश्चरस्तृतीयोऽभूदश्विनौ वडवात्मजौ ।१०।

अष्टमेऽन्तर आयाते सावर्णिर्भविता मनुः
निर्मोकविरजस्काद्याः सावर्णितनया नृप ।११।

तत्र देवाः सुतपसो विरजा अमृतप्रभाः
तेषां विरोचनसुतो बलिरिन्द्रो भविष्यति ।१२।

दत्त्वेमां याचमानाय विष्णवे यः पदत्रयम्
राद्धमिन्द्र पदं हित्वा ततः सिद्धिमवाप्स्यति ।१३।

योऽसौ भगवता बद्धः प्रीतेन सुतले पुनः
निवेशितोऽधिके स्वर्गादधुनास्ते स्वराडिव ।१४।

गालवो दीप्तिमान्रामो द्रोणपुत्रः कृपस्तथा
ऋष्यशृङ्गः पितास्माकं भगवान्बादरायणः ।१५।

इमे सप्तर्षयस्तत्र भविष्यन्ति स्वयोगतः
इदानीमासते राजन्स्वे स्व आश्रममण्डले ।१६।

देवगुह्यात्सरस्वत्यां सार्वभौम इति प्रभुः
स्थानं पुरन्दराद्धृत्वा बलये दास्यतीश्वरः ।१७।

नवमो दक्षसावर्णिर्मनुर्वरुणसम्भवः
भूतकेतुर्दीप्तकेतुरित्याद्यास्तत्सुता नृप ।१८।

पारा मरीचिगर्भाद्या देवा इन्द्रो ऽद्भुतः स्मृतः
द्युतिमत्प्रमुखास्तत्र भविष्यन्त्यृषयस्ततः ।१९।

आयुष्मतोऽम्बुधारायामृषभो भगवत्कला
भविता येन संराद्धां त्रिलोकीं भोक्ष्यतेऽद्भुतः ।२०।

दशमो ब्रह्मसावर्णिरुपश्लोकसुतो मनुः
तत्सुता भूरिषेणाद्या हविष्मत्प्रमुखा द्विजाः ।२१।

हविष्मान्सुकृतः सत्यो जयो मूर्तिस्तदा द्विजाः
सुवासनविरुद्धाद्या देवाः शम्भुः सुरेश्वरः ।२२।

विष्वक्सेनो विषूच्यां तु शम्भोः सख्यं करिष्यति
जातः स्वांशेन भगवान्गृहे विश्वसृजो विभुः ।२३।

मनुर्वै धर्मसावर्णिरेकादशम आत्मवान्
अनागतास्तत्सुताश्च सत्यधर्मादयो दश ।२४।

विहङ्गमाः कामगमा निर्वाणरुचयः सुराः
इन्द्रश्च वैधृतस्तेषामृषयश्चारुणादयः ।२५।

आर्यकस्य सुतस्तत्र धर्मसेतुरिति स्मृतः
वैधृतायां हरेरंशस्त्रिलोकीं धारयिष्यति ।२६।

भविता रुद्र सावर्णी राजन्द्वादशमो मनुः
देववानुपदेवश्च देवश्रेष्ठादयः सुताः ।२७।

ऋतधामा च तत्रेन्द्रो देवाश्च हरितादयः
ऋषयश्च तपोमूर्तिस्तपस्व्याग्नीध्रकादयः ।२८।

स्वधामाख्यो हरेरंशः साधयिष्यति तन्मनोः
अन्तरं सत्यसहसः सुनृतायाः सुतो विभुः ।२९।

मनुस्त्रयोदशो भाव्यो देवसावर्णिरात्मवान्
चित्रसेनविचित्राद्या देवसावर्णिदेहजाः ।३०।

देवाः सुकर्मसुत्राम संज्ञा इन्द्रो दिवस्पतिः
निर्मोकतत्त्वदर्शाद्या भविष्यन्त्यृषयस्तदा ।३१।

देवहोत्रस्य तनय उपहर्ता दिवस्पतेः
योगेश्वरो हरेरंशो बृहत्यां सम्भविष्यति ।३२।

मनुर्वा इन्द्र सावर्णिश्चतुर्दशम एष्यति
उरुगम्भीरबुधाद्या इन्द्र सावर्णिवीर्यजाः ।३३।

पवित्राश्चाक्षुषा देवाः शुचिरिन्द्रो भविष्यति
अग्निर्बाहुः शुचिः शुद्धो मागधाद्यास्तपस्विनः ।३४।

सत्रायणस्य तनयो बृहद्भानुस्तदा हरिः
वितानायां महाराज क्रियातन्तून्वितायिता ।३५।

राजंश्चतुर्दशैतानि त्रिकालानुगतानि ते
प्रोक्तान्येभिर्मितः कल्पो युगसाहस्रपर्ययः ।३६।

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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे मन्वन्तरानुवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः


श्रीमद्भागवत महापुराण: अष्टम स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 1-22 का हिन्दी अनुवाद -


आगामी सात मन्वन्तरों का वर्णन करते हुए शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित ! विवस्वान् के पुत्र यशस्वी श्राद्धदेव ही सातवें (वैवस्वत) मनु हैं। यह वर्तमान मन्वन्तर ही उनका कार्यकाल है। उनकी सन्तान का वर्णन मैं करता हूँ। 

वैवस्वत मनु के दस पुत्र हैं- इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, दिष्ट, करुष, पृषध्र और वसुमान। 

परीक्षित ! इस मन्वन्तर में आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, अश्विनीकुमार और ऋभु- ये देवताओं के प्रधान गण हैं और पुरन्दर उनका इन्द्र है।

 कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज- ये सप्तर्षि हैं। 

इस मन्वन्तर में भी कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से आदित्यों के छोटे भाई वामन के रूप में भगवान् विष्णु ने अवतार ग्रहण किया था। 

परीक्षित! इस प्रकार मैंने संक्षेप से तुम्हें सात मन्वन्तरों का वर्णन सुनाया; अब भगवान् की शक्ति से युक्त अगले (आने वाले) सात मन्वन्तरों का वर्णन करता हूँ। परीक्षित! यह तो मैं तुम्हें पहले (छठे स्कन्ध में) बता चुका हूँ कि विवस्वान् (भगवान् सूर्य) की दो पत्नियाँ थीं- संज्ञा और छाया।

 ये दोनों ही विश्वकर्मा की पुत्री थीं। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि उनकी एक तीसरी पत्नी वडवा भी थी। (मेरे विचार से तो संज्ञा का ही नाम वडवा हो गया था।) 

उन सूर्यपत्नियों में संज्ञा से तीन सन्तानें हुईं- यम, यमी और श्राद्धदेव। 

छाया के भी तीन सन्तानें हुईं- सावर्णि, शनैश्चर और तपती नाम की कन्या जो संवरण की पत्नी हुई। 

जब संज्ञा ने वडवा का रूप धारण कर लिया, तब उससे दोनों अश्विनीकुमार हुए। 

आठवें मन्वन्तर में सावर्णि मनु होंगे। 

उनके पुत्र होंगे निर्मोक, विरजस्क आदि। परीक्षित! उस समय सुतपा, विरजा और अमृतप्रभ नामक देवगण होंगे। उन देवताओं के इन्द्र होंगे विरोचन के पुत्र बलि। 

विष्णु भगवान् ने वामन अवतार ग्रहण करके इन्हीं से तीन पग पृथ्वी माँगी थी; परन्तु इन्होंने उनको सारी त्रिलोकी दे दी। राजा बलि को एक बार तो भगवान् ने बाँध दिया था, परन्तु फिर प्रसन्न होकर उन्होंने इनको स्वर्ग से भी श्रेष्ठ सुतल लोक का राज्य दे दिया। 

वे इस समय वहीं इन्द्र के समान विराजमान हैं। आगे चलकर ये ही इन्द्र होंगे और समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण इन्द्रपद का भी परित्याग करके परमसिद्धि प्राप्त करेंगे। गालव, दीप्तिमान्, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यश्रृंग और हमारे पिता भगवान् व्यास- ये आठवें मन्वन्तर में सप्तर्षि होंगे। 

इस समय ये लोग योग बल से अपने-अपने आश्रम मण्डल में स्थित हैं।

 देवगुह्य की पत्नी सरस्वती के गर्भ से सार्वभौम नामक भगवान् का अवतार होगा।

 ये ही प्रभु पुरन्दर इन्द्र से स्वर्ग का राज्य छीनकर राजा बलि को दे देंगे। परीक्षित ! वरुण के पुत्र दक्षसावर्णि नवें मनु होंगे। भूतकेतु, दीप्तकेतु आदि उनके पुत्र होंगे।

 पार, मारीचिगर्भ आदि देवताओं के गण होंगे और अद्भुत नाम के इन्द्र होंगे।

 उस मन्वन्तर में द्युतिमान् आदि सप्तर्षि होंगे। आयुष्यमान् की पत्नी अम्बुधारा के गर्भ से ऋषभ के रूप में भगवान् का कलावतार होगा। 

अद्भुत नामक इन्द्र उन्हीं की दी हुई त्रिलोकी का उपभोग करेंगे। दसवें मनु होंगे उपश्लोक के पुत्र ब्रह्मसावर्णि। उनमें समस्त सद्गुण निवास करेंगे। भूरिषेण आदि उनके पुत्र होंगे और हविष्यमान्, सुकृति, सत्य, जय, मूर्ति आदि सप्तर्षि। सुवासन, विरुद्ध आदि देवताओं के गण होंगे और इन्द्र होंगे शम्भु 

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श्रीमद्भागवत महापुराण: अष्टम स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 23-36 का हिन्दी अनुवाद

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विश्वसृज की पत्नी विषूचि के गर्भ से भगवान् विष्वक्सेन के रूप में अंशावतार ग्रहण करके शम्भु नामक इन्द्र से मित्रता करेंगे।

ग्यारहवें मनु होंगे अत्यन्त संयमी धर्म सावर्णि। उनके सत्य, धर्म आदि दस पुत्र होंगे। 

विहंगम, कामगम, निर्वाणरुचि आदि देवताओं के गण होंगे।

 अरुणादि सप्तर्षि होंगे वैधृत नाम के इन्द्र होंगे। आर्यक की पत्नी वैधृता के गर्भ से धर्मसेतु के रूप में भगवान् का अंशावतार होगा और उसी रूप में वे त्रिलोकी की रक्षा करेंगे।

परीक्षित ! बारहवें मनु होंगे रुद्र सार्वणि। उनके देववान्, उपदेव और देवश्रेष्ठ आदि पुत्र होंगे। उस मन्वन्तर में ऋतुधामा नामक इन्द्र होंगे और हरित आदि देवगण। तपोमूर्ति, तपस्वी आग्नीध्रक आदि सप्तर्षि होंगे। सत्यसहाय की पत्नी सूनृता के गर्भ से स्वधाम के रूप में भगवान् का अंशावतार होगा और उसी रूप में भगवान उस मन्वन्तर का पालन करेंगे।

तेरहवें मनु होंगे परम जितेन्द्रिय देवसावर्णि। चित्रसेन, विचित्र आदि उनके पुत्र होंगे। सुकर्म और सुत्राम आदि देवगण होंगे तथा इन्द्र का नाम होगा दिवस्पति। 

उस समय निर्मोक और तत्त्वदर्श आदि सप्तर्षि होंगे। देवहोत्र कि पत्नी बृहती के गर्भ से योगेश्वर के रूप में भगवान का अंशावतार होगा और उसी रूप में भगवान् दिवस्पति को इन्द्र-पद देंगे।

महराज! चौदहवें मनु होंगे इन्द्र सावर्णि। उरू, गम्भीर, बुद्धि आदि उनके पुत्र होंगे। उस समय पवित्र, चाक्षुष आदि देवगण होंगे और इन्द्र का नाम होगा शुचि। 

अग्नि, बाहु, शुचि, शुद्ध और मागध आदि सप्तर्षि होंगे। उस समय सत्रायण की पत्नी विताना के गर्भ से बृहद्भानु के रूप में भगवान अवतार ग्रहण करेंगे तथा कर्मकाण्ड का विस्तार करेंगे।

परीक्षित!  ये चौदह मन्वन्तर भूत, वर्तमान और भविष्य- तीनों ही काल में चलते रहते हैं। इन्हीं के द्वारा एक सहस्र चतुर्युगी वाले कल्प के समय की गणना की जाती है।

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मनु पुत्र इक्ष्वाकु का वंश :-

महाराजा मनु के बड़े पुत्र इक्ष्वाकु हुए इनके कई पुत्र हुए परन्तु तीन मुख्य हुए विकुक्षि ,निमि ,दण्ड।

विकुक्षि :-

राजा विकुक्षि के पुत्र पुरंजय के पुत्र शाबस्त ने शाबस्तीपुरी का निर्माण किया जो आधुनिक श्राबस्ती (अयोध्या ) के पास था।

विकुक्षि के बारहवें वंश में सम्राट मान्धाता हुए जो एक महान राजा हुए उन्होंने अपने राज्य का बहुत विस्तार किया उन्होंने यदु के छठवें वंश में उत्पन्न शशिबिन्दु की पुत्री बिंदु मती से विवाह करके अपने प्रभाव का विस्तार किया। मान्धाता के तीन पुत्र पुरुकुत्स ,अम्बरीष और मुचुकुन्द हुए।

मान्धाता पुत्र पुरुकुत्स और उनके वंशज :-

पुरुकुत्स की पत्नी नर्मदा नाग जाति की कन्या थी। नाग जाति के लोग गन्धर्वों से बहुत परेशान थे और उन्होंने अपनी बहन नर्मदा को प्रेरित किया जिससे नर्मदा का कहने पर पुरुकुत्स वहाँ सेना लेकर गया और गन्धर्वो को पराजित करके नाग जाति की रक्षा की। सम्भवता इसी वजह से रेवा नदी का नाम नर्मदा पड़ा।

बाहु व सगर :-

इक्ष्वाकु वंशीय मान्धाता के पुत्र पुरुकुत्स की सत्रहवीं पीढ़ी में बाहु नामक राजा हुआ। बाहु हैहह ,तालजंघीय क्षत्रियों से पराजित होकर अपनी रानी के साथ वन में चला गया था तथा और्व ऋषि के आश्रम के समीप रहने लगा बाद में उसकी मृत्यु हो गयी उसके मरने के दौरान उसकी रानी गर्भवती थी इसी समय रानी की सौत ने उसे विष दे दिया लेकिन ऋषि के आशीर्वाद से बालक जीवित बच गया। विष अर्थात गर के साथ ही जन्म लेने के कारण उसका नाम सगर पड़ा। राजा सगर ने बड़े होकर हैहह व तालजंघीय राजाओं को दबाया व यवनों और म्लेक्षों को भी परास्त किया।

सगर का पुत्र असमंजस दुष्ट प्रकृति का था जबकि पोता अंशुमान धर्मपरायण। अंशुमान का पुत्र दिलीप और दिलीप का पुत्र भागीरथ हुआ। भगीरथ को गंगा को धरती पर लाने का श्रेय मिला और राजा भगीरथ के नाम पर गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा । भागवत महापुराण के अनुसार भगीरथ के अट्ठारहवें वंश में दशरथ राजा हुए। राजा दशरथ के चार पुत्र राम ,भरत ,लक्ष्मण ,शत्रुघ्न हुए

श्री राम और उनके भाई :-

राम एक आदर्श राजा और विष्णु के अवतार थे। राम के पुत्र कुश ने कुशावती नगरी बसायी जो आधुनिक कुशीनगर के पास थी। लव ने शरावती नगर बसाया।

भरत के पुत्र तक्ष ने तक्षशिला और पुष्कल ने पुष्कलावती नगर बसाया। तक्षशिला झेलम नदी के उत्तर में और पुष्कलावती पेशावर के आस पास थी।

शत्रुघ्न ने श्री राम के आदेश पर मधु के पुत्र लवण नामक दैत्य का वध किया और मधुरा (संभवतः मथुरा) नगरी की स्थापना की। यह नगरी शत्रुघ्न पुत्र शूरसेन के नाम पर शूरसेन भी कहलायी। अपने पुुत्र शत्रुघाती के लिए शत्रुघ्न ने विदिशा राष्ट्र बसाया।(स. वाल्मीकि रामायण उत्तर कांड)

लक्ष्मण के पुत्र अंगद ने अंगदीया नगरी बसाई जो आधुनिक बस्ती जिले के पास थी। चंद्रकेतु ने गोरखपुर में मल्ल राष्ट्र की स्थापना किया।

राम पुत्र कुश के वंशज वृहद्रल ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था और उसे अभिमन्यु ने मारा था।

वृहद्रल की 29 वीं पीढ़ी में सुमित्र नामक राजा हुआ जो इक्ष्वाकु वंश का अंतिम राजा था।

इक्ष्वाकु पुत्र निमि :-

इक्ष्वाकु के पुत्र निमि के विदेह नामक पुत्र हुआ इसे मिथि भी कहा जाता है इसी के नाम पर मिथिला नगरी का नाम हुआ। निमि के 14 वें वंश में सीरध्वज राजा हुए इन्हे राजा जनक भी कहा जाता है इन्ही की पुत्री सीता का विवाह श्री राम से हुआ था। जनक वंशीय अंतिम राजा कृति था।

मनु पुत्र दिष्ट :-

उनके पुत्र दिष्ट के वंशज करन्धम एक दिग्विजयी राजा हुए। दिष्ट के 27 वें वंश में तृणबिन्दु राजा हुए और उनके पुत्र विशाल ने वैशाली नगरी (मुजफ्फरपुर ,दरभंगा के पास )की स्थापना किया।

मनु पुत्र शर्याति :-

आर्यों का राज्य गुजरात में भी फैला।

मनु के पुत्र शर्याति के पुत्र आनर्त के नाम पर उत्तरी गुजरात में आनर्त देश की स्थापना हुई उसकी राजधानी कुशस्थली (जहाँ द्वारिकापुरी है ) थी।

आनर्त के पुत्र रेवत के बाद वहाँ पुण्यजन नामक राक्षस जाति के लोगों ने आक्रमण किया और उनकी नगरी को नष्ट कर दिया। रेवत के भाई पराजित होकर विभिन्न स्थानों पर चले गए और क्षत्रियों के राज्य स्थापित किये।

मनु पुत्र धृष्ट :-

महाराजा मनु के पुत्र धृष्ट के वंशज धार्ष्टक क्षत्रिय हुए। उन्होंने पंजाब में अपना राज्य स्थापित किया। इन्हे उत्तरीय प्रांतों का रक्षक कहा गया।

मनु पुत्र करूष :-

उनके पुत्र करूष से कारुष क्षत्रिय हुए। इन्होने दक्षिण पश्चिम बिहार में अपना राज्य स्थापित किया।

मनु पुत्र नभग :-

महाराजा मनु पुत्र नभग के नाभाग उससे अंबरीश फिर विरुप उससे पृषदश्व तथा पृषदश्व से रतीरथ हुआ।

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मनु पुत्र नरिष्यन्त :-

आर्यों का राज्य नरिष्यन्त के कारण मध्य एशिया की ओर विस्तृत हुआ ऐसा धर्म ग्रंथों से संकेत मिलता है।

मनु पुत्र नरिष्यन्त के चित्रसेन फिर ऋक्ष और फिर मीढ़वान हुए। नारिष्यन्त के कुछ वंशज पश्चिमोत्तर दर्रे से होकर मध्य एशिया गए और कुछ दक्षिण को चले गए।

सुदुम्न :-

मनु का एक अन्य पुत्र के बारे में जानकारी मिलती है उसका नाम सुद्दुम्न था। उसने पूर्वी भाग मुख्यतया बिहार के पास अपना राज्य स्थापित किया।

सुद्दुम्न के तीन पुत्र हुए उत्कल ,गय और विमल। उत्कल से उड़ीसा का प्रान्त और गय से गया का प्रान्त बसा।

चंद्रवंशी राजाओं का राज्य विस्तार :-

आर्यों का राज्य वंश में सूर्य वंश के बाद चंद्र वंश महत्वपूर्ण राजवंश था इसका विकास सूर्यवंश से भी अधिक हुआ।

महर्षि अत्रि और अनुसूया से चंद्र की उत्पत्ति हुई। चंद्र से बुध की उत्पत्ति हुई और बुध का विवाह मनु की पुत्री इला से हुआ।

बुध की पत्नी इला से पुरुरवा की उत्पत्ति हुई जो संसार में ऐल पुरुरवा के नाम से विख्यात हुए। पुरुरवा के कई पुत्र हुए जिसमें से उनके पुत्र आयु ने राहु की कन्या से विवाह किया।

पुरुरवा के पुत्र आयु के वंशज :-

आयु के नहुष ,क्षत्रवृद्धि ,रम्भ ,रजि ,अनेना ये पांच पुत्र हुए।

क्षत्रवृद्धि के सुहोत्र, सुहोत्र के काश्य ,काश और गृहतसमद नामक तीन पुत्र हुए।

काश्य के वंशज काश्यवंशीय कहलाये। काश्य का पुत्र काशीराज काशेय हुआ। काशेय से राष्ट्र फिर दीर्घतमा और फिर धन्वन्तरि हुए जो कि आयुर्वेद के प्रणेता थे। उन्होंने संपूर्ण आयुर्वेद को आठ भागों में विभक्त किया।

आयु का पुत्र रजि धर्म विरोधी था। रम्भ सन्तान हीन था।

नहुष का वंश :-

पुरुरवा के पुत्र आयु के पुत्र नहुष के वंश का बहुत विस्तार हुआ।

नहुष के पांच पुत्र कृति ,वियाति ,आयाति ,संयाति ,ययाति और यति हुए।

ययाति :-

ययाति भारत के सम्राट थे उनका राज्य बहुत विस्तृत था। ययाति की दो रानियाँ थीं देवयानी और शर्मिष्ठा।

राजा ययाति के देवयानी से यदु और दुर्वसु तथा शर्मिष्ठा से द्रुह्यु ,अनु व पुरु हुए।

ययाति पुत्र यदु का वंश :-

महाराजा ययाति पुत्र यदु के सहस्त्रजित ,क्रोष्टु ,नल और नहुष ये चार पुत्र हुए।

सहस्त्रजित :-

सहस्त्रजित का पुत्र शतजित हुआ उसके तीन पुत्रों में से एक का नाम हैहय हुआ। हैहय के पाँचवें वंश में महिष्मान नामक राजा हुआ इसी ने माहिष्मती पुरी(दक्षिणी मध्यप्रदेश ) का निर्माण किया।

महिष्मान के तीसरे वंश में धनक नामक राजा हुआ। धनक के चार पुत्रों में से एक कृतवीर्य हुआ। कृतवीर्य का पुत्र अर्जुन हुआ जिसे कार्तवीर्य व सहस्त्रबाहु भी कहा जाता है।

कार्तवीर्य अर्जुन बड़ा ही प्रतापी राजा हुआ। अर्जुन ने बड़े पैमाने पर दिग्विजय किया उसने दक्षिण के राजाओं को अपने अधीन किया और राक्षस जाति को दबा कर रखा। उस समय लंका का राजा रावण दिग्विजय के अभियान पर था और दिग्विजय के उद्देश्य से रावण ने नर्मदा नदी के किनारे माहिष्मती पुरी के पास डेरा डाला। कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रबाहु) को जब यह पता चला तो उसने रावण पर आक्रमण करके उसे बंदी बना लिया और बहुत समय बाद छोड़ा।

सहस्त्रबाहु अपने बल के घमंड में उद्दंड हो गया था और ऋषियों का अपमान करने लगा था इसलिए जमदग्नि पुत्र भगवान परशुराम ने उसका वध कर दिया। सहस्त्रबाहु के मरने के बाद राक्षस जातियाँ फिर से सक्रिय हो गयीं।

सहस्त्रबाहु अर्जुन के पांच मुख्य पुत्रों में से जयध्वज का पुत्र तालजंघ हुआ। तालजंघ की वजह से उसके वंशज तालजंघीय क्षत्रिय कहलाये। तालजंघ के कई पुत्र थे राजा सगर ने उनका वध किया था।

तालजंघ का पुत्र वीतिहोत्र था जिसके मधु और मधु के वृष्णि हुए। मधु के नाम पर ये माधव वंशीय और वृष्णि के नाम पर वृष्णिवंशीय कहलाये। ये सभी राजा यदु के वंशज थे इसलिए यादव कहलाये। (स. भागवत महापुराण )

यदु पुत्र क्रोष्टु :-

यदु के एक अन्य पुत्र क्रोष्टु थे। क्रोष्टु के पांचवें वंश में शशिबिन्दु राजा हुए। शशिबिन्दु के एक पुत्र पृथुश्रवा के पांचवें वंश में परावृत राजा हुए परावृत के पुत्र ज्यामघ के विदर्भ नामक एक पुत्र हुआ। विदर्भ के तीन पुत्र क्रथ ,कैशिक और रोमपाद हुए।

विदर्भ पुत्र क्रथ के वंशज सत्वत से सात्वत वंश चला। सत्वत के सात पुत्र थे भजन ,भजमान ,दिव्य ,अन्धक ,देववृद्ध ,महाभोज ,वृष्णि।

सत्वत के पुत्र वृष्णि के वंश में अक्रूर जी का जन्म हुआ था। सत्वत पुत्र महाभोज की सन्तानें भोजवंशी (मृत्तिकावरपुर निवासी ) कहलाये।

यदु पुत्र क्रोष्टु के वंशज सत्वत के पुत्र अन्धक के चार पुत्र हुए कुकर ,भजमान ,शुचिकम्बल और बर्हिष।

अन्धक पुत्र कुकर के आठवें वंश में आहुक नामक पुत्र हुआ ,उसके देवक और उग्रसेन दो पुत्र हुए। देवक की पुत्री देवकी का विवाह वसुदेव जी से हुआ।

उग्रसेन का पुत्र कंस हुआ।

अन्धक पुत्र भजमान के वंशज देवगर्भ हुए उनके शूरसेन नामक पुत्र हुआ उससे वसुदेव जी का जन्म हुआ। वसुदेव से भगवान श्री कृष्ण और बलराम हुए।

वसुदेव के पिता शूरसेन की कई पुत्रियाँ थीं उन्होंने निःसन्तान कुन्ति भोज को अपनी पृथा (कुन्ती )नामक पुत्री गोद दे दी थी।

यदु पुत्र क्रोष्टु के वंशज विदर्भ पुत्र रोमपाद के वंश में चेदि ने जन्म लिया और उनसे चैद्य राजा हुए ।चेदि के नाम पर चेदि राज्य का निर्माण हुआ।इसी में शिशुपाल हुआ जिसका वध भगवान श्री कृष्ण ने किया था।

सम्राट ययाति का पुत्र दुर्वसु का वंश मरुत पर समाप्त हो जाता है क्योंकि वह निः सन्तान था और उसने पुरु वंशीय दुष्यंत को अपना पुत्र स्वीकार कर लिया था।

ययाति पुत्र द्रुह्यु :-

आर्यों का राज्य अब आधुनिक पाकिस्तान तक विस्तृत हुआ।

ययाति के पुत्र द्रुह्यु के चौथे वंश में गांधार राजा हुआ उसने गांधार देश(पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान ) की स्थापना किया। गांधार का वंशज प्रचेता हुआ ,इस प्रचेता के कई पुत्र हुए ये सभी उत्तर दिशा में म्लेक्षों के अधिपति बने।

ययाति पुत्र अनु :-

उनके पुत्र अनु के तीन पुत्र हुए इनमे सभानल के तीसरी पीढ़ी में पुरंजय नामक राजा हुआ जो एक प्रतापी राजा था। पुरंजय के वंशज महामना के दो पुत्र उशीनर और तितिक्षु हुए।

उशीनर के पुत्र शिवि के वृषादर्भ, सुवीर ,कैकय ,मद्रक नामक पुत्र हुए और इन्ही के नाम पर ये राज्य सुवीर (पाकिस्तान में सिंधु नदी के किनारे नवाब शाह ,बेंद के आसपास ),मद्र (स्यालकोट के दक्षिण ),कैकय (पंजाब) स्थापित हुए।

तितिक्षु का वंशज बलि हुआ। दीर्घतमा ऋषि के आशीर्वाद से बलि के बालि के छः पुत्र अंग ,बंग ,कलिंग ,सुह्य ,पुण्ड्र अन्ध्र हुए। इन्होंने अपने ही नाम पर ये राज्य स्थापित किये। जिनमे अंग (उत्तरी पूर्वी बिहार ),बंग (बंगाल ),कलिंग (उड़ीसा ),सुह्य (म्यांमार के पास ),पुण्ड्र (असम बंगाल ),अन्ध्र (आंध्र प्रदेश ) हैं।

आर्यों का राज्य बलि के पुत्रों ने पूर्वी भागों तक विस्तृत किया।

बलि के पुत्र अंग के चौथे वंशज चित्ररथ हुए जिनका दूसरा नाम रोमपाद था ये श्री राम के पिता दशरथ के मित्र थे। राजा दशरथ ने इन्हे संतानहीन जानकार अपनी शान्ता नाम की कन्या चित्ररथ को गोद दे दी थी। शांता का विवाह बाद में ऋष्य श्रृंग ऋषि से हुआ। चित्ररथ के वंश में चम्प नामक राजा हुए इन्होने चम्पा नगरी(भागलपुर ,मुंगेर ) बसायी। यही का राजा महाभारत काल का दुर्योधन का मित्र कर्ण हुआ।

ययाति पुत्र पुरु :-

पुरुरवा के वंशज ययाति के पुत्र पुरु के 21 वें वंश में अन्तिनार राजा हुआ जिसके वंशज दुष्यंत पुत्र भरत हुए

भरत शकुंतला के पुत्र और चक्रवर्ती सम्राट थे कहा जाता है कि उन्ही के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।

भरत के वंशज सुहोत्र का पुत्र हस्ति हुआ। हस्ति ने हस्तिनापुर नगरी(वर्तमान मेरठ के पास ) का निर्माण किया हस्ति के तीन पुत्र अजमीढ़ ,द्विमीढ़ व पुरुमीढ़ हुए।

पुरु के वंशज हस्ति के पुत्र अजमीढ़ और उसकी पत्नी नलिनी से नील की उत्पत्ति हुई। नील के वंशज हर्यश्व के पांच पुत्र हुए -सञ्जय, काम्पिल्य , वृहदिषु ,यवीनर और मुद्गल। हर्यश्व ने कहा था कि ये मेरे पांच पुत्र पाँच देशों पर शासन करने में समर्थ हैं , ये लोग सम्मिलित रूप से पांचाल कहलाये। मुद्गल का पुत्र दिवोदास हुआ और पुत्री अहिल्या हुई जिसका विवाह गौतम ऋषि से हुआ था। दिवोदास के वंश में राजा द्रुपद हुआ।

पुरु के वंशज हस्ति के पुत्र अजमीढ़ का एक अन्य पुत्र ऋक्ष हुआ जिसका पुत्र संवरण और संवरण का पुत्र कुरु हुआ जिसने धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र का निर्माण किया।

कुरु के पुत्र सुधन्वा के वंश में वृहद्रथ हुआ और उसका पुत्र जरासंध हुआ।

कुरु के पुत्र जन्हु के वंश में प्रतीप राजा हुआ। प्रतीप के तीन पुत्र देवापि ,शांतनु और बाह्लीक हुए।

शान्तनु के गंगा से भीष्म जो कि ब्रह्मचारी थे और सत्यवती से विचित्रवीर्य और चित्रांगद हुए। विचित्रवीर्य से धृतराष्ट्र और पाण्डु हुए इन्हीं से कौरव और पाण्डव हुए। बाद में पाण्डव अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राज्य सौंपकर तप करने चले गए।

परीक्षित का पुत्र जन्मेजय हुआ उसकी चौथी पीढ़ी में निचक्नु राजा हुआ। बाढ़ के कारण जब हस्तिनापुर गंगा में बह गयी तो उसने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया। निचक्नु से होते हुए यह वंश शतानीक ,उदयन। अंत में दंडपाणि उसके पुत्र निरमित्र तक जाता है।

उपसंहार-

आर्यों का राज्य का विस्तार संपूर्ण भारतवर्ष और अंत में विश्व के अन्य भागों तक गया। आर्य राजाओं के कई पुत्रों का वर्णन नहीं मिलता उन्होंने भी अपने राज्य अवश्य स्थापित किये होंगे।

विशेष- :देव संस्कृति के अनुयायियों की वंशावली का वर्णन भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में दिया गया है पर कहीं -कहीं अपवाद वश इक्का-दुक्का नामों में अंतर आ गया है।

इसे भी देखें:-

" गाधि वंश की उत्पत्ति और विकास

 

 जह्नु वही थे जो गंगा जी को अपनी अंजलि में पी गए थे. जह्नु के पुत्र थे पुरू, पुरू के बलाक, बलाक के अज़क. अज़क के पुत्र कुश हुए. कुश के चार पुत्र हुए, कुशाम्बु, तनय, वशु और कुशनाभ. इनमे से कुशाम्बु के पुत्र हुए गाधि. यहाँ से प्राम्भ होती है, परशुराम और विश्वामित्र जी के जन्म की कथा:

गाधि की कन्या का नाम था सत्यवती. ऋचिक ऋषि ने गाधि से उनकी कन्या मांगी, गाधि ने ये समझकर की ये कन्या के योग्य वार नहीं है, ऋचीक से कहा- मुनिवर, हम लोग कुशिक (कौशिक) वंश के क्षत्रिय है, और आप ठहरे ब्राह्मण, अतएव हमारी कन्या मिलना कठिन है. कुछ शर्त की प्रतिपूर्ति के बाद ऋचीक और सत्यवती जी का विवाह हो गया.

 एक दिन सत्यवती जी ने ऋचीक मुनि से अपने एवं अपनी माता के लिए पुत्र की इच्छा ब्यक्त की. अपनी माता के लिए जाती के अनुसार क्षत्रिय एवं अपने लिए ब्राह्मण. (सत्यवती की माता का पुत्र उनका भाई होगा). मुनि द्वारा दिया गया फल बदल जाने की वजह से सत्यवती को जमदग्नि और जमदग्नि को वसुमान आदि कई पुत्र हुए, जिनमे सबसे छोटे परशुराम जी थे, जो फल बदल जाने की वजह से क्षत्रिय कर्म को प्राप्त हुए.

 उधर सत्यवती जी की पिता गाधि एवं माता जी को अग्नि के सामान परम तेजस्वी विश्वामित्र जी हुए. उन्होंने अपने तपोबल से एक अन्य सृष्टि का निर्माण किया, जिसकी वंशावली के अंतर्गत कौशिक गोत्र के ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनों ही अपने अपने कर्मानुसार बने.

सुमेरियन पुराणों से ये कथाओ भारतीयों में प्रसारित हुईं


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(हरिवंश पुराण हरिवंश पर्व-२७वाँ अध्याय)

जह्नुस्तु दयितं पुत्रं सुनहं नाम धार्मिकम् ।
कावेर्यां जनयामास अजकस्तस्य चात्मजः ।1.27.१० ।।


अजकस्य तु दायादो बलाकाश्वो महीपतिः ।
बभूव मृगयाशीलः कुशस्तस्यात्मजोऽभवत् ।। ११ ।।


कुशपुत्रा बभूवुर्हि चत्वारो देववर्चसः ।
कुशिकः कुशनाभश्च कुशाम्बो मूर्तिमांस्तथा ।। १२ ।।


पह्लवैः सह संवृद्धिं राजा वनचरैस्तदा ।
कुशिकस्तु तपस्तेपे पुत्रमिन्द्रसमप्रभम्।
लभेयमिति तं शक्रस्त्रासादभ्येत्य जक्षिवान् ।। १३ ।।


पूर्णे वर्षसहस्रे वै तं तु शक्रो ह्यपश्यत ।
अत्युग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरंदरः ।। १४ ।।


समर्थः पुत्रजनने स्वमेवांशमवासयत्।
पुत्रत्वे कल्पयामास स देवेन्द्रः सुरोत्तमः ।। १५ ।।


स गाधिरभवद्राजा मघवान् कौशिकः स्वयम्।
पौरुकुत्स्यभवद् भार्या गाधिस्तस्यामजायत ।। १६ ।।


गाधेः कन्या महाभागा नाम्ना सत्यवती शुभा ।
तां गाधिर्भृगुपुत्राय ऋचीकाय ददौ प्रभुः ।। १७ ।।


तस्याः प्रीतोऽभवद् भर्ता भार्गवो भृगुनन्दनः ।
पुत्रार्थं कारयामास चरुं गाधेस्तथैव च ।। १८ ।।


उवाचाहूय तां भर्ता ऋचीको भार्गवस्तदा ।
उपयोज्यश्चरुरयं त्वया मात्रा त्वयं तव ।। १९ ।।

_______________
तस्यां जनिष्यते पुत्रो दीप्तिमान् क्षत्रियर्षभः ।
अजेयः क्षत्रियैर्लोके क्षत्रियर्षभसूदनः ।। 1.27.२० ।।


तवापि पुत्रं कल्याणि धृतिमन्तं तपोनिधिम्।
शमात्मकं द्विजश्रेष्ठं चरुरेष विधास्यति ।। २१ ।।


एवमुक्त्वा तु तां भार्यामृचीको भृगुनन्दनः ।
तपस्यभिरतो नित्यमरण्यं प्रविवेश ह ।। २२ ।।


गाधिः सदारस्तु तदा ऋचीकावासमभ्यगात्।
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन सुतां द्रष्टुं जनेश्वरः ।। २३ ।।


चरुद्वयं गृहीत्वा तद्ऋषेः सत्यवती तदा ।
चरुमादाय यत्नेन सा तु मात्रे न्यवेदयत् ।।२४ ।।


माता व्यत्यस्य दैवेन दुहित्रे स्वं चरुं ददौ ।
तस्याश्चरुमथाज्ञानादात्मसंस्थं चकार ह ।। २५ ।।


अथ सत्यवती गर्भे क्षत्रियान्तकरं तदा ।
धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शनम् ।। २६ ।।


तामृचीकस्ततो दृष्ट्वा योगेनाभ्यनुसृत्य च ।
तामब्रवीद् द्विजश्रेष्ठः स्वां भार्यां वरवर्णिनीम् ।। २७ ।।


मात्रासि वञ्चिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना ।
जनिष्यति हि पुत्रस्ते क्रूरकर्मातिदारुणः ।। २८ ।।


भ्राता जनिष्यते चापि ब्रह्मभूतस्तपोधनः ।
विश्वं हि ब्रह्म तपसा मया तस्मिन्समर्पितम् ।। २९ ।।


एवमुक्ता महाभागा भर्त्रा सत्यवती तदा ।
प्रसादयामास पतिं पुत्रो मे नेदृशो भवेत् ।
ब्राह्मणापसदस्तत्र इत्युक्तो मुनिरब्रवीत् ।। 1.27.३० ।।


नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथास्त्विति ।
उग्रकर्मा भवेत् पुत्रः पितुर्मातुश्च कारणात्।
पुनः सत्यवती वाक्यमेवमुक्ताब्रवीदिदम् ।। ३१ ।।


इच्छँलोकानपि मुने सृजेथाः किं पुनः सुतम्।
शमात्मकमृजुं त्वं मे पुत्रं दातुमिहार्हसि ।। ३२ ।।


काममेवंविधः पौत्रो मम स्यात्तव च प्रभो ।
यद्यन्यथा न शक्यं वै कर्तुमेतद् द्विजोत्तम ।। ३३ ।।


ततः प्रसादमकरोत्स तस्यास्तपसो बलात् ।
भद्रे नास्ति विशेषो मे पौत्रे च वरवर्णिनि ।
त्वया यथोक्तं वचनं तथा भद्रं भविष्यति ।। ३४ ।।


ततः सत्यवती पुत्रं जनयामास भार्गवम्।
तपस्यभिरतं दान्तं जमदग्निं शमात्मकम् ।। ३५ ।।


भृगोश्चरुविपर्यासे रौद्रवैष्णवयोः पुरा ।
यजनाद् वैष्णवेऽथांशे जमदग्निरजायत ।। ३६ ।।


सा हि सत्यवती पुण्या सत्यधर्मपरायणा ।
कौशिकीति समाख्याता प्रवृत्तेयं महानदी ।। ३७ ।।


इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रेणुर्नाम नराधिपः ।
तस्य कन्या महाभागा कामली नाम रेणुका ।। ३८ ।।


रेणुकायां तु कामल्यां तपोविद्यासमन्वितः ।
आर्चीको जनयामास जामदग्न्यं सुदारुणम् ।। ३९ ।।


सर्वविद्यानुगं श्रेष्ठं धनुर्वेदस्य पारगम् ।
रामं क्षत्रियहन्तारं प्रदीप्तमिव पावकम् ।। 1.27.४० ।।


और्वस्यैवमृचीकस्य सत्यवत्यां महायशाः ।
जमदग्निस्तपोवीर्याज्जज्ञे ब्रह्मविदां वरः ।। ४१ ।।


मध्यमश्च शुनःशेपः शुनःपुच्छः कनिष्ठकः ।
विश्वामित्रं तु दायादं गाधिः कुशिकनन्दनः ।। ४२ ।।


जनयामास पुत्रं तु तपोविद्याशमात्मकम् ।
प्राप्य ब्रह्मर्षिसमतां योऽयं सप्तर्षितां गतः ।। ४३ ।।


विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा नाम्ना विश्वरथः स्मृतः ।
जज्ञे भृगुप्रसादेन कौशिकाद् वंशवर्धनः ।। ४४ ।।


विश्वामित्रस्य च सुता देवरातादयः स्मृताः ।
प्रख्यातास्त्रिषु लोकेषु तेषां नामानि मे शृणु ।। ४५ ।।


देवश्रवाः कतिश्चैव यस्मात्कात्यायनाः स्मृताः ।
शालावत्यां हिरण्याक्षो रेणोर्जज्ञेऽथ रेणुमान् ।। ४६ ।।


सांकृतिर्गालवश्चैव मुद्गलश्चेति विश्रुताः ।
मधुच्छन्दो जयश्चैव देवलश्च तथाष्टकः ।। ४७ ।।


कच्छपो हारितश्चैव विश्वामित्रस्य वै सुताः ।
तेषां ख्यातानि गोत्राणि कौशिकानां महात्मनाम् ।।४८।।


पाणिनो बभ्रवश्चैव ध्यानजप्यास्तथैव च ।
पार्थिवा देवराताश्च शालङ्कायनबाष्कलाः ।। ४९ ।।


लोहिता यामदूताश्च तथा कारीषवः स्मृताः ।
सौश्रुताः कौशिका राजंस्तथान्ये सैन्धवायनाः ।। 1.27.५०।।


देवला रेणवश्चैव याज्ञवल्क्याघमर्षणाः ।
औदुम्बरा ह्यभिष्णातास्तारकायनचुञ्चुलाः ।। ५१ ।।


शालावत्या हिरण्याक्षाः सांकृत्या गालवास्तथा ।
बादरायणिनश्चान्ये विश्वामित्रस्य धीमतः ।। ५२ ।।


ऋष्यन्तरविवाह्याश्च कौशिका बहवः स्मृताः ।
पौरवस्य महाराज ब्रह्मर्षेः कौशिकस्य च ।
सम्बन्धोऽन्यस्य वंशेऽस्मिन्ब्रह्मक्षत्रस्य विश्रुतः ।। ५३ ।।


विश्वामित्रात्मजानां तु शुनःशेपोऽग्रजः स्मृतः ।
भार्गवः कौशिकत्वं हि प्राप्तः स मुनिसत्तमः ।। ५४ ।।


विश्वामित्रस्य पुत्रस्तु शुनःशेपोऽभवत्किल ।
हरिदश्वस्य यज्ञे तु पशुत्वे विनियोजितः ।। ५५ ।।


देवैर्दत्तः शुनःशेपो विश्वामित्राय वै पुनः ।
देवैर्दत्तः स वै यस्माद् देवरातस्ततोऽभवत् ।। ५६ ।।


देवरातादयः सप्त विश्वामित्रस्य वै सुताः ।
दृषद्वतीसुतश्चापि विश्वामित्रात् तथाष्टकः ।। ५७ ।।


अष्टकस्य सुतो लौहिः प्रोक्तो जह्नुगणो मया ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वंशमायोर्महात्मनः ।। ५८ ।।
___________     
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण्यमावसुवंशकीर्तनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ।। २७ ।।

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सोमानम् । स्वरणम् । कृणुहि । ब्रह्मणः । पते ।कक्षीवन्तम् । यः । औशिजः ॥१(ऋग्वेद-१/१८/१)

हे "ब्रह्मणस्पते एतन्नामकदेव “सोमानम् अभिषवस्य कर्तारं "स्वरणं देवेषु प्रकाशनवन्तं “कृणुहि कुरु । अत्र दृष्टान्तः । “कक्षीवन्तम् एतन्नामकमृषिम् । इवशब्दोऽत्राध्याहर्तव्यः । कक्षीवान् यथा देवेषु प्रसिद्धस्तद्वदित्यर्थः । “यः कक्षीवानृषिः “औशिजः उशिजः पुत्रः। तमिवेति पूर्वत्र योजना। कक्षीवतोऽनुष्ठातृषु मुनिषु प्रसिद्धिस्तैत्तिरीयैराम्नायते - एतं वै पर आट्णारः कक्षीवाँ औशिजो वीतहव्यः श्रायसस्त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः प्रजाकामा अचिन्वत ' ( तै. सं. ५. ६. ५. ३) इति


 मुद्गल= हर्य्यश्वराजपुत्त्रः  यथा -“ सुशान्तेः पुरुजानुः तस्माच्चर्क्षः ततश्च हर्य्यश्वः हर्य्यश्वान्मुद्गलसृञ्जयबृहदिषुयवीनरकाम्पिल्यसंज्ञाः ।  पञ्चानामेतेषां विषयाणां रक्षणायालमेते मत्पुत्त्रा इति पित्राभिहिता इति पञ्चालाः ।
  (इति विष्णुपुराणे ४ अंशे १९ अध्यायः)  


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