बुधवार, 24 अक्तूबर 2018

अहीर जन-जाति दस्यु डकैत (Daicoit) क्यों बनी ?

अहीर जन-जाति दस्यु डकैत (Daicoit) क्यों बनी ?
प्रत्येक काल में  इतिहास पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर लिखा गया; आधुनिक इतिहास हो या प्राचीन इतिहास या पौराणिक आख्यानकों में  सर्वत्र अहीरों को (Criminal tribe ) अापराधिक जन-जाति के रूप में दुर्दान्त हत्यारे और लूटेरों के रूप में वर्णित किया गया है।

अमर कोश कार अमर सिंह ने आभीर शब्द की काल्पनिक व्युत्पत्ति अहीरों की तल्कालीन सामाजिक प्रवृत्ति के अनुरूप की "
आभीरः, पुल्लिंग संज्ञा रूप :-(आ समन्तात् भियं राति ददाति। रा दाने आत इति कः ) गोपः ।
इत्यमरः कोश ॥ आहिर इति भाषा ।
अमर सिंह चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (380-413) के नव रत्नों में से एक थे ।
परन्तु अहीर ब्राह्मणों की सामाजिक व्यवस्था के विद्रोही थे । चोर होना और डकैत होना दौनों अलग अलग बातें हैं फिर अहीरों के विषय में लिखने वाले भी रूढ़िवादी विचार धारा के अनुमोदक थे ।
पता नहीं इतिहासकारों की कौन सी भैंस अहीरों ने चुरा ली थी  ।
इतिहास कार भी विशेष समुदाय वर्ग के ही थे ।
अहीरों के विषय में ऐसा ऐैतिहासिक विवरण पढ़ने वाले गधों से अधिक कुछ नहीं हैं।
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अहीर क्रिमिनल ट्राइब कदापि  नही हैं अपितु विद्रोही ट्राइब अवश्य रही है ; वो भी अत्याचारी शासन व्यवस्थाओं  के खिलाफ ,
क्योंकि इतिहास भी शासन के प्रभाव में ही लिखा जाता था। और कोई शासक विद्रोहियों को सन्त तो कहेगा नहीं परन्तु जनता क्यूँ सच मान लेती है ये सारी काल्पनिक बाते यही समझ में नहीं आता  ?
ऐसी ऊटपटांग बातें आजादी के बाद यादवों के बारे में वर्ण-व्यवस्था के अनुमोदकों ने ही पूर्व-दुराग्रहों से ग्रसित होकर लिखीं ।
परन्तु यथार्थोन्मुख सत्य तो ये है कि यादवों ने ना कभी कोई  अापराधिक कार्य अपने स्वार्थ या अनुचित माँगों को मनवाने के लिए किया हो ! और न
कोई तोड़ फोड़ कभी  की ! और ना ही -गरीबों की -बहिन बेटीयों  को सताया ।
केवल कुकर्मीयों , व्यभिचारीयों के खिलाफ विद्रोह अवश्य किया, वो भी हथियार बन्ध होकर ,
यादवों का विद्रोह शासन और उस  शासक के खिलाफ रहा हमेशा से रहा , जिसने समाज का शोषण किया विशेषत: निम्न व मध्यम तबके का ;  अहीरों ने केवल इन जमींदारों के विरुध आवाज उठाई ;
ना की आम लोगों के खिलाफ !

दस्युओं के विषय में जब महाभारत -जैसे भारतीय संस्कृति के कोश ग्रन्थ वर्णन करते हैं कि दस्यु भी नैतिकता का पालन करने वाले और  गरीबों के सहायक होते हैं ।👇
दस्यु का अर्थ यद्यपि ईरानी भाषा में दह्यु के रूप पराक्रमी ,नायक आदि है ।
चौर की मर्यादाऐं भले ही नहों परन्तु
दस्युयों में भी मर्यादाऐं होती हैं । क्यों दस्यु वस्तुत वे विद्रोही थे जिन्होनें शुंग कालीन ब्राह्मणों की वर्ण व्यवस्था और सामाजिक मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया।
(महाभारत के शान्ति पर्व के अन्तर्गत आपद्धर्म
एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय )
दस्युयों की नैतिकता और मर्यादाओं का वर्णन है।
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यथा सद्भि: परादानमहिंसा दस्युभि: कृता ।
अनुरज्यन्ति भूतानि समर्यादेषु दस्युषु।।15।
दस्यु में भी मर्यादा होती है जैसे अच्छे डाकू दूसरों का धन तो लूटते हैं परंतु हिंसा नहीं करते किसी की इज्जत नहीं लूटते हैं ।
जो मर्यादाओं का ध्यान रखते हैं उन लुटेरों में बहुत से प्राणी नैतिकता का पालन तथा स्नेह भी करते हैं क्योंकि उनके द्वारा बहुतों की रक्षा भी होती है।15

अयुद्ध्यमानस्य वधो दारामर्ष: कृतघ्ना।
ब्रह्मवित्तस्य चादानं नि:शेषकरणं  तथा ।16।

स्त्रिया मोष: पतिस्थानं दस्युष्वेतद् विगर्हितम्।
संश्लेषं च परस्त्रीभिर्दस्युरेतानि वर्जयेत्।17।

युद्ध ना करने वालों को मारना, पराई स्त्री का बलात्कार करना, कृतघ्नता, ब्राह्मण के धन का अपरण, किसी का सर्वस्व छीन लेना ,कुमारी कन्या का अपहरण करना, तथा किसी ग्राम आदि पर आक्रमण करके स्वयं उसका स्वामी बन बैठना – यह सब बातें डाकुओं में भी निन्दित मानी गई हैं।16-17।

अभिसंदधते ये च विश्वासायास्य मानवा: ।
अशेषमेवोपलभ्य कुर्वन्तीति विनिश्चय:।18।

जिनका सर्वस लूट लिया जाता है वह मनुष्य और डाकुओं के साथ मेलजोल और विश्वास बढ़ाने की चेष्टा करते हैं और उनके स्थान आज का पता लगाकर फिर उनका सर्वस्व नष्ट कर देते हैं यह निश्चित बात है।18।

तस्मात् सशेषं कर्तव्यं  स्वाधीनमपि दस्युभि:।
न बलस्थो८हमस्मीति नृशंसानि समाचरेत् ।19।

इसलिए दस्युयों को उचित है कि वह दूसरों के धन को अपने अधिकार में पाकर भी कुछ से छोड़ दें सारा का सारा न लूट ले "मैं बलवान हूं ऐसा समझकर क्रूरता पूर्वक बर्ताव न करें।19

स शेषकारिणस्तत्र शेषं पश्यन्ति सर्वश:।
नि:शेषकारिणो नित्यं नि:शेषकरणाद् भयम्।20।

जो डाकू दूसरों के धन को शेष छोड़ देते हैं वह सब ओर से अपने धन का भी अवशेष देख पाते हैं तथा जो दूसरों के धन से कुछ अवशेष नहीं छोड़ते उन्हें सदा अपने धन के भी अवशेष न रह जाने का भय बना रहता है।20।

फिर जनता के प्रतिनिधि उन बुद्धिजीवीयों को भी विचार करना चाहिए !
कि जिसके अधिकार जब्त कर लिए गये हों
'वह दस्यु बन गये अर्थात्‌ विद्रोही !
जनता को सोचना-समझना चाहिए !

न कि बलगर  लोगो के कहने पर विश्वास करना चाहिए
जिस प्रकार से आज समाज में अहीरों के खिलाफ सभी रूढ़ि वादी समुदाय एक जुट हो गये हैं ।
और अहीरों को बात बात पर चोर अथवा शूद्र अथवा विदेशी कहकर अपनी भड़ास निकलने की कुचेष्टा करते हैं ।
उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि अहीरों से दुश्मनी लेकर कभी कोई जन-जाति सलामत नहीं रही है ।
और
यह  उनके भविष्य के लिए भी शुभ संकेत नहीं है
जय श्री कृष्णा !
विचारक :- वी० कुमार यादव
यादव योगेश कुमार 'रोहि' आदि
ग्राम-आज़ादपुर
पत्रालय- पहाड़ीपुर
जनपद- अलीगढ़---उ०प्र०

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