शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

पुराणों में दुर्गा को यादवी अर्थात् यादव कन्या कहा -

पुराणों में दुर्गा को यादवी अर्थात् यादव कन्या कहा -

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सावित्र्युवाच। लक्ष्मीर्नाद्यापिचायातिसतीनैवेहदृश्यते।बृहदाग्रायणेहूताशक्राणीगच्छतीत्विह।नाहमेकाकिनीयास्येयावन्नायान्तिताःस्त्रियः॥ब्रूहिगत्वाविरिञ्चिन्तंतिष्ठत्विहृमुहूर्त्तकम्॥वदमानांतथाध्वर्य्युस्त्यक्त्वादेवमुपागमत्।सावित्रीव्याकुलादेवीप्रसक्तागृहकर्म्मणि॥सख्योनाभ्यागतायावत्तावन्नागमनंमम।एवमुक्तोऽस्मिवैदेव !कालश्चाप्यतिवर्त्तते॥यश्चयोम्यंभवेदत्रतत्कुरुष्वपितामह !।एवमुक्तेतदावाक्यंकिञ्चित्कोपसमन्वितः॥पत्नीञ्चान्यांमदर्थन्तुशीघ्रंत्वञ्चसमानय।प्रवर्त्ततेयथायज्ञःकालहीनोनजायते॥तथाशीघ्रंविधेहित्वंनारींकाञ्चिदुपानय।एवमुक्तस्तथाशक्रोगत्वासर्व्वंधरातलम्॥

स्त्रियोदृष्टास्तुयास्तेनसर्व्वास्तास्तुपरिग्रहाः

आभीरकन्यासुरूपासुभाषाचारुलोचना
॥ददर्शतांसुचार्व्वङ्गींकमलायतलोचनाम्।कासिकस्यकुतश्चत्वमागतासुभ्रु !
कथ्यताम्॥
एकाकिनीकिमर्थञ्चवीथिमध्येऽवतिष्ठसे।रूपान्विताचसाकन्याशक्रंप्रोवाचवेपती॥गोपकन्याअहंवीर !
विक्रेतुमिहगोरसम्।समागताघृतादीनांप्रगृह्णीष्वयथेप्सितम्॥एवमुक्तस्तदाशक्रोगृहीत्वातांकरेदृढम्।आनीयतांविशालाक्षींयत्रब्रह्माव्यवस्थितः॥कमलाक्षींस्फुरद्वाणींपुण्डरीकनिभेक्षणाम्।गान्धर्व्वेणतदाब्रह्माग्रहीतुंमनआदघे॥ प्रभुत्वमात्मनोदानेगोपकन्नाप्यमन्यत।यदेवंमांसुरूपत्वादिच्छत्यादातुमाग्रहात्॥नास्तिसीमन्तिनीकाचिन्मत्तोधन्यतरायतः।अनेनाहंसमानीतायस्यदृग्गोचरंगता॥एवंचिन्तापरादीनायावत्सागोपकन्यका।भवत्येषामहाभागागायत्त्रीनामतःप्रभो !
॥तावदेवमहाविष्णुःप्रोक्तवानिदमुत्तमम्।
अनुग्रहेणदेवेश !अस्याःपाणिग्रहंकुरु॥गन्धर्व्वेणविवाहेनउपयेमेषितामहः॥
          ॥अस्याध्यानंयथा --
सन्दर्भ - ग्रन्थ👇
पद्म पुराण - सृष्टिखण्ड - स्कन्द पुराण । अग्नि पुराण आदि
परन्तु हद की सरहद तो तब खत्म हो गयी जब
इस सुमेरियन कैनानायटी आदि संस्कृतियों में द्रुएगा (Druega) नाम से विख्यात ईश्वरीय सत्ता को
कुछ  रूढ़िवादी मानवों ने अपने पूर्वदुराग्रहों के द्वारा
अपना अशालीनताओं से पूर्ण मनोवृत्ति के अनुकूल चित्रित करने की असफल चेष्टा की !

शारदीय नवरात्रि के  प्राकृतिक परिवर्तन के प्रतिनिधि पर्वत पर  जब सांस्कृतिक आयोजन रूढ़िवादी श्रृद्धा से प्रवण होकर कि ये तो जगह-जगह भव्य पाण्डाल सजाये गये   और वहाँ जोर-जोर से "जय महिषासुर मर्दिनी" के जयकारे लगाये गये तो !
कुछ रूढ़िवादी प्रमाण प्रस्तुत करने लगे कि दुर्गा आदिवासी महषासुर की हत्यारी थी।
वास्तव में ये मत उन रूढ़िवादी भ्रान्त-चित्त महामानवों का है । जो केवल अपने प्रतिद्वन्द्वी की बुराई में अच्छाई का आविष्कार करते हैं ।
परन्तु दुर्गा प्राकृतिक शक्तियों की अधिष्ठात्री देवता है ।
और इस कारण से वासन्तिक नवदुर्गा शब्द सारदीय नव रात्र के समानान्तरण है ।
यद्यपि कथाओं में मिथकीयता का समावेश उन्हें चमत्कारिक बना देता है ।
रूढ़िवादी धर्मावलम्बी व्यक्तियों के अनुसार -

नवरात्रि इसीलिये मनायी जाती है क्योंकि विश्वा है कि दुर्गा ने इसी नौ दिनों में युद्ध करके महिषासुर का वध किया था ।
अन्वेषणों में अपेक्षित यह बात  है कि आखिर तथ्यों के क्या ऐतिहासिक प्रमाण है ? कि कोई दुर्गा थी, या कोई महिषासुर था ।
यद्यपि भारतीय पुराणों में दुर्भाग्य को महामाया एवं महाप्रकृति मानता है । जो यादव अथवा गोपों की कन्या के रूप में प्रकट होती है ।
और गायत्री भी इसी प्रकार नरेन्द्र सेन आभीर (अहीर) की कन्या है ।

महिषासुर के विषय में जो भी  जानकारी है, वह मिथक ही प्रतीत होती है!
क्यों कि
देवीपुराण के पञ्चम् स्कन्द में एक कथा आती है कि असुरों के राजा रम्भ को अग्निदेव ने वर दिया कि तुमारी पत्नी के  एक पराक्रमी पुत्र का जन्म  होगा।
जब एक दिन रम्भ भ्रमण कर रहा था तो उसने एक नवयौवना उन्मत्त  महिषी को  देखा ।
रम्भ का मन उस भैंस पर आ गया और उसने उससे सम्भोग किया ! तब कालान्तरण में रम्भ के वीर्य से गर्भित होकर उसी भैंस( महिषी ) ने महिषासुर को जन्म दिया !

और इस महिषासुर को यादव बताने वाले भ्रमित हैं ।

यद्यपि असुर असीरियन जन-जाति का भारतीय संस्करण है ।जो साम की सन्तति( वंशज) होने से सोमवंशी हैं ।
परन्तु महिषासुर जैसे काल्पनिक रात्र को हम कैसे यादव मानें ।
क्यों कि इसकी जन्म कथा ही स्वयं में हास्यास्पद व अशालीनताओं से पूर्ण मनोवृत्ति की द्योतक है ।
महिषासुर की काल्पनिक कथा का अंश आगे इस प्रकार है ।👇

कुछ दिनों बाद जब वह महिषी ग्रास चर रही थी तो अकस्मात्  एक भयानक भैसा कहीं आ गया, और वह उस भैंस  से मैथुन करने के लिये उसकी ओर दौड़ा...
रम्भ भी वहीं था, उसने देखा कि एक भैसा मेरी भैंस से  सम्भोग करने का प्रयास कर रहा है! तो उसकी स्वाभिमानी वृत्ति जाग गयी और वह भैंसे से भिड़ गया।
फिर क्या था, उस भैसे की नुकीली सींगों से रम्भ मारा गया, और जब रम्भ के सेवकों ने उसके शव को चिता पर लेटाया तो उसकी पत्नी पतिव्रता भैंस भी चिता पर चढ़कर रम्भ के साथ सती हो गयी।
वास्तव में सतीप्रथा राजपूती काल की उपज है ।
यह कथा भी उसी समय की है ।
मुझे तो यह सोचकर भी आश्चर्य होता है कि किसी जमाने मे भारत मे इतनी पतिव्रता भैंस भी हुआ करती थी जो अपने पति के साथ आत्मदाह कर लेती थी।
अस्तु !... ऐसे ही अनेक मनगड़न्त व काल्पनिक कथाओं का सृजन राजपूती काल में हुआ
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महिषासुर से सम्बन्धित एक दूसरी कथा वराहपुराण अध्याय-95 मे भी मिलती है, जो निम्न है-
विप्रचित नामक दैत्य की एक सुन्दर कन्या थी माहिष्मती! माहिष्मती मायावी-शक्ति से वेष बदलना जानती थी ।
एक दिन वह अपनी सखियों के साथ घूमती हुई एक पर्वत की तराई मे आ गयी, जहाँ एक सुन्दर उपवन था और एक ऋषि (सुपार्श्व) वहीं तप कर रहे थे।
माहिष्मती उस मनोहर उपवन मे रहना चाहती थी, उसने सोचा कि इस ऋषि को डराकर भगा दूँ और अपनी सखियों के साथ यहाँ कुछ दिन विहार करूँ!
यही सोचकर माहिष्मती ने एक भैंस का रूप धारण किया और सुपार्श्व ऋषि को पास आकर उन्हे डराने लगी! ऋषि ने अपनी योगशक्ति से सत्य को जान लिया और माहिष्मती को श्राप दिया कि तू भैंस का रूप धारण करके मुझे डरा रही है तो जाऽऽ ...
मै तुझे श्राप देता हूँ कि तू सौ वर्षों तक इसी भैंस-रूप मे रहेगी!

अब माहिष्मती भैंस बनकर नर्मदा तट पर रहने लगी! वहीं नजदीक सिन्धुद्वीप नामक एक ऋषि तप करते थे। एक दिन जब ऋषि स्नान करने के लिये नर्मदा नदी के तट पर गये तो उन्होने देखा कि वहाँ एक सुन्दर दैत्यकन्या इन्दुमती नंगी होकर स्नान कर रही थी!
उसे नग्नावस्था मे देखकर ऋषि का जल मे ही वीर्यपात हो गया! माहिष्मती ने उसी जल को पी लिया, जिससे वह गर्भवती हो गयी और कुछ महीनों बाद इसी माहिष्मती भैंस ने महिषासुर को जन्म- दिया ।

महिषासुर की कथा केवल इन्ही दो पुराणों में मिलती है, और दोनो के अनुसार वह भैंस के पेट से पैदा हुआ।
अब कम से कम मेरी साधारण बुद्धि तो यह मानने को तैयार नही कि एक भैंस किस इंसान के भ्रूण को जन्म दे सकती है! अतः इससे स्पष्ट है कि पौराणिक कहानी तो पूरी तरह से काल्पनिक है।
अब बड़ा सवाल यह होता है कि क्या महिषासुर काल्पनिक है!
इतिहासकारों ने भी महिषासुर पर अलग-अलग राय दी है!
कोसम्बी कहते थे कि वह म्हसोबा (महोबा) का था, तो मैसूर के निवासी कहते हैं कि मैसूर का पुराना नाम ही महिष-असुर ही था !
मैसूर मे महिषासुर की एक विशालकाय प्रतिमा भी है।

रही बात दुर्गा की तो उनके बारें मे भी पढ़े तो कुछ अता-पता नही चलता!
एक पुराण कहता है कि दुर्गा कात्यायन ऋषि की पुत्री थी।
दूसरा कहता है कि दुर्गा मणिद्वीप मे रहने वाली जगदम्बा ही थी।
यही नही.. कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि वह चोलवंश की राजकुमारी थी।

अगर दुर्गा को जानने के लिये देवीपुराण पढ़ो तो पूरी पौराणिक-मान्यताऐं ही पलट जाती है!
देवीपुराण मे लिखा है कि अब तक राम-कृष्ण समेत जितने भी अवतार हुये हैं, वह सब दुर्गा के थे, विष्णु के नही! बल्कि यह पुराण तो कहता है कि विष्णु भी दुर्गा की प्रेरणा से ही जन्मे! दुर्गा चालीसा मे भी नरसिंह अवतार दुर्गा का कहा गया है।
ये निम्न चौपाई देखें-
"धरा रूप नरसिंह को अम्बा।
प्रकट भई फाड़ कर खम्बा।।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो।
हिरनाकुश को स्वर्ग पठायो।।"

जहाँ तक मेरा मानना है तो यह कथा पाखण्ड ही हैं और दुर्गा को प्रतिष्ठित करना या पूजना बेकार मे समय की बर्बादी के अलावा और कुछ नही है!
वैसे भी जो गलती हमारे पूर्वजों ने अज्ञानतावश की है, उसे हम परम्परा मानकर आखिर कब तक दोहरा रहेंगे।

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