मंगलवार, 12 मार्च 2024

"श्रीकृष्ण गोपेश्वर सर्वस्वं कथा समिति "वैष्णववर्ण भाग द्वितीय-"

भाग द्वितीयम्-श्रीकृष्ण गोपेश्वरस्य पञ्चंवर्णम्-

विशेष:- ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियाँ नहीं हैं ये वर्ण हैं जातियाँ वर्णों के अन्तर्गत ही होती है।

"उपर्युक्त श्लोकों में गोपों के वैष्णव वर्ण तथा भागवत धर्म का संकेत है जिसे अन्य जाति के पुरुष गोपों के प्रति श्रृद्धा और कृष्ण भक्ति से प्राप्त कर लेते हैं।। 

"विशेष:-वैष्णव= विष्णोरस्य रोमकूपैर्भवति  अण्सन्तति वाची- विष्णु+ अण् = वैष्णव= विष्णु से उत्पन्न अथवा विष्णु से सम्बन्धित- जन वैष्णव हैं।

अर्थ-वैष्णव= विष्णु के रोमकूपों से उत्पन्न अण्- प्रत्यय सन्तान वाची भी है विष्णु पद में तद्धित अण् प्रत्यय करने पर वैष्णव शब्द निष्पन्न होता है। अत: गोप वैष्णव वर्ण के हैं। 
उपर्युक्त श्लोकों में पञ्चम जाति के रूप में भागवत धर्म के प्रर्वतक आभीर / यादव लोगो को स्वीकार किया गया है ।
क्योंकि वैष्णव शब्द भागवत शब्द का ही पर्याय है।


 ईरानी धर्म ग्रन्थ- अवेस्ता में "अतर" अग्नि  का वाचक है
सन्दर्भ:-(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय (17), श्लोक 38)।
अत्रि अग्नि की लपटों से वारुणी 


अत: चन्द्रमा के अत्रि से उत्पन्न होने का प्रकरण प्रक्षेप ही है।
चन्द्रमा की वास्तविक और प्राचीन उत्पत्ति का सन्दर्भ- ऋग्वेद के दशम मण्डल के (90) वें पुरुष सूक्त की (13) वीं ऋचा में है। जिसको हम उद्धृत कर रहे हैं ।

📚: चन्द्रमा विराट् पुरुष विष्णु के मन से उत्पन है  मन ही हृदय अथवा प्राण के तुल्य  है। चन्द्रमा भी विराट पुरुष के मन से उत्पन्न होने से  भी वैष्णव है। चन्द्रमा के वैष्णव होने के भी अनेक शास्त्रीय सन्दर्भ हैं।
ऋग्वेद के दशम मण्डल के (90) वें सूक्त में विराट पुरुष से विश्व का सृजन होते हुए दर्शाया है। और इसी विराट स्वरूप के दर्शन का कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिखाया जाना श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में वर्णन किया गया है। 
नीचे 'विराट पुरुष' के स्वरूप का वर्णन पहले ऋग्वेद तत्पश्चात श्रीमद्भगवद्गीता में देखें 

"तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥5॥
(ऋग्वेद-10/90/5 )
अनुवाद:- उस विराट पुरुष से  यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ। उसी विराट से जीव समुदाय  उत्पन्न हुआ। वही देहधारी रूप में सबसे श्रेष्ठ हुआ, जिसने सबसे पहले पृथ्वी को फिर शरीर धारियों को उत्पन्न किया।5।
'चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥13॥
( ऋग्वेद-10/90/13)
अनुवाद:-विराट पुरुष के मन से चन्द्रमा नेत्रों से सूर्य ज्योति , मुख से तेज और अग्नि का प्राकट्य हुआ।13।
'नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥14॥
( ऋग्वेद-10/90/14
अनुवाद:- विराट् पुरुष की नाभि से अन्तरिक्ष  शिर से द्युलोक, पैरों से भूमि तथा कानों से दिशाऐं प्रकट हुईं।  इस विराट पुरुष के द्वारा  इसी प्रकार अनेक लोकों को  रचा गया ।14।

श्रीमद्भगवद्-गीता अध्याय (11) श्लोक ( 19)
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।11/19।।
हिंदी अनुवाद - 
आपको मैं  अर्जुन आदि ? मध्य और अन्तसे रहित ? अनन्त प्रभावशाली ? अनन्त भुजाओंवाले? चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोंवाले? प्रज्वलित अग्नि के समान मुखों वाले और अपने तेजसे संसारको जलाते  हुए देख रहा हूँ।11/19.
__________

अब एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि चातुर्यवर्ण व्यवस्था विराट पुरुष से उत्पन्न है।
 अथवा उस विराट पुरुष के नाभि कमल से उत्पन्न ब्रह्मा से उत्पन्न है।

समाधान:- वास्तव में चातुर्य-वर्ण की उत्पत्ति ब्रह्मा से ही हुई है। जिसमें ब्रह्मा की प्रथम और प्रमुख सन्तान ब्राह्मण हैं। इस बात से
पुष्टि भी अनेक ग्रन्थों में होती है।
पहले सभी ब्राह्मण थे, बाद में गुण और कर्मों के अनुसार विभिन्न वर्ण विभाग हुए-

"न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत्।ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् ॥२२॥(महाभारत-शल्यपर्व १८८/१०)
अनुवाद:-
भृगु ने कहा-ब्राह्मणादिभृगु ने कहा-ब्राह्मणादि वर्गों में किसी प्रकार का अन्तर नहीं है। पहले ब्रह्मा द्वारा सृष्ट सारा जगत् ब्राह्मणमय था, बादमें कर्मों द्वारा विभिन्न वर्ण हुए॥२२॥
सन्दर्भ:-(श्रीमद्भागवत पुराण ११/१७/१९--)




ब्राह्मणो विप्रस्य प्रजापतेर्वा अपत्यम् - ब्रह्म वेदस्तमधीते वा सः- (इति भरतः नाट्यशास्त्र) ॥  (ब्रह्मन् + अण् “ ब्राह्मोऽजातौ । “६ । ४ । १७१ । इति नटिलोपः । )  
ब्राह्मणः शब्द पुल्लिंग   ब्रह्मन्  शब्द से सन्तान के अर्थ में  (अण्)  प्रत्यय लगने पर बनता है।
जबकि नपुसंसक लिंग ब्रह्मन् से   ब्राह्मणम्,शब्द बनता है। (ब्रह्मन् + अण् न टिलोपः।) ब्रह्म- संघातः  । वेदभागः । इति मेदिनी ।
ब्राह्मणः शब्द पुल्लिंग   ब्रह्मन्  शब्द से सन्तान के अर्थ में  (अण्)  प्रत्यय लगने पर बनता है।
"ब्राह्मणो विप्रस्य प्रजापतेर्वा अपत्यम् । 
ब्रह्म वेदस्तमधीते वा सः । इति भरतः ॥ (ब्रह्मन् + अण् “ब्राह्मोऽजातौ ।” ६।४ ।१७१। इति नटिलोपः । तत्पर्य्यायः । द्विजातिः २ अग्रजन्मा ३ भूदेवः ४ बाडवः ५ विप्रः ६ । इत्यमरः ॥ २ । ७ । ४ ॥ द्बिजः ७ सूत्र- कण्ठः ८ ज्येष्ठवर्णः ९ अग्रजातकः १० द्विजन्मा ११ वक्त्रजः १२ मैत्रः १३ वेदवासः १४ नयः १५ गुरुः १६ । इति शब्दरत्नाबली ॥

"आ ब्राह्मण ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः सुरऽईषव्योऽतिव्याधि महारथो जायतां दोग्धरी धेनुर्वोदऽनद्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णु रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नऽओषधयः पच्यन्तां योग क्षेमो नः कल्पताम् ॥
 (--यजुर्वेद 22, मन्त्र 22:-)

अर्थ :- हमारे राष्ट्र में ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण उत्पन्न हों । हमारे राष्ट्र में शूर, बाणवेधन में कुशल, महारथी क्षत्रिय उत्पन्न हों । यजमान की गायें दूध देने वाली हों, बैल भार ढोने में सक्षम हों, घोड़े शीघ्रगामी हों । स्त्रियाँ सुशील और सर्वगुण सम्पन्न हों । रथवाले, जयशील, पराक्रमी और यजमान पुत्रवान् हों । हमारे राष्ट्र में आवश्यकतानुसार समय-समय पर मेघ वर्षा करें । फ़सलें और औषधियाँ फल-फूल से युक्त होकर परिपक्वता प्राप्त करें । और हमारा योगक्षेम उत्तम रीति से होता रहे ।

व्याख्या :- यहाँ ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी एवं राजाओं के लिए शूरत्व आदि की प्रार्थना आयी है  यदि वेदों में वर्णव्यवस्था कथित गुण कर्मानुरूप होती तो ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी की प्रार्थना उसमें नहीं होती तब वेद में ब्रह्मवर्चस युक्त को ही नाम ब्राह्मण होता एव ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी  प्रार्थना एवं आशिर्वाद ही व्यर्थ होता। 

यह प्रार्थना ही यहाँ जन्मना वर्ण व्यवस्था को सिद्धि करती है,

पद्म पुराण के निम्नांकित श्लोक से भी सिद्ध होता है कि ब्राह्मण ब्रह्मा की सन्तान हैं।

"ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम।
पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः ।१३०।
यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद्ब्रह्मा चकार ह।
चातुर्वर्ण्यं महाराज यज्ञसाधनमुत्तमम् ।१३१।

पुलस्त्यजी बोले- कुरुश्रेष्ठ! सृष्टि की इच्छा रखने वाले ब्रह्माजी ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को उत्पन्न किया। इनमें ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय वक्षःस्थल से, वैश्य जाँघों से और शूद्र ब्रह्माजी के पैरों से उत्पन्न हुए।
महाराज ! ये चारों वर्ण यज्ञ के उत्तम साधन हैं; अतः ब्रह्माजी ने यज्ञानुष्ठान की सिद्धि के लिये ही इन सबकी सृष्टि की। 
अन्यत्र विष्णु पुराण में भी 


ब्राह्मण= ब्राह्मोऽजातौ (ब्रह्मन्+ अण्)  (अष्टाध्यायी- ६।४।१७१- इस पाणिनि सूत्र से अपत्य एवं जाति में ब्राह्मण शब्द होता है अब अर्थ हुआ कि हे ब्रह्मन्  ! ब्राह्मण ब्रह्मवर्चसी होवें अथवा ब्रह्मन्–ब्राह्मण में (सप्तम्या लुक्) ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण उत्पन्न होवें। 

विशेष—ऋग्वेद के पुरूषसूक्त में ब्राह्मणों की उत्पत्ति विराट् या ब्रह्म के मुख से कही गई है।
यह पूर्णत: प्रक्षेप है। क्यों ब्राह्मण ब्रह्मा की सन्तान हैं। परम् ब्रह्म की सन्तान नहीं है।
 दूसरी बात वर्ण व्यवस्था  की यह है कि ब्राह्मण शब्द ब्रह्म+ अण्= ब्राह्मण ब्रह्मा की सन्तान हैं जबकि क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र ये किसकी सन्तान हैं। वास्तव में ये बाद के तीन नाम केवल अभिधामूलक हैं। सम्भवत: पहले ब्रह्मा का एक ही वर्ण था  ब्राह्मण परन्तु उसके वही अन्य वृत्ति मूलक रूप क्रमशः क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र हैं। वैदिक काल में शूद्र थे नहीं ऋग्वेद में केवल एक बार शूद्र शब्द आया है ऋग्वेद 10/90/12 पर उद्धृत है। कृष्ण ने स्वयं को गोप और क्षत्रिय रूपों में प्रस्तुत किया।

दो पिशाच जो कृष्ण के वर्चस्व से प्रभावित कृष्ण के भक्त बन गये थे । उन्होंने जब साक्षात् रूप में उपस्थित कृष्ण का परिचय पूछा तो उन्होंने (कृष्ण ने) अपना परिचय शत्रुओं का क्षरण या क्षति करके पीडित का त्राण करने वाला क्षत्रिय बताया। 
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"ब्रूहि मर्त्य यथातत्त्वं ज्ञातुमिच्छामि मानद । 
एवं पृष्टः पिशाचाभ्यामाह विष्णुरुरुक्रमः।3/80/ 9 ।•–दूसरों को मान देने वाले मानव आप ठीक ठीक बताइए मैं पिशाच यथार्थ रूप से आपका परिचय जानना चाहता हूँ । उन दौनों पिशाचों के इस प्रकार पूछने पर महान डग वाले भगवान विष्णु के रूप में कृष्ण बोले ! 
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'क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मानुष्याः प्रकृतिस्थिताः । यदुवंशे समुत्पन्नः क्षात्रं वृत्तमनुष्ठितः। 3/80/10 ।

 •-मैं क्षत्रिय हूँ प्राकृत मनुष्य मुझे ऐसा ही कहते हैं ; और जानते हैं यदुकुल में उत्पन्न हुआ हूँ । इस लिए क्षत्रियोचित कर्म का अनुष्ठान करता हूँ। 10।।

'लोकानामथ पातास्मि शास्ता दुष्टस्य सर्वदा । कैलासं गन्तुकामोऽस्मि द्रष्टुं देवमुमापतिम्।।3/80/11।।

 •-मैं तीनों लोगों का पालक तथा सदा ही दुष्टों पर शासन करने वाला हूँ। इस समय उमापति भगवान् शंकर का दर्शन करने कैलास पर्वत पर जाना चाहता हूँ 3/80/11 

इसी पुराण में एक स्थान पर कृष्ण 'ने स्वयं उद्घोषणा की कि मैं गोप हमेशा सब प्रकार से प्राणियों की रक्षा करने वाला हूँ।
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"गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणद: सदा । गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।।४१। 
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 •– राजन् ! मैं गोप हूँ , और प्राणियों का सब ओर से प्राण दान करने वाला हूँ। सम्पूर्ण लोकों का रक्षक( गोप्ता) और सब ओर से दुष्टों का शासन करने वाला हूँ । हरिवशं पुराण भविष्यपर्व के सौंवें अध्याय का यह इकतालीस वाँ श्लोक (पृष्ठ संख्या 1298 गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण) गोप शब्द की वीरता मूलक व्युत्पत्ति का प्रतिपादन करता है।

अतएव गोप ही यादव और यादव अपनी वीरता प्रवृत्ति से आभीर थे और क्षत्रिय वीर ही हो सकता है जो वीरता से रहित है वह क्षत्रिय नहीं हो सकता है भले ही उसका जन्म किसी क्षत्रिय पुरुष से हुआ हो ।  इसमें ब्राह्मण की सन्तान ब्राह्मण होन  की वाध्यता नहीं है। हरिवशं पुराण में ही भविष्य पर्व के सौंवे अध्याय में पौंड्रक जब कृष्ण से युद्ध करता है तो कभी उन्हें गोपाल या गोप कह कर सम्बोधित करता है तो कभी यादव कह कर ! देखें उस सन्दर्भ को 

कृष्ण गोपों को क्षत्रियोचित रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। परन्तु रूढ़ि वादी पुरोहित गोपों के गोपालन और कृषि करने वाले होने से वैश्य वर्ण में समायोजित करते है। 

"कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्"।
अब यदि कृष्ण ब्रह्मा की वर्णव्यवस्था के समर्थक होते तो उनके गोपालक  गोप कभी भी नारायणी सेना के यौद्धा नहीं होते  क्योंकि  गोप गोपालन और कृषि कार्य ही मुख्य रूप से करते हैं । परन्तु गोप  व्यापार नहीं करते यह व्यापार कार्य तो बनिया( वणिक) लोगों का ही व्यवसाय है।
अब कृष्ण स्वयं को क्षत्रिय भी कह रहे हैं और गोप भी कह रहे हैं। 

ब्राह्मण प्रधान वर्णव्यवस्था में तो यह गोपों का युद्ध सम्बन्धित विधान  सम्भव नहीं है।  गोप ब्राह्मण वर्णव्यवस्था से पृथक वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत हैं। जिसमें गोपालन ही श्रेष्ठ वृत्ति है।
परन्तु गोप पशुपालन, युद्ध ईश्वरीय ज्ञानार्जन और कृषि कार्य भी करते हैं।
गोप जो विष्णु के शरीर के रोमकूपों से उनके हृदय से ही  उत्पन्‍न होते हैं। वह तो वैष्णव हैं ही। क्योंकि वे स्वराट- विष्णु के तनु से उत्पन्न उनकी सन्तान हैं।
वेदों में चन्द्रमा को भी विराट पुरुष के मन से उत्पन्न दर्शाया है। और वेदों का साक्ष्य पुराणों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ व प्रबल है।
चन्द्रमा यादवों का आदि वंश द्योतक है।

नीचे पुरुष सूक्त से दो ऋचाऐं उद्धृत हैं। जो चन्द्रमा की उत्पत्ति का निर्देशन करती हैं।

ऋग्वेद पुरुष सूक्त में जोड़ी गयी  (12) वीं  ऋचा  ब्रह्मा से सम्बन्धित है।

"चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत॥१३॥

"नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१४॥

ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ९० ऋचा- १३-१४
📚: उधर ऋग्वेद के दशम मण्डल ते 95 वें सूक्त की सम्पूर्ण (18) ऋचाऐं " पुरूरवा और उर्वशी के संवाद रूप में है।

जिसमें पुरूरवा के विशेषण गोष ( घोष- गोप) तथा गोपीथ- हैं । अत: पुरुरवा एक गो- पालक राजा ही सम्राट् भी है।

पुरुरवा बुध ग्रह और पृथ्वी ग्रह (इला) ग्रह  से सम्बन्धित होने से इनकी सन्तान माना गया है।
यही व्युत्पत्ति सैद्धान्तिक है।
यदि आध्यात्मिक अथवा काव्यात्मक रूप से इला-वाणी अथवा बुद्धिमती स्त्री और बुध बुद्धिमान पुरुष का भी वाचक है । और पुरुरवा एक शब्द और उसकी अर्थवत्ता के विशेषज्ञ कवि का वाचक है। और उर्वशी उसकी काव्य शक्ति है।
यदि पुरुरवा को बुध ग्रह और इला स्त्री से उत्पन्न भी माना जाय तो इला की ऐतिहासिकता सन्दिग्ध है। परन्तु पुरुरवा की ऐतिहासिकता प्रमाणित है। उसका वर्णन वेद, पुराण और अन्य लौकिक आख्यानों में है। पुरुरवा के गोष (घोष-अथवा गो पालक होने का सन्दर्भ भी वैदिक है।

"ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः ।
पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम्॥४२ ॥
अनुवाद:- उसके बाद समय बीतने पर प्रतिष्ठान पुर का अधिपति अपने पुत्र  पुरुरवा को गायें देकर वन को चला गया।४२।
श्रीमद्‍भागवत महापुराण
 नवमस्कन्ध प्रथमोध्याऽयः॥१॥
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वेदों में भी पुरुरवा के गाय पालने का सन्दर्भ पूर्व- वितित ही  हैं । पुरुरवा ,बुध ,और इला की सन्तान था। 
ऋग्वेद के दशम मण्डल में उर्वशी के पति और नायक पुरुरवा का भी गोष(घोष)अथवा गोप रूप में वर्णन मिलता है।

इन्हीं तथ्यों का हम शास्त्रीय प्रमाणों द्वारा यहाँ सिद्ध करने का उपक्रम करते हैं।

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥१३॥

"नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१४॥

यूरोपीय भाषाओं में चन्द्रमा का नामान्तरण मून है। जिसका सीधा सम्बन्ध भारोपीय(मूल वैदिक शब्द मान=(मन+अण्- मनसो जात: चन्द्रमा)  अर्थात मन से उत्पन्न- इस प्रकरण पर हम विस्तृत विश्लेषण आगे क्रमश करते हैं।

मन से मनन( विचार) उत्पन्न होकर निर्णीत होने पर बुध:( ज्ञान) बनता है और इसी ज्ञान(बुध:) के साथ इला ( वाणी) मिलकर परुरवा(कवि) कविः पुल्लिंग-(कवते सर्व्वं जानाति सर्व्वं वर्णयति सर्व्वं सर्व्वतो गच्छति वा । (कव् +इन्) । यद्वा कुशब्दे + “अचः इः” । उणादि सूत्र ४ । १३८ । इति इः ।
कवि शब्द शब्दार्थ के विशेषज्ञ का वाचक है। जो कि एक कवि की मौलिक विशेषता होती है।

"मन से मनन उत्पन्न होने से चन्द्रमा( मान ) कहलाया  चन्द्र विराट पुरुष के मन से उत्पन्न होने से, यह विचारो का प्रेरक व प्रतिनिधि है। परवर्ती नाम मात्र  कवियों की कल्पना में भी चन्द्रमा का होना परम्परा के अवशेष मात्र हैं। 

और इस मान -मन्यु:( विचार ) से ज्ञान (बुध: ) उत्पन्न हुआ और इसी बुध: और इला (वाणी ) के संयोग से कवि का गुण काव्य उत्पन्न हुआ पुरुरवा दुनिया का प्रथम  पौराणिक कवि है और वह भी संयोग श्रृँगार के प्रथम कवि के रूप में । 

स्वयं पुरुरवा शब्द का  अभिधा मूलक अर्थ है। पुरु- प्रचुरं रौति कौति इति पुरुरवस्-
पुरूरवसे - पुरु रौतीति पुरूरवाः । ‘रुशब्दे '। अस्मात् औणादिके असुनि ‘पुरसि च पुरूरवाः' (उणादि. सू. ४. ६७१) इति पूर्वपदस्य दीर्घो निपात्यते । 
सुकृते । ‘सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृञः ' (पा. सू. ३. २. ८९) इति क्विप् । ततः तुक् ।

पुराकाले पुरुरवसेव सदैव गायत्रीयम् प्रति पुरं रौति ।तस्मादमुष्य  पुरुरवस्संज्ञा सार्थकवती।।१।अनुवाद:-
प्राचीन काल में पुरुरवस् ( पुरुरवा) ही गायत्री का नित्य अधिक गान करता थे । इसी लिए उसकी पुरुरवा संज्ञा सार्थक हुई।१।

(पुरु प्रचुरं  रौति कौति इति। “ पर्व्वतश्च पुरुर्नाम यत्र यज्ञे पुरूरवाः (महाभारत- ।“३।९०।२२ ।

अत: पुरुरवा गो- पालक राजा है।
पुरुरवा के आयुष और आयुष के नहुष तथा नहुष के पुत्र ययाति हुए जो गायत्री माता के नित्य उपासक थे।
इसी लिए रूद्रयामल तन्त्र ग्रन्थ में तथा देवी भागवत पराण के  गायत्री सहस्र नाम में गायत्री माता को ' ययातिपूजनप्रिया" कहा गया है।

अत्रि, चन्द्रमा और बुध का सम्बन्ध प्राय: आकाशीय ग्रह, उपग्रह आदि नक्षत्रीय पिण्डों से सम्बन्धित होने से ऐतिहासिक धरातल पर प्रतिष्ठित नहीं होता है। परन्तु पुरुरवा और उर्वशी ऐतिहासिक पात्र हैं। दौनों ही नायक नायिका का वर्ण  एक है। आभीर तथा गोष(घोष) रूप में गोपालक जाति के आदि प्रवर्तक के रूप में इतिहास की युगान्तकारी खोज है।

इतिहास मैं दर्ज है कि आर्य पशु पालक थे ।जिन्होंने कालान्तरण में कृषि कार्य किए , स्वयं कृष्ण और संकर्षण(बलराम) कृषि पद्धति के जनक थे बलराम ने हल का आविष्कार कर उसे ही अपना शस्त्र स्वीकार किया। स्वयं आभीर शब्द  "आर्य के सम्प्रसारण "वीर का सम्प्रसारण है।

उर्वशी:-उरून् अश्नुते वशीकरोति उरु + अश+क गौरा० ङीष् । स्वसौन्दर्येण उरून् महतः पुरुषान् वशीकरोति- अपने अद्भुद सौन्दर्य से अच्छे अच्छों को वश में करने से इनकी उर्वशी संज्ञा सार्थक होती है।

"उरसि वशति(वष्टि)इति उर्वशी-जो हृदय में कामना अथवा प्रेम उत्पन्न करती है। वह उर्वशी है यह भाव मलक अर्थ भी सार्थक है।

"कवि पुरुरवा है रोहि !
कविता उसके उरवशी
हृदय सागर की अप्सरा ।
संवेदन लहरों में विकसी।।
एक रस बस ! प्रेमरस सृष्टि 
नहीं कोई काव्य सी !
"प्रेम मूलक काव्य का आदि श्रोत उर्वशी और आदि कवि गोपालक पुरुरवा ही है -क्योंकि प्रेम सौन्दर्य का आकाँक्षी और उसका चिरनिवेदक है।

ऋग्वेद के दशम मण्डल ते 95 वें सूक्त में 18 ऋचाओं में सबसे प्राचीन यह "प्रेम निवेदन पुरुरवा का उर्वशी के प्रति किया गया है।

सत्य पछा जाय तो कवि अथवा शब्द तत्व का ज्ञाता वही बन सकता है जो किसी के प्रेम में तड़पता हो अथवा जिसे संसार से वैराग्य हो गया हो।
"प्रेम में तड़पा हुआ या जिसे वैराग्य है। 
कवि बनने का केवल उसका ही सौभाग्य है।।
उर्वशी ही काव्य की आदि जननी है।

और अहीरों अथवा यादवों के आदि ऐतिहासिक पुरुष पुरुरवा भी गोपालक (गोष - गोपीथ )आदि के रूप में वैदिक ऋचाओं में वर्णित हैं।

"कालान्तरण पुराणों में कुछ द्वेषवादी पुरोहितों ने जोड़-तोड़ और तथ्यों को मरोड़ कर अपने स्वार्थ के अनुरूप लिपिबद्ध किया तो परिणाम स्वरूप तथ्यों में परस्पर विरोधाभास और शास्त्रीय सिद्धान्त के विपरीत बाते सामने आयीं।

गोष: = गां सनोति (सेवयति) सन् (षण् धातु =संभक्तौ/भक्ति/दाने च) +विट् ङा । सनोतेरनः” पा० षत्वम् ।  अर्थात "गो शब्द में षन् धातु का "ष" रूप शेष रहने पर(गो+षन्)= गोष: शब्द बना - जिसका अर्थ है । गो सेवक अथवा पालक।

वैदिक ऋचाओं में गोष: (घोष)शब्द का पूर्व रूप ही है। जिसका अर्थ होता है - गायों का दान करने वाला / तथा गोसेवा करने वाला" गोपाल- उपर्युक्त ऋचा के अतिरिक्त निम्न ऋचा में भी पुरुरवा को गाय पालने वाला सूचित किया गया है।

"जज्ञिषे इत्था गोपीथ्याय हि दधाथ तत्पुरूरवो म ओजः अशासं त्वा विदुषी सस्मिन्नहन्न म आशृणोः किमभुग्वदासि ॥११॥
सायण-भाष्य"-

“इत्था= इत्थं = इस प्रकार इत्थम्भावः इत्थम्भूतः "गोपीथ्याय – गौः =पृथिवी /धेनू। पीथं= पालनम् के लिए । स्वार्थिकस्तद्धितः । भूमे रक्षणीय जज्ञिषे =( जनी धातु मध्यम पुरुष एकवचन लिट् लकार “हि जातोऽसि खलु पुत्ररूपेण । 'आत्मा वै पुत्रनामा ' इति श्रुतेः। पुनस्तदेवाह ।
 हे "पुरूरवः “मे ममोदरे मयि "ओजः अपत्योत्पादनसामर्थ्यं "दधाथ मयि निहितवानसि  "तत् तथास्तु । अथापि स्थातव्यमिति चेत् तत्राह । अहं "विदुषी भावि कार्यं जानती “सस्मिन्नहन् सर्वस्मिन्नहनि त्वया कर्तव्यं "त्वा =त्वाम् "अशासं =शिक्षितवत्यस्मि । त्वं "मे मम वचनं “न “आशृणोः =न शृणोषि। “किं त्वम् "अभुक् =अभोक्तापालयिता प्रतिज्ञातार्थमपालयन् “वदासि हये जाय इत्यादिकरूपं प्रलापम् ।

सतयुग में वर्णव्यवस्था नहीं थी परन्तु एक ही वर्ण था । जिसे हंस नाम से केवल भागवत पुराण में वर्णन किया गया है।

"आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः।कृतकृत्याः प्रजा जात्या तस्मात् कृतयुगं विदुः॥१९॥

भगवान ने उद्धव से कहा-हे उद्धव ! सत्ययुग के प्रारम्भ में सभी मनुष्यों का 'हंस' नामक एक ही वर्ण था। उस युग में सब लोग जन्म से ही कृतकृत्य होते थे, इसीलिए उसका एक नाम कृतयुग भी है।  हे महाभाग, त्रेतायुगके आरम्भ होने पर मेरे हृदयसे श्वास-प्रश्वासके द्वारा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदरूप त्रयी विद्या प्रकट हुई और उस त्रयी विद्यासे होत्र, अध्वर्य और उद्गाता-इन तीन यज्ञों  के कर्ता के ये रूप प्रकट हुए। बाद में विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। उनकी पहचान उनके स्वभावानुसार और आचरण से होती है॥१९-२१॥

पहले सभी ब्राह्मण थे, बाद में गुण और कर्मों के अनुसार विभिन्न वर्ण विभाग हुए-

"न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत्।ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् ॥२२॥(महाभारत-शल्यपर्व १८८/१०)
अनुवाद:-

भृगु ने कहा-ब्राह्मणादिभृगु ने कहा-ब्राह्मणादि वर्गों में किसी प्रकार का अन्तर नहीं है। पहले ब्रह्मा द्वारा सृष्ट सारा जगत् ब्राह्मणमय था, बादमें कर्मों द्वारा विभिन्न वर्ण हुए॥२२॥
सन्दर्भ:-
(श्रीमद्भागवत पुराण ११/१७/१९--)

निष्कर्षत: चार वर्ण केवल एक ब्राह्मण वर्ण का विस्तार हैं । मूलत: एक वर्ण ब्राह्मण जो ब्रह्मा से उत्पन्न था उसी से अन्य वर्ण रूप विकसित हुए।

मनुस्मृति ने कहा है कि ब्राह्मण को ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत या सत्यानृत इन पाँच साधनों के द्वारा जीविका निर्वाह करना चाहिए।
१-ऋत का अर्थ है भूमि पर पडे़ हुए अनाज के दानों को चुनना (उंछ वृत्ति) या छोडी़ हुई बालों से दाने झाड़ना (शिलवृत्ति)।

बिना माँगे जो कुछ भीख मिल जाय उसे ले लेना २-अमृत वृति है; 
३-भीख माँगने का नाम है मृतवृत्ति। 
४-कृषि 'प्रमृत' वृति है और 
५-वाणिज्य सत्यानृत वृति' है। 

इन्ही वृत्तियों के अनुसार ब्राह्मण चार प्रकार का कहे गए हैं—कुशूलधान्यककुभीधान्यकत्र्यैहिक और अश्वस्तनिक। 
जो तीन वर्ष तक के लिये अन्नादि सामग्री संचित कर रखे उसे कुशलधान्यक, जो एक वर्ष के लिये संचित करे उसे कुंभीधान्यक, जो तीन दिन के लिये रखे, उसे त्र्यैहिक और जो नित्य संग्रह करे ओर नित्य खाय उसे अश्वस्तनिक कहते है। 

चारो में अश्वस्तनिक श्रेष्ठ है। आदिम काल में मंत्रकार या वेदपाठी ऋषि ही ब्राह्मण  कहलाते थे। भ्रमर की तरह निरन्तर ब्रह्- ब्रह्-की ध्वनि करने वाला ब्राह्मण कहा जाता था यह ध्वनि अनुकरण मूलक व्युत्पत्ति है ।
  

      "अध्याय -दशम -★

वैवस्वत मनुके पुत्र राजा सुद्युनकी कथा-

अध्याय एक – राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना (9.1)

"एवं स्त्रीत्वं अनुप्राप्तः सुद्युम्नो मानवो नृपः ।सस्मार स कुलाचार्यं वसिष्ठमिति शुश्रुम ॥३६ ॥

'स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः ।
 सुद्युम्नस्याशयन् पुंस्त्वं उपाधावत शंकरम् ॥३७॥

"तुष्टस्तस्मै स भगवान् ऋषये प्रियमावहन्।

 स्वां च वाचं ऋतां कुर्वन् इदमाह विशाम्पते॥ ३८॥

'मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः ।
 इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्नोऽवतु मेदिनीम् ॥ ३९ ॥

36 -मैंने विश्वस्त सूत्रों से सुना है कि मनु-पुत्र सुद्युम्न ने इस प्रकार स्त्रीत्व प्राप्त करके अपने कुलगुरु वसिष्ठ का स्मरण किया।

37-सुद्युम्न की इस शोचनीय स्थिति को देखकर वसिष्ठ अत्यधिक दुखी हुए। उन्होंने सुद्युम्न को उसका पुरुषत्व वापस दिलाने की इच्छा से फिर से शिवजी की पूजा प्रारम्भ कर दी।

38-39 हे राजा परीक्षितशिवजी वसिष्ठ पर प्रसन्न हुए। अतएव शिवजी ने उन्हें संतुष्ट करने तथा पार्वती को दिये गये अपने वचन को सत्य रखने के उद्देश्य से उस ऋषि से कहा, “आपका शिष्य मनुपुत्र सुद्युम्न एक मास (महीना) तक नर रहेगा और दूसरे मास (महीना) नारी होगा। इस तरह वह इच्छानुसार जगत पर शासन कर सकेगा।

वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड में यह कथा  कर्दम ऋषि की सन्तान इल से सम्बन्धित है। और भागवत पुराण में वैवस्वत मनु के पुत्र सुद्युम्न के नाम से - अब एक व्यक्ति के दो- दो  मातापिता कैसे हो सकते हैं।

"इला" के माता-पिता कि निर्धारण न होने के कारण और उसके एक महीना नर -और एक महीना नारी होने की घटना के सैद्धांतिक न होने से भी ये कथा प्रक्षिप्त है।

सन्तान जो नौ महीना में गर्भ से भ्रूण और प्रसव पूर्व सन्तान तक निर्मित होती है वह तो एक महीने में सम्भव नहीं है। ।

एवं स राजा पुरुषो मासं भूत्वाथ कार्दमिः ।
त्रैलोक्यसुन्दरी नारी मासमेकमिला ऽभवत् ।। ७.८७.२९ ।।

अनुवाद:-
इस प्रकार कर्दम से वह राजा उत्पन्न हुआ इल, एक महीने के लिए पुरुष अगले महीने इला के नाम पर एक महिला बन गया,(वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड-सर्ग- (87 श्लोक 29)

कुछ पुराणों के अनुसार -

कर्दम ऋषि की उत्पत्ति सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी की छाया से हुई थी।
ब्रह्मा जी ने उन्हें प्रजा में वृद्धि करने की आज्ञा दी। उनके आदेश का पालन करने के लिये कर्दम ऋषि ने स्वयंभुव मनु की द्वितीय कन्या देवहूति से विवाह कर नौ कन्याओं तथा एक पुत्र की उत्पत्ति की।

कन्याओं के नाम कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुन्धती और शान्ति थे तथा पुत्र का नाम कपिल था। 

वाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड  के  पर्व 83,3 में प्रजापति कर्दम के पुत्र को बाह्लीकों राजा कहा गया है--'श्रूयते हि पुरा सौम्य कर्दमस्य प्रजापते:, पुत्रो बाह्लीश्वर: श्रीमानिलोनाम सुधारमिक:' जिसकी नाम इल था।

अत: बुध से वैवस्वत मनु की पुत्री इला अथवा कर्दम ऋषि के पुत्र इल का इला होरकर सन्तान उत्पन्न करना काल्पनिक व सिद्धांत हीन है।

ध्रुव महाराज का यक्षों से युद्ध श्रीमद्भागवत - स्कन्ध 4 अध्याय 10-

श्लोक 4.10.2

इलायामपि भार्यायां वायोः पुत्र्यां महाबलः।
पुत्रं उत्कलनामानं योषिद् रत्‍नमजीजनत् ।२।

समानार्थी शब्द:-इल्याम् - अपनी इला द्वारा नियुक्त पत्नी को; अपि - भी; भार्याम् - अपनी पत्नी के प्रति; वायुः - देवता वायु (वायु के नियंत्रक) का; पुत्रीम् – पुत्री को; महा - बलः - शक्तिशाली शक्तिशाली ध्रुव महाराज; पुत्रम् – पुत्र; उत्कल – उत्कल; नामानम् – नाम का; योषित - स्त्री; रत्नम् – रत्न;अजीजानत - उसका जन्म हुआ।

अनुवाद:-महाबली ध्रुवकी दूसरी स्त्री वायुपुत्री इला थी। उससे उनके उत्कल नामके एक पुत्र और एक कन्यारत्नका जन्म हुआ ॥ 2 ॥

श्रीमद्भागवतपुराणम्‎ - स्कन्धः ४ अध्याय१० श्लोक २। 


📚: इस प्रसंग में संस्कृत के पौराणिक कथा-कोश लक्ष्मीनारायण संहिता से उद्धृत निम्नलिखित तथ्य विचारणीय हैं। 

कि जब ययाति यदु से उनकी युवावस्था का अधिग्रहण करने को कहते हैं
तब यदु उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।

"यदुं प्राह प्रदेहि मे यौवनं भुंक्ष्व राष्ट्रकम् ।७२।    
अनुवाद:-उन ययाति ने यदु से कहा :-कि मुझे यौवन दो और राष्ट्र का भोग करो ।

यदुः प्राह न शक्नोमि दातुं ते यौवनं नृप।
जराया हेतवः पञ्च चिन्ता वृद्धस्त्रियस्तथा ।७३।

कदन्नं नित्यमध्वा च शीतजाठरपीडनम्।
सा जरा रोचते मे न भोगकालो ह्ययं मम ।७४।

"अनुवाद:-यदु ने कहा-: हे राजा, मैं अपनी जवानी तुम्हें नहीं दे सकता। शरीर के जरावस्था( जर्जर होने  के पांच कारण होते हैं  १-चिंता और २-वृद्ध महिलाएं ३-खराब खानपान (कदन्न )और ४-नित्य सुरापान करने से पेट में (५-शीतजाठर की पीडा)। मुझे ये जरा( बुढ़ापा) अच्छा नहीं लगता यह मेरा भोग करने का समय है ।७३-।७४।

श्रुत्वा राजा शशापैनं राज्यहीनः सवंशजः।
तेजोहीनः क्षत्रधर्मवर्जितः पशुपालकः ।७५।

"अनुवाद:-यह सुनकर राजा ने उसे श्राप दे दिया और उसने अपने वंशजो सहित राज्य को छोड़ दिया  वह यदु राजकीय तेज से हीन और राजकीय क्षत्र धर्म से रहित पशुपालन से जीवन निर्वाह करने लगा।७५।

भविष्यसि न सन्देहो याहि राज्याद् बहिर्मम।
इत्युक्त्वा च पुरुं प्राह शर्मिष्ठाबालकं नृपः।७६।

"अनुवाद:-तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे इसमें सन्देह नहीं हेै यदु! मेरे राज्य से बाहर  चले जाओ। इस प्रकार कहकर और राजा ने फिर पुरू से कहा शर्मिष्ठा के बालक पुरु तुम राजा बनोगे।७६।

देहि मे यौवनं पुत्र गृहाण त्वं जरां मम ।
कुरुः प्राह करिष्यामि भजनं श्रीहरेः सदा ।७७।

"अनुवाद:-पुत्र मुझे यौवन देकर तुम मेरा जरा( बुढ़ापा) ग्रहण करो पुरु ( कुरु वंश के जनक) ने कहा  मैं हरि का  सदैव भजन करूँगा।७७।

📚: उर्वशी का  वर्णन अहीर कन्या के नाम से  इतिहास में जुड़ा है। मत्स्यपुराण इसका साक्ष्य है।
"एक आभीर कन्या जिसने भीमदवादशी का पालन किया, और उर्वशी बन गई। 
(मत्स्य-पुराण 69.59.)

"या तु कल्याणिनी नाम पुरा कल्पेषु पठ्यते। 
त्वमादिकर्ता भव सौकरेऽस्मिन् कल्पे महावीर वरप्रधान।।६९.५९।।
यस्याः स्मरन् कीर्तनमप्यशेषं विनष्टपापस्त्रिदशाधिपः स्यात्।। ६९.६० ।।
कृत्वा च यामप्सरसामधीशा नर्तकीकृता ह्यन्यभवान्तरेषु।
(बद्रिकाान्तिके पद्मसेनाभीरस्य)आभीर कन्यातिकुतूहलेन सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे।।६९.६१।।
जाताथवा विट्कुलोद्भवापि पुलोमकन्या पुरुहूतपत्नी।
तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं मम प्रिया सम्प्रति सत्यकामा।।६९.६२।।
  
विवरण:- वीर! तुम्हारे द्वारा इसका अनुष्ठान होनेपर यह व्रत तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगा। इसे लोग भीमद्वादशी' कहेंगे। यह भीमद्वादशी सब पापोंको नाश करनेवाली और शुभकारिणी होगी। प्राचीन कल्पोंमें इस व्रतको 'कल्याणिनी व्रत' कहा जाता था। महान् वीरोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेन! इस वाराहकल्पमें तुम इस व्रतके सर्वप्रथम अनुष्ठानकर्ता बनो। इसका स्मरण और कीर्तनमात्र करनेसे मनुष्यका सारा पाप नष्ट हो जाता है और वह देवताओंका राजा इन्द्र बन जाता है ॥ 51-58 ॥

कालान्तर में एक बद्रिका वन के समीप पद्मसेन अहीर की कन्या ने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रत का अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह नर्तकी अप्सराओं की अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोक में वह उर्वशी नाम से विख्यात है। 

इसी प्रकार वैश्य कुलमें उत्पन्न हुई, एक दूसरी कन्याने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव) की पुत्रीरूपमें उत्पन्न होकर इन्द्र की पत्नी बनी उसके अनुष्ठान कालमें जो उसको सेविका थी,वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है।

📚: "चन्द्रमा (मान) से बुध( ज्ञान) और बुध और इला ( वाणी) से  काव्यशक्ति ( पुरुरवा - कवि उत्पन्न की दार्शनिक थ्योरी है। 
चन्द्रमा विराट् पुरुष विष्णु के मन से उत्पन है अत: चन्द्रा़मा भी वैष्णव है। गोप जो विष्णु के शरीर के रोमकूपों से उत्पन्‍न हैं। वह तो वैष्णव हैं रही। नीचे पुरुष सूक्त से दो ऋचाऐं उद्धृत हैं। जो चन्द्रमा की उत्पत्ति का निर्देशन करती हैं।

'आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।।10.21।।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय(10)
 अनुवाद:-
द्वादश आदित्यों में मैं विष्णु नामक आदित्य हूँ। प्रकाश करनेवाली ज्योतियों में मैं किरणोंवाला सूर्य हूँ। वायुसम्बन्धी देवताओंके भेदों में मैं मरीचि नामक देवता हूँ और नक्षत्रों में मैं शशी (चन्द्रमा) हूँ।

'पशुजन्तुषु गौश्चहं चन्दनं काननेषु च।
तीर्थपूतश्च पूतेषु निःशङ्केषु च वैष्णवः।९२।
अनुवाद :-
पशुओं जीवों  में  गौ वनों में चन्दन पवित्र करने वालों में  तीर्थ और निशंक अथवा निर्भीकों में वैष्णव हूँ।९२।
विशेष- गोपों की निर्भीक प्रवृत्ति के कारण ही उनको संसार में आभीर भी कहा जाता है और कृष्ण ने स्वयं को इस रूप में स्वीकार किया है।

न वैष्णवात्परः प्राणी मन्मन्त्रोपासकश्च यः।
वृक्षेष्वङ्कुररूपोऽहमाकारः सर्ववस्तुषु ।९३ ।
अनुवाद :-
वैष्णव से बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है। विशेषत: वह जो मेरे मन्त्र की उपासना करता है।वह सर्वश्रेष्ठ हैं। मैं वृक्षों में अंकुर तथा सम्पूर्ण वस्तुओं में उसका आकार हूँ।९३।
_______
श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण श्रीकृष्णजन्मखण्ड  त्रिसप्ततितमोऽध्यायः।७३।

ऋग्वेद में चन्द्रमा की उत्पत्ति स्वराट् विष्णु के मन से हुई है। अत: चन्द्रमा वैष्णव सृष्टि है।
"चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥१३॥
"नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१४॥
यूरोपीय भाषाओं में चन्द्रमा का नामान्तरण मून है। जिसका सीधा सम्बन्ध भारोपीय मूल वैदिक शब्द मान=(मन+अण्- मनसो जात: चन्द्रमा)  अर्थात मन से उत्पन्न- मान -इस प्रकरण पर हम विस्तृत विश्लेषण आगे क्रमश: करते हैं।

चन्द्रमा (मान) से बुध( ज्ञान) और बुध और इला ( वाणी) से  काव्यशक्ति ( पुरुरवा - कवि उत्पन्न की दार्शनिक थ्योरी है। 

मन से मनन( विचार) उत्पन्न होकर निर्णीत होने पर बुध:( ज्ञान) बनता है और इसी ज्ञान(बुध:) के साथ इला ( वाणी) मिलकर परुरवा(कवि) हैं 

कविः शब्द पुल्लिंग है जिसकी  उत्पत्ति- कु धातु के "कव् रूप से (कवते सर्व्वं जानाति सर्व्वं वर्णयति सर्व्वं सर्व्वतो गच्छति वा । रूप में हुई है।कवि=(कव् +इन्) । यद्वा कुशब्दे + “अचः इः” । उणादि सूत्र ४ । १३८ । इति इः।

कवि शब्द शब्दार्थ के विशेषज्ञ का वाचक है। जो कि एक कवि की मौलिक विशेषता होती है।

"मन से मनन उत्पन्न होने से चन्द्रमा( मान ) कहलाया  चन्द्र विराट पुरुष के मन से उत्पन्न होने से यह विचारो का प्रेरक व प्रतिनिधि है। परवर्ती नाम मात्र  कवियों की कल्पना में भी चन्द्रमा का होना परम्परा के अवशेष मात्र हैं। 

और इस मान -मन्यु:( विचार ) से ज्ञान (बुध: ) उत्पन्न हुआ और इसी बुध: और इला (वाणी ) के संयोग से कवि का गुण काव्य उत्पन्न हुआ पुरुरवा दुनिया का प्रथम  पौराणिक कवि है और वह भी संयोग श्रृँगार के प्रथम कवि के रूप में । 

स्वयं पुरुरवा शब्द का  अभिधा मूलक अर्थ है। पुरु- प्रचुरं रौति कौति इति पुरुरवस्-
पुरूरवसे - पुरु रौतीति पुरूरवाः । ‘रु शब्दे '। अस्मात् औणादिके असुनि ‘पुरसि च पुरूरवाः' (उणादि. सूत्र  ४. ६७१) इति पूर्वपदस्य दीर्घो निपात्यते की सिद्धि से । 
सुकृते । ‘सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृञः ' (पाणिनीय सूत्र- ३. २. ८९) इति क्विप् । ततः तुक्  प्रत्यय।

पुरुरवा के जन्म विषय में ऋग्वेद का सन्दर्भ-

"त्वमग्ने मनवे द्यामवाशयः पुरूरवसे सुकृते सुकृत्तरः।
श्वात्रेण यत्पित्रोर्मुच्यसे पर्या त्वा पूर्वमनयन्नापरं पुनः॥४॥
(ऋग्वेदः - मण्डल १ सूक्त ३१ ऋचा ४)
सूक्तं १.३१
(अग्ने) हे अग्ने ! (सुकृत्तरः) अत्यन्त सुकृत कर्म करनेवाले (त्वम्)  आप (पुरूरवसे) अधिक स्तुति करने वाले कवि के लिए (मनवे) ज्ञानवान् विद्वान् के लिये (द्याम्) द्यौ लोक को (अवाशयः) - तुम प्रकाशित हुए।
मध्यम अवाशयः
(वश्- प्रकाशित होना- धातु का लङ्लकार मध्यम पुरुष एक वचन का
रूप अवाशय:) - तुम प्रकाशित किए हुए हो ।  (श्वात्रेण) धन और विज्ञान के साथ वर्त्तमान (पूर्वम्) पूर्वसमय में   (अपरम्) इसके आगे (पुनः) बार-बार (अनयन्) आते  हैं।  जो (त्वा) तुझे (श्वात्रेण) धन और विज्ञान के साथ वर्त्तमान (पूर्वम्) पिछले (अपरम्) अगले  को प्राप्त कराता है (पित्रोः) माता और पिता से तू (पर्यामुच्यसे) सब प्रकार छूट जाता  (आ) अच्छे प्रकार कर ॥ ४ ॥
📚: वश्- प्रकाशित होना- धातु का लङ्लकार मध्यम पुरुष एक वचन का
रूप अवाशय:) - तुम प्रकाशित किए हुए हो ।  (श्वात्रेण) धन और विज्ञान के साथ वर्त्तमान (पूर्वम्) पूर्वसमय में  (अपरम्) इसके आगे (पुनः) बार-बार (अनयन्) आते  हैं।  जो (त्वा) तुझे (श्वात्रेण) धन और विज्ञान के साथ वर्त्तमान (पूर्वम्) पिछले (अपरम्) अगले  को प्राप्त कराता है (पित्रोः) माता और पिता से तू (पर्यामुच्यसे) सब प्रकार छूट जाता  (आ) अच्छे प्रकार कर ॥ ४ ॥
"सायण भाष्य-मूलक अर्थ-
हे अग्नि ! तुम मनन शील व्यक्ति (मनु) के लिए स्वर्ग से प्रकाशित हुए।
अच्छे से अच्छा कर्म करने वाले पुरुरवा के उन अच्छे कार्यों के परिणाम स्वरूप  उसके लिए भी प्रकाशित हुए ।
जब अरणियों (लकड़ीयों) के शीघ्र मन्थन से तुम चारो ओर उत्पन्न होते हो। जब अरणियों से उत्पन्न हुए तुम्हें वेदी के पहले स्थान को ले जाते हुए आह्वानीय रूप से स्थापित किया गया और उसके पश्चात पश्चिम स्थान को ले जाते हुए तुम्हें गार्हपत्य रूप में स्थापित किया गया ।(ऋ०१/३१/४)
_______
आपको पता होना चाहिए कि संसार की रचना का आलंकारिक वर्णन शास्त्रों में प्रतिपादित हुआ है। ब्रह्म वैवर्तपुराण में एक स्थान पर चन्द्र उत्पति का वर्णन है 

मरीचेर्मनसो जातः कश्यपश्च प्रजापतिः।।
अत्रेर्नेत्रमलाच्चन्द्रः क्षीरोदे च बभूव ह ।।२।।
प्रचेतसोऽपि मनसो गौतमश्च बभूव ह ।।
पुलस्त्यमानसः पुत्रो मैत्रावरुण एव च ।।३।।

अनुवाद- मरीचि ब्रह्मा के मन से उत्पन्न हुए और मरीचि के मन से कश्यप उत्पन्न हुए। और अत्रि के नेत्रमल-(आँखों के कीचड़) से  समुद्र के जल में हुआ और प्रचेतस भी गौतम के मन से उत्पन्न है।

और पुलस्त्य जो ब्रह्मा के मन से उत्पन्न हुए उन्हीं पुलस्त्य के मन से मैत्रावरुण उत्पन्न हुए।२-।

'चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥13॥
( ऋग्वेद-10/90/13)
अनुवाद:-विराट पुरुष के मन से चन्द्रमा नेत्रों से सूर्य ज्योति , मुख से तेज और अग्नि का प्राकट्य हुआ।13।

'नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥14॥
( ऋग्वेद-10/90/14
अनुवाद:- विराट् पुरुष की नाभि से अन्तरिक्ष  शिर से द्युलोक, पैरों से भूमि तथा कानों से दिशाऐं प्रकट हुईं।   इस विराट पुरुष के द्वारा  इसी प्रकार अनेक लोकों को  रचा गया ।14।
[1/8, : भगवद् गीता अध्याय 11 श्लोक( 19)

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।11/19।।

हिंदी अनुवाद - 
आपको मैं  अर्जुन आदि ? मध्य और अन्तसे रहित ? अनन्त प्रभावशाली ? अनन्त भुजाओंवाले? चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोंवाले? प्रज्वलित अग्नि के समान मुखों वाले और अपने तेजसे संसारको जलाते  हुए देख रहा हूँ।
__________
📚: 
उधर ऋग्वेद के दशम मण्डल के- 95 वें सूक्त की 18 ऋचाऐं " पुरूरवा और उर्वशी के संवाद रूप में है। जिसमें पुरूरवा के विशेषण गोष ( घोष- गोप) तथा गोपीथ- है। अत: पुरुरवा गो- पालक राजा है।
📚: इस प्रसंग में संस्कृत के पौराणिक कथा-कोश लक्ष्मीनारायण संहिता से उद्धृत निम्नलिखित तथ्य विचारणीय हैं। 

कि जब ययाति यदु से उनकी युवावस्था का अधिग्रहण करने को कहते हैं
तब यदु उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।

"यदुं प्राह प्रदेहि मे यौवनं भुंक्ष्व राष्ट्रकम् ।७२।    
अनुवाद:-उन ययाति ने यदु से कहा :-कि मुझे यौवन दो और राष्ट्र का भोग करो ।

'यदुः प्राह न शक्नोमि दातुं ते यौवनं नृप।
जराया हेतवः पञ्च चिन्ता वृद्धस्त्रियस्तथा ।७३।

कदन्नं नित्यमध्वा च शीतजाठरपीडनम्।
सा जरा रोचते मे न भोगकालो ह्ययं मम ।७४।
"अनुवाद:-यदु ने कहा-: हे राजा, मैं अपनी जवानी तुम्हें नहीं दे सकता। शरीर के जरावस्था( जर्जर होने  के पांच कारण होते हैं।

१-चिंता और २-वृद्धता ३- विलासनी स्त्रीयाँ ४-खराब खानपान (कदन्न )और ५-नित्य सुरापान करने से पेट में (६-शीतजाठर की पीडा)। 

मुझे ये जरा( बुढ़ापा) अच्छा नहीं लगता यह मेरा भोग करने का समय है ।७३-।७४।

"अनुवाद:-यह सुनकर राजा ने उसे श्राप दे दिया और उसने अपने वंशजो सहित राज्य को छोड़ दिया  वह यदु राजकीय तेज से हीन और राजकीय क्षत्र धर्म से रहित पशुपालन से जीवन निर्वाह करने लगा।७५।
ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त 62 की ऋचा 10 में यदु और तुर्वसु का गोप रूप जानने योग्य है।

भविष्यसि न सन्देहो याहि राज्याद् बहिर्मम।
इत्युक्त्वा च पुरुं प्राह शर्मिष्ठाबालकं नृपः।७६।

"अनुवाद:-तुम्हारे वंशज कभी राजतन्त्र की प्रणाली से राजा नहीं होंगे इसमें सन्देह नहीं हेै यदु! मेरे राज्य से बाहर  चले जाओ। इस प्रकार कहकर और राजा ने फिर पुरू से कहा शर्मिष्ठा के बालक पुरु तुम राजा बनोगे।७६।

देहि मे यौवनं पुत्र गृहाण त्वं जरां मम ।
कुरुः प्राह करिष्यामि भजनं श्रीहरेः सदा ।७७।

"अनुवाद:-पुत्र मुझे यौवन देकर तुम मेरा जरा( बुढ़ापा) ग्रहण करो पुरु ( कुरु वंश के जनक) ने कहा  मैं हरि का  सदैव भजन करूँगा।७७।
📚: इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः 
अवीरे क्रतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः ॥३॥

-पदार्थ-
(इषुधेः) =इषु कोश से (असना) =फेंका जाने वाला (इषुः)= बाण (श्रिये न) विजयलक्ष्मी  में समर्थ नहीं होता है, तुझ भार्या  सहयोग के बिना, (रंहिः-न) मैं वेगवान् भी नहीं  (गोषाः-शतसाः)  सैकड़ो गायों का सेवक   (अवीरे) हे आभीरे  ! (उरा क्रतौ) विस्तृत यज्ञकर्म में या संग्रामकर्म में (न विदविद्युतत्) मेरा वेग प्रकाशित नहीं होता  (धुनयः) शत्रुओं को कंपाने वाले मेरे सैनिक (मायुम्) अब आदेश को (न चिन्तयन्त) नहीं मानते हैं ! ॥३॥
सरलार्थ:-
तूणीर( वाणकोश) से फेंका जाने वाले बाण वियश्री  में समर्थ नहीं होते हैं, तुझ भार्या उर्वशी के  सहयोग के बिना,  मैं वेगवान् भी नहीं  हूँ। (गोषाः-शतसाः) मैं सैकड़ो गायों का सेवक    (अवीरे) हे आभीरे  ! विस्तृत कर्म में या संग्रामकर्म में अब मेरा वेग प्रकाशित नहीं होता है। शत्रुओं को कंपाने वाले मेरे सैनिक भी अब मेरे आदेश को नहीं मानते हैं ॥३।
सायण-भाष्य:-
अनया पुरूरवाः स्वस्य विरहजनितं वैक्लव्यं तां प्रति ब्रूते । “इषुधेः । इषवो धीयन्तेऽत्रेतीषुधिर्निषङ्गः । ततः सकाशात् “इषुः “असना असनायै प्रक्षेप्तुं न भवति “श्रिये विजयार्थम् । त्वद्विरहाद्युद्धस्य बुद्ध्वावप्यनिधानात् । तथा “रंहिः वेगवानहं शत्रुसकाशात् {“गोषाः= तेषां शत्रूणां ~ गवां संभक्ता} "न अभवम् । लौकिकेषु भाषायां गोष: शब्देव घोष: अभवत् ।

तथा “शतसाः= शतानामपरिमितानां शत्रुधनानां संभक्ता नाभवम् । किंच “अवीरे= वीरवर्जिते( वैदिक रूप में तद्धित पद से पूर्व उपसर्ग विधान नही होने से अवीर (अवि+ईर)= अवीर= अभीर “क्रतौ राजकर्मणि सति “न “वि “दविद्युतत् न विद्योतते मत्सामर्थ्यम् । किंच “धुनयः कम्पयितारोऽस्मदीया भटाः "उरा उरौ। ‘सुपां सुलुक् ' इति सप्तम्या डादेशः । विस्तीर्णे संग्रामे "मायुम् । मीयते प्रक्षिप्यत इति मायुः शब्दः । 'कृवापाजि° - इत्यादिनोण् । सिंहनादं “न “चितयन्त न बुध्यन्ते । ‘चिती संज्ञाने'। अस्माण्णिचि संज्ञापूर्वकस्य विधेरनित्यत्वाल्लघूपधगुणाभावः । छान्दसो लङ्।३।

"जज्ञिष इत्था गोपीथ्याय हि दधाथ तत्पुरूरवो म ओजः ।
अशासं त्वा विदुषी सस्मिन्नहन्न म आशृणोः किमभुग्वदासि ॥११॥

“इत्था= इत्थं "गोपीथ्याय । गौः पृथिवी/ धेनु वा । पीथं =पालनम् (गोपालन ) । 
उर्वशी का  वर्णन अहीर कन्या के नाम से  इतिहास में जुड़ा है। मत्स्यपुराण इसका साक्ष्य है।

"एक आभीर कन्या जिसने भीमदवादशी व्रत का पालन किया, और उर्वशी बन गई। (मत्स्य-पुराण 69.59.)

"या तु कल्याणिनी नाम पुरा कल्पेषु पठ्यते। त्वमादिकर्ता भव सौकरेऽस्मिन् कल्पे महावीर वरप्रधान।६९.५९।

यस्याः स्मरन् कीर्तनमप्यशेषं विनष्टपापस्त्रिदशाधिपः स्यात्।६९.६०।

कृत्वा च यामप्सरसामधीशा नर्तकीकृता ह्यन्यभवान्तरेषु।(बद्रिकाान्तिके पद्मसेनाभीरस्य)आभीर कन्यातिकुतूहलेन सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे।६९.६१।

जाताथवा विट्कुलोद्भवापि पुलोमकन्या पुरुहूतपत्नी। तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं मम प्रिया सम्प्रति सत्यकामा।।६९.६२।।

विवरण:- वीर! तुम्हारे द्वारा इसका अनुष्ठान होनेपर यह व्रत तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगा। इसे लोग भीमद्वादशी' कहेंगे। 
यह भीमद्वादशी सब पापोंको नाश करनेवाली और शुभकारिणी होगी।

प्राचीन कल्पोंमें इस व्रतको 'कल्याणिनी व्रत' कहा जाता था। महान् वीरोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेन! इस वाराहकल्पमें तुम इस व्रतके सर्वप्रथम अनुष्ठानकर्ता बनो।

इसका स्मरण और कीर्तनमात्र करनेसे मनुष्यका सारा पाप नष्ट हो जाता है और वह देवताओंका राजा इन्द्र बन जाता है ॥ 51-58 ॥

कालान्तर में एक बद्रिका वन के समीप पद्मसेन अहीर की कन्या ने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह उर्वशी नर्तकी -अप्सराओं की अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोक में उर्वशी नाम से विख्यात है। इसी प्रकार वैश्य कुल में उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्या ने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव) की पुत्री रूप में उत्पन्न होकर इन्द्र की पत्नी बनी उसके अनुष्ठान काल में जो उसको सेविका थी, वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है।

वेदाश्च सर्वशास्त्राणां वरुणो यादसामहम् ।      उर्वश्यप्सरसामेव समुद्राणां जलार्णवः। ७०।
अनुवाद :- नन्द जी ! को कृष्ण अपने वैष्णव विभूतियों के सन्दर्भ में कहते हैं कि  छन्दों में गायत्री, संपूर्ण शास्त्रों में वेद, जलचरों में उनका राजा वरुण, अप्सराओं में उर्वशी, मेरी विभूति हैं इति श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण श्रीकृष्णजन्मखण्ड उत्तरार्द्ध नारदनां नन्दादि-
णोकप्रमोचनं नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः।७३।

"कृत्वा च यामप्सरसामधीशा नर्तकीकृता ह्यन्यभवान्तरेषु।
आभीर कन्यातिकुतूहलेन सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे।।६९.६१।।
(मत्स्य पुराण अध्याय 69 श्लोक 59)
अनुवाद :-

जन्मान्तर में एक अहीर की कन्या ने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह  स्वर्ग नर्तकी अप्सराओं की अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोक में उर्वशी नामसे विख्यात है।५९।


वैष्णव धर्म के प्राचीन संवाहक पुरुरवा - नहुष, ययाति और यदु- 

पुरुरवा (पुरूरवस) एक प्राचीन राजा का नाम है, जिसने (अहिर्बुध्न्यसंहिता) के अध्याय:- 47 में वर्णित शांति अनुष्ठान किया था, जो पंचरात्र( भागवत/वैष्णव धर्म )की  परम्परा से संबंधित है, जो धर्मशास्त्र, अनुष्ठान, प्रतिमा विज्ञान, कथा पौराणिक कथाओं और अन्य से संबंधित है।

 तदनुसार, "[यह संस्कार] जब वे संकट में हों तो अत्यंत गौरवशाली संप्रभुओं द्वारा नियोजित किया जाना चाहिए-

,अलर्क, मांधात्र, पुरुरवा, राजोपरिचर, धुंधु, शिबि और श्रुतकीर्तन - पुराने राजाओं ने इसे करने के बाद सार्वभौमिक संप्रभुता प्राप्त की। 

वे रोगमुक्त और शत्रुमुक्त हो गये। उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी और वे निर्दोष थे।”

पञ्चरात्र 
भागवत धर्म की एक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जहां  विष्णु का सम्मान किया जाता है और उनकी पूजा की जाती है।

वैष्णववाद से संबंधित क्लोज़ले के अनुसार, पंचरात्र साहित्य में कई वैष्णव दर्शनों को समाहित करने वाले विभिन्न आगम और तंत्र शामिल हैं।।

नहुष की पत्नी पार्वती पुत्री अशोक सुन्दरी की जन्म गाथा-
                 "श्रीदेव्युवाच-
वृक्षस्य कौतुकाद्भावान्मया वै प्रत्ययः कृतः।
सद्यः प्राप्तं फलं भद्रे भवती रूपसम्पदा ।७१।

अशोकसुन्दरी नाम्ना लोके ख्यातिं प्रयास्यसि ।
सर्वसौभाग्यसम्पन्ना मम पुत्री न संशयः ।७२।

सोमवंशेषु विख्यातो यथा देवः पुरन्दरः ।
नहुषोनाम राजेन्द्रस्तव नाथो भविष्यति ।७३।
एवं दत्वा वरं तस्यै जगाम गिरिजा गिरिम् ।
कैलासं शङ्करेणापि मुदा परमया युता। ७४।
अनुवाद:-

श्री देवी (अर्थात पार्वती ) ने अपनी पुत्री अशोक सुन्दरी से कहा :

71-74.-इस कल्पद्रुम  के बारे में सच्चाई जानने की जिज्ञासा से मैंने पुत्री तुम्हारे बारे में  चिन्तन किया। हे भद्रे!, तुझे फल अर्थात् सौन्दर्य का धन तुरन्त प्राप्त हो जाता है तुम रूप सम्पदा हो। तुम निःसंदेह सर्व सौभाग्य से सम्पन्न मेरी पुत्री हो। तुम संसार में अशोकसुन्दरी के नाम से विख्यात होओंगी । राजाओं के स्वामी सम्राट, नहुष , जो देव इंद्र के समान चन्द्रवँश परिवार में प्रसिद्ध होंगे वे ही , तुम्हारे पति होंगे।

इस प्रकार  (अर्थात् पार्वती) ने अशोक सुन्दरी को वरदान दिया और बड़ी खुशी के साथ शंकर के साथ कैलास पर्वत पर चली गईं।

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ।१०२।

वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ।१०२।

पुरुरवा पुत्र  आयुष को दत्तात्रेय का वरदान कि आयुष के नहुष नाम से विष्णु का अंश- अवतार होगा।  नीचे के श्लोकों में यही है।
 
देववीर्यं सुतेजं च अजेयं देवदानवैः ।
क्षत्रियै राक्षसैर्घोरैर्दानवैः किन्नरैस्तथा ।१३१।

देवब्राह्मणसम्भक्तः प्रजापालो विशेषतः ।
यज्वा दानपतिः शूरः शरणागतवत्सलः ।१३२।

दाता भोक्ता महात्मा च वेदशास्त्रेषु पण्डितः ।
धनुर्वेदेषु निपुणः शास्त्रेषु च परायणः ।१३३।

अनाहतमतिर्धीरः सङ्ग्रामेष्वपराजितः ।
एवं गुणः सुरूपश्च यस्माद्वंशः प्रसूयते ।१३४।

देहि पुत्रं महाभाग ममवंशप्रधारकम् ।
यदि चापि वरो देयस्त्वया मे कृपया विभो ।१३५।

अनुवाद :- सम्राट आयुष दत्तात्रेय से कहते हैं कि हे भगवन ् यदि आप मुझे वर देना चाहते हो तो वर दो ।१३५।

               "दत्तात्रेय उवाच-
एवमस्तु महाभाग तव पुत्रो भविष्यति ।
गृहे वंशकरः पुण्यः सर्वजीवदयाकरः ।१३६।
अनुवाद :- दत्तात्रेय ने कहा - एसा ही हो
तेरे घर में सभी जीवों पर दया करनेवाला पुण्य कर और भाग्यशाली पुत्र होगा।१३६।

एभिर्गुणैस्तु संयुक्तो वैष्णवांशेन संयुतः ।***
राजा च सार्वभौमश्च इन्द्रतुल्यो नरेश्वरः ।१३७।
अनुवाद:-
इन सभी गुणों से संयुक्त विष्णु के अंश से युक्त
सार्वभौमिक राजा इन्द्र के तुल्य होगा। १३७।

एवं खलु वरं दत्वा ददौ फलमनुत्तमम् ।
भूपमाह महायोगी सुभार्यायै प्रदीयताम् ।१३८।

एवमुक्त्वा विसृज्यैव तमायुं प्रणतं पुरः ।
आशीर्भिरभिनंद्यैव अन्तर्द्धानमधीयत ।१३९।

प्रसंग-

एक बार दत्तात्रेय की सेवा करते करते आयुष को जब कई दिनों का लंबा समय बीत गया, तो उस योगी  दत्तात्रेय ने उन्मत्त  हालत में  राजा से कहा: हे राजन् “जैसा मैं तुमसे कहता हूं वैसा ही करो। मुझे प्याले में दाखमधु दो; और मांस का भोजन जो पक गया है उसे दो।” उनके इन शब्दों को सुनकर, पृथ्वी के स्वामी आयुष ने उत्सुक होकर, तुरन्त एक प्याले में शराब ली, और तुरंत अपने हाथ से अच्छी तरह से पका हुआ मांस काट लिया, और, राजा ने उसे दत्तात्रेय को दे दिया। वह श्रेष्ठ मुनि मन में प्रसन्न हो गये। (आयुष की) भक्ति, पराक्रम और गुरु के प्रति महान सेवा को देखकर, उन्होंने राजाओं के भी राजा उस विनम्र आयुष से कहा:

129. “हे राजन, आपका कल्याण हो, ऐसा वर मांगो जो पृथ्वी पर प्राप्त करना कठिन हो।” अब मैं तुम्हें वह सब कुछ दूँगा जो तुम चाहते हो।”

राजा ने कहा :

130-135. हे मुनिश्रेष्ठ, आप मुझ पर दया करके सचमुच वरदान दे रहे हैं। तो मुझे सद् गुणों से संपन्न, सर्वज्ञ, , देवताओं की शक्ति से युक्त और देवताओं और दैत्यों, क्षत्रियों , दिग्गजों, भयंकर राक्षसों और किन्नरों से अजेय पुत्र दीजिए । (वह केवल ) देवताओं और ब्राह्मणों के प्रति समर्पित होना चाहिए, और (उसे) विशेष रूप से अपनी प्रजा की देखभाल करने वाला , त्यागी, दान का स्वामी (अर्थात् सर्वश्रेष्ठ दाता), शूरवीर, अपने आश्रय पाने वालों के प्रति स्नेही, दाता, भोक्ता, उदार और वेदों तथा पवित्र ग्रंथों का ज्ञाता, धनुर्वेद (अर्थात धनुर्विद्या) में कुशल होना चाहिए। और पवित्र उपदेशों में पारंगत हैं। उसकी बुद्धि (होनी चाहिए) और वह अजेय; बहादुर और युद्धों में अपराजित होना वाला हो। उसमें ऐसे गुण होने चाहिए, वह सुंदर होना चाहिए और ऐसा होना चाहिए जिससे वंश आगे बढ़े। हे महामहिम, यदि आप कृपा करके मुझे एक वरदान देना चाहते हैं, तो हे प्रभु, मुझे मेरे परिवार का भरण-पोषण करने वाला (ऐसा) पुत्र  अवश्य दीजिए।

दत्तात्रेय ने कहा :

136-138- ऐसा ही होगा, हे गौरवशाली राजी! आपके महल में एक पुत्र होगा, जो मेधावी होगा, आपके वंश को कायम रखेगा और सभी जीवित प्राणियों पर दया करेगा। वह  सभी सद्गुणों और विष्णु के अंश से संपन्न होगा। वह, मनुष्यों का स्वामी, इंद्र के बराबर एक संप्रभु सम्राट होगा।

इस प्रकार उसे वरदान देने के बाद, महान ध्यानी योगी दत्तात्रेय ने राजा को एक उत्कृष्ट फल दिया और उससे कहा: "इसे अपनी पत्नी को देना।" इतना कहकर, और उस आयुस् को, जो उसके सामने नतमस्तक हुआ था, दत्तात्रेय  उसे  आशीर्वाद देकर , वह गायब हो गये।

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ।१०३।

नहुष चन्द्रवंश का एक प्रसिद्ध राजा था। वह सम्राट आयुष् के पुत्र थे। एक समय तो वह इंद्र भी बन गया थे। अंत में अगस्त्य ऋषि ने उन्हें सर्प बनने का श्राप दे दिया।

परिवार
पिता: आयुष्
माता : इन्दुमती
भाई: क्षत्रियवृद्ध, राभ, अनैना
पत्नी: अशोकसुन्दरी
पुत्र : याति, ययाति , संयाति, अयाति, वियाति, कृति
(नह्यति सर्व्वाणि भूतानि माययेति - जो माया द्वाराजगत के सभी प्राणियों को बाँधता है  वह  विष्णु नहुष हैं।
(महाभारते ।१३।१४९।४७।  “
परन्तु पद्मपुराण भूमि-खण्ड में नहुष शब्द की व्युत्पत्ति {नञ्+ हुष्+घञ्}=नहुष: जो कभी पराजित न हो।

नहुष को स्वर्ग में प्रवेश करने की अनुमति दी गई क्योंकि उसने वैष्णव यज्ञ करके खुद को शुद्ध कर लिया था।
(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 257, श्लोक 5)।
महाभारत, सभा पर्व, अध्याय 8, श्लोक 8 

में कहा गया है कि नहुष, मृत्यु के बाद, राजा यम (मृत्यु के देवता) के महल में रहते है।

(9) ऋग्वेद , मण्डल 1, अनुवाक 7, सूक्त 31  की 11वीं ऋचा में पुरुरवा के पुत्र आयुस् वर्णन है और उसके भी पुत्र नहुष के इन्द्र बनने का उल्लेख मिलता है।

त्वामग्ने प्रथममायुमायवे देवा अकृण्वन्नहुषस्य विश्पतिम् ।
इळामकृण्वन्मनुषस्य शासनीं पितुर्यत्पुत्रो ममकस्य जायते ॥११॥

-हे (अग्ने) तुम  ! (देवाः) देवों ने (नहुषस्य) पुरुरवा के पौत्र की (आयवे) आयुस् के लिये इस (इळाम्) वाणी को (अकृण्वन्) प्रकाशित किया तथा (मनुष्यस्य) मनुष्यमात्र की (शासनीम्) सत्य शिक्षा को (अकृण्वन्) प्रकाशित किया और (यत्) जैसे (ममकस्य) हम लोगों के (पितुः) पिता का  (पुत्रः) (जायते) उत्पन्न होता है।॥ ११ ॥

सायण की टिप्पणी: ऋग्वेद-भाष्य

नहुष पुरुरवा के पुत्र 'आयुष- का पुत्र था , जिसे इंद्र के रूप में स्वर्ग में पदोन्नत किया गया था । इला( पृथ्वी - गाय) यज्ञ करने के पहले नियमों को साधन बनाती है, इसलिए वह शासनि = धर्मोपदेशकर्तृ, कर्तव्य में वाद्य कर्म की दाता है।



                 

      "अध्याय - प्रथम"-

     "कठोपनिषद् में वाजश्रवापुत्र- ऋषिकुमार नचिकेता और यम देव के बीच प्रश्नोत्तरों के रूप में आत्मा की स्थित का कथामयी वर्णन है।

बालक नचिकेता की आध्यात्मिक शंकाओं का समाधान करते हुए यमराज उसे लौकिक उपमाओं के माध्यम से सांसारिक भोगों में लिप्त जीवात्मा, और उसके शरीर के मध्य के सम्बन्ध का स्पष्टीकरण करते हैं ।

सम्बन्धित आख्यान में यम देव के निम्नांकित श्लोकनिबद्ध दो वचनसारगर्भित हैं।

"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।

सन्दर्भ:-(कठोपनिषद्,अध्याय-१,वल्ली ३,श्लोक- ३)

अनुवाद:-इस जीवात्मा को तुम रथी, (रथ में सबार ) समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी- (रथ हांकने वाला) और मन को लगाम समझो । (लगाम – इंद्रियों पर नियंत्रण के लिए होता है। अगले श्लोक में उल्लेख है।)

"इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।

सन्दर्भ:-(कठोपनिषद्,अध्याय १,वल्ली ३,श्लोक ४)

अनुवाद:-मनीषियों, (मननशील पुरुषों), ने इन्द्रियों को इस शरीर रूपी-रथ को खींचने वाले घोड़े कहा है, जिनके लिए इन्द्रिय-विषय ही विचरण के मार्ग हैं, इन्द्रियों तथा मन से युक्त इस आत्मा को उन्होंने शरीररूपी रथ का भोग करने वाला बताया है ।

प्राचीन भारतीय विचारकों का चिन्तन प्रमुखतया आध्यात्मिक प्रवृति का रहा है । ऐहिक सुखों के आकर्षण का ज्ञान उन्हें भी रहा ही होगा।

परन्तु उसकी परिवर्तनशील व नश्वरता ने उनका मोह अवश्य खण्डित किया होगा। तत्पश्चात उनका प्रयास रहा  होगा कि वे उसके मिथ्या आकर्षण पर विजय पायें ।

उनकी आध्यात्मिक साधना इसी प्रयास या रूपान्तरण है।

"रथ में सबार यह रथेष्ठा ही निष्क्रिय रहकर केवल प्रेरक बना रहता है। अब यह. प्रेरणा शारीरिक क्रिया तो है नहीं आत्मा रथी के रूप में  रथ के चालक को मात्र  प्रेरणा ही देता है।

वास्तव में रथेष्ठा की लौकिक उपमा बड़ी सार्थक बन पड़ी है ।
रथेष्ठा की केवल इतनी ही भूमिका है कि 'वह प्रेरित करता है।

और यह शरीर वास्तव में एक रथ के समान है , तथा बुद्धि को रथ हाँकने वाला सारथि जान लें । और मन केवल प्रग्रह ( पगाह)--या कहें लगाम है।

अब आत्मा बुद्धि को निर्देशित करती है। और  बुद्धि मन को नियन्त्रण करता है । और मन इन्द्रियों को-

विद्वान कहते हैं कि इन्द्रियाँ ही रथ में जुते हुए घोड़े हैं । और विषय ही मार्ग में आया हुआ उनका  भोजन ( ग्रास) आदि है।

वस्तुत:-आत्मा ही मन और इन्द्रीयों से युक्त हो कर दु:ख और सुख उपभोग करने वाला भोक्ता है । 
जब उसमे अहं का भाव हो जाय तब यह भोक्ता भाव से युक्त होता है।
स्वत्व आत्मबोध या रूपान्तरण है। परन्तु अहंकार इसके विपरीत आत्मा के अबोध कि रूपान्तरण है। 
अहंकार की भूमि पर संकल्प का बीज इच्छाओं की वल्लरी( वेल) बनता है। जिसपर कर्म रूपी फल लगा हुआ है।
बिना इच्छाओं के कर्म उबले हुए  बीज की तरह अंकुरित ही नहीं हो सकता है।
संसार रूपी बारी में इच्छाओं सी वही वेल चलती फूलती हैं।

इन सबके मूल में  माया रूपी अज्ञानता से जनित प्रतीति है। द्वन्द्व संसार की आत्मा है।
संसार शब्द की व्युत्पत्ति "संसरत्यस्मादिति- संसार ।  सं + सृ गतौ +घञ् ।  जो सम्यक् रूप से सरति(गच्छति) गमन करता है।
 
"आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।
ततः सद्यो विमुच्येत यद् बिभेति स्वयं भयम्।१४।
भागवतपुराण-१/१/१४

आपन्नः – उलझा हुआ; संसृतिम् - जन्म और मृत्यु रूपी चक्र  में ; घोरम् - बहुत जटिल; यत् - जो; नाम -  नाम; विवशः - असमर्थ;  गृणान् - स्तुतियों को ततः -उससे; सद्यः - तुरन्त; विमुच्येत - मुक्ति मिले ; यत् - जो; बिभेति - डरता है ; स्वयंम् – व्यक्तिगत रूप से; भयम् - भय ही। 

अनुवाद:-

जो जीवित प्राणी जन्म और मृत्यु के जटिल चक्र में फंसे हुए हैं, वे अनजाने में भी कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करके तुरंत मुक्त हो सकते हैं, जिससे भय भी  भयभीत होता है।  

संसार में फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकार से पार जाना चाहते हैं, उनके लिये अध्यात्मिक तत्त्वों को प्रकाशित कराने वाला यह एक अद्वितीय दीपक है।

क्यों कि दु:ख और सुख मन के विकल्प और द्वन्द्व की अवस्थाऐं हैं। दु:ख सुख आत्मा का विषय है ही नहीं।

व्यक्ति के मूर्च्छित होने पर दु:ख सुख की प्रतीति( अनुभव) नहीं होता है।
जीव जन्म- मरण के चक्र में वही अनादि काल से घूम रहा है।

दु:ख सुख मन के स्तर पर ही विद्यमान हैं ये  परस्पर विरोधाभासी व सापेक्ष हैं । परन्तु आनन्द सुख से पूर्णत: भिन्न है। यही आत्मा की एक अवस्था व सहज अनुभूति है।
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सत् - चित् और आनन्द = सच्चिदानन्द ईश्वरीय अस्तित्व का बोधक है।
और यह मूल आत्मा परमात्मा का ही एक इकाई अथवा अंश रूप है।

आत्मा का स्वरूप इसी लिए (सत्-चित्-(चेतनामय)-आनन्द ) से युक्त है  इसी लिए मनीषियों ने परमात्मा को  सच्चिदानन्द कहा है। 

अब अज्ञानता से जीव सुख को ही आनन्द समझता है और सुख की सापेक्षिकता से दु:ख उसे अवश्य मिलता है । यही क्रम संसार का अनादि काल से चलता-रहता है।

और यह द्वन्द्व (परस्पर विरोधी दो भावों का रूप ) ही सृष्टि का मूलाधार है । 
यही हम्हें दु:ख और सुख के दो पाटों में  निरन्तर पीसता रहता  है । _________________________________________________

श्रीमद्भगवत् गीता इसी द्वन्द्व से मुक्त करने वाले ज्ञान का प्रतिपादन करती है । वस्तुत द्वन्द्व से परे होने के लिए मध्यम अथवा जिसे दूसरे शब्दों में समता का मार्ग भी कह सकते हैं अपनाना ही पड़ेगा । क्यों संसार द्वन्द्व रूप है ।
भगवान कृष्ण ने अपनी विभूतियों के सन्दर्भ में कहा भी है-
👇
अनुवाद :- मैं अक्षरों (वर्णमाला) में अकार और समासों में द्वन्द्व (नामक समास) हूँ मैं अक्षय काल और विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) धाता हूँ।। 

अर्थात्‌ ये मेरी विभूतियाँ हैं । ये तो सभी भाषाविद् जानते ही हैं कि "भाषा में स्वरों की सहायता के बिना शब्दों का उच्चारण नहीं किया जा सकता और उसमें भी "अ" स्वर सबका आधार है। 

"अ" स्वर का ही उदात्त (ऊर्ध्वगामी) रूप "उ" तथा अनुदात्त (अधोगामी) "इ" रूप है।

और इन तीनों स्वरों से सम्पूर्ण स्वर विकसित हुए। 
"अ" वर्ण का ही घर्षण रूप "ह" हुआ । इन दौनों का पारस्परिक तादात्म्य-(एकरूपता) श्वाँस और धड़कन (हृत्स्पन्दन) के समान विद्यमान है ।

"ह" प्रत्येक वर्ण में महाप्राण के रूप मे गुम्फित है। और "अ" आत्मा के रूप में ।

"अकार के इस महत्व को पहचान कर ही उपनिषदों में इसे समस्त वाणी का सार कहा गया है। 
हिब्रू तथा फोंनेशियन आदि सैमेटिक भाषाओं में "अकार का रूपान्तरण "अलेफ" वर्ण है ।
 श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण वचन  " अक्षराणामकारोऽस्मि के पश्चात कहा -

द्वन्द्वः सामासिकस्य च -मैं समासों में द्वन्द्व हूँ अर्थात्‌ द्वन्द्व ईश्वर की समासीय विभूति है । 
स्त्री-पुरुष द्वन्द्व हैं । शीत- और उष्ण(गर्मी) द्वन्द्व हैं।
संस्कृत व्याकरण में दो या अधिक (पदों) को संयुक्त करने वाला विधान विशेष समास कहलाता है? जिसके अनेक प्रकार हैं।

समास के दो पदों के संयोग का एक नया ही रूप होता है। द्वन्द्व समास में दोनों ही पदों का समान महत्व होता है? 

जबकि अन्य सभासों मे पूर्वपद अथवा उत्तरपद का दौनों में किसी एक का ही होता है। 
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण द्वन्द्व समास को अपनी विभूति बनाते हैं क्योंकि इसमें उभय पदों का समान महत्व है ।

अध्यात्म ज्ञान के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि आत्मा और अनात्मा(शरीर) दोनों इस प्रकार मिले हैं कि हमें वे एक रूप में ही अनुभव में आते हैं और उनका भेद स्पष्ट ज्ञात नहीं होता ? -जैसे माया और ईश्वर ।
परन्तु विवेकी पुरुष के लिए वे दोनों उतने ही विलग होते हैं जैसे कलहंस के लिए नीर और क्षीर-
ये विवेक ( सत्य असत्य को अलग करने का ज्ञान) बुद्धि पर ईश्वरीय प्रकाश है। विवेक निर्णीत ज्ञान है।
वेद लौकिक ज्ञान के उद्भासक हैं।
वेद अध्यात्म की उस गहराई का कभी प्रतिपादन नहीं करते है। जिसका विवेचन भगवान कृष्ण स्वयं श्रीमद्भगवद्गीता में करते हैं।

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श्रीमद्भगवद्गीता -,अध्याय २- का (45-46) 
हे अर्जुुन सारे वेद सत्, रज, और तम इन तीनों प्राकृतिक गुणों का ही प्रतिपादन करते हैं।  अर्थात्‌ इन्हीं तीनों गुणों से युक्त हैं इसलिए तुम इन तीनों को त्याग कर दु:ख-दुख आदि द्वन्द्वों से परे होकर  तथा नित्य सत्वगुण में स्थित योग-क्षेम को न चाहने वाले बनकर केवल आत्म-परायण बनो ! जैसे सब ओर से परिपूर्ण जलाशय को प्राप्त होकर  मनुष्य का छोटे गड्डों से कोई प्रयोजन नहीं रहता है ; उसी प्रकार उपर्युक्त वर्णित तथ्यों को जानने वाले निर्द्वन्द्व व्यक्ति का वेदों से कोई प्रयोजन नहीं रहता ! 

अनुवाद :-
(श्रीमद्भगवद् गीता 2/53) में स्पष्ट वर्णन है। जब वेदों के सुनने से तेरी बुद्धि विचलित हो गयी है। परन्तु  जब ये समाधि
में स्थिर होगी तब तू योग को प्राप्त कर सकेगा ! आशय यह कि वेदों का अध्ययन व तदनुकूल आचरण करने से व्यक्ति की बुद्धि विचलित हो जाती है ;
क्योंकि वेद आध्यात्मिक पथ को प्रशस्त नहीं करते अपितु व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताओं की प्राप्ति के उपायों का वर्णन या प्रतिपादन ही करते हैं।
 और कृष्ण का दर्शन कामनाओं के समूल त्याग की दीक्षा ( उपदेश) देता है।

"जब व्यक्ति में सत्य का निर्णय करने व उच्च  तत्व को समझने की बुद्धि नहीं रहती है। तब ही वह भौतिक जगत की ओर आकर्षित होकर भागता है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण वैष्णव पुराण  में श्रीकृष्ण को ही प्रमुख इष्ट मानकर उन्हें सृष्टि का कारण बताता है। 'ब्रह्मवैवर्त' शब्द का अर्थ ही है- ब्रह्म का विवर्त ( परिवर्तन- नृत्य) अथवा विलास- क्रीड़ा या खेल है।

उत्तरमीमांसा (वेदान्त दर्शन)का सबसे विशेष दार्शनिक सिद्धान्त यह है कि जड़ जगत का उपादान( सामग्री) और निमित्त कारण चेतन ब्रह्म ही है।

"ठीक उसी प्रकार जैसे मकड़ी अपने भीतर से उत्पन्न लार से ही जाल बुनकर तानती है, वैसे ही ब्रह्म भी इस जगत्‌ को अपनी ही शक्ति द्वारा उत्पन्न करता है। यही नहीं, वही इसका पालक है और वही इसका संहार भी करता है।

जीव और ब्रह्म का तादात्म्य( एकरूपता) है और इसी लिए अनेक प्रकार के साधनों और उपासनाओं द्वारा वह ब्रह्म के साथ तादात्म्य का अनुभव करके जगत्‌ के कर्म-जाल से और बारम्बार के जन्म और मरण से मुक्त हो जाता है।  तब मुक्तावस्था में परम आनन्द का अनुभव करता है।

संसार की सृष्टि का मूल  स्वत्व है और उसका अहंकार से उत्पन्न रूप संकल्प है। यही संकल्प प्रवाहित होकर इच्छा का रूप धारण करता है।

ये इच्छाओं की आपूर्ति का मूर्त  प्रयास ही कर्म है। ये सम्पूर्ण संसार कर्म से निर्मित हुआ है। यदि व्यक्ति कर्म से हीन हो जाए यदि उसकी इच्छाओं का शमन हो जाए तो संसार उसके लिए निस्सार हो जाता है।

"स्वप्न की सृष्टि( उत्पत्ति) भी प्राय: मन की इच्छाओं के  दमित( दबे हुए)  परिणाम का रूपान्तरण है।  इस लिए स्वप्न के विश्लेषण से सृष्टि उत्पत्ति के  रहस्य को सुलझाया जा सकता है।

परन्तु स्वप्न विश्लेषण व्यक्तिगत अनुभव है। लौकिक उपमा मकड़ी की हा सुबोध्य है।

जिसका प्रस्तुतिकरण हम पुन: करते हैं।

"भूतयोन्यक्षरमित्युक्तम्। तत्कथं भूतयोनित्वमित्युच्यते प्रसिद्धदृष्टान्तैः -
(1.1.7)
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथा सतः पुरुषात्केशलोमानितथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्।।1.1.7।
1.1.7।
यथा लोके प्रसिद्धम् - ऊर्णनाभिर्लूताकीटः किञ्चित्कारणान्तरमनपेक्ष्य स्वयमेव सृजते स्वशरीराव्यतिरिक्तानेव तन्तून्बहिप्रसारयति पुनस्तानेव गृह्यते च गृह्णाति स्वात्मभावमेवापादयति। यथा च पृथिव्यामोषधयो व्रीह्यादिस्थावरान्ता इत्यर्थः। स्वात्माव्यतिरिक्ता एव प्रभवन्ति। यथा च सतो विद्यमानाञ्जीवतः पुरुषात्केशलोमानि केशाश्च लोमानि च सम्भवन्ति विलक्षणानि।
यथैते दृष्टानातास्तथा विलक्षणं सलक्षणं च निमित्तान्तन्तरानपेक्षाद्यथोक्तलक्षणादक्षरात्सम्भवति समुत्पद्यत इह संसारमण्डले विश्वं समस्तं जगत्। अनेकदृष्टान्तोपादानं तु सुखार्थप्रबोधनार्थम्।1.1.7।

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ऊर्णनाभः, पुल्लिंग- (ऊर्णेव तन्तुर्नाभौ यस्य-ऊन के समान तन्तु जिसकी नाभि में हैं वह ऊर्णनाभ है।

अनुवाद:- अक्षर ब्रह्म( नाद- ब्रह्म) का विश्व कारणत्व

पूर्व में इस प्रकार कहा जा चुका है। कि अक्षर ब्रह्म भूतों (प्राणियों) की योनि (जन्मस्थान) है। उसका वह भूत योनित्व किस प्रकार है। वह प्रसिद्ध दृष्टान्त द्वारा बतलाया जाता है।

जिस प्रकार मकड़ी जाले को बनाती और फिर निगल जाती है। जैसे पृथ्वी में औषधीयाँ  उत्पन्न होती हैं। जैसे सजीव पुरुषों से जड़ केश तथा लोम उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार उस अक्षर ब्रह्म से  यह विश्व उत्पन्न होता है।

जिस प्रकार संसार में प्रसिद्ध है। कि ऊर्णनाभि (मकड़ी) किसी अन्य उपकरण की अपेक्षा ( इच्छा) न कर स्वयं ही अपने शरीर से अभिन्न तन्तुओं (धागों) को रचती अर्थात उन्हें बाहर फैलाती है। और फिर आवश्यकता समाप्त होने पर उसे ग्रहीत( घरी) भी कर लेती है। यानि अपने शरीर में समाविष्ट कर लेती है । जैसे पृथ्वी में व्रीहि (धान) यव ( जौ)इत्यादि अन्न से लेकर  वृक्ष पर्यन्त ( तक ) सम्पूर्ण औषधीयाँ उससे अभिन्न ही उत्पन्न होती हैं। सत् (चेतनसत्ता)  युक्त पुरुष से भिन्न विलक्षण केश तथा रोम ( लोम) उत्पन्न होते हैं।

जैसा कि यह दृष्टान्त है उसी प्रकार इस संसार मण्डल में इससे विभिन्न और समान लक्षणों वाला यह विश्व-( समस्त जगत्) किसी अन्य निमित्त की अपेक्षा न करने वाले उस उपर्युक्त लक्षण विशिष्ट अक्षर से ही उत्पन्न होता है।

ये अनेक दृष्टान्त केवल विषय को सरलता से समझने के लिए ही दिए गये हैं।७।

द्वितीयः खण्डः
समाप्तमिदं तृतीयकं मुण्डकम्

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मुण्डकोपनिषद् की कथा का विवरण इस लेख में प्रस्तुत किया गया है । प्रश्नोपनिषद् के समान, मुण्डकोपनिषद् में भी कथा का अंश बहुत कम है, और सम्भवतः यह भी, कथा न होकर, किसी ऐतिहासिक घटना का वर्णन है । 

मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेद की शौनकी शाखा से है इसमें परम-ब्रह्म और उसको प्राप्त करने के मार्ग का सुन्दर उपदेश है । भारत सरकार द्वारा गर्वान्वित उपदेश ’सत्यमेव जयते’ भी इसी उपनिषद् से संग्रहीत  है ।

इसी प्रकार इसके अन्य श्लोकांश भी सुविख्यात दार्शनिकता से पूर्ण हैं । 

इसके कुछ श्लोक कठोपनिषद् में भी पाए जाते हैं यह उपनिषद् तीन अध्यायों में बटा है, जिन्हें मुण्डक कहा जाता है । प्रत्येक मुण्डक में दो-दो खण्ड है, जिनमें कुल ६४ श्लोक हैं ।

अति-स्पष्ट होने से, परातपर ब्रह्म के ज्ञान हेतु यह उपनिषद् अवश्य ही पढ़ना चाहिए ।

उपनिषद् बताता है कि देवों की जो प्रथम सृष्टि हुई, उनमें भी सबसे ज्ञानी ब्रह्मा हुए, जो सबके कर्ता और लोकों के रक्षक हुए (सम्भवतः, उन्होंने मनुष्य-जाति को आगे बढ़ाने में योगदान दिया और धर्म के प्रवचन से सब प्राणियों की रक्षा के निमित्त हुए – यह इसका अर्थ है ।

"इस ’ब्रह्मा’ को परमात्मा-वाची ’ब्रह्म’ कभी नहीं समझना चाहिए – क्योंकि नपुंसकलिंग ’ब्रह्मन्’ शब्द परमात्मा के लिए प्रयुक्त होता है, और प्रायः पुंल्लिङ्ग ब्रह्मन्" शब्द  ’ब्रह्मा’ के लिए होता- है क्यों कि देव-/मनुष्य-वाची( पुल्लिंग) होता है  ब्रह्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को ब्रह्मविद्या दी । अथर्वा ने अंगिरा ऋषि को इस विद्या का पात्र बनाया ।

 "ब्रह्मन्- बृंहति बर्द्धते निरतिशयमहत्त्व-  लक्षणबृद्धिमान् भवतीत्यर्थः ।  बृहिबृद्धौ + बृंहे- र्नोऽच्च । “  उणादि सूत्र- ४ । १४५ ।  + मनिन् नकार- स्याकारः ।  रत्वञ्च । )  जो परमेश्वर निरन्तर वृद्धि कर रहा है। जिसका कहीं और कभी अन्त ही नहीं हो रहा है।   

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मुण्डकोपनिषद, 1.1.7

"यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति।
यथा सः पुरुषात् केशलोमनि तथाऽक्षरात् संभवतिः विश्वमृ ॥
"

यथा -  - जैसे । ऊर्णाभिः -  - ऊन से  । सृजते -  - रचना करता है । गृह्णते च - - और संग्रह करता है( समेटता है) । यथा पृथिवीम् --जैसा कि पृथ्वी को  ओषधयः - जड़ी-बूटियाँ ।सम्भवन्ति - उत्पन्न होती हैं।  यथा सतः पुरूषात् -  - जैसे कि एक सत पुरुष से से ।केशलोमानि - सिर और शरीर के बाल  हैं -  तथा इह - वैसे ही यह  अक्षरात् - अक्षर से अपरिवर्तनीय | विश्वम् सम्भवति -  - संसार का जन्म होता है |

श्लोक 1.1.7

जैसे मकड़ी अपने लार से उत्पन्न  जाल को बनाती  और अपने में पुन: निगल लेती  है, जैसे औषधीय पौधे पृथ्वी से उगते हैं, जैसे जीवित व्यक्ति से  निर्जीव आभासी बाल उगते हैं, वैसे ही यह ब्रह्माणड परात्पर ब्रह्म  से विकसित और अन्त में उसमें ही विलय  हो जाता है।



"यह सृष्टि ब्रह्म का वैवर्त है (ब्रह्म -वैवर्त- पुराण -पुरुष और प्रकृति के परिणामों की कथानक मूलक प्रस्तुति करने वाला प्रथम और प्राचीन पुराण है। इसमें कोई सन्देह नहीं है।

अन्य अठारह पुराणों में इसकी गणना उसी रूप में नहीं की जा सकती है जैसे पद्मपुराण, मत्स्य पुराण, अथवा भागवत पुराण की की जाती है ।

पद्मपुराण कि सृष्टि खण्ड अन्य सभी पुराणों में प्राचीनतर है जिसकी तर्ज पर स्कन्द पुराण का लेखन भी किया गया ।-

  वेदान्त के मनीषीयों जैसे रामानुजाचार्य आदि का  मत है कि सृष्टि का आधार सत्कार्यवाद का सिद्धान्त है।

इसकी मान्यता है कि कार्य अपनी उत्पत्ति के पूर्व अपने कारण में विद्यमान रहता है। जैसे एक छोटे से पीपल के बीज में सम्पूर्ण विशाल पीपल के वृक्ष की पूर्ण सम्भावनाऐं समाविष्ट (समाई)  हुई होती हैं। अनुकूल परिस्थितियों के आने पर समय पर सम्पूर्ण पीपल काम विकास हो जाता है। 

यह कारण और कार्य की एकता का अकाट्य सिद्धान्त है। यह सत्कार्यवाद के परिणामवादी रूप को मानता है। 

इसका सिद्धान्त ब्रह्म-परिणामवाद कहलाता है जिसके अनुसार यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म का, उसके विशेषणांश का परिणाम है।

इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि रामानुज तत्त्वत्रय ईश्वर, चित्त( जीव) और अचित्त( प्रकृति) में विश्वास तो करते हैं। परन्तु अन्त में सबको एक ब्रह्म में तिरोहित ( समाविष्ट) कर देते हैं।

इनमें ईश्वर विशेष्य है तथा चित् एवं अचित् उसके विशेषण हैं।
ईश्वर अंशी है और चिदचित् उसके अंश हैं।
अंश कभी अंशी से पृथक ( अलग) नहीं हो सकता है।
ब्रह्म के विशेषणांश (चिदचित्) का ही यथार्थ रूपान्तरण यह चराचर जगत् है ।

अचित् ज्ञानशून्य (जड़) एवं परिणामी द्रव्य है। और चित् (आत्मा) अपरिवर्तित रूप है।

यह अचित्- तीन प्रकार का है।

      ●  शुद्ध सत्य या नित्य-विभूति

      ●   मिश्र सत्त्व या प्रकृति एवं

      ●    सत्त्वशून्य या काल शुद्ध

"सत्त्वं रजस्तमस्रहित एवं उदात्तीभूत प्रकृति है। यह वह उपादान है जिससे आदर्श जगत् (वैकुण्ठ लोक) की वस्तुएं, ईश्वर तथा मुक्त जीवों के शरीर बनते हैं। सत्त्वशून्य जड़द्रव्य 'काल' है। 

यह भी परिणामी है। 

वाराहमिहिर कृत ‘सूर्य सिद्धान्त’ में तारों, सूर्य, चन्द्रमा और अन्य ग्रहों की गति और गणितीय व्युत्पत्तियों के आधार पर समय के मापन की नौ पद्धतियों का विवेचन किया गया है।
तद्नुसार काल की नौ इकाईयाँ हैं।

१-ब्राह्म’, २‘दिव्य’, ३‘त्रिज्या ४-प्राजापत्य’, ५‘गौरव’, ६‘सौर’, ७‘सावन’, ‘८ चान्द्र’ और -‘आर्क्ष’।
प्रथम छ: इकाइयों ‘ब्राह्म से सौर पर्यन्त’ का प्रयोग ब्रह्माण्ड के आविर्भाव से व्यतीत होने वाले  समय को परिभाषित करने में किया गया है।

चान्द्रमान का उपयोग दैनिन्दिनदर्शिका (पंचांग) के निर्माण में होता है, जिससे विभिन्न संस्कारों तथा त्योहारों का निर्धारण किया जाता है।

सावन दिन (Solar day) और नाक्षत्र दिन (Sidereal day) का उपयोग ग्रहों की गति की गणना में किया जाता है।

सावन दिन:-पूरे एक दिन और एक रात का समय होता। 

एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के समय को सावन दिन कहा जाता है अर्थात् 60 दंड का  समय । 

विशेष— इस प्रकार के ३० दिनों का एक सावन मास होता है और ऐसे बारह सावन मासों अर्थात् ३६० दिनों का एक सावन वर्ष होता है, मलमासतत्व के अनुसार — 'सौर संवत्सरे दिवस षट्काधिक ? सावनो भवति'।

अर्थात् सौर और सावन वर्ष में लगभग ६ दिनों का अंतर होता है। 

"सवनं यागाङ्गं स्नानं सोमनिष्पीडनं वा तस्येदमण् सावनं - “अहोरात्रेण चैकेन सावनो दिवसः स्मृतः” ब्रह्मसिद्धान्तोक्ते (१) -अहोरात्रात्मके दिवसे, सवनत्रयस्य अहोरात्र- साध्यत्वादह्नस्तत्सम्बन्धित्वम्

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आधुनिक भौतिक विज्ञान के इस युग में भी हमने समय की इन दो इकाइयों को महत्त्व दिया है।

सावन दिन’ अपनी उपयोगिता के कारण दोनों पद्धतियों (वैशेषिक एवं भौतिकी) में समय  के मापन का ठोस एवं उत्तम आधार तैयार करता है।

प्राचीन भारतीय पद्धति में काल  की इकाई का विभाजन और उपविभाजन अधोलिखित प्रकार से होता है-

60 विपल=1 पल
 60 पल=1 घंटि (नाडी/दण्ड)
 21/2 घंटि=1 होरा (hour)
 24 होरा = 1 सावन दिन
आधुनिक समय में हम काल (समय) का विभाजन तथा उपविभाजन निम्न प्रकार से करते हैं-
६० सैकेण्ड=१ मिनट
६० मिनट=१ घण्टा
२४ घण्टा=१ दिन (सूर्य- दिवस)


भारतीय ज्योतिष में ग्रह, के अर्थ में, जो भी पिण्ड अंतरिक्ष में नक्षत्रों के सापेक्ष हमें गति करते दिखते हैं वे ग्रह कहलाते हैं। ग्रह का शाब्दिक अर्थ प्लैनेट  के रूप में व्यवहार ज्योतिष की दृष्टि से असंगत है।
काल (समय) की इकाई  होरा (जो घण्टा के समतुल्य है) साप्ताहिक दिनों के नामों की व्यवस्था प्रदान करता है। 

काल के विपरीत दिशा- आकाश से अभिन्न है और प्रकृतिजन्य है।

मिश्रसत्त्व में सत्त्व, रजस् एवं तमस्, तीनों गुण रहते हैं। इसे प्रकृति या माया कहते हैं।

रामानुज प्रकृति को ही सृष्टि का मूलभूत कारण कहते हैं।

उल्लेखनीय है कि रामानुज की प्रकृति सांख्य दर्शन की प्रकृति से पूरी तरह  भिन्न भी नहीं है। 

जैसे, सत्व, रजस् एवं तमस् सांख्य की प्रकृति के निर्माणक घटक हैं एवं द्रव्य रूप हैं, जबकि ये रामानुज की प्रकृति के गुण या विशेषण हैं जिससे संसार निर्माण होता है।।

ये उससे अवियोजनीय होते हुए भी मित्र हैं। पुनः, सांख्य की प्रकृति स्वतन्त्र  है जब द्वन्द्व के सापेक्ष हो तब, जबकि रामानुज की प्रकृति ब्रह्म पर आश्रित है। 

रामानुज के दर्शन में बन्धन और मोक्ष -रामानुज के अनुसार ब्रह्म ही संसार का ( उपादान - (कार्य सामग्री) और निमित्त कारण दोनों है। 

ईश्वर के अंशभूत तत्त्व, जीव और प्रकृति, जगत् के उपादान कारण हैं। ईश्वर के संकल्प से सृष्टि का प्रारम्भ होता है। अतः ईश्वर सृष्टि का निमित्त कारण भी है। 

जब ईश्वर अपने संकल्प से जीवों को उनके अतीत कर्मों का फल दिलाने के लिए चित् और प्रकृति का प्रवर्तन करता है तब सृष्टि उत्पन्न होती है। इसी को रामानुज ब्रह्म की लीला कहते हैं।

इस प्रकार रामानुज का ब्रह्मपरिणामवाद लीलावाद है। 

" यह सृष्टि ब्रह्म की लीला है जिसे प्रकार मकड़ी के अन्दर से जाला निकलता है और आवश्यकता समाप्त होने पर वह मकड़ी उस जाले को स्वयं ही निगल लेती है। उसी प्रकार ब्रह्म के अन्दर से सृष्टि निकली है और अन्त में उसी में विलीन हो जाती है।  

ब्रह्म के रूप

ब्रह्म के दो रूप हैं

    ●  कारणावस्था और 

    ●  कार्यावस्था

"ब्रह्म की कार्यावस्था ही सृष्टि है जो कारणरूप ब्रह्म में बीज रूप में सदैव निहित होती है।

यह सृष्टि ब्रह्म का ही यथार्थ रूपांतरण( वैवर्त) है। ईश्वर प्रलयकाल में कारण रूप में रहता है। यह ब्रह्माण्ड अव्यक्त रूप में उसमें निहित होता है। सृष्टि की स्थिति में अव्यक्त रूप ब्रह्माण्ड व्यक्त होता है। 

इस अवधि में सूक्ष्म भूत स्थूल हो जाते हैं और जीव का धर्मभूत ज्ञान विस्तृत होकर अतीत कर्मों के अनुसार उसे भौतिक शरीरों से संयुक्त कर देता है।



"इस प्रकार एकमात्र ईश्वर ही सृष्टि का निमित्त एवं उपादान कारण है।

 उपादान:-वह कारण जो स्वयं कार्य रूप में परिणत हो जाय । वह सामग्री जिससे कोई वस्तु तैयार हो उपादान है ।

 जैसे, घड़े का उपादान कराण मिट्टी है । वैशेषिक में इसी को "समवायिकरण" कहते हैं । सांख्य के मत से उपादान और कार्य एक ही है ।

अर्थात् सृष्टि किसी बाह्य साधन की सहायता के बिना ही उससे स्वतः विकसित होती है। रामानुज के अनुसार यह परिणाम केवल ईश्वर के विशेषणांश में होता है, ईश्वर स्वतः इससे अप्रभावित रहता है। इस प्रकार ब्रह्म इस परिवर्तनशील जगत् का अपरिवर्तनशील केन्द्र है। जैसे किसी चक्र की परिधि और धुरी या सम्बन्ध होता है।

जगत् भी सत् है- 

"मुण्डकोपनिषद्  की मान्यता है कि सत् कारण से उत्पन्न होने के कारण जगत् भी सत् है , संविशेष ब्रह्म की  विभूति होने के कारण जगत् की सत्ता पारमार्थिक है। रामानुज शंकर के इस दृष्टिकोण को अस्वीकार करते हैं "कि जगत् केवल व्यावहारिक दृष्टि से सत् है और परमार्थतः( सिद्धान्तत:) असत् है ।

रामानुज की दृष्टि में शंकराचार्य का विचार श्रुति विरोधी है। उन्होंने इस बात का प्रतिपादन किया कि सृष्टि वास्तविक है। यह जगत् उतना ही सत्य है जितना ब्रह्म ।

श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णन है -


ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।4.24।।

अर्थ- जिस यज्ञ में अर्पण भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है, जिस मनुष्य की ब्रह्म में ही कर्म समाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।

छान्दोग्योपनिषद (तृतीय प्रपाठक चतुर्दश खण्ड हिंदी भावार्थ सहित) (चतुर्दशः खण्डः)

सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत 
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके
पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत
॥ ३. १४. १ ॥
 यह ब्रह्म ही सब कुछ है । यह समस्त संसार उत्पत्तिकाल में इसी परम्- ब्रह्म से उत्पन्न हुआ है, स्थिति काल में इसी से प्राण रूप अर्थात जीवित है और अनंतकाल में इसी में लीन हो जायेगा । ऐसा ही जान कर उपासक को शान्तचित्त और रागद्वेष रहित होकर परब्रह्म की सदा उपासना करे। जो मृत्यु के पूर्व जैसी उपासना करता है, वह जन्मान्तर में वैसा ही हो जाता है।

रामानुज नानात्व का निषेध करने वाले 'नेह नानास्ति किञ्चन्' तथा उनकी एकता को स्वीकार करने वाले 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म', इत्यादि श्रुतिवाक्यों की व्याख्या करते हुए कहते हैं।

कि ये वाक्य विषयों की सत्ता को अस्वीकार नहीं करते हैं। वे केवल यह बताते हैं कि उनमें एक ही ब्रह्म निहित है। जिस प्रकार स्वर्ण के सभी आभूषण स्वर्ण ही हैं उसी प्रकार इन विषयों का आन्तरिक सत्य ब्रह्म ही है।

सृष्टि का विकास क्रम -

रामानुज भी सांख्य दर्शन की तरह प्रकृति से सृष्टि का विकास क्रम दिखाते हैं। 

रामानुज भी सृष्टि का विकास क्रम लगभग सांख्य-जैसा ही मानते हैं। दोनों में प्रमुख अन्तर यह है कि रामानुज उपनिषदों में प्रतिपादित 'पञ्चीकरण की प्रक्रिया को स्वीकार करते हैं, जबकि सांख्य दर्शन भी  इसे मान्यता तो देता है परन्तु इसका निरूपण नहीं करता है। 

इस प्रक्रिया के अनुसार 'भूतादि अहंकार' से सर्वप्रथम पाँच सूक्ष्म भूतों का इस क्रम से आविर्भाव होता है —

        ◾  आकाश का गुण- ( ध्वनि)

        ◾  वायु का गुण -(स्पर्श)

        ◾ अग्नि का गुण- ( तेज)

        ◾ जल का गुण- (रस )

        ◾ पृथ्वी का गुण-( गन्ध)

इन पाँचों सूक्ष्म भूतों का पुनः पाँच प्रकार से संयोग होता है जिससे पाँच स्थूल महाभूतों का आविर्भाव होता है। पञ्चीकरण सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक स्थूल महाभूत में आधा भाग (1/2) इस महाभूत का अपना होता है और शेष आधे भाग में अन्य महाभूतों के बराबर भाग (1/8) होते हैं।

अभिप्राय  यह है कि पंचीकरण-सिद्धान्त से पाँच स्थूल महाभूतों का आविर्भाव निम्नलिखित क्रम और अनुपात से होता है—

"आकाश महाभूत= 1/2 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 अग्नि+1/8 जल+1/8 पृथ्वी। 

"वायु महाभूत= 1/2वायु + 1/8 आकाश + 1/8 अग्रि + 1/8 जल + 1/8 पृथ्वी

"अग्नि महाभूत = 1/2अग्नि +1/8 आकाश + 1/8 वायु + 1/8 जल + 1/8

 "पृथ्वी जल महाभूत= 1/2 जल +1/8 आकाश + 1/8 वायु + 1/8 अग्नि + 1/8 पृथ्वी ।

"पृथ्वी महाभूत= 1/2 पृथ्वी +1/8 आकाश + 1/8 वायु + 1/8 जल +1/8 अग्नि 

रामानुज के अनुसार सभी सांसारिक पदार्थ जिसमें जीव का शरीर भी शामिल है, इन्हीं पंचमहाभूतों से उत्पन्न होते हैं।

इसीलिए सभी सांसारिक वस्तुओं में पाँचों महाभूतों के तत्त्व पाये जाते हैं। पुनः, रामानुज ब्रह्म एवं जगत् के सम्बन्ध को आत्मा एवं शरीर के सम्बन्ध के समान मानते हैं।

"समालोचना-

हम ब्रह्म के स्वरूप विवेचन में देख चुके हैं कि रामानुज का 'परम यथार्थता' "का सिद्धान्त तार्किक दृष्टि से भले ही सन्तोषजनक न हो परन्तु दार्शनिक रूप से सार्थक है। 

और उनका लीलावाद का सिद्धान्त एक प्रकार का रहस्यवाद है जिसे बौद्धिक धरातल पर ग्राह्य नहीं माना जा सकता क्यों कि यह रहस्य मानवीय भौतिक बुद्धि द्वारा ग्राह्य नहीं है।

ईश्वर सृष्टि रचना का संकल्प क्यों करता है? क्या इसमें उसका कोई प्रयोजन निहित है ?

अवश्य प्रयोजन निहित है  लीला विलास उसका उद्देश्य है। सत- चित और आनन्द उस आत्मा की मौलिक सत्ताऐं हैं।

पुनः जगत् को ईश्वर के विशेषणांश या अंश (चिदचित्) का परिणाम बताया जाता है। क्या विशेषणांश के परिवर्तन से विशेष्य अप्रभावित रह सकता है ? क्या अंशों में परिणाम होने पर भी अंशी अपरिणामी बना रह सकता है ? क्या जगत् के दोष ब्रह्म को व्याप्त नहीं करते हैं?

रामानुज इन प्रश्नों का समाधान 'आत्मा-शरीर' एवं 'राजा-प्रजा' की उपमाओं के आधार पर करने का प्रयास करते हैं।

 किन्तु वे इस प्रयास में तर्कतः सफल नहीं होते। वास्तव में, यदि ब्रह्म अंशी है और जगत् अंश है तो जगत् के दोषों से ब्रह्म अक्षुण्ण नहीं रह सकता। इसी लिए उसका दोष पूर्ण रूपान्तरण ही जीवात्मा है।

 विशेषणांश के परिणामी होने पर विशेष्यांश के अपरिणामी बने रहने की बात स्थूल रूप से समझ में नहीं आती। परन्तु द्वन्द्व वाद के विवेचन करने पर यह बात समझ में आ जाती है। जैसे आधेय और आधार केन्द्र और परिधि आदि रूप इसी प्रकार समन्वित हैं।

यह संसार मन में स्वप्न के समान अथवा समुद्र में लहर के समान परिणामी है।

वह एक कृष्ण ही अनेक रूपों में उद्भासित होते हैं। अर्थात् ब्रह्म का रूपान्तर ही उसका वैवर्त  है। 

ब्रह्म की रूपान्तर राशि 'प्रकृति' है। प्रकृति के विविध परिणामों का प्रतिपादन ही इस 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' में प्राप्त होता है।

 विष्णु के अवतार कृष्ण का उल्लेख यद्यपि कई पुराणों में मिलता है, किन्तु इस पुराण में यह विषय भिन्नता लिए हुए है। 

'ब्रह्मवैवर्त पुराण' में कृष्ण को ही 'परब्रह्म' माना गया है, जिनकी इच्छा से सृष्टि का जन्म होता है।

कृष्ण से ही ब्रह्माविष्णु, महेश और प्रकृति का जन्म बताया गया है। उनके दाएं पार्श्व से त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम) उत्पन्न होते हैं। फिर उनसे महत्तत्त्व, अहंकार और पंच तन्मात्र उत्पन्न हुए। फिर नारायण का जन्म हुआ जो श्याम वर्ण, पीताम्बरधारी और वनमाला धारण किए चार भुजाओं वाले थे। पंचमुखी शिव का जन्म कृष्ण के वाम पार्श्व( बगल) से हुआ। नाभि से ब्रह्मा, वक्षस्थल से धर्म, वाम पार्श्व से पुन: लक्ष्मी, मुख से सरस्वती और विभिन्न अंगों से दुर्गा, सावित्रीकामदेव, रति, अग्नि, वरुण, वायु आदि देवी-देवताओं का आविर्भाव हुआ। ये सभी भगवान के 'गोलोक' में स्थित हो गए

जिस प्रकार ब्रह्माण्ड, शरीर और परमाणु परस्पर समष्टि (समूह) और  व्यष्टि (इकाई) के रूप में  सम्बन्धित हैं। उसी प्रकार सृष्टि का भी क्रम है
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यह परमाणु भी त्रिगुणात्मक है --सत् धनात्मक तथा तमस् ऋणात्मक तथा रजो गुण न्यूट्रॉन के रूप में मध्यस्थ होने से न्यूट्रल (Neutral ) है जो उदासीन है।  परमाणु को जब और शूक्ष्मत्तम रूप में देखा तो अल्फा, बीटा और गामा कण भी त्रिगुणात्मक ही सिद्ध  होते है।

परन्तु ये सभी पूर्ण नहीं हैं; केवल उसके अवयव रूप हैं परमाणु का मध्य भाग जिसे नाभिक (Nucleus)भी कहते हैं ,उसी में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन उसी प्रकार समायोजित हैं , जैसे सत्य  का समायोजन ब्रह्म से हो। अथवा सतोगुण का समायोजन परम्-ब्रह्म में हो।
क्योंकि परम्- ब्रह्म की प्राप्ति के लिए सतोगुण को तो धारण करना पड़ेगा और अन्त में उसका परित्याग करना ही पड़ता है।

क्वार्क बोसॉन एक प्राथमिक कण है तथा यह पदार्थ का मूल घटक है। क्वार्क एकजुट होकर सम्मिश्रण कण हेड्रान बनाते है। परमाणु के मुख्य अवयव प्रोटॉन व न्यूट्रॉन इनमें से सर्वाधिक स्थिर होते है और बोसॉन जो कि गौड पार्टीकल्स के नाम से मशहूर है , जिससे बिग बैंग का पता चला था , उसी को बोसॉन कहते है ,

विदित हो कि परमाणु के केन्द्र में प्रतिष्ठित प्रोटॉन (Protons) पूर्णतः घन आवेशित कण है और इसी केन्द्र के चारो ओर भिक्षुक के सदृश्य(समान) प्रोटॉन के विपरीत ऋण-आवेशित कण इलैक्ट्रॉन गतिशील हैं।

जो कक्षाओं में निरन्तर चक्कर काटते रहते हैं  इलैक्ट्रान पर भी प्रोटॉन के धन आवेश के बराबर ही ऋण आवेश की संख्या होती है।

अर्थात् परमाणु में इलैक्ट्रॉन की संख्या भी प्रोटॉन की संख्या के बराबर होती है।
इलेक्ट्रॉन ही वस्तु के विद्युतीयकरण के लिए उत्तर दायी  होते हैं। 

परमाणु के द्रव्यमान का 99.94% से अधिक भाग नाभिक में होता है । 
प्रॉटॉन पर सकारात्मक विद्युत आवेश होता है । तथा इलेक्ट्रॉन पर नकारात्मक विद्युत आवेश होता है । और न्यूट्रॉन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता ।
तथा परमाणु का इलेक्ट्रॉन इस विद्युतीय बल द्वारा एक परमाणु के नाभिक में प्रॉटॉन की ओर आकर्षित होता है तथा परमाणु में प्रॉटॉन और न्यूट्रॉन एक अलग बल अर्थात् परमाणु बल के द्वारा एक दूसरे को आकर्षित करते हैं ।

विद्युत के साथ चुम्बकत्व जुड़ी हुई घटना है।विद्युत आवेश वैद्युतचुम्बकीय क्षेत्र पैदा करते हैं। विद्युत क्षेत्र में रखे विद्युत आवेशों पर बल लगता है।

समस्त विद्युत का आधार इलेक्ट्रॉन हैं। क्योंकि इलेक्ट्रॉन हल्के होने के कारण ही आसानी से स्थानांतरित हो पाते हैं। इलेक्ट्रानों के हस्तानान्तरण के कारण ही कोई वस्तु आवेशित होती है। आवेश की गति की दर विद्युत धारा है। 

आधुनिक शब्द 'इलेक्ट्रॉन' का उपयेग यूनानी भाषा में अंबर के लिए किया जाता है। 'इलेक्ट्रिसिटी' शब्द का उपयोग सन् 1650 में वाल्टर शार्ल्टन (Walter Charlton) ने किया। इसी समय राबर्ट बायल -1627-1691 ई.) ने पता लगाया कि आवेशित वस्तुएँ हल्की वस्तुओं को शून्य में भी आकर्षित करती हैं, अर्थांत् विद्युत के प्रभाव के लिए हवा का माध्यम होना आवश्यक नहीं है।

वस्तुओं की रगड़ के कारण विद्युत दो प्रकार की होती है, घनात्मक एवं ऋणात्मक। पहले इनके क्रमश: काचाभ (vitreous) तथा रेजिनी (resionous) नाम प्रचलित थे।
सन्-1737में डूफे (Du Fay,1699-1739 ने बताया कि सजातीय आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं तथा विजातीय आकर्षित करते हैं। 
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ऐसा ही आकर्षण स्त्री और पुरुष का पारस्परिक रूप से है । परमाणु किसी पदार्थ की सबसे पूर्ण सूक्षत्तम इकाई है।
वस्तुएँ न्यूनतम ऊर्जा विन्यास तक पहुँचने की प्रवृत्ति रखती हैं।
एक अन्य चुंबक उदाहरण, यदि आप दो बार चुंबकों को एक साथ रखते हैं, तो एक चुंबक का उत्तरी ध्रुव दूसरे के दक्षिणी ध्रुव के साथ संरेखित हो जाएगा। यह एक चुंबक के क्षेत्रों को दूसरे की ओर विपरीत दिशा में निर्देशित कर देगा, जिससे अधिकांश क्षेत्र रद्द हो जाएंगे, और इस प्रकार न्यूनतम ऊर्जा उत्पन्न होगी। 
समान ध्रुवों के बीच हमेशा प्रतिकर्षण बल होता है और विपरीत ध्रुवों के बीच में आकर्षण बल होता है।
इसका कारण दौनों ध्रुवों का परस्पर अपूर्णत्व ही है। इस लिए दौंनों मिलकर स्वयं को पूर्ण करना चाहते हैं।
स्त्री पुरुष की भी यही मिलन प्रवृत्ति है।
_पुरुष स्त्री की कोमलता का आकाँक्षी है तो स्त्री उसके पौरुष( परुषता) - या कठोरता की सहज आकाँक्षी है। ______________________________________________ 

"यूरोपीय पुरातन भाषाओं में विशेषत: जर्मनिक भाषाओं में "आत्मा" शब्द के अनेक वर्ण--विन्यास के रूप विद्यमान हैं👇

 जैसे -
1-पुरानी अंगेजी में--(Aedm)
 2-डच( Dutch) भाषा में (Adem )
 3-प्राचीन उच्च जर्मन में (Atum) = breath अर्थात् प्राण अथवा श्वाँस-- 
4-डच भाषा में इसका एक क्रियात्मक रूप (Ademen )--to breathe श्वाँसों लेना ।परन्तु (Auto) शब्द ग्रीक भाषा का प्राचीन रूप है । जो की (Hotos) रूप में था । 

जो संस्कृत भाषा में स्वत: से समरूपित है । श्री मद्भगवद्गीता में कृष्ण के इस विचार को आत्मा अविनाशिता के रूप में उद्घोषित किया है।👇
मूल श्लोकः

"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।
 (श्रीमद्भगवद्गीता-  2/23)

इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है ; जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।।
 
आत्मा नि:सन्देह अजर ( जीर्ण न होने वाला) और अमर (न मरने वाला ) है  आत्मा में मूलत: अनन्त ज्ञान, अनन्त शक्ति और यह स्वयं अनन्त आनन्द स्वरूप है। 
क्योंकि ज्ञान इसका परम स्वभाव है । 
ज्ञान ही शक्ति है और ज्ञान ही आनन्द परन्तु ज्ञान से तात्पर्य सत्य से अन्वय अथवा योग है 
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सत्य ज्ञान का गुण है और चेतना भी ज्ञान एक गुण है सत्य और ज्ञान दौनों मिलकर ही आनन्द का स्वरूप धारण करते हैं। जैसे सत्य पुष्प के रूप में हो तो ज्ञान इसकी सुगन्ध और चेतना इसका पराग और आनन्द स्वयं उसका मकरन्द (पुष्प -रस )है ; आत्मा सत्य है । 
क्योंकि इसकी सत्ता शाश्वत है । एक दीपक से अनेक दीपक जैसे जलते हैं ; ठीक उसी प्रकार उस अनन्त सच्चिदानन्द ब्रह्म से अनेक आत्माऐं उद्भासित हैं ।
परन्तु अनादि काल से वह सच्चिदानन्द ब्रह्म लीला रत है ;यह संसार लीला है उसकी जिसमें अविद्या ही निर्देशक है। अज्ञानता ही इस समग्र लीला का कारण है । अज्ञानता सृष्टि का स्वरूप है ; उसका स्वभाव है "यह सृष्टि स्वभाव से ही अन्धकार उन्मुख है। क्यों कि अन्धकार का तो कोई दृश्य श्रोत नहीं है, परन्तु प्रकाश का प्रत्येक श्रोत दृश्य है।

अन्धकार तमोगुणात्मक है ,तथा प्रकाश सतो गुणात्मक है यही दौनो गुण द्वन्द्व के प्रतिक्रिया रूप में रजो गुण के कारक हैं!

यही द्वन्द्व (दो) की सृष्टि में पुरुष और स्त्री के रूप में विद्यमान है। स्त्री स्वभाव से ही कोमल और भावना प्रधान प्रकृति कि है और पुरुष कठोर तथा विचार प्रधान प्रकृति का है।

वस्तुत: कहना चाहिए कि स्त्री प्रवृत्ति गत रूप से भावनात्मक रूप से प्रबल होती हैं ; और पुरुष विचारात्मक रूप से प्रबल होता है। 
इसके परोक्ष में सृष्टा  का एक सिद्धान्त निहित है  वह भी विज्ञान - संगत क्योंकि व्यक्ति इन्हीं दौनों विचार भावनाओं से पुष्ट होकर ही ज्ञान से संयोजित होता है ।

अन्यथा नहीं , वास्तव में इलैक्ट्रॉन के समान सृष्टि सञ्चालन में स्त्री की ही प्रधानता है।
और संस्कृत भाषा में आत्मा शब्द का व्यापक अर्थ है :--जो सर्वत्र चराचर में व्याप्त है । 

-आत्मा शब्द द्वन्द्व से रहित ब्रह्म का वाचक भी है और ब्रह्मन्- नपुसंक लिंग शब्द है। और द्वन्द्व से संयोजित जीव का वाचक भी है।

जैसे समुद्र में लहरें उद्वेलित हैं वैसे ही आत्मा में जीव उद्वेलित है ,वास्तव में लहरें समुद्र जल से पृथक् नहीं हैं ,लहरों का कारक तो मात्र एक आवेश या वेग है यह वेग जीवात्मा में मन अथवा चित्त या है ।
ब्रह्म रूपी दीपक से जीवात्मा रूपी अनेक दीपकों में जैसे एक दीपक की अग्नि का रूप अनेक रूपों ही प्रकट हो जाता है ।

इच्छा संकल्प काम ही आवेशात्मक रूपान्तरण है। और आवेश द्वन्द्व के परस्पर घर्षण का परिणाम है जीव अपने में अपूर्णत्व का अनुभव करता है । परन्तु यह अपूर्णत्व किसका अनुभव करता है उसे ज्ञात नहीं :-
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"ज्ञान दूर है और क्रिया भिन्न !    
श्वाँसें क्षण क्षण होती विच्छिन्न । 

पर खोज अभी तक जारी है । 
अपने स्वरूप से मिलने की । 

हम सबकी अपनी तैयारी है । 
आशा के पढ़ाबों से दूर निकर
संसार में किसी पर मोह न कर।
ये हार का हार स्वीकार न कर ।।
मञ्जिल बहुत दूर तुम्हारी है । 

शोक मोह में तू क्यों खिन्न है ।
कुछ पल के रिश्ते सब छिन्न है । 
'ये मतलब की दुनियाँ सारी है ।
मञ्जिल बहुत दूर तुम्हारी है । 
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शक्ति , ज्ञान और आनन्द के अभाव में व्यक्ति अनुभव करता है कि उसका कुछ तो खो गया है । जिसे वह जन्म जन्म से प्राप्त करने में संलग्न है । परन्तु परछाँईयों में वह उसे खोजता है।
सबका समाधान और निदान आत्मा का ज्ञान अथवा उसका साक्षात्कार ही है । 
और यह केवल मन के शुद्धिकरण से ही सम्भव है।

 स्व: में आत्म सत्ता का बोध सम्पूर्णत्व के साथ है ; यह सिन्धुत्व का भाव (समु्द्र होने का भाव )है । व्यक्ति के अन्त: करण में स्व: का भाव तो उसका स्वयं के अस्तित्व का बोधक है ।

 परन्तु अहं का भाव केवल मैं ही हूँ ; इस भाव का बोधक है। इसमें अति का भाव ,अज्ञानता है । _________________________________________
अल्पज्ञानी अहं भाव से प्रेरित होकर कार्य करते हैं ; तो ज्ञानी सर्वस्व: के भाव से प्रेरित होकर ,

सम्पूर्ण सृष्टि में जीव की भिन्नता का कारण प्राणी का चित् अथवा मन ही है ।
हमारा चित्त ही हमारी दृष्टि- ज्ञान और वाणी का संवाहक है, हमारी चेतना जितनी प्रखर होगी ,हमारा ज्ञान वाणी और दृष्टि उतनी ही उन्नत होगी।

स्त्री और पुरुष का जो भेद है, वह केवल मन के स्तर पर ही है ।
 
आत्मा के स्तर पर कदापि नहीं है जन्म-जन्मातरण तक यह मन ही हमारे जीवन का दिशा -निर्देशन करता है । 

सुषुप्ति ,जाग्रति और स्वप्न ये मन की ही त्रिगुणात्मक अवस्थाऐं हैं ।
परन्तु चतुरीय (तुरीय) अवस्था आत्मा की अवस्था है।

"प्राणी जीवन का संचालन मन में समायोजित प्रवृत्तियों के द्वारा होता है 
जैसे कम्प्यूटर का संचालन सी.पी.यू.-(केन्द्रिय प्रक्रिया इकाई) के द्वारा होता है । 

जिसमें सॉफ्टवेयर इन्सटॉल्ड (installed)होते हैं उसी प्रकार प्रवृत्तियों के (System Software) तथा (Application Software )हमारे मन /चित्त के (सी. पी.यू.) में समायोजित हैं।
 
जिन्हें हम क्रमश: प्रवृत्ति और स्वभाव कहते हैं । वास्तव में प्रवृत्तियाँ प्राणी की जाति(ज्ञाति)से सम्बद्ध होती हैं । 
और स्वभाव पूर्व-जन्म के कर्म-गत संस्कारों से सम्बन्धित होता है।

जैसे सभी स्त्री और पुरुषों की प्रवृत्तियाँ तो समान होती परन्तु स्वभाव भिन्न भिन्न होते हैं।जिन्हें हम क्रमश: सिष्टम सॉफ्टवेयर और एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर कह सकते है। 

आत्मा का वाचक प्रेत शब्द‌ भारतीय भाषाओं में अपने मूल व प्रारम्भिक अर्थें में प्रेरक- शक्ति का वाचक रहा होगा ।

जो अंग्रजी में स्प्रिट (Spirit) है । 
पुरानी फ्रेंच भाषा में लैटिन प्रभाव से "(espirit)" शब्द है जिसका अर्थ होता है --श्वाँस लेना (Breathing) अथवा (inspiration)----जिसका सम्बन्ध लैटिन क्रिया -(Spirare---to breathe) से है।

भाषा वैज्ञानिक इस शब्द का सम्बन्ध भारोपीय धातु स्पस् (speis)" से निर्धारित करते हैं । 

यद्यपि ईश्वर आदि और अन्त की सीमाओं से सर्वथा परे है। समुद्र बूँद तो नहीं हो सकता परन्तु अपनी इकाई रूप में बूँद अवश्य हो सकती है।

वह अन्तर्यामी ईश्वर व्यापक होते हुए भी अपने एक इकाई रूप से पृथ्वी पर भी अवतरित होता है।
भगवान कृष्ण गोलोक से सीधे भूलोक पर गोपों में ही अवतरित होते हैं।
क्यों वे धर्म की रक्षा के लिए अवतरण करते हैं।

"व्रजोपभोग्या च यथा नागे च दमिते मया ।
सर्वत्र सुखसंचारा सर्वतीर्थसुखाश्रया ।५७।

एतदर्थं च वासोऽयं व्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च ।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम् ।।

एनं कदम्बमारुह्य तदेव शिशुलीलया ।
विनिपत्य ह्रदे घोरे दमयिष्यामि कालियम्।५९

एवं कृते बाहुवीर्ये लोके ख्यातिं गमिष्यति। 2.11.६०।
अनुवाद:-मुझे इस नागराज का दमन करना है, जिससे जल देने वाली यह नदी कल्‍याणकारी जल का आश्रय हो सके। इस नाग का मेरे द्वारा दमन हो जाने पर यहाँ की नदी समूचे व्रज के उपभोग में आने योग्‍य हो जायेगी। यहाँ सब ओर सुखपूर्वक विचरण करना सम्‍भव हो जायगा तथा यह नदी समस्‍त तीर्थों और सुखों का आश्रय हो जायगी।

इसीलिये व्रज में मेरा यह निवास हुआ है और इसीलिये मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।कुमार्ग पर स्थित हुए इन दुरात्‍माओं का दमन करने के लिये ही यहाँ मेरा अवतार हुआ है। मैं बालकों के खेल-खेल में ही इस कदम्‍ब पर चढ़कर उस घोर ह्नद में कूद पड़ूँगा और कालिय नाग का दमन करूँगा। 

ऐसा करने पर संसार में मेरे बाहुबल की ख्‍याति होगी।

इस प्रकार श्रीमहाभारत के खिलभाग हरिवंश के अन्‍तर्गत विष्‍णु पर्व में बाललीला के प्रसंग में यमुना वर्णन नामक ग्‍यारहवां अध्‍याय पूरा हुआ 
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इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बालचरिते यमुनावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ।११।

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फिर आप लोग पुस्तक के अन्तिम व तीसरे खण्ड में यह भी जान पाएंगे कि ब्रह्मा जी की सृष्टि- रचना  चार वर्णों के अतिरिक्त भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक पाँचवा वर्ण अर्थात वैष्णव वर्ण भी विद्यमान है। 
जो ब्रह्मा जी के चार वर्णो से अलग है और जिसकी उत्पत्ति  सर्वोच्च सत्ता- श्रीकृष्ण अर्थात जिसे (स्वराट- विष्णु ) भी कह सकते हैं  से हुई है।

जिनके  सदस्यगण  व लीला सहचर एक मात्र गोप (अहीर ) ही हैं। जिन अहीरों को ही वास्तविक वैष्णव कहा जाता है । ये स्वराट्- विष्णु से उत्पन्न होने से ही वैष्णव हैं। स्वराट् विष्णु कृष्ण ही अपर नाम है।

श्री भगवान द्वारा सृष्टि के कार्य में नियुक्त ब्रह्माजी कमलकोष में प्रवेश किया और उसके ही भू:, भव:, और सव: तीन भाग किए । जीवों के भोगस्थान के रूप में इन्ही तीन लोकों का शास्त्रों में वर्णन हुआ है। जो निष्काम कर्म करने वाले हैं, उन्हें मह:, तप: जन: और सत्यलोकस्वरूप ब्रहमलोक की प्राप्ति होती है।

विषयों का निरंतर बदलना ही काल का आकार है। स्वयं तो वह निर्विशेष अनादि और अनन्त है। उसी को निमित्त बना कर भगवान खेल खेल में ही अपने आपको सृष्टि के रूप में प्रकट कर देते हैं। पहले यह सारा विश्व भगवान की माया से लीं होकर ब्रह्मरूप से स्थित था। उसी को अव्यक्त मूर्ति काल के द्वारा भगवान ने प्रथक रूप से प्रकट किया है।

यह जगत जैसा अब है पहले भी वैसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही होगा। प्रलयकाल आने पर सृष्टि के सम्पूर्ण विनाश के बाद, भगवान सृष्टि की पुनः रचना करते है। आदि काल से यह चक्र निर्विवाद रूप से विद्यमान है।

जगत की सृष्टि नौ प्रकार की होती है तथा प्राकृत वैकृत भेद से एक दसवीं सृष्टि और भी है । सृष्टि का प्रलयकाल, द्रव्य तथा गुणों के द्वारा तीन प्रकार होता है। दस प्रकार की सृष्टि का भेद निम्न प्रकार के बताया गया है:

छह प्राकृत सृष्टि-

१. पहली सृष्टि महत्व की है। भगवान की कृपा से सत्वआदि गुणो में विषमता होना ही इसका स्वरूप है।

२. दूसरी सृष्टि अहंकार की है। जिससे पृथ्वी आदि पंचभूत ज्ञानेंद्रिय और कर्मइंद्रियों की उत्पत्ति होती है।

३. तीसरी सृष्टि भूतसर्ग है जिससे पंचमहाभूतों को उत्पन्न करने वाला तन्मात्र वर्ग रहता है।

४. चौथी सृष्टि इंद्रियों की है। यह ज्ञान और क्रिया शक्ति से उत्पन्न होती है।

५. पाँचवी सृष्टि सात्विक अहंकार से उत्पन्न हुए देवताओं इंद्रियाधिष्ठाताओ देवताओं की है, मन भी इसी सृष्टि के अंतर्गत है।

६. छठी सृष्टि अविद्या की है। इसमें तमिस्र, अंधतमिस्र, तम, मोह और महामहिम- यह पाँच गाँठें हैं। यह जीवों की आत्मा का आवरण और विक्षेप करने वाली हैं।

वैकृत सृष्टि-

७. सातवी प्रधान वैकृत सृष्टि छह प्रकार के स्थावर वृक्षों की होती है। इनका संचार नीचे (जड़) से ऊपर की और होता है। इनके ज्ञान शक्ति नहीं होती, यह अंदर ही अंदर केवल स्पर्श का अनुभव करते है, इनमे से प्रत्येक के गुण अलग होते हैं।

– वनस्पति – जो बिना बौर आए ही फलते हैं जैसे गूलर, बड़, पीपल।
– औषधि – जो फलों के पक जाने पर नष्ट हो जाते हैं जैसे धान, गेहूँ, चना ।
– लता – जो किसी का आश्रय ले कर बढ़ते हैं जैसे ब्राह्मी।
– तवकसार – जिनकी छाल बहुत कठोर होती है जैसे बाँस ।
– वीरुध- जिनकी लता पृथ्वी पर ही फैलती है जैसे तरबूज़।
– द्रुम- जिनमे फूल आ कर फिर फूलों के स्थान पर ही फल लगते हैं जैसे जामुन।

८. आठवीं सृष्टि तिर्यग्योनियों (पशु पक्षियों) की है। इन्हें काल का ज्ञान नहीं होता और तमोगुण की अधिकता के कारण यह केवल खाना- पीना मैथुन तथा सोना ही जानते हैं। इन्हें सूँघने मात्र से से वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है। इनके मस्तिष्क में विचारशक्ति नहीं होती।

– द्विशफ – दो खुरों वाले पशु जैसे गाय, बकरा, भैंसा, मृग, शूकर, भेद और ऊँट।
– एकशफ – एक खुर वाले पशु जैसे गधा, घोड़ा, खच्चर।
– पञ्च नख – पाँच नखों वाले पशु जैसे कुत्ता, भेड़िया, बाघ, बिल्ली, सिंह, हाथी इत्यादि
– उड़ने वाले जीव – जैसे बगुला, गिध, हंस, मोर, कौवा, सरस उल्लू, इत्यादि

९. मनुष्य – नवी सृष्टि मनुष्यों की है। यह एक ही प्रकार के हैं। परस्पर इनमे कोई भेद नहीं है । इनका आहार ऊपर से नीचे की और होता है। मनुष्य रजोगुण प्रधान, कर्म परायण और दुःख: रूप विषयों में ही सुख मनने वाले होते हैं।

उपरोक्त के अतिरिक्त देव सृष्टि आठ प्रकार की –

देवता-पितर,असुर,

गंधर्व -अप्सरा,

यक्ष – राक्षस,

सिद्ध- चारण-विद्याधर,

भूत- प्रेत-पिशाच और

किन्नर-किम्पपुरुष-अश्वमुख है ।

इस प्रकार सृष्टि करने वाले सत्य संकल्प के रूप श्री हरि ही ब्रह्मा जी के रूप में प्रत्येक कल्प के आदि में रजोगुण से व्याप्त होकर स्वयं ही जगत के रूप में अपनी ही रचना करते हैं।        

सौति कहते हैं– शौनक जी! तब भगवान की आज्ञा के अनुसार तपस्या करके  सृष्टि क्रम में अभीष्ट सिद्धि पाकर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम मधु और कैटभ के मेद(चर्बी ) से मेदिनी की सृष्टि की।
उन्होंने आठ प्रधान पर्वतों की रचना की। 
वे सब बड़े मनोहर थे। 
उनके बनाये हुए छोटे-छोटे पर्वत तो असंख्य हैं, उनके नाम क्या बताऊँ ? मुख्य-मुख्य पर्वतों की नामावली सुनिये– सुमेरु, कैलास, मलय, हिमालय, उदयाचल, अस्ताचल, सुवेल और गन्धमादन – ये आठ प्रधान पर्वत हैं। फिर ब्रह्मा जी ने सात समुद्रों, अनेकानेक नदों और कितनी ही नदियों की सृष्टि की।

वृक्षों, गाँवों और नगरों का निर्माण किया। समुद्रों के नाम सुनिये– लवण, इक्षुरस, सुरा, घृत, दही, दूध और सुस्वादु जल के वे समुद्र हैं।

उनमें से पहले की लंबाई-चौड़ाई एक लाख योजन की है। बाद वाले उत्तरोत्तर दुगुने होते गये हैं। इन समुद्रों से घिरे हुए सात द्वीप हैं। 

उनके भूमण्डल कमल पत्र की आकृति वाले हैं। उनमें उपद्वीप और मर्यादा पर्वत भी सात-सात ही हैं।

ब्रह्मन! अब आप उन द्वीपों के नाम सुनिये, जिनकी पहले ब्रह्मा जी ने रचना की थी।

वे हैं–जम्बूद्वीप, शाकद्वीप, कुशद्वीप, प्लक्षद्वीप, क्रौंचद्वीप, न्यग्रोध (अथवा शाल्मलि) द्वीप तथा पुष्करद्वीप। 

भगवान ब्रह्मा ने मेरु पर्वत के आठ शिखरों पर आठ लोकपालों के विहार के लिये आठ मनोहर पुरियों का निर्माण किया। उस पर्वत के मूलभाग–पाताल लोक में उन्होंने भगवान अनन्त (शेषनाग) की नगरी बनायी। 

तदनन्तर लोकनाथ ब्रह्मा ने उस पर्वत के ऊपर-ऊपर सात स्वर्गों की सृष्टि की।

शौनक जी ! उन सबके नाम सुनिये– भूर्लोक, भुवर्लोक, परम मनोहर- स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक।

मेरु के सबसे ऊपरी शिखर पर जरा-मृत्यु आदि से रहित ब्रह्मा का लोक ब्रह्मलोक है।
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 उससे भी ऊपर ध्रुवलोक है,( उत्तरीध्रुव) जो सब ओर से अत्यन्त मनोहर है। जगदीश्वर ब्रह्मा जी ने उस पर्वत के निम्न भाग में सात पातालों का निर्माण किया। 
मुने ! वे स्वर्ग की अपेक्षा भी अधिक भोग-साधनों से सम्पन्न हैं और क्रमशः एक से दूसरे उत्तरोत्तर नीचे भाग में स्थित हैं।
 उनके नाम इस प्रकार हैं– अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल तथा रसातल। सबसे नीचे रसातल ही है।

 सात द्वीप, सात स्वर्ग तथा सात पाताल– इन लोकों सहित जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, वह ब्रह्मा जी के ही अधिकार में है।

शौनक! ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और महाविष्णु के रोमांच-विवरों ( रोमकूपों)में उनकी स्थिति है।

श्रीकृष्ण की माया से प्रत्येक ब्रह्माण्ड में दिक्पाल, ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं, देवता, मनुष्य आदि सभी प्राणी स्थित हैं।

इन ब्रह्माण्डों की गणना करने में न तो लोकनाथ ब्रह्मा, न शंकर, न धर्म और न विष्णु ही समर्थ हैं; फिर और देवता किस गिनती में हैं ?

विप्रवर! कृत्रिम विश्व तथा उसके भीतर रहने वाली जो वस्तुएँ हैं, वे सब अनित्य तथा स्वप्न के समान नश्वर हैं। 

वैकुण्ठ, शिवलोक तथा इन दोनों से परे जो गोलोक है, ये सब नित्य-धाम हैं। इन सबकी स्थिति कृत्रिम विश्व से बाहर है। ठीक उसी तरह, जैसे आत्मा, आकाश और दिशाएँ कृत्रिम जगत से बाहर तथा नित्य हैं।

इसी क्रम में ब्रह्मा सृष्टि करते हुए 
सावित्री से वेद आदि की सृष्टि करते हैं, ब्रह्मा जी से सनकादि की, सस्त्रीक स्वायम्भुव मनु की, रुद्रों की, पुलस्त्यादि मुनियों की तथा नारद की उत्पत्ति, भी सावित्री द्वारा होती है । सावित्री प्रसव की देवी हैं।  इसी उपरान्त नारद को ब्रह्मा का और ब्रह्मा जी को नारद का शाप
 
सौति कहते हैं – तदनन्तर सावित्री ब्रह्मा के संयोग से  चार मनोहर वेदों को प्रकट किया। साथ ही न्याय और व्याकरण आदि नाना प्रकार के शास्त्र-समूह तथा परम मनोहर एवं दिव्य छत्तीस रागिनियाँ उत्पन्न कीं। 

नाना प्रकार के तालों से युक्त छः सुन्दर राग प्रकट किये। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलहप्रिय कलियुग; वर्ष, मास, ऋतु, तिथि, दण्ड, क्षण आदि; दिन, रात्रि, वार, संध्या, उषा, पुष्टि, मेधा, विजया, जया, छः कृत्तिका, योग, करण, कार्तिकेय प्रिया सती महाषष्ठी देवसेना– जो मातृकाओं में प्रधान और बालकों की इष्ट देवी हैं, इन सबको भी सावित्री ने ही उत्पन्न किया।******
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 ब्रह्मा, पाद्म और वाराह– ये तीन कल्प माने गये हैं। नित्य, नैमित्तिक, द्विपरार्ध और प्राकृत – ये चार प्रकार के प्रलय हैं। 
इन कल्पों और प्रलयों को तथा काल, मृत्युकन्या एवं समस्त व्याधिगणों को उत्पन्न करके सावित्री ने उन्हें अपना स्तन पान कराया।
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तदनन्तर ब्रह्मा जी के पृष्ठ देश से अधर्म उत्पन्न हुआ। अधर्म से वामपार्श्व से अलक्ष्मी उत्पन्न हुई, जो उसकी पत्नी थी। 

ब्रह्मा जी के नाभि देश से शिल्पियों के गुरु विश्वकर्मा हुए। साथ ही आठ महावसुओं की उत्पत्ति हुई, जो महान बल-पराक्रम से सम्पन्न थे। *******

तत्पश्चात् विधाता के मन से चार कुमार आविर्भूत हुए, जो पाँच वर्ष की अवस्था के-से जान पड़ते थे और ब्रह्मतेज से प्रज्वलित हो रहे थे। 

उनमें से प्रथम तो सनक थे, दूसरे का नाम सनन्दन था, तीसरे सनातन और चौथे ज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान सनत्कुमार थे।
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इसके बाद ब्रह्मा जी के मुख से सुवर्ण के समान कान्तिमान कुमार उत्पन्न हुआ, जो दिव्य रूपधारी था। उसके साथ उसकी पत्नी भी थी।

वह श्रीमान एवं सुन्दर युवक था। क्षत्रियों का बीजस्वरूप था। उसका नाम था स्वायम्भुव मनु।
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जो स्त्री थी, उसका नाम शतरूपा था। वह बड़ी रूपवती थी और लक्ष्मी की कलास्वरूपा थी। पत्नी सहित मनु विधाता की आज्ञा का पालन करने के लिये उद्यत रहते थे।
स्वयं विधाता ने हर्ष भरे पुत्रों से, जो बड़े भगवद्भक्त थे, सृष्टि करने के लिये कहा।
परंतु वे श्रीकृष्ण परायण होने के कारण ‘नहीं’ करके तपस्या करने के लिये चले गये। इससे जगत्पति विधाता को बड़ा क्रोध हुआ।

कोपासक्त ब्रह्मा ब्रह्मतेज से जलने लगे। 
प्रभो! इसी समय उनके ललाट से ग्यारह रुद्र प्रकट हुए। 

उन्हीं में से एक को संहारकारी 'कालाग्नि रुद्र' कहा गया है। समस्त लोगों में केवल वे ही तामस या तमोगुणी माने गये हैं।
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गोलोकनाथ श्रीकृष्ण निर्गुण हैं; क्योंकि वे प्रकृति से परे हैं। जो परम अज्ञानी और मूर्ख हैं, वे ही शिव को तामस (तमोगुणी) कहते हैं। वे शुद्ध, सत्त्वस्वरूप, निर्मल तथा वैष्णवों में अग्रगण्य हैं।

अब रुद्रों के वेदोक्त नाम सुनो– महान, महात्मा, मतिमान, भीषण, भयंकर, ऋतुध्वज, ऊर्ध्वकेश, पिंगलाक्ष, रुचि, शुचि तथा कालाग्नि रुद्र। 

ब्रह्मा जी के दायें कान से पुलस्त्य, बायें कान से पुलह, दाहिने नेत्र से अत्रि, वाम नेत्र से क्रतु, नासिका छिद्र से अरणि, मुख से अंगिरा एवं रुचि, वामपार्श्व से भृगु, दक्षिणपार्श्व से दक्ष, छाया से कर्दम, नाभि से पंचशिख, वक्षःस्थल से वोढु, कण्ठ देश से नारद, स्कन्ध देश से मरीचि, गले से अपान्तरतमा, रसना से वसिष्ठ, अधरोष्ठ से प्रचेता, वामकुक्षि से हंस और दक्षिणकुक्षि से यति प्रकट हुए। विधाता ने अपने इन पुत्रों की सृष्टि करने की आज्ञा दी। 
पिता की बात सुनकर नारद ने उनसे कहा। नारद बोले – जगत्पते! पितामह! पहले सनक, सनन्दन आदि ज्येष्ठ पुत्रों को बुलाइये और उनका विवाह कीजिये। तत्पश्चात् हम लोगों से ऐसा करने के लिये कहिये। जब पिता जी! आपने उन्हें तपस्या में लगाया है, तब हमें ही क्यों संसार-बन्धन में डाल रहे हैं? 

अहो ! कितने खेद की बात है कि प्रभु की बुद्धि विपरीत भाव को प्राप्त हो रही है। भगवन! आपने किसी पुत्र को तो अमृत से भी बढ़कर तपस्या का कार्य दिया है और किसी को आप विष से भी अधिक विषम विषय-भोग दे रहे हैं। 
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पिताजी! जो अत्यन्त निम्न कोटि के भयानक भवसागर में गिरता है, उसका करोड़ों कल्प बीतने पर भी उद्धार नहीं होता। भगवान पुरुषोत्तम ही सबके आदि कारण तथा निस्तार के बीज हैं। वे ही सब कुछ देने वाले, भक्ति प्रदान करने वाले, दास्यसुख देने वाले, सत्य तथा कृपामय हैं। वे ही भक्तों को एकमात्र शरण देने वाले, भक्तवत्सल और स्वच्छ हैं।

भक्तों के प्रिय, रक्षक और उन पर अनुग्रह करने वाले भी वे ही हैं। भक्तों के आराध्य तथा प्राप्य उन परमेश्वर श्रीकृष्ण को छोड़कर कौन मूढ़ विनाशकारी विषय में मन लगायेगा? 

अमृत से भी अधिक प्रिय श्रीकृष्ण सेवा छोड़कर कौन मूर्ख विषय नामक विषम विष का भक्षण (आस्वादन) करेगा?

विषय तो स्वप्न के समान नश्वर, तुच्छ, मिथ्या तथा विनाशकारी है।
मरीचि आदि ब्रह्मकुमारों तथा दक्षकन्याओं की संतति का वर्णन, दक्ष के शाप से पीड़ित चन्द्रमा का भगवान शिव की शरण में जाना, अपनी कन्याओं के अनुरोध पर दक्ष का चन्द्रमा को लौटा लाने के लिये जाना, शिव की शरणागत वत्सलता तथा विष्णु की कृपा से दक्ष को चन्द्रमा की प्राप्ति
 
सौति कहते हैं– विप्रवर शौनक! तदनन्तर ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों को सृष्टि करने की आज्ञा दी। नारद को छोड़कर शेष सभी पुत्र सृष्टि के कार्य में संलग्न हो गये।

मरीचि के मन से प्रजापति कश्यप का प्रादुर्भाव हुआ। 

अत्रि के नेत्रमल से क्षीरसागर में चन्द्रमा प्रकट हुए। प्रचेता के मन से भी गौतम का प्राकट्य हुआ। मैत्रावरुण पुलस्त्य के मानस पुत्र हैं।
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मनु से शतरूपा के गर्भ से तीन कन्याओं का जन्म हुआ– आकूति, देवहूति और प्रसूति। 

वे तीनों ही पतिव्रता थीं। मनु-शतरूपा से दो मनोहर पुत्र भी हुए, जिनके नाम थे– प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे।

मनु ने अपनी पुत्री आकूति का विवाह प्रजापति रुचि के साथ तथा प्रसूति का विवाह दक्ष के साथ कर दिया। 
इसी तरह देवहूति का विवाह-सम्बन्ध उन्होंने कर्दम मुनि के साथ किया, जिनके पुत्र साक्षात भगवान कपिल हैं। 

दक्ष के वीर्य और प्रसूति के गर्भ से आठ कन्याओं का जन्म हुआ। उनमें से आठ कन्याओं का विवाह दक्ष ने धर्म के साथ किया, ग्यारह कन्याओं को ग्यारह रुद्रों के हाथ में दे दिया। एक कन्या सती भगवान शिव को सौंप दी। 

तेरह कन्याएँ कश्यप को दे दीं तथा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को अर्पित कर दीं।

विप्रवर! अब मुझसे धर्म की पत्नियों के नाम सुनिये– शान्ति, पुष्टि, धृति , तुष्टि, क्षमा, श्रद्धा, मति और स्मृति। 

शान्ति का पुत्र संतोष और पुष्टि का पुत्र महान हुआ।
धृति से धैर्य का जन्म हुआ। तुष्टि से दो पुत्र हुए – हर्ष और दर्प। 
क्षमा का पुत्र सहिष्णु था और श्रद्धा का पुत्र धार्मिक। 
मति से ज्ञान नामक पुत्र हुआ और स्मृति से महान जातिस्मर का जन्म हुआ।
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धर्म की जो पहली पत्नी मूर्ति थी, उससे नर - नारायण नामक दो ऋषि उत्पन्न हुए। 

शौनक जी ! धर्म के ये सभी तीन पुत्र बड़े धर्मात्मा हुए।

अब आप सावधान होकर रुद्र पत्नियों के नाम सुनिये। कला, कलावती, काष्ठा, कालिका, कलहप्रिया, कन्दली, भीषणा, रास्रा, प्रमोचा, भूषणा और शुकी। इन सबके बहुत-से पुत्र हुए, जो भगवान शिव के पार्षद हैं।

दक्षपुत्री सती ने यज्ञ में अपने स्वामी की निन्दा होने पर शरीर को त्याग दिया और पुनः हिमवान की पुत्री पार्वती के रूप में अवतीर्ण हो भगवान शंकर को ही पतिरूप में प्राप्त किया।

धर्मात्मन! अब कश्यप की पत्नियों के नाम सुनिये। देवमाता, अदिति, दैत्यमाता दिति, सर्पमाता कद्रू, पक्षियों की जननी विनता, 
गौओं और भैंसों की माता सुरभि, दानवजननी दनु तथा अन्य पत्नियाँ भी इसी तरह अन्यान्य संतानों की जननी हैं। 
मुने! इन्द्र आदि बारह आदित्य तथा उपेन्द्र (वामन) आदि देवता अदिति के पुत्र कहे गये हैं, जो महान बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं।

ब्रह्मन! इन्द्र का पुत्र जयन्त हुआ, जिसका जन्म शची के गर्भ से हुआ था। आदित्य (सूर्य) की पत्नी तथा विश्वकर्मा की पुत्री सर्वणा के गर्भ से शनैश्चर और यम नामक दो पुत्र तथा कालिन्दी नाम वाली एक कन्या हुई। 
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उपेन्द्र के वीर्य और पृथ्वी के गर्भ से मंगल नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

तदनन्तर भगवान उपेन्द्र अंश और धरणी के गर्भ से मंगल के जन्म का प्रसंग सुनाकर सौति बोले– मंगल की पत्नी मेधा हुई, जिसके पुत्र महान घंटेश्वर और विष्णु तुल्य तेजस्वी व्रणदाता हुए। दिति से महाबली हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक पुत्र तथा सिंहिका नाम वाली कन्या का जन्म हुआ।
सैंहिकेय (राहु) सिंहिका का ही पुत्र है। सिंहिका का दूसरा नाम निर्ऋति भी था। इसीलिये राहु को नैर्ऋत कहते हैं। हिरण्याक्ष को कोई संतान नहीं थी। वह युवावस्था में ही भगवान वाराह के हाथों मारा गया। हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद हुए, जो वैष्णवों में अग्रगण्य माने गये हैं। उनके पुत्र विरोचन हुए और विरोचन के पुत्र साक्षात राजा बलि। बलि का पुत्र बाणासुर हुआ, जो महान योगी, ज्ञानी तथा भगवान शंकर का सेवक था। यहाँ तक दिति का वंश बताया गया।

अब कद्रू के वंश का परिचय सुनिये। अनन्त, वासुकि, कालिय, धनंजय, कर्कोटक, तक्षक, पद्म, ऐरावत, महापद्म, शंकु, शंक, संवरण, धृतराष्ट्र, दुर्धर्ष, दुर्जय, दुर्मुख, बल, गोक्ष, गोकामुख तथा विरूप आदि को कद्रू ने जन्म दिया था।

शौनक जी! जितनी सर्प-जातियाँ हैं, उन सब में प्रधान ये ही हैं। लक्ष्मी के अंश से प्रकट हुई मनसादेवी कद्रू की कन्या हैं। ये तपस्विनी स्त्रियों में श्रेष्ठ, कल्याणस्वरूपा और महातेजस्विनी हैं। इन्हीं का दूसरा नाम जरत्कारु है। इन्हीं के पति मुनिवर जरत्कारु थे, जो नारायण की कला से प्रकट हुए थे। 

विष्णु तुल्य तेजस्वी आस्तीक इन्हीं मनसा देवी के पुत्र हैं। इन सबके नाम मात्र से मनुष्यों का नागों से भय दूर हो जाता है। यहाँ तक कद्रू के वंश का परिचय दिया गया। अब विनता के वंश का वर्णन सुनिये।

विनता के दो पुत्र हुए– अरुण और गरुड़। दोनों ही विष्णु-तुल्य पराक्रमी थे। उन्हीं दोनों से क्रमशः सारी पक्षी-जातियाँ प्रकट हुईं। गाय, बैल और भैंसे – ये सुरभि की श्रेष्ठ संतानें हैं।

समस्त सारमेय (कुत्ते) सरमा के वंशज हैं। दनु के वंश में दानव हुए तथा अन्य स्त्रियों के वंशज अन्यान्य जातियाँ। यहाँ तक कश्यप-वंश का वर्णन किया गया। 

अब चन्द्रमा का आख्यान सुनिये।
पहले चन्द्रमा की पत्नियों के नामों पर ध्यान दीजिये। फिर पुराणों में जो उनका अत्यन्त अपूर्व पुरातन चरित्र है, उसको श्रवण कीजिये। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पूजनीया साध्वी पुनर्वसु, पुष्या, आश्लेषा, मघा, पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, हस्ता, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूला, पूर्वाषाढा, उत्तरषाढा, श्रवणा, धनिष्ठा, शुभा शतभिषा, पूर्वभाद्रपदा, उत्तरभाद्रपदा तथा रेवती– ये सत्ताईस चन्द्रमा की पत्नियाँ हैं।
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इनमें रोहिणी के प्रति चन्द्रमा का विशेष आकर्षण होने के कारण चन्द्रमा ने अन्य सब पत्नियों की बड़ी अवहेलना की। तब उन सबने जाकर पिता दक्ष को अपना दुःख सुनाया। दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय-रोग से ग्रस्त होने का शाप दे दिया। चन्द्रमा ने दुःखी होकर भगवान शंकर की शरण ली और शंकर ने उन्हें आश्रय देकर अपने मस्तक में स्थान दिया।

तब से उनका ‘चन्द्रशेखर’ हो गया। 
देवताओं तथा अन्य लोगों में शिव से बढ़कर शरणागत पालक दूसरा कोई नहीं है।

अपने पति के रोग मुक्त और शिव के मस्तक में स्थित होने की बात सुनकर दक्ष कन्याएँ बारंबार रोने लगीं और तेजस्वी पुरुषों में श्रेष्ठ पिता दक्ष की शरण में आयीं। वहाँ जाकर अपने अंगों को बारंबार पीटती हुई वे उच्चस्वर से रोने लगीं तथा दीनानाथ ब्रह्मपुत्र दक्ष से दीनतापूर्वक कातर वाणी में बोलीं।

दक्ष कन्याओं ने कहा- पिताजी! हमें स्वामी का सौभाग्य प्राप्त हो, इसी उद्देश्य को लेकर हमने आपसे अपना दुःख निवेदन किया था। परंतु सौभाग्य तो दूर रहे, हमारे सद्गुणशाली स्वामी ही हमें छोड़कर चल दिये। तात! नेत्रों के रहते हुए भी हमें सारा जगत अन्धकारपूर्ण दिखायी देता है। आज यह बात समझ में आयी है कि स्त्रियों का नेत्र वास्तव में उनका पति ही है। पति ही स्त्रियों की गति है, पति ही प्राण तथा सम्पत्ति है। ****

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का हेतु तथा भवसागर का सेतु भी पति ही है। पति ही स्त्रियों का नारायण है, पति ही उनका व्रत और सनातन धर्म है। जो पति से विमुख हैं उन स्त्रियों का सारा कर्म व्यर्थ है।




तो चलिए इसे भगवान श्री कृष्ण  की स्तुति करके  ग्रन्थ लेखन प्रारम्भ करते हैं।
(श्रीपद्मपुराण उत्तरखण्ड श्रीमद्‌भागवतमाहात्म्य
भक्तिनारदसमागमो नामक प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥)
अनुवाद:-
हे सत् चित्त आनंद! हे संसार की उत्पत्ति के कारण! हे दैहिक, दैविक और भौतिक तीनो तापों का विनाश करने वाले महाप्रभु! हे श्रीकृष्ण! आपको हम कोटि कोटि नमन करते हैं।
स्वयं भगवान स्वराट् विष्णु ( श्रीकृष्ण)  जो गोलोक में अपने मूल कारण कृष्ण रूप में ही विराजमान हैं वही आभीर जाति में मानवरूप में सीधे अवतरित होकर इस पृथ्वी पर आते हैं; 

क्योंकि आभीर(गोप) जाति साक्षात् उनके रोम कूप ( शरीर) से उत्पन है जो गुण-धर्म में उन्हीं कृष्ण के समान होती है। 

इस बात की पुष्टि अनेक ग्रन्थ से होती है।प्रसिद्ध वैष्णव ग्रन्थ गर्ग-संहिता में उद्धृत " कुछ तथ्यो  को हम प्रस्तुत करते हैं।

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इस बात की पुष्टि अनेक ग्रन्थ से होती है।प्रसिद्ध वैष्णव ग्रन्थ गर्ग-संहिता में उद्धृत " कुछ तथ्यो  को हम प्रस्तुत करते हैं।

कृष्ण का गोप जाति में अवतरण और गोप जाति के विषय में राधा जी का अपना मन्तव्य प्रकट करना ही इसी तथ्य को सूचित करता है। कि गोपों से श्रेष्ठ इस सृष्टि मैं को ईव दूसरा नहीं है।

अनुवाद:- जब स्वयं कृष्ण राधा की एक सखी बनकर  स्वयं ही कृष्ण की राधा से निन्दा करते हैं तब राधा कहती हैं -

 "भूतल के अधिक-भार का -हरण करने वाले कृष्ण तथा सत्पुरुषों के कल्याण करने वाले कृष्ण  गोपों के घर में प्रकट हुए हैं। फिर तुम हे सखी ! उन आदिपुरुष श्रीकृष्ण की निन्दा कैसे करती हो ? तुम तो बड़ी ढीठ जान पड़ती हो। ये गोप सदा गौओं का पालन करते हैं, गोरज की गंगा में नहाते हैं, उसका स्पर्श करते हैं तथा गौओं का उत्तम नामों का जप करते हैं।                       इतना ही नहीं, उन्हें दिन-रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप-जाति से बढ़कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।२१-२२।

(सन्दर्भ:- गर्गसंहिता वृन्दावन खण्ड अध्याय १८)

गाय और गोप जिनके लीला- सहचर बनते हैं।
और इनकी आदिशक्ति- राधा ही "दुर्गा" गायत्री"और उर्वशी आदि के रूप में अँशत:  इन अहीरों के घर में जन्म लेने के लिए प्रेरित होती हैं। उन अहीरों को हेय कैसे कहा जा सकता है ?_ 

ऋग्वेद में विष्णु के लिए  'गोप', 'गोपति' और 'गोपा:' जैसे विशेषणों से सम्बोधित किया गया है।  वस्तुत: वैदिक ऋचाओं मे ं सन्दर्भित  विष्णु गोप रूप में जिस लोक में रहते वहाँ बहुत सी स्वर्ण मण्डित सीगों वाली गायें रहती हैं। 

जो पुराण वर्णित गोलोक का  ही रूपान्तरण अथवा संस्करण है। विष्णु के लिए गोप - विशेषण की परम्परा  "गोप-गोपी-परम्परा के ही प्राचीनतम लिखित प्रमाण कहे जा सकते हैं।

इन (उरूक्रम त्रिपाद-क्षेपी)लंबे डग धर के अपने तीन कदमों में ही तीन लोकों को नापने वाले। विष्णु के कारण रूप और इस ब्रह्माण्ड से परे  ऊपर गोलोक में विराजमान द्विभुजधारी शाश्वत किशोर कृष्ण ही हैं।

विष्णु के तृतीय पाद-क्षेप  परम पद में मधु के उत्स (स्रोत )और भूरिश्रृंगा-(स्वर्ण मण्डित सींगों वाली) जहाँ गउएँ  रहती हैं , वहाँ पड़ता है।

"कदाचित इन गउओं के पालक होने के नाते ही विष्णु को गोप कहा गया है।

ऋग्वेद में विष्णु के सन्दर्भ में ये तथ्य इस ऋचा में प्रतिबिम्बित है।

"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥ (ऋग्वेद १/२२/१८)

शब्दार्थ:-(अदाभ्यः) =सोमरस रखने के लिए गूलर की लकड़ी का बना हुआ पात्र को (धारयन्) धारण करता हुआ । (गोपाः) गोपालक रूप, (विष्णुः) संसार का अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) =तीन (पदानि) क़दमो से (विचक्रमे)= गमन करता है । और ये ही (धर्माणि)= धर्मों को धारण करता है ॥18॥

इन सभी तथ्यों की हम क्रमश: व्याख्या करेंगे।विष्णु को सम्पूर्ण संसार का रक्षक और अविनाशी ब्रह्मा को यज्ञकार्य हेतु तत्काल एक पत्नी की आवशयकता होती है। "होता"यज्ञ में आहुति देनेवाला तथा मंत्र पढ़कर यज्ञकुंड में हवन की सामग्री डालने वाले के रूप में उपस्थित माना जाता है । अत्रि इस "होता" की भूमिका में हैं। सभी सप्तर्षि इस यज्ञ में किसी न किसी भूमिका में हैं।

विशेष—यह चार प्रधान ऋत्विजों में है जो ऋग्वेद के मंत्र पढ़कर देवताओं का आह्वान करता है। 

ब्रह्मा की पत्नी सावित्री गृह कार्य में व्यस्त हैं अत: वे यज्ञ- स्थल में आने को तैयार नहीं हैं।अब मुहूर्त का समय निकला जा रहा है। तभी सप्तर्षियों के कहने पर ब्रह्मा अपने यज्ञ कार्य के लिए इन्द्र को एक पत्नी बनाने के लिए कन्या लाने को कहते हैं। तब आभीर कन्या गायत्री को इन्द्र ब्रह्मा के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।

विष्णु ही इस कन्या के दत्ता( कन्यादान करनेवाले पिता बनकर ) ब्रह्मा से इसका विवाह सम्पन्न कराते हैं।

"निष्कर्ष:- उपर्युक्त पद्मपुराण सृष्टि खण्ड अध्याय- (१६-१७) में वर्णित गायत्री की कथा से प्रमाणित होता है कि गायत्री के परिवारीजन गोप गोलोक से पृथ्वी पर गोपालन हेतु सतयुग में ही अवतरित हो गये थे।

 ये ब्रह्मा की सृष्टि से पृथक थे इसलिए यज्ञ में अपनी सम्पूर्ण सृष्टि के साथ इन्हें ब्रह्मा द्वारा आमन्त्रित नहीं किया गया। ब्रह्मा का यह यज्ञ एक हजार वर्ष तक चला था।

अत्रि जो सावित्री द्वारा शापित हो गये थे;  गायत्री और ब्रह्मा के विवाह में सहायक होने के कारण उन्हें फिर आभीर कन्या गायत्री द्वारी  ही शाप मुक्त कर वरदान से अनुग्रहीत किया गया।


इसलिए अत्रि ने गायत्री को माँ कहकर सम्बोधित किया तब अत्रि को अहीरों का पूर्वज कैसे कहा जा सकता है।?

 ये कालान्तर में अहीर जाति के पुरोहित बन कर  गोत्र प्रवर्तक  हो गये हों यह सम्भव है परन्तु अहीर जाति अत्रि से उत्पन्न हुई है यह कहना शास्त्रीय सिद्धान्त के विपरीत है । 



विदित हो कि वामन अवतार कृष्ण के अंशावतार विष्णु का ही अवतार है नकि स्वयं कृष्ण का अवतार -क्योंकि कृष्ण का साहचर्य सदैव गो और गोपों में ही रहता है।

"कृष्ण हाई वोल्टेज रूप हैं तो विराट और क्षुद्र विराट आदि रूप उनके ही कम वोल्टेज के रूप हैं।

विष्णु कृष्ण के ही एक प्रतिनिधि रूप हैं। परन्तु स्वयं कृष्ण नहीं क्योंकि कृष्ण समष्टि (समूह) हैं तो विष्णु व्यष्टि ( इकाई) अब इकाई में समूह को गुण धर्म तो विद्यमान होते हैं पर उसकी सम्पूर्ण सत्ता अथवा अस्तित्व नहीं।

विशेष:- पद्म पुराण सृष्टि खण्ड '  ऋग्वेद तथा श्रीमद्भगवद्गीता और स्कन्द आदि पुराणों में  गोपों को ही धर्म का आदि प्रसारक(propagater) माना गया है ।

ऋग्वेद 1.22.18) में  भगवान विष्णु गोप रूप में ही धर्म को धारण किये हुए हैं।

विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्”(ऋग्वेद 1.22.18) ऋग्वेद की यह ऋचा इस बात का उद्घोष कर रही है।

आभीर लोग प्राचीन काल से ही "व्रती और "सदाचार सम्पन्न होते थे। स्वयं भगवान् विष्णु ने सतयुग में भी अहीरों के समान किसी अन्य जाति को व्रती और सदाचारीयों में श्रेष्ठ न जानकर अहीरों को ही सदाचार सम्पन्न और धर्मवत्सल स्वीकार किया।

और इस कारण से भी स्वराट्- विष्णु(कृष्ण) ने अपना अवतरण भी इन्हीं अहीरों की जाति में लेना स्वीकार किया। और दूसरा कारण गोप स्वयं कृष्ण के सनातन अंशी हैं। जिनका पूर्व वराह कल्प में ही गोलोक में जन्म हुआ।

"व्यक्ति अपनी भक्ति और तप की शक्ति से गोलोक को प्राप्त कर गोप जाति में जन्म लेता है।

वैदिक ऋचाओं में विष्णु का गोप होना सर्वविदित ही है।

यह गोप रूप विष्णु के आदि कारण रूप कृष्ण का है और यह विष्णु कृष्ण के प्रतिनिध रूप में ही अपने गोप रूप में धर्म को धारण करने की घोषणा कर रहे हैं। धर्म सदाचरण और नैतिक मूल्यों का  पर्याय है। और इसी की स्थापना के लिए कृष्ण भूलोक पर पुन: पुन: आते है।

 "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! अभ्युत्थानम्-अधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजामि- अहम्।। 
श्रीमद्भगवद्गीता ( 4/7) 



हे अर्जुन ! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूप से प्रकट करता हूँ।

अत: गोप रूप में ही कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए समय समय पर अपने एक मानवीय रूप का आश्रय लेकर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं।

                    "इति समापनम्-


अनुवाद:-
उस समय नारद ने तो अपनी वीणा ग्रहण की जो छ: ग्रामों पर आधारित राग आदि के द्वारा चित्त को एकाग्र करने वाली थी  नरदेव ! स्वयं श्रीकृष्ण ने तो अपनी मुरली (वंशी) के घोष द्रारा हल्लीसक नृत्य का आयोजन किया।६८।
हरिवंशपुराण- विष्णुपर्व /अध्याय- 89/ श्लोक-68 
श्री कृष्ण और संकृष्ण( संकर्षण) दौंनो ही महापुरुष अपने युग के महान कृषि पद्धति के जन्मदाता थे । कृष्ण ने संगीत और कलाओं में महारत हासिल की और उसका यादव समाज में व्यापक प्रचार- प्रसार
अनुवाद:-
उस समय नारद ने तो अपनी वीणा ग्रहण की जो छ: ग्रामों पर आधारित राग आदि के द्वारा चित्त को एकाग्र करने वाली थी  नरदेव ! स्वयं श्रीकृष्ण ने तो अपनी मुरली (वंशी) के घोष द्रारा हल्लीसक नृत्य का आयोजन किया।६८।
हरिवंशपुराण- विष्णुपर्व /अध्याय- 89/ श्लोक-68 
श्री कृष्ण और संकृष्ण( संकर्षण) दौंनो ही महापुरुष अपने युग के महान कृषि पद्धति के जन्मदाता थे । कृष्ण ने संगीत और कलाओं में महारत हासिल की और उसका यादव समाज में व्यापक प्रचार- प्रसार किया उस समय संगीत में स्वरों के स्वरग्राम (सरगम) के सन्धान के लिए वंशी बाँस के वृक्ष से निर्माण कर कृष्ण ने बनायी कृष्ण ने संगीत को सृष्टि ती आदि विद्या और कला मानकर आभीर जाति के नाम पर राग आभीर भी दिया ।

वेदों में ऋग्वेद के प्राचीन होने पर भी संगीत के वेद साम वेद को अपनी विभूति माना  
"वेदानां सामवेदोस्मि देवानामस्मि वासव: । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।१०/२२। श्रीमद्भगवद्गीता-

मैं वेदोमें सामवेद हूँ ? देवों में वासव हूँ और  इन्द्रियों में संकल्पविकल्पात्मक मन हूँ। सब भूतों- प्राणियोंमें चेतना हूँ। कार्यकरणके समुदायरूप शरीरमें सदा प्रकाशित रहनेवाली जो चिन्तन वृत्ति है ? उसका नाम चेतना है।

वास्तव में रास का प्रारम्भिक रूप हल्लीषक नृत्य है। हललीषक - नृत्य का आधार हल और ईषा-(ईसा) की आकृति बनाकर किया जाने वाला नृत्य ही है। मनुष्य जीवन पर्यन्त जिन व्यवहारों का नित्य सम्पादन करता रहता है वह अपने उत्सवों में भी वही अभिनय समन्वित कर आनन्दित होता है। 
वस्तव में उत्सव जीवन की भागदौड़ में एक विश्राम स्थल( पड़ाव) हैं जहाँ जीवन की भाग दौड़ से थका हुआ व्यक्ति कुछ समय के लिए सब भूलकर विश्राम करता है।
कृष्ण का जन्म गोप - आभीर जाति में हुआ जो सनातन काल से गोपालक रही है। गो चारण काल में इन गोपों की आवश्यकता ने पशुओं के चारे घास आदि के  के लिए और स्वयं अपने भोजन के लिए भी कृषि विधि के जन्म दिया । ग्राम शब्द का मूल अर्थ - ग्रास या घास युक्त भूमि से है। जहाँ पशुपालक- अपना पाव डालते थे  धीरे धीरे उनके ये पड़ाव स्थाई होने लगे और ग्रामसभ्यता कै जन्म हुआ। जबकि नगर सभ्यता व्यापारिक अथवा वाणिज्यिक केन्द्र थे जिन्हे आज हम बाजारवाद कह सकते हैं। जहाँ वणिकों की बस्तियाँ होती थीं।

ग्रामीण जीवन या पालन करने वाली  गोपों की गोप ललनाऐं विशेष उत्सवों पर हल्लीसक नृत्य का आयोजन पुरुषों के सहयोग से करती थीं। और अनेक रागों पर गीत गाती थीं। अहीरों ने संगीत को अनेक लौकिक अवदान दिये ।
हल्लीसक- शब्द पुराणों विशेषत: हरिवंश पुराण विष्णु पर्व अध्याय( 89 )में  वर्णित है।

हल -विलेखे भ्वादिगणीय परस्मैपदीय सकर्म सेट् धातु से  हलति अहालीत् आदि क्रिया रूप बनते हैं। हलः हालः-  हल्यते कृष्यतेऽनेन  इति हल्+ घञर्थे करणे (क) । लाङ्गल ( हल) अमरः कोश। कृषि शब्दे २१९८ पृ० दृश्यम् ।
हल वह यन्त्र जिससे कृषि कार्य किया जाए-

और ईषा -हलयुगयोर्मध्यमकाष्ठे (लाङ्गलदण्डे)वा हल के मध्य में लकड़ी का दण्ड - हल और ईषा इन दोनों शब्दों से तद्धित शब्द बनता है। हल्लीषा- हल्लीषक ।

हल्लीषा- एक नृत्य जो हल और उसके ईषा ( दण्ड) के समानांतर दृश्य में आकृति बनाकर किया मण्डलाकार विधि से किया जाता था।

वैसे कृष्ण और संकर्षण शब्द कृषकों के विशेषण हैं। गोपों में जन्म लेने वाले ये दौंनों महानायक कृषि पद्धति के जनक भी थे कृषि करने के लिए हल तथा उस धान्य को पीट कर अन्न पृथक करने के लिए मूसल- का आविष्कार भी कृष्ण के बड़े भाई संकर्षण के द्वारा ही किया गया था। 
इनकी लोक संस्कृति में भी यही आविष्कार प्रदर्शित थे उनका सांस्कृतिक नृत्य हल्लीषम्- हल और ईषा की आकृति बनाकर किया जाने वाला नृत्य ही था ।

जिसे पुराणकारों ने श्रृँगार रस में डुबोकर रास के नाम से काव्यात्मक रूप में वर्णन किया है। संकर्षण कि हलधर विशेषण भी उनके कृषक होने का प्रमाण है।
हलधर= हलं धरति आयुधत्वं कृषिसाधनत्व वा धृ +अच् ।  बलराम  कृषक उदाहरण “उन्मूलिता हलधरेण पदावधतैः” उद्भटः ।

इन गोपों कि हल्लीषम् नृत्य (हल्लीश, हल्लीष)= 
नाट्यशास्त्र में वर्णित अठारह उपरूपकों में से एक के रूप में मान्य है।
 विशेष—इसमें एक ही अंक होता है और नृत्य की प्रधानता रहती है। 
इसमें एक पुरुष पात्र और सात, आठ या दस स्त्रियाँ पात्री होती हैं  जिसे मंडल बाँधकर  जिसमें एक पुरुष के आदेश पर कई स्त्रियाँ नाचती हैं।

 साहित्यदर्पण(। ६ । ५५५ । )  में इसका लक्षण 
“हल्लीष एव एकाङ्कः सप्ताष्टौ दश वा स्त्रियः। वागुदात्तैकपुरुषः कैशिकीवृत्तसङ्कुलः। मुखान्तिमौ तथा सन्धी बहुताललयस्थितिः॥


विशेष—पौराणिक परम्परा  इस क्रीड़ा का आरंभ कृष्ण द्वारा  कभी मार्गशीर्ष की पूर्णिमा  को तो कभी  कार्तिकी पूर्णिमा को आधी रात के समय को मानती है।

तब से गोप लोग यह क्रीड़ा करने लगे थे। पीछे से इस क्रीड़ा के साथ कई प्रकार के पूजन आदि मिल गए और यह मोक्षप्रद मानी जाने लगी।
इस अर्थ में यह शब्द प्रायः स्त्रीलिंग बोला जाता है। जैसे  हल्लीषा-

इसमें लास्य नृत्य ( स्त्री नृत्य) की प्रधानता ही होती है इसी लिए इसे रास्य( लास्य) भी कहा जने  लगा।

भारतीय संस्कृति में प्रेम की उदात्त अभिव्यक्ति होती थी। कृष्ण की रासलीला इसका प्रतीक है।
भक्तिकाव्य में रासलीला शब्द का खूब प्रयोग हुआ है। दरअसल रास एक कलाविधा है।
प्रेम और आनंद की उत्कट अभिव्यक्ति के लिए कृष्ण की उदात्त प्रेमलीलाओं का भावाभिनय ही रासलीला कहलाता है।

मूलतः यह एक नृत्य है जिसमें कृष्ण को केंद्र में रख गोपियां उनकी परिधि में मुरली की धुन पर थिरकती अथवा हल और ईषा की आकृति मैं वृत्ताकार नर्तन करती हैं। 

अष्टछाप के भक्तकवियों नें प्रेमाभिव्यक्ति करने वाले अनेक रासगीतों की रचना की है।
रास में आध्यात्मिकता भी है जिसमें गोपियों का कृष्ण के प्रति अनुराग व्यक्त होता है।
वे वृत्ताकार मंडल में प्रेमाभिव्यक्ति करती हैं।
जिसे भविष्य पुराण  कारो ने हल्लीषम् अवश्य कहा-

रासक्रीड़ायाञ्च तल्लक्षणं यथा “पृथुं सुवृत्तं मसृणं वितस्तिमात्रोन्नतं कौ विनिखन्य शङ्कुकम् ।
आक्रम्य पद्भ्यामितरेतरन्तु हस्तैर्भ्रमोऽयं खलु रासगोष्ठी” हरिवंश पुराण टीका नीलकण्ठः शास्त्री।

संस्कृत में हल्लीषम् शब्द अर्थ का विश्लेषण-

एक विद्वान डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल मत है 

कि हल्लीसं शब्द ़यूनानी इलिशियन- नृत्यों ( इलीशियन मिस्ट्री डांस) से विकसित है। इसका विकास ईस्वी सन्  के आसपास माना जाता है।

सन्दर्भ- हर्षचरित एक सांस्कृतिक अध्ययन-पृष्ठ संख्या 33-

वास्तव में हल्लीषम् और इलिशियन दौंनो शब्द पृथक पृथक है।

विशेषण को तौर पर  एलिसियन शब्द एक आनंदमय स्थिति का वर्णन करता है, जैसा कि अधिकांश लोग हवाई छुट्टियों पर आनंद लेने की उम्मीद करते हैं।

एलीसियन शब्द एलीसियन फील्ड्स नामक रमणीय यूनानी पौराणिक स्थान से आया है।

 हालाँकि अब इस शब्द को अक्सर स्वर्ग के साथ समझा जाता है, ग्रीक एलीसियन फील्ड्स वासतव में  मृत्यु के बाद के जीवन में जाने के लिए एक स्वर्गीय विश्राम स्थल था।

 संभवतः इस अवधारणा की कल्पना मूल रूप से युद्ध के दौरान सैनिकों में वीरता को प्रोत्साहित करने के लिए की गई थी। 

आजकल, लोग किसी भी स्वर्गीय दृश्य का वर्णन करने के लिए एलिसियन का उपयोग करते हैं -

एलीसियम -
1590 के दशक, लैटिन एलीसियम से, ग्रीक एलीसियन (पेडियन) से "एलिसियन क्षेत्र", मृत्यु के बाद धन्य लोगों का निवास, जहां नायक और गुणी निवास करते हैं, जो अज्ञात मूल का है, शायद प्री-ग्रीक (एक गैर-आईई सब्सट्रेट भूमध्यसागरीय भाषा) से ). इसका उपयोग पूर्ण प्रसन्नता की स्थिति के लाक्षणिक रूप में भी किया जाता है।
दूसरा लैटिन शब्द इल्युशन भी है 

पुरानी फ्रांसीसी भाष से , लैटिन (illuso) से और (illūdere) से  क्रियाओं विकसित शब्द -
, में (in- में " ) + lūdere -"खेलने के लिए क्रीड़ा करना खेलना ") आदि रूपों से सम्बन्धित है।
यह क्रिया, लैटिन के साथ (ludus)"एक खेल, खेलो, ये सम्बन्धित है।" 
PIE आद्य भारोपीय  रूट -*leid-या*loid- से सम्बंधित है जिसका अर्थ"खेलना,"
 मृगतृष्णा

लैटिन( illusio) से ही  फ्रांसीसी में विकसित (illusion) भ्रम का वाचक है। इस इल्युशन शब्द के मोह माया  जादू आदि अन्य अर्थ भी प्रचलित हैं।
देखा जाय तो संस्कृत में भी 
१-लड्=

विलास करना /क्रीडा करना

२-लड= उपसेवायाम्
३-लड= विकाशे आदि अर्थों की वाचक धातु धातुपाठ में लिखित है।
लल= ईप्सायाम् - लालयते कुं लालयते-कुलालः भ्वादौ लड- विलासे (1250) लडति 155।

जिसे लाड- लाडो, ललन, लीला ,जैसे शब्द विकसित हुए है।

लास्य रूप में प्रचलित रास का मूल रूप है।
इसका विकास संस्कृत धातु -लस=

श्लेषण,क्रीडनयोः
(लसतीत्यादि विलासी) "वौ कषलस''इति तच्छीलादौ घिनुण् न लसः, (अलसः, आलस्यम्)

लस=
शिल्पयोगे च।
अत्र स्वामी शिल्पोपयोगइति पठित्त्वा केचिन्मूर्धन्यान्तं पठन्तीत्याह ( लासयति ) श्लेषणक्रीडनयोर्लसतीति शपि 193
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मध्यकाल में इसमें जो आध्यात्मिकता थी वह धीरे धीरे गायब होती गई और विशुद्ध मनोरंजन शैलियों वाली गिरावट इस भक्ति और अध्यात्म को अभिव्यक्त करनेवाली विशिष्ट विधा में भी समा गई। वैसे आज भी बृज की रास मण्डलियां प्रसिद्ध हैं।
कथक से भी रास को जोड़ा जाता है किन्तु कथक की पहचान जहां एकल प्रस्तुति में मुखर होती है वहीं रास सामूहिक प्रस्तुति है। 

अलबत्ता रास शैली का प्रयोग कथक और मणिपुरी जैसी शास्त्रीय नृत्यशैलियों में हुआ है। इसके अलावा गुजरात का जग प्रसिद्ध डांडिया नृत्य रास के नाम से ही जाना जाता है। रास का मुहावरेदार प्रयोग भी बोलचाल की भाषा में खूब होता है। रास रचाना यानी स्त्री-पुरुष में आपसी मेल-जोल बढ़ना। रास-रंग यानी ऐश्वर्य और आमोद-प्रमोद में लीन रहना।

रास शब्द रास् धातु से आ रहा है जिसमें किलकना, किलोल, शोरगुल का भाव है।

इससे बना है रासः जिसमें होहल्ला, किलोल सहित एक ऐसे मण्डलाकार नृत्य का भाव है जिसे कृष्ण और गोपियां करते थे। 

इससे ही बना है रासकम् शब्द जिसका अर्थ नृत्यनाटिका है। कुछ कोशों में इसका अर्थ हास्यनाटक भी कहा गया है। 
दरअसल रासलीला जब कला विधा में विकसित हो गई तो वह सिर्फ नृत्य न रहकर नृत्यनाटिका के रूप में सामने आई।
 नाटक के तत्वों में हास्य भी प्रमुख है। 

रासलीला में हंसोड़पात्र भी आते हैं जो प्रायः रासधारी गोप होते हैं। इसलिए रासकम् को सिर्फ हास्यनाटक कहना उचित नहीं है। मूलतः रास् से बने रासकम् का ही रूप मध्यकालीन साहित्य की एक विधा रासक के रूप में सामने आया। 

रासक को एकतरह से जीवन चरित कहना उचित होगा जैसे पृथ्वीराज रासो या बीसलदेवरासो आदि जो वीरगाथा साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ हैं।

विद्वानों का मानना है कि रास शब्द का रिश्ता संस्कृत के लास्य से भी है जिसमें भी नृत्याभिनय और क्रीड़ा का भाव है। र औ ल एक ही वर्णक्रम में आते हैं।  लास्य का ही प्राकृत रूप रास्स होता है। 
 
कतिपय विद्वानों का मानना है कि श्रीकृष्ण के समय रास शब्द प्रचलित नहीं था। वे नृत्य की परिपाटी और श्रीकृष्ण के कलाप्रेम को खारिज नहीं करते हैं। कृष्णचरित से कलाओं को अलग किया ही नहीं जा सकता। मुरलीमनोहर और गोप-गोपियों के मेल ने भारतीय संस्कृति को विविध कलाएं दी हैं। गुप्तकालीन रचना रास पंचाध्यायी से मण्डलाकार नृत्य के लिए रास शब्द का प्रचलन बढ़ा है। निश्चित ही रास ब्रज क्षेत्र का पारम्परिक लोकनृत्य रहा है। कृष्ण चरित से इस शब्द के जुड़ा होने के पीछे की भ्रम की गुंजाइश नहीं है। 
पण्डा शब्द का संदर्भ पोथी-जन्त्री तक ही सीमित है। इस वर्ग का नृत्य या कलाकर्म में कोई दखल नहीं था इसलिए रास शब्द से इन्हें जोड़ना भी ठीक नहीं। 

संलापकं श्रीगदितं शिल्पकं च विलासिका ।
दुर्मल्लिका प्रकरणी हल्लीशो भाणिकेति च ।। सूत्र ६.५ ।। साहित्य दर्पण-

हल्लीशक महाभारत में वर्णित एक नृत्यशैली है। इसका एकमात्र विस्तृत वर्णन महाभारत के खिल्ल भाग हरिवंश (विष्णु पर्व, अध्याय 20) में मिलता है। 
विद्वानों ने इसे रास का पूर्वज माना है साथ ही रासक्रीड़ा का पर्याय भी। आचार्य नीलकंठ ने टीका करते हुए लिखा है - 'हस्लीश क्रेडर्न एकस्य पुंसो बहुभि: स्त्रीभि: क्रीडन सैव रासकीड़'। (हरि. 2.20.36) 'हल्लीशक' का शाब्दिक अर्थ है - 'हल का ईषा- हत्था'।

यह नृत्य स्त्रियों का है जिसमें एक ही पुरुष श्रीकृष्ण होता है। यह दो दो गोपिकाओं द्वारा मंडलाकार बना तथा श्रीकृष्ण को मध्य में रख संपादित किया जाता है। हरिवंश के अनुसार श्रीकृष्ण वंशी, अर्जुन मृदंग, तथा अन्य अप्सराएँ अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र बजाते हैं।

इसमें अभिनय के लिए रंभा, हेमा, मिश्रकेशी, तिलोत्तमा, मेनका, आदि अप्सराएँ प्रस्तुत होती हैं। सामूहिक नृत्य, सहगान आदि से मंडित यह कोमल नृत्य श्रीकृष्णलीलाओं के गान से पूर्णता पाता है। इसका वर्णन अन्य किसी पुराण में नहीं आता। 
भासकृत बालचरित्‌ में हल्लीशक का उल्लेख है। अन्यत्र संकेत नहीं मिलता।

शूरसेन या मथुरा मंडल जिसमें श्रीकृष्ण के लीला स्थल विशेष रुप से सम्मिलित है, भक्तिकाल में ब्रज प्रदेश के रुप में प्रसिद्ध हुआ। पुराणकाल में यह क्षेत्र मथुरा मंडल तथा विभिन्न ग्रंथों में शूरसेन जनपद के रुप में विख्यात रहा था। वर्तमान ब्रज क्षेत्र पर यदि ऐतिहासिक संदर्भ में विचार किया जाए तो यह क्षेत्र भी कभी एक सुरम्य वन प्रदेश था, जहाँ प्रमुख रुप से आभीर निवास करते थे। मथुरा राज्य के आदि संस्थापक मधु ने हरिवंश पुराण में स्वयं कहा है कि मेरे राज्य में चारों ओर आभीरों की बस्ती है।

इतिहास से यह स्पष्ट हो जाता है कि आभीर जाति देव संस्कृति के अनुयायियों से इतर थी और उनकी संस्कृति बहुत समृद्ध थी तथा देव संस्कृति  से उसमें काफी असमानता थी। आभीरों में स्त्री-स्वातंत्र्य देवसंसकृति   की अपेक्षा अधिक था, वे नृत्य-गान में परम प्रवीण और केशो की दो वेणी धारण करने वाली थीं। 'हल्लीश' या 'हल्लीसक नृत्य' इन आभीरों की सामाजिक नृत्य था, जिसमें आभीर नारियाँ अपनी रुचि के किसी भी गोप पुरुष के साथ समूह बनाकर मंडलाकार नाचती थीं। हरिवंश पुराण के हल्लीसक-क्रीड़न अध्याय में उल्लेख है- कृष्ण की इंद्र पर विजय के उपरांत आभीर रमणियों ने उनके साथ नृत्य करने का प्रस्ताव किया। भाई या पति व अन्य आभीरों के रोकने पर भी वे नहीं रुकीं और कृष्ण को खोजने लगीं-

"ता वार्यमाणा: पतिमि भ्रातृभिर्मातृमिस्तथा।
कृष्ण गोपांगना रात्रो मृगयन्ते रातेप्रिया:।।
- हरिवंश, हल्लीसक-क्रीड़न अध्याय, श्लोक २४

आभीर समाज में प्रचलित यह हल्लीसक मंडलाकार नृत्य था, जिसमें एक नायक के साथ अनेक नायिकाएँ नृत्य करती थीं। नृत्य में श्रृंगार-भावना का प्राधान्य था। नृत्य का स्वरुप स्पष्ट करते हुए नाट्यशास्र का टीका में अभिनव गुप्त ने कहा है-

"मण्डले च यत स्रीणां, नृत्यं हल्लीसकंतु तत्।
नेता तत्र भवदेको, गोपस्रीणां यथा हरि:।।

इसी नृत्य को श्री कृष्ण ने अपनी कला से सजाया तब वह रास के नाम से सर्वत्र प्रसिद्ध हुआ। इस नृत्य को सुकरता व नागरता प्रदान करने के कारण ही आज तक श्रीकृष्ण 'नटनागर' की उपाधि से विभूषित किए जाते हैं।

द्वारका के राज दरबार में प्रतिष्ठित हो जाने के उपरान्त द्वारका आकर उषा ने इस नृत्य में मधुर भाव-भंगिमाओं को विशेष रुप से जोड़ा व इसे स्री-समाज को सिखाया और देश देशांतरों में इसे लोकप्रिय बनाया। सारंगदेव ने अपने 'संगीत-रत्नाकर' में इस तथ्य की पुष्टि की है। वह लिखते है-

"पार्वतीत्वनु शास्रिस्म, लास्यं वाणात्मामुवाम्।
तथा द्वारावती गोप्यस्तामि सोराष्योषित:।।७।।
तामिस्तु शिक्षितानार्यो नाना जनपदास्पदा:।
एवं परम्यराप्राहामेतलोके प्रतिष्ठितम्।।८।।

इस प्रकार रास की परम्परा ब्रज में जन्मी तथा द्वारका से यह पूरे देश में फैली। जैन धर्म में रास की विशेष रुप से प्रचार हुआ और उसे मन्दिरों में भी किया जाने लगा, क्योंकि जैनियों के २३वे तीर्थकर भगवान नेमिनाथ भी द्वारका के ही आभीर यदुवंशी थे। उन्हें प्रसन्न करने का रास किया जा सकता है

आभीर समाज में प्रचलित यह हल्लीसक मंडलाकार नृत्य था, जिसमें एक नायक के साथ अनेक नायिकाएँ नृत्य करती थीं। नृत्य में श्रृंगार-भावना का प्राधान्य था परन्तु कामुकता नही थी । 

ब्रज का रास भारत के प्राचीनतम नृत्यों में अग्रगण्य है। अत: भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्र में रास को रासक नाम से उप-रुपकों में रखकर इसके तीन रुपों का उल्लेख किया है-

१- मंडल रासक, २-ताल रासक,३- दंडक रासक या लकुट रासक। 

देश में आज जितने भी नृत्य रुप विद्यमान हैं, उन परत्र रास का प्रभाव किसी-न-किसी रुप में पड़ा है।

 गुजरात का 'गरबा', राजस्थान का 'डांडिया' आदि नृत्य, मणिपुर का रास-नृत्य तथा संत ज्ञानदेव के द्वारा स्थापित 'अंकिया नाट' तो पूरी तरह रास से ही प्रभावित नृत्य व नाट्य रुप है।


यह हल्लीसक एक प्रकार का वादन – गान के साथ लोकनृत्य था । यही रास का प्रारम्भिक रूप था । छालिक्य एक समूह गीत था , जिसके अन्तर्गत विभिन्न वाद्यों का वादन एवं नृत्य होता था । विष्णु पर्व के अनुसार इसको विभिन्न ग्रामरागों के अन्तर्गत विविध स्थान तथा मूर्च्छनाओं के साथ गाया जाता था ।
 यह गान शैली अत्यन्त कठिन थी ।

"आधुनिक विद्वानों का मत हैं, 'रास' शब्द कृष्ण-काल में प्रचलित नहीं था ; उसका प्रचलन बहुत बाद में हुआ। 'रास' शब्द के सर्वाधिक प्रचार का श्रेय श्रीमद्भागवत की 'रास-पंचाध्यायी' को है, जिसकी रचना गुप्त काल से पहिले की नहीं मानी जाती है। 

कुछ विद्वान 'रास' का पूर्व रूप 'हल्लीसक' मानते है। 'रास' और 'हल्लीसक' पृथक्-पृथक् परंपराएँ थी। जो बाद में एक-दूसरे से संबंद्ध हो गई थीं। 

इस प्रकार श्रीकृष्ण के नृत्य-नाट्य का आरंभिक नाम 'हल्लीसक'  था। उसके लिए सदा से 'रास' शब्द ही लोक में प्रचलित नहीं रहा है। ऐसा ज्ञात होता है 'रास' की पहिले मौखिक परंपरा थी, जो प्रचुर काल तक विद्यमान रही थी। उसी मौखिक और लोक प्रचलित शब्द को 'भागवत' कार ने साहित्य में अमर-कर दिया था।


      •अध्याय- द्वितीय★

कृष्णोत्तर काल से मौर्य-पूर्व काल तक की स्थिति।

श्रीकृष्ण द्वारा प्रचलित तथाकथित 'रास' आरंभ में ब्रज का एक लोक-नृत्य अथवा लोक नृत्य-नाट्य था, जो पुरातन ब्रजवासियों के मनोविनोद का साधन था। जब कृष्णोपासना का प्रचार हुआ, तब 'रास' को भी धार्मिक महत्व प्राप्त हो गया था।

 उस समय लोक के साथ धर्म के क्षेत्र में भी रास का प्रवेश हो गया था। कृष्णोपासक भागवत एवं पौराणिक हिंदू धर्मो ने 'रास' की धार्मिक महत्व को स्वीकार किया था, और श्रीमद्भागवत ने उसके गौरव को बढ़ाया था।


प्राचीन ब्रज में बुद्ध एवं महावीर द्वारा प्रवर्तित बौद्ध तथा जैन धर्मो का प्रचार हुआ, तब भागवत एवं पौराणिक हिंदू धर्मों का प्रभाव कुछ कम हो गया था। 

फलत: कृष्णोपासना तथा 'रास' के धार्मिक महत्व में भी कमी आ गई थी। उसका एक बड़ा कारण यह था कि बौद्ध और जैन धर्म वैराग्य एंव निवृत्ति प्रधान थे; जिनकी धार्मिक मान्यता में कृष्णोपासना एवं 'रास' के लिए कोई समुचित स्थान नहीं था। 

बौद्ध-जैन धर्मों को कुछ समय पश्चात ही अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना पड़ा था। तब उनके द्वारा नृत्य-नाट्य के धार्मिक स्वरूप को प्रश्रय प्रदान किया गया। उस परिवर्तन का प्रभाव प्राचीन ब्रज में दिखलाई देने लगा था। फलत: पौराणिक हिंदू धर्मों के मंदिर-देवालयों की भाँति बौद्ध-जैन धर्मो के उपासनालयों एवं पूजा-गृहों में भी नृत्य-नाट्य को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया। इसका प्रमाण तत्कालीन साहित्यिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थापत्य की कलाकृतियों में मिलता है। जहाँ तक 'रास' का संबंध हैं, उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है। कुछ कलाकृतियों में उसके रूप का आभास होता है।

नृत्य अहीरों में पहले से  रहा है। उर्वशी का नाम एक खूबसूरत नर्तकी के रूप में लिया जाता था और उस युग में नर्तकियों को अप्सरा कहा जाता था। । पुरुरवा और उर्वशी नाम इतिहास में शामिल करते समय इन दोनों के माता पिताओं का नाम अहीर जाति से सम्बन्धित है।,
तथा उर्वशी भगवान  कृष्ण की विभूति हैं।  पुरुरवा गोप और उर्वशी अहीर का नाम इतिहास में जुड़ा तो बहुत बड़ी महाक्रान्ति होगी।

जितने अपने को चन्द्र वंशी ,सोमवंशी यदुवंशी कुरुवंशी राजपूत क्षत्रिय कहते हैं। वह सब अहीरों से सम्बन्धित शाखाएं हैं। 

यादवों का प्राचीन काल से ही गायन वादन और नृत्य अर्थात संगीत विधा पर पूर्ण स्वामित्व रहा है।
"हल्लिशम नृत्य और आभीर राग अहीरों की मौलिक संगीत सर्जना का प्रमाण है।

भगवान कृष्ण का  जन्म व बाल्यकाल आभीर जाति में हुआ था। आभीरों की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति थी, जिसमें पूर्ण नारी- स्वातंत्रय तो था ही, साथ ही वे राग- रंग के भी बड़े प्रेमी थे। उनका लोकनृत्य हल्लीश या हल्लीसक सर्वविख्यात रहा है, जिसका वर्णन अनेक लक्षण ग्रंथों में भी मिल जाता है --

"मण्डलेन तु यत्स्त्रीणां नृत्यं हल्लीसकं तु तत् । तत्र नेता भवेदेको गोपस्त्रीणां हरिर्यथा ।। २.१५६।

सरस्वतीकण्ठाभरणम्  /परिच्छेदः (२)
सरस्वतीकण्ठाभरणम्
परिच्छेदः २
भोजराजः

यदाङ्गिकैकनिर्वर्त्यमुज्झितं वाचिकादिभिः ।
नर्तकैरभिधीयेत प्रेक्षणाक्ष्वेडिकादि तत्।२.१४२।

तल्लास्यं ताण्डवं चैव छलिकं संपया सह ।
हल्लीसकं च रासं च षट्‌प्रकारं प्रचक्षते ।२.१४३।
____________________
मण्डलेन तु यत्स्त्रीणां नृत्यं हल्लीसकं तु तत् ।
तत्र नेता भवेदेको गोपस्त्रीणां हरिर्यथा ।। २.१५६ ।। (२.१४४)
अर्थ-
मण्डल ( घेरा) में जो गोपस्त्रीयों का नृत्य होता है वह हल्लीसक  कहलाता है ।
उसमें एक गोप सभी गोप- स्त्रीयों का नेतृत्व करने वाला होता है जैसे भगवान कृष्ण होते हैं ।

"अङ्गवाक्सत्वजाहार्यः सामान्यश्चित्र इत्यमी ।
षट् चित्राभिनयास्तद्वदभिनेयं वचो विदुः ।। २.१५७ ।। (२.१४५)

चतस्त्रो विंशतिश्चैताः शब्दालङ्कारजातयः ।
शब्दसन्दर्भमात्रेण हृदयं हर्तुमीशते ।। २.१५८ ।। (२.१४६)
____________________

इति श्रीराजाधिराज भोजदेवेन विरचिते सरस्वतीकण्ठाभरण नाम्नि अलङ्कारशास्त्रेऽलङ्कारनिरूपणं नाम द्वितीयः परिच्छेदः ।

नाट्यशास्त्र में भी वर्णित अठारह उपरूपकों में से एक के सन्दर्भ में हल्लीसक नृत्य या विवेचन है ।
विशेष—इसमें एक ही अंक होता है और नृत्य की प्रधानता रहती है। 
इसमें एक पुरुष पात्र और सात, आठ या दस स्त्रियाँ पात्री होती हैं। 
यह गोप संस्कृति का प्राचीन नृत्य है जो उत्सव विशेष पर किया जाता था।

मंडल बाँधकर होनेवाला एक प्रकार का नाच जिसमें एक पुरुष के आदेश पर कई स्त्रियाँ नाचती हैं।
इसी को नीमान्तरण से लास्य: तो कहीं रास्य या रास भी कहा जाने लगा।

यह हल्लीसक नृत्य एक मंडलाकार नृत्य था, जिसमें नायिका अनेक किंतु नायक एक ही होता था। इस नृत्य के लिए आभीर स्त्रियाँ उस पराक्रमी पुरुष को अपने साथ नृत्य के लिए आमंत्रित करती थीं, तो अतुलित पराक्रम प्रदर्शित करता था।
 हरिवंश पुराण के अनुसार आभीर नारियों ने श्री कृष्ण को इस नृत्य के लिए उस समय आमंत्रित किया था, जब इंद्र- विजय के उपरांत वह महापराक्रमी वीर पुरुष के रुप में प्रतिष्ठित हुए थे।
इन्द्र- विजय के उपरान्त आभीर नारियों के साथ श्री कृष्ण के इस नृत्य का विस्तृत वर्णन हरिवंश पुराण के हल्लीसक क्रीड़न अध्याय में हुआ है। 
इसी हल्लीसक नृत्य को श्रीकृष्ण ने अपनी कलात्मकता से संवार कर जो रुप दिया, वही बाद में रास के नाम से विकसित होकर "रसो वै सःरास' के रुप में प्रतिष्ठित हुआ।

भगवान कृष्ण के द्वारकाधीश चले जाने पर यह नृत्य कृष्णकाल में द्वारका के यदुवंशियों 
का राष्ट्रीय नृत्य बन गया था। इस नृत्योत्सव का विस्तृत वर्णन हरिवंश पुराण के "छालिक्य संगीत' अध्याय में उपलब्ध है। शारदातनय का कथन है कि द्वारका में रास के विकास में श्री कृष्ण की पौत्रवधू अनिरुद्ध- पत्नी उषा का बड़ा योगदान था, जो स्वयं नृत्य में पारंगत थी। यह पार्वतीजी की शिष्या थी, जिसने उनसे लास्य- नृत्य की शिक्षा ग्रहण की थी। 
उसने द्वारका के नारी- समाज को विशेष रुप से रास- नृत्य मं प्रशिक्षित किया था। 

द्वारका पहुँचने पर यह रास- नृत्य नाटिकाओं का रुप ले चुका था। जिसमें श्री कृष्ण व बलराम की जीवन की प्रमुख घटनाओं का प्रदर्शन होता था।

भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्र में लोकधर्मी उपरुपकों के अंतर्गत रास के "रासक' और "नाट्य रासक' दो रुपों का उल्लेख किया है। इससे प्रतीत होता है कि उस काल में रास के दो रुप अलग- अलग विकसित हो गए थे। "नाट्य रासक' जहाँ नाट्योन्मुख नृत्य- संगीत का प्रतिनिधि था, वहाँ इसका शुद्ध नृत्य रुप "रासक' था। "रासक' के भरतमुनि ने भेद किए हैं --

१. मण्डल रासक 
२. लकुट रासक तथा 
३. ताल रासक। 

मण्डलाकार नृत्य मंडल रासक, हाथों से दंडा बजाकर नृत्य करना लकुट रासक या दंड रासक और हाथों से ताल देकर समूह में नृत्य करना संभवतः ताल रासक था। यह रासक परंपरा बाद में विभिन्न रुपों में विभिन्न धर्मों और संप्रदायों में विकसित हुई ( जिसका परिचय यहाँ देना संभव नहीं है ) बाद में जैन धर्म में ही रासक परम्परा बाद बहुत लोकप्रिय हुई, क्योंकि श्रीकृष्ण के चचेरे भाई श्री नेमिनाथजी को जैन धर्म ने अपना २३ वाँ तीर्थंकर स्वीकार कर लिया था। जिन्हें प्रसन्न करने के लिए जैन मंदिरों में भी रास उपासना का अंग बन गया। 

कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्णकाल से प्रारम्भ होकर रास की प्राचीन परम्परा विभिन्न उतार- चढ़ावों के मध्य १५ वीं शताब्दी के अन्त तक या १६ वीं शताब्दी के प्रारंभ तक आभीर जाति में रही , जबकि वर्तमान रास का पुनर्गठन हुआ, निरन्तर किसी न किसी रुप में विद्यमान रही और उसी के वर्तमान रास- मञ्च उद्भूत हुआ। 
इस प्रकार रास भारत का वह मंच है जो कृष्णकाल से आज तक निरंतर जीवित- जाग्रत रहा है।

भारत में दूसरा कोई ऐसा मंच नहीं जो इतना दीर्घजीवी हुआ हो। इसी के रास की लोकप्रियता और महत्ता स्पष्ट है।

अहीर भैरव एक लोकप्रिय राग है जिसमें कोमल ऋषभ और कोमल निषाद के स्वरों का संयोजन होता है। 
_______________________________
बलरामश्रीकृष्णादीनां यादवानां जलक्रीडा एवं गानादिकानां वर्णनम्-
एकोननवतितमोऽध्यायः

               "वैशम्पायन उवाच
रेमे बलश्चन्दनपङ्कदिग्धः कादम्बरीपानकलः पृथुश्रीः।
रक्तेक्षणो रेवतिमाश्रयित्वा प्रलम्बबाहुर्ललितप्रयातः ।१।

नीलाम्बुदाभे वसने वसानश्चन्द्रांशुगौरो मदिराविलाक्षः ।
रराज रामोऽम्बुदमध्यमेत्य सम्पूर्णबिम्बो भगवानिवेन्दुः ।२।
वामैककर्णामलकुण्डलश्रीः स्मेरं मनोज्ञाब्जकृतावतंसः ।
तिर्यक्कटाक्षं प्रियया मुमोद रामः सुखं चार्वभिवीक्ष्यमाणः ।३।
अथाज्ञया कंसनिकुम्भशत्रोरुदाररूपोऽप्सरसां गणः सः ।
द्रष्टुं मुदा रेवतिमाजगाम वेलालयं स्वर्गसमानमृद्ध्या ।४।
तां रेवतीं चाप्यथ वापि रामं सर्वा नमस्कृत्य वराङ्गयष्ट्यः।
वाद्यानुरूपं ननृतुः सुगात्र्यः समन्ततोऽन्या जगिरे च सम्यक्।५।
चकुस्तथैवाभिनयेन रङ्गं यथावदेषां प्रियमर्थयुक्तम् 
हद्यानुकूलं च बलस्य तस्य तथाज्ञया रेवतराजपुत्र्याः।६।
चक्रुर्हसन्त्यश्च तथैव रासं तद्देशभाषाकृतिवेषयुक्ताः 
सहस्ततालं ललितं सलीलं वराङ्गना मङ्गलसम्भृताङ्ग्यः ।७।
संकर्षणाधोक्षजनन्दनानि संकीर्तयन्त्योऽथ च मङ्गलानि ।
कंसप्रलम्बादिवधं च रम्यं चाणूरघातं च तथैव रङ्गे ।८।
यशोदया च प्रथितं यशोऽथ दामोदरत्वं च जनार्दनस्य ।
वधं तथारिष्टकधेनुकाभ्यां व्रजे च वासं शकुनीवधं च ।९।
तथा च भग्नौ यमलार्जुनौ तौ सृष्टिं वृकाणामपि वत्सयुक्ताम् ।
स कालियो नागपतिर्ह्रदे च कृष्णेन दान्तश्च यथा दुरात्मा ।2.89.१०।
शङ्खहृदादुद्धरणं च वीर पद्मोत्पलानां मधुसूदनेन।
गोवर्द्धनोऽर्थे च गवां धृतोऽभूद् यथा च कृष्णेन जनार्दनेन ।।११।।
कुब्जां यथा गन्धकपीषिकां च कुब्जत्वहीनां कृतवांश्च कृष्णः ।
अवामनं वामनकं च चक्रे कृष्णो यथाऽऽत्मानमजोऽप्यनिन्द्यः।।१२।
सौभप्रमाथं च हलायुधत्वं वधं मुरस्याप्यथ देवशत्रोः ।
गान्धारकन्यावहने नृपाणां रथे तथा योजनमूर्जितानाम् ।। १३ ।
ततः सुभद्राहरणे जयं च युद्धे च बालाहकजम्बुमाले ।
रत्नप्रवेकं च युधाजितैर्यत् समाहृतं शक्रसमक्षमासीत् ।।१४।।
एतानि चान्यानि च चारुरूपा जगुः स्त्रियः प्रीतिकराणि राजन् ।
सङ्कर्षणाधोक्षजहर्षणानि चित्राणि चानेककथाश्रयाणि ।।१५।।
कादम्बरीपानमदोत्कटस्तु बलः पृथुश्रीः स चुकूर्द रामः ।
सहस्ततालं मधुरं समं च स भार्यया रेवतराजपुत्र्या ।। १६ ।।
तं कूर्दमानं मधुसूदनश्च दृष्ट्वा महात्मा च मुदान्वितोऽभूत्।
चुकूर्द सत्यासहितो महात्मा हर्षागमार्थं च बलस्य धीमान् ।। १७ ।।
समुद्रयात्रार्थमथागतश्च चुकूर्द पार्थो नरलोकवीरा ।
कृष्णेन सार्द्धं मुदितश्चुकूर्द सुभद्रया चैव वराङ्गयष्ट्या ।। १८ ।।
गदश्च धीमानथ सारणश्च प्रद्युम्नसाम्बौ नृप सात्यकिश्च ।
सात्राजितीसूनुरुदारवीर्यः सुचारुदेष्णश्च सुचारुरूपः ।। १९ ।।
वीरौ कुमारौ निशठोल्मुकौ च रामात्मजौ वीरतमौ चुकूर्दतुः ।
अक्रूरसेनापतिशंकवश्च तथापरे भैमकुलप्रधानाः ।। 2.89.२० ।।
तद् यानपात्रं ववृधे तदानीं कृष्णप्रभावेण जनेन्द्रपुत्र ।
आपूर्णमापूर्णमुदारकीर्ते चुकूर्दयद्भिर्नप भैममुख्यैः ।। २१ ।।।
तै राससक्तैरतिकूर्दमानैर्यदुप्रवीरैरमरप्रकाशैः ।
हर्षान्वितं वीर जगत् तथाभूच्छेमुश्च पापानि जनेन्द्रसूनो ।। २२ ।।
देवातिथिस्तत्र च नारदोऽथ विप्रः प्रियार्थं मुरकेशिशत्रोः ।
चुकूर्द मध्ये यदुसत्तमानां जटाकलापागलितैकदेशः ।। २३ ।।
रासप्रणेता मुनि राजपुत्र स एव तत्राभवदप्रमेयः ।
मध्ये च गत्वा च चुकूर्द भूयो हेलाविकारैः सविडम्बिताङ्गैः ।।२४ ।।
स सत्यभामामथ केशवं च पार्थं सुभद्रां च बलं च देवम् ।
देवीं तथा रेवतराजपुत्रीं संदृश्य संदृश्य जहास धीमान् ।।२५ ।।
ता हासयामास सुधैर्ययुक्तास्तैस्तैरुपायैः परिहासशीलः ।
चेष्टानुकारैर्हसितानुकारैर्लीलानुकारैरपरैश्च धीमान् । २६ ।।
आभाषितं किंचिदिवोपलक्ष्य नादातिनादान् भगवान् मुमोच ।
हसन् विहासांश्च जहास हर्षाद्धास्यागमे कृष्णविनोदनार्थम् ।। २७ ।
कृष्णाज्ञया सातिशयानि तत्र यथानुरूपाणि ददुर्युवत्यः ।
रत्नानि वस्त्राणि च रूपवन्ति जगत्प्रधानानि नृदेवसूनो ।। २८ ।।
माल्यानि च स्वर्गसमुद्भवानि संतानदामान्यतिमुक्तकानि ।
सर्वर्तुकान्यप्यनयंस्तदानीं ददुर्ह रेरिङ्गितकालतज्ज्ञाः ।।२९।।
रासावसाने त्वथ गृह्य हस्ते महामुनिं नारदमप्रमेयः 
पपात कृष्णो भगवान् समुद्रे सात्राजितीं चार्जुनमेव चाथ ।। 2.89.३० ।।
उवाच चामेयपराक्रमोऽथ शैनेयमीषत्प्रहसन् पृथुश्रीः ।
द्विधा कृतास्मिन् पतताशु भूत्वा क्रीडाजलेनोऽस्तु सहाङ्गनाभिः ।।३१।।
सरेवतीकोऽस्तु बलोऽर्द्धनेता पुत्रा मदीयाश्च सहार्द्धभैमाः ।
भैमार्द्धमेवाथ बलात्मजाश्च मत्पक्षिणः सन्तु समुद्रतोये ।।३२।।
आज्ञापयामास ततः समुद्रं कृष्णः स्मितं प्राञ्जलिनं प्रतीतः ।
सुगन्धतोयो भव मृष्टतोयस्तथा भव ग्राहविवर्जितश्च ।। ३३ ।।
दृश्या च ते रत्नविभूषिता तु सा वेलिका भूरथ पत्सुखा च ।
मनोऽनुकूलं च जनस्य तत्तत् प्रयच्छ विज्ञास्यसि मत्प्रभावात्।।३४।।
भवस्यपेयोऽप्यथ चेष्टपेयो जनस्य सर्वस्य मनोऽनुकूलः ।
वैडूर्यमुक्तामणिहेमचित्रा भवन्तु मत्स्यास्त्वयि सौम्यरूपाः ।। ३५ ।।
बिभृस्व च त्वं कमलोत्पलानि सुगन्धसुस्पर्शरसक्षमाणि ।
षट्पादजुष्टानि मनोहराणि कीलालवर्णैश्च समन्वितानि ।। ३६ ।।
मैरेयमाध्वीकसुरासवानां कुम्भांश्च पूर्णान् स्थपयस्व तोये ।
जाम्बूनदं पाननिमित्तमेषां पात्रं पपुर्येषु ददस्व भैमाः ।। ३७ ।।
पुष्पोच्चयैर्वासितशीततोयो भवाप्रमत्तः खलु तोयराशे ।
यथा व्यलीकं न भवेद् यदूनां सस्त्रीजनानां कुरु तत्प्रयत्नम् ।। ३८।।
इतीदमुक्त्वा भगवान् समुद्रं ततः प्रचिक्रीड सहार्जुनेन ।
सिषेच पूर्वं नृप नारदं तु सात्राजिती कृष्णमुखेङ्गितज्ञा ।। ३९ ।।
ततो मदावर्जितचारुदेहः पपात रामः सलिले सलीलम् ।
साकारमालम्ब्य करं करेण मनोहरां रेवतराजपुत्रीम् ।। 2.89.४० ।।
कृष्णात्मजा ये त्वथ भैममुख्या रामस्य पश्चात् पतिताः समुद्रे ।
विरागवस्त्राभरणाः प्रहृष्टाः क्रीडाभिरामा मदिराविलाक्षाः ।। ४१ ।।
शेषास्तु भैमा हरिमभ्युपेताः क्रीडाभिरामा निशठोल्मुकाद्याः ।
विचित्रवस्त्राभरणाश्च मत्ताः संतानमाल्यावृतकण्ठदेशाः ।। ४२ ।।
वीर्योपपन्नाः कृतचारुचिह्ना विलिप्तगात्रा स्नलपात्रहस्ताः ।
गीतानि तद्वेषमनोहराणि स्वरोपपन्नान्यथ गायमानाः ।।४३ ।।
ततः प्रचक्रुर्जलवादितानि नानास्वराणि प्रियवाद्यघोषाः ।
सहाप्सरोभिस्त्रिदिवालयाभिः कृष्णाज्ञया वेशवधूशतानि ।। ४४ ।।
आकाशगङ्गाजलवादनज्ञाः सदा युवत्यो मदनैकचित्ताः ।
अवादयंस्ता जलदर्दुरांश्च वाद्यानुरूपं जगिरे च हृष्टाः ।। ४५ ।।
कुशेशयाकोशविशालनेत्राः कुशेशयापीडविभूषिताश्च ।
कुशेशयानां रविबोधितानां जह्रुः श्रियं ताः सुरचारुमुख्यः ।। ४६ ।
स्त्रीवक्त्रचन्द्रैः सकलेन्दुकल्पै रराज राजञ्छतशः समुद्रः ।
यदृच्छया दैवविधानतो वा नभो यथा चन्द्रसहस्रकीर्णम् ।। ४७ ।।
समुद्रमेघः स रराज राजञ्च्छतह्रदास्त्रीप्रभयाभिरामः ।
सौदामिनीभिन्न इवाम्बुनाथो देदीप्यमानो नभसीव मेघः ।। ४८ ।।
नारायणश्चैव सनारदश्च सिषेच पक्षे कृतचारुचिह्नः 
बलं सपक्षं कृतचारुचिह्नं स चैव पक्षं मधुसूदनस्य ।। ४९।।
हस्तप्रमुक्तैर्जलयन्त्रकैश्च प्रहृष्टरूपाः सिषिचुस्तदानीम् ।
रागोद्धता वारुणिपानमत्ताः संकर्षणाधोक्षजदेवपत्न्यः ।। 2.89.५० ।।

आरक्तनेत्रा जलमुक्तिसक्ताः स्त्रीणां समक्षं पुरुषायमाणाः ।
ते नोपरेमुः सुचिरं च भैमा मानं वहन्तो मदनं मदं च ।। ५१ ।।
अतिप्रसङ्गं तु विचिन्त्य कृष्णस्तान् वारयामास रथाङ्गपाणिः ।
स्वयं निवृत्तो जलवाद्यशब्दैः सनारदः पार्थसहायवांश्च ।। ५२ ।।
कृष्णेङ्गितज्ञा जलयुद्धसङ्गाद् भैमा निवृत्ता दृढमानिनोऽपि ।
नित्यं तथाऽऽनन्दकराः प्रियाणां प्रियाश्च तेषां ननृतुः प्रतीताः ।। ५३ ।।
नृत्यावसाने भगवानुपेन्द्रस्तत्याज धीमानथ तोयसङ्गान् ।
उत्तीर्य तोयादनुकूललेपं जग्राह दत्त्वा मुनिसत्तमाय ।। ५४ ।
उपेन्द्रमुत्तीर्णमथाशु दृष्ट्वा भैमा हि ते तत्यजुरेव तोयम् ।
विविक्तगात्रास्त्वथ पानभूमिं कृष्णाज्ञया ते ययुरप्रमेयाः ।५५।
यथानुपूर्व्या च यथावयश्च यत्सन्नियोगाश्च तदोपविष्टाः ।
अन्नानि वीरा बुभुजुः प्रतीताः पपुश्च पेयानि यथानुकूलम् ।। ५६ ।।

________
मांसानि पक्वानि फलाम्लकानि चुक्रोत्तरेणाथ च दाडिमेन।
निष्टप्तशूलाञ्छकलान् पशूंश्च तत्रोपजह्रुः शुचयोऽथ सूदाः ।५७।
सुस्विन्नशूल्यान्महिषांश्च बालाञ्छूल्यान्सुनिष्टप्तघृतावसिक्तान्।
वृक्षाम्लसौवर्चलचुक्रपूर्णान् पौरोगवोक्त्या उपजह्रुरेषाम् ।५८।
पौरोगवोक्त्या विधिना मृगाणां मांसानि सिद्धानि च पीवराणि ।
नानाप्रकाराण्युपजह्रुरेषां मृष्टानि पक्वानि च चुक्रचूतैः ।५९।
पार्श्वानि चान्ये शकलानि तत्र ददुः पशूनां घृतमृक्षितानि ।
सामुद्रचूर्णैरवचूर्णितानि चूर्णेन मृष्टेन समारिचेन ।। 2.89.६०।


समूलकैर्दाडिममातुलिङ्गैः पर्णासहिङ्ग्वार्द्रकभूस्तृणैश्च ।
तदोपदंशैः सुमुखोत्तरैस्ते पानानि हृष्टाः पपुरप्रमेयाः । ६१ ।
कट्वाङ्कशूलैरपि पक्षिभिश्च घृताम्लसौवर्चलतैलसिक्तैः।
मैरेयमाध्वीकसुरासवांस्ते पपुः प्रियाभिः परिवार्यमाणाः ।६२।
श्वेतेन युक्तानपि शोणितेन भक्ष्यान्सुगन्धांल्लवणान्वितांश्च।
आर्द्रान्किलादान् घृतपूर्णकांश्च नानाप्रकारानपि खण्डखाद्यान् ।६३।

अपानपाश्चोद्धवभोजमिश्राः शाकैश्च सूपैश्च बहुप्रकारैः।
पेयैश्च दघ्ना पयसा च वीराः स्वन्नानि राजन् बुभुजुः प्रहृष्टाः ।६४।

तथारनालांश्च बहुप्रकारान् पपुः सुगन्धानपि पालवीषु ।
शृतं पयः शर्करया च युक्तं फलप्रकारांश्च बहूंश्च खादन् ।। ६५ ।।
तृप्ताः प्रवृत्ताः पुनरेव वीरास्ते भैममुख्या वनितासहायाः।
गीतानि रम्याणि जगुः प्रहृष्टाः कान्ताभिनीतानि मनोहराणि ।६६।

_____ 
आज्ञापयामास ततः स तस्यां निशि प्रहृष्टो भगवानुपेन्द्रः ।
छालिक्यगेयं बहुसंनिधानं यदेव गान्धर्वमुदाहरन्ति ।६७।
जग्राह वीणामथ नारदस्तु षड्ग्रामरागादिसमाधियुक्ताम् ।
हृल्लीसकं तु स्वयमेव कृष्णः सवंशघोषं नरदेव पार्थः ।६८।
मृदङ्गवाद्यानपरांश्च वाद्यान् वराप्सरस्ता जगृहुः प्रतीताः ।
आसारितान्तं च ततः प्रतीता रम्भोत्थिता साभिनयार्थतज्ज्ञा ।६९।
तयाभिनीते वरगात्रयष्ट्या तुतोष रामश्च जनार्दनश्च 
अथोर्वशी चारुविशालनेत्रा हेमा च राजन्नथ मिश्रकेशी । 2.89.७०।
तिलोत्तमा चाप्यथ मेनका च एतास्तथान्याश्च हरिप्रियार्थम् ।
जगुस्तथैवाभिनयं च चक्रु रिष्टैश्च कामैर्मनसोऽनुकूलैः ।७१ ।
ता वासुदेवेऽप्यनुरक्तचित्ताः स्वगीतनृत्याभिनयैरुदारैः ।
नरेन्द्रसूनो परितोषितेन ताम्बूलयोगाश्च वराप्सरोभिः ।७२।
तदागताभिर्नृवराहृतास्तु कृष्णेप्सया मानमयास्तथैव।
फलानि गन्धोत्तमवन्ति वीराश्छालिक्यगान्धर्वमथाहृतं च ।७३।

____  

कृष्णेच्छया च त्रिदिवान्नृदेव अनुग्रहार्थं भुवि मानुषाणाम् ।
स्थितं च रम्यं हरितेजसेव प्रयोजयामास स रौक्मिणेयः।७४।
छालिक्यगान्धर्वमुदारबुद्धिस्तेनैव ताम्बूलमथ प्रयुक्तम् ।
प्रयोजितं पञ्चभिरिन्द्रतुल्यैश्छालिक्यमिष्टं सततं नराणाम् ।७५।

शुभावहं वृद्धिकरं प्रशस्तं मङ्गल्यमेवाथ तथा यशस्यम ।
पुण्यं च पुष्ट्यभ्युदयावहं च नारायणस्येष्टमुदारकीर्तेः । ७६ ।
जयावहं धर्मभरावहं च दुःस्वप्ननाशं परिकीर्त्यमानम् ।
करोति पापं च तथा विहन्ति शृण्वन् सुरावासगतो नरेन्द्रः ।७७।

छालिक्यगान्धर्वमुदारकीर्तिर्मेने किलैकं दिवसं सहस्रम् ।
चतुर्युगानां नृप रेवतोऽथ ततः प्रवृत्ता च कुमारजातिः ।७८ ।
गान्धर्वजातिश्च तथापरापि दीपाद् यथा दीपशतानि राजन् ।
विवेद कृष्णश्च स नारदश्च प्रद्युम्नमुख्यैर्नृप भैममुख्यैः । ७९ ।
विज्ञानमेतद्धि परे यथावदुद्देशमात्राच्च जनास्तु लोके ।
जानन्ति छालिक्यगुणोदयानां तोयं नदीनामथवा समुद्रः ।2.89.८० ।
ज्ञातुं समर्थो हि महागिरिर्वा फलाग्रतो वा गुणतोऽथ वापि ।
शक्यं न छालिक्यमृते तपोभिः स्थाने विधानान्यथ मूर्च्छनासु ।८१।
षड्ग्रामरागेपु च तत्तु कार्यं तस्यैकदेशावयवेन राजन् ।
लेशाभिधानां सुकुमारजातिं निष्ठां सुदुःखेन नराः प्रयान्ति । ८२ ।
छालिक्यगान्धर्वगुणोदयेषु ये देवगन्धर्वमहर्षिसंघाः 
निष्ठां प्रयान्तीत्यवगच्छ बुद्ध्या छालिक्यमेवं मधुसूदनेन ।८३।

भैमोत्तमानां नरदेव दत्तं लोकस्य चानुग्रहकाम्ययैव 
गतं प्रतिष्ठाममरोपगेयं बाला युवानश्च तथैव वृद्धाः ।८४.।
क्रीडन्ति भैमाः प्रसवोत्सवेषु पूर्वं तु बालाः समुदावहन्ति ।
वृद्धाश्च पश्चात्प्रतिमानयन्ति स्थानेषु नित्यं प्रतिमानयन्ति । ८५।
मर्त्येषु मर्त्यान् यदवोऽतिवीराः स्ववंशधर्मे समनुस्मरन्तः।
पुरातनं धर्मविधानतज्ज्ञाः प्रीतिः प्रमाणं न वयः प्रमाणम् ।८६।
प्रीतिप्रमाणानि हि सौहृदानि प्रीतिं पुरस्कृत्य हि ते दशार्हाः ।
वृष्ण्यन्धकाः पुत्रसखा बभूवुर्विसर्जिताः केशिविनाशनेन ।८७ ।

स्वर्गे गताश्चाप्सरसां समूहाः कृत्वा प्रणामं मधुकंसशत्रोः ।
प्रहृष्टरूपस्य सुहृष्टरूपा बभूव हृष्टः सुरलोकसङ्घः ।८८ ।


कृष्ण का चरित्रांकन देश और समाज की प्रवृत्तियों के अनुरूप हर काल में भिन्न भिन्न रूप में हुआ। परन्तु कुछ शास्त्रकार ऐसे भी थे जिन्होंने कृष्ण का चरित्रांकन कामशास्त्र के नायक के रूप में किया ये शास्त्रकार कृष्ण को देव संस्कृति के समर्थकों में प्रतिष्ठित करना चाहते थे।
हरिवंश पुराण कार ने रास प्रकरण में काल्पनिक उपादानों को आधार मानकर यही प्रयास किया है।
परन्तु सच्चे अर्थों में कृष्ण देवसंस्कृति के कटु आलोचक तथा इन्द्र यज्ञ और पूजा के प्रबल विरोधी थे।
परन्तु पुष्यमित्र सुँग ने देवयज्ञों प्रारम्भ कराकर पुन: यज्ञों  पशु बलि की पृथा भी प्रारम्भ कराई -

"यह सम्भव है कि  कुछ यादव साकाहारी और कुछ मासाँहारी भी रहे होंगे। जैसा कि आज भी है। 

परन्तु कृष्ण और बलराम जैसे भागवत धर्म के संस्थापकों को मदिरा पान कराकर माँस भक्षण करते हुए दिखाना और अनेक स्त्रीयों के साथ व्यभिचारी की भूमिका में प्रस्तुत करना " श्रीमद् भगवद्गीता के सिद्धान्तों के विपरीत है।

पुराणों में जिस प्रकार ब्राह्मणों की प्रसंग विपरीत होने पर भी अचानक दान और सेवा आदि से संतुष्ट करने की बातें सर्वविदित ही हैं। हरिवंश पुराण से कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं जो पूर्णत: उनके वास्तविक चरित्र को विपरीत हैं। फिर भी ब्राह्मण शास्त्र कार उन्हें लिखकर कृष्ण के सामाजिक वर्चस्व को समाप्त करना चाहते हैं।

मांसानि पक्वानि फलाम्लकानि चुक्रोत्तरेणाथ च दाडिमेन।
निष्टप्तशूलाञ्छकलान् पशूंश्च तत्रोपजह्रुः शुचयोऽथ सूदाः ।५७।
सुस्विन्नशूल्यान्महिषांश्च बालाञ्छूल्यान्सुनिष्टप्तघृतावसिक्तान्।
वृक्षाम्लसौवर्चलचुक्रपूर्णान् पौरोगवोक्त्या उपजह्रुरेषाम् ।५८।
पौरोगवोक्त्या विधिना मृगाणां मांसानि सिद्धानि च पीवराणि ।
नानाप्रकाराण्युपजह्रुरेषां मृष्टानि पक्वानि च चुक्रचूतैः ।५९।
पार्श्वानि चान्ये शकलानि तत्र ददुः पशूनां घृतमृक्षितानि ।
सामुद्रचूर्णैरवचूर्णितानि चूर्णेन मृष्टेन समारिचेन ।। 2.89.६०।


समूलकैर्दाडिममातुलिङ्गैः पर्णासहिङ्ग्वार्द्रकभूस्तृणैश्च ।
तदोपदंशैः सुमुखोत्तरैस्ते पानानि हृष्टाः पपुरप्रमेयाः । ६१ ।
कट्वाङ्कशूलैरपि पक्षिभिश्च घृताम्लसौवर्चलतैलसिक्तैः।
मैरेयमाध्वीकसुरासवांस्ते पपुः प्रियाभिः परिवार्यमाणाः ।६२।
श्वेतेन युक्तानपि शोणितेन भक्ष्यान्सुगन्धांल्लवणान्वितांश्च।
आर्द्रान्किलादान् घृतपूर्णकांश्च नानाप्रकारानपि खण्डखाद्यान् ।६३।

अपानपाश्चोद्धवभोजमिश्राः शाकैश्च सूपैश्च बहुप्रकारैः।
पेयैश्च दघ्ना पयसा च वीराः स्वन्नानि राजन् बुभुजुः प्रहृष्टाः ।६४।

तथारनालांश्च बहुप्रकारान् पपुः सुगन्धानपि पालवीषु ।
शृतं पयः शर्करया च युक्तं फलप्रकारांश्च बहूंश्च खादन् ।। ६५ ।।
तृप्ताः प्रवृत्ताः पुनरेव वीरास्ते भैममुख्या वनितासहायाः।
गीतानि रम्याणि जगुः प्रहृष्टाः कान्ताभिनीतानि मनोहराणि ।६६।

_____ 
आज्ञापयामास ततः स तस्यां निशि प्रहृष्टो भगवानुपेन्द्रः ।
छालिक्यगेयं बहुसंनिधानं यदेव गान्धर्वमुदाहरन्ति ।६७।
जग्राह वीणामथ नारदस्तु षड्ग्रामरागादिसमाधियुक्ताम् ।
हृल्लीसकं तु स्वयमेव कृष्णः सवंशघोषं नरदेव पार्थः ।६८।
मृदङ्गवाद्यानपरांश्च वाद्यान् वराप्सरस्ता जगृहुः प्रतीताः ।
आसारितान्तं च ततः प्रतीता रम्भोत्थिता साभिनयार्थतज्ज्ञा ।६९।

"हरिवंश पुराण: विष्णु पर्व: एकोननवतितम अध्याय:89 वाँ अध्याय -

 श्लोक 53-69 का हिन्दी अनुवाद :-श्रीकृष्‍ण के संकेतों को समझने वाले भीमवंशी यादव सुदृढ़ अभिमान से युक्‍त होने पर भी उस जल युद्ध के प्रसंग से निवृत्त हो गये। तदनन्‍तर उन प्रिय पुरुषों को नित्‍य आनन्‍द देने वाली उनकी प्‍यारी वार-वनिताएं विश्‍वस्‍त होकर नृत्‍य करने लगीं। नृत्‍य के अन्‍त में बुद्धिमान भगवान श्रीकृष्‍ण ने जलक्रीड़ा के प्रसंग त्‍याग दिये।
 उन्‍होंने जल से ऊपर आकर मुनिवर नारद जी को अनुकूल चन्‍दन का लेप देकर फिर स्‍वयं भी उसे ग्रहण किया। भगवान् श्रीकृष्‍ण को जल से बाहर निकला देख अन्‍य यादवों ने भी जलक्रीड़ा त्‍याग दी।

 फिर वे अप्रमेय शक्तिशाली यादव शुद्ध शरीर हो श्रीकृष्‍ण की आज्ञा से पानभूमि ( मदिरालय)में गये। वहाँ वे क्रमश: अवस्‍था और सम्‍बन्‍ध के अनुसार उस समय भोजन के लिये बैठे।
तदनन्‍तर उन प्रख्‍यात वीरों ने अपनी रुचि के अनुकूल अन्‍न खाये और पेय रसों का पान किया।
 पके फलों के गूदे (पका हुआ मांस, खट्टे फल, अधिक खट्टे अनार के साथ शूल में गूँथकर सेके गये महिष का मांस ये सब पदार्थ पवित्र रसोईयों ने उनके लिये परोसे। 

शूल में गूँथकर पकाये गये महिष का मांस नारियल, तपे हुए घी में तले गये अन्‍यान्‍य खाद्य पदार्थ, अमलवेंत, काला नमक और चूक के मेल से बने हुए लेह्य पदार्थ (चटनी)- ये सब वस्‍तुएं पाकशालाध्‍यक्ष के कहने से रसोईयों ने इन यादवों के लिये प्रस्‍तुत कीं। 
"
पाकशालाध्‍यक्ष के बताये अनुसार विधिवत तैयार किये गये मृग के  मोटे-मोटे गूदे, आम की खटाई डालकर बनाये गये नाना प्रकार के विशुद्ध व्‍यंजन भी इनके लिये परोसे गये।

मांसानि पक्वानि फलाम्लकानि चुक्रोत्तरेणाथ च दाडिमेन।
निष्टप्तशूलाञ्छकलान् पशूंश्च तत्रोपजह्रुः शुचयोऽथ सूदाः ।५७।
सुस्विन्नशूल्यान्महिषांश्च बालाञ्छूल्यान्सुनिष्टप्तघृतावसिक्तान्।
वृक्षाम्लसौवर्चलचुक्रपूर्णान् पौरोगवोक्त्या उपजह्रुरेषाम् ।५८।
पौरोगवोक्त्या विधिना मृगाणां मांसानि सिद्धानि च पीवराणि ।
नानाप्रकाराण्युपजह्रुरेषां मृष्टानि पक्वानि च चुक्रचूतैः ।५९।
पार्श्वानि चान्ये शकलानि तत्र ददुः पशूनां घृतमृक्षितानि ।
सामुद्रचूर्णैरवचूर्णितानि चूर्णेन मृष्टेन समारिचेन ।। 2.89.६०।

दूसरे रसोईयों ने पास रखे हुए पोषक शाकों के टुकड़े-टुकड़े करके उन्‍हें घी में तल दिये और उनमें नमक तथा मिर्च के चूर्ण मिलाकर खाने वालों को परोस दिये। मूली, अनार बिजौरा, नीबू, तुलसी, हींग और भूतृण नामक शाक विशेष के साथ सुन्‍दर मुख वाले पानपात्र लेकर उन अप्रमेय शक्तिशाली यादवों ने बड़े हर्ष के साथ पेय रस का पान किया।

कट्वांक अर्थात कटुक परवल, शूलहर (हींग) तथा नमक-खटाई मिलाकर घी और तेल में सेके गये लकुच या बड़हर[2] 

के साथ मैरेय, माध्‍वीक, सुरासव नामक मधु( मदिरा) का उन यादवों ने अपनी प्रियतमाओं से घिरे रहकर पान किया। 

नरेश्‍वर! श्‍वेत रंग के खाद्य पदार्थ मिश्री आदि तथा लाल रंग के फल के साथ नाना प्रकार के सुगन्धित एवं नमकीन भोजन एवं आद्र (रसदार साग), किलाद (भैंस के दूध में पकाये गये खीर आदि), घी से भरे हुए पदार्थ (पुआ-हलुआ आदि) तथा भाँति-भाँति के खण्‍ड-खाद्य (खाँड़ आदि) उन्‍होंने खाये।

 राजन ! उद्धव, भोज आदि श्रेष्‍ठ यादव वीरों ने जो मादक रसों का पान नहीं करते थे, बड़े हर्ष के साथ नाना प्रकार के साग, दाल, पेय-पदार्थ तथा दही-दूध आदि के साथ उत्‍तम अन्‍न का भोजन किया।
___________________
उन्‍होंने प्‍यालों में अनेक प्रकार के सुगन्धित आरनाल (कांजीरस) का पान किया। चीनी मिलाये हुए गरम-गरम दूध पीया और भाँति-भाँति के फल भी खाये। 

खा-पीकर तृप्‍त होने के पश्‍चात वे मुख्‍य-मुख्‍य यदुवंशी वीर पुन: स्त्रियों को साथ लेकर बड़े हर्ष के साथ रमणीय एवं मनोहर गीत गाने लगे।

उनकी प्रेयसी कामिनियाँ अपने हाव-भाव द्वारा उन गीतों के अर्थ का अभिनय करती जाती हैं। तदनन्‍तर हर्ष में भरे हुए भगवान् उपेन्‍द्र ने उस रात में बहुसंख्‍यक मनुष्‍यों द्वारा सम्‍पन्‍न होने वाले उस छालिक्‍य गान के लिये आज्ञा दी, जिसे गान्‍धर्व कहते हैं।

उस समय नारद जी ने अपनी वीणा सँभाली, जो छ: ग्रामों पर आधारित राग आदि के द्वारा चित्त को एकाग्र कर देने वाली थी। 

नरदेव! साक्षात् श्रीकृष्‍ण ने वंशी बजाकर हृल्‍लीसक[4] (रास) नामक नृत्‍य का आयोजन किया। 
_________________    
कुन्‍तीपुत्र अर्जुन ने मृदंग वाद्य ग्रहण किया। अन्‍य वाद्यों को श्रेष्‍ठ अप्‍सराओं ने ग्रहण किया जो उनके वादन कला में प्रख्‍यात थीं। आसारित[5] (प्रथम आसारनर्त की-प्रवेश) के बाद अभिनय के अर्थतत्त्व का ज्ञान रखने वाली रम्भा नामक अप्‍सरा उठी, जो अपनी अभिनय कला के लिये विख्‍यात थी।

अध्याय 90 - यादवों  का रास नृत्य का आयोजन - (जारी) हरिवंश पुराणविष्णु- पर्व--

1. वैशम्पायन ने कहा:- कादम्बर मदिरा पीने के कारण बलराम ने स्वयं पर तथा अपनी गतिविधियों पर सारा नियंत्रण खो दिया था और उसकी आँखें लाल हो गई थीं, चंदन से चिपकी हुई बड़ी भुजाओं वाली अत्यंत सुंदर पत्नी रेवती के साथ वे क्रीड़ा करने लगे ।१।

2. जैसे पूर्णिमा का चंद्रमा बादलों में चमकता है, वैसे ही काले वस्त्र पहने हुए , चंद्रमा की किरणों के समान गोरे और नशे में डूबी आंखों वाले दिव्य बलराम वहां चमक रहे थे ।२।

3. अपने बाएं कान पर केवल कुंडल रखकर और सुंदर कमलों से सुशोभित, मुस्कुराते हुए राम ने अपनी प्यारी पत्नी के पार्श्व-लंबाई रूप से सुशोभित चेहरे को बार-बार देखकर अत्यधिक आनंद प्राप्त किया।

4. तत्पश्चात कंस और निकुंभ के संहारक केशव की आज्ञा से सुंदर अप्सराएं रेवती और बलराम को देखने के लिए स्वर्ग के समान समृद्ध हल धारक के पास पहुंचीं।

5. मनमोहक शारीरिक गठन से युक्त उन सुंदर शरीर वाली अप्सराओं ने रेवती और राम को नमस्कार किया और समय के साथ नृत्य करना शुरू कर दिया। और उनमें से कुछ ने हर प्रकार की भावना को अभिव्यक्त करने वाले इशारों के साथ गाया।

6. बलदेव और रेवत के  राजा की पुत्री की आज्ञा के अनुसार उन्होंने यादवों की इच्छा के अनुसार अपने द्वारा अर्जित विभिन्न हाव-भाव प्रदर्शित करना शुरू कर दिया ।

7. उन दुबली-पतली और सुंदर युवतियों ने यादव देश की स्त्रियों के समान वस्त्र पहनकर उनकी भाषा में मधुर गीत गाए।

7-14. हे वीर, उस सभा से पहले उन्होंने बलराम और केशव की प्रसन्नता के लिए विभिन्न पवित्र प्रसंग गाए, जैसे कंस, प्रलम्व और चाणूर का विनाश ; जनार्दन को ओखली से बांधने की कहानी जिसके कारण यशोदा ने उनकी महिमा स्थापित की और उन्हें दामोदर नाम मिला ; अरिष्टा और धेनुका का विनाश ; व्रज में उनका निवास ; पूतना का विनाश ; उनके द्वारा यमल और अर्जुन वृक्षों को उखाड़ना ; कालांतर में उनके द्वारा भेड़ियों की रचना, झील में कृष्ण द्वारा दुष्ट नागों के राजा कलयानाग का दमन ; उस झील से कमल, कुमुद, शंख और निधियों के साथ मधुसूदन की वापसी ; विश्व कल्याण के स्रोत केशव द्वारा गोकुल की भलाई के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण करना ; कैसे कृष्ण ने खुशबूदार चन्द्रन  बेचने वाली कूबड़ वाली महिला को ठीक किया; भगवान के ये वृत्तांत जन्म और अपूर्णताओं से रहित हैं।

अप्सराओं ने यह भी वर्णन किया कि कैसे भगवान ने, यद्यपि स्वयं बौने नहीं थे, अत्यंत वीभत्स बौना रूप धारण किया; सौभ की हत्या कैसे हुई; इन सभी युद्धों में बलदेव ने अपना हल कैसे उठाया; देवताओं के अन्य शत्रुओं का विनाश; गांधार राजकुमारी के विवाह के समय घमंडी राजाओं के साथ युद्ध ; सुभद्रा का हरण; वलहाका और जमवुमाली के साथ युद्ध ; और कैसे उसने इन्द्र  को हराने के बाद उसकी मौजूदगी में ही सारे गहने हरण लिए ।

15-16. हे राजन, जब वे सुंदर स्त्रियाँ संगकर्षण और अधोक्षज के लिए इन सभी और विभिन्न अन्य सुखद और आनंददायक विषयों को गा रही थीं , तो अत्यधिक सुंदर बलराम , कादम्बरीवारी  के नशे में, अपनी पत्नी रेवती के साथ मधुर तालियों के साथ गाने लगे ।

17. राम को इस प्रकार गाते देख बुद्धिमान, उच्चात्मा और अत्यधिक शक्तिशाली मधुसूदन ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए सत्य के साथ गाना शुरू किया ।

18. विश्व के महानतम वीर पार्थ , जो समुद्र-यात्रा के लिये वहाँ आये थे, वह भी प्रसन्न होकर सुन्दर सुभद्रा और कृष्ण के साथ गाने लगे।

19-20. हे राजन, बुद्धिमान गद , सरण , प्रद्युम्न , साम्ब- , सात्यकि और सत्राजित के पुत्र, महान शक्तिशाली चारुदेष्ण ने भी वहां समवेत स्वर में गाया। बलराम के पुत्र, सबसे महान वीर, राजकुमार निशाथ और उल्मुख, सेनापति अक्रूर , शंख और अन्य प्रमुख भीमकुल के यादवों ने भी वहां गाया।

21. उस समय, हे राजा, कृष्ण की शक्ति से नावों का आकार बढ़ गया और जनार्दन ने प्रमुख भीमवंशीयों के साथ अपनी पूरी क्षमता से गाना गाया।

23 हे वीर राजकुमार, जब अमर-तुल्य यदु सरदारों ने इस प्रकार गाया तो सारा संसार हर्ष से भर गया और पाप नष्ट हो गये।

23 तब मधु के हत्यारे केशव को प्रसन्न करने के लिए देवताओं के अतिथि नारद ने यादवों के बीच ऐसा गाना शुरू किया कि उनकी जटाओं का एक हिस्सा पिघल गया।

24. हे राजकुमार, अथाह ऊर्जा वाले उस मुनि ने वहां-वहां गीतों की रचना करते हुए उन्हें बार-बार विभिन्न भावों और गतियों के साथ उन्हें  भीम कुल  के यादवों के बीच गाया।

25 तब राजा रेवत की पुत्री रेवती, बलदेव , केशव, पृथा के पुत्र अर्जुन तथा सुभद्रा को देखकर बुद्धिमान ऋषि बार-बार मुस्कुराये।

26. हालाँकि केशव की पत्नियाँ स्वभाव से धैर्यवान थीं, फिर भी बुद्धिमान नारद, जो हमेशा मज़ाक करने के शौकीन थे, अपने हाव-भाव, मुस्कुराहट, चाल और कई अन्य तरीकों से जो उनकी हँसी को उत्तेजित कर सकते थे, उन्हें हँसाते थे।

27. मानो निर्देश दिया गया हो कि दिव्य मुनि नारद ने ऊंचे और नीचे विभिन्न धुनें गाईं और कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए वह जोर-जोर से हंसने लगे और खुशी के आंसू बहाने लगे।

28-29. हे राजकुमार, तब इशारों में निपुण युवा युवतियों ने, कृष्ण के आदेश पर, दुनिया के सबसे अच्छे गहने, सुंदर वस्त्र, स्वर्ग में बनी मालाएं, संतानक(पारिजात) फूल, मोती और सभी मौसमों में पैदा होने वाले अन्य फूल दे दिए।

30. तत्पश्चात् संगीतमय सभा की समाप्ति के बाद दिव्य कृष्ण, महान और अतुलनीय मुनि नारद का हाथ पकड़कर सत्यभामा और अर्जुन के साथ समुद्र में कूद पड़े ।

31-32. अतुलनीय पराक्रम वाले अत्यधिक सुंदर कृष्ण ने थोड़ा मुस्कुराते हुए सिनी के पुत्र से कहा- "आइए हम दो दलों में बंट जाएं और युवतियों के साथ समुद्र के पानी में खेलें। समुद्र के इस पानी में बलदेव और रेवती को साथ रहने दें मेरे बेटे और कुछ भीमवंशी यादव एक पार्टी बनाते हैं और बचे हुए भीमवंशी और बलराम के बेटों को मेरी पार्टी में शामिल होने देते हैं।"

33. बाद में अत्यधिक आश्वस्त केशव ने हाथ जोड़कर सामने खड़े समुद्र से कहा:- "समुद्र, तुम्हारा पानी मीठा हो और घतक मगर आदि से रहित हो।

34. तेरा बिछौना  (समुद्र तल) रत्नों से सुशोभित हो, और तेरे किनारे दोनों पांवों के सुखपूर्वक स्पर्श के योग्य हों। और आप, मेरी शक्ति से, वह सब कुछ दे सकें जो आप मानव जाति के स्वाद के अनुकूल जानते हैं।

35. तू मनुष्यों को मनभावन सब प्रकार का पेय दे, और सोने, नीलमणि और मोतियों से सजी हुई कोमल मछलियां तेरे जल में तैरें।

36. आप रत्नों, सुगन्धित, मनमोहक, लाल कमलों और मधुर स्पर्श वाले कुमुदिनों को धारण करें और मधुमक्खियों से सेवित हों।

______    

37. क्या आपके पास असंख्य घड़े और सोने के बर्तन हैं, जिनमें से भैमस मैरेया , माधविका और आसव आदि  मदिरा हों तो उन्हें पेश करो

38. हे सागर, तुम्हार जल फूलों की सुगन्ध से सुगन्धित ठंडा हो। आप इतना सावधान रहें कि यादवों को अपनी स्त्रियों के साथ कोई असुविधा न हो।''

39 हे राजन, समुद्र से ऐसा कहकर कृष्ण अर्जुन के साथ क्रीड़ा करने लगे। सत्राजित की पुत्री, जो कृष्ण द्वारा दिए गए संकेतों में पारंगत थी, ने नारद के शरीर पर जल छिड़का।

40. तब राम ने नशे में डूबे अपने शरीर को उत्तेजना पूर्वक अपने हाथों से रेवती के हाथों से पकड़ लिया और खेल-खेल में समुद्र के पानी में कूद पड़े।

41-42. राम के पीछे कृष्ण के चंचल पुत्र, नशे में आँखें घुमाते हुए और अन्य प्रमुख भीमवंशी, अपने वस्त्र, और आभूषणों से वंचित होकर, खुशी से समुद्र में कूद पड़े।

निशत, उल्मुक और बलदेव के अन्य पुत्र अपने गले में संतानक फूलों की माला पहने हुए, विभिन्न प्रकार के वस्त्र पहने हुए, नशे में धुत और खेल-कूद में व्यस्त थे, साथ ही शेष भीमवंशी भी केशव की सभा में शामिल हो गए।

43. शक्तिशाली यादव, जिनके चेहरे पर सुंदर निशान और लेप थे, अपने हाथों में मदिरा के पात्र लेकर, मधुर धुनों वाले गीत गाने लगे और उस स्थान के लिए सुंदर रूप से अनुकूल थे।

44 तदनन्तर संगीत में रुचि रखने वाली, सजी-धजी सैकड़ों युवतियाँ, दिव्यलोक में रहने वाली अप्सराओं के साथ मिलकर विभिन्न स्वर बजाने लगीं।

45. वे युवा युवतियाँ, जो अलौकिक गंगा के जल में वाद्ययंत्र बजाने में पारंगत थीं , और जिनका मन पूरी तरह से कामदेव के वश में था, प्रसन्नतापूर्वक   जलदर्दुर[1] बजाती थीं और उसके साथ गीत गाती थीं।

46. ​​उस समय कमल की पंखुड़ियों के समान नेत्रों वाली और कमल के डंठलों से सुशोभित सुंदर दिव्य नृत्य करने वाली लड़कियाँ सूर्य की किरणों से उड़े हुए कमल के समान शोभा पा रही थीं।

47. हे राजा, सैकड़ों पूर्णिमा के चंद्रमाओं के समान दिखने वाली उन महिलाओं के चंद्रमा जैसे चेहरों से भरा हुआ, या तो अपनी इच्छा से या विधि के आदेश के तहत वहां जा रहा थे , समुद्र हजारों चंद्रमाओं से सुशोभित आकाश की तरह दिखाई दे रहा था।

48 हे राजन, मेघरूपी समुद्र स्त्री के समान प्रकाश से सुशोभित हुआ। जल के स्वामी आकाश में बिजली से छितरे हुए बादलों के समान प्रकट हुए।

49. इसके बाद नारायण , जिन्होंने अपने शरीर पर सुंदर निशान लगाए थे, नारद और उनकी सभा के अन्य सदस्यों ने बलदेव और उनकी सभा पर पानी छिड़का, जिन्होंने भी सुंदर निशान लगाए थे। और बाद वाले ने भी पहले वाले पर पानी छिड़का।

"हस्तप्रमुक्तैर्जलयन्त्रकैश्चप्रहृष्टरूपावारुणिपानमत्ता: संकर्षणाधोक्षजदेवपत्न्य:।2/89/50

50. उस समय कृष्ण और संकर्षण की पत्नियाँ वारुणी मदिरा के नशे में चूर होकर और संगीत के साथ प्रसन्न होकर हाथों और जलयंत्रों से एक दूसरे पर पानी फेंकती थीं।

____

51. शराब, कामदेव और स्वाभिमान से युक्त, नशे से लाल आंखों वाले भीमवंशी एक-दूसरे पर पानी फेंकते थे और इस तरह महिलाओं की उपस्थिति के सामने कठोर रवैया अपनाते थे: 

हालांकि वे एक के लिए खेल रहे थे, वे बाज नहीं आए  लंबे समय तक भी।

52. इस प्रकार उनके परिचित कामक्रीडा को देखकर, चक्रधारी कृष्ण ने एक क्षण के लिए सोचा और फिर उन्हें रोक दिया। उन्होंने भी पार्थ और नारद के साथ जल में वाद्ययंत्र बजाने से परहेज किया।

53. भीमवंशी यादव, जो हमेशा अपनी प्रिय महिलाओं को प्रसन्न करते थे, हालांकि वे अत्यधिक संवेदनशील थे, जैसे ही उन्होंने संकेत दिया, तुरंत कृष्ण के इरादे को समझ गए और पानी में खेलना बंद कर दिया: लेकिन युवतियों ने नृत्य करना जारी रखा।

54. नाच पार्टी समाप्त होने के बाद जब अन्य यादव पानी में थे तब भी उपेन्द्र किनारे पर आ गये। इसके बाद उन्होंने नारद को श्रेष्ठ मुनि बनने का अवसर दिया और बाद में स्वयं भी उनका अंग बन गये।

55. फिर उपेन्द्र को जल से बाहर निकलता देख अतुलनीय भींमो ने शीघ्र ही जल छोड़ दिया। फिर वे अपने शरीर को दूबों से शुद्ध करके, कृष्ण की अनुमति से, शाराब के स्थान में चले गए।

56 उन सुप्रसिद्ध वीरों ने अपनी-अपनी आयु तथा स्थिति के अनुसार क्रम से बैठकर नाना प्रकार के भोजन तथा पेय पदार्थों से स्वयं को तरोताजा किया।

57. तब रसोइये बड़े आनन्द से पके हुए मांस, सिरके, अनार और लोहे की छड़ों पर भुना हुआ पशुओं का मांस ले आए।

58. फिर एक युवा भैंस को डंडे पर अच्छी तरह से भूनकर, गर्म करके, घी में भिगोकर, सिरका, सोचल नमक और एसिड मिलाकर परोसा गया।

59. बहुत से मोटे हिरणों का मांस कुशल पकाने की विधि के अनुसार भूनकर, और सिरके में मीठा करके लाया गया।

60. जानवरों की टाँगें, नमक और सरसों के साथ मिलाकर और घी में तलकर भी परोसी जाती थीं।

61. अतुलनीय यादवों ने अरुम कैम्पैनुलटम की जड़ों, अनार, नींबू, हींग, जिंजरेड और अन्य सुगंधित सब्जियों वाले उन व्यंजनों को बड़े आनंद से खाया। फिर उन्होंने सुंदर प्यालों में शराब पी।

62. वे अपनी प्रिय युवतियों के साथ घिरे रहकर मैरेया, माधविका और आसव जैसी विभिन्न मदिरा पीते थे, जो पक्षियों के मांस को मक्खन, अम्ल रस, नमक और खट्टी चीजों के साथ भूनकर तैयार की जाती थी।

63. उन्होंने अन्य व्यंजन, सफेद और लाल रंग के विभिन्न सुगंधित नमकीन खाद्य पदार्थ, दही और घी से बनी चीजें भी खाईं।

64. हे राजा, उद्धव , भोज और अन्य वीर, जो शराब नहीं पीते थे, उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक सब्जियाँ, सब्जी-करी, केक, दही और हलवा लिया।

65. पलावी नामक पीने के बर्तन से, वे विभिन्न सुगंधित पेय, दूध और चीनी के साथ मक्खन पीते थे और विभिन्न प्रकार के फल लेते थे।

66. इस प्रकार वीर भीमों ने भरपेट भोजन करके प्रसन्न हो गये। बाद में, वे, अपनी पत्नियों को अपने साथियों के रूप में रखते हुए, अपनी पत्नियों द्वारा शुरू किए गए आनंद के साथ फिर से संगीत में शामिल हो गए।

67. इसके बाद जब रात होने लगी तो दिव्य उपेन्द्र ने सभा में उपस्थित सभी लोगों से गाना जारी रखने के लिए कहा। 

देवताओं और गंधर्वों द्वारा गाए जाने वाले विभिन्न सुरों के (छालिक्य) ।

68-72. हे राजन, तब नारद ने अपनी वीणा बजाना शुरू किया जो छह ताल और रागों के साथ [2] मन की एकाग्रता लाती है, कृष्ण ने अपनी बांसुरी के संगीत के साथ हल्लीसक नृत्य करना जारी रखा और पार्थ ने अपने मृदंग को बजाना शुरू किया। : [

4] अन्य प्रमुख अप्सराएँ विभिन्न अन्य वाद्ययंत्र बजाती थीं। इसके बाद असरिता के बाद , सुंदर रंभा , एक चतुर अभिनेत्री, उठी, उसने अभिनय किया और बलराम और केशव को प्रसन्न किया। तदनन्तर, हे राजन , सुंदर और विशाल नेत्रों वाली उर्वशी , हेमा , मिश्रकेशी , तिलोत्तमा , मेनका और अन्य दिव्य अभिनेत्रियाँ क्रम से उठीं और गायन और नृत्य से हरि को प्रसन्न किया।

 उनके मनमोहक गायन और नृत्य से आकर्षित होकर वासुदेव ने उन सभी को उनके मन के अनुरूप उपहार देकर प्रसन्न किया। 

हे राजकुमार, उन सम्मानित और प्रमुख अप्सराओं को, जिन्हें वहां लाया गया था, कृष्ण की इच्छा पर पान के पत्तों से  ( वीड़ो)सम्मानित किया गया था।

73-74. हे राजा, इस प्रकार विभिन्न सुगंधित फल और  छालिक्य गीत, जो कृष्ण की इच्छा और मानव जाति के प्रति उनके उपकार से दिव्य क्षेत्र से स्वर्ग से लाए गए थे, केवल रुक्मिणी के बुद्धिमान पुत्र को ही ज्ञात थे। वही उनका उपयोग कर सकता था और वही उस समय पान बांटता था।

75-76.  छालिक्य गीत, नारायण के कल्याण, पोषण और समृद्धि के लिए अनुकूल, गौरवशाली कर्मों का, और जो मानव जाति के लिए महान, शुभ और प्रसिद्धि और धर्मपरायणता का उत्पादक था, इंद्र जैसे कृष्ण, राम, प्रद्युम्न द्वारा समवेत स्वर में गाया गया था। अनुविन्ध और शम्वा।

77-78. यह छालिक्य, जो वहाँ गाया जाता था, पुण्य की धुरी धारण करने में समर्थ तथा दु:ख और पाप का नाश करने वाला था। दिव्य क्षेत्र की मरम्मत करते हुए और इस चालिक्य गीत को सुनकर प्रतापी राजा रेवत ने चार हजार युगों को एक दिन के रूप में माना।इससे कुमारजाति आदि गंधर्वों के विभिन्न प्रभागों की उत्पत्ति हुई ।

79. हे राजन, जैसे एक ही प्रकाश से सैकड़ों दीप उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार छालिक्य से गंधर्वों की विभिन्न श्रेणियां उत्पन्न हुई हैं। हे राजन, प्रद्युम्न और अन्य प्रमुख भीमों के साथ कृष्ण और नारद यह सब जानते थे।

80-81. झरनों और समुद्र के पानी की तरह इस दुनिया के लोग छालिक्य को केवल दृष्टांत से जानते थे। मुरकाना [5] और चालिक्य के समय को जानने के लिए कठोर तपस्या किए बिना हिमालय के गुणों और वजन को जानना संभव है , लेकिन ऐसा नहीं है ।

82-83. हे राजा, छह तराजू और राग पुरुषों के साथ छालिक्य का क्या, बड़ी कठिनाई के साथ, सुकुमारजति के ग्यारहवें मंडल के अंत तक भी नहीं आ सकता है । हे राजन, यह निश्चित रूप से जान लें कि मधुसूदन ऐसी व्यवस्था की थी कि देवता, गंधर्व और महान ऋषि छालिक्य के गुणों के कारण भक्ति भावना प्राप्त कर सकें।

84-88. भगवान द्वारा, मनुष्यों में, कृष्ण द्वारा, दुनिया पर उपकार दिखाने के लिए भैमों से पहले गाए जाने के कारण, चालिक्य, जिसे केवल अमर लोगों द्वारा गाया जाता था, ऐसी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है,

 जिसे पहले उत्सव के अवसर पर भीम लड़के इस्तेमाल करते थे इसे एक उदाहरण के रूप में उद्धृत करने के लिए। और बड़े-बूढ़े उनकी बात का अनुमोदन करते थे और लड़के, जवान और बूढ़े उसे समवेत स्वर में गाते थे। "प्यार ही कसौटी है, उम्र नहीं" - मनुष्यों को उनकी जाति के इस गुण की याद दिलाने के लिए, प्राचीन धार्मिक संस्कारों के संचालक वीर यादवों ने मनुष्यों की भूमि में ऐसा किया। 

हे राजन, मित्रता प्रेम से जानी जाती है, इसलिए प्रेम को सामने रखते हुए, केशव को छोड़कर अन्य वृष्णि , अंधक और दशार्ह अपने पुत्रों के साथ भी मित्र जैसा व्यवहार करते थे। तत्पश्चात प्रसन्न होकर कंस के हत्यारे मधुसूदन को नमस्कार करते हुए, संतुष्ट अप्सराएँ दिव्य क्षेत्र में लौट आईं, जो भी (तदनुसार) खुशी से भरा हुआ था।

फ़ुटनोट और संदर्भ:

[1] :

पानी में बजाया जाने वाला एक प्रकार का वाद्ययंत्र।

[2] :

संगीत की एक विधा जिसमें से छह की गणना की जाती है। भैरव , मालव सारंगा , हिंडोला , वसंत , दीपका और मेघा : वे काव्य और पौराणिक कथाओं में चित्रित हैं ।

[3] :

मुख्य रूप से एक पुरुष और आठ या दस महिला कलाकारों द्वारा गायन और नृत्य का एक छोटा नाटकीय मनोरंजन , एक बैले।

[4] :

एक प्रकार का वाद्य यंत्र।

[5] :

एक स्वर या अर्धस्वर जो उसके पैमाने में रखा जाता है, ग्राम या पैमाने का सातवाँ भाग।


 हरिवंश पुराण का लेखन काल पुष्यमित्र सुँग के परवर्ती काल का है यद्यपि इसमें बहुत सी बाते कृष्ण चरित्र के अनुकूल सकारात्मक भी हैं  परन्तु पुराणकार पुष्य मित्र के विचारों का पोषक है कृष्ण को आधार बनाकर पुराणकार पुष्य मित्र के उन सभी पृथाओं को कृष्ण पर आरोपित कर रहा है। जो किसी भी अच्छे धर्म में मान्य नही की जाकती हैं रास मण्डली में यादव राजकुमारों के साथ वेश्याओ के समूह को उपस्थित करना सभी यादवों का मदिरा पीकर कामुक व्यवहार करना दिखाना  अपने पुत्रों के सामने ही कृष्ण और बलराम को शराब पीकर स्स्रीयों के साथ सेक्सुअल इण्टरकोर्स में दिखाना वह भी रात्री काल में स्वर्ग से आयी अप्सराओं के साथ राजकुमारों का इन्द्र के समान मदिरा पी पीकर रमण करना इन्द्र के ऐश्वर्य को आदर्श केवरूप में प्रस्तुत करना ही है।  ।  

हरिवंश का कालनिर्णय

हरिवंश के कालनिर्माण तथा महाभारत के साथ सम्बद्ध होने के काल का निर्णय प्रमाणों द्वारा किया जा सकता है-

(क) हरिवंश के साथ सम्मिलित होकर लक्ष श्लोकात्मक रूप धारण करने वाला महाभारत शत साहस्री संहिताके नाम से (454) ईस्वी के गुप्त शिलालेख में उल्लिखित है। 

(ख) अश्वघोष (प्रथमशती) ने अपने वज्रसूची उपनिषद् में हरिवंश के 'प्रेतकल्पप्रकरण से सप्तव्याधा दशार्णेषु’ (हरिवंश 24/20, 21) इत्यादि श्लोकों को प्रमाण रूप से उद्धृत किया है। अतः हरिवंश की रचना प्रथमशती से अर्वाचीन नहीं हो सकती।

(ग) हरिवंश (विष्णु पर्व 55/50) में 'दीनारका उल्लेख उसके रचनाकाल का द्योतक है। रोम साम्राज्य के सोने के सिक्के 'दिनारियसकहलाते थे और उसी शब्द का संस्कृत रूप दीनारहै। इस शब्द का सबसे प्राचीन प्रयोग प्रथमशती के शिलालेखों में उपलब्ध होता है।

(घ) हरिवंश के एक श्लोक में शुंगब्राह्मण राज्य के संस्थापक पुष्यमित्रशुंग द्वारा यज्ञ का उल्लेख भविष्य में होनेवाली घटना के रूप में निर्दिष्ट किया गया है

उपात्तयज्ञो देवेसु ब्राह्मणेषुपपत्स्यते । ‘औद्भिज्जो भविता कश्चित् सेनानी: काश्यपो द्विजः । अश्वमेधं कलियुगे पुनः प्रत्याहरिष्यति । (हरिवंश 3 /2/39-40 )


  • यह तो प्रसिद्ध ही है कि ब्राह्मण सेनापति पुष्पमित्र ने दो बार अश्वमेघ यज्ञ किया थाजिनमें महाभाष्य के रचयिता पतञलि स्वयं ऋत्विक् रूप से उपस्थित थे। 'इह पुष्पमित्रं याजयाम:'-महाभाष्य । पुष्पमित्र ने लगभग 36 वर्षो तक राज्य किया (लगभग ईस्वी पूर्व 187-151) और आरम्भ में वे मौर्य सम्राट् के सेनापति था। इसी प्रसिद्ध सेनानी का निर्देश इस श्लोक में है। फलत: हरिवंश का रचनाकाल इससे पूर्व नहींतो इसके कुछ ही पश्चात् होना चाहिए। 

  • अतएव 'हरिवंशका निर्माण काल ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में मानना सर्वथा सुसंगत होगा 

  • हरिवंश का धार्मिक महत्व सर्वत्र प्रख्यात है । सन्तान के इच्छुक व्यक्तियों के लिये 'हरिवंशके विधिवत् श्रवण का विधान लोक प्रचलित है। शपथ खाने के लिए पुरूषों के हाथ पर हरिवंश की पोथी रखने का प्रचलन नेपाल में उसी प्रकार है जिस प्रकार किसी मुसलमान के हाथ पर कुरान रखने का . 

  • श्रीकृष्ण के चरित के तुलनात्मक अध्ययन के लिए हरिवंश के विष्णुपर्व का परिशीलन नितान्त आवश्यक है। प्राचीन भारत की ललित कलाओं के विषय में हरिवंश बहुत ही उपादेय सामग्री प्रस्तुत करता है। प्राचीन भारत में नाटक के अभिनय प्रकार की जानकारी के लिए यहाँ उपादेय तथ्यों का संकलन है। 
  • सबसे महत्वपूर्ण है हरिवंश में राजनैतिक इतिहास का वर्णनजो किसी भी प्राचीन पुराण के वर्णन से उपादेयता और प्रामाणिकता में किसी प्रकार न्यून नहीं है फलतः प्रथम शती में भारती संस्कृति की रूपरेखा जानने के लिए हरिवंशहमारा विश्वनीय मार्गदर्शक है।

हरिवंशपुराण- हरिवंश का स्वरूप, हरिवंश में तीन पर्व या खण्ड -

  • महाभारत के खिल पर्व होने के कारण हरिवंश की आलोचना अब प्रसंग प्राप्त है। हरिवंश में श्लोकों की संख्या सोलह हजार तीन सौ चौहत्तर (16, 374 श्लोक ) श्रीमद्भागवत की श्लोक संख्या से कुछ ही अधिक है।
  • डॉ० विन्टरनित्स के कथनानुसार यूनानी कवि होमर के दोनों महाकाव्यों 'इलियडऔर 'ओडिसीकी सम्मिलित संख्या से भी यह अधिक हैपरन्तु यह एक लेखक की रचना न होकर अनेक लेखकों के संयुक्त प्रयास का फल है। 
  • हरिवंश का अन्तिम पर्व (ग्रन्थ का तृतीय भाग) तो परिशिष्ट भूत हरिवंश का भी परिशिष्ट है और काल क्रम से सबसे पीछे का निर्मित भाग है। 

हरिवंश में तीन पर्व या खण्ड हैं

(क) हरिवंश पर्व

  •  कृष्ण के वंश वृष्णि-अन्धक की कथा विस्तार से दी गयी है और इस आदिम पर्व के वर्णन के अनन्तर राजा पृथु की कथा विस्तार से दी गयी है ।

  • सूर्यवंशीय राजाओं के प्रसंग में विश्वामित्र तथा वसिष्ठ का भी आख्यान वर्णित है। प्रसंग से पृथक् हटकर प्रेतकल्प ( अन्त्येष्टि एवं श्राद्ध) का वर्णन नौ अध्यायों में (अध्याय- 16-24) विस्तार से निबद्ध है और इसी के अन्तर्गत 21 वें अध्याय में पशुओं की बोली को समझने-बूझने वाले ब्रह्मदत्त की कथा दी गई है चन्द्रवंशीय राजाओं के वर्णन के अवसर पर राजा पुरूरवा और उर्वशी का प्रख्यान से समानता रखता है (अ0 26) । नहुषययाति तथा यदु के वर्णन के पश्चात् विष्णु की अनेक स्तुतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। जो एक प्रकार से कृष्ण के पूर्व दैवी इतिहास का परिचय देती हैं।


(ख) विष्णुपर्व -

  • यह समय ग्रन्थ का अतिशय विस्तृत तथा महनीय भाग है। इसमें कृष्णचन्द्र की विविध लीलाओं काविशेषत: बाललीलाओं का बड़ा ही सांगोपांग रूचिर विवरण है श्रीमद्भागवत के वर्णन से तुलना करने पर अनेक स्थल पर पार्थक्य दृष्टिगोचर होता है। कहीं-कहीं अन्य घटनायें भी दी गयी हैं। 

  • कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के जन्मशंबर द्वारा हरणसमुद्र से प्राप्ति तथा मायावती के साथ विवाह आदि प्रख्यात कथाओं का यहाँ उल्लेख हैपरन्तु असुरों के राजा वज्रनाभ की दुहिता प्रभावती के साथ प्रद्युम्न का विवाह और वह भी नितान्त नाटकीय ढंग से एकदम नूतन तथा पर्याप्तरूपेण रोचक है (150 अध्याय)। 

  • इसी प्रकार प्रख्यात रासलीला का हल्लीसक नृत्य के रूप में निर्देश किसी प्राचीन युग की स्मृति दिलाता है। इस पर्व के अन्त में अनिरूद्ध का विवाह बाणासुर की कन्या उषा के साथ बड़े उमंग और उत्साह से वर्णित है और इससे पूर्व 'हरि-हरात्मक स्तव' (अध्याय- 184) द्वारा शिव और विष्णु की एक ही अभिन्न देवता के रूप में सुन्दर स्तुति की गई है। इस पर्व में विषय की एकता और वर्णन की संगति से प्रतीत होता है कि प्राचीन युग में श्रीकृष्ण चरित काव्यके साथ यह अंश सम्बन्ध रखता हैपरन्तु तृतीय भाग के विषय में किसी एकता की कल्पना नहीं की जा सकती।

(ग) भाविष्यपर्व- 

  • यह भाग विविध वृत्तों का पौराणिक शैली में परस्पर असम्बद्ध संकलन है। इस पर्व का नामकरण प्रथम अध्याय के नाम पर हैजहाँ भविष्य में होने वाली घटनाओं का संकेत किया गया है। जनमेजय द्वारा विहित यज्ञों का वर्णन बड़े सुन्दर ढंग से किया गया है (अ) 191-196) । विष्णु के सूकरनृसिहं तथा वामन अवतारों के वर्णन के अनन्तर शिवपूजा तथा विष्णु पूजा के समन्वय की दिशा दिखाई गई है। शिव के दो उपासक हंस तथा डिम्भक की कथा विस्तार से हैजिन्हे कृष्ण ने पराजित किया था। महाभारत के माहात्म्य वर्णन के पश्चात् समग्र हरिवंश का ध्येय हरि की स्तुति में प्रदर्शित किया गया है-

आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।

हरिवंश का स्वरूप

एक ओर हरिवंश महाभारत का परिशिष्ट (खिल) माना जाता है और दूसरी ओर यह पुराणनाम से भी अभिहित होता है। इसके पोषक प्रमाणों की कमी नहीं है-

(1) महाभारत के आरम्भ में ग्रन्थ के समग्र पर्वो की संख्या एक सौ परिगणित है (आदि अ0 2) और इसके भीतर हरिवंश भी सम्मिलित किया गया है (आदि 2/82-83)। ध्यान देने की बात तो यह है कि हरिवंश 'खिलसंज्ञित पुराणकहा गया है। (हरिवंशसततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम्)। फलत: व्यास की दृष्टि में खिल और पुराण दोनों साथ-साथ होने में कोई वैषम्य नहीं है।

( 2 ) हरिवंश के 20 वें अध्याय में 'यथा ते कथितं पूर्व मया राजर्षिसत्तमके द्वारा याति के चरित की महाभारत में पूर्व स्थिति का स्पष्ट निर्देश है (आदिपर्व अ0 81-88)

(3) हरिवंश के 32 वें अध्याय में अदृश्यवाणी का कथन 'त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तलाके द्वारा महाभारत में शकुन्तलोपाख्यान की ओर स्पष्ट संकेत है तथा 54 अध्याय में कणिक मुनि महाभारत में कणिक मुनि की पूर्व स्थिति बतलाता है (आदिपर्व अ0 140 ) 


(4) हरिवंश का उपक्रम तथा उपसंहार बतलाता है कि हरिवंश महाभारत का ही परस्पर सम्बद्ध खिल पर्व है। उपक्रमाध्याय में भारती कथा सुनने के बाद वृष्णि अन्धक चरित सुनने की इच्छा शौनक ने सौति से जो प्रकट की वह दोनों के सम सम्बन्ध का सूचक है। हरिवंश के 132 वें अध्याय में महाभारत के कथाश्रवण का फल हैजिस कथन की संगति हरिवंश के महाभारत के अन्तर्गत मानने पर ही बैठ सकती हैअन्यथा नहीं ।

(5) बहिरंग प्रमाणों में आनन्दवर्धन का यह कथन साक्ष्य प्रस्तुत करता है कि महाभारत के अन्त में हरिवंश के वर्णन से समाप्ति करने वाले व्यासजी ने शान्तरस को ही ग्रन्थ का मुख्य रस व्यन्जना के द्वारा अभिव्यक्त किया है। '

फलत: हरिवंश महाभारत का 'खिलपर्व है। साथ ही साथ पञ्च लक्षण से समन्वित होने से यह 'पुराणनाम्ना भी अभिहित किया जाता हैपरन्तु न तो यह महापुराणों में अन्तर्भूत होता है और न उपपुराणों में दोनों से इसकी विशिष्टता पृथक् ही है।


गुजरात: द्वारका में 37000 अहीर महिलाओं के महारास ने रचा इतिहास अखिल भारतीय यादव समाज और अहिरानी महिला मंडल द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम विशाल नंदधाम परिसर में हुआ. सभा में न केवल भारत के विभिन्न हिस्सों से बल्कि दुनिया भर से प्रतिभागी शामिल थे. इस आयोजन में डेढ़ लाख से अधिक अहीर यादव समुदाय के सदस्यों ने भाग लिया.


गुजरात के द्वारका में 23-24 दिसंबर को आयोजित दो दिवसीय महा रास में 37,000 से अधिक महिलाएं एकत्र हुईं. पारंपरिक लाल पोशाक पहने महिलाओं ने भगवान कृष्ण की मूर्ति के चारों ओर घेरे में नृत्य किया. यह आयोजन बाणासुर की बेटी और भगवान कृष्ण की बहू उषा के रास की याद में आयोजित किया गया था.

महिलाओं को गीता पुस्तक के उपहार से सम्मानित किया गया
अखिल भारतीय यादव समाज और अहिरानी महिला मंडल द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम विशाल नंदधाम परिसर में हुआ. सभा में न केवल भारत के विभिन्नहिस्सों से बल्कि दुनिया भर से प्रतिभागी शामिल थे. इस आयोजन में डेढ़ लाख से अधिक अहीर यादव समुदाय के सदस्यों ने भाग लिया. प्रदर्शन के बाद, सभी 37,000 भाग लेने वाली महिलाओं को गीता पुस्तक के उपहार से सम्मानित किया गया.


यात्राधाम द्वारका में अखिल भारतीय अहिरानी महा रास में जामनगर सांसद पूनम बेन माडमने अपने पारपरिक ड्रेस के साथ रास गरबा किया. गुजरात भर से अदाजित 37 हजार से अधिक अहीर बहनों ने अपनी पारंपरिक पोशाक पहनकर कृष्ण भक्ति में लीन होकर कालिया ठाकोर की राजधानी द्वारका में रास गरबा का आयोजन किया.।


अनुवाद" 

उस समय नारद ने तो अपनी वीणा ग्रहण की जो छ: ग्रामों पर आधारित राग आदि के द्वारा चित्त को एकाग्र करने वाली थी  नरदेव ! स्वयं श्रीकृष्ण ने तो अपनी मुरली (वंशी) के घोष द्वारा # हल्लीसक- नृत्य का आयोजन किया।६८। सन्दर्भ:- हरिवंशपुराण-विष्णुपर्व /अध्याय-89/श्लोक-68 

"श्री कृष्ण और संकृष्ण( संकर्षण) दौंनो ही महापुरुष अपने युग के महान कृषि पद्धति के जन्मदाता थे। इनके छोटे भाई कृष्ण ने संगीत और कलाओं में महारत हासिल की और उसका यादव समाज में व्यापक प्रचार- प्रसार किया उस समय संगीत में स्वरों के स्वरग्राम (सरगम) के सन्धान के लिए वंशी -बाँस के वृक्ष से निर्माण कर कृष्ण ने बनायी और कृष्ण ने एक नवीन संगीत की सृष्टि की कृष्ण ने संगीत को जीवन का आधार और सृष्टि की आदि विद्या के रूप प्रतिपादित किया।'

आभीर जाति के नाम पर प्रचलित राग आभीर संगीत के क्षेत्र में अहीरों योगदान को परिलक्षित करता है। वेदों में ऋग्वेद के प्राचीन होने पर भी संगीत के वेद साम वेद को कृष्ण ने अपनी विभूति माना -

"वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासव: ।         इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।१०/२२। श्रीमद्भगवद्गीता- मैं वेदोमें सामवेद हूँ ? देवों में वासव हूँ और  इन्द्रियों में संकल्पविकल्पात्मक मन हूँ। सब भूतों- प्राणियोंमें चेतना हूँ। कार्यकरणके समुदायरूप शरीरमें सदा प्रकाशित रहनेवाली जो चिन्तन वृत्ति है ? उसका नाम चेतना है।

वास्तव में रास का प्रारम्भिक रूप हल्लीषक नृत्य है। हल्लीषक - नृत्य का आधार हल और ईषा-(ईसा) की आकृति बनाकर किया जाने वाला नृत्य ही है।

वस्तव में उत्सव जीवन की भागदौड़ में एक विश्राम स्थल ( पड़ाव) हैं जहाँ जीवन की भाग दौड़ से थका हुआ व्यक्ति कुछ समय के लिए सब चिन्ता- दु:खों को भूलकर विश्राम करता है।

कृष्ण का जन्म गोप - आभीर जाति में हुआ जो सनातन काल से गोपालक रही है। गो चारण काल में ही इन गोपों की आवश्यकता ने पशुओं के चारे घास आदि के  के लिए और स्वयं अपने भोजन के लिए भी कृषि विधि को जन्म दिया ।


जहाँ पशुपालक- अपना पड़ाव डालते थे  
धीरे धीरे उनके ये पड़ाव स्थाई होने लगे और 
ग्रामसभ्यता कै जन्म हुआ। 

जबकि नगर सभ्यता व्यापारिक अथवा वाणिज्यिक केन्द्र थे जिन्हे आज हम बाजारवाद कह सकते हैं। जहाँ वणिकों की बस्तियाँ होती थीं।


ग्रामीण जीवनका पालन करने वाले  गोपों की गोप ललनाऐं विशेष उत्सवों पर हल्लीसक नृत्य का आयोजन पुरुषों के सहयोग से करती थीं। और अनेक ऋतु सम्बन्धी रागों पर गीत गाती थीं। अहीरों ने संगीत को अनेक लौकिक अवदान दिये ।

मनुष्य जीवन पर्यन्त जिन व्यवहारों का नित्य. सम्पादन करता रहता है वह अपने उत्सवों में भी वही अभिनय समन्वित कर आनन्दित होता है। -

"ग्राम शब्द का मूल अर्थ - ग्रास या घास युक्त भूमि से है।

"यस्याश्वासः प्रदिशि यस्य गावो यस्य ग्रामा यस्य विश्वे रथासः।
यः सूर्यं य उषसं जजान यो अपां नेता स जनास इन्द्रः ॥७॥
ग्रसतेऽत्रेति ग्रामा = जहाँ ग्रास खाने के लिए मिले वह स्थान- ग्राम है। (ऋग्वेद २/१२/७)

(ग्रस्+ मन्)“ग्रसेरात्  उणादि मन् प्रत्यय।१।१४२। इतिमन्धातोराकारान्तादेशश्च।

हल्लीसक- शब्द पुराणों विशेषत: हरिवंश पुराण विष्णु पर्व अध्याय( 89 )में  वर्णित है।

हल -विलेखे भ्वादिगणीय परस्मैपदीय सकर्म सेट् धातु से  हलति अहालीत् आदि क्रिया रूप बनते हैं। हलः हालः-  हल्यते कृष्यतेऽनेन  इति हल्+ घञर्थे करणे (क) । लाङ्गल ( हल) अमरः कोश। कृषि शब्दे २१९८ पृ० दृश्यम् ।

हल वह यन्त्र जिससे कृषि कार्य किया जाए-

और ईषा -हलयुगयोर्मध्यमकाष्ठे (लाङ्गलदण्डे)वा हल के मध्य में लकड़ी का दण्ड - हल और ईषा इन दोनों शब्दों से तद्धित शब्द बनता है। हल्लीषा- हल्लीषक

हल्लीषा- एक नृत्य जो हल और उसके ईषा ( दण्ड) के समानांतर दृश्य में आकृति बनाकर किया मण्डलाकार विधि से किया जाता था।

वैसे कृष्ण और संकर्षण शब्द कृषकों के विशेषण हैं। गोपों में जन्म लेने वाले ये दौंनों महानायक कृषि पद्धति के जनक भी थे कृषि करने के लिए हल तथा उस धान्य को पीट कर अन्न पृथक करने के लिए मूसल- का आविष्कार भी कृष्ण के बड़े भाई संकर्षण के द्वारा ही किया गया था। 

इनकी लोक संस्कृति में भी यही आविष्कार प्रदर्शित थे उनका सांस्कृतिक नृत्य हल्लीषम्- हल और ईषा की आकृति बनाकर किया जाने वाला नृत्य ही था ।

जिसे पुराणकारों ने श्रृँगार रस में डुबोकर रास के नाम से काव्यात्मक रूप में वर्णन किया है।संकर्षण कि हलधर विशेषण भी उनके कृषक होने का प्रमाण है।

हलधर= हलं धरति आयुधत्वं कृषिसाधनत्व वा धृ +अच् ।  बलराम  कृषक उदाहरण “उन्मूलिता हलधरेण पदावधतैः” उद्भटः ।

इन गोपों कि हल्लीषम् नृत्य (हल्लीश, हल्लीष)= 

नाट्यशास्त्र में वर्णित अठारह उपरूपकों में से एक के रूप में मान्य है।

विशेष—इसमें एक ही अंक होता है और नृत्य की प्रधानता रहती है। 

इसमें एक पुरुष पात्र और सात, आठ या दस स्त्रियाँ पात्री होती हैं  जिसे मंडल बाँधकर  जिसमें एक पुरुष के आदेश पर कई स्त्रियाँ नाचती हैं। साहित्यदर्पण(। ६ । ५५५ । )  में इसका लक्षण 

हल्लीष एव एकाङ्कः सप्ताष्टौ दश वा स्त्रियः। वागुदात्तैकपुरुषः कैशिकीवृत्तसङ्कुलः। मुखान्तिमौ तथा सन्धी बहुताललयस्थितिः॥

विशेष—पौराणिक परम्परा  इस क्रीड़ा का आरंभ कृष्ण द्वारा  कभी मार्गशीर्ष की पूर्णिमा  को तो कभी  कार्तिकी पूर्णिमा को आधी रात के समय को मानती है।

तब से गोप लोग यह क्रीड़ा करने लगे थे। पीछे से इस क्रीड़ा के साथ कई प्रकार के पूजन आदि मिल गए और यह मोक्षप्रद मानी जाने लगी। इस अर्थ में यह शब्द प्रायः स्त्रीलिंग जाता है। जैसे  हल्लीषा-

इसमें लास्य नृत्य ( स्त्री नृत्य) की प्रधानता ही होती है इसी लिए इसे रास्य( लास्य) भी कहा जने  लगा।

भारतीय संस्कृति में प्रेम की उदात्त अभिव्यक्ति होती थी। कृष्ण की रासलीला इसका प्रतीक है।

भक्तिकाव्य में रासलीला शब्द का खूब प्रयोग हुआ है। दरअसल रास एक कलाविधा है।

प्रेम और आनंद की उत्कट अभिव्यक्ति के लिए कृष्ण की उदात्त प्रेमलीलाओं का भावाभिनय ही रासलीला कहलाता है।

मूलतः यह एक नृत्य है जिसमें कृष्ण को केंद्र में रख गोपियां उनकी परिधि में मुरली की धुन पर थिरकती अथवा हल और ईषा की आकृति मैं वृत्ताकार नर्तन करती हैं। 

अष्टछाप के भक्तकवियों नें प्रेमाभिव्यक्ति करने वाले अनेक रासगीतों की रचना की है।

रास में आध्यात्मिकता भी है जिसमें गोपियों का कृष्ण के प्रति अनुराग व्यक्त होता है।

वे वृत्ताकार मंडल में प्रेमाभिव्यक्ति करती हैं। जिसे भविष्य पुराण  कारो ने हल्लीषम् अवश्य कहा-

रासक्रीड़ायाञ्च तल्लक्षणं यथा “पृथुं सुवृत्तं मसृणं वितस्तिमात्रोन्नतं कौ विनिखन्य शङ्कुकम् ।

आक्रम्य पद्भ्यामितरेतरन्तु हस्तैर्भ्रमोऽयं खलु रासगोष्ठी” हरिवंश पुराण टीका नीलकण्ठः शास्त्री।

संस्कृत में हल्लीषक का विश्लेषण-

एक विद्वान डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल मत है  कि हल्लीसं शब्द ़यूनानी इलिशियन- नृत्यों (इलीशियन मिस्ट्री डांस) से विकसित है। इसका विकास ईस्वी सन्  के आसपास माना जाता है। 

सन्दर्भ- हर्षचरित एक सांस्कृतिक अध्ययन-पृष्ठ संख्या 33-

वास्तव में हल्लीषम् और इलिशियन दौंनो शब्द पृथक पृथक है।

विशेषण को तौर पर  एलिसियन शब्द एक आनंदमय स्थिति का वर्णन करता है, जैसा कि अधिकांश लोग हवाई छुट्टियों पर आनंद लेने की उम्मीद करते हैं। एलीसियन शब्द एलीसियन फील्ड्स नामक रमणीय यूनानी पौराणिक स्थान से आया है।  हालाँकि अब इस शब्द को अक्सर स्वर्ग के साथ समझा जाता है, ग्रीक एलीसियन फील्ड्स वासतव में  मृत्यु के बाद के जीवन में जाने के लिए एक स्वर्गीय विश्राम स्थल था।

 संभवतः इस अवधारणा की कल्पना मूल रूप से युद्ध के दौरान सैनिकों में वीरता को प्रोत्साहित करने के लिए की गई थी। 

आजकल, लोग किसी भी स्वर्गीय दृश्य का वर्णन करने के लिए एलिसियन का उपयोग करते हैं -

एलीसियन- 1590 के दशक, लैटिन एलीसियम से, ग्रीक एलीसियन (पेडियन) से "एलिसियन क्षेत्र", मृत्यु के बाद धन्य लोगों का निवास, जहां नायक और गुणी निवास करते हैं, जो अज्ञात मूल का है, शायद प्री-ग्रीक (एक गैर-आईई सब्सट्रेट भूमध्यसागरीय भाषा) से ). इसका उपयोग पूर्ण प्रसन्नता की स्थिति के लाक्षणिक रूप में भी किया जाता है।

    यह क्रिया, लैटिन के साथ (ludus)"एक खेल, खेलो, ये सम्बन्धित है।"  PIE आद्य भारोपीय  रूट -*leid-या*loid- से सम्बंधित है जिसका अर्थ"खेलना,"  मृगतृष्णा

    लैटिन (illusio) से ही  फ्रांसीसी में विकसित (illusion) भ्रम का वाचक है। 

    इस इल्युशन शब्द के मोह माया  जादू आदि अन्य अर्थ भी प्रचलित हैं। देखा जाय तो संस्कृत में भी 

      मध्यकाल में इसमें जो आध्यात्मिकता थी वह धीरे धीरे गायब होती गई और विशुद्ध मनोरंजन शैलियों वाली गिरावट इस भक्ति और अध्यात्म को अभिव्यक्त करनेवाली विशिष्ट विधा में भी समा गई। वैसे आज भी बृज की रास मण्डलियां प्रसिद्ध हैं।

      कथक से भी रास को जोड़ा जाता है किन्तु कथक की पहचान जहां एकल प्रस्तुति में मुखर होती है वहीं रास सामूहिक प्रस्तुति है। 

      अलबत्ता रास शैली का प्रयोग कथक और मणिपुरी जैसी शास्त्रीय नृत्यशैलियों में हुआ है। इसके अलावा गुजरात का जग प्रसिद्ध डांडिया नृत्य रास के नाम से ही जाना जाता है। रास का मुहावरेदार प्रयोग भी बोलचाल की भाषा में खूब होता है। रास रचाना यानी स्त्री-पुरुष में आपसी मेल-जोल बढ़ना। रास-रंग यानी ऐश्वर्य और आमोद-प्रमोद में लीन रहना।

      रास शब्द रास् धातु से आ रहा है जिसमें किलकना, किलोल, शोरगुल का भाव है।

      इससे बना है रासः जिसमें होहल्ला, किलोल सहित एक ऐसे मण्डलाकार नृत्य का भाव है जिसे कृष्ण और गोपियां करते थे। 

      इससे ही बना है रासकम् शब्द जिसका अर्थ नृत्यनाटिका है। कुछ कोशों में इसका अर्थ हास्यनाटक भी कहा गया है। 

      दरअसल रासलीला जब कला विधा में विकसित हो गई तो वह सिर्फ नृत्य न रहकर नृत्यनाटिका के रूप में सामने आई।

      इसलिए रासकम् को सिर्फ हास्यनाटक कहना उचित नहीं है। मूलतः रास् से बने रासकम् का ही रूप मध्यकालीन साहित्य की एक विधा रासक के रूप में सामने आया। 

      नाटक के तत्वों में हास्य भी प्रमुख है।  रासलीला में हंसोड़पात्र भी आते हैं जो प्रायः रासधारी गोप होते हैं।

      रासक को एकतरह से जीवन चरित कहना उचित होगा जैसे पृथ्वीराज रासो या बीसलदेवरासो आदि जो वीरगाथा साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ हैं।

      विद्वानों का मानना है कि रास शब्द का रिश्ता संस्कृत के लास्य से भी है जिसमें भी नृत्याभिनय और क्रीड़ा का भाव है। र औ ल एक ही वर्णक्रम में आते हैं।  लास्य का ही प्राकृत रूप रास्स होता है। 

       कतिपय विद्वानों का मानना है कि श्रीकृष्ण के समय रास शब्द प्रचलित नहीं था। वे नृत्य की परिपाटी और श्रीकृष्ण के कलाप्रेम को खारिज नहीं करते हैं। कृष्णचरित से कलाओं को अलग किया ही नहीं जा सकता। मुरलीमनोहर और गोप-गोपियों के मेल ने भारतीय संस्कृति को विविध कलाएं दी हैं। गुप्तकालीन रचना रास पंचाध्यायी से मण्डलाकार नृत्य के लिए रास शब्द का प्रचलन बढ़ा है। निश्चित ही रास ब्रज क्षेत्र का पारम्परिक लोकनृत्य रहा है। 

      lascivious  adj.)

      mid-15c., "lustful, inclined to lust," कामुक, वासना की ओर प्रवृत्त,"


      from Medieval Latin lasciviosus (used in a scolding sense by Isidore and other early Church writers),

      मध्यकालीन लैटिन लास्किविओसस से (इसिडोर और अन्य प्रारंभिक चर्च लेखकों द्वारा डांट के अर्थ में प्रयुक्त),

      from Latin lascivia "lewdness, playfulness, fun, frolicsomeness, jolity," from lascivus "lewd, playful, undesigned, frolicsome, wanton."


      लैटिन लास्किविया से "भद्दापन, चंचलता, मौज-मस्ती, उल्लास, उल्लास," लास्किवस से "भद्दा, चंचल, असंयमित, उल्लासपूर्ण, प्रचंड।"

      __________    

      This is from PIE *las-ko-, from the root *las- "to be eager, wanton, or unruly" यह PIE से है *लास-को-, मूल से *लास-"उत्सुक, प्रचंड, या अनियंत्रित होना"

      हल्लीशक महाभारत में वर्णित एक नृत्यशैली है। इसका एकमात्र विस्तृत वर्णन महाभारत के खिल्ल भाग हरिवंश (विष्णु पर्व, अध्याय 20) में मिलता है। 

      विद्वानों ने इसे रास का पूर्वज माना है साथ ही रासक्रीड़ा का पर्याय भी। आचार्य नीलकंठ ने टीका करते हुए लिखा है - 'हस्लीश क्रेडर्न एकस्य पुंसो बहुभि: स्त्रीभि: क्रीडन सैव रासकीड़'। (हरि. 2.20.36) 'हल्लीशक' का शाब्दिक अर्थ है - 'हल का ईषा- हत्था'।

      यह नृत्य स्त्रियों का है जिसमें एक ही पुरुष श्रीकृष्ण होता है। यह दो दो गोपिकाओं द्वारा मंडलाकार बना तथा श्रीकृष्ण को मध्य में रख संपादित किया जाता है। हरिवंश के अनुसार श्रीकृष्ण वंशी, अर्जुन मृदंग, तथा अन्य अप्सराएँ अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र बजाते हैं।

      इसमें अभिनय के लिए रंभा, हेमा, मिश्रकेशी, तिलोत्तमा, मेनका, आदि अप्सराएँ प्रस्तुत होती हैं। सामूहिक नृत्य, सहगान आदि से मंडित यह कोमल नृत्य श्रीकृष्णलीलाओं के गान से पूर्णता पाता है। इसका वर्णन अन्य किसी पुराण में नहीं आता। 

      भासकृत बालचरित्‌ में हल्लीशक का उल्लेख है।अन्यत्र संकेत नहीं मिलता।

      शूरसेन या मथुरा मंडल जिसमें श्रीकृष्ण के लीला स्थल विशेष रुप से सम्मिलित है, भक्तिकाल में ब्रज प्रदेश के रुप में प्रसिद्ध हुआ। पुराणकाल में यह क्षेत्र मथुरा मंडल तथा विभिन्न ग्रंथों में शूरसेन जनपद के रुप में विख्यात रहा था। वर्तमान ब्रज क्षेत्र पर यदि ऐतिहासिक संदर्भ में विचार किया जाए तो यह क्षेत्र भी कभी एक सुरम्य वन प्रदेश था, जहाँ प्रमुख रुप से आभीर निवास करते थे। मथुरा राज्य के आदि संस्थापक मधु ने हरिवंश पुराण में स्वयं कहा है कि मेरे राज्य में चारों ओर आभीरों की बस्ती है।

      इतिहास से यह स्पष्ट हो जाता है कि आभीर जाति देव संस्कृति के अनुयायियों से इतर थी और उनकी संस्कृति बहुत समृद्ध थी तथा देव संस्कृति  से उसमें काफी असमानता थी। आभीरों में स्त्री-स्वातंत्र्य देवसंसकृति   की अपेक्षा अधिक था, वे नृत्य-गान में परम प्रवीण और केशो की दो वेणी धारण करने वाली थीं। 'हल्लीश' या 'हल्लीसक नृत्य' इन आभीरों की सामाजिक नृत्य था, जिसमें आभीर नारियाँ अपनी रुचि के किसी भी गोप पुरुष के साथ समूह बनाकर मंडलाकार नाचती थीं।  हरिवंश पुराण के हल्लीसक-क्रीड़न अध्याय में उल्लेख है- कृष्ण की इंद्र पर विजय के उपरांत आभीर रमणियों ने उनके साथ नृत्य करने का प्रस्ताव किया। भाई या पति व अन्य आभीरों के रोकने पर भी वे नहीं रुकीं और कृष्ण को खोजने लगीं-

        - हरिवंश, हल्लीसक-क्रीड़न अध्याय, श्लोक २४

        आभीर समाज में प्रचलित यह हल्लीसक मंडलाकार नृत्य था, जिसमें एक नायक के साथ अनेक नायिकाएँ नृत्य करती थीं। नृत्य में श्रृंगार-भावना का प्राधान्य था। नृत्य का स्वरुप स्पष्ट करते हुए नाट्यशास्र का टीका में अभिनव गुप्त ने कहा है-

        मण्डले च यत स्रीणां, नृत्यं हल्लीसकंतु तत्। नेता तत्र भवदेको, गोपस्रीणां यथा हरि:।।

        इसी नृत्य को श्री कृष्ण ने अपनी कला से सजाया तब वह रास के नाम से सर्वत्र प्रसिद्ध हुआ। इस नृत्य को सुकरता व नागरता प्रदान करने के कारण ही आज तक श्रीकृष्ण 'नटनागर' की उपाधि से विभूषित किए जाते हैं।

         द्वारका के राज दरबार में प्रतिष्ठित हो जाने के उपरान्त द्वारका आकर उषा ने इस नृत्य में मधुर भाव-भंगिमाओं को विशेष रुप से जोड़ा व इसे स्री-समाज को सिखाया और देश देशांतरों में इसे लोकप्रिय बनाया। सारंगदेव ने अपने 'संगीत-रत्नाकर' में इस तथ्य की पुष्टि की है। वह लिखते है-

        पार्वतीत्वनु शास्रिस्म, लास्यं वाणात्मामुवाम्। तथा द्वारावती गोप्यस्तामि सोराष्योषित:।।७।। तामिस्तु शिक्षितानार्यो नाना जनपदास्पदा:। एवं परम्यराप्राहामेतलोके प्रतिष्ठितम्।।८।।

        इस प्रकार रास की परम्परा ब्रज में जन्मी तथा द्वारका से यह पूरे देश में फैली। जैन धर्म में रास की विशेष रुप से प्रचार हुआ और उसे मन्दिरों में भी किया जाने लगा, क्योंकि जैनियों के २३वे तीर्थकर भगवान नेमिनाथ भी द्वारका के ही आभीर यदुवंशी थे। उन्हें प्रसन्न करने का रास किया जा सकता है

        आभीर समाज में प्रचलित यह हल्लीसक मंडलाकार नृत्य था, जिसमें एक नायक के साथ अनेक नायिकाएँ नृत्य करती थीं। नृत्य में श्रृंगार-भावना का प्राधान्य था परन्तु कामुकता नही थी । 

        ब्रज का रास भारत के प्राचीनतम नृत्यों में अग्रगण्य है। अत: भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्र में रास को रासक नाम से उप-रुपकों में रखकर इसके तीन रुपों का उल्लेख किया है-

        १- मंडल रासक, २-ताल रासक,३- दंडक रासक या लकुट रासक। 

        देश में आज जितने भी नृत्य रुप विद्यमान हैं, उन परत्र रास का प्रभाव किसी-न-किसी रुप में पड़ा है।

         गुजरात का 'गरबा', राजस्थान का 'डांडिया' आदि नृत्य, मणिपुर का रास-नृत्य तथा संत ज्ञानदेव के द्वारा स्थापित 'अंकिया नाट' तो पूरी तरह रास से ही प्रभावित नृत्य व नाट्य रुप है।


        यह हल्लीसक एक प्रकार का वादन – गान के साथ लोकनृत्य था । यही रास का प्रारम्भिक रूप था । छालिक्य एक समूह गीत था , जिसके अन्तर्गत विभिन्न वाद्यों का वादन एवं नृत्य होता था । विष्णु पर्व के अनुसार इसको विभिन्न ग्रामरागों के अन्तर्गत विविध स्थान तथा मूर्च्छनाओं के साथ गाया जाता था ।

         यह गान शैली अत्यन्त कठिन थी ।


        "आधुनिक विद्वानों का मत हैं, 'रास' शब्द कृष्ण-काल में प्रचलित नहीं था ; उसका प्रचलन बहुत बाद में हुआ। 'रास' शब्द के सर्वाधिक प्रचार का श्रेय श्रीमद्भागवत की 'रास-पंचाध्यायी' को है, जिसकी रचना गुप्त काल से पहिले की नहीं मानी जाती है। 

        कुछ विद्वान 'रास' का पूर्व रूप 'हल्लीसक' मानते है। 'रास' और 'हल्लीसक' पृथक्-पृथक् परंपराएँ थी। जो बाद में एक-दूसरे से संबंद्ध हो गई थीं। 

        इस प्रकार श्रीकृष्ण के नृत्य-नाट्य का आरंभिक नाम 'हल्लीसक'  था। उसके लिए सदा से 'रास' शब्द ही लोक में प्रचलित नहीं रहा है। ऐसा ज्ञात होता है 'रास' की पहिले मौखिक परंपरा थी, जो प्रचुर काल तक विद्यमान रही थी। उसी मौखिक और लोक प्रचलित शब्द को 'भागवत' कार ने साहित्य में अमर-कर दिया था।

        कृष्णोत्तर काल से मौर्य-पूर्व काल तक की स्थिति

        विषय सूची

        १-नृत्य एवं नाट्य कलाएँ / Dance and Drama

        २-कृष्णोत्तर काल से मौर्य-पूर्व काल तक की स्थिति

        ३-नृत्यनाट्य का महान ग्रंथ 'नाट्य शास्त्र'

        ४-नाट्य मंडप

        श्रीकृष्ण द्वारा प्रचलित तथाकथित 'रास' आरंभ में ब्रज का एक लोक-नृत्य अथवा लोक नृत्य-नाट्य था, जो पुरातन ब्रजवासियों के मनोविनोद का साधन था। जब कृष्णोपासना का प्रचार हुआ, तब 'रास' को भी धार्मिक महत्व प्राप्त हो गया था।

         उस समय लोक के साथ धर्म के क्षेत्र में भी रास का प्रवेश हो गया था। कृष्णोपासक भागवत एवं पौराणिक हिंदू धर्मो ने 'रास' की धार्मिक महत्व को स्वीकार किया था, और श्रीमद्भागवत ने उसके गौरव को बढ़ाया था।

        प्राचीन ब्रज में बुद्ध एवं महावीर द्वारा प्रवर्तित बौद्ध तथा जैन धर्मो का प्रचार हुआ, तब भागवत एवं पौराणिक हिंदू धर्मों का प्रभाव कुछ कम हो गया था। 

        फलत: कृष्णोपासना तथा 'रास' के धार्मिक महत्व में भी कमी आ गई थी। उसका एक बड़ा कारण यह था कि बौद्ध और जैन धर्म वैराग्य एंव निवृत्ति प्रधान थे; जिनकी धार्मिक मान्यता में कृष्णोपासना एवं 'रास' के लिए कोई समुचित स्थान नहीं था। 

        बौद्ध-जैन धर्मों को कुछ समय पश्चात ही अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना पड़ा था। तब उनके द्वारा नृत्य-नाट्य के धार्मिक स्वरूप को प्रश्रय प्रदान किया गया। उस परिवर्तन का प्रभाव प्राचीन ब्रज में दिखलाई देने लगा था। फलत: पौराणिक हिंदू धर्मों के मंदिर-देवालयों की भाँति बौद्ध-जैन धर्मो के उपासनालयों एवं पूजा-गृहों में भी नृत्य-नाट्य को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया। इसका प्रमाण तत्कालीन साहित्यिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थापत्य की कलाकृतियों में मिलता है। जहाँ तक 'रास' का संबंध हैं, उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है। कुछ कलाकृतियों में उसके रूप का आभास होता है।

        नृत्य अहीरों में पहले से  रहा है। उर्वशी का नाम एक खूबसूरत नर्तकी के रूप में लिया जाता था और उस युग में नर्तकियों को अप्सरा कहा जाता था। । पुरुरवा और उर्वशी नाम इतिहास में शामिल करते समय इन दोनों के माता पिताओं का नाम अहीर जाति से सम्बन्धित है।,

        तथा उर्वशी भगवान  कृष्ण की विभूति हैं।  पुरुरवा गोप और उर्वशी अहीर का नाम इतिहास में जुड़ा तो बहुत बड़ी महाक्रान्ति होगी।

        जितने अपने को चन्द्र वंशी ,सोमवंशी यदुवंशी कुरुवंशी राजपूत क्षत्रिय कहते हैं। वह सब अहीरों से सम्बन्धित शाखाएं हैं। 

        यादवों का प्राचीन काल से ही गायन वादन और नृत्य अर्थात संगीत विधा पर पूर्ण स्वामित्व रहा है।

        "हल्लिशम नृत्य और आभीर राग अहीरों की मौलिक संगीत सर्जना का प्रमाण है।

        भगवान कृष्ण का  जन्म व बाल्यकाल आभीर जाति में हुआ था। आभीरों की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति थी, जिसमें पूर्ण नारी- स्वातंत्रय तो था ही, साथ ही वे राग- रंग के भी बड़े प्रेमी थे। उनका लोकनृत्य हल्लीश या हल्लीसक सर्वविख्यात रहा है, जिसका वर्णन अनेक लक्षण ग्रंथों में भी मिल जाता है --

        "मण्डलेन तु यत्स्त्रीणां नृत्यं हल्लीसकं तु तत् । तत्र नेता भवेदेको गोपस्त्रीणां हरिर्यथा ।। २.१५६।

        सरस्वतीकण्ठाभरणम्  /परिच्छेदः (२)सरस्वतीकण्ठाभरणम्

        परिच्छेदः २

                       भोजराजः

        यदाङ्गिकैकनिर्वर्त्यमुज्झितं वाचिकादिभिः ।       

        नर्तकैरभिधीयेत प्रेक्षणाक्ष्वेडिकादि तत्।२.१४२।

        तल्लास्यं ताण्डवं चैव छलिकं संपया सह ।हल्लीसकं च रासं च षट्‌प्रकारं प्रचक्षते ।२.१४३।

        ____________________

        मण्डलेन तु यत्स्त्रीणां नृत्यं हल्लीसकं तु तत् ।तत्र नेता भवेदेको गोपस्त्रीणां हरिर्यथा ।। २.१५६ ।। (२.१४४)

        अर्थ-

        मण्डल ( घेरा) में जो गोपस्त्रीयों का नृत्य होता है वह हल्लीसक  कहलाता है ।उसमें एक गोप सभी गोप- स्त्रीयों का नेतृत्व करने वाला होता है जैसे भगवान कृष्ण होते हैं ।


        "अङ्गवाक्सत्वजाहार्यः सामान्यश्चित्र इत्यमी ।       षट् चित्राभिनयास्तद्वदभिनेयं वचो विदुः ।। २.१५७ ।। (२.१४५)


        चतस्त्रो विंशतिश्चैताः शब्दालङ्कारजातयः ।शब्दसन्दर्भमात्रेण हृदयं हर्तुमीशते ।। २.१५८ ।। (२.१४६)

        ____________________

        इति श्रीराजाधिराज भोजदेवेन विरचिते सरस्वतीकण्ठाभरण नाम्नि अलङ्कारशास्त्रेऽलङ्कारनिरूपणं नाम द्वितीयः परिच्छेदः ।

        नाट्यशास्त्र में भी वर्णित अठारह उपरूपकों में से एक के सन्दर्भ में हल्लीसक नृत्य या विवेचन है ।

        विशेष—इसमें एक ही अंक होता है और नृत्य की प्रधानता रहती है। 

        इसमें एक पुरुष पात्र और सात, आठ या दस स्त्रियाँ पात्री होती हैं। 

        यह गोप संस्कृति का प्राचीन नृत्य है जो उत्सव विशेष पर किया जाता था।

        मंडल बाँधकर होनेवाला एक प्रकार का नाच जिसमें एक पुरुष के आदेश पर कई स्त्रियाँ नाचती हैं।

        इसी को नीमान्तरण से लास्य: तो कहीं रास्य या रास भी कहा जाने लगा।


        यह हल्लीसक नृत्य एक मंडलाकार नृत्य था, जिसमें नायिका अनेक किंतु नायक एक ही होता था। इस नृत्य के लिए आभीर स्त्रियाँ उस पराक्रमी पुरुष को अपने साथ नृत्य के लिए आमंत्रित करती थीं, तो अतुलित पराक्रम प्रदर्शित करता था। हरिवंश पुराण के अनुसार आभीर नारियों ने श्री कृष्ण को इस नृत्य के लिए उस समय आमंत्रित किया था, जब इंद्र- विजय के उपरांत वह महापराक्रमी वीर पुरुष के रुप में प्रतिष्ठित हुए थे।

        इन्द्र- विजय के उपरान्त आभीर नारियों के साथ श्री कृष्ण के इस नृत्य का विस्तृत वर्णन हरिवंश पुराण के हल्लीसक क्रीड़न अध्याय में हुआ है। 

        इसी हल्लीसक नृत्य को श्रीकृष्ण ने अपनी कलात्मकता से संवार कर जो रुप दिया, वही बाद में रास के नाम से विकसित होकर "रसो वै सः' के रुप में प्रतिष्ठित हुआ।

        भगवान कृष्ण के द्वारकाधीश चले जाने पर यह नृत्य कृष्णकाल में द्वारका के यदुवंशियों 

        का राष्ट्रीय नृत्य बन गया था। इस नृत्योत्सव का विस्तृत वर्णन हरिवंश पुराण के "छालिक्य संगीत' अध्याय में उपलब्ध है। शारदातनय का कथन है कि द्वारका में रास के विकास में श्री कृष्ण की पौत्रवधू अनिरुद्ध- पत्नी उषा का बड़ा योगदान था, जो स्वयं नृत्य में पारंगत थी। यह पार्वतीजी की शिष्या थी, जिसने उनसे लास्य- नृत्य की शिक्षा ग्रहण की थी। उसने द्वारका के नारी- समाज को विशेष रुप से रास- नृत्य मं प्रशिक्षित किया था। 


        द्वारका पहुँचने पर यह रास- नृत्य नाटिकाओं का रुप ले चुका था। जिसमें श्री कृष्ण व बलराम की जीवन की प्रमुख घटनाओं का प्रदर्शन होता था।


        भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्र में लोकधर्मी उपरुपकों के अंतर्गत रास के "रासक' और "नाट्य रासक' दो रुपों का उल्लेख किया है। इससे प्रतीत होता है कि उस काल में रास के दो रुप अलग- अलग विकसित हो गए थे। "नाट्य रासक' जहाँ नाट्योन्मुख नृत्य- संगीत का प्रतिनिधि था, वहाँ इसका शुद्ध नृत्य रुप "रासक' था। "रासक' के भरतमुनि ने भेद किए हैं --

        १. मण्डल रासक 

        २. लकुट रासक तथा 

        ३. ताल रासक। 

        मण्डलाकार नृत्य मंडल रासक, हाथों से दंडा बजाकर नृत्य करना लकुट रासक या दंड रासक और हाथों से ताल देकर समूह में नृत्य करना संभवतः ताल रासक था। यह रासक परंपरा बाद में विभिन्न रुपों में विभिन्न धर्मों और संप्रदायों में विकसित हुई ( जिसका परिचय यहाँ देना संभव नहीं है ) बाद में जैन धर्म में ही रासक परम्परा बाद बहुत लोकप्रिय हुई, क्योंकि श्रीकृष्ण के चचेरे भाई श्री नेमिनाथजी को जैन धर्म ने अपना २३ वाँ तीर्थंकर स्वीकार कर लिया था। जिन्हें प्रसन्न करने के लिए जैन मंदिरों में भी रास उपासना का अंग बन गया। 

        कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्णकाल से प्रारम्भ होकर रास की प्राचीन परम्परा विभिन्न उतार- चढ़ावों के मध्य १५ वीं शताब्दी के अन्त तक या १६ वीं शताब्दी के प्रारंभ तक आभीर जाति में रही , जबकि वर्तमान रास का पुनर्गठन हुआ, निरन्तर किसी न किसी रुप में विद्यमान रही और उसी के वर्तमान रास- मञ्च उद्भूत हुआ। 

        इस प्रकार रास भारत का वह मंच है जो कृष्णकाल से आज तक निरंतर जीवित- जाग्रत रहा है।

        भारत में दूसरा कोई ऐसा मंच नहीं जो इतना दीर्घजीवी हुआ हो। इसी के रास की लोकप्रियता और महत्ता स्पष्ट है।

        अहीर भैरव एक लोकप्रिय राग है जिसमें कोमल ऋषभ और कोमल निषाद के स्वरों का संयोजन होता है। 

          (हरिवंशपुराण विष्णु पर्व-अध्याय-89)  →

        बलरामश्रीकृष्णादीनां यादवानां जलक्रीडा एवं गानादिकानां वर्णनम्-एकोननवतितमोऽध्यायः

                       "वैशम्पायन उवाच रेमे बलश्चन्दनपङ्कदिग्धः कादम्बरीपानकलः पृथुश्रीः। रक्तेक्षणो रेवतिमाश्रयित्वा प्रलम्बबाहुर्ललितप्रयातः ।।१।।

        नीलाम्बुदाभे वसने वसानश्चन्द्रांशुगौरो मदिराविलाक्षः । रराज रामोऽम्बुदमध्यमेत्य सम्पूर्णबिम्बो भगवानिवेन्दुः ।। २ ।। वामैककर्णामलकुण्डलश्रीः स्मेरं मनोज्ञाब्जकृतावतंसः । तिर्यक्कटाक्षं प्रियया मुमोद रामः सुखं चार्वभिवीक्ष्यमाणः ।। ३ ।। अथाज्ञया कंसनिकुम्भशत्रोरुदाररूपोऽप्सरसां गणः सः । द्रष्टुं मुदा रेवतिमाजगाम वेलालयं स्वर्गसमानमृद्ध्या ।। ४ ।। तां रेवतीं चाप्यथ वापि रामं सर्वा नमस्कृत्य वराङ्गयष्ट्यः । वाद्यानुरूपं ननृतुः सुगात्र्यः समन्ततोऽन्या जगिरे च सम्यक्।। ५ ।। चकुस्तथैवाभिनयेन रङ्गं यथावदेषां प्रियमर्थयुक्तम् । हद्यानुकूलं च बलस्य तस्य तथाज्ञया रेवतराजपुत्र्याः ।। ६ ।। चक्रुर्हसन्त्यश्च तथैव रासं तद्देशभाषाकृतिवेषयुक्ताः । सहस्ततालं ललितं सलीलं वराङ्गना मङ्गलसम्भृताङ्ग्यः ।। ७ ।। संकर्षणाधोक्षजनन्दनानि संकीर्तयन्त्योऽथ च मङ्गलानि । कंसप्रलम्बादिवधं च रम्यं चाणूरघातं च तथैव रङ्गे ।। ८ ।। यशोदया च प्रथितं यशोऽथ दामोदरत्वं च जनार्दनस्य । वधं तथारिष्टकधेनुकाभ्यां व्रजे च वासं शकुनीवधं च ।। ९ तथा च भग्नौ यमलार्जुनौ तौ सृष्टिं वृकाणामपि वत्सयुक्ताम् । स कालियो नागपतिर्ह्रदे च कृष्णेन दान्तश्च यथा दुरात्मा ।। 2.89.१० ।। शङ्खहृदादुद्धरणं च वीर पद्मोत्पलानां मधुसूदनेन । गोवर्द्धनोऽर्थे च गवां धृतोऽभूद् यथा च कृष्णेन जनार्दनेन ।। ११ ।। कुब्जां यथा गन्धकपीषिकां च कुब्जत्वहीनां कृतवांश्च कृष्णः । अवामनं वामनकं च चक्रे कृष्णो यथाऽऽत्मानमजोऽप्यनिन्द्यः।।१२। सौभप्रमाथं च हलायुधत्वं वधं मुरस्याप्यथ देवशत्रोः । गान्धारकन्यावहने नृपाणां रथे तथा योजनमूर्जितानाम् ।। १३ । ततः सुभद्राहरणे जयं च युद्धे च बालाहकजम्बुमाले । रत्नप्रवेकं च युधाजितैर्यत् समाहृतं शक्रसमक्षमासीत् ।।१४।। एतानि चान्यानि च चारुरूपा जगुः स्त्रियः प्रीतिकराणि राजन् । सङ्कर्षणाधोक्षजहर्षणानि चित्राणि चानेककथाश्रयाणि ।। १५ ।। कादम्बरीपानमदोत्कटस्तु बलः पृथुश्रीः स चुकूर्द रामः । सहस्ततालं मधुरं समं च स भार्यया रेवतराजपुत्र्या ।। १६ ।। तं कूर्दमानं मधुसूदनश्च दृष्ट्वा महात्मा च मुदान्वितोऽभूत्। चुकूर्द सत्यासहितो महात्मा हर्षागमार्थं च बलस्य धीमान् ।। १७ ।। समुद्रयात्रार्थमथागतश्च चुकूर्द पार्थो नरलोकवीरा । कृष्णेन सार्द्धं मुदितश्चुकूर्द सुभद्रया चैव वराङ्गयष्ट्या ।। १८ ।। गदश्च धीमानथ सारणश्च प्रद्युम्नसाम्बौ नृप सात्यकिश्च । सात्राजितीसूनुरुदारवीर्यः सुचारुदेष्णश्च सुचारुरूपः ।। १९ ।। वीरौ कुमारौ निशठोल्मुकौ च रामात्मजौ वीरतमौ चुकूर्दतुः । अक्रूरसेनापतिशंकवश्च तथापरे भैमकुलप्रधानाः ।। 2.89.२० ।। तद् यानपात्रं ववृधे तदानीं कृष्णप्रभावेण जनेन्द्रपुत्र । आपूर्णमापूर्णमुदारकीर्ते चुकूर्दयद्भिर्नप भैममुख्यैः ।। २१ ।।। तै राससक्तैरतिकूर्दमानैर्यदुप्रवीरैरमरप्रकाशैः । हर्षान्वितं वीर जगत् तथाभूच्छेमुश्च पापानि जनेन्द्रसूनो ।। २२ ।। देवातिथिस्तत्र च नारदोऽथ विप्रः प्रियार्थं मुरकेशिशत्रोः । चुकूर्द मध्ये यदुसत्तमानां जटाकलापागलितैकदेशः ।। २३ ।। रासप्रणेता मुनि राजपुत्र स एव तत्राभवदप्रमेयः । मध्ये च गत्वा च चुकूर्द भूयो हेलाविकारैः सविडम्बिताङ्गैः ।।२४ ।। स सत्यभामामथ केशवं च पार्थं सुभद्रां च बलं च देवम् । देवीं तथा रेवतराजपुत्रीं संदृश्य संदृश्य जहास धीमान् ।।२५ ।। ता हासयामास सुधैर्ययुक्तास्तैस्तैरुपायैः परिहासशीलः । चेष्टानुकारैर्हसितानुकारैर्लीलानुकारैरपरैश्च

        धीमान् । २६ ।। आभाषितं किंचिदिवोपलक्ष्य नादातिनादान् भगवान् मुमोच । हसन् विहासांश्च जहास हर्षाद्धास्यागमे कृष्णविनोदनार्थम् ।। २७ । कृष्णाज्ञया सातिशयानि तत्र यथानुरूपाणि ददुर्युवत्यः । रत्नानि वस्त्राणि च रूपवन्ति जगत्प्रधानानि नृदेवसूनो ।। २८ ।। माल्यानि च स्वर्गसमुद्भवानि संतानदामान्यतिमुक्तकानि । सर्वर्तुकान्यप्यनयंस्तदानीं ददुर्ह रेरिङ्गितकालतज्ज्ञाः ।।२९।। रासावसाने त्वथ गृह्य हस्ते महामुनिं नारदमप्रमेयः । पपात कृष्णो भगवान् समुद्रे सात्राजितीं चार्जुनमेव चाथ ।। 2.89.३० ।। उवाच चामेयपराक्रमोऽथ शैनेयमीषत्प्रहसन् पृथुश्रीः । द्विधा कृतास्मिन् पतताशु भूत्वा क्रीडाजलेनोऽस्तु सहाङ्गनाभिः ।।३१।। सरेवतीकोऽस्तु बलोऽर्द्धनेता पुत्रा मदीयाश्च सहार्द्धभैमाः । भैमार्द्धमेवाथ बलात्मजाश्च मत्पक्षिणः सन्तु समुद्रतोये ।।३२।। आज्ञापयामास ततः समुद्रं कृष्णः स्मितं प्राञ्जलिनं प्रतीतः । सुगन्धतोयो भव मृष्टतोयस्तथा भव ग्राहविवर्जितश्च ।। ३३ ।। दृश्या च ते रत्नविभूषिता तु सा वेलिका भूरथ पत्सुखा च । मनोऽनुकूलं च जनस्य तत्तत् प्रयच्छ विज्ञास्यसि मत्प्रभावात्।।३४।। भवस्यपेयोऽप्यथ चेष्टपेयो जनस्य सर्वस्य मनोऽनुकूलः । वैडूर्यमुक्तामणिहेमचित्रा भवन्तु मत्स्यास्त्वयि सौम्यरूपाः ।। ३५ ।। बिभृस्व च त्वं कमलोत्पलानि सुगन्धसुस्पर्शरसक्षमाणि । षट्पादजुष्टानि मनोहराणि कीलालवर्णैश्च समन्वितानि ।। ३६ ।। मैरेयमाध्वीकसुरासवानां कुम्भांश्च पूर्णान् स्थपयस्व तोये । जाम्बूनदं पाननिमित्तमेषां पात्रं पपुर्येषु ददस्व भैमाः ।। ३७ ।। पुष्पोच्चयैर्वासितशीततोयो भवाप्रमत्तः खलु तोयराशे । यथा व्यलीकं न भवेद् यदूनां सस्त्रीजनानां कुरु तत्प्रयत्नम् ।। ३८।। इतीदमुक्त्वा भगवान् समुद्रं ततः प्रचिक्रीड सहार्जुनेन । सिषेच पूर्वं नृप नारदं तु सात्राजिती कृष्णमुखेङ्गितज्ञा ।। ३९ ।। ततो मदावर्जितचारुदेहः पपात रामः सलिले सलीलम् । साकारमालम्ब्य करं करेण मनोहरां रेवतराजपुत्रीम् ।। 2.89.४० ।। कृष्णात्मजा ये त्वथ भैममुख्या रामस्य पश्चात् पतिताः समुद्रे । विरागवस्त्राभरणाः प्रहृष्टाः क्रीडाभिरामा मदिराविलाक्षाः ।। ४१ ।। शेषास्तु भैमा हरिमभ्युपेताः क्रीडाभिरामा निशठोल्मुकाद्याः । विचित्रवस्त्राभरणाश्च मत्ताः संतानमाल्यावृतकण्ठदेशाः ।। ४२ ।। वीर्योपपन्नाः कृतचारुचिह्ना विलिप्तगात्रा स्नलपात्रहस्ताः । गीतानि तद्वेषमनोहराणि स्वरोपपन्नान्यथ गायमानाः ।।४३ ।। ततः प्रचक्रुर्जलवादितानि नानास्वराणि प्रियवाद्यघोषाः । सहाप्सरोभिस्त्रिदिवालयाभिः कृष्णाज्ञया वेशवधूशतानि ।। ४४ ।। आकाशगङ्गाजलवादनज्ञाः सदा युवत्यो मदनैकचित्ताः । अवादयंस्ता जलदर्दुरांश्च वाद्यानुरूपं जगिरे च हृष्टाः ।। ४५ ।। कुशेशयाकोशविशालनेत्राः कुशेशयापीडविभूषिताश्च । कुशेशयानां रविबोधितानां जह्रुः श्रियं ताः सुरचारुमुख्यः ।। ४६ । स्त्रीवक्त्रचन्द्रैः सकलेन्दुकल्पै रराज राजञ्छतशः समुद्रः । यदृच्छया दैवविधानतो वा नभो यथा चन्द्रसहस्रकीर्णम् ।। ४७ ।। समुद्रमेघः स रराज राजञ्च्छतह्रदास्त्रीप्रभयाभिरामः । सौदामिनीभिन्न इवाम्बुनाथो देदीप्यमानो नभसीव मेघः ।। ४८ ।। नारायणश्चैव सनारदश्च सिषेच पक्षे कृतचारुचिह्नः । बलं सपक्षं कृतचारुचिह्नं स चैव पक्षं मधुसूदनस्य ।। ४९।। हस्तप्रमुक्तैर्जलयन्त्रकैश्च प्रहृष्टरूपाः सिषिचुस्तदानीम् । रागोद्धता वारुणिपानमत्ताः संकर्षणाधोक्षजदेवपत्न्यः ।। 2.89.५० ।। आरक्तनेत्रा जलमुक्तिसक्ताः स्त्रीणां समक्षं पुरुषायमाणाः । ते नोपरेमुः सुचिरं च भैमा मानं वहन्तो मदनं मदं च ।। ५१ ।। अतिप्रसङ्गं तु विचिन्त्य कृष्णस्तान् वारयामास रथाङ्गपाणिः । स्वयं निवृत्तो जलवाद्यशब्दैः सनारदः पार्थसहायवांश्च ।। ५२ ।। कृष्णेङ्गितज्ञा जलयुद्धसङ्गाद् भैमा निवृत्ता दृढमानिनोऽपि । नित्यं तथाऽऽनन्दकराः प्रियाणां प्रियाश्च तेषां ननृतुः प्रतीताः ।। ५३ ।। नृत्यावसाने भगवानुपेन्द्रस्तत्याज धीमानथ तोयसङ्गान् । उत्तीर्य तोयादनुकूललेपं जग्राह दत्त्वा मुनिसत्तमाय ।। ५४ । उपेन्द्रमुत्तीर्णमथाशु दृष्ट्वा भैमा हि ते तत्यजुरेव तोयम् । विविक्तगात्रास्त्वथ पानभूमिं कृष्णाज्ञया ते ययुरप्रमेयाः ।। ५५ ।। यथानुपूर्व्या च यथावयश्च यत्सन्नियोगाश्च तदोपविष्टाः । अन्नानि वीरा बुभुजुः प्रतीताः पपुश्च पेयानि यथानुकूलम् ।। ५६ ।। मांसानि पक्वानि फलाम्लकानि चुक्रोत्तरेणाथ च दाडिमेन । निष्टप्तशूलाञ्छकलान् पशूंश्च तत्रोपजह्रुः शुचयोऽथ सूदाः ।। ५७ । सुस्विन्नशूल्यान्महिषांश्च बालाञ्छूल्यान्सुनिष्टप्तघृतावसिक्तान्। वृक्षाम्लसौवर्चलचुक्रपूर्णान् पौरोगवोक्त्या उपजह्रुरेषाम् ।। ५८ पौरोगवोक्त्या विधिना मृगाणां मांसानि सिद्धानि च पीवराणि । नानाप्रकाराण्युपजह्रुरेषां मृष्टानि पक्वानि च चुक्रचूतैः ।। ५९ ।। पार्श्वानि चान्ये शकलानि तत्र ददुः पशूनां घृतमृक्षितानि । सामुद्रचूर्णैरवचूर्णितानि चूर्णेन मृष्टेन समारिचेन ।। 2.89.६०।। समूलकैर्दाडिममातुलिङ्गैः पर्णासहिङ्ग्वार्द्रकभूस्तृणैश्च । तदोपदंशैः सुमुखोत्तरैस्ते पानानि हृष्टाः पपुरप्रमेयाः ।। ६१ । कट्वाङ्कशूलैरपि पक्षिभिश्च घृताम्लसौवर्चलतैलसिक्तैः । मैरेयमाध्वीकसुरासवांस्ते पपुः प्रियाभिः परिवार्यमाणाः ।। ६२ ।। श्वेतेन युक्तानपि शोणितेन भक्ष्यान्सुगन्धांल्लवणान्वितांश्च। आर्द्रान्किलादान् घृतपूर्णकांश्च नानाप्रकारानपि खण्डखाद्यान् ।। ६३ ।। अपानपाश्चोद्धवभोजमिश्राः शाकैश्च सूपैश्च बहुप्रकारैः । पेयैश्च दघ्ना पयसा च वीराः स्वन्नानि राजन् बुभुजुः प्रहृष्टाः ।। ६४ ।। तथारनालांश्च बहुप्रकारान् पपुः सुगन्धानपि पालवीषु । शृतं पयः शर्करया च युक्तं फलप्रकारांश्च बहूंश्च खादन् ।। ६५ ।। तृप्ताः प्रवृत्ताः पुनरेव वीरास्ते भैममुख्या वनितासहायाः । गीतानि रम्याणि जगुः प्रहृष्टाः कान्ताभिनीतानि मनोहराणि ।। ६६ ।। आज्ञापयामास ततः स तस्यां निशि प्रहृष्टो भगवानुपेन्द्रः । छालिक्यगेयं बहुसंनिधानं यदेव गान्धर्वमुदाहरन्ति ।। ६७ ।। जग्राह वीणामथ नारदस्तु षड्ग्रामरागादिसमाधियुक्ताम् । हृल्लीसकं तु स्वयमेव कृष्णः सवंशघोषं नरदेव पार्थः ।। ६८।। मृदङ्गवाद्यानपरांश्च वाद्यान् वराप्सरस्ता जगृहुः प्रतीताः । आसारितान्तं च ततः प्रतीता रम्भोत्थिता साभिनयार्थतज्ज्ञा ।। ६९ ।। तयाभिनीते वरगात्रयष्ट्या तुतोष रामश्च जनार्दनश्च । अथोर्वशी चारुविशालनेत्रा हेमा च राजन्नथ मिश्रकेशी ।। 2.89.७०।। तिलोत्तमा चाप्यथ मेनका च एतास्तथान्याश्च हरिप्रियार्थम् । जगुस्तथैवाभिनयं च चक्रु रिष्टैश्च कामैर्मनसोऽनुकूलैः ।। ७१ ।। ता वासुदेवेऽप्यनुरक्तचित्ताः स्वगीतनृत्याभिनयैरुदारैः । नरेन्द्रसूनो परितोषितेन ताम्बूलयोगाश्च वराप्सरोभिः ।। ७२ ।। तदागताभिर्नृवराहृतास्तु कृष्णेप्सया मानमयास्तथैव । फलानि गन्धोत्तमवन्ति वीराश्छालिक्यगान्धर्वमथाहृतं च ।। ७३ ।। कृष्णेच्छया च त्रिदिवान्नृदेव अनुग्रहार्थं भुवि मानुषाणाम् । स्थितं च रम्यं हरितेजसेव प्रयोजयामास स रौक्मिणेयः ।। ७४ ।। छालिक्यगान्धर्वमुदारबुद्धिस्तेनैव ताम्बूलमथ प्रयुक्तम् । प्रयोजितं पञ्चभिरिन्द्रतुल्यैश्छालिक्यमिष्टं सततं नराणाम् ।। ७५ ।। शुभावहं वृद्धिकरं प्रशस्तं मङ्गल्यमेवाथ तथा यशस्यम । पुण्यं च पुष्ट्यभ्युदयावहं च नारायणस्येष्टमुदारकीर्तेः । ७६ ।। जयावहं धर्मभरावहं च दुःस्वप्ननाशं परिकीर्त्यमानम् । करोति पापं च तथा विहन्ति शृण्वन् सुरावासगतो नरेन्द्रः ।। ७७।। छालिक्यगान्धर्वमुदारकीर्तिर्मेने किलैकं दिवसं सहस्रम् । चतुर्युगानां नृप रेवतोऽथ ततः प्रवृत्ता च कुमारजातिः ७८ ।। गान्धर्वजातिश्च तथापरापि दीपाद् यथा दीपशतानि राजन् । विवेद कृष्णश्च स नारदश्च प्रद्युम्नमुख्यैर्नृप भैममुख्यैः ।। ७९ ।। विज्ञानमेतद्धि परे यथावदुद्देशमात्राच्च जनास्तु लोके । जानन्ति छालिक्यगुणोदयानां तोयं नदीनामथवा समुद्रः ।। 2.89.८० ।। ज्ञातुं समर्थो हि महागिरिर्वा फलाग्रतो वा गुणतोऽथ वापि । शक्यं न छालिक्यमृते तपोभिः स्थाने विधानान्यथ मूर्च्छनासु ।। ८१ ।। षड्ग्रामरागेपु च तत्तु कार्यं तस्यैकदेशावयवेन राजन् । लेशाभिधानां सुकुमारजातिं निष्ठां सुदुःखेन नराः प्रयान्ति ।। ८२ ।। छालिक्यगान्धर्वगुणोदयेषु ये देवगन्धर्वमहर्षिसंघाः । निष्ठां प्रयान्तीत्यवगच्छ बुद्ध्या छालिक्यमेवं मधुसूदनेन ।। ८३ ।। भैमोत्तमानां नरदेव दत्तं लोकस्य चानुग्रहकाम्ययैव । गतं प्रतिष्ठाममरोपगेयं बाला युवानश्च तथैव वृद्धाः ।। ८४.।। क्रीडन्ति भैमाः प्रसवोत्सवेषु पूर्वं तु बालाः समुदावहन्ति । वृद्धाश्च पश्चात्प्रतिमानयन्ति स्थानेषु नित्यं प्रतिमानयन्ति ।। ८५ ।। मर्त्येषु मर्त्यान् यदवोऽतिवीराः स्ववंशधर्मे समनुस्मरन्तः । पुरातनं धर्मविधानतज्ज्ञाः प्रीतिः प्रमाणं न वयः प्रमाणम् ।। ८६ ।। प्रीतिप्रमाणानि हि सौहृदानि प्रीतिं पुरस्कृत्य हि ते दशार्हाः । वृष्ण्यन्धकाः पुत्रसखा बभूवुर्विसर्जिताः केशिविनाशनेन ।। ८७ ।। स्वर्गे गताश्चाप्सरसां समूहाः कृत्वा प्रणामं मधुकंसशत्रोः । प्रहृष्टरूपस्य सुहृष्टरूपा बभूव हृष्टः सुरलोकसङ्घः ।। ८८ ।।

         इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भानुमतीहरणे छालिक्यक्रीडावर्णने एकोननवतितमोऽध्यायः।।८९।।

        कृष्ण का चिरत्रांकन देश और समाज की प्रवृत्तियों के अनुरूप हर काल में भिन्न भिन्न रूप में हुआ। परन्तु कुछ शास्त्रकार ऐसे भी थे जिन्होंने कृष्ण का चरित्रांकन कामशास्त्र के नायक के रूप में किया ये शास्त्रकार कृष्ण को देव संस्कृति के समर्थकों में प्रतिष्ठित करना चाहते थे।

        हरिवंश पुराण कार ने रास प्रकरण में काल्पनिक उपादानों को आधार मानकर यही प्रयास किया है।

        परन्तु सच्चे अर्थों में कृष्ण देवसंस्कृति के कटु आलोचक तथा इन्द्र यज्ञ और पूजा के प्रबल विरोधी थे।

        परन्तु पुष्यमित्र सुँग ने देवयज्ञों प्रारम्भ कराकर पुन: यज्ञों  पशु बलि की पृथा भी प्रारम्भ कराई -

        यह सम्भव है कि  कुछ यादव साकाहारी और कुछ मासाँहारी भी रहे होंगे। जैसा कि आज भी है। परन्तु कृष्ण और बलराम जैसे भागवत धर्म के संस्थापकों को मदिरा पान कराकर माँस भक्षण करते हुए दिखाना और अनेक स्त्रीयों के साथ व्यभिचारी की भूमिका में प्रस्तुत करना " श्रीमद् भगवद्गीता के सिद्धान्तों के विपरीत है। पुराणों में जिस प्रकार ब्राह्मणों की प्रसंग विपरीत होने पर भी अचानक दान और सेवा आदि से संतुष्ट करने की बातें सर्वविदित ही हैं। हरिवंश पुराण से कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं जो पूर्णत: उनके वास्तविक चरित्र को विपरीत हैं। फिर भी ब्राह्मण शास्त्र कार उन्हें लिखकर कृष्ण के सामाजिक वर्चस्व को समाप्त करना चाहते हैं।

        "हरिवंश पुराण: विष्णु पर्व: एकोननवतितम अध्याय:89 वाँ अध्याय -

         श्लोक 53-69 का हिन्दी अनुवाद :-श्रीकृष्‍ण के संकेतों को समझने वाले भीमवंशी यादव सुदृढ़ अभिमान से युक्‍त होने पर भी उस जल युद्ध के प्रसंग से निवृत्त हो गये। तदनन्‍तर उन प्रिय पुरुषों को नित्‍य आनन्‍द देने वाली उनकी प्‍यारी वारवनिताएं विश्‍वस्‍त होकर नृत्‍य करने लगीं। नृत्‍य के अन्‍त में बुद्धिमान भगवान श्रीकृष्‍ण ने जलक्रीड़ा के प्रसंग त्‍याग दिये।


         उन्‍होंने जल से ऊपर आकर मुनिवर नारद जी को अनुकूल चन्‍दन का लेप देकर फिर स्‍वयं भी उसे ग्रहण किया। भगवान् श्रीकृष्‍ण को जल से बाहर निकला देख अन्‍य यादवों ने भी जलक्रीड़ा त्‍याग दी। फिर वे अप्रमेय शक्तिशाली यादव शुद्ध शरीर हो श्रीकृष्‍ण की आज्ञा से पानभूमि (रसोई के स्‍थान) में गये। वहाँ वे क्रमश: अवस्‍था और सम्‍बन्‍ध के अनुसार उस समय भोजन के लिये बैठे।

        तदनन्‍तर उन प्रख्‍यात वीरों ने अपनी रुचि के अनुकूल अन्‍न खाये और पेय रसों का पान किया।

        पके फलों के गूदे, खट्टे फल, अधिक खट्टे अनार के साथ शूल में गूँथकर सेके गये कन्‍द या फलों के टुकड़े, पोषक[1]

         तत्त्‍व (अन्‍न)- ये सब पदार्थ पवित्र रसोईयों ने उनके लिये परोसे। 


        शूल में गूँथकर पकाये गये भैंसाकन्‍द तथा अन्‍यान्‍य कन्‍द या मूल-फल, नारियल, तपे हुए घी में तले गये अन्‍यान्‍य खाद्य पदार्थ, अमलवेंत, काला नमक और चूक के मेल से बने हुए लेह्य पदार्थ (चटनी)- ये सब वस्‍तुएं पाकशालाध्‍यक्ष के कहने से रसोईयों ने इन यादवों के लिये प्रस्‍तुत कीं। 


        पाकशालाध्‍यक्ष के बताये अनुसार विधिवत तैयार किये गये मृगनामक कन्‍द विशेष के मोटे-मोटे गूदे, आम की खटाई डालकर बनाये गये नाना प्रकार के विशुद्ध व्‍यंजन भी इनके लिये परोसे गये।


        दूसरे रसोईयों ने पास रखे हुए पोषक शाकों के टुकड़े-टुकड़े करके उन्‍हें घी में तल दिये और उनमें नमक तथा मिर्च के चूर्ण मिलाकर खाने वालों को परोस दिये। मूली, अनार बिजौरा, नीबू, तुलसी, हींग और भूतृण नामक शाक विशेष के साथ सुन्‍दर मुख वाले पानपात्र लेकर उन अप्रमेय शक्तिशाली यादवों ने बड़े हर्ष के साथ पेय रस का पान किया।


         कट्वांक अर्थात कटुक परवल, शूलहर (हींग) तथा नमक-खटाई मिलाकर घी और तेल में सेके गये लकुच या बड़हर[2] 


        के साथ मैरेय, माध्‍वीक, सुरासव नामक मधु का उन यादवों ने अपनी प्रियतमाओं से घिरे रहकर पान किया। 


        नरेश्‍वर! श्‍वेत रंग के खाद्य पदार्थ मिश्री आदि तथा लाल रंग के फल के साथ नाना प्रकार के सुगन्धित एवं नमकीन भोजन एवं आद्र (रसदार साग), किलाद (भैंस के दूध में पकाये गये खीर आदि), घी से भरे हुए पदार्थ (पुआ-हलुआ आदि) तथा भाँति-भाँति के खण्‍ड-खाद्य (खाँड़ आदि) उन्‍होंने खाये।


         राजन ! उद्धव, भोज आदि श्रेष्‍ठ यादव वीरों ने जो मादक रसों का पान नहीं करते थे, बड़े हर्ष के साथ नाना प्रकार के साग, दाल, पेय-पदार्थ तथा दही-दूध आदि के साथ उत्‍तम अन्‍न का भोजन किया।

        ___________________

        उन्‍होंने प्‍यालों में अनेक प्रकार के सुगन्धित आरनाल (कांजीरस) का पान किया। चीनी मिलाये हुए गरम-गरम दूध पीया और भाँति-भाँति के फल भी खाये। 


        खा-पीकर तृप्‍त होने के पश्‍चात वे मुख्‍य-मुख्‍य यदुवंशी वीर पुन: स्त्रियों को साथ लेकर बड़े हर्ष के साथ रमणीय एवं मनोहर गीत गाने लगे।


        उनकी प्रेयसी कामिनियाँ अपने हाव-भाव द्वारा उन गीतों के अर्थ का अभिनय करती जाती हैं। तदनन्‍तर हर्ष में भरे हुए भगवान् उपेन्‍द्र ने उस रात में बहुसंख्‍यक मनुष्‍यों द्वारा सम्‍पन्‍न होने वाले उस छालिक्‍य गान के लिये आज्ञा दी, जिसे गान्‍धर्व कहते हैं।


        उस समय नारद जी ने अपनी वीणा सँभाली, जो छ: ग्रामों पर आधारित राग आदि के द्वारा चित्त को एकाग्र कर देने वाली थी। 


        नरदेव! साक्षात् श्रीकृष्‍ण ने वंशी बजाकर हृल्‍लीसक[4] (रास) नामक नृत्‍य का आयोजन किया। 

        _________________    

        कुन्‍तीपुत्र अर्जुन ने मृदंग वाद्य ग्रहण किया। अन्‍य वाद्यों को श्रेष्‍ठ अप्‍सराओं ने ग्रहण किया जो उनके वादन कला में प्रख्‍यात थीं। आसारित[5] (प्रथम आसारनर्त की-प्रवेश) के बाद अभिनय के अर्थतत्त्व का ज्ञान रखने वाली रम्भा नामक अप्‍सरा उठी, जो अपनी अभिनय कला के लिये विख्‍यात थी।


        अध्याय 90 - यादवों  का खेल (जारी)

        1. वैशम्पायन ने कहा:- कादम्बर मदिरा पीने के कारण बलराम ने स्वयं पर तथा अपनी गतिविधियों पर सारा नियंत्रण खो दिया था और उसकी आँखें लाल हो गई थीं, चंदन से चिपकी हुई बड़ी भुजाओं वाली अत्यंत सुंदर पत्नी रेवती के साथ वे क्रीड़ा करने लगे ।१।

        2. जैसे पूर्णिमा का चंद्रमा बादलों में चमकता है, वैसे ही काले वस्त्र पहने हुए , चंद्रमा की किरणों के समान गोरे और नशे में डूबी आंखों वाले दिव्य बलराम वहां चमक रहे थे ।२।

        3. अपने बाएं कान पर केवल कुंडल रखकर और सुंदर कमलों से सुशोभित, मुस्कुराते हुए राम ने अपनी प्यारी पत्नी के पार्श्व-लंबाई रूप से सुशोभित चेहरे को बार-बार देखकर अत्यधिक आनंद प्राप्त किया।

        4. तत्पश्चात कंस और निकुंभ के संहारक केशव की आज्ञा से सुंदर अप्सराएं रेवती और बलराम को देखने के लिए स्वर्ग के समान समृद्ध हल धारक के पास पहुंचीं।

        5. मनमोहक शारीरिक गठन से युक्त उन सुंदर शरीर वाली अप्सराओं ने रेवती और राम को नमस्कार किया और समय के साथ नृत्य करना शुरू कर दिया। और उनमें से कुछ ने हर प्रकार की भावना को अभिव्यक्त करने वाले इशारों के साथ गाया।

        6. बलदेव और रेवत के  राजा की पुत्री की आज्ञा के अनुसार उन्होंने यादवों की इच्छा के अनुसार अपने द्वारा अर्जित विभिन्न हाव-भाव प्रदर्शित करना शुरू कर दिया ।

        7. उन दुबली-पतली और सुंदर युवतियों ने यादव देश की स्त्रियों के समान वस्त्र पहनकर उनकी भाषा में मधुर गीत गाए।

        7-14. हे वीर, उस सभा से पहले उन्होंने बलराम और केशव की प्रसन्नता के लिए विभिन्न पवित्र प्रसंग गाए, जैसे कंस, प्रलम्व और चाणूर का विनाश ; जनार्दन को ओखली से बांधने की कहानी जिसके कारण यशोदा ने उनकी महिमा स्थापित की और उन्हें दामोदर नाम मिला ; अरिष्टा और धेनुका का विनाश ; व्रज में उनका निवास ; पूतना का विनाश ; उनके द्वारा यमल और अर्जुन वृक्षों को उखाड़ना ; कालांतर में उनके द्वारा भेड़ियों की रचना, झील में कृष्ण द्वारा दुष्ट नागों के राजा कलयानाग का दमन ; उस झील से कमल, कुमुद, शंख और निधियों के साथ मधुसूदन की वापसी ; विश्व कल्याण के स्रोत केशव द्वारा गोकुल की भलाई के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण करना ; कैसे कृष्ण ने खुशबूदार चन्द्रन  बेचने वाली कूबड़ वाली महिला को ठीक किया; भगवान के ये वृत्तांत जन्म और अपूर्णताओं से रहित हैं।

        अप्सराओं ने यह भी वर्णन किया कि कैसे भगवान ने, यद्यपि स्वयं बौने नहीं थे, अत्यंत वीभत्स बौना रूप धारण किया; सौभ की हत्या कैसे हुई; इन सभी युद्धों में बलदेव ने अपना हल कैसे उठाया; देवताओं के अन्य शत्रुओं का विनाश; गांधार राजकुमारी के विवाह के समय घमंडी राजाओं के साथ युद्ध ; सुभद्रा का हरण; वलहाका और जमवुमाली के साथ युद्ध ; और कैसे उसने इन्द्र  को हराने के बाद उसकी मौजूदगी में ही सारे गहने हरण लिए ।

        15-16. हे राजन, जब वे सुंदर स्त्रियाँ संगकर्षण और अधोक्षज के लिए इन सभी और विभिन्न अन्य सुखद और आनंददायक विषयों को गा रही थीं , तो अत्यधिक सुंदर बलराम , कादम्बरीवारी  के नशे में, अपनी पत्नी रेवती के साथ मधुर तालियों के साथ गाने लगे ।

        17. राम को इस प्रकार गाते देख बुद्धिमान, उच्चात्मा और अत्यधिक शक्तिशाली मधुसूदन ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए सत्य के साथ गाना शुरू किया ।

        18. विश्व के महानतम वीर पार्थ , जो समुद्र-यात्रा के लिये वहाँ आये थे, वह भी प्रसन्न होकर सुन्दर सुभद्रा और कृष्ण के साथ गाने लगे।

        19-20. हे राजन, बुद्धिमान गद , सरण , प्रद्युम्न , साम्ब- , सात्यकि और सत्राजित के पुत्र, महान शक्तिशाली चारुदेष्ण ने भी वहां समवेत स्वर में गाया। बलराम के पुत्र, सबसे महान वीर, राजकुमार निशाथ और उल्मुख, सेनापति अक्रूर , शंख और अन्य प्रमुख भीमकुल के यादवों ने भी वहां गाया।

        21. उस समय, हे राजा, कृष्ण की शक्ति से नावों का आकार बढ़ गया और जनार्दन ने प्रमुख भीमवंशीयों के साथ अपनी पूरी क्षमता से गाना गाया।

        23 हे वीर राजकुमार, जब अमर-तुल्य यदु सरदारों ने इस प्रकार गाया तो सारा संसार हर्ष से भर गया और पाप नष्ट हो गये।

        23 तब मधु के हत्यारे केशव को प्रसन्न करने के लिए देवताओं के अतिथि नारद ने यादवों के बीच ऐसा गाना शुरू किया कि उनकी जटाओं का एक हिस्सा पिघल गया।

        24. हे राजकुमार, अथाह ऊर्जा वाले उस मुनि ने वहां-वहां गीतों की रचना करते हुए उन्हें बार-बार विभिन्न भावों और गतियों के साथ उन्हें  भीम कुल  के यादवों के बीच गाया।

        25 तब राजा रेवत की पुत्री रेवती, बलदेव , केशव, पृथा के पुत्र अर्जुन तथा सुभद्रा को देखकर बुद्धिमान ऋषि बार-बार मुस्कुराये।

        26. हालाँकि केशव की पत्नियाँ स्वभाव से धैर्यवान थीं, फिर भी बुद्धिमान नारद, जो हमेशा मज़ाक करने के शौकीन थे, अपने हाव-भाव, मुस्कुराहट, चाल और कई अन्य तरीकों से जो उनकी हँसी को उत्तेजित कर सकते थे, उन्हें हँसाते थे।

        27. मानो निर्देश दिया गया हो कि दिव्य मुनि नारद ने ऊंचे और नीचे विभिन्न धुनें गाईं और कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए वह जोर-जोर से हंसने लगे और खुशी के आंसू बहाने लगे।

        28-29. हे राजकुमार, तब इशारों में निपुण युवा युवतियों ने, कृष्ण के आदेश पर, दुनिया के सबसे अच्छे गहने, सुंदर वस्त्र, स्वर्ग में बनी मालाएं, संतानक(पारिजात) फूल, मोती और सभी मौसमों में पैदा होने वाले अन्य फूल दे दिए।

        30. तत्पश्चात् संगीतमय सभा की समाप्ति के बाद दिव्य कृष्ण, महान और अतुलनीय मुनि नारद का हाथ पकड़कर , सत्यभामा और अर्जुन के साथ समुद्र में कूद पड़े ।

        31-32. अतुलनीय पराक्रम वाले अत्यधिक सुंदर कृष्ण ने थोड़ा मुस्कुराते हुए सिनी के पुत्र से कहा- "आइए हम दो दलों में बंट जाएं और युवतियों के साथ समुद्र के पानी में खेलें। समुद्र के इस पानी में बलदेव और रेवती को साथ रहने दें मेरे बेटे और कुछ भीमवंशी यादव एक पार्टी बनाते हैं और बचे हुए भीमवंशी और बलराम के बेटों को मेरी पार्टी में शामिल होने देते हैं।"

        33. बाद में अत्यधिक आश्वस्त केशव ने हाथ जोड़कर सामने खड़े समुद्र से कहा:- "समुद्र, तुम्हारा पानी मीठा हो और घतक मगर आदि से रहित हो।

        34. तेरा बिछौना  (समुद्र तल) रत्नों से सुशोभित हो, और तेरे किनारे दोनों पांवों के सुखपूर्वक स्पर्श के योग्य हों। और आप, मेरी शक्ति से, वह सब कुछ दे सकें जो आप मानव जाति के स्वाद के अनुकूल जानते हैं।

        35. तू मनुष्यों को मनभावन सब प्रकार का पेय दे, और सोने, नीलमणि और मोतियों से सजी हुई कोमल मछलियां तेरे जल में तैरें।

        36. आप रत्नों, सुगन्धित, मनमोहक, लाल कमलों और मधुर स्पर्श वाले कुमुदिनों को धारण करें और मधुमक्खियों से सेवित हों।

        ______    

        37. क्या आपके पास असंख्य घड़े और सोने के बर्तन हैं, जिनमें से भैमस मैरेया , माधविका और आसव आदि  मदिरा हों तो उन्हें पेश करो

        38. हे सागर, तुम्हार जल फूलों की सुगन्ध से सुगन्धित ठंडा हो। आप इतना सावधान रहें कि यादवों को अपनी स्त्रियों के साथ कोई असुविधा न हो।

        39 हे राजन, समुद्र से ऐसा कहकर कृष्ण अर्जुन के साथ क्रीड़ा करने लगे। सत्राजित की पुत्री, जो कृष्ण द्वारा दिए गए संकेतों में पारंगत थी, ने नारद के शरीर पर जल छिड़का।

        40. तब राम ने नशे में डूबे अपने शरीर को उत्तेजना पूर्वक अपने हाथों से रेवती के हाथों से पकड़ लिया और खेल-खेल में समुद्र के पानी में कूद पड़े।

        41-42. राम के पीछे कृष्ण के चंचल पुत्र, नशे में आँखें घुमाते हुए और अन्य प्रमुख भीमवंशी, अपने वस्त्र, और आभूषणों से वंचित होकर, खुशी से समुद्र में कूद पड़े।

        निशत, उल्मुक और बलदेव के अन्य पुत्र अपने गले में संतानक फूलों की माला पहने हुए, विभिन्न प्रकार के वस्त्र पहने हुए, नशे में धुत और खेल-कूद में व्यस्त थे, साथ ही शेष भीमवंशी भी केशव की सभा में शामिल हो गए।

        43. शक्तिशाली यादव, जिनके चेहरे पर सुंदर निशान और लेप थे, अपने हाथों में मदिरा के पात्र लेकर, मधुर धुनों वाले गीत गाने लगे और उस स्थान के लिए सुंदर रूप से अनुकूल थे।

        44 तदनन्तर संगीत में रुचि रखने वाली, सजी-धजी सैकड़ों युवतियाँ, दिव्यलोक में रहने वाली अप्सराओं के साथ मिलकर विभिन्न स्वर बजाने लगीं।

        45. वे युवा युवतियाँ, जो अलौकिक गंगा के जल में वाद्ययंत्र बजाने में पारंगत थीं , और जिनका मन पूरी तरह से कामदेव के वश में था, प्रसन्नतापूर्वक   जलदर्दुर[1] बजाती थीं और उसके साथ गीत गाती थीं।

        46. ​​उस समय कमल की पंखुड़ियों के समान नेत्रों वाली और कमल के डंठलों से सुशोभित सुंदर दिव्य नृत्य करने वाली लड़कियाँ सूर्य की किरणों से उड़े हुए कमल के समान शोभा पा रही थीं।

        47. हे राजा, सैकड़ों पूर्णिमा के चंद्रमाओं के समान दिखने वाली उन महिलाओं के चंद्रमा जैसे चेहरों से भरा हुआ, या तो अपनी इच्छा से या विधि के आदेश के तहत वहां जा रहा थे , समुद्र हजारों चंद्रमाओं से सुशोभित आकाश की तरह दिखाई दे रहा था।

        48 हे राजन, मेघरूपी समुद्र स्त्री के समान प्रकाश से सुशोभित हुआ। जल के स्वामी आकाश में बिजली से छितरे हुए बादलों के समान प्रकट हुए।

        49. इसके बाद नारायण , जिन्होंने अपने शरीर पर सुंदर निशान लगाए थे, नारद और उनकी सभा के अन्य सदस्यों ने बलदेव और उनकी सभा पर पानी छिड़का, जिन्होंने भी सुंदर निशान लगाए थे। और बाद वाले ने भी पहले वाले पर पानी छिड़का।

        50. उस समय कृष्ण और संकर्षण की पत्नियाँ वारुणी मदिरा के नशे में चूर होकर और संगीत के साथ प्रसन्न होकर हाथों और जलयंत्रों से एक दूसरे पर पानी फेंकती थीं।

        51. शराब, कामदेव और स्वाभिमान से युक्त, नशे से लाल आंखों वाले भीमवंशी एक-दूसरे पर पानी फेंकते थे और इस तरह महिलाओं की उपस्थिति के सामने कठोर रवैया अपनाते थे: 

        हालांकि वे एक के लिए खेल रहे थे, वे बाज नहीं आए  लंबे समय तक भी।

        52. इस प्रकार उनके परिचित कामक्रीडा को देखकर, चक्रधारी कृष्ण ने एक क्षण के लिए सोचा और फिर उन्हें रोक दिया। उन्होंने भी पार्थ और नारद के साथ जल में वाद्ययंत्र बजाने से परहेज किया।

        53. भीमवंशी यादव, जो हमेशा अपनी प्रिय महिलाओं को प्रसन्न करते थे, हालांकि वे अत्यधिक संवेदनशील थे, जैसे ही उन्होंने संकेत दिया, तुरंत कृष्ण के इरादे को समझ गए और पानी में खेलना बंद कर दिया: लेकिन युवतियों ने नृत्य करना जारी रखा।

        54. नाच पार्टी समाप्त होने के बाद जब अन्य यादव पानी में थे तब भी उपेन्द्र किनारे पर आ गये। इसके बाद उन्होंने नारद को श्रेष्ठ मुनि बनने का अवसर दिया और बाद में स्वयं भी उनका अंग बन गये।

        55. फिर उपेन्द्र को जल से बाहर निकलता देख अतुलनीय भींमो ने शीघ्र ही जल छोड़ दिया। फिर वे अपने शरीर को दूबों से शुद्ध करके, कृष्ण की अनुमति से, शाराब के स्थान में चले गए।

        56 उन सुप्रसिद्ध वीरों ने अपनी-अपनी आयु तथा स्थिति के अनुसार क्रम से बैठकर नाना प्रकार के भोजन तथा पेय पदार्थों से स्वयं को तरोताजा किया।

        57. तब रसोइये बड़े आनन्द से पके हुए मांस, सिरके, अनार और लोहे की छड़ों पर भुना हुआ पशुओं का मांस ले आए।

        58. फिर एक युवा भैंस को डंडे पर अच्छी तरह से भूनकर, गर्म करके, घी में भिगोकर, सिरका, सोचल नमक और एसिड मिलाकर परोसा गया।

        59. बहुत से मोटे हिरणों का मांस कुशल पकाने की विधि के अनुसार भूनकर, और सिरके में मीठा करके लाया गया।

        60. जानवरों की टाँगें, नमक और सरसों के साथ मिलाकर और घी में तलकर भी परोसी जाती थीं।

        61. अतुलनीय यादवों ने अरुम कैम्पैनुलटम की जड़ों, अनार, नींबू, हींग, जिंजरेड और अन्य सुगंधित सब्जियों वाले उन व्यंजनों को बड़े आनंद से खाया। फिर उन्होंने सुंदर प्यालों में शराब पी।

        62. वे अपनी प्रिय युवतियों के साथ घिरे रहकर मैरेया, माधविका और आसव जैसी विभिन्न मदिरा पीते थे, जो पक्षियों के मांस को मक्खन, अम्ल रस, नमक और खट्टी चीजों के साथ भूनकर तैयार की जाती थी।

        63. उन्होंने अन्य व्यंजन, सफेद और लाल रंग के विभिन्न सुगंधित नमकीन खाद्य पदार्थ, दही और घी से बनी चीजें भी खाईं।

        64. हे राजा, उद्धव , भोज और अन्य वीर, जो शराब नहीं पीते थे, उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक सब्जियाँ, सब्जी-करी, केक, दही और हलवा लिया।

        65. पलावी नामक पीने के बर्तन से, वे विभिन्न सुगंधित पेय, दूध और चीनी के साथ मक्खन पीते थे और विभिन्न प्रकार के फल लेते थे।

        66. इस प्रकार वीर भीमों ने भरपेट भोजन करके प्रसन्न हो गये। बाद में, वे, अपनी पत्नियों को अपने साथियों के रूप में रखते हुए, अपनी पत्नियों द्वारा शुरू किए गए आनंद के साथ फिर से संगीत में शामिल हो गए।

        67. इसके बाद जब रात होने लगी तो दिव्य उपेन्द्र ने सभा में उपस्थित सभी लोगों से गाना जारी रखने के लिए कहा। 

        देवताओं और गंधर्वों द्वारा गाए जाने वाले विभिन्न सुरों के (छालिक्य) ।

        68-72. हे राजन, तब नारद ने अपनी वीणा बजाना शुरू किया जो छह ताल और रागों के साथ [2] मन की एकाग्रता लाती है, कृष्ण ने अपनी बांसुरी के संगीत के साथ हल्लीसक नृत्य करना जारी रखा और पार्थ ने अपने मृदंग को बजाना शुरू किया। : [

        4] अन्य प्रमुख अप्सराएँ विभिन्न अन्य वाद्ययंत्र बजाती थीं। इसके बाद असरिता के बाद , सुंदर रंभा , एक चतुर अभिनेत्री, उठी, उसने अभिनय किया और बलराम और केशव को प्रसन्न किया। तदनन्तर, हे राजन , सुंदर और विशाल नेत्रों वाली उर्वशी , हेमा , मिश्रकेशी , तिलोत्तमा , मेनका और अन्य दिव्य अभिनेत्रियाँ क्रम से उठीं और गायन और नृत्य से हरि को प्रसन्न किया।

         उनके मनमोहक गायन और नृत्य से आकर्षित होकर वासुदेव ने उन सभी को उनके मन के अनुरूप उपहार देकर प्रसन्न किया। 

        हे राजकुमार, उन सम्मानित और प्रमुख अप्सराओं को, जिन्हें वहां लाया गया था, कृष्ण की इच्छा पर पान के पत्तों से  ( वीड़ो)सम्मानित किया गया था।

        73-74. हे राजा, इस प्रकार विभिन्न सुगंधित फल और  छालिक्य गीत, जो कृष्ण की इच्छा और मानव जाति के प्रति उनके उपकार से दिव्य क्षेत्र से स्वर्ग से लाए गए थे, केवल रुक्मिणी के बुद्धिमान पुत्र को ही ज्ञात थे। वही उनका उपयोग कर सकता था और वही उस समय पान बांटता था।

        75-76.  छालिक्य गीत, नारायण के कल्याण, पोषण और समृद्धि के लिए अनुकूल, गौरवशाली कर्मों का, और जो मानव जाति के लिए महान, शुभ और प्रसिद्धि और धर्मपरायणता का उत्पादक था, इंद्र जैसे कृष्ण, राम, प्रद्युम्न द्वारा समवेत स्वर में गाया गया था। अनुविन्ध और शम्वा।

        77-78. यह छालिक्य, जो वहाँ गाया जाता था, पुण्य की धुरी धारण करने में समर्थ तथा दु:ख और पाप का नाश करने वाला था। दिव्य क्षेत्र की मरम्मत करते हुए और इस चालिक्य गीत को सुनकर प्रतापी राजा रेवत ने चार हजार युगों को एक दिन के रूप में माना।इससे कुमारजाति आदि गंधर्वों के विभिन्न प्रभागों की उत्पत्ति हुई ।

        79. हे राजन, जैसे एक ही प्रकाश से सैकड़ों दीप उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार छालिक्य से गंधर्वों की विभिन्न श्रेणियां उत्पन्न हुई हैं। हे राजन, प्रद्युम्न और अन्य प्रमुख भीमों के साथ कृष्ण और नारद यह सब जानते थे।

        80-81. झरनों और समुद्र के पानी की तरह इस दुनिया के लोग छालिक्य को केवल दृष्टांत से जानते थे। मुरकाना [5] और चालिक्य के समय को जानने के लिए कठोर तपस्या किए बिना हिमालय के गुणों और वजन को जानना संभव है , लेकिन ऐसा नहीं है ।

        82-83. हे राजा, छह तराजू और राग पुरुषों के साथ छालिक्य का क्या, बड़ी कठिनाई के साथ, सुकुमारजति के ग्यारहवें मंडल के अंत तक भी नहीं आ सकता है । हे राजन, यह निश्चित रूप से जान लें कि मधुसूदन ऐसी व्यवस्था की थी कि देवता, गंधर्व और महान ऋषि छालिक्य के गुणों के कारण भक्ति भावना प्राप्त कर सकें।

        84-88. भगवान द्वारा, मनुष्यों में, कृष्ण द्वारा, दुनिया पर उपकार दिखाने के लिए भैमों से पहले गाए जाने के कारण, चालिक्य, जिसे केवल अमर लोगों द्वारा गाया जाता था, ऐसी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है,

         जिसे पहले उत्सव के अवसर पर भीम लड़के इस्तेमाल करते थे इसे एक उदाहरण के रूप में उद्धृत करने के लिए। और बड़े-बूढ़े उनकी बात का अनुमोदन करते थे और लड़के, जवान और बूढ़े उसे समवेत स्वर में गाते थे। "प्यार ही कसौटी है, उम्र नहीं" - मनुष्यों को उनकी जाति के इस गुण की याद दिलाने के लिए, प्राचीन धार्मिक संस्कारों के संचालक वीर यादवों ने मनुष्यों की भूमि में ऐसा किया। 

        हे राजन, मित्रता प्रेम से जानी जाती है, इसलिए प्रेम को सामने रखते हुए, केशव को छोड़कर अन्य वृष्णि , अंधक और दशार्ह अपने पुत्रों के साथ भी मित्र जैसा व्यवहार करते थे। तत्पश्चात प्रसन्न होकर कंस के हत्यारे मधुसूदन को नमस्कार करते हुए, संतुष्ट अप्सराएँ दिव्य क्षेत्र में लौट आईं, जो भी (तदनुसार) खुशी से भरा हुआ था।

        फ़ुटनोट और संदर्भ:

        [1] :

        पानी में बजाया जाने वाला एक प्रकार का वाद्ययंत्र।

        [2] :

        संगीत की एक विधा जिसमें से छह की गणना की जाती है। भैरव , मालव सारंगा , हिंडोला , वसंत , दीपका और मेघा : वे काव्य और पौराणिक कथाओं में चित्रित हैं ।

        [3] :

        मुख्य रूप से एक पुरुष और आठ या दस महिला कलाकारों द्वारा गायन और नृत्य का एक छोटा नाटकीय मनोरंजन , एक बैले।

        [4] :

        एक प्रकार का वाद्य यंत्र।

        [5] :

        एक स्वर या अर्धस्वर जो उसके पैमाने में रखा जाता है, ग्राम या पैमाने का सातवाँ भाग।


        हरिवंशपुराण- हरिवंश का स्वरूप, हरिवंश में तीन पर्व या खण्ड 


        महाभारत के खिल पर्व होने के कारण हरिवंश की आलोचना अब प्रसंग प्राप्त है। हरिवंश में श्लोकों की संख्या सोलह हजार तीन सौ चौहत्तर (16, 374 श्लोक ) श्रीमद्भागवत की श्लोक संख्या से कुछ ही अधिक है।

        डॉ० विन्टरनित्स के कथनानुसार यूनानी कवि होमर के दोनों महाकाव्यों 'इलियड' और 'ओडिसी' की सम्मिलित संख्या से भी यह अधिक है, परन्तु यह एक लेखक की रचना न होकर अनेक लेखकों के संयुक्त प्रयास का फल है। 

        हरिवंश का अन्तिम पर्व (ग्रन्थ का तृतीय भाग) तो परिशिष्ट भूत हरिवंश का भी परिशिष्ट है और काल क्रम से सबसे पीछे का निर्मित भाग है। 

        हरिवंश में तीन पर्व या खण्ड हैं

        (क) हरिवंश पर्व

         कृष्ण के वंश वृष्णि-अन्धक की कथा विस्तार से दी गयी है और इस आदिम पर्व के वर्णन के अनन्तर राजा पृथु की कथा विस्तार से दी गयी है ।

        सूर्यवंशीय राजाओं के प्रसंग में विश्वामित्र तथा वसिष्ठ का भी आख्यान वर्णित है। प्रसंग से पृथक् हटकर प्रेतकल्प ( अन्त्येष्टि एवं श्राद्ध) का वर्णन नौ अध्यायों में (अध्याय- 16-24) विस्तार से निबद्ध है और इसी के अन्तर्गत 21 वें अध्याय में पशुओं की बोली को समझने-बूझने वाले ब्रह्मदत्त की कथा दी गई है चन्द्रवंशीय राजाओं के वर्णन के अवसर पर राजा पुरूरवा और उर्वशी का प्रख्यान से समानता रखता है (अ0 26) । नहुष, ययाति तथा यदु के वर्णन के पश्चात् विष्णु की अनेक स्तुतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। जो एक प्रकार से कृष्ण के पूर्व दैवी इतिहास का परिचय देती हैं।


        (ख) विष्णुपर्व -

        यह समय ग्रन्थ का अतिशय विस्तृत तथा महनीय भाग है। इसमें कृष्णचन्द्र की विविध लीलाओं का, विशेषत: बाललीलाओं का बड़ा ही सांगोपांग रूचिर विवरण है श्रीमद्भागवत के वर्णन से तुलना करने पर अनेक स्थल पर पार्थक्य दृष्टिगोचर होता है। कहीं-कहीं अन्य घटनायें भी दी गयी हैं। 

        कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के जन्म, शंबर द्वारा हरण, समुद्र से प्राप्ति तथा मायावती के साथ विवाह आदि प्रख्यात कथाओं का यहाँ उल्लेख है, परन्तु असुरों के राजा वज्रनाभ की दुहिता प्रभावती के साथ प्रद्युम्न का विवाह और वह भी नितान्त नाटकीय ढंग से एकदम नूतन तथा पर्याप्तरूपेण रोचक है (150 अध्याय)। 


        इसी प्रकार प्रख्यात रासलीला का हल्लीसक नृत्य के रूप में निर्देश किसी प्राचीन युग की स्मृति दिलाता है। इस पर्व के अन्त में अनिरूद्ध का विवाह बाणासुर की कन्या उषा के साथ बड़े उमंग और उत्साह से वर्णित है और इससे पूर्व 'हरि-हरात्मक स्तव' (अध्याय- 184) द्वारा शिव और विष्णु की एक ही अभिन्न देवता के रूप में सुन्दर स्तुति की गई है। इस पर्व में विषय की एकता और वर्णन की संगति से प्रतीत होता है कि प्राचीन युग में ‘श्रीकृष्ण चरित काव्य' के साथ यह अंश सम्बन्ध रखता है, परन्तु तृतीय भाग के विषय में किसी एकता की कल्पना नहीं की जा सकती।


        (ग) भाविष्यपर्व- 

        यह भाग विविध वृत्तों का पौराणिक शैली में परस्पर असम्बद्ध संकलन है। इस पर्व का नामकरण प्रथम अध्याय के नाम पर है, जहाँ भविष्य में होने वाली घटनाओं का संकेत किया गया है। जनमेजय द्वारा विहित यज्ञों का वर्णन बड़े सुन्दर ढंग से किया गया है (अ) 191-196) । विष्णु के सूकर, नृसिहं तथा वामन अवतारों के वर्णन के अनन्तर शिवपूजा तथा विष्णु पूजा के समन्वय की दिशा दिखाई गई है। शिव के दो उपासक हंस तथा डिम्भक की कथा विस्तार से है, जिन्हे कृष्ण ने पराजित किया था। महाभारत के माहात्म्य वर्णन के पश्चात् समग्र हरिवंश का ध्येय हरि की स्तुति में प्रदर्शित किया गया है-

        ‘आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।

        हरिवंशपुराण का स्वरूप:-

        एक ओर हरिवंश महाभारत का परिशिष्ट (खिल) माना जाता है और दूसरी ओर यह ‘पुराण' नाम से भी अभिहित होता है। इसके पोषक प्रमाणों की कमी नहीं है-

        (1) महाभारत के आरम्भ में ग्रन्थ के समग्र पर्वो की संख्या एक सौ परिगणित है (आदि अ0 2) और इसके भीतर हरिवंश भी सम्मिलित किया गया है (आदि 2/82-83)। ध्यान देने की बात तो यह है कि हरिवंश 'खिलसंज्ञित पुराण' कहा गया है। (हरिवंशसततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम्)। फलत: व्यास की दृष्टि में खिल और पुराण दोनों साथ-साथ होने में कोई वैषम्य नहीं है।

        ( 2 ) हरिवंश के 20 वें अध्याय में 'यथा ते कथितं पूर्व मया राजर्षिसत्तम' के द्वारा याति के चरित की महाभारत में पूर्व स्थिति का स्पष्ट निर्देश है (आदिपर्व अ0 81-88)।

         

        (3) हरिवंश के 32 वें अध्याय में अदृश्यवाणी का कथन 'त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला' के द्वारा महाभारत में शकुन्तलोपाख्यान की ओर स्पष्ट संकेत है तथा 54 अध्याय में कणिक मुनि महाभारत में कणिक मुनि की पूर्व स्थिति बतलाता है (आदिपर्व अध्याय- 140 ) ।

         

        (4) हरिवंश का उपक्रम तथा उपसंहार बतलाता है कि हरिवंश महाभारत का ही परस्पर सम्बद्ध खिल पर्व है। उपक्रमाध्याय में भारती कथा सुनने के बाद वृष्णि अन्धक चरित सुनने की इच्छा शौनक ने सौति से जो प्रकट की वह दोनों के सम सम्बन्ध का सूचक है। हरिवंश के 132 वें अध्याय में महाभारत के कथाश्रवण का फल है, जिस कथन की संगति हरिवंश के महाभारत के अन्तर्गत मानने पर ही बैठ सकती है, अन्यथा नहीं ।

        (5) बहिरंग प्रमाणों में आनन्दवर्धन का यह कथन साक्ष्य प्रस्तुत करता है कि महाभारत के अन्त में हरिवंश के वर्णन से समाप्ति करने वाले व्यासजी ने शान्तरस को ही ग्रन्थ का मुख्य रस व्यन्जना के द्वारा अभिव्यक्त किया है। '

        फलत: हरिवंश महाभारत का 'खिल' पर्व है। साथ ही साथ पञ्च लक्षण से समन्वित होने से यह 'पुराण' नाम्ना भी अभिहित किया जाता है, परन्तु न तो यह महापुराणों में अन्तर्भूत होता है और न उपपुराणों में दोनों से इसकी विशिष्टता पृथक् ही है।

        हरिवंश का कालनिर्णय

        हरिवंश के कालनिर्माण तथा महाभारत के साथ सम्बद्ध होने के काल का निर्णय प्रमाणों द्वारा किया जा सकता है-

        (क) हरिवंश के साथ सम्मिलित होकर लक्ष श्लोकात्मक रूप धारण करने वाला महाभारत ‘शत साहस्री संहिता' के नाम से (454) ईस्वी के गुप्त शिलालेख में उल्लिखित है। 

        (ख) अश्वघोष (प्रथमशती) ने अपने वज्रसूची उपनिषद् में हरिवंश के 'प्रेतकल्प' प्रकरण से ‘सप्तव्याधा दशार्णेषु’ (हरिवंश 24/20, 21) इत्यादि श्लोकों को प्रमाण रूप से उद्धृत किया है। अतः हरिवंश की रचना प्रथमशती से अर्वाचीन नहीं हो सकती।

        (ग) हरिवंश (विष्णु पर्व 55/50) में 'दीनार' का उल्लेख उसके रचनाकाल का द्योतक है। रोम साम्राज्य के सोने के सिक्के 'दिनारियस' कहलाते थे और उसी शब्द का संस्कृत रूप दीनार' है। इस शब्द का सबसे प्राचीन प्रयोग प्रथमशती के शिलालेखों में उपलब्ध होता है।

        (घ) हरिवंश के एक श्लोक में शुंगब्राह्मण राज्य के संस्थापक पुष्यमित्रशुंग द्वारा यज्ञ का उल्लेख भविष्य में होनेवाली घटना के रूप में निर्दिष्ट किया गया है

        उपात्तयज्ञो देवेसु ब्राह्मणेषुपपत्स्यते । ‘औद्भिज्जो भविता कश्चित् सेनानी: काश्यपो द्विजः । अश्वमेधं कलियुगे पुनः प्रत्याहरिष्यति । (हरिवंश 3 /2/39-40 )


        यह तो प्रसिद्ध ही है कि ब्राह्मण सेनापति पुष्पमित्र ने दो बार अश्वमेघ यज्ञ किया था, जिनमें महाभाष्य के रचयिता पतञलि स्वयं ऋत्विक् रूप से उपस्थित थे। 'इह पुष्पमित्रं याजयाम:'-महाभाष्य । पुष्पमित्र ने लगभग 36 वर्षो तक राज्य किया (लगभग ईस्वी पूर्व 187-151) और आरम्भ में वे मौर्य सम्राट् के सेनापति था। इसी प्रसिद्ध सेनानी का निर्देश इस श्लोक में है। फलत: हरिवंश का रचनाकाल इससे पूर्व नहीं, तो इसके कुछ ही पश्चात् होना चाहिए। 

        अतएव 'हरिवंश' का निर्माण काल ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में मानना सर्वथा सुसंगत होगा | 

        हरिवंश का धार्मिक महत्व सर्वत्र प्रख्यात है । सन्तान के इच्छुक व्यक्तियों के लिये 'हरिवंश' के विधिवत् श्रवण का विधान लोक प्रचलित है। शपथ खाने के लिए पुरूषों के हाथ पर हरिवंश की पोथी रखने का प्रचलन नेपाल में उसी प्रकार है जिस प्रकार किसी मुसलमान के हाथ पर कुरान रखने का . 

        श्रीकृष्ण के चरित के तुलनात्मक अध्ययन के लिए हरिवंश के विष्णुपर्व का परिशीलन नितान्त आवश्यक है। प्राचीन भारत की ललित कलाओं के विषय में हरिवंश बहुत ही उपादेय सामग्री प्रस्तुत करता है। प्राचीन भारत में नाटक के अभिनय प्रकार की जानकारी के लिए यहाँ उपादेय तथ्यों का संकलन है। 

        सबसे महत्वपूर्ण है हरिवंश में राजनैतिक इतिहास का वर्णन, जो किसी भी प्राचीन पुराण के वर्णन से उपादेयता और प्रामाणिकता में किसी प्रकार न्यून नहीं है फलतः प्रथम शती में भारती संस्कृति की रूपरेखा जानने के लिए हरिवंश' हमारा विश्वनीय मार्गदर्शक है।


        इस प्रकार उन लोगों ने अपने रहने के लिये नगर और अन्य आवास बनाये; उन्होंने कई जोड़ों के लिए घर बनाए रहने के लिए। जैसे पेड़ उनके पहले प्रकार के घर थे, वैसे ही, उन सभी को याद करके, उन लोगों ने अपने घर बनाए। जैसे किसी पेड़ की कुछ शाखाएँ एक दिशा में जाती हैं, और कुछ दूसरी दिशा में जाती हैं, और कुछ ऊपर की ओर उठती हैं और कुछ नीचे की ओर झुकती हैं, वैसे ही उन्होंने अपने घरों में शाखाएँ बनाईं 

        हे सन्तो!, वे शाखाएँ, जो पहले कल्प वृक्ष की शाखाएँ थीं, परिणामस्वरूप उन लोगों के बीच घरों में कमरे बन गईं।


         


















         
        एक आवेश हो मन में और चंचलता क्षण क्षण 
        समझो तूफानों का दौर है , होगी जरूर गड़बड़।। 

        ये उमंग और रंगत , लगें मोहक नजारे,
        सयंम की राह हे मन पकड़ ! इधर उधर 'न जारे

        –सच बयान करने वाले मुख नहीं ,
        दुनियाँ में अब महज चहरे होते हैं । 
        केवल शब्दों की ही भाषा सुनने वाले  
        लोग तो अक्सर बहरे होते हैं।।

         अरे तेरी आँखें जो कहती हैं पगले । 
        वो भाव ही असली तेरे होते हैं। 

        उमड़ आते हैं वे एकदम चहरे पर
        बर्षों से दिल में जो कहीं ठहरे होते हैं
         
         दर्द देते हमको वीरानी राहों में "रोहि"
         अक्सर तन्हाई में  जब कहीं बसेरे होते हैं ।
         अपमान हेयता की चोटों के जख़्म , 
        जो न भरने वालेे और बड़े गहरे होते हैं ।। 

        –दान दीन को दीजिए भिक्षा जो मोहताज ।
         और दक्षिणा दक्ष को जिसका श्रममूलक काज।

         परन्तु रीति विपरीत है सब जगह देख लो आज ।
         श्रृंँगार बनाकर असुन्दरी जैसे नैन - मटका वाज।

         जैसे डिग्रीयों में अब नहीं, रही योग्यता की आवाज ।।

        -ये परिस्थियाँ ये अनिवार्यताऐं जीवन की एक सम्पादिका !
         जिनकी वजह से खरीदा और बेका भी बहुत परन्तु अपना कभी चरित्र नहीं बिका ।। 

        प्रवृत्तियाँ जन्म सिद्ध होती जिनसे निर्धारित जातियाँ।
        आदतें व्यवहार सिद्ध ज्योति सुलगती जीवन बातियाँ ।।

        ये कर्म अस्तित्व है जीवन का धड़कने श्वाँस के साँचे।
        समय और परिवर्तन मिलकर जगत् के गीत सब बाँचे ।।

         –क्योंकि जिन्दे पर पूछा नहीं न किया कभी उन्हें याद ! 
        तैरहीं खाने आते हैं वे उसके मरने के वाद ।
         कर्ज लेकर कर इलाज कराया जैसे खुजली में दाद ।
         खेती बाड़ी सभी बिक गयी हो गया गरीब बर्वाद 

        पण्डा , पण्डित गिद्द पाँत में फिर भी ले रहे स्वाद 
         घर की हालत खश्ता इतनी छाया है शोक विषाद 

         किस मूरख ने यह कह डाला ? 
        तैरहीं ब्राह्मणों को प्रसाद !
         आज तुमने धन्यवाद वाद क्या दिया !
         मुझे तुमने धन्य कर दिया साध! 

        धुल गया वो पाप सारा सब क्षमा जघन्य अपराध!
         तभी मुसाफिर आगे बढ़ता ले उन बातों की याद। 
        –अज्ञानता के अँधेरों में हकीकत ग़ुम थी ।
         उजाले इल्म के होंगे ! उन्हें न ये मालुम थी ।।

         –धड़कने थम जाने पर श्वाँसें कब चलती हैं ? 
        –बहारे गुजर जाती जहाँ वहाँ खामोशियाँ मचलती हैं !

         –हम इच्छाओं की खातिर जिन्द़ा ये इच्छा वैशाखी है। 
        दर्द तो दिल में बहुत है लोगों , बस अब सिसकना बाकी है । 

        –वासना लोभ मूलक पास रहने की इच्छा है ।
         जबकि उपासना स्वत्व मूलक पास रहने की इच्छा है ।

         काम अथवा वासना में क्रूरता का समावेश उसी प्रकार सन्निहित है ! –जैसे रति में करुणा- मिश्रित मोह सन्निहित है। 
        जैसे शरद और वसन्त ऋतु दौनों का जन्म समान कुल और पिता से हुआ है । 
        परन्तु जहाँ वसन्त कामोत्पादक है ।
        वहीं शरद वैराग्य व आध्यात्मिक भावों की उत्पादिका ऋतु है ।

         –एक अनजान और अजीव देखा मैंने वह जीव ।
        जीवन की एक किताब पढ़ न पाया तरतीब ।।

         -साहित्य गूँगे इतिहास का वक्ता है ।
         परन्तु इसे नादान कोई नहीं समझता है ।।
         
        साहित्य किसी समय विशेष का प्रतिबिम्ब 
        तथा तात्कालिक परिस्थितियों का खाका है । 
        ये पूर्ण चन्द्र की धवल चाँदनी है जैसे 
        अतीत कोई तमस पूर्ण राका है ।। 

        इतिहास है भूत का एक दर्पण। 
        गुजरा हुआ कल, गुजरा हुआ क्षण -क्षण ।। 

         कोई नहीं किसी का मददगार होता है । 
        आदमी भी मतलब का बस यार होता है ।।

         छोड़ देते हैं सगे भी अक्सर मुसीबत में ।
         मुफ़लिसी में जब कोई लाचार होता है ।। 

        बात ये अबकी नहीं सदीयों पुरानी है । 
        स्वार्थ से लिखी हर जीवन कहानी है ।।

        स्वार्थ है जीवन का वाहक । 
        और अहं जीवन की सत्ता है ।। 

        अहंकार और स्वार्थ ही है । 
        हर प्राणी की गुणवत्ता है ।। 

         विश्वास को भ्रम , और दुष्कर्म को श्रम कह रहे 
        आज लूट के व्यवसाय को , अब कुछ लोग उपक्रम कह रहे।।

        व्यभिचार है,पाखण्ड है , ईमान भी खण्ड खण्ड है 
        संसार जल रहा है हर तरफ से ये वासनाओं की ज्वाला प्रचण्ड है ।

        साधना से हीन साधु सन्त शान्ति से विहीन ।
        दान भी उनको नहीं मिलता जो वास्तव में बने हैं दीन।।

         व्यभिचार में डूबा हुआ । 
        भक्त उसको परम कह रहे । 
        रूढ़ियों जो सड़ गयीं लोग उनके धर्म कह रहे ।।

         - इन्तहा जिसकी नहीं, उसका कहाँ आग़ाज है 
         ना जान पाया तू अभी तक जिन्द़गी क्या राज है 

        - धड़कनों की ताल पर , श्वाँसों की लय में ढ़ाल कर ।
         स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को। 

        साज़ लेकर संवेदनाओं का । 
        दु:ख सुख की ये सरग़में ।
         आहों के आलाप में । ये कुछ सुनाती हैं हम्हें ।। 

        सुने पथ के ओ पथिक ! 
        तुम सीखो जीवन रीति को ।। 
        स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को।

        सिसकियों की तान जिसमें एक राग है अरमान का ।।
        प्राणों के झँकृत तार पर । उस चिर- निनादित गान का ।। 

        विस्तृत मत कर देना तुम , इस दायित पुनीत को  
        स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को  

        ताप न तड़पन रहेगी। जब श्वाँस से धड़कन कहेगी 
        हो जोश में तनकर खड़ा। विद्युत - प्रवाह सी प्रेरणा ।

         बनती हैं सम्बल बड़ा ।। 
        तुम्हेें जीना है अपने ही बल पर ।
         तुम लक्ष्य बनाओं जीत को ।। 
        स्वर बनाकर प्रीति को तब गाओ जीवन गीत को 

        -खो गये कहीं बेख़ुदी में । हम ख़ुद को ही तलाशते ।।
         लापता हैं मञ्जिलें । 
        अब मिट गये सब रास्ते ।। 
        न तो होश है न ही जोश है ।। 

        ये जिन्द़गी बड़ी खामोश है ।। 
        बिखर गये हैं अरमान मेरे सब बदनशीं के वास्ते । 
        ये दूरियाँ ये फासिले , बेतावीयों के सिलसिले !! 
        एक साद़गी की तलाश में , हम परछाँयियों से आमिले ।। 

        दूर से भी काँच हमको। मणियों जैसे भासते ।।
        सज़दा किया मज्दा किया ।। कुर्बान जिसके वास्ते।। 
        हम मानते उनको ख़ुदा ।। 
        जो कभी न हमारे ख़ास थे ।। 

        किश्ती किनारा पाएगी कहाँ मिल पाया ना ख़ुदा।
         वो खुद होकर हमसे ज़ुदा । 
        ओझल हो गया फिर आस्ते ।। 
        खो गये कहीं बेख़ुदी में । 
        हम ख़ुद को ही तलाशते ।। 

        - जिन्द़गी की किश्ती ! 
        आशाओं के सागर ।। 
        बीच में ही डूब गये ; 
        कुछ लोग तो घबराकर ।।
         किसी आश़िक को पूछ लो । 
        अरे तुम द़िल का हाल जाकर ।।
        दुपहरी सा जल रहा है ; बैचारा तमतमाकर ।। 
         
        असीमित आशाओं के डोर में । 
        बँधी पतंग है जिन्द़गी कोई ।। 
        मञ्जिलों से पहले ही यहाँं , 
        भटक जातों हैं अक्सर बटोही क्यों कि ! बख़्त की राहों पर ! जिन्द़गी वो मुसाफिर है ।। 

        जिसकी मञ्जिल नहीं "रोहि" कहीं । 
        और न कोई सफ़र ही आखिर है ।। 
        आशाओं के कुछ पढ़ाब जरूर हैं 
        वह भी अभी हमसे बहुत दूर हैं ।। 

        बस ! चलते रो चलते रहो " चरैवेति चरैवेति ! 

        - अपनों ने कहा पागल हमको । ग़ैरों ने कहा आवारा है । 
        जिसने भी देखा पास हम्हें । उसने ही हम्हें फटकारा है ।। 

        - कोई तथ्य असित्व में होते हुए भी उसी मूल-रूप में नहीं होता ; जिस रूप में कालान्तरण में उसके अस्तित्व को लोगों द्वारा दर्शाया जाता है । 

        क्यों कि इस परिवर्तित -भिन्नता का कारण लोगों की भ्रान्ति पूर्ण जानकारी, श्रृद्धा प्रवणता तथा अतिरञ्जना कारण है । 
        और परम्पराओं के प्रवाह में यह अस्त-व्यस्त होने की क्रिया स्वाभाविक ही है । 
        देखो ! आप नवीन वस्त्र और उसी का अन्तिम जीर्ण-शीर्ण रूप ! अतः उसके मूल स्वरूप को जानने के लिए केवल अन्त:करण की स्वच्छता व सदाचरण व्रत आवश्यक है क्यों कि दर्पण के स्वच्छ होने पर ज्ञान रूप प्रकाश स्वत: ही परावर्तित होता है ।
         और यह ज्ञान वही प्रकाश है । 

        जिससे वस्तु अथवा तथ्यों का मूल वास्तविक रूप दृष्टि गोचर होता है । और ज्ञान की सिद्धि के लिए अन्त:करण चतुष्टय की शुद्धता परमावश्यक है ।
        फिर आपसे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं । 
        समझे ! अभी नहीं समझे !
        अनुभव उम्र की कषौटी है । 
        ज्ञान की मर्यादा उससे कुछ छोटी है । 

        क्योंकि अनुभव प्रयोगों के आधार पर अपने आप में सिद्ध होता है और ज्ञान केवल एक सैद्धान्तिक स्थति है भक्तों आप ही बताइए कि प्रयोग बड़ा होता है या सिद्धांत ! 

        परिस्थितियों के साँचे में । 'रोहि' व्यक्तित्व ढलता है ।
        बदलती है दुनियाँ उनकी , जिनका केवल मन बदलता है। 

        मेरे विचार मेरे भाव यही मेरे ठिकाने हैं ।
        हर कर्म है इनकी व्याख्या ये लोगो को समझाने हैं 

        जन्म जन्मान्तरण के अहंकारों का सञ्चित रूप ही तो नास्तिकता है । 
        आत्मा को छोड़कर दुनियाँ में बस सब-कुछ बिकता है ।

        जो जीवन को निराशाओं के अन्धेरों से आच्छादित कर देती है । और ये आस्तिकता जीने का एक सम्बल देती है ।
         समझने की आवश्यकता है कि क्या नास्तिकता है ? 

        अपने उस अस्तित्व को न मानना जिससे अपनी पता है ।
         क्यों कि लोग अहं में जीते है । 

        जिसमें फजीते ही फजीते हैं । 
        परन्तु यदि वे स्वयं में जी कर देखें तो वे परम आस्तिक हैं और बड़े सुभीते हैं।। 

        बुद्ध ने भी स्व को महत्ता दी अहं को नहीं !
         दर्शन ( Philosophy) से विज्ञान का जन्म हुआ।
         दर्शन वस्तुत सैद्धान्तिक ज्ञान है । 

        और जबकि विज्ञान प्रायौगिक है , --जो किसी वस्तु अथवा तथ्य के विश्लेषण पर आधारित है ।

        ताउम्र बुझती नहीं "रोहि " जिन्द़गी 'वह प्यास है 
        आनन्द की एक बूँद के लिए भी , आदमी इच्छाओं का दास है ।।

        परन्तु दु:ख सुख की मृग मरीचि का में 
        उसका ये सारा प्रयास है।। 

        आस जब तलक छोड़ी नहीं थीं धड़कने और श्वाँस।
        जीवन किसी पहाड़ सा दुर्गम और स्वप्न जैसे झरना कोई खा़स.. 

        ये नींद सरिता की अविरल धारा. 
        जहाँ मिलता नहीं कभी कोई किनारा। 

        हर श्वाँस में है अभी जीने की चाह ... 
        क्योंकि जीवन है अनन्त जन्मों का प्रवाह ....
         शिक्षा का व्यवसायी करण दु:खद व पतनकारी हे भगवन् ! 

        शिक्षा अन्धेरे में दिया इसके विना सूना जीवन । 
        आज के अधिकतर शिक्षा संस्थान (एकेडमी) एक ब्यूटी-पार्लर से अधिक कुछ नहीं हैं । 

        जिनमें केवल डिग्रीयों का श्रृँगार करके विद्या - अरथी नकलते हैं । ये योग्यता या विद्या का अरथी ले जा रहे हों ऐसा लगता है । 

        जिनमें योग्यता रूपी सुन्दरता का प्राय: अभाव ही रहता है केवल आँखों में सबको चूसने का भाव रहता है। इन्हें -जब समझ में आये कि सुन्दरता कोई श्रृँगार नहीं ! -
        जैसे साक्षरता शिक्षाकार नहीं । 
        योग्यता एक तपश्चर्या है । 

        --जो नियम- और संयम के पहरे दारी में रहती है 
         वैसे भी योग्य व्यक्ति दुनियाँ का सबसे शक्ति शाली व्यक्ति है । 
        यदि स्त्रीयाँ सुन्दर न हों केवल श्रृँगार सर्जरी कराई कर रुतबा बिखेरती हों तो विद्वानों की दृष्टि में कभी भी सम्माननीया नहीं रहती । 

        जिन्हें अपने संसारी पद का , "रोहि" हद से ज्यादा मद है । 
        सन्त और विद्वान समागम , उनका छोटा क़द है ।

        उनके पास कुछ टुकड़े हैं । क्षण-भङ्गुर चन्द कनक के , 
        उन्मुक्त कर रहे स्वर उनको , बड़ते पैसों की खनक के ।।

        उनकी उपलब्धियों की भी , संसार में यही सरहद है ।
         ये लौकिक यात्रा का साधन धन !
         जिसकी टिकट भी अब तो रद है ।।
         जीवात्मा की अनन्त यात्रा ।
         जिसका पाथेय उपनिषद् है । 
        पढ़ाबों से वही बढ़ पाता है रोहि ।

         --जो राहों का गहन विशारद है .
        .. सच कहने में संकोच खौंच दीवार की आँसे ! 
        व्यक्ति की छोटी शोच , मोच पैरों की नाँसे !!

        बातचीत करके और व्यवहार परख कर चलने वाले कभी नहीं पाते झांसे ! 

        सभी दूध के धुले भी कहाँ निर्विवाद होते हैं । 
        नियमों में भी अक्सर यहाँं अपवाद होते हैं ।। 

        कार्य कारण की बन्दिशें , उसके भी निश्चित दायरे। 
        नियम भी सिद्धान्तों का तभी, अनुवाद होते हैं ।। 

        महानताऐं घूमती हैं "रोहि" गुमनाम अँधेरों में । 
        चमत्कारी तो लोग प्रसिद्धियों के बाद होते हैं ।। 

        भव सागर है कठिन डगर है । 
        हम कर बैठे खुद से समझौते ! 
        डूब न जाए जीवन की किश्ती । 
        यहाँ मोह के भंवर लोभ के गोते ।
         मन का पतवार बीच की धार। 
        रोही उम्र बीत गई रोते-रोते। 
        प्रवृत्तियों के वेग प्रबल हैं । 
        लहरों के भी कितने छल हैं । 

        बस बच गए हैं हम खोते खोते। 
        सद्बुद्धि केवटिया बन जा । 
        इन लहरों पर सीधा तंजा । 

        प्रायश्चित के फेनिल से चमकेगा। 
        रोही अन्तर घट ये धोते-धोते।। 

        तन्हाईयों के सागर में खयालों की बाड़ हैं । 
        जिन्दगी की किश्ती लहरें प्रगाढ़ हैं ।

        पतवार छूट गये मेरे ज्ञान और कर्म के ।
        हर तरफ मेरे मालिक ! 
        घोर स्वार्थो की दहाड़ है । 
        जिसकी दृष्टि में भय मिश्रित छल है। 

        रोही वह निश्चित ही कोई अपराध कर रहा है और उसे अपराध बोध भी है। परन्तु वह दुर्भावनाओं से प्रेरित है । 

        यह मेरा निश्चित मत है और जो व्यक्ति हमसे भयभीत है हम्हें उनसे भी भयभीत रहें।
        क्योंकि यह अपने भय निवारण के लिए हमारा अवसर के अनुकूल अनिष्ट कर सकते हैं। 
        व्यक्तित्व तो रोहि परिस्थितियों के साँचे में ढलते हैं।

        अभावों की आग में तप कर भत्त भी फौलाद में बदलते हैं । अनजान और अजीव , ऐसा था एक जीव ।। 

        वक्त की राहों पर चल पड़ा बेतरतीव ।। 
        शरद और वसन्त ऋतु क्रमश वैराग्य और काम भावों की उत्प्रेरक हैं । वैराग्य और काम एक ही वेग की दो विपरीत धाराऐं हैं ।
         ये हुश़्न भी "कोई " ख़ूबसूरत ब़ला है ! _______________________________

         बड़े बड़े आलिमों को , इसने छला है !!
         इसके आगे ज़ोर किसी चलता नहीं भाई! 

        ना इससे पहले किसी का चला है ! 
        ये आँधी है ,तूफान है ये हर ब़ला है 
        परछाँयियों का खेल ये सदीयों का सिलस़िला है ! 

        आश़िकों को जलाने के लिए इसकी एक च़िगारी काफी है , 
        जलाकर राख कर देना । 

        फिर इसमें ना कोई माफी है । 
        सबको जलाया है इसने , ये बड़ा ज़लज़ला है !!
        इश्क है दुनियाँ की लीला, तो ये हुश़्न उसकी कला है ।।

        ____________________________________

        छोटे या बड़े होने का प्रतिमान यथार्थों की सन्निकटता ही है ।
         क्यों कि ज्ञान सत्य का परावर्तन और सर्वोच्च शक्तियों का विवर्तन ( प्रतिरूप ) है । 
        -वह व्यक्ति दुनियाँ का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति है ; 
        जो सत्य के समकक्ष उपस्थित है ।
         ज्ञान जान है यह सत्य का प्रतिमान ( पैमाना )है 
        संसार में प्रत्येक व्यक्ति की एक सोच होती है ; 

        जो समानान्तरण उसकी प्रवृत्ति और स्वभाव को प्रतिबिम्बित करती रहती है । 
        उसी के अनुरूप वह जीवन में व्यवसाय क्षेत्रों का चयन करता है। और सत्य पूछा जाय तो इसका मूल कारण उसकी प्रारब्ध है जो जन्म- जमान्तरण के संचित 'कर्म'- संस्कारों से संग्रहीत है जीव संचित' क्रियमाण और प्रारब्ध का प्रतिफलन हैं । 

        प्रारम्भ में सृष्टि में एक अवसर सबको मिलता है ।
        फिर समय उपरान्त वह अपने कर्मों से अपने जीवन की यात्रा निर्धारित करता है । 
        लव तलब मतलब इन हयातों का सबब !

        दुनियाँ की उथल -पुथल दुनियाँ इनसे ये सारी है 
        कर्म जीवन का अस्तित्व कर्म ये कर्म की फुलवारी है ।।

         _____________________________________ 
        रोहि सुधरेगा नहीं , सदियों तक ये देश।।
        अनपढ़ बैठे दे रहे ,  मंचों  पर  उपदेश।।

        मंचों पर उपदेश  पंच बैठे हैं अन्यायी ।
        वारदात के बाद पुलिस लपके से आयी।।

        राजनीति का खेल , विपक्षी बना है द्रोही।
        जुल्मों का ये ग्राफ  क्रम बनता आरोहि ।।
        ___________

        पाखण्डी इस देश में , पाते हैं सम्मान ।
        अन्ध भक्त बैठे हुए, लेते उनसे  ज्ञान ।।

        लेते उनसे ज्ञान  मति गयी उनकी मारी ।
        दौलत के पीछे पड़े, उम्र बीत गयी सारी

        स्वर" ईश्वर बिकते जहाँ ,दुनियाँ ऐसी मण्डी।
        भाँग धतूरा ,कहीं चिलम फूँक रहे पाखण्डी।।
        _______
        रोहि सुधरेगा नहीं ,सदियों तक अपना देश।।
        अनपढ़ बैठे दे रहे  पढने वालों को उपदेश।।

        पढने वालों को उपदेश  राजनीति है गन्दी।
        बेरोजगारी भी बड़ी  और पड़ी देश में मन्दी।।

        अपराधी ज़ालिम बड़े और लड़े  देश में  द्रोही।
        किसी की ना सुनता कोई , जुल्म  बना आरोहि।।

        भाई कमाल के आशिक थे तुम भी 
        मुद्दतों ये मुद्दा  सरफराज करते हैं।
        दिल में  उमड़ते मोहब्बत के बादल 
         आज भी  बयाने अंदाज करते है।।

        बवाल की परम्परा को आप संजोये हुए हैं।
        खाम खां  इश्क में रोये हुए हैं।
        मोहब्बत में कहीं तुम  सहादत न करना 
        उलफत की जंग बहुत तो खोए हुए हैं।

        बवाल की परम्परा को आप संजोये हुए हैं।
        खाम खां  इश्क में रोये हुए हैं।
        मोहब्बत में कहीं तुम  सहादत न करना 
        उलफत की जंग में बहुत तो खोए हुए हैं।
        भक्ति गहराई में उतर कर देखो यहाँ भक्त खुशी में रोये हुए हैं ।

        मजबूरियाँ हालातों के जब से  साथ हैं।
        सफर में सैकड़ों  हजारों   फुटपाथ हैं।।

        सम्हल रहा हूँ जिन्दगी की दौड़ में गिर कर !
        किस्मतों को तराशने वाले भी कुछ हाथ हैं।

        गुरुर्मातृसमो नास्ति नास्ति भार्यासमःसखा।
        नीचावमाननाद्दुःखाद्दुःखं नास्ति यथा परम्।४०। 
        (विष्णु धर्मोत्तर पुराण  अध्याय 305 -)

        अनुवाद:-
        माता को समान गुरु नहीं है और पत्नी को समान सखा नहीं । नीच व्यक्ति द्वारा किया गया अपमान इस दुनियाँ का सबसे बड़ा दु:ख है।

         जीवन की अनन्त विस्तारमयी श्रँखलाओं में से एक कड़ी है वर्तमान जीवन और इस वर्तमान जीवन में घटित पहलू प्रारब्ध द्वारा निर्धारित हो गये है। इस संसार में प्रत्येक प्राणी के जीवन में सभी घटित  घटनाओं और प्राप्त  वस्तुओं का अस्तित्व उद्देश्य पूर्ण और सार्थक ही है। वह नियत है ,निश्चित है। उसके

        भले हीं उस समय  उनकी उपयोगिता हमारे जीवन के अनुकूल हो अथवा  न हो । क्योंकि उसकी घटित वास्तविकता का स्थूल रूप से हम्हें कभी बोध ही नहीं होता है।

        और लोगों को कभी भी भविष्य में स्वयं के द्वारा करने वाले कर्मों के लिए दाबा - और भूल से किए गये गलत कर्मों  के लिए भी पछतावा नहीं करना चाहिए।  क्यों कि भूल से जो कर्म हुआ वह काल से प्रेरित प्रारब्ध का विधान था । 
        बुद्धिमानी इसी में है कि अहंकार से रहित होकर उस परम सत्ता से मार्गदशन का निरन्तर आग्र क्या जाए।

        हाँ भूत काल की घटनाओं से उनके सकारात्मक या नकारात्मक रूप में घटित  परिणामों से मनुष्य को  शिक्षा लेकर भविष्य की  सुधारात्मक परियोजना का अवश्य विचार करना चाहिए। वहाँ  कर्म का दावा तो कभी नहीं करना चाहिए-

        यद्यपि कर्म तो वर्तमान के ही धरातल पर सम्पादित होता है। अत: वर्तमान को ही बहुत सजग तरीके जीना- जीवन है।

        भविष्य की घटित घटनाओं का ज्ञान  स्थूल दृष्टि से तो कोई नहीं कर सकता है।

        परन्तु रात्रि के अन्तिम पहर में देखे हुए स्वप्न भी जीवन में सन्निकट भविष्य में होने वाली कुछ घटनाओं का प्रकाशन अवश्य करते हैं। वास्तव में यह मन में स्फुटित प्रारब्ध का प्रकाशन है।

        ये भविष्य की घटनाएँ कभी प्रतिकूल प्रतीत होते हुए भी अनुकूल स्थितियों का निर्माण करती हैं ।

        और अनुकूल प्रतीत होते हुए भी वाली ये  घटनाएँ  प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्माण भी कर देती हैं। साधारण लोग इनके गूढ सत्य को नहीं जानते हैं!  ये सब तो प्रारब्ध के विधान ही हैं। 
        कभी कभी हम बचपन में केवल शोक अथवा सनक में ऐसी वस्तुओं का संग्रह कर लेते हैं जो उस समय तो निरर्थक और बेकार सी होती हैं परन्तु भविष्य में कभी उनकी उपयोगिता सार्थक हो जाती है। यही तो प्रारब्ध का विधान है।

        दर-असल प्रारब्ध अनेक जन्मों के मन के  निर्देशन द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों से किए गये कर्मों का सञ्चित रूप में से- एक जीवन के  निर्देशन के लिए विभाजित एक रूप है।

        अर्थात्  ( एक जीवन में फलित परिस्थितियों और उपलब्धियों की सुलभता का नाम प्रारब्ध है । स्वभाव की रवानगी में यही प्रारब्ध ही व्याप्त है। 
        यही प्रारब्ध भाग्य संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है।

        परन्तु जब लोग स्वभाव के विपरीत संयम से कुछ नया करते हैं तब  वह साधना नवीन कर्म संस्कार का निर्माण करती है। यही तपस्या अथवा साधना नवीन सृजन की भी क्रिया या शक्ति है। 
        यह क्रियमाण कर्म है - जिससे आगामी जीवन के प्रारब्ध का निर्माण होता है।

        यही जीवन का सत्य है। हमने जीवन की प्रयोगशाला में यह अनुभव रूपी प्रयोग भी किया है। यह प्रयोगशाला और प्रयोग सबका मौलिक ही होता है। सार्वजनिक कदापि नहीं सबका जीवन अपनी एक निजी प्रयोगशाला है। -

        दुनियाँ के सभी प्राणियों की क्रियाविधि काल के तन्तुओं से निर्मित‌ प्रारब्ध की डोर से नियन्त्रित है।

        परिस्थितियों के वस्त्रों में है डोर या धागा  सबका प्रारब्ध का ही लगा है   इसी वस्त्र से  जीवन आवृत  है।
         
        इसी लिए अहंकार रहित होकर कर्तव्य करने में ही जीवन की सार्थकता है। निष्काम भक्त इस संसार में सबसे बड़ा साधक है।

        धर्म का अधिष्ठाता यम हैं ।

        और यम की दार्शनिक व्याख्या की जाए तो 
        यम स्वाभाविकताऐं जो मन और सम्पूर्ण जीवन का अन्तत: पतन कर देती हैं। 
        उनके  नियमन अथवा ( निरोध) की विधि है।
        योगशास्त्र में प्रथम सूत्र है।

         योग की परिभाषा निरूपित करते हुए ।
        योगश्चितवृत्तिनिरोध:” चित्तवृत्ति के निरोध का नाम योग है | 
        चित्त अर्थात मन वृत्ति ( स्वाभाविक तरंगे) उनका निरोध( यमन - नियन्त्रण) करने के लिए ही जीवन में धर्माचरण आवश्यक है।
        इसी धर्माचरण के ही अन्य नाम व्रत- तपस्या -सदा चरण आदि हैं योग भी मन की वृत्तियों के नियन्त्रण की  क्रिया -विधि है।

         मन की इन्हीं वृत्तियों ( तरंगो) के नियन्त्रण हेतु कतिपय उपाय  आवश्यक होते हैं  जो संख्या में आठ माने जाते हैं। अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पांच अंगों में  (यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार) ‘बहिरंग’ हैं।

         और शेष तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) ‘अंतरंग’ नाम से प्रसिद्ध हैं।
        अत: यम बाह्य सदाचरण मूलक साधना है।
        यही धर्म है।

        बहिरंग साधना के यथार्थ रूप से अनुष्ठित या क्रियान्वित होने पर ही साधक को अंतरंग साधना का अधिकार प्राप्त होता है।

         यम’ और ‘नियम’ वस्तुत: शील और तपस्या के द्योतक हैं। 

        यम का अर्थ है संयम जो पांच प्रकार का माना जाता है : (क) अहिंसा, (ख) सत्य, (ग) अस्तेय (चोरी न करना अर्थात्‌ दूसरे के द्रव्य के लिए स्पृहा न रखना) अथवा बिना उनकी अनुमति के उसकी इच्छा न करना।

        सत्य यही है कि व्यक्ति जब सदाचरण और यम की इन प्रक्रियाओं को करता है तो उसका अन्त:करण शुद्ध और मन बुद्ध ( बोध युक्त)हो जाता है बुद्धि चित् या मन की ही बोध शक्ति है।
        यहीं से ईश्वरीय ज्ञान का स्वत: स्फुरण होने लगता है। 
        इसी लिए तो साधक सन्त तपस्वी सबके मन की बात जान लेते हैं और अनेक भविष्य वाणीयाँ भी सटीक करते हैं।

        नास्तिक व्यक्ति आत्म चिन्तन से विमुख तथा मन की स्वाभाविक वासनामूलक वृत्तियों की लहरों में उछलता -डूबता हुआ  कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं होता और जो शान्ति से रहित व्यक्ति   सुखी अथवा आनन्दित कैसे रह सकता है ? आनन्द रहित व्यक्ति नीरस और निराशाओं में जीवन में सदैव अतृप्त ही रह जीवन बिता देता है।

        दर-असल नास्तिकता जन्म - जन्मान्तरों के सञ्चित अहंकार का घनीभूत रूप है। 

        जिसकी गिरफ्त हुआ व्यक्ति कभी भी सत्य का दर्शन नहीं कर सकता यही अहंकार अन्त:करण की मलीनता( गन्दिगी) के लिए उत्तरदायी है।

        अन्त:करण ( मन ,बुद्धि, चित्त ,और स्वत्वबोधकसत्ता का समष्टि रूप ) के शुद्ध होने पर ही सत्य का दर्शन होता है।

        और इस  अहंकार का निरोध ही तो भक्ति है।
        अहंकार व्यक्ति को सीमित और संकुचित दायरे में कैद कर देता है ।

        वह भक्ति जिसमें सत्य को जानकर उसके अनुरूप सम्पूर्ण जीवन के कर्म उस परम शक्ति के प्रति समर्पित करना होता है। जो जन्म और मृत्यु के द्वन्द्व से परे होते हुए भी इन रूपों को अपने लीला हेतु अवलम्बित करता है। वह अनन्त और सनातन है।

        मानवीय बुद्धि उसका एक अनुमान तो कर सकती है परन्तु अन्य पात्रता हीन व्यक्तियों के सामने व्याख्यान नहीं कर सकती हैं।

        संसार में कर्म इच्छओं  से कभी रहित नहीं होता है। 

        कर्म में इच्छा और इच्छाओं के मूल में संकल्प और संकल्प अहंकार का विकार -है।

        भक्ति में कर्म फल को भक्त ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है अत: ईश्वर स्वयं प्रेरणात्मक रूप से उसका मार्गदर्शन करता है ।

        जब एक बार किसी के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो जाय तो जनसाधारण उनकी गलत बातों को भी सही मानते हैं। धर्म के क्षेत्र में यही सिद्धान्त लागू है।
        क्योंकि श्रद्धा तर्क विचार और विश्लेषण के द्वार बन्द कर देती है।

        जब जब व्यक्ति अपनी प्राप्तव्य वस्तु के अनुरूप योग्यता अर्जित कर लेता है वह वस्तु उसे प्राप्त हो के ही रहती है।
        देर भले ही हो जाय !

        वासना " तृष्णा " लोभ " मोह " और  लालसा" एक ही परिवार के सदस्य नहीं है। अपितु यह एक भाव ही  सभी अवान्तर भूमिकाओं में भिन्न भिन्न नाम धारण किए हुए है। 
        और "आवश्यकता" (जरूरत) नामक जो भाव है वह  इन सबसे पृथक  जीवन के अस्तित्व का अवधारक है। जरूरतें जैविक अवधान हैं सृष्टा द्वारा निर्धारित जीवन का विधान हैं।

        और जो वस्तु जीवन के लिए आवश्यक है वहीउसी रूप और अनुपात में उतनी ही सुन्दर भी  है।

        यद्यपि प्रत्येक इन्सान में  गुण- दोष होते ही हैं व्यक्ति स्वयं अपने दोषों पर गौर नहीं करता  परन्तु हम्हें तो उसके गुण ही ग्रहण करने चाहिए सायद वे हमारे लिए गुण न हों क्योंकि हम जिसे एक बार शत्रु मान लेते हैं उस व्यक्ति में चाहें कितने भी गुण हों वह हम्हें  दोष ही दिखाई देते हैं। क्यों कि उस शत्रु भाव से हमारे दृष्टि के लेन्स का कलर ही बदल जाता है।

        शत्रुता "ईर्ष्या" घृणा अथवा विरोध सभी भाव मूलत: उस व्यक्ति के हमारी प्रति वैचारिक प्रतिकूलता के प्रतिबिम्बित रूप हैं।
        यहीं से हमारे मस्तिष्क में पूर्वदुराग्रह का जन्म होता है। 
        ऐसी स्थिति में हमारा निर्णय कभी भी निष्पक्ष नहीं होता है।

        व्यक्ति को अपने लम्बे समय से चाहे हुए (आकाँक्षित) अभियान की शुरुआत स्थान को बदलकर ही करनी चाहिए।
         क्योंकि वह जिस स्थान पर दीर्घकाल से रह रहा है। वहाँ के लोगों की दृष्टि में  वह प्रभाव हीन और गुणों से हीन हो गया है। और वे लोग उसको लगातार हतोत्साहित और हीन बनाने के लिए मौके की तलाश में बैठे हैं।
        अच्छा है उस स्थान को बदल ही दिया जाए -

        जैसे कोई वाहन भार से युक्त होने पर आगे गति करते हुए यदि  सिलप होने लगे तो फिर लीख काटकर ही आगे बढ़ पाता है।

        क्योंकि उस वाहन की गति के अवरोधक  तत्व निरन्तर उसकी गति को अवरोधित  अथवा क्षीण करते हुए अपनी अवरोधन क्रिया का विस्तार ही करते ही रहते हैं।

        अन्य  गाँव का जोगिया 
        और गाँव का सिद्ध ।

        बराबर से दिखने लगे 
        लोगों को हंस और गिद्ध ।

        प्रेम धोखा पाई हुई स्त्री उस नागिन के समान  आक्रामक होती है जिसकी खोंटी कर दी गयी हो। और प्रेम में धोखा खाया हुआ पुरुष पागल हो जाता है जैसे उसकी बुद्धि को लकवा मार गया हो ! इस प्रकार का विश्लेषण प्राय हम करते रहते हैं।

        परन्तु ये वास्तव में प्रेम के नाम पर यह केवल सांसारिक स्वार्थ परक वासना मूलक आकर्षण ही है। इसे आप प्रेम नही कह सकते हैं।

        क्योंकि प्रेम कभी आक्रामक हो ही  नहीं सकता  प्रेम तो बलिदान और त्याग  का दूसरा नाम है। 

        स्त्रीयाँ में दर -असल व्यक्तियों के  गुण - वैभव और साहस की आकाँक्षी होती हैं।
         विशेषत: उन चीजों की जो उनके अन्दर नहीं हैं।
        जैसे तर्क " विश्लेषण की शक्ति " विचार अथवा चिन्तन और साहस या कठोरता प्राय: स्त्रियों में कम ही होता है पुरुष के मुकाबले स्त्रियाँ 
        पुरुष के  महज सौन्दर्य की आकाँक्षी कभी नहीं होती हैं।  
        स्त्रियों तथा पुरुषों  की दृष्टि में सौन्दर्य आवश्यकता मूलक दृष्टिकोण या नजरिया है। पुरुष की दृष्टि में स्त्रीयों की कोमलता ही सौन्दर्य है। पुरुष में कोमलता होती नहीं हैं  पुरुष तो परुषता या कठोरता का पुतला है। 

        और स्त्री रबड़ की गुड़िया-
        जैनों एक दूसरे के भावों के तलबदार हैं यही उनके परस्पर आकर्षण और मिलन का कारण भी है।
        यदि पुरुष इश्क कि शहंशाह है तो स्त्री हुश्न की मलिका है दोनों को एक दूसरे की चाह ( इच्छा) है।

        यह उनका एक बहुत महान दृष्टिकोण है। अधिकतर स्त्रीयाँ प्राय: समर्पित" सहनशील और निष्ठावान प्रवृत्ति की  होती हैं।

        आपने स्त्रियों को नास्तिक होते नहीं पाया होगा वे भावनाओं से आप्लावित होती हुई श्रद्धा भावनाओं का घनीभूत रूप है। 

         श्रद्धा भक्ति का ही समर्पण युक्त रूपांतरण है।
         जबकि अहंकार इसके विपरीत  भाव है। अहंकार के  जन्म जन्मातरों का घनीभूत रूप ही नास्तिकता है।

         स्त्रीया" भावनाओं से आप्लावित एक नाव को समान होती हैं।

        महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा अधिक जितेन्द्रिया और व्यवस्थापिका होती हैं।

        यह उनके गुण अनुकरणीय हैं।

        परन्तु दु:ख की बात की धर्म शास्त्र लिखने वाले पुरुषों ने स्त्रीयों के दोषों को ही देखा है गुणों को नहीं यही उनका पूर्वदुराग्रह उनकी विद्वत्ता पर कलंक है।


        दर्द जान की पहिचान है।

        मन एक समुद्र जिसमें विचारों की लहरें तब आन्दोलित होती हैं। जब विचारों का परस्पर आघात -प्रत्याघात ही ज्ञान के बुलबुले उत्पन्न करता है। जिसमें सिद्धान्त की ऑक्सीजन (प्राण वायु) समाहित होती है।
        बाल बढ़ाए तीनगुण लोग कहें महाराज ।
         साधक सा जीवन बने  सिद्धों में सरताज।।

         सिद्धों में सरताज  साधना जब हो  सच्ची।
        भोगों - रोगों से रहित ज़िन्दगी सबसे अच्छी ।

        साधना के पथ पर चलें, फाँसे जगत के जाल ।
        सबको सुलझाते रहो , यह याद दिलाते बाल!

        व्यक्ति का कर्म ही उसके उच्च और निम्न स्तर के मानक को सुनिश्चित करता है।
         न कि उसका जन्म ! अभावों और विकटताओं में जन्म लेने वाले भी महान बन जाते हैं और सम्पन्नता और भोग विलास में जीवन यापन करने वाले भी पतित और चरित्रहीन हो जाते हैं।

        "सराफत की दुहाई देने वाले अधिकर दोषी निकले।
        परिवार का जिनको हम समझ रहे वे पड़ोसी निकले।।

        भौतिक उपलब्धियाँ व्यक्ति की हैसियत का मापन तो कर सकती हैं परन्तु उसकी शख्सियत का मापन तो उसके आचरण और विचारों की महानता ही करती है।
        अत: सस्ती लोकप्रियता के बदले अपने विचारों की महानता का समझौता मत करो!

        अनुमान का सत्य के इर्दगिर्द विश्लेषण होता है सत्य केन्द्र है तो अनुमान परिधि !

        ज़िन्दगी के सफर में 
        आशंकाओं के जब ब्रेकर बहुत हो।
        ज़िन्दगी  रेंग रेंग चलती है।
        मंजिल कैसे फतह हो।।

        आशंकाऐ सम्भावी अनहोनीयों के द्वार भी बन्द कर देती हैं। ये इन आशंकओं का सकारात्मक पक्ष है कि ये अनिष्टों के प्रति सदैव सावधान करती हैं। इस प्रकार विधाता ने इनको भी सार्थकता दी है

        संसार में सामाजिक सारोकारों के तीन कारण दिखाई देते हैं। कर्तव्य - मोह और स्वार्थ 
        कर्तव्य निर्देश करता है कि मनुष्य को क्या करना चाहिए ताकि उसका जीवन सफल हो सार्थक हो।

        "भगवद् गीता अध्याय 5 श्लोक 11

        "कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
        योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये।।5.11।।

        हिंदी अनुवाद - कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँशरीरमनबुद्धिके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं।
        मूल श्लोकः
        निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
        शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।4.21।।
         अनुवाद:-जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है,  जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है,  ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।


        मन आग्रह ही स्मरण है ।   
        किसी भावों के आवेश से युक्त मन निर्णय उसी के उसी से सम्बन्धित वस्तु के पक्ष में लेता है।

        _________________________________



        जिस प्रकार अग्नि में क्वथित बीज (उबला हुआ बीज) अंकुरित नहीं होता है उसी प्रकार तत्व ज्ञान (यथार्थ ज्ञान) की अग्नि में दग्ध (जला हुआ) अहंकार से रहित  संकल्प और उससे उत्पन्न कामनाओं से रहित कर्म भी कभी फल देने वाला नहीं होता है।

        श्रीमद्भगवद्गीता का निम्न श्लोक कर्म फल की सम्यक् व्याख्या करता है।
        कहने तात्पर्य है कि संसार के हर कर्म के पीछे इच्छाओं का हाथ है। और इच्छाओं का कारण संकल्प ( मन का दृढ़ निश्चय) और संकल्प का कारण व्यक्ति का अहंकार है। और इस अहंकार के पीछे कारण है व्यक्ति का वह अज्ञान जिसके कारण कभी सत्य का पूर्णरूप से बोध नहीं होता है।
        निम्नलिखित श्लोक में कर्म बन्धन से मुक्त होने की विधि का वर्णन है। क्योंकि कर्म बन्धन में
         पड़ा हुआ व्यक्ति द्वन्द्व (दु:ख-सुख) अथवा किस से लगाव -अलगाव आदि परस्पर विरोधी भावों से सदैव समान रूप से प्रभावित रहता है।
        यही संसार का अनवरत चक्र गतिशील रहता है।
        श्रीमद्भगवद्गीता दृश्य ( तमाशा) न बनाकर तमाशा देखने वाला बनने की शिक्षा देती है।
        श्रीमद्भगवद्गीता का वह श्लोक जिसमें कर्म फल से मुक्त होने की विधि का वर्णन है।

        श्रीमद्भगवद्गीता -  4.19  
        "यस्य सर्वे समारम्भाः कर्मा: कामसंकल्पवर्जिताः।
        ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं  तमाहुः पण्डितं बुधाः॥ १९॥
        शब्दार्थ-
        यस्य—जिसके; सर्वे—सभी प्रकार के; समारम्भा:— समान रूप से आरम्भ ; कर्मा: कर्म समूह काम—इच्छा/ ; सङ्कल्प— मन का निश्चय; वर्जिता:—से रहित हैं; ज्ञान— ज्ञान की; अग्नि—अग्नि द्वारा; दग्ध—भस्म हुए; कर्माणम्—जिसका कर्म; तम्—उसको; आहु:—कहते हैं; पण्डितम्—बुद्धिमान्; बुधा:—बोध सम्पन्न ।.
         
        भावार्थ--
        जिस तत्वज्ञानी व्यक्ति के सभी कर्म -अहंकार जनित संकल्पों के प्रवाहात्मिका रूपा कामनाओं(इच्छाओं)  से रहित हो जाऐं  तो वह कभी भी संसार के कर्मफल का भागी नही होता यदि उससे कोई अप्राकृतिक अथवा उन्मादी कृत्य (कर्म) भी हो जाए तो  प्रायश्चित करने पर उसका शुद्धि करण हो जाता है।

        जिस प्रकार अग्नि में क्वथित( उबला हुआ) बीज अंकुरित नहीं होता है। उसी प्रकार ज्ञान की अग्नि में तप्त कर्म रूपी बीज संकल्प और इच्छाओं के रूप में 
        अंकुरित नहीं होता है। अन्यथा संसारी लोग अहंकार के गुण संकल्प और संकल्प के प्रवाह इच्छाओं के वशीभूत होकर ही कर्म में प्रवृत होते हैं।
        जिनके फल भोग के लिए ही उनका अनेक जीवों के रूप में वृत्ति और प्रवृत्ति के अनुरूप जन्म होता है।
        आज भी वास्तविक अध्यात्म का प्रतिपादक श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद है।

        श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्यायः में  कर्मयोग  का  बड़ा सैद्धान्तिक विवेचन है।

        द्वितीय अध्याय में  श्रीकृष्ण ने श्लोक 11 से श्लोक 30 तक आत्मतत्त्व का विवेचन कर  सांख्ययोग का प्रतिपादन किया ।

        तत्पश्चात्  श्लोक 31 से श्लोक 53 तक समस्त बुद्धिरूप कर्मयोग के द्वारा परमेश्वर को पाये हुए "स्थितप्रज्ञ" सिद्ध पुरुष के लक्षण, आचरण और महत्व का स्वाभाविक  प्रतिपादन किया है।

        इसमें कर्मयोग की महिमा बताते हुए कृष्ण ने 47 तथा 48 वें श्लोक में कर्मयोग का स्वरूप बताकर अर्जुन को कर्म करने को प्रेरित किया है।

        49 वें श्लोक में समत्व बुद्धिरूप कर्मयोग की अपेक्षा सकाम कर्म का स्थान बहुत निम्न बताया है। इसी अध्याय के  50 वें श्लोक में समत्व बुद्धियुक्त पुरुष की प्रशंसा करके अर्जुन को कर्मयोग में संलग्न हो जाने के लिए कहा और 51 वें श्लोक में बताया कि समत्व बुद्धियुक्त ज्ञानी पुरुष को परम पद की प्राप्ति होती है।
        यह प्रसंग सुनकर अर्जुन ठीक से निश्चय नहीं कर पाया कि मुझे क्या करना चाहिए ? (मह्यं किं कर्त्तव्यम्)
        इसलिए कृष्ण से उसका और स्पष्टीकरण कराने तथा अपना निश्चित कल्याण जानने की इच्छा से अर्जुन पुन: कृष्ण से पूछते हैं जिसे तृतीय अध्याय में निर्देशित किया गया है।

                           "अथ तृतीयोऽध्यायः।

                              "अर्जुन उवाच"
        ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
        तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।1।।
        अनुवाद-अर्जुन बोलेः हे जनार्दन ! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव ! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?

        व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
        तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्।।2।।
        अनुवाद-आप मिले हुए वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं | इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ ।

                        'श्रीभगवानुवाच'
        लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
        ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।3।।
        अनुवाद-श्री भगवनान बोलेः हे निष्पाप ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है | उनमें से सांख्ययोगियों की निष्ठा तो ज्ञानयोग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है |

        न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
        न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।4।।
        अनुवाद-मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मता को यानि योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है!

        न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
        कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।5।।
        अनुवाद-निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है |

        कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
        इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।6।।
        अनुवाद-जो मूढबुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है |

        यस्त्विन्द्रियाणी मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
        कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।7।।
        अनुवाद-किन्तु हे  अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है |

        नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
        शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।8।।
        अनुवाद-तू शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा |

        यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
        तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।।9।।
        अनुवाद-यज्ञ के निमित्त किये जाने कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन ! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर |
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        सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
        अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्तिवष्टकामधुक्।।10।।
        अनुवाद-प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो |

        देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
        परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।11।।
        अनुवाद-तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें  इस प्रकार निःस्वार्थभाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे!

        इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
        तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः।।12।।
        अनुवाद-यज्ञ के द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिये हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं भोगता है, वह चोर ही है |

        यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
        आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।।17।।
        अनुवाद-परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है |

        नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
        न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।18।।
        अनुवाद-उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता |
        ____________________
        तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
        असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।19।।
        अनुवाद-इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भली भाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है !

        कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
        लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि।।20।।
        अनुवाद-जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे | इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने को ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है |

        यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
        स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।21।।
        अनुवाद-श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं | वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसके अनुसार बरतने लग जाता है |

        न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
        नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।22।।
        अनुवाद-हे अर्जुन ! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है न ही कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ |

        यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यन्द्रितः।
        मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।23।।
        अनुवाद-क्योंकि हे पार्थ ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए, क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं |

        उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
        संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।24।।
        अनुवाद-इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायें और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ |

        सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
        कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्।।25।।
        अनुवाद- हे भारत ! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्ति रहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे |

        न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
        जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्।।26।।
        अनुवाद- परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात् कर्मों में अश्रद्धा उन्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे |
        ______________________
        प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
        अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।27।।
        अनुवाद-वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है !

        तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
        गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।28।।
        अनुवाद-परन्तु हे महाबाहो ! गुणविभाग और कर्मविभाग के तत्त्व को जाननेवाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण-ही-गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता |

        प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
        तानकृत्स्न्नविदो मन्दान्कृत्स्न्नविन्न विचालयेत्।।29।।
        अनुवाद-प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी विचलित न करे |

        सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
        प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।33।।
        अनुवाद-सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करते है| फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा |

        इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
        तयोर्न वशमागच्छेतौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।।34।।
        अनुवाद-इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं |

        श्रेयान्स्वधर्मो विगुण परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
        स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।35।।
        अनुवाद-अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है |
        ______________________

        अर्जुन उवाच
        अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।
        अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।36।।
        अनुवाद-अर्जुन बोलेः हे कृष्ण ! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?

                            'श्रीभगवानुवाच
        काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद् भवः
        महाशनो महापाप्मा विद्धेयनमिह वैरिणम्।।37।।
        अनुवाद-श्री भगवान बोलेः रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खाने वाला अर्थात् भोगों से कभी न अघाने वाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषय में वैरी जान !

        धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
        यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।।38।।
        अनुवाद-जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है |

        आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा
        कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।39।।
        अनुवाद-और हे अर्जुन ! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने
        वाले कामरूप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है !

        इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
        एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।40।।
        अनुवाद-इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि – ये सब वास स्थान कहे जाते हैं | यह काम( सेक्स प्रवृत्ति) इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों के द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है |

        तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
        पाप्मान प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।41।।
        अनुवाद-इसलिए हे अर्जुन ! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल |

        इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
        मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।42।।
        अनुवाद-इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानि श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं | इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है |

        एवं बुद्धेः परं बुद् ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
        जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।43।।
        अनुवाद-इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात् सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल |
        _________________________________
        अर्थात - इस प्रकार हे अर्जुन ! आत्मा को लौकिक बुद्धि से श्रेष्ठ जानकर अपनी इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर संयम रखो और आत्मज्ञान द्वारा कामरूपी दुर्जेय शत्रु का दमन करो।

        कठोपनिषद् में रथ " रथी तथा सारथी के उपमान विधान  से शरीर" आत्मा और बुद्धि तत्व  की बहुत ही सुन्दर व्याख्या की है।

        "आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
        बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च। 3।
        इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
        आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः। 4।

        (कठोपनिषद्-1.3.3-4)

        श्रीमद्भगवद् गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मेविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः |3|
        इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद् भगवद् गीता के
        श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में 'कर्मयोग' नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न हुआ |

        आत्मानं रथिनं विद्धि- आत्मा को रथ समझो !
        संसार की कामनाओं में काम ( उपभोग करने की इच्छा-अथवा बुभुक्षा- का समावेश है और ये कामनाऐं अपनी तृप्ति हेतु अनैतिक और पापपूर्ण परिणामों का कारण बनती हैं ।

        इसी पाप का परिणाम संसार की यातना और असंख्य पीड़ाऐं हैं  इन कामनाओं का दिशा परिवर्तन आध्यात्मिक कारणों से ही सम्भव है ।

        कठोपनिषद् में वाजश्रवापुत्र ऋषिकुमार नचिकेता और यम देवता के बीच प्रश्नोत्तरों की कथा का आध्यात्मिक वर्णन है ।
        बालक नचिकेता की शंकाओं का समाधान करते हुए यमराज उसे उपमाओं के माध्यम से सांसारिक भोगों में लिप्त आत्मा, अर्थात् जीवात्मा, और उसके शरीर के मध्य का सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं ।

        संबंधित आख्यान में यम देव के निम्नांकित श्लोकनिबद्ध दो वचन जीवन सार्थक उपमा  के रूप  हैं !
        _________________
         आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
        बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।३।

        (कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
        (आत्मानम् रथिनम् विद्धि, शरीरम् तु एव रथम्, बुद्धिम् तु सारथिम् विद्धि, मनः च एव प्रग्रहम् ।)

        इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो ।
        (लगाम –
        इंद्रियों पर नियंत्रण का हेतु,
        अगले मंत्र में उल्लेख
        __________________
        इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।। ४

        (कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)
        (मनीषिणः इंद्रियाणि हयान् आहुः, विषयान् तेषु गोचरान्, आत्मा-इन्द्रिय-मनस्-युक्तम् भोक्ता इति आहुः ।)

        मनीषियों, विवेकी पुरुषों, ने इंद्रियों को इस शरीर-रथ को खींचने वाले घोड़े कहा है, जिनके लिए इंद्रिय-विषय विचरण के मार्ग हैं,
        इंद्रियों तथा मन से युक्त इस आत्मा को उन्होंने शरीररूपी रथ की सबारी  करने वाला बताया है

        प्राचीन भारतीय विचारकों का चिंतन  आध्यात्मिकता प्रधान रहा है। ।
        ऐहिक सुखों के आकर्षण का ज्ञान उन्हें भी रहा ही होगा  परन्तु उनके प्रयास रहे थे कि वे उस आकर्षण पर विजय पायें जीवन के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कर सकें ।

        उनकी जीवन-पद्धति प्राय:  आधुनिक काल की  भौतिक पद्धति के विपरीत रही ।
        स्वाभाविक भौतिक आकर्षण से लोग स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करें ऐसा वे सोचते रहे होंगे और उपनिषद् आदि ग्रंथ उनकी इसी सोच को प्रदर्शित करते हैं।

        उनके दर्शन के अनुसार मृत्यु से परे आत्मा शरीर के द्वारा इस भौतिक संसार से जुड़ी रहती है और यहां के सुख-दुःखों का अनुभव मन के अति चेतन चेतन और अवचेतन आदि स्तरों द्वारा करती हैं ।

        मन का संबंध बाहरी जगत् से इंद्रियों के माध्यम से होता है ।
        दर्शन शास्त्र में दस इंद्रियों की व्याख्या की जाती हैः पांच ज्ञानेंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ तथा त्वचा) और पांच कर्मेद्रियां (हाथ, पांव, मुख, मलद्वार तथा उपस्थ अर्थात्  जननेद्रिय,।

        पुरुषों में लिंग एवं स्त्रियों में योनि) ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से मिलने वाले संवेदन-संकेत को मन अपने प्रकार से व्याख्यायित करता है मन के उसी विकल्प को सुख अथवा दुःख के रूप में जाना जाता है ।

        इंद्रिय-संवेदना क्रमशः देखने, सुनने, सूंघने, चखने तथा स्पर्शानुभूति से संबंधित रहती हैं ।

        किन विषयों में इंद्रियां विचरण करेंगी और कितना तत्संबंधित संवेदनाओं को ग्रहण करेगी  यह मन के उन पर नियंत्रण पर निर्भर करता है ।

        इंद्रिय-विषयों की उपलब्धता होने पर भी मन उनके प्रति उदासीन हो सकता है ऐसा मत मनीषियों का सदैव से रहा है परन्तु जब मन के वासनाऐं समाप्त होकर बुद्धि में में ईश्वरीय ज्ञान का प्रकाश होता है।

        उपर्युक्त श्लोकों के अनुसार क्या करना चाहिए है और क्या नहीं करना चाहिए इसका निर्धारण बुद्धि करती है और मन तदनुसार इंद्रियों को निर्देशित करता है ।

        इन मंत्रों का सार यह है: भौतिक भोग्य विषयों रूपी मार्गों में विचरण करने वाले इंद्रिय रूपी घोड़ों पर मन रूपी लगाम के द्वारा बुद्धिरूपी सारथी नियंत्रण रखता है ।
        _______________________________

        रथ:शरीर पुरुष सत्य दृष्टतात्मा नियतेन्द्रियाण्याहुरश्वान् ।
        तैरप्रमत:कुशली सदश्वैर्दान्तै:सुखं याति रथीव धीर:।२३।

        षण्णामात्मनि युक्तानामिन्द्रयाणां प्रमाथिनाम् ।
        यो धीरे धारयेत् रश्मीन् स स्यात् परमसारथि:।२४।

        इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु धृतिं कुर्वीत सारथ्येधृत्या तानि ध्रुवम् ।२५।

        इन्द्रियाणां विचरतां यनमनोऽनु विधीयते ।
        तदस्य हरते बुदिं नावं वायुरिवाम्भसि ।२६।

        येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात् फलागमम्।
        तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ।२७।

        इति महाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेय समस्या पर्वणि ब्राह्मण व्याधसंवादे एकादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:(211 वाँ अध्याय)



        ________________________________

        पुरुष का यह प्रत्‍यक्ष देखने में आने वाला स्‍थूल शरीर रथ के समान है। बुद्धि सारथि है और इन्द्रियों को घोड़े  बताया गया है। जैसे कुशल, सावधान एवं धीर सारथी, उत्तम घोड़ों को अपने वश में रखकर उनके द्वारा सुख पूर्वक मार्ग सुगम्य करता है, उसी प्रकार सावधान, धीर एवं  पुरुष की बुद्धि मन के द्वारा इन्द्रियों को वश में करके सुख से जीवन यात्रा तय  करती है।२३।

        जो धीर पुरुष अपने शरीर में नित्‍य विद्यमान छ: प्रमथनशील इन्द्रिय रुपी अश्वों  की लगाम संभालता है, वही उत्तम सारथी हो सकता है । २४।

        सड़क पर दौड़ने वाले घोड़ों की तरह विषयों में विचरने वाली इन इन्द्रियों को वश में करने के लिये धैर्य पूर्वक प्रयत्‍न करे। धैर्यपूर्वक उद्योग करने वाले को उन पर अवश्‍य विजय प्राप्‍त होती है।२५।

        जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्‍त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है ।२६।

        सभी मनुष्‍य इन छ: इन्द्रियों के शब्‍द, रस  आदि विषयों में उनसे प्राप्‍त होने वाले सुखरुप फल पाने के सम्‍बन्‍ध में मोह से संशय में पड़ जाते हैं। परंतु जो उनके दोषों का अनुसंधान करने वाला वीतराग पुरुष है, वह उनका निग्रह करके ध्‍यानजनित आनन्‍द का अनुभव करता है ।२७।
        ___________________         
        इस प्रकार श्री महाभारत वनपर्व के अन्‍तर्गत मार्कण्‍डेय समस्‍या पर्व में ब्राह्मण व्‍याध संवाद विषयक दो सौ ग्‍यारहवां अध्‍याय पूरा हुआ

        आत्मा को वैदिक सन्दर्भों में "स्वर् अथवा "स्व: कह कर वर्णित किया है। परवर्ती तद्भव रूप में श्वस् धातु भी स्वर् का ही विकसित रूप है ।

        आद्य-जर्मनिक भाषाओं:- swḗsa( स्वेसा ) तथा swījēn( स्वजेन) शब्द आत्म बोधक हैं।
        अर्थात् own, relation प्राचीनत्तम जर्मन- गोथिक में:
        1-swēs (a) 2-`own'; swēs n. (b) `property' 2- पुरानी नॉर्स (Old Norse): svās-s `lieb, traut' 3-Old Danish: Run. dat. sg. suasum 4-Old English: swǟs `lieb, eigen' 5-Old Frisian: swēs `verwandt'; sīa `Verwandter' 6-Old Saxon: swās `lieb' 7-Old High German: { swās ` 8-Middle High German: swās Indo-European Proto- indo European se-, *sow[e] *swe- स्व 9-Old Indian: poss. svá- 10-Avestan: hva-हवा xva- जवा 'eigen, suus', hava- hvāvōya, xvāi Other Iranian: 11-OldPersian huva- 'eigen, suus' 12-Armenian: in-khn, gen. in-khean 'selbst', iur 'sui, sibi' 13-Latin: sibī, sē; sovos (OldLat), suus 14-Proto-Baltic: *sei-, *saw-, *seb- Meaning: self Indo-European etymology 15- Old Lithuanian: sawi, sau.

        संस्कृत भाषाओं में तथा वैदिक भाषाओं में स्व: शब्द आत्म बोधक है। ___________________________________

        "स्वेन स्वभावेन सुखेन, वा तिष्ठति स्था धातु विसर्गलोपः । स्वभावस्थे अर्थात्‌ स्व आत्मनि तिष्ठति स्थायते इति स्वस्थ: अर्थात्‌ --जो स्वयं मे स्थित है 'वह सच्चे अर्थों में स्वस्थ है ।।

        योग स्वास्थ्य का साधक है ।

        पञ्चम् सदी में पुना-रचित श्रीमद्भगवत् गीता मे योग की उत्तम परिभाषा बताया है ।
        भगवद्गीता के अनुसार योग :–👇

        "सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा निष्काम कुरु कर्माणि समत्वं योग उच्चते ।।
        श्रीमद्भगवत् गीता(2/48) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्द्व भावों में सर्वत्र सम होकर निष्काम कर्म कर ! क्यों कि समता ही योग है।

        समता में ही समग्र सृष्टि के विकास और ह्रास की व्याख्या निहित है।

        भगवद्गीता के अनुसार -👇 " तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् " अर्थात् इसलिए योग से जुड़ यह योग ही कर्मों में कुशलता है । कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्म करना चाहिए इस प्रकार का कर्म करने का कौशल ही योग है। पूर्ण श्लोक इस प्रकार है 👇 ____________________________________ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।
        बुद्धि(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्था में ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। तब यह समता योग है । अतः तू योग(समता) में लग जा क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।।।2.50।। 🌸

        पाप और पुण्य मन की धारणायें हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ मन पर वासनाओं के रूप में अंकित होती हैं।
        --जो जन्म- जन्म का संस्कार बनती हैं ।
        मनरूपी विक्षुब्ध समुद्र के साथ जो व्यक्ति तादात्म्य नहीं करता वह वासनाओं की ऊँची-ऊँची तरंगों के द्वारा न तो ऊपर फेंका जायेगा और न नीचे ही डुबोया जायेगा।

        यहाँ वर्णित मन का बुद्धि के साथ युक्त होना ही बुद्धियुक्त शब्द का अर्थ है। जैसे चक्र के दो अरे होतें हैं ।
        जिनके क्रमश: ऊपर आने और जाने से ही चक्र घूर्णन करता है ।
        और मन ही इस द्वन्द्व रूपी अरों वाले संसार चक्र में घुमाता है ।

        संसार या संसृति चक्र है तो द्वन्द्व रूपी अरे दु :ख -सुख हैं। योग शब्द यूरोपीय भाषाओं में विशेषत: रोम की प्राचीनत्त भाषाओं लैटिन में यूज (use) के रूप में है । इसमें भी युति( युत् ) इसका मूल रूप है --जो पुरानी लैटिन में उति (oeti) है।👇 ____________________________________use," frequentative form of past participle stem of Latin uti "make use of, profit by, take advantage of, enjoy, apply, consume,"

        पुरानी लैटिन में युति क्रिया है। जिससे यूज शब्द का विकास हुआ; परन्तु अंग्रेज़ी का यूज ( Use) संस्कृत की युज् धातु के अत्यधिक समीप है । जिससे (युज्+घञ् ) इन धातु प्रत्यय के योग से योग शब्द बनता है । ____________________________________ योग स्वास्थ्य की सम्यक् साधना है । 👇
        योग और स्वास्थ्य इन दौनों का पारस्परिक सातत्य समन्वय है ।

        योग’ शब्द ‘युजँ समाधौ’ संयमने च आत्मनेपदीय धातु रूप चुरादिगणीय सेट् उभयपदीय धातु में ‘घञ् " प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है।

        इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ- समाधि अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध।

        और चित्त की वृत्ति क्या हैं मन की चञ्चलता --जो उसके स्वाभाविक 'व्यापार' का स्वरूप है। योग के अनुसार चित्त की अवस्था जो पाँच प्रकार की मानी गई हैं 👇

        १-क्षिप्त, २-मूढ़ ३-विक्षिप्त, ४-एकाग्र और ५-निरुद्ध। चित्त की वृत्ति का अर्थ चित्त के कार्य (व्यापार) जो स्वभाव जन्य हैं साधारण रूप में चित्त ही हमारी चेतना का संवाहक है ।

        --जो विचार (चिन्तन)और चित्रण (दर्शन) की शक्ति देता है । साँख्य-दर्शन के अनुसार चित्त अन्तःकरण की एक वृत्ति है।

        स्वामी सदानन्द ने वेदान्तसार में अन्तःकरण की चार वृत्तियाँ वर्णित की हैं— 👇मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ।

        १-संकल्प विकल्पात्मक वृत्ति को मन कहते हैं । २-निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि (-जब आत्मा का प्रकाश मन पर परावर्तित होता है तब निर्णय शक्ति उत्पन्न होती है।

        और वही बुद्धि है और इन्हीं दोनों मन और बुद्धि के अन्तर्गत चिन्तनात्मक वृत्ति को चित्त और अस्मिता अथवा अहंता वृत्ति को अंहकार कहते हैं।

        ये ही शूक्ष्म शरीर के साथ सम्पृक्त (जुड़े)रहते हैं । योग के आचार्य पतञ्जलि चित्त को स्वप्रकाश नहीं स्वीकार करते ।

        वे चित्त को दृश्य और जड़ पदार्थ मानकर उसको एक अलग प्रकाशक मानते हैं जिसे जीव कहते हैं। उनके विचार में प्रकाश्य और प्रकाशक के संयोग से प्रकाश होता है, अतः कोई वस्तु अपने ही साथ संयोग नहीं कर सकती।
        🌸🌸🌸

        योगसूत्र के अनुसार चित्तवृत्ति पाँच प्रकार की है—१:- प्रमाण, २-विपर्यय,३- विकल्प, ४-निद्रा और ५-स्मृति तथा ६-प्रत्यक्ष, ७-अनुमान और ८-शब्दप्रमाण; ये भी चित्त की संज्ञानात्मक वृत्तियाँ-हैं । चित्त की पाँच वृत्तियाँ इसकी पाँच अवस्थाऐं ही हैं ।

        नामकरण में भिन्नता होते हुए भी गुणों में समानताओं के स्तर हैं ।

        १- एक में दूसरे का भ्रम–विपर्यय है २-स्वरूपज्ञान के बिना कल्पना – विकल्प है ३-सब विषयों के अभाव का बोध निद्रा है ४-और कालान्तरण में पूर्व अनुभव का आरोप स्मृति कहलाता है यह जाग्रति का बोध है ।

        पञ्च-दशी तथा और अन्य दार्शनिक ग्रन्थों में मन या चित्त का स्थान हृदय या हृत्पझगोलक लिखा है। परन्तु आधुनिक पाश्चात्य जीव-विज्ञान ने अंतःकरण के सारे व्यापारों का स्थान मस्तिष्क में माना है जो सब ज्ञानतन्तुओं का केंद्रस्थान है । खोपड़ी के अंदर जो टेढ़ी मेढ़ी गुरियों की सी बनावट होती है, जिसे मेण्डुला कहते है वहीं विचार और चेतना केन्द्रित है ।

        वही अंतःकरण है और उसी के सूक्ष्म मज्जा-तन्तु-जाल और कोशों की क्रिया द्वारा सारे मानसिक व्यापारी होते हैं ।

        ये तन्तु और कोश प्राणी की कशेरुका या रीढरज्जु से सम्पृक्त हैं ।

        भौतिकवादी वैज्ञानिकों के मत से चित्त, मन या आत्मा कोई पृथक् वस्तु नहीं है, केवल व्यापार- विशेष का नाम है।

        जो छोटे जीवों में बहुत ही अल्प परिमाण में होता है और बड़े जीवों में क्रमशः बढ़ता जाता है इस व्यापार का प्राणरस/ जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) के कुछ विकारों के साथ नित्य सम्बन्ध है।
        जीव-विज्ञानी कोशिका को जीवन का इकाई मानते हैं । मस्तिष्क के ब्रह्म (Bragma) भाग में पीनियल ग्रन्थि ही आत्मा का स्थान है ।

        👂👇👂👂 पीनियल ग्रन्थि (जिसे पीनियल पिण्ड, एपिफ़ीसिस सेरिब्रि, एपिफ़ीसिस या "तीसरा नेत्र" भी कहा जाता है।

        यह पृष्ठवंशी मस्तिष्क में स्थित एक छोटी-सी अंतःस्रावी ग्रंथि है। यह सेरोटोनिन और मेलाटोनिन को सृजन करती है, जोकि जागने/सोने के ढर्रे तथा मौसमी गतिविधियों का नियमन करने वाला हार्मोन का रूप है। ___________________________________
        इसका आकार एक छोटे से पाइन शंकु से मिलता-जुलता है (इसलिए तदनुसार इसका नाम करण हुआ ) और यह मस्तिष्क के केंद्र में दोनों गोलार्धों के बीच, खांचे में सिमटी हुई स्थिति में रहती है, जहां दोनों गोलकार चेतकीय पिंड जुड़ते हैं।

        उपस्थिति मानव में पीनियल ग्रंथी लाल-भूरे रंग की और लगभग चावल के दाने के बराबर आकार वाली (5-8 मिली-मीटर), ऊर्ध्व लघु उभार के ठीक पीछे, पार्श्विक चेतकीय पिण्डों के बीच, स्ट्रैया मेड्युलारिस के पीछे अवस्थित है।
        यह अधिचेतक भाग का अवयव है।

        पीनियल ग्रन्थि एक मध्यवर्ती संरचना है और अक्सर खोपड़ी के मध्य सामान्य एक्स-रे में देखी जा सकती है, क्योंकि प्रायः यह कैल्सीकृत होता है।

        पीनियल ग्रन्थि को आत्मा का आसन भी कहा जाता है ।
        --जो चेतनामय क्रियाओं की सञ्चालक है ।

        वस्तुत चित्त ही जीवात्मा का सञ्चालक रूप है ; और चित्त ही स्व है और स्व का अपने मूल रूप में स्थित होने का भाव ही स्वास्थ्य है ।

        और यह केवल और केवल योग से ही सम्भव है । योग संसार में सदीयों से आध्यात्मिक साधना-पद्धति का सिद्धि-विधायक रूप रहा है । और योग से ही ज्ञान का प्रकाश होता है ।

        और ज्ञान ही जान है ।
        अस्तित्व की पहिचान है ।

        कठोपोपनिषद में एक सुन्दर उपमा के माध्यम से आत्मा, बुद्धि ,मन तथा इन्द्रीयों के सम्बन्ध का पारस्परिक वर्णन इस किया गया है ।👇 __________________________________

        आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
        बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।। इन्द्रियाणि हयान् आहु: विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियं मनोयुक्तं भोक्ता इति आहुर्मनीषिणा ।। ( कठोपोपनिषद अध्याय १ वल्ली ३ मन्त्र ३-४ ) अर्थात् मनीषियों ने आत्मा को रथेष्ठा( रथ में बैठने वाला ) ही कहा है । अर्थात् --जो (केवल प्रेरक है और जो केवल बुद्धि के द्वारा मन को प्रेरित ही करता है।
        --जो स्वयं चालक नहीं है । यह शरीर रथ है । बुद्धि जिसमें सारथी तथा मन लगाम ( प्रग्रह)–पगाह इन्द्रियाँ ही रथ में जुते हुए घोड़े ।
        और आगे तो आप समझ ही गये होंगे ।

        एक विचारणीय तथ्य है कि आत्मा को प्रेरक सत्ता को रूप में स्वीकार किया जा सकती है ।

        --जो वास्तविक रूप में कर्ता भाव से रहित है । भारोपीय भाषाओं में प्रचलित है ।
        (प्रेत -Spirit ) शब्द आत्मा की प्रेरक सत्ता का ही बोधक है। आत्मा कर्म तो नहीं करता परन्तु प्रेरणा अवश्य करता है।

        और प्रेरणा कोई कर्म-- नहीं ! अत: आत्मा को प्रेत भी इसी कारण से कहा गया ।

        परन्तु कालान्तरण में अज्ञानता के प्रभाव से प्रेत का अर्थ ही बदल गया !

        इसीलिए आत्मा का विशेषण प्रेत शब्द सार्थक होना चाहिए।
        प्रेत शब्द पर हम आगे यथास्थान व्याख्या करेंगे ।
        कठोपोपनिषद का यह श्लोक श्रीमद्भगवत् गीता में भी था ।

        परन्तु उसे हटा दिया गया ।
        यह रथेष्ठा ही निष्क्रिय रहकर केवल प्रेरक बना रहता है ।
        वास्तव में रथेष्ठा की लौकिक उपमा बड़ी सार्थक बन पड़ी है ।
        रथेष्ठा की केवल इतनी ही भूमिका है कि 'वह प्रेरित करता है ।

        और यह शरीर वास्तव में एक रथ के समान है , तथा बुद्धि तो रथ हाँकने वाला सारथि जानलें । और मन केवल प्रग्रह ( पगाह)--या लगाम है।
        अब आत्मा बुद्धि को निर्देशित करती है।

        जिसका नियन्त्रण बुद्धिके हाथों में मन का नियन्त्रण होता है ।
        विद्वान कहते हैं कि इन्द्रियाँ ही रथ में जुते हुए घोड़े हैं ।
        और विषय ही मार्ग में आया हुआ ग्रास आदि । वस्तुत:-आत्मा ही मन और इन्द्रीयों से युक्त हो कर दु:ख और सुख उपभोग करने वाला भोक्ता है।
        जब मन में अहं का भाव हो जाय ।

        परन्तु यह सब अज्ञानता जनित प्रतीति है । क्यों कि दु:ख और सुख मन के विकल्प और द्वन्द्व की अवस्थाऐं हैं । जो परस्पर विरोधाभासी व सापेक्ष हैं । परन्तु आनन्द सुख से पूर्णत: भिन्न है ।

        आत्मा का स्वरूप इसी लिए (सत्-चित्-(चेतनामय)-आनन्द ) मनीषियों ने कहा है अर्थात्‌ सच्चिदानन्द। अब अज्ञानता से जीव सुख को ही आनन्द समझता है और सुख की सापेक्षिकता से दु:ख उसे मिलता है ।

        और यह द्वन्द्व (परस्पर विरोधी दो भावों का रूप ) ही सृष्टि का मूलाधार है ।
        यही हम्हें दु:ख और सुख के दो पाटों में पीसता है  ___________________________________

        पाँचवीं सदी में कृष्ण के आध्यात्मिक सिद्धान्तों की संग्राहिका उपनिषद् श्रीमद्भगवत् गीता इसी द्वन्द्व से मुक्त करने वाले ज्ञान का प्रतिपादन करती है । यद्यपि श्रीमद्भगवद्गीता में आध्यात्मिक ज्ञान से समन्वित श्लोकों को छोड़कर प्राय: श्लोक वर्णव्यवस्था के मण्डन हेतु जोड़े गये हैं । परन्तु गीता के आध्यात्मिक सिद्धान्त सत्य के सन्निकट ही हैं। जो सांख्य और वैदान्त के सिद्धान्तों का ही प्रतिपादन करते हैं।


        वस्तुत द्वन्द्व से परे होने के लिए मध्यम अथवा जिसे दूसरे शब्दों में समता का मार्ग भी कह सकते हैं अपनाना पड़ेगा ।
        क्यों संसार द्वन्द्व रूप है ।👇

        "अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः।।10.33।।
        मैं अक्षरों (वर्णमाला) में अकार और समासों में द्वन्द्व (नामक समास) हूँ मैं अक्षय काल और विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) धाता हूँ।।

        अर्थात्‌ ये मेरी विभूतियाँ हैं ।
        भाषा में स्वरों की सहायता के बिना शब्दों का उच्चारण नहीं किया जा सकता और उसमें भी "अ"।
        अ स्वर का ही उदात्त ऊर्ध्वगामी रूप "उ" तथा अनुदात्त निम्न गामी "इ" रूप है ।
        और इन तीनों स्वरों से सम्पूर्ण स्वर विकसित हुए  "अ" वर्ण का ही घर्षण रूप "ह" हुआ ।
        दौनों का पारस्परिक तादात्म्य-एकरूपता श्वाँस और धड़कन (हृत्स्पन्दन) के समान है ।
        "ह" प्रत्येक वर्ण में महाप्राण केरूप मे गुम्फित है । और "अ" आत्मा के रूप में ।
        अकार के इस महत्व को पहचान कर ही उपनिषदों में इसे समस्त वाणी का सार कहा गया है। हिब्रू संस्कृतियों तथा फोएनशियन आदि सैमेटिक भाषाओं अलेफ है ।

        मैं समासों में द्वन्द्व हूँ अर्थात्‌ द्वन्द्व ईश्वर की समासीय विभूति है । संस्कृत व्याकरण में दो या अधिक (पदों) को संयुक्त करने वाला विधान विशेष समास कहलाता है? जिसके अनेक प्रकार हैं।
        समास के दो पदों के संयोग का एक नया ही रूप होता है।

        द्वन्द्व समास में दोनों ही पदों का समान महत्व होता है? जबकि अन्य सभासों मे पूर्वपद अथवा उत्तरपद का।
        यहाँ भगवान श्रीकृष्ण द्वन्द्व समास को अपनी विभूति बनाते हैं क्योंकि इसमें उभय पदों का समान महत्व है और इसकी रचना भी सरल है। अध्यात्म ज्ञान के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि आत्मा और अनात्मा दोनों इस प्रकार मिले हैं कि हमें वे एक रूप में ही अनुभव में आते हैं और उनका भेद स्पष्ट ज्ञात नहीं होता?

        -जैसे माया और ईश्वर । परन्तु विवेकी पुरुष के लिए वे दोनों उतने ही विलग होते हैं जितने कि एक वैय्याकरण के लिए द्वन्द्व समास के दो पद। मैं अक्षय काल हूँ पहले भी यह उल्लेख किया जा चुका है कि गणना करने वालों में मैं काल हूँ।

        वहाँ सापेक्षिक काल का निर्देश था ? जबकि यहाँ अनन्त पारमार्थिक काल को इंगित किया गया है। अक्षय काल को ही महाकाल कहते हैं। संक्षेपत दोनों कथनों का तात्पर्य यह है कि मन के द्वारा परिच्छिन्न रूप में अनुभव किया जाने वाला काल तथा अनन्त काल इन दोनों का अधिष्ठान आत्मा है। प्रत्येक क्षणिक काल के भान के बिना सम्पूर्ण काल का ज्ञान असंभव है।

        अत: मैं प्रत्येक काल खण्ड में हूँ? तथा उसी प्रकार? सम्पूर्ण काल का भी अधिष्ठान हूँ।
        मैं धाता हूँ श्रीशंकराचार्य अपने भाष्य में इस शब्द की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि ईश्वर धाता अर्थात् कर्मफलविधाता है। द्वन्द्व को समझने का माध्यम योग है ।

        उस तराजू को योग करते हैं जिसको दौनों पलड़े बराबर हों ।

          -----------------------------------------------------
        अत: मन को ही आत्मा जब बुद्धि या ज्ञान शक्ति के द्वारा वशीभूत कर , इन्द्रीयों पर नियन्त्रण करती है । तब ही स्व की स्थति स्वास्थ्य है ।
        परन्तु कालान्तरण में -जब लोग अल्पज्ञानी हो गये तब अन्त्र (आँत) को ही आत्मा और उसकी क्रिया-विधि के सकारात्मक रूप को स्वास्थ्य कहने लगे । यानि शरीर की नीरोग अवस्था ।
        परन्तु आधुनिक योग शास्त्र के अनुसार तन ,मन और सामाजिक पृष्ठभूमि पर आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सभ्यता मूलक स्तर पर जो सन्तुष्ट है ; 'वह स्वस्थ है  ___________________________________
        आध्यात्मिक स्तर पर स्वास्थ्य से तात्पर्य है । आत्मा की मूल स्वाभाविक स्थिति" बौद्धमतावलंबी भी जो पुष्य-मित्र सुंग कालीन ब्राह्मणों के द्वारा व्याख्यायित ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते, परन्तु योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं।
        क्यों कि योग द्रविड़ो की आध्यात्मिक साधना-पद्धति है ।

        अत: योग पर केवल ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं । बौद्ध ,जैनों आदि सबने योग को स्वीकार किया । यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं। पतञ्जलि ने योगदर्शन में, जो परिभाषा दी है 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम योग है।

        इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं: चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं।

        परन्तु इस परिभाषा पर कई विद्वानों को आपत्ति है। उनका कहना है कि चित्तवृत्तियों के प्रवाह का ही नाम चित्त है।

        पूर्ण निरोध का अर्थ होगा चित्त के अस्तित्व का पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृतियों और संस्कारों का नि:शेष हो जाना। यदि ऐसा हो जाए तो फिर समाधि से उठना संभव नहीं होगा।
        क्योंकि उस अवस्था के सहारे के लिये कोई भी संस्कार बचा नहीं होगा, प्रारब्ध (फलित भाग्य) दहन हो गया होगा।

        निरोध यदि सम्भव हो तो श्रीकृष्ण के इस वाक्य का क्या अर्थ होगा ?
        योगस्थ: कुरु कर्माणि, योग में स्थित होकर कर्म करो।
        विरुद्धावस्था में कर्म हो नहीं सकता और उस अवस्था में कोई संस्कार नहीं पड़ सकते, स्मृतियाँ नहीं बन सकतीं, जो समाधि से उठने के बाद कर्म करने में सहायक हों।

        संक्षेप में आशय यह है कि योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक्‌ रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। क्यों जीवन ही कर्म मय है । 👇

        "न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
        कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।3.5।

        कोई भी मनुष्य कभी किसी भी क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता क्योंकि सभी प्राणी प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों द्वारा परवश हुए अवश्य ही कर्मों में प्रवृत्त कर दिये जाते हैं। यहाँ सभी प्राणीके साथ अज्ञानी विशेषण ( शब्द )जोड़ना चाहिये क्योंकि आगे के प्रकरण में जो गुणों से विचलित नहीं किया जा सकता इस कथन से ज्ञानियों को अलग किया है ।

        अतः अज्ञानियों के लिये ही कर्मयोग है ज्ञानियों के लिये नहीं। क्योंकि जो गुणों द्वारा विचलित या मोहित नहीं किये जा सकते उन ज्ञानियों में स्वतः क्रियाका अभाव होने से उनके लिये कर्मयोग सम्भव नहीं है। केवल लीला सदृश्य वे निष्काम कर्म करते हैं ; लोक हित के लिए ।
        परन्तु जब आत्मा से संयुक्त होकर कर्म और प्रारब्ध ही करते हैं जीवन की व्याख्या तब व्यक्ति संसार के चक्र में घूर्णन करता रहता है ।

        कालान्तरण में जब बुद्ध के सिद्धान्तों को समझने वाले बुद्धत्व से हीन हुए दो बुद्ध का मार्ग दो रूपों में विभाजित हुआ ।

        बौद्ध धर्म में प्रमुख सम्प्रदाय बन गये। हीनयान, थेरवाद, महायान, वज्रयान और नवयान, परन्तु बौद्ध धर्म एक ही था एवं सभी बौद्ध सम्प्रदाय बुद्ध के सिद्धान्त को तो मानते परन्तु व्याख्या अपने स्वार्थों के अनुकूल करने लगे।

        हीनयान अथवा 'स्थविरवाद' रूढिवादी बौद्ध परम्पराओं का पालन करने वाला एक सम्प्रदाय बन गया ।
        परिचय संपादित करें प्रथम बौद्ध धर्म की दो ही शाखाएं थीं, हीनयान निम्न वर्ग(गरीबी) और महायान उच्च वर्ग (अमीरी), हीनयान एक व्‍यक्त वादी धर्म था इसका शाब्दिक अर्थ है निम्‍न मार्ग। यह मार्ग केवल भिुक्षुओं के ही लिए ही सम्भव था।

        हीनयान सम्प्रदाय के लोग परिवर्तन अथवा सुधार के विरोधी थे। यह बौद्ध धर्म के प्राचीन आदर्शों का ज्‍यों त्‍यों बनाए रखना चाहते थे।

        हीनयान सम्प्रदाय के सभी ग्रन्थ पाली भाषा मे लिखे गए हैं। हीनयान बुद्ध की पूजा भगवान के रूप मे न करके बुद्ध को केवल महापुरुष मानते थे।

        हीनयान की साधना अत्‍यंत कठोर थी तथा वे भिक्षुु जीवन के हिमायती थे। हीनयान सम्प्रदाय श्रीलंका, बर्मा, जावा आदि देशों मे फैला हुआ है।
        बाद मे यह संप्रदाय दो भागों मे विभाजित हो गया- १-वैभाषिक एवं सौत्रान्तिक। इनका वर्णन वादरायण के ब्रह्-सूत्र में है । वैभाषिक मत की उत्‍पत्ति कश्‍मीर में हुई थी तथा सौतान्त्रिक तन्त्र-मन्त्र से संबंधित था।
        सौतांत्रिक संप्रदाय का सिद्धांत मंजूश्रीमूलकल्‍प एवं गुहा सामाज नामक ग्रंथ मे मिलता है।

        थेरवाद' शब्द का अर्थ है 'बड़े-बुज़ुर्गों का कहना'।
        बौद्ध धर्म की इस शाखा में पालि भाषा में लिखे हुए प्राचीन त्रिपिटक धार्मिक ग्रन्थों का पालन करने पर बल दिया जाता है।

        थेरवाद अनुयायियों का कहना है कि इस से वे बौद्ध धर्म को उसके मूल रूप में मानते हैं। इनके लिए गौतम बुद्ध एक गुरू एवं महापुरुष अवश्य हैं लेकिन कोई अवतार या ईश्वर नहीं। वे उन्हें पूजते नहीं और न ही उनके धार्मिक समारोहों में बुद्ध-पूजा होती है।

        जहाँ महायान बौद्ध परम्पराओं में देवी-देवताओं जैसे बहुत से दिव्य जीवों को माना जाता है वहाँ थेरवाद बौद्ध परम्पराओं में ऐसी किसी हस्ती को नहीं पूजा जाता।

        थेरवादियों का मानना है कि हर मनुष्य को स्वयं ही निर्वाण का मार्ग ढूंढना होता है।

        इन समुदायों में युवकों के भिक्षु बनने को बहुत शुभ माना जाता है ; और यहाँ यह प्रथा भी है कि युवक कुछ दिनों के लिए भिक्षु बनकर फिर गृहस्थ में लौट जाता है।

        थेरवाद शाखा दक्षिणी एशियाई क्षेत्रों में प्रचलित है, जैसे की श्रीलंका, बर्मा, कम्बोडिया, म्यान्मार, थाईलैंड और लाओस पहले ज़माने में 'थेरवाद' को 'हीनयान शाखा' कहा जाता था।

        बौद्ध धर्म का सबसे विकृत रूप वज्रयान के रूप में वर्णित हुआ ।

        वज्रयान को तांत्रिक बौद्ध धर्म, तंत्रयान मंत्रयान, गुप्त मंत्र, गूढ़ बौद्ध धर्म और विषमकोण शैली या वज्र रास्ता भी कहा जाता है। वज्रयान बौद्ध दर्शन और अभ्यास की एक जटिल और बहुमुखी प्रणाली है जिसका विकास कई सदियों में हुआ।

        वज्रयान संस्कृत शब्द, अर्थात हीरा या तड़ित का वाहन है, जो तांत्रिक बौद्ध धर्म भी कहलाता है तथा भारत व पड़ोसी देशों में  विशेषकर तिब्बत में बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण विकास समझा जाता है। बौद्ध धर्म के इतिहास में वज्रयान का उल्लेख महायान के आनुमानिक चिंतन से व्यक्तिगत जीवन में बौद्ध विचारों के पालन तक की यात्रा के लिये किया गया है।

        ‘वज्र’ शब्द का प्रयोग मनुष्य द्वारा स्वयं अपने व अपनी प्रकृति के बारे में की गई कल्पनाओं के विपरीत मनुष्य में निहित वास्तविक एवं अविनाशी स्वरूप के लिये किया जाता है।

        यान( रास्ता) ‘यान’ वास्तव में अंतिम मोक्ष और अविनाशी तत्त्व को प्राप्त करने की आध्यात्मिक यात्रा है। वज्रयानी ही कालान्तरण में सिद्ध कहलाए यह समय लगभग पाँचवीं-छठी शताब्दी है ।

        सिद्धों की परम्परा में जो वस्तु ब्राह्मण धर्म में बुरी मानी जाती थी, उसे ये अच्छी मानते थे। इनके मत में डोंबी, धोबिन, चांडाली या बालरंडा के साथ भोग करना विहित था।
        सरहपा की उक्तियाँ कण्ह की अपेक्षा अधिक तीखी हैं।
        इन्होंने भस्मपोत आचार्यों, पूजा-पाठ करते पंडितों, जैन क्षपणकों आदि सभी की निंदा की है। एक और परिचय सिद्ध सरहपा (आठवीं शती) हिन्दी के प्रथम कवि माने जाते हैं।

        उनके जन्म-स्थान को लेकर विवाद है। एक तिब्बती जनश्रुति के आधार पर उनका जन्म-स्थान उड़ीसा बताया गया है।

        एक जनश्रुति सहरसा जिले के पंचगछिया ग्राम को भी उनका जन्म-स्थान बताती है।
        राहुल सांकृत्यायन ने उनका निवास स्थान नालंदा और प्राच्य देश की राज्ञीनगरी दोनों ही बताया है। उन्होंने दोहाकोश में राज्ञीनगरी के भंगल (भागलपुर) या पुंड्रवद्रधन प्रदेश में होने का अनुमान किया है।

        अतः सरहपा को कोसी अंचल का कवि माना जा सकता है।
        सरहपा का चैरासी सिद्धों की प्रचलित तालिका में छठा स्थान है। उनका मूल नाम ‘राहुलभद्र’ था और उनके ‘सरोजवज्र’, ‘शरोरुहवज्र’, ‘पद्म’ तथा ‘पद्मवज्र’ नाम भी मिलते हैं। वे पालशासक धर्मपाल (770-810 ई.) के समकालीन थे।

        उनको बौद्ध धर्म की वज्रयान और सहजयान शाखा का प्रवर्तक तथा आदि सिद्ध माना जाता है। वे ब्राह्मणवादी वैदिक विचारधारा के विरोधी और विषमतामूलक समाज की जगह सहज मानवीय व्यवस्था के पक्षधर थे।
        ये बुद्ध को मार्ग से पूर्ण रूपेण पृथक हो गये ।

        योग को इन्होंने भोग का माध्यम बना लिया । दुनिया के करीब २ अरब (२९%) लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गये किंतु, अमेरिका के प्यु रिसर्च के अनुसार, विश्व में लगभग ५४ करोड़ लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी है, जो दुनिया की आबादी का 7% हिस्सा है। प्यु रिसर्च ने चीन, जापान व वियतनाम देशों के बौद्धों की संख्या बहुत ही कम बताई हैं, हालांकि यह देश सर्वाधिक बौद्ध आबादी वाले शीर्ष के तीन देश हैं। दुनिया के 200 से अधिक देशों में बौद्ध अनुयायी हैं।

        किंतु चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यान्मार, भूटान, श्रीलंका, कम्बोडिया, मंगोलिया, लाओस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया एवं उत्तर कोरिया समेत कुल 13 देशों में बौद्ध धर्म 'प्रमुख धर्म' धर्म है। भारत, नेपाल, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, रूस, ब्रुनेई, मलेशिया आदि देशों में भी लाखों और करोडों बौद्ध अनुयायी हैं। योग को बुद्ध ने जाना इससे पूर्व कृष्ण ने योग को जाना जैनियों के त्रेसठ शलाका पुरुषों में कृष्ण और बलराम का भी वर्णन है ।

        बुद्ध परम्परा में भी कृष्ण को माना ।
        योग सृष्टि के रहस्य को जानने रा सम्यक् विज्ञान है
        योग आत्म-साक्षात्कार की कुञ्जी है । ___________________________________

        यही सृष्टि -सञ्चालन का सिद्धान्त बडा़ अद्भुत कारण है। जिसे मानवीय बुद्धि अहंत्ता पूर्ण विधि से कदापि नहीं समझ सकती है।
        विश्वात्मा ही सम्पूर्ण चराचर जगत् की प्रेरक सत्ता है । और आत्मा प्राणी जीवन की , इसी सन्दर्भ में हम सर्व प्रथम आत्मा शब्द पर विचार-विश्लेषण करते हैं !

        सर्व प्रथम हम आत्मा शब्द पर विचार-विश्लेषण करें ! तो यह शब्द संसार की सम्पूर्ण सभ्य भाषाओं में विशेषत: भारोपीय भाषा परिवार में सदीयों से किन्हीं न किन्हीं रूपों में अवश्य विद्यमान रहा है।

        और मानव- जिज्ञासा का चरम लक्ष्य भी आत्मा की ही खोज है ; और होनी भी चाहिए ।
        क्योंकि मानव जीवन का सर्वोपरि मूल्य इसी में निहित है।

        .मैं यादव योगेश कुमार ''रोहि' इसी महान भाव से प्रेरित होकर उन तथ्यों को यहाँ उद् घाटित कर रहा हूँ।
        जो स्व -जीवन की प्रयोग शाला में दीर्घ कालिक साधनाओं के प्रयोग के परिणाम स्वरूप प्राप्त किए हैं।
        इन तथ्यों के अनुमोदन हेतु भागवत धर्म के प्रतिनिधि ग्रन्थ एवं औपनिषदीय साहित्य के मूर्धन्य ग्रन्थ श्री-मद्भगवद् गीता तथा अन्य उपनिषदों को उद्धृत किया गया है। यद्यपि श्रीमद्भगवद् गीता महाभारत के भीष्म पर्व का ही अंग है ।

        परन्तु यह महाभारत भी बुद्ध के परवर्ती काल खण्ड में पुष्यमित्र सुंग के विचारों के अनुमोदक ब्राह्मण समुदाय द्वारा समायोजित किया गया। गीता में जो आध्यात्मिक तथ्य हैं ।

        वह कृष्ण के मत के अनुमोदक अवश्य है ; कृष्ण की साक्षात् वाणी कदापि नहीं। वस्तुत वर्तमान श्रीमद्भगवद् गीता पाँचवीं सदी के बाद की रचना है । जिसमें -परोक्षत: -ब्रह्म-सूत्रपद के आश्रय से बौद्ध कालीन है ।
        श्रीमद्भगवद् गीता पाँचवीं सदी के वाद की रचना है ।👇 ___________________________________

        दूसरा प्रमाण कि श्रीमद्भगवद् गीता में -ब्रह्म-सूत्रपदों का वर्णन है। जिसमें बौद्ध दर्शन के चार सम्प्रदायों :- १-वैभाषिक २- सौत्रान्तिक ३-योगाचार ४- माध्यमिक का खण्डन है योगाचार और माध्यमिक बौद्ध सम्प्रदायों का विकास 350 ईस्वी के समकक्ष "असंग " और वसुबन्धु नामक बौद्ध भाईयों ने किया ।
        -ब्रह्म-सूत्रपदों की रचना बुद्ध के बाद पाँचवीं सदी में हुई । द्वन्द्व से मुक्त होने को श्रीमद्भगवत् गीता मे योग कहा । और प्रकृति द्वन्द्व मयी है ।👇 ___________________________________
        "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
        निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मावान् ( 2-46)   यावानर्थ उदपाने सर्वत: संप्लुतोदके . तावन्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: (2-45) -
        ---हे अर्जुुन सारे वेद सत्व, रज, और तम इन तीनों प्राकृतिक गुणों का ही प्रतिपादन करते हैं अर्थात्‌ इन्हीं तीनों गुणों से युक्त हैं इसलिए तुम इन तीनों को त्याग कर दु:ख-दुख आदि द्वन्द्वों को परे होकर  तथा नित्य सत्वगुण में स्थित योग-क्षेम को न चाहने वाले बनकर केवल आत्म-परायण बनो ! जैसे सब ओर से परिपूर्ण जलाशय को प्राप्त होकर छोटे गड्डों से कोई प्रयोजन नहीं रहता ; उसी प्रकार उपर्युक्त वर्णित तथ्यों को जानने वाले निर्द्वन्द्व व्यक्ति का वेदों से कोई प्रयोजन नहीं रहता !

        श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा यास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।।
        (श्रीमद्भगवद् गीता 2/53) जब वेदों के सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि है। समाधि में स्थिर होगी तब तू योग को प्राप्त कर सकेगा ! आशय यह कि वेदौं का अध्ययन व तदनुकूल आचरण करने से व्यक्ति की बुद्धि विचलित हो जाती है ; उसमें सत्य का निर्णय करने व किया उच्च  तत्व को समझने की बुद्धि नहीं रहती है । अब बताऐं कि किस प्रकार गीता और वेद समान हैं कभी नहीं  वस्तुत: गीता का प्रतिपाद्य विषय द्रविड़ो की योग पद्धति है ।
        बुद्ध के मध्यम-मार्ग का अनुमोदन "समता योग उच्यते योग: कर्मसुु कौशलम्"  तथ्य से पूर्ण रूपेण है ।

        योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनञ्जय। सिद्धय-असिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

        योग: कर्मसुु कौशलम्" ईश्वर और आत्मा के विषय में बुद्ध के विचार स्पष्ट ही कृष्ण दर्शन के अनुरूप हैं। विशेषत: मज्झ मग्ग ( मध्य मार्ग) महात्मा बुद्ध को उनके अनुयायी ईश्वर में विश्वास न रखने वाला कह कर बुद्ध को नास्तिक मानते हैं।

        इस सम्बन्ध में आजकल जो लोग अपने को बौद्धमत का अनुयायी कहते हैं उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की ही भरमार है ।

        जो ईश्वर और आत्मा की सत्ता को अस्वीकार करते हैं एक बड़ी कठिनाई महात्मा बुद्ध के यथार्थ विचार जानने में यह है कि उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा अब दीर्घनिकाय, मज्झिनिकाय, विनयमपिटक आदि जो भी ग्रन्थ महात्मा बुद्ध के नाम से पाये जाते हैं ; उनका संकलन उनके निर्वाण की कई शताब्दियों के पश्चात् किया गया जिनमें से बहुत-सी उक्तियां किंवदन्ती के ही रूप में हैं। महात्मा बुद्ध परलोक और पुनर्जन्म को मानते थे । इससे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। इसलिये उन्हें सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण देना अनावश्यक है।

        प्रथम प्रमाण के रूप में धम्मपद के जरावग्गो श्लोक (संख्या 153) देखें---

         अनेक जाति संसारं, सन्धाविस्सं अनिन्विस।
        गृहकारकं गवेस्संतो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।’

        महात्मा बुद्ध ने कहा है कि अनेक जन्मों तक मैं संसार में लगातार भटकता रहा।
        गृह निर्माण करने वाले की खोज में बार-बार जन्म दुःखमय हुआ। श्लोक का यह अर्थ महाबोधि सभा, सारनाथ-बनारस द्वारा प्रकाशित श्री अवध किशोर नारायण द्वारा अनुदित धम्मपद के अनुसार है। दूसरा प्रमाण ब्रह्मजाल सुत्त का है; जहां महात्मा बुद्ध ने अपने लाखों जन्मों के चित्तसमाधि आदि के द्वारा स्मरण का वर्णन किया है।

        ईश्वर सार्वजनिक विषय नहीं है । ईश्वर को मानना भी अपने ऊपर आस्थाओं की चादर डालना है।

        उससे केवल मन की उन्मुक्तता और उत्श्रृँखलता पर तो नियन्त्रण किया जा सकता है। परन्तु ईश्वर को नहीं जाना जा सकता है।

        क्योंकि वह निराकार और अनन्त है।  जन साधारण की बुद्धि से परे इसी लिए ईश्वरीय प्रतीक के रूप में मूर्ति या ईश्वर की कल्पित प्रतिमा की स्थापना की गयी जो वस्तुत श्रद्धा केन्द्रित करने का अवलम्बन मात्र थी ।

        "श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
        ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।39। (श्रीमद्भगवद्गीता चतुर्थ अध्याय-)
         
        अनुवाद:- जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

        श्रद्धा से से भी मनस् -शुद्धि द्वारा ज्ञान की ही प्राप्ति होती है।

        जन्म और मृत्यु परिवर्तन के ही प्रवाह हैं! न तो आत्मा जन्म ही लेती है और ना ही मरती है।
        परन्तु मन जो आत्मा और प्रकृति का मिश्रित रूप है
        जागता सोता मरता और जीता है।
        ईश्वर आदि ( प्रारम्भ) और अन्त से रहित असीम अस्तित्व है। जिसकी आँशिक अनुभूति तो सम्भव है परन्तु सम्पूर्ण अस्तित्व का दर्शन सम्भव और अनुभूति गद्य नहीं है।
        फिर जन साधारण के लिए उसकी व्याख्या भी नहीं की जा सकती है।
        अहं( ईगो) जीवन की सत्ता है अहंकार से संकल्प और संकल्प से इच्छाओं का प्रादुर्भाव ही जीवन के लिए उत्तरदायी है।
        परन्तु स्व ( स्वयं) रूप ही आत्मा का अस्तित्व बोधक है।

        अहं से हम और हम के भाव से स्व (आत्मा) की और जीवन के अग्रसर होने के लिए केवल कृष्ण ने निष्काम (कामना अथवा इच्छा रहित -) कर्म की प्रेरणा दी
        अहं जहाँ जीवन को सीमित दायरे में संकुचित और सीमित करता है वहीं स्व का भाव बोध असीम की और अनन्त की अनुभूति का कारण है।

        ___________    

        ज्ञान की स्थिति में मन द्वारा जो संकल्पित कर्म सम्पादित होता है। उसका परिणाम !

        और ज्ञान के अभाव में मन द्वारा संकल्पित  सम्पादित कार्य का परिणाम भिन्न भिन्न प्रभाव वाला होता है।

        श्रद्धा के  केन्द्रीकरण के आयाम सदैव स्थूल अवलम्बन का आश्रय लेते हैं। यही ईश्वर का साकार मान्य प्रतीक है।

        वैदिक काल में भी प्रतिमा शब्द इसी अर्थ में रूढ़ हो गया था।

        "कासीत्प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत्।
        छन्दः किमासीत्प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे ॥३॥ ( ऋग्वेद -१०/१३०/३)

        “{प्रमा= प्रमाणम्} 
        “प्रतिमा = हविष्प्रतियोगित्वेन मीयते निर्मीयते इति प्रतिमा देवता ।

        परन्तु मूर्ति पूजा तो एक श्रद्धा का निमित्ति कारण है। दर-असल ईश्वर को जानना ही श्रेयकर है।

        ईश्वरीय सत्ता का आंशिक ज्ञान भी तभी सम्भव है जब अन्त:करण चतुष्टय पूर्णत: दुर्वासना से रहित हो जाए  ! हमारी वासनाओं के आवेग ही मन में लालच की तरंगे पैंदा करते रहते हैं। जो दर्पण को मलिन करती रहती हैं। 

        अन्त: करण एक दर्पण के समान स्वच्छ हो जाए तो साधक ईश्वरीय आंशिक सत्ता की तात्विक अनुभूति सहज कर लेता है।  ईश्वर की पूर्ण सत्ता का अनुभव तो स्वयं ईश्वर भी नहीं कर पाता है।  यही ईश्वरीय असमर्थता है। ईश्वर नाम से अभिहित तत्व स्वयं में अपरिमेय है।

        उसके अनन्त अस्तित्व तो मापने का  कोई उपमान अथवा मानक  ही नही है।
        पूर्ण ईश्वर को किसी ने नहीं देखा उसको जानने के सिद्धान्त ही शेष रह जाते हैं। साधक भी ईश्वरीय" सत्ता का आँशिक अनुभव करता है।

        वह ईश्वर अपने आप में पूर्ण " अनन्त और अपरिमेय सत्ता है । 

        भारतीय मनीषीयों ने अपने साधना काल में उसकी एक आँशिक झलक अनुभत की थी 
        तब यह कहा -

        "पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
        पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

        वह ईश्वर अनन्त है, और यह (ब्रह्माण्ड) अनन्त है। अनन्त से अनन्त की प्राप्ति होती है। (तब) अनन्त की अनंतता लेते हुए, भी वह अनंत के रूप में भी अकेला रहता है।

        जिस प्रकार गणितीय प्रक्रिया में शून्य से शून्य को घटाया जाता है तो परिणाम शून्य ही आता है। उसी रूप मे ईश्वरीय अनन्तता को समझा जा सकता है।

        इसी लिए उस अनन्त अपरिमेय आत्मिक सत्ता को सजीव और निर्जीव से भी पृथक शून्य ( ∅ ) रूप में  उपमित किया गया जिसमें अनन्त काल तक आप परिक्रमण करते रहो कोई अवरोध नहीं आयेगा- आप जीवन पर्यन्त निरन्तर चलते रहोगे -पर उसका कभी गन्तव्य अवरोध नहीं आयेगा-

        हमारे सारे धार्मिक उपक्रम मन के शुद्धि करण के उपाय मात्र हैं। यदि यज्ञ अथवा किसी देवता की पूजा करने से अथवा तीर्थ यात्रा अथवा मन्दिर आदि के  द्वारा  मन न शुद्ध हो सके तो ये सारे उपक्रम व्यर्थ ही हैं।

        ईश्वरीय सत्ता के अन्वेषण अथवा अनुभूति के इसलिए साधक को निरन्तर मन के शुद्धि करण हेतु तप "संयम " और योग अभ्यास भी करना चाहिए 
        प्राचीन काल में साधक ही साधु संज्ञा के अधिकारी होते थे। 

        और सन्त भी  पूजा( साधना ) करने वाले होते थे।
        अरबी भाषा में प्रचलित शब्द (सनम) देव मूर्ति का वाचक है। 
        दरअसल जब लोग ईश्वरी सत्ता की परिकल्पना करते थे तो वे किसी इमेज के रूप में मूर्ति भी  बनाते थे।

        अरब  का यह सनम शब्द हिब्रू" अक्काडियन और अनेक सैमेटिक भाषाओं में कही  सनम- तो कहीं  "सलम आदि रूपों में प्रचलित है। 

        वैदिक तथा लौकिक संस्कृत में षण्-(सन्) धातु भ्वादिगणीय है। और दूसरी धातु सल्(शल्,) भी है जो स्तुति गमन और पार होने के अर्थ में प्रचलित है। षन् धातु का 
        लट् लकार (वर्तमान) में  रूप निम्नलिखित हैं ।

        एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
        प्रथमपुरुषः सनति सनतः सनन्ति
        (वह पूजा करता है/ वे दोनों पूजा करते हैं/ वे सब पूजा करते हैं।

        मध्यमपुरुषः सनसि सनथः सनथ
        ( तू पूजा करता है/ तुम दोनों पूजा करते हो/तुम सब पूजा करते हो/

        उत्तमपुरुषः सनामि सनावः सनामः
        ( मैं पूजा करता हूँ/ हम दोनों पूजा करते हैं/ हम सब पूजा करते हैं/

        मूर्तियों या निर्माण निराकार ईश्वर के साकार प्रतीक के विधान के तौर पर जन साधारण के लिए किया गया था।
        अरबी में 
         صنم فروش ( सनम-फ़रोस- , " मूर्ति विक्रेता )        (
        है।

        सेमिटिक मूल का ‘"सनम’ صنم शब्द बनता है स्वाद-नून-मीम ص ن م तीन वर्णो  से मिलकर यह शब्द बनता है।।

        इस्लाम से पहले सैमेटिक संस्कृति मूर्तिपूजक थी मनुष्य की धार्मिक प्रवृत्ति  बुतपरस्ती  के माध्यम से  ही प्रकट होती रही है।

        प्रतीक, प्रतिमा, सनम या बुत तब तक निर्गुण-निराकारवादियों को नहीं खटकते जब तक वे धर्म के सर्वोच्च प्रतीक के तौर पर पूजित न हों।
        मूर्ति पूजा या विधान जनसाधारण के लिए था।

        "सनम" का सन्दर्भ भी प्रतिमा के ऐसे ही रूप का है। कुरान की टीकाओं व अरबी कोशों भी सनम को “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” के तौर पर ही व्याख्यायित किया गया है।

        अनेक सन्दर्भों से पता चलता है कि "सनम" का व्युत्पत्तिक आधार हिब्रू भाषा का है और वहाँ से अरबी में दाखिल हुआ।

        हिब्रू में यह स-ल-म अर्थात( salem) है  एक स्तुति वाचक शब्द है।

        जिसमें बिम्ब, छाया अथवा प्रतिमा का आशय है। इस्लाम से पहले काबा में पूजी जाने वाली प्रतिमाओं के लिए भी" सनम शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है। 

        चूँकि “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध है इसलिए सनम, सनमक़दा और सनमपरस्ती का उल्लेख इस्लामीय शरीयत  के परवर्ती सन्दर्भों में तिरस्कार के नज़रिये से ही प्रचलित हुआ  है।

        प्राचीन सेमिटिक भाषाओं में अक्काद प्रमुख संस्कृति है जिसकी रिश्तेदारी हिब्रू और अरबी से रही है। 

        उत्तर पश्चिमी अक्काद और उत्तरी अरबी के शिलालेखों में भी सनम का (‘स-ल-म)’ रूप मिलता है। 
        दरअसल न और ल में बदलाव  की प्रवृत्ति भारतीय आर्यभाषाओं में भी होती रही है।

        मिसाल के तौर पर पश्चिमी बोलियों में लूण ऊत्तर-पूर्वी बोलियों में नून, नोन हो जाता है। इसी तरह नील, नीला जैसे उत्तर-पूर्वी उच्चार पश्चिम की राजस्थानी या मराठी में जाकर लील, लीलो हो जाते हैं।
        यही बात सलम के सनम रूपान्तर में सामने आ रही है।

        इस सन्दर्भ में S-l-M से यह भ्रम हो सकता है कि इस्लाम की मूल क्रिया धातु s-l-m और सनम वाला s-l-m भी एक है।

        दरअसल इस्लाम वाले स-ल-म में (सीन-लाम-मीम س ل م‎ है ! 

        जिसमें सर्वव्यापी, सुरक्षित और अखंड सलामती जैसे भाव हैं। जाहिर है ये वही तत्व हैं जिनसे शांति उपजती है।
        अत: सल् ( शल्) पार करना - स्तुति करना आदि अर्थ लेकर संस्कृत धातुपाठ में भी उपस्थित है।

        जबकि प्रतिमा के अर्थ वाले स-ल-म का मूल स्वाद-लाम-मीम है।

        ख़ास बात यह कि प्राचीन सामी सभ्यता में देवी पूजा का बोलबाला था।

        लात, मनात, उज्जा जैसी देवियों की प्रतिमाओं की पूजा प्रचलित थी। इसलिए बतौर सनम अनेक बार इन देवियों की प्रतिमाओं का आशय रहा। 

        बाद के दौर में सनम प्रतिमा के अर्थ में रूढ़ हो गया।

        इस सिलसिले की दिलचस्प बात ये है कि जहाँ बुत, मूर्ति या प्रतिमा जैसे शब्दों का प्रयोग ‘प्रियतम’ के अर्थ में नहीं होता मगर प्रतिमा के अर्थाधार से उठे शब्द में किस तरह प्रियतम का भाव भी समा गया।

        संस्कृत धातु पाठ में सन् - धातु का अर्थ पूजा-करना भी है।

        यहाँ समझने की बात यह है कि भारतीय संस्कृति में ईश्वर आराधना की प्रमुख दो पद्धति रही हैं- पहली है सगुण  अथवा साकार और दूसरी है निर्गुण अथवा निराकार।

        सगुण (साकार)  पद्धति में ईश्वर की उपासना करने वाले समूह में भी प्रतिमा, उस परमशक्ति का रूप नहीं है।
        जिस प्रतीक को परमशक्ति माना गया, उसकी प्रतिमा को  मात्र  ईश्वर की मानकर पूजा जाता है।

        भारतीय पुराणों में ब्राह्मा के चार पुत्र 
        सनत" सनत्कुमार" सनातन" सनन्दन " के नामों में भी यह सन् धातु समाविष्ट है।
        चारो शब्दों की व्युत्पत्ति " सन्= पूजायां धातु परक है।

        सन्त: शब्द के मूल में भी यही सन् धातु समाविष्ट है 
        मत्स्यपुराण के अनुसार सन्त शब्द की निम्न परिभाषा है :

        ब्राह्मणा: श्रुतिशब्दाश्च देवानां व्यक्तमूर्तय:।
        सम्पूज्या ब्रह्मणा ह्येतास्तेन सन्तः प्रचक्षते॥
        अनुवाद:-
        ब्राह्मण ग्रंथ और वेदों के शब्द, ये देवताओं की निर्देशिका मूर्तियां हैं। जिनके अंतःकरण में इनके और ब्रह्म का संयोग बना रहता है, वही सन्त कहलाते हैं।

        मनोज्ञैस्तत्र भावैस्ते सुखिनो ह्युपपेदिरे ।
        अतः शिष्टान्प्रवक्ष्यामि सतः साधूंस्तथैव च ।१९ ।
        सदिति ब्रह्मणः शब्दस्तद्वंतो ये भवंत्युत ।
        साजात्याद्ब्रह्मणस्त्वेते तेन सन्तः प्रचक्षते ।२०। 
        सन्दर्भ:-
        (ब्रह्माण्डपुराण /पूर्वभागः/अध्यायः ३२)

        सन्त' शब्द 'सत्' शब्द के कर्ताकारक का बहुवचन है। इसका अर्थ है - साधु, संन्यासी, विरक्त या त्यागी पुरुष या महात्मा आदि अर्थ है।

        सच्छब्दस्य प्रथमाबहुवचनान्तरूपञ्च ॥  
        (यथा -रघुःवंश महाकाव्य । १।१०। 

        रघुवंशम्-1.10

        श्लोकः-" तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति सदसद्व्यक्तिहेतवः।
        हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा ॥1.10॥
        अनुवाद:-
        उस वंश को सुनने को सत्य असत्य का निर्णय करने वाले सन्त ही योग्य है। 
        सोने की पवित्रता और कलौंच अग्नि ही में देखी जाती है ॥१.१०॥

        एक अन्य ग्रन्थ विश्वामित्रसंहिता- के अध्याय 27 के श्लोक 42 में "सन्त" की परिभाषा निम्नलिखित है।

        एककालं बलेर्हानौ द्विगुणं च बलिं हरेत् ।
        कुर्याच्च पूर्ववच्छेषमिति सन्तः प्रचक्षते ॥ 42॥

        पहले भारत को बुद्ध के द्वारा जाना गया था परन्तु अब भविष्य में कृष्ण के द्वारा भारत को जाना जाएगा इस्कॉन के द्वारा कृष्ण दर्शन यूरोप में प्रतिष्ठित हो गया

        अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ या इस्कॉन (अंग्रेज़ी: International Society for Krishna Consciousness - ISKCON; , को "हरे कृष्ण आन्दोलन" के नाम से भी जाना जाता है। इसे 1966 में न्यूयॉर्क नगर में भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने प्रारम्भ किया था।

        ये कायस्थ बंगाली परिवार में जन्में थे।
        इनके माता-पिता: श्रीमन गौड़ मोहन डे तथा श्रीमती रजनी डे थे।

        डे या डे आमतौर पर बंगाली समुदाय द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक उपनाम है। डे/डे अंतिम नाम देब/देव या देवा से लिया गया है।

        उपनाम मुख्य रूप से बंगाली कायस्थों के साथ जुड़ा हुआ है।

        अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (1 सितम्बर 1896 – 14 नवम्बर 1977) जिन्हें स्वामी श्रील भक्तिवेदान्त प्रभुपाद के नाम से भी जाना जाता है,सनातन हिन्दू धर्म के एक प्रसिद्ध गौडीय वैष्णव गुरु तथा धर्मप्रचारक थे।

        प्रस्तुतिकरण:- साधक - माताप्रसाद सिंह  व  योगेश कुमार रोहि- सम्पर्क सूत्र-8077160219





        यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।
        भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।
        (श्रीमद्भगवद्गीता-9/25) 
        अनुवाद:-
        देवताओं का पूजन करनेवाले  देवताओं को प्राप्त होते हैं। पितरों का पूजन करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूत-प्रेतों को ही प्राप्त होते हैं।
        परन्तु  हे अर्जुन!  मेरा पूजन करने वाले वैष्णव भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।

        ____________________
        सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
        अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।
         -श्रीमद्भगवद्गीता-(18.66)
        अनुवाद:-
        सब धर्मां का परित्याग करके मुझ एक की शरण में आ जा। मैं तुझे सारे पापों से छुड़ा दूँगा। तू  शोक मत कर।66।
             
                     


        इस संसार में प्रत्येक प्राणी के जीवन में  सभी घटित  घटनाओं और प्राप्त  वस्तुओं का अस्तित्व उद्देश्य पूर्ण और सार्थक ही है।  वह नियत है , और निश्चित भी है।

        भले हीं उसकी उपयोगिता हमारे जीवन के अनुकूल उस समय हो या नहो हो ।  क्योंकि उसकी घटित सूक्ष्म वास्तविकताओं का हम्हें  कभी स्थूल बोध ही नहीं होता है।

        लोगों को कभी भी  भविष्य में स्वयं द्वारा करने वाले कर्ता बनकर कर्मों के लिए दाबा नहीं करना चाहिए- और बीते हुए समय में  भूल से की गयी गलत क्रियाओं के लिए  भी पछतावा भी नहीं करना  चाहिए । बुद्धिमानी इसी में है। 

        हाँ भूत काल की घटनाओं से उनके सकारात्मक या नकारात्मक परिणामों से मनुष्य शिक्षा लेकर भविष्य की  सुधारात्मक परियोजना का  अवश्य विचार करना चाहिए  । 

        यद्यपि कर्म तो वर्तमान के ही धरातल पर सम्पादित  होता है। अत: वर्तमान को ही बहुत सजग तरीके जीना- जीवन की कला है।

        भविष्य की घटित घटनाओं का ज्ञान  स्थूल दृष्टि से तो कोई नहीं कर सकता है।
        परन्तु रात्रि के अन्तिम पहर में देखे हुए स्वप्न भी जीवन में सन्निकट भविष्य में होने वाली कुछ घटनाओं का प्रकाशन अवश्य करते  हैं।
        विज्ञान के युग में भी यह एक गूढ़ पहेली है। इसके मूल में न दि मत इच्छाऐं हैं और न आने वाले जीवन की परीक्षाऐं-

        ये भविष्य की घटनाएँ कभी प्रतिकूल प्रतीत होते हुए भी अनुकूल स्थितियों का निर्माण करती हैं । मनुष्य इसे नहीं जान पाता-

        और अनुकूल प्रतीत होते हुए भी वाली ये  घटनाएँ  प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्माण कर देती हैं।  ये सब तो प्रारब्ध का विधान ही है। प्रारब्ध कर्म संस्कार के धागों से निर्मित जीवन का मानचित्र( नक्शा) है।

        कभी कभी हम बचपन में केवल शोक अथवा सनक में ऐसी वस्तुओं का संग्रह कर लेते हैं जो उस समय तो निरर्थक और बेकार सी होती हैं परन्तु भविष्य में कभी उनकी उपयोगिता सार्थक हो जाती है। यह तो प्रारब्ध का विधान है।

        दर-असल प्रारब्ध अनेक जन्मों के मन के  निर्देशन द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों से किए गये कर्मों का सञ्चित रूप में से एक जीवन के  निर्देशन के लिए विभाजित रूप है। 
        अर्थात  ( एक जीवन में फलित परिस्थितियों और उपलब्धियों की सुलभता का नाम एक दूसरा नाम  है।  स्वभाव की रवानगी में यही प्रारब्ध ही  व्याप्त है। 

        यही प्रारब्ध  भाग्य संज्ञा से भी  अभिहित किया जाता है।

        परन्तु जब लोग स्वभाव के विपरीत संयम से कुछ नया करते हैं तब  वह साधना नवीन कर्म संस्कार का निर्माण करती है। 

        यही क्रियमाण कर्म है। जिससे आगामी जीवन के प्रारब्ध का निर्माण होता है।

        यही जीवन का सत्य है। हमने जीवन की प्रयोगशाला में  यह अनुभव रूपी प्रयोग भी किया है। यह प्रयोगशाला और प्रयोग सबका मौलिक ही होता है। सार्वजनिक कदापि नहीं -

         दुनियाँ के  सभी  प्राणियों  की क्रियाविधि काल के तन्तुओं से निर्मित‌ प्रारब्ध की डोर से नियन्त्रित है।

        परिस्थितियों के वस्त्रों में  है डोर या धागा  सबका प्रारब्ध का लगा है  इन वस्त्रों से  जीवन आवृत  है। और डोर वही प्रारब्ध ( भाग्य ) की लगी हुई  है।
        इसी लिए अहंकार रहित होकर कर्तव्य करने में ही जीवन की सार्थकता है।

        श्रीराधाकृष्णाभ्याम् नम: 


        हम यहाँ प्रथम रूप से भगवान्- विष्णु के अंशावतार परम वैष्णव नहुष के चरित्र की विशेषताओं को पौराणिक आधार पर मूल्यांकन करेंगे।

        नहुष की पत्नी विरजा का अन्य नाम "अशोक सुन्दरी" भी था जिन्हें  पार्वती ने अपनी पुत्री के रूप में कल्प-द्रुम से प्राप्त किया था हम उस प्रकृति की अंशरूपा विरजा अथवा अशोक सुन्दरी की जन्म गाथा को पद्मपुराण भूमि-खण्ड से प्रस्तुत करते हैं। -

                          "श्रीदेव्युवाच-
        वृक्षस्य कौतुकाद्भावान्मया वै प्रत्ययः कृतः।
        सद्यः प्राप्तं फलं भद्रे भवती रूपसम्पदा ।७१।

        अशोकसुन्दरी नाम्ना लोके ख्यातिं प्रयास्यसि ।
        सर्वसौभाग्यसम्पन्ना मम पुत्री न संशयः ।७२।

        सोमवंशेषु विख्यातो यथा देवः पुरन्दरः ।
        नहुषोनाम राजेन्द्रस्तव नाथो भविष्यति ।७३।

        एवं दत्वा वरं तस्यै जगाम गिरिजा गिरिम् ।
        कैलासं शङ्करेणापि मुदा परमया युता। ७४।


        "श्री देवी पार्वती ने अपनी पुत्री अशोक सुन्दरी से कहा :

        .इस कल्पद्रुम  के बारे में सच्चाई जानने की जिज्ञासा से ही मैंने पुत्री तुम्हारे बारे में  चिन्तन किया। हे भद्रे !, तुझे सौन्दर्य का धन रूपी फल तुरन्त प्राप्त हो जाता है तुम रूप सम्पदा हो। 71।

        तुम संसार में अशोकसुन्दरी के नाम से विख्यात होओंगी , तुम निःसंदेह सर्व सौभाग्य से सम्पन्न मेरी पुत्री हो।।72।

         राजाओं के स्वामी सम्राट, नहुष जो इंद्र के समान शक्ति शाली हैं।  चन्द्रवँश में प्रसिद्ध होंगे वे ही , तुम्हारे पति होंगे।73।

        इस प्रकार  पार्वती ने अशोक सुन्दरी को वरदान दिया और बड़ी खुशी के साथ शंकर के साथ कैलास पर्वत पर चली गईं।74।


        इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ।१०२।

        पुरुरवा पुत्र  आयुष को दत्तात्रेय का वरदान कि हे  आयुष तेरा  नहुष नाम से विष्णु का अंशवतार  पुत्र उत्पन्न होगा।  नीचे के श्लोकों में यह प्रमाण देखें प्रसंग रूप में प्रस्तुत है। ।
         
        देववीर्यं सुतेजं च अजेयं देवदानवैः ।
        क्षत्रियै राक्षसैर्घोरैर्दानवैः किन्नरैस्तथा ।१३१।
        "अनुवाद"- देवों के समान शक्तिशाली सुन्दर तेजयुक्त देव और दानवों, क्षत्रिय, राक्षस और दैत्यो तथा किन्नरों  द्वारा भी न जीता जाने वाला अजेय ( पुत्र होने का वरदान दीजिए) ।


        देवब्राह्मणसम्भक्तः प्रजापालो विशेषतः ।
        यज्वा दानपतिः शूरः शरणागतवत्सलः ।१३२।
        "अनुवाद"- जो विशेष रूप से देवों और ब्रह्मज्ञानी  का भक्त हो तथा वह प्रजापालक, यज्ञकरने वाला दानपति ,शूरवीर, और शरण में आये हुए का रक्षक और स्नेह करने वाला हो।१३२।

        दाता भोक्ता महात्मा च वेदशास्त्रेषु पण्डितः ।
        धनुर्वेदेषु निपुणः शास्त्रेषु च परायणः ।१३३।
        "अनुवाद"- वह दाता भोक्ता महात्मा और वेद शास्त्रों में पारंगत ( विशेषज्ञ) हो वह धनुर्वेद, में निपुण और सभी शास्त्रों के अध्ययन में लगा हुआ होना चाहिए ।१३३।

        अनाहतमतिर्धीरः सङ्ग्रामेष्वपराजितः ।
        एवं गुणः सुरूपश्च यस्माद्वंशः प्रसूयते ।१३४।
        "अनुवाद"- संग्राम ( युद्ध) अपराजित  कहीं पर भी चोट न खाने वाला, अधिक धैर्यशाली, रूप वा ने गुणसम्पन्न हो जिससे वंश चल सके ऐसा पुत्र होना चाहिए ।१३४।

        देहि पुत्रं महाभाग ममवंशप्रधारकम् ।
        यदि चापि वरो देयस्त्वया मे कृपया विभो ।१३५।
        "अनुवाद"- हे भगवन ! मुझे मेरे वंश को धारण करने वाला पुत्र दो । यदि आप  मुझ पर कृपा करके वर ही देना चाहते हो तो दीजिये ।१३५।

                      "दत्तात्रेय उवाच-
        एवमस्तु महाभाग तव पुत्रो भविष्यति ।
        गृहे वंशकरः पुण्यः सर्वजीवदयाकरः ।१३६।
        "अनुवाद"-दत्तात्रेय ने कहा - एसा ही हो
        तेरे घर में सभी जीवों पर दया करनेवाला पुण्य कर्म करने वाला भाग्यशाली पुत्र होगा।१३६।

        एभिर्गुणैस्तु संयुक्तो वैष्णवांशेन संयुतः ।***
        राजा च सार्वभौमश्च इन्द्रतुल्यो नरेश्वरः ।१३७।
        इन सभी गुणों से संयुक्त विष्णु के अंश से युक्त
        सार्वभौमिक राजा इन्द्र के तुल्य होगा। १३७।

        एवं खलु वरं दत्वा ददौ फलमनुत्तमम् ।
        भूपमाह महायोगी सुभार्यायै प्रदीयताम् ।१३८।
        "अनुवाद" इस प्रकार वरदान देकर महा योगी दत्तात्रेय ने आयुस को एक उत्त
         फल दिया और कहा कि इस फल को अपनी पत्नी को दो-।१३८।

        एवमुक्त्वा विसृज्यैव तमायुं प्रणतं पुरः ।
        आशीर्भिरभिनंद्यैव अन्तर्द्धानमधीयत ।१३९।
        "अनुवाद" इस प्रकार कहकर उस  नमन करते हुए राजा आयुष  को वही छोड़कर आशीर्वाद से आनन्दित कर दत्तात्रेय अन्तर्ध्यान हो गये।१३९।

        "प्रसंग-

        एक बार दत्तात्रेय की सेवा करते करते आयुष को जब कई दिनों का लंबा समय बीत गया, तो उस योगी  दत्तात्रेय ने उन्मत्तों  जैसा रूप धारण कर  राजा से कहा: हे राजन् “जैसा मैं तुमसे कहता हूं वैसा ही करो। मुझे प्याले में दाखमधु दो; और मांस का भोजन जो पक गया है उसे दो।” उनके इन शब्दों को सुनकर, पृथ्वी के स्वामी आयुष ने उत्सुक होकर, तुरन्त एक प्याले में शराब ली, और तुरंत अपने हाथ से अच्छी तरह से पका हुआ मांस काट लिया, और, राजा ने उसे दत्तात्रेय को दे दिया। वह श्रेष्ठ मुनि मन में प्रसन्न हो गये।

        विशेष- महायोगी दत्तात्रेय राजा आयुष की परीक्षा के लिए ही इस प्रकार का तामस भोजन लाने का आदेश देते हैं। ताकि राजा का दत्तात्रेय के प्रति समर्पण देखा जा सके।
         
        (आयुस की) भक्ति, पराक्रम और गुरु के प्रति महान सेवा को देखकर, महान योगी दत्तात्रेय ने राजाओं के भी राजा उस विनम्र आयुष से कहा:

        129. “हे राजन, आपका कल्याण हो, ऐसा वर मांगो जो पृथ्वी पर प्राप्त करना कठिन हो।” अब मैं तुम्हें वह सब कुछ दूँगा जो तुम चाहते हो।

        राजा ने कहा :

         हे मुनिश्रेष्ठ, आप मुझ पर दया करके सचमुच वरदान दे रहे हैं। तो मुझे सद् गुणों से संपन्न, सर्वज्ञ, , देवताओं की शक्ति से युक्त और देवताओं और दैत्यों, क्षत्रियों , दिग्गजों, भयंकर राक्षसों और किन्नरों से अजेय पुत्र दीजिए । (वह केवल ) देवताओं और ब्राह्मणों के प्रति समर्पित होना चाहिए, और (उसे) विशेष रूप से अपनी प्रजा की देखभाल करने वाला , त्यागी, दान का स्वामी (अर्थात् सर्वश्रेष्ठ दाता), शूरवीर, अपने आश्रय पाने वालों के प्रति स्नेही, दाता, भोक्ता, उदार और वेदों तथा पवित्र ग्रंथों का ज्ञाता, धनुर्वेद (अर्थात धनुर्विद्या) में कुशल होना चाहिए। और पवित्र उपदेशों में पारंगत हैं। उसकी बुद्धि (होनी चाहिए) और वह अजेय; बहादुर और युद्धों में अपराजित होना वाला हो। उसमें ऐसे गुण होने चाहिए, वह सुंदर होना चाहिए और ऐसा होना चाहिए जिससे वंश आगे बढ़े। हे महामहिम, यदि आप कृपा करके मुझे एक वरदान देना चाहते हैं, तो हे प्रभु, मुझे मेरे परिवार का भरण-पोषण करने वाला (ऐसा) पुत्र  अवश्य दीजिए।130-135.

        दत्तात्रेय ने कहा :

        ऐसा ही होगा, हे गौरवशाली राजी! आपके महल में एक पुत्र होगा, जो मेधावी होगा, आपके वंश को कायम रखेगा और सभी जीवित प्राणियों पर दया करेगा। वह  सभी सद्गुणों और विष्णु के अंश से संपन्न होगा। वह, मनुष्यों का स्वामी, इंद्र के बराबर एक संप्रभु सम्राट होगा।

        इस प्रकार उसे वरदान देने के बाद, महान ध्यानी योगी दत्तात्रेय ने राजा को एक उत्कृष्ट फल दिया और उससे कहा: "इसे अपनी पत्नी को देना।" इतना कहकर, और उस आयुस् को, जो उसके सामने नतमस्तक हुआ था, दत्तात्रेय  उसे  आशीर्वाद देकर , वह गायब हो गये।136-138-

        इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः।१०३।

        तावत्पुष्पसुवृष्टिं च चक्रुर्देवाः सुतोपरि ।
        ललितं सुस्वरं गीतं जगुर्गंधर्वकिन्नराः।५६।

        ऋषयो वेदमन्त्रैस्तु स्तुवन्ति नृपनन्दनम् ।
        वशिष्ठस्तं समालोक्य वरं वै दत्तवांस्तदा।५७।

        नहुषेत्येव ते नाम ख्यातं लोके भविष्यति ।
        हुषितो नैव तेनापि बालभावैर्नराधिप।५८।*******

        तस्मान्नहुष ते नाम देवपूज्यो भविष्यसि ।
        जातकर्मादिकं कर्म तस्य चक्रे द्विजोत्तमः।५९।

        व्रतदानं विसर्गं च गुरुशिष्यादिलक्षणम् ।
        वेदं चाधीत्य सम्पूर्णं षडङ्गं सपदक्रमम् ।६०।

        सर्वाण्येव च शास्त्राणि अधीत्य द्विजसत्तमात् ।
        वशिष्ठाच्च धनुर्वेदं सरहस्यं महामतिः।६१।

        शस्त्राण्यस्त्राणि दिव्यानि ग्राहमोक्षयुतानि च ।
        ज्ञानशास्त्रादिकं न्याय राजनीतिगुणादिकान् ।६२।

        वशिष्ठादायुपुत्रश्च शिष्यरूपेण भक्तिमान् ।
        एवं स सर्वनिष्पन्नो नाहुषश्चातिसुन्दरः ।६३।

        वशिष्ठस्य प्रसादाच्च चापबाणधरोभवत् ।६४।
        इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे पञ्चोत्तरशततमोऽध्यायः ।१०५।

        वसिष्ठ ने कहा :

        आप सभी ऋषिगण आकर बालक का दर्शन करें। यह (बालक) किसका है ? रात को इसे मेरे दरवाजे के आँगन में कौन लेकर आया है ? ऋषियों ने उस बालक को देवता या गंधर्व के बालक के समान और करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर देखा होगा।

        वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण  उस महान राजा आयु के पुत्र को देखकर अत्यंत जिज्ञासा और प्रसन्नता से पूर्ण हो गये। उस धर्मात्मा वसिष्ठ ने कुलीन आयु के पुत्र को देखकर उसके (अलौकिक) ज्ञान से यह जान लिया कि यह बालक  आयुष का पुत्र है और (अच्छे) आचरण से सम्पन्न है तथा उन्होंने बालक शत्रु बने  दुष्ट तथा दुष्टात्मा हुण्ड का वृत्तान्त भी यह जान लिया । .

        55-60. जब ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठ ने   (उसके लिए) दया करके बालक को अपने हाथों से उठाया, तो देवताओं ने बालक पर पुष्पों की वर्षा की । गंधर्व और किन्नर मनमोहक और मधुर गायन करते थे। ऋषियों ने वैदिक ऋचाओं से उस राजा के पुत्र की स्तुति की। 

        उसे देखकर वसिष्ठ ने उसी समय उसे वरदान दे दिया। “तुम्हारा नाम संसार में नहुष के नाम से प्रसिद्ध होगा । अपनी बालसुलभ भावनाओं के कारण, तुम उस हुण्ड के द्वारा नष्ट नहीं हुए। इसलिये तुम्हारा नाम नहुष होगा, और तुम्हें देवताओं द्वारा सम्मानित  किया जाएगा ।

         वशिष्ठ ने उनके जन्म पर समारोह आयोजित किया, और उन्हें व्रत, दान सिखाया और उन्हें शिक्षक के पास एक शिष्य के रूप में भेज दिया।

        60-63. एक छात्र के रूप में छह अंगों वाले वेदों और पद और क्रम  (उन्हें पढ़ने के तरीके) के साथ पूरी तरह से अध्ययन किया, सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण वशिष्ठ से सभी पवित्र पुस्तकों का अध्ययन किया, अपने रहस्यों के साथ तीरंदाजी, और (उपयोग) दिव्य हथियार और अग्नेयास्त्र के, साथ ही उन्हें पकड़ने और छोड़ने के तरीके, और ज्ञान की विभिन्न शाखाओं, तर्क विज्ञान, राजनीति जैसी उत्कृष्टताएं सीखीं , आयु का सुंदर और समर्पित पुत्र इस प्रकार पूरी तरह से निपुण हो गया। वसिष्ठ की कृपा से वह धनुष-बाण धारक (अर्थात् चलाने में कुशल) हो गया।

        सन्दर्भ:

        [1] :हुषिता-शब्द स्पष्ट नहीं है।

        [2] :पादक्रम- पाद वैदिक शब्दों को एक दूसरे से अलग करना है और क्रमा वैदिक पाठ को पढ़ने का विशेष तरीका है।

        नहुष का विष्णु के अंश से उत्पन्न होना- 


                        "कुञ्जल उवाच-
        गते तस्मिन्महाभागे दत्तात्रेये महामुनौ ।
        आजगाम महाराज आयुश्च स्वपुरं प्रति ।१।

        इन्दुमत्या गृहं हृष्टः प्रविवेश श्रियान्वितम् ।
        सर्वकामसमृद्धार्थमिन्द्रस्य सदनोपमम् ।२।

        राज्यं चक्रे स मेधावी यथा स्वर्गे पुरन्दरः ।
        स्वर्भानुसुतया सार्द्धमिन्दुमत्या द्विजोत्तम।३।

        सा च इन्दुमती राज्ञी गर्भमाप फलाशनात् ।
        दत्तात्रेयस्य वचनाद्दिव्यतेजः समन्वितम् ।४।

        इन्दुमत्या महाभाग स्वप्नं दृष्टमनुत्तमम् ।
        रात्रौ दिवान्वितं तात बहुमङ्गलदायकम् ।५।

        गृहान्तरे विशन्तं च पुरुषं सूर्यसन्निभम् ।
        मुक्तामालान्वितं विप्रं श्वेतवस्त्रेणशोभितम् ।६।

        श्वेतपुष्पकृतामाला तस्य कण्ठे विराजते ।
        सर्वाभरणशोभांगो दिव्यगन्धानुलेपनः ।७।

        चतुर्भुजः शङ्खपाणिर्गदाचक्रासिधारकः ।
        छत्रेण ध्रियमाणेन चन्द्रबिम्बानुकारिणा ।८।

        शोभमानो महातेजा दिव्याभरणभूषितः ।
        हारकङ्कणकेयूर नूपुराभ्यां विराजितः ।९।

        चन्द्रबिम्बानुकाराभ्यां कुण्डलाभ्यां विराजितः ।
        एवंविधो महाप्राज्ञो नरः कश्चित्समागतः ।१०।

        इन्दुमतीं समाहूय स्नापिता पयसा तदा ।
        शङ्खेन क्षीरपूर्णेन शशिवर्णेन भामिनी ।११।

        रत्नकाञ्चनबद्धेन सम्पूर्णेन पुनः पुनः ।
        श्वेतं नागं सुरूपं च सहस्रशिरसं वरम् ।१२।

        महामणियुतं दीप्तं धामज्वालासमाकुलम् ।
        क्षिप्तं तेन मुखप्रान्ते दत्तं मुक्ताफलं पुनः।१३।

        कण्ठे तस्याः स देवेश इन्दुमत्या महायशाः ।
        पद्मं हस्ते ततो दत्वा स्वस्थानं प्रति जग्मिवान् ।१४।

        एवंविधं महास्वप्नं तया दृष्टं सुतोत्तमम् ।
        समाचष्ट महाभागा आयुं भूमिपतीश्वरम् ।१५।

        समाकर्ण्य महाराजश्चिन्तयामास वै पुनः ।
        समाहूय गुरुं पश्चात्कथितं स्वप्नमुत्तमम् ।१६।

        शौनकं सुमहाभागं सर्वज्ञं ज्ञानिनां वरम् ।
        राजोवाच-
        अद्य रात्रौ महाभाग मम पत्न्या द्विजोत्तम ।१७।

        विप्रो गेहं विशन्दृष्टः किमिदं स्वप्नकारणम् ।
                        "शौनक उवाच-
        वरो दत्तस्तु ते पूर्वं दत्तात्रेयेण धीमता ।१८।

        आदिष्टं च फलं राज्ञां सुगुणं सुतहेतवे ।
        तत्फलं किं कृतं राजन्कस्मै त्वया निवेदितम् ।१९।

        सुभार्यायै मया दत्तमिति राज्ञोदितं वचः ।
        श्रुत्वोवाच महाप्राज्ञः शौनको द्विजसत्तमः ।२०।

        दत्तात्रेयप्रसादेन तव गेहे सुतोत्तमः।
        वैष्णवांशेन संयुक्तो भविष्यति न संशयः।२१।

        स्वप्नस्य कारणं राजन्नेतत्ते कथितं मया ।
        इन्द्रोपेन्द्र समः पुत्रो दिव्यवीर्यो भविष्यति ।२२।

        पुत्रस्ते सर्वधर्मात्मा सोमवंशस्य वर्द्धनः ।
        धनुर्वेदे च वेदे च सगुणोसौ भविष्यति ।२३।

        एवमुक्त्वा स राजानं शौनको गतवान्गृहम् ।
        हर्षेण महताविष्टो राजाभूत्प्रियया सह ।२४।

        कुंजल ने कहा :

        1-4. जब वे महामहिम महर्षि दत्तात्रेय चले गये, तब वे महान् राजा आयुष अपने नगर में (वापस) आये। वह प्रसन्न होकर वैभव से संपन्न, सभी वांछित वस्तुओं से संपन्न तथा इंद्र के भवन के समान दिखने वाले इन्दुमती साथ  महल में प्रवेश कर गये। हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ,  वह आयुष स्वर्ग में इंद्र की तरह, बुद्धिमान व्यक्ति स्वर्भानु (सूर्य- भानु) की बेटी इन्दुमती(प्रभा) के साथ अपने राज्य पर शासन करते थे। दत्तात्रेय के कहने पर रानी इन्दुमती ने फल खाने के परिणामस्वरूप दिव्य तेज से संपन्न एक पुत्र को जन्म दिया।

        5-14. हे महामहिम, इन्दुमती ने रात के अन्तिम प्रहर-के साथ दिन में (अर्थात प्रातःकाल) बहुत सी शुभ वस्तुएँ देने वाला एक उत्तम स्वप्न देखा।

        (उसने सपने में देखा) कि एक विप्र , जो सूर्य के समान, मोतियों की माला से सुसज्जित और सफेद वस्त्र से सुसज्जित है, उसके घर में प्रवेश कर रहा है। उसके गले में श्वेत पुष्पों से सुसज्जित माला चमक रही थी। उनका शरीर समस्त आभूषणों से सुशोभित और दिव्य चंदन से रंगा हुआ दिख रहा था। उसके चार हाथ थे, उसके हाथ में एक शंख था और एक गदा, एक चक्र और एक तलवार थी। 

        वह महान् कान्ति वाला, दिव्य आभूषणों से सुशोभित, चन्द्रमा के गोले के समान छाते से चमक रहा था, जो छाता (उसके ऊपर) रखा हुआ था। वह हार, कंगन, बाजूबन्द और पायल के साथ बेहद खूबसूरत लग रहे थे। वह (भी) चन्द्रमा की कक्षा के समान कान की बालियों से चमक रहा था। ऐसा ही एक अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति (वहां) आया. उसने इंदुमती को बुलाकर, बार-बार उस सुंदर महिला को  (अर्थात) दूध से भरे हुए शंख से नहलाया, जिसका रंग चंद्रमा के समान श्वेत था और जो रत्नों और सोने से सजाया गया था। उस इन्दुमती के मुँह में उस विप्र ने एक हजार फनों से ढका हुआ, मणि से युक्त तथा उज्ज्वल ज्वालाओं से भरा हुआ एक सफेद, सुंदर साँप का प्रवेश कराया । उसके गले में उसने एक मोती भी पहनाया। तब वह परम तेजस्वी विप्र देवराज इन्दुमती के हाथ में कमल देकर अपने स्थान को चले गया।

        15. इस प्रकार उसने एक महान् स्वप्न और सर्वोत्तम पुत्र देखा। इन्दुमती ने इसे राजाओं के स्वामी आयुष को सुनाया।

        16-17. यह सुनकर महान राजा ने फिर सोचा। तब परम तेजस्वी, सर्वज्ञ तथा विद्वानों में श्रेष्ठ अपने गुरु शौनक को बुलाकर उन्हें उत्तम स्वप्न का हाल सुनाया।

        राजा ने कहा :

        17-18. हे महामहिम, हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, आज (देर रात) मेरी पत्नी ने (स्वप्न में) एक साधु को घर में प्रवेश करते हुए देखा। इस सपने का क्या मतलब है? कृपया बताऐं।

        शौनक ने कहा :

        18-23. पूर्ण बुद्धिमान दत्तात्रेय ने तुम्हें वरदान दिया था; और रानी को पुत्र प्राप्ति के लिए एक अत्यंत प्रभावशाली फल देने का निर्देश भी दिया था। हे राजा, तुमने फल के साथ क्या किया? आपने इसे किसको दिया है ?

        शौनक द्वारा कहे गए वचनों को सुनकर, राजा ने कहा -"मैंने उस फल को अपनी अच्छी पत्नी को दे दिया है," परम बुद्धिमान, सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण शौनक ने कहा: "इसमें कोई संदेह नहीं है कि, दत्तात्रेय की कृपा से, विष्णु के अंश से युक्त सबसे अच्छा पुत्र आपके घर में पैदा होगा। 

        हे राजा, मैंने स्वप्न का यह अर्थ तुम्हें बता दिया है।(तुम्हारे घर में) एक दैवीय शक्ति वाला, इंद्र और विष्णु के समान पुत्र पैदा होगा। आपका पुत्र सभी अच्छे आचरणों की आत्मा होगा और  जो चंद्र वंश को कायम रखेगा। वह धनुर्विद्या और (ऋग्- वेद (आदि) के विज्ञान में भी कुशल होगा ।

        24. राजा से इस प्रकार कहकर शौनक अपने आश्रम को चले गये। तब राजा अपनी पत्नी सहित अत्यंत आनंद से परिपूर्ण हो गया था।

        सन्दर्भ:-इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे चतुरधिकशततमोऽध्यायः।१०४।

                  

        देवी भागवत पुराण- प्रकृति खण्ड- स्कन्ध नवम् अध्याय तृतीय) मे ंभी  इस  बालक के विषय में इसी प्रकार का वर्णन है कि -
        ब्रह्मपुत्र नारद! मन्त्रोपदेश के पश्चात् परम प्रभु श्रीकृष्ण ने उस बालक के भोजन की व्यवस्था की, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो ! प्रत्येक विश्व में वैष्णवजन जो कुछ भी नैवेद्य भगवान को अर्पण करते हैं,
        उसमें से सोलहवाँ भाग विष्णु को मिलता है और पंद्रह भाग इस बालक के लिये निश्चित हैं; क्योंकि यह बालक स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्ण का विराट-रूप है। यह बालक ही महाविष्णु है।
        विष्णु महाविष्णु और स्वराट् विष्णु में केवल कलाओं अथवा अंशों का ही भेद है ।
        अन्यथा ये सब एक ही रूप हैं।
        स्वराट् विष्णु ही गोलोक में  द्विभुजधारी सदा किशोर-वय श्रीकृष्ण हैं। जो परिपूर्णत्तम साकार ( अपर)ब्रह्म हैं। निराकार होने पर यही परब्रह्म हैं।
        संसार में इनके अवतरण भेद को हम छै(6) प्रकार से निरूपण करते हैं।
        गर्गसंहिता के वृन्दावन और विश्वजित् - खण्ड में इन कलाओं का निरूपण हुआ है। प्रथम रूप से बहुलाश्व और नारद मुनि का संवाद पिरस्तुत है।

                    "श्रीबहुलाश्व उवाच -
        कतिधा श्रीहरेर्विष्णोरवतारो भवत्यलम् ।
        साधूनां रक्षणार्थं हि कृपया वद मां प्रभो ।१५॥

                      श्रीनारद उवाच -
        अंशांशोंऽशस्तथावेशः कलापूर्णः प्रकथ्यते।
        व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम् ।१६॥

        अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा ।
        कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः ।१७॥

        पूर्णो नृसिंहो रामश्च श्वेतद्वीपाधिपो हरिः ।
        वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः ।१८॥

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ।
        असंख्यब्रह्माण्डपतिर्गोलोके धाम्नि राजते ।१९॥

        कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकिर्तिताः ।
        तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेंऽशांशा विदिताः प्रभोः।२०॥

        येषामन्तर्गतो विष्णुः कार्यं कृत्वा विनिर्गतः ।
        नानाऽऽवेशावतारांश्च विद्धि राजन्महामते ।२१॥

        धर्मं विज्ञाय कृत्वा यः पुनरन्तरधीयत ।
        युगे युगे वर्तमानः सोऽवतारः कला हरेः ।२२॥

        चतुर्व्यूहो भवेद्‌यत्र दृश्यन्ते च रसा नव ।
        अतः परं च वीर्याणि स तु पूर्णः प्रकथ्यते ।२३॥

        यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि ।
        तं वदन्ति परे साक्षात्परिपूर्णतमं स्वयम् ।२४॥

        पूर्णस्य लक्षणं यत्र तं पश्यन्ति पृथक् पृथक् ।
        भावेनापि जनाः सोऽयं परिपूर्णतमः स्वयम् ।२५॥

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि ।
        एककार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं  चकार ह ।२६।

        पूर्णः पुराणः पुरुषोत्तमोत्तमः
             परात्परो यः पुरुषः परेश्वरः ।
        स्वयं सदाऽऽनन्दमयं कृपाकरं
             गुणाकरं तं शरणं व्रजाम्यहम् ॥२७। 

        बहुलाश्व ने पूछा- मुनिवर ! संतों की रक्षा के लिये भगवान विष्णु के कितने प्रकार के अवतार होते हैं ? यह मुझे बताने की कृपा करें।१५।

        श्रीनारदजी बोले- राजन ! व्यास आदि मुनियों ने १-अंशांश, २-अंश, ३-आवेश, ४-कला, ५-पूर्ण और ६-परिपूर्णतम- ये छ: प्रकार के अवतार बताये हैं।

         इनमें से छठा परिपूर्णतम अवतार साक्षात श्रीकृष्ण ही हैं। मरीचि आदि “अंशांशावतार”,है।  ब्रह्मा आदि ‘अंशावतार’ है।, कपिल एवं कूर्म प्रभृति ‘कलावतार’ हैं। और परशुराम आदि ‘आवेशावतार’ कहे गये हैं। 

        नृसिंह,  राम, श्वेतद्वीपाधिपति हरि, वैकुण्ठ, यज्ञ और नर नारायण- ये ‘पूर्णावतार’ हैं एवं साक्षात भगवान भगवान श्रीकृष्ण ही ‘परिपूर्णतम’ अवतार हैं।

        अंसख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति वे प्रभु गोलोकधाम में विराजते हैं। जो भगवान के दिये सृष्टि आदि कार्यमात्र के अधिकार का पालन करते हैं, वे ब्रह्मा आदि ‘सत’ (सत्स्वरूप भगवान) के अंश हैं। जो उन अंशों के कार्यभार में हाथ बटाते हैं, वे ‘अंशांशावतार’ के नाम से विख्यात हैं। परम बुद्धिमान नरेश ! भगवान विष्णु स्वयं जिनके अंत:करण में आविष्ट हो, अभीष्ट कार्य का सम्पादन करके फिर अलग हो जाते हैं, राजन ! ऐसे नानाविध अवतारों को ‘आवेशावतार’ समझो। ( जिस प्रकार किसी व्यक्ति पर कुछ समय के लिए कोई प्रेत या भूत आवेश उत्पन्न कर फिर शान्त हो जाता है। उसी प्रकार आवेश अवतार है। 

        और जो प्रत्येक युग में प्रकट हो, युगधर्म को जानकर, उसकी स्थापना करके, पुन: अन्तर्धान( गायब) हो जाते हैं, भगवान के उन अवतारों को ‘कलावतार’ कहा गया है।

        जहाँ चार व्यूह प्रकट हों- जैसे श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न एवं वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरूद्ध, तथा जहाँ नौ रसों की अभिव्यक्ति देखी जाती हो एवं जहाँ बल-पराक्रम की भी पराकाष्ठा दृष्टिगोचर होती हो, भगवान के उस अवतार को ‘पूर्णावतार’ कहा गया है।

        "जिसके अपने तेज में अन्य सम्पूर्ण तेज विलीन हो जाते हैं, भगवान के उस अवतार को श्रेष्ठ विद्वान पुरुष साक्षात ‘परिपूर्णत्तम’ अवतार  बताते हैं


        जिस अवतार में पूर्ण का पूर्ण लक्षण दृष्टिगोचर होता है और मनुष्य जिसे पृथक-पृथक भाव के अनुसार अपने परम प्रिय रूप में देखते हैं, वही यह साक्षात ‘परिपूर्णत्तम’ अवतार है।

         [इन सभी लक्षणों से सम्पन्न] स्वयं परिपूर्णत्तम भगवान श्रीकृष्ण ही हैं, दूसरा नहीं; क्योंकि श्रीकृष्ण ने एक कार्य के उद्देश्य से अवतार लेकर अन्यान्य करोड़ों कार्यों का सम्पादन किया है। जो पूर्ण, पुराण पुरुषोत्तमोत्तम एवं परात्पर पुरुष परमेश्वर हैं, उन साक्षात सदानन्दमय, कृपानिधि, गुणों के आकार भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र की मैं शरण लेता हूँ।

        श्रीगर्ग-संहिता में गोलोक खण्ड के अन्तदर्गत नारद- बहुलाश्व् संवाद में ‘श्रीकृष्णम माहात्मय का वर्णन’ नामक पहला अध्याय पूरा हुआ।


        इसी गर्गसंहिता ग्रन्थ में आगे भी विश्वजित्-खण्ड में  राजा-गुणाकर और वामदेव ऋषि के आध्यात्मिक संवाद के रूप में भी कृष्ण के अवतार भेदों का निरूपण हुआ है। दखें- निम्नलिखित श्लोक-

                      "गुणाकर उवाच।
        परिपूर्णतमस्यापि श्रीकृष्णस्य महात्मनः ।।
        लक्षणं वद मे ब्रह्मंस्त्वं परावरवित्तमः ।४५।।

                       "वामदेव उवाच"
        यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयंते स्वतेजसि ।।
        तं वदंति परं साक्षात्परिपूर्णतमं हरिम् । ४६ ।।

        अंशांशोंशस्तथावेशः कला पूर्णः प्रकथ्यते ।।
        व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम् ।४७।।

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि ।।
        एककार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं चकार ह ।४८।।

        गुणाकर ने कहा- 

        ब्रह्मन ! आप परावर( पराविद्या और अपराविद्या) वेत्ताओं में श्रेष्‍ठ हैं; अत: मुझे परिपूर्णतम परमात्‍मा श्रीकृष्‍ण का लक्षण बताइये।

        वामदेवजी बोले-जिनके अपने तेज में अन्‍य सारे तेज लीन हो जाते हैं, **

        उन्‍हें साक्षात परिपूर्णत्तम परमात्‍मा श्रीकृष्ण कहते हैं। अंशांश, अंश, आवेश, कला तथा पूर्ण अवतार के ये पांच भेद हैं। व्‍यास आदि महर्षियों ने छठा श्रीकृष्ण को परिपूर्णत्तम अवतार  कहा है।

        दूसरा नहीं: क्‍योंकि उन्‍होंने एक कार्य के लिये आकर करोड़ों कार्य सिद्ध किये हैं।
        सन्दर्भ:-



        📚: गोलोक से भूलोक तक "पञ्चम वर्ण गोपों की सृष्टि -

        "गोपालक (पुरुरवा) की पत्नी आभीर कन्या उर्वशी का प्रचीन प्रसंग व  विवरण- 
        गायत्री अहीरों की सबसे विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम कन्या सिद्ध होती हैं।

        इसी लिए स्वयं विष्णु भगवान ने ब्रह्मा के यज्ञ-सत्र में गायत्री की भूरि -भूरि प्रशंसा की है।
        गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता पद पर नियुक्त किया गया। संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।

        गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम गोविल( नरेन्द्रसेन) था।
        दोनों का सम्बन्ध गो तथा गोलोक से है।

        विशेष:- गोपों को ही संसार में धर्म का आदि प्रसारक माना गया है। ऋग्वेद में वर्णित है कि भगवान विष्णु गोप रूप में धर्म को धारण किये हुए हैं।

        आभीर लोग प्राचीन काल से ही व्रती, धर्म वत्सल और सदाचार सम्पन्न होते थे। स्वयं भगवान् विष्णु ने सतयुग में भी अहीरों के समान किसी अन्य जाति को व्रती और सदाचारीयों में सम्पन्न न जानकर अहीरों को ही सदाचार सम्पन्न और धर्मवत्सल स्वीकार किया है।

        और इसी कारण से विष्णु ने अपना अवतरण भी इन्हीं अहीरों की जाति में लेना स्वीकार किया। वैदिक ऋचाओं में विष्णु का गोप होना सर्वविदित ही है।

        ___________________

        हम बात करते हैं पद्मपुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय-17 में वर्णित- अहीरों की जाति में भगवान कृष्ण के रूप में विष्णु के निम्नलिखित तीन श्लोक की :- जिसमें प्रथम श्लोक में अहीरों को धर्मतत्व का ज्ञाता होना तथा सदाचारी होना सूचित किया गया है।
         इसके बाद के श्लोकों में गायत्री के द्वारा आभीर जाति का उद्धार करने वाला बताकर तृतीय श्लोक में विष्णु द्वारा अपने अवतरण की स्वीकृति अहीरों को दे दी गयी है।

        ये तीनों बाते हीं सिद्ध करती हैं कि अहीरों की जाति सबसे प्राचीन और पवित्र है जिसमें स्वयं भगवान विष्णु अवतरण करते हैं।
        पद्मपुराण सृ्ष्टिखण्ड के (१७) वें अध्याय के निम्न लिखित श्लोक विचारणीय है।

        "धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्। मया ज्ञात्वा ततःकन्या दत्ता चैषा विरञ्चये।१५।
        ___________________________________

        "अनया गायत्र्या तारितो गच्छ युवां भो आभीरा ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
        युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।

        "अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।

        अनुवाद -विष्णु ने अहीरों से कहा मैंने तुमको धर्मज्ञ और धार्मिक, सदाचारी तथा धर्मवत्सल जानकर तुम्हारी इस गायत्री नामकी कन्या को ब्रह्मा के लिए यज्ञकार्य हेतु पत्नी रूप में दिया है। (क्योंकि यज्ञ एक व्रतानुष्ठान ही है)। और अहीर कन्याऐं सदैव कठिन व्रतों का पालन करती हैं।
        हे अहीरों ! इस गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब लोग ! दिव्यलोकों को जाओ- और तुम्हारी अहीर जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों की कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा (अवतारं करिष्येहं ) और वहीं मेरी सांसारिक लीला (क्रीडा) होगी जब धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।

        निष्कर्ष:- उपर्युक्त श्लोकों में भगवान विष्णु संसार में अहीरों को ही सबसे बड़े धर्मज्ञ ' धार्मिक सदाचारी और सुव्रतज्ञ (अच्छे व्रतों को जानने वाला ) मानते हैं और इसी लिए उनका सांसारिक कल्याण करने के लिए उनकी ही अहीर जाति में अवतरण करते हैं।

        गोप लोग विष्णु के शरीर से उनके रोमकूपों से उत्पन्न होते हैं। अत: ये वैष्णव जन हैं।

        ब्रह्मवैवर्तपुराण में लिखा है कि वैष्णव ही इन अहीरों का वर्ण है।

        गोपों अथवा अहीरों की सृष्टि चातुर्यवर्ण- व्यवस्था से पृथक (अलग) है। क्यों कि ब्रह्मा आदि देव भी विष्णु के नाभि कमल से उत्पन्न होते हैं तो गोप सीधे विष्णु के शरीर के रोम कूपों से उत्पन्न होते हैं। इसीलिए ब्रह्मवैवर्त पुराण में गोपों को वैष्णव वर्ण में समाविष्ट ( included ) किया गया है।

        "पाद्मे विष्णोर्नाभिपद्मे स्रष्टा सृष्टिं विनिर्ममे । त्रिलोकीं ब्रह्मलोकान्तां नित्यलोकत्रयं विना ।१५।
        अनुवाद:-
        तत्पश्चात् पाद्म कल्प में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने विष्णु के नाभि कमल से उत्पन्न हो सृष्टि का निर्माण किया।

        ब्रह्मलोक पर्यन्त जो त्रिलोकी है, उसी की रचना ब्रह्मा ने की परन्तु , ऊपर के जो नित्य तीन लोक हैं, उनकी रचना ब्रह्मा ने नहीं की।

        "सा च सम्भाष्य गोविन्दं रत्नसिंहासने वरे । 
        उवास सस्मिता भर्तुः पश्यन्ती मुखपङ्कजम्।३९।
        तस्याश्च लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपाङ्गनागणः।आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः ।1.5.४०।
        कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।। आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२ ।

        त्रिंशत्कोटिपरिमितः कमनीयो मनोहरः ।।संख्याविद्भिश्च संख्यातो बल्लवानां गणः श्रुतौ।४३।
        कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यश्चाविर्बभूव ह ।। नानावर्णो गोगणश्च शश्वत्सुस्थिरयौवनः ।४४।
        (श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे सौतिशौनकसंवादे)
        सृष्टिनिरूपणे ब्रह्मखण्डे पञ्चमोऽध्यायः ।५।

        अनुवाद:- वह गोविन्द से वार्तालाप करके उनकी आज्ञा पा मुसकराती हुई श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासन पर बैठ गयीं। उनकी दृष्टि अपने उन प्राणवल्लभ के मुखारविन्द पर ही लगी हुई थी। उस किशोरी के रोमकूपों से तत्काल ही गोपांगनाओं का आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेष के द्वारा भी उसी की समानता करती थीं। उनकी संख्या लक्षकोटि थी। वे सब-की-सब नित्य सुस्थिर-यौवना थीं। संख्या के जानकार विद्वानों ने गोलोक में गोपांगनाओं की उक्त संख्या ही निर्धारित की है।

        मुने ! फिर तो श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी उसी क्षण गोपगणों का आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेष में भी उन्हीं के समान थे। संख्यावेत्ता महर्षियों का कथन है कि श्रुति में गोलोक के कमनीय मनोहर रूप वाले गोपों की संख्या तीस करोड़ बतायी गयी है।

        ब्रह्म वैवर्त पुराण एकादश -अध्याय श्लोक संख्या (४१)
        निम्नलिखित श्लोक में ब्राह्मण" क्षत्रिय" वैश्य" और शूद्र वर्ण के अतिरिक्त एक स्वतन्त्र जाति और वर्ण भी माना गया है। जिसे वैष्णव नाम दिया गया है। 

        जो विष्णु से सम्बन्धित अथवा उनके रोमकूपों से उत्पन्न है।

        विष्णुर्देवताऽस्य तस्येदं वा अण् वैष्णव -विष्णू पासके विष्णोर्जातो इति वैष्णव विष्णुसम्बन्धिनि च स्त्रियां ङीप् वैष्णवी- दुर्गा गायत्री आदि।

        ___________________
        "ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा। स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वेष्वस्मिन्वैष्णवाभिधा ।४३।।

        अनुवाद:-ब्राह्मण' क्षत्रिय 'वैश्य और शूद्र जो चार जातियाँ जैसे इस विश्व में हैं वैसे ही वैष्णव नाम कि एक स्वतन्त्र जाति व वर्ण भी इस संसार में है ।४३।
        उपर्युक्त श्लोक में पञ्चम जाति व वर्ण के रूप में भागवत धर्म के प्रर्वतक आभीर / यादव लोगो को स्वीकार किया गया है। 
        क्योंकि वैष्णव शब्द भागवत शब्द का ही पर्याय है।

        विष्णु का परम पद, परम धाम दिव्य- आकाश में स्थित एवं सूर्य के समान देदीप्यमान माना गया है 

        तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥२०॥

        देवता — विष्णुः ; छन्द — गायत्री;
        स्वर — षड्जः; ऋषि — मेधातिथिः काण्वः

        (सूरयः) बहुत से सूर्य (दिवि) आकाश में (आततम्) फैले हुए (चक्षुरिव) नेत्रों के समान जो (विष्णोः) विष्णु भगवान् ! (परमम्) उत्तम से उत्तम (पदम्) स्थान को ! (तत्) उसको (पश्यन्ति) देखते हैं॥20॥(ऋग्वेद १/२२/२०)।

        इसी प्रकार का वर्णन भविष्य पुराण में भी ऋग्वेद का उपर्युक्त श्लोक है।

        तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूरयः ।।
        दिवीव चक्षुराततम् ।।१९।।

        पीतवस्त्रेण कृष्णाय श्वेतवस्त्रेण शूलिने।।
        कौसुंभवस्त्रेणाढ्येन गौरीमुद्दिश्य दापयेत्।।4.130.२०।।

        इति श्रीभविष्ये महापुराण उत्तरपर्वणि श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादे दीपदानविधिवर्णनं नाम त्रिंशदुत्तरशततमोऽध्यायः।।१३०।।

        उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥५॥

        अर्थानुवाद:-
        (यत्र) जिसमें (देवयवः) देवों का अन्न( जौ) (नरः) जन (मदन्ति) आनन्दित होते हैं (तत्) उस (अस्य) इस (उरुक्रमस्य) अनन्त पराक्रमयुक्त (विष्णोः) के (प्रियम्) प्रिय (पाथः) मार्ग को (अभ्यश्याम्) सब ओर से प्राप्त होऊँ, जिस परमात्मा के (परमे) अत्युत्तम (पदे) प्राप्त होने योग्य पद में (मधवः) मधुरादि गुणयुक्त पदार्थ का (उत्सः) श्रोत- वर्तमान है (सः, हि) वही (इत्था) इस प्रकार से हमारा (बन्धुः) भाई के समान है ॥५॥

        ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः।
        अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ॥६॥

        (यत्र) जहाँ (अयासः) स्थित हुईं (भूरिशृङ्गाः) बहुत सींगों वाली (गावः)गायें हैं (ता) उन (वास्तूनि)

        तृतीय क्रम में वही शक्ति सतयुग के  प्रथम चरण में नन्दसेन / नरेन्द्र सेन अथवा गोविल आभीर की पुत्री के रूप में जन्म लेती हैं और बचपन से ही गायत्री गोपालन और गो दुग्ध का दोहन भी करती हैं। 

        अत: पद्मपुराण सृष्टि खण्ड में गायत्री का दुहिता सम्बोधन प्राप्त है।
        भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में आज तक ग्रामीण क्षेत्र में लड़की ही गाय-भैंस का दूध दुहती है। यह उसी परम्परा अवशेष हैं।


        गोपालक (पुरुरवा) की पत्नी आभीर कन्या उर्वशी का प्रचीन प्रसंग का विवरण- 
        गायत्री अहीरों की सबसे विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम कन्या सिद्ध होती हैं। इसी लिए स्वयं विष्णु भगवान ने ब्रह्मा के यज्ञ-सत्र में गायत्री की भूरि -भूरि प्रशंसा की है। गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता पद पर नियुक्त किया गया। संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।
        गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम नन्दसेन/अथवा नरेन्द्र सेन आभीर था। जो आनर्त (गुजरात) में निवास करते थे

        मत्कृते येऽत्र शापिता शावित्र्या ब्राह्मणा सुरा:। तेषां अहं करिष्यामि शक्त्या साधारणां स्वयम्।।७।।
        "अनुवाद:-मेरे कारण ये ब्राह्मण और देवगण सावित्री के द्वारा शापित हुए हैं‌। उन सबको मैं (गायत्री) अपनी शक्ति से साधारणत: पूर्ववत् कर दुँगी।।७।।

        किसी के द्वारा दिए गये शाप को 
        समाप्त कर समान्य करना और समान्य
        को फिर वरदान में बदल देना 
        अर्थात जो शापित थे उनको वरदान देना
        यह कार्य आभीर कन्या गायत्री के द्वारा
        ही सम्भव हो सका ।  
        अन्यथा कोई देवता किसी अन्य के द्वारा दिए गये शाप का शमन नहीं कर सकता है।

        अपूज्योऽयं विधिः प्रोक्तस्तया मन्त्रपुरःसरः॥ सर्वेषामेव वर्णानां विप्रादीनां सुरोत्तमाः॥८।
        "अनुवाद:-यह ब्रह्मा (विधि) अपूज्य हो यह उस सावित्री के द्वारा कहा गया था परन्तु विपरीत है।


        गायत्री के मातापिता गोविल और गेविला गोलोक से सम्बन्धित हैं।
        क्योंकि ब्रह्मा ने अपने यज्ञ सत्र नें अपनी सृष्टि को ही आमन्त्रित किया था  चातुर्यवर्ण, सप्तर्षि देवतागण आदि सभी यज्ञ में उपस्थित थे।

        गायत्री की उत्पत्ति भी गोपों में हुयी है। 

        गोविल-गोविला- गायत्री -गोप गोविन्द गोपाल आदि -

        ________________

        गर्ग संहिता
        गोलोक खण्ड : अध्याय- (3) इस अध्याय में विष्णु के सभी अवतारों का विलय भगवान श्री कृष्ण में अपनी शक्ति के अनुरूप शरीर के विशेष 
        स्थानों में होता है। 

        भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान

        श्री जनकजी ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें।

        श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये। उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं। वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। 
        वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

        _________________________________
        तदैव चागतः साक्षाद्‌रामो राजीवलोचनः ।
        धनुर्बाणधरः सीताशोभितो भ्रातृभिर्वृतः ॥ ६ ॥
        दशकोट्यर्कसंकाशे चामरैर्दोलिते रथे ।
        असंख्यवानरेंद्राढ्ये लक्षचक्रघनस्वने ॥ ७ ॥
        श्रीगर्गसंहितायां गोलोकखण्डे नारदबहुलाश्वसंवादे आगमनोद्योगवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
        अनुवाद:-
        फिर वे पूर्णस्वरूप कमल लोचन भगवान श्रीराम स्वयं वहाँ पधारे। उनके हाथ में धनुष और बाण थे तथा साथ में श्रीसीताजी और भरत आदि तीनों भाई भी थे। उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्यों के समान प्रकाशमान था। उस पर निरंतर चँवर डुलाये जा रहे थे। असंख्य वानर यूथपति उनकी रक्षा के कार्य में संलग्न थे। उस रथ के एक लाख चक्कों से मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी।

        उस पर लाख ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस रथ में लाख घोड़े जुते हुए थे। वह रथ सुवर्णमय था। उसी पर बैठकर भगवान श्रीराम वहाँ पधारे थे।
        वे भी श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य विग्रह में लीन हो गये। 


        फिर उसी समय साक्षात यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकाल की जाज्वल्यमान अग्निशिखा के समान उद्भासित हो रहे थे। देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नि दक्षिणा के साथ ज्योतिर्मय रथ पर बैठे दिखायी देते थे। वे भी उस समय श्याम विग्रह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन हो गये। तत्पश्चात् साक्षात भगवान नर-नारायण वहाँ पधारे। 
        उनके शरीर की कांति मेघ के समान श्याम थी। उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनि के वेष में थे।
        उनके सिर का जटा-जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियों के समान दीप्तिमान था।

        गर्गसंहिता/खण्डः(१) (गोलोकखण्डः)
        अध्यायः (१)

        "गर्गसंहिता‎-खण्डः १-(गोलोकखण्डः)अध्यायः २→
        गर्गमुनिः श्रीकृष्ण-माहात्म्य वर्णन-


                  श्रीबहुलाश्व उवाच -
        कतिधा श्रीहरेर्विष्णोरवतारो भवत्यलम् ।
        साधूनां रक्षणार्थं हि कृपया वद मां प्रभो ।१५।

               श्रीनारद उवाच -
        "अंशांशोंऽशस्तथावेशः कलापूर्णः प्रकथ्यते ।
        व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम्।१६।

        अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा ।
        कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः।१७।

        पूर्णो नृसिंहो रामश्च श्वेतद्वीपाधिपो हरिः।
        वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः।१८।

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ।
        असंख्यब्रह्माण्डपतिर्गोलोके धाम्नि राजते ।१९।

        कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकिर्तिताः ।
        तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेंऽशांशा विदिताः प्रभोः।२०।

        येषामन्तर्गतो विष्णुः कार्यं कृत्वा विनिर्गतः ।
        नानाऽऽवेषावतारांश्च विद्धि राजन्महामते ॥२१॥

        धर्मं विज्ञाय कृत्वा यः पुनरन्तरधीयत ।
        युगे युगे वर्तमानः सोऽवतारः कला हरेः ॥ २२ ॥

        चतुर्व्यूहो भवेद्‌यत्र दृश्यन्ते च रसा नव ।
        अतः परं च वीर्याणि स तु पूर्णः प्रकथ्यते ॥ २३ ॥

        यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि ।
        तं वदन्ति परे साक्षात्परिपूर्णतमं स्वयम् ॥ २४ ॥

        पूर्णस्य लक्षणं यत्र तं पश्यन्ति पृथक् पृथक् ।
        भावेनापि जनाः सोऽयं परिपूर्णतमः स्वयम् ।२५।

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि ।
        एककार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं चकार ह।२६।

        पूर्णः पुराणः पुरुषोत्तमोत्तमः
             परात्परो यः पुरुषः परेश्वरः ।
        स्वयं सदाऽऽनन्दमयं कृपाकरं
             गुणाकरं तं शरणं व्रजाम्यहम् ॥ २७ ॥
        ______________  
                       'श्रीगर्ग उवाच -
        तच्छ्रुत्वा हर्षितो राजा रोमाञ्ची प्रेमविह्वलः ।
        प्रमृश्य नेत्रेऽश्रुपूर्णे नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २८ ॥

                      "श्रीबहुलाश्व उवाच -
        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो केन हेतुना ।
        आगतो भारते खण्डे द्वारवत्यां विराजते ॥ २९ ॥

        तस्य गोलोकनाथस्य गोलोकं धाम सुन्दरम् ।
        कर्माण्यपरिमेयानि ब्रूहि ब्रह्मन् बृहन्मुने ॥ ३० ॥

        यदा तीर्थाटनं कुर्वञ्छतजन्मतपःपरम् ।
        तदा सत्सङ्‍गमेत्याशु श्रीकृष्णं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३१ ॥

        श्रीकृष्णदासस्य च दासदासः
             कदा भवेयं मनसाऽऽर्द्रचित्तः ।
        यो दुर्लभो देववरैः परात्मा
             स मे कथं गोचर आदिदेवः ॥ ३२ ॥

        धन्यस्त्वं राजशार्दूल श्रीकृष्णेष्टो हरिप्रियः ।
        तुभ्यं च दर्शनं दातुं भक्तेशोऽत्रागमिष्यति ॥ ३३ ॥

        त्वं नृपं श्रुतदेवं च द्विजदेवो जनार्दनः ।
        स्मरत्यलं द्वारकायामहो भाग्यं सतामिह ॥ ३४ 



        गर्गसंहिता/खण्डः (१) (गोलोकखण्डः) अध्यायः (१)

        "गर्गसंहिता‎ | खण्डः १ (गोलोकखण्डः)
        गर्गसंहिता
        गोलोकखण्डः
        गर्गमुनिः अध्यायः २ →
        श्रीकृष्ण-माहात्म्य वर्णनम्

        ॐ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
        देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
        शरद्विकचपङ्‍कजश्रियमतीवविद्वेषकं
             मिलिन्दमुनिसेवितं कुलिशकंजचिह्नावृतम् ।
        स्फुरत्‌कनकनूपुरं दलितभक्ततापत्रयं
           चलद्‌द्युतिपदद्वयं हृदि दधामि राधापतेः॥२॥

        वदनकमलनिर्यद्यस्य पीयूषमाद्यं
             पिबति जनवरो यं पातु सोऽयं गिरं मे ।
        बदरवनविहारः सत्यवत्याः कुमारः
             प्रणतदुरितहारः शाङ्‌र्गधन्वावतारः ॥ ३ ॥

        कदाचिन्नैमिषारण्ये श्रीगर्गो ज्ञानिनां वरः ।
        आययौ शौनकं द्रष्टुं तेजस्वी योगभास्करः ॥४॥

        तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय शौनको मुनिभिः सह ।
        पूजयामास पाद्याद्यैरुपचारैर्विधानतः ॥५॥

        श्रीशौनक उवाच -
        सतां पर्यटनं धन्यं गृहिणां शान्तये स्मृतम् ।
        नृणामन्तस्तमोहारी साधुरेव न भास्करः ॥ ६ ॥

        तस्मान्मे हृदि सम्भूतं संदेहं नाशय प्रभो ।
        कतिधा श्रीहरेर्विष्णोरवतारो भवत्यलम् ॥ ७ ॥

        श्रीगर्ग उवाच -
        साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन् भगवद्‌गुणवर्णनम् ।
        शृण्वतां गदतां यद्वै पृच्छतां वितनोति शम् ॥ ८ ॥

        अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
        यस्य श्रवणमात्रेण महादोषः प्रशाम्यति ॥ ९ ॥

        मिथिलानगरे पूर्वं बहुलाश्वः प्रतापवान् ।
        श्रीकृष्णभक्तः शान्तात्मा बभूव निरहङ्‍कृतिः॥१०।

        अम्बरादागतं दृष्ट्वा नारदं मुनिसत्तमम् ।
        सम्पूज्य चासने स्थाप्य कृताञ्जलिरभाषत ॥११

        श्री-बहुलाश्व उवाच -
        योऽनादिरात्मा पुरुषो भगवान्प्रकृतेः परः ।
        कस्मात्तनुं समाधत्ते तन्मे ब्रूहि महामते ॥ १२ ॥

        श्रीनारद उवाच -
        गोसाधुदेवताविप्रदेवानां रक्षणाय वै ।
        तनुं धत्ते हरिः साक्षाद्‌भगवानात्मलीलया ॥ १३ ॥

        यथा नटः स्वलीलायां मोहितो न परस्तथा ।
        अन्ये दृष्ट्वा च तन्मायां मुमुहुस्ते न संशयः।१४।

        श्रीबहुलाश्व उवाच -
        कतिधा श्रीहरेर्विष्णोरवतारो भवत्यलम् ।
        साधूनां रक्षणार्थं हि कृपया वद मां प्रभो ॥ १५ ॥

        श्रीनारद उवाच -
        अंशांशोंऽशस्तथावेशः कलापूर्णः प्रकथ्यते ।
        व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम् ॥ १६।
        ________
        अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा ।
        कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः ॥१७॥

        पूर्णो नृसिंहो बलरामश्च श्वेतद्वीपाधिपो हरिः ।
        वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः।१८।

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ।
        असंख्यब्रह्माण्डपतिर्गोलोके धाम्नि राजते।१९।

        कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकिर्तिताः ।
        तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेंऽशांशा विदिताः प्रभोः ॥ २० ॥

        येषामन्तर्गतो विष्णुः कार्यं कृत्वा विनिर्गतः।
         नानाऽऽवेशावतारांश्च विद्धि राजन्महामते।२१।

        धर्मं विज्ञाय कृत्वा यः पुनरन्तरधीयत ।
        युगे युगे वर्तमानः सोऽवतारः कला हरेः ॥ २२ ॥

        चतुर्व्यूहो भवेद्‌यत्र दृश्यन्ते च रसा नव ।
        अतः परं च वीर्याणि स तु पूर्णः प्रकथ्यते ॥ २३ ॥

        यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि ।
        तं वदन्ति परे साक्षात्परिपूर्णतमं स्वयम् ॥२४ ॥

        पूर्णस्य लक्षणं यत्र तं पश्यन्ति पृथक् पृथक् ।
        भावेनापि जनाः सोऽयं परिपूर्णतमः स्वयम् ।२५।

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि ।
        एककार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं चकार ह ॥ २६।

        पूर्णः पुराणः पुरुषोत्तमोत्तमः
             परात्परो यः पुरुषः परेश्वरः ।
        स्वयं सदाऽऽनन्दमयं कृपाकरं
             गुणाकरं तं शरणं व्रजाम्यहम् ॥ २७ ॥

        श्रीगर्ग उवाच -
        तच्छ्रुत्वा हर्षितो राजा रोमाञ्ची प्रेमविह्वलः ।
        प्रमृश्य नेत्रेऽश्रुपूर्णे नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २८ ॥

        श्रीबहुलाश्व उवाच -
        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो केन हेतुना ।
        आगतो भारते खण्डे द्वारवत्यां विराजते ॥ २९ ॥

        तस्य गोलोकनाथस्य गोलोकं धाम सुन्दरम् ।
        कर्माण्यपरिमेयानि ब्रूहि ब्रह्मन् बृहन्मुने ॥ ३० ॥

        यदा तीर्थाटनं कुर्वञ्छतजन्मतपःपरम् ।
        तदा सत्सङ्‍गमेत्याशु श्रीकृष्णं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३१ ॥

        श्रीकृष्णदासस्य च दासदासः
             कदा भवेयं मनसाऽऽर्द्रचित्तः।
        यो दुर्लभो देववरैः परात्मा
             स मे कथं गोचर आदिदेवः ॥ ३२ ॥

        धन्यस्त्वं राजशार्दूल श्रीकृष्णेष्टो हरिप्रियः ।
        तुभ्यं च दर्शनं दातुं भक्तेशोऽत्रागमिष्यति ॥ ३३ ॥

        त्वं नृपं श्रुतदेवं च द्विजदेवो जनार्दनः ।
        स्मरत्यलं द्वारकायामहो भाग्यं सतामिह ॥ ३४ ॥

        इति श्रीगर्गसंहितायां गोलोकखण्डे नारदबहुलाश्वसंवादे कृष्णमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

        अनुवाद :-

        अथ- श्रीगर्गसंहितायां गोलोकखण्डे नारदबहुलाश्वसंवादे कृष्णमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

        श्रीजनक( बहुलाश्व) बोले- महामते ! जो भगवान अनादि, प्रकृति से परे और सबके अंतर्यामी ही नहीं, आत्मा हैं, वे शरीर कैसे धारण करते हैं? (जो सर्वत्र व्यापक है, वह शरीर से परिच्छिन्न कैसे हो सकता है? ) यह मुझे बताने की कृपा करें।

        नारदजी ने कहा- गौ, साधु, देवता, ब्राह्मण और वेदों की रक्षा के लिये साक्षात भगवान श्रीहरि अपनी लीला से शरीर धारण करते हैं। [अपनी अचिंत्य लीलाशक्ति से ही वे देहधारी होकर भी व्यापक बने रहते हैं। उनका वह शरीर प्राकृत नहीं, चिन्मय है।]

        जैसे नट अपनी माया से मोहित नहीं होता और दूसरे लोग मोह में पड़ जाते हैं, वैसे ही अन्य प्राणी भगवान की माया देखकर मोहित हो जाते हैं, किंतु परमात्मा मोह से परे रहते हैं- इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।

        श्रीजनकजी ने पूछा- मुनिवर ! संतों की रक्षा के लिये भगवान विष्णु के कितने प्रकार के अवतार होते हैं ? यह मुझे बताने की कृपा करें। श्रीनारदजी बोले- राजन ! 
        _______________
        व्यास आदि मुनियों ने १-अंशांश, २-अंश, ३-आवेश, ४-कला, ५-पूर्ण और ६-परिपूर्णतम- ये छ: प्रकार के अवतार बताये हैं। 
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        इनमें से छठा परिपूर्णतम अवतार साक्षात श्रीकृष्ण ही हैं। 

        मरीचि आदि “अंशांशावतार”( अंश के अंश अवतरित-) , ब्रह्मा आदि ‘अंशावतार’, कपिल एवं कूर्म प्रभृति ‘कलावतार’ और परशुराम आदि ‘आवेशावतार’ कहे गये हैं।

         नृसिंह, बलराम, श्वेतद्वीपाधिपति हरि, वैकुण्ठ, यज्ञ और नर नारायण- ये सात ‘पूर्णावतार’ हैं।

         एवं साक्षात भगवान भगवान श्रीकृष्ण ही एक  ‘परिपूर्णतम’ अवतार हैं।
        अंसख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति वे प्रभु गोलोकधाम में विराजते हैं।

         जो भगवान के दिये सृष्टि आदि कार्यमात्र के अधिकार का पालन करते हैं, वे ब्रह्मा आदि ‘सत’ (सत्स्वरूप भगवान) के अंश हैं। रजोगुण के प्रतिनिधि हैं।

        जो उन अंशों के कार्यभार में हाथ बटाते हैं, वे ‘अंशांशावतार’ के नाम से विख्यात हैं। 

        परम बुद्धिमान नरेश ! भगवान विष्णु स्वयं जिनके अंत:करण में आविष्ट हो, अभीष्ट कार्य का सम्पादन करके फिर  अलग हो जाते हैं, राजन ! ऐसे नानाविध अवतारों को ‘आवेशावतार’ समझो।
        यह अवतार उसी प्रकार का हैं जैसे किसी व्यक्ति पर कुछ समय तक कोई भूत या प्रेत प्रवेश कर उसको उत्तेजित या उन्मादी बना देता है। यह स्थाई नहीं होता है। परशुराम पर भी इसी प्रकार उन्माद आवेश आता था

        आवेश:- वेग - आतुरता - जोश- दौरा-। 
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        श्रीनारद उवाच -
        अंशांशोंऽशस्तथावेशः कलापूर्णः प्रकथ्यते ।
        व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम् ॥ १६।
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        अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा ।
        कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः ॥१७॥

        पूर्णो नृसिंहो बलरामश्च श्वेतद्वीपाधिपो हरिः ।
        वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः।१८।

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् ।
        असंख्यब्रह्माण्डपतिर्गोलोके धाम्नि राजते।१९।

        कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकिर्तिताः ।
        तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेंऽशांशा विदिताः प्रभोः ॥ २० ॥

        येषामन्तर्गतो विष्णुः कार्यं कृत्वा विनिर्गतः।
        नानाऽऽवेशावतारांश्च विद्धि राजन्महामते ।२१।

        धर्मं विज्ञाय कृत्वा यः पुनरन्तरधीयत ।
        युगे युगे वर्तमानः सोऽवतारः कला हरेः ॥ २२ ॥

        चतुर्व्यूहो भवेद्‌यत्र दृश्यन्ते च रसा नव ।
        अतः परं च वीर्याणि स तु पूर्णः प्रकथ्यते ॥ २३ ॥

        यस्मिन्सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि ।
        तं वदन्ति परे साक्षात्परिपूर्णतमं स्वयम् ॥२४ ॥

        पूर्णस्य लक्षणं यत्र तं पश्यन्ति पृथक् पृथक् ।
        भावेनापि जनाः सोऽयं परिपूर्णतमः स्वयम् ।२५।

        परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि ।
        एककार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं चकार ह ॥ २६।

        पूर्णः पुराणः पुरुषोत्तमोत्तमः
             परात्परो यः पुरुषः परेश्वरः ।
        स्वयं सदाऽऽनन्दमयं कृपाकरं
             गुणाकरं तं शरणं व्रजाम्यहम् ॥ २७ ॥

        श्रीगर्ग उवाच -
        तच्छ्रुत्वा हर्षितो राजा रोमाञ्ची प्रेमविह्वलः ।
        प्रमृश्य नेत्रेऽश्रुपूर्णे नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २८ ॥

        गोलोक खण्ड : अध्याय 1

        जो प्रत्येक युग में प्रकट हो, युगधर्म को जानकर, उसकी स्थापना करके, पुन: अंतर्धान हो जाते हैं, भगवान के उन अवतारों को ‘कलावतार’ कहा गया है। 


        जहाँ चार व्यूह प्रकट हों- जैसे श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न एवं वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरूद्ध, तथा जहाँ नौ रसों की अभिव्यक्ति देखी जाती हो एवं जहाँ बल-पराक्रम की भी पराकाष्ठा दृष्टिगोचर होती हो, भगवान के उस अवतार को ‘पूर्णावतार’ कहा गया है।
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        जिसके अपने तेज में अन्य सम्पूर्ण तेज विलीन हो जाते हैं, भगवान के उस अवतार को श्रेष्ठ विद्वान पुरुष साक्षात ‘परिपूर्णम’ बताते हैं। जिस अवतार में पूर्ण का पूर्ण लक्षण दृष्टिगोचर होता है और मनुष्य जिसे पृथक-पृथक भाव के अनुसार अपने परम प्रिय रूप में देखते हैं, वही यह साक्षात ‘परिपूर्णतम’ अवतार है।

         [इन सभी लक्षणों से सम्पन्न] स्वयं परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण ही हैं,।

         दूसरा नहीं; क्योंकि श्रीकृष्ण ने एक कार्य के उद्देश्य से अवतार लेकर अन्यान्य करोड़ों कार्यों का सम्पादन किया है।

         जो पूर्ण, पुराण पुरुषोत्तमोत्तम एवं परात्पर पुरुष परमेश्वर हैं, उन साक्षात सदानन्दमय, कृपानिधि, गुणों के आकार भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र की मैं शरण लेता हूँ।

        यह सुनकर राजा हर्ष से भर गये।
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        उनके शरीर में रोमांच हो आया। वे प्रेम से विह्वल हो गये और अश्रुपूर्ण नेत्रों को पोंछकर नारदजी से यों बोले। राजा बहुलाश्व ने पूछा- महर्षे ! साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्णचन्द्र सर्वव्यापी चिन्मय गोलोकधाम से उतरकर जो भारत वर्ष के अंतर्गत द्वारकापुरी में विराज रहे हैं- 
        इसका क्या कारण है ? ब्रह्मन ! उन भगवान श्रीकृष्ण के सुन्दर बृहत (विशाल या ब्रह्म स्वरूप) गोलोकधाम का वर्णन कीजिये। महामुने ! साथ ही उनके अपरिमेय कार्यों को भी कहने की कृपा कीजिये। मनुष्य जब तीर्थ यात्रा तथा सौ जन्मों तक उत्तम तपस्या करके उसके फलस्वरूप सत्संग का सुअवसर पाता है, तब वह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को शीघ्र प्राप्त कर लेता है। कब मैं भक्ति रस से आर्द्रचित्त हो मन से भगवान श्रीकृष्ण के दास का भी दासानुदास होऊँगा ? जो सम्पूर्ण देवताओं के लिये भी दुर्लभ हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आदिदेव भगवान श्रीकृष्ण मेरे नेत्रों के समक्ष कैसे होंगे?

        श्रीनारद जी बोले- नृपश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के अभीष्ट जन हो और उन श्रीहरि के परम प्रिय भक्त हो। तुम्हें दर्शन देने के लिये ही वे भक्त वत्सल भगवान यहाँ अवश्य पधारेंगे। ब्रह्मण्यदेव भगवान जनार्दन द्वारका में रहते हुए भी तुम्हें और ब्राह्मण श्रुतदेव को याद करते रहते हैं। अहो ! इस लोक में संतों का कैसा सौभाग्य है 

        इस प्रकार श्री गर्ग संहिता में गोलोक खण्ड के अन्तदर्गत नारद- बहुलाश्व् संवाद में ‘श्रीकृष्णम माहातमय का वर्णन’ नामक पहला अध्याय पूरा हुआ।

        गर्ग संहिता

        गोलोक खण्ड : अध्याय 3

        भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान

        श्री जनकजी ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें।

        श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये। उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं। वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

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        "तदैव चागतः साक्षाद्‌रामो राजीवलोचनः 
        धनुर्बाणधरः सीताशोभितो भ्रातृभिर्वृतः ।६।

        "दशकोट्यर्कसंकाशे चामरैर्दोलिते रथे 
        असंख्यवानरेन्द्राढ्ये लक्षचक्रघनस्वने।७।

        'लक्षध्वजे लक्षहये शातकौंभे स्थितस्ततः।
        श्रीकृष्णविग्रहे पूर्णः सम्प्रलीनो बभूव ह ।८।

        अनुवाद:-

        उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्यों के समान प्रकाशमान था। उस पर निरन्तर चँवर डुलाये जा रहे थे। असंख्य वानर यूथपति उनकी रक्षा के कार्य में संलग्न थे। उस रथ के एक लाख चक्कों से मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी।७।
        विदित होना चाहिए कि राम और कृष्ण की किसी प्रकार भी समानता नहीं है।कृष्ण समुद्र हैं तो राम बूँद हैं।

        ___________

        फिर उसी समय साक्षात यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकाल की जाज्वल्यमान अग्निशिखा के समान उद्भासित हो रहे थे। देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नि दक्षिणा के साथ ज्योतिर्मय रथ पर बैठे दिखायी देते थे। वे भी उस समय श्याम विग्रह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन हो गये। तत्पश्चात् साक्षात भगवान नर-नारायण वहाँ पधारे। उनके शरीर की कांति मेघ के समान श्याम थी। उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनि के वेष में थे। उनके सिर का जटा-जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियों के समान दीप्तिमान था।

        राम कहाँ 12 कलाओं से अवतार लेते हैं और कृष्ण 16  कलाओं से सेभी अधिक परिपूर्णत्तम परमेश्वर स्वरूप में हैं।  राम बूँद हैं तो कृष्ण समुद्र है।

        गोलोक खण्ड : अध्याय 3

        भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान

        श्री जनकजी (बहुलाश्व) ने पूछा- मुने ! परात्पर महात्मा भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का दर्शन प्राप्त कर सम्पूर्ण देवताओं ने आगे क्या किया, मुझे यह बताने की कृपा करें।

        श्रीनारदजी कहते हैं- राजन ! उस समय सबके देखते-देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठधिपति भगवान श्रीहरि उठे और साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो गये। उसी समय कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्ण स्वरूप भगवान नृसिंहजी पधारे और भगवान श्रीकृष्ण तेज में वे भी समा गये। इसके बाद सहस्र भुजाओं से सुशोभित, श्वेतद्वीप के स्वामी विराट पुरुष, जिनके शुभ्र रथ में सफेद रंग के लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ आये। उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं। वे अनेक प्रकार के अपने आयुधों से सम्पन्न थे। पार्षदगण चारों ओर से उनकी सेवा में उपस्थित थे। वे भगवान भी उसी समय श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में सहसा प्रविष्ट हो गये।

        फिर वे पूर्णस्वरूप कमल लोचन भगवान श्रीराम स्वयं वहाँ पधारे। उनके हाथ में धनुष और बाण थे तथा साथ में श्रीसीताजी और भरत आदि तीनों भाई भी थे। उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्यों के समान प्रकाशमान था। उस पर निरंतर चँवर डुलाये जा रहे थे। असंख्य वानर यूथपति उनकी रक्षा के कार्य में संलग्न थे। 

        उस रथ के एक लाख चक्कों से मेघों की गर्जना के समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी।

         उस पर लाख ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस रथ में लाख घोड़े जुते हुए थे। वह रथ सुवर्णमय था। 
        उसी पर बैठकर भगवान श्रीराम वहाँ पधारे थे। वे भी श्रीकृष्णचन्द्र के दिव्य विग्रह में लीन हो गये।

        फिर उसी समय साक्षात यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकाल की जाज्वल्यमान अग्निशिखा के समान उद्भासित हो रहे थे। देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नि दक्षिणा के साथ ज्योतिर्मय रथ पर बैठे दिखायी देते थे। वे भी उस समय श्याम विग्रह भगवान श्रीकृष्णचन्द्र में लीन हो गये। तत्पश्चात् साक्षात भगवान नर-नारायण वहाँ पधारे। उनके शरीर की कांति मेघ के समान श्याम थी। उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनि के वेष में थे। उनके सिर का जटा-जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियों के समान दीप्तिमान था।

        परम बुद्धिमान नरेश ! भगवान विष्णु स्वयं जिनके अंत:करण में आविष्ट हो, अभीष्ट कार्य का सम्पादन करके फिर अलग हो जाते हैं, राजन ! ऐसे नानाविध अवतारों को ‘आवेशावतार’ समझो।
        _____________________
        आवेश अवतार स्थाई नहीं होता है जिस प्रकार किसी पर देवी आ जाती और फिर तान्त्रिक के झाड़ -फूँक करने पर चली जाती है उसी प्रकार परशुराम पर भी ईश्वर की आवेशीय ऊर्जा  आती है और फिर चली जाती है।।

        _________________________    

          अध्याय-103 पद्मपुराण भूमिखण्ड -

                      "कुञ्जल उवाच-

        अशोकसुन्दरी जाता सर्वयोषिद्वरा तदा।रेमे सुनन्दने पुण्ये सर्वकामगुणान्विते।१।

        सुरूपाभिः सुकन्याभिर्देवानां चारुहासिनी ।सर्वान्भोगान्प्रभुं जाना गीतनृत्यविचक्षणा ।२।

        विप्रचित्तेः सुतो हुण्डो रौद्रस्तीव्रश्च सर्वदा ।स्वेच्छाचारो महाकामी नन्दनं प्रविवेश ह ।३।

        अशोकसुन्दरीं दृष्ट्वा सर्वालङ्कारसंयुताम् ।तस्यास्तु दर्शनाद्दैत्यो विद्धः कामस्य मार्गणैः ४।

        तामुवाच महाकायः का त्वं कस्यासि वा शुभे ।कस्मात्त्वं कारणाच्चात्र आगतासि वनोत्तमम् ।५।

                      "अशोकसुन्दर्युवाच-

        शिवस्यापि सुपुण्यस्य सुताहं शृणु साम्प्रतम् ।स्वसाहं कार्तिकेयस्य जननी गोत्रजापि मे ।६।

        बालभावेन सम्प्राप्ता लीलया नन्दनं वनम् ।भवान्कोहि किमर्थं तु मामेवं परिपृच्छति ।७।

                         'हुण्ड उवाच-

        विप्रचित्तेः सुतश्चाहं गुणलक्षणसंयुतः । हुण्डेति नाम्ना विख्यातो बलवीर्यमदोद्धतः ।८।

        दैत्यानामप्यहं श्रेष्ठो मत्समो नास्ति राक्षसः। देवेषु मर्त्यलोकेषु तपसा यशसा कुले ।९।

        अन्येषु नागलोकेषु धनभोगैर्वरानने ।दर्शनात्ते विशालाक्षि हतः कन्दप्रमार्गैण ।१०।

        शरणं ते ह्यहं प्राप्तः प्रसादसुमुखी भव ।भव स्ववल्लभा भार्या मम प्राणसमा प्रिया ।११।

                        'अशोकसुन्दर्युवाच-

        श्रूयतामभिधास्यामि सर्वसम्बन्धकारणम् ।भवितव्या सुजातस्य लोके स्त्री पुरुषस्य हि ।१२।

        भवितव्यस्तथा भर्ता स्त्रिया यः सदृशो गुणैः ।संसारे लोकमार्गोयं शृणु हुणड यथाविधि ।१३।

        अस्त्येव कारणं चात्र यथा तेन भवाम्यहम् ।सुभार्या दैत्यराजेंद्र शृणुष्व यतमानसः।१४।

        वृक्षराजादहं जाता यदा काले महामते ।  शम्भोर्भावं सुसंगृह्य पार्वत्या कल्पिता ह्यहम् ।१५।

        देवस्यानुमते देव्या सृष्टो भर्ता ममैव हि ।      सोमवंशे महाप्राज्ञः स धर्मात्मा भविष्यति ।१६।

        जिष्णुर्विष्णुर्समो वीर्ये तेजसा पावकोपमः।    सर्वज्ञः सत्यसन्धश्च त्यागे वैष्णवोपमम् ।१७।

        यज्वा दानपतिः सोपि रूपेण मन्मथोपमः।नहुषोनाम धर्मात्मा गुणशील महानिधिः।१८।

        देव्या देवेन मे दत्तःख्यातोभर्ताभविष्यति ।तस्मात्सर्वगुणोपेतं पुत्रमाप्स्यामि सुन्दरम्।१९।

        इन्द्रोपेन्द्र समं लोके ययातिं जनवल्लभम् ।लप्स्याम्यहं रणे धीरं तस्माच्छम्भोः प्रसादतः।२०।

        अहं पतिव्रता वीर परभार्या विशेषतः ।        अतस्त्वं सर्वथा हुणड त्यज भ्रान्तिमितो व्रज ।२१।

        प्रहस्यैव वचो ब्रूते अशोकसुन्दरीं प्रति ।            हुण्ड उवाच-नैव युक्तं त्वया प्रोक्तं देव्या देवेन चैव हि ।२२।

        नहुषोनाम धर्मात्मा सोमवंशे भविष्यति ।        भवती वयसा श्रेष्ठा कनिष्ठो न स युज्यते ।२३।

        कनिष्ठा स्त्री प्रशस्ता तु पुरुषो न प्रशस्यते ।        कदा स पुरुषो भद्रे तव भर्ता भविष्यति।२४।

        तारुण्यं यौवनं चापि नाशमेवं प्रयास्यति ।  यौवनस्य बलेनापि रूपवत्यः सदा स्त्रियः।२५।

        पुरुषाणां वल्लभत्वं प्रयान्ति वरवर्णिनि ।      तारुण्यं हि महामूलं युवतीनां वरानने।२६।

        तस्या धारेण भुञ्जन्ति भोगान्कामान्मनोनुगान् ।कदा सोभ्येष्यते भद्रे आयोः पुत्रः शृणुष्व मे।२७।

        यौवनं वर्ततेऽद्यैव वृथा चैव भविष्यति ।           गर्भत्वं च शिशुत्वं च कौमारं च निशामय ।२८।

        कदासौ यौवनोपेतस्तव योग्यो भविष्यति ।
        यौवनस्य प्रभावेन पिबस्व मधुमाधवीम्।२९।

        मया सह विशालाक्षि रमस्व त्वं सुखेन वै ।
        हुण्डस्य वचनं श्रुत्वा शिवस्य तनया पुनः ।३०।

        उवाच दानवेन्द्रं तं साध्वसेन समन्विता ।
        अष्टाविंशतिके प्राप्ते द्वापराख्ये युगे तदा ।३१।

        शेषावतारो धर्मात्मा वसुदेवसुतो बलः ।
        रेवतस्य सुतां दिव्यां भार्यां स च करिष्यति।३२।

        सापि जाता महाभाग कृताख्ये हि युगोत्तमे ।
        युगत्रयप्रमाणेन सा हि ज्येष्ठा बलादपि ।३३।

        बलस्य सा प्रिया जाता रेवती प्राणसंमिता ।
        भविष्यद्वापरे प्राप्त इह सा तु भविष्यति ।३४।

        मायावती पुरा जाता गन्धर्वतनया वरा ।
        अपहृत्य नियम्यैव शम्बरो दानवोत्तमः ।३५।

        तस्या भर्ता समाख्यातो माधवस्य सुतो बली ।
        प्रद्युम्नो नाम वीरेशो यादवेश्वरनन्दनः ।३६।

        तस्मिन्युगे भविष्येत भाव्यं दृष्टं पुरातनैः ।
        व्यासादिभिर्महाभागैर्ज्ञानवद्भिर्महात्मभिः ।३७।

        एवं हि दृश्यते दैत्य वाक्यं देव्या तदोदितम् ।
        मां प्रति हि जगद्धात्र्या पुत्र्या हिमवतस्तदा ।३८।

        त्वं तु लोभेन कामेन लुब्धो वदसि दुष्कृतम् ।
        किल्बिषेण समाजुष्टं वेदशास्त्रविवर्जितम् ।३९।

        यद्यस्यदिष्टमेवास्ति शुभं वाप्यशुभं दृढम् ।
        पूर्वकर्मानुसारेण तत्तस्य परिजायते ।४०।

        देवानां ब्राह्मणानां च वदने यत्सुभाषितम् ।
        निः सरेद्यदि सत्यं तदन्यथा नैव जायते ।४१।

        मद्भाग्यादेवमाज्ञातं नहुषस्यापि तस्य च ।
        समायोगं विचार्यैवं देव्या प्रोक्तं शिवेन च ।४२।

        एवं ज्ञात्वा शमं गच्छ त्यज भ्रान्तिं मनःस्थिताम् ।
        नैव शक्तो भवान्दैत्य मे मनश्चालितुं ध्रुवम् ।४३।

        पतिव्रता दृढा चित्ते स को मे चालितुं क्षमः ।
        महाशापेन धक्ष्यामि इतो गच्छ महासुर ।४४।

        एवमाकर्ण्य तद्वाक्यं हुण्डो वै दानवो बली ।
        मनसा चिन्तयामास कथं भार्या भवेदियम् ।४५।

        विचिन्त्य हुण्डो मायावी अन्तर्धानं समागतः ।
        ततो निष्क्रम्य वेगेन तस्मात्स्थानाद्विहाय ताम् ।
        अन्यस्मिन्दिवसे प्राप्ते मायां कृत्वा तमोमयीम् ।४६।

        दिव्यं मायामयं रूपं कृत्वा नार्यास्तु दानवः ।
        मायया कन्यका रूपो बभूव मम नन्दन ।४७।

        सा कन्यापि वरारोहा मायारूपागमत्ततः ।
        हास्यलीला समायुक्ता यत्रास्ते भवनन्दिनी ।४८।

        उवाच वाक्यं स्निग्धेव अशोकसुन्दरीं प्रति ।
        कासि कस्यासि सुभगे तिष्ठसि त्वं तपोवने ।४९।

        किमर्थं क्रियते बाले कामशोषणकं तपः ।
        तन्ममाचक्ष्व सुभगे किम्निमित्तं सुदुष्करम् ।५०।

        तन्निशम्य शुभं वाक्यं दानवेनापि भाषितम् ।
        मायारूपेण छन्नेन साभिलाषेण सत्वरम् ।५१।

        आत्मसृष्टि सुवृत्तान्तं प्रवृत्तं तु यथा पुरा ।
        तपसः कारणं सर्वं समाचष्ट सुदुःखिता ।५२।

        उपप्लवं तु तस्यापि दानवस्य दुरात्मनः।
        मायारूपं न जानाति सौहृदात्कथितं तया ।५३।

                        "हुण्ड उवाच-
        पतिव्रतासि हे देवि साधुव्रतपरायणा ।
        साधुशीलसमाचारा साधुचारा महासती ।५४।

        अहं पतिव्रता भद्रे पतिव्रतपरायणा ।
        तपश्चरामि सुभगे भर्तुरर्थे महासती ।५५।

        मम भर्ता हतस्तेन हुण्डेनापि दुरात्मना ।
        तस्य नाशाय वै घोरं तपस्यामि महत्तपः ।५६।

        एहि मे स्वाश्रमे पुण्ये गङ्गातीरे वसाम्यहम् ।
        अन्यैर्मनोहरैर्वाक्यैरुक्ता प्रत्ययकारकैः ।५७।

        हुण्डेन सखिभावेन मोहिता शिवनन्दिनी ।
        समाकृष्टा सुवेगेन महामोहेन मोहिता ।५८।

        आनीतात्मगृहं दिव्यमनौपम्यं सुशोभनम् ।
        मेरोस्तु शिखरे पुत्र वैडूर्याख्यं पुरोत्तमम् ।५९।

        अस्ति सर्वगुणोपेतं काञ्चनाख्यं महाशिवम् ।
        तुङ्गप्रासादसंबाधैः कलशैर्दंडचामरैः ।६०।

        नानवृक्षसमोपेतैर्वनैर्नीलैर्घनोपमैः ।
        वापीकूपतडागैश्च नदीभिस्तु जलाशयैः ।६१।

        शोभमानं महारत्नैः प्राकारैर्हेमसंयतैः ।
        सर्वकामसमृद्धार्थं सम्पूर्णं दानवस्य हि ।६२।

        ददृशे सा पुरं रम्यमशोकसुंदरी तदा ।
        कस्य देवस्य संस्थानं कथयस्व सखे मम ।६३।

        सोवाच दानवेंद्रस्य दृष्टपूर्वस्य वै त्वया ।
        तस्य स्थानं महाभागे सोऽहं दानवपुङ्गवः ।६४।

        मया त्वं तु समानीता मायया वरवर्णिनि ।
        तामाभाष्य गृहं नीता शातकौंभं सुशोभनम् ।६५।

        नानावेश्मैः समाजुष्टं कैलासशिखरोपमम् ।
        निवेश्य सुन्दरीं तत्र दोलायां कामपीडितः ।६६।

        पुनः स्वरूपी दैत्येन्द्रः कामबाणप्रपीडितः ।
        करसम्पुटमाबध्य उवाच वचनं तदा ।६७।

        यं यं त्वं वाञ्छसे भद्रे तं तं दद्मि न संशयः ।
        भज मां त्वं विशालाक्षि भजन्तं कामपीडितम् ।६८।


                          "श्रीदेव्युवाच-
        नैव चालयितुं शक्तो भवान्मां दानवेश्वरः ।
        मनसापि न वै धार्यं मम मोहं समागतम् ।६९।

        भवादृशैर्महापापैर्देवैर्वा दानवाधमैः ।
        दुष्प्राप्याहं न सन्देहो मा वदस्व पुनः पुनः।७०।

        स्कन्दानुजा सा तपसाभियुक्ता जाज्वल्यमाना महता रुषा च ।
        संहर्तुकामा परि दानवं तं कालस्य जिह्वेव यथा स्फुरन्ती ।७१।

        पुनरुवाच सा देवी तमेवं दानवाधमम् ।
        उग्रं कर्म कृतं पाप चात्मनाशनहेतवे ।७२।

        आत्मवंशस्य नाशाय स्वजनस्यास्य वै त्वया ।
        दीप्ता स्वगृहमानीता सुशिखा कृष्णवर्त्मनः ।७३।

        यथाऽशुभः कूटपक्षी सर्वशोकैः समुद्गतः ।
        गृहं तु विशते यस्य तस्य नाशं प्रयच्छति ।७४।

        स्वजनस्य च सर्वस्य सधनस्य कुलस्य च ।
        स द्विजो नाशमिच्छेत विशत्येव यदा गृहम् ।७५।

        तथा तेहं गृहं प्राप्ता तव नाशं समीहती ।
        पुत्राणां धनधान्यस्य तव वंशस्य साम्प्रतम्।७६।

        जीवं कुलं धनं धान्यं पुत्रपौत्रादिकं तव ।
        सर्वं ते नाशयित्वाहं यास्यामि च न संशयः ।७७।

        यथा त्वयाहमानीता चरन्ती परमं तपः ।
        पतिकामा प्रवाञ्च्छन्ती नहुषं चायुनन्दनम् ।७८।

        तथा त्वां मम भर्ता च नाशयिष्यति दानव ।
        मन्निमित्तउपायोऽयं दृष्टो देवेन वै पुरा ।७९।

        सत्येयं लौकिकी गाथा यां गायन्ति विदो जनाः।
        प्रत्यक्षं दृश्यते लोके न विन्दन्ति कुबुद्धयः ।८०।

        येन यत्र प्रभोक्तव्यं यस्माद्दुःखसुखादिकम् ।
        स एव भुञ्जते तत्र तस्मादेव न संशयः ।८१।

        कर्मणोस्य फलं भुङ्क्ष्व  स्वकीयस्य महीतले ।
        यास्यसे निरयस्थानं परदाराभिमर्शनात् ।८२।

        सुतीक्ष्णं हि सुधारं तु सुखड्गं च विघट्टति ।
        अङ्गुल्यग्रेण कोपाय तथा मां विद्धि साम्प्रतम् ।८३।

        सिंहस्य सम्मुखं गत्वा क्रुद्धस्य गर्जितस्य च ।
        को लुनाति मुखात्केशान्साहसाकारसंयुतः ।८४।

        सत्याचारां दमोपेतां नियतां तपसि स्थिताम् ।
        निधनं चेच्छते यो वै स वै मां भोक्तुमिच्छति ।८५।

        समणिं कृष्णसर्पस्य जीवमानस्य साम्प्रतम् ।
        गृहीतुमिच्छते सो हि यथा कालेन प्रेषितः ।८६।

        भवांस्तु प्रेषितो मूढ कालेन कालमोहितः ।
        तदा ते ईदृशी जाता कुमतिः किं नपश्यसि ।८७।

        ऋते तु आयुपुत्रेण समालोकयते हि कः ।
        अन्यो हि निधनं याति ममरूपावलोकनात् ।८८।

        एवमाभाषयित्वा तं गङ्गातीरं गता सती ।
        सशोका दुःखसंविग्ना नियतानि यमान्विता ।८९।

        पूर्वमाचरितं घोरं पतिकामनया तपः ।
        तव नाशार्थमिच्छंती चरिष्ये दारुणं पुनः ।९०।

        यदा त्वां निहतं दुष्टं नहुषेण महात्मना ।
        निशितैर्वज्रसंकाशैर्बाणैराशीविषोपमैः ।९१।

        रणे निपतितं पाप मुक्तकेशं सलोहितम् ।
        गतासुं च प्रपश्यामि तदा यास्याम्यहं पतिम् ।९२।

        एवं सुनियमं कृत्वा गङ्गातीरमनुत्तमम् ।        संस्थिता हुण्डनाशाय निश्चला शिवनन्दिनी ।९३।

        वह्नेर्यथादीप्तिमती शिखोज्ज्वला तेजोभियुक्ता प्रदहेत्सुलोकान् ।
        क्रोधेन दीप्ता विबुधेशपुत्री गङ्गातटे दुश्चरमाचरत्तपः।९४।

        कुञ्जल उवाच-
        एवमुक्ता महाभाग शिवस्य तनया गता ।
        गङ्गााम्बसि ततः स्नात्वा स्वपुरे काञ्चनाह्वये ।९५।

        तपश्चचार तन्वङ्गीहुण्डस्य वधहेतवे ।
        अशोकसुन्दरी बाला सत्येन च समन्विता ।९६।

        हुण्डोपि दुःखितोभूतः शापदग्धेन चेतसा ।
        चिन्तयामास सन्तप्त अतीव वचनानलैः ।९७।

        समाहूय अमात्यं तं कम्पनाख्यमथाब्रवीत् ।
        समाचष्ट स वृत्तान्तं तस्याः शापोद्भवं महत् ।९८।

        शप्तोस्म्यशोकसुन्दर्या शिवस्यापि सुकन्यया ।
        नहुषस्यापि मे भर्त्तुस्त्वं तु हस्तान्मरिष्यसि ।९९।

        नैव जातस्त्वसौ गर्भ आयोर्भार्या च गुर्विणी ।
        यथा सत्याद्व्यलीकस्तु तस्याः शापस्तथा कुरु १००।
                         "कम्पन उवाच-
        अपहृत्य प्रियां तस्य आयोश्चापि समानय ।
        अनेनापि प्रकारेण तव शत्रुर्न जायते ।१०१।

        नो वा प्रपातयस्व त्वं गर्भं तस्याः प्रभीषणैः ।
        अनेनापि प्रकारेण तव शत्रुर्न जायते ।१०२।

        जन्मकालं प्रतीक्षस्व नहुषस्य दुरात्मनः ।
        अपहृत्य समानीय जहि त्वं पापचेतनम् ।१०३।

        एवं सम्मन्त्र्य तेनापि कम्पनेन स दानवः ।
        अभूत्स उद्यमोपेतो नहुषस्य प्रणाशने ।१०४।

                          "विष्णुरुवाच-
        एलपुत्रो महाभाग आयुर्नाम क्षितीश्वरः ।
        सार्वभौमः स धर्मात्मा सत्यव्रतपरायणः ।१०५।

        इन्द्रोपेन्द्रसमो राजा तपसा यशसा बलैः ।
        दानयज्ञैः सुपुण्यैश्च सत्येन नियमेन च ।१०६।

        एकच्छत्रेण वै राज्यं चक्रे भूपतिसत्तमः ।
        पृथिव्यां सर्वधर्मज्ञः सोमवंशस्य भूषणम् ।१०७।

        पुत्रं न विंदते राजा तेन दुःखी व्यजायत ।
        चिन्तयामास धर्मात्मा कथं मे जायते सुतः ।१०८।

        इति चिन्तां समापेदे आयुश्च पृथिवीपतिः ।
        पुत्रार्थं परमं यत्नमकरोत्सुसमाहितः ।१०९।

        अत्रिपुत्रो महात्मा वै दत्तात्रेयो महामुनिः ।
        क्रीडमानः स्त्रिया सार्द्धं मदिरारुणलोचनः ।११०।

        वारुण्या मत्त धर्मात्मा स्त्रीवृन्दैश्च समावृतः ।
        अङ्के युवतिमाधाय सर्वयोषिद्वरां शुभाम् ।१११।

        गायते नृत्यते विप्रः सुरां च पिबते भृशम् ।
        विना यज्ञोपवीतेन महायोगीश्वरोत्तमः ।११२।

        पुष्पमालाभिर्दिव्याभिर्मुक्ताहारपरिच्छदैः ।
        चन्दनागुरुदिग्धाङ्गो राजमानो मुनीश्वरः ।११३।

        तस्याश्रमं नृपो गत्वा तं दृष्ट्वा द्विजसत्तमम् ।
        प्रणाममकरोन्मूर्ध्ना दण्डवत्सुसमाहितः ।११४।

        अत्रिपुत्रः स धर्मात्मा समालोक्य नृपोत्तमम् ।
        आगतं पुरतो भक्त्या अथ ध्यानं समास्थितः ।११५।

        एवं वर्षशतं प्राप्तं तस्य भूपस्य सत्तम ।
        निश्चलं शांतिमापन्नं मानसं भक्तितत्परम् ।११६।

        समाहूय उवाचेदं किमर्थं क्लिश्यसे नृप ।
        ब्रह्माचारेण हीनोस्मि ब्रह्मत्वं नास्ति मे कदा ।।११७।

        सुरामांसप्रलुब्धोऽस्मि स्त्रियासक्तः सदैव हि ।
        वरदाने न मे शक्तिरन्यं शुश्रूष ब्राह्मणम् ।११८।

                          "आयुरुवाच-
        भवादृशो महाभाग नास्ति ब्राह्मणसत्तमः ।
        सर्वकामप्रदाता वै त्रैलोक्ये परमेश्वरः ।११९।

        अत्रिवंशे महाभाग गोविंदः परमेश्वरः ।
        ब्राह्मणस्य स्वरूपेण भवान्वै गरुडध्वजः ।१२०।

        नमोऽस्तु देवदेवेश नमोऽस्तु परमेश्वर ।
        त्वामहं शरणं प्राप्तः शरणागतवत्सल ।१२१।

        उद्धरस्व हृषीकेश मायां कृत्वा प्रतिष्ठसि ।
        विश्वस्थानां प्रजानां तु विद्वांसं विश्वनायकम् ।१२२।

        जानाम्यहं जगन्नाथं भवन्तं मधुसूदनम् ।
        मामेव रक्ष गोविन्द विश्वरूप नमोस्तु ते ।१२३।

        अध्याय -(103) - पार्वती पुत्री अशोक सुंदरी को बचाये जाने  और आयुष को पुत्र का वरदान मिलने का प्रकरण-

        कुञ्जल ने कहा :

        1-2. उस समय अशोकसुंदरी का जन्म सर्वश्रेष्ठ स्त्री के रूप में हुआ था। वह मनमोहक मुस्कान वाली, गायन और नृत्य में कुशल और सभी वांछित वस्तुओं से संपन्न उत्कृष्ट मेधावी कन्या  थी । वह एक बार नंदन वन में सुसज्जित अत्यन्त सुंदर देवताओं की बेटियों के साथ सभी सुखों का आनंद ले रही थी।

        3-4.उसी समय विप्रचित्ति का पुत्र हुण्ड , जो सदैव हिंसक, उतावला और अत्यधिक कामुक रहता था, नन्दन वन में प्रवेश कर गया। सभी आभूषणों से संपन्न अशोकसुंदरी को देखने के बाद, वह अशोक सुन्दरी के देखते ही कामदेव के बाणों से घायल हो गया।

        5. उस विशाल शरीरवाले दानव ने अशोक सुन्दरी से कहा, हे शुभे, तुम कौन हो ? तुम किसकी पुत्री हो ? आप इस उत्तम नन्दन (उद्यान) में किस कारण से आयी हो ?”

        अशोकसुंदरी ने कहा :

        6. अब सुनो. मैं अत्यंत मेधावी शिव की पुत्री हूं । मैं कार्तिकेय की बहन हूं और पार्वती मेरी मां हैं।

        7. बचपन के कारण (अर्थात् बालक होने के कारण) मैं खेल-खेल में नन्दना उपवन में आयी हूँ। परन्तु आप कौन हैं ? आप मुझसे ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?

        हुण्ड ने कहा :

        8-11. मैं विप्रचित्त्ति का पुत्र हूँ, अच्छे गुणों से सम्पन्न हूँ। मैं ताकत और अपने पराक्रम के कारण घमंडी होकर हुण्ड के नाम से वि ख्यात हूँ।

        हे सुंदर मुख वाली, राक्षसों में भी मैं सर्वश्रेष्ठ हूं और मेरे समान देवताओं में, मानवलोक में या नागलोक में  कोई दूसरा राक्षस नहीं है (तपस्या के संबंध में, परिवार में महिमा के संबंध में), या धन और सुख किसी में भी कोई नहीं है।

        हे विशाल नेत्रों वाली, तुम्हें देखते ही मैं कामदेव के बाणों से घायल हो गया हूँ। मैंने आपकी शरण मांगी है. मुझ पर अनुग्रह करने की कृपा करें. मेरी प्रिय पत्नी बनो, मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय समझो।

        अशोकसुंदरी ने कहा :

        12-20. सुनो, मैं तुम्हें अच्छे पुरुषों और महिलाओं के बीच सभी संपर्कों का कारण बताता हूं; तो सुनो, हे हुण्ड ! , इस सांसारिक अस्तित्व में यह संसार की रीति है कि एक स्त्री का पति गुणों के संबंध में उसके लिए उपयुक्त होगा। यही एक कारण है कि मैं आपकी योग्य पत्नी नहीं बनूंगी।

         हे दैत्यराजों के स्वामी, शांत मन से सुनो। जब मैं वृक्षों के देवता से उत्पन्न हुई हूँ , तो शिव के मन को ठीक से समझने के बाद, पार्वती ने मेरा ध्यान किया। शिव की सहमति से देवी ने मेरे पति के उत्पन्न होने की भी भविष्य वाणी की है। 

        उसका (जन्म) चन्द्रवंश में होगा। वह बहुत बुद्धिमान और धार्मिक विचारधारा वाला होगा। वह एक विजेता होगा, और वीरता में जिष्णु (अर्थात् विष्णु या अर्जुन ) के समान होगा, और तेज में अग्नि के समान होगा। वह सर्वज्ञ, सत्यवादी और दान में कुबेर के समान होगा । वह यज्ञ करने वाला, ( महान दान देने वाला) होगा और सुन्दरता में कामदेव के समान होगा। उसका नाम नहुष होगा , वह धर्मात्मा होगा और सद्गुणों तथा अच्छे चरित्र का महान खजाना होगा। वह मुझे  देवी (पार्वती) और भगवान (शिव) द्वारा दिया गया है। मेरे पति मशहूर होंगे. और उससे मुझे सर्वगुण सम्पन्न सुन्दर पुत्र प्राप्त होगा। अर्थात-

        शिव की कृपा से मुझे उनसे ययाति नाम का एक पुत्र प्राप्त होगा , जो इंद्र और विष्णु के समान होगा, दुनिया भर के लोगों को प्रिय होगा और युद्ध में बहादुर होगा।

        21. हे वीर हुण्ड, मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं, और विशेषकर अब किसी और की पत्नी हूं। इसलिए गलत धारणा को तुम पूरी तरह त्याग दो और यहां से चले जाओ।

        22. वह बस दानव  हँसा और  उसने अशोकसुन्दरी से ये शब्द कहे।

        हुण्ड ने कहा :

        22-30. तुमने जो कहा (कि) देवी और देवता ने (नहुष ​​को तुम्हारे पति के रूप में दिया है) वह उचित नहीं है। नहुष नाम का वह धर्मात्मा चन्द्रवंश में जन्म लेगा। आप उम्र में बड़ी हैं, इसलिए जो छोटा है वह आपका पति बनने के लायक नहीं है। कम उम्र की महिला की (पत्नी बनने के लिए) सराहना की जाती है, न कि कम उम्र के पुरुष (पति बनाने के लिए प्रशंसा किय जाय। हे सुन्दरी, वह पुरूष तेरा पति कब होगा? ज तक तुम्हारी ताजगी और यौवन अवश्य नष्ट हो जायेगा। हे उत्तम वर्ण वाली, सुन्दर स्त्रियाँ अपने यौवन के बल पर सदैव पुरुषों को प्रिय हो जाती हैं। हे सुन्दर मुख वाली, यौवन ही नारियों की महान पूंजी है। इसके सहारे वे इच्छानुसार सुख और वस्तुओं का उपभोग करते हैं। हे अच्छी महिला, आयुस् का वह पुत्र तुम्हारे पास कब आएगा ? मेरी बात सुनो। यौवन आज ही (के लिए) मौजूद है। यह (बाद में) बेकार हो जाएगा. सुनो, उसे गर्भ में रहना, बचपन और किशोरावस्था जैसी स्थितियों से गुजरना होगा। वह कब यौवन के वैभव से सम्पन्न होगा और आपके योग्य होगा ? उसे बहुत समय लगेगा हे विशाल नेत्रों वाली, यौवन के तेज से युक्त, मादक पेय पी लो। मेरे साथ आनंदपूर्वक रमण करो .


        30-38. हुण्ड के वचनों को सुनकर शिव की पुत्री भय से भरकर फिर से राक्षसों के स्वामी से बोली: "जब  अठ्टाइस वाँ द्वापर नामक  युग आएगा, तब धर्मात्मा बल (अर्थात बलराम ), शेष के अवतार और वासुदेव के पुत्र , लेंगे। रेवत की दिव्य पुत्री उनकी पत्नी के रूप में। हे महामहिम, वह पहले से ही कृत नामक सर्वोत्तम युग में पैदा हो चुकी है । वह उनसे तीन युग बड़ी है। वह रेवती बल ( राम ) को अपने प्राणों के समान प्रिय हो गई है । जब भविष्य में द्वापर (युग) आएगा, तब वह यहीं जन्म लेगी।

        पूर्व में वह एक गंधर्व की उत्कृष्ट पुत्री, मायावती के रूप में पैदा हुई थी । श्रेष्ठ दैत्य शंबर ने उसका अपहरण कर बंदी बना लिया। उस युग में, यादवों के स्वामी माधव के पुत्र, सर्वश्रेष्ठ नायक प्रद्युम्न को उनका पति घोषित किया गया है।

        वह उसका पति होगा. इस भविष्य (घटना) को व्यास जैसे प्राचीन प्रतिष्ठित और महान (ऋषियों) ने देखा है । हे राक्षस, उस समय जगत की माता तथा हिमालय की पुत्री देवी ने मेरे विषय में ऐसे ही वचन कहे थे।

        39-42. और तुम लोभ और वासना के कारण ऐसे शब्द बोल रहे हो जो दुष्ट, पाप से भरे हुए और वेदों और धार्मिक ग्रंथों से रहित (अर्थात् समर्थित नहीं) हैं। किसी व्यक्ति के मामले में उसके पूर्व कर्मों के अनुसार जो भी अच्छा या बुरा निश्चित होता है, वही उसके मामले में घटित होता है। यदि देवताओं और ब्राह्मणों के मुख से निकले हुए वचन सत्य हैं, तो वे कभी भी अन्यथा नहीं होंगे। यह मेरे और उस नहुष के भाग्य के कारण नियत है।

        (हम दोनों के) मिलन का ऐसा विचार करके मेरी माता पार्वती देवी तथा शिव ने भी (ऐसा ही) कहा।

        43-44. इस बात को समझते हुए शांत रहें और अपने मन में चल रही गलत धारणा को त्याग दें।हे राक्षस, तुम निश्चय ही मेरे मन को विचलित नहीं कर पाओगे। मैं एक वफादार पत्नी हूं, मन की दृढ़ हूं; कौन मुझे दूर ले जा सकता है? मैं तुम्हें बड़े शाप से भस्म कर दूँगा। हे महान राक्षस, यहाँ से चले जाओ।”

        45-48. उसके ये वचन सुनकर महाबली राक्षस हुण्ड ने मन में सोचा, 'यह मेरी पत्नी कैसे होगी?' ऐसा सोचते हुए धोखेबाज हुंड गायब हो गया। फिर उसे छोड़कर तेजी से वहां से निकल गया और दूसरे दिन वह पाप से भरी हुई माया बनाकर वहां आ गया। हे मेरे बेटे, राक्षस ने एक स्त्री का दिव्य, मायावी रूप धारण कर लिया था, वह माया के माध्यम से एक स्त्री का रूप बन गया (अर्थात् स्वयं को बदल लिया)। उस अत्यंत सुन्दर युवती ने मायावी रूप धारण कर लिया। हँसी-मजाक और खेलकूद में व्यस्त होकर वह उस स्थान पर गई, जहाँ शिव की पुत्री (अर्थात अशोकसुंदरी) रहती थी।

        49-50. मानो (उसके प्रति) स्नेह करते हुए उसने अशोकसुंदरी से (ये) शब्द कहे: “हे धन्य, तुम कौन हो? आप किसके हैं? हे युवती, तुम क्यों तपस्या-कुंज में रहकर अपनी वासना को सुखाने वाली तपस्या करती हो? मुझे बताओ, हे परम भाग्यशाली, किस कारण से (तुम तपस्या कर रही हो) तपस्या करना बहुत कठिन है।

        51-53. उस मायावी राक्षस ने, जिसने अपना मूल रूप छिपा रखा था और जो (उसके प्रति) लालसा रखता था, उसके कहे हुए शुभ वचनों को सुनकर अत्यंत दुःखी हुई उस अशोक सुन्दरी ने शीघ्र ही उसे अपनी सृष्टि का वृत्तांत सुनाया, जैसा कि उसने पहले कहा था। स्थान और तपस्या करने का सारा कारण भी। (उसने) उस दुष्ट राक्षस द्वारा किये गये उत्पीड़न के बारे में भी (उसे बताया)। वह उसके मायावी रूप को नहीं पहचानती थी, अत: स्नेहवश उसने उसे (सब कुछ) बता दिया।

        हुण्ड ने कहा :

        54-57. हे आदरणीय स्त्री, तुम पतिव्रता हो, अच्छे व्रतों में लगी हो। आपका चरित्र और व्यवहार अच्छा है, आपके कार्य पवित्र हैं और आप बहुत पवित्र महिला हैं। हे अच्छी महिला, मैं एक वफादार पत्नी हूं और अपने पति के प्रति समर्पित हूं। मैं एक महान पतिव्रता स्त्री हूँ और अपने पति के लिये तपस्या कर रही हूँ। उस दुष्ट हुण्ड ने मेरे पति को भी मार डाला। उसके नाश के लिये मैं महान् (अर्थात् घोर) तपस्या कर रही हूँ। मेरे पवित्र आश्रम में आओ. मैं गंगा के किनारे रहती हूँ ।

        57-62. शिव की उस पुत्री को उसने (अर्थात हुण्ड ने) अन्य आकर्षक और आश्वस्त करने वाले शब्दों से संबोधित किया और हुण्डा ने मैत्रीपूर्ण भावना से उसे मोहित कर लिया। मूर्खता के कारण मोहित होकर वह बहुत तेजी से उसकी ओर आकर्षित हो गई। वह उसे अपने दिव्य, अतुलनीय और अत्यंत सुंदर घर में ले आया। हे पुत्र, मेरु के शिखर पर एक उत्कृष्ट नगर है, जो वैदूर्य नाम से जाना जाता है , सभी अच्छे गुणों से भरा हुआ है, बहुत शुभ है और काञ्चन नाम से जाना जाता है । राक्षस का पूरा शहर ऊंचे महलों, घड़ों, डंडों और चौरियों से भरा हुआ था। वह बादलों के समान गहरे नीले पेड़ों से भरा हुआ था, और विभिन्न पेड़ों से भरा हुआ था, कुओं, तालाबों और झीलों और नदियों और जलाशयों से भी भरा हुआ था। वह बड़े-बड़े रत्नों से, सोने से सुसज्जित प्राचीरों से, और सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली वस्तुओं से समृद्ध था।

        63. तब अशोकसुन्दरी ने उस सुन्दर नगर को देखा। “हे मित्र, मुझे बताओ कि यह स्थान किस देवता का है।”

        64-65. उसने कहा: “यह राक्षसों के उस सरदार का है जिसे तुम पहले देख चुकी हो। यह उस राक्षस का स्थान है. हे महाबली, मैं वह सर्वश्रेष्ठ राक्षस हूं। हे उत्तम वर्ण वाली, माया से (अर्थात तुम्हें धोखा देकर) मैं तुम्हें (यहाँ) ले आया हूँ।

        65-67. (इस प्रकार) उससे बात करके वह उसे अपने सुनहरे महल में ले गया, जो कई भवनों से भरा हुआ था और कैलास के शिखर के समान था । उन्होंने काम से पीड़ित होकर, उस सुंदर स्त्री को झूले पर बैठाया, अपना मूल रूप धारण किया, और फिर राक्षसों के स्वामी ने, कामदेव के बाणों से पीड़ित होकर, अपने हाथ की हथेलियाँ जोड़ीं, और उससे (ये) शब्द कहे :

        68-70. “हे अच्छी महिला, इसमें कोई संदेह नहीं है कि तुम जो चाहोगी मैं तुम्हें दूँगा। हे विशाल नेत्रों वाले, जो वासना से पीड़ित होकर तुमसे आसक्त हो गया है, मेरा आश्रय लो।

        आदरणीय महिला (अर्थात अशोक सुन्दरी) ने कहा :

        हे राक्षसों के स्वामी, आप मुझे बिल्कुल भी गुमराह नहीं कर सकते। मेरे विषय में (तुम्हारे मन में) जो भ्रम उत्पन्न हो गया है, उसे अपने मन में भी मत लाना। महान पापी नीच राक्षसों से मेरी रक्षा करना कठिन है। इसमें कोई संदेह नहीं है. बार-बार (ऐसी) बात तुम  मत करो.

        71-72. वह देवी, जो स्कंद के बाद उत्पन्न हुई उसकी बहिन थी, तपस्या से संपन्न, अत्यंत क्रोध से जलने वाली, उस राक्षस को नष्ट करने की इच्छा रखने वाली और मृत्यु की जीभ की तरह फड़कती हुई फिर से उस नीच राक्षस से बोली:

        72-79. “हे पापी, तूने स्वयं के विनाश के लिए, अपने परिवार और अपने रिश्तेदारों के विनाश के लिए एक भयंकर कार्य किया है। तू अपने घर में आग की एक जलती हुई, उज्ज्वल लौ लेकर आया है। जैसे एक अशुभ, धोखेबाज पक्षी, सभी प्रकार के दुखों के साथ उठता है, जिसके घर में प्रवेश करता है, उसके घर को नष्ट कर देता है, जैसे वह पक्षी (मनुष्य के) रिश्तेदारों, सभी धन और परिवार के विनाश की कामना करता है। (तब) उसके घर में प्रवेश करो, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे विनाश की इच्छा से तुम्हारे घर में आयी हूँ। निःसंदेह मैं अब तुम्हारा सब कुछ नष्ट कर दूंगी - तुम्हारा धन, धान्य, परिवार, जीवन, पुत्र और पौत्र आदि। हे राक्षस, जब से तुम मेरे पास आए हो जो एक महान (अर्थात गंभीर) तपस्या कर रही थी, मैं एक पति की लालसा कर रही थी। आयुस के पुत्र नहुष से विवाह उपरान्त, मेरा पति तुम्हें नष्ट कर देगा।

        79-88. पहले (केवल) भगवान ने मेरे मामले में यह उपाय देखा था। यह लोकप्रिय श्लोक, (जिसे) बुद्धिमान लोग गाते हैं, सत्य है। यह वास्तव में दुनिया में मनाया जाता है; दुष्ट मन वालों को इसका एहसास नहीं होता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिसे किसी एक से दुःख, सुख आदि का अनुभव करना होता है, वह उसी व्यक्ति से अनुभव करता है। तुम (आदमी) के पास जाओगे। कोई अपनी उंगली की नोक से बहुत तेज़, महीन धार वाली, अच्छी तलवार को छूता है। अब जान लो कि मुझे इस तरह छूने से (मुझमें) गुस्सा पैदा हो जाएगा। कौन उतावले होकर क्रोध में और जोर से दहाड़ रहे सिंह के पास जाकर उसके चेहरे के बाल काट देगा ? जो मृत्यु की इच्छा रखता है, वह मेरे साथ व्यभिचार करना चाहता है, जो सत्य आचरण वाला, संयमी और तपस्या में रत रहने वाला है। वह, अब, चूँकि वह मृत्यु से प्रेरित है, एक काले, जीवित नाग के मणि को जब्त करने की इच्छा रखता है; और हे मूर्ख, तू मृत्यु से मोहित होकर मृत्यु के द्वारा भेजा गया है। इसलिये ऐसा दुष्ट विचार (तुम्हारे मन में) उत्पन्न होता है। क्या तुम्हें इसका एहसास नहीं है? आयू के बेटे को छोड़कर, कौन देखता है (यानी मेरी तरफ देखेगा)? मेरे रूप को देखकर कोई भी (आयुस् के बेटे के अलावा) मर जाएगा।

        89-92. वह जो पतिव्रता स्त्री थी, जो दुःखी थी, जो क्लेश से व्याकुल थी, जो वश में थी और जो धार्मिक व्रत का पालन कर रही थी, वह इस प्रकार बोलकर गंगा के तट पर चली गयी। 'मैं, जिसने पहले वर की इच्छा से (प्राप्त करने के लिए) कठोर तपस्या की थी, अब आपके विनाश की इच्छा से फिर से कठिन तपस्या करूंगी। तब मैं अपने पति के पास जाऊँगी, जब मैं तुम्हें विशाल नहुष द्वारा वज्र और सर्पों के समान तीक्ष्ण बाणों से मार डाला हुआ, युद्धभूमि में खुले बालों और रक्त से लथपथ उस पापी को देखूँगी। आपके शरीर से रिस रहा है)।”

        93-94. हुण्ड के विनाश के लिए इतनी बड़ी प्रतिज्ञा करके, शिव की उस दृढ़ पुत्री ने गंगा के उत्कृष्ट तट का सहारा लिया। जिस प्रकार तेज,  अग्नि की लौ, तेज से भरी हुई महान लोकों को जला देगी, देवताओं के स्वामी की बेटी, क्रोध से जलती हुई, गंगा के तट पर,  कठिन तपस्या कर रही थी।

        कुंजल ने कहा :

        95-96. हे महानुभाव, इस प्रकार कहकर शिव की पुत्री गंगा के जल में स्नान करके कांचन नामक अपने नगर में चली गई। दुबले-पतले शरीर वाली और सत्यनिष्ठा से संपन्न उस युवा अशोकसुंदरी ने हुंड की मृत्यु के लिए तपस्या की।

        97-98. हुण्ड भी शाप से जले हुए हृदय से दुःखी हो गया और शब्दों की अग्नि से अत्यन्त पीड़ित होकर सोचने लगा। 

        -उसने कम्पन नामक अपने मंत्री को बुलाकर उससे कहा। उसने उसे उसके श्राप का महत्वपूर्ण समाचार सुनाया:

        99-100. "मुझे शिव की अच्छी बेटी अशोकसुन्दरी ने शाप दिया है: उसने कहा है।कि 'तुम मेरे पति नहुष के हाथों मरोगे।' वह बच्चा (अभी तक) पैदा नहीं हुआ है; लेकिन आयु की पत्नी उसकी माँ होगी । ऐसा कार्य करो कि अभिशाप झूठा निकले।”

        कंपन ने कहा :

        101-104. आयु की पत्नी का अपहरण करके उसे (यहाँ) ले आओ। इस तरह आपका शत्रु पैदा नहीं होगा. या फिर तेज़ (दवाइयों) से उसका गर्भपात करा दो। इस तरह आपका शत्रु भी पैदा नहीं होगा. उस दुष्ट नहुष के जन्म का समय अंकित करो। इसे लेकर (यहाँ )लाओ और पापबुद्धि को मार डालो।

        इस प्रकार कम्पन के साथ परामर्श करने के बाद, राक्षस (हुंड) ने नहुष को नष्ट करने के लिए खुद ही प्रयास किया।

        विष्णु ने कहा :

        105-108. ऐल (पुरुरवा) का गौरवशाली, धर्मात्मा पुत्र , जिसका नाम आयु था, जो सोम कुल का आभूषण था , सर्वश्रेष्ठ राजा और सभी प्रथाओं को जानने वाला संप्रभु सम्राट, सत्य की प्रतिज्ञा में लगा हुआ, इंद्र और विष्णु के समान, एक छत्र के नीचे शासन करता था सार्वभौमिक संप्रभु) पृथ्वी पर तपस्या, महिमा, शक्ति, दान, बलिदान, मेधावी कृत्यों और संयम के माध्यम से। 

        राजा (आयुस्) का कोई पुत्र नहीं था। इसलिए वह दुखी था. धर्मी ने सोचा, 'मेरे यहां पुत्र कैसे उत्पन्न हो सकता है?'

        109. पृथ्वी के स्वामी आयु ने ऐसा विचार मन में उठाया। शांतचित्त होकर उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिये बहुत प्रयत्न किया।

        110-113. अत्रि के पुत्र दत्तात्रेय , उच्चात्मा ब्राह्मण , महान ऋषि, जिनकी आँखें शराब पीने के कारण लाल थीं, एक स्त्री के साथ क्रीड़ा कर रहे थे। उस धर्मात्मा ने शराब के नशे में धुत होकर, एक युवा, शुभ स्त्री, सभी स्त्रियों में सर्वश्रेष्ठ, को अपनी गोद में बिठाया, गाना गाया, नृत्य किया और जमकर शराब पी। महान ध्यान करने वाले संतों में सर्वश्रेष्ठ,  ऋषि, (जो) बिना जनेऊ के थे, (और) अपने शरीर पर चंदन और घृत का लेप लगाए हुए थे, फूलों की दिव्य मालाओं और मोतियों के हार के उपांगों से चमक रहे थे।

        114-118. राजा ने उसके आश्रम में जाकर, श्रेष्ठ ब्राह्मण को देखकर और शांतचित्त होकर, सिर झुकाकर और उसके सामने गिरकर उसे नमस्कार किया। अत्रि के उस धर्मात्मा पुत्र ने अपने सामने आये उस श्रेष्ठ राजा को भक्तिपूर्वक देखकर ध्यान का सहारा लिया। हे श्रेष्ठ, राजा को इसी प्रकार सौ वर्ष बीत गये। जो स्थिर, शान्त और अत्यंत समर्पित था, उसे बुलाकर उसने ये (शब्द) कहे: “हे राजा, तू अपने आप को क्यों कष्ट देता है? मैं ब्राह्मण आचरण से रहित हूँ। मेरे पास कभी नहीं  ब्राह्मणत्व था. मैं शराब और माँस का लालची हूँ और सदैव स्त्रियों में आसक्त रहता हूँ।

        मुझमें वरदान देने की शक्ति नहीं है। (कृपया) किसी अन्य ब्राह्मण की सेवा कर तू।”

        आयुस ने कहा :

        119-123. हे महामहिम, आपके समान कोई अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मण नहीं है, जो सभी वांछित वस्तुओं को प्रदान करता है और तीनों लोकों में सबसे महान स्वामी है। हे महामहिम, आप विष्णु हैं, गरुड़ -धारी, सर्वोच्च भगवान, (ब्राह्मण के रूप में अत्रि के परिवार में जन्मे)। हे देवाधिदेवों के प्रधान, हे सर्वोच्च प्रभु, मैं आपको नमस्कार करता हूं। हे तुम जो अपने आप को तुम्हारे अधीन कर देते हो उन पर स्नेह करने वालों, मैंने तुम्हारी शरण मांगी है। हे हृषीकेश , मुझे मुक्ति दो। तुम भ्रम पैदा करके बने रहते हो (अर्थात आनंद लेते हो)। मैं तुम्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में जानता हूं जो ब्रह्मांड में रहने वाले प्राणियों को जानता है, जो ब्रह्मांड का प्रमुख है, जो दुनिया का स्वामी है और (राक्षस) मधु का हत्यारे हैं । हे गोविंद , हे विश्वरूप, आप ही मेरी रक्षा करें। आपको मेरा प्रणाम!

        __________________________    


        दानवं सूदयिष्यामि समरे पापचेतनम् ।
        देवानां च विशेषेण मम मायापचारितम् ।१३।

        एवमुक्ते महावाक्ये नहुषेण महात्मना ।
        अथायातः स्वयं देवः शङ्खचक्रगदाधरः ।१४।*******

        चक्राच्चक्रं समुत्पाट्य सूर्यबिम्बोपमं महत्।
        ज्वलता तेजसा दीप्तं सुवृत्तारं शुभावहम् ।१५।

        नहुषाय ददौ देवो हर्षेण महता किल ।
        तस्मै शूलं ददौ शम्भुः सुतीक्ष्णं तेजसान्वितम्।१६।

        तेन शूलवरेणासौ शोभते समरोद्यतः ।
        द्वितीयः शङ्करश्चासौ त्रिपुरघ्नो यथा प्रभुः।१७।

        ब्रह्मास्त्रं दत्तवान्ब्रह्मा वरुणः पाशमुत्तमम् ।
        चन्द्र तेजःप्रतीकाशं शङ्खं च नादमङ्गलम् ।१८।

        वज्रमिन्द्रस्तथा शक्तिं वायुश्चापं समार्गणम् ।
        आग्नेयास्त्रं तथा वह्निर्ददौ तस्मै महात्मने।१९।

        शस्त्राण्यस्त्राणि दिव्यानि बहूनि विविधानि च ।
        ददुर्देवा महात्मानस्तस्मै राज्ञे महौजसे ।२०।

                          "कुञ्जल उवाच-
        अथ आयुसुतो वीरो दैवतैः परिमानितः ।
        आशीर्भिर्नन्दितश्चापि मुनिभिस्तत्त्ववेदिभिः।२१।

        आरुरोह रथं दिव्यं भास्वरं रत्नमालिनम् ।
        घण्टारवैः प्रणदन्तं क्षुद्रघण्टासमाकुलम् ।२२।

        रथेन तेन दिव्येन शुशुभे नृपनन्दन: ।
        दिविमार्गे यथा सूर्यस्तेजसा स्वेन वै किल ।२३।

        प्रतपंस्तेजसा तद्वद्दैत्यानां मस्तकेषु सः ।
        जगाम शीघ्रं वेगेन यथा वायुः सदागतिः।२४।

        यत्रासौ दानवः पापस्तिष्ठते स्वबलैर्युतः ।
        तेन मातलिना सार्द्धं वाहकेन महात्मना ।२५।

        "अनुवाद"

        इन शब्दों को सुनकर) राजाओं के स्वामी हर्ष के कारण रोमाँचित हो गए (कहा:) "देवताओं के भगवान, उदार वशिष्ठ की कृपा से, मैं युद्ध में एक दुष्ट हृदय के राक्षस को मार डालूँगा, जिसने देवताओं को धोखा दिया था और विशेष रूप से मुझको।"

        14-20. जब नहुष ने ये महान वचन कहे तो शंख, चक्र और गदा धारण किये हुए भगवान विष्णु स्वयं वहाँ आये। भगवान ने अपने चक्र से सूर्य के गोले के समान, ज्वलन्त चमक से चमकने वाली, गोल तीलियों वाली और शुभता लाने वाली एक बड़ी चक्र निकाला, जिसे भगवान ने बहुत खुशी के साथ नहुष को दे दिया।

        **************************

         शिव ने उसे तेजस्विता से युक्त एक अत्यंत तीक्ष्ण भाला दिया। उस उत्कृष्ट भाले से वह युद्ध के लिये तत्पर होकर त्रिपुर के संहारक भगवान शिव के समान चमकने लगा । ब्रह्मा ने उसे ब्रह्मास्त्र दिया । वरुण ने उसे चन्द्रमा के समान कान्ति वाला एक उत्तम पाश और मंगल ध्वनि वाला शंख दिया। इंद्र ने (उसे) वज्र और (एक प्रकार की मिसाइल जिसे शक्ति कहा जाता है) दी । वायु ने (उसे) बाणों सहित एक धनुष दिया। ( अग्नि ) ने उदार अग्नि-प्रक्षेपास्त्र दिया।(इस प्रकार) देवताओं ने उस महान तेजस्वी राजा को विभिन्न प्रकार के दिव्य हथियार और **********

        कुंजल ने कहा :

        21-25. तब आयु के पुत्र, देवताओं द्वारा सम्मानित और ऋषियों द्वारा आशीर्वाद के साथ ब्राह्मण के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले नायक , दिव्य, चमकदार, रत्नों से सुसज्जित, घंटियों के कारण बड़ी ध्वनि करने वाले और छोटी-छोटी घंटियों से भरे हुए रथ में चढ़े। . उस दिव्य रथ से राजकुमार दिव्य पथ पर अपनी चमक से सूर्य के समान चमकने लगा। वह उसी के समान अपने तेज से प्रज्वलित होकर, उस उदार सारथी मातलि के साथ, राक्षसों के सिरों की ओर, निरंतर चलने वाले वायु की तरह, तेजी से और तेजी से उस स्थान पर पहुंचे, जहां वह पापी राक्षस हुण्ड अपनी सेना के साथ खड़ा था।

        इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे नहुषाख्याने दशाधिकशततमोऽध्यायः ।११०।

        _____________

        दत्तात्रेयो मुनिश्रेष्ठः साक्षाद्देवो भविष्यति ।
        शुश्रूषितस्त्वया देवि मया च तपसा पुरा ।२६।


        पुत्ररत्नं तेन दत्तं वैष्णवांशप्रधारकम् ।************
        सदा हनिष्यति परं दानवं पापचेतनम् ।२७।

        सर्वदैत्यप्रहर्ता च प्रजापालो महाबलः ।
        दत्तात्रेयेण मे दत्तो वैष्णवाञ्शः सुतोत्तमः ।२८।

        एवं संभाष्य तां देवीं राजा चेन्दुमतीं तदा ।
        महोत्सवं ततश्चक्रे पुत्रस्यागमनं प्रति ।२९।

        हर्षेण महताविष्टो विष्णुं सस्मार वै पुनः ।३०।
        सर्वोपपन्नं सुरवर्गयुक्तमानन्दरूपं परमार्थमेकम् ।
        क्लेशापहं सौख्यप्रदं नराणां सद्वैष्णवानामिह मोक्षदं परम् ।३१। 

        "अनुवाद"

        23-28. उसके शब्दों को सुनकर, राजाओं के स्वामी ने अपनी पत्नी से कहा: "हे गौरवशाली, पहले ऋषि नारद ने मुझसे कहा था: 'हे राजा, तुम्हें अपने बेटे के बारे में कभी चिंता नहीं करनी चाहिए। तुम्हारा पुत्र बड़ी वीरता से उस राक्षस को मारकर आएगा।' मुनि ने पहले जो वचन कहे थे वे सत्य हो गये। हे रानी, ​​उसकी बातें अन्यथा (अर्थात् असत्य) कैसे होंगी? ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ दत्तात्रेय वास्तव में भगवान हैं। पूर्व में, हे रानी, ​​आपने और मैंने तपस्या के माध्यम से उनकी सेवा की थी। उन्होंने विष्णु के अंश से हमें यह पुत्र रत्न दिया है । वह सदैव एक महान दुष्टात्मा राक्षस का वध करेगा। दत्तात्रेय ने मुझे सबसे उत्तम और अत्यंत शक्तिशाली पुत्र दिया है, जो विष्णु का अंश है, सभी राक्षसों का संहार करने वाला है और अपनी प्रजा का पालन-पोषण करेगा।”

        29-31. रानी इन्दुमती से इस प्रकार कहकर राजा ने अपने पुत्र के आगमन पर बड़े उत्सव मनाया। अत्यंत आनंद से परिपूर्ण होकर उसने फिर से सब कुछ से संपन्न, देवताओं के समूहों के साथ, आनंद स्वरूप, एकमात्र सर्वोच्च वस्तु, दर्द को दूर करने वाले, खुशी देने वाले और विष्णु के अच्छे अनुयायियों को मोक्ष देने वाले महान दाता विष्णु को याद किया।

        इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखंडे वेनोपाख्याने गुरुतीर्थमाहात्म्ये च्यवनचरित्रे नहुषाख्याने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ।११६।



        अब नहुष के पुत्र वैष्णव धर्म के प्रचारक सम्राट ययाति की जीवन गाथा-

        मातलि के द्वारा भगवान् शिव और श्रीविष्णु की महिमा का वर्णन, मातलि को विदा करके राजा ययाति का वैष्णवधर्म के प्रचार द्वारा भूलोक को वैकुण्ठ तुल्य बनाना तथा ययाति के दरबार में कामदेव आदि का नाटक खेलना आदि का प्राचीन प्रसंग-  मूल संस्कृत तथा उसका हिन्दी अनुवाद सहित-

                          'पिप्पल उवाच-
        मातलेश्च वचः श्रुत्वा स राजा नहुषात्मजः।
        किं चकार महाप्राज्ञस्तन्मे विस्तरतो वद ।१।

        सर्वपुण्यमयी पुण्या कथेयं पापनाशिनी ।
        श्रोतुमिच्छाम्यहं प्राज्ञ नैव तृप्यामि सर्वदा ।२।

                        'सुकर्मोवाच-
        सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठो ययातिर्नृपसत्तमः ।
        तमुवाचागतं दूतं मातलिं शक्रसारथिम् ।३।

                        "ययातिरुवाच-
        शरीरं नैव त्यक्ष्यामि गमिष्ये न दिवं पुनः ।
        शरीरेण विना दूत पार्थिवेन न संशयः ।४।

        यद्यप्येवं महादोषाः कायस्यैव प्रकीर्तिताः ।
        पूर्वं चापि समाख्यातं त्वया सर्वं गुणागुणम् ।५।

        नाहं त्यक्ष्ये शरीरं वै नागमिष्ये दिवं पुनः ।
        इत्याचक्ष्व इतो गत्वा देवदेवं पुरन्दरम् ।६।

        एकाकिना हि जीवेन कायेनापि महामते ।
        नैव सिद्धिं प्रयात्येवं सांसारिकमिहैव हि ।७।

        नैव प्राणं विना कायो जीवः कायं विना नहि ।
        उभयोश्चापि मित्रत्वं नयिष्ये नाशमिन्द्र न ।८।

        यस्य प्रसादभावाद्वै सुखमश्नाति केवलम् ।
        शरीरस्याप्ययं प्राणो भोगानन्यान्मनोनुगान् ।९।

        एवं ज्ञात्वा स्वर्गभोग्यं न भोज्यं देवदूतक ।
        सम्भवन्ति महादुष्टा व्याधयो दुःखदायकाः ।१०।

        मातले किल्बिषाच्चैव जरादोषात्प्रजायते ।
        पश्य मे पुण्यसंयुक्तं कायं षोडशवार्षिकम् ।११।

        जन्मप्रभृति मे कायः शतार्धाब्दं प्रयाति च ।
        तथापि नूतनो भावः कायस्यापि प्रजायते ।१२।

        मम कालो गतो दूत अब्दा प्रनंत्यमनुत्तमम् ।
        यथा षोडशवर्षस्य कायः पुंसः प्रशोभते ।१३।

        तथा मे शोभते देहो बलवीर्यसमन्वितः ।
        नैव ग्लानिर्न मे हानिर्न श्रमो व्याधयो जरा ।१४।

        मातले मम कायेपि धर्मोत्साहेन वर्द्धते ।
        सर्वामृतमयं दिव्यमौषधं परमौषधम् ।१५।

        पापव्याधिप्रणाशार्थं धर्माख्यं हि कृतम्पुरा ।
        तेन मे शोधितः कायो गतदोषस्तु जायते ।१६।

        हृषीकेशस्य संध्यानं नामोच्चारणमुत्तमम् ।
        एतद्रसायनं दूत नित्यमेवं करोम्यहम् ।१७।

        तेन मे व्याधयो दोषाः पापाद्याः प्रलयं गताः।
        विद्यमाने हि संसारे कृष्णनाम्नि महौषधे ।१८।

        मानवा मरणं यांति पापव्याधि प्रपीडिताः ।
        न पिबन्ति महामूढाः कृष्ण नाम रसायनम् ।१९।

        तेन ध्यानेन ज्ञानेन पूजाभावेन मातले ।
        सत्येन दानपुण्येन मम कायो निरामयः।२०।

        पापर्द्धेरामयाः पीडाः प्रभवन्ति शरीरिणः ।
        पीडाभ्यो जायते मृत्युः प्राणिनां नात्र संशयः ।२१।

        तस्माद्धर्मः प्रकर्तव्यः पुण्यसत्याश्रयैर्नरैः ।
        पञ्चभूतात्मकः कायः शिरासन्धिविजर्जरः।२२।

        एवं सन्धीकृतो मर्त्यो हेमकारीव टंकणैः ।
        तत्र भाति महानग्निर्द्धातुरेव चरः सदा ।२३।

        शतखण्डमये विप्र यः सन्धत्ते सबुद्धिमान् ।
        हरेर्नाम्ना च दिव्येन सौभाग्येनापि पिप्पल ।२४।

        पञ्चात्मका हि ये खण्डाः शतसन्धिविजर्जराः ।
        तेन सन्धारिताः सर्वे कायो धातुसमो भवेत् ।२५।

        हरेः पूजोपचारेण ध्यानेन नियमेन च ।
        सत्यभावेन दानेन नूत्नः कायो विजायते ।२६।

        दोषा नश्यन्ति कायस्य व्याधयः शृणु मातले ।
        बाह्याभ्यन्तरशौचं हि दुर्गंधिर्नैव जायते ।२७।

        शुचिस्ततो भवेत्सूत प्रसादात्तस्य चक्रिणः ।
        नाहं स्वर्गं गमिष्यामि स्वर्गमत्र करोम्यहम् ।२८।

        तपसा चैव भावेन स्वधर्मेण महीतलम् ।
        स्वर्गरूपं करिष्यामि प्रसादात्तस्य चक्रिणः ।२९।

        एवं ज्ञात्वा प्रयाहि त्वं कथयस्व पुरन्दरम् ।
                            "सुकर्मोवाच-
        समाकर्ण्य ततः सूतो नृपतेः परिभाषितम् ।३०।

        आशीर्भिरभिनंद्याथ आमन्त्र्य नृपतिं गतः ।
        सर्वं निवेदयामास इन्द्राय च महात्मने ।३१।

        समाकर्ण्य सहस्राक्षो ययातेस्तु महात्मनः ।
        तस्याथ चिन्तयामासानयनार्थं दिवं प्रति ।३२।

        इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने मातापितृतीर्थवर्णने ययातिचरिते द्विसप्ततितमोऽध्यायः ।७२।

        "अनुवाद"

        अध्याय 72 - ययाति की शरीर छोड़ने की अनिच्छा

        पिप्पल ने कहा :

        1-2. हे अत्यंत बुद्धिमान, मुझे विस्तार से बताओ कि मातलि के वचन सुनकर नहुष के पुत्र राजा ययाति ने क्या कहा । हे मुनिवर, यह पापों का नाश करने वाली परम पुण्यमयी कथा है। मुझे इसे सुनने की इच्छा है. मुझे बिल्कुल भी संतुष्टि नहीं हो रही है.

        3. श्रेष्ठ राजा, धर्मपरायण लोगों में सबसे महान, ययाति ने, इंद्र के सारथी, दूत मातलि से, जो (उनके पास) आया था, कहा:

        ययाति ने कहा :

        4-7. हे दूत, मैं अपना शरीर नहीं त्यागूंगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मैं (इस) पार्थिव शरीर के बिना स्वर्ग नहीं जाऊँगा। यद्यपि आपने इस प्रकार शरीर के महान दोषों का वर्णन किया है, और यद्यपि आप पहले ही इसके सभी गुण और दोषों का वर्णन कर चुके हैं, फिर भी मैं अपने शरीर का त्याग नहीं करूंगा, और मैं स्वर्ग में नहीं आऊंगा। देवताओं के राजा इंद्र के पास जाकर उनसे इस प्रकार कहो: “हे अत्यंत बुद्धिमान, कोई व्यक्ति अकेले आत्मा के माध्यम से या केवल शरीर के माध्यम से पूर्णता प्राप्त नहीं करता है। यह शरीर सांसारिक (अस्तित्व) है.

        8-14. शरीर जीवन (अर्थात आत्मा) के बिना नहीं रह सकता, न ही आत्मा शरीर के बिना रह सकती है। हे इन्द्र, उनमें मित्रता है (अर्थात वे परस्पर मित्र हैं)। मैं उस शरीर को नष्ट नहीं करूँगा जिसकी कृपा से आत्मा को अपने मन के अनुसार (अर्थात् इच्छानुसार) अनन्य सुख तथा अन्य सुख प्राप्त होते हैं।” हे देवदूत, स्वर्ग में भोगों को इस प्रकार जानते हुए भी मैं उन्हें नहीं चाहता। हे मातलि, दोषों के कारण कष्टदायक और अत्यंत पापपूर्ण रोग (संक्रमित) होते हैं।

        बुढ़ापा एक दोष के कारण होता है। मेरे धार्मिक गुणों से सम्पन्न और सोलह वर्ष के शरीर का निरीक्षण करें। मेरे जन्म के बाद से मेरा शरीर आधी शताब्दी तक चला गया है (अर्थात् अस्तित्व में है)। अभी भी मेरे शरीर में ताजगी है। मेरा यह (अर्थात् जीवन) काल उत्तम व्यतीत हुआ। जैसे सोलह वर्ष के युवक का शरीर सुन्दर दिखता है, उसी प्रकार शक्ति और वीरता से सम्पन्न मेरा शरीर दिखता है।

        4-16. , मुझे असफलता नहीं है, मुझे थकावट नहीं है; न ही मुझे कोई बीमारी या बुढ़ापा है। हे मातलि, मेरा शरीर भी धर्मपरायणता के उत्साह से भर जाता है; क्योंकि, पुराने दिनों में, औषधि - दिव्य और, महान , अमृत से भरपूर, पापों और रोगों के विनाश के लिए तैयार की जाती है। उससे मेरा शरीर शुद्ध होता है; (इसलिए) यह दोषों से मुक्त है.

        17-24. हे दूत, मैं सदैव अमृत का पान (अर्थात् ग्रहण) करता रहता हूँ। विष्णु का ध्यान और उनके नाम का उत्कृष्ट उच्चारण उससे मेरे सभी रोग और पाप आदि दोष नष्ट हो गए हैं, जब इस सांसारिक अस्तित्व में कृष्ण (अर्थात विष्णु) के नाम जैसी महान (अर्थात् प्रभावी) औषधि है।

         पाप-पूर्ण रोग से पीड़ित मनुष्य मर जाते हैं (क्योंकि) अत्यंत मूर्ख लोग कृष्ण (अर्थात विष्णु) के नाम का अमृत नहीं पीते हैं। हे मातलि, उस ध्यान, ज्ञान, पूजा, सत्यता और दान देने के धार्मिक पुण्य के कारण मेरा शरीर स्वस्थ है। 

        रोग और कष्ट उसे सताते हैं जिनकी सिद्धि पाप है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्राणी यहीं (अर्थात इस संसार में) कष्टों के कारण मरते हैं। इसलिये मनुष्यों को सदाचार और सत्यता का आश्रय लेकर धर्म-कर्म करना चाहिये। शरीर पांच तत्वों से बना है, और नाड़ियों और जोड़ों से जर्जर हो गया है। जैसे एक आभूषण सुनार द्वारा टङ्कण (धातु की चीज में टाँका मारकार जोड़ लगाने का कार्य)   से बनाया जाता है, उसी प्रकार एक मनुष्य को एक साथ रखा जाता है। इसमें सदैव एक महान अग्नि, शरीर का गतिशील हास्य चमकता रहता है, जो सैकड़ों टुकड़ों से बना होता है। हे ब्राह्मण , जो इन टुकड़ों को जोड़ता है वह बुद्धिमान है।

        25-30. हे पिप्पल , पांच तत्वों की प्रकृति के ये सभी टुकड़े (शरीर के) और सैकड़ों जोड़ों से घिसे हुए, विष्णु के दिव्य नाम और सौभाग्य से एक साथ रखे गए हैं। शरीर एक धातु की तरह है. विष्णु की पूजा, ध्यान और संयम, सत्य और दान से शरीर नया हो जाता है। हे मातलि, सुनो, शरीर के दोष-रोग-नाश हो जाते हैं। बाह्य एवं आन्तरिक पवित्रता रहती है तथा दुर्गन्ध नहीं रहती। तब, हे सारथी, चक्रधारी (अर्थात विष्णु) की कृपा से, (शरीर) शुद्ध होगा।

        मैं स्वर्ग नहीं जाऊंगा. मैं यहीं (केवल) स्वर्ग का निर्माण करूंगा। मैं (अपनी) तपस्या, भक्ति, अपने धार्मिक कृत्यों और चक्र-धारक की कृपा से पृथ्वी को स्वर्ग की प्रकृति बना दूंगा। यह जानकर आप (कृपया) जाकर इन्द्र से कह दीजिये।

        सुकर्मन ने कहा :

        30-32. तब वह सारथी राजा के वचन सुनकर और आशीर्वाद देकर राजा से विदा लेकर (स्वर्ग को) चला गया। उसने सारी बात देवराज इन्द्र को बता दी। उदार ययाति का (संदेश) सुनकर इंद्र ने सोचा कि ययाति को स्वर्ग में कैसे लाया जाए।

        _____________

          पद्मपुराण /खण्डः-२ (भूमिखण्डःअध्याय 73 )
                       पिप्पल उवाच-

        गते तस्मिन्महाभागे दूत इंद्रस्य वै पुनः ।
        किं चकार स धर्मात्मा ययातिर्नहुषात्मजः ।१।

                             सुकर्मोवाच-
        तस्मिन्गते देववरस्य दूते स चिंतयामास नरेंद्रसूनुः।आहूय दूतान्प्रवरान्स सत्वरं धर्मार्थयुक्तं वच आदिदेश ।२।

        गच्छन्तु दूताः प्रवराः पुरोत्तमे देशेषु द्वीपेष्वखिलेषु लोके।
        कुर्वंतु वाक्यं मम धर्मयुक्तं व्रजन्तु लोकाः सुपथा हरेश्च ।३।

        भावैः सुपुण्यैरमृतोपमानैर्ध्यानैश्च ज्ञानैर्यजनैस्तपोभिः।
        यज्ञैश्च दानैर्मधुसूदनैकमर्चंतु लोका विषयान्विहाय ।४।

        सर्वत्र पश्यंत्वसुरारिमेकं शुष्केषु चार्द्रेष्वपि स्थावरेषु ।
        अभ्रेषु भूमौ सचराचरेषु स्वीयेषु कायेष्वपि जीवरूपम् ।५।

        देवं तमुद्दिश्य ददंतु दानमातिथ्यभावैः परिपैत्रिकैश्च।
        नारायणं देववरं यजध्वं दोषैर्विमुक्ता अचिराद्भविष्यथ ।६।

        यो मामकं वाक्यमिहैव मानवो लोभाद्विमोहादपि नैव कारयेत् ।
        स शास्यतां यास्यति निर्घृणो ध्रुवं ममापि चौरो हि यथा निकृष्टः ।७।

        आकर्ण्य वाक्यं नृपतेश्च दूताःसंहृष्टभावाः सकलां च पृथ्वीम् ।
        आचख्युरेवं नृपतेः प्रणीतमादेशभावं सकलं प्रजासु ।८।

        विप्रादिमर्त्या अमृतं सुपुण्यमानीतमेवं भुवि तेन राज्ञा ।
        पिबंतु पुण्यं परिवैष्णवाख्यं दोषैर्विहीनं परिणाममिष्टम् ।९।

        श्रीकेशवं क्लेशहरं वरेण्यमानंदरूपं परमार्थमेवम् 
        नामामृतं दोषहरं सुराज्ञा आनीतमस्त्येव पिबंतु लोकाः ।१०।

        सखड्गपाणिं मधुसूदनाख्यं तं श्रीनिवासं सगुणं सुरेशम् ।
        नामामृतं दोषहरं सुराज्ञा आनीतमस्त्येव पिबंतु लोकाः।११।

        श्रीपद्मनाथं कमलेक्षणं च आधाररूपं जगतां महेशम् ।
        नामामृतं दोषहरं सुराज्ञा आनीतमस्त्येव पिबंतु लोकाः ।१२।

        पापापहं व्याधिविनाशरूपमानंददं दानवदैत्यनाशनम् ।
        नामामृतं दोषहरं सुराज्ञा आनीतमस्त्येव पिबन्तु लोकाः ।१३।

        यज्ञांगरूपं चरथांगपाणिं पुण्याकरं सौख्यमनंतरूपम् ।
        नामामृतं दोषहरं सुराज्ञा आनीतमस्त्येव पिबंतु लोकाः।१४।

        विश्वाधिवासं विमलं विरामं रामाभिधानं रमणं मुरारिम् ।
        नामामृतं दोषहरं सुराज्ञा आनीतमस्त्येव पिबंतु लोकाः।१५।

        आदित्यरूपं तमसां विनाशं बंधस्यनाशं मतिपंकजानाम् ।
        नामामृतं दोषहरं सुराज्ञा आनीतमस्त्येव पिबंतु लोकाः।१६।

        नामामृतं सत्यमिदं सुपुण्यमधीत्य यो मानव विष्णुभक्तः।
        प्रभातकाले नियतो महात्मा स याति मुक्तिं न हि कारणं च ।१७।


        अध्याय- 73 - विष्णु के नाम की प्रभावकारिता

        पिप्पल ने कहा :

        1.जब वह तेजस्वी दूत (स्वर्ग के लिए) चला गया, तो नहुष के पुत्र, धार्मिक विचारधारा वाले ययाति ने क्या किया?

        सुकर्मन ने कहा :

        2-7. जब  देवता (अर्थात इंद्र ) का वह दूत चला गया, तो राजा नहुष के पुत्र  ने (अपने मन में) सोचा। तुरंत अपने उत्कृष्ट दूतों को बुलाकर, उन्होंने उन्हें उचित शब्दों में निर्देश दिया: “उत्कृष्ट दूतों को एक उत्कृष्ट शहर, दुनिया के सभी क्षेत्रों और द्वीपों में जायें और वे मेरे वचनों (अर्थात् आदेश) का पालन करें, जो सदाचार से परिपूर्ण है। लोग भक्ति और अत्यंत मेधावी कार्यों, अमृत के समान ध्यान, ज्ञान, बलिदान और तपस्या के माध्यम से विष्णु के अच्छे मार्ग पर चलें 

         वे सांसारिक इन्द्रियों के विषयों का त्याग करके यज्ञों और उपहारों से केवल विष्णु की ही पूजा करें। वे हर जगह केवल राक्षसों और आत्मा की प्रकृति के शत्रु को ही देखें - सूखे स्थानों पर, गीले और स्थिर स्थानों पर, बादलों में, पृथ्वी पर, गतिशील और स्थिर (वस्तुओं) में और यहां तक ​​कि अपने स्वयं के शरीर में भी। वे अपने मृत पूर्वजों के सम्मान में आतिथ्य और संस्कार के साथ उन्हें उस देवता को समर्पित करते हुए उपहार दे सकते हैं। क्या वे उस सर्वश्रेष्ठ भगवान नारायण (अर्थात् विष्णु) की  उपासना करते हैं ;  वे शीघ्र ही दोषों से मुक्त हो जायेंगे। वह निर्लज्ज मनुष्य जो लोभ या मूर्खता के कारण अभी मेरी ये बातें नहीं मानेेगे, उन्हें निश्चय ही एक नीच चोर के समान दण्ड दिया जाएगा।”

        8. राजा की बातें सुनकर दूत मन से प्रसन्न  सारी पृय्वी पर चले गए, और राजा की आज्ञा सारी प्रजा में प्रगट की।

        _________

        9-16. “हे मनुष्यों, ब्राह्मणों तथा अन्य लोगों, राजा अत्यंत पुण्यदायी अमृत को पृथ्वी पर लेकर आये हैं। उस वैष्णव नामक गुणकारी (अमृत) को पीजिए , जो दोषों से मुक्त और वांछनीय प्रभाव वाला है। राजा ने पहले ही श्रीकेशव नाम के रूप में दोषों को दूर करने वाला अमृत (पृथ्वी पर) ला दिया है, जो दु:ख को दूर करता है, जो वांछनीय है, जो आनंद का रूप है और जो स्वयं सर्वोच्च सत्य है। लोग इसे पीयें. अच्छे राजा ने पहले से ही अपने नाम के रूप में दोषों को दूर करने वाला अमृत (पृथ्वी पर) ला दिया है, जिसके हाथ में तलवार है, जिसे मधुसूदन कहा जाता है, जो लक्ष्मी का निवास है , और देवताओं का मेधावी स्वामी है। लोग इसे पीयें. अच्छे राजा ने पहले ही कमल जैसी आँखों वाले, संसार के सहारा और महान स्वामी, श्री पद्मनाभ नाम के रूप में, दोषों को दूर करते हुए, अमृत (पृथ्वी पर) ला दिया है। लोग इसे पियें। अच्छे राजा ने पहले ही (विष्णु के) नाम के रूप में दोषों को दूर करने वाला अमृत ला दिया है, जो पापों को नष्ट कर देता है, जो रोगों को दूर कर देता है, जो आनंद देता है, जो दानवों और दैत्यों यानी राक्षसों) को नष्ट कर देता है। लोग इसे पीयें. अच्छा राजा पहले से ही यज्ञीय प्रकृति के विष्णु नाम के रूप में दोषों को दूर करने वाला अमृत लेकर आया है, उसके हाथ में एक चक्र है, जो धार्मिक गुणों की खान है, और अनंत सुख की खान है। लोग इसे पीयें. राजा पहले से ही दोषों को दूर करने वाला, विष्णु के नाम के रूप में, हर चीज का निवास, शुद्ध, अंत (हर चीज का), राम नाम वाला , सुखदायक और मुरारि का  अमृत लेकर आया है । लोग इसे पीयें. अच्छे राजा ने पहले ही अमृत ला दिया है, जो दोषों को दूर करता है, (विष्णु के नाम के रूप में), सूर्य के रूप में, अंधेरे का विनाशक, मन रूपी कमल के बंधन को नष्ट करने वाला। लोग इसे पीयें.

        17. वह श्रेष्ठ, विष्णु का भक्त, स्वयं को संयमित करके, (विष्णु के) नाम के इस सत्य, अत्यंत मेधावी अमृत का अध्ययन (अर्थात् पाठ) करता है, मोक्ष को प्राप्त होता है। (इसके अलावा) कोई (अन्य) प्रतिनिथि नहीं है।”


          पद्मपुराणम्/खण्डः २ (भूमिखण्डः अध्याय-74)


                           'सुकर्मोवाच-
        दूतास्तु ग्रामेषु वदन्ति सर्वे द्वीपेषु देशेष्वथ पत्तनेषु 
        लोकाः शृणुध्वं नृपतेस्तदाज्ञां सर्वप्रभावैर्हरिमर्चयंतु ।१।

        दानैश्च यज्ञैर्बहुभिस्तपोभिर्धर्माभिलाषैर्यजनैर्मनोभिः।
        ध्यायन्तु लोका मधुसूदनं तु आदेशमेवं नृपतेस्तु तस्य ।२।

        एवं सुघुष्टं सकलं तु पुण्यमाकर्ण्य तं भूमितलेषु लोकैः।
        तदाप्रभृत्येव यजन्ति विष्णुं ध्यायन्ति गायन्ति जपन्ति मर्त्याः ।३।

        वेदप्रणीतैश्च सुसूक्तमन्त्रैः स्तोत्रैः सुपुण्यैरमृतोपमानैः ।
        श्रीकेशवं तद्गतमानसास्ते व्रतोपवासैर्नियमैश्च दानैः ।४।

        विहाय दोषान्निजकायचित्तवागुद्भवान्प्रेमरताः समस्ताः ।
        लक्ष्मीनिवासं जगतां निवासं श्रीवासुदेवं परिपूजयन्ति।५।

        इत्याज्ञातस्य भूपस्य वर्तते क्षितिमण्डले ।
        वैष्णवेनापि भावेन जनाः सर्वे जयन्ति ते ।६।

        नामभिः कर्मभिर्विष्णुं यजन्ते ज्ञानकोविदाः ।
        तद्ध्यानास्तद्व्यवसिता विष्णुपूजापरायणाः ।७।

        यावद्भूमण्डलं सर्वं यावत्तपति भास्करः ।
        तावद्धि मानवा लोकाः सर्वे भागवता बभुः।८।

        विष्णोर्ध्यानप्रभावेण पूजास्तोत्रेण नामतः ।
        आधिव्याधिविहीनास्ते संजाता मानवास्तदा ।९।

        वीतशोकाश्च पुण्याश्च सर्वे चैव तपोधनाः ।
        सञ्जाता वैष्णवा विप्र प्रसादात्तस्य चक्रिणः ।१०।

        आमयैश्च विहीनास्ते दोषैरोषैश्च वर्जिताः ।
        सर्वैश्वर्यसमापन्नाः सर्वरोगविवर्जिताः।११।

        प्रसादात्तस्य देवस्य सञ्जाता मानवास्तदा ।
        अमराः निर्जराः सर्वे धनधान्यसमन्विताः ।१२।

        मर्त्या विष्णुप्रसादेन पुत्रपौत्रैरलंकृताः ।        तेषामेव महाभाग गृहद्वारेषु नित्यदा ।१३।

        कल्पद्रुमाः सुपुण्यास्ते सर्वकामफलप्रदाः ।
        सर्वकामदुघा गावः सचिंतामणयस्तथा ।१४।

        सन्ति तेषां गृहे पुण्याः सर्वकामप्रदायकाः ।
        अमरा मानवा जाताः पुत्रपौत्रैरलंकृताः ।१५।

        सर्वदोषविहीनास्ते विष्णोश्चैव प्रसादतः।
        सर्वसौभाग्यसम्पन्नाः पुण्यमंगलसंयुताः।१६।

        सुपुण्या दानसंपन्ना ज्ञानध्यानपरायणाः।
        न दुर्भिक्षं न च व्याधिर्नाकालमरणं नृणाम् ।१७।

        तस्मिञ्शासति धर्मज्ञे ययातौ नृपतौ तदा ।
        वैष्णवा मानवाः सर्वे विष्णुव्रतपरायणाः ।१८।

        तद्ध्यानास्तद्गताः सर्वे संजाता भावतत्पराः।
        तेषां गृहाणि दिव्यानि पुण्यानि द्विजसत्तम।१९।

        पताकाभिः सुशुक्लाभिः शंखयुक्तानि तानि वै ।
        गदांकितध्वजाभिश्च नित्यं चक्रांकितानि च ।२०।

        पद्मांकितानि भासन्ते विमानप्रतिमानि च ।
        गृहाणि भित्तिभागेषु चित्रितानि सुचित्रकैः।२१।

        सर्वत्र गृहद्वारेषु पुण्यस्थानेषु सत्तमाः।
        वनानि संति दिव्यानि शाद्वलानि शुभानि च ।२२।

        तुलस्या च द्विजश्रेष्ठ तेषु केशवमन्दिरैः ।
        भासन्ते पुण्यदिव्यानि गृहाणि प्राणिनां सदा।२३।

        सर्वत्र वैष्णवो भावो मंगलो बहु दृश्यते ।
        शंखशब्दाश्च भूलोके मिथः स्फोटरवैः सखे ।२४।

        श्रूयन्ते तत्र विप्रेंद्र दोषपापविनाशकाः ।
        शंखस्वस्तिकपद्मानि गृहद्वारेषु भित्तिषु ।२५।

        विष्णुभक्त्या च नारीभिर्लिखितानि द्विजोत्तम ।
        गीतरागसुवर्णैश्च मूर्च्छना तानसुस्वरैः।२६।

        गायन्ति केशवं लोका विष्णुध्यानपरायणाः।२७।

        हरिं मुरारिं प्रवदंति केशवं प्रीत्या जितं माधवमेव चान्ये ।
        श्रीनारसिंहं कमलेक्षणं तं गोविंदमेकं कमलापतिं च ।२८।

        कृष्णं शरण्यं शरणं जपन्ति रामं च जप्यैः परिपूजयंति ।
        दण्डप्रणामैः प्रणमन्ति विष्णुं तद्ध्यानयुक्ताः परवैष्णवास्ते ।२९।

        अध्याय 74 - ययाति के शासन के दौरान वैष्णव धर्म की लोकप्रियता

        सुकर्मन ने कहा :

        1-2. सभी दूतों ने द्वीपों, प्रदेशों और नगरों में कहा (अर्थात् प्रचार किया) : “हे प्रजा, राजा की आज्ञा सुनो।” वे अपनी संपूर्ण महिमा के साथ विष्णु की पूजा करते हैं । पुण्य की इच्छा रखने वाले (समर्पित) मन वाले लोग, कई उपहारों, बलिदानों के माध्यम से, विष्णु पर चिंतन करें; तपस्या, और यज्ञ संस्कार।'' ऐसी उस राजा की आज्ञा है.

        3-5. पृथ्वी पर (संदेशवाहकों द्वारा) इस प्रकार सुप्रचारित ये सब गुणात्मक (वचन) लोगों ने सुने। तब से केवल मनुष्य ही विष्णु के (सम्मान में) बलिदान देते हैं,।

         उनका चिंतन करते हैं, उनकी स्तुति गाते हैं और बुदबुदाते हैं (उनके लिए प्रार्थना करते हैं)। सभी मनुष्य व्रत, उपवास, संयम और दान के द्वारा अपने शरीर, मन और वाणी के दोषों को त्याग कर और अपने हृदय से उन पर समर्पित होकर उन श्री केशव, श्री वासुदेव की पूजा करते हैं। लक्ष्मी का निवास , और लोकों का निवास, वेदों द्वारा सिखाए गए बहुत ही मेधावी और अमृतमय भजनों और स्तुतियों के साथ।

        6-11. इस प्रकार उस राजा का आदेश पृथ्वी पर प्रचलित होता है। वे सभी लोग विष्णु की भक्ति के कारण विजयी हुए हैं। जो लोग ज्ञान में पारंगत हैं, और जो उनका ध्यान और चिंतन करते हैं और जो उनकी पूजा करने के इच्छुक हैं, वे विष्णु की (अर्थात् उनके नामों का पाठ करके) और उनके कर्मों से पूजा करते हैं। जब तक पृथ्वी कायम है और सूर्य चमक रहा है तब तक सभी मनुष्य भगवान (विष्णु) के अनुयायी थे (अर्थात बने रहेंगे)। तब विष्णु के ध्यान की शक्ति के कारण, उनकी पूजा और उनकी स्तुति और (उनके) नामों के (पाठ) के कारण मनुष्य मानसिक पीड़ा और शारीरिक रोगों से मुक्त हो गए। हे ब्राह्मण , चक्रधारी (अर्थात विष्णु) की कृपा से विष्णु के सभी भक्त दुःख से मुक्त हो गए, मेधावी बन गए और तपस्या ही उनका धन बन गई। वे रोगों से मुक्त थे, दोष या क्रोध से रहित थे; वे सभी प्रकार के वैभव से संपन्न और सभी रोगों से मुक्त थे।

        12-27. उस देवता की कृपा से उस समय के सभी मनुष्य अजर-अमर हो गये और सभी धन-धान्य से सम्पन्न हो गये। विष्णु की कृपा से प्राणी पुत्रों और पौत्रों से सुशोभित थे। हे महानुभाव, उनके घरों के दरवाज़ों पर (आस-पास के क्षेत्रों में) हमेशा ही उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले फल देने वाले गुणकारी वृक्ष होते थे, और सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली गायें भी होती थीं। विष्णु की कृपा से ही सभी मनुष्य अमर हो गये, पुत्र-पौत्रों से सुशोभित हो गये और सभी दोषों से मुक्त हो गये। वे सौभाग्य, योग्यता एवं शुभता से सम्पन्न थे। वे बड़े मेधावी, दान-पुण्य से सम्पन्न तथा ज्ञान-ध्यान में तत्पर थे। जब राजा ययाति , जो जानते थे कि क्या सही है, शासन कर रहे थे, तब कोई अकाल नहीं था, कोई बीमारी नहीं थी, और मनुष्यों में कोई अकाल मृत्यु नहीं थी। सभी मनुष्य विष्णु के भक्त थे, सभी विष्णु के व्रत (अर्थात उनके लिए पवित्र) के प्रति समर्पित (पालन करने वाले) थे। उन्होंने उस पर ध्यान किया, वे उसके प्रति समर्पित थे, और उनका हृदय उस पर लगा हुआ था। हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, उनके दिव्य और शुभ घर सफेद ध्वजों और शंखों से सुसज्जित थे, और उनके ध्वज गदाओं से चिह्नित थे और चक्रों से चिह्नित थे। कमलों से अंकित और अच्छे चित्रों से रंगी हुई दीवारों वाले घर दिव्य कारों के समान थे। हे श्रेष्ठों, हर जगह - घरों के दरवाजों के पास और पवित्र स्थानों पर पेड़ों की दिव्य झाड़ियाँ और शुभ घास के स्थान थे। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, तुलसी और विष्णु के मंदिरों के कारण (मानव) प्राणियों के शुभ और दिव्य घर हमेशा चमकते रहते हैं। सर्वत्र विष्णु के प्रति मेधावी भक्ति प्रचुर मात्रा में देखी गई। हे मित्र, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, वहाँ पृथ्वी पर परस्पर टकराने और पाप का नाश करने वाली ध्वनियों के कारण शंख की ध्वनियाँ सुनाई दे रही थीं। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, विष्णु के प्रति भक्ति के कारण स्त्रियों ने घरों के दरवाजों पर शंख, स्वस्तिक , कमल के चित्र बनाए थे ; और संगीत, गाने, अच्छे शब्दों, संगीत के पैमाने के माध्यम से ध्वनियों के विनियमित उत्थान या पतन के साथ विष्णु का ध्यान करने वाले लोग विष्णु की प्रशंसा में गाते हैं।

        28-29. वे हरि , मुरारी , केशव, अजित , माधव के बारे में स्नेहपूर्वक बात करते हैं । वे शरणागत विष्णु के नाम जपते हैं, (जैसे) कमल-नेत्र गोविंद, कमला के स्वामी (अर्थात लक्ष्मी), कृष्ण और राम , और (उनके नाम) जपते हुए पूजा करते हैं। विष्णु के वे महान भक्त, ध्यान में लगे हुए, उनके सामने पूरी तरह से प्रणाम करके उन्हें नमस्कार करते हैं।

        _________________________


                          "सुकर्मोवाच-
        विष्णुं  हरिं रामं कृष्णं मुकुंदं मधुसूदनम् ।
        नारायणं विष्णुरूपं नारसिंहं तमच्युतम् ।१।

        केशवं पद्मनाभं च वासुदेवं च वामनम् ।
        वाराहं कमठं मत्स्यं हृषीकेशं सुराधिपम् ।२।

        विश्वेशं विश्वरूपं च अनंतमनघं शुचिम् ।
        पुरुषं पुष्कराक्षं च श्रीधरं श्रीपतिं हरिम् ।३।

        श्रीनिवासं पीतवासं माधवं मोक्षदं प्रभुम् ।
        इत्येवं हि समुच्चारं नामभिर्मानवाः सदा ।४।

        प्रकुर्वंति नराः सर्वे बालवृद्धाः कुमारिकाः ।
        स्त्रियो हरिं सुगायंति गृहकर्मरताः सदा ।५।

        आसने शयने याने ध्याने वचसि माधवम् ।
        क्रीडमानास्तथा बाला गोविंदं प्रणमंति ते ।६।

        दिवारात्रौ सुमधुरं ब्रुवंति हरिनाम च ।
        विष्णूच्चारो हि सर्वत्र श्रूयते द्विजसत्तम ।७।

        वैष्णवेन प्रभावेण मर्त्या वर्तंति भूतले ।
        प्रासादकलशाग्रेषु देवतायतनेषु च ।८।

        यथा सूर्यस्य बिंबानि तथा चक्राणि भांति च ।वैकुंठे दृश्यते भावस्तद्भावं जगतीतले ।९।

        तेन राज्ञा कृतं विप्र पुण्यं चापि महात्मना ।
        विष्णुलोकस्य समतां तथानीतं महीतलम् ।१०।

        नहुषस्यापि पुत्रेण वैष्णवेन ययातिना ।
        उभयोर्लोकयोर्भावमेकीभूतं महीतलम् ।११।

        भूतलस्यापि विष्णोश्च अंतरं नैव दृश्यते ।
        विष्णूच्चारं तु वैकुंठे यथा कुर्वंति वैष्णवाः ।१२।

        भूतले तादृशोच्चारं प्रकुर्वंति च मानवाः ।
        उभयोर्लोकयोर्विप्र एकभावः प्रदृश्यते ।१३।

        जरारोगभयं नास्ति मृत्युहीना नरा बभुः ।
        दानभोगप्रभावश्च अधिको दृश्यते भुवि ।१४।

        पुत्राणां तु सुखं पुण्यमधिकं पौत्रजं नराः ।
        प्रभुंजंति सुखेनापि मानवा भुवि सत्तम ।१५।

        विष्णोः प्रसाददानेन उपदेशेन तस्य च ।
        सर्वव्याधिविनिर्मुक्ता मानवा वैष्णवाः सदा ।१६।

        स्वर्गलोकप्रभावो हि कृतो राज्ञा महीतले ।
        पंचविंशप्रमाणेन वर्षाणि नृपसत्तम ।१७।

        गदैर्हीना नराः सर्वे ज्ञानध्यानपरायणाः ।
        यज्ञदानपराः सर्वे दयाभावाश्च मानवाः ।१८।

        उपकाररताः पुण्या धन्यास्ते कीर्तिभाजनाः ।
        सर्वे धर्मपरा विप्र विष्णुध्यानपरायणाः ।१९।

        राज्ञा तेनोपदिष्टास्ते संजाता वैष्णवा भुवि ।
                          "विष्णुरुवाच-
        श्रूयतां नृपशार्दूल चरित्रं तस्य भूपतेः ।२०।

        सर्वधर्मपरो नित्यं विष्णुभक्तश्च नाहुषिः ।
        अब्दानां तत्र लक्षं हि तस्याप्येवं गतं भुवि ।२१।

        नूतनो दृश्यते कायः पंचविंशाब्दिको यथा ।
        पंचविंशाब्दिको भाति रूपेण वयसा तदा ।२२।

        प्रबलः प्रौढिसंपन्नः प्रसादात्तस्य चक्रिणः ।
        मानुषा भुवमास्थाय यमं नैव प्रयांति ते ।२३।

        रागद्वेषविनिर्मुक्ताः क्लेशपाशविवर्जिताः ।
        सुखिनो दानपुण्यैश्च सर्वधर्मपरायणाः ।२४।

        विस्तारं तेजनाः सर्वे संतत्यापि गता नृप ।
        यथा दूर्वावटाश्चैव विस्तारं यांति भूतले ।२५।

        यथा ते मानवाः सर्वे पुत्रपौत्रैः प्रविस्तृताः ।
        मृत्युदोषविहीनास्ते चिरं जीवंति वै जनाः ।२६।

        स्थिरकायाश्च सुखिनो जरारोगविवर्जिताः ।
        पंचविंशाब्दिकाः सर्वे नरा दृश्यंति भूतले ।२७।

        सत्याचारपराः सर्वे विष्णुध्यानपरायणाः ।
        एवं सर्वे च मर्त्यास्ते प्रसादात्तस्य चक्रिणः ।२८।

        संजाता मानवाः सर्वे दानभोगपरायणाः ।
        मृतो न श्रूयते लोके मर्त्यः कोपि नरोत्तम ।२९।

        शोकं नैव प्रपश्यंति दोषं नैव प्रयांति ते ।
        यद्रूपं स्वर्गलोकस्य तद्रूपं भूतलस्य च ।३०।

        संजातं मानवश्रेष्ठ प्रसादात्तस्य चक्रिणः ।
        विभ्रष्टा यमदूतास्ते विष्णुदूतैश्च ताडिताः ।३१।

        रुदमाना गताः सर्वे धर्मराजं परस्परम् ।
        तत्सर्वं कथितं दूतैश्चेष्टितं भूपतेस्तु तैः ।३२।

        अमृत्युभूतलं जातं दानभोगेन भास्करे ।
        नहुषस्यात्मजेनापि कृतं देवययातिना ।३३।

        विष्णुभक्तेन पुण्येन स्वर्गरूपं प्रदर्शितम् ।
        एवमाकर्णितं सर्वं धर्मराजेन वै तदा ।३४।

        धर्मराजस्तदा तत्र दूतेभ्यः श्रुतविस्तरः ।
        चिंतयामास सर्वार्थं श्रुत्वैवंनृपचेष्टितम् ।३५।

        इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखंडे वेनोपाख्याने मातापितृतीर्थवर्णने ययातिचरित्रे पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ।७५। 

        "अनुवाद"

        अध्याय 75 - विष्णु की कृपा से ययाति की प्रजा अमर हो गई

        सुकर्मन ने कहा :

        1-6. सभी पुरुष, बच्चे, बूढ़े, अविवाहित लड़कियाँ हमेशा विष्णु, कृष्ण , हरि , राम , मुकुंद , मधुसूदन, विष्णु के रूप नारायण, नरसिंह , अच्युत , केशव , पद्मन जैसे नामों का उच्चारण करते थे (अर्थात विष्णु के विभिन्न नामों का जाप करते थे)।

         आभा , वासुदेव , वामन , वराह , कामठ , मत्स्य , हृषिकेश , सुरधिप, विश्वेश, विश्वरूप, अनंत , अनाघ , शुचि , पुरुष , पुष्करक्ष, श्रीधर , श्रीपति , हरि , श्रीनिवास , पीतवास ( अर्थात पीले वस्त्र पहने हुए), माधव , मोक्षदा ( अर्थात मोक्ष दाता) और प्रभु । घरेलू काम में लगी महिलाएँ हमेशा हरि, माधव, (जब वे बैठी होती थीं) (जब वे लेटी हुई होती थीं) (जब वे जा रही होती थीं) वाहन में  प्रचुर मात्रा में गाती थीं (अर्थात् उनके नामों का जप करती थीं)। और ध्यान में. इसी प्रकार बच्चों ने (जबकि) खेलते हुए गोविंद (अर्थात विष्णु) को प्रणाम किया।

        7-16. दिन-रात वे विष्णु के अत्यंत मधुर नाम का उच्चारण करते थे। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ , सर्वत्र विष्णु का (नाम का) उच्चारण सुनाई दे रहा था। मनुष्य पृथ्वी पर (केवल) विष्णु की शक्ति से रहते थे। विष्णु का चक्र) के प्रतिबिंब) के रूप में चमकता है। सूर्य के चक्र महलों और मंदिरों के घड़ों के शीर्ष पर चमकते हैं। जो स्थिति वैकुण्ठ में देखी गई वही पृथ्वी पर देखी गई। 

        उस महान राजा नहुष के पुत्र ययाति ने पुण्य का कार्य किया और पृथ्वी को विष्णु  के वैकुण्ठ के समान बना दिया। दोनों लोकों की शक्ल (समान होने से) पृथ्वी एक (विष्णु के वैकुण्ठ के साथ) हो गई थी। पृथ्वी और विष्णु के वैकुण्ठ में कोई अंतर नहीं देखा गया।

        जैसे विष्णु के भक्तों ने वैकुण्ठ में विष्णु के नामों का उच्चारण किया, उसी प्रकार (अर्थात् उसी प्रकार) मनुष्यों ने पृथ्वी पर विष्णु के नामों का उच्चारण किया।

        हे ब्राह्मण, दोनों दुनियाओं के बीच पहचान देखी गई। बुढ़ापे और बीमारियों से कोई डर नहीं था. लोग मृत्यु से मुक्त हो गये। पृथ्वी पर दान और भोग का अधिक वैभव देखने को मिला। 

        हे श्रेष्ठ, पुरुषों ने पुत्रों और पौत्रों से (अर्थात) अधिक आनंद उठाया। सभी मनुष्य - विष्णु के भक्त - विष्णु की कृपा (जो उन्हें प्राप्त हुई) और उनके निर्देश के कारण सभी रोगों से हमेशा मुक्त थे।

        17-20. राजा ने पृथ्वी पर वैकुण्ठ का वैभव लाया। हे श्रेष्ठ राजा, वर्ष पच्चीस वर्ष के थे (अर्थात् बहुत लम्बे थे)। सभी मनुष्य रोगों से मुक्त थे और ज्ञान तथा ध्यान पाने के इच्छुक थे। 

        सभी मनुष्य पूरी तरह से विष्णु यजन करने ) और उपहार देने  में लीन थे और सभी दयालु थे।वे (दूसरों को) उपकृत करने में लगे हुए थे; यश के भंडार वे मेधावी पुरुष धन्य हो गये। 

        हे ब्राह्मण, सभी मनुष्य पूरी तरह से धर्म के प्रति समर्पित थे और पूरी तरह से ध्यान में लीन थे। उस राजा के निर्देश पर, वे पृथ्वी पर विष्णु के प्रति समर्पित हो गये।

        विष्णु ने कहा :

        20-28. हे राजाश्रेष्ठ, उस राजा का वृत्तान्त सुनो।नहुष का वह पुत्र सदैव सभी गुणों में लीन और विष्णु का भक्त था। इस प्रकार उन्होंने पृथ्वी पर एक लाख वर्ष व्यतीत किये।

         उसका शरीर परिपक्व हो गया था और रूप से पच्चीस वर्ष का प्रतीत होता था। वे मनुष्य (अर्थात् उसकी प्रजा) पृथ्वी का आश्रय लेकर (अर्थात् उस पर रहकर) यम के पास नहीं जाते थे।********

        हे राजा, सभी लोग राग-द्वेष से रहित, कष्ट के पाश से रहित, उपहार देने से प्राप्त पुण्य से प्रसन्न और केवल सभी धार्मिक कार्यों में समर्पित रहने वाले लोगों का सदैव विस्तार होता है ।

        (अर्थात उनकी संख्या बढ़ती है) संतान के संबंध में भी. जैसे दूर्वा (घास) और बरगद के वृक्ष शाखाओं की तरह पृथ्वी पर फैले हुए थे, उसी प्रकार वे सभी मनुष्य पुत्रों और पौत्रों के द्वारा विस्तार (अर्थात संख्या में वृद्धि) करने लगे।

         वे मनुष्य मृत्यु के दोष से मुक्त होकर दीर्घकाल तक जीवित रहे। पृथ्वी पर सब (वे) बलिष्ठ शरीर वाले, बुढ़ापे और रोगों से रहित तथा (अत: प्रसन्न) पुरुष पच्चीस वर्ष के (अर्थात् बहुत युवा) जान पड़ते थे। 

        सभी अच्छे आचरण के प्रति समर्पित थे और विष्णु के ध्यान में लीन थे। इसी लिए वे सभी भौतिक विकारों से परे थे।

        28-34. इस प्रकार सभी नश्वर प्राणी-सभी मनुष्य-उस चक्र-धारक (अर्थात विष्णु) की कृपा के कारण, पूरी तरह से उपहार और भोग के प्रति समर्पित हो गए थे। हे नरश्रेष्ठ, किसी भी मनुष्य को मरा हुआ नहीं सुना गया। उन्होंने दु:ख न देखा  और न ही मिला। वे निर्दोष देखे जाते हैं 

        हे पुरुषश्रेष्ठ, उस चक्रधारी की कृपा से संसार का स्वरूप ठीक वैसा ही हो गया जैसा वैकुण्ठ का स्वरूप था। 

        विष्णु के दूतों द्वारा पीटे गए यम के दूत गायब हो गए। वे सभी एक दूसरे के साथ रोते हुए धर्मराज (अर्थात् यम) के पास गये। 

        दूतों ने (यम को) वह सब बता दिया जो राजा (अर्थात् ययाति) ने किया था। (उन्होंने यम से कहा): “हे सूर्य पुत्र; दान और भोग के कारण पृथ्वी अमर हो गई है। 

        हे भगवान यम , नहुष के पुत्र ययाति ने ऐसा किया है। विष्णु के उस मेधावी भक्त ने (पृथ्वी पर) वैकुण्ठ की प्रकृति का प्रदर्शन किया।

        34-35. उसी समय धर्मराज ने यह सब सुन लिया। तब धर्मराज ने राजा की गतिविधियों को विस्तारपूर्वक सुनकर सारी बात पर विचार किया।

        ***************

        आयुष, नहुष, और ययाति का प्रकरण 

        ( लक्ष्मीनारायण- संहिता खण्ड- तृतीय-3- द्वापरयुग सन्तान अध्याय-(73) 

        पर भी इसी प्रकार पद्मपुराण के समान ययाति का वैष्णव चरित्र वर्णित है। जिसके निम्न दो श्लोकों में ययाति के द्वारा अन्त में गोलोक में जाने का वर्णन है।

        ययातिः प्रययौ विष्णोर्वैकुण्ठं वैष्णवैः सह ।
        ब्रह्मलोकं ययुः सर्वे पूजिताश्चाऽमरादिभिः ।१११।

        एवं भक्तिप्रभावोऽस्ति लक्ष्मि निर्बन्धकृत् सदा 
        अहं नयामि वैकुण्ठं गोलोकं चाऽक्षरं परम् ।१ १२।
        सन्दर्भ:-
         



        पद्मपुराणम्/खण्डः २ (भूमिखण्डः अध्याय (76) प्रारम्भ-)

                          "सुकर्मोवाच-
        सौरिर्दूतैस्तथा सर्वैः सह स्वर्गं जगाम सः।
        द्रष्टुं तत्र सहस्राक्षं देववृंदैः समावृतम् ।१।

        धर्मराजं समायांतं ददर्श सुरराट्तदा ।
        समुत्थाय त्वरायुक्तो दत्वा चार्घमनुत्तमम्।२।

        पप्रच्छागमनं तस्य कथयस्व ममाग्रतः ।
        समाकर्ण्य महद्वाक्यं देवराजस्य भाषितम् ।३।

        धर्मराजोऽब्रवीत्सर्वं ययातेश्चरितं महत् ।
                      "धर्मराज उवाच-
        श्रूयतां देवदेवेश यस्मादागमनं मम।४।

        कथयाम्यहमत्रापि येनाहमागतस्तव ।
        नहुषस्यात्मजेनापि वैष्णवेन महात्मना।५।

        वैष्णवाश्च कृता मर्त्या ये वसन्ति महीतले ।
        वैकुण्ठस्य समं रूपं मर्त्यलोकस्य वै कृतम्।६।

        अमरा मानवा जाता जरारोगविवर्जिताः ।
        पापमेव न कुर्वंति असत्यं न वदंति ते।७।

        कामक्रोधविहीनास्ते लोभमोहविवर्जिताः ।
        दानशीला महात्मानः सर्वे धर्मपरायणाः।८।

        सर्वधर्मैः समर्चन्ति नारायणमनामयम् ।
        तेन वैष्णवधर्मेण मानवा जगतीतले ।९।

        निरामया वीतशोकाः सर्वे च स्थिरयौवनाः ।
        दूर्वा वटा यथा देव विस्तारं यान्ति भूतले ।१०।

        तथा ते विस्तरं प्राप्ताः पुत्रपौत्रैः प्रपौत्रकैः ।
        तेषां पुत्रैः प्रपौत्रैश्च वंशाद्वंशांतरं गताः।११।

        एवं हि वैष्णवः सर्वो जरामृत्युविवर्जितः ।
        मर्त्यलोकः कृतस्तेन नहुषस्यात्मजेन वै।१२।

        पदभ्रष्टोस्मि सञ्जातो व्यापारेण विवर्जितः ।
        एतत्सर्वं समाख्यातं मम कर्मविनाशनम् ।१३।

        एवं ज्ञात्वा सहस्राक्ष लोकस्यास्य हितं कुरु ।
        एतत्ते सर्वमाख्यातं यथापृष्टोस्मि वै त्वया ।१४।

        एतस्मात्कारणादिन्द्र आगतस्तव सन्निधौ ।
                            "इन्द्र उवाच-
        पूर्वमेव मया दूत आगमाय महात्मनः।१५।

        प्रेषितो धर्मराजेन्द्र दूतेनास्यापि भाषितम् ।
        नाहं स्वर्गसुखस्यार्थी नागमिष्ये दिवं पुनः।१६

        स्वर्गरूपं करिष्यामि सर्वं तद्भूमिमंडलम् ।
        इत्याचचक्षे भूपालः प्रजापाल्यं करोति सः।१७।

        तस्य धर्मप्रभावेण भीतस्तिष्ठामि सर्वदा ।
                       "धर्म उवाच-
        येनकेनाप्युपायेन तमानय सुभूपतिम् ।१८।

        देवराज महाभाग यदीच्छसि मम प्रियम् ।
        इत्याकर्ण्य वचस्तस्य धर्मस्यापि सुराधिपः।१९।

        चिन्तयामास मेधावी सर्वतत्वेन भूपते ।
        कामदेवं समाहूय गंधर्वांश्च पुरंदरः।२०।

        मकरन्दं रतिं देव आनिनाय महामनाः ।
        तथा कुरुत वै यूयं यथाऽगच्छति भूपतिः।२१।

        यूयं गच्छन्तु भूर्लोकं मयादिष्टा न संशयः ।
                          "काम उवाच-
        युवयोस्तु प्रियं पुण्यं करिष्यामि न संशयः।२२।

        राजानं पश्य मां चैव स्थितं चैव समा युधि।
        तथेत्युक्त्वा गताः सर्वे यत्र राजा स नाहुषिः।२३।

        नटरूपेण ते सर्वे कामाद्याः कर्मणा द्विज ।
        आशीर्भिरभिनन्द्यैव ते च ऊचुः सुनाटकम् ।२४।

        तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ययातिः पृथिवीपतिः ।
        सभां चकार मेधावी देवरूपां सुपण्डितैः। २५।

        समायातः स्वयं भूपो ज्ञानविज्ञानकोविदः ।
        तेषां तु नाटकं राजा पश्यमानः स नाहुषिः।२६।

        चरितं वामनस्यापि उत्पत्तिं विप्ररूपिणः।
        रूपेणाप्रतिमा लोके सुस्वरं गीतमुत्तमम् ।२७।

        गायमाना जरा राजन्नार्यारूपेण वै तदा ।
        तस्या गीतविलासेन हास्येन ललितेन च ।२८।

        मधुरालापतस्तस्य कन्दर्पस्य च मायया ।
        मोहितस्तेन भावेन दिव्येन चरितेन च ।२९।

        बलेश्चैव यथारूपं विंध्यावल्या यथा पुरा ।
        वामनस्य यथारूपं चक्रे मारोथ तादृशम् ।३०।

        सूत्रधारः स्वयं कामो वसंतः पारिपार्श्वकः ।
        नटीवेषधरा जाता सा रतिर्हृष्टवल्लभा।३१।

        नेपथ्यान्तश्चरी राजन्सा तस्मिन्नृत्यकर्मणि ।
        मकरन्दो महाप्राज्ञः क्षोभयामास भूपतिम् ।३२।

        यथायथा पश्यति नृत्यमुत्तमं गीतं समाकर्णति स क्षितीशः ।
        तथातथा मोहितवान्स भूपतिं नटीप्रणीतेन महानुभावः ।३३।


          "अध्याय-76 -धर्मराज बेरोजगार हो गये-

        अनुवाद:-

        सुकर्मन ने कहा :

        1-4. सूर्य के पुत्र ( यम ) अपने सभी दूतों के साथ देवताओं के समूहों से घिरे इंद्र से  मिलने  के लिए स्वर्ग गए । तभी उस देवराज (अर्थात इन्द्र) ने धर्मराज को अपनी सभा में देखा। 

        उसने झट से उठकर उसे उत्तम सम्मानपूर्ण भेंट दी और उससे  उनके आने का कारण पूछा  "मुझे बताओ  (तुम क्यों आए हो)।" देवताओं के राजा के भारी वचनों को सुनकर धर्मराज ने उन्हें ययाति का सारा महान वृत्तान्त कह सुनाया ।

        धर्मराज ने कहा :

        4-11. हे देवराज, सुनो मैं किस लिये आया हूँ। मैं यही  तुम्हें बताऊँगा कि मैं क्यों आया हूँ। विष्णु के भक्त नहुष के कुलीन पुत्र ने पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्यों को विष्णु का भक्त बना दिया है। उन्होंने नश्वर संसार का स्वरूप वैकुण्ठ जैसा बना दिया है । 

        मनुष्य अमर हो गया है और बुढ़ापे तथा रोगों से मुक्त हो गया है। वे न तो कोई पाप करते हैं और न ही झूठ बोलते हैं।

        वे काम और क्रोध से मुक्त हैं, और लोभ और भ्रम से रहित हैं। श्रेष्ठजनों को दान दिया जाता है और वे सभी धर्म के प्रति समर्पित होते हैं। 

        सभी अच्छे कार्यों के साथ वे ध्वनि नारायण की पूजा करते हैं । उस वैष्णव धर्म के  पालन करने के कारण पृथ्वी पर सभी मनुष्य स्वस्थ हैं।, शोक से मुक्त हैं और सभी स्थिर युवा हैं। 

        हे भगवन्, जिस प्रकार दूर्वा (घास) और बून के वृक्ष पृथ्वी पर फैलते हैं, उसी प्रकार वे अपने पुत्र, पौत्र और प्रपौत्रों के कारण विस्तार (अर्थात संख्या में वृद्धि) कर चुके हैं। 

        अपने पुत्रों और प्रपौत्रों के साथ वे एक राजवंश से दूसरे राजवंश में चले गये (अर्थात विभिन्न राजवंशों की शुरुआत की)।

        12-15. इस प्रकार नहुष के पुत्र ने संपूर्ण नश्वर संसार को विष्णु का भक्त  वैष्णव बना दिया और बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्त कर दिया। 

        कार्य से मुक्त (अर्थात शून्य) होने के कारण मैं (मानो) अपने पद से वंचित हो गया हूँ।

         इस प्रकार मैंने तुम्हें वह सब कुछ बता दिया है जो मेरे कार्य को समाप्त कर देता है। हे हजार नेत्रों वाले (इंद्र) ऐसा जानकर वही करो जो इस संसार के लिए हितकर हो। जैसा कि आपने मुझसे पूछा था, मैंने यह सब आपको बता दिया है। इसी कारण से, हे इंद्र, मैं आपके समीप (अर्थात आपके पास आया हूं।

        इंद्र ने कहा :

        15-18. हे महान धर्मराज, पहले केवल मैंने ही अपने दूत (अर्थात् मातलि ) को उस महान व्यक्ति के पास  उस महान ययाति को यहाँ लाने के लिए) भेजा था। यहाँ तक कि मेरे दूत ने भी उससे बात की। (लेकिन ययाति ने उससे कहा:) “मुझे स्वर्ग में सुख की इच्छा नहीं है। मैं स्वर्ग में (बिल्कुल नहीं) आऊंगा। मैं पूरे विश्व को स्वर्ग की प्रकृति का बना दूंगा।

        इन्द्र ने कहा हे धर्मराज-

        इस प्रकार राजा ने (मेरे दूत मातलि से) कहा। वह राजा अपनी प्रजा की रक्षा कर रहा है. उसकी धार्मिकता के बल से मैं भी सदैव संकट में रहता हूँ।

        धर्म ने कहा :

        18-19. हे देवताओं के महामहिम स्वामी, यदि आप मुझे प्रिय वस्तु देना चाहते हैं तो उस अच्छे राजा को किसी भी तरह से लालसा देकर (स्वर्ग में) ले आइए।

        19-22. हे राजन, उस धर्मराज के ये वचन सुनकर बुद्धिमान देवराज ने सभी बातों पर तथ्यात्मक दृष्टि से विचार किया। श्रेष्ठ मन वाले भगवान इंद्र ने कामदेव और गंधर्वों को बुलाकर कोयल वसन्त (मकरन्द) और रति को ले आये । (उन्होंने उनसे कहा:) "वह करो जिससे राजा (यहाँ) आये।" मेरी आज्ञा से तुम पृथ्वी पर चले जाओ। (इस बारे में) तुम्हें कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।”

         "कामदेव ने कहा :

        22-23. इसमें कोई संदेह नहीं कि मैं वही करूँगा जो आपके अनुकूल एवं जो तुम्हें उचित लगेगा।मुझे और राजा को युद्ध में (एक दूसरे के विपरीत) खड़े हुए देखिये।

        23-24. 'ठीक है' कहकर सभी वहाँ चले गये जहाँ वह राजा नहुष का पुत्र ययाति रहता था। 

        हे ब्राह्मण , उन सभी ने, काम देव आदि ने, अभिनेताओं के रूप में (अर्थात स्वयं को छिपाकर) राजा को आशीर्वाद दिया और अपने अच्छे नाटक के बारे में राजा को बताया (अर्थात अच्छे अभिनय के साथ उनसे बात की)।

        25-33. उनकी ये बातें सुनकर पृथ्वी के बुद्धिमान स्वामी ययाति ने अत्यंत विद्वानों के साथ एक दिव्य सभा की व्यवस्था की। पवित्र तथा अपवित्र विद्या में निपुण राजा स्वयं (वहां) आये। नहुष के पुत्र राजा ने वह नाटक देखा। (उन्होंने देखा) वामन का जीवन , एक ब्राह्मण के रूप में उनका जन्म भी है। 

        उस समय जरा (अर्थात् वृद्धावस्था) ने संसार में सौंदर्य में अद्वितीय स्त्री का रूप धारण करके एक उत्तम, मधुर गीत गाया, हे राजन! उसके गायन के आकर्षण के कारण, उसकी मनोहर हंसी (अर्थात मुस्कान) के कारण, और उसके मीठे शब्दों के कारण, और कामदेव की युक्ति, ढंग और दिव्य व्यवहार के कारण वह राजा मोहित हो गया था। कामदेव का रूप पहले बलि , और विंध्य या वामन की पंक्ति जैसा था। 

        कामदेव स्वयं मुख्य अभिनेता और मंच प्रबंधक बन गए, और  वसन्त रति उनके सहायक थे। वह रति, जिसका पति प्रसन्न था, उस रति ने मुख्य अभिनेत्री की पोशाक पहन ली। उस नृत्य-प्रदर्शन में वह  विश्राम-कक्ष में चली गईं।अत्यंत बुद्धिमान कोयल ने राजा को उत्साहित कर दिया। जैसे ही गौरवशाली राजा ने उत्कृष्ट नृत्य देखा और उत्कृष्ट संगीत सुना, वह मुख्य अभिनेत्री (अर्थात् रति) द्वारा प्रस्तुत (इनसे) मोहित हो गया।

        मकरन्द:- पुष्परस-कामवर्धक पदार्थ- मकरमपि द्यति कामजनकत्वात् दो--अवखण्डने क पृषो० मुम् ।(१)-पुष्पमधौ अमरः कोश ।

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                           'सुकर्मोवाच-
        कामस्य गीतलास्येन हास्येन ललितेन च।
        मोहितो राजराजेंद्रो नटरूपेण पिप्पल ।१।

        कृत्वा मूत्रं पुरीषं च स राजा नहुषात्मजः ।
        अकृत्वा पादयोः शौचमासने उपविष्टवान् ।२।

        तदंतरं तु संप्राप्य संचचार जरा नृपम् ।
        कामेनापि नृपश्रेष्ठ इंद्रकार्यं कृतं हितम् ।३।

        निवृत्ते नाटके तस्मिन्गतेषु तेषु भूपतिः ।
        जराभिभूतो धर्मात्मा कामसंसक्तमानसः।४।

        मोहितः काममोहेन विह्वलो विकलेंद्रियः ।
        अतीव मुग्धो धर्मात्मा विषयैश्चापवाहितः।५।

        एकदा तु गतो राजा मृगया व्यसनातुरः।
        वने च क्रीडते सोपि मोहरागवशं गतः।६।

        सरसं क्रीडमानस्य नृपतेश्च महात्मनः ।
        मृगश्चैकः समायातश्चतुःशृंगो ह्यनौपमः ।७।

        सर्वांगसुंदरो राजन्हेमरूपतनूरुहः।
        रत्नज्योतिः सुचित्रांगो दर्शनीयो मनोहरः।८।

        अभ्यधावत्स वेगेन बाणपाणिर्धनुर्द्धरः।
        इत्यमन्यत मेधावी कोपि दैत्यः समागतः।९।

        मृगेण च स तेनापि दूरमाकर्षितो नृपः ।
        गतः सरथवेगेन श्रमेण परिखेदितः।१०।

        वीक्षमाणस्य तस्यापि मृगश्चांतरधीयत ।
        स पश्यति वनं तत्र नंदंनोपममद्भुतम्।११।

        चारुवृक्षसमाकीर्णं भूतपंचकशोभितम् ।
        गुरुभिश्चंदनैः पुण्यैः कदलीखंडमंडितैः।१२।

        बकुलाशोकपुंनागैर्नालिकेरैश्च तिंदुकैः ।
        पूगीफलैश्च खर्जूरैः कुमुदैः सप्तपर्णकैः।१३।

        पुष्पितैः कर्णिकारैश्च नानावृक्षैः सदाफलैः ।
        पुष्पितामोदसंयुक्तैः केतकैः पाटलैस्ततः।१४।

        वीक्षमाणो महाराज ददर्श सर उत्तमम् ।
        पुण्योदकेन संपूर्णं विस्तीर्णं पंचयोजनम्।१५।

        हंसकारंडवाकीर्णं जलपक्षिविनादितम् ।
        कमलैश्चापि मुदितं श्वेतोत्पलविराजितम्।१६।

        रक्तोत्पलैः शोभमानं हाटकोत्पलमंडितम् ।
        नीलोत्पलैः प्रकाशितं कल्हारैरतिशोभितम् ।१७।

        मत्तैर्मधुकरैश्चपि सर्वत्र परिनादितम् ।
        एवं सर्वगुणोपेतं ददर्श सर उत्तमम् ।१८।

        पंचयोजनविस्तीर्णं दशयोजनदीर्घकम् ।
        तडागं सर्वतोभद्रं दिव्यभावैरलंकृतम् ।१९।

        रथवेगेन संखिन्नः किंचिच्छ्रमनिपीडितः।
        निषसाद तटे तस्य चूतच्छायां सुशीतलाम् ।२०।

        स्नात्वा पीत्वा जलं शीतं पद्मसौगंध्यवासितम् ।
        सर्वश्रमोपशमनममृतोपममेव तत् ।२१।

        वृक्षच्छाये ततस्तस्मिन्नुपविष्टेन भूभृता ।
        गीतध्वनिः समाकर्णि गीयमानो यथा तथा ।२२।

        यथा स्त्री गायते दिव्या तथायं श्रूयते ध्वनिः।
        गीतप्रियो महाराज एव चिंतां परां गतः।२३।

        चिंताकुलस्तु धर्मात्मा यावच्चिंतयते क्षणम् ।
        तावन्नारी वरा काचित्पीनश्रोणी पयोधरा।२४।

        नृपतेः पश्यतस्तस्य वने तस्मिन्समागता ।
        सर्वाभरणशोभांगी शीललक्षणसंपदा।२५।

        तस्मिन्वने समायाता नृपतेः पुरतः स्थिता ।
        तामुवाच महाराजः का हि कस्य भविष्यसि।२६।

        किमर्थं हि समायाता तन्मे त्वं कारणं वद ।
        पृष्टा सती तदा तेन न किंचिदपि पिप्पल।२७।

        शुभाशुभं च भूपालं प्रत्यवोचद्वरानना ।
        प्रहस्यैव गता शीघ्रं वीणादंडकराऽबला।२८।

        विस्मयेनापि राजेंद्रो महता व्यापितस्तदा ।
        मया संभाषिता चेयं मां न ब्रूते स्म सोत्तरम्।२९।

        पुनश्चिंतां समापेदे ययातिः पृथिवीपतिः ।
        यो वै मृगो मया दृष्टश्चतुःशृंगः सुवर्णकः।३०।

        तस्मान्नारी समुद्भूता तत्सत्यं प्रतिभाति मे ।
        मायारूपमिदं सत्यं दानवानां भविष्यति।३१।

        चिंतयित्वा क्षणं राजा ययातिर्नहुषात्मजः ।
        यावच्चिंतयते राजा तावन्नारी महावने।३२।

        अंतर्धानं गता विप्र प्रहस्य नृपनंदनम् ।
        एतस्मिन्नंतरे गीतं सुस्वरं पुनरेव तत्।३३।

        शुश्रुवे परमं दिव्यं मूर्छनातानसंयुतम् ।
        जगाम सत्वरं राजा यत्र गीतध्वनिर्महान्।३४।

        जलांते पुष्करं चैव सहस्रदलमुत्तमम् ।
        तस्योपरि वरा नारी शीलरूपगुणान्विता ।३५।

        दिव्यलक्षणसंपन्ना दिव्याभरणभूषिता ।
        दिव्यैर्भावैः प्रभात्येका वीणादंडकराविला ।३६।

        गायंती सुस्वरं गीतं तालमानलयान्वितम् ।
        तेन गीतप्रभावेण मोहयंती चराचरान् ।३७।

        देवान्मुनिगणान्सर्वान्दैत्यान्गंधर्वकिन्नरान् ।
        तां दृष्ट्वा स विशालाक्षीं रूपतेजोपशालिनीम्।३८।

        संसारे नास्ति चैवान्या नारीदृशी चराचरे ।
        पुरा नटो जरायुक्तो नृपतेः कायमेव हि ।३९।

        संचारितो महाकामस्तदासौ प्रकटोभवत् ।
        घृतं स्पृष्ट्वा यथा वह्नी रश्मिवान्संप्रजायते।४०।

        तां च दृष्ट्वा तथा कामस्तत्कायात्प्रकटोऽभवत् ।
        मन्मथाविष्टचित्तोसौ तां दृष्ट्वा चारुलोचनाम्।४१।

        ईदृग्रूपा न दृष्टा मे युवती विश्वमोहिनी ।
        चिंतयित्वा क्षणं राजा कामसंसक्तमानसः।४२।

        तस्याः सविरहेणापि लुब्धोभून्नृपतिस्तदा ।
        कामाग्निना दह्यमानः कामज्वरेणपीडितः।४३।

        कथं स्यान्मम चैवेयं कथं भावो भविष्यति ।
        यदा मां गूहते बाला पद्मास्या पद्मलोचना।४४।

        यदीयं प्राप्यते तर्हि सफलं जीवितं भवेत् ।
        एवं विचिंत्य धर्मात्मा ययातिः पृथिवीपतिः।४५।

        तामुवाच वरारोहां का त्वं कस्यापि वा शुभे ।
        पूर्वं दृष्टा तु या नारी सा दृष्टा पुनरेव च ।४६।

        तां पप्रच्छ स धर्मात्मा का चेयं तव पार्श्वगा ।
        सर्वं कथय कल्याणि अहं हि नहुषात्मजः।४७।

        सोमवंशप्रसूतोहं सप्तद्वीपाधिपः शुभे ।
        ययातिर्नाम मे देवि ख्यातोहं भुवनत्रये ।४८।

        तव संगमने चेतो भावमेवं प्रवांछते ।
        देहि मे संगमं भद्रे कुरु सुप्रियमेव हि ।४९।

        यं यं हि वांछसे भद्रे तद्ददामि न संशयः ।
        दुर्जयेनापि कामेन हतोहं वरवर्णिनि ।५०।

        तस्मात्त्राहि सुदीनं मां प्रपन्नं शरणं तव ।
        राज्यं च सकलामुर्वीं शरीरमपि चात्मनः ।५१।

        संगमे तव दास्यामि त्रैलोक्यमिदमेव ते ।
        तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सा स्त्री पद्मनिभानना ।५२।

        विशालां स्वसखीं प्राह ब्रूहि राजानमागतम् ।
        नाम चोत्पत्तिस्थानं च पितरं मातरं शुभे ।५३।

        ममापि भावमेकाग्रमस्याग्रे च निवेदय ।
        तस्याश्च वांछितं ज्ञात्वा विशाला भूपतिं तदा ।५४।

        उवाच मधुरालापैः श्रूयतां नृपनंदन ।
                       "विशालोवाच-
        काम एष पुरा दग्धो देवदेवेन शंभुना ।५५।

        रुरोद सा रतिर्दुःखाद्भर्त्राहीनापि सुस्वरम् ।
        अस्मिन्सरसि राजेंद्र सा रतिर्न्यवसत्तदा ।५६।

        तस्य प्रलापमेवं सा सुस्वरं करुणान्वितम् ।
        समाकर्ण्य ततो देवाः कृपया परयान्विताः ।५७।

        संजाता राजराजेंद्र शंकरं वाक्यमब्रुवन् ।
        जीवयस्व महादेव पुनरेव मनोभवम् ।५८।

        वराकीयं महाभाग भर्तृहीना हि कीदृशी ।
        कामेनापि समायुक्तामस्मत्स्नेहात्कुरुष्व हि ।५९।

        तच्छ्रुत्वा च वचः प्राह जीवयामि मनोभवम् ।
        कायेनापि विहीनोयं पंचबाणो मनोभवः ।६०।

        भविष्यति न संदेहो माधवस्य सखा पुनः ।
        दिव्येनापि शरीरेण वर्तयिष्यति नान्यथा ।६१।

        महादेवप्रसादाच्च मीनकेतुः स जीवितः ।
        आशीर्भिरभिनंद्यैवं देव्याः कामं नरोत्तम ।६२।

        गच्छ काम प्रवर्तस्व प्रियया सह नित्यशः ।
        एवमाह महातेजाः स्थितिसंहारकारकः ।६३।

        पुनः कामः सरःप्राप्तो यत्रास्ते दुःखिता रतिः ।
        इदं कामसरो राजन्रतिरत्र सुसंस्थिता ।६४।

        दग्धे सति महाभागे मन्मथे दुःखधर्षिता ।
        रत्याः कोपात्समुत्पन्नः पावको दारुणाकृतिः ।६५।

        अतीवदग्धा तेनापि सा रतिर्मोहमूर्छिता ।
        अश्रुपातं मुमोचाथ भर्तृहीना नरोत्तम ।६६।

        नेत्राभ्यां हि जले तस्याः पतिता अश्रुबिंदवः।
        तेभ्यो जातो महाशोकः सर्वसौख्यप्रणाशकः।६७।

        जरा पश्चात्समुत्पन्ना अश्रुभ्यो नृपसत्तम ।
        वियोगो नाम दुर्मेधास्तेभ्यो जज्ञे प्रणाशकः ।६८।

        दुःखसंतापकौ चोभौ जज्ञाते दारुणौ तदा ।
        मूर्छा नाम ततो जज्ञे दारुणा सुखनाशिनी ।६९।

        शोकाज्जज्ञे महाराज कामज्वरोथ विभ्रमः ।
        प्रलापो विह्वलश्चैव उन्मादो मृत्युरेव च ।७०।

        तस्याश्च अश्रुबिंदुभ्यो जज्ञिरे विश्वनाशकाः ।
        रत्याः पार्श्वे समुत्पन्नाः सर्वे तापांगधारिणः ।७१।

        मूर्तिमंतो महाराज सद्भावगुणसंयुताः ।
        काम एष समायातः केनाप्युक्तं तदा नृप ।७२।

        महानंदेन संयुक्ता दृष्ट्वा कामं समागतम् ।
        नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां पतिता अश्रुबिन्दवः ।७३।

        अप्सु मध्ये महाराज चापल्याज्जज्ञिरे प्रजाः ।
        प्रीतिर्नाम तदा जज्ञे ख्यातिर्लज्जा नरोत्तम ।७४।

        तेभ्यो जज्ञे महानंद शांतिश्चान्या नृपोत्तम ।
        जज्ञाते द्वे शुभे कन्ये सुखसंभोगदायिके ।७५।

        लीलाक्रीडा मनोभाव संयोगस्तु महान्नृप ।
        रत्यास्तु वामनेत्राद्वै आनंदादश्रुबिंदवः ।७६।

        जलांते पतिता राजंस्तस्माज्जज्ञे सुपंकजम् ।
        तस्मात्सुपंकजाज्जाता इयं नारी वरानना ।७७।

        अश्रुबिंदुमती नाम रतिपुत्री नरोत्तम । तस्याः प्रीत्या सुखं कृत्वा नित्यं वर्त्ते समीपगा।७८।

        सखीभावस्वभावेन संहृष्टा सर्वदा शुभा ।
        विशाला नाम मे ख्यातं वरुणस्य सुता नृप ।७९।

        अस्याश्चांते प्रवर्तामि स्नेहात्स्निग्धास्मि सर्वदा ।
        एतत्ते सर्वमाख्यातमस्याश्चात्मन एव ते ।८०।

        तपश्चचार राजेंद्र पतिकामा वरानना ।
                          -राजोवाच-
        सर्वमेव त्वयाख्यातं मया ज्ञातं शुभे शृणु ।८१।

        मामेवं हि भजत्वेषा रतिपुत्री वरानना ।
        यमेषा वांछते बाला तत्सर्वं तु ददाम्यहम् ।८२।

        तथा कुरुष्व कल्याणि यथा मे वश्यतां व्रजेत् ।
                          विशालोवाच-
        अस्या व्रतं प्रवक्ष्यामि तदाकर्णय भूपते ।८३।

        पुरुषं यौवनोपेतं सर्वज्ञं वीरलक्षणम् ।
        देवराजसमं राजन्धर्माचारसमन्वितम् ।८४।

        तेजस्विनं महाप्राज्ञं दातारं यज्विनां वरम् ।
        गुणानां धर्मभावस्य ज्ञातारं पुण्यभाजनम् ।८५।

        लोक इंद्रसमं राजन्सुयज्ञैर्धर्मतत्परम् ।
        सर्वैश्वर्यसमोपेतं नारायणमिवापरम् ।८६।

        देवानां सुप्रियं नित्यं ब्राह्मणानामतिप्रियम् ।
        ब्रह्मण्यं वेदतत्त्वज्ञं त्रैलोक्ये ख्यातविक्रमम् ।८७।

        एवंगुणैः समुपेतं त्रैलोक्येन प्रपूजितम् ।
        सुमतिं सुप्रियं कांतं मनसा वरमीप्सति ।८८।

                          'ययातिरुवाच-
        एवं गुणैः समुपेतं विद्धि मामिह चागतम् ।
        अस्यानुरूपो भर्त्ताहं सृष्टो धात्रा न संशयः ।८९।

                           'विशालोवाच-
        भवंतं पुण्यसंवृद्धं जाने राजञ्जगत्त्रये ।
        पूर्वोक्ता ये गुणाः सर्वे मयोक्ताः संति ते त्वयि ।९०।

        एकेनापि च दोषेण त्वामेषा हि न मन्यते ।
        एष मे संशयो जातो भवान्विष्णुमयो नृप ।९१।
                             "ययातिरुवाच-
        समाचक्ष्व महादोषं यमेषा नानुमन्यते ।
        तत्त्वेन चारुसर्वांगी प्रसादसुमुखी भव ।९२।

                              विशालोवाच-
        आत्मदोषं न जानासि कस्मात्त्वं जगतीपते ।
        जरया व्याप्तकायस्त्वमनेनेयं न मन्यते ।९३।

        एवं श्रुत्वा महद्वाक्यमप्रियं जगतीपतिः ।
        दुःखेन महताविष्टस्तामुवाच पुनर्नृपः ।९४।

        जरादोषो न मे भद्रे संसर्गात्कस्यचित्कदा ।
        समुद्भूतं ममांगे वै तं न जाने जरागमम् ।९५।

        यं यं हि वांछते चैषा त्रैलोक्ये दुर्लभं शुभे ।
        तमस्यै दातुकामोहं व्रियतां वर उत्तमः ।९६।

                        "विशालोवाच-
        जराहीनो यदा स्यास्त्वं तदा ते सुप्रिया भवेत् ।
        एतद्विनिश्चितं राजन्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।९७।

        श्रुतिरेवं वदेद्राजन्पुत्रे भ्रातरि भृत्यके ।
        जरा संक्राम्यते यस्य तस्यांगे परिसंचरेत् ।९८।

        तारुण्यं तस्य वै गृह्य तस्मै दत्वा जरां पुनः ।
        उभयोः प्रीतिसंवादः सुरुच्या जायते शुभः।९९।

        यथात्मदानपुण्यस्य कृपया यो ददाति च ।
        फलं राजन्हि तत्तस्य जायते नात्र संशयः।१००।

        दुःखेनोपार्जितं पुण्यमन्यस्मै हि प्रदीयते ।
        सुपुण्यं तद्भवेत्तस्य पुण्यस्य फलमश्नुते।१०१।

        पुत्राय दीयतां राजंस्तस्मात्तारुण्यमेव च ।
        प्रगृह्यैव समागच्छ सुंदरत्वेन भूपते।१०२।

        यदा त्वमिच्छसे भोक्तुं तदा त्वं कुरुभूपते ।
        एवमाभाष्य सा भूपं विशाला विरराम ह ।१०३।

                         "सुकर्मोवाच-
        एवमाकर्ण्य राजेंद्रो विशालामवदत्तदा ।
                           "राजोवाच-
        एवमस्तु महाभागे करिष्ये वचनं तव ।१०४।

        कामासक्तः समूढस्तु ययातिः पृथिवीपतिः ।
        गृहं गत्वा समाहूय सुतान्वाक्यमुवाच ह ।१०५।

        तुरुं पूरुं कुरुं राजा यदुं च पितृवत्सलम्।
        कुरुध्वं पुत्रकाः सौख्यं यूयं हि मम शासनात् ।१०६।

                           "पुत्रा ऊचुः-
        पितृवाक्यं प्रकर्तव्यं पुत्रैश्चापि शुभाशुभम् ।
        उच्यतां तात तच्छीघ्रं कृतं विद्धि न संशयः।१०७।

        एवमाकर्ण्यतद्वाक्यं पुत्राणां पृथिवीपतिः ।
        आचचक्षे पुनस्तेषु हर्षेणाकुलमानसः।१०८।

        अध्याय 77 - ययाति जुनून को जन्म देता है

        सुकर्मन ने कहा :

        1-5. हे पिप्पल , कामदेव के संगीत के आकर्षण, उनकी मनमोहक मुस्कान और एक अभिनेता के रूप में उनके रूप से राजाओं के राजा ययाति मोहित हो गए थे । नहुष का पुत्र राजा ययाति, मल मूत्र त्याग कर  , पैर धोए बिना ही अपने आसन पर बैठ गया। उस अवसर लाभ उठाकर  जरा (अर्थात बुढ़ापा) राजा के पास चला गया। हे श्रेष्ठ राजा,  तभी कामदेव ने भी इंद्र के लिए लाभकारी कार्य पूरा कर दिया।

        जब नाटक समाप्त हो गया और वे चले गए, तो धार्मिक विचारों वाला राजा बुढ़ापे से ग्रस्त हो गया, उसका मन वासना में आसक्त हो गया, कामदेव द्वारा उत्पन्न भ्रम से मोहित हो गया, व्याकुल हो गया, उसके अंग कमजोर हो गए; वह धर्मात्मा (राजा) अत्यंत मूर्च्छित होगया था और इन्द्रिय विषयों से दूर हो गया था।

        6-11. एक बार एक राजा शिकार की इच्छा से (अर्थात् शिकार करने को उत्सुक) जंगल में गया। वह मोह के वशीभूत होकर वन में क्रीड़ा करने लगा। जब वह प्रतापी राजा रुचिपूर्वक खेल रहा था, तभी चार सींगों वाला एक अतुलनीय हिरण (वहां) आया। हे राजन, उसका पूरा शरीर सुंदर था, उसके बाल सुनहरे रंग के थे, उसका शरीर मणि के समान चमक से युक्त था; यह सुंदर और आकर्षक था. धनुर्धर (अर्थात राजा) हाथ में तीर लेकर तेजी से (उसकी ओर) दौड़ा।

         बुद्धिमान (राजा) ने सोचा कि (वहाँ) कोई राक्षस आया है। हिरण ने भी राजा को खींच लिया। वह रथ की गति से (उसके पीछे) चला, और थकावट से पीड़ित हो गया। जब वह देख रहा था, हिरण गायब हो गया।

        11-20. वहाँ उन्होंने इन्द्र की वाटिका के समान एक अद्भुत वन देखा; यह सुंदर पेड़ों से भरा हुआ था, और पांच तत्वों के साथ शानदार लग रहा था, बड़े पवित्र चंदन के पेड़ और केले के पेड़ों के आकर्षक समूहों के साथ, (जैसे) बकुला , अशोक , पुन्नागा , नालिकेरा (यानी कोको-अखरोट के पेड़) के साथ। तिंदुका , पुगीफला (सुपारी के पेड़), खजूर के पेड़, कमल और सप्तपर्ण के पेड़, खिले हुए कर्णिकारा (पेड़), और विभिन्न पेड़ जिन पर हमेशा फल लगते हैं, इसी तरह केतका और पाटल के साथ भी । (इन्हें) देखते समय महान राजा को एक उत्तम झील दिखाई दी। वह पवित्र जल से भरा हुआ था; वह पाँच योजन तक व्यापक (फैला हुआ) था ; उसमें हंसों और बत्तखों की भीड़ थी; वह जलीय पक्षियों से गूँज रहा था; वह कमलों से भी रमणीय था; वह लाल कमलों से आकर्षक लग रही थी, और सुनहरे कमलों से सुशोभित थी; श्वेत कमलों के कारण वह अत्यंत मनमोहक लग रहा था; यह हर जगह नशे में धुत मधुमक्खियों से भी गूंज रहा था। इस प्रकार उन्होंने झील को सभी उत्कृष्टताओं से संपन्न देखा। यह पाँच योजन चौड़ा और दस योजन लम्बा था। झील सब तरफ से शुभ थी; और दिव्य वस्तुओं से सुशोभित था। रथ की गति से थककर और थकान से परेशान होकर वह उसके किनारे एक आम के पेड़ की छाया में बैठ गया।

        21-26. उसमें स्नान करके, अमृत के समान कमल की सुगंध से सुगन्धित उसके शीतल जल को पीकर (अर्थात् पिया) और सारी थकावट दूर कर देता है। पेड़ की छाया में बैठे राजा को किसी तरह (किसी के द्वारा) गाए जा रहे गीत की आवाज सुनाई दी। यह ध्वनि उस गीत के रूप में सुनी गई (यह ध्वनि होगी) जिसे एक दिव्य महिला गाएगी। संगीत प्रेमी वह महान राजा अत्यंत विचारशील हो गया। जब वह कुलीन इस प्रकार चिंतित हुआ और एक क्षण के लिए सोचने लगा, तभी जंगल में एक स्त्री, जिसके नितम्ब और स्तन थे, आ पहुँची, जिसे राजा देख रहे थे। वह, जिसका शरीर सभी आभूषणों से सुंदर लग रहा था, और अच्छे चरित्र और (शुभ) चिह्नों से युक्त थी, जंगल में आई और राजा के सामने खड़ी हुई।

        26-32. राजा ने उससे कहा: “तुम कौन हो? आप किसके हैं? तुम यहाँ क्यों आये हो? मुझे इसका कारण बताओ।” हे पिप्पला, उस उत्कृष्ट मुख वाली स्त्री ने उस समय राजा द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर न तो अच्छा उत्तर दिया और न ही बुरा। वह स्त्री, जिसकी गर्दन हाथ में थी, हँसी और तेजी से चली गई। तब राजा बड़े आश्चर्य से भर गये, 'जब मैंने उससे बात की तो वह उत्तर नहीं दे रही है।' फिर उस राजा ययाति ने सोचा: '(ये) चार सींग जो मैंने देखे थे। मुझे लगता है कि यही सच है. यह वास्तव में राक्षसों का एक कपटपूर्ण रूप होना चाहिए (अर्थात् द्वारा अपनाया गया)।' हे ब्राह्मण , नहुष के पुत्र राजा ययाति ने एक क्षण के लिए (इस प्रकार) सोचा।

        32-38. जब राजा ऐसा सोच रहा था; महिला राजकुमार पर हंसते हुए जंगल में गायब हो गई। इस बीच, उन्होंने फिर से गाना सुना, जो मधुर था, बहुत दिव्य था और संगीत के पैमाने के माध्यम से ध्वनियों के स्वर और नियमित उतार-चढ़ाव के साथ था। राजा उस स्थान पर गया (जहाँ से) गीत की महान ध्वनि आ रही थी। जल में एक हज़ार पंखुड़ियों वाला एक उत्कृष्ट कमल था। उस पर एक उत्कृष्ट महिला थी, जो (अच्छे) चरित्र, सुंदरता और गुणों से संपन्न थी। वह दिव्य चिन्हों से युक्त थी; वह दिव्य आभूषणों से सुसज्जित थी; वह दिव्य वस्तुओं से चमकती थी; उसका हाथ लुटेरे की गर्दन पकड़ने में लगा हुआ था। वह ताल और समय मापने तथा विराम के साथ एक मधुर गीत गा रही थी। उस गाने की शक्ति से उसने जंगम और स्थावर, देवताओं, ऋषियों के समूहों, सभी राक्षसों, गंधर्वों और किन्नरों को भी मोहित कर लिया ।

        38-42. उस (स्त्री को) चौड़ी आंखों वाली, सौंदर्य और तेज से युक्त देखकर (उसने सोचा) कि इस चराचर और स्थावर संसार में उसके समान दूसरी कोई स्त्री नहीं है। पूर्वकाल में अभिनेता महान कामदेव राजा के शरीर में प्रविष्ट हो गये थे; उन्होंने उस समय स्वयं को प्रकट किया। जैसे आग, घी के संपर्क में आने से प्रकाश की किरणें निकालती है (यानी उज्ज्वल होती है), उसी तरह कामदेव (यानी जुनून) उसे देखने के बाद (यानी राजा के बाद) खुद को प्रकट करते हैं। उस मनमोहक नेत्रों वाली स्त्री को देखकर उसके मन पर कामदेव (अर्थात जुनून) हावी हो गया। (उसने सोचा:) 'मैंने (पहले) ऐसी युवा महिला को दुनिया को लुभाते हुए कभी नहीं देखा।'

        42-43. एक पल के लिए सोचने पर राजा का मन कामवासना में बंध गया। उसके वियोग में राजा कामाग्नि से जलकर तथा काम-ज्वर से पीड़ित होकर उसकी लालसा करने लगा।

        44-46. (उसने सोचा:) 'वह मेरी कैसे होगी? उसे (मुझसे) प्रेम कैसे होगा? मेरा जीवन तभी सफल होगा जब कमल के समान मुख वाली तथा कमल के समान नेत्रों वाली यह युवती मुझे गले लगाएगी अथवा मुझे प्राप्त होगी।' इस प्रकार विचार करके उस धर्मात्मा राजा ययाति ने उस सुन्दरी से कहा- हे शुभा आप कौन हैं? आप किसके हैं?” वह महिला जो पहले देखी गई थी वह फिर से (मुझे) दिखाई दी है।

        47-52. धर्मी ने उससे पूछा: “तुम्हारे पास कौन है? हे शुभ, मुझे सब कुछ बताओ। मैं नहुष का पुत्र हूं। हे दयालु, मैं चंद्र वंश में पैदा हुआ हूं और सात द्वीपों का स्वामी हूं। हे आदरणीय महिला, मेरा नाम ययाति है; मैं तीनों लोकों में विख्यात हूँ। इस प्रकार मेरा हृदय आपके साथ मिलन की अभिलाषा रखता है। हे अच्छी महिला, मेरे साथ एकजुट हो जाओ, वह करो जो (मुझे) बहुत प्रिय है। हे अच्छी महिला, इसमें कोई संदेह नहीं है कि मैं तुम्हें वह सब कुछ दूंगा जो तुम चाहोगी। हे उत्कृष्ट रंगरूप वाले आप, मैं अजेय जुनून से अभिभूत हूं। अत: मुझ अत्यंत असहाय और आपकी शरण में आये हुए लोगों की रक्षा कीजिये। तुम्हारे साथ मिलन के लिए (अर्थात बदले में) मैं अपना राज्य, पूरी पृथ्वी या यहां तक ​​कि अपना शरीर भी दे दूंगा। ये तीनों लोक आपके हैं।”

        52-55 राजा के वचन सुनकर कमल के समान मुख वाली उस स्त्री ने अपनी सखी विशाला से कहा- जो राजा यहाँ आये हैं, उन्हें मेरा नाम, मेरा जन्म स्थान, मेरा नाम बताओ। मेरे पिता और माता, हे अच्छी स्त्री! उसे (उसके लिए) मेरे प्यार के बारे में भी बताओ।” उसकी इच्छा को समझकर विशाला ने मीठे शब्दों में राजा से कहा, "हे राजकुमार, सुनो।"

        विशाला ने कहा :

        55-7. इस कामदेव को पहले देवताओं के देवता शम्भु (अर्थात शिव ) ने जला दिया था। वह रति अपने पति से वंचित होकर दुःख के कारण मधुर स्वर में रोने लगी। हे राजाश्रेष्ठ, उस समय वह रति इसी सरोवर में रहती थी। हे राजाओं के राजा, देवताओं ने उसके इस प्रकार दुःख से युक्त मधुर विलाप को सुनकर (उस पर) बड़ी दया की। उन्होंने शंकर से (ये) शब्द कहे : “हे महान देवता, मन में जन्मे (कामदेव) को फिर से जीवित करो। हे महिमामयी, वह किस स्वभाव की होगी (अर्थात उसकी क्या दुर्दशा होगी) जो अपने पति से वंचित होकर असहाय हो गयी है? हमारे प्रति आपके स्नेह के कारण (अर्थात चूँकि आप हमसे प्रेम करते हैं, कृपया) उसे कामदेव से मिला दें।” उन शब्दों को सुनकर (शिव) ने कहा: "मैं कामदेव को पुनर्जीवित करूंगा।" पांच बाणों से युक्त यह मन-जन्मा (अर्थात कामदेव), शरीर न होते हुए भी, फिर से वसंत का मित्र होगा। इसके बारे में कोई संदेह नहीं है। वह दिव्य शरीर के साथ रहेगा; (और) अन्यथा नहीं (अर्थात् किसी अन्य निकाय के साथ नहीं)।” वह मछली-बैनर वाला देवता (अर्थात कामदेव), महान देवता (अर्थात शिव) की कृपा से जीवित हो गया। हे श्रेष्ठ पुरुष, इस प्रकार आदरणीय महिला (अर्थात रति) की इच्छा को आशीर्वाद के साथ मंजूरी दे दी (शिव ने कहा:) "हे कामदेव, जाओ और हमेशा अपने प्रिय के साथ रहो।" इस प्रकार महान तेज वाले (संसार के) पालन और विनाश के कारण भगवान ने (कामदेव से) कहा। कामदेव फिर से उस झील पर आए जहां दुखी रति रह गई थी। हे राजा, यह (उस झील को कामसरस कहा जाता है) (अर्थात कामदेव से संबंधित) जहां रति अच्छी तरह से बसी हुई है। जब महान कामदेव को (शिव द्वारा) जला दिया गया तो वह दुःख से उबर गई। रति के क्रोध से भयानक रूप वाली अग्नि उत्पन्न हुई। उसने रति को भी बहुत झुलसा दिया और बेहोश हो गई। हे नरश्रेष्ठ, वह अपने पति से वंचित होकर आँसू बहा रही थी। उसकी आँखों से आँसू पानी में गिर गये। उनसे महान् दुःख उत्पन्न हुआ जिसने समस्त सुखों को नष्ट कर दिया। हे श्रेष्ठ राजा, उसके बाद जरा (अर्थात बुढ़ापा) आंसुओं से अस्तित्व में आया। उनमें से मंदबुद्धि विनाशक अर्थात्। अलगाव उभर आया. भयानक दुःख और यातना दोनों भी तब सामने आये। उनसे भयानक और सुख को नष्ट करने वाला भ्रम उत्पन्न हुआ। हे महान राजा, दुःख से जुनून और त्रुटि का बुखार उत्पन्न हुआ। व्यथित विलाप, पागलपन और मृत्यु, सब कुछ नष्ट कर देने वाली, उसके आँसुओं से उत्पन्न हुई।

        71-79. हे महान राजा, रति की ओर से सभी पीड़ा के शरीर को धारण करते हैं और, सभी अच्छी भावनाओं के गुणों से युक्त होकर, अवतार लेते हैं। हे राजा, तभी किसी ने कहा: "यह कामदेव (वह) आया है।" (वहां) आये हुए कामदेव को देखकर वह (अर्थात रति) अत्यंत आनंद से भर गयी। उसकी आँखों से आँसू गिर पड़े। हे महान राजा, जल में प्राणियों की उत्पत्ति शीघ्र हो गयी। हे श्रेष्ठ पुरुष, उस समय लव नाम की (एक महिला) उत्पन्न हुई, उसी प्रकार रेनॉउन और शेम भी। हे श्रेष्ठ राजा, उनमें से (अर्थात आंसुओं से) महान आनंद उत्पन्न हुआ और दूसरा, अर्थात्। शांति। सुख और भोग देने वाली दो मंगलमय कन्याएँ उत्पन्न हुईं। हे राजन, मनोरंजन, खेल और मन की भक्ति का अद्भुत संयोजन था। हे राजन, खुशी के मारे रति की बायीं आंख से आंसू छलक पड़े। उनसे एक उत्तम कमल उत्पन्न हुआ। हे पुरुषश्रेष्ठ, उस अच्छे कमल से रति की पुत्री, अश्रुबिन्दुमती नाम की यह सुंदर स्त्री उत्पन्न हुई। उसके प्रति प्रेम के कारण, मैं उसका मित्र होने के कारण, सदैव प्रसन्न और सदाचारी होकर, उसके निकट रहता हूँ और उसे सुख देता हूँ। मेरा नाम विशाला के नाम से जाना जाता है (अर्थात मुझे इस नाम से जाना जाता है)। हे राजन, मैं वरुण की पुत्री हूं।

        80-81  मैं उसके प्रति सदैव स्नेहशील रहकर उसके प्रेम के द्वारा उसके निकट रहता हूँ। इस प्रकार मैंने तुम्हें उसका (वृत्तान्त) सब बता दिया है और अपना भी। हे राजाओं के स्वामी, इस सुंदरी ने पति की इच्छा से तपस्या की।

        राजा ने कहा :

        81 -83। हे मंगलमयी, तूने जो कुछ मुझसे कहा है, वह सब मैं समझ गया हूँ; सुनो, रति की इस सुन्दर पुत्री को मुझे चुनने दो। मैं इस युवती को वह सब कुछ दूँगा जो वह चाहती है। हे शुभ स्त्री, ऐसा करो जिससे वह मेरे वश में हो जाये।

        विशाला ने कहा :

        83-88. मैं तुम्हें उसका संकल्प बताऊंगा. इसे सुनो, हे राजा! वह अपने दूल्हे के रूप में एक ऐसे पुरुष की इच्छा रखती है, जो यौवन से संपन्न हो; जो सर्वज्ञ है; जिसमें वीर पुरुष के लक्षण हों; जो देवताओं के स्वामी के समान है; जो धर्मात्मा आचरण रखता हो; जो प्रतिभाशाली है; अत्यंत तेजस्वी, दानी तथा यज्ञों में श्रेष्ठ; जो सद्गुणों और धर्म के प्रति समर्पण को जानता है (अर्थात् सराहना करता है); जो धर्म और अच्छे आचरण से युक्त है; जो संसार में इन्द्र के समान है; जो महान बलिदानों के माध्यम से धार्मिक प्रथाओं का इरादा रखता है; जो समस्त वैभव से संपन्न है; जो मानो दूसरा विष्णु है ; जो सदैव देवताओं को अत्यंत प्रिय है और ब्राह्मणों को अत्यंत प्रिय है ; जो ब्राह्मणों का मित्र है; जो वेदों के सत्य को जानता है ; जिनकी वीरता तीनों लोकों में विख्यात है। वह ऐसा ही वर चाहती है।

        ययाति ने कहा :

        89. जो लोग यहाँ आये हैं, मुझे इन गुणों से सम्पन्न जानो। इसमें कोई संदेह नहीं कि विधाता ने (मुझमें) उसके योग्य पति उत्पन्न किया है।

        विशाला ने कहा :

        90. हे राजा, मैं जानता हूं कि आप तीनों लोकों में धार्मिक गुणों से समृद्ध हैं। जो गुण मैंने पहले बताये हैं वे आपमें विद्यमान हैं।

        91. केवल एक दोष के कारण वह आपके बारे में अच्छा नहीं सोचती। यह शंका मेरे मन में उत्पन्न हो गई है। (अन्यथा) हे राजा, आप विष्णु से परिपूर्ण हैं।

        ययाति ने कहा :

        92. मुझे वह महान दोष बताओ, जो सभी अंगों में सुंदर है, वास्तव में इसका प्रतिकार नहीं करता। मेरा पक्ष लेने के लिए अच्छी तरह तैयार रहें।

        विशाला ने कहा :

        93. हे जगत के स्वामी, तू अपना दोष क्यों नहीं जानता? तुम्हारा शरीर बुढ़ापे से ढका हुआ है। इस (दोष) के कारण वह तुम्हें पुरस्कार नहीं देती।

        94. इन महान् (महत्वपूर्ण) और अप्रिय वचनों को सुनकर जगत् के स्वामी राजा ने बड़े दुःख से आतुर होकर फिर कहा:

        95. “हे शुभ नारी, मेरे शरीर पर बुढ़ापे का यह दोष किसी के संसर्ग का कारण नहीं है। मैं नहीं जानता कि मेरे शरीर में यह बुढ़ापा (कैसे) आ गया है।

        96. हे मंगलमयी, वह संसार में जो भी कठिन वस्तु प्राप्त करना चाहती है, मैं उसे देने को तैयार हूं। सर्वोत्तम वरदान चुनें।”

        विशाला ने कहा :

        97-100. जब तुम बुढ़ापे से मुक्त हो जाओगे, तब वह तुम्हारी परम प्रिय (पत्नी) होगी। यह निश्चित है, हे राजा; मैं (आपको) सच (और) सच (केवल) बता रहा हूं। जो अपने बेटे, (या) भाई, (या) नौकर से अपनी जवानी छीनकर उसे अपना बुढ़ापा दे देता है, उसके शरीर पर जवानी हावी हो जाती है। अच्छे स्वाद के कारण दोनों के बीच एक सुखद समझौता हो जाता है। हे राजा, उसे उस व्यक्ति के पुण्य के समान ही फल मिलता है जो दया करके स्वयं को अर्पित करता है। इसके बारे में कोई संदेह नहीं है।

        101-103. जब कठिनाई से प्राप्त पुण्य किसी और को दिया जाता है तो उसके पास महान धार्मिक योग्यता होगी। पुण्य का फल (इस प्रकार) प्राप्त होता है। अत: हे राजा, अपने पुत्र को (अपनी वृद्धावस्था) दे दो और उससे (यौवन) प्राप्त करके रूप रूप धारण करके (अर्थात प्राप्त करके) लौट आओ। हे राजन, जब तुम्हें (उसका) आनंद लेने की इच्छा हो तो ऐसा करो।

        इस प्रकार, राजा से बात करते हुए, विशाला ने बोलना बंद कर दिया।

        सुकर्मन ने कहा :

        104. फिर श्रेष्ठ राजा के समान सुनकर विशाला से बोले।

        राजा ने कहा :

        104-106. हे महानुभाव, ऐसा ही हो; मैं आपकी बात मानूंगा (अर्थात जैसा आपने मुझसे कहा है वैसा ही करूंगा)।

        पृथ्वी के उस मूर्ख स्वामी, ययाति ने, जोश से वशीभूत होकर, घर जाकर, अपने पुत्रों तुरु, पुरु , कुरु और यदु को बुलाकर , पिता से प्रेम करते हुए, उनसे (ये) शब्द कहे: "मेरे आदेश पर, हे बेटों, (मेरे लिए) खुशियाँ लाओ।”

        बेटों ने कहा :

        107-108. पिता के शब्द (अर्थात आदेश) - चाहे अच्छे हों या बुरे - पुत्रों को निष्पादित करने पड़ते हैं। हे पिता, शीघ्र बोलो, और जान लो कि इसका (अर्थात आदेश का) पालन किया जाता है। इसमें कोई शक नहीं है।

        पुत्रों की ये बातें सुनकर पृथ्वी के स्वामी हर्ष से अभिभूत होकर फिर उनसे बोले।

        पद्मपुराण /खण्डः २ (भूमिखण्डः)अध्यायः (७८)


        पद्मपुराणम्/खण्डः २ (भूमिखण्डःअध्यायः 78)

                        "ययातिरुवाच-
        एकेन गृह्यतां पुत्रा जरा मे दुःखदायिनी ।
        धीरेण भवतां मध्ये तारुण्यं मम दीयताम् ।१।

        स्वकीयं हि महाभागाः स्वरूपमिदमुत्तमम् ।
        संतप्तं मानसं मेद्य स्त्रियां सक्तं सुचंचलम् ।२।

        भाजनस्था यथा आप आवर्त्तयति पावकः ।
        तथा मे मानसं पुत्राः कामानलसुचालितम् ।३।

        एको गृह्णातु मे पुत्रा जरां दुःखप्रदायिनीम् ।
        स्वकं ददातु तारुण्यं यथाकामं चराम्यहम् ।४।

        यो मे जरापसरणं करिष्यति सुतोत्तमः ।
        स च मे भोक्ष्यते राज्यं धनुर्वंशं धरिष्यति ।५।

        तस्य सौख्यं सुसंपत्तिर्धनं धान्यं भविष्यति ।
        विपुला संततिस्तस्य यशः कीर्तिर्भविष्यति ।६।

                         "पुत्रा ऊचुः-
        भवान्धर्मपरो राजन्प्रजाः सत्येन पालकः ।
        कस्मात्ते हीदृशो भावो जातः प्रकृतिचापलः ।७।

                           "राजोवाच-
        आगता नर्तकाः पूर्वं पुरं मे हि प्रनर्तकाः ।
        तेभ्यो मे कामसंमोहे जातो मोहश्च ईदृशः ।८।

        जरया व्यापितः कायो मन्मथाविष्टमानसः ।
        संबभूव सुतश्रेष्ठाः कामेनाकुलव्याकुलः ।९।

        काचिद्दृष्टा मया नारी दिव्यरूपा वरानना ।
        मया संभाषिता पुत्राः किंचिन्नोवाच मे सती ।१०।

        विशालानाम तस्याश्च सखी चारुविचक्षणा ।
        सा मामाह शुभं वाक्यं मम सौख्यप्रदायकम् ।११।

        जराहीनो यदा स्यास्त्वं तदा ते सुप्रिया भवेत् ।
        एवमंगीकृतं वाक्यं तयोक्तं गृहमागतः ।१२।

        मया जरापनोदार्थं तदेवं समुदाहृतम् ।
        एवं ज्ञात्वा प्रकर्तव्यं मत्सुखं हि सुपुत्रकाः ।१३।

                            "तुरुरुवाच-
        शरीरं प्राप्यते पुत्रैः पितुर्मातुः प्रसादतः ।
        धर्मश्च क्रियते राजञ्शरीरेण विपश्चिता ।१४।

        पित्रोः शुश्रूषणं कार्यं पुत्रैश्चापि विशेषतः ।
        न च यौवनदानस्य कालोऽयं मे नराधिप ।१५।

        प्रथमे वयसि भोक्तव्यं विषयं मानवैर्नृप ।
        इदानीं तन्न कालोयं वर्तते तव सांप्रतम् ।१६।

        जरां तात प्रदत्वा वै पुत्रे तात महद्गताम् ।
        पश्चात्सुखं प्रभोक्तव्यं न तु स्यात्तव जीवितम् ।१७।

        तस्माद्वाक्यं महाराज करिष्ये नैव ते पुनः ।
        एवमाभाषत नृपं तुरुर्ज्येष्ठसुतस्तदा ।१८।

        तुरोर्वाक्यं तु तच्छ्रुत्वा क्रुद्धो राजा बभूव सः ।
        तुरुं शशाप धर्मात्मा क्रोधेनारुणलोचनः ।१९।

        अपध्वस्तस्त्वयाऽदेशो ममायं पापचेतन ।
        तस्मात्पापी भव स्वत्वं सर्वधर्मबहिष्कृतः ।२०।

        शिखया त्वं विहीनश्च वेदशास्त्रविवर्जितः ।
        सर्वाचारविहीनस्त्वं भविष्यसि न संशयः ।२१।

        ब्रह्मघ्नस्त्वं देवदुष्टः सुरापः सत्यवर्जितः ।
        चंडकर्मप्रकर्ता त्वं भविष्यसि नराधमः ।२२।

        सुरालीनः क्षुधी पापी गोघ्नश्च त्वं भविष्यसि ।
        दुश्चर्मा मुक्तकच्छश्च ब्रह्मद्वेष्टा निराकृतिः ।२३।

        परदाराभिगामी त्वं महाचंडः प्रलंपटः ।
        सर्वभक्षश्च दुर्मेधाः सदात्वं च भविष्यसि ।२४।

        सगोत्रां रमसे नारीं सर्वधर्मप्रणाशकः ।
        पुण्यज्ञानविहीनात्मा कुष्ठवांश्च भविष्यसि ।२५।

        तव पुत्राश्च पौत्राश्च भविष्यंति न संशयः ।
        ईदृशाः सर्वपुण्यघ्ना म्लेच्छाः सुकलुषीकृताः ।२६।

        एवं तुरुं सुशप्त्वैव यदुं पुत्रमथाब्रवीत् ।
        जरां वै धारयस्वेह भुंक्ष्व राज्यमकंटकम् ।२७।

        बद्धाञ्जलिपुटो भूत्वा यदू राजानमब्रवीत् ।
                         *** "यदुरुवाच-
        जराभारं न शक्नोमि वोढुं तात कृपां कुरु ।२८।

        शीतमध्वा कदन्नं च वयोतीताश्च योषितः ।
        मनसः प्रातिकूल्यं च जरायाः पञ्चहेतवः ।२९।

        जरादुःखं न शक्नोमि नवे वयसि भूपते ।
        कः समर्थो हि वै धर्तुं क्षमस्व त्वं ममाधुना ।३०।

        यदुं क्रुद्धो महाराजः शशाप द्विजनंदन ।
        राज्यार्हो न च ते वंशः कदाचिद्वै भविष्यति
         ।३१।

        बलतेजः क्षमाहीनः क्षात्रधर्मविवर्जितः 
        भविष्यति न सन्देहो मच्छासनपराङ्मुखः ।३२।

                           "यदुरुवाच-
        निर्दोषोहं महाराज कस्माच्छप्तस्त्वयाधुना 
        कृपां कुरुष्व दीनस्य प्रसादसुमुखो भव ।३३।

                            "राजोवाच-
        महादेवः कुले ते वै स्वांशेनापि हि पुत्रक ।
        करिष्यति विसृष्टिं च तदा पूतं कुलं तव ।३४।

                              "यदुरुवाच-
        अहं पुत्रो महाराज निर्दोषः शापितस्त्वया ।
        अनुग्रहो दीयतां मे यदि मे वर्त्तते दया ।३५।

                               "राजोवाच-
        यो भवेज्ज्येष्ठपुत्रस्तु पितुर्दुःखापहारकः ।
        राज्यदायं सुभुंक्ते च भारवोढा भवेत्स हि ।३६।

        त्वया धर्मं न प्रवृत्तमभाष्योसि न संशयः ।
        भवता नाशिताज्ञा मे महादण्डेन घातिनः ।३७।

        तस्मादनुग्रहो नास्ति यथेष्टं च तथा कुरु ।
                              "यदुरुवाच-
        यस्मान्मे नाशितं राज्यं कुलं रूपं त्वया नृप ।३८।

        तस्माद्दुष्टो भविष्यामि तव वंशपतिर्नृप ।
        तव वंशे भविष्यंति नानाभेदास्तु क्षत्त्रियाः ।३९।

        तेषां ग्रामान्सुदेशांश्च स्त्रियो रत्नानि यानि वै ।
        भोक्ष्यंति च न संदेहो अतिचंडा महाबलाः ।४०।

        मम वंशात्समुत्पन्नास्तुरुष्का म्लेच्छरूपिणः ।
        त्वया ये नाशिताः सर्वे शप्ताः शापैः सुदारुणैः ।४१।

        एवं बभाषे राजानं यदुः क्रुद्धो नृपोत्तम ।
        अथ क्रुद्धो महाराजः पुनश्चैवं शशाप ह ।४२।

        मत्प्रजानाशकाः सर्वे वंशजास्ते शृणुष्व हि ।
        यावच्चंद्रश्च सूर्यश्च पृथ्वी नक्षत्रतारकाः ।४३।

        तावन्म्लेच्छाः प्रपक्ष्यन्ते कुम्भीपाके चरौ रवे ।
        कुरुं दृष्ट्वा ततो बालं क्रीडमानं सुलक्षणम् ।४४।

        समाह्वयति तं राजा न सुतं नृपनन्दनम् ।
        शिशुं ज्ञात्वा परित्यक्तः सकुरुस्तेन वै तदा ।४५।

        शर्मिष्ठायाः सुतं पुण्यं तं पूरुं जगदीश्वरः ।
        समाहूय बभाषे च जरा मे गृह्यतां पुनः ।४६।

        भुंक्ष्व राज्यं मया दत्तं सुपुण्यं हतकंटकम् ।
                             "पूरुरुवाच-
        राज्यं देवे न भोक्तव्यं पित्रा भुक्तं यथा तव ।४७।

        त्वदादेशं करिष्यामि जरा मे दीयतां नृप ।
        तारुण्येन ममाद्यैव भूत्वा सुंदररूपदृक् ।४८।

        भुंक्ष्व भोगान्सुकर्माणि विषयासक्तचेतसा ।
        यावदिच्छा महाभाग विहरस्व तया सह ।४९।

        यावज्जीवाम्यहं तात जरां तावद्धराम्यहम् ।
        एवमुक्तस्तु तेनापि पूरुणा जगतीपतिः ।५०।

        हर्षेण महताविष्टस्तं पुत्रं प्रत्युवाच सः ।
        यस्माद्वत्स ममाज्ञा वै न हता कृतवानिह ।५१।

        तस्मादहं विधास्यामि बहुसौख्यप्रदायकम् ।
        यस्माज्जरागृहीता मे दत्तं तारुण्यकं स्वकम् ।५२।

        तेन राज्यं प्रभुंक्ष्व त्वं मया दत्तं महामते ।
        एवमुक्तः सुपूरुश्च तेन राज्ञा महीपते ।५३।

        तारुण्यंदत्तवानस्मै जग्राहास्माज्जरां नृप ।
        ततः कृते विनिमये वयसोस्तातपुत्रयोः ।५४।

        तस्माद्वृद्धतरः पूरुः सर्वांगेषु व्यदृश्यत ।
        नूतनत्वं गतो राजा यथा षोडशवार्षिकः ।५५।

        रूपेण महताविष्टो द्वितीय इव मन्मथः ।
        धनूराज्यं च छत्रं च व्यजनं चासनं गजम् ।५६।

        कोशं देशं बलं सर्वं चामरं स्यंदनं तथा ।
        ददौ तस्य महाराजः पूरोश्चैव महात्मनः ।५७।

        कामासक्तश्च धर्मात्मा तां नारीमनुचिंतयन् ।
        तत्सरः सागरप्रख्यंकामाख्यं नहुषात्मजः ।५८।

        अश्रुबिंदुमती यत्र जगाम लघुविक्रमः ।
        तां दृष्ट्वा तु विशालाक्षीं चारुपीनपयोधराम् ।५९।

        विशालां च महाराजः कंदर्पाकृष्टमानसः ।
                          "राजोवाच-
        आगतोऽस्मि महाभागे विशाले चारुलोचने।६०।

        जरात्यागःकृतो भद्रे तारुण्येन समन्वितः ।
        युवा भूत्वा समायातो भवत्वेषा ममाधुना ।६१।

        यंयं हि वांछते चैषा तंतं दद्मि न संशयः ।
                            "विशालोवाच-
        यदा भवान्समायातो जरां दुष्टां विहाय च ।६२।

        दोषेणैकेनलिप्तोसि भवंतं नैव मन्यते ।
                              "राजोवाच-
        मम दोषं वदस्व त्वं यदि जानासि निश्चितम् ।६३।तं तु दोषं परित्यक्ष्येगुणरूपंनसंशयः ।६४।

        "अनुवाद"

        अध्याय -78 - पुरु ने अपनी जवानी ययाति को दे दी

        ययाति ने कहा :

        1-4. हे मेरे श्रेष्ठ पुत्रों, तुममें से जो बुद्धिमान है, उसे मेरे इस बुढ़ापे को, जो मुझे कष्ट दे रहा है, ले लेना चाहिए और अपना यौवन तथा उत्तम रूप मुझे दे देना चाहिए; (ताकि) मैं जैसा चाहूँ वैसा व्यवहार करूँ। आज मेरा अत्यंत चंचल मन क्रोधित हो गया है और एक स्त्री में आसक्त हो गया है। जैसे घड़े में भरे हुए पानी के चारों ओर अग्नि घूमती रहती है, उसी प्रकार हे मेरे पुत्रों, काम की अग्नि से मेरा मन अत्यंत कंपित हो रहा है। हे (मेरे) पुत्रों, तुम में से एक को मेरा यह बुढ़ापा जो मुझे दुःख दे रहा है, ले लेना चाहिए और अपनी जवानी (मुझे) दे देनी चाहिए; (ताकि) मैं अपनी इच्छा के अनुसार आचरण करूँ।

        5-6. वह श्रेष्ठ पुत्र, जो अपनी युवावस्था मुझे सौंप देगा, वह मेरे राज्य का आनंद उठाएगा और मेरा धनुष उठाएगा (और मेरी वंशावली को आगे बढ़ाएगा)। उसके पास सुख, प्रचुर धन, ऐश्वर्य और धान्य होगा। उसके बहुत से बच्चे होंगे, उसे यश और कीर्ति प्राप्त होगी।

        बेटों ने कहा :

        7. हे राजन, आप धर्म परायण राजा हैं। आप सच्चाई से अपनी प्रजा की रक्षा कर रहे हैं। आपके मन में यह स्वाभाविक रूप से चंचल विचार किस कारण उत्पन्न हुआ है?

        राजा ने कहा :

        8-10. पूर्व नर्तक, श्रेष्ठ नर्तक, मेरे शहर में आये। उन्हीं के कारण मुझमें ऐसी भ्रांति उत्पन्न हुई है, जब कामदेव ने मुझे मोहित कर लिया था। मेरा शरीर बुढ़ापे से ढका हुआ है; और मेरा मन कामदेव (अर्थात् जोश) से वश में हो गया। हे श्रेष्ठ पुत्रों, मैं क्रोधित था और जोश से वश में था। मैंने एक दिव्य रूप वाली सुन्दर कन्या को देखा। हे पुत्रों, मैं ने उस से बातें कीं; लेकिन अच्छे ने कुछ नहीं कहा.

        11-13. उसकी आकर्षक और चतुर दोस्त का नाम विशाला है। उसने मुझसे अच्छे शब्द कहे, जिससे मुझे खुशी हुई: "जब तुम बुढ़ापे से मुक्त हो जाओगे, तो सबसे प्रिय तुम्हारा होगा।" मैंने उसके कहे हुए इन शब्दों को मान लिया (अर्थात् मान लिया) और (फिर) घर आ गया। मैंने अपने बुढ़ापे को दूर करने के लिये तुमसे ऐसा कहा है (उसने मुझसे कहा था)। हे भले पुत्रों, ऐसा समझकर तुम्हें वही करना चाहिए (जिससे मुझे प्रसन्नता हो)।

        14-18. पिता और माता की कृपा से पुत्रों को शरीर मिलता है। हे राजन, शरीर की सहायता से बुद्धिमान व्यक्ति धार्मिक कार्य करता है। पुत्र को अपने पिता की विशेष सेवा करनी चाहिए। फिर भी, हे राजा, यह मेरे लिए अपनी जवानी तुम्हें देने का समय नहीं है। हे राजन, पुरुषों को युवावस्था में इंद्रियों का सुख भोगना चाहिए। अभी तुम्हारे लिए (इन सुखों को भोगने का) उचित समय नहीं है। (आप कहते हैं) हे पिता, आप उस सुख का आनंद तब उठाएंगे जब आप अपना परिपक्व बुढ़ापा अपने पुत्रों को दे देंगे; लेकिन (तब) आपके पास (इतना) जीवन नहीं होगा (यानी आप इतने लंबे समय तक जीवित नहीं रहेंगे)। इसलिए, हे महान राजा, मैं आपके शब्दों का पालन नहीं करूंगा (अर्थात जैसा आप कहते हैं वैसा ही करूंगा)।

        इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्र तुरु ने उस समय उनसे बात की।

        19 तुरु की ये बातें सुनकर राजा को क्रोध आया। धर्मात्मा ने क्रोध से लाल आँखें करके तुरु को श्राप दिया।

        20-26. “हे दुष्ट पुत्र, तू ने मेरी इस आज्ञा का उल्लंघन किया है। अत: सब धर्मों से बहिष्कृत पापी मनुष्य बनो। तुम सिर के मुकुट पर बालों की लट से रहित रहोगे; तुम पवित्र ग्रंथों से वंचित रह जाओगे; तुम सभी शिष्टाचार से रहित हो जाओगे। इसमें कोई संदेह नहीं है. तुम ब्राह्मणों के हत्यारे होगे ; तुम देवताओं द्वारा नष्ट किये जाओगे; तुम शराबी होगे; तुम सत्यता से रहित हो जाओगे; तू भयंकर काम करेगा; तुम सबसे नीच आदमी होगे. तुम्हें शराब पीने की लत लग जायेगी; आप। भूखा, पापी और गौहत्यारा होगा। आपकी त्वचा खराब हो जाएगी; तेरे निचले वस्त्र का आंचल खुला रहेगा; तुम ब्राह्मणों से घृणा करोगे; तुम विकृत हो जाओगे. तू व्यभिचारी होगा; तुम बहुत उग्र होगे; तुम बहुत कामातुर हो जाओगे; तुम सब कुछ खाओगे; तुम सदैव दुष्ट रहोगे. तू अपने ही कुटुम्बी स्त्री के साथ संभोग करेगा; आप सभी धार्मिक प्रथाओं को नष्ट कर देंगे; तुम पवित्र ज्ञान से रहित हो जाओगे; और तुम कुष्ठ रोग से पीड़ित हो जाओगे. तुम्हारे पुत्र और पौत्र भी सभी पवित्र वस्तुओं को नष्ट कर देंगे, बर्बर होंगे और इसी प्रकार (अर्थात् इसी प्रकार) बहुत बिगड़ जायेंगे।”

        27. इस प्रकार तुरु को बहुत बुरी तरह श्राप देने के बाद, उन्होंने (अपने दूसरे) पुत्र, यदु से कहा : "अब (मेरा) बुढ़ापा ले लो, और किसी भी प्रकार की परेशानी से मुक्त होकर राज्य का आनंद लो।"

        28. यदु ने हाथ जोड़कर राजा से कहा:

        यदु ने कहा :

        28-30. हे पिता, मैं (आपके) बुढ़ापे का बोझ सहन करने में असमर्थ हूँ; (कृपया) मुझ पर दया करें (अर्थात् क्षमा करें)। बुढ़ापे के पांच कारण हैं: ठंडक, यात्रा, गलत खान-पान, वृद्ध स्त्री और मन का अरुचि। हे राजन, मैं अपनी युवावस्था में (अर्थात् जवान होते हुए) दुःख सहने में समर्थ नहीं हूँ। बुढ़ापे को कौन रोक सकता है? अब (कृपया) मुझे क्षमा करें।

        31-32. हे ब्राह्मण पुत्र , क्रोधित महान राजा ने यदु को श्राप दिया: “तुम्हारा वंश कभी भी राज्य का हकदार नहीं होगा। यह शक्ति, चमक, सहनशीलता से रहित हो जाएगा और क्षत्रियों के आचरण से वंचित हो जाएगा (क्योंकि आपने) मेरे आदेश से मुंह मोड़ लिया है। इसमें कोई अनिश्चितता नहीं है।”

        यदु ने कहा :

        33. हे राजा, मैं निर्दोष हूं; अब तुमने मुझे क्यों शाप दिया है? (कृपया) उस गरीब (अर्थात मुझ पर) का पक्ष लें। मुझ पर अनुग्रह करने की कृपा करें.

        राजा ने कहा :

        34. हे पुत्र, (जब) ​​महान देवता अपने अंश सहित तेरे कुल में जन्म लेगा, तब तेरा कुल शुद्ध हो जायेगा।

        यदु ने कहा :

        35. हे राजा, तू ने मुझ निर्दोष पुत्र को शाप दिया है; यदि आपको मुझ पर दया है तो (कृपया) मुझ पर कृपा करें।

        राजा ने कहा :

        36. जो ज्येष्ठ पुत्र हो उसे पिता का दुःख दूर करना चाहिए। वह राज्य की विरासत का अच्छी तरह से आनंद लेता है, और वह (राज्य का) बोझ भी उठाएगा।

        37-38ए. आपने (अपना) कर्तव्य नहीं निभाया है, (इसलिए) आप निश्चित रूप से बात करने के लायक नहीं हैं। तूने मेरे उस आदेश को नष्ट कर दिया है (अर्थात अवज्ञा की है) जिसे मैं महान् (अर्थात् भारी) दण्ड दे सकता हूँ। इसलिए आपका पक्ष नहीं लिया जा सकता, आप जैसा चाहें वैसा करें।

        यदु ने कहा :

        38-42. हे राजा, चूँकि तुमने मेरे राज्य, रूप और परिवार को नष्ट कर दिया है, इसलिए मैं, तुम्हारे परिवार का मुखिया, दुष्ट होगा। आपके परिवार में विभिन्न रूपों वाले (जन्म लेने वाले) क्षत्रिय होंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अत्यंत भयंकर और अत्यंत शक्तिशाली (प्राणी) अपने गाँवों, अच्छे क्षेत्रों, अपनी स्त्रियों और उनके पास जो भी रत्न होंगे, उनका आनंद लेंगे। मेरे कुल में बर्बरों के रूप वाले तुरुष्क उत्पन्न होंगे - जो नष्ट हो गए थे और जिन्हें आपने बहुत भयंकर शाप दिया था। हे श्रेष्ठ राजा, क्रोधित यदु ने राजा ( ययाति ) से इस प्रकार कहा।

        42-45. तब क्रोधित महान राजा ने फिर से (यदु) को श्राप दिया: “सुनो, यह जान लो कि तुम्हारे परिवार में जो भी जन्म लेगा वह मेरी प्रजा को नष्ट कर देगा। जब तक चंद्रमा, सूर्य, पृथ्वी, नक्षत्र और तारे (अंतिम) रहेंगे तब तक म्लेच्छ कुंभीपाक और रौरव (नरक) में भुने रहेंगे । तब राजा ने युवा कुरु को खेलते हुए और अच्छे अंक प्राप्त करते हुए देखकर उस पुत्र को राजकुमार नहीं कहा। कुरु को बालक जानकर राजा वहां से चले गये।

        46-47. तब संसार के स्वामी (अर्थात् ययाति) ने शर्मिष्ठा के मेधावी पुत्र पुरु को बुलाया और उससे कहा: "मेरा बुढ़ापा ले लो और मेरे द्वारा दिए गए उपद्रव के स्रोतों को नष्ट करके, (और) मेरे अत्यंत अच्छे राज्य का आनंद लो ( आपको)।"

        पुरु ने कहा :

        47-49. प्रभु (यदि आप) अपने पिता के समान राज्य का उपभोग करें, तो मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। हे राजा, मेरी जवानी के बदले मुझे अपना बुढ़ापा दे दो। आज केवल सुंदर दिखने वाले, भोग-विलास करने वाले, मन को इंद्रिय विषयों, भोग-विलास और अच्छे कर्मों में आसक्त रखने वाले हैं।

        49-54. हे महानुभाव, जब तक तुम चाहो उसके साथ खेलो। हे पिता, जब तक मैं जीवित हूं, बुढ़ापा कायम रखूंगा।

        उस पुरु के इस प्रकार कहने पर जगत् के स्वामी ने बड़े हर्ष से भरे हुए हृदय से अपने पुत्र से फिर कहा, “हे पुत्र, चूँकि तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, (इसके विपरीत) उसका पालन किया, इसलिए मैं तुम्हें दूँगा।” तुम्हें बहुत ख़ुशी है. हे परम बुद्धिमान, तू ने मेरा बुढ़ापा ले लिया, और मुझे अपनी जवानी दे दी, इस कारण तू मेरे दिए हुए राज्य का उपभोग कर। हे राजन, राजा द्वारा इस प्रकार संबोधित किये जाने पर उस अच्छे पुरु ने उसे अपनी जवानी दे दी और उससे बुढ़ापा ले लिया।

        54 -60. हे प्रियजन, जब पिता और पुत्र की आयु का आदान-प्रदान हुआ, तो पुरु अपने सभी अंगों में राजा से अधिक उम्र का प्रतीत हुआ। राजा युवावस्था तक पहुँच गया, (और एक आदमी की तरह दिखता था) सोलह साल का, और बहुत आकर्षण रखता था (दिखता था) जैसे कि वह एक और कामदेव था। महान राजा ने उस महान पुरु को सब कुछ दे दिया - (उसका) धनुष, राज्य, छत्र, पंखा, आसन और हाथी, (साथ ही) उसका पूरा खजाना, देश, सेना, चौरी और रथ भी। वह नहुष का धर्मात्मा पुत्र, जो वासना से आसक्त था, उस कन्या के बारे में सोचता हुआ, तेज कदमों से उस काम नामक झील पर गया , जो समुद्र के समान थी, जहाँ अश्रुबिन्दुमति (रखी) थी। बड़े-बड़े नेत्रों वाली तथा सुन्दर एवं मोटे स्तनों वाली उस प्रतिष्ठित कन्या को देखकर कामदेव के प्रति आकर्षित मन वाले महान राजा ने विशाला से कहा:

        राजा ने कहा :

        60-62. हे महान और आकर्षक आँखों वाली प्रतिष्ठित महिला, हे शुभ, मैंने अपना बुढ़ापा त्याग दिया है, और (अब) युवावस्था से संपन्न हूँ। जवान होकर मैं (यहाँ) आया हूँ। अब उसे मेरा होने दो। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह जो चाहेगी मैं उसे दूँगा।

        विशाला ने कहा :

        62-63. जब (अब) तुम दुष्ट बुढ़ापे को त्याग कर आये हो, (फिर भी) तुम पर अब भी एक दोष लगा हुआ है। (इसलिए) वह आपको पुरस्कार नहीं देती।

        राजा ने कहा :

        63-64. यदि तुम निश्चय ही मेरा दोष जानते हो तो (मुझसे) कहो। मैं निःसंदेह उस निम्न प्रकृति के दोष को त्याग दूँगा।


        पद्मपुराणम्/खण्डः २ (भूमिखण्डः अध्याय-79)


                       "विशालोवाच-
        शर्मिष्ठा यस्य वै भार्या देवयानी वरानना ।
        सौभाग्यं तत्र वै दृष्टमन्यथा नास्ति भूपते ।१।

        तत्कथं त्वं महाभाग अस्याः कार्यवशो भवेः ।
        सपत्नजेन भावेन भवान्भर्ता प्रतिष्ठितः ।२।

        ससर्पोसि महाराज भूतले चंदनं यथा ।
        सर्पैश्च वेष्टितो राजन्महाचंदन एव हि ।३।

        तथा त्वं वेष्टितः सर्पैः सपत्नीनामसंज्ञकैः ।
        वरमग्निप्रवेशश्च शिखाग्रात्पतनं वरम् ।४।

        रूपतेजः समायुक्तं सपत्नीसहितं प्रियम् ।
        न वरं तादृशं कांतं सपत्नीविषसंयुतम् ।५।

        तस्मान्न मन्यते कांतं भवंतं गुणसागरम् ।
                          राजोवाच-
        देवयान्या न मे कार्यं शर्मिष्ठया वरानने ।६।

        इत्यर्थं पश्य मे कोशं सत्वधर्मसमन्वितम् ।
                         अश्रुबिंदुमत्युवाच-
        अहं राज्यस्य भोक्त्री च तव कायस्य भूपते।७।

        यद्यद्वदाम्यहं भूप तत्तत्कार्यं त्वया ध्रुवम् ।
        इत्यर्थे मम देहि स्वं करं त्वं धर्मवत्सल ।८।

        बहुधर्मसमोपेतं चारुलक्षणसंयुतम् ।
                          राजोवाच-
        अन्य भार्यां न विंदामि त्वां विना वरवर्णिनि ।९।

        राज्यं च सकलामुर्वीं मम कायं वरानने ।
        सकोशं भुंक्ष्व चार्वंगि एष दत्तः करस्तव।१०।

        यदेव भाषसे भद्रे तदेवं तु करोम्यहम्।
        अश्रुबिंदुमत्युवाच-
        अनेनापि महाभाग तव भार्या भवाम्यहम् ।११।

        एवमाकर्ण्य राजेंद्रो हर्षव्याकुललोचनः ।
        गांधर्वेण विवाहेन ययातिः पृथिवीपतिः ।१२।

        उपयेमे सुतां पुण्यां मन्मथस्य नरोत्तम ।
        तया सार्द्धं महात्मा वै रमते नृपनंदनः।१३।

        सागरस्य च तीरेषु वनेषूपवनेषु च ।
        पर्वतेषु च रम्येषु सरित्सु च तया सह ।१४।

        रमते राजराजेंद्रस्तारुण्येन महीपतिः ।
        एवं विंशत्सहस्राणि गतानि निरतस्य च ।१५।

        भूपस्य तस्य राजेंद्र ययातेस्तु महात्मनः।
                        विष्णुरुवाच-
        एवं तया महाराजो ययातिर्मोहितस्तदा ।१६।

        कंदर्पस्य प्रपंचेन इंद्रस्यार्थे महामते ।
                         सुकर्मोवाच-
        एवं पिप्पल राजासौ ययातिः पृथिवीपतिः।१७।

        तस्या मोहनकामेन रतेन ललितेन च ।
        न जानाति दिनं रात्रिं मुग्धः कामस्य कन्यया ।१८।

        एकदा मोहितं भूपं ययातिं कामनंदिनी ।
        उवाच प्रणतं नम्रं वशगं चारुलोचना ।१९।

                      "अश्रुबिंदुमत्युवाच-
        संजातं दोहदं कांत तन्मे कुरु मनोरथम् ।
        अश्वमेधमखश्रेष्ठं यजस्व पृथिवीपते ।२०।

                            "राजोवाच-
        एवमस्तु महाभागे करोमि तव सुप्रियम् ।
        समाहूय सुतश्रेष्ठं राज्यभोगे विनिःस्पृहम् ।२१।

        समाहूतः समायातो भक्त्यानमितकंधरः ।
        बद्धांजलिपुटो भूत्वा प्रणाममकरोत्तदा ।२२।

        तस्याः पादौ ननामाथ भक्त्या नमितकंधरः ।
        आदेशो दीयतां राजन्येनाहूतः समागतः।२३।

        किं करोमि महाभाग दासस्ते प्रणतोस्मि च ।
                             "राजोवाच-
        अश्वमेधस्य यज्ञस्य संभारं कुरु पुत्रक ।२४।

        समाहूय द्विजान्पुण्यानृत्विजो भूमिपालकान् ।
        एवमुक्तो महातेजाः पूरुः परमधार्मिकः।२५।

        सर्वं चकार संपूर्णं यथोक्तं तु महात्मना ।
        तया सार्धं स जग्राह सुदीक्षां कामकन्यया ।२६।

        अश्वमेधयज्ञवाटे दत्वा दानान्यनेकधा ।
        ब्राह्मणेभ्यो महाराज भूरिदानमनंतकम् ।२७।

        दीनेषु च विशेषेण ययातिः पृथिवीपतिः ।
        यज्ञांते च महाराजस्तामुवाच वराननाम् ।२८।

        अन्यत्ते सुप्रियं बाले किं करोमि वदस्व मे ।
        तत्सर्वं देवि कर्तास्मि साध्यासाध्यं वरानने।२९।
                            "सुकर्मोवाच-
        इत्युक्ता तेन सा राज्ञा भूपालं प्रत्युवाच ह ।
        जातो मे दोहदो राजंस्तत्कुरुष्व ममानघ ।३०।

        इंद्रलोकं ब्रह्मलोकं शिवलोकं तथैव च।
        विष्णुलोकं महाराज द्रष्टुमिच्छामि सुप्रियम् ।३१।

        दर्शयस्व महाभाग यदहं सुप्रिया तव ।
        एवमुक्तस्तयाराजातामुवाचससुप्रियाम् ।३२।

        साधुसाधुवरारोहेपुण्यमेवप्रभाषसे ।
        स्त्रीस्वभावाच्चचापल्यात्कौतुकाच्चवरानने ।३३।

        यत्तवोक्तं महाभागे तदसाध्यं विभाति मे।
        तत्साध्यं पुण्यदानेन यज्ञेन तपसापि च ।३४।

        अन्यथा न भवेत्साध्यं यत्त्वयोक्तं वरानने ।
        असाध्यं तु भवत्या वै भाषितं पुण्यमिश्रितम् ।३५।

        मर्त्यलोकाच्छरीरेण अनेनापि च मानवः।
        श्रुतो दृष्टो न मेद्यापि गतः स्वर्गं सुपुण्यकृत् ।३६।

        ततोऽसाध्यं वरारोहे यत्त्वया भाषितं मम ।
        अन्यदेव करिष्यामि प्रियं ते तद्वद प्रिये ।३७।

                        "देव्युवाच-
        अन्यैश्च मानुषै राजन्न साध्यं स्यान्न संशयः ।
        त्वयि साध्यं महाराज सत्यंसत्यं वदाम्यहम् ।३८।

        तपसा यशसा क्षात्रै र्दानैर्यज्ञैश्च भूपते ।
        नास्ति भवादृशश्चान्यो मर्त्यलोके च मानवः ।३९।

        क्षात्रं बलं सुतेजश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
        तस्मादेवं प्रकर्तव्यं मत्प्रियं नहुषात्मज ।४०।
        इति 

         "श्रीपद्मपुराणे भूमिखंडे वेनोपाख्याने मातापितृतीर्थवर्णने ययातिचरित्रे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ।७९।


        "अनुवाद"

        अध्याय 79 - युवा ययाति अश्रुबिन्दुमति के साथ आनंद लेते हैं

        विशाला ने कहा :

        1-2. वहाँ (अर्थात उस राजा में) ही सौभाग्य देखा जाता है , जिसकी पत्नी शर्मिष्ठा हो और जिसकी पत्नी सुंदर देवयानी हो। हे राजा, यह बात झूठी नहीं हो सकती; तो फिर हे प्रतापी राजा, आप इस युवती के शरीर (सौंदर्य) पर कैसे मोहित हो गए  जबकि आप दो पत्नियों वाले पति के रूप में जाने जाते हैं ?

        3-4. हे राजा, चंदन के समान आपके (चारों ओर) सर्प हैं। हे राजन, जैसे एक विशाल चंदन का वृक्ष सर्पों से घिरा रहता है, उसी प्रकार आप सह-पत्नियों नामक सर्पों से घिरे रहते हैं।

        4-6. अग्नि में प्रवेश करना उत्तम है, (पहाड़ की) चोटी से गिरना उत्तम है, परंतु सुन्दरता और तेज से युक्त आप जैसे  प्रिय पति का होना  सहपत्नियों के साथ -उत्तम नहीं है,  सहपत्नी रूपी विष के साथ रहना उत्तम नहीं है इसलिए वह आपको, गुणों के सागर, अपने प्रेमी के रूप में पुरस्कृत नहीं करती है।

        राजा ने कहा :

        अश्रुबिन्दुमति ने कहा :

        7-9. हे राजन, मैं आपके राज्य और आपके शरीर का भोक्ता बनूंगी। हे राजा, मैं जो कुछ करने को कहूँगी तुम्हें अवश्य ही करना पड़ेगा। इस प्रयोजन के लिए, हे धर्मपरायण लोगों, अनेक गुणों से युक्त और शुभ चिह्नों से युक्त अपना हाथ मुझे दीजिए।

        राजा ने कहा :

        9-11. हे अति सुन्दर रूप वाली, मैं तेरे सिवा कोई दूसरी पत्नी नहीं रखूँगा। हे सुंदर स्त्री, हे मनमोहक शरीर वाली स्त्री, मेरे संपूर्ण राज्य का उसके धन सहित, इसी प्रकार संपूर्ण पृथ्वी और मेरे शरीर का भी आनंद लो। (इसके प्रमाण रूप में) मैंने अपना यह हाथ तुम्हें अर्पित किया है।हे अच्छी महिला, तुम जो कहोगी मैं वही करूंगा।

        अश्रुबिन्दुमति ने कहा :

        11. बस इस (वादे) के साथ, हे महान व्यक्ति, मैं तुम्हारी पत्नी बनूंगी।

        12-16. यह सुनकर, पृथ्वी के स्वामी, राजाओं के राजा, ययाति ने खुशी से भरी आँखों के साथ कामदेव की उस पवित्र पुत्री से गंधर्व विधि से विवाह किया।   देखें नीचे प्रमाण

        एवमाकर्ण्य राजेंद्रो हर्षव्याकुललोचनः ।
        गांधर्वेण विवाहेन ययातिः पृथिवीपतिः ।१२।

        उपयेमे सुतां पुण्यां मन्मथस्य नरोत्तम ।
        तया सार्द्धं महात्मा वै रमते नृपनंदनः।१३।

        राजा नहुष का कुलीन पुत्र  उसके साथ समुद्र तटों, जंगलों और उद्यानों में आनंद लेता था।

        ,वह  राजाओं के स्वामी, युवावस्था में उसके साथ पहाड़ों और सुंदर नदियों में क्रीड़ा करता था। इस प्रकार हे राजन्!, उस महान राजा ययाति को उसके साथ क्रीड़ा करते हुए बीस हजार (वर्ष) बीत गये।

        विष्णु ने कहा :

        16-17. हे अत्यंत बुद्धिमान, उस समय कामदेव के कपटपूर्ण कार्य के माध्यम से, महान राजा ययाति इंद्र के लाभ के लिए उसके द्वारा मोहित हो गए थे।

        सुकर्मन ने कहा :

        17-19. हे पिप्पल , पृथ्वी के स्वामी ययाति को कामदेव की पुत्री के मोहक जोश और मोहक मिलन से मोहित होकर दिन या रात का ज्ञान नहीं रहता था। एक बार आकर्षक नेत्रों वाली कामदेव की पुत्री ने उन स्तब्ध, विनम्र, आज्ञाकारी राजा ययाति को प्रणाम करके कहा:

        अश्रुबिन्दुमति ने कहा :

        20. हे प्रिय, मेरी इच्छा उत्पन्न होती है; अत: मेरी वह इच्छा पूरी करो: सर्वोत्तम यज्ञ करो, अर्थात्। अश्वमेध , हे पृथ्वी के स्वामी!

        राजा ने कहा :

        21-24. हे गौरवशाली, ऐसा ही हो; मैं वही करूंगा जो तुम्हें बहुत पसंद है.

        उन्होंने अपने छोटे श्रेष्ठ बेटे को आमंत्रित किया, जिसे राज्य का आनंद लेने की कोई इच्छा नहीं थी।

        (पुत्र) बुलाये जाने पर भक्तिभाव से गर्दन (अर्थात् सिर) झुकाकर तथा हाथ जोड़कर (ययाति को) प्रणाम करके वहाँ पुरु  आया। उसने भी अपनी गर्दन (अर्थात् सिर) झुकाकर उसके चरणों को प्रणाम किया। “हे राजा, मुझे आज्ञा दीजिए क्योंकि मैं पुरु , जिसे आपके द्वारा बुलाया गया था, मैं आ गया हूं। हे महानुभाव, मुझे क्या करना चाहिए? मैं आपका सेवक हूँ जिसने आपको प्रणाम किया है।”

        राजा ने कहा :

        24-29. हे पुत्र, ब्राह्मणों , यज्ञ करने वाले मेधावी पुरोहितों ,और राजाओं को आमंत्रित करके, अश्व-यज्ञ की तैयारी करो।

        इस प्रकार संबोधित करते हुए, उस अत्यंत तेजस्वी और अत्यधिक धार्मिक पुरु ने महिमावान के कहे अनुसार सब कुछ पूर्ण रूप से किया।कामदेव की पुत्री अश्रुबिन्दुमती  के साथ उन्होंने विधिवत दीक्षा ली (अर्थात स्वयं को यज्ञ के लिए समर्पित कर लिया)। हे महान राजा, पृथ्वी के स्वामी ययाति ने यज्ञ स्थल पर ब्राह्मणों को विभिन्न उपहार दिए, उसी प्रकार विशेष रूप से गरीबों को अनंत, प्रचुर उपहार दिए; और यज्ञ के अंत में उन्होंने उस खूबसूरत महिला अश्रुबिन्दुमती से कहा: “हे युवा महिला, मुझे बताओ कि तुम्हारा प्रिय मुझे और क्या करना चाहिए। हे सुंदरी, मैं वह सब कुछ करूंगा जो प्राप्य है और प्राप्य भी नहीं है।"

        सुकर्मन ने कहा :

        30-37. राजा के इस प्रकार कहने पर वह उत्तर में बोली, “हे राजा, मुझमें एक इच्छा उत्पन्न हुई है; हे भोले, तू इसे कर (अर्थात् संतुष्ट कर)। हे महान राजा, मैं इंद्र, ब्रह्मा , शिव और विष्णु का अत्यंत सुखदायक लोक देखने की इच्छा रखती हूँ । हे कुलीन, यदि मैं तुम्हें बहुत प्रिय हूं तो मुझे दिखाओ।'' उसके इस प्रकार संबोधित करने पर राजा ने उससे, जो उसे बहुत प्रिय थी, कहा: ''हे सुंदरी, अच्छा, तुम न्यायप्रिय हो पवित्र बातें कह रही हो। हे सुंदरी, मुझे लगता है कि स्त्री स्वभाव, चंचलता और जिज्ञासा के कारण आपने जो कहा, वह अप्राप्य है, 

        हे महान महिला !  आपने जो कहा  है वह पवित्र उपहार, त्याग और तपस्या के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है; किसी अन्य माध्यम से, प्राप्त नहीं किया जा सकता है   हे सुन्दर महिला। आपने अभी कुछ ऐसा कहा है जो अप्राप्य है क्योंकि यह धार्मिक गुणों के साथ मिश्रित (अर्थात् जुड़ा हुआ) है। मैंने अभी तक किसी अत्यंत मेधावी व्यक्ति के बारे में नहीं देखा या सुना है जो नश्वर संसार से अपने शरीर के साथ स्वर्ग गया हो । 

        इसलिए, हे सुंदरी, तुमने जो कहा वह मेरे लिए अप्राप्य है। मैं कुछ और कर सकूँ। हे प्रिय मुझे वही बताओ।"

        आदरणीय महिला ने कहा :

        38-40. हे राजन, यह निश्चित रूप से अन्य मनुष्यों के लिए प्राप्य नहीं है; लेकिन यह आपके लिए प्राप्य है; मैं सत्य ही कह रही हूं। हे राजन, इस मृत्युलोक में तपस्या में, यश में, वीरतापूर्वक कार्य करने में, दान देने में और यज्ञ करने में आपके समान कोई दूसरा मनुष्य नहीं है।

         सब कुछ - एक क्षत्रिय की शक्ति , ऊर्जा की आग - आप में स्थापित है। इसलिए, हे नहुष के पुत्र, यह (बात) मुझे प्रिय है  यह कार्य (तुम्हारे द्वारा) किया जाना ही चाहिए।

        सन्दर्भ:-[1] :

        मौजूदा पाठ में "कार्यवशो" का कोई अर्थ नहीं है। इसे "कायवशो" से प्रतिस्थापित करना बेहतर होगा जिसका हमने यहां अनुवाद किया है। 


        ________________________________
        ***           "यदुरुवाच-
        जराभारं न शक्नोमि वोढुं तात कृपां कुरु ।२८।

        शीतमध्वा कदन्नं च वयोतीताश्च योषितः।
        मनसः प्रातिकूल्यं च जरायाः पञ्चहेतवः ।२९।


        जरादुःखं न शक्नोमि नवे वयसि भूपते ।
        कः समर्थो हि वै धर्तुं क्षमस्व त्वं ममाधुना ।३०।

        यदुं क्रुद्धो महाराजः शशाप द्विजनन्दन ।
        राज्यार्हो न च ते वंशः कदाचिद्वै भविष्यति ।३१।

        बलतेजः क्षमाहीनः क्षात्रधर्मविवर्जितः।
        भविष्यति न सन्देहो मच्छासनपराङ्मुखः ।३२।

                         "यदुरुवाच-
        निर्दोषोहं महाराजकस्माच्छप्तस्त्वयाधुना ।
        कृपां कुरुष्व दीनस्य प्रसादसुमुखो भव ।३३।

                         "राजोवाच-
        महादेवः कुले ते वै*** स्वांशेनापि हि पुत्रक ।
        करिष्यति विसृष्टिं च तदा पूतं कुलं तव ।३४।

                          "यदुरुवाच-
        अहं पुत्रो महाराज निर्दोषः शापितस्त्वया ।
        अनुग्रहो दीयतां मे यदि मे वर्त्तते दया ।३५।

        यदु ने कहा :
        33. हे राजा, मैं निर्दोष हूं; अब तुमने मुझे क्यों शाप दिया है? (कृपया) मुझ गरीब  का पक्ष लें। मुझ पर दया करने की कृपा करें.

        राजा ने कहा :

        34- हे पुत्र, (जब) ​​महान देवता (स्वराटविष्णु) अपने अंश सहित तेरे कुल में जन्म लेगा, तब तेरा कुल शुद्ध हो जायेगा।

                          "राजोवाच-
        यो भवेज्ज्येष्ठपुत्रस्तु पितुर्दुःखापहारकः।
        राज्यदायं सुभुन्क्ते च भारवोढा भवेत्स हि।३६।

        त्वया धर्मं न प्रवृत्तमभाष्योसि न संशयः।
        भवता नाशिताज्ञा मे महादण्डेन घातिनः ।३७।

        तस्मादनुग्रहो नास्ति यथेष्टं च तथा कुरु ।
                            "यदुरुवाच-
        यस्मान्मे नाशितं राज्यं कुलं रूपं त्वया नृप ।३८।

        तस्माद्दुष्टो भविष्यामि तव वंशपतिर्नृप ।
        तव वंशे भविष्यंति नानाभेदास्तु क्षत्त्रियाः ।३९।

        तेषां ग्रामान्सुदेशांश्च स्त्रियो रत्नानि यानि वै ।
        भोक्ष्यन्ति च न संदेहो अतिचणडा महाबलाः ।४०।

        मम वंशात्समुत्पन्नास्तुरुष्का म्लेच्छरूपिणः ।
        त्वया ये नाशिताः सर्वे शप्ताः शापैः सुदारुणैः ।४१।

        एवं बभाषे राजानं यदुः क्रुद्धो नृपोत्तम ।
        अथ क्रुद्धो महाराजः पुनश्चैवं शशाप ह ।४२।

        मत्प्रजानाशकाः सर्वे वंशजास्ते शृणुष्व हि ।
        यावच्चंद्रश्च सूर्यश्च पृथ्वी नक्षत्रतारकाः ।४३।

        तावन्म्लेच्छाः प्रपक्ष्यन्ते कुम्भीपाके चरौ रवे ।
        कुरुं दृष्ट्वा ततो बालं क्रीडमानं सुलक्षणम् ।४४।

        समाह्वयति तं राजा न सुतं नृपनन्दनम् ।
        शिशुं ज्ञात्वा परित्यक्तः सकुरुस्तेन वै तदा ।४५।

        शर्मिष्ठायाः सुतं पुण्यं तं पूरुं जगदीश्वरः।
        समाहूय बभाषे च जरा मे गृह्यतां पुनः ।४६।



        27. इस प्रकार तुरुवसु को बहुत बुरी तरह शाप देने के बाद, उन्होंने (अपने अन्य) पुत्र,यदु से कहा "अब (मेरा) बुढ़ापा ले लो, और किसी भी प्रकार की कष्टों से मुक्त होकर राज्य का आनंद लो।"

        28. यदु ने हाथ जोड़कर राजा से कहा:
        हे पिता, मैं (आपके) बुढ़ापे का बोझ सहन करने में असमर्थ हूँ; (कृपया) मुझ पर दया करें

        बुढ़ापे के पाँच कारण  हैं।: ठंडक, मदिरा, गलत खान-पान, वृद्ध स्त्री और मन का अरुचि।
        शीतमध्वा कदन्नं च वयोतीताश्च योषितः।
        मनसः प्रातिकूल्यं च जरायाः पञ्चहेतवः
        ________________________________
         हे राजन, मैं अपनी युवावस्था में (अर्थात् जवान होते हुए) दुःख सहने में समर्थ नहीं हूँ। बुढ़ापे को कौन रोक सकता है? अब (कृपया) मुझे क्षमा करें।

        31-32. हे ब्राह्मण पुत्र , क्रोधित महान राजा  ययाति ने यदु को श्राप दिया: “तुम्हारा वंश कभी भी राज्य का हकदार नहीं होगा। यह शक्ति, चमक, सहनशीलता से रहित हो जाएगा और क्षत्रियों के आचरण से वंचित हो जाएगा (क्योंकि आपने) मेरे आदेश से मुंह मोड़ लिया है। इसमें कोई अनिश्चितता नहीं है।”
        _______________
        यदु ने कहा :
        33. हे राजा, मैं निर्दोष हूं; अब तुमने मुझे क्यों शाप दिया है? (कृपया) मुझ गरीब  का पक्ष लें। मुझ पर दया करने की कृपा करें.

        राजा ने कहा :
        34- हे पुत्र, (जब) ​​महान देवता (स्वराटविष्णु) अपने अंश सहित तेरे कुल में जन्म लेगा, तब तेरा कुल शुद्ध हो जायेगा।

        यदु ने कहा :
        35. हे राजा, तमने मुझ निर्दोष पुत्र को शाप दिया है; यदि आपको मुझ पर दया है तो मुझ पर कृपा करें।

        राजा ने कहा :
        36. जो ज्येष्ठ पुत्र हो उसे पिता का दुःख दूर करना चाहिए। वह राज्य की विरासत का अच्छी तरह से आनंद लेता है, और वह (राज्य का) बोझ भी उठाएगा।

        37-38 आपने (अपना) कर्तव्य नहीं निभाया है, (इसलिए) आप निश्चित रूप से बात करने के लायक नहीं हैं। तूने मेरे उस आदेश को नष्ट कर दिया है (अर्थात अवज्ञा की है) जिसे मैं महान् (अर्थात् भारी) दण्ड दे सकता हूँ। इसलिए आपका पक्ष नहीं लिया जा सकता, आप जैसा चाहें वैसा करें।

        यदु ने कहा :
        38-42. हे राजा, चूँकि तुमने मेरे राज्य, रूप और परिवार को नष्ट कर दिया है, इसलिए मैं, तुम्हारे परिवार का मुखिया, दुष्ट होगा। आपके परिवार में विभिन्न रूपों वाले (जन्म लेने वाले) क्षत्रिय होंगे।

         इसमें कोई संदेह नहीं है कि अत्यंत भयंकर और अत्यंत शक्तिशाली (प्राणी) अपने गाँवों, अच्छे क्षेत्रों, अपनी स्त्रियों और उनके पास जो भी रत्न होंगे, उनका आनंद लेंगे।

        मेरे कुल में बर्बरों के रूप वाले तुरुष्क उत्पन्न होंगे - जो नष्ट हो गए थे और जिन्हें आपने बहुत भयंकर शाप दिया था। हे श्रेष्ठ राजा, क्रोधित यदु ने राजा  से इस प्रकार कहा।

        42-45. तब क्रोधित महान राजा ने फिर से (यदु) को श्राप दिया: “सुनो, यह जान लो कि तुम्हारे परिवार में जो भी जन्म लेगा वह मेरी प्रजा को नष्ट कर देगा। जब तक चंद्रमा, सूर्य, पृथ्वी, नक्षत्र और तारे (अंतिम) रहेंगे तब तक म्लेच्छ कुंभीपाक और रौरव (नरक) में भुने रहेंगे । तब राजा ने युवा कुरु को खेलते हुए और अच्छे अंक प्राप्त करते हुए देखकर उस पुत्र को राजकुमार नहीं कहा। कुरु को बालक जानकर राजा वहां से चले गये।

        46-47. तब संसार के स्वामी (अर्थात् ययाति) ने शर्मिष्ठा के मेधावी पुत्र पुरु को बुलाया और उससे कहा: "मेरा बुढ़ापा ले लो और मेरे द्वारा दिए गए उपद्रव के स्रोतों को नष्ट करके, (और) मेरे अत्यंत अच्छे राज्य का आनंद लो ( आपको)।"

        पुरु ने कहा :
        47-49. प्रभु (यदि आप) अपने पिता के समान राज्य का उपभोग करें, तो मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। हे राजा, मेरी जवानी के बदले मुझे अपना बुढ़ापा दे दो। 

        आज केवल सुंदर दिखने वाले, भोग-विलास करने वाले, मन को इंद्रिय विषयों, भोग-विलास और अच्छे कर्मों में आसक्त रखने वाले हैं।

        49-54. हे महानुभाव, जब तक तुम चाहो उसके साथ खेलो। हे पिता, जब तक मैं जीवित हूं, बुढ़ापा कायम रखूंगा।

        उस पुरु के इस प्रकार कहने पर जगत् के स्वामी ने बड़े हर्ष से भरे हुए हृदय से अपने पुत्र से फिर कहा, “हे पुत्र, चूँकि तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, (इसके विपरीत) उसका पालन किया, इसलिए मैं तुम्हें राज्य दूँगा।” तुम्हें बहुत ख़ुशी है. हे परम बुद्धिमान, तू ने मेरा बुढ़ापा ले लिया, और मुझे अपनी जवानी दे दी, इस कारण तू मेरे दिए हुए राज्य का उपभोग कर। हे राजन, राजा द्वारा इस प्रकार संबोधित किये जाने पर उस अच्छे पुरु ने उसे अपनी जवानी दे दी और उससे बुढ़ापा ले लिया।


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        कामकन्यां यदा राजा उपयेमे द्विजोत्तम ।
        किं चक्राते तदा ते द्वे पूर्वभार्ये सुपुण्यके ।१।

        देवयानी महाभागा शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।
        तयोश्चरित्रं तत्सर्वं कथयस्व ममाग्रतः ।२।

                       "सुकर्मोवाच-
        यदानीता कामकन्या स्वगृहं तेन भूभुजा ।
        अत्यर्थं स्पर्धते सा तु देवयानी मनस्विनी।३।

        तस्यार्थे तु सुतौ शप्तौ क्रोधेनाकुलितात्मना।
        शर्मिष्ठां च समाहूय शब्दं चक्रे यशस्विनी।४।

        रूपेण तेजसा दानैः सत्यपुण्यव्रतैस्तथा ।
        शर्मिष्ठा देवयानी च स्पर्धेते स्म तया सह।५।

        दुष्टभावं तयोश्चापि साऽज्ञासीत्कामजा तदा ।
        राज्ञे सर्वं तया विप्र कथितं तत्क्षणादिह।६।

        ****
        अथ क्रुद्धो महाराजः समाहूयाब्रवीद्यदुम् ।
        शर्मिष्ठा वध्यतां गत्वा शुक्रपुत्री तथा पुनः।७।

        सुप्रियं कुरु मे वत्स यदि श्रेयो हि मन्यसे ।
        एवमाकर्ण्य तत्तस्य पितुर्वाक्यं यदुस्तदा ।८।

        प्रत्युवाच नृपेंद्रं तं पितरं प्रति मानद ।
        नाहं तु घातये तात मातरौ दोषवर्जिते।९।

        मातृघाते महादोषः कथितो वेदपण्डितैः।
        तस्माद्घातं महाराज एतयोर्न करोम्यहम् ।१०।

        दोषाणां तु सहस्रेण माता लिप्ता यदा भवेत् ।
        भगिनी च महाराज दुहिता च तथा पुनः।११।

        पुत्रैर्वा भ्रातृभिश्चैव नैव वध्या भवेत्कदा ।
        एवं ज्ञात्वा महाराज मातरौ नैव घातये ।१२।

        यदोर्वाक्यं तदा श्रुत्वा राजा क्रुद्धो बभूव ह ।
        शशाप तं सुतं पश्चाद्ययातिः पृथिवीपतिः ।१३।

        यस्मादाज्ञाहता त्वद्य त्वया पापि समोपि हि ।
        मातुरंशं भजस्व त्वं मच्छापकलुषीकृतः ।१४।

        एवमुक्त्वा यदुं पुत्रं ययातिः पृथिवीपतिः ।
        पुत्रं शप्त्वा महाराजस्तया सार्द्धं महायशाः ।१५।

        रमते सुखभोगेन विष्णोर्ध्यानेन तत्परः ।
        अश्रुबिंदुमतीसा च तेन सार्द्धं सुलोचना ।१६।

        बुभुजे चारुसर्वांगी पुण्यान्भोगान्मनोनुगान् ।
        एवं कालो गतस्तस्य ययातेस्तु महात्मनः ।१७।

        अक्षया निर्जराः सर्वा अपरास्तु प्रजास्तथा ।
        सर्वे लोका महाभाग विष्णुध्यानपरायणाः ।१८।

        तपसा सत्यभावेन विष्णोर्ध्यानेन पिप्पल ।
        सर्वे लोका महाभाग सुखिनः साधुसेवकाः ।१९।

        अध्याय- 80 -ययाति के कहने से जब यदु ने अपनी दौंनो माताओं (देवयानी- और शर्मिष्ठा) को मारने से मना कर दिया तब ययाति यदु को शाप दिया ।

        पिप्पला ने कहा :

        1-2. हे ब्राह्मण श्रेष्ठ , जब राजा ( ययाति ) ने कामदेव की पुत्री से विवाह किया, तो उनकी दो पूर्व, बहुत शुभ, पत्नियों, अर्थात्। कुलीन देवयानी और वृषपर्वन् की पुत्री शर्मिष्ठा क्या किया ? दोनों का सारा वृत्तान्त बताओ।

        सुकर्मन ने कहा :

        3-9. जब वह राजा कामदेव की पुत्री को अपने घर ले गया, तो वह उच्च विचार वाली देवयानी (उसके साथ) बहुत प्रतिद्वंद्विता करने लगी। "इस कारण आकुलमन वाले राजा ययाति ने क्रोध के वशीभूत होकर अपने दो पुत्रों (अर्थात तुरुवसु और यदु ) को श्राप दे दिया। जो देवयानी नामक बड़ी रानी से उत्पन्न हुए थे" मनस्विनी देवयानी ने शर्मिष्ठा को बुलाकर उससे सारी बाते कहीं। तब रूप, तेज और दान के द्वारा शर्मिष्ठा और देवयानी  उस अश्रुुबिन्दुमती के साथ अत्यधिक प्रतिस्पर्धा करने लगीं। तब कामदेव की पुत्री ने  उनकी  इस प्रतिस्पर्द्धा को जान लिया। तभी उसने राजा को सारी बात बता दी, हे ब्राह्मण! तब क्रोधित होकर महान राजा ने यदु को बुलाया और उनसे कहा:

         “जाओ और शर्मिष्ठा और शुक्र की बेटी (देवयानी) को मार डालो । 

        हे पुत्र, यदि तुम्हें सुख की परवाह है तो वही करो जो मुझे सबसे प्रिय है।” अपने पिता के ये वचन सुनकर यदु ने अपने पिता, राजाओं के स्वामी, को उत्तर दिया:

        9-14. “हे घमंडी पिता, मैं अपराधबोध से मुक्त होकर इन दोनों माताओं को नहीं मारूंगा। वेदों के ज्ञाता लोगों ने अपनी माता की हत्या को महापाप बताया है। 

        इसलिए, हे महान राजा, मैं इन दोनों माताओं को नहीं मारूंगा। हे महान राजा, (भले ही) यदि एक माँ, एक बहन या एक बेटी पर सौ दोष लगें, तो उसे कभी भी बेटों या भाइयों द्वारा नहीं मारा जाना चाहिए।

        यह जानकर, हे महान राजा, मैं (इन) दोनों माताओं को कभी नहीं मारूंगा। उस समय यदु की बातें सुनकर राजा ययाति क्रोधित हो गये।

        पृथ्वी के स्वामी ययाति ने तब अपने पुत्र को शाप दिया: और कहा "चूंकि तुमने (मेरे) आदेश की अवज्ञा की है, तुम एक पापी के समान हो, मेरे शाप से प्रदूषित हो, तुम मातृभक्त ही बने रहो अपनी माँ के अंश का आनंद लो"।

        ******************

        15-19. अपने पुत्र यदु से इस प्रकार बात करते हुए, पृथ्वी के स्वामी, ययाति, महान प्रतापी राजा, ने अपने पुत्र  यदु को शाप दे दिया, और पूरी तरह से विष्णु के प्रति समर्पित न होकर , कामदेव की पुत्री अश्रबिन्दुमती के  साथ सुख भोगा।

        आकर्षक नेत्रों वाली और सभी अंगों में सुंदर अश्रुबिन्दुमती ने उसके साथ अपनी इच्छानुसार सभी सुंदर भोगों का आनंद लिया। 

        इस प्रकार उस श्रेष्ठ ययाति ने अपना समय व्यतीत किया। अन्य सभी विषय बिना किसी हानि या बिना बुढ़ापे के थे; सभी लोग पूरी तरह से गौरवशाली विष्णु के ध्यान के प्रति समर्पित थे।हे महान पिप्पल , सभी लोग प्रसन्न थे और उन्होंने तपस्या, सत्यता और विष्णु के ध्यान के माध्यम से भलाई की।

        __________

        पद्मपुराणम्/खण्डः २ (भूमिखण्डःअध्यायः81-)
          →

                        " सुकर्मोवाच-
        यथेंद्रोसौ महाप्राज्ञः सदा भीतो महात्मनः।
        ययातेर्विक्रमं दृष्ट्वा दानपुण्यादिकं बहु ।१।

        मेनकां प्रेषयामास अप्सरां दूतकर्मणि ।
        गच्छ भद्रे महाभागे ममादेशं वदस्व हि ।२।

        कामकन्यामितो गत्वा देवराजवचो वद।
        येनकेनाप्युपायेन राजानं त्वमिहानय ।३।

        एवं श्रुत्वा गता सा च मेनका तत्र प्रेषिता ।
        समाचष्ट तु तत्सर्वं देवराजस्य भाषितम् ।४।

        एवमुक्ता गता सा च मेनका तत्प्रचोदिता ।
        गतायां मेनकायां तु रतिपुत्री मनस्विनी ।५।

        राजानं धर्मसंकेतं प्रत्युवाच यशस्विनी ।
        राजंस्त्वयाहमानीता सत्यवाक्येन वै पुरा।६।

        स्वकरश्चांतरे दत्तो भवनं च समाहृता ।
        यद्यद्वदाम्यहं राजंस्तत्तत्कार्यं हि वै त्वया।७।

        तदेवं हि त्वया वीर न कृतं भाषितं मम ।
        त्वामेवं तु परित्यक्ष्ये यास्यामि पितृमंदिरम्।८।

                            राजोवाच-
        यथोक्तं हि त्वया भद्रे तत्ते कर्त्ता न संशयः ।
        असाध्यं तु परित्यज्य साध्यं देवि वदस्व मे।९।

                      "अश्रुबिंदुमत्युवाच-
        एतदर्थे महीकांत भवानिह मया वृतः ।
        सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वधर्मसमन्वितः।१०।

        सर्वं साध्यमिति ज्ञात्वा सर्वधर्तारमेव च ।
        कर्त्तारं सर्वधर्माणां स्रष्टारं पुण्यकर्मणाम्।११।

        त्रैलोक्यसाधकं ज्ञात्वा त्रैलोक्येऽप्रतिमं च वै।
        विष्णुभक्तमहं जाने वैष्णवानां महावरम् ।१२।

        इत्याशया मया भर्त्ता भवानंगीकृतः पुरा।
        यस्य विष्णुप्रसादोऽस्ति स सर्वत्र परिव्रजेत् ।१३।

        दुर्लभं नास्ति राजेंद्र त्रैलोक्ये सचराचरे ।
        सर्वेष्वेव सुलोकेषु विद्यते तव सुव्रत।१४।

        विष्णोश्चैव प्रसादेन गगने गतिरुत्तमा ।
        मर्त्यलोकं समासाद्य त्वयैव वसुधाधिप।१५।

        जरापलितहीनास्तु मृत्युहीना जनाः कृताः ।
        गृहद्वारेषु सर्वेषु मर्त्यानां च नरर्षभ।१६।

        कल्पद्रुमा अनेकाश्च त्वयैव परिकल्पिताः ।
        येषां गृहेषु मर्त्यानां मुनयः कामधेनवः ।१७।

        त्वयैव प्रेषिता राजन्स्थिरीभूताः सदा कृताः ।
        सुखिनः सर्वकामैश्च मानवाश्च त्वया कृताः।१८।

        गृहैकमध्ये साहस्रं कुलीनानां प्रदृश्यते ।
        एवं वंशविवृद्धिश्च मानवानां त्वया कृता।१९।

        यमस्यापि विरोधेन इंद्रस्य च नरोत्तम।
        व्याधिपापविहीनस्तु मर्त्यलोकस्त्वया कृतः ।२०।

        स्वतेजसाहंकारेण स्वर्गरूपं तु भूतलम् ।
        दर्शितं हि महाराज त्वत्समो नास्ति भूपतिः।२१।

        नरो नैव प्रसूतो हि नोत्पत्स्यति भवादृशः ।
        भवंतमित्यहं जाने सर्वधर्मप्रभाकरम् ।२२।

        तस्मान्मया कृतो भर्ता वदस्वैवं ममाग्रतः ।
        नर्ममुक्त्वा नृपेंद्र त्वं वद सत्यं ममाग्रतः।२३।

        यदि ते सत्यमस्तीह धर्ममस्ति नराधिप ।
        देवलोकेषु मे नास्ति गगने गतिरुत्तमा ।२४।

        सत्यं त्यक्त्वा यदा च त्वं नैव स्वर्गं गमिष्यसि।
        तदा कूटं तव वचो भविष्यति न संशयः।२५।

        पूर्वंकृतं हि यच्छ्रेयो भस्मीभूतं भविष्यति ।
                           "राजोवाच-
        सत्यमुक्तं त्वया भद्रे साध्यासाध्यं न चास्ति मे।२६।

        सर्वंसाध्यं सुलोकं मे सुप्रसादाज्जगत्पते।
        स्वर्गं देवि यतो नैमि तत्र मे कारणं शृणु ।२७।

        आगंतुं तु न दास्यंति लोके मर्त्ये च देवताः ।
        ततो मे मानवाः सर्वे प्रजाः सर्वा वरानने ।२८।

        मृत्युयुक्ता भविष्यंति मया हीना न संशयः ।
        गंतुं स्वर्गं न वाञ्छामि सत्यमुक्तं वरानने ।२९।

                       "देव्युवाच-।
        लोकान्दृष्ट्वा महाराज आगमिष्यसि वै पुनः ।
        पूरयस्व ममाद्यत्वं जातां श्रद्धां महातुलाम् ।३०।

                       "राजोवाच-
        सर्वमेवं करिष्यामि यत्त्वयोक्तं न संशयः ।
        समालोक्य महातेजा ययातिर्नहुषात्मजः ।३१।

        एवमुक्त्वा प्रियां राजा चिंतयामास वै तदा ।
        अंतर्जलचरो मत्स्यः सोपि जाले न बध्यते ।३२।

        मरुत्समानवेगोपि मृगः प्राप्नोति बंधनम् ।
        योजनानां सहस्रस्थमामिषं वीक्षते खगः ।३३।

        सकंठलग्नपाशं च न पश्येद्दैवमोहितः ।
        कालः समविषमकृत्कालः सन्मानहानिदः ।३४।

        परिभावकरः कालो यत्रकुत्रापि तिष्ठतः ।
        नरं करोति दातारं याचितारं च वै पुनः ।३५।

        भूतानि स्थावरादीनि दिवि वा यदि वा भुवि ।
        सर्वं कलयते कालः कालो ह्येक इदं जगत् ।३६।

        अनादिनिधनो धाता जगतः कारणं परम् ।
        लोकान्कालः स पचति वृक्षे फलमिवाहितम् ।३७।

        न मंत्रा न तपो दानं न मित्राणि न बांधवाः ।
        शक्नुवंति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम् ।३८।

        त्रयः कालकृताः पाशाः शक्यंते नातिवर्तितुम् ।
        विवाहो जन्ममरणं यदा यत्र तु येन च ।३९।

        यथा जलधरा व्योम्नि भ्राम्यंते मातरिश्वना ।
        तथेदं कर्मयुक्तेन कालेन भ्राम्यते जगत् ।४०।

                       "सुकर्मोवाच- 
        कालोऽयं कर्मयुक्तस्तु यो नरैः समुपासितः ।
        कालस्तु प्रेरयेत्कर्म न तं कालः करोति सः।४१।

        उपद्रवा घातदोषाः सर्पाश्च व्याधयस्ततः ।
        सर्वे कर्मनियुक्तास्ते प्रचरंति च मानुषे ।४२।

        सुखस्य हेतवो ये च उपायाः पुण्यमिश्रिताः ।
        ते सर्वे कर्मसंयुक्ता न पश्येयुः शुभाशुभम् ।४३।

        कर्मदा यदि वा लोके कर्मसम्बधि बान्धवाः ।
        कर्माणि चोदयंतीह पुरुषं सुखदुःखयोः ।४४।

        सुवर्णं रजतं वापि यथा रूपं विनिश्चितम् ।
        तथा निबध्यते जंतुः स्वकर्मणि वशानुगः ।४५।

        पञ्चैतानीह सृज्यंते गर्भस्थस्यैव देहिनः ।
        आयुः कर्म च वित्तं च विद्यानिधनमेव च ।४६।

        यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद्यदिच्छति ।
        तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ।४७।

        देवत्वमथ मानुष्यं पशुत्वं पक्षिता तथा ।
        तिर्यक्त्वं स्थावरत्वं च प्राप्यते च स्वकर्मभिः।४८।

        स एव तत्तथा भुंक्ते नित्यं विहितमात्मना ।
        आत्मना विहितं दुःखं चात्मना विहितं सुखम्। ४९।

        गर्भशय्यामुपादाय भुंजते पूर्वदैहिकम् ।
        संत्यजंति स्वकं कर्म न क्वचित्पुरुषा भुवि।५०।

        बलेन प्रज्ञया वापि समर्थाः कर्तुमन्यथा ।
        सुकृतान्युपभुंजंति दुःखानि च सुखानि च।५१।

        हेतुं प्राप्य नरो नित्यं कर्मबंधैस्तु बध्यते ।
        यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विंदति मातरम्।५२।

        तथा शुभाशुभं कर्म कर्तारमनुगच्छति ।
        उपभोगादृते यस्य नाश एव न विद्यते ।५३।

        प्राक्तनं बंधनं कर्म कोन्यथा कर्तुमर्हति ।
        सुशीघ्रमपि धावंतं विधानमनुधावति ।५४।

        शेते सह शयानेन पुरा कर्म यथाकृतम् ।
        उपतिष्ठति तिष्ठंतं गच्छंतमनुगच्छति ।५५।

        करोति कुर्वतः कर्मच्छायेवानु विधीयते ।
        यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम् ।५६।

        तद्वत्कर्म च कर्ता च सुसंबद्धौ परस्परम् ।
        ग्रहा रोगा विषाः सर्पाः शाकिन्यो राक्षसास्तथा ५७।

        पीडयन्ति नरं पश्चात्पीडितं पूर्वकर्मणा ।
        येन यत्रोपभोक्तव्यं सुखं वा दुःखमेव वा ।५८।

        स तत्र बद्ध्वा रज्ज्वा वै बलाद्दैवेन नीयते ।
        दैवः प्रभुर्हि भूतानां सुखदुःखोपपादने ।५९।

        अन्यथा चिंत्यते कर्म जाग्रता स्वपतापि वा ।
        अन्यथा स तथा प्राज्ञ दैव एवं जिघांसति ।६०।

        शस्त्राग्नि विष दुर्गेभ्यो रक्षितव्यं च रक्षति ।
        अरक्षितं भवेत्सत्यं तदेवं दैवरक्षितम् ।६१।

        दैवेन नाशितं यत्तु तस्य रक्षा न दृश्यते ।
        यथा पृथिव्यां बीजानि उप्तानि च धनानि च।६२।

        तथैवात्मनि कर्माणि तिष्ठंति प्रभवंति च ।
        तैलक्षयाद्यथा दीपो निर्वाणमधिगच्छति ।६३।

        कर्मक्षयात्तथा जंतुः शरीरान्नाशमृच्छति ।
        कर्मक्षयात्तथा मृत्युस्तत्त्वविद्भिरुदाहृतः।६४।

        विविधाः प्राणिनस्तस्य मृत्यो रोगाश्च हेतवः ।
        तथा मम विपाकोयं पूर्वं कृतस्य नान्यथा ।६५।

        संप्राप्तो नात्र संदेहः स्त्रीरूपोऽयं न संशयः ।
        क्व मे गेहं समायाता नाटका नटनर्तकाः ।६६।

        तेषां संगप्रसंगेन जरा देहं समाश्रिता ।
        सर्वं कर्मकृतं मन्ये यन्मे संभावितं ध्रुवम् ।६७।

        तस्मात्कर्मप्रधानं च उपायाश्च निरर्थकाः ।
        पुरा वै देवराजेन मदर्थे दूतसत्तमः ।६८।

        प्रेषितो मातलिर्नाम न कृतं तस्य तद्वचः ।
        तस्य कर्मविपाकोऽयं दृश्यते सांप्रतं मम ।६९।

        इति चिंतापरो भूत्वा दुःखेन महतान्वितः ।
        यद्यस्याहि वचः प्रीत्या न करोमि हि सर्वथा ।७०।

        सत्यधर्मावुभावेतौ यास्यतस्तौ न संशयः ।
        सदृशं च समायातं यद्दृष्टं मम कर्मणा ।७१।

        भविष्यति न संदेहो दैवो हि दुरतिक्रमः ।
        एवं चिंतापरो भूत्वा ययातिः पृथिवीपतिः। ७२।

        कृष्णं क्लेशापहं देवं जगाम शरणं हरिम् ।
        ध्यात्वा नत्वा ततः स्तुत्वा मनसा मधुसूदनम् ।७३।

        त्राहि मां शरणं प्राप्तस्त्वामहं कमलाप्रिय ।७४।


        अध्याय 81 - नियति अप्रतिरोध्य है

        सुकर्मन ने कहा :

        1-3. अत्यंत बुद्धिमान इंद्र , जो हमेशा कुलीन ययाति से डरते थे , उन्होंने उनके वीरता और उपहार देने जैसे कई सराहनीय कार्यों को देखकर, स्वर्ग की अप्सरा मेनका को एक दूत के रूप में कार्य करने के लिए भेजा

         (उसने उससे कहा:) "हे अच्छे और प्रतिष्ठित व्यक्ति मातलि!, जाओ और मेरा आदेश बताओ । यहां से जाकर कामदेव की पुत्री से देवताओं के स्वामी (मेरे) ये शब्द (अर्थात आदेश) कहो:  वे राजा ययाति को'राजा को किसी भी तरह यहां ले आऐं।''

        4. यह सुनकर वह मेनका (इंद्र द्वारा) भेजी हुई वहां गयी; और जो कुछ देवताओं के प्रभु ने कहा था, वह सब उसे बता दिया।

        5-8. इस प्रकार उसे यह बताने के बाद कि मेनका, उसके द्वारा निर्देशित (यानी कामदेव की बेटी) के पास चली गई  जब मेनका चली गई, और अश्रुबिन्दुमती राजा ययाति के पास गयी तो रति की उस उच्च विचारधारा वाली, गौरवशाली बेटी अश्रुबिन्दुमती ने राजा को वैध समझौते की बात कही: “हे राजा, आपने पहले सच्ची वाणी के साथ मुझे (यहाँ) लाया था; इस बीच तू ने मुझे अपना हाथ दिया, और मुझे अपने निवास में ले आया। हे राजा, तुम्हें यहाँ (अर्थात अभी) वही करना होगा जो मैं तुमसे कहती हूँ। हे वीर, जो मैं ने तुझ से कहा था, वह तू ने नहीं किया; मैं तुम्हें त्याग कर अपने पिता के घर चली जाऊँगी।”

        राजा ने कहा :

        9. हे भद्रे!, जो कुछ तू ने मुझ से कहा है, मैं अवश्य वैसा ही करूंगा। हे आदरणीय नारी, जो अप्राप्य है उसे छोड़कर (अर्थात् न बताना) और जो प्राप्य है वह बताओ।

        अश्रुबिन्दुमति ने कहा :

               "अश्रुबिन्दुमत्युवाच-
        एतदर्थे महीकान्त भवानिह मया वृतः ।
        सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वधर्मसमन्वितः ।१०।

        सर्वं साध्यमिति ज्ञात्वा सर्वधर्तारमेव च ।
        कर्त्तारं सर्वधर्माणां स्रष्टारं पुण्यकर्मणाम्।११।

        10-11.  इस प्रयोजन के लिए, हे पृथ्वी के स्वामी, मैं तुम्हें विवाह के लिए चुनती हूँ, यह जानते हुए कि तुम सभी (शुभ) चिह्नों वाले और सभी गुणों से संपन्न हो, और यह जानते हुए कि तुम सब कुछ पूरा करोगे, हर चीज का समर्थन करोगे, सभी अच्छे उपयोग करोगे और सृजन करोगे ( अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान करो, और तीनों लोकों को प्राप्त करोगे, और यह जानोगे कि तुम तीनों लोकों में अतुलनीय हो। मैं जानती हूं कि आप एक भक्त हैं और विष्णु के अनुयायियों में सर्वश्रेष्ठ हैं । इसी आशा से मैंने पहले तुम्हें अपना पति समझ लिया था। जिस पर विष्णु की कृपा होगी वह हर जगह विचरण करेगा। हे राजाओं के स्वामी, ऐसा कुछ भी नहीं है जो (आपके द्वारा) तीनों लोकों में - स्थावर या (स्थिर रहने वाला)- में पूरा न किया जा सके। अच्छे व्रत के कारण आपके लिए सभी लोकों में सब कुछ (प्राप्त करने योग्य) है। विष्णु की कृपा से ही तुम आकाश में स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकते हो। नश्वर संसार में आकर, हे पृथ्वी के स्वामी, आपने लोगों को बुढ़ापे, सफ़ेद बालों और मृत्यु से मुक्त किया है। हे राजन, आपने स्वयं ही मनुष्यों के सभी घरों के द्वारों के पास बहुत से इच्छा फल देने वाले वृक्ष लगाए हैं।हे राजन, आपने स्वयं मनुष्यों के घरों में ऋषियों को भेजा है और उनके घरों में इच्छा देने वाली गायों को हमेशा दृढ़ता से बसाया है। तुमने मनुष्यों की सब अभिलाषाएं पूरी करके उन्हें प्रसन्न किया है। एक घर में हजारों कुलीन लोग देखे जाते हैं।

        - 19-26-इस प्रकार तुमने यमराज और इन्द्र के विरोध के बावजूद भी मनुष्य जाति को बढ़ाया है। हे ययाति आपने नश्वर संसार को रोग और पापों से मुक्त कर दिया)। हे महान राजा  आपने अपने पराक्रम और स्वाभिमान से पृथ्वी को स्वर्ग बना दिया- आपके समान इस संसार में दूसरा कोई राजा नहीं हुआ - और ना ही भविष्य में कभी होगा। मैं तुम्हें सम्पूर्ण धर्म का प्रकाशक मानती हूँ। इस लिए मैं कामदेव की पुत्री अश्रुबिन्दुमती तुम्हें अपना पति चुनती हूँ।

         हे राजाओं के स्वामी, मजाक छोड़ कर मेरे सामने सत्य बोलो। हे राजन, यदि तुममें सत्य और धर्मपरायणता है तो सच बोलो। "मैं दिव्य लोकों में विचरण नहीं करती, न ही आकाश में स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकती हूँ"। जब तुम सत्य को त्यागकर (ऐसा कहते हो) तो कभी स्वर्ग में नहीं जाओगे; तुम्हारी बातें निश्चय झूठी होंगी; और पहले किए गए सभी अच्छे काम राख में मिल जाएंगे।

        राजा ने कहा :

        26-29. हे सुन्दरी, आपने सच कहा, मेरे लिए अप्राप्य जैसा कुछ भी नहीं है। जगत् के स्वामी की कृपा से मेरे लिए सब कुछ प्राप्य है। हे आदरणीय नारी, मैं  जिस कारण से स्वर्ग नहीं जा रहा हूँ, उसका कारण सुनो।

        वे देवताओं को नश्वर संसार में जाने की अनुमति नहीं देंगे; परिणामस्वरूप सभी मनुष्य-मेरी प्रजा-मेरे द्वारा त्याग दिए जाने पर मृत्यु को प्राप्त होंगे; 

        इसमें कोई संदेह नहीं है, हे सुन्दरी! मुझे स्वर्ग जाने की इच्छा नहीं है; हे सुन्दरी, मैं ने तुझ से सत्य कहा है।

        अश्रुबिन्दुमती ने कहा :

        30. हे राजा, तुम उन सभी लोकों को देखकर फिर  पुन: पृथ्वी पर लौट आएगे। आज मेरी अतुलनीय प्रबल इच्छा पूरी करो.

        राजा ने कहा :

        31-40. आपने जो कुछ कहा है मैं अवश्य वह सब करूँगा। नहुष के पुत्र अत्यंत तेजस्वी राजा ययाति ने (इस प्रकार) देखा और अपनी प्रियतमा से इस प्रकार कहा, फिर सोचा: 'एक मछली पानी में घूमती हुई भी जाल में बंधी हुई है (अर्थात फंसी हुई है)। वायु के समान वेग वाला मृग भी बंधा हुआ है। एक हजार योजन की दूरी पर होने पर भी पक्षी शिकार को देख लेता है । नियति के बहकावे में आकर यह अपनी गर्दन पर लटका हुआ फंदा नहीं देख पाता। नियति अच्छी और बुरी चीजें लेकर आती है। 

        नियति सम्मान को नष्ट कर देती है. नियति जहां चाहे वहाँ  रहकर अपमान भी कराती है। यह मनुष्य को दाता या याचक बनाती है। नियति सब कुछ धारण करती है - सभी गतिहीन और स्वर्ग या पृथ्वी पर रहने वाले अन्य प्राणी। इस संसार का कर्म ही एकमात्र भाग्यविधायक है।

        यह उत्पत्ति और मृत्यु से रहित है और संसार का सबसे बड़ा कारण है।

        नियति दुनिया भर को उसी तरह पकाती है जैसे पेड़ पर लगे फल को समय पकाता है।

        भूतानि स्थावरादीनि दिवि वा यदि वा भुवि ।
        सर्वं कलयते कालः कालो ह्येक इदं जगत् ।३६।

        अनादिनिधनो धाता जगतः कारणं परम् ।
        लोकान्कालः स पचति वृक्षे फलमिवाहितम् ।३७।

        न मन्त्रा न तपो दानं न मित्राणि न बान्धवाः ।
        शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम् ।३८।

        त्रयः कालकृताः पाशाः शक्यन्ते नातिवर्तितुम्।
        विवाहो जन्ममरणं यदा यत्र तु येन च ।३९।

        यथा जलधरा व्योम्नि भ्राम्यन्ते मातरिश्वना ।
        तथेदं कर्मयुक्तेन कालेन भ्राम्यते जगत् ।४०।

                         "सुकर्मोवाच- 
        कालोऽयं कर्मयुक्तस्तु यो नरैः समुपासितः ।
        कालस्तु प्रेरयेत्कर्म न तं कालः करोति सः।४१।

        भजन, तप, दान, मित्र या सम्बन्धी भी भाग्य से पीड़ित मनुष्य की रक्षा करने में समर्थ नहीं होते।नियति के तीन बंधनों पर काबू पाना संभव नहीं है: विवाह, जन्म और मृत्यु - किसी को ये कब और कहाँ मिलेंगे, और किसके साथ या किसके माध्यम से मिलेंगे। 

        जैसे आकाश में बादल हवा से चलते हैं, वैसे ही संसार (प्राणियों के) कर्मों (फलों) के साथ मिलकर भाग्य से चलता है।

        सुकर्मन ने कहा :

        41-67. लेकिन नियति, जो कर्म (कर्म) के साथ संयुक्त है, मनुष्यों द्वारा पूजनीय है, (केवल) कर्म (कर्मों के फल) के लिए आग्रह करती है, और इसे बनाती नहीं है। मानव (संसार) में विपत्तियाँ, विपत्तियाँ, सर्प और बीमारियाँ (किसी के) कर्मों के अनुसार ही चलती हैं। जो सुख के कारण और साधन हैं, वे सब पुण्य से मिश्रित होकर (कर्मों के) फल से संयुक्त हैं। वे शुभ और (क्या है) अशुभ नहीं देखेंगे (अर्थात् इसकी परवाह नहीं करेंगे)।(अस्पष्ट!) कर्मों के फल से जुड़े रिश्तेदार उनका आदान-प्रदान कर सकते हैं [1] ; परन्तु (अकेले) कर्मों का फल ही मनुष्यों को इस संसार में सुख और दुःख की ओर ले जाता है। जिस प्रकार सोने या चांदी का स्वभाव निश्चित होता है, उसी प्रकार जीव अपने कर्मों के अनुसार बंधा होता है। मनुष्य जब (अपनी माँ के) गर्भ में होता है, तब ये पाँच उत्पन्न होते हैं (अर्थात निर्णय लेते हैं): उसका जीवन (अर्थात दीर्घायु), कर्म, धन, विद्या और मृत्यु। जिस प्रकार कुम्हार निर्जीव गांठ से जो चाहे बना देता है, उसी प्रकार पहले किए गए कर्म कर्ता के पीछे चले जाते हैं। कोई अपने कर्मों के अनुसार देवता, या मनुष्य, या जानवर, या पक्षी, या निचला जानवर, या स्थिर वस्तु बन जाता है।वह हमेशा उसी के अनुसार आनंद लेता है जो उसके द्वारा पूरा किया जाता है - दुख उसके अपने कार्यों से उत्पन्न होता है; ख़ुशी व्यक्ति के अपने कर्मों से मिलती है। गर्भ शैया प्राप्त करके वह अपने पूर्व शरीर के कर्मों (अर्थात पूर्व जन्म में किये गये कर्मों) का फल भोगता है। पृथ्वी पर मनुष्य अपने कर्मों का फल कभी नहीं त्यागते (अर्थात् कभी नहीं छोड़ सकते)। वे

        अपनी शक्ति या बुद्धि से उन्हें बदलने में सक्षम नहीं हैं। वे पुण्य कर्मों, दुखों और सुखों का आनंद लेते हैं। किसी कारण तक पहुंचकर (अर्थात् कारण से) मनुष्य सदैव अपने कर्मों के बंधन से बंधा रहता है। 

        जैसे हजारों गायों में से एक बछड़ा अपनी माँ को खोज लेता है, उसी प्रकार शुभ या अशुभ कर्मों का फल - जो 'भोग (या दुःख) के अलावा नष्ट नहीं होता है - अपने कर्ता के पीछे-पीछे जाता है। पूर्व जन्म में किये गये कर्म का फल कौन बदल सकता है? जो बहुत तेज दौड़ता है, उसके कर्म का फल भी उसका पीछा करता है। पूर्व जन्म के कर्मों का फल, जैसा कि किया गया था, सोने वाले के साथ सोता है। यह उसके साथ खड़ा रहता है जो खड़ा रहता है, और जो चलता है उसका अनुसरण करता है। जो कार्य करता है, उसके कर्म का फल; यह उसकी छाया की तरह उसका पीछा करता है।

        जिस प्रकार छाया और प्रकाश सदैव एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं, उसी प्रकार एक कार्य और उसके कर्ता आपस में जुड़े होते हैं। ग्रह, रोग, विषैले साँप, राक्षसियाँ [2] तथा राक्षस सबसे पहले अपने ही कर्मों से पीड़ित मनुष्य को कष्ट देते हैं।जिसे किसी स्थान पर सुख भोगना होता है या दुख भोगना होता है, वह वहां रस्सी से बंधा होता है, भाग्य उसे बलपूर्वक ले जाता है। सुख या दुख देने में भाग्य ही प्राणियों का स्वामी होता है। हे बुद्धिमान, जागते या सोते रहने से एक प्रकार से कर्म की कल्पना की जाती है और नियति उसे दूसरा मोड़ देकर नष्ट कर देती है। 

        यह उसकी रक्षा करता है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए (अर्थात जिसकी वह रक्षा करना चाहता है) उसे हथियार, आग, जहर या कठिनाइयों से बचाता है। सचमुच जिसकी रक्षा नहीं की जा सकती, नियति इसी प्रकार उसकी रक्षा करती है।जो नियति द्वारा नष्ट कर दिया जाता है, उसकी रक्षा कभी नहीं की जा सकती। जैसे भूमि में बोए गए बीज और धन पहले (सुप्त) रहते हैं और (फिर) बढ़ते (सक्रिय) होते हैं, उसी प्रकार आत्मा में कर्म (अक्षुण्ण) रहते हैं और (फिर) सक्रिय हो जाते हैं। जैसे तेल के समाप्त हो जाने से अग्नि बुझ जाती है, उसी प्रकार कर्मों के फल के समाप्त हो जाने से जीव अपने शरीर से नाश को प्राप्त हो जाता है (अर्थात् चला जाता है); 

        क्योंकि जो लोग सत्य को जानते हैं वे कहते हैं कि मृत्यु (किसी के) कर्मों के (फलों की) समाप्ति के कारण होती है। उसकी मृत्यु का कारण विभिन्न जीव-जंतु और रोग हैं। 'इस प्रकार यह मेरे पूर्व अस्तित्व के कर्मों का पकना है। यह अन्यथा नहीं है. यह (अब) निश्चित रूप से इस महिला के रूप में (मेरे पास) आया है; इसके बारे में कोई संदेह नहीं है। अभिनेताओं, नर्तकों और बार्डों को मेरे घर आना पड़ता था; उनके सम्पर्क से मेरे शरीर में बुढ़ापा आ गया है। मेरा मानना ​​है कि सब कुछ (अर्थात्) किसी के (पूर्व अस्तित्व में) कर्मों के कारण होता है, क्योंकि यह (अब) निश्चित रूप से उत्पन्न हो चुका है।

        68 (क). इसलिये कर्म ही प्रधान हैं; प्रयास बेकार हैं.

        68 (ख)-74. पूर्वकाल में देवताओं के राजा ने मुझे (स्वर्ग में) ले जाने के लिए मातलि नामक सर्वश्रेष्ठ दूत भेजा था । मैंने उनकी बात (अर्थात जो उन्होंने मुझसे कहा था) वैसा नहीं किया। अब मैं उन कर्मों का पकना देख रहा हूं।' वह (ययाति) इस प्रकार चिंता से भरा हुआ था, और महान दुःख से उबर गया था। (उसने सोचा:) 'यदि मैं ख़ुशी से वह नहीं करूँगा जो वह कहती है, तो सत्यता और धर्मपरायणता दोनों चली जाएँगी (अर्थात नष्ट हो जाएँ); इसके बारे में कोई संदेह नहीं है। मेरे कर्मों के अनुसार जो निश्चय हुआ वह आ गया; (जो पूर्वनिर्धारित है) अवश्य घटित होगा। नियति पर विजय पाना कठिन है।' पृथ्वी के स्वामी ययाति इस प्रकार विचार में लीन थे।उन्होंने संकट हरने वाले कृष्ण , हरि की शरण मांगी , उनका ध्यान करके, उन्हें नमस्कार किया और उनकी स्तुति की: 'हे आप जिन्हें लक्ष्मी प्रिय हैं, मेरी रक्षा करें जिन्होंने आपकी शरण ली है।'

        संदर्भ: टिप्पणी

        [1] :"कर्मदायादिवाणोके" संभवतः एक भ्रष्ट वाचन है।

        [2] :साकिनी - एक प्रकार की महिला, दुर्गा की परिचरिका को राक्षसी या परी माना जाता है।

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          पद्मपुराणम्/खण्डः २ (भूमिखण्डःअध्याय-82 नीचे देखे-)


                      "सुकर्मोवाच-
        एवं चिन्तयते यावद्राजा परमधार्मिकः ।
        तावत्प्रोवाच सा देवी रतिपुत्री वरानना ।१।

        किमु चिन्तयसे राजंस्त्वमिहैव महामते ।
        प्रायेणापि स्त्रियः सर्वाश्चपलाः स्युर्न संशयः ।२।

        नाहं चापल्यभावेन त्वामेवं प्रविचालये ।
        नाहं हि कारयाम्यद्य भवत्पार्श्वं नृपोत्तम ।३।

        अन्यस्त्रियो यथा लोके चपलत्वाद्वदंति च ।
        अकार्यं राजराजेंद्र लोभान्मोहाच्च लंपटाः ।४।

        लोकानां दर्शनायैव जाता श्रद्धा ममोरसि ।
        देवानां दर्शनं पुण्यं दुर्लभं हि सुमानुषैः ।५।

        तेषां च दर्शनं राजन्कारयामि वदस्व मे ।
        दोषं पापकरं यत्तु मत्संगादिह चेद्भवेत् ।६।

        एवं चिंतयसे दुःखं यथान्यः प्राकृतो जनः ।
        महाभयाद्यथाभीतो मोहगर्ते गतो यथा ।७।

        त्यज चिंतां महाराज न गंतव्यं त्वया दिवि ।
        येन ते जायते दुःखं तन्न कार्यं मया कदा ।८।

        एवमुक्तस्तथा राजा तामुवाच वराननाम् ।
        चिंतितं यन्मया देवि तच्छृणुष्व हि सांप्रतम् ।९।

        मानभंगो मया दृष्टो नैव स्वस्य मनःप्रिये ।
        मयि स्वर्गं गते कांते प्रजा दीना भविष्यति।१०।

        त्रासयिष्यति दुष्टात्मा यमस्तु व्याधिभिः प्रजाः।
        त्वया सार्धं प्रयास्यामि स्वर्गलोकं वरानने ।११।

        एवमाभाष्य तां राजा समाहूय सुतोत्तमम् ।
        पूरुं तं सर्वधर्मज्ञं जरायुक्तं महामतिम् ।१२।

        एह्येहि सर्वधर्मज्ञ धर्मं जानासि निश्चितम् ।
        ममाज्ञया हि धर्मात्मन्धर्मः संपालितस्त्वया ।१३।

        जरा मे दीयतां तात तारुण्यं गृह्यतां पुनः ।
        राज्यं कुरु ममेदं त्वं सकोशबलवाहनम् ।१४।

        आसमुद्रां प्रभुंक्ष्व त्वं रत्नपूर्णां वसुंधराम् ।
        मया दत्तां महाभाग सग्रामवनपत्तनाम् ।१५।

        प्रजानां पालनं पुण्यं कर्तव्यं च सदानघ ।
        दुष्टानां शासनं नित्यं साधूनां परिपालनम् ।१६।

        कर्तव्यं च त्वया वत्स धर्मशास्त्रप्रमाणतः ।
        ब्राह्मणानां महाभाग विधिनापि स्वकर्मणा ।१७।

        भक्त्या च पालनं कार्यं यस्मात्पूज्या जगत्त्रये।पञ्चमे सप्तमे घस्रे कोशं पश्य विपश्चितः।१८।

        बलं च नित्यं संपूज्यं प्रसादधनभोजनैः ।
        चारचक्षुर्भवस्व त्वं नित्यं दानपरो भव ।१९।

        भव स्वनियतो मंत्रे सदा गोप्यः सुपंडितैः ।
        नियतात्मा भव स्वत्वं मा गच्छ मृगयां सुत।२०।

        विश्वासः कस्य नो कार्यः स्त्रीषु कोशे महाबले ।
        पात्राणां त्वं तु सर्वेषां कलानां कुरु संग्रहम्।२१।

        यज यज्ञैर्हृषीकेशं पुण्यात्मा भव सर्वदा ।
        प्रजानां कंटकान्सर्वान्मर्दयस्व दिने दिने ।२२।

        प्रजानां वांछितं सर्वमर्पयस्व दिने दिने ।
        प्रजासौख्यं प्रकर्तव्यं प्रजाः पोषय पुत्रक।२३।

        स्वको वंशः प्रकर्तव्यः परदारेषु मा कृथाः।
        मतिं दुष्टां परस्वेषु पूर्वानन्वेहि सर्वदा ।२४।

        वेदानां हि सदा चिंता शास्त्राणां हि च सर्वदा।
        कुरुष्वैवं सदा वत्स शस्त्राभ्यासरतो भव।२५।

        संतुष्टः सर्वदा वत्स स्वशय्या निरतो भव ।
        गजस्य वाजिनोभ्यासं स्यंदनस्य च सर्वदा ।२६।

        एवमादिश्य तं पुत्रमाशीर्भिरभिनंद्य च ।
        स्वहस्तेन च संस्थाप्य करे दत्तं स्वमायुधम् ।२७।

        स्वां जरां तु समागृह्य दत्त्वा तारुण्यमस्य च ।
        गंतुकामस्ततः स्वर्गं ययातिः पृथिवीपतिः ।२८।

        अध्याय 82 - ययाति ने अपना बुढ़ापा वापस ले लिया

        सुकर्मन ने कहा :

        1-8. जब राजा इस प्रकार सोच में डूबे हुए थे, तब रति की सुंदर पुत्री ने कहा: "हे अत्यंत बुद्धिमान राजा, आप अभी क्या सोच रहे हैं? इसमें कोई शक नहीं कि ज्यादातर महिलाएं चंचल होती हैं। मैं तुम्हें चंचलता से दूर नहीं ले जा रहा हूँ। हे श्रेष्ठ राजा, मैं आज किसी कपटपूर्ण उपाय का उपयोग नहीं कर रही हूं, (बोलकर) जैसा कि अन्य लालची महिलाएं बोलती हैं, कुछ ऐसा जो लालच और भ्रम के माध्यम से नहीं किया जा सकता है। मेरे हृदय में समस्त लोकों को देखने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हो गई है।देवताओं का दर्शन पुण्यदायी है और सज्जनों को भी प्राप्त होना अत्यंत कठिन है। 

        हे राजा, मुझसे कहो कि तुम मुझे देवताओं के दर्शन कराओगे।दूसरे साधारण मनुष्य की भाँति महान् दुःख से भयभीत होकर मोह की खाई में गिरे हुए आप यह सोच रहे हैं कि क्या अब मेरी संगति से कोई महान् पाप होगा। 

        अपनी चिंता छोड़ो; तुम्हें स्वर्ग नहीं जाना चाहिए. मैं ऐसा कभी नहीं करूंगी जिससे तुम्हें दुःख पहुंचे।”

        9-11. राजा ने (उसके द्वारा) संबोधित करते हुए, उस सुंदर महिला से कहा: “हे आदरणीय महिला, अब मैंने जो सोचा है उसे सुनो। मैं (यहाँ) अपना अपमान देखता हूँ, अपने मन की (संतुष्टि) नहीं देखता। हे प्रिय, जब मैं स्वर्ग जाऊंगा, तो मेरी प्रजा असहाय हो जाएगी। दुष्ट मन वाले यमराज मेरी प्रजा को रोगों से परेशान करेंगे। हे सुंदरी, तब  मैं तुम्हारे साथ स्वर्ग क्यों जाऊंगा।

        12-26. इस प्रकार उससे बात करके और अपने सबसे अच्छे बेटे पुरु को बुलाकर , जो वृद्ध और महान बुद्धि वाला था । राजा ने उससे कहा:) "चलो, हे पुरु! तुम जो सभी पारंपरिक अनुष्ठानों को जानते हो, तुम निश्चित रूप से अपना कर्तव्य जानते हो। हे धार्मिक विचारधारा वाले, तुमने मेरे आदेश से धर्मपरायणता बनाए रखी है। हे पुत्र, मुझे (मेरा) बुढ़ापा वापस दे दो, और (अपनी) जवानी वापस ले लो। धन, सेना और वाहनों सहित मेरे इस राज्य की रक्षा करो।

        मेरे द्वारा (तुम्हें) दी गयी रत्नों से भरी पृथ्वी का, गाँवों, वनों और नगरों सहित पालन कर जीवन व्यती करते हुए आनन्द उठाओ।

        हे निष्पाप, तुम्हें पुण्यदायी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए; पवित्र ग्रंथों के आधार पर तुम्हें हमेशा दुष्टों को दंडित करना चाहिए और अच्छे लोगों की रक्षा करनी चाहिए। हे गौरवशाली, आपको अपने कर्मों द्वारा भक्तिपूर्वक और नियमों के अनुसार ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणों की रक्षा करनी चाहिए , क्योंकि वे तीनों लोकों में सम्मान के पात्र हैं। हर पांचवें या सातवें दिन खजाने का निरीक्षण करें और विद्वानों से मिलें। तुम्हें हमेशा अपनी सेना का समर्थन करके और उन्हें धन और भोजन देकर उनका सम्मान करना चाहिए। अपने गुप्तचरों को सदैव अपनी आँखें बनाकर काम में लो और सदैव परोपकार में लगे रहो। अपने परामर्श में हमेशा संयमित रहें, क्योंकि इसकी राज्य की रक्षा हमेशा बहुत बुद्धिमान लोगों द्वारा की जाती है। हे पुत्र, तू सदैव अपने ऊपर नियंत्रण रख; शिकार करने मत जाओ. किसी पर भी भरोसा मत करो - महिलाओं पर, खजाने पर या अपनी महान सेना पर भी। 

        सदैव योग्य व्यक्तियों और सभी कलाओं का संग्रह करें। यज्ञों से विष्णु की अवश्य पूजा करो 

        और सदैव सदाचारी रहो। प्रजा में उपद्रव फैलाने वाले स्रोतों को प्रतिदिन कुचल डालो। प्रतिदिन अपनी प्रजा को वह सब कुछ दो जो वह चाहती है। प्रजा को सुख दो, प्रजा का पालन करो, हे पुत्र ! अपने ही परिवार में (केवल एक महिला अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध) रखें; किसी और की पत्नी के साथ ऐसा न करें. दूसरे के धन के बारे में बुरा मत सोचो; सदैव अपने पूर्वजों का अनुसरण करो। 

        सदैव वेदों और पवित्र ग्रंथों का मनन करो; हे बालक, शस्त्र विद्या के अध्ययन में लग जाओ। हे वत्स!, सदैव सन्तुष्ट रहो और अपनी शय्या (अर्थात् पत्नी) के प्रति समर्पित रहो। सदैव हाथियों, घोड़ों और रथों का अध्ययन करो।”

        27-28. इस प्रकार अपने पुत्र को उपदेश देकर,और  आशीर्वाद देकर अभिनन्दन करके, अपने हाथ से उसे (सिंहासन पर बैठाकर) ययाति ने अपना दण्ड उसके हाथ में दे दिया।तब पृथ्वी के स्वामी ययाति ने (पुरु से) उसका बुढ़ापा वापस लेकर (अपनी जवानी) उसे दे दी और गोलोक( वैकुण्ठ का ऊपरी लोक) जाने की इच्छा की।

        अध्याय 83 - ययाति ने दिव्य लोकों का दौरा किया

        सुकर्मन ने कहा :-

        1-5. पृथ्वी के स्वामी ने ययाति ने सभी हिस्सों से सभी प्रजा को बुलाकर अत्यंत प्रसन्नता से कहा, "हे मेरी प्रजा में श्रेष्ठ लोगों सुनो! - ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र , मैं इस महिला के साथ जा रहा हूं।" इंद्र का स्वर्ग, ब्रह्मा का लोक, रुद्र का लोक और फिर विष्णु के वैकुण्ठ में, सभी पापों को नष्ट करके मोक्ष का कारण बनता है। इसके बारे में कोई संदेह नहीं है।

         (अपने) परिवार सहित (तुम) पृथ्वी पर सुखपूर्वक रहो। हे प्रजा, मैंने इस गौरवशाली और बुद्धिमान पुरु को आपका संरक्षक और राजदंडधारी राजा नियुक्त किया है।

        5-13. इस प्रकार संबोधित करते हुए, उन सभी विषयों में राजा से कहा: “हे श्रेष्ठ राजा, (अर्थात्) सभी वेदों और पुराणों में हम धर्म के बारे में सुनते हैं ; लेकिन जैसा कि हमने देखा, किसी ने भी धर्म को नहीं देखा, जैसा कि नहुष के महान घर में पैदा हुआ ययाति  (यानी आप), दस घटकों में से एक, चंद्र वंश में, सत्य से प्यार करने वाले, हाथ, पैर और चेहरे वाला, सभी (अच्छे) का प्रचार करने वाले अभ्यास, आध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान से संपन्न, और धार्मिक गुणों का एक बड़ा खजाना, गुणों की खान और सत्य में कुशल, हे महान राजा आप हो।

        सत्यवादी और अत्यधिक तेजस्वी लोग महान गुणों का अभ्यास करते हैं। हमने आप में वह धर्म देखा है, जो वांछनीय रूप (या कामदेव के समान सुंदर), (हमारी) इच्छाओं को पूरा करने वाला और इतना सत्य बोलने वाला है। तीन प्रकार के कृत्यों (अर्थात शरीर, मन और वाणी) के साथ भी हम आपको त्यागने में असमर्थ हैं,।

        आप जहां भी जाएंगे, हम खुशी से और सहमति से आप के साथ  जाएंगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम जहां रहोगे (अर्थात यदि तुम नरक में रहोगे तो) हम नरक में ही होंगे। हे महान राजा, आपके बिना पत्नी, भोग या जीवन का क्या लाभ? हमारा उससे (अर्थात् पत्नी आदि) से कोई लेना-देना नहीं है। हे राजाओं के स्वामी ययाति, हम तो तेरे संग ही चलेंगे; यह अन्यथा नहीं होगा।”

        14-26. प्रजा की ये बातें सुनकर पृथ्वी के स्वामी ययाति ने अत्यंत प्रसन्नता से भरकर प्रजा से कहा, "हे सभी मेधावी लोगों, मेरे साथ आओ।" कामदेव की पुत्री अश्रुबिन्दुमती को लेकर राजा रथ पर चढ़ गये। (वह) नहुष के पुत्र ययाति , देवताओं के स्वामी इंद्र की तरह चमकते थे, उनके रथ का रंग हंसों जैसा और चंद्रमा की कक्षा के समान था; 

        वह चाउरी और प्रशंसकों द्वारा प्रशंसित होने के संकट से मुक्त था (जैसा कि वह था); वह भी उस भाग्यशाली, शुभ और महान ध्वजा से चमक उठा। 

        ऋषि-मुनियों, पंडितों और गायकों के साथ-साथ उनकी प्रजा भी उनकी प्रशंसा करती थी। तब उसकी सारी प्रजा वाहनों में सवार होकर मनुष्यों के स्वामी के पास पहुंची; और वे हाथियों और घोड़ों के साथ (अर्थात् उन पर चढ़कर) वैकुण्ठ की ओर चले गए।

        वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य सामान्य लोग थे। वे सभी विष्णु के अनुयायी थे और विष्णु के ध्यान में लीन थे । उनके झण्डे श्वेत थे और सुनहरी डंडियों से सुशोभित थे। (वह सभी एक वर्ण वैष्णव के लोग हो गये)

        सभी पर शंख और चक्र अंकित थे और उनके पास दण्ड और ध्वज थे। हवा से प्रेरित बैनर प्रजा की भीड़ के बीच चमक उठे। सभी (प्रजा) ने दिव्य मालाएँ पहन रखी थीं और तुलसी के पत्तों से सुशोभित थे। उनके शरीर पर दिव्य चंदन और (दिव्य काले देवदारु और चन्दन) की लकड़ी का लेप लगाया गया था। वे दिव्य वस्त्राभूषणों से विभूषित थे और दिव्य आभूषणों से अलंकृत थे। वे सभी सुन्दर लोग राजा के पीछे चलने लगे। सारी प्रजा - हजारों, सैकड़ों, लाखों और करोड़ों की संख्या में लोग , और अरव , खर्व (अर्थात् 10,000,000,000) जैसी बहुत बड़ी संख्या में लोग (राजा के साथ) चले गए। वे सभी, विष्णु के अनुयायी, मेधावी कार्य करते हुए, विष्णु के ध्यान में, पवित्र नामों के जाप में और दान में राजा के साथ चले गए।

        सुकर्मन ने कहा :

        26-30. हे महान राजा, वे सभी बड़े हर्ष से भरे हुए (राजा के साथ) आगे बढ़े, अपने पुत्र पुरु को अपने सिंहासन पर बैठाया, जिससे पृथ्वी के स्वामी ययाति विष्णु के लोक में चले गए। उनके तेज, धार्मिक गुण और धर्मपरायणता के कारण वे सभी लोग विष्णु के सर्वोत्तम लोक वैकुण्ठ ( गोलोक) में चले गये। तब देवताओं के राजा के साथ, गंधर्वों , किन्नरों और भांडों के साथ देवता उनके सामने आए (उनका स्वागत करने के लिए), हे श्रेष्ठ राजा, उन राजाओं का सम्मान करते हुए।

        इंद्र ने कहा :

        30. हे महान राजा, आपका स्वागत है। मेरे घर में प्रवेश करो.

        31. यहां अपनी इच्छानुसार सभी दिव्य सुखों का आनंद उठायें।

        राजा ने कहा :

        31-40. हे सहस्र नेत्रों वाले, अत्यंत बुद्धिमान भगवान, मैं आपके कमल-सदृश चरणों को नमस्कार कर रहा हूँ। फिर मैं ब्रह्मा के लोक में जाऊंगा।

        देवताओं द्वारा प्रशंसा किये जाने पर वह ब्रह्मा के लोक में चला गया। अत्यंत तेजस्वी ब्रह्मा ने उत्कृष्ट ऋषियों के साथ उनके पैर धोने के लिए जल, आदरपूर्वक प्रसाद और उत्कृष्ट आसन देकर उनका आतिथ्य सत्कार किया; (और) उससे कहा: "अपने कर्मों के बल से विष्णु के वैकुण्ठ में जाओ।" विधाता के इस प्रकार कहने पर वह शिव के घर गया। उमा (अर्थात पार्वती ) के साथ शिव ने उसी राजा का आतिथ्य सत्कार किया और राजा से ये शब्द कहे:

        "कृष्णभक्तोसि राजेंद्र ममापि सुप्रियो भवान् ।
        ततो ययाते राजेंद्र वस त्वं मम मंदिरम्।३६।

        सर्वान्भोगान्प्रभुंक्ष्व त्वं दुःखप्राप्यान्हि मानुषैः ।
        अंतरं नास्ति राजेंद्र मम विष्णोर्न संशयः।३७।

        अनुवाद:-

        हे राजाओं के राजा, आप कृष्ण के भक्त हैं , आप मुझे भी बहुत प्रिय हैं; इसलिए, हे राजाओं के स्वामी ययाति, मेरे लोक में रहो। उन सभी सुखों का आनंद लें जो मनुष्य को प्राप्त करना कठिन है।

        हे राजाओं के स्वामी, विष्णु और मुझमें निश्चित रूप से कोई अंतर नहीं है।

        इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो विष्णु का रूप है वह शिव है, और हे राजा, जो शिव है वह प्राचीन विष्णु है। दोनों में कोई अंतर नहीं है. इसलिये मैं ही (इस प्रकार) बोलता हूँ। मैं विष्णु के एक मेधावी भक्त को (अपने निवास में) स्थान देता हूं। इसलिए, हे निर्दोष महान राजा, आपको यहीं रहना चाहिए।

        40-43. शिव द्वारा इस प्रकार संबोधित किए जाने पर, विष्णु के प्रिय ययाति ने, भक्ति में अपनी गर्दन (अर्थात सिर) झुकाकर, देवताओं के स्वामी शिव को नमस्कार किया, (और उनसे कहा:) "हे महान भगवान, आपने जो कुछ भी कहा है वह उचित है . आप दोनों में कोई अंतर नहीं है. यह दो भागों में विभाजित एक रूप है। मैं विष्णु के पास (वैकुण्ठ) जाने की इच्छा रखता हूँ; मैं आपके चरणों को नमस्कार करता हूँ।” “हे महान राजा, ऐसा ही हो; विष्णु के लोक  को जाओ।”

        43-65. (इस प्रकार) शिव द्वारा निर्देशित, पृथ्वी के स्वामी, विष्णु के बहुत मेधावी भक्तों के साथ, विष्णु के प्रिय राजा - उनके सामने नृत्य करते हुए (विष्णु के लोक की ओर) आगे बढ़े। वह महापापों का नाश करने वाले शंख-ध्वनि और सिंहों की बहुत सी दहाड़ें, बहुत सी (अन्य) ध्वनियों के साथ, अच्छे पंडितों द्वारा पूजे जाने वाले, (उनकी स्तुति) शास्त्रों में कुशल पाठकों द्वारा मधुर स्वर में गाए जाने पर, (आगे बढ़ गए) गाने में उत्सुकता से लगे गंधर्वों ने उनके सामने गाना गाया। ऋषि-मुनियों के साथ-साथ देवताओं की टोली भी उनकी स्तुति कर रही थी। नहुष के उस पुत्र की सेवा सुंदर दिव्य युवतियाँ कर रही थीं। उस महान राजा की प्रशंसा मेधावी और शुभ गंधर्वों, किन्नरों, सिद्धों , साधुओं, साध्यों , विद्याधरों , मरुतों और वसुओं द्वारा की जाती है , साथ ही रुद्र और आदित्यों के समूहों द्वारा, और अभिभावकों और देवताओं द्वारा, और तीनों लोकों द्वारा की जाती है। चारों ओर, विष्णु का अतुलनीय और कुण्ठा रहित लोक वैकुण्ठ( गोलोक) देखा। हे राजा, वह उत्कृष्ट और सर्वश्रेष्ठ नगर स्वर्णिम,  दिव्य यानों  से चमक रहा था, सभी सुंदरता से भरा हुआ था, सौ मंजिला हवेली थी जिसमें हंस, कुंड  (फूल) या चंद्रमा की तरह सफेद महालय( महल) थे, और मेरु और मंदार के समान थे। वे पर्वत जिनकी चोटियाँ स्वर्ग और आकाश को छूती थीं, और जिनके शिखरों पर चमकीले सुनहरे घड़े थे।वह बहुत से तारों वाले आकाश के समान तेज से चमका; धधकती हुई चमक की लपटों के साथ वह मानो आँखों से देख रहा था। हे राजाओं के देव, उस शिव के लोक ने, अनेक रत्नों से युक्त, हँसते हुए दाँत दिखाते हुए, और पत्ते उछालते हुए ध्वज के बहाने, विष्णु के प्रिय, मेधावी भक्तों को आमंत्रित किया। 

        वह हर जगह हवा से उछाले गए आकर्षक बैनरों के शीर्षों, सुनहरे डंडों और घंटियों से सुशोभित था। वह सूर्य की चमक के समान (उज्ज्वल) दिखने वाले द्वारों और निगरानी टावरों से चमक रहा था, सुंदर गोल खिड़कियों, जाली की पंक्तियों और चौड़े मार्गों की चमक वाली खिड़कियों, और सुनहरे प्राचीरों, मेहराबों, अच्छे बैनरों और कई बहुत ही शुभ ध्वनियों के साथ, घड़ों के शीर्षों से युक्त, दर्पण जैसा चक्र जो चमक में सूर्य के गोले के समान होता है, महान शोभा के साथ, पानी से रहित बादलों के समान सैकड़ों निजी कक्षों के साथ, कर्मचारियों और छतरियों और घड़ों से भरे हुए, बरसात के मौसम में बादलों के समान कक्षों के साथ, और (इतने सारे) घड़ों से पृथ्वी ऐसी दिखाई देती थी, मानो आकाश तारों से भरा हो।विष्णु की नगरी बहुत से तारों के समान चमक वाली, शंख या चंद्रमा के समान दिखने वाली, स्फटिक की वस्तुओं के आकार की, शंख या चंद्रमा के समान चमकने वाली, बहुत सी धातुओं से बने सोने के महलों और  की भीड़ के साथ, बहुत सारी छड़ियों और बैनरों से सुंदर लग रही थी, दस करोड़ और हज़ारों करोड़ों की संख्या में दिव्य विमानो के साथ; और सभी आनंद के साथ. वे मनुष्य, विष्णु के भक्त, धार्मिक कर्मों वाले और अपने सभी पापों को धोकर, उनकी कृपा से उन घरों में रहते हैं, जो पूरी तरह से मेधावी, दिव्य और सभी सुखों से समृद्ध हैं।

        65-75. विष्णु का लोक इस प्रकार की उत्कृष्ट (वस्तुओं) से सुशोभित था। वह सर्वत्र नाना प्रकार के वृक्षों से भरा हुआ था, चंदन के वृक्षों से सुशोभित था, सभी वांछित फलों से युक्त था। यह कुओं, तालाबों और सारस से सुशोभित झीलों से चमकता था, उसी प्रकार हंसों और बत्तखों से भरी झीलों से भी, सफेद कमलों से सुशोभित, (अन्य) कमल, बड़े सफेद कमल, (अन्य प्रकार के) कमल और नीले कमल, और (अन्य) से सुशोभित था। ) सुनहरे कमल के समान रंग वाला (अर्थात् सदृश)। वैकुण्ठ (अर्थात विष्णु का लोक) सभी सौंदर्य से समृद्ध था, दिव्य उद्यानों से सुशोभित था, दिव्य आकर्षण से भरा था और विष्णु के भक्तों से सुशोभित था। राजा ने (यह) वैकुण्ठ, मोक्ष का अतुलनीय स्थान देखा। नहुष के पुत्र ययाति ने देवताओं की सेना से भरे हुए और किसी भी प्रकार के भयंकर तीव्र ताप  से मुक्त उस सुंदर शहर में प्रवेश किया। उसने देखा कि विष्णु, सभी कष्टों का नाश करने वाले, किसी भी क्षति से मुक्त, दिव्य विमानो से चमकने वाले, सभी आभूषणों से देदीप्यमान, पीले वस्त्र पहने हुए, श्रीवत्स से चिह्नित , और बहुत चमकदार, श्री के साथ गरुड़ पर चढ़े हुए , सर्वोच्च से भी ऊंचे , - सर्वोच्च देवता, सभी संसारों के आश्रय, (जो) सर्वोच्च आनंद के रूप में पूर्ण वैराग्य के साथ चमकते थे, और विष्णु के महान, बहुत मेधावी भक्तों द्वारा उनकी सेवा की जा रही थी।

        76-79. पृथ्वी के स्वामी ने, अपनी पत्नी के साथ, नारायण (अर्थात विष्णु) को नमस्कार किया, जो देवताओं के समूह से भरे हुए थे, गंधर्वों और दिव्य अप्सराओं के समूहों द्वारा प्रतीक्षा कर रहे थे, जो उदार थे और जिन्होंने सभी कष्टों को दूर कर दिया था। राजा के साथ गए विष्णु के सभी भक्तों ने विष्णु को नमस्कार किया, हे परम बुद्धिमान! हे अत्यंत बुद्धिमान, उन्होंने भक्तिपूर्वक उनके दोनों चरणों को नमस्कार किया। विष्णु ने उस तेजस्वी राजा से कहा, जो तेज से चमक रहा था और जो उसे नमस्कार कर रहा था: “हे अच्छे व्रत वाले, मैं तुमसे प्रसन्न हूं। हे राजाओं के स्वामी, जो वरदान तुम्हारे मन में हो, वह माँग लो; मैं इसे तुम्हें अवश्य प्रदान करूंगा। तुम मेरे भक्त हो, हे अत्यंत बुद्धिमान ययाति।”

        राजा ने कहा :

        80. हे मधुसूदन , हे देवताओं के स्वामी, यदि आप प्रसन्न हैं, तो हे लोकों के स्वामी, मुझे सदैव अपनी दासता प्रदान करें (अर्थात मुझे अपना दास बना लें)।

        विष्णु ने कहा :

        81-83. हे गौरवशाली, ऐसा ही हो; तुम निःसंदेह मेरे भक्त हो; हे महान राजा, इस महिला के साथ आप मेरे वैकुण्ठ अथवा गोलोक में रह सकते हैं।

        पृथ्वी के स्वामी, महान राजा ययाति, इस प्रकार संबोधित करते हुए, उस भगवान की कृपा से, विष्णु के उत्कृष्ट वैकुण्ठ में रहते थे, जो सुशोभित था।

        पद्मपुराणम्/खण्डः २ (भूमिखण्डः अध्याय-80)

        "कामकन्यां यदा राजा उपयेमे द्विजोत्तम।
        किं चक्राते तदा ते द्वे पूर्वभार्ये सुपुण्यके।१।

        "अनुवाद- जब राजा ययाति नें कामदेव की पुत्री के साथ विवाह कर लिया; तब राजा की पहले वाली दोनों पत्नियों ने क्या किया।१।

        देवयानी महाभागा शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।
        तयोश्चरित्रं तत्सर्वं कथयस्व ममाग्रतः।२।

        "अनुवाद- महाभागा देवयानी और शर्मिष्ठा उन  दोंनो का सब आचरण ( कर्म) मेरे समक्ष कहो।२।

                       "सुकर्मोवाच-
        यदानीता कामकन्या स्वगृहं तेन भूभुजा ।
        अत्यर्थं स्पर्धते सा तु देवयानी मनस्विनी।३।

        "अनुवाद- सुकर्मा ने कहा :- महाराज ययाति जब कामदेव की पुत्री अश्रुबिन्दुमती को  अपने घर लाये तो मनस्विनी देवयानी ने उस अश्रुबिन्दुमती के साथ अत्यधिक स्पर्धा ( होड़) की।३।

        तस्यार्थे तु सुतौ शप्तौ क्रोधेनाकुलितात्मना।
        शर्मिष्ठां च समाहूय शब्दं चक्रे यशस्विनी।४।

        "अनुवाद- इस कारण से राजा ययाति नें क्रोध से व्याकुल मन होकर देवयानी से उत्पन्न अपने दोनों  यदु और तुर्वसु नामक पुत्रों को शाप दे दिया। तब शर्मिष्ठा को बुलाकर यशस्विनी देवयानी नें राजा द्वारा दिए गये शाप की सब बातें कहीं।४।

        रूपेण तेजसा दानैः सत्यपुण्यव्रतैस्तथा ।
        शर्मिष्ठा देवयानी च स्पर्धेते स्म तया सह।५।

        "अनुवाद- रूप तेज दान सत्यता , और पुण्य के द्वारा शर्मिष्ठा और देवयानी दोंनो ने उस ययाति की तीसरी पत्नी अश्रुबिन्दुमती के साथ स्पर्धा( होड़ )की।५।

        दुष्टभावं तयोश्चापि साऽज्ञासीत्कामजा तदा।
        राज्ञे सर्वं तया विप्र कथितं तत्क्षणादिह।६।

        "अनुवाद-   तब कामदेव की पुत्री राजा की तीसरी पत्नी अश्रुबिन्दुमती ने देवयानी और शर्मिष्ठा का वह स्पर्धा वाला दूषितभाव जान लिया और राजा ययाति को सब उसी समय बता दिया।६।

        ****
        अथ क्रुद्धो महाराजः समाहूयाब्रवीद्यदुम् ।
        शर्मिष्ठा वध्यतां गत्वा शुक्रपुत्री तथा पुनः।७।

        "अनुवाद-  उसके बाद राजा ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को बुलाकर कहा। हे यदु तुम जाकर शर्मिष्ठा और देवयानी दोंनो को मार दो।७।

        सुप्रियं कुरु मे वत्स यदि श्रेयो हि मन्यसे ।
        एवमाकर्ण्य तत्तस्य पितुर्वाक्यं यदुस्तदा ।८।

        "अनुवाद-  हे वत्स !  मेरा यह प्रिय कार्य करो यदि तुम इसे सही मानते हो तो, यदु ने इस प्रकार ययाति की ये बातें सुनकर  ।८।

        प्रत्युवाच नृपेंद्रं तं पितरं प्रति मानद ।
        नाहं तु घातये तात मातरौ दोषवर्जिते।९।

        "अनुवाद- राजा ययाति उस अपने पिता को उत्तर दिया , हे माननीय पिता जी मैं इन दोंनो निर्दोष  माता ओं का बध नहीं करुँगा।९।

        मातृघाते महादोषः कथितो वेदपण्डितैः।
        तस्माद्घातं महाराज एतयोर्न करोम्यहम्।१०।

        "अनुवाद- वेद के जानने वाले विद्वानों ने माता को मारने का महापाप बताया है। हे महाराज  इस लिए मैं इन दोंनो मीताओं का बध नहीं करुँगा।१०।

        दोषाणां तु सहस्रेण माता लिप्ता यदा भवेत् ।
        भगिनी च महाराज दुहिता च तथा पुनः।११।

        "अनुवाद- माता ,बहिन और पुत्री यदि हजारों दोषों से युक्त हो तो भी हे महाराज!।११।

        पुत्रैर्वा भ्रातृभिश्चैव नैव वध्या भवेत्कदा ।
        एवं ज्ञात्वा महाराज मातरौ नैव घातये।१२।

        "अनुवाद-  वह पुत्र भाई तथा पिता आदि के द्वारा कभी भी वध करने योग्य नहीं है। इस प्रकार यह सब जानकर मैं अपनी इन दोंनो माताओं का वध नहीं कर सकता हूँ।

        यदोर्वाक्यं तदा श्रुत्वा राजा क्रुद्धो बभूव ह ।
        शशाप तं सुतं पश्चाद्ययातिः पृथिवीपतिः।१३।

        "अनुवाद- यदु की यह बात सुनकर राजा क्रोधित होगया। और इसके बाद ययाति ने यदु को शाप दे दिया।१३।

        यस्मादाज्ञाहता त्वद्य त्वया पापि समोपि हि ।
        मातुरंशं भजस्व त्वं मच्छापकलुषीकृतः।१४।

        "अनुवाद- तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इस कारण तुम पापी हो इस लिए मेरे शाप के कारण पापी बने हुए तुम अपनी माता के अँश को ही प्राप्त करो।१४।

        एवमुक्त्वा यदुं पुत्रं ययातिः पृथिवीपतिः ।
        पुत्रं शप्त्वा महाराजस्तया सार्द्धं महायशाः।१५।

        "अनुवाद-  इस प्रकार कह कर पृथ्वीपति ययाति पुत्र यदु को शाप देकर अपनी तीसरी पत्नी अश्रुबिन्दुमती के साथ वहाँ से चले गये।१५।

        रमते सुखभोगेन विष्णोर्ध्याने न तत्परः ।
        अश्रुबिन्दुमतीसा च तेन सार्द्धं सुलोचना।१६।

        अनुवाद-  सुन्दर नेत्रों वाली अश्रुबिन्दुमती के साथ सुखभोग के द्वारा आनन्दित होने पर राजा भगवान विष्णु के ध्यान में भी तत्पर नहीं रह सके।१६।

        बुभुजे चारुसर्वांगी पुण्यान्भोगान्मनोनुगान् ।
        एवं कालो गतस्तस्य ययातेस्तु महात्मनः।१७।

        अनुवाद-  सर्वांग सुन्दरी अश्रुबिन्दुमती ने मन के अनुकूल सभी पुण्यमयी -भोगों का भोग करती  ,इस तरह महान आत्मा राजा ययाति का बहुत समय व्यतीत हुआ।१७।

        अक्षया निर्जराः सर्वा अपरास्तु प्रजास्तथा ।
        सर्वे लोका महाभाग विष्णुध्यानपरायणाः।१८।

        अनुवाद-  विनाश और बुढापे से रहित उनकी अन्य प्रजाऐं आदि सभी लोग भगवान विष्ण के ध्यान में लगे रहते थे।१८।

        तपसा सत्यभावेन विष्णोर्ध्यानेन पिप्पल ।
        सर्वे लोका महाभाग सुखिनः साधुसेवकाः।१९।

        सुकर्मा ने कहा- हे महाभाग पिप्पल! तपस्या ,सत्य भाव तथा भगवान विष्णु के ध्यान में लगे सभी लोग सुखी तथा साधु जनों के सेवक थे।१९।


        इतिहास में एक व्यक्ति वह हुआ जिसने अपने पिता के कहने पर  अपनी निर्दोष माता को केवल व्यभिचारी होने के शक में कत्ल कर दिया - गर्भस्थ शिशुओं की हत्या की वह भगवान बना दिया गया । जबकि एक व्यक्ति वह भी था जिसने पिता के कहने पर अपनी निर्दोष माता ओं का कत्ल नहीं किया और उल्टे पिता को ही दोषी सिद्ध किया स्वयं  परिपूर्णत्तम ब्रह्म ने  अपने अशांवतारों सहित स्वयं अवतार लिया परन्तु उनको पुरोहितों नें वह सम्मान नहीं दिया जिसपर उनका अधिकार था।  


        सन्दर्भ:-




        यदु के उनकी तपस्विनी पत्नी यजनशीला  यज्ञवती में  चार पुत्र  हुए जो बड़े प्रसिद्ध थे- सहस्रजित, क्रोष्टा, नल और रिपु। पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अध्याय-(13) में  यदु के पाँच पुत्र भी बताये गये हैं।


        सहस्रजित्तथा ज्येष्ठः क्रोष्टा नीलोञ्जिको रघुः।
        सहस्रजितो दायादः शतजिन्नाम पार्थिवः।।९९।।
        अनुवाद:-अनुवाद:-यदु के देवों के समान पाँच पुत्र उत्पन्न हुए।98।
        सबसे बड़े थे सहस्रजित , फिर क्रोष्ट्रा , नील , अंजिका और रघु ।99।
         
         राजा सहस्रजीत का पुत्र शतजित था।
        और शतजित के तीन पुत्र थे- महाहय, वेणुहय और हैहय। हैहय का धर्म, धर्म का नेत्र, नेत्र का कुन्ति, कुन्ति का सोहंजि, सोहंजि का महिष्मान और महिष्मान का पुत्र भद्रसेन हुआ।

        "यदोः पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च देवसुतोपमाः। सहस्रजिदथ श्रेष्ठः क्रोष्टुर्नीलो जितो लघुः।१।
        अनुवाद:-यदु के पाँच देवताओं के समानपुत्र हुए- १-सहस्रजित - २-क्रोष्टु - ३-नील-४-अञ्जिक-५-लघु -
        सन्दर्भ-

        यदोः पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च देवसुतोपमाः ।
        सहस्रजिदथ श्रेष्ठः क्रोष्टुर्नीलोञ्जिको लघुः ॥ २,६९.२ ॥
        अनुवाद:- यदु के पाँच देवताओं के समानपुत्र हुए- १-सहस्रजित - २-क्रोष्टु - ३-नील-४-अञ्जिक-५-लघु -
        सन्दर्भ:-




            


        हैहय वंशावली परिचय “हैहय-कथा” का पहला भाग


        हैहय वंशावली परिचय:

        हैहयराज कार्तृवीर्य सहस्रार्जुन, सोमवंशीय क्षत्रिय थे। उनका जन्म पुरुरवा वंश में हुआ था। इस वंश में राजा नहुष और ययाति जैसे महान पराक्रमी, कलाप्रेमी, धर्मात्मा, तपस्वी और लोक-हितकारी राजा हुए थे।

           

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        "भगवान्- सहस्रबाहु की पूजा का पुराणों में विधान है।

        हनुमद्भजनासक्तः कार्तवीर्यार्जुनं सुधीः ।।
        विशेषतः समाराध्य यथोक्तं फलमाप्नुयात् ।। ७५-१०६।

        अनुवाद:- हनुमान की भक्ति से आसक्त सुधीजन कार्तवीर्य अर्जुन की आराधना प्रारम्भ कर जैसा कहते  है वैसा ही फल प्राप्त करते हैं।।।१०६। 

        सन्दर्भ :- नारदपुराण पूर्वभाग 75 वाँ अध्याय :-

        जो सत्य हम कहेंगे वह कोई नहीं नहीं कहेगा-
        एक स्थान पर परशुराम ने  स्वयं- कार्तवीर्य्य अर्जुन के द्वारा वध अपना वध होने से पूर्व सहस्रबाहू की प्रशंसा करते हुए कहा-
        हे राजन्!
        (प्राचीन काल के वन्दीगण ऐसा कहते हैं कि भूतल पर कार्तवीर्यार्जुन के समान दाता, सर्वश्रेष्ठ, धर्मात्मा, यशस्वी, पुण्यशाली और उत्तम बुद्धिसम्पन्न न कोई हुआ है ; और ना ही आगे होगा। 

        पुराणों के अतिरिक्त संहिता ग्रन्थ भी इस आख्यान का वर्णन करते हैं।

        लक्ष्मीनारायणसंहिता में वे श्लोक हैं जो ब्रह्मवैवर्त पुराण गणपतिखण्ड के समान ही हैं। प्रस्तुत करते हैं।

        लक्ष्मीनारायणसंहिता - खण्ड प्रथम          (कृतयुगसन्तानः) अध्यायः (४५८ ) में परशुराम और सहस्रबाहू युद्ध का वर्णन इस प्रकार है। 
                         
        दत्तात्रेयेण दत्तेन सिद्धाऽस्त्रेणाऽर्जुनस्तु तम् ।जडीचकार तत्रैव स्तम्भितो राम एव वै।८८।
        अर्थ:-परन्तु दत्तात्रेय द्वारा सिद्ध अस्त्र के द्वारा उस पाशुपत अस्त्र को भी कार्तवीर्य ने स्तम्भित(जाम) कर दिया और उसके साथ परशुराम भी स्तम्भित हो गये।
        श्रीकृष्णरक्षितं भूपं ददर्श कृष्णवर्म च ।
        ददर्शाऽपि भ्रमत्सुदर्शनं रक्षाकरं रिपोः।८९।

        अर्थ:- जब परशुराम ने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित राजा सहस्रबाहू को देखा और कृष्ण-वर्म ( कृष्ण द्वारा प्रदत्त कवच) को भी परशुराम ने देखा और यह भी देखा कि घूमता हुआ सुदर्शन चक्र इस राजा की शत्रुओं से सदैव रक्षा करने वाला है।८९। 

        _________________________________
        तावत् ध्यातोऽर्जुनगुरुर्दत्तात्रेयः समागतः।
        ददौ शूलं हि परशुरामस्य नाशार्थं कृष्णवर्म च।८५।।
        अर्थ- उसके बाद अर्जुन ने दत्तात्रेय का ध्यान किया तो उन्होंने आकर परशुराम के विनाश के लिए अर्जुन को शूल और कृष्णवर्म (काला-कवच) प्रदान किया।८५। 

        विशेष :- यदि परशुराम विष्णु का अवतरण थे तो विष्णु के ही अंशावतार दत्तात्रेय ने परशुराम के वध के निमित्त सहस्रबाहू को शूल और कृष्ण वर्म क्यों प्रदान किया ?
        _____________________________   
        "जग्राह राजा शूलं तश्चिक्षेप परशुरामकन्धरे।मूर्छामवाप रामः सःपपात श्रीहरिं स्मरन्।८६। 

        अर्थ:-तब महाराज कार्तवीर्य ने उस रण में परशुराम के वध के लिए दत्तात्रेय द्वारा प्रदत्त शूल का मन्त्र पूर्वक उपयोग (सन्धान) किया , जो कभी भी व्यर्थ ना होने वाला था  परशुराम ने उस सैकडो सूर्य के समान कान्तिपूर्ण प्रलय कालीन अग्निशिखा से आप्लायित और देवो के लिये भी दुर्निवार्य उस शूल को देखा हे नारद ! परशुराम के ऊपर वह शूल गिरा, जिससे भगवान् हरि का नाम लेते   हुए परशुराम मूर्छित हो गिर गये।।८६।

        परशुराम के गिर जाने के वाद समस्त देव गण व्याकुल हो गये और कोहराम मच गया , उस समय युद्ध स्थल में ब्रह्मा विष्णु एवं महेश्वर भी आ गये।१९।

        इस विषय में निम्न श्लोक विचारणीय हैं-
        यदि परशुराम हरि (विष्णु) के अवतार थे तो उन्होंने मूर्च्छित होकर मरते समय विष्णु अथवा हरि को क्यो नाम लिया।  यदि वे स्वयं विष्णु के अवतार थे तो  इसका अर्थ यही है कि परशुराम हरि अथवा विष्णु का अवतार नही थे।
        उन्हें बाद में पुरोहितों ने अवतार बना दिया

        वास्तव में सहस्रबाहू ने परशुराम का वध कर दिया था।

        परन्तु परशुराम का वध जातिवादी पुरोहित वर्ग का वर्चस्व समाप्त हो जाना ही था। इसीलिए इसी समस्या के निदान के लिए पुरोहितों ने  ब्रह्मवैवर्त- पुराण में  निम्न श्लोक बनाकर जोड़ दिया कि परशुराम को मरने बाद शिव द्वारा जीवित करना बता दिया गया । 

        और इस घटना को चमत्कारिक बना दिया गया। यह ब्राह्मण युक्ति थी । परन्तु सच्चाई यही है कि मरने के व़बाद कभी कोई जिन्दा ही नहीं हुआ।

        विशेष :- उपर्युक्त श्लोक में कृष्ण रूप में भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से सहस्रबाहू की परशुराम से युद्ध होने पर रक्षा कर रहे हैं तो सहस्रबाहू को परशुराम कैसे मार सकते हैं ।

        यदि शास्त्रकार सहस्रबाहू को परशुराम द्वारा मारा जाना वर्णन करते हैं तो भी उपर्युक्त श्लोक में विष्णु को शक्तिहीन और साधारण होना ही सूचित करते हैं जोकि शास्त्रीय सिद्धान्त के सर्वथा विपरीत ही है। जबकि  विष्णु सर्वशक्तिमान हैं।

        ________
          
        जिस प्रकार पुराणों में बाद में यह आख्यान जोड़ा गया कि परशुराम ने 
        "गर्भस्थ शिशुओं की हत्या की  और क्षत्रियों पत्नीयों  क्या तक को मार डाला।  यह कृत्य करना विष्णु के अवतारी का गुण  हो सकता है। ? कभी नहीं।

        महाभारत शान्तिपर्व में वर्णन है कि -
        परशुराम किस प्रकार हैहयवंश के यदुवंशीयों की स्त्रियों के गर्भस्थ शिशुओं की हत्या करते हैं ? यह सर्वविदित ही है। इस सन्दर्भ में देखें निम्न श्लोक
        ____________________________________ 

        "स पुनस्ताञ्जघान् आशु बालानपि नराधिप गर्भस्थैस्तु मही व्याप्ति पुनरेवाभवत्तदा ।62।

        "जातंजातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह।        अरक्षंश्च सुतान्कान्श्चित्तदाक्षत्रिय योषितः।63।

        "त्रिःसप्तकृत्वःपृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः।दक्षिणामश्वमेधान्ते कश्यपायाददत्ततः।64।

        सन्दर्भ:-(महाभारत शान्तिपर्व अध्याय- ४८)
        _________________
        "अर्थ- 
        "नरेश्वर! परशुराम ने पुन: उन सबके छोटे-छोटे शिशुओं तक को शीघ्र ही मार डाला जो बच्चे गर्भ में रह गये थे, उन्हीं से पुनः यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी। परशुराम एक एक गर्भ के उत्पन्न होने पर पुनः उसका वध कर डालते थे। उस समय क्षत्राणियाँ कुछ ही पुत्रों को बचा सकीं थी।
        राजन् ! तदनन्तर कुछ क्षत्रियों को बचाये रखने की इच्छा से कश्यपजी ने स्रुक् (स्रुवा) लकड़ी की बनी हुई एक प्रकार की छोटी करछी जिससे हवनादि में घी की आहुति देते हैं। उसको लिये हुए हाथ से संकेत करते हुए यह बात कही- मुने ! अब तुम दक्षिण समुद्र के तट पर चले जाओ। अब कभी मेरे राज्य में निवास न करना।
        ____________________________________
        (ब्रह्मवैवर्त पुराण गणपति खण्ड अध्याय (४०)
        में भी वर्णन है कि (२१) बार पृथ्वी से क्षत्रिय को नष्ट कर दिया और उन क्षत्रियों की पत्नीयों के गर्भस्थ शिशुओं की हत्या कर दी ! यह आख्यान भी परशुराम को विष्णु  का अवतार सिद्ध नहीं करता-
        क्योंकि विष्णु कभी भी निर्दोष गर्भस्थ शिशुओं का वध नहीं करेंगे।

         ____________________________________
        "एवं त्रिस्सप्तकृत्वश्च क्रमेण च वसुन्धराम् ।।
        रामश्चकार निर्भूपां लीलया च शिवं स्मरन्।७३
        "गर्भस्थं मातुरङ्कस्थं शिशुं वृद्धं च मध्यमम्।
        जघान क्षत्रियं रामः प्रतिज्ञापालनाय वै।७४।
         _________________

        ___________________________

            गीताप्रेस- गोरखपुर संस्करण)
                          महाभारत: वनपर्व: 

         सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः(117) श्लोक 1-13 का हिन्दी अनुवाद :-
        रेणुका स्नान करने के लिए गंगा नदी तट पर गयी। राजन! जब वह स्नान करके लौटने लगी, उस समय अकस्मात उसकी दृष्टी मार्तिकावत देश के राजा चित्ररथ पर पड़ी, जो कमलों की माला धारण करके अपनी पत्नी के साथ जल में क्रीड़ा कर रहा था। 

        उस समृद्धिशाली नरेश को उस अवस्था में देखकर रेणुका ने उसकी इच्छा की। 

        उस समय इस मानसिक विकार से द्रवित हुई रेणुका जल में बेहोश-सी हो गयी।  फिर त्रस्त होकर उसने आश्रम के भीतर प्रवेश किया।  परन्तु ऋषि उसकी सब बातें जान गये।  उसे धैर्य से च्युत और ब्रह्मतेज से वंचित हुई देख उन महातेजस्वी शक्तिशाली महर्षि‍ ने धिक्कारपूर्ण वचनों द्वारा उसकी निन्दा की। 

        इसी समय जमदग्नि के ज्येष्‍ठ पुत्र रुमणवान वहाँ आ गये। फिर क्रमश: सुशेण, वसु और विश्वावसु भी आ पहूंचे। भगवान जमदग्नि ने बारी-बारी से उन सभी पुत्रों को यह आज्ञा दी कि 'तुम अपनी माता का वध कर डालो', 

        परंतु मातृस्नेह उमड़ आने से वे कुछ भी बोल न सके, बेहोश-से खड़े रहे। तब महर्षि‍ ने कुपित हो उन सब पुत्रों को शाप दे दिया। 

        शापग्रस्त होने पर वे अपनी चेतना( होश) खो बैठे और तुरन्त मृग एवं पक्षि‍यों के समान जड़-बुद्धि हो गये।
        "महाभारत: वनपर्व: अध्‍याय: (११७ )वाँ श्लोक 14-29 का हिन्दी अनुवाद
        __________

        तदनन्तर शत्रुपक्ष के वीरों का संहार करने वाले परशुराम सबसे पीछे आश्रम पर आये। उस समय महातपस्वी महाबाहु जमदग्नि ने उनसे कहा-‘बेटा ! अपनी इस पापिनी माता को अभी मार डालो और इसके लिये मन में किसी प्रकार का खेद न करो। तब परशुराम ने फरसा लेकर उसी क्षण माता का मस्तक काट डाला। 

        इतिहास में एक व्यक्ति वह हुआ जिसने अपने पिता के कहने पर  अपनी निर्दोष माता को केवल व्यभिचारी होने के शक में कत्ल कर दिया - गर्भस्थ शिशुओं की हत्या की वह भगवान बना दिया गया । जबकि एक व्यक्ति वह भी था जिसने पिता के कहने पर अपनी निर्दोष माता ओं का कत्ल नहीं किया और उल्टे पिता को ही दोषी सिद्ध किया स्वयं  परिपूर्णत्तम ब्रह्म ने  अपने अशांवतारों सहित स्वयं अवतार लिया परन्तु उनको पुरोहितों नें वह सम्मान नहीं दिया जिसपर उनका अधिकार था।  

        ______
        कालिका पुराण में भी महाभारत वन पर्व के समान कथा है।

        "एकदा तस्य जननी स्नानार्थं रेणुका गता।
        गङ्गातोये ह्यथापश्यन्नाम्ना चित्ररथं नृपम्।८३.८।
        अनुवाद:-
        एक बार परशुराम की माता रेणुका स्नान के लिए गयीं तभी  गंगा के जल में स्नान करते हुए  चित्ररथ नामक एक राजा को देखा।८।

        "भार्याभिः सदृशीभिश्च जलक्रीडारतं शुभम्।
        सुमालिनं सुवस्त्रं तं तरुणं चन्द्रमालिनम्। ८३.९ ।।
        अनुवाद:-
        वह अपनी सुन्दर पत्नीयों के साथ शुभ जल क्रीडा में रत था। वह राजा सुन्दर मालाओं  सुन्दर वस्त्र  से युक्त युवा चन्द्रमा के समान सुशोभित हो रहा था।९।

        "तथाविधं नृपं दृष्ट्वा सञ्जातमदना भृशम्।
        रेणुका स्पृहयामास तस्मै राज्ञे सुवर्चसे। ८३.१० ।
        अनुवाद:-
        उस प्रकार राजा को देखकर वह रेणुका अत्यधिक काम से पीडित हो गयी और रेणुका ने उस वर्चस्व शाली राजा की इच्छा की।१०।

        "स्पृहायुतायास्तस्यास्तु संक्लेदः समजायत।
        विचेतनाम्भसा क्लिन्ना त्रस्ता सा स्वाश्रमं ययौ। ८३.११ ।।  
        अनुवाद:-
        राजा की इच्छा करती हुई वह रज:स्रवित हो गयी
        और चेतना हीन रज स्राव के जल से भीगी हुई डरी हुई अपने आश्रम को गयी।।११।

        "अबोधि जमदग्निस्तां रेणुकां विकृतां तथा।
        धिग् धिक्काररतेत्येवं निनिन्द च समन्ततः। ८३.१२ ।।
        अनुवाद:-
        उस रेणुका को जमदग्नि ने विकृत अवस्था में जानकर  उसकी सब प्रकार से निन्दा की और उस रति पीडिता को धिक्कारा।१२।

        "ततः स तनयान् प्राह चतुरः प्रथमं मुनिः।
        रुषण्वत्प्रमुखान् सर्वानेकैकं क्रमतो द्रुतम्।८३.१३। 
        अनुवाद:-
        तब  क्रोधित जमदग्नि ने अपने रुषणवत् आदि चारों पुत्रों से एक एक से कहा। १३।

        "छिन्धीमां पापनिरतां रेणुकां व्यभिचारिणीम्।
        ते तद्वचो नैव चक्रुर्मूकाश्चासन् जडा इव।८३.१४। 
        अनुवाद:-
        जल्दी ही पाप में निरत इस  रेणुका को  काट दो 
        लेकिन  पुत्र उनकी बात न मान कर मूक और जड़ ही बने रहे।१४।

        कुपितो जमदग्निस्ताञ्छशापेति विचेतसः।
        भवध्वं यूयमाचिराज्जडा गोबुद्धिर्गर्द्धिता:।
         ८३.१५ ।।अनुवाद:-

        क्रोधित जमदग्नि ने उन सबको शाप दिया की सभी जड़ बुद्धि हो जाएं । कि तुम सब  सदैव के लिए घृणित   जड़ गो बुद्धि को प्राप्त हो जाओ।१५।

        अथाजगाम चरमो जामदग्न्येऽतिवीर्यवान्।।
        तं च रामं पिता प्राह पापिष्ठां छिन्धि मातरम्।
         ८३.१६ ।।
        अनुवाद:-
        तभी जमदग्नि के अन्तिम पुत्र शक्तिशाली परशुराम आये  जमदग्नि ने परशुराम से कहा पापयुक्ता इस माता को तुम काट दो।१६।

        स भ्रातृंश्च तथाभूतान् दृष्ट्वा ज्ञानविवर्जितान्।। 
        पित्रा शप्तान् महातेजाः प्रसूं परशुनाच्छिनत्।
        ८३.१७ ।।
        अनुवाद:-
        पिता के  द्वारा  शापित ज्ञान से शून्य अपने भाइयों को देखकर उस परशुराम ने अपनी माता रेणुका का शिर फरसा से काट दिया ।

        "रामेण रेणुकां छिन्नां दृष्ट्वा विक्रोधनोऽभवत्।। 
        जमदग्निः प्रसन्नः सन्निति वाचमुवाच ह।८३.१८ ।।
        अनुवाद:-
        परशुराम के द्वारा कटी हुई रेणुका को देखकर 
        जमदग्नि क्रोधरहित हो गये। और जमदग्नि प्रसन्न होते हुए यह वचन बोले!।१८।

        "प्रीतोऽस्मि पुत्र भद्र ते यत् त्वया मद्वचः कृतम्।। ८३.१८- १/२।
        अनुवाद:-
        मैं प्रसन्न हूँ। पुत्र तेरा कल्याण हो !  तू मुझसे कुछ माँग ले!।१९।

        "श्रीकालिकापुराणे त्र्यशीतितमोऽध्यायः।८३।

        शास्त्रों के कुछ गले और दोगले विधान जो जातीय द्वेष की परिणित थे। -
        उनसे प्रभावित पुरोहितों नें पुराणों में कालान्तर में लेखन कार्य जोड़ दिए-

        सहस्रबाहु की कथा को विपरीत  अर्थ -विधि से लिखा गया

        परशुराम ने  कभी भी पृथ्वी से २१ बार क्षत्रिय हैहयवंशीयों का वध किया ही नहीं।
        परन्तु इस अस्तित्व हीन बात को बड़ा- चढ़ाकर बाद में लिखा गया।
        ____________________________________
        अब प्रश्न यह भी उठता है  !
        कि जब धर्मशास्त्र इस बात का विधान करते हैं 
        कि ब्राह्मण की चार पत्नीयाँ हो सकती हैं उनमें से दो पत्नीयाँ ब्राह्मणी और क्षत्राणी के गर्भ से ब्राह्मण ही उत्पन्न होगा और शेष दो वैश्याणी और शूद्राणी के गर्भ से जो पुत्र होंगे वे ; ब्राह्मणत्व से रहित माता की जाति के ही समझे जाते हैं --
        कि इसी महाभारत के अनुशासन पर्व में दानधर्म नामक उपपर्व के अन्तर्गत (वर्णसंकरकथन) नामक( अड़तालीसवाँ अध्याय) में यह  वर्णन है ।
        देखें निम्न श्लोक -

        भार्याश्चतश्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते।
        आनुपूर्व्याद् द्वेयोर्हीनौ मातृजात्यौ प्रसूयत:।४।(महाभारत अनुशासन पर्व का दानधर्म नामक उपपर्व)

        कि ब्राह्मण की चार पत्नीयाँ हो सकती हैं उनमें से दो पत्नीयाँ ब्राह्मणी और क्षत्राणी के गर्भ से सन्तान केवल ब्राह्मण ही उत्पन्न होगी !
        और शेष दो वैश्याणी और शूद्राणी पत्नीयों के गर्भ से जो सन्तान होंगी  वे ; ब्राह्मणत्व से रहित माता की जाति की ही समझी जाएगी --।।४।।
        इसी अनुशासन पर्व के इसी अध्याय में वर्णन है कि 
        "तिस्र: क्षत्रियसम्बन्धाद्  द्वयोरात्मास्य जायते। हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृति:।७।।

        अर्थ:-क्षत्रिय से क्षत्रियवर्ण की स्त्री और वैश्यवर्ण की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है ; वह क्षत्रिय वर्ण का होता है।तीसरी पत्नी शूद्रा के गर्भ से हीन वर्ण वाले  शूद्र उत्पन्न होते हैं जिन्हें उग्र कहते हैं यह स्मृति (धर्मशास्त्र)का कथन है।७।

        (महाभारत अनुशासन पर्व में दानधर्म नामक उपपर्व के अन्तर्गत वर्णसंकरकथन नामक अड़तालीसवाँ अध्याय का सप्तम श्लोक -) (पृष्ठ संख्या- ५६२५) गीता प्रेस का संस्करण)
        _______________
        मनुस्मृति- में भी देखें निम्न श्लोक
        यथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्मास्य जायते ।आनन्तर्यात्स्वयोन्यां तु तथा बाह्येष्वपि क्रमात् ।।10/28

        अर्थ- जिस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों में से दो में से दो में अपनी समान उत्पन्न होता है उसी तरह आनन्तर (खारिज) जाति में भी क्रम से होता है।१०/२८
        न ब्राह्मणक्षत्रिययोरापद्यपि हि तिष्ठतोः ।कस्मिंश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते 3/14
        __________________
        महाभारत के उपर्युक्त अनुशासन पर्व से उद्धृत और आदिपर्व  से उद्धृत क्षत्रियों के नाश के वाद क्षत्राणीयों में बाह्मणों के संयोग से उत्पन्न पुत्र- पुत्री क्षत्रिय किस विधान से हुई  दोनों तथ्य परस्पर विरोधी होने से क्षत्रिय उत्पत्ति का प्रसंग काल्पनिक व मनगड़न्त ही सिद्ध करते हैं ।


        मिध्यावादीयों ने मिथकों की आड़ में अपने स्वार्थ को दृष्टि गत करते हुए आख्यानों की रचना की ---

        कौन यह दावा कर सकता है ? कि ब्राह्मणों से क्षत्रिय-पत्नीयों में क्षत्रिय ही कैसे उत्पन्न हुए ? 
        किस सिद्धांत की अवहेलना करके  ! क्या पुरोहित जो कह दे वही सत्य हो जाएगा ?

          

        "प्रधानता बीज की होती है नकि खेत की
        क्यों कि दृश्य जगत में फसल का निर्धारण बीज के अनुसार ही होता है नकि स्त्री रूपी खेत के अनुसार--

        सहस्रबाहु की पूजा का विधान ( नारदपुराण-पूर्वाद्ध- में किया गया है।
        शास्त्रों में  भगवान की   पूजा का विधान तो हुआ है दुष्ट या व्यभिचारी की पूजा का विधान तो नही
         हुआ है। 


        बुद्धिमान कार्तवीर्य अर्जुन हनुमान की पूजा से जुड़ा हुए हैं
        विशेष रूप से देवता की पूजा करनी चाहिए और ऊपर बताए अनुसार फल प्राप्त करना चाहिए 75-106।

        यह श्री बृहन्नारायण पुराण के पूर्वी भाग में बृहदुपाख्यान के तीसरे भाग का पचहत्तरवाँ अध्याय है, जिसका शीर्षक दीपक की विधि का विवरण है।।75।।

        अनेन मनुना मन्त्री ग्रहग्रस्तं प्रमार्जयेत् ।।
        आक्रंदंस्तं विमुच्याथ ग्रहः शीघ्रं पलायते ।। ७५-१०४।

        मनवोऽमी सदागोप्या न प्रकाश्या यतस्ततः ।।
        परीक्षिताय शिष्याय देया वा निजसूनवे । ७५-१०५ 

        हनुमद्भजनासक्तः कार्तवीर्यार्जुनं सुधीः ।।
        विशेषतः समाराध्य यथोक्तं फलमाप्नुयात् ।। ७५-१०६।

        इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे दीपविधिनिरूपणं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७५ ।।

        नारदपुराणम्- पूर्वार्द्ध अध्यायः ७६
        _____________________

                        "नारद उवाच।
        कार्तवीर्यतप्रभृतयो नृपा बहुविधा भुवि ।
        जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः ।।१।।
        अनुवाद:-
        देवर्षि नारद कहते हैं ! पृथ्वी पर कार्तवीर्य आदि राजा अपने कर्मानुगत होकर उत्पन्न होते और विलीन हो जाते हैं। १-।

        तत्कथं राजवर्योऽसौ लोकेसेव्यत्वमागतः ।।
        समुल्लंघ्य नृपानन्यानेतन्मे नुद संशयम् ।।२ ।।
        अनुवाद:-
        तब उन्हीं सभी राजाओं को लाँघकर कार्तवीर्य किस प्रकार संसार में पूज्य हो गये यही मेरा संशय है।

                     "सनत्कुमार उवाच"
        श्रृणु नारद वक्ष्यामि संदेहविनिवृत्तये।।
        यथा सेव्यत्वमापन्नः कार्तवीर्यार्जुनो भुवि।३।
        अनुवाद:-
        सनत्कुमार ने कहा! हे नारद ! मैं आपके संशय की निवृति हेतु वह तथ्य कहता हूँ। जिस प्रकार से कार्तवीर्य अर्जुन पृथ्वी पर पूजनीय( सेव्यमान) कहे गये हैं।३।

        यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले।।
        दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम्।४।
        अनुवाद:-
        ये पृथ्वी लोक पर सुदर्शन चक्र के अवतार हैं। इन्होंने महर्षि दत्तात्रेय की आराधना से उत्तम तेज प्राप्त किया।४।*******

        तस्य क्षितीश्वरेंद्रस्य स्मरणादेव नारद ।।
        शत्रूञ्जयति संग्रामे नष्टं प्राप्नोति सत्वरम् ।।५।।****
        अनुवाद:-
        हे नारद कार्तवीर्य अर्जुन के स्मरण मात्र से पृथ्वी पर विजय लाभ की प्राप्ति होती है। शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त होती है। तथा शत्रु का नाश भी शीघ्र ही हो जाता है।५।

        तेनास्य मन्त्रपूजादि सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ।।
        तुभ्यं प्रकाशयिष्येऽहं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ।६ ।
        अनुवाद:-
        कार्तवीर्य अर्जुन का मन्त्र सभी तन्त्रों में गुप्त है। मैं सनत्कुमार आपके लिए इसे आज प्रकाशित करता हूँ। जो सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।६।

        वह्नितारयुता रौद्री लक्ष्मीरग्नींदुशांतियुक् ।।
        वेधाधरेन्दुशांत्याढ्यो निद्रयाशाग्नि बिंदुयुक् ।७।

        पाशो मायांकुशं पद्मावर्मास्त्रे कार्तवीपदम् ।
        रेफोवा द्यासनोऽनन्तो वह्निजौ कर्णसंस्थितौ ।८।

        मेषः सदीर्घः पवनो मनुरुक्तो हृदंतिमः ।।
        ऊनर्विशतिवर्णोऽयं तारादिर्नखवर्णकः ।९ ।

        दत्तात्रेयो मुनिश्चास्यच्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।।
        कार्तवीर्यार्जुनो देवो बीजशक्तिर्ध्रुवश्च हृत् ।१०।

        शेषाढ्यबीजयुग्मेन हृदयं विन्यसेदधः ।।
        शांतियुक्तचतुर्थेन कामाद्येन शिरोंऽगकम् ।।११ ।।

        इन्द्वाढ्यं वामकर्णाद्यमाययोर्वीशयुक्तया ।।
        शिखामंकुशपद्माभ्यां सवाग्भ्यां वर्म विन्यसेत् ।१२।।

        वर्मास्त्राभ्यामस्त्रमुक्तं शेषार्णैर्व्यापकं पुनः ।।
        हृदये जठरे नाभौ जठरे गुह्यदेशतः ।।१३ ।।

        दक्षपादे वामपादे सक्थ्नि जानुनि जंघयोः ।।
        विन्यसेद्बीजदशकं प्रणवद्वयमध्यगम् ।।१४ ।।

        ताराद्यानथ शेषार्णान्मस्तके च ललाटके ।।
        भ्रुवोः श्रुत्योस्तथैवाक्ष्णोर्नसि वक्त्रे गलेंऽसके।१५ ।

        सर्वमन्त्रेण सर्वांगे कृत्वा व्यापकमादृतः ।।
        सर्वेष्टसिद्धये ध्यायेत्कार्तवीर्यं जनेश्वरम् ।। १६ ।।

        इनका वह मन्त्र उन्नीस अक्षरों का है‌( यह मूल में श्लोक संख्या 7- से 9 तक वर्णित है। इसका मन्त्रोद्धार विद्वान जन करें अत: इसका अनुवाद करना भी त्रुटिपूर्ण होगा  इस मन्त्र के ऋषि दत्तात्रेय हैं। छन्द अनुष्टुप् और देवाता हैं कार्तवीर्य अर्जुन " बीज है ध्रुव- तथा  शक्ति है हृत् - शेषाढ्य  बीज द्वय से हृदय न्यास करें। शन्तियुक्त- चतुर्थ मन्त्रक्षर से शिरोन्यास इन्द्राढ्यम् से वाम कर्णन्यास अंकुश तथा पद्म से शिखान्यास वाणी से कवचन्यास करें हुं फट् से अस्त्रन्यास करें। तथा शेष अक्षरों से पुन: व्यापक न्यास करना चाहिए इसके बाद सर्व सिद्धि हेतु जनेश्वर ( लोगों के ईश्वर) कार्तवीर्य का चिन्तन करें।७-१६।

        उद्यद्रर्कसहस्राभं सर्वभूपतिवन्दितम् ।।
        दोर्भिः पञ्चाशता दक्षैर्बाणान्वामैर्धनूंषि च ।१७ ।।
        _________________
        दधतं स्वर्णमालाढ्यं रक्तवस्त्रसमावृतम् ।।
        चक्रावतारं श्रीविष्णोर्ध्यायेदर्जुनभूपतिम् ।१८ ।।
        अनुवाद:-
        ध्यान :- इनकी कान्ति (आभा) हजारों उदित सूर्यों के समान है। संसार के सभी राजा इनकी वन्दना अर्चना करते हैं। सहस्रबाहु के 500 दक्षिणी हाथों में वाण और  500 उत्तरी (वाम) हाथों में धनुष हैं। ये स्वर्ण मालाधारी तथा रक्वस्त्र( लाल वस्त्र) से समावृत ( लिपटे हुए ) हैं। ऐसे श्री विष्णु के चक्रावतार राजा सुदर्शन का ध्यान करें।१७-१८।

        __________________

        लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयात्तिलैः ।।
        सतण्डुलैः पायसेन विष्णुपीठे यजत्तुतम् ।१९ ।

        षट्कोणेषु षडंगानि ततो दिक्षु विविक्षु च ।।
        चौरमदविभञ्जनं मारीमदविभंजनम् ।२०।।

        अरिमदविभंजनं दैत्यमदविभंजनम् ।।
        दुष्टनाशं दुःखनाशं दुरितापद्विनाशकम् ।२१।

        दिक्ष्वष्टशक्तयः पूज्याः प्राच्यादिष्वसितप्रभाः ।।
        क्षेमंकरी वश्यकरी श्रीकरी च यशस्करी ।२२।

        आयुः करी तथा प्रज्ञाकरी विद्याकरी पुनः।
        धनकर्यष्टमी पश्चाल्लोकेशा अस्त्रसंयुताः ।२३।

        अनुवाद:-ध्यान के उपरांत एक लाख और  जप के उपरान्त होम तिल  चावल तथा पायस( खीर ) से पूजा करके  विष्णु पीठ पर इनका पूजन करें । उसके बाद षट्कोण में पूजा करके दिक् विदिक् में  षडंगदेवगण की पूजा करें।

        इसमें चौरमद नारीमद शत्रुमद दैत्यमद का और दुष्ट का और र दु:ख का तथा पाप का नाश होता है। 


        अनपत्यः क्रतुस्त्वस्मिन्स्मृतो वैवस्वतेन्तरे॥
        अत्रेः पत्न्यो दशैवासन्सुन्दर्यश्च पतिव्रताः॥३८॥

        "अनुवाद:- वैवस्वत मन्वन्तर में सप्तर्षियों में एक  क्रतु प्रजापति सन्तान हीन ही कहे गये । तृतीय प्रजापति अत्रि की दश सुन्दर और पतिव्रता पत्नीयाँ थीं।

        भद्राश्वस्य घृताच्यां  जज्ञिरे दश चाप्सराः ॥३९॥

        "अनुवाद:- जो भद्राश्व वर्ष के अधिपति भद्राश्व की घृताची अप्सरा में उत्पन्न दश पुत्रीयाँ थीं।

        भद्रा शूद्रा च मद्रा च नलदा जलदा तथा ॥ उर्णा पूर्णा च देवेशि या च गोपुच्छला स्मृता॥7.1.20.४०॥

        तथा तामरसा नाम दशमी रक्तकोटिका॥    एतासां च महादेवि ख्यातो भर्त्ता प्रभाकर:॥४१॥

        अनुवाद:- भद्रा, मुद्रा, मद्रा,नलदा, जलदा,उर्णा, पूर्णा ,गोपुच्छला कही गयी है॥४०

        अनुवाद:- तथा तामरसा, दशमी हैं जिसे रक्त कोटिका भी कहते है इन सब महा देवीयाों के भर्ता प्रभाकर अत्रि थे।४१। 

        *********

        स्वर्भानुना हते सूर्ये पतितेस्मिन्दिवो महीम् ॥
        तमोऽभिभूते लोकेस्मिन्प्रभा येन प्रवर्त्तिता॥
        ४२॥

        ******

        अनुवाद:-  स्वर्भानु (राहु) के द्वारा आहत सूर्य देवलोक से पृथ्वी पर गिरने पर यह लोक अन्धकार से ढक गया तब जिस अत्रि के द्वारा प्रभा उत्पन्न कर फैलाया गयी।४२।

        "स्वस्ति तेस्त्विति चैवोक्तः पतन्निह दिवाकरः ॥
        ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य न पपात यतः प्रभुः ॥ ४३ ॥

        अनुवाद:- स्वस्ति स्वस्ति ते:( तेरा कल्याण हो ! तेरा कल्याण हो! और एसा कहने पर पृथ्वी लोक पर गिरता हुआ सूर्य(दिवाकर) ब्रह्मर्षि अत्रि के वचन से  फिर नहीं गिरा जिससे सामर्थ्यवान् अत्रि को प्रभाकर इस प्रकार से कहा गया।

        ततः प्रभाकरेत्युक्तः प्रभुरेवं महर्षिभिः॥
        भद्रायां जनयामाम् सोमं पुत्रं यशस्विनम्॥४४॥

        अनुवाद:- अत्रि को प्रभाकर इस प्रकार से कहा गया। महर्षि प्रभाकर अत्रि ने भद्रा नाम की पत्नी में सोम (चन्द्रमा) उत्पन्न किया। जो बड़ा यशस्वी हुआ।४४।

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        त्विषिमान्घर्मपुत्रस्तु सोमो देवो वरस्तु सः ॥
        शीतरश्मिः समुत्पन्नः कृत्तिकासु निशाचरः॥४५॥

        अनुवाद:- 45. तेजस्वी भगवान सोम अत्रि के केवल धर्म के पुत्र थे । उसकी किरणें शीतल हैं. उनका जन्म कृत्तिकाओं से हुआ था। वह रात्रि-( (निशा) में  चर( गमन) करने वाला होने से (निशाचर ) है।। 

        त्विष= दीप्तौ-

        पिता सोमस्य वै देवि ! जज्ञेऽत्रिर्भगवानृषिः ॥
        तत्रात्रिः सर्वलोकेशं भृत्वा स्वे नयने स्थितः ॥४६

        अनुवाद:- हे देवि ! भगवान अत्रि ने चन्द्रमा को उत्पन्न किया अत: वे सोम के पिता हुए वहाँ अत्रि ने सभी लोके के स्वामी चन्द्रमा को अपने नेत्रों में धारणकर स्थित किया।46।

        त्विषिमान् घर्म्मपुत्रस्तु सोमो विश्वावसुस्तथा।
        शीतरश्मिः समुत्पन्नः कृत्तिकासु निशाकरः ।। ५३.१०५ ।

        अनुवाद:- घर्म्म पुत्र त्विषमान्, सोम, विश्वासु- शीतरश्मि ये सब रात्रि करने वाले कृतिका नक्षत्र में उत्पन्न हुए।५३.१०५।


        विश्वावसु- वैदिक ज्योतिष में उनतीसवें संवत्सर ("जोवियन वर्ष)" को संदर्भित करता है ।

        "श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते ज्योतिःसन्निवेशो नाम त्रिपञ्चाशोऽध्यायः।५३।

        त्विषिमान् .-घर्म( सूर्यातप- घाम) का पुत्र; 1 चाक्षुष युग में कृत्तिकों से जन्मीं; पाँच किरणों में से 2 । 3

        1  त्विषिमान्घर्मपुत्रस्तु सोमदेवो वसुः स्मृतः।
        शुक्रो देवस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरराजकः ।। ५३.८० ।।

        घर्म शब्द को अनेक पुराणों में भ्रान्ति वश धर्म लिखकर प्रकरण के विपरीत अर्थ कर दिया गया है। ज्योतिषचक्र प्रकरण में धर्म के स्थान पर घर्म शब्द ही युक्तियुक्त है।

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        स्कन्दपुराण-खण्डः ७ (प्रभासखण्डः)प्रभासक्षेत्र माहात्म्यम्- अध्यीय 20-

        अनपत्यः क्रतुस्त्वस्मिन्स्मृतो वैवस्वतेंतरे ॥
        अत्रेः पत्न्यो दशैवासन्सुन्दर्यश्च पतिव्रताः ॥३८॥

        भद्राश्वस्य घृताच्यां जज्ञिरे दश चाप्सराः ॥३९॥
        भद्रा शूद्रा च मद्रा च नलदा जलदा तथा ॥
        उर्णा पूर्णा च देवेशि या च गोपुच्छला स्मृता॥7.1.20.४०॥


        तथा तामरसा नाम दशमी रक्तकोटिका ॥
        एतासां च महादेवि ख्यातो भर्त्ता प्रभाकरः ॥ ४१ ॥
        स्वर्भानुना हते सूर्ये पतितेस्मिन्दिवो महीम् ॥
        तमोऽभिभूते लोकेस्मिन्प्रभा येन प्रवर्त्तिता ॥! ॥ ४२ ॥
        स्वस्ति तेस्त्विति चैवोक्तः पतन्निह दिवाकरः ॥
        ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य न पपात यतः प्रभुः ॥ ४३ ॥
        ततः प्रभाकरेत्युक्तः प्रभुरेवं महर्षिभिः ॥
        भद्रायां जनयामाम् सोमं पुत्रं यशस्विनम् ॥ ४४ ॥
        त्विषिमान्धर्मपुत्रस्तु सोमो देवो वरस्तु सः ॥
        शीतरश्मिः समुत्पन्नः कृत्तिकासु निशाचरः॥ ।४५॥
        पिता सोमस्य वै देवि जज्ञेऽत्रिर्भगवानृषिः ॥
        तत्रात्रिः सर्वलोकेशं भृत्वा स्वे नयने स्थितः ॥ ४६ ॥
        कर्मणा मनसा वाचा शुभान्येव समा चरत् ॥
        काष्ठकुड्यशिलाभूत ऊर्द्ध्वबाहुर्महाद्युतिः ॥४७॥
        सुदुस्तरं नाम तपस्तेन तप्तं महत्पुरा ॥
        त्रीणि वर्षसहस्राणि दिव्यानि सुरसुंदरि ॥ ४८ ॥
        तस्योर्द्ध्वरेतसस्तत्र स्थितस्यानिमिषस्य ह ॥
        सोमत्वं वपुरापेदे महाबुद्धेस्तु वै शुभे ॥ ४९ ॥
        ऊर्द्ध्वमाचक्रमे तस्य सोमसंभावितात्मनः ॥
        नेत्राभ्यां सोमः सुस्राव दशधा द्योतयन्दिशः ॥ 7.1.20.५० ॥
        तद्गर्भं विधिना दृष्टा दिशोदश दधुस्तदा ॥
        समेत्य धारयामासुर्न च धर्तुमशक्नुवन् ॥ ॥ ५१ ॥
        स ताभ्यः सहसैवेह दिग्भ्यो गर्भश्च शाश्वतः ॥ पपात भावयँल्लोकाञ्छीतांशुः सर्वभावनः ॥ ५२ ॥
        यदा न धारणे शक्तास्तस्य गर्भस्य ताः स्त्रियः ॥
        ततस्ताभ्यः स शीतांशुर्निपपात वसुंधराम् ॥ ५३ ॥
        पतितं सोममालोक्य ब्रह्मा लोकपितामहः॥
        रथमारोपयामास लोकानां हितका म्यया ॥ ५४ ॥



        38. यह स्मरणीय है कि इस वैवस्वत मन्वन्तर में क्रतु निःसंतान थे । अत्रि की दस पत्नियाँ थीं। वे सभी सुन्दर और पवित्र थे।

        39. घृताचि में   दस दिव्य देवियाँ भद्राश्व( भविष्य पुराण भविष्य पर्व में भद्राश्व के स्थान पर रूद्राश्व है)  से उत्पन्न हुई थी ।

        40-41. हे महान देवी, प्रभाकर अत्रि इन दसों के पति के रूप में प्रसिद्ध हैं: भद्रा , शूद्रा, मद्रा , नलदा , जलदा, उरना [ श्रण ?], पूर्णा , गोपुच्चला, ताम्रसा और रक्तकोटिका दसवीं पत्नी है।

        42-44. जब सूर्य को स्वर्भानु (अर्थात राहु ) ने मारा और सूर्य स्वर्ग से जमीन पर गिर पड़े, तो पूरी दुनिया अंधेरे से घिर गई ! उस समय अत्रि ऋषि ने कहा: तेरा कल्याण तेरा कल्याण हो"। दिवाकर (सूर्य देव) जो गिरने वाले थे, फिर वे नहीं गिरे। 

        इसलिए ऋषि अत्रि को प्रभाकर कहा जाता था क्योंकि उन्होंने प्रकाश( प्रभा) को क्रियान्वित किया। महान ऋषियों ने उन अत्रि को ऐसा ही कहा है ।

        भगवान प्रभाकर अत्रि  ने भद्रा से प्रतिष्ठित पुत्र सोम को जन्म दिया।

        अत्रि अग्नि का रूपान्तरण है। ईरानी ग्रन्थों में अतर- अग्नि का वाचक है। इस श्लोक में भी अत्रि को प्रकाश करने वाला " कहा गया है।

        45. तेजस्वी भगवान सोम घर्म के पुत्र थे । उसकी किरणें शीतल हैं. उनका जन्म कृत्तिकाओं से हुआ था । वह रात्रि का कारण है। (निशाचर ))। 

        46. ​​हे देवी, अत्रि ने समस्त लोकों के स्वामी को अपनी दृष्टि में रखा और स्वयं को इस प्रकार स्थापित किया। इस प्रकार महर्षि अत्रि सोम के पिता बने।

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        47. मानसिक, वाचिक और शारीरिक रूप से उन्होंने जो कुछ भी किया वह शुभ ही था।

        अपनी तपस्या के दौरान अत्यधिक चमकदार ऋषि लकड़ी के टुकड़े, दीवार या चट्टान की तरह स्थिर रहे। उसने अपनी भुजाएँ ऊपर उठा रखी थीं।

        48. पूर्व में उनके द्वारा की गई तपस्या अत्यंत कठोर एवं महान थी। हे सुन्दरी देवी, उन्होंने देवताओं की गणना के अनुसार तीन हजार वर्षों तक तपस्या की।

        49. हे शुभ महिला, अत्यधिक बुद्धिमान महिला इस प्रकार बिना पलक झपकाए रह गई। उसने अपनी यौन ऊर्जा को उच्चीकृत कर लिया था। उनका शरीर सोम (चन्द्रमा) की अवस्था को प्राप्त हुआ।

        50. जैसे ही उनके शरीर ने सोम की स्थिति प्राप्त की, चंद्रमा ऊपर उठे और सोम रस उनकी आंखों से बह निकला और दसों दिशाओं को प्रकाशित कर दिया।

        51. दसों प्रसन्न दिशाओं ने विधिपूर्वक इसे अपने गर्भ में धारण किया। उन्होंने इसे सामूहिक रूप से प्राप्त किया लेकिन वे इसे धारण नहीं कर सके।

        52. वह शाश्वत भ्रूण, शीतल किरण वाला चंद्रमा, सभी को प्रसन्न करने वाला, अचानक दिशाओं से नीचे गिर गया और लोकों को प्रकाशित कर दिया।

        53. जब वे स्त्रियाँ भ्रूण को पकड़ने में असमर्थ हो गईं, तो शीतांशु (ठंडी किरण वाला चंद्रमा) दिशाओं से जमीन पर गिर पड़ा।

        54. लोकों के पितामह ब्रह्मा ने पतित सोम को देखा। समस्त लोकों के कल्याण की इच्छा से उन्होंने उसे रथ पर बिठा लिया।

        55. हे देवी, हे सुरस की सुंदरी, मेरे द्वारा धर्मपरायणता स्थापित करने के उद्देश्य से रथ में एक हजार सफेद घोड़े लगाए गए थे। वह बोलने में सच्चा था।

        56. हे देवी, जब अत्रि के पुत्र महान आत्मा गिर पड़े, तो ब्रह्मा के प्रसिद्ध मानसिक पुत्रों ने उनकी स्तुति की।

        57. इनके साथ-साथ भृगु के सभी अंगिरसों और पुत्रों ने ऋग्वेद , सामवेद और अथर्ववेद के मंत्रों से उनकी स्तुति की ।

        58. जैसे-जैसे उनकी स्तुति की जा रही थी, देदीप्यमान सोम का तेज सुपोषित और बढ़ गया। उन्होंने तीनों लोकों को प्रकाशित किया।

        59 उस अति प्रसिद्ध व्यक्ति ने उस उत्कृष्ट रथ पर सवार होकर इक्कीस बार समुद्र-गहनी पृथ्वी की प्रदक्षिणा की।

        60. (उनके) तेजस् के अंश से , जो पृथ्वी पर पहुंचा, औषधीय जड़ी-बूटियां उत्पन्न हुईं (उत्पन्न हुईं) जो महान चमक के साथ चमकीं।

        61. उनसे वह (अर्थात चन्द्रमा) इस जगत् तथा चारों प्रकार के विषयों (सृष्टि) को सजीव करता है। ये ओषधि (औषधीय जड़ी-बूटियाँ) सत्रह प्रकार की होती हैं (अनाज और दाल के रूप में)। वे परिपक्व होते हैं और फल देते हैं।


         "इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये चन्द्रोत्पत्तिवर्णनंनाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

        अनपत्यः क्रतुस्तस्मिन् स्मृतो वैवस्वतेन्तरे।
        अत्रेः पत्न्यो दशैवासन् सुंदर्यश्च पतिव्रताः।६८।

        भद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः।
        भद्राभद्रा च जलदा मंदा नंदा तथैव च।६९।

        बलाबला च विप्रेन्द्रा या च गोपाबला स्मृता।
        तथा तामरसा चैव वरक्रीडा च वै दश।७०।

        आत्रेयवंशप्रभवा स्तासां भर्ता प्रभाकरः।।
        स्वर्भानुपिहिते सूर्ये पतितेस्मिन्दिवो महीम्।.७१ ।

        तमोऽभिभूते लोकेस्मिन्प्रभा येन प्रवर्तिता।।
        स्वस्त्यस्तु हि तवेत्युक्ते पतन्निह दिवाकरः।७२ ।

        ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य पपात न विभुर्दिवः।
        ततः प्रभाकरेत्युक्तः प्रभुरत्रिर्महर्षिभिः।७३।

        भद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम्।
        स तासु जनयामास पुनः पुत्रांस्तपोधनः।७४।

        स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः।
        तेषां द्वौ ख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ च महौजसौ। ७५ ।

        दत्तो ह्यत्रिवरो ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः।।
        यवीयसी स्वसा तेषाममला ब्रह्मवादिनी।७६।

        तस्य गोत्रद्वये जाताश्चत्वारः प्रथिता भुवि।।
        श्यावश्च प्रत्वसश्चैव ववल्गुश्चाथ गह्वरः।७७ ।

        आत्रेयाणां च चत्वारः स्मृताः पक्षा महात्मनाम्।।
        काश्यपो नारदश्चैव पर्वतानुद्धतस्तथा।.७८।

        श्रीलिंगमहापुराणे पूर्वभागे देवादिसृष्टिकथनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः।। ६३।।

        अनुवाद:-  वैवस्वत मन्वन्तर में क्रतु प्रजापति  सन्तान हीन ही कहे गये । तृतीय प्रजापति अत्रि की दश सुन्दर और पतिव्रता पत्नीयाँ थीं।६८।

        "अनुवाद:- भद्राश्व वर्ष के अधिपति भद्राश्व की घृताची अप्सरा में उत्पन्न दश पुत्रीयाँ थीं।६९।

        अनुवाद:- भद्रा, मुद्रा, मद्रा,नलदा, जलदा,उर्णा, पूर्णा, ,गोपुच्छला कही गयी है।७०।

        अनुवाद:- तथा तामरसा,और  दशमी  रक्त कोटिका थी इन सब महा देवीयों के भर्ता प्रभाकर अत्रि थे।।७१। 

        अनुवाद:-  स्वर्भानु (राहु) के द्वारा आहत सूर्य के देवलोक से पृथ्वी पर गिरने पर यह लोक अन्धकार से ढक गया तब जिस अत्रि के द्वारा ही प्रभा( प्रकाश) उत्पन्न कर फैलाया गयी।७२।

        अनुवाद:- स्वस्ति स्वस्ति ते:( तेरा कल्याण हो ! तेरा कल्याण हो! और एसा कहने पर पृथ्वी लोक पर गिरता हुआ सूर्य(दिवाकर) ब्रह्मर्षि अत्रि के वचन से  फिर नहीं गिरा जिससे सामर्थ्यवान् अत्रि को प्रभाकर इस प्रकार से कहा गया।७३।

        अनुवाद:- अत्रि को प्रभाकर इस प्रकार से कहा गया। महर्षि प्रभाकर अत्रि ने भद्रा नाम की पत्नी में सोम ( चन्द्रमा) उत्पन्न किया। जो बड़ा यशस्वी हुआ।७४।

        सन्दर्भ:-

        लिंगपराण-अध्याय-63 का अनुवाद-

        __________________________________

         अनुवाद:-  उस तपोवन ऋषि ने उन पत्नीयों से पुन: और भी पुत्र उत्पन्न किए वे सब स्वस्त्यात्रेय कहलाए और वेदों में पारंगत ऋषि हुए।७५।

        अनुवाद:-  उनमें दो प्रसिद्ध यश वाले ब्रह्मिष्ठ और महान ओजस्वी हुए। दत्तात्रेय अत्रि के ज्येष्ठ पुत्र और दुर्वासा उनके छोटे पुत्र थे। अत्रि की पुत्री अमला ब्रह्म वादिनी हुई।७६।

        अनुवाद:-  उनके दो गोत्रों में श्याव, प्रत्वस, ववल्गु गह्वर ये चार उपगोत्र उत्पन्न हुए। ये भूलोक में प्रसिद्ध है। ७७।

        अनुवाद:-  महान आत्मा वाले आत्रेयों  के चार पक्ष कहे गये हैं। काश्यप, नारद, पर्वत,अनुद्धत ।७८।

        सन्दर्भ:-

        लिंगपराण-अध्याय-63 का अनुवाद-

         स्कन्द पुराण

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        स्कन्द पुराण-अध्याय 20 - चन्द्रमा की उत्पत्ति -: खंड 1 - प्रभास-क्षेत्र-महात्म्य


        38. यह स्मरणीय है कि इस वैवस्वत मन्वन्तर में क्रतु ऋषि निःसंतान थे । अत्रि की दस पत्नियाँ थीं। वे सभी सुन्दर और पवित्र थी।

        39. घृताची में दस दिव्य देवियाँ भद्राश्व से उत्पन्न हुई थीं ।

        40-41. हे महान देवी, प्रभाकर ( अत्रि) इन दसों के पति के रूप में प्रसिद्ध हैं: भद्रा , शूद्रा, मद्रा , नलदा , जलदा, उरना [ श्रण ?], पूर्णा , गोपुच्छला, ताम्रसा और रक्तकोटिका दसवीं थी।

        42-44. जब सूर्य को स्वर्भानु (अर्थात राहु ) ने मारा और सूर्य स्वर्ग से जमीन पर गिर पड़े, तो पूरी दुनिया अंधेरे से घिर गई (आच्छादित हो गई)। उस समय अत्रि ऋषि ने कहा: तेरा कल्याण हो"। दिवाकर (सूर्य देव) जो गिरने वाले थे, फिर नहीं गिरे।

        इसलिए ऋषि को प्रभाकर कहा जाता था क्योंकि उन्होंने प्रकाश को क्रियान्वित किया। महान ऋषियों ने उनके विषय में ऐसा ही कहा। 

        भगवान प्रभाकर अत्रि ने भद्रा से प्रतिष्ठित पुत्र सोम को जन्म दिया।

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        45. तेजस्वी भगवान सोम "घर्म के पुत्र थे । उसकी किरणें शीतल हैं. उनका जन्म कृत्तिका नक्षत्र में हुआ था । वह रात्रि का कारण है ( निशाकरः ])। 

        46. ​​हे देवी, अत्रि ने समस्त लोकों के स्वामी को अपनी दृष्टि में रखा और स्वयं को इस प्रकार स्थापित किया। इस प्रकार महर्षि अत्रि सोम के पिता बने।

        47. मानसिक, वाचिक और शारीरिक रूप से उन्होंने जो कुछ भी किया वह शुभ ही था।

        अपनी तपस्या के दौरान अत्यधिक चमकदार ऋषि लकड़ी के टुकड़े, दीवार या चट्टान की तरह स्थिर रहे। उसने अपनी भुजाएँ ऊपर उठा रखी थीं।

        48. पूर्व में उनके द्वारा की गई तपस्या अत्यंत कठोर एवं महान थी। हे सुन्दरी देवी, उन्होंने देवताओं की गणना के अनुसार तीन हजार वर्षों तक तपस्या की।

        49. हे शुभ महिला, अत्यधिक बुद्धिमान महिला इस प्रकार बिना पलक झपकाए रह गई। उसने अपनी यौन ऊर्जा को उच्चीकृत कर लिया था। उनका शरीर सोम (चन्द्रमा) की अवस्था को प्राप्त हुआ।

        50. जैसे ही उनके शरीर ने सोम की स्थिति प्राप्त की, चंद्रमा ऊपर उठे और सोम रस उनकी आंखों से बह निकला और दसों दिशाओं को प्रकाशित कर दिया।

        51. दसों प्रसन्न दिशाओं ने विधिपूर्वक इसे अपने गर्भ में धारण किया। उन्होंने इसे सामूहिक रूप से प्राप्त किया लेकिन वे इसे धारण नहीं कर सकीं।

        52. वह शाश्वत भ्रूण, शीतल किरण वाला चंद्रमा, सभी को प्रसन्न करने वाला, अचानक दिशाओं से नीचे गिर गया और  जिसने लोकों को प्रकाशित कर दिया।

        53. जब वे स्त्रियाँ भ्रूण को पकड़ने में असमर्थ हो गईं, तो शीतांशु (ठंडी किरण वाला चंद्रमा) दिशाओं से जमीन पर गिर पड़ा।

        54. लोकों के पितामह ब्रह्मा ने पतित सोम को देखा। समस्त लोकों के कल्याण की इच्छा से उन्होंने उसे रथ पर बिठा लिया।

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        पूरोः पुत्रो महावीर्यो राजाऽऽसीज्जनमेजयः ।
        प्रचिन्वांस्तु सुतस्तस्य यः प्राचीमजयद् दिशम्।५।

        प्रचिन्वतः प्रवीरोऽभून्मनस्युस्तस्य चात्मजः ।
        राजा चाभयदो नाम मनस्योरभवत् सुतः।६।

        तथैवाभयदस्यासीत् सुधन्वा तु महीपतिः ।
        सुधन्वनो बहुगवः शम्यातिस्तस्य चात्मजः ।७ ।

        शम्यातेस्तु रहस्याती रौद्राश्वस्तस्य चात्मजः ।
        रौद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः ।८।******

        ऋचेयुः प्रथमस्तेषां कृकणेयुस्तथैव च ।
        कक्षेयुः स्थण्डिलेयुश्च सन्नतेयुस्तथैव च ।९।

        दशार्णेयुर्जलेयुश्च स्थलेयुश्च महायशाः ।
        धनेयुश्च वनेयुश्च पुत्रिकाश्च दश स्त्रियः ।। 1.31.१०।
        रुद्रा शूद्रा च भद्रा च मलदा मलहा तथा ।
        खलदा चैव राजेन्द्र नलदा सुरसापि च ।
        तथा गोचपला तु स्त्रीरत्नकूटा च ता दश।११।

        ऋषिर्जातोऽत्रिवंशे तु तासां भर्ता प्रभाकरः ।
        रुद्रायां जनयामास सुतं सोमं यशस्विनम् ।१२।

        स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम् ।
        तमोऽभिभूते लोके च प्रभा येन प्रवर्तिता ।१३।

        स्वस्ति तेऽस्त्विति चोक्तो वै पतमानो दिवाकरः ।
        वचनात् तस्य विप्रर्षेर्न पपात दिवो महीम् ।१४।

        अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः 
        यज्ञेष्वत्रेर्धनं चैव सुरैर्यस्य प्रवर्तितम् ।१५। 

        स तासु जनयामास पुत्रिकासु सनामकान् ।
        दश पुत्रान् महात्मा स तपस्युग्रे रतान्सदा ।१६।

        ते तु गोत्रकरा राजन्नृषयो वेदपारगाः ।
        स्वस्त्यात्रेया इति ख्याताः किं त्वत्रिधनवर्जिताः। १७।

                      (अध्यायः ३१)

        हे जनमेजय, पुरु का पुत्र अत्यंत शक्तिशाली राजा था प्रचिनवान्- था जिसने पूर्वी क्षेत्र पर विजय प्राप्त की।

        6-7. प्रचिनवान का पुत्र प्रवीर था जिसका पुत्र मनस्यु हुआ । उनके पुत्र राजा अभयद हुए और जिनका पुत्र राजा सुधन्वा था । उसका पुत्र बहुगव था जिसका पुत्र शाम्यति था।

        8. और इस शाम्याति का पुत्र राहस्याति  हुआ- जिसका पुत्र रौद्राश्व(भद्राश्व) था इसके  दस बेटे और दश बेटियाँ थीं।

        9-11. पुत्रों के नाम क्रमशः १-दशार्णोयु, २-"कृकणेयु , ३-कक्षेयु , ४-स्थण्डिलेयु-, ५-सन्नतेयु-, ६- ऋचेयु , ७-स्थलेयु , अत्यंत यशस्वी ८-जलेयु, ९-धनेयु और १० वाँ पुत्र वनेयु आदि थे । 

        रुद्रा शूद्रा च भद्रा च मलदा मलहा तथा ।
        खलदा चैव राजेन्द्र नलदा सुरसापि च ।
        तथा गोचपला तु स्त्रीरत्नकूटा च ता दश।११।

        पुत्रियों के नाम १-रुद्रा , २-शूद्रा , ३-भद्रा , ४-मलहा , ५-मलदा , ६-खलदा , ७- "नलदा , ८-सुरसा और ९-गोचपला १०-स्त्रीरत्नकूटा । इन दस पुत्रियाँ थीं। 11।

        12. अत्रि( अग्नि) वंश में जन्मे प्रभाकर ऋषि उनके पति थे।  उन्होंने रुद्रा* से अपने यशस्वी पुत्र सोम को जन्म दिया ।

        ब्रह्माण्ड पुराण आदि में रू ग्रा के स्थान पर भद्रा लिखा है। और अत्रि का दूसरा नाम प्रभाकर बताया है।

        13. राहु से पराजित होने पर सूर्य पृथ्वी पर गिर जाता है, और जब पूरी दुनिया अंधेरे से ढक जाती है तो वह अत्रि  अपनी किरणें हर जगह फैलाता है। 

        14. जब उस ऋषि ने कहा, "तुम्हारा भला हो" तो उसके शब्दों के अनुसार, सूर्य आकाश से नहीं नीचे नहीं  गिरता है।

        15. महान तपस्वी अत्रि महान कुलों के संस्थापक थे। उनके बलिदान पर देवताओं ने भी धन-सम्पत्ति को प्रवर्तित किया।

        16. इस उच्चात्मा ऋषि ने रौद्राश्व की दस पुत्रियों से दस पुत्रों को जन्म दिया जो सदैव कठिन तपस्या में लगे रहते थे।

        17. हे राजन, वे ऋषि , जो वेदों में पारंगत थे , परिवारों के संस्थापक थे। वे स्वस्तात्रेय के नाम से प्रवर्तित हुए। लेकिन अत्रि ने यज्ञों में धन वर्जित किया।

        श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि कुक्षेयुवंशानुकीर्तनं नाम एकत्रिंशोऽध्यायः ।। ३१ ।।

        भद्राश्व (भद्राश्व)।—पुरुवंश का एक राजा। वह राहस्याति(रहोवादी)का पुत्र था। भद्रश्व के दस पुत्र थे: ऋक्षेयु, कृषेयु, सन्नतेयु, घृतेयु, सितेयु, स्थण्डिलेयु, धर्मेयु, सम्मितेयु, कृतेयु और मतिनारा।

        अग्निरुवाच
        पुरोर्जनमेजयोऽभूत्प्राचीन्नन्तस्तु तत्सुतः ।
        प्राचीन्नन्तान्मनस्युस्तु तस्माद्वीतमयो तृपः ।। २७८.१ ।।

        शुन्धुर्वीतमयाच्चाऽभूच्छुन्धोर्बहुविधः सुतः ।
        बहुविधाच्च संयातिरहोवादी च तत्सुतः ।२७८.२ ।

        तस्य पुत्रोऽथ भद्राश्वो भद्राश्वस्य दशात्मजाः ।
        ऋचेयुश्च कृषेयुश्च सन्नतेयुस्तथात्मजः ।२७८.३ ।।

        घृतेयुश्च चितेयुश्च स्थण्डिलेयुश्च सत्तमः ।
        धर्म्मोयुः सन्नतेयुश्चः कृचेयुर्म्मतिनारकः ।२७८.४ ।।

        तंसुरोघः प्रतिरथः पुरस्तो मतिनारजाः ।
        आसीत्प्रतिरथात्कण्वः कण्वान्मेधातिथिस्त्वभूत् ।। २७८.५ ।।

         (अध्याय- 278, अग्नि पुराण)।

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        दूसरा भद्राश्व  - अग्नीध्र का पुत्र और माल्यवंता का स्वामी: घृताची के माध्यम से उनकी दस बेटियाँ (अप्सराएँ) थीं;  भद्राश्व को मेरु के पूर्व के राज्य का प्रभारी नियुक्त किया गया।

        रहमावरका का एक पुत्र और अप्सराओं के माध्यम से 10 पुत्रों का पिता, घृत (धृत)। *

        • * मत्स्य-पुराण 49. 4.

        पूरुवंशवर्णनम्।
        पूरोः पुत्रो महातेजा राजा स जनमेजयः।
        प्राची ततः सुतस्तस्य यः प्राचीमकरोद्दिशम्।। ४९.१ ।।

        प्राचीत तस्य तनयो मनस्युश्च तथा भवत्।
        राजा पीतायुधो नाम मनस्योरभवत् सुतः।४९.२ ।।

        दायादस्तस्य चाप्यासीद् धुन्धुर्नाम महीपतिः।
        धुन्धोर्बहुविधः पुत्रः सम्पातिस्तस्य चात्मजः।। ४९.३ ।।

        सम्पातेस्तु रहं वर्चा भद्राश्वस्तस्य चात्मजः।
        भद्राश्वस्य धृताच्यां(घृताच्यां) तु दशाप्सरसि सूनवः।। ४९.४ ।।


        औचेयुश्च हृषेयुश्च कक्षेयुश्च सनेयुकः।
        घृतेयुश्च विनेयुश्च स्थलेयुश्चैव सत्तमः।। ४९.५ ।।

        धर्मेयुः सन्नतेयुश्च पुण्येयुश्चेति ते दश।
        औचेयोर्ज्वलना नाम भार्या वै तक्षकात्मजा।। ४९.६ ।।

        तस्यां स जनयामास रन्तिनारं महीपतिम्।
        रन्तिनारो मनस्विन्यां पुत्रान् जज्ञे परान् शुभान्।। ४९.७ ।।

        अमूर्तरयसंवीरं त्रिवनञ्चैव धार्मिकम्।
        गौरी कन्या तृतीया च मान्धातुर्जननी शुभा।। ४९.८


        पूरु- वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप - वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास

        सूतजी कहते हैं— ऋषियो। (ययातिके सबसे छोटे पुत्र) पूरु का पुत्र महातेजस्वी राजा जनमेजय (प्रथम) था। उसका पुत्र प्राचीत्वत (प्राचीनवंत) हुआ, जिसने प्राची (पूर्व) दिशा बसायी प्राचीत्वत का पुत्र मनस्यु' हुआ। मनस्यु का पुत्र राजा वीतायुध (अभय) हुआ। उसका पुत्र धुन्धु नाम का राजा हुआ। धुन्धु का पुत्र बहुविध (बहुविद्य, अन्यत्र बहुगव) और उसका पुत्र संयाति हुआ। संयाति का पुत्र रहंवर्चा और उसका पुत्र भद्राश्व (रौद्राश्व) हुआ। भद्राश्वके घृता (घृताची, अन्यत्र मिश्रकेशी) नामकी अप्सरा के गर्भ से दस पुत्र उत्पन्न हुए। उन दसों के नाम हैं- १-औचेयु (अधिकांश पुराणोंमें ऋचेयु), २-हृषेयु, ३-कक्षेयु, ४-सनेय, ५-धृतेयु, ६-विनेयु श्रेष्ठ ७-स्थलेयु, ८-धर्मेयु, ९-संनतेयु और १०पुण्येयु ।

        औचेयु (ऋचेयु) की पत्नी का नाम ज्वलना था। वह नागराज तक्षक की कन्या थी। उसके गर्भसे उन्होंने भूपाल रन्तिनार (यह प्रायः सर्वत्र मतिनार, पर भागवत में रन्तिभार है) को जन्म दिया। रन्तिनार ने अपनी पत्नी मनस्विनी के गर्भ से कई सुन्दर पुत्रों को उत्पन्न किया, जिनमें वीरवर अमूर्तरय और धर्मात्मा त्रिवन प्रधान थे। उसकी तीसरी संतति गौरी नामकी सुन्दरी कन्या थी, जो मान्धाताकी जननी हुई। 

        इलिना यमराज की कन्या थी । उसने त्रिवन से ब्रह्मवाद में श्रेष्ठ पराक्रमी ऐलिन (ऐलिक, त्रंसु या जंसु) नामक प्रिय पुत्र उत्पन्न किया। इलिना नन्दन ऐलिन (जंसु) के संयोगसे उपदानवी ने ऋष्यन्त, दुष्यन्त, प्रवीर तथा अनघ नामक चार पुत्रोंको प्राप्त किया। इनमें द्वितीय पुत्र राजा दुष्यन्तके संयोग से शकुन्तला के गर्भ से भरत का जन्म हुआ, जो आगे चलकर संग्राम विजयी चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। उसीके नामपर उसके वंशधर 'भारत' नामसे कहे जाने लगे ॥ 1-11 ॥

        इसी दुष्यन्त-पुत्र भरत के विषयमें आकाशवाणीने | राजा दुष्यन्तसे कहा था- 'दुष्यन्त ! माता का गर्भाशय तो एक चमड़ेके थैलेके समान है, उसमें गर्भाधान करनेके कारण पुत्र पिताका ही होता है; अतः जो जिससे पैदा होता है, वह उसका आत्मस्वरूप ही होता है। इसलिये तुम अपने पुत्र का भरण-पोषण करो और शकुन्तला का अपमान मत करो। पुत्र अपने मरे हुए पिता को यमपुरीके कष्टोंसे छुटकारा दिलाता है। इस गर्भ का आधान करने वाले तुम्हीं हो, शकुन्तला ने यह बिलकुल सच बात कही है। पूर्वकाल में भरत के सभी पुत्रों का विनाश हो गया था। माता के कोप के कारण उनके पुत्रों का यह पुत्र का महासंहार हुआ था। यह देखकर मरुद्गणों ने बृहस्पति के पुत्र भरद्वाज को लाकर भरत के हाथों में समर्पित किया था। बृहस्पति अपने इस पुत्र को वन में छोड़कर चले गये थे ।।12-25॥

        इस प्रकार माता-पिताद्वारा त्यागे गये उस शिशुको देखकर मरुद्गणोंका हृदय पिघल गया था, तब उन्होंने उस भरद्वाज नामक शिशु को उठा लिया।

        विशेष :- भरद्वाज- की कथा भरत के साथ जोड़ने के पीछे पुरोहितवादी वर्चस्व के स्थापन का प्रयोजन ही है।

        भरद्वाज का जन्म वैसे भी बृहस्पति के द्वारा अपने भाई उतथ्य की पत्नी ममता के साथ किए गये बलात्कार (व्यभिचार) के परिणाम स्वरूप हुआ था।

        "तच्च गर्भं प्रविशद्गर्भस्थेन स्थानसङ्कोचभयात् पार्ष्णिप्रहारेणापास्तं बहिः पतितमपि अमोघ वीर्य्यतया बृहस्पतेर्भरद्वाजनामपुत्त्रोऽभूत् ।
        गर्भस्थश्च बृहस्पतिना तस्मादेवापराधादन्धो भवेति शप्तो दीर्घतमा नामाभवत् !

        "अनुवाद:-

        यह सुनकर बालक तो गर्भ से निकल भागा परन्तु बृहस्पति ने ममता के साथ बलात्कार करके उसे पुन: गर्भ वती कर दिया  तब वह बालक उत्थ्य और बृहस्पति दौनों की सन्तान होने से
        भरद्वाज कहलाया।
        शाप के कारण 'वह बालक दीर्घतमा कहलाया -
        फिर बृहस्पति बोले ममता से ! 
        हे मूढे ममते "द्बाजं द्वाभ्यामावाभ्यां जातमिमं पुत्त्रं त्वं भर रक्ष ।

        अनुवाद:-
        अर्थात् हे ममता मुझ बृहस्पति और उतथ्य द्वारा उत्पन्न इस बालक का तू पालन  कर !

        "एवं बृहस्पतिनोक्तेव ममता तमाह हे बृहस्पते !
        द्वाजं द्बाभ्यां जातमिममेकाकिनी किमित्यहं भरिष्यामि । त्वमिमं भरेति परस्परमुक्त्वा तं पुत्त्रं त्यक्त्वा यस्मात् पितरौ ममताबृहस्पती ततो यातौ 
        ततो भरद्वाजाख्योऽयम् ।

        पाठान्तरे एवं विवदमानौ ।
        यद्दुःखात् यन्निमित्ताद् दुःखात् पितरौ यातावित्यर्थः । तदेवं ताभ्यां त्यक्तो मरुद्भिर्भृतः ।
        मरुत्सोमाख्येन च यागेनाराधितैर्मरुद्भिस्तस्य वितथे पुत्त्र- जन्मनि सति दत्तत्वाद्बितथसंज्ञाञ्चावाप ।
        इति विष्णुपुराण चतुर्थ अंश- १९वाँ अध्यायः।

        " भरद्वाज शब्द की व्युत्पत्ति भी उस बालक के जन्म के आधार पर हुई- -

        अर्थात् बड़े भाई उतथ्य की पत्नी ममता से बृहस्पति द्वारा बलात्कार से  उत्पन्न सन्तान भरद्वाज।
        (जन् + डः)
        ततः पृषोदरादित्वात् द्वाजः =सङ्करः ।
        भ्रियते मरुद्भिरिति ।
        भृ + अप् = भरः । भरश्चासौ द्बाजश्चेति कर्म्मधारयः) मुनिविशेषः ।

        (भागवत पुराण-श्लोक  9.20.34 ) 
        तस्यासन् नृप वैदर्भ्य: पत्‍न्यस्तिस्र: सुसम्मता:
        जघ्नुस्त्यागभयात् पुत्रान् नानुरूपा इतीरिते॥ ३४ ॥
        शब्दार्थ
        तस्य—उसकी (भरत की); आसन्—थीं; नृप—हे राजा परीक्षित ! वैदर्भ्य:—विदर्भ की कन्याएँ; पत्न्य:—पत्नियाँ; तिस्र:—तीन; सु-सम्मता:—अत्यन्त मनोहर तथा उपयुक्त; जघ्नु:—मार डाला; त्याग-भयात्—त्यागे जाने के भय से; पुत्रान्—अपने पुत्रों को; न अनुरूपा:—अपने पिता की तरह न होने से; इति—इस तरह; ईरिते—विचार करते हुए पर ।.
        अनुवाद:-
        हे राजा परीक्षित, महाराज भरत की तीन मनोहर पत्नियाँ थीं जो विदर्भ के राजा की पुत्रियाँ थीं। जब तीनों के सन्तानें हुईं तो वे राजा के समान नहीं निकलीं, अतएव इन पत्नियों ने यह सोचकर कि राजा उन्हें कृतघ्न रानियाँ समझकर त्याग देंगे, उन्होंने अपने अपने पुत्रों को मार डाला।
        (भागवत पुराण-श्लोक  9.20.35  )
        तस्यैवं वितथे वंशे तदर्थं यजत: सुतम् ।
        मरुत्स्तोमेन मरुतो भरद्वाजमुपाददु: ॥ ३५ ॥
        शब्दार्थ
        तस्य—उसके; एवम्—इस प्रकार; वितथे—परेशान होकर; वंशे—सन्तान उत्पन्न करने में; तत्-अर्थम्—पुत्र प्राप्ति के लिए; यजत:— यज्ञ सम्पन्न करते हुए; सुतम्—एक पुत्र को मरुत्-स्तोमेन—मरुत्स्तोम यज्ञ करने से; मरुत:—मरुत्गण देवता; भरद्वाजम्—भरद्वाज को; उपाददु:—भेंट कर दिया ।.
        अनुवाद:-
        सन्तान के लिए जब राजा का प्रयास इस तरह विफल हो गया तो उसने पुत्रप्राप्ति के लिए मरुत्स्तोम नामक यज्ञ किया। सारे मरुत्गण उससे पूर्णतया सन्तुष्ट हो गये तो उन्होंने उसे भरद्वाज नामक पुत्र उपहार में दिया।

        (भागवत पुराण-श्लोक  9.20.36  )
        अन्तर्वत्‍न्यां भ्रातृपत्‍न्यां मैथुनाय बृहस्पति: ।
        प्रवृत्तो वारितो गर्भं शप्‍त्वा वीर्यमुपासृजत् ॥ ३६ ॥
        शब्दार्थ:-
        अन्त:-वत्न्याम्—गर्भवती; भ्रातृ-पत्न्याम्—भाई की पत्नी से; मैथुनाय—संभोग की इच्छा से; बृहस्पति:—बृहस्पति नामक देवता; प्रवृत्त:—प्रवृत्त; वारित:—मना किया गया; गर्भम्—गर्भ के भीतर के पुत्र को; शप्त्वा—शाप देकर; वीर्यम्—वीर्य; उपासृजत्— स्खलित किया ।.
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        अनुवाद
        बृहस्पति देव ने अपने भाई की पत्नी ममता पर मोहित होने पर उसके गर्भवती होते हुए भी उसके साथ संभोग करना चाहा। उसके गर्भ के भीतर के पुत्र ने मना किया लेकिन बृहस्पति ने उसे शाप दे दिया और बलात् ममता के गर्भ में वीर्य स्थापित कर दिया।
        ____
        "क्या अपराधी निरपराध को शाप देने की सामर्थ्य रखता है।
        तात्पर्य
        इस संसार में संभोग की इच्छा इतनी प्रबल होती है कि देवताओं के गुरु तथा अत्यन्त पंडित बृहस्पति ने भी अपने भाई की गर्भवती पत्नी के साथ संभोग करना चाहा। जब उच्चतर देवताओं के समाज में ऐसा हो सकता है तो मानव समाज के विषय में क्या कहा जाये ? संभोग की इच्छा इतनी प्रबल है कि बृहस्पति जैसा विद्वान व्यक्ति भी विचलित हो सकता है।

        (भागवत पुराण- श्लोक  9.20.37  )

        तं त्यक्तुकामां ममतां भर्तुस्त्यागविशङ्किताम् ।
        नामनिर्वाचनं तस्य श्लोकमेनं सुरा जगु:॥ ३७॥
         
        शब्दार्थ
        तम्—नवजात शिशु को; त्यक्तु-कामाम्—त्यागने की इच्छा से; ममताम्—ममता को; भर्तु: त्याग-विशङ्किताम्—अवैध पुत्र उत्पन्न करने के कारण अपने पति द्वारा छोड़े जाने से अत्यन्त भयभीत; नाम-निर्वाचनम्—नामकरण संस्कार; तस्य—उस बालक का; श्लोकम्—श्लोक; एनम्—इस; सुरा:—देवतागण ने; जगु:—घोषित किया
         
        अनुवाद:-
        ममता अत्यन्त भयभीत थी कि अवैध पुत्र उत्पन्न करने के कारण उसका पति उसे छोड़ सकता है अतएव उसने बालक को त्याग देने का विचार किया। लेकिन तब देवताओं ने उस बालक का नामकरण करके सारी समस्या हल कर दी।
         
        तात्पर्य
        वैदिक शास्त्र के अनुसार जब भी बालक उत्पन्न होता है तो जातकर्म तथा नामकरण संस्कार किये जाते हैं जिनमें विद्वान ब्राह्मण ज्योतिषगणना के अनुसार कुण्डली बनाते हैं। किन्तु ममता ने जिस पुत्र को जन्म दिया था वह बृहस्पति द्वारा उत्पन्न अवैध पुत्र था क्योंकि ममता तो उतथ्य की पत्नी थी, किन्तु बृहस्पति ने बलपूर्वक उसे गर्भवती बना दिया था।
        अतएव बृहस्पति को भर्ता बनना पड़ा। वैदिक संस्कृति के अनुसार पत्नी पति की सम्पत्ति होती है और अवैध मैथुन द्वारा उत्पन्न पुत्र द्वाज कहलाता है। हिन्दू समाज में ऐसे पुत्र को दोगला कहा जाता है।
        ऐसी स्थिति में बालक को उचित संस्कार द्वारा नाम दे पाना कठिन होता है। इसीलिए ममता चिन्तित थी, किन्तु देवताओं ने बालक को एक उपयुक्त नाम भरद्वाज प्रदान किया जिसका अर्थ था कि यह बालक अवैध रूप से उत्पन्न है और इसका पालन ममता तथा बृहस्पति दोनों को करना चाहिए।
        _______________

         (भागवत पुराण-श्लोक  9.20.38 ) 
        मूढे भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते ।
        यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८॥
         
        शब्दार्थ
        मूढे—हे मूर्ख स्त्री; भर—पालन करोद्वाजम्—दोनों के बीच अवैध सम्बन्ध से उत्पन्न; इमम्—इस बालक को; भर—पालो; द्वाजम्—अवैध जन्म लेने के कारण; बृहस्पते—हे बृहस्पति; यातौ—छोडक़र चले गये; यत्—क्योंकि; उक्त्वा—कहकर; पितरौ— माता पिता दोनों; भरद्वाज:—भरद्वाज नामक; तत:—तत्पश्चात्; तु—निस्सन्देह; अयम्—यह बालक ।.
         
        अनुवाद:-
        बृहस्पति ने ममता से कहा, “अरी मूर्ख! यद्यपि यह बालक अन्य पुरुष की पत्नी और किसी दूसरे पुरुष के वीर्य से उत्पन्न हुआ है, किन्तु तुम इसका पालन करो।” यह सुनकर ममता ने उत्तर दिया, “अरे बृहस्पति, तुम इसको पालो।” ऐसा कहकर बृहस्पति तथा ममता उसे छोडक़र चले गये। इस तरह बालक का नाम भरद्वाज पड़ा।

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        श्लोक  9.20.39  

        चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा वितथमात्मजम् ।
        व्यसृजन् मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥
         
        शब्दार्थ
        चोद्यमाना—प्रोत्साहित किये जानेपर (कि बालक को पालो); सुरै:—देवताओं द्वारा; एवम्—इस प्रकार; मत्वा—मानकर; वितथम्—निष्प्रयोजन; आत्मजम्—अपने पुत्र को; व्यसृजत्—त्याग दिया; मरुत:—मरुत्गण ने; अबिभ्रन्—बच्चे का पालन किया; दत्त:—दिया गया; अयम्—यह; वितथे—निराश; अन्वये—महाराज भरत का वंश में  ।.
         
        अनुवाद:-
        यद्यपि देवताओं ने बालक को पालने के लिए प्रोत्साहित किया था, किन्तु ममता ने अवैध जन्म के कारण उस बालक को व्यर्थ समझ कर उसे छोड़ दिया। फलस्वरूप, मरुत्गण देवताओं ने बालक का पालन किया और जब महाराज भरत सन्तान के अभाव से निराश हो गए तो उन्हें यही बालक पुत्र-रूप में भेंट किया गया।
         
         
        इस प्रकार श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध के अन्तर्गत “पूरु का वंश” नामक बीसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
        ________________________________

        भागवतपुराण 9,20,36, में भरद्वाज की उत्पत्ति का प्रसंग इस प्रकार है । एक वार बृहस्पति ने अपने छोटे भाई उतथ्य की पत्नी ममता के साथ उसको पहले से भी गर्भवती होने पर बलात्कार करना चाहा  उस समय गर्भस्थ शिशु ने मना किया परन्तु बृहस्पति नहीं माने काम वेग ने उन्हें विवश कर दिया ।
        बृहस्पति नें बालक को शाप दे दिया की तू दीर्घ काल तक अन्धा (तमा) हो जाय ।

        यह सुनकर बालक तो निकल भागा परन्तु बृहस्पति ने ममता के साथ बलात्कार करके उसे पुन: गर्भवती कर दिया  तब वह बालक उतथ्य और बृहस्पति दौनों की सन्तान होने से
        भरद्वाज कहलाया ।

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        माता भस्त्र पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।
        भरस्व पुत्रं दुष्यंतमावमंस्थाश्शकुंतलाम् ।१२ ।
        रेतोधाः पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।
        त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुंतला ।१३ ।
        भरतस्य पत्नित्रये नव पुत्रा बभूवुः ।१४ ।
        नैते ममानुरूपा इत्यभिहितास्तन्मातरः परित्यागभयात्तत्पुत्राञ्जघ्नुः ।१५ ।
        ततोस्य वितथे पुत्रजन्मनि पुत्रार्थिनो मरुत्सोमयाजिनो दीर्घतमसः पार्ष्ण्यपास्तद्बृहस्पतिवीर्यादुतथ्यपत्न्यां ममतायां समुत्पन्नो भरद्वाजाख्यः पुत्रो मरुद्भिर्दत्तः ।१६ ।
        तस्यापि नामनिर्वचनश्लोकः पठ्यते ।१७ ।
        मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पते।
        यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् इति ।।।१८ ।
        भरद्वाजस्स तस्य वितथे पुत्रजन्मनि मरुद्भिर्दत्तः ततो वितथसंज्ञामवाप ।१९ ।
        वितथस्यापि मन्युः पुत्रोऽभवत् ।२० ।
        बृहत्क्षत्रमहावीर्यनगरगर्गा अभवन्मन्युपुत्राः ।२१ ।
        नगरस्य संकृतिस्संकृतेर्गुरुप्रीतिरंतिदेवौ ।२२ ।
        गर्गाच्छिनिः ततश्च गार्ग्याश्शैन्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो बभूवु ।२३ ।

         इति विष्णुपुराणे ४ अंशे १९ अध्यायः

        __________     

        सन्दर्भ:-

        (मत्स्य पुराण-अध्याय-४९-)

        नीलमतपुराण के अनुसार, त्रेतायुग एक कलियुग की तीन गुना मात्रा वाली समयावधि को संदर्भित करता है। जैसा कि हमें बताया गया है, सूर्य का राशि चक्र की एक राशि से होकर गुजरना सौर मास कहलाता है। दो महीनों से एक ऋतु बनती है, तीन ऋतुओं से एक अयन और दो अयन से एक वर्ष बनता है। 

        चार लाख बत्तीस हजार वर्ष कलियुग बनाते हैं। कलियुग से दोगुना द्वापर है, तीन युगों से त्रेता है और चार युगों से एक चतुर्युग बनता है और इकहत्तर चतुर्युगों से एक मन्वंतर बनता है।


        त्रेतायुग (त्रेतायुग).—चार युगों में से दूसरा। कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग ये चार युग हैं। त्रेतायुग में तीन हजार देववर्ष हैं।

        श्री राम का जन्म त्रेतायुग के अंत में हुआ था। त्रेतायुग ईसा पूर्व- (867100) में समाप्त हुआ। श्री राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक देश पर शासन किया।

        "दश-वर्ष-सहस्राणिनी दश-वर्ष-शतानि च / रामो राज्यमुपाषित्वा ब्रह्मलोकं प्रयस्यति //" (वाल्मीकि रामायण)।

        (दस हजार वर्षों तक अपनी भूमि की सेवा करने के बाद और दस सौ वर्षों (दस हजार से अधिक हजार वर्ष) तक सेवा करने के बाद श्री राम ब्रह्मलोक जाएंगे)। जब राम ने प्रशासन की बागडोर संभाली तब वह केवल चालीस वर्ष के थे। मन्वंतर और युग के अंतर्गत देखें। (शास्त्रीय संस्कृत साहित्य)।

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        रौद्राश्वस्य दशार्णेयुः कृकाणेयुस्तथैव च।
        कक्षेयुस्थण्डिलेयुश्च सन्नतेयुस्तथैव च॥ १३.५ ॥

        ऋचोयुश्च जलेयुश्च स्थलेयुश्च महाबलः।
        धनेयुश्च वनेयुश्च पुत्रकाश्च दश स्त्रियः॥ १३.६ ॥

        भद्रा शूद्रा च मद्रा च शलदा तथा।
        खलदा च ततो विप्रा नलदा सुरसापि च॥ १३.७ ॥

        तथा गोचपला च स्त्रीरत्नकूटा च ता दश।
        ऋषिर्जातोऽत्रिवंशे च तासां भर्त्ता प्रभाकरः॥ १३.८ ॥

        भद्रायां जनयामास सुतं सोमं यशस्विनम्।
        स्वर्भानुना हते सूर्य्ये पतमाने दिवो महीम्॥१३.९॥

        तमोऽभिभूते लोके च प्रभा येन प्रवर्त्तिता।
        स्वस्ति तेऽस्त्विति चोक्त्वा वै पतमानो दिवाकरः॥ १३.१०॥

        वचनात्तस्य विप्रर्षेर्न पपात दिवो महीम्।
        अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः॥१३.११॥

        यज्ञेष्वत्रेर्बलञ्चैव देवैर्यस्य प्रतिष्ठितम्।
        स तासु जनयामास पुत्रिकास्वात्मकामजान्॥ १३.१२ ॥

        दश पुत्रान् महासत्त्वांस्तपस्युग्रे रतांस्तथा।
        ते तु गोत्रकरा विप्रा ऋषयो वेदपारगाः॥१३.१३ ॥

        ब्रह्मपुराणम्/अध्यायः (१३)


        अत्रिस् ब्रह्म-( Atash-Behram, ) शब्द अवेस्ता( ईरानी) धर्मग्रन्थों में मिलता है। जो सर्वोत्तम अग्नि का वाचक है।

        अत्रि- अग्नि की लपटों से वारुणी यज्ञ में जन्मे ; 1 उसकी दस सुंदर और पवित्र पत्नियाँ थीं, सभी भद्राश्व और घृताची की बेटियाँ थीं। उनके दस पुत्र आत्रेय, 2 स्वस्त्यात्रेय के नाम से जाने जाते थे;।
        • ब्रह्माण्ड-पुराण III। 1. 21 एवं 44; 8. 73; मत्स्य-पुराण 171. 27; 192. 10; 195. 9; वायु-पुराण 62. 17; 64. 27; विष्णु-पुराण I. 7.5, 7.
        • 2) वायु-पुराण 70. 67-76.
        • 3) मत्स्य-पुराण 145. 90, 107-9; 197. 1 और 4; 200. 19; 229. 2 और 3; वायु-पुराण 59. 104.
        • 4) मत्स्य-पुराण 252. 2; 285-6.

        अत्रिर्मीनश्च मेषश्च लोहितश्च शिखी तथा ।
        खड्गदण्डद्विदण्डौ च सुमहाकालव्यालिनौ ॥ ३,४४.५३ ॥ ब्रह्माण्ड पुराण)

        अत्रिर्मीनश्च मेषश्च लोहितश्च शिखी तथा ।२९३.०४५
        छगलण्डद्विरण्डौ द्वौ समहाकालवालिनौ ॥२९३.०४५ अग्निपुराण)


        अत्रि और चन्द्रमा की जो सिद्धान्त विहीन उत्पत्ति कालान्तर में पुराणों में जोड़ी गयी वह प्रक्षिप्त ही है। अत: अत्रि एक अग्नि का रूपान्तरण है।और अधिक तर अत्रि के प्रकरण अग्नि तत्व से सम्बन्धित है। ब्रह्मा से अत्रि को उत्पन्न कर दर्शाना और अत्रि से चन्द्रमा की उत्पत्ति भी प्रक्षेप ही है।
        क्योंकि हरिवंश पुराण में हरिवंश पर्व -३१ वें अध्याय में पुरुवंशी रूद्राश्व(भद्राश्व) की घृताची अप्सरा में उत्पन्न भद्रा नामक पुत्री जो अत्रि की पत्नी है। अत्रि उसी भद्रा से चन्द्रमा को उत्पन्न करते हैं। ये चन्द्रमा ( सोम) पुरुवंशी का वंशज कैसे बन गया। जबकि इसे पुरवंश का पूर्वज होना चाहिए-
        भागवत पुराण तथा अन्य  कई  पुराणों में अत्रि की पत्नी अनिसूया जो कर्दम ऋषि और देवहूति  की पुत्री अनसूया से चन्द्रमा का जन्म होना भी प्रक्षेप है।  वैदिक सन्दर्भ प्राचीन होने से सही माना जाना चाहिए -  कि चन्द्रमा विराट पुरुष विष्णु के मन से उत्पन्न होने से मान: है ।

        "अत्रेः पत्‍न्यनसूया त्रीन् जज्ञे सुयशसः सुतान् ।
        दत्तं दुर्वाससं सोमं आत्मेशब्रह्मसम्भवान् ॥१५ 

                          "विदुर उवाच -
        अत्रेर्गृहे सुरश्रेष्ठाः स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।
        किञ्चित् चिकीर्षवो जाता एतदाख्याहि मे गुरो ॥ १६।

        मनु जी ने अपनी दूसरी कन्या देवहूति कर्दम जी को ब्याही थी।

        अत्रि की पत्नी अनसूया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चन्द्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमशः भगवान् विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे।

        सन्दर्भ-

        (श्रीमद्भागवतपुराण स्कन्धः४- अध्याय१-)


                   

          •{लोकाचरण-खण्ड}-

          अध्याय -पञ्चम- कृष्ण अस्तित्व के ऐतिहासिक साक्ष्य-•




        वासुदेव नामांकित शिलालेखों से पता चलता है कि उसका शासनकाल कम से कम 191 से 232 ईस्वी तक था। एक यूट्यूबर जो  पूर्वदुराग्रही और वैदिक साहित्य और भाषा विज्ञान से पूर्णत: अनभिज्ञ या अनजान ही है उसका कहना है कि कृष्ण शब्द सस्कृत का है और संस्कृत का जन्म आठवीं  ईस्वी सदी है।

        हम यादव योगेश कुमार रोहि"  साइन्स  जर्नी के कुतर्कों का समाधान कर करते हुए प्रमाण और साक्ष्य प्रस्तुत कर रहे हैं।

        हम बतादें- कि 
        भारत में कुषाण वंश की स्थापना "कुजुल कडफिसेस" ने की। 
        कुजुल कडफिसेस एक कुषाण राजकुंवर था जिसने पहली सदी ईस्वी में "युएझ़ी परिसंघ को संगठित किया और वह पहला कुषाण सम्राट बना।

        अफ़ग़ानिस्तान के बग़लान प्रान्त में सुर्ख़ कोतल नामक पुरातन स्थल में पाए गए ।
        रबातक शिलालेख के अनुसार कुजुल कडफिसेस प्रसिद्ध कुषाण सम्राट कनिष्क का पर-दादा था। 

        कनिष्क का सम्बन्ध कुषाण के चीन की "यू-ची जाति से थे  जो तुषारी लोग कहे जाते थे। तुषारों का वर्णन भारतीय पुराणों में है।

        यूची का परिचय:- कुछ इतिहास कार कुषाणों को यूची कबीले का कहते हैं। जिनका मिलान इतिहास कारो ने गूजर "अहीर और जाटों के कुछ कबीलों से किया गया। 

        पौराणिक कालगणना के अनुसार भी कृष्ण का जन्म आज से लगभग 5,235 वर्ष पूर्व हुआ था। 

        कई वैज्ञानिकों तथा पुराणों का यही मानना है, जो महाभारत युद्ध की कालगणना से मेल खाता है। भगवान कृष्ण के जन्म का सटीक अंदाजा शायद ही कोई लगा पाए। इस विषय पर कई मतभेद हैं परंतु सारगर्भित तथ्यों पर ध्यान डालें तो सारे परिणाम अपने स्थान पर सत्य हैं।

        भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध के द्वितीय अध्याय के अनुसार कलियुग के आरंभ के संदर्भ में भारतीय गणना के अनुसार कलयुग का शुभारंभ ईसा से 3102 वर्ष पूर्व 20 फरवरी को 2 बजकर 27 मिनट तथा 30 सेकंड पर हुआ था। 

        पुराणों में बताया गया है कि जब श्रीकृष्ण का देहावसान हुआ तब कलयुग का आगमन हुआ। इसके अनुसार कृष्ण जन्म 4,500 से 3,102 ईसा पूर्व के बीच मानना ठीक रहेगा।

         इस गणना को सत्यापित करने वाली खोज मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में 1929 में हुई। 
        अर्नेस्ट मैके द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) मिला जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बालक का चित्र बना हुआ था, जो हमें भागवत आदि पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा की ओर संकेत करता है।

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        इसके अनुसार महाभारत का युद्ध 3000 ईसा पूर्व हुआ होगा, जो पुराणों की गणना में सटीक बैठता है।

        श्रीकृष्ण का रूपवर्णन:-
        श्रीकृष्ण की बारंबार वर्णित छवि के अनुसार उनकी अंगकांति श्याम (सांवली)थी। वे नित्य तरुण पीताम्बरधारी और विभिन्न् वनमालाओं से विभूषित थे। 

        वे रत्नमय आभूषणों से विभूषित थे। शारंगधनुष धारण किए हुए थे। कौस्तुभ मणि उनके वक्षस्थल की शोभा बढ़ा रही थी। श्रीवत्सभूषित वक्ष में लक्ष्मी का निवास था। शरत्काल की पूर्णिमा के चंद्रमा की प्रभा से वे मनोहर जान पड़ते थे।

        इतिहास और पुरातत्त्व में श्रीकृष्ण
        सुविख्यात इतिहासकार दामोदर धर्मानन्द कोशाम्बी के अनुसार कृष्ण के बारे में एकमात्र पुरातात्विक प्रमाण है उनका पारम्परिक शस्त्र : चक्र है।

        यह शस्त्र वैदिक नहीं है और बुद्ध के पहले ही इसका चलन बंद हो गया था; परंतु मिर्जापुर जिले (दरअसल, बौद्ध दक्षिणागिरि) के एक गुफाचित्र में एक रथारोही को ऐसे चक्र से दैत्यों पर  (जिन्होंने यह चित्र बनाया है) आक्रमण करते दिखाया गया है।

        अत: इसका समय होगा लगभग 800 ई पू, जबकि मोटे तौर पर, वाराणसी में पहली बस्ती की नींव पड़ी थी। दूसरी ओर, ऋग्वेद में कृष्ण को इंद्र का शत्रु बताया गया है, 

        और उनका नाम श्यामवर्ण देव संस्कृति के अनुयायी  लोगों का द्योतक है। कृष्णाख्यान का मूलाधार यह है कि वे एक वीर योद्धा थे और यदु कबीले के नर-देवता (प्राचीनतम वेद ऋग्वेद में जिन पांच प्रमुख जनों यानी कबीलों का उल्लेख मिलता है, उनमें से यदु कबीला एक था); परंतु सूक्तकारों ने, पंजाब के कबीलों में निरंतर चल रहे कलह से जनित तत्कालीन गुटबंदी के अनुसार, इन यदुओं को कभी धिक्कारा है तो कभी आशीर्वाद दिया है।
        ____________    

        अंत का इतिहास वास्तव में यादव गणतंत्र के अंत का इतिहास है।
        महाभारत का एक पर्व है-भीष्म पर्व। भीष्म पर्व का अध्याय पच्चीस से लेकर अध्याय बयालीस तक वस्तुत: गीता का क्रमश: अध्याय एक से लेकर अध्याय अठारह है। महाभारत में भीष्म पर्व और भीष्म पर्व में रखी हुई है गीता। ऐसा लगता है वेदव्यास गीता रत्न को महाभारत के अंतर्गत बहुत सहेजकर रखना चाहते थे। जैसे संदूक के अंदर छोटा संदूक और छोटे संदूक में रखा गया मूल्यवान रत्न।

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        जैन और बौद्ध साहित्य में कृष्ण
        कम ही लोगों को जानकारी होगी कि तीर्थंकर नेमिनाथ श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। संन्यास लेने से पूर्व उनका नाम अरिष्टनेमि था। जैन साहित्य एवं आगमिक कृतियों में कृष्ण को अति विशिष्ट पुरुष के रूप में चित्रित किया गया है।

         'उत्तराध्ययन' के अनुसार कृष्ण का जन्मनाम केशव था। उन्हें 'कण्ह' या कृष्ण संभवत: श्यामवर्णी होने के कारण कहा जाता रहा होगा।

        उनके पितामह का नाम अंधकवृष्णि बताया गया है, जिनके पुत्र हुए वसुदेव और उन्हीं के पुत्र वासुदेव कहलाए। 

        कृष्ण की नगरी का नाम उत्तराध्ययन में (वारगापुरी) मिलता है, जो नौ योजन पर्यंत थी। नगरी के बाहर उत्तर-पूर्व दिशा में रैवतक पर्वत था, जिस पर नंदनवन था। कृष्ण की सभा का नाम सुधर्मा था। दूसरे महत्वपूर्ण जैनागम 'निरयावलिका' में आए वर्णन के अनुसार कृष्ण की इस सभा में तीन तरह की भेरियां थीं : कौमुदी, सामुदायिन और सन्‍नाहिका, जिन्हें विभिन्न अवसरों पर बजाया जाता था। कृष्ण का राज्य वैताढ्य पर्वत से लेकर द्वारावती तक फैला हुआ बताया गया है। 

        इसी प्रकार कण्ह जातक नाम से एक बौद्ध ग्रंथ उपलब्ध है। 
        उसमें कृष्‍ण कुमार का विवाह महरूपी नामक कन्या से करवाया गया है। यहां कृष्ण कुमार को ओक्काक यानी इक्ष्वाकु वंशी कहा गया है। 
        परन्तु यह इक्ष्वाकु यदुवंश के अन्तर्गत एक पूर्वज का नाम है।
        घतजातक में कृष्ण की कहानी दूसरे ढंग से कही गई है। कृष्ण चर्चा बौद्ध गाथाओं में भी है, मगर बिलकुल अपनी निजी भंगिमा के साथ।


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             "उत्तर- समाधान -

        उत्तर-१ 

        सबसे पहले तो यह मानना भी युक्ति युक्त नहीं कि कुषाण वंशी वासुदेव ही कृष्ण का रूपान्तरण है। 

        हाँ इतना कहा जा सकता है कि सम्भवत: वासुदेव कनिष्क के उत्तराधकारी मध्य एशिया( तुर्की और  चीनी यू-ची कबीले के थे जो चरावाहे थे। कृष्ण का स्वतन्त्र उल्लेख ऋग्वेद से लेकर छान्दोग्य
        उपनिषद में भी मिलता है जो  पुराणों और रामायण, महाभारत से प्राचीनतम हैं। 

        सिन्धु सभ्यता की मोहन-जादारो की खुदाई में भी कृष्ण चरित्र से सम्बंधित ओखल बन्धन और यमलार्जुन वृक्षों के दृश्य अंकित पत्थर मिले हैं।

        मोहनजो-दारो  सिंधी  शब्द है। जिसका अर्थ है 'मृतकों का टीला'  और कभी-कभी इसका अर्थ  'मोहन का टीला' भी होता है। 

         पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एक पुरातात्विक स्थल है । लगभग 2500 ईसा पूर्व निर्मित, यह प्राचीन काल की सबसे बड़ी बस्ती थी सिंधु घाटी सभ्यता , और दुनिया के शुरुआती प्रमुख शहरों में से एक, प्राचीन मिस्र , मेसोपोटामिया ,  यूनान की मिनोअन क्रेते और नॉर्टे चिको की सभ्यताओं के समकालीन है । 
        कम से कम 40,000 लोगों की अनुमानित आबादी के साथ, मोहनजो-दारो लगभग 1700 ईसा पूर्व तक समृद्ध रहा। 

        सिन्धु घाटी की सभ्यता सम्भवतः ईसा पूर्व नवम सदी तक जीवन्त रही होगी ।
        कृष्ण, शिव, दुर्गा, जैसे पौराणिक पात्रों की प्रतिमाएँ यहाँ भी मिली हैं।

        यह मोहनजो-दारो, लरकाना जिले, सिंध (अब पाकिस्तान में) के पुरातात्विक स्थल से खोदी गई एक साबुन की गोली है।

        विशेष:-

        सोपस्टोन (जिसे स्टीटाइट या सोपरॉक के नाम से भी जाना जाता है) एक टैल्क-शिस्ट है, जो एक प्रकार की रूपांतरित चट्टान है। यह मुख्य रूप से मैग्नीशियम से भरपूर खनिज टैल्क से बना है। यह डायनेमोथर्मल मेटामोर्फिज्म और मेटासोमैटिज्म द्वारा निर्मित होता है, जो उन क्षेत्रों में होता है जहां टेक्टोनिक प्लेटें नीचे जाती हैं, गर्मी और दबाव से, तरल पदार्थ के प्रवाह के साथ, लेकिन पिघले बिना चट्टानों को बदलती हैं। यह हजारों वर्षों से नक्काशी का एक माध्यम रहा है


        यह भगवान कृष्ण के जीवन की एक महत्वपूर्ण कहानी के साथ अद्भुत समानता दर्शाता है।

        टैबलेट में एक युवा लड़के को दो पेड़ों को उखाड़ते हुए दिखाया गया है। इन दोनों पेड़ों से दो मानव आकृतियाँ निकल रही हैं और कुछ पुरातत्वविदों ने इसे भगवान कृष्ण से जुड़ी तारीखें तय करने के लिए एक दिलचस्प पुरातात्विक खोज करार दे रहे हैं।

        यह छवि यमलार्जुन प्रकरण- (भागवत और हरिवंश पुराण दोनों में उल्लिखित) से मिलती जुलती है।

         टैबलेट पर मौजूद युवा लड़के के भगवान कृष्ण होने की बहुत संभावना है, और पेड़ों से निकलने वाले दो इंसान दो शापित गंधर्व हैं, जिन्हें नलकूबर और मणिग्रीव के रूप में पहचाना जाता है।

        ऊपर: मोहेंजो-दारो, लरकाना जिला, सिंध (अब पाकिस्तान में) के पुरातात्विक स्थल से सोपस्टोन टैबलेट की खुदाई की गई। स्रोत - मैके की रिपोर्ट, भाग 1, पृष्ठ 344-45, भाग 2, प्लेट 90, वस्तु संख्या। डीके 10237.

        दिलचस्प बात यह है कि मोहनजो-दारो में खुदाई करने वाले डॉ. ईजेएच मैके ने भी इस छवि की तुलना यमलार्जुन प्रकरण से की है। इस विषय के एक अन्य विशेषज्ञ प्रो. वीएस अग्रवाल ने भी इस पहचान को स्वीकार किया है। इसलिए, यह काफी संभव है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग भगवान कृष्ण की कहानियों से अवगत थे। बेशक, इस तरह का एक और पृथक साक्ष्य तथ्यों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। हालाँकि, सबूतों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में और अधिक अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है।

        द्वारका के साथ सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों (पूरे उपमहाद्वीप में) की भौगोलिक निकटता को देखते हुए, इस कोण को भी ध्यान में रखते हुए अनुसंधान किया जाना चाहिए। 

        जबकि मोहनजो-दारो शब्द का आम तौर पर स्वीकृत अर्थ 'मुर्दों का टीला' है, इसके समानांतर अर्थ - 'मोहन का टीला' की जांच की भी कुछ गुंजाइश है। समानता एक संयोग से भी अधिक हो सकती है!

        रुचि रखने वालों के लिए मोहनजो-दारो की पृष्ठभूमि की जानकारी (स्रोत:www.harappa.com)
        मोहनजो-दारो की खोज मूल रूप से 1922 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक अधिकारी आरडी बनर्जी ने की थी, हड़प्पा में प्रमुख खुदाई शुरू होने के दो साल बाद। 

        बाद में, 1930 के दशक के दौरान जॉन मार्शल, केएन दीक्षित, अर्नेस्ट मैके और कई अन्य लोगों के निर्देशन में साइट पर बड़े पैमाने पर खुदाई की गई।
        हालाँकि उनके तरीके उतने वैज्ञानिक या तकनीकी रूप से अच्छे नहीं थे जितने होने चाहिए थे, फिर भी वे बहुत सारी जानकारी लेकर आए जिसका अभी भी विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जा रहा है।
        इस स्थल पर अंतिम प्रमुख उत्खनन परियोजना 1964-65 में स्वर्गीय डॉ. जीएफ डेल्स द्वारा की गई थी, जिसके बाद मौसम से उजागर संरचनाओं को संरक्षित करने की समस्याओं के कारण खुदाई रोक दी गई थी।
        1964-65 के बाद से साइट पर केवल बचाव उत्खनन, सतह सर्वेक्षण और संरक्षण परियोजनाओं की अनुमति दी गई है।

        इनमें से अधिकांश बचाव अभियान और संरक्षण परियोजनाएं पाकिस्तानी पुरातत्वविदों और संरक्षकों द्वारा संचालित की गई हैं।
        1980 के दशक में व्यापक वास्तुशिल्प दस्तावेज़ीकरण, विस्तृत सतह सर्वेक्षण, सतह स्क्रैपिंग और जांच के साथ मिलकर जर्मन और इतालवी सर्वेक्षण टीमों द्वारा डॉ. माइकल जानसन (आरडब्ल्यूटीएच) और डॉ. मौरिज़ियो तोसी (आईएसएमईओ) के नेतृत्व में किया गया था।

        हड़प्पा सभ्यता की तिथि कार्बन डेटिंग पद्धति द्वारा 2500 ई०पूर्व से (1750) ई० पूर्व तक निर्धारित की जती है।



        शिलापट पर श्रीकृष्ण जन्म के प्रमाण-

        भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा में जन्म लेने को लेकर यूं कोई संदेह नहीं। धर्मग्रंथों में उनकी न जाने कितनी लीलाओं का वर्णन है। इसके पुरातात्विक प्रमाण भी मौजूद हैं, लेकिन आमतौर पर जानकारी में नहीं हैं। सत्तानवे साल पहले गताश्रम टीला से मिली मूर्ति को भगवान कृष्ण के जन्म का पुरातत्व में पहला प्रमाण है। धर्मग्रन्थ

        Publish:Sun, 17 Aug 2014 02:37 PM (IST)Updated:Sun, 17 Aug 2014 02:58 PM (IST)




         इस क्रम में पहले  हम तमिलनाडु के ऐतिहासिक नगर महाबलिपुरम् से सम्बन्धित तथ्यों का विश्लेषण करते हैं।

        जिसमें प्राप्त शिलाओं पर कृष्ण बांसुरी बजाते हुए अंकित हैं।
        यह ऐतिहासिक सन्दर्भ है-


        महाबलिपुरम के तट मन्दिर को दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में माना जाता है जिसका सम्बन्ध आठवीं शताब्दी से है। 

        महाबलिपुरम् (Mahabalipuram) या कहें  मामल्लपुरम् (Mamallapuram) भारत के तमिलनाडु राज्य के चेंगलपट्टु ज़िले में स्थित एक प्राचीन नगर (शहर) है।

        यह मंदिरों का शहर राज्य की राजधानी, चेन्नई, से 55 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी से तटस्थ है।
        चैन्नई का पुराना नाम मदुरैई है जिसका शुद्ध रूप मथुरा है।
        स्थानीय लोग इसे (तेन मदुरा) कहते हैं, यानि दक्षिणी मथुरा - उत्तर भारत के मथुरा की उपमा में यह नाम है।
        क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक रूप से पांड्य राजाओं का शासन रहा है, चोळों के साम्राज्य में भी यहाँ पांड्यों की उपस्थिति रही है। 
        याद रहे कि तमिळ लिखावट को देखकर यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि इसका नाम और उच्चारण मथुरा था या मतुरा या मदुरा या मधुरा - तमिळ उच्चारण में भी यह अन्तर स्पष्ट नहीं होता।
        ________
        पल्लव राजाओ की विरासत 
        महाबलिपुरम प्राचीन शहर अपने भव्य मंदिरों, स्थापत्य और सागर-तटों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। सातवीं शताब्दी में यह शहर पल्लव राजाओं की राजधानी था। 

        द्रविड वास्तुकला की दृष्टि से यह शहर अग्रणी स्थान रखता है। यहाँ पर पत्थरो को काट कर मन्दिर बनाया गया। पल्लव वंश के अंतिम शासक अपराजित थे।

        यह मंदिर द्रविड वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। यहां तीन मंदिर हैं। बीच में भगवान विष्णु का मंदिर है जिसके दोनों तरफ से शिव मंदिर हैं। मंदिर से टकराती सागर की लहरें एक अनोखा दृश्य उपस्थित करती हैं। 
        इसे महाबलीपुरम् का रथ मंदिर भी कहते है। इसका निर्माण "नरसिंह वर्मन्" प्रथम ने कराया था। 

        प्रांरभ में इस शहर को "मामल्लपुरम" कहा जाता था।
        महाबलिपुरम के लोकप्रिय रथ दक्षिणी सिर पर स्थित हैं।
         महाभारत के पांच पांडवों के नाम पर इन रथों को पांडव रथ कहा जाता है। पांच में से चार रथों को एकल चट्टान पर उकेरा गया है।

         द्रौपदी और अर्जुन रथ वर्ग के आकार का है जबकि भीम रथ रेखीय आकार में है। 
        धर्मराज रथ सबसे ऊंचा है।

        इसमे दौपदी के पांच रथमंदिर हुए। क्योंकि उसके पांच पति थे। इस लिए उसके पांच रथमंदिर हुए।
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        कृष्ण मण्डपम्-
        यह मंदिर महाबलिपुरम के प्रारंभिक पत्थरों को काटकर बनाए गए मंदिरों में एक है। मंदिर की दीवारों पर ग्रामीण जीवन की झलक देखी जा सकती है। एक चित्र में भगवान कृष्ण को गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाए तथा बाँसुरी बजाते हुए दिखाया गया है।


        यमुना में कृष्ण और गोपिकाओं का सबसे पहला उल्लेख-

        निम्नलिखित पंक्तियों का अनुवाद डॉ. कामिल ज़्वेलेबिल द्वारा किया गया है।

        नर हाथी अपनी मादा के खाने के लिए कोमल टहनियों को नष्ट कर देता है, उसकी तुलना "माल" से की जाती है, जो कपड़े पहनने के लिए पेड़ों की शाखाओं (यानी कुरुंतमारम, कन्नन द्वारा काटा गया जंगली चूना) पर चलते हुए रौंदता (चलता, कूदता, मिटिट्टु) बनाता है। पानी से भरी तोलुनाई नदी के दूर-दूर तक फैले रेत वाले चौड़े घाट के [किनारों पर] ग्वालों अंतर- (आयर) समुदाय की युवा महिलाओं (मकलिर) को ठंड  लगती है।

        और डॉ. ज़्वेलेबिल के अनुसार, किंवदंती का यह संस्करण किसी भी संस्कृत स्रोत को ज्ञात नहीं है। सबसे पहला संस्कृत स्रोत या तो भागवतपुराण या विष्णुपुराण प्रतीत होता है


         इसलिए ऐसा लगता है कि "मटुरै मरुतानिलनकन" की यह अकाम 59 कविता भारत में कृष्ण की आकृति और यमुना नदी के तट पर अहीरो का उल्लेख करने वाली सबसे पुरानी कविता प्रतीत होती है।


        साइन्स जर्नी चैनल का यूट्यूबर  "कृष्ण" शब्द को सातवीं आठवीं सताब्दी का मानता है । जबकि
        कृष्ण का सबसे पहला उल्लेख वेद में हैं और ऋग्वेद का समय  ईसा पूर्व नवम सदी से पन्द्रह वीं सदी तक है।
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        ऋग्वेद की सबसे पुरानी प्रति भोजपत्र पर लिखी हुई है, जिसे पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) में रखा गया।
        इनमें से एक पांडुलिपि शारदा स्क्रिप्ट ( लिपि) में लिखी हुई है।

         जबकि बाकी 29  मेनुस्क्रिप्ट (पाण्डुलिपि) देवनागरी लिपि में भी हैं.

        इनमें बहुत से ऐसे फीचर हैं, शब्दों के ऐसे उच्चारण हैं, जो फिलहाल आधुनिक प्रतियों में कहीं नहीं दिखते हैं।.
        शारदा लिपि का व्यवहार ईसा की दसवीं शताब्दी से उत्तर-पूर्वी पंजाब और कश्मीर में देखने को मिलता है

        ब्यूह्लर का मत था कि शारदा लिपि की उत्पत्ति गुप्त लिपि की पश्चिमी शैली से हुई है, और उसके प्राचीनतम लेख (8) वीं शताब्दी से मिलते हैं।

        "ऐतिहासिक और साहित्यिक स्रोत-

        एक व्यक्तित्व के रूप में कृष्ण का विस्तृत विवरण सबसे पहले ऋग्वेद और उसके बाद छान्दोग्योपनिषद में मिलता है।

        फिर बहुत बाद में  महाकाव्य महाभारत में कृष्ण के विषय में लिखा गया है , जिसमें कृष्ण को विष्णु के अवतार के रूप में दर्शाया गया है। जबकि महाभारत से पूर्व लिखित ग्रन्थ ब्रह्म वैवर्तपुराण में कृष्ण को विष्णु का भी मूल कहा गया है। 

        महाभारत के बाद के परिशिष्ट हरिवंशपुराण में कृष्ण के बचपन और युवावस्था का एक विस्तृत संस्करण है। इसके अतिरिक्त 

        भारतीय-यूनानी मुद्रण में भी कृष्ण चरित्र अंकित हैं।-

        180  ईसा पूर्व लगभग इंडो-ग्रीक राजा एगैथोकल्स ने देवताओं की छवियों पर आधारित कुछ सिक्के जारी किये थे। 

        भारत में अब उन सिक्को को वैष्णव दर्शन से संबंधित माना जाता है।   सिक्कों पर प्रदर्शित देवताओं को विष्णु के अवतार बलराम -( संकर्षण) के रूप में देखा जाता है जिसमें गदा और हल और वासुदेव-कृष्ण , शंख और सुदर्शन चक्र दर्शाये हुए हैं।

        प्राचीन संस्कृत व्याकरण भाष्यकार पतंजलि ने अपने महाभाष्य में भारतीय ग्रंथों के देवता कृष्ण और उनके सहयोगियों के कई संदर्भों का उल्लेख किया है।

         पाणिनी की श्लोक- (३/१/२६) पर अपनी टिप्पणी में, वह कंसवध अथवा कंस की हत्या का भी उल्लेख करते हैं, जो कि कृष्ण से सम्बन्धित किंवदन्तियों का एक महत्वपूर्ण अंग है। 

        पाणिनि का समय भी ईसा पूर्व 800 से 400 के मध्य है, विद्वान् पाणिनि का समय भगवान बुद्ध से पूर्व बताते हैं,। पाणिनी पणि ( फोनीशियन ) जाति से सम्बन्धित थे जिन्होंने भाषा और लिपि पर कार्य किया।

        दुनिया की प्रथम लिपि फोनेशियन पति लोगो की देन है  जिससे कालांतर में दुनियाभर की अन्य लिपियाँ विकसित हुई ।

        ___________________

        बौद्ध ग्रन्थ पाली भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे गये हैं। 

        ब्राह्मी लिपि के विषय में नीचे कुछ विश्लेषण है। जिसमें कृष्ण चरित्र को लिखा गया है।

        हेलीडियोरस स्तंभ और अन्य शिलालेख-

        मध्य भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में औपनिवेशिक काल के पुरातत्वविदों ने एक ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेख के साथ एक स्तंभ की खोज की थी। आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए, इसे १२५ और १०० ईसा पूर्व के बीच का घोषित किया गया है और ये निष्कर्ष निकाला गया कि यह एक इंडो-ग्रीक प्रतिनिधि द्वारा एक क्षेत्रीय भारतीय राजा के लिए बनवाया गया था जो ग्रीक राजा एण्टिलासिडास के एक राजदूत के रूप में उनका प्रतिनिधि था। इसी इंडो-ग्रीक के नाम अब इसे हेलेडियोरस स्तंभ के रूप में जाना जाता है। इसका शिलालेख "वासुदेव" के लिए समर्पण है जो भारतीय परम्परा में कृष्ण का दूसरा नाम है। कई विद्वानों का मत है कि इसमें "वासुदेव" नामक देवता का उल्लेख है, क्योंकि इस शिलालेख में कहा गया है कि यह " भागवत हेलियोडोरस" द्वारा बनाया गया था और यह " गरुड़ स्तंभ" (दोनों विष्णु-कृष्ण-संबंधित शब्द हैं)।

        इसके अतिरिक्त, शिलालेख के एक अध्याय में कृष्ण से संबंधित कविता भी शामिल हैं महाभारत के अध्याय ११/७ का सन्दर्भ देते हुए बताया गया है कि अमरता और स्वर्ग का रास्ता सही ढंग से तीन गुणों का जीवन जीना है: स्व- संयम ( दमः ), उदारता ( त्याग ) और सतर्कता ( अप्रामदाह )

        हेलियोडोरस शिलालेख एकमात्र प्रमाण नहीं है। तीन हाथीबाड़ा शिलालेख और एक घोसूंडी शिलालेख,जो कि राजस्थान राज्य में स्थित हैं।  और आधुनिक कार्यप्रणाली के अनुसार जिनका समयकाल 19 वीं  सदी ईसा पूर्व है उनमें भी कृष्ण का उल्लेख किया गया है। पहली सदी ईसा पूर्व , संकर्षण (बलराम का एक नाम ) और वासुदेव का उल्लेख करते हुए, उनकी पूजा के लिए एक संरचना का निर्माण किया गया था। ये चार शिलालेख प्राचीनतम ज्ञात संस्कृत शिलालेखों में से एक है 

        हाथीबाड़ा घोसुण्डी शिलालेख (या, घोसुंडी शिलालेख, या हाथीबाड़ा शिलालेख), राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के पास प्राप्त शिलालेख हैं जिनकी भाषा संस्कृत है और लिपि ब्राह्मी है

        __________________

        ये ब्राह्मी लिपि में, संस्कृत के प्राचीनतम शिलालेख हैं।  हाथीबाड़ा शिलालेख, नगरी गाँव से प्राप्त हुए थे जो चित्तौड़गढ़ से 8 किलोमीटर उत्तर में है।

        घोसुण्डी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व)

        यह लेख कई शिलाखण्डों में टूटा हुआ है। इसके कुछ टुकड़े ही उपलब्ध हो सके हैं। इसमें एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।

        घोसुण्डी का शिलालेख नगरी चित्तौड़ के निकट घोसुण्डी गांव में प्राप्त हुआ था इस लेख में प्रयुक्त की गई भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है। घोसुंडी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉक्टर डी० आर० भण्डारकर द्वारा पढ़ा गया यह राजस्थान में वैष्णव या भागवत संप्रदाय से संबंधित सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख है इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि उस समय तक राजस्थान में भागवत धर्म लोकप्रिय हो चुका था।

        इसमें भागवत की पूजा के निमित्त शिला प्राकार बनाए जाने का वर्णन है

        इस लेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजागृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने का उल्लेख है। इस लेख का महत्त्व द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में भागवत धर्म का प्रचार, संकर्षण तथा 

        वासुदेव की मान्यता और अश्वमेघ यज्ञ के प्रचलन आदि में है।

        ________________________

        कई पुराणों में कृष्ण की जीवन कथा को बताया या कुछ इस पर प्रकाश डाला गया है ।


                   "ब्राह्मी लिपि का परिचय-


        • ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट अशोक (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। नये अनुसंधानों के आधार 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है। ब्राह्मी भी खरोष्ठी की तरह ही पूरे एशिया में फैली हुई थी।
        • अशोक ने अपने लेखों की लिपि को 'धम्मलिपि' का नाम दिया है; उसके लेखों में कहीं भी इस लिपि के लिए 'ब्राह्मी' नाम नहीं मिलता। लेकिन बौद्धोंजैनों तथा ब्राह्मण-धर्म के ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम 'ब्राह्मी' लिपि ही रहा होगा।
        • बौद्ध ग्रंथ 'ललितविस्तर' में 64 लिपियों के नाम दिए गए हैं। इनमें पहला नाम 'ब्राह्मी' है और दूसरा 'खरोष्ठी' है । 
        • जैनों के 'पण्णवणासूत्र' तथा 'समवायांगसूत्र' में 16 लिपियों के नाम दिए गए हैं, जिनमें से पहला नाम 'बंभी' (ब्राह्मी) का है।
        • 'भगवतीसूत्र' में सर्वप्रथम 'बंभी' (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके (नमो बंभीए लिविए) सूत्र का आरंभ किया गया है।
        • 668 ई. में लिखित एक चीनी बौद्ध विश्वकोश 'फा-शु-लिन्' में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उल्लेख मिलता है। इसमें लिखा है कि, 'लिखने की कला का शोध दैवी शक्ति वाले तीन आचार्यों ने किया है; उनमें सबसे प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर को पढ़ी जाती है।'
        • इससे यही जान पड़ता है कि ब्राह्मी भारत की सार्वदेशिक लिपि थी और उसका जन्म भारत में ही हुआ किंतु बहुत-से विदेशी पुराविद मानते हैं कि किसी बाहरी वर्णमालात्मक लिपि के आधार पर ही ब्राह्मी वर्णमाला का निर्माण किया गया था।
        • ब्यूह्लर जैसे प्रसिद्ध पुरालिपिविद की मान्यता रही कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण फिनीशियन लिपि के आधार पर हुआ। इसके लिए उन्होंने एरण के एक सिक्के का प्रमाण भी दिया था।
        • एरण (सागर ज़िला, म.प्र.) से तांबे के कुछ सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक पर 'धमपालस' शब्द के अक्षर दाईं ओर से बाईं ओर को लिखे हुए मिलते हैं। चूंकि, सेमेटिक लिपियां भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थीं, इसलिए ब्यूह्लर ने इस अकेले सिक्के के आधार पर यह कल्पना कर ली कि आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी सेमेटिक लिपियों की तरह दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। ओझा जी तथा अन्य अनेक पुरालिपिविदों ने ब्यूह्लर की इस मान्यता का तर्कयुक्त खंडन किया है। उस समय ओझा जी ने लिखा था, 'किसी सिक्के पर लेख का उलटा आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सिक्के पर उभरे हुए अक्षर सीधे आने के लिए सिक्के के ठप्पे में अक्षर उलटे खोदने पड़ते हैं, अर्थात् जो लिपियां बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती हैं उनके ठप्पों में सिक्कों की इबारत की पंक्ति का आरंभ दाहिनी ओर से करके प्रत्येक अक्षर उलटा खोदना पड़ता है, परंतु खोदनेवाला इसमें चूक जाए और ठप्पे पर बाईं ओर से खोदने लग जाए तो सिक्के पर सारा लेख उलटा आ जाता है, जैसा कि एरण के सिक्के पर पाया जाता है।' साथ ही, ओझा जी ने लिखा था, 'अब तक कोई शिलालेख इस देश में ऐसा नहीं मिला है कि जिसमें ब्राह्मी लिपि फ़ारसी की नाईं उलटी लिखी हुई मिली हो।'
        • यह 1918 के पहले की बात है।


        _

        पालि भाषा एवं मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं के संबंध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह भाषाविकास जो संस्कृत से माना जाता है वह ठीक नहीं। 

        यथार्थत: वैदिककाल से ही साहित्यिक भाषा के साथ साथ उससे मिलती जुलती लोकभाषा ने देश एवं कालभेदानुसार साहित्यिक प्राकृत भाषाओं का रूप धारण किया है। 

        पालि भी अपनी पूरी विरासत संस्कृत से नहीं ले रही, क्योंकि उसमें अनके शब्दरूप ऐसे पाए जाते हैं जिसका मेल संस्कृत से नहीं, किंतु उसका उत्पत्ति मिलान वेदों की भाषा से बैठता है।

         उदाहरणार्थ- पालि एवं अन्य प्राकृतों में तृतीया बहुवचन के देवेर्भि, देवेहि, जैसे रूप मिलते हैं।

        अकारान्त संज्ञाओं के ऐसे रूपों का संस्कृत में सर्वथा अभाव है, किंतु वैदिक में देवेभिर्, उतना ही सुप्रचिलित है जितना देवै:।

        वैदिक भाषा में देवेभिर्- और दैवै: दोनों शब्द प्रचलन में रहे परन्तु पूर्व शब्द देवेभिर् ही है परन्तु लौकिक भाषा संस्कृत में देवै: ही प्रचलित है।

        अतएव उक्त रूप की परंपरा पालि तथा प्राकृतों में वैदिक भाषा से ही उत्पन्न मानी जा सकती है। उसी प्रकार पालि में 'यमामसे', 'मासरे', 'कातवे' आदि अनेक रूप ऐसे हैं जिनके प्रत्यय संस्कृत में पाए ही नहीं जाते, किंतु वैदिक भाषा में विद्यमान हैं।

        पालि के ग्रंथों तथा अशोक की प्रशस्तियों से पूर्व का प्राकृत (लोकभाषाओं) में लिखित साहित्य उपलब्ध नहीं है तथा प्राकृत वैयाकरणों ने अपनी सुविधा के लिए संस्कृत को प्रकृति मानकर प्राकृत भाषा का व्याकरणात्मक विश्लेषण किया है और इसीलिए यह भ्रांति उत्पन्न हो गई है कि प्राकृत भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत से हुई। 

        पालि के कच्चानमोग्गल्लान आदि व्याकरणों में यह दोष नहीं पाया जाता, क्योंकि वहाँ भाषा का वर्णन संस्कृत को प्रकृति मानकर नहीं किया गया।

        "पालि भाषा का उद्भव:-

        पालि भाषा दीर्घकाल तक राज्य भाषा के रूप में भी गौरवान्वित रही है। भगवान बुद्ध ने पालि भाषा में ही उपदेश दिये थे। अशोक के समय में इसकी बहुत उन्नति हुई। उस समय इसका प्रचार भी विभिन्न बाहरी देशों में हुआ। अशोक के समय सभी लेख पालि भाषा में ही लिखे गए थे। यह कई देशो जैसे श्री लंकाबर्मा तिब्बत आदि देशों की धर्म भाषा के रूप में सम्मानित हुई।

        ‘पाली’ भाषा का उद्भव गौतम बुद्ध से लगभग तीन सौ वर्ष पहले ही हो चुका था, किन्तु उसके प्रारम्भिक साहित्य का पता नहीं लगता। प्रत्येक भाषा का अपना साहित्य प्रारम्भिक अवस्था में कथा, गीत, पहेली आदि के रूप में रहता है और उसकी रूपरेखा तब तक लोगों को जबानी याद रहती है जब तक कि वह लेखबद्ध हो या ग्रंथारूढ न हो जाय। 

        इस काल में पालि भाषा की जैसे उत्पत्ति हुई वैसे ही विकास भी हुआ। प्रारंभ से लेकर लगभग तीन सौ वर्षों तक पालि भाषा जन साधारण के बोलचाल की भाषा रही, किन्तु जिस समय भगवान बुद्ध ने इसे अपने उपदेश के लिए चुना और इसी भाषा में उपदेश देना शुरू किया, तब यह थोड़े ही दिनों में शिक्षित समुदाय की भाषा होने के साथ राजभाषा भी बन गई। ‘पालि’ शब्द का सबसे पहला व्यापक प्रयोग हमें आचार्य बुद्धघोष की अट्टकथाओं और उनके विसुद्धिमग्ग में मिलता है। परन्तु अश्व घोष ने बुद्ध चरित संस्कृत भाषा में लिखा-

         वहाँ यह बात अपने उत्तर कालीन भाषा संबंधी अर्थ से मुक्त है। आचार्य बुद्धघोष ने पालि शब्द -दो अर्थों में इसका प्रयोग किया है- (१) बुद्ध-बचन या मूल टिपिटक के अर्थ में (२) पाठ या मूल टिपिटक के पाठ अर्थ में।

        ‘पालि भाषा’ से तात्पर्य उस भाषा से लेते हैं जिसमें स्थविरवाद(थेरवाद)-बौद्धधर्म का तिपिटक और उसका संपूर्ण उपजीवी साहित्य रखा हुआ है। किन्तु ‘पालि’ शब्द का इस अर्थ में प्रयोग स्वयं पालि साहित्य में भी उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व कभी नहीं किया गया। पालि भाषा मूलतः मागधी भाषा ही थी। मगध आधुनिक समय में विहार का दक्षिणी भाग ही पहले मगध था "अधुना वेहाराख्यदेशस्य दक्षिण- भागः"

        वा हार की पालि भाषा के  उदाहरण कच्चायन-व्याकरण में देखने को मिलते हैं। 

        मागधी ही मूल भाषा है, जिसमें प्रथम कल्प के मनुष्य बोलते थे, जो ही अश्रुत वचन वाले शिशुओं की मूल भाषा है और जिसमें ही बुद्ध ने अपने धर्म का, मूल रूप से भाषण किया। इसी प्रकार महावंश के परिवर्द्धित अंश चोल वंश के परिच्छेद 37 की 244 वीं गाथा में कहा गया है “सब्बेसं मूलभासाय मागवाय निरुत्तीया” आदि। निश्चय ही सिंहली परंपरा अपनी इस मान्यता में बड़ी दृढ़ है कि जिसे हम आज पालि कहते हैं, वह बुद्धकालीन भारत में बोली जाने वाली मागध भाषा ही थी। बुद्ध बचनों की भाषा को ही सिंहली परंपरा ‘मागधी’ कहना नहीं चाहती, वह अट्टककथाओं तक की भाषा को बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में मागधी कहना ही अधिक पसन्द करती है।

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        "पालि भाषा ब्राह्मी लिपि में है जिस लिपि की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।-

        • यह बाँये से दाँये की तरफ लिखी जाती है।
        • यह मात्रात्मक लिपि है। व्यंजनों पर मात्रा लगाकर लिखी जाती है।
        • कुछ व्यंजनों के संयुक्त होने पर उनके लिये 'संयुक्ताक्षर' का प्रयोग (जैसे प्र= प् + र)
        • वर्णों का क्रम वही है जो आधुनिक भारतीय लिपियों में है।

        ब्राह्मी लिपि के अभिलेख-

        सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में अंकित प्रमुख अभिलेख
        • रुम्मिनदेई - स्तम्भलेख
        • गिरनार - शिलालेख
        • बराबर - गृहालेख
        • मानसेहरा - शिलालेख
        • शाहबाजगद्री - शिलालेख
        • दिल्ली - स्तम्भलेख
        • गुर्जर - लघु-शिलालेख
        • मस्की- शिलालेख
        • कान्धार - द्विभाषी शिलालेख

        ब्राह्मी की संतति-

        ब्राह्मी लिपि से उद्गम हुई कुछ लिपियाँ और उनकी आकृति एवं ध्वनि में समानताएं स्पष्टतया देखी जा सकती हैं। इनमें से कई लिपियाँ ईसा के समय के आसपास विकसित हुई थीं। इन में से कुछ इस प्रकार हैं-

        १-देवनागरी, २-बांग्ला लिपि, ३-उड़िया लिपि, ४-गुजराती लिपि, ५-गुरुमुखी, ६-तमिल लिपि, ७-मलयालम लिपि, ८-सिंहल लिपि, ९-कन्नड़ लिपितेलुगु लिपि, १०तिब्बती लिपि, ११-रंजना, प्रचलित १२-नेपाल, १३-भुंजिमोल, १४-कोरियाली, १५-थाई, १६-बर्मेली, १७-लाओ, १८-ख़मेर, १९-जावानीज़, २०-खुदाबादी लिपि आदि।

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         जबकि वेद शब्द भारोपीय होने अनेक भाषाओ में  है जिसका कुछ विवरण नीचे है।
        परन्तु यह वैदिक शब्द ही है जो संस्कृत में  विद धातु में + ल्युट्( अन.) + टाप्) प्रत्यय जोड़ने से बनता है  जिसका रूप अर्थ- ज्ञान - तथा  सुख-दुःख का अनुभव ( बोध) और विवाह है ।
         
        विद -धातु भारोपीय परिवार ही नही अपितु सैमेटिक और हैमेटिक भाषाओं में भी है ।

        It is the hypothetical source of/evidence for its existence is provided by: 
        १-Vedic language- veda "I know;" 
        २-Avestan vaeda "I know;"
        ३-Greek oida,
        ४- Doric woida "I know,"
         ५-idein "to see;"

         ६-Old Irish fis "vision," find "white," i.e. "clearly seen," fiuss "knowledge;" 

        ७-Welsh gwyn,

         ८-Gaulish vindos,

         ९-Breton gwenn "white;"

         १०-Gothic, 

        ११-Old Swedish, Old English witan "to know;"

         १२-Gothic weitan "to see;" 

        १३-English wise, German wissen "to know;"

        १४- Lithuanian vysti "to see;" 

        १५-Bulgarian vidya "I see;" 

        १६-Polish widzieć "to see," wiedzieć "to know;" 

        १७-Russian videt' "to see," vest' "news
        १८- Old Russian vedat' "to know."

        wed (v.)
        Old English weddian "to pledge oneself, covenant to do something, vow; betroth, marry,"
         also "unite (two other people) in a marriage, conduct the marriage ceremony," from Proto-Germanic *wadja (source also of Old Norse veðja, Danish vedde "to bet, wager," Old Frisian weddia "to promise," Gothic ga-wadjon "to betroth"), from PIE root *wadh- (1) "to pledge, to redeem a pledge" (source also of Latin vas, genitive vadis "bail, security," 
        Lithuanian vaduoti "to redeem a pledge"), which is of uncertain origin.

        पुरानी अंग्रेजी विवाह wed- "स्वयं को प्रतिज्ञा करना, कुछ करने की प्रतिज्ञा करना, प्रतिज्ञा करना; सगाई करना, विवाह करना,इसके अलावा "एक विवाह में (दो अन्य लोगों को) एकजुट करें, विवाह समारोह का संचालन करें," प्रोटो-जर्मनिक *वाडजा (पुराने नॉर्स वेजा का भी स्रोत, डेनिश वेड्डे "शर्त लगाना, दांव लगाना," ओल्ड फ़्रिसियाई वेडिया "वादा करना," गोथिक) गा-वाडजॉन "टू बीट्रोथ"), पीआईई रूट से *वाध- (1) "प्रतिज्ञा करना, प्रतिज्ञा चुकाना" (स्रोत)लैटिन का भी वास, जननेटिव वादीस "जमानत, सुरक्षा,"लिथुआनियाई वाडुओटी "प्रतिज्ञा भुनाने के लिए"), जो अनिश्चित मूल का है।
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        The sense has remained closer to "pledge" in other Germanic languages (such as German Wette "a bet, wager"); development to "marry" is unique to English. "Originally 'make a woman one's wife by giving a pledge or earnest money', then used of either party" [Buck]. Passively, of two people, "to be joined as husband and wife," from c. 1200. Related: Wedded; wedding.
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        वेदाना (वेदना)। अर्थ भारतीय पुराणों में—एक देवी जो जीवित प्राणियों को पीड़ा पहुँचाती थी। अधर्म ने हिंसा से विवाह किया। उनकी नृता और निऋति नाम की दो बेटियाँ पैदा हुईं। उनसे भय, नरक, माया और वेदना का जन्म हुआ। मृत्यु माया की पुत्री थी। दुख वेदना का पुत्रब॒छपनव था। (अग्नि पुराण, अध्याय 20)।
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        बौद्ध धर्म में
        थेरवाद (बौद्ध धर्म की प्रमुख शाखा)
        थेरवाद शब्दावली में वेदना
        स्रोत : विज्डम लाइब्रेरी: धम्मसंगनी
        वेदना बहुत सामान्य अर्थ वाला शब्द है, जिसका अर्थ है संपर्क या प्रभाव पर शारीरिक या मानसिक, भावना या प्रतिक्रिया। अनुभूति शायद ही भावना के रूप में इतनी वफादार प्रस्तुति है,!

         हालांकि वेदना को अक्सर इंद्रिय-गतिविधि में "संपर्क से पैदा हुआ" के रूप में जाना जाता है, इसे हमेशा आम तौर पर तीन प्रजातियों से मिलकर परिभाषित किया जाता है -

        आनंद (ख़ुशी),दर्द (बीमार),और तटस्थ भावना
        - एक सुखवादी पहलू जिसके लिए 'भावना' शब्द ही पर्याप्त है। इसके अलावा, यह प्रतिनिधि भावना को समाहित करता है।

        वेदना का यह सामान्य मानसिक पहलू, शारीरिक रूप से स्थानीय संवेदनाओं से अलग है - उदाहरण के लिए, दांत दर्द - संभवतः उत्तर में "मानसिक" (सीटासिकम) शब्द द्वारा जोर दिया गया है। साइ. बताते हैं कि इस अभिव्यक्ति (= सीतानिसिटट्टम) से "शारीरिक सुख समाप्त हो जाता है" (असल. 139)।

        (ऋग्वेद 1.176.4)
        असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न ते मयः ।
        अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते ॥४॥

        अनुवाद:-
        हे इन्द्र ! सोमरस न निचोड़ ने वाले दु: साध्य विनाश वालों और सुख न पहुँचाने वालों का विनाश करो। ऐसे लोगों का धन हमें दो । तुम्हारी स्तुति करने वाला ही धन पाता है ।४। ऋग्वेद-(१/१७६/४)
        वेदनं= धनम्।vedanaṃ < vedanam < vedana[noun], accusative, singular, neuter “property; marriage; obtainment.”
        = अनुवाद:

         (असुन्वन्तम्)= अभिषवादिनिष्पादनपुरुषार्थरहितम् (समम्)= सर्वम् (जहि)= मारो- हन् धातु लोटलकार । (दूणाशम्)= दुःखेन नाशनीयम् (यः)=जो (न)= निषेधे (ते)= तव (मयः)= सुखम् (अस्मभ्यम्) (अस्य) (वेदनम्)= धनम् (दद्धि) धर । अत्र दध धारण इत्यस्माद्बहुलं छन्दसीति शपो लुक् व्यस्ययेन परत्मैपदञ्च । (सूरिः) =विद्वान् (चित्) इव (ओहते) व्यवहारान् वहति । अत्र वाच्छन्दसीति संप्रसारणं लघूपधगुणः ॥ ४ ।

        (असुन्वन्तम्) पदार्थों के सार खींचने आदि पुरुषार्थ से रहित (दूणाशम्) दुःख से विनाशने योग्य (समम्) समस्त को (जहि) मारो (यः) जो (सूरिः) विद्वान्  (चित्) समान (ओहते) व्यवहारों की प्राप्ति करता है (ते) तुम्हारे (मयः) सुख को (न) नही (अस्य) इसके (वेदनम्) धन को (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (दद्धि) याच्ञायाम् निघण्टुः । अयं धातुरित्यन्ये । दे दो ॥ ४ ।

        (ऋग्वेद 4.30.13)

        उत शुष्णस्य धृष्णुया प्र मृक्षो अभि वेदनम्। पुरो यदस्य सम्पिणक् ॥१३॥

         अनुवाद:-
        "तूने वीरता से शूष्ण का धन छीन लिया , जब तुमने उसके नगरों को ध्वस्त कर दिया था।"

        अक्सर बौद्धवादी अपने पूर्वदुराग्रह द्वारा कहा करते हैं।

        कि पालि भारत की सबसे प्राचीन ज्ञात भाषा है। जिसे भारत की सबसे प्राचीन ज्ञात लिपि धम्म लिपि में लिखा जाता था। जिसका प्रमाण सम्राट अशोक के शिलालेख और स्तंभ से प्राप्त होता है।पाली भाषा भारत के जनमानस की भाषा थी।

         कुछ इतिहासकार संस्कृत को सबसे प्राचीन भाषा मानते है पर ये प्रमाणित नहीं है वेदिक भाषा प्राचीन है। क्योंकि पाली भाषा में (ऋ, क्ष, त्र, ज्ञ, ऐ, औ) अक्षर नही है। इन अक्षरों की उत्पत्ति बाद के समय में हुई।

         संस्कृत का सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में ऋ से ये आसानी से समझा जा सकता है की पाली भाषा ही भारत की सबसे प्राचीन भाषा है। 
        पालि की प्रवृति साधारण जन के अनुरूप है अत: (ऋ) वर्ण का उच्चारण (र) रूप में ही होता है।

        "पालि व्याकरण परंपरा-पालि व्याकरण में पाच व्याकरण परंपरा प्रसिद्ध है –

        1.बोधिसत्त

        2.सब्बगुणाकार

        3.कच्चान

        4.मोग्गल्लान

        5.सद्दनीति

        बोधिसत्त  और  सब्बगुणाकार अधिक प्राचीन व्याकरण है, जो  वर्तमान में उपलब्ध नहीं है।

        पालि भाषा में कच्चायन  व्याकरण में अक्खरापादयो एकचत्तालिसं अर्थात  41 वर्ण माने गए है तथा मोग्गल्लान

        व्याकरण में तेचत्तालीस-क्खरा वण्णा अर्थात  43 वर्ण माने जाते है। पाली भाषा में मोग्गल्लान व्याकरण

        अधिक प्रचलित है। प्रस्ततु  लेख में  मोग्गल्लान व्याकरण का  आधार लिया गया है।

        स्वर

        पालि भाषा में दसादो सरा अर्थात 10 स्वर है।

        अ,आ, इ, ई, उ, ऊ, एँ, ऐ , ओँ, ओ।

            द्वेद्वे सवण्णा  अर्थात दो-दो स्वर सवर्ण कहे गए

        है। पुब्बो रस्सो  अर्थात पूर्व स्वर र्हस्व माना जाता है और परो

        दीघो  अर्थात बाद का स्वर दीर्घ  माना जाता है।

        व्यञ्जन

         पालि भाषा में  (33)  व्यञ्जन है।

        ङ्
        अं

            

        पञ्‍च पञ्‍चका वग्गा का तात्पर्य  पाच- पाच वण्ण के  पाच वग्ग  है-जसे कवग्ग, चवग्ग, टवग्ग,तवग्ग,पवग्ग. बिन्दु  निग्गहीतं अर्थात ‘अं’ को निग्गहित (अनुस्वार) कहते है।

        जो वर्ण पालि भाषा में नहीं है उसके लिए प्रयुक्त वर्ण

        • लृ ऐ, औ पालि भाषा में नहीं है.
        • रेफ भी पालि भाषा में नहीं है। कभी कभी रेफ का लोप होता है तो कभी  कभी ‘र’ होता है।

        जैसे-

        कर्म = कम्म

        महार्ह = महारहो

        •  के स्थान पर अ, इ ,उ का प्रयोग करते है।

        जैसे-

        गृहं= गहं

        ऋणं= इणं

        ऋतु= उतु

        •  के स्थान पर ए, इ, ई का प्रयोग करते है।

        जैसे-

        ऐरावण = एरावण

        ग्रैवेयं = गीवेय्यं

        सैन्धव = सिन्धव

        •  के स्थान पर ओ, उ का प्रयोग करते है।

        जैसे-

        दौवारीक =दोवारीक

        मौक्तिक =मुत्तिकं

        • श,ष के स्थान पर  का प्रयोग करते है।

        जैसे-

        ऋषि =इसि

        शाखा=साखा

        _____________________________________

        तथागत बुद्ध ने अपने उपदेश पाली में ही दिए है। धम्म ग्रंथ त्रिपिटक की भाषा भी पाली ही हैl

        संस्कृत में 13 स्वर, पालि भाषा में 10 स्वर, प्राकृत में 10 स्वर, अपभ्रंश में 8 तथा हिन्दी में 11 स्वर होते है।

        'पालि' शब्द का निरुक्त:-
        पालि शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों के नाना मत पाए जाते हैं। किसी ने इसे पाठ शब्द से तथा किसी ने पायड (प्राकृत) से उत्पन्न करने का प्रयत्न किया है। एक जर्मन विद्वान् मैक्स वैलेसर ने पालि को 'पाटलि' का संक्षिप्त रूप बताकर यह मत व्यक्त किया है कि उसका अर्थ पाटलिपुत्र की प्राचीन भाषा से है।
        इन व्युत्पत्तियों की अपेक्षा जिन दो मतों की ओर विद्वानों का अधिक झुकाव है, उनमें से एक तो है पं॰ विधुशेखर भट्टाचार्य का मत, जिसके अनुसार पालि, पंक्ति शब्द से व्युत्पन्न हुआ है। पंक्ति को मराठी में पाळी बोलते है और मराठी में और संस्कृत में पालन शब्द भी है जिसका अर्थ है जिसको लोग पाल पोसकर बड़ा करते है या पालन का अर्थ जिसका नियम के अनुसार अवलंब या प्रयोग किया जाता है। इस मत का प्रबल समर्थन एक प्राचीन पालि कोश अभिधानप्पदीपिका (12वीं शती ई.) से होता है,

        क्योंकि उसमें तंति (तंत्र), बुद्धवचन, पंति (पंक्ति) और पालि इन शब्दों मे भी स्पष्ट ही पालि का अर्थ पंक्ति ही है। पूर्वोक्त दो अर्थों में पालि के जो प्रयोग मिलते हैं, उनकी भी इस अर्थ से सार्थकता सिद्ध हो जाती है। 
        बुद्धवचनों की पंक्ति या पाठ की पंक्ति का अर्थ बुद्धघोष के प्रयोगों में बैठ जाता है। तथापि ध्वनिविज्ञान के अनुसार पंक्ति शब्द से पालि की व्युत्पत्ति नहीं बैठाई जा सकती। उसकी अपेक्षा पंक्ति के अर्थ में प्रचलित देशी शब्द पालि, पाठ्ठ, पाडू से ही इस शब्द का सबंध जोड़ना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है पालि शब्द पीछे संस्कृत में भी प्रचलित हुआ पाया जाता है। अभिधानप्पदीपिका में जो पालि की व्युत्पत्ति "पालेति रक्खतीति पालि", इस प्रकार बतलाई गई है उससे भी इस मत का समर्थन होता है। किंतु "पालि महाव्याकरण" के कर्ता भिक्षु जगदीश कश्यप ने पालि को पंक्ति के अर्थ में लेने के विषय में कुछ आपत्तियाँ उठाई हैं और उसे मूल त्रिपिटक ग्रंथों में अनेक स्थानों पर प्रयुक्त 'परीयाय' (पर्याय) शब्द से व्युत्पन्न बतलाने का प्रयत्न किया है। सम्राट् अशोक के भाब्रू शिलालेख में त्रिपिटक के 'धम्मपरियाय' शब्द स्थान पर मागधी प्रवृत्ति के अनुसार 'धम्म पलियाय' शब्द का प्रयोग पाया जाता है, जिसका अर्थ बुद्ध-उपदेश या वचन होता है। कश्यप जी के अनुसार इसी पलियाय शरण से पालि की व्युत्पत्ति हुई।


        भाषा की दृष्टि से पालि उस मध्ययुगीन भारतीय आर्यभाषा का एक रूप है जिसका विकास लगभग ई.पू. छठी शती से माना जाता है। उससे पूर्व की आदियुगीन भारतीय आर्यभाषा का स्वरूप वेदों तथा ब्राह्मणों, उपनिषदों एवं रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों में प्राप्त होता है, जिन्हें 'वैदिक भाषा' एवं 'संस्कृत भाषा' कहते हैं। वैदिक भाषा एवं संस्कृत की अपेक्षा मध्यकालीन भाषाओं का भेद प्रमुखता से निम्न बातों में पाया जाता है :
        _____
        ध्वनियों में ऋ, लृ, ऐ, औ - इन स्वरों का अभाव,
        ए और ओ की ह्रस्व ध्वनियों का विकास,
        श्, ष्, स् इन तीनों ऊष्मों के स्थान पर किसी एकमात्र का प्रयोग (सामान्यतः स का प्रयोग)
        विसर्ग ( ः ) का सर्वथा अभाव तथा असवर्णसंयुक्त व्यंजनों को असंयुक्त बनाने अथवा सवर्ण संयोग में परिवर्तित करने की प्रवृत्ति।
        व्याकरण की दृष्टि से
        _______
        संज्ञा एवं क्रिया के रूपों में द्विवचन का अभाव,
        पुल्लिंग और नपुंसक लिंग में अभेद और व्यत्यय,
        कारकों एवं क्रियारूपों में संकोच,
        हलन्त रूपों का अभाव,
        कियाओं में परस्मैपद, आत्मनेपद तथा भवादि, अदादि गणों के भेद का लोप।
        ये विशेषताएँ मध्ययुगीन भारतीय आर्यभाषा के सामान्य लक्षण हैं और देश की उन लोकभाषाओं में पाए जाते हैं !

        जिनका सुप्रचार उक्त अवधि से कोई दो हजार वर्ष तक रहा और जिनका बहुत-सा साहित्य भी उपलब्ध है।

        काल के आधार पर प्राकृत भाषाओं के भेद
        उक्त सामान्य लक्षणों के अतिरिक्त इन भाषाओं में अपने-अपने देश और काल की अपेक्षा अनेक भेद पाए जाते हैं। काल की दृष्टि से उनके तीन स्तर माने गए हैं -
        ___________
        पाली भाषा का इतिहास-
        प्राक्मध्यकालीन (ई.पू. 600 से ई. सन् 100 तक),
        अन्तर मध्यकालीन (ई. सन् 100 से 600 तक), तथा
        उत्तर मध्यकालीन (ई.सन् 600 से 1000 तक)।
        _________
        इन सब युगों की भाषाओं को एक सामान्य नाम प्राकृत दिया गया है। इसके प्रथम स्तर को भाषाओं का स्वरूप अशोक की प्रशस्तियों तथा पालि साहित्य में प्राप्त होता है।
         द्वितीय स्तर की भाषाओं में मागधी, अर्धमागधी, शौरसेनी एवं महाराष्ट्री प्राकृत भाषाएँ है जिनका विपुल साहित्य उपलब्ध है। तृतीय स्तर की भाषाओं को अपभ्रंश एव अवहट्ठ नाम दिए गए हैं।

        देशभेद की दृष्टि से प्राकृत भाषाओं के भेद
        देशभेद की दृष्टि से मध्यकालीन भाषाओं के भेद का सर्वप्राचीन परिचय मौर्य सम्राट् अशोक (ई.पू. तृतीय शती) की धर्मलिपियों( ब्राह्मी) में प्राप्त होता है। इनमें तीन प्रदेशभेद स्पष्ट हैं - पूर्वी, पश्चिमी और पश्चिमोत्तरी। 
        पूर्वी भाषा का स्वरूप धौली और जौगढ़ की प्रशस्तियों में दिखाई देता है। इनमें (र) वर्ण के स्थान पर (ल ) तथा आकारांत शब्दों के कर्ताकारक एकवचन की विभक्ति (ए )सुप्रतिष्ठित है। प्राकृत के वैयाकरणों ने इन प्रवृत्तियों को मागधी प्राकृत के विशेष लक्षणों में गिनाया है। वैयाकरणों के मतानुसार इस मागधी प्राकृत का तीसरा विशेष लक्षण तीनों ऊष्म वर्णों के स्थान पर (श्) का प्रयोग है। किन्तु अशोक के उक्त लेखों में यह प्रवृत्ति नहीं पाई जाती, क्योंकि यहाँ तीनों ऊष्मों के स्थान पर (स् )ही प्रयुक्त हुआ है। इसी कारण अशोक की इस पूर्वी प्राकृत को मागधी न कहकर अर्धमागधी का प्राचीन रूप कहना अधिक उपयुक्त है।

        पश्चिमी भाषा भेद का प्रतिनिधित्व करनेवालों में गिरनार की प्रशस्तियाँ हैं। इनमें (र) और (ल) का भेद सुरक्षित है। ऊष्मों के स्थान पर (स् )का प्रयोग है तथा अकारान्त कर्ता कारक एकवचन रूप ओ में अन्त होता है। इन प्रवृत्तियों से स्पष्ट है कि यह भाषा शौरसेनी का प्राचीन रूप है।
        पालि शब्द भी पल्लि शब्द से विकसित हुआ - पल्ली का अर्थ गाँव होता है ।
        यानि पाली ग्रामीणों की स्वाभाविक भाषा-
         
        पश्चिमोत्तर की भाषा का रूप शहबाजगढ़ी और मानसेरा की प्रशस्तियों में दिखाई देता है। इनमें प्राय: (श्, ष्, स्) ये तीनों ऊष्म वर्ण अपने स्थान पर सुरक्षित हैं। कहीं-कहीं कुछ व्यत्यय दृष्टिगोचर होता है। रकारयुक्त संयुक्तवर्ण भी दिखाई देते हैं, तथा ज्ञ और न्य के स्थान पर रंञ, का प्रयोग (जैसे रंञो ) पाया जाता है। ये प्रवृत्तियाँ उस भाषा को पैशाची प्राकृत का पूर्व रूप इंगित करती हैं।

        पालि त्रिपिटक का कुछ भाग अवश्य ही अशोक के काल में साहित्यिक रूप धारण कर चुका था क्योंकि उसके लाहुलोवाद, मोनेय्यसुत्त आदि सात प्रकरणों का उल्लेख उनकी भाब्रू की प्रशस्ति में हुआ है। किंतु उपलब्ध साहित्य की भाषा में अशोक के पूर्वी शिलालेख की भाषा संबंधी विशेषताओं का प्राय: सर्वथा अभाव है। व्यापक रूप से पालि भाषा का स्वरूप गिरनार प्रशस्ति की भाषा से सर्वाधिक मेल खाता है और इसी कारण पालि मूलतः पूर्वदेशीय नहीं, किन्तु मध्यदेशीय है। जिस विशेषता के कारण पालि मध्ययुगीन भारतीय आर्यभाषा के प्रथम स्तर की गिनी जाती है (द्वितीय स्तर की नही), वह है उसमें मध्यवर्ती अघोष व्यंजनों के लोप तथा महाप्राण वर्णों के स्थान पर ह् के आदेश का अभाव। ये प्रवृत्तियाँ द्वितीय स्तर की भाषाओं के सामान्य लक्षण हैं। हाँ, कहीं कहीं क् त् जैसे अघोष वर्णों के स्थान पर ग् द् आदि सघोष वर्णों का आदेश दिखाई देता है। किंतु यह एक तो अल्पमात्रा में ही है और दूसरे वह प्रथम स्तर की उक्त मर्यादा के भीतर अपेक्षाकृत पश्चात्काल की प्रवृत्ति का द्योतक है।
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        पालि भाषा एवं मध्यकालीन भारतीय- आर्यभाषाओं के संबंध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह पालि भाषा एवं मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं के संबंध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह भाषाविकास जो संस्कृत से माना जाता है वह ठीक नहीं। यथार्थत: वैदिककाल से ही साहित्यिक भाषा के साथ साथ उससे मिलती जुलती लोकभाषा ने देश एवं कालभेदानुसार साहित्यिक प्राकृत भाषाओं का रूप धारण किया है।

        पालि भी अपनी पूरी विरासत संस्कृत से नहीं ले रही, क्योंकि उसमें अनके शब्दरूप ऐसे पाए जाते हैं जिसका मेल संस्कृत से नहीं, किंतु वेदों की भाषा से बैठता है। उदाहरणार्थ- पालि एवं अन्य प्राकृतों में तृतीया बहुवचन के देवेर्भि, देवेहि, जैसे रूप मिलते हैं। अकारांत संज्ञाओं के ऐसे रूपों का संस्कृत में सर्वथा अभाव है, किंतु वैदिक में देवेर्भि, उतना ही सुप्रचिलित है जितना देवै:।
        अतएव उक्त रूप की परंपरा पालि तथा प्राकृतों में वैदिक भाषा से ही उद्भूत मानी जा सकती है। उसी प्रकार पालि में 'यमामसे', 'मासरे', 'कातवे' आदि अनेक रूप ऐसे हैं जिनके प्रत्यय संस्कृत में पाए ही नहीं जाते, किंतु वैदिक भाषा में विद्यमान हैं। पालि के ग्रंथों तथा अशोक की प्रशस्तियों से पूर्व का प्राकृत (लोकभाषाओं) में लिखित साहित्य उपलब्ध नहीं है तथा प्राकृत वैयाकरणों ने अपनी सुविधा के लिए संस्कृत को प्रकृति मानकर प्राकृत भाषा का व्याकरणात्मक विश्लेषण किया है और इसीलिए यह भ्रांति उत्पन्न हो गई है कि प्राकृत भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत से हुई।
         पालि के कच्चान, मोग्गल्लान आदि व्याकरणों में यह दोष नहीं पाया जाता, क्योंकि वहाँ भाषा का वर्णन संस्कृत को प्रकृति मानकर नहीं किया गया।
        वैदिक भाषा का वह रूप जिसको संस्कार अथवा सुधार कर नगरीय व्यवस्था के वाग्व्यवहार सञ्चालन हेतु निश्चित किया गया था वही भाषा संस्कृत थी।
        जबकि पालि सीधे वैदिक रूपों को स्वाभाविक रूप में ग्रहण करती है जो जन साधारण के अनुरूप थे।
        पालि एक नदी के समान प्रवाहित हुई तो संस्कृत नहर के समान - 
        यही क्रिया दोनों के भिन्न भिन्न होने का कारण बनी-
        जबकि पालि और संस्कृत दौंनो का एक ही श्रोत है वैदिक भाषा!

        पालि भाषा का उद्भव-
        पालि भाषा दीर्घकाल तक राज्य भाषा के रूप में भी गौरवान्वित रही है। भगवान बुद्ध ने पालि भाषा में ही उपदेश दिये थे। अशोक के समय में इसकी बहुत उन्नति हुई। उस समय इसका प्रचार भी विभिन्न बाह्य देशों में हुआ। अशोक के समय सभी लेख पालि भाषा में ही लिखे गए थे। यह कई देशो जैसे श्री लंका, बर्मा आदि देशों की धर्म भाषा के रूप में सम्मानित हुई।

        ‘पाली’ भाषा का उद्भव गौतम बुद्ध से लगभग तीन सौ वर्ष पहले ही हो चुका था, किन्तु उसके प्रारम्भिक साहित्य का पता नहीं लगता। प्रत्येक भाषा का अपना साहित्य प्रारम्भिक अवस्था में कथा, गीत, पहेली आदि के रूप में रहता है और उसकी रूपरेखा तब तक लोगों को जबानी याद रहती है जब तक कि वह लेखबद्ध हो या ग्रंथारूढ न हो जाय। इस काल में पालि भाषा की जैसे उत्पत्ति हुई वैसे ही विकास भी हुआ। प्रारंभ से लेकर लगभग तीन सौ वर्षों तक पालि भाषा जन साधारण के बोलचाल की भाषा रही, किन्तु जिस समय भगवान बुद्ध ने इसे अपने उपदेश के लिए चुना और इसी भाषा में उपदेश देना शुरू किया, तब यह थोड़े ही दिनों में शिक्षित समुदाय की भाषा होने के साथ राजभाषा भी बन गई। ‘पालि’ शब्द का सबसे पहला व्यापक प्रयोग हमें आचार्य बुद्धघोष की अट्टकथाओं और उनके विसुद्धिमग्ग में मिलता है। वहाँ यह बात अपने उत्तर कालीन भाषा संबंधी अर्थ से मुक्त है। आचार्य बुद्धघोष ने दो अर्थों में इसका प्रयोग किया है- (१) बुद्ध-बचन या मूल टिपिटक के अर्थ में (२) पाठ या मूल टिपिटक के पाठ अर्थ में।

        ‘पालि भाषा’ से तात्पर्य उस भाषा से लेते हैं जिसमें स्थविरवाद बौद्धधर्म का त्रिपिटक और उसका संपूर्ण उपजीवी साहित्य रखा हुआ है। किन्तु ‘पालि’ शब्द का इस अर्थ में प्रयोग स्वयं पालि साहित्य में भी उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व कभी नहीं किया गया। पालि भाषा मूलतः मागधी भाषा ही थी। इसके उदाहरण कच्चायन-व्याकरण में देखने को मिलते हैं। 
        मागधी ही मूल भाषा है, जिसमें प्रथम कल्प के मनुष्य बोलते थे, जो ही अश्रुत वचन वाले शिशुओं की मूल भाषा है और जिसमें ही बुद्ध ने अपने धर्म का, मूल रूप से भाषण किया। इसी प्रकार महावंश के परिवर्द्धित अंश चूल वंश के परिच्छेद 37की 244 वीं गाथा में कहा गया है “सब्बेसं मूलभासाय मागवाय निरुत्तीया” आदि।

         निश्चय ही सिंहली परंपरा अपनी इस मान्यता में बड़ी दृढ़ है कि जिसे हम आज पालि कहते हैं, वह बुद्धकालीन भारत में बोली जाने वाली मागध भाषा ही थी। बुद्ध बचनों की भाषा को ही सिंहली परंपरा ‘मागधी’ कहना नहीं चाहती, वह अट्टककथाओं तक की भाषा को बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में मागधी कहना ही अधिक पसन्द करती है। यह बाते हम पूर्व में कह चुके हैं। पालि भाषा की लिपि का विकास वेदों में वर्णित पणियों की लिपि फोनेशियन( प्यूनिक) लिपि से हुआ है।

         


        फेनिशिया (1200-500 ईसा पूर्व) पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व में आधुनिक लेबनान और सीरिया के तट पर रहने वाले सेमिटिक-भाषी कनानियों की सभ्यता थी। टायर और सिडोन जैसे प्रमुख शहरों से , फोनीशियन व्यापारियों और नाविकों ने भूमध्य सागर की खोज की , व्यापक वाणिज्य में लगे, और पश्चिमी भूमध्य सागर में कार्थेज और अन्य उपनिवेशों की स्थापना की।
        इतिहास :-जब इसराइली एक संयुक्त राज्य का गठन कर रहे थे,तब  फोनीशियन (जो खुद को "कैनानी"/कनानी कहते थे) 1200 ईसा पूर्व में सीरिया-फिलिस्तीन के क्षेत्र में बस गए थे। 1100 ईसा पूर्व तक कनानी क्षेत्र सिकुड़ कर पहाड़ों और समुद्र के बीच वर्तमान लेबनान की एक संकीर्ण पट्टी में सिमट गया था, क्योंकि इस्राएलियों और पलिश्तियों ने उनकी भूमि पर विजय प्राप्त कर ली थी। फोनीशियनों ने तट पर छोटे शहर-राज्य ,बाइब्लोस , बेरिटस , सिडोन और टायर बसाए। 1000 ईसा पूर्व से पहले, बाइब्लोस सबसे महत्वपूर्ण फोनीशियन शहर-राज्य था, जो माउंट लेबनान की ढलानों से देवदार की लकड़ी और पपीरस का वितरण केंद्र था। मिस्र से . राजा हीराम , जो 969 ईसा पूर्व में सत्ता में आए थे, टायर की प्रमुखता में वृद्धि के लिए जिम्मेदार थे, उन्होंने राजा सोलोमन के साथ घनिष्ठ गठबंधन बनाया और यरूशलेम में पहले मंदिर के निर्माण के लिए कुशल फोनीशियन कारीगरों और देवदार की लकड़ी प्रदान की । 800 ईसा पूर्व में टायर ने पास के सिडोन पर कब्ज़ा कर लिया और भूमध्यसागरीय तटीय व्यापार पर हावी हो गया। टायर व्यावहारिक रूप से अभेद्य था, जिसमें एक नहर से जुड़े दो बंदरगाह, एक बड़ा बाज़ार, राजकोष

        और अभिलेखागार के साथ एक शानदार महल, और देवताओं मेलकार्ट और एस्टार्ट के मंदिर थे । 30,000 निवासियों में से कुछ मुख्य भूमि पर उपनगरों में रहते थे।

        900 ईसा पूर्व के बाद टायर ने अपना ध्यान पश्चिम की ओर लगाया और सीरियाई तट से 100 मील दूर तांबे से समृद्ध द्वीप साइप्रस पर उपनिवेश स्थापित किए । 700 ईसा पूर्व तक पश्चिमी भूमध्य सागर में बस्तियों की एक श्रृंखला ने एक " फोनीशियन त्रिभुज " का निर्माण किया, जो पश्चिमी लीबिया से मोरक्को तक उत्तरी अफ्रीकी तट , स्पेन के दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी तट से बना था, जिसमें जिब्राल्टर जलडमरूमध्य पर गेड्स (आधुनिक कैडिज़) शामिल थे , जो नियंत्रित करते थे । भूमध्य सागर और अटलांटिक महासागर के बीच का मार्ग ; और सार्डिनिया , सिसिली और माल्टा के तट से दूर द्वीप इटली . टायर ने असीरियन( असुर) राजाओं को श्रद्धांजलि देकर 701 ईसा पूर्व तक अपनी स्वायत्तता बनाए रखी। उस वर्ष अंततः यह असीरियन सेना के हाथों गिर गया जिसने इसके अधिकांश क्षेत्र और आबादी को छीन लिया, जिससे सिडोन फोनीशिया में अग्रणी शहर बन गया।

        को श्रद्धांजलि देकर 701 ईसा पूर्व तक अपनी स्वायत्तता बनाए रखी। उस वर्ष अंततः यह असीरियन सेना के हाथों गिर गया जिसने इसके अधिकांश क्षेत्र और आबादी को छीन लिया, जिससे सिडोन फोनीशिया में अग्रणी शहर बन गया।
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        तूनिशिया से मिली फ़ोनीशियाई में लिखी
        (बाल हम्मोन) और तनित नामक देवताओं की प्रार्थना का प्रमाणित दस्तावेज है।

        बाल ऋग्वेद में वर्णित बल है जो इन्द्र और बृहस्पति का प्रतिद्वन्

        तूनिसीया उत्तरी अफ़्रीक़ा महाद्वीप में एक अरब राष्ट्र है जिसका अरबी भाषा में नाम अल्जम्हूरीयाह अत्तूनिसीयाह (الجمهرية التونسية) या तूनिस है। यह भूमध्यसागर के किनारे स्थित है, इसके पूर्व में लीबिया और पश्चिम मे अल्जीरिया देश हैं। देश की पैंतालीस प्रतिशत ज़मीन सहारा रेगिस्तान में है जबकि बाक़ी तटीय जमीन खेती के लिए इस्तमाल होती है। रोमन इतिहास मे तूनिस का शहर कारथिज एक आवश्यक जगह रखता है और इस प्रान्त को बाद में रोमीय राज्य का एक प्रदेश बना दीया गया जिस का नाम अफ़्रीका यानी गरम प्रान्त रखा गया जो अब पूरे महाद्वीप का नाम है।

        तूनीशियाई वर्णमाला फ़ोनीशिया की सभ्यता द्वारा अविष्कृत वर्णमाला थी !

        जिसमें हर वर्ण एक व्यंजन की ध्वनि बनता था। क्योंकि फ़ोनीशियाई लोग समुद्री सौदागर थे।

         इसलिए उन्होंने इस अक्षरमाला को दूर-दूर तक फैला दिया और उनकी देखा-देखी और सभ्यताएँ भी अपनी भाषाओँ के लिए इसमें फेर-बदल करके इसका प्रयोग करने लगीं। और फिर अनेक समानान्तर लिपियों का विकास हुआ।

        माना जाता है के आधुनिक युग की सभी मुख्य अक्षरमालाएँ( लिपियाँ) इसी फ़ोनीशियाई वर्णमाला की संताने हैं। 

         "ब्राह्मी , देवनागरी सहित, भारत की सभी वर्णमालाएँ भी फ़ोनीशियाई वर्णमाला की वंशज हैं।


        इसका विकास लगभग (1050) ईसा-पूर्व में आरम्भ हुआ था । 

        और प्राचीन यूनानी सभ्यता के उदय के साथ-साथ अंत हो गया। परन्तु यूनानी लिपि भी फोनेशियन लिपि से विकसित हुई।

         वर्णमाला की दृष्टि से-फ़ोनीशियाई वर्णमाला के हर अक्षर का नाम फ़ोनीशियाई भाषा में किसी वस्तु के नाम पर रखा गया है। 

        __________

        अंग्रेज़ी में वर्णमाला को "ऐल्फ़ाबॅट" बोलते हैं जो नाम फ़ोनीशियाई वर्णमाला के पहले दो अक्षरों ("अल्फ़" यानि "बैल" और "बॅत" यानि "घर") से आया है।

        पहले हम अलिफ की कुण्डली निकालते हैं

        Aleph-First letter of many Semitic abjads

        "Alef" redirects here. For other uses, see Aleph (disambiguation) and Alef (disambiguation).

        Aleph (or alef or alif, transliterated ʾ) is the first letter of the Semitic abjads, including Phoenician ʾālep 𐤀, Hebrew ʾālef א, Aramaic ʾālap 𐡀, Syriac ʾālap̄ ܐ, Arabic ʾalif ا, and North Arabian 𐪑. It also appears as South Arabian 𐩱 and Ge'ez ʾälef አ.

        Quick Facts Bet →, Phoenician ...

        These letters are believed to have derived from an Egyptian hieroglyph depicting an ox's head to describe the initial sound of *ʾalp, the West Semitic word for ox (compare Biblical Hebrew אֶלֶף‎ ʾelef, "ox"). 


        संस्कृत में अलीक: का अर्थ मस्तक है।

        _______

        The Phoenician variant gave rise to the Greek alpha (Α), being re-interpreted to express not the glottal consonant but the accompanying vowel, and hence the Latin A and Cyrillic А.

        Phonetically, aleph originally represented the onset of a vowel at the glottis. 

        In Semitic languages, this functions as a prosthetic weak consonant, allowing roots with only two true consonants to be conjugated in the manner of a standard three consonant Semitic root. In most Hebrew dialects as well as Syriac, the aleph is an absence of a true consonant, a glottal stop ([ʔ]), the sound found in the catch in uh-oh. In Arabic, the alif represents the glottal stop pronunciation when it is the initial letter of a word. In texts with diacritical marks, the pronunciation of an aleph as a consonant is rarely indicated by a special marking, hamza in Arabic and mappiq in Tiberian Hebrew. In later Semitic languages, aleph could sometimes function as a mater lectionis indicating the presence of a vowel elsewhere (usually long). When this practice began is the subject of some controversy, though it had become well established by the late stage of Old Aramaic (ca. 200 BCE). Aleph is often transliterated as U+02BE ʾ , based on the Greek spiritus lenis ʼ; for example, in the transliteration of the letter name itself, ʾāleph.

        Origin-The name aleph is derived from the West Semitic word for "ox" (as in the Biblical Hebrew word Eleph (אֶלֶף) 'ox'), and the shape of the letter derives from a Proto-Sinaitic glyph that may have been based on an Egyptian hieroglyph, which depicts an ox's head.

        More information Hieroglyph, Proto-Sinaitic ...

        In Modern Standard Arabic, the word أليف /ʔaliːf/ literally means 'tamed' or 'familiar', derived from the root ʔ-L-F, from which the verb ألِف /ʔalifa/ means 'to be acquainted with; to be on intimate terms with'. In modern Hebrew, the same root ʔ-L-P (alef-lamed-peh) gives me’ulaf, the passive participle of the verb le’alef, meaning 'trained' (when referring to pets) or 'tamed' (when referring to wild animals).

        Ancient Egyptian

        Further information: Transliteration of Ancient Egyptian § alef

        More information "Aleph" in hieroglyphs ...

        The Egyptian "vulture" hieroglyph (Gardiner G1), by convention pronounced [a]) is also referred to as aleph, on grounds that it has traditionally been taken to represent a glottal stop ([ʔ]), although some recent suggestions tend towards an alveolar approximant ([ɹ]) sound instead. Despite the name it does not correspond to an aleph in cognate Semitic words, where the single "reed" hieroglyph is found instead.

        The phoneme is commonly transliterated by a symbol composed of two half-rings, in Unicode (as of version 5.1, in the Latin Extended-D range) encoded at U+A722 Ꜣ LATIN CAPITAL LETTER EGYPTOLOGICAL ALEF and U+A723 ꜣ LATIN SMALL LETTER EGYPTOLOGICAL ALEF. A fallback representation is the numeral 3, or the Middle English character ȝ Yogh; neither are to be preferred to the genuine Egyptological characters.

        Aramaic-

        The Aramaic reflex of the letter is conventionally represented with the Hebrew א in typography for convenience, but the actual graphic form varied significantly over the long history and wide geographic extent of the language. Maraqten identifies three different aleph traditions in East Arabian coins: a lapidary Aramaic form that realizes it as a combination of a V-shape and a straight stroke attached to the apex, much like a Latin K; a cursive Aramaic form he calls the "elaborated X-form", essentially the same tradition as the Hebrew reflex; and an extremely cursive form of two crossed oblique lines, much like a simple Latin X.

        More information Cursive Aramaic, Lapidary Aramaic ...

        Hebrew

        "א" redirects here. For the Biblical manuscript, see Codex Sinaiticus.

        Hebrew spelling: אָלֶף ‎

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        In Modern Israeli Hebrew, the letter either represents a glottal stop ([ʔ]) or indicates a hiatus (the separation of two adjacent vowels into distinct syllables, with no intervening consonant). It is sometimes silent (word-finally always, word-medially sometimes: הוּא‎ [hu] "he", רָאשִׁי‎ [ʁaˈʃi] "main", רֹאשׁ‎ [ʁoʃ] "head", רִאשׁוֹן‎ [ʁiˈʃon] "first"). The pronunciation varies in different Jewish ethnic divisions.

        _____

        In gematria, aleph represents the number 1, and when used at the beginning of Hebrew years, it means 1000 (e.g. א'תשנ"ד‎ in numbers would be the Hebrew date 1754, not to be confused with 1754 CE).

        Aleph, along with ayin, resh, he and heth, cannot receive a dagesh. (However, there are few very rare examples of the Masoretes adding a dagesh or mappiq to an aleph or resh. The verses of the Hebrew Bible for which an aleph with a mappiq or dagesh appears are Genesis 43:26, Leviticus 23:17, Job 33:21 and Ezra 8:18.)

        In Modern Hebrew, the frequency of the usage of alef, out of all the letters, is 4.94%.

        Aleph is sometimes used as a mater lectionis to denote a vowel, usually /a/. That use is more common in words of Aramaic and Arabic origin, in foreign names, and some other borrowed words.

        More information Orthographic variants, Various Print Fonts ...

        Rabbinic Judaism–

        Aleph is the subject of a midrash that praises its humility in not demanding to start the Bible. (In Hebrew, the Bible begins with the second letter of the alphabet, bet.) In the story, aleph is rewarded by being allowed to start the Ten Commandments. (In Hebrew, the first word is אָנֹכִי‎, which starts with an aleph.)

        In the Sefer Yetzirah, the letter aleph is king over breath, formed air in the universe, temperate in the year, and the chest in the soul.

        Aleph is also the first letter of the Hebrew word emet (אֶמֶת‎), which means truth. In Judaism, it was the letter aleph that was carved into the head of the golem that ultimately gave it life.

        Aleph also begins the three words that make up God's name in Exodus, I Am who I Am (in Hebrew, Ehyeh Asher Ehyeh אהיה אשר אהיה), and aleph is an important part of mystical amulets and formulas.

        Aleph represents the oneness of God. The letter can be seen as being composed of an upper yud, a lower yud, and a vav leaning on a diagonal. The upper yud represents the hidden and ineffable aspects of God while the lower yud represents God's revelation and presence in the world. The vav ("hook") connects the two realms.

        Judaism relates aleph to the element of air, and the Scintillating Intelligence (#11) of the path between Kether and Chokmah in the Tree of the Sephiroth [citation needed].

        Yiddish–

        In Yiddish, aleph is used for several orthographic purposes in native words, usually with different diacritical marks borrowed from Hebrew niqqud:

        With no diacritics, aleph is silent; it is written at the beginning of words before vowels spelled with the letter vov or yud. For instance, oykh 'also' is spelled אויך. The digraph וי represents the initial diphthong [oj], but that digraph is not permitted at the beginning of a word in Yiddish orthography, so it is preceded by a silent aleph. Some publications use a silent aleph adjacent to such vowels in the middle of a word as well when necessary to avoid ambiguity.

        An aleph with the diacritic pasekh, אַ, represents the vowel [a] in standard Yiddish.

        An aleph with the diacritic komets, אָ, represents the vowel [ɔ] in standard Yiddish.

        Loanwords from Hebrew or Aramaic in Yiddish are spelled as they are in their language of origin.

        Syriac–

        More information Alaph ...

        In the Syriac alphabet, the first letter is ܐ, Classical Syriac: ܐܵܠܲܦ, alap (in eastern dialects) or olaph (in western dialects). It is used in word-initial position to mark a word beginning with a vowel, but some words beginning with i or u do not need its help, and sometimes, an initial alap/olaph is elided. For example, when the Syriac first-person singular pronoun ܐܸܢܵܐ is in enclitic positions, it is pronounced no/na (again west/east), rather than the full form eno/ana. The letter occurs very regularly at the end of words, where it represents the long final vowels o/a or e. In the middle of the word, the letter represents either a glottal stop between vowels (but West Syriac pronunciation often makes it a palatal approximant), a long i/e (less commonly o/a) or is silent.

        South Arabian/Ge'ez

        In the Ancient South Arabian alphabet, 𐩱 appears as the seventeenth letter of the South Arabian abjad. The letter is used to render a glottal stop /ʔ/.

        In the Ge'ez alphabet, ʾälef አ appears as the thirteenth letter of its abjad. This letter is also used to render a glottal stop /ʔ/.

        More information South Arabian, Ge'ez ...

        Arabic–

        Written as ا or 𐪑, spelled as ألف or 𐪑𐪁𐪐 and transliterated as alif, it is the first letter in Arabic and North Arabian. Together with Hebrew aleph, Greek alpha and Latin A, it is descended from Phoenician ʾāleph, from a reconstructed Proto-Canaanite ʾalp "ox".

        Alif is written in one of the following ways depending on its position in the word:

        More information Position in word, Isolated ...

        More information North Arabian ...

        Arabic variants

        Alif mahmūza: أ and إ

        Main article: Hamza

        The Arabic letter was used to render either a long /aː/ or a glottal stop /ʔ/. That led to orthographical confusion and to the introduction of the additional marking hamzat qaṭ‘ ﺀ to fix the problem. Hamza is not considered a full letter in Arabic orthography: in most cases, it appears on a carrier, either a wāw (ؤ), a dotless yā’ (ئ), or an alif.

        More information Position in word, Isolated ...

        The choice of carrier depends on complicated orthographic rules. Alif إ أ is generally the carrier if the only adjacent vowel is fatḥah. It is the only possible carrier if hamza is the first phoneme of a word. Where alif acts as a carrier for hamza, hamza is added above the alif, or, for initial alif-kasrah, below it and indicates that the letter so modified is indeed a glottal stop, not a long vowel.

        A second type of hamza, hamzat waṣl (همزة وصل) whose diacritic is normally omitted outside of sacred texts, occurs only as the initial letter of the definite article and in some related cases. It differs from hamzat qaṭ‘ in that it is elided after a preceding vowel. Alif is always the carrier.

        More information Position in word, Isolated ...

        Alif mamdūda: آ

        The alif maddah is a double alif, expressing both a glottal stop and a long vowel. Essentially, it is the same as a أا sequence: آ (final ـآ) ’ā /ʔaː/, for example in آخر ākhir /ʔaːxir/ 'last'.

        More information Position in word, Isolated ...

        "It has become standard for a hamza followed by a long ā to be written as two alifs, one vertical and one horizontal." (the "horizontal" alif being the maddah sign).

        Alif maqṣūrah: ى

        The ى ('limited/restricted alif', alif maqṣūrah), commonly known in Egypt as alif layyinah (ألف لينة, 'flexible alif'), may appear only at the end of a word. Although it looks different from a regular alif, it represents the same sound /aː/, often realized as a short vowel. When it is written, alif maqṣūrah is indistinguishable from final Persian ye or Arabic yā’ as it is written in Egypt, Sudan and sometimes elsewhere.

        The letter is transliterated as y in Kazakh, representing the vowel /ə/. Alif maqsurah is transliterated as á in ALA-LC, ā in DIN 31635, à in ISO 233-2, and ỳ in ISO 233.

        In Arabic, alif maqsurah ى is not used initially or medially, and it is not joinable initially or medially in any font. However, the letter is used initially and medially in the Uyghur Arabic alphabet and the Arabic-based Kyrgyz alphabet, representing the vowel /ɯ/: (ىـ ـىـ‎).

        More information Position in word, Isolated ...

        Numeral As a numeral, alif stands for the number one. It may be modified as follows to represent other numbers.[citation needed]

        More information Modification to alif, Number represented ...

        Other uses

        Mathematics

        In set theory, the Hebrew aleph glyph is used as the symbol to denote the aleph numbers, which represent the cardinality of infinite sets. This notation was introduced by mathematician Georg Cantor. In older mathematics books, the letter aleph is often printed upside down by accident, partly because a Monotype matrix for aleph was mistakenly constructed the wrong way up.

        Aleph

        कई सेमेटिक( अबजदों  वर्णमालाओं)का पहला अक्षर-

        एलेफ़ (या एलेफ़ या अलिफ़, लिप्यंतरित ʾ) सेमेटिक अबजादों का पहला अक्षर है, जिसमें 

        1-फ़ोनीशियन ʾalep 𐤀, 

        2-हिब्रू ʾalef א, 

        3-अरामी ʾalap 𐡀, 

        4-सिरिएक ʾalap̄ ̄, 

        5-अरबी ʾalif ا, और 

        6-उत्तरी अरब 𐪑 शामिल हैं। 

        यह साउथ अरेबियन 𐩱 और गीज़ ʾälef አ के रूप में भी दिखाई देता है।

        त्वरित तथ्य शर्त →, फोनीशियन ...

        ऐसा माना जाता है कि ये अक्षर मिस्र के एक चित्रलिपि से लिए गए हैं, जिसमें एक बैल के सिर को दर्शाया गया है, जो बैल के लिए पश्चिमी सेमिटिक शब्द *ʾalp की प्रारंभिक ध्वनि का वर्णन करता है (बाइबिल के हिब्रू אֶלֶף‎ ʾelef, "बैल" की तुलना करें)।


        _______

        फोनीशियन संस्करण ने ग्रीक अल्फा (Α) को जन्म दिया, जिसे ग्लोटल व्यंजन नहीं बल्कि साथ वाले स्वर को व्यक्त करने के लिए दोबारा व्याख्या की गई, और इसलिए लैटिन ए और सिरिलिक ए।

        ध्वन्यात्मक रूप से, एलेफ़ मूल रूप से ग्लोटिस पर एक स्वर की शुरुआत का प्रतिनिधित्व करता था।

        सेमिटिक भाषाओं में, यह एक कृत्रिम कमजोर व्यंजन के रूप में कार्य करता है, जिससे केवल दो सच्चे व्यंजन वाली जड़ों को मानक तीन व्यंजन सेमिटिक रूट (धातु)के तरीके से संयुग्मित किया जा सकता है। अधिकांश हिब्रू बोलियों के साथ-साथ सिरिएक में, एलेफ एक सच्चे व्यंजन, एक ग्लोटल स्टॉप ([ʔ]) की अनुपस्थिति है, जो ध्वनि उह- ओह में पकड़ में पाई जाती है।

        अरबी में, अलिफ़ ग्लोटल स्टॉप उच्चारण का प्रतिनिधित्व करता है जब यह किसी शब्द का प्रारंभिक अक्षर होता है। 

        विशेषक चिह्नों वाले ग्रंथों में, व्यंजन के रूप में एलेफ़ का उच्चारण शायद ही कभी एक विशेष चिह्न द्वारा दर्शाया जाता है, अरबी में हम्ज़ा और तिबेरियन हिब्रू में मप्पिक। बाद की सेमेटिक भाषाओं में, एलेफ़ कभी-कभी मेटर लेक्शनिस के रूप में कार्य कर सकता है जो कहीं और स्वर की उपस्थिति (आमतौर पर लंबा) का संकेत देता है।

         यह प्रथा कब शुरू हुई यह कुछ विवाद का विषय है, हालाँकि यह पुराने अरामाइक के अंतिम चरण (लगभग 200 ईसा पूर्व) तक अच्छी तरह से स्थापित हो गई थी। 

        एलेफ़ को अक्सर ग्रीक स्पिरिटस लेनिस ʼ के आधार पर U+02BE ʾ के रूप में लिप्यंतरित किया जाता है; उदाहरण के लिए, अक्षर नाम के लिप्यंतरण में ही, āleph.

        मूल

        एलेफ नाम पश्चिमी सेमिटिक शब्द "बैल" से लिया गया है (जैसा कि बाइबिल के हिब्रू शब्द एलीफ (אֶלֶף) 'बैल') में है, और अक्षर का आकार एक प्रोटो-सिनाईटिक ग्लिफ़ से लिया गया है जो शायद एक पर आधारित हो सकता है मिस्र का चित्रलिपि, जो एक बैल के सिर को दर्शाता है।

        आधुनिक मानक अरबी में, शब्द أليف /ʔaliːf/ का शाब्दिक अर्थ है 'पालित' या 'परिचित', है।

        जो मूल ʔ-L-F से लिया गया है, जिससे क्रिया ألِف /ʔalifa/ का अर्थ है 'परिचित होना; 'के साथ घनिष्ठ संबंध रखना।प्रेमी-आदि 

         आधुनिक हिब्रू में, वही मूल ʔ-L-P (एलेफ़-लैमेड-पेह) मी'उलाफ़ देता है, जो क्रिया ले 'एलेफ़ का निष्क्रिय कृदन्त है, जिसका अर्थ है 'प्रशिक्षित' (पालतू जानवरों का संदर्भ देते समय) या 'पालतू' (जब सन्दर्भित किया जाता है) जंगली जानवर)।

        पौराणिक मिश्र:-

        अधिक जानकारी: प्राचीन मिस्र का लिप्यंतरण § एलेफ़

        इब्रानी:-

        सुविधा के लिए टाइपोग्राफी में अक्षर के अरामी रिफ्लेक्स को पारंपरिक रूप से हिब्रू א के साथ दर्शाया जाता है, लेकिन वास्तविक ग्राफिक रूप भाषा के लंबे इतिहास और व्यापक भौगोलिक विस्तार के कारण काफी भिन्न होता है। 

        मराकटेन पूर्वी अरब के सिक्कों में तीन अलग-अलग एलेफ़ परंपराओं की पहचान करता है: एक लैपिडरी अरामी रूप जो इसे वी-आकार के संयोजन और शीर्ष से जुड़े एक सीधे स्ट्रोक के रूप में महसूस करता है, लैटिन के की तरह; एक घसीट अरामी रूप को वह "विस्तृत एक्स-फॉर्म" कहते हैं, मूलतः वही परंपरा हिब्रू प्रतिवर्त के रूप में; और दो पार की गई तिरछी रेखाओं का एक अत्यंत घसीट रूप, एक साधारण लैटिन एक्स की तरह।


        यहूदी

        "א" यहां पुनर्निर्देश करता है। बाइबिल पांडुलिपि के लिए, कोडेक्स साइनेटिकस देखें।

        हिब्रू वर्तनी: אָלֶף ‎

        आधुनिक इज़राइली हिब्रू में, अक्षर या तो एक ग्लोटल स्टॉप ([ʔ]) का प्रतिनिधित्व करता है या एक अंतराल को इंगित करता है (दो आसन्न स्वरों को अलग-अलग अक्षरों में अलग करना, बिना किसी हस्तक्षेप वाले व्यंजन के)।

        यह कभी-कभी मौन होता है (शब्द-अंततः हमेशा, शब्द-मध्यवर्ती रूप से कभी-कभी: הוּא‎ [hu] "he", רָאשִׁי‎ [ʁaˈʃi] "main", רֹאשׁ‎ [ʁoʃ] "head", רִאשׁוֹן‎ [ʁiˈʃon] "first " ). विभिन्न यहूदी जातीय प्रभागों में उच्चारण भिन्न-भिन्न होता है।

        जेमट्रिया में, एलेफ संख्या 1 का प्रतिनिधित्व करता है, और जब हिब्रू वर्षों की शुरुआत में उपयोग किया जाता है, तो इसका मतलब 1000 होता है (उदाहरण के लिए א'תשנ"ד‎ संख्या में हिब्रू तारीख 1754 होगी, 1754 सीई के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए)।

        अलेफ, अयिन, रेश, हे और हेथ के साथ, दागेश प्राप्त नहीं कर सकता। (हालाँकि, मासोरेट्स द्वारा अलेफ या रेश में दागेश या मप्पिक जोड़ने के कुछ बहुत ही दुर्लभ उदाहरण हैं। 

        हिब्रू बाइबिल के छंद जिनके लिए मप्पिक या दागेश के साथ अलेफ दिखाई देता है, उत्पत्ति 43:26, लेविटस 23:17 हैं, अय्यूब 33:21 और एज्रा 8:18.)

        आधुनिक हिब्रू में, सभी अक्षरों में से, एलेफ़ के उपयोग की आवृत्ति 4.94% है।

        एलेफ का उपयोग कभी-कभी स्वर को दर्शाने के लिए मेटर लेक्शनिस के रूप में किया जाता है, आमतौर पर /ए/। यह प्रयोग अरामी और अरबी मूल के शब्दों, विदेशी नामों और कुछ अन्य उधार लिए गए शब्दों में अधिक आम है।

        रब्बीनिक यहूदी धर्म:-

        एलेफ एक मिड्रैश का विषय है जो बाइबिल शुरू करने की मांग न करने की अपनी विनम्रता की प्रशंसा करता है। (हिब्रू में, बाइबल वर्णमाला के दूसरे अक्षर से शुरू होती है।कहानी में, एलेफ़ को दस आज्ञाएँ शुरू करने की अनुमति देकर पुरस्कृत किया जाता है। (हिब्रू में, पहला शब्द אָנֹכִי‎ है, जो एलेफ से शुरू होता है।)

        सेफ़र यत्ज़िराह में, अक्षर एलेफ़ सांस पर राजा है, ब्रह्मांड में वायु का निर्माण होता है, वर्ष में शीतोष्ण होता है, और आत्मा में छाती होती है।

        एलेफ़ हिब्रू शब्द एमेट (אֶמֶת‎) का पहला अक्षर भी है, जिसका अर्थ सत्य है। यहूदी धर्म में, यह अक्षर एलेफ़ था जिसे गोलेम के सिर में उकेरा गया था जिसने अंततः इसे जीवन दिया।

        एलेफ उन तीन शब्दों की भी शुरुआत करता है जो निर्गमन में भगवान का नाम बनाते हैं, मैं वही हूं जो मैं हूं (हिब्रू में, एहयेह आशेर एहयेह אהיה אשר אהיה), और एलेफ रहस्यमय ताबीज और सूत्रों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

        ___                  

        अलेफ ईश्वर की एकता का प्रतिनिधित्व करता है। पत्र को एक ऊपरी युद, एक निचले युद और एक विकर्ण पर झुके हुए वाव से बना देखा जा सकता है। 

        ऊपरी युद ईश्वर के छिपे और अवर्णनीय पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है जबकि निचला युद दुनिया में ईश्वर के रहस्योद्घाटन और उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। वाव ("हुक") दो क्षेत्रों को जोड़ता है।

        यहूदी धर्म एलेफ को हवा के तत्व से जोड़ता है, और सेफिरोथ के पेड़ में केथर और चोकमा के बीच के पथ की स्किंटिलेटिंग इंटेलिजेंस (#11) [उद्धरण वांछित]।

        यहूदी

        यिडिश में, एलेफ़ का उपयोग मूल शब्दों में कई वर्तनी संबंधी उद्देश्यों के लिए किया जाता है, आमतौर पर हिब्रू निक्कुड से उधार लिए गए विभिन्न विशेषक चिह्नों के साथ:

        बिना किसी विशेषक चिह्न के, एलेफ़ चुप है; यह शब्दों की शुरुआत में वोव या युड अक्षर से लिखे गए स्वरों से पहले लिखा जाता है। उदाहरण के लिए, oykh 'भी' को אויך लिखा जाता है। डिग्राफ וי प्रारंभिक डिप्थॉन्ग [ओजे] का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन यिडिश ऑर्थोग्राफी में किसी शब्द की शुरुआत में उस डिग्राफ की अनुमति नहीं है, इसलिए यह एक साइलेंट एलेफ से पहले होता है। कुछ प्रकाशन अस्पष्टता से बचने के लिए आवश्यक होने पर शब्द के बीच में ऐसे स्वरों से सटे एक साइलेंट एलेफ़ का भी उपयोग करते हैं।

        विशेषक पसेख,( אַ )के साथ एक एलेफ, मानक यिडिश में स्वर [ए] का प्रतिनिधित्व करता है।

        विशेषक कोमेट्स, אָ के साथ एक एलेफ़, मानक यिडिश में स्वर [ɔ] का प्रतिनिधित्व करता है।

        यिडिश में हिब्रू या अरामी भाषा के ऋणशब्दों की वर्तनी वैसे ही की जाती है जैसे वे उनकी मूल भाषा में हैं।

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        सिरिएक

        अधिक जानकारी अलफ़...

        सिरिएक वर्णमाला में, पहला अक्षर Ԑ है, शास्त्रीय सिरिएक: ԐֵԵԠֲ֦, अलाप (पूर्वी बोलियों में) या ओलाफ़ (पश्चिमी बोलियों में)। इसका उपयोग स्वर से शुरू होने वाले शब्द को चिह्नित करने के लिए शब्द-प्रारंभिक स्थिति में किया जाता है, लेकिन i या u से शुरू होने वाले कुछ शब्दों को इसकी सहायता की आवश्यकता नहीं होती है, और कभी-कभी, प्रारंभिक अलाप/ओलाफ हटा दिया जाता है। उदाहरण के लिए, जब सिरिएक प्रथम-व्यक्ति एकवचन सर्वनाम ԐԸԢԵԐ enclitic स्थिति में होता है, तो इसका उच्चारण पूर्ण रूप eno/ana के बजाय no/na (फिर से पश्चिम/पूर्व) किया जाता है। यह अक्षर शब्दों के अंत में बहुत नियमित रूप से आता है, जहां यह लंबे अंतिम स्वरों ओ/ए या ई का प्रतिनिधित्व करता है। शब्द के मध्य में, अक्षर या तो स्वरों के बीच एक ग्लोटल स्टॉप का प्रतिनिधित्व करता है (लेकिन पश्चिम सिरिएक उच्चारण अक्सर इसे एक तालव्य सन्निकटन बनाता है), एक लंबा आई/ई (कम सामान्यतः ओ/ए) या मौन होता है।

        साउथ अरेबियन/गीज़

        प्राचीन दक्षिण अरब वर्णमाला में, 𐩱 दक्षिण अरब अबजद के सत्रहवें अक्षर के रूप में प्रकट होता है। अक्षर का उपयोग ग्लोटल स्टॉप /ʔ/ प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है।

        गीज़ वर्णमाला में, ʾälef አ इसके अबजद के तेरहवें अक्षर के रूप में प्रकट होता है। इस अक्षर का उपयोग ग्लोटल स्टॉप /ʔ/ प्रस्तुत करने के लिए भी किया जाता है।

        अधिक जानकारी साउथ अरेबियन, गीज़...

        अरबी

        ا या 𐪑 के रूप में लिखा जाता है, ألف या 𐪑𐪁𐪐 के रूप में लिखा जाता है और अलिफ़ के रूप में लिप्यंतरित किया जाता है, यह अरबी और उत्तरी अरब में पहला अक्षर है। हिब्रू एलेफ़, ग्रीक अल्फ़ा और लैटिन ए के साथ, यह फ़ोनीशियन सेलेफ़ का वंशज है, एक पुनर्निर्मित प्रोटो-कैनानाइट एल्प "बैल" से।

        अलिफ़ को शब्द में उसकी स्थिति के आधार पर निम्नलिखित में से किसी एक तरीके से लिखा जाता है:

        यद्यपि यूरोपीय भाषाओं में "Axe" ( तलवार या कुलाड़ी) के लिए वैदिक तथा संस्कृत में असि: शब्द है।

        असिः, पुंल्लिंग-(असतीति । अस दीप्तौ इनि ।) अस्त्र- भेदः । खा~डा तरवाल इत्यादि भाषा । तत्प- र्य्यायः । खड्गः २ निस्त्रिंशः ३ चन्द्रहासः ४ रिष्टिः ५ कौक्षेयकः ६ मण्डलाग्रः ७ करपालः ८ कृपाणः ९ इत्यमरः ॥ प्रबालकः १० भद्रात्मजः ११ रिष्टः १२ ऋष्टिः १३ धाराविषः १४ कौक्षेयः १५ तरवारिः १६ तरवाजः १७ कृपाणकः १८ करवालः १९ कृपाणी २० शस्त्रः २१ । इति शब्दरत्नावली ॥ विषसनः २२ । इति त्रिकांण्ड- शेषः ॥ (“पर्णशालामथ क्षिप्रं विकृष्टासिः प्रविश्य सः । वैरूप्यपौनरुक्तेन भीषणां तामयोजयत्” ॥ इति रघवंशे १२ । ४० ॥ “स्यन्दनाश्वैः समे युध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा । वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्म्मायुधैः स्थले ॥” इति मनौ ७ । १९२ ॥) तस्य स्तुतिर्यथा । “असिर्व्विषसनः खड्गस्तीक्ष्णधारो दुरासदः । श्रीगर्भो विजयश्चैव धर्म्मपालो नमोऽस्तु ते ॥ इत्यष्टौ तव नामानि स्वयमुक्तानि वेधसा । नक्षत्रं कृत्तिका ते तु गुरुर्देवो महेश्वरः ॥ हिरण्यञ्च शरीरन्ते धाता देवो जनार्द्दनः । पिता पितामहो देवस्त्वं मां पालय सर्व्वदा ॥ नीलजीमूतसङ्काशस्तीक्ष्णदंष्ट्रः कृशोदरः । भावशुद्धोऽमर्षणश्च अतितेजास्तथैव च ॥ इयं येन धृता क्षौणी हतश्च महिषासुरः । तीक्ष्णधाराय शुद्धाय तस्मै खड्गाय ते नमः” ॥ इति वृहन्नन्दिकेश्वरपुराणीयदुर्गोत्सवपद्धतिधृत- वाराहीतन्त्रं ॥

        मा त्वा तपत्प्रिय आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्व आ तिष्ठिपत्ते ।
        मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राणि असिना मिथू कः ॥२०॥( ऋग्वेद  १/१६२/२०)

        अक्रीळन्क्रीळन्हरिरत्तवेऽदन्वि पर्वशश्चकर्त गामिव -असिः ॥६॥( ऋग्वेदः सूक्तं १०/७९/६)



        माहेश्वर सूत्र को संस्कृत व्याकरण का प्रथम आधार माना जाता है।

        • पाणिनि ने संस्कृत भाषा के तत्कालीन स्वरूप को परिष्कृत अर्थात् संस्कारित एवं नियमित करने के उद्देश्य से वैदिक भाषा के विभिन्न अवयवों एवं घटकों को ध्वनि-विभाग के रूप अर्थात् (अक्षरसमाम्नाय), नाम- (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण), पद- (विभक्ति युक्त वाक्य में प्रयुक्त शब्द , आख्यात-(क्रिया), उपसर्ग, अव्यय, वाक्य, लिंग इत्यादि तथा उनके अन्तर्सम्बन्धों का समावेश अष्टाध्यायी में किया है।

        अष्टाध्यायी में ३२ पाद हैं जो आठ अध्यायों मे समान रूप से विभाजित हैं । व्याकरण के इस महद् ग्रन्थ में पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के विशाल कलेवर (शरीर)का समग्र एवं सम्पूर्ण विवेचन लगभग 4000 सूत्रों में किया है।

        जो आठ अध्यायों में (संख्या की दृष्टि से असमान रूप से) विभाजित हैं।

        तत्कालीन समाज में लेखन सामग्री की दुष्प्राप्यता को दृष्टि गत रखते हुए पाणिनि ने व्याकरण को स्मृतिगम्य बनाने के लिए सूत्र शैली की सहायता ली है।

        • विदित होना चाहिए कि संस्कृत भाषा का प्रादुर्भाव वैदिक भाषा छान्दस् से ई०पू० चतुर्थ शताब्दी में ही हुआ यद्यपि संस्कृत की शब्दावली वैदिक भाषा की ही थी। ।
        • तभी ग्रामीण या जनसाधारण की भाषा बौद्ध काल से पूर्व ई०पू० 563 में भी थी । यह भी वैदिक भाषा (छान्दस्)से विकसित हुई। ये ही भाषाऐं गाँव( पल्लि) से सम्बन्धित होने से पालि और साधारण जन प्रकृति से सम्बन्धित होने से प्राकृत कह लायी गयीं।

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        व्याकरण को स्मृतिगम्य बनाने के लिए पाणिनी ने सूत्र शैली की सहायता ली है।

        • पुनः विवेचन को अतिशय संक्षिप्त बनाने हेतु पाणिनि ने अपने पूर्ववर्ती वैयाकरणों से प्राप्त उपकरणों के साथ-साथ स्वयं भी अनेक उपकरणों का निर्माण करके प्रयोग किया है जिनमे शिवसूत्र या माहेश्वर सूत्र सबसे महत्वपूर्ण हैं।

        माहेश्वर सूत्रों की उत्पत्ति-----माहेश्वर सूत्रों की उत्पत्ति भगवान नटराज (शंकर) के द्वारा किये गये ताण्डव नृत्य से मानी गयी है। जो कि एक श्रृद्धा प्रवण अतिरञ्जना ही है ।

        रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने इसे आख्यान परक रूप इस प्रकार दिया। 👇

        • नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्। उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान्एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥

        अर्थात:- "नृत्य (ताण्डव) के अवसान (समाप्ति) पर नटराज (शिव) ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना की उद्धार (पूर्ति) के लिये नवपञ्च (चौदह) बार डमरू बजाया।

        इस प्रकार चौदह शिवसूत्रों का ये जाल (वर्णमाला) रूप में प्रकट हुया। " डमरु के चौदह बार बजाने से चौदह सूत्रों के रूप में ध्वनियाँ निकली, इन्हीं ध्वनियों से व्याकरण का प्रकाट्य हुआ।

        • इसलिये व्याकरण सूत्रों के आदि-प्रवर्तक भगवान नटराज को माना जाता है।
        • वस्तुत भारतीय संस्कृति की इस मान्यता की पृष्ठ भूमि में शिव का ओ३म स्वरूप भी है ।
        • उमा शिव की ही शक्ति का रूप है ।

        उमा शब्द की व्युत्पत्ति -

        • (उ- भो मा तपस्यां कुरुवति -अरे तपस्या मत करो- यथा, “उमेति मात्रा तपसो निषिद्धा पश्चादुमाख्यां सुमुखी जगाम ” । जब उमा की माता ने तपस्या का निषेध ( मनाही) की तब इसके बाद इस सुमुॉखी का नाम उमा हुआ।

        इति कुमारोक्तेः(कुमारसम्भव महाकाव्य)।

        • यद्वा ओर्हरस्य मा लक्ष्मीरिव ।उं शिवं माति मिमीते वा । आतोऽनुपसर्गेति कः । अजादित्वात् टाप् ।
        • अवति ऊयते वा उङ् शब्दे “विभाषा तिलमाषो मेति” । ५।२।४। निपातनात् मक् )
        • दुर्गा का विशेषण ।

        परन्तु यह पाणिनि के द्वारा भाषा का उत्पत्ति मूलक विश्लेषण है जिसमें संशोधन और भी अपेक्षित है।

        • यादव योगेश कुमार रोहि ने इसका विश्लेषण किया है।

        • यदि ये सूत्र शिव से प्राप्त होते तो इनमें चार सन्धि स्वर (ए,ऐ,ओ,औ) का समावेश कभी नहीं होता तथा अन्त:स्थ वर्ण (य,व,र,ल )भी माहेश्वर सूत्र में सम्मिलित न होते ! क्यों कि ये भी सन्धि- संक्रमण स्वर ही हैं मौलिक नहीं।
        • इनकी संरचना के विषय में नीचे विश्लेषण प्रस्तुत है

        ________________________________________

        पाणिनि के माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या 14 है ;जो निम्नलिखित हैं: 👇__________________________________________

        • १. अइउण्। २. ॠॡक्। ३. एओङ्। ४. ऐऔच्। ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्। ८. झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्। ११. खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३. शषसर्। १४. हल्।

        उपर्युक्त्त 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों (अक्षरसमाम्नाय) को एक विशिष्ट प्रकार के क्रम से संयोजित किया गया है।

        • फलतः, पाणिनि को शब्दों के निर्वचन या नियमों मे जब भी किन्ही विशेष वर्ण समूहों या प्रत्याहारों (एक से अधिक वर्णों) के प्रयोग की आवश्यकता होती है, वे उन वर्णों (अक्षरों) को माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाकर संक्षेप मे ग्रहण करते हैं।
        • माहेश्वर सूत्रों को इसी कारण ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी कहते हैं।
        • प्रत्याहार बनाने की विधि तथा संस्कृत व्याकरण में उनके बहुविध प्रयोगों को आगे दर्शाया गया है।
        • इन 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा के समस्त वर्णों को समावेश किया गया है।
        • प्रथम 4 सूत्रों (अइउण् – ऐऔच्) में स्वर वर्णों तथा शेष 10 सूत्र व्यंजन वर्णों की गणना की गयी है।
        • संक्षेप में स्वर वर्णों को अच् एवं व्यंजन वर्णों को हल् कहा जाता है।
        • अच् एवं हल् भी प्रत्याहार हैं।
        • प्रत्याहार की अवधारणा :---प्रत्याहार का अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन।

        अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘आदिरन्त्येन सहेता’ (१-१-७१) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का पाणिनि ने निर्देश किया है।

        आदिरन्त्येन सहेता (१-१-७१): (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण (सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदि वर्ण एवं इत्संज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में (collectively) बोध कराता है।

        • उदाहरण: अच् = प्रथम माहेश्वर सूत्र ‘अइउण्’ के आदि वर्ण ‘अ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ऐऔच्’ के अन्तिम वर्ण ‘च्’ से योग कराने पर अच् प्रत्याहार बनता है।
        • यह अच् प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है।
        • अतः, अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ।
        • इसी तरह हल् प्रत्याहार की सिद्धि ५ वें सूत्र हयवरट् के आदि अक्षर ह को अन्तिम १४ वें सूत्र हल् के अन्तिम अक्षर (या इत् वर्ण) ल् के साथ मिलाने (अनुबन्ध) से होती है।
        • फलतः, हल् = ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ब ग ड द, ख फ छ ठ थ च ट त, क प, श ष स, ह।
        • उपर्युक्त सभी 14 सूत्रों में अन्तिम वर्ण
        • (ण् क् च् आदि हलन्त वर्णों ) को पाणिनि ने इत् की संज्ञा दी है।
        • इत् संज्ञा होने से इन अन्तिम वर्णों का उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिए केवल अनुबन्ध (Bonding) हेतु किया जाता है, लेकिन व्याकरणीय प्रक्रिया मे इनकी गणना नही की जाती है |
        • अर्थात् इनका प्रयोग नही होता है।

        ________________________________

        • (अ"इ"उ ऋ"लृ मूल स्वर ।
        • (ए ,ओ ,ऐ,औ) ये सन्ध्याक्षर होने से मौलिक नहीं अपितु इनका निर्माण हुआ है ।
        • जैसे क्रमश: अ+ इ = ए तथा अ + उ = ओ संयुक्त स्वरों के रूप में गुण सन्धि के रूप में उद्भासित होते हैं ।
        • अतः स्वर तो केवल तीन ही मान्य हैं ।👇
        • । अ" इ" उ" । और ये परवर्ती (इ) तथा (उ) स्वर भी केवल
        • (अ) स्वर के उदात्त( ऊर्ध्वगामी ) उ ।
        • तथा अनुदात्त-(निम्न गामी) इ । के रूप में हैं ।
        • ___________
        • ऋ तथा ऌ स्वर न होकर क्रमश पार्श्वविक तथा आलोडित रूप है ।
        • जो उच्चारण की दृष्टि से मूर्धन्य तथा वर्त्स्य ( दन्तमूलीय रूप ) है ।
        • अब (ह)वर्ण महाप्राण है ।
        • जिसका उच्चारण स्थान काकल है ।👉👆👇
        • मूलत: ध्वनि के प्रतीक तो 28 हैं ।
        • परन्तु पाणिनी ने अपने शिक्षा शास्त्र में (64) चतु:षष्टी वर्णों की रचना दर्शायी है ।
        • पच्चीस स्वर ( प्रत्येक स्वर के उदात्त (ऊर्ध्वगामी) अनुदात्त( निम्न गामी) तथा स्वरित( मध्य गामी) फिर इन्हीं के अनुनासिक व निरानुनासिक रूप
        • इस प्रकार से प्रत्येक ह्रस्व स्वर के पाँच रूप हुए )इस प्रकार कुल योग (25) हुआ ।
        • क्यों कि मूल स्वर पाँच ही हैं । 5×5=25
        • _________________________
        • और पच्चीस स्पर्श व्यञ्जन
        • कवर्ग ।चवर्ग ।टवर्ग ।तवर्ग । पवर्ग। = 25।
        • तेरह (13) स्फुट वर्ण ( आ ई ऊ ऋृ लृ ) (ए ऐ ओ औ )
        • ( य व र ल) ( चन्द्रविन्दु ँ )
        • अनुस्वार तथा विसर्ग अनुसासिक के रूप होने से पृथक रूप से गणनीय नहीं हैं ।
        • पाणिनीय शिक्षा में कहा कि ---त्रिषष्टि चतु: षष्टीर्वा वर्णा शम्भुमते मता: ।

        स्वर (Voice) या कण्ठध्वनि की उत्पत्ति उसी प्रकार के कम्पनों से होती है जिस प्रकार वाद्ययन्त्र से ध्वनि की उत्पत्ति होती है।

        अत: स्वरयन्त्र और वाद्ययन्त्र की रचना में भी कुछ समानता के सिद्धान्त हैं।

        वायु के वेग से बजनेवाले वाद्ययन्त्र के समकक्ष मनुष्य तथा अन्य स्तनधारी प्राणियों में निम्नलिखित अंग होते हैं :👇

        _________________________________________

        1. कम्पक (Vibrators) इसमें स्वर रज्जुएँ (Vocal cords) भी सम्मिलित हैं।

        2. अनुनादक अवयव (resonators) इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :

        क. नासा ग्रसनी (nasopharynx), ख. ग्रसनी (pharynx),

        ग. मुख (mouth),

        घ. स्वरयंत्र (larynx),

        च. श्वासनली और श्वसनी

        (trachea and bronchus)

        छ. फुफ्फुस (फैंफड़ा )(lungs),

        ज. वक्षगुहा (thoracic cavity)।

        3. स्पष्ट उच्चारक (articulators)अवयव :- इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :

        क. जिह्वा (tongue),

        ख. दाँत (teeth),

        ग. ओठ (lips),

        घ. कोमल तालु (soft palate),

        च. कठोर तालु (मूर्धा )(hard palate)।

        __________________________________________

        स्वर की उत्पत्ति में उपर्युक्त अव्यव निम्नलिखित प्रकार से कार्य करते हैं :

        जीवात्मा द्वारा प्रेरित वायु फुफ्फुस जब उच्छ्वास की अवस्था में संकुचित होता है, तब उच्छ्वसित वायु वायुनलिका से होती हुई स्वरयन्त्र तक पहुंचती है, जहाँ उसके प्रभाव से स्वरयंत्र में स्थिर स्वररज्जुएँ कम्पित होने लगती हैं, जिसके फलस्वरूप स्वर की उत्पत्ति होती है।

        ठीक इसी समय अनुनादक अर्थात् स्वरयन्त्र का ऊपरी भाग, ग्रसनी, मुख तथा नासा अपनी अपनी क्रियाओं द्वारा स्वर में विशेषता तथा मृदुता उत्पन्न करते हैं।

        इसके उपरान्त उक्त स्वर का शब्द उच्चारण के रूपान्तरण उच्चारक अर्थात् कोमल, कठोर तालु, जिह्वा, दन्त तथा ओष्ठ आदि करते हैं।

        इन्हीं सब के सहयोग से स्पष्ट शुद्ध स्वरों की उत्पत्ति होती है।

        स्वरयंत्र---

        अवटु (thyroid) उपास्थि

        वलथ (Cricoid) उपास्थि

        स्वर रज्जुऐं

        ये संख्या में चार होती हैं जो स्वरयन्त्र के भीतर सामने से पीछे की ओर फैली रहती हैं।

        यह एक रेशेदार रचना है जिसमें अनेक स्थिति स्थापक रेशे भी होते हैं।

        देखने में उजली तथा चमकीली मालूम होती है।

        इसमें ऊपर की दोनों तन्त्रियाँ गौण तथा नीचे की मुख्य कहलाती हैं।

        इनके बीच में त्रिकोण अवकाश होता है जिसको कण्ठ-द्वार (glottis) कहते हैं।

        इन्हीं रज्जुओं के खुलने और बन्द होने से नाना प्रकार के विचित्र स्वरों की उत्पत्ति होती है।

        स्वर की उत्पत्ति में स्वररज्जुओं की गतियाँ (movements)----

        श्वसन काल में रज्जुद्वार खुला रहता है और चौड़ा तथा त्रिकोणकार होता है।

        श्वाँस लेने में यह कुछ अधिक चौड़ा (विस्तृत) तथा श्वाँस छोड़ने में कुछ संकीर्ण (संकुचित) हो जाता है।

        बोलते समय रज्जुएँ आकर्षित होकर परस्पर सन्निकट आ जाती हैं ;और उनका द्वार अत्यंत संकीर्ण हो जाता है।

        जितना ही स्वर उच्च होता है, उतना ही रज्जुओं में आकर्षण अधिक होता है और द्वारा उतना ही संकीर्ण हो जाता है।

        __________________________________________

        स्वरयन्त्र की वृद्धि के साथ साथ स्वररज्जुओं की लंबाई बढ़ती है ; जिससे युवावस्था में स्वर भारी हो जाता है।

        स्वररज्जुएँ स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक लंबी होती हैं।

        इसी लिए पुरुषों का स्वर मन्द्र सप्तक पर आधारित है

        और स्त्रियों का स्वर तार सप्तक पर आधारित है।

        _________________________________________

        स्वरों की उत्पत्ति का मानव शास्त्रीय सिद्धान्त --

        उच्छ्वसित वायु के वेग से जब स्वर रज्जुओं का कम्पन होता है ; तब स्वर की उत्पत्ति होती है।

        यहाँ स्वर मूलत: एक ही प्रकार का उत्पन्न होता है किन्तु आगे चलकर तालु, जिह्वा, दन्त और ओष्ठ आदि अवयवों के सम्पर्क से उसमें परिवर्तन आ जाता है।

        ये ही उसके विभिन्न प्रारूपों के साँचें है ।

        स्वररज्जुओं के कम्पन से उत्पन्न स्वर का स्वरूप निम्लिखित तीन बातों पर आश्रित है :👇

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        1. प्रबलता (loudness) - यह कम्पन तरंगों की उच्चता के अनुसार होता है।

        2. तारत्व (Pitch) - यह कम्पन तरंगों की संख्या के अनुसार होता है।

        3. गुणता (Quality) - यह गुञ्जनशील स्थानों के विस्तार के अनुसार बदलता रहता है; और कम्पन तरंगों के स्वरूप पर निर्भर करता है।

        1. अ" स्वर का उच्चारण तथा ह स्वर का उच्चारण श्रोत समान है । कण्ठ तथा काकल ।
        2. _________________________________________
        3. नि: सन्देह काकल कण्ठ का पार्श्ववर्ती है और "अ" तथा "ह" सम्मूलक सजातिय बन्धु हैं।
        4. जैसा कि संस्कृत व्याकरण में रहा भी गया है कहा भी गया है ।
        5. "अ कु ह विसर्जनीयीनांकण्ठा ।
        6. अर्थात् अ स्वर , कवर्ग :- ( क ख ग घ ड्•) तथा विसर्ग(:) , "ह" ये सभीे वर्ण कण्ठ से उच्चारित होते हैं ।
        7. अतः "ह" महाप्राण " भी "अ " स्वर के घर्षण से ही विकसित रूप है । अ-<हहहहह.... ।
        8. अतः "ह" भी मौलिक नहीं है। इसका विकास भी "अ" स्वर से हुआ ।
        9. अत: हम इस "ह" वर्ण को भी मौलिक वर्णमाला में समावेशित नहीं करते हैं।________________________________________
        10. य, व, र ,ल , ये अन्त:स्थ वर्ण हैं ; स्वर और व्यञ्जनों के मध्य में होने से ये अन्त:स्थ हैं।
        11. क्यों कि अन्त: का अर्थ मध्य ( Inter) और स्थ का अर्थ स्थित रहने वाला ।ये अन्त:स्थ वर्ण
        12. क्रमश: गुण सन्ध्याक्षर या स्वरों के विरीत संरचना वाले हैं । 👇
        13. जैसे :- इ+अ = य अ+इ =ए
        14. उ+अ = व अ+उ= ओ ______________________________________
        15. ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्।
        16. स्पर्श व्यञ्जनों सभी अनुनासिक अपने अपने वर्ग के अनुस्वार अथवा नकार वर्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
        17. ८. झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्। ११.
        18. खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३.
        19. शषसर्।
        20. उष्म वर्ण श, ष, स, वर्ण क्रमश: चवर्ग , टवर्ग और चवर्ग के सकार क प्रतिनिधित्व करते हैं ।
        21. जैसे पश्च । पृष्ठ ।पस्त परास्त ।
        22. यहाँ क्रमश चवर्ग के साथ तालव्य श उष्म वर्ण है।
        23. टवर्ग के साथ मूर्धन्य (ष) उष्म वर्ण है ।
        24. तथा तवर्ग के साथ दन्त्य (स) उष्म वर्ण है ।
        25. ___________________________________👇💭
        26. यूरोपीय भाषाओं में विशेषत: अंग्रेजी आदि में जो रोमन लिपि में है वहाँ तवर्ग का अभाव है।
        • अतः त थ द ध तथा स वर्णो को यूरोपीय अंग्रेजी आदि भाषाओं में नहीं लिख सकते हैं ।
        • क्यों कि वहाँ की शीत जलवायु के कारण जिह्वा का रक्त सञ्चरण (गति) मन्द रहती है । और तवर्ग की की उच्चारण तासीर ( प्रभाव) सम शीतोष्ण जल- वायवीय है ।

        अतः "श्" वर्ण के लिए (Sh) तथा "ष्" वर्ण के (S )वर्ण रूपान्तरित हो सकते हैं । यूरोपीय भाषाओं में तवर्ग तथा "स" वर्ण शुद्धता की कषौटी पर पूर्णत: निषिद्ध व अमान्य ही हैं ।

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        • १४. हल्।
        • तथा पाणिनि माहेश्वर सूत्रों में एक "ह" वर्ण केवल हलों के विभाजन के लिए है ।
        • इस प्रकार वर्ण जो ध्वनि अंकन के रूप हैं ।
        • मौलिक रूप में केवल 28 वर्ण हैं ।
        • जो ध्वनि के मुल रूप के द्योतक हैं ।

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        1. बाह्योष्ठ्य (exo-labial)

        2. अन्तःओष्ठ्य (endo-labial)

        3. दन्त्य (dental)

        4. वर्त्स्य (alveolar)

        5. पश्च वर्त्स्य (post-alveolar)

        6. प्रतालव्य( prä-palatal )

        7. तालव्य (palatal)

        8. मृदुतालव्य (velar)

        9. अलिजिह्वीय (uvular)

        10.ग्रसनी से (pharyngal)

        11.श्वासद्वारीय (glottal)

        12.उपजिह्वीय (epiglottal)

        13.जिह्वामूलीय (Radical)

        14.पश्चपृष्ठीय (postero-dorsal)

        15.अग्रपृष्ठीय (antero-dorsal)

        16.जिह्वापाग्रीय (laminal)

        17.जिह्वाग्रीय (apical)

        18.उप जिह्विय( sub-laminal)

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        स्वनविज्ञान के सन्दर्भ में, मुख गुहा के उन 'लगभग अचल' स्थानों को उच्चारण बिन्दु (articulation point या place of articulation) कहते हैं; जिनको 'चल वस्तुएँ' छूकर जब ध्वनि मार्ग में बाधा डालती हैं तो उन व्यंजनों का उच्चारण होता है।

        उत्पन्न व्यञ्जन की विशिष्ट प्रकृति मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करती है- उच्चारण स्थान, उच्चारण विधि और स्वनन (फोनेशन)।

        मुख गुहा में 'अचल उच्चारक' मुख्यतः मुखगुहा की छत का कोई भाग होता है जबकि 'चल उच्चारक' मुख्यतः जिह्वा, नीचे वाला ओष्ठ (ओठ), तथा श्वाँस -द्वार (ग्लोटिस)आदि हैं।

        व्यञ्जन वह ध्वनि है जिसके उच्चारण में वायु अबाध गति से न निकलकर मुख के किसी भाग:-

        (तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि) से या तो पूर्ण अवरुद्ध होकर आगे बढ़ती है या संकीर्ण मार्ग से घर्षण करते हुए या पार्श्व मार्ग से निकलती है ।

        1. इस प्रकार वायु मार्ग में पूर्ण या अपूर्ण अवरोध उपस्थित होता है। तब व्यञ्जन ध्वनियाँ प्रादुर्भूत ( उत्पन्न) होती हैं ।
        2. हिन्दी व्यञ्जनों का वर्गीकरण----
        3. व्यञ्जनों का वर्गीकरण मुख्य रूप से स्थान और प्रयत्न के आधर पर किया जाता है।
        4. व्यञ्जनों के उत्पन्न होने के स्थान से सम्बन्धित व्यञ्जन को आसानी से पहचाना जा सकता है।
        5. इस दृष्टि से हिन्दी व्यञ्जनों का वर्गीकरण इस प्रकार है-
        6. उच्चारण स्थान (ध्वनि वर्ग) उच्चरित ध्वनि--👇
        7. द्वयोष्ठ्य:- ,प , फ, ब, भ, म
        8. दन्त्योष्ठ्य :-, फ़
        9. दन्त्य :-,त, थ, द, ध
        10. वर्त्स्य :-न, स, ज़, र, ल, ळ
        11. मूर्धन्य :-ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, र, ष
        12. कठोर :-तालव्य श, च, छ, ज, झ
        13. कोमल तालव्य :-क, ख, ग, घ, ञ, ख़, ग़
        14. पश्च-कोमल-तालव्य:- क़ वर्ण है।
        15. स्वरयन्त्रामुखी:-. ह वर्ण है ।
        16. "ह" ध्वनि महाप्राण है इसका विकास "अ" स्वर से हुआ है ।जैसे धड़कन (स्पन्दन) से श्वाँस का
        17. जैसे धड़कन (स्पन्दन) से श्वाँस का अन्योन्य सम्बन्ध है उसी प्रकार "अ" और "ह" वर्ण हैं।
        18. "ह" वर्ण का उच्चारण स्थान काकल है ।
        19. काकल :--- गले में सामने की ओर निकल हुई हड्डी । कौआ । घण्टी । टेंटुवा आदि नाम इसके साधारण भाषा में हैं। शब्द कोशों में इसका अर्थ :- १. काला कौआ । २. कंठ की मणि या गले की मणि ।
        20. उच्चारण की प्रक्रिया के आधार पर व्यञ्जनों का वर्गीकरण--👇
        21. उच्चारण की प्रक्रिया या प्रयत्न के परिणाम-स्वरूप उत्पन्न व्यञ्जनों का वर्गीकरण इस प्रकार है-
        22. स्पर्श : उच्चारण अवयवों के स्पर्श करने तथा सहसा खुलने पर जिन ध्वनियों का उच्चारण होता है उन्हें स्पर्श कहा जाता है।
        23. विशेषत: जिह्वा का अग्र भाग जब मुख के आन्तरिक भागों का उच्चारण करता है ।
        24. क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ और क़ सभी ध्वनियाँ स्पर्श हैं।
        25. च, छ, ज, झ को पहले 'स्पर्श-संघर्षी' नाम दिया जाता था ; लेकिन अब सरलता और संक्षिप्तता को ध्यान में रखते हुए इन्हें भी स्पर्श व्यञ्जनों के वर्ग में रखा जाता है।
        26. इनके उच्चारण में उच्चारण अवयव सहसा खुलने के बजाए धीरे-धीरे खुलते हैं।
        27. मौखिक व नासिक्य :- व्यञ्जनों के दूसरे वर्ग में मौखिक व नासिक्य ध्वनियां आती हैं।
        28. हिन्दी में ङ, ञ, ण, न, म व्यञ्जन नासिक्य हैं। इनके उच्चारण में श्वासवायु नाक से होकर निकलती है, जिससे ध्वनि का नासिकीकरण होता है। इन्हें 'पञ्चमाक्षर' भी कहा जाता है।
        29. और अनुनासिक भी --
        30. इनके स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग सुविधजनक माना जाता है।
        31. वस्तुत ये सभीे प्रत्येक वर्ग के पञ्चम् वर्ण "न" अथवा "म" के ही रूप हैं ।
        32. परन्तु सभी केवल अपने स्ववर्गीय वर्णों के सानिध्य में अाकर "न" वर्ण का रूप प्रकट करते हैं ।
        33. जैसे :-
        34. कवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
        35. अङ्क , सङ्ख्या अङ्ग , लङ्घ।
        36. चवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
        37. चञ्चल, पञ्छी ,पिञ्जल अञ्झा ।
        38. टवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
        39. कण्टक, कण्ठ, अण्ड ,. पुण्ढीर ।
        40. तवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
        41. तन्तु , पन्थ ,सन्दीपन, अन्ध ।
        42. पवर्ग के अनुरूप अनुनासिक:-
        43. पम्प , गुम्फन , अम्बा, दम्भ ।
        • ________________________________________
        • इन व्यंजनों को छोड़कर अन्य सभी व्यञ्जन मौखिक हैं।
        • उष्म वर्ण - उष्म व्यञ्जन :- उष्म का अर्थ होता है- गर्म। जिन वर्णो के उच्चारण के समय वायु मुख के विभिन्न भागों से टकरा कर और श्वाँस में गर्मी पैदा कर , ध्वनि समन्वित होकर बाहर निकलती उन्हें उष्म व्यञ्जन कहते है।
        • वस्तुत इन उष्म वर्णों का प्रयोजन अपने वर्ग के अनुरूप सकारत्व का प्रतिनिधित्व करना है ।
        • तवर्ग - (त थ द ध न) का उच्चारण स्थान दन्त्य होने से "स" उष्म वर्ण है ।
        • और यह हमेशा तवर्ग के वर्णों के साथ प्रयोग होता है।
        • जैसे - अस्तु, वस्तु,आदि--
        • इसी प्रकार टवर्ग - ट ठ ड ढ ण का उच्चारण स्थान मूर्धन्य होने से "ष" उष्म वर्ण ये सभी सजातिय हैं।
        • जैसे - कष्ट ,स्पष्ट पोष्ट ,कोष्ठ आदि
        • चवर्ग -च छ ज झ ञ का तथा "श" का उच्चारण स्थान तालव्य होने से ये परस्पर सजातिय हैं ।
        • जैसे- पश्चात् , पश्च ,आदि
        • इन व्यञ्जनों के उच्चारण के समय वायु मुख से रगड़(घर्षण) खाकर ऊष्मा पैदा करती है अर्थात् उच्चारण के समय मुख से गर्म वायु निकलती है।
        • उष्म व्यञ्जनों का उच्चारण एक प्रकार की रगड़ या घर्षण से उत्पत्र उष्म वायु से होता हैं।
        • ये भी चार व्यञ्जन होते है- श, ष, स, ह।
        • _____________________________________
        • पार्श्विक : इन व्यञ्जनों के उच्चारण में श्वास -वायु जिह्वा के दोनों पार्श्वों (अगल-बगल) से निकलती है।
        • 'ल' ऐसी ही पार्श्विक ध्वनि है।
        • अर्ध स्वर : इन ध्वनियों के उच्चारण में उच्चारण अवयवों में कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता तथा श्वासवायु अवरोधित नहीं रहती है।
        • हिन्दी में य, व ही अर्धस्वर की श्रेणि में हैं।
        • लुण्ठित :- इन व्यञ्जनों के उच्चारण में जिह्वा वर्त्स्य (दन्त- मूल या मसूड़े) भाग की ओर उठती है। हिन्दी में 'र' व्यञ्जन इसी तरह की ध्वनि है।
        • उत्क्षिप्त :- जिन व्यञ्जन ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा का अग्र भाग (नोक) कठोर तालु के साथ झटके से टकराकर नीचे आती है, उन्हें उत्क्षिप्त कहते हैं।
        • ड़ और ढ़ ऐसे ही व्यञ्जन हैं।
        • जो अंग्रेजी' में क्रमश (R) तथा ( Rh ) वर्ण से बनते हैं ।
        • घोष और अघोष वर्ण---
        • व्यञ्जनों के वर्गीकरण में स्वर-तन्त्रियों की स्थिति भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
        • इस दृष्टि से व्यञ्जनों को दो वर्गों में
        • विभक्त किया जाता है :- घोष और अघोष।
        • जिन व्यञ्जनों के उच्चारण में स्वर-तन्त्रियों में कम्पन होता है, उन्हें घोष या सघोष कहा जाता हैं।
        • दूसरे प्रकार की ध्वनियाँ अघोष कहलाती हैं।
        • स्वर-तन्त्रियों की अघोष स्थिति से अर्थात् जिनके उच्चारण में कम्पन नहीं होता उन्हें अघोष व्यञ्जन कहा जाता है।
        • _________________________________________
        • घोष अघोष
        • ग, घ, ङ,क, ख
        • ज,झ, ञ,च, छ
        • ड, द, ण, ड़, ढ़,ट, ठ
        • द, ध, न,त, थ
        • ब, भ, म, प, फ
        • य, र, ल, व, ह ,श, ष, स ।
        • प्राणतत्व के आधर पर भी व्यञ्जन का वर्गीकरण किया जाता है।
        • प्राण का अर्थ है - श्वास -वायु।
        • जिन व्यञ्जन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास बल अधिक लगता है उन्हें महाप्राण और जिनमें श्वास बल का प्रयोग कम होता है उन्हें अल्पप्राण व्यञ्जन कहा जाता है।
        • पञ्चम् वर्गों में दूसरी और चौथी ध्वनियाँ महाप्राण हैं।
        • हिन्दी के ;- ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ, ड़, ढ़ - व्यञ्जन महाप्राण हैं।
        • वर्गों के पहले, तीसरे और पाँचवें वर्ण अल्पप्राण हैं।
        • क, ग, च, ज, ट, ड, त, द, प, ब, य, र, ल, व, ध्वनियाँ इसी अल्प प्रमाण वर्ग की हैं।

        वर्ण यद्यपि स्वर और व्यञ्जन दौनों का वाचक है

        परन्तु जब व्यञ्जन में स्वर का समावेश होता है; तब वह अक्षर होता है ।

        (अक्षर में स्वर ही मेरुदण्ड अथवा कशेरुका है।)

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        भाषाविज्ञान में 'अक्षर' या शब्दांश (अंग्रेज़ी रूप (syllable) सिलेबल) ध्वनियों की संगठित इकाई को कहते हैं।

        किसी भी शब्द को अंशों में तोड़कर बोला जा सकता है और शब्दांश ही अक्षर है ।

        शब्दांश :- शब्द के वह अंश होते हैं जिन्हें और अधिक छोटा नहीं बनाया जा सकता यदि छोटा किया तो शब्द की ध्वनियाँ बदल जाती हैं।

        उदाहरणतः 'अचानक' शब्द के तीन शब्दांश हैं - 'अ', 'चा' और 'नक'।

        यदि रुक-रुक कर 'अ-चा-नक' बोला जाये तो शब्द के तीनों शब्दांश खंडित रूप से देखे जा सकते हैं।

        लेकिन शब्द का उच्चारण सुनने में सही प्रतीत होता है।

        अगर 'नक' को आगे तोड़ा जाए तो शब्द की ध्वनियाँ ग़लत हो जातीं हैं - 'अ-चा-न-क'. इस शब्द को 'अ-चान-क' भी नहीं बोला जाता क्योंकि इस से भी उच्चारण ग़लत हो जाता है।

        यह क्रिया उच्चारण बलाघात पर आधारित है ।

        कुछ छोटे शब्दों में एक ही शब्दांश होता है, जैसे 'में', 'कान', 'हाथ', 'चल' और 'जा'. कुछ शब्दों में दो शब्दांश होते हैं, जैसे 'चलकर' ('चल-कर'), खाना ('खा-ना'), रुमाल ('रु-माल') और सब्ज़ी ('सब-ज़ी')। कुछ में तीन या उस से भी अधिक शब्दांश होते हैं, जैसे 'महत्त्वपूर्ण' ('म-हत्व-पूर्ण') और 'अन्तर्राष्ट्रीय' ('अंत-अर-राष-ट्रीय')।

        एक ही आघात या बल में बोली जाने वाली या उच्चारण की जाने वाली ध्वनि या ध्वनि समुदाय की इकाई को अक्षर कहा जाता है।

        इकाई की पृथकता का आधार स्वर या स्वर-रत (Vocoid) व्यञ्जन होता है। व्यञ्जन ध्वनि किसी उच्चारण में स्वर का पूर्व या पर अंग बनकर ही आती है।

        अक्षर में स्वर ही मेरुदण्ड अथवा कशेरुका है।

        अक्षर से स्वर को न तो पृथक्‌ ही किया जा सकता है और न बिना स्वर या स्वरयुक्त व्यञ्जन के द्वारा अक्षर का निर्माण ही सम्भव है।

        उच्चारण में यदि व्यञ्जन मोती की तरह है तो स्वर धागे की तरह।

        यदि स्वर सशक्त सम्राट है तो व्यञ्जन अशक्त राजा। इसी आधार पर प्रायः अक्षर को स्वर का पर्याय मान लिया जाता है, किन्तु ऐसा है नहीं, फिर भी अक्षर निर्माण में स्वर का अत्यधिक महत्व होता है।

        कतिपय भाषाओं में व्यञ्जन ध्वनियाँ भी अक्षर निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं।

        • अंग्रेजी भाषा में न, र, ल, जैसे एन ,आर,एल, आदि ऐसी व्यञ्जन ध्वनियाँ स्वरयुक्त भी उच्चरित होती हैं एवं स्वर-ध्वनि के समान अक्षर निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं।
        • अंग्रेजी सिलेबल के लिए हिन्दी में अक्षर शब्द का प्रयोग किया जाता है।
        • __________________________________________
        • ध्वनि उत्पत्ति- सिद्धान्त-----
        • मानव एवं अन्य जन्तु ध्वनि को कैसे सुनते हैं? -- ध्वनि तरंग कर्णपटल का स्पर्श करती है , कान का पर्दा, कान की वह मेकेनिज्म जो ध्वनि को संकेतों में बदल देती है।
        • श्रवण तंत्रिकाएँ, (पर्पल): ध्वनि संकेत का आवृति स्पेक्ट्रम, तन्त्रिका में गया संकेत) ही शब्द है ।
        • भौतिक विज्ञान में -
        • ध्वनि (Sound) एक प्रकार का कम्पन या विक्षोभ है जो किसी ठोस, द्रव या गैस से होकर सञ्चारित होती है। किन्तु मुख्य रूप से उन कम्पनों को ही ध्वनि कहते हैं जो मानव के कान (Ear) से सुनायी पडती हैं।
        • ध्वनि की प्रमुख विशेषताएँ---
        • ध्वनि एक यान्त्रिक तरंग है न कि विद्युतचुम्बकीय तरंग। (प्रकाश विद्युतचुम्बकीय तरंग है।
        • ध्वनि के सञ्चरण के लिये माध्यम की जरूरत होती है। ठोस, द्रव, गैस एवं प्लाज्मा में ध्वनि का सञ्चरण सम्भव है।
        • निर्वात में ध्वनि का सञ्चरण नहीं हो सकता।
        • द्रव, गैस एवं प्लाज्मा में ध्वनि केवल अनुदैर्घ्य तरंग (longitudenal wave) के रूप में चलती है जबकि ठोसों में यह अनुप्रस्थ तरंग (transverse wave) के रूप में भी संचरण कर सकती है।
        • अनुदैर्घ्य तरंग:---
        • जिस माध्यम में ध्वनि का सञ्चरण होता है यदि उसके कण ध्वनि की गति की दिशा में ही कम्पन करते हैं तो उसे अनुदैर्घ्य तरंग कहते हैं!
        • अनुप्रस्थ तरंग:-
        • जब माध्यम के कणों का कम्पन ध्वनि की गति की दिशा के लम्बवत होता है तो उसे अनुप्रस्थ तरंग कहते है।
        • सामान्य ताप व दाब (NTP) पर वायु में ध्वनि का वेग लगभग 343 मीटर प्रति सेकेण्ड होता है।
        • बहुत से वायुयान इससे भी तेज गति से चल सकते हैं उन्हें सुपरसॉनिक विमान कहा जाता है।
        • मानव कान लगभग २० हर्ट्स से लेकर २० किलोहर्टस (२०००० हर्ट्स) आवृत्ति की ध्वनि तरंगों को ही सुन सकता है।
        • बहुत से अन्य जन्तु इससे बहुत अधिक आवृत्ति की तरंगों को भी सुन सकते हैं। जैसे चमकाधड़
        • एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाने पर ध्वनि का परावर्तन एवं अपवर्तन होता है।
        • माइक्रोफोन ध्वनि को विद्युत उर्जा में बदलता है; लाउडस्पीकर विद्युत उर्जा को ध्वनि उर्जा में बदलता है।
        • किसी भी तरंग (जैसे ध्वनि) के वेग, तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति में निम्नलिखित संबन्ध होता है:-
        • {\displaystyle \lambda ={\frac {v}{f}}}
        • जहाँ v तरंग का वेग, f आवृत्ति तथा : {\displaystyle \lambda } तरंगदर्ध्य है।
        • आवृत्ति के अनुसार वर्गीकर---
        • अपश्रव्य (Infrasonic) 20 Hz से कम आवृत्ति की ध्वनि मानव को सुनाई नहीं देती,
        • श्रव्य (sonic) 20 Hz से 20 kHz, के बीच की आवृत्तियों वाली ध्वनि सामान्य मानव को सुनाई देती है।
        • पराश्रव्य (Ultrasonic) 20 kHz से 1,6 GHz के बीच की आवृत्ति की ध्वनि मानव को सुनाई नहीं पड़ती,
        • अतिध्वनिक (Hypersonic) 1 GHz से अधिक आवृत्ति की ध्वनि किसी माध्यम में केवल आंशिक रूप से ही संचरित (प्रोपेगेट) हो पाती है।
        • ध्वनि और प्रकाश का सम्बन्ध शब्द और अर्थ के सामान्य या शरीर और आत्मा के समान जैविक सत्ता का आधार है ।
        • ध्वनि के विषय में दार्शनिक व ऐैतिहासिक मत -
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        • सृष्टि के प्रारम्भ में ध्वनि का प्रादुर्भाव ओ३म् के रूप में हुआ --
        • ओ३म् शब्द की व्युत्पत्ति----
        • एक वैश्विक विश्लेषण करते हैं
        • ओ३म् की अवधारणा द्रविडों की सांस्कृतिक अभिव्यञ्जना है
        • वे नि: सन्देह फॉनिशियन जन-जाति के सहवर्ती अथवा सजातिय बन्धु रहे होंगे । क्यों दौनों का सांस्कृतिक समीकरण है ।
        • द्रविड द्रव (पदार्थ ) अथवा जल तत्व का विद =वेत्ता ( जानकार) द्रव+विद= समाक्षर लोप (Haplology)
        • के द्वारा निर्मित रूप द्रविद -द्रविड है !
        • ये बाल्टिक सागर के तटवर्ती -संस्कृतियों जैसे प्राचीन फ्रॉञ्च ( गॉल) की सैल्टिक (कैल्टिक) जन-जाति में द्रूयूद (Druid) रूप में हैं ।
        • कैल्ट जन जाति के धर्म साधना के रहस्य मय अनुष्ठानों में इसी कारण से आध्यात्मिक और तान्त्रिक क्रियाओं को प्रभावात्मक बनाने के लिए ओघम् (ogham शब्द का दृढता से उच्चारण विधान किया जाता था !
        • कि उनका विश्वास था ! कि इस प्रकार (Ow- ma) अर्थात् जिसे भारतीय आर्यों ने ओ३म् रूप में साहित्य और कला के ज्ञान के उत्प्रेरक और रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया था वह ओ३म् प्रणवाक्षर नाद- ब्रह्म स्वरूप है।
        • और उनका मान्यता भी थी..
        • प्राचीन भारतीय आर्य मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण भाषा की आक्षरिक सम्पत्ति (syllable prosperity) यथावत् रहती है
        • इसके उच्चारण प्रभाव से ओघम् का मूर्त प्रारूप सूर्य के आकार के सादृश्य पर था ।
        • जैसी कि प्राचीन पश्चिमीय संस्कृतियों की मान्यताऐं भी हैं।
        • ..ब. वास्तव में ओघम् (ogham )से बुद्धि उसी प्रकार नि:सृत होती है .
        • जैसे सूर्य से प्रकाश प्राचीन मध्य मिश्र के लीबिया प्रान्त में तथा थीब्ज में यही आमोन् रा (ammon- ra) के रूप ने था ..जो वस्तुत: ओ३म् -रवि के तादात्मय रूप में प्रस्तावित है।
        • आधुनिक अनुसन्धानों के अनुसार भी अमेरिकीय अन्तरिक्ष यान - प्रक्षेपण संस्थान के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य में अजस्र रूप से निनादित ओ३म् प्लुत स्वर का श्रवण किया है।
        • सैमेटिक -- सुमेरियन हिब्रू आदि संस्कृतियों में अोमन् शब्द आमीन के रूप में है ।
        • तथा रब़ का अर्थ .नेता तथा महान होता हेै ! जैसे रब्बी यहूदीयों का धर्म गुरू है .. अरबी भाषा में..रब़ -- ईश्वर का वाचक है .अमोन तथा रा प्रारम्भ में पृथक पृथक थे .. दौनों सूर्य सत्ता के वाचक थे ।
        • मिश्र की संस्कृति में ये दौनों कालान्तरण में एक रूप होकर अमॉन रॉ के रूप में अत्यधिक पूज्य हुए
        • .. क्यों की प्राचीन मिश्र के लोगों की मान्यता थी कि अमोन -- रॉ.. ही सारे विश्व में प्रकाश और ज्ञान का कारण है,।
        • मिश्र की परम्पराओ से ही यह शब्द मैसोपोटामिया की सैमेटिक हिब्रु परम्पराओं में प्रतिष्ठित हुआ जो क्रमशः यहूदी ( वैदिक यदुः ) के वंशज थे !!
        • इन्हीं से ईसाईयों में (Amen) तथा अ़रबी भाषा में यही आमीन ?


        पणि कौन थे ? यह जानना भी आवश्यक है क्योंकि पणियों को यूरोपीय ग्रीक, लैटिन और डच इत्यादि पुराणों में वर्णन है।
        राथ के मतानुसार यह शब्द 'पण्=विनिमय' से बना है तथा पणि वह व्यक्ति है, जो कि बिना बदले के कुछ नहीं दे सकता।
        इस मत का समर्थन जिमर तथा लुड्विग ने भी किया है।
        लड्विग ने इस पार्थक्य के कारण पणिओं को यहाँ का आदिवासी व्यवसायी माना है।
        ये अपने सार्थ अरब, पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ़्रीका में भेजते थे और अपने धन की रक्षा के लिए बराबर युद्ध करने को प्रस्तुत रहते थे।

        इनके लिए 
        दस्यु अथवा दास शब्द के प्रसंगों के आधार पर उपर्युक्त मत पुष्ट होता है।
        किन्तु आवश्यक है कि आर्यों के देवों की पूजा न करने वाले और पुरोहितों को दक्षिणा न देने वाले इन पणियों को धर्मनिरपेक्ष, लोभी और हिंसक व्यापारी कहा जा सकता है।
        ये आर्य और अनार्य दोनों हो सकते हैं।
        हिलब्रैण्ट ने इन्हें स्ट्राबो द्वारा उल्लिखित पर्नियन जाति के तुल्य माना है।
        जिसका सम्बन्ध दहा (दास) लोगों से था।
        फ़िनिशिया इनका पश्चिमी उपनिवेश था, जहाँ ये भारत से व्यापारिक वस्तुएँ, लिपि, कला आदि ले गए।

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        पणि के संस्कृत में अर्थ ,
        व्यवहारो द्यूतं स्तुतिर्वा पणः अस्त्यर्थे इनि पणिन्।
        १ क्रयादिव्यवहारयुक्ते
        २ स्तुतियुक्ते च
        ३ ऋषिभेदे पु० । तस्यापत्यम् अण् “गाथिविदथीत्यादि” पाणिनि  ।
        पाणिन तस्यापत्ये यूनि ततः इञ् पाणिनिः ।

        सरमा तथा पणि संवाद–
        सरमा शब्द निर्वचन प्रसंग में उद्धृत ऋग्वेद 10/108/01 के व्याखयान में प्राप्त होता है। आचार्य यास्क का कथन है कि इन्द्र द्वारा प्रहित देवशुनी सरमा ने पणियों से संवाद किया।
        पणियों ने देवों की गाय चुरा ली थी।
        इन्द्र ने सरमा को गवान्वेषण के लिए भेजा था।
        यह एक प्रसिद्ध आख्यान है।

        आचार्य यास्क द्वारा सरमा माध्यमिक देवताओं में पठित है। वे उसे शीघ्रगामिनी होने से सरमा मानते हैं।
        वस्तुतः मैत्रायणी संहिता के अनुसार भी सरमा वाक् ही है। गाय रश्मियाँ हैं  इस प्रकार यह आख्यान सूर्य रश्मियों के अन्वेषण का आलंकारिक वर्णन है।
        निरुक्त शास्त्र के अनुसार
        ‘‘ऋषेः दृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवत्यायानसंयुक्ता’’
        अर्थात् सब जगत् के प्रेरक परमात्मा अद्रष्ट अर्थों को आख्यान के माध्यम से उपदिष्ट करते हैं।

        क्रमशः एक-एक शब्द पर विचार करते हैं।

        पणयः- ऋग्वेद में 16 बार प्रयुक्त बहुवचनान्त पणयः शब्द तथा चार बार एकवचनान्त पणि शब्द का प्रयोग है।
        पणि शब्द पण् व्यवहारे स्तुतौ च धातु से अच् प्रत्यय करके पुनः मतुबर्थ में अत इनिठनौ से इति प्रत्यय कर के सिद्ध होता है।
        यः पणते व्यवहरति स्तौति स पणिः अथवा कर्मवाच्य में पण्यते व्यवहियते सा पणिः’’।
        अर्थात् जिसके साथ हमारा व्यवहार होता है और जिसके बिना हमारा जीवन व्यवहार नहीं चल सकता है, उसे पणि कहते हैं ।

        पणिक भाषा , जिसे कार्थागिनीन  या फोएनिसियो-पूनिक भी कहा जाता है!
        यह सेमेटिक परिवार की कनानी भाषा  , फिनिशियन भाषा की एक विलुप्त विविधतामयी भाषा है।
        यह 8 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 5 वीं शताब्दी ईस्वी तक, उत्तर पश्चिमी अफ्रीका में कार्तगिनियन साम्राज्य और शास्त्रीय पुरातनता में पणिक लोगों द्वारा कई भूमध्य द्वीपों में बोली जाती थी

        ट्यूनीशिया और (तटीय हिस्सों), जैसे मोरक्को , अल्जीरिया  , दक्षिणी इबेरिया , लीबिया , माल्टा , पश्चिमी सिसिली आदि देशों में यह लोग भ्रमण करते थे
        800 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी तक का समय --
        भाषा परिवार-
        अफ्रीकी-एशियाई
        यहूदी
        पश्चिम सेमिटिक
        केंद्रीय सेमिटिक
        नॉर्थवेस्ट सेमिटिक
        कैनेनिटी( कनानी)

        इतिहास के दृष्टि कोण से -
        पेनिक्स या वैदिक सन्दर्भों में वर्णित पणि  146 ईसा पूर्व रोमन गणराज्य द्वारा कार्थेज के विनाश तक फेनेशिया के संपर्क में रहे।
        फोनिशियन नामकरण पणिस् अथवा पणिक से सम्बद्ध है ।

        नियो-पुणिक शब्द को दो इंद्रियों में प्रयोग किया जाता है: एक फीनशियन वर्णमाला से संबंधित है और दूसरा भाषा में ही है।  वर्तमान सन्दर्भ में, नियो-पुणिक ने कार्तेज के पतन के बाद और 146 ईसा पूर्व पूर्व पुणिक क्षेत्रों के रोमन विजय के बाद पूनिक की बोली को संदर्भित किया है।
        बोली पहले की पंचिक भाषा से भिन्न थी, जैसा कि पहले के पंख की तुलना में अलग-अलग वर्तनी से और गैर-सेमिटिक नामों के उपयोग से स्पष्ट रूप से लिबिको-बर्बर मूल के उपयोग से स्पष्ट है।
        अंतर द्विपक्षीय परिवर्तनों के कारण था कि पुणिक उत्तर-अफ्रीकी लोगों के बीच फैल गया था।
        नव-पुणिक कार्यों में लेपिस मैग्ना एन 1 9 (9 2 ईस्वी) शामिल है।

        चौथी शताब्दी ईस्वी तक, पुणिक अभी भी ट्यूनीशिया, उत्तर पश्चिमी अफ्रीका के अन्य हिस्सों और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में बोली जाती थी।
        नव-पुणिक वर्णमाला भी Punic (प्यूनिक)भाषा से निकली। लगभग 400 ईस्वी  तक, पुणिक का पहला अर्थ मुख्य रूप से स्मारक शिलालेखों के लिए उपयोग किया जाता था, जो कहीं और कर्सर नव-पुणिक वर्णमाला द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था।
        पुणिक साहित्यिक कार्यों के उदाहरणों में मागो के विषय को शामिल किया गया है, जो महान कुख्यातता के साथ एक पुणिक जनरल है, जिसने लड़ाई के दौरान किताबों के लेखन के माध्यम से कार्थेज के प्रभाव को उतना ही फैलाया।
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        रोमन सीनेट ने इतने कामों की सराहना की कि कार्थेज लेने के बाद, उन्होंने उन्हें बर्बर राजकुमारों को प्रस्तुत किया, जिनके पास पुस्तकालयों का स्वामित्व था।
        मैगो का काम ग्रीक में यूटिका के कैसियस डायनीसियस द्वारा अनुवादित किया गया था।
        लैटिन संस्करण का शायद ग्रीक संस्करण से अनुवाद किया गया था। साहित्य के पुणिक कार्यों के और उदाहरणों में हनो नेविगेटर के काम शामिल हैं, जिन्होंने अफ्रीका के आसपास नौसेना के दौरान और नई उपनिवेशों के निपटारे के दौरान अपने मुठभेड़ों के बारे में लिखा था।

        Punic का एक तीसरा संस्करण लैटिनो-Punic होगा, लैटिन वर्णमाला में लिखा एक Punic, लेकिन सभी वर्तनी उत्तर पश्चिमी अफ्रीकी उच्चारण का पक्ष लिया। लैटिनो-पुनीक को तीसरी और चौथी शताब्दी तक बोली जाती थी और सत्तर बरामद ग्रंथों में दर्ज की गई थी। रोमन शासन के तहत पुणिक का आश्चर्यजनक अस्तित्व इसलिए था क्योंकि बोलने वाले लोगों के पास रोम के साथ बहुत अधिक संपर्क नहीं था, और इसलिए लैटिन सीखने की आवश्यकता नहीं थी।
        सन्दर्भ तालिका -
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        लैटिनो- Punic ग्रंथों में पहली शताब्दी Zliten एलपी 1, या दूसरी शताब्दी Lepcis Magna एलपी 1 शामिल हैं। [ स्पष्टीकरण की आवश्यकता ] उन्हें चौथी शताब्दी के अंत में भी लिखा गया था, बीर एड-ड्रेडर एलपी 2 । शास्त्रीय स्रोत जैसे स्ट्रैबो (63/4 ईसा पूर्व - एडी 24), लिबिया के फोनीशियन विजय का जिक्र करते हैं।

        सलस्ट (86 - 34 ईसा पूर्व) के अनुसार 146 ईसा पूर्व के बाद पुणिक के हर रूप में परिवर्तन हुआ है, जो दावा करते हैं कि पुणिक को " न्यूमिडियन के साथ उनके विवाहों में बदल दिया गया था"। यह खाता पुणिक पर उत्तर-अफ्रीकी प्रभाव का सुझाव देने के लिए पाए गए अन्य सबूतों से सहमत है, जैसे यूनेबियस के ओनोमास्टिक में लिबिको-बर्बर नाम। [ संदिग्ध ] आखिरी ज्ञात साक्ष्य रिपोर्टिंग एक जीवित भाषा के रूप में Punic है हिप्पो के अगस्तिन (डी। 430) की है।
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        पणियों का देवता (ईश्वरीय सत्ता) वल
        का सेमैेटिक पुराणों में रूप -बाल ठीक से Ba'al , पुरातनता के दौरान Levant में बोली जाने वाली उत्तर पश्चिमी सेमेटिक भाषाओं में एक शीर्षक और सम्मानित अर्थ " भगवान " था। लोगों के बीच इसके उपयोग से, यह देवताओं पर लागू किया गया था।  विद्वानों ने पहले सौर संप्रदायों के साथ और विभिन्न असंबद्ध संरक्षक देवताओं के साथ नाम से जुड़ा हुआ था, लेकिन शिलालेखों से पता चला है कि बाल नाम विशेष रूप से तूफान और प्रजनन भगवान हदाद और उनके स्थानीय अभिव्यक्तियों से जुड़ा हुआ था। [8]

        Ba'al
        प्रजनन , मौसम , बारिश , हवा , बिजली , ऋतु , युद्ध , नाविकों के संरक्षक और समुद्री व्यापारियों के देवता , रेफाईम (पैतृक आत्माओं) के नेता
        बाद के विचार: देवताओं के राजा

        उगलिट के खंडहर में पाए गए थंडरबॉल्ट के साथ बाल का स्टील
        प्रतीक
        बुल , भेड़
        क्षेत्र
        कनान के पास और पास
        पास, आसपास और उगारिट में
        मिस्र (मध्य साम्राज्य)
        व्यक्तिगत जानकारी
        पत्नी के
        अनाट , अथतर्ट, आर्से, तलेय, पिड्रे
        माता-पिता
        डगन (सामान्य लोअर) एल  (कुछ उगारिटिक ग्रंथ)
        एक माँ की संताने
        Anat
        सदियों की अवधि में संकलित और क्यूरेटेड हिब्रू बाइबिल में विभिन्न लेवेंटाइन देवताओं के संदर्भ में शब्द का सामान्य उपयोग शामिल है, और आखिरकार हदाद की ओर इशारा करते हुए आवेदन, जिसे झूठे भगवान के रूप में अस्वीकार कर दिया गया था। उस प्रयोग को ईसाई धर्म और इस्लाम में ले जाया गया था, कभी-कभी दानव में बेल्जबूब के अपमानजनक रूप के तहत।

        एटिमोलॉजी -
        अंग्रेजी शब्द "बाल" की वर्तनी ग्रीक बाल ( Βάαλ ) से निकली है, जो नए नियम [9] और सेप्टुआजिंट , [10] में दिखाई देती है और इसके लैटिनयुक्त रूप बाल से , जो वल्गेट में दिखाई देती है। [10] ये रूप स्वर में कम-से-कम नॉर्थवेस्ट सेमेटिक फॉर्म बीएल से निकलते हैं। फोएनशियन देवता और झूठे देवताओं के रूप में शब्द की बाइबिल की  इंद्रियों को आम तौर पर प्रोटेस्टेंट सुधार के दौरान किसी भी मूर्तियों , संतों के प्रतीक , या कैथोलिक चर्च को दर्शाने के लिए बढ़ाया गया था। [11] इस तरह के संदर्भों में, यह anglicized उच्चारण का पालन करता है और आमतौर पर इसके दो As के बीच किसी भी निशान को छोड़ देता है। [1] सेमिटिक नाम के करीबी लिप्यंतरण में, आयन का प्रतिनिधित्व बाल के रूप में किया जाता है।

        नॉर्थवेस्ट सेमेटिक भाषाओं में - यूगारिटिक , फोएनशियन , हिब्रू , एमोरिट , और अरामासिक- शब्द बाल ने " मालिक " और विस्तार से, "भगवान", [10] एक "मास्टर" या "पति" का संकेत दिया। [12] [13] संज्ञेयों में अक्कडियन बेल्लू ( 𒂗 ), [सी] अम्हारिक बाल ( ባል ), [14] और अरबी बाल ( بعل ) शामिल हैं। बाल ( बेथेल ) और बाल अभी भी आधुनिक हिब्रू  और अरबी में "पति" के शब्दों के रूप में कार्य करते हैं। वे चीजों के स्वामित्व या गुणों के कब्जे से संबंधित कुछ संदर्भों में भी दिखाई देते हैं।

        स्त्री का रूप ba'alah है ( हिब्रू : בַּעֲלָה ; [15] अरबी : بعلة  ), जिसका अर्थ है मादा मालिक या घर की महिला [15] के अर्थ में "मालकिन" और अभी भी " पत्नी " के लिए दुर्लभ शब्द के रूप में सेवा करना । [16]

        प्रारंभिक आधुनिक छात्रवृत्ति में सुझावों में सेल्टिक भगवान बेलेनस के साथ तुलना भी शामिल है। [17]

        सेमिटिक धर्म -
        यह भी देखें: प्राचीन निकट पूर्व के धर्म , प्राचीन सेमिटिक धर्म , कनानी धर्म , और कार्थागिनी धर्म

        एक बाल का कांस्य मूर्ति, 14 वीं x 12 वीं शताब्दी ईसा पूर्व, फीनशियन तट के पास रस शमरा (प्राचीन उगारिट ) में पाया गया। Musée du Louvre ।
        जेनेरिक -
        यह भी देखें: बेल , ज़ीउस बेलोस , और बेलस नाम के अन्य आंकड़े
        सुमेरियन में एन की तरह, अक्कडियन बेल्लू और नॉर्थवेस्ट सेमिटिक बाल (साथ ही साथ इसकी स्त्री रूप बालाह ) मेसोपोटामियन और सेमिटिक पैंथियंस में विभिन्न देवताओं के शीर्षक के रूप में प्रयोग किया जाता था। केवल एक निश्चित लेख , जननांग या उपकला , या संदर्भ स्थापित कर सकता है कि कौन सा विशेष भगवान था। [18]

        हदाद -
        मुख्य लेख: हदाद और अदद
        बायल को तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व द्वारा उचित नाम के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था, जब वह अबू सलाबीख  में देवताओं की एक सूची में प्रकट होता है। [10] अधिकांश आधुनिक छात्रवृत्ति का दावा है कि यह बाल-आमतौर पर "भगवान" के रूप में प्रतिष्ठित है ( हे बहेल , हा बाल ) - तूफान और प्रजनन देवता हदाद के समान है; [10] [1 9] [12] यह बाल हडु के रूप में भी प्रकट होता है। [13] [20]विद्वानों ने प्रस्ताव दिया कि, हदाद की पंथ महत्त्व में बढ़ी है, इसलिए उसका सच्चा नाम किसी के लिए बहुत पवित्र माना गया है, लेकिन महायाजक जोर से बोलने के लिए और उपनाम "भगवान" ("बाल") था इसके बजाए, " बेल " का इस्तेमाल बाबुलियों के बीच मर्दुक और इस्राएलियों के बीच यहोवा के  लिए " अदोनी " के लिए किया गया था। एक अल्पसंख्यक प्रस्ताव करता है कि बाल एक देशी कनानी देवता था जिसकी पंथ की पहचान अदद के पहलुओं के साथ की गई थी या अवशोषित की गई थी। [10] पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक , उनके मूल संबंधों के बावजूद, दोनों अलग थे: हदाद की पूजा अरामियों और बाल ने फीनशियनों और अन्य कनानियों  द्वारा की थी। [10]

        एल -
        मुख्य: एल
        फोएनशियन बायल आमतौर पर एल या डगन के साथ पहचाना जाता है। [21]

        Ba'al बाल ( वैदिक -बल)
        Ba'al शिलालेखों में जीवित रहने के लिए अच्छी तरह से प्रमाणित है और लेवेंट [22] में अलौकिक नामों में लोकप्रिय था, लेकिन आमतौर पर अन्य देवताओं के साथ उनका उल्लेख किया जाता है, "कार्रवाई के अपने क्षेत्र को शायद ही कभी परिभाषित किया जा रहा है"। [23] फिर भी, उगारिटिक रिकॉर्ड उन्हें मौसम देवता के रूप में दिखाते हैं, विशेष रूप से बिजली , हवा , बारिश और प्रजनन क्षमता पर शक्ति। [23] [डी] क्षेत्र के सूखे गर्मियों को अंडरवर्ल्ड में बाल के समय के रूप में समझाया गया था और शरद ऋतु में उनकी वापसी ने तूफान का कारण बनने के लिए कहा था। [23] इस प्रकार, कनान में बालल की पूजा - जहां उन्होंने अंततः देवताओं के नेता और राजा के संरक्षक के रूप में एल को आपूर्ति की- मिस्र और मेसोपोटामिया के विपरीत, इसकी खेती के लिए वर्षा पर क्षेत्रों की निर्भरता से जुड़ा हुआ था, जो सिंचाई पर केंद्रित था उनकी प्रमुख नदियों से। फसलों और पेड़ों के लिए पानी की उपलब्धता के बारे में चिंता ने अपनी पंथ के महत्व को बढ़ाया, जिसने वर्षा देवता के रूप में अपनी भूमिका पर ध्यान केंद्रित किया। [12] युद्ध के दौरान उन्हें भी बुलाया गया था, जिसमें दिखाया गया था कि उन्हें मनुष्यों की दुनिया में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करने का विचार किया गया था, [23] एल के अधिक अलगाव के विपरीत। बालाबेक के लेबनानी शहर का नाम बाल के नाम पर रखा गया था। [26]

        उगारिट का बाल हदाद का प्रतीक था, लेकिन समय बीतने के बाद, यह सिद्धांत भगवान का नाम बन गया, जबकि हदाद महाकाव्य बन गया। [27] बायल को आमतौर पर दगान का पुत्र कहा जाता था, लेकिन यूगारिटिक स्रोतों में एल के पुत्रों में से एक के रूप में दिखाई देता है। [22] [13] [ई] बालाल और एल दोनों यगारिटिक ग्रंथों में बैल से जुड़े थे, क्योंकि यह ताकत और प्रजनन दोनों का प्रतीक था। [28] कुंवारी देवी ' अनाथ उसकी बहन थीं और कभी-कभी उसके माध्यम से एक बच्चे के साथ श्रेय दिया जाता था। [ उद्धरण वांछित ] उन्होंने सांपों के खिलाफ विशेष दुश्मन आयोजित किया, दोनों स्वयं और यमू के प्रतिनिधियों ( lit. "सागर"), कनानी समुद्र देवता और नदी देवता के रूप में । [2 9] उन्होंने टैनिन ( तुन्नानु ), "ट्विस्ट सर्प" ( बान'क्लटन ), " लिटन द फ्यूजिटिव सर्पेंट" ( लेट्टन बान ब्र , बाइबिल लीविथान ), [2 9] और " सात प्रमुखों के साथ ताकतवर " ( Šlyṭ D.šb't Rašm )। [30] [एफ] बाम के यमू के साथ संघर्ष अब आम तौर पर बाइबिल की पुस्तक डैनियल के 7 वें अध्याय में दर्ज दृष्टि के प्रोटोटाइप के रूप में माना जाता है। [32] समुद्र के विजेता के रूप में, बालल को कनानी और फोएनशियनों ने नाविकों और समुद्री व्यापारियों के संरक्षक के रूप में माना था। [2 9] मोना के विजेता के रूप में, कनानी मृत्यु देवता , उन्हें बाल रापूमा ( बीएल आरपीयू ) के नाम से जाना जाता था और विशेष रूप से सत्तारूढ़ राजवंशों के पूर्वजों, रेफैम ( आरपीयूएम ) के नेता के रूप में जाना जाता था। [29]

        कनान से, पूर्व साम्राज्य बीसीई में फोएनशियन उपनिवेशवाद  की लहरों के बाद, मध्य साम्राज्य और भूमध्यसागरीय इलाकों  में बाल की पूजा मिस्र में फैल गई। [22] उन्हें विभिन्न उपहासों के साथ वर्णित किया गया था और, यूगारिट को फिर से खोजने से पहले, यह माना जाता था कि इन्हें अलग-अलग स्थानीय देवताओं के लिए संदर्भित किया गया था। हालांकि, जैसा कि दिन द्वारा समझाया गया है, उगारिट के ग्रंथों से पता चला है कि उन्हें "विशेष देवता के स्थानीय अभिव्यक्तियों" के रूप में माना जाता था, जो रोमन कैथोलिक चर्च में वर्जिन मैरी के स्थानीय अभिव्यक्तियों के समान थे। " [1 9] उन शिलालेखों में, उन्हें अक्सर "विक्टोरियस बाल" ( अलीिन या आलिन बाल ) के रूप में वर्णित किया जाता है, [13] [10] "


        Phoenicia में


        सीथियन साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार पश्चिम एशिया एवं पूर्वी यूरोप में था
        एशिया माइनर / अनातोलिया के शास्त्रीय क्षेत्रों के भीतर फेनिशिया का स्थान

        फेनिशिया एक प्राचीन सेमिटिक सभ्यता थी जिसकी उत्पत्ति पूर्वी भूमध्य सागर और उपजाऊ वर्धमान के पश्चिम में हुई थी । उनकी सभ्यता प्राचीन ग्रीस के समान शहर-राज्यों में संगठित थी, जिनमें से सबसे उल्लेखनीय थे टायर , सिडोन , अरवाड , बेरिटस , बायब्लोस , त्रिपोलिस , एको या टॉलेमाइस और कार्थेज ।


        फेनिशिया का स्थान

        विद्वान आम तौर पर इस बात से सहमत हैं कि इसमें आज के लेबनान , उत्तरी इज़राइल और दक्षिणी सीरिया के तटीय क्षेत्र शामिल हैं जो उत्तर में अरवाड तक पहुँचते हैं, लेकिन इस बात पर कुछ विवाद है कि यह दक्षिण में कितनी दूर तक गया, सबसे दूर सुझाया गया क्षेत्र अश्कलोन है । [5] इसके उपनिवेश बाद में पश्चिमी भूमध्य सागर (विशेष रूप से कार्थेज) और यहां तक ​​कि अटलांटिक महासागर तक पहुंच गए। यह सभ्यता 1500 ईसा पूर्व से 300 ईसा पूर्व के बीच भूमध्य सागर में फैली थी ।

        शब्द-साधन(शब्द व्युत्पत्ति

        फोनीशियन नाम , लैटिन पोएनी (विशेषण पोएनिकस, बाद में प्यूनिकस) की तरह, ग्रीक Φοίνικες ( फोनिकेस ) से आया है। शब्द φοῖνιξ फ़ोनिक्स का अर्थ भिन्न-भिन्न रूप से " फोनीशियन व्यक्ति", "टायरियन पर्पल, क्रिमसन" या "खजूर" है और होमर में पहले से ही तीनों अर्थों के साथ प्रमाणित है । [6] (पौराणिक पक्षी फ़ीनिक्स का भी यही नाम है, लेकिन यह अर्थ सदियों बाद तक प्रमाणित नहीं हुआ है।) यह शब्द φόοινός phoinós "रक्त लाल" से लिया गया है, [7] स्वयं संभवतः φόνος फ़ोनोस "हत्या" से संबंधित है . यह पता लगाना मुश्किल है कि कौन सा अर्थ पहले आया, लेकिन यह समझ में आता है कि यूनानी कैसे थेखजूर और डाई के लाल या बैंगनी रंग का संबंध उन व्यापारियों से हो सकता है जो दोनों उत्पादों का व्यापार करते थे। रॉबर्ट एसपी बीकेस ने जातीय नाम की पूर्व-ग्रीक उत्पत्ति का सुझाव दिया है। [8] ग्रीक में शब्द का सबसे पुराना प्रमाणित रूप माइसेनियन पो-नी-की-जो , पो-नी-की हो सकता है , जो संभवतः मिस्र के fnḫw (फेनखु) से उधार लिया गया है। [9]

        फेनिशिया एक प्राचीन यूनानी शब्द है जिसका उपयोग क्षेत्र के प्रमुख निर्यात को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, म्यूरेक्स मोलस्क से टायरियन बैंगनी रंगे कपड़े, और प्रमुख कनानी बंदरगाह कस्बों को संदर्भित किया जाता है; समग्र रूप से फोनीशियन संस्कृति के अनुरूप नहीं है क्योंकि इसे मूल रूप से समझा गया होगा। उनकी सभ्यता प्राचीन ग्रीस के समान शहर-राज्यों में संगठित थी , [28] शायद उनमें से सबसे उल्लेखनीय थे टायर , सिडोन , अर्वाड , बेरिटस , बायब्लोस और कार्थेज । [29]प्रत्येक शहर-राज्य एक राजनीतिक रूप से स्वतंत्र इकाई थी, और यह अनिश्चित है कि फोनीशियन किस हद तक खुद को एक राष्ट्रीयता के रूप में देखते थे। पुरातत्व, भाषा, जीवनशैली और धर्म के संदर्भ में फोनीशियनों को अलग करने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि वे लेवांत के अन्य निवासियों, जैसे उनके करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों, इज़राइलियों से स्पष्ट रूप से भिन्न थे। [30]

        लगभग 1050 ईसा पूर्व, फोनीशियन भाषा लिखने के लिए फोनीशियन वर्णमाला का उपयोग किया जाता था। [31] यह सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली लेखन प्रणालियों में से एक बन गई, जिसे फोनीशियन व्यापारियों ने भूमध्यसागरीय दुनिया भर में फैलाया, जहां यह विकसित हुई और कई अन्य संस्कृतियों द्वारा इसे आत्मसात किय

        अगाथोकल्स ( लगभग  180 ईसा पूर्व ) के सिक्के में ब्राह्मी लिपि और भारत के कई देवताओं को शामिल किया गया था, जिनकी व्याख्या विष्णु , शिव , वासुदेव , बलराम या बुद्ध के रूप में की गई है । [9] [10]

        1. ज़ीउस देवी हेकेट के साथ खड़ा है । [11] ग्रीक: "किंग अगाथोकल्स"।
        2. देवता सिर पर आयतन के साथ एक लंबा हेमेशन पहने हुए, हाथ आंशिक रूप से मुड़े हुए और कॉन्ट्रापोस्टो मुद्रा में हैं। ग्रीक: "राजा अगाथोकल्स"। [11] यह सिक्का कांसे का है । [12]
        3. हिंदू भगवान बलराम - गुणों के साथ संकर्षण । ग्रीक: "राजा अगाथोकल्स"। [13]
        4. हिंदू भगवान वासुदेव - गुणों के साथ कृष्ण । [13] ब्राह्मी : "राजने अगाथुक्लेयासा", "राजा अगाथोकलेस"।

        5. देवी लक्ष्मी , अपने दाहिने हाथ में कमल धारण करती हैं। [14] ब्राह्मी : "राजने अगाथुक्लेयासा", "राजा अगाथोकलेस"।

        1880 में, इसी तरह का एक सिक्का अगाथोकल्स द्वारा चलाया गया था, लेकिन फिलिप के बेटे अलेक्जेंडर की "स्मृति" में ब्रिटिश संग्रहालय के पर्सी गार्ंडर द्वारा प्रकाशित किया गया था। [4] अगाथोकल्स के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का उप-राजा बनना असंभव था जिसने लगभग दो सौ साल पहले शासन किया था, ड्रॉयसन के स्पष्टीकरण को सैलेट के पक्ष में सरसरी तौर पर खारिज कर दिया गया था। [4] [ई] गार्डनर ने प्रस्तावित किया कि ये सिक्के यूक्रेटाइड्स प्रथम द्वारा (अंततः सफल) चुनौती की पूर्व संध्या पर अपनी जनता को बढ़ाने के लिए जारी किए गए थे । [15] 1900 के मध्य की शुरुआत में, ह्यूग रॉविन्सन और विलियम टार्नएक भव्य हेलेनिस्टिक अतीत के अपने दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए गार्डनर के विचारों का विस्तार करेगा जहां अगाथोकल्स ने अपनी वंशावली को नकली बना दिया था और यूक्रेटाइड्स I सेल्यूसिड नियंत्रण को फिर से स्थापित करने के लिए एंटिओकस IV के आदेशों का पालन कर रहा था । [16] [15] अन्य विद्वान आम तौर पर इन "पूर्वज सिक्कों" को बहुत अधिक महत्व देने से बचते हैं। [17]

        इन सिक्कों की और भी किस्में बाद में खोजी जाएंगी। [4] इनमें डायोडोटस द्वितीय , डेमेट्रियस द्वितीय और डेमेट्रियस का उल्लेख है । [4] [6] [18] [17] पिछले कुछ दशकों में, ऐसे सिक्के अधिक संख्या में खोजे गए हैं लेकिन इन सिक्कों की सटीकता इस तथ्य से प्रभावित है कि ये नियंत्रित उत्खनन से नहीं बल्कि नीलामी नेटवर्क से आए थे। [4] महाद्वीपों की यात्रा करने और कई हाथों से गुजरने के बाद ही विद्वानों द्वारा उनका मूल्यांकन किया गया। [4]

        तब से यह स्वीकार कर लिया गया है कि ये सिक्के वास्तव में अगाथोकल्स के पूर्ववर्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। [19] ढलाई और महत्व का सटीक संदर्भ अभी भी स्पष्ट नहीं है। [6]


        भारत देवताओं के साथ अगाथोकल्स का सिक्का ।
        ओबीवी बलराम - ग्रीक किंवदंती के साथ संकर्षण : ΒΑΣΙΛΕΩΣ ΑΓΑΘΟΚΛΕΟΥΣ ( बेसिलोस अगाथोक्लिअस )। ब्राह्मी कथा के साथ
        रेव वासुदेव-कृष्ण :𑀭𑀚𑀦𑁂 𑀅𑀕𑀣𑀼𑀼𑀓𑁆𑀮𑁂𑀬𑁂𑀲 राजने अगाथुक्लेसा "राजा अगाथोकल्स"।

        3 अक्टूबर 1970 को, फ्रांसीसी पुरातत्वविदों की एक टीम द्वारा एक तीर्थयात्री के पानी के जहाज से ऐ-खानौम के प्रशासनिक क्वार्टर में छह भारतीय-मानक चांदी के ड्रैकमास की खोज की गई थी। [26] ये सिक्के वैदिक देवताओं का पहला मुद्राशास्त्रीय प्रतिनिधित्व हैं और प्रारंभिक भारत में भगवतीवाद के वैष्णववाद का पहला रूप होने के प्रमुख साक्ष्य के रूप में काम करते हैं। [27] [28]

        सिक्के विष्णु के शुरुआती अवतारों को प्रदर्शित करते हैं : बलराम - संकर्षण , पीछे मूसल और हल की विशेषताओं के साथ , और वासुदेव - कृष्ण , सामने शंख और सुदर्शन चक्र की विशेषताओं के साथ । [27] [28] [जी] सिक्कों के आधार पर भारतीय मूर्तिकला के विशिष्ट ट्रेडमार्क - तीन-चौथाई के विपरीत ललाट मुद्रा, पर्दों में कठोर और स्टार्चयुक्त सिलवटें, अनुपात की अनुपस्थिति, और पैरों का बग़ल में स्वभाव - ऑडोइन और बर्नार्ड ने अनुमान लगाया कि नक्काशी भारतीय कलाकारों द्वारा की गई थी। [27]बोपेराच्ची निष्कर्ष पर विवाद करते हैं और वासुदेव-कृष्ण के छत्र के साथ टोपी और ऊंची गर्दन वाले फूलदान के साथ शंख के गलत चित्रण की ओर इशारा करते हैं ; उनका अनुमान है कि एक यूनानी कलाकार ने अब लुप्त हो चुकी (या अनदेखी) मूर्ति से सिक्का उकेरा था। [27]

        अगाथोकल्स के कुछ कांस्य सिक्कों के अग्रभाग पर पाई गई एक नाचती हुई लड़की को सुभद्रा का प्रतिनिधित्व माना जाता है । [27]

        साइन्स जर्नी चैनल का यूट्यूबर  कृष्ण शब्द को पाली  और प्राकृत भाषाओं में  नही   मानता है जबकि वेद शब्द भारोपीय होने अनेक भाषाओ में  है जिसका कुछ विवरण नीचे है।

        प्राकृत- में कृष्ण का रूप (काण्ह) है और पाली की पूर्व लिपि ब्राह्मी थी  ।

        बौद्ध ग्रन्थ तो महावीर स्वामी का वर्ण निगंठ ( निर्ग्रन्थ तथा ज्ञान पुत्र के रूप में वर्णन करते हैं 

         परन्तु जैन ग्रन्थों में किसी भी बुद्ध का वर्णन नहीं है। अत: जैन धर्म बौद्ध धर्म से पुराना  है ।

        सत्य तो यही है कि कृष्ण को ऋग्वेद
        में असुर अर्थात् अदेव कहा है ।
        --- जो यमुना की तलहटी में इन्द्र से युद्ध करते हैं 
        मोहनजोदाड़ो सभ्यता के विषय में 1929 में हुई खोज के अनुसार पुरातत्व वेत्ता मैके द्वारा मोहनजोदाड़ो में हुए उत्खनन में एक पुरातन टैबलेट (भित्तिचित्र) मिला है।
        जिसमें दो वृक्षों के बीच खड़े एक बच्चे का चित्र बना हुआ था ।
        जो भागवत आदि पुराणों के कृष्ण से सम्बद्ध थे।
        पुराणों में लिखे कृष्ण द्वारा यमलार्जुन के उद्धार की कथा की ओर ले जाता है। पुराणों का सृजन बुद्ध के परवर्ती काल में हुआ । और कृष्ण की कथाऐं इससे भी ---पुरानी हैं ।

        अथर्ववेद-(20/137/7)
        ऋषिः - तिरश्चीराङ्गिरसो द्युतानो वा
        देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् । सूक्तम् - (१३७)
        "अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः। आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥
        (इयानः) चलता हुआ (अंशुमतीम्) विभागवाली [सीमावाली नदी-म० ८]  पर (अव अतिष्ठत्) ठहरा है। (नृमणाः) नरों के समान मनवाले (इन्द्रः) इन्द्र  ने (तम् धमन्तम्) उस हाँफते हुए को (शच्या) शचि के साथ  (आवत्)-
        लङ्(अनद्यतन भूत)
        एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
        प्रथमपुरुषःआवत्=युद्ध किया 
         युद्ध किया  और (स्नेहितीः) स्नेहयुक्त (अप अधत्त) हटा लिया है ॥७॥
        टिप्पणी:-
         (धमन्तम्) उच्छ्वसन्तम्। पराभवेन दीर्घं श्वसन्तम् (स्नेहितीः) स्नेहतिः स्नेहतिर्वधकर्मा-निघ० २।१९। स्वकीया मारणशीलाः सेनाः (नृमणाः) नेतृतुल्यमनस्कः (अप अधत्त) दूरे धारितवान् निवर्तितवान् ॥

        ऋग्वेद प्रथम एवम् अष्टम मण्डल में कृष्ण का वर्णन सायण भाष्य सहित

        ऋग्वेदः सूक्तं १.१०१
        कुत्स आङ्गिरसः
        दे. इन्द्रः( १ गर्भस्राविण्युपनिषद्)। जगती, ८-११ त्रिष्टुप्

        "प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना।                                    अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥१॥

        यो व्यंसं जाहृषाणेन मन्युना यः शम्बरं यो अहन्पिप्रुमव्रतम्।                                         इन्द्रो यः शुष्णमशुषं न्यावृणङ्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥२॥

        यस्य द्यावापृथिवी पौंस्यं महद्यस्य व्रते वरुणो यस्य सूर्यः ।                                              यस्येन्द्रस्य सिन्धवः सश्चति व्रतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥३॥
        सामवेदः -कौथुमीया/संहिता -ग्रामगेयः-प्रपाठकः १०-वैरूपम्

        सामवेदः‎ - कौथुमीया‎ - संहिता‎ - ग्रामगेयः‎ - प्रपाठकः १०
        :32
        वैरूपम्.

        वैरूपम्.
        प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना ।
        अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हुवेमहि ।। ३८० ।। तथा  ऋग्वेद १/१०१/१

        (३८०।१) ।। वैरूपम् । विरूपो जगतीन्द्रो मरुत्त्वान्।
        प्रमंदाऽ२३४इने ।। पितुमदाऽ३र्च्चाऽ३तावचः । यःकाऽ३ओऽ२३४वा ।
        कृष्णगर्भानिरहन्नृजिश्वनाऽ३ । अवस्याऽ२३४वाः। वृषणंवा । ज्रादक्षाऽ२३४इणाम् ।
        मारौवाओऽ२३४वा ।। त्वन्तꣳसख्यायहुवाऽ५इमहाउ ।। वा ।।
        ( दी ३ । प० १० । मा० ९ )२३ ( णो । ६५१)

        द्र. पञ्चनिधनं वैरूपम्
        वैरूपोपरि वैदिकसंदर्भाः

        अस्मिन् जगति अस्माकं इन्द्रियाणि यत्किंचित् संवेदनं प्राप्नुवन्ति, तत् सर्वं असत्यं तु नैवास्ति, किन्तु विरूपितं अवश्यमस्ति। यदा वयं वैराजपदं प्राप्नुवन्ति, तदा अस्माकं दृष्टिः सत्यस्य दर्शने समर्था भवति।"
        ________
        यो अश्वानां यो गवां गोपतिर्वशी य आरितः कर्मणिकर्मणि स्थिरः।                        वीळोश्चिदिन्द्रो यो असुन्वतो वधो मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥४॥
        ___________

        यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्यो ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्दत् ।  इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥५॥

        यः शूरेभिर्हव्यो यश्च भीरुभिर्यो धावद्भिर्हूयते यश्च जिग्युभिः ।                                                इन्द्रं यं विश्वा भुवनाभि संदधुर्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥६॥

        रुद्राणामेति प्रदिशा विचक्षणो रुद्रेभिर्योषा तनुते पृथु ज्रयः ।                                                इन्द्रं मनीषा अभ्यर्चति श्रुतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥७॥

        यद्वा मरुत्वःपरमे सधस्थे यद्वावमे वृजने मादयासे।अत आ याह्यध्वरं नो अच्छा त्वाया हविश्चकृमा सत्यराधः ॥८॥

        त्वायेन्द्र सोमं सुषुमा सुदक्ष त्वाया हविश्चकृमा ब्रह्मवाहः।                                                अधा नियुत्वः सगणो मरुद्भिरस्मिन्यज्ञे बर्हिषि मादयस्व ॥९॥

        मादयस्व हरिभिर्ये त इन्द्र विष्यस्व शिप्रे वि सृजस्व धेने ।                                              आ त्वा सुशिप्र हरयो वहन्तूशन्हव्यानि प्रति नो जुषस्व ॥१०॥

        मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा वयमिन्द्रेण सनुयाम वाजम् ।                                                  तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥११॥

        {सायण-भास्यम्}
        प्र मन्दिने' इति एकादशर्चमष्टमं सूक्तमाङ्गिरसस्य कुत्सस्यार्षम् । अष्टम्याद्याश्चतस्रस्त्रिष्टुभः शिष्टाः सप्त जगत्यः । इन्द्रो देवता । तथा चानुक्रान्तं - ' प्रमन्दिन एकादश कुत्स आद्या गर्भस्राविण्युपनिषच्चतुस्त्रिष्टुबन्तम्' इति । दशरात्रस्य नवमेऽहनि मरुत्वतीये एतत्सूक्तम् । विश्वजितः' इति खण्डे सूत्रितं- ‘प्र मन्दिन इमा उ त्वेति मरुत्वतीयम्' (आश्व. श्रौ. ८.७.) इति ॥
        ____________________
        प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना।                                    अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥१॥
        अर्थ-
        अच्छी प्रकार से  इन्द्र और उसके सखा राजा  ऋजिश्वन् की  स्तुति करने वाले के लिए यह निर्देश है कि वे उनकी अन्न से पूरित हवि आदि से अर्चना करते हुए  ऐसे वचनों से कहें कि वे इन्द्र मरुतगण जिनके सखा है और जिन इन्द्र ने दाहिने हाथ में वज्र धारण करते हुए कृष्ण के द्वारा गर्भिताओं का वध कर दिया था ;रक्षा के इच्छुक हम सब उन शक्ति शाली इन्द्र का ही आह्वान करते हैं । 

        विशेष=असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है । अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद नहीं  होकर अदेव पद है ।
        ____
          . १०९-११५ ) । एतदनार्षत्वेनानादरणीयं भवति । एषोऽर्थः क्रमेणर्क्षु वक्ष्यते । तथा चास्या ऋचोsयमर्थः । 1“द्रप्सः =। द्रुतं सरति गच्छतीति द्रप्सः । पृषोदरादिः । द्रुतं गच्छन् "दशभिः “सहसैः दशसहस्रसंख्यैरसुरैः “इयानः= “कृष्णः एतन्नामकोऽसुरः "अंशुमतीं नाम नदीम् “अव “अतिष्ठत् =अवतिष्ठते । ततः 2-“शच्या= कर्मणा प्रज्ञानेन वा 3-“धमन्तम्= उदकस्यान्तरुच्छ्वसन्तं यद्वा जगद्भीतिकरं शब्दं कुर्वन्तं “तं =कृष्णमसुरम् “इन्द्रः मरुद्भिः सह 5-“आवत् =प्राप्नोत् । पश्चात्तं कृष्णमसुरं तस्यानुचरांश्च हतवानिति वदति । “नृमणाः नृषु मनो यस्य सः । यद्वा । कर्मनेतृष्वृत्विक्ष्वेकविधं मनो यस्य स तथोक्तः । तादृशः सन् “स्नेहितीः । स्नेहतिर्वधकर्मसु पठितः । सर्वस्य हिंसित्रीस्तस्य सेनाः “अप “अधत्त ।6- अपधानं =हननम् । अवधीदित्यर्थः । ‘ अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' (सा. सं. १. ४. १.४.१) इति छन्दोगाः पठन्ति । तस्यानुचरान् हत्वा तं द्रुतं गच्छन्तमसुरमपाधत्त । हतवान् ॥
        _________________
        "द्र॒प्सम॑पश्यं॒ विषु॑णे॒ चर॑न्तमुपह्व॒रे न॒द्यो॑ अंशुमत्या:।
        नभो॒ न कृ॒ष्णम॑वतस्थि॒वांस॒मिष्या॑मि वो वृषणो॒ युध्य॑ता॒जौ ॥१४
        द्रप्सम् । अपश्यम् । विषुणे । चरन्तम् । उपऽह्वरे । नद्यः । अंशुऽमत्याः ।
        नभः । न । कृष्णम् । अवतस्थिऽवांसम् । इष्यामि । वः । वृषणः । युध्यत । आजौ ॥१४

        तुरीयपादो मारुतः । मरुतः प्रति यद्वाक्यमिन्द्र उवाच तदत्र कीर्त्यते । हे मरुतः “द्रप्सं द्रुतगामिनं कृष्णमहम् “अपश्यम् =अदर्शम् । कुत्र वर्तमानम् । “विषुणे= विष्वगञ्चने सर्वतो विस्तृते देशे । यद्वा । विषुणो विषमः । विषमे परैरदृश्ये गुहारूपे देशे। “चरन्तं =परितो गच्छन्तम् । किंच “अंशुमत्याः एतन्नामिकायाः “नद्यः =नद्याः “उपह्वरे= अत्यन्तं गूढे स्थाने “नभो “न नभसि यथादित्यो दीप्यते तद्वत्तत्र दीप्यमानम् “अवतस्थिवांसम् उदकस्यान्तरवस्थितं “कृष्णम् एतन्नामकमसुरमपश्यम् । तस्मिन् दृष्टे सति हे “वृषणः कामानामुदकानां वा सेक्तारो मरुतः “वः युष्मान् युद्धार्थम् “इष्यामि अहमिच्छामि । ततो यूयं तमिमं कृष्णम् "आजौ । अजन्ति गच्छन्त्यत्र योद्धार आयुधानि प्रक्षेपयन्तीति वाजिः संग्रामः । तस्मिन् "युध्यत संहरत । वाक्यभेदादनिघातः । केचित् इष्यामि वो मरुतः इति पठन्ति । तत्र हे मरुतः वो युष्मानिच्छामीत्यर्थो भवति ॥

        अध॑ द्र॒प्सो अं॑शु॒मत्या॑ उ॒पस्थेऽधा॑रयत्त॒न्वं॑ तित्विषा॒णः।विशो॒ अदे॑वीर॒भ्या॒३॒॑चर॑न्ती॒र्बृह॒स्पति॑ना यु॒जेन्द्र: ससाहे ॥१५।

        अध । द्रप्सः । अंशुऽमत्याः । उपऽस्थे । अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः ।
        विशः। अदेवीः ।अभि। आऽचरन्तीः ।बृहस्पतिना । युजा । इन्द्रः । ससहे ॥१५।

        1-“अध= अथ 2-“द्रप्सः =द्रुतगामी कृष्णः 3-“अंशुमत्याः= नद्याः 4-“उपस्थे =समीपे 5-“तित्विषाणः= दीप्यमानः सन् 6-“तन्वम् =आत्मीयं शरीरम् 7-“अधारयत् । =परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन 8-“युजा= सहायेन 9-“अदेवीः =अद्योतमानाः । कृष्णरूपा इत्यर्थः । यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । 10-“आचरन्तीः= आगच्छन्तीः 11-“विशः= असुरसेनाः "अभि 12-"ससहे =जघान । तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ॥ ३४ ॥ 

        त्वं ह॒ त्यत्स॒प्तभ्यो॒ जाय॑मानोऽश॒त्रुभ्यो॑ अभव॒ः शत्रु॑रिन्द्र ।
        गू॒ळ्हे द्यावा॑पृथि॒वी अन्व॑विन्दो विभु॒मद्भ्यो॒ भुव॑नेभ्यो॒ रणं॑ धाः ॥१६
        पद पाठ:-
        त्वम् । ह । त्यत् । सप्तऽभ्यः । जायमानः । अशत्रुऽभ्यः । अभवः । शत्रुः । इन्द्र ।
        गूळ्हे इति । द्यावापृथिवी इति । अनु । अविन्दः । विभुमत्ऽभ्यः । भुवनेभ्यः । रणम् । धाः ॥१६

        हे “इन्द्र “त्वं खलु “त्यत् तत् कर्म कृतवानसि। किं तत् उच्यते । "जायमानः त्वं प्रादुर्भवन्नेव । “अशत्रुभ्यः स्तुरहितेभ्यः “सप्तभ्यः कृष्णवृत्रनमुचिशम्बरादिसप्तभ्यो बलवद्भ्यः शत्रुभ्यः तदर्थं “शत्रुः “अभवः । यद्वा । सप्तभ्यः । ससैवाङ्गिरसः । सप्तभ्योङ्गिरोभ्यो गवानयनार्थं प्रादुर्भवन्नेवाशत्रुभ्यो बलवद्भ्यः पणिभ्यः शत्रुरभवः । किंच हे इन्द्र त्वं “गूळ्हे तमसा गूढे संवृते “द्यावापृथिवी द्यावापृथिव्यौ सूर्यात्मना ते प्रकाश्यानुक्रमेण "अविन्दः अलभथाः । तथा “विभुमद्भ्यः महत्त्वयुक्तेभ्यः "भुवनेभ्यः लोकेभ्यः "रणं रमणं “धाः धारयसि । विदधासीत्यर्थः ॥
        _________________________

        drip (v.)
        c. 1300, drippen, "to fall in drops; let fall in drops," from Old English drypan, also dryppan, from Proto-Germanic *drupjanan (source also of Old Norse dreypa, Middle Danish drippe, Dutch druipen, Old High German troufen, German triefen), perhaps from a PIE root *dhreu-. Related to droop and drop. Related: Dripped; dripping.

        drip (n.)
        mid-15c., drippe, "a drop of liquid," from drip (v.). From 1660s as "a falling or letting fall in drops." Medical sense of "continuous slow introduction of fluid into the body" is by 1933. The slang meaning "stupid, feeble, or dull person" is by 1932, perhaps from earlier American English slang sense "nonsense" (by 1919).

        विषुण-अनेक रूप का। बहुरूपी। २. सर्वग। सर्वगत। ३. विप्रकीर्ण। बिखरा हुआ। ४. पराङमुख [को०]।


        "अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
        आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥
        द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
        नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥
        अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
        विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
        _______________________________________
        क्रमशः उपर्युक्त तीनों ऋचाओं का पदपाठ-

        "अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
        आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥

        पद का अन्वय= अव । द्रप्सः । अंशुऽमतीम् । अतिष्ठत् । इयानः । कृष्णः । दशऽभिः । सहस्रैः ।आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नेहितीः । नृऽमनाः । अधत्त ॥१३।

        शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण-                १-अव= तुम रक्षा करो लोट्लकर  मध्यम पुरुष एकवचन।
        २-द्रप्स:= जल से द्रप्स् का पञ्चमी एकवचन यहाँ करण कारक के रूप में  ।
        ३- अंशुमतीम् = यमुनाम्  –यमुना को अथवा यमुना के पास द्वितीया यहाँ करण कारक के रूप में ।
        ४-अवतिष्ठत् =  अव उपसर्ग पूर्वक (स्था धातु का तिष्ठ आदेश  लङ्लकार रूप)  स्थित हुए।
        ५- इन्द्र: शच्या -स्वपत्न्या= इन्द्र: पद में प्रथमा विभक्ति एकवचन कर्ता करक  तथा शच्या में शचि के तृत्तीया विभक्ति करणकारक का रूप शचि इन्द्र: की पत्नी का नाम है।।
         ६-धमन्तं= अग्निसंयोगम् कुर्वन्तं  कोलाहलकुर्वन्तंवा। चमकते हुए को अथवा हल्ला करते हुए को।  (ध्मा धातु का धम आदेश तथा +शतृ(अत्) प्रत्यय कर्मणि द्वित्तीया का रूप  एक वचन धमन्तं कृष्ण का विशेषण है  ।
        ७-अप स्नेहिती: = जल में भीगते हुए का।
        ८-नृमणां( धनानां) 
        ९-अधत्त= उपहार या धन दिया ।(डुधाञ् (धा)=दानधारणयोर्लङ्लकारे आत्मनेपदीय अन्यपुरुषएकवचने) 

        विशेषटिप्पणी-
        १०-अव्=१- रक्षण २-गति ३-कान्ति ४-प्रीति ५-तृप्ति ६-अवगम ७-प्रवेश ८-श्रवण ९- स्वाम्यर्थ १०-याचन ११-क्रिया। १२ -इच्छा १३- दीप्ति १४-अवाप्ति १५-आलिङ्गन १६-हिंसा १७-दान  १८-वृद्धिषु।                
        ११-अव् – एक परस्मैपदीय धातु है और धातुपाठ में इसके अनेक अर्थ हैं । प्रकरण के अनुरूप अर्थ ग्रहण करना चाहिए ।
        प्रथम पुरुष एक वचन का लङ् लकार(अनद्यतन भूूूतकाल का रूप।
        आवत् =प्राप्त किया । 
        हिन्दी अर्थ- हे कृष्ण आप यमुना के तट पर स्थित इस जल के रक्षा करने वाले हैं आप इसकी रक्षा करो ! कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं। इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि के साथ अग्नि से संयोजित होते हुए अर्थात् दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया  और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप  धन दिया।
        भाष्य-
        कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै: परिवृत: सन्  अँशुमतीनामधेयाया नद्या:  यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं  तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये   स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।

        हिन्दी अनुवाद- कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं अशुमती अथवा यमुना के तट पर स्थित कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उस गोप कृष्ण को यमुना नदी के जल में स्थित देखा।
        ________________________________
        द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
        नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥

        पद का अन्वय= द्र॒प्सम् । अ॒प॒श्य॒म् । विषु॑णे । चर॑न्तम् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । न॒द्यः॑ । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ ।

        नभः॑ । न । कृ॒ष्णम् । अ॒व॒त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । इष्या॑मि । वः॒ । वृ॒ष॒णः॒ । युध्य॑त । आ॒जौ ॥१४।।

        हिन्दी अर्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए बैल अथवा साँड़ को भी देखा  और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं चाहूगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़  कृष्ण को संग्राम में युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं चाहूँगा। जहाँ जल और- ( नभ) बादल भी न हो 
        (अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह इच्छा करता है )
        _______________    

        शब्दार्थ व्याकरणिक विश्लेषण-
        १-द्र॒प्सम्= जल को कर्मकारक द्वित्तीया।अपश्यम्=अदर्शम्  दृश् धातु का लङ्लकार  (सामान्य भूतकाल ) क्रिया पदरूप  - मैंने देखा ।__________________

        २- वि + सवन(‌सुन) रूप विषुण -(विभिन्न रूप)।   षु (सु)= प्रसवऐश्वर्ययोः - परस्समैपदीय सवति सोता [ कर्मणि- ]  सुषुवे सुतः सवनः सवः अदादौ (234) सौति स्वादौ षुञ् अभिषवे (51) सुनोति (911) सूनुः, पुं, (सूयते इति । सू + “सुवः कित् ।” उणादिसूत्र्र ३।३५। इति (न:) स:च कित् )

        पुत्त्रः । (यथा, रघुः । १ । ९५ ।
        “सूनुः =सुनृतवाक् स्रष्टुः विससर्ज्जोदितश्रियम् ) अनुजः । सूर्य्यः । इति मेदिनी ॥ अर्कवृक्षः । इत्यमरः कोश ॥
        षत्व विधान सन्धि :-"विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद 'कु(कखगघड•)    'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न  कोई  स्वर जैैैसे इ उ आदि हो अथवा 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्'  के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।

        शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु। हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु । मातृ + सु = मातृषु ।परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 

        परन्तु अ' आ 'स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु । वि+सम=विषम । वि+सुन =विषुण अथवा विष्+ उणप्रत्यय=विषुण।__________________________

        विषुण-विभिन्न रूपी।
        ३-वृ॒ष॒णश्चर॑न्तम्=  चरते हुए साँड  को।
        ४-आजौ =  संग्रामे  युद्ध में।
        ५-अ॒व॒ = उपसर्ग
        ६- त॒स्थि॒ऽवांस॑म्= तस्थिवस् शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप तस्थिवांसम् है । तस्थिवस्=  स्था--क्वसु  स्थितवति (स्थिर) अडिग अथवा जो एक ही स्थान पर खड़ा होते हुए में।
        ७-व:= युष्मान् - तुम सबको ।  युष्मभ्यम् ।  युष्माकम् । यष्मच्छब्दस्य द्बितीया चतुर्थी षष्ठी बहुवचनान्तरूपोऽयम् इति व्याकरणम् ॥
        ८-उपह्वरे= निर्जन देशे।
        ९-वृ॒ष॒णः॒ = साँड ने ।
        १०-युध्य॑त= युद्ध करते हुए।
        ११-आजौ= युद्ध में ।
        १२-इष्या॑मि= मैं इच्छा करुँगा।
        ___________________________________

        अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
        विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
        ______________
        अर्थ-कृष्ण ने अंशुमती के जल के नीचे अपने दैदीप्यमान शरीर को अशुमती की गोद में धारण किया  जो इनके गोपों - विशों (गोपालन आदि करने वाले -वैश्यवृत्ति सम्पन्न) थे ।  चारो ओर चलती हुई गायों के साथ रहने वाले गोपों को इन्द्र ने बृहस्पति की  सहायता से दमन किया ।
        पदपाठ-विच्छेदन :-
        । द्रप्स:। अंशुऽमत्याः। उपऽस्थे ।अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः। विशः। अदेवीः ।अभि । आऽचरन्तीः। बृहस्पतिना। युजा । इन्द्रः। ससहे॥१५।
        “अध =अथ अधो वा “द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु: “अंशुमत्याः= यमुनाया: नद्याः“(उपस्थे=समीपे “(  त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे  तित्विषाणः= दीप्यमानः)( सन् =भवन् ) “(तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम्) “(अधारयत्  = शरीर धारण किया)। परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन “अदेवीः = देवानाम्  ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः । 
        यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः “विशः=गोपालका:"अभि "ससहे षह्(सह्) लिट्लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) । शक्यार्थे - चारो और से सख्ती की ।
         सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति शक्तावुपेक्षायाञ्च उदाहृतं तमधिचक्रे इति (7) 22  तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ॥ ॥ ३४ ॥ 

        ऋग्वेद २/१४/७ में भी सायण ने "उपस्थ' का अर्थ उत्संग( गोद) ही किया है । जैसे 
        अध्वर्यवो यः शतमा सहस्रं भूम्या उपस्थेऽवपज्जघन्वान् ।
        कुत्सस्यायोरतिथिग्वस्य वीरान्न्यावृणग्भरता सोममस्मै ॥७॥देखे 

        हे अध्वर्यवो जघन्वान् पूर्वं शत्रून् हतवान् य इंद्रः शतं सहस्रमसुरान् भूम्या उपस्थ उत्संगेऽवपत् । एकैकेन प्रकारेणापातयत् । किंच यः कुत्सस्यैतन्नामकस्य राजर्षेः । आयोः पौरूरवसस्य राजर्षेः। अतिथिग्वस्य दिवोदासस्य । एतेषां त्रयाणां वीरानभिगंतॄन्प्रति द्वंद्विनः शुष्णादीनसुरान् न्यवृणक् । वृणक्तिर्हिंसाकर्मा । अवधीत् । तथा च मंत्रवर्णः । त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारंधयोऽतिथिग्वाय शंबरं ।१. ५१. ६.। इति । तादृशायेंद्राय सोमं भरत ॥
         
        तस्मिन्स रमते देवः स्त्रीभिः परिवृतस्तदा ।
        हारनूपुरकेयूररशनाद्यैर्विभूषणैः।1.73.२०।

        १-तस्मिन् -उसमें ।
         २-रमते लट्लकार अन्य पुरुष एक वचन - क्रीडा करते हैं रमण करते हैं । रम्=क्रीडायाम्
        ३-देव:(प्रथमा विभक्ति एक वचन कर्ताकारक।
        स्त्रीभि:=  तृतीया विभक्ति करण कारक बहुवचन रूप स्त्रीयों के साथ।
        परिवृत:= चारों ओर से घिरे हुए।

        हारनूपुरकेयूररशना आद्यै: तृतीया विभक्ति वहुवचन = हार नूपुर(घँघुरू) केयूर(बाँह में पहनने का एक आभूषण  ,बिजायठ  बजुल्ला ,अंगद , बहुँठा अथवा भुजबंद भी जिसकी हिन्दी नाम हैं  आदि के द्वारा । 
        तदा= तस्मिन् काले -उस समय में।
        भूषितानां वरस्त्रीणां चार्वङ्गीनां विशेषतः ।
        ताभिः सम्पीयते पानं शुभगन्धान्वितं शुभम् । २१।
        भूषितानां= भूषण पहने हुओं का (षष्ठी वहुवचन रूप सम्बन्ध बोधक रूप)
        वरस्त्रीणां=श्रेष्ठ स्त्रीयों का ।
        चारु=सुन्दर । अङ्गीनाम्= अंगों वाली का षष्ठी विभक्ति वहुचन रूप ।
        विशेषत:=विशेष से पञ्चमी एकवचन अपादान कारक।
        शुभम्- जल जैसा राजनिघण्टु में शुभम् नपुँसक रूप में जल अर्थ उद्धृत किया है । अत: उपर्युक्त श्लोक में 'शुभम् शुभगन्धान्वितं' विशेषण का विशेष्य पद है ।
        शुभगन्धान्वितं= शुभ (कल्याण कारी) गन्धों से युक्त को द्वितीया विभक्ति  कर्म कारक पद रूप ।

        कृष्ण ने अपने जीवन काल में कभी भी मदिरा का पान भी नहीं किया ।
        सुर संस्कृति से प्रभावित  कुछ तत्कालीन यादव सुरा पान अवश्य करते थे। परन्तु  सुरापान यादवों की सांस्कृतिक परम्परा या पृथा नहीं थी।
        जैसा कि वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में  

        वाल्मीकि रामायण कार ने वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में )
        सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है-
        “सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l”
        सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:. अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥
        (वाल्मीकि रामायण  बालकाण्ड सर्ग 45 के श्लोक 38)
        उपर्युक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है.।
        चूंकि देव लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे।
        इस कारण देवोपासक पुरोहितों  के कथित देव (देवता) सुर कहलाये और सुरा का पान नहीं करने वाले  असुर (जिन्हें इन्द्रोपासक देवपूजकों  द्वारा अदेव कहा गया) असुर कहलाये. ।

        परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है ।
        इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को अपने 
        ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या 96 की कुछ ऋचाओं के भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर  (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा अदेव  कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित है ।
        परन्तु वेदों की व्याख्या करने वाले देवोपासक पुरोहितों ने द्वेष वश कृष्ण को भी सुरापायी बनाने के लिए द्वि-अर्थक पदों से कृष्ण चरित्र का वर्णन करने की चेष्टा की है।
        परन्तु फिर भी ये लोग पूर्ण त: कृष्ण की आध्यात्मिक छवि खराब करने में सफल नहीं हो पाये हैं ।
        राजनिर्घण्टः।। शुभम्-(उदकम् । इति निघण्टुः । १।१२।
        सम्पीङ् - सम्यक्पाने आत्मनेपदीय अन्य पुरुष एक वचन रूप सम्पीयते ( सम्यक् रूप से पीता है - पी जाती है ।

        भविष्य पुराण के ब्रह्म खण्ड में कृष्ण के इस प्रकार के विलासी चरित्र दर्शाने के लिए काल्पनिक वर्णन किया गया है ।
        स्त्रियों के साथ दिन में रमण ( संभोग) करना और मदिरापान करना कृष्ण सदृश श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद् के वक्ता के द्वारा असम्भव ही है । जो सरासर कृष्ण चरित्र की धज्जीयाँ पीटना है
        कृष्ण ने कभी भी देवसंस्कृति की मूढ़ मान्यताओं का अनुमोदन नहीं किया जैसे निर्दोष पशुओं की यज्ञ में बलि के रूप में हिंसा करना ।
        और करोड़ो देवों की पूजा करना। धर्म के नाम परसुरापान करना  कृष्ण ने नहीं किया।
        ______
        जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में कृष्ण ने अर्जुन से कहा -
        येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:।
        तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।9/23।
        _______________
        श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय नवम का २३ वाँ श्लोक
        अर्थ: –हे अर्जुन ! जो भक्त दूसरे देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मेरा ही पूजन करते हैं, लेकिन उनकी यह पूजा विना विधि पूर्वक ही होती है।
        कृष्ण का तो एक ही उद्घोष( एलान) था कि सभी देवताओं से सम्बन्धित सम्प्रदाय ( धर्मों) को छोड़कर मेरी शरण आजा मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।
        श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय अठारह का मूल श्लोकः देखें निम्न रूपों में
        __________
        सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
        अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।18.66। 
        सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी
         ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।

        वेदों में कृष्ण और इन्द्र के युद्ध सम्बन्धी तथ्य-

        भारतीय भाषाओं में इन्द्र" नाम की कोई निश्चित व्युत्पत्ति नहीं है। सबसे प्रशंसनीय रूप से यह एक प्रोटो-इण्डो-यूरोपियन मूल का शब्द है।

        यूरोपीय भाषाओं में एण्डरो-(andró) शब्द ग्रीक भाषा के Aner से विकसित हुआ है। Aner का सम्बन्ध कारक रूप एण्डरो- है। मूल भरोपीय भाषाओं में (H- Ner) हनर-

        ओस्कैन में  (ner)- "पुरुषों का"), अल्बानियाई में  नजेरी "आदमी, मानव," वेल्स- नर । मितन्नी में  इन-द-र- शब्द है। यद्यपि अवेस्ता में इन्द्र एक दुष्ट शक्ति है। क्योंकि देव शब्द ही अवेस्ता में दुष्ट का वाचक है। पारसी मिथ को के सम्बन्ध में इन्द्र और देव शब्द पर आगे यथा क्रम विचार किया जाएगा ।

        संस्कृत(Sanskrit) एक वैदिक भाषा परिनिष्ठित व संशोधित रूपान्तरण है. कुछ लोगों का मानना है कि ये दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है, जो लगभग 5000 साल पुरानी है. ऋग्वेद जिस भाषा में लिखा गया है वो इसका यानी संस्कृत का प्रथम स्वरूप है, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि संस्कृत ऋग्वेद से भी पहले इस्तेमाल होती थी. इस भाषा का इस्तेमाल आज से लगभग 3500 साल पहले सीरिया का एक राजवंश किया करता था. आज हम उसी राजवंश के बारे में आपको आगे यथाक्रम बताएंगे.

        भारतीय वेदों में इन्द्र की सबसे अधिक स्तुति वैदिक ब्राह्मणों ने की है। और इन्द्र को वेदों में सबसे वड़ा देव घोषित किया गया है ।

        परन्तु वैदिक पुरोहित भौतिक कामनाओं की आपूर्ति के लिए ही इन्द्र आदि देवताओं का योजन( यज्ञ) आदि किया करते थे। देवताओं की उपासना से आध्यात्मिक ज्ञान अथवा मोक्ष तो मिन नहीं सकता और न ही यज्ञों के सम्पादन से न ईश्वर की अनुभूति हो सकती है और नहीं आत्मज्ञान प्राप्त होता है।

         यज्ञ केवल देवों की प्रसन्नता के लिए किए जाते थे और ये यज्ञ भी निर्दोष पशुओं पक्षीयों की हत्या के बिना सम्पन्न नहीं माने जाते थे। इन्द्र स्वयं यज्ञ में पशुमेध का समर्थ था।

        वेदों में तथा पुराणों में इन्द्र का चरित्र पूर्णतया राजसिक है । वह पुराणों में तो अपनी कामुक प्रवृत्ति के लिए जाना जाता है। वेदों वनो  भी उसका विलासी चरित्र उभर कर आता है। उसमें सत्व गण का कोई भाव नहीं है। भोग विलास में निरन्तर लगा हुआ इन्द्र आध्यात्मिक ज्ञान से विमुख और परे है।

        ____________

        महाभारत के आदि पर्व में इन्द्र का यज्ञ भूमि में सोम पीकर उन्मत्त होने का वर्णन है।

        सोम एक नशीला पदार्थ था जिसे पारसी धर्म ग्रन्थों में होम कहा गया है क्योंकि फारसी में प्राय: वैदिक भाषा के " स" वर्ण का उच्चारण "ह"वर्ण के रूप में होता है"

        प्राचीन भारत में सुर, सुरा, सोम और मदिरा आदि का बहुत प्रचलन था। कहते हैं कि इंद्र की सभा में सुंदरियों के नृत्य के बीच सुरों के साथ सुरापान होता था। 
        सोम रस : सभी देवता लोग सोमरस का सेवन करते थे। प्रमाण- 'यह निचोड़ा हुआ शुद्ध दधिमिश्रित सोमरस, सोमपान की प्रबल इच्छा रखने वाले इंद्रदेव को प्राप्त हो।-

        सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये ।
        सोमासो दध्याशिरः ॥५॥

        सुतऽपाव्ने । सुताः । इमे । शुचयः । यन्ति । वीतये।सोमासः । दधिऽआशिरः ॥५।

        सायणभाष्य:-

        “इमे "सोमासः अस्मिन् कर्मणि संपादिताः सोमाः "सुतपाव्ने= अभिषुतस्य सोमस्य पानकर्त्रे । षष्ठ्यर्थे चतुर्थी । तस्य पातुः =“वीतये भक्षणार्थं "यन्ति तमेव प्राप्नुवन्ति । कीदृशाः सोमाः । "सुता:= अभिषुताः । “शुचयः =दशापवित्रेण शोधितत्वात् शुद्धाः । "दध्याशिरः =अवनीयमानं दधि आशीर्दोषघातकं येषां सोमानां ते दध्याशिरः ।। सुतपाव्ने । सुतं पिबतीति सुतपावा । वनिप: पित्त्वात् धातुस्वर एव शिष्यते । समासे द्वितीयापूर्वपदप्रकृतिस्वरं बाधित्वा कृदुत्तरपदप्रकृतिस्वरत्वम् । शुचयः । शुच दीप्तौ'। ‘इन्' इत्यनुवृत्तौ ‘इगुपधात्कित्' (उ. सू. ४. ५५९) इति इन् । कित्त्वाल्लघूपधगुणाभावः। नित्त्वादाद्युदात्तत्वम् । वीतये । ‘ वि गतिप्रजनकान्त्यशनखादनेषु' इत्यस्मात् ' मन्त्रे वृषेषपचमनविदभूवीरा उदात्तः ' ( पा. सू. ३, ३. ९६ ) इति क्तिन् उदात्तः । सोमासः । ‘ षुञ् अभिषवे'। ‘ अर्तिस्तुसुहुसृधृक्षि° ' ( उ. सू. १. १३७ ) इत्यादिना मन् । नित्त्वादाद्युदात्तः । ‘ आज्जसेरसुक्' (पा. सू. ७. १. ५० } इत्यसुगागमः । दध्याशिरः । दधाति पुष्णातीति दधि । ‘डुधाञ् धारणपोषणयोः । ‘ आदृगमहनजनः किकिनौ लिट् च ' ( पा. सू. ३. २. १७१ ) इति किन् । लिङ्वद्भावात् द्विर्भावः । कित्त्वादाकारलोपः । नित्त्वादाद्युदात्तत्वम् ।शॄ ‘हिंसायाम् ' । शृणाति हिनस्ति सोमेऽवनीयमानं सत् सोमस्य स्वाभाविकं रसम्  ऋजीषत्वप्रयुक्तं नीरसं दोषं वा इत्याशीः । क्विपि ‘ ऋत इद्धातोः ' ( पा. सू. ७, १. १०० ) इति इत्वं रपरत्वं च । दध्येव आशीर्येषां सोमानां ते दध्याशिरः। बहुव्रीहौ पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वम् ।९ ॥ (ऋग्वेद-1/5/5).

        तीव्राः सोमास आ गह्याशीर्वन्तः सुता इमे ।
        वायो तान्प्रस्थितान्पिब ॥१॥

        "शतं वा य: शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदुनिम्नं न रीयते।। 

        (ऋग्वेद-1/23/1).. 

        शतं वा यः शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम् ।
        एदु निम्नं न रीयते ॥२॥

        (ऋग्वेद-1/30/2) 

        इन्द्रा य गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु” (ऋग्वेद- ८/, ५८,/ ६ )

        इमे त इन्द्र सोमास्तीव्रा अस्मे सुतासः ।
        शुक्रा आशिरं याचन्ते ॥१०॥

        ताँ आशिरं पुरोळाशमिन्द्रेमं सोमं श्रीणीहि ।
        रेवन्तं हि त्वा शृणोमि ॥११॥

        हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् ।
        ऊधर्न नग्ना जरन्ते ॥१२॥

        सुरापान : प्राचीन काल में सुरा एक प्रकार से शराब ही थी कहते हैं कि सुरों द्वारा ग्रहण की जाने वाली हृष्ट (बलवर्धक) प्रमुदित (उल्लासमयी) वारुणी (पेय) इसीलिए सुरा कहलाई। कुछ देवता सुरापान करते थे। 

        हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् ।
        ऊधर्न नग्ना जरन्ते ॥१२॥ (ऋग्वेदः सूक्तं 8/2/12)

        अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर नंगे  होकर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात ही मचाया करते हैं।

        वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड का पैतालीसवां सर्ग श्लोक संख्या ३६ से ३८ ,प्रसंग समुद्र मंथन.

        विश्वामित्र राम लक्ष्मण को कुछ वेद पुराण सुना रहे हैं और उसी के तहत समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों के बारे बताते हुए कहते हैं ....
        असुरास्तेंन दैतेयाः सुरास्तेनादितेह सुताः 
        हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन वारुणीग्रह्नात सुराः (३८)
        ('सुरा से रहित होने के कारण ही दैत्य 'असुर ' कहलाये 
        और सुरा-सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों की 'सुर' संज्ञा हुई.
        वारुणी को   ग्रहण करने से देवतालोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनंदमग्न हो गए )
        इसके पहले और बाद के दो श्लोकों में समुद्रमंथन से वरुण की कन्या वारुणी "जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी"

        धर्मग्रन्थों में असुर वे लोग हैं जो 'सुर' (देवताओं) से संघर्ष करते हैं।
        धर्मग्रन्थों में उन्हें शक्तिशाली, अतिमानवीय, असु राति अर्थात् जो प्राण देता है, के रूप में चित्रित किया गया है
        'असुर' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में लगभग १०५ बार हुआ है। उसमें ९० स्थानों पर इसका प्रयोग 'असु युक्त अथवा प्राण -युक्त के अर्थ में किया गया है । और केवल १५ स्थलों पर यह 'देवताओं के शत्रु' का वाचक है।
        'असुर' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है- प्राणवंत, प्राणशक्ति संपन्न ('असुरिति प्राणनामास्त: शरीरे भवति, निरुक्ति ३.८)
        और इस प्रकार यह वैदिक देवों के एक सामान्य विशेषण के रूप में व्यवहृत किया गया है।
        विशेषत: यह शब्द इंद्र, मित्र तथा वरुण के साथ प्रयुक्त होकर उनकी एक विशिष्ट शक्ति का द्योतक भी  है। इंद्र के तो यह वैयक्तिक बल का सूचक है, परंतु वरुण के साथ प्रयुक्त होकर यह उनके नैतिक बल अथवा शासनबल का स्पष्टत: संकेत करता है।

        परन्तु लौकिक संस्कृत में सुर के विपरीत असुर हैं।

        वाल्मीकि रामायण को बाल काण्ड नें सुरा पीने वाले को सुर" ( देव) कहा है ।

        वाल्मीकि रामायण-
        बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में )
         सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है- 
        “सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l”
        "सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:. अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥ ३८।
        (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड)
        उक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है. 
        चूंकि देव लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे। 

        वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड का पैतालीसवां सर्ग श्लोक संख्या ३६ से ३८ ,
        प्रसंग ( समुद्र मंथन.) विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को कुछ वेद पुराण सुना रहे हैं ।
        और उसी के तहत समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों के बारे में बताते हुए कहते हैं ।

        "असुरास्तेंन दैतेयाः सुरास्तेनादितेह सुताः हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन वारुणीग्रह्नात सुराः। (३८)
         ('सुरा से रहित होने के कारण ही दैत्य 'असुर ' कहलाये और सुरा-सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों की 'सुर' संज्ञा हुई. 

        वारुणी को ग्रहण करने से देवता लोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनंदमग्न हो गए )
        इसके पहले और बाद के दो श्लोकों में समुद्रमंथन से वरुण की कन्या वारुणी "जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी" के प्रकट होने और दैत्यों द्वारा उसे ग्रहण न करने और देवों द्वारा इन अनिन्द्य सुन्दरी को ग्रहण करने का उल्लेख है.।
        ________
        ये तो सर्वविदित ही है कि इन्द्र सुरा और सुन्दरियों के रूपरस का  पान करता रहता था। 
        इन्द्र एक व्यभिचारी देव था। कृष्ण ने सर्वप्रथम इन्द्र के इस कुत्सित कर्म को दृष्टिगत करते हुए उसकी पूजा पर रोक लगाई।
        तो इन्द्रोपासक पुरोहितों ने षड्यन्त्र पूर्वक कृष्ण के चरित्र को इन्द्र से भी अधिक दूषित करके चित्रित किया गया। और जो देवसंस्कृति के समर्थन में कृष्ण ने काम नहीं किया उसे भी कृष्ण के नाम पर जोड़कर कृष्ण के विचारों के साथ भी षड्यन्त्र कर दिया।

        इन्द्र सुरापान करके उन्मत्त रहता था । और सुरापान करने वाला ही कामुक और उन्मत्त होकर व्यवहार करता है।

        अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर नंगे  होकर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात ही मचाया करते हैं।

        हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो  सुरायाम्  ऊधर्न नग्ना जरन्ते (ऋग्वेद -8/2./12)

        पदान्वय:-सुरायाम्- पीतासो= सुरा पीने वाले।दुर्मदासो= बुरी तरह उन्मत्त होकर। नग्ना हृत्सु:- नंगे होकर छाती या हृदय में स्थित । ऊध: - स्तनो को  । जरन्ते - जारके समान मसलते या जीर्ण करते हैं।

        (न ) जिस प्रकार- (दुर्मदास:- दूषित मद से उन्मत्त लोग। युध्यन्ते-युद्ध करते हैं। हृत्सु- हृदयों में। सुरायाम्- पीतास:- सुरा पीने वाले लोग। नग्ना: - नंगे लोग।ऊध:-स्तन या छाती। जरन्ते- जारों की तरह मसलते रहते हैं। जीर्ण करते रहते हैं।

        _____

        इन्द्र भी इसी प्रकार का चरित्र व्यवहार करता है।

        "व्युषिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिवः ।पुरा परमधर्मिष्ठः पूरोर्वंशविवर्धनः ।७।

        तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महात्मनि।उपागमंस्ततो देवाः सेन्द्राः सह महर्षिभिः।८।

        अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ।व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मनः।९।

        महाभारत आदिपर्व- (1/120/ 7-8-9-10)

          "अनुवाद :-एक समय वे महाबाहु धर्मात्‍मा नरेश व्युषिताश्व जब यज्ञ करने लगे, उस समय इन्‍द्र आदि देवता देवर्षियों के साथ उस यज्ञ में पधारे थे। उसमें देवराज इन्‍द्र सोमपान करके उन्‍मत्त हो उठे !थे तथा ब्राह्मण लोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्ष से फूल उठे थे।

        इन्द्रोपासक पुरोहित भी केवल भौतिक कामनाओं की आपूर्ति के लिए इन्द्र की स्तुति करते हैं। इन्द्र के उपासक केवल स्वर्ग" सुन्दर स्त्री और भौतिक कामनाओं की आपूर्ति के लिए ही इन्द्र की उपासना करते है।

        इन्द्र बहुत से बैलों( उक्षण) को खाने वाला और अपनी यज्ञों में पशु बलि माँगता है।

        ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त-(86) जो वृषाकपि के नाम से है   उसकी समस्त ऋचाऐं इन्द्र के विलासी चरित्र का दिग्दर्शन करती हैं।

        ऋग्वेदः सूक्तं १०/८६/

                        " वृषाकपिसूक्तम्

        "तैइस ऋचाओं का यह वृषाकपि सूक्त है जिसमें  वृषाकपि नामक इन्द्र अन्य पत्नू से उत्पन्न एक पुत्र था इन्द्र और इन्द्राणी( शचि) का परस्पर संवाद है

        वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत ।यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥१॥ 

        "सोम-अभिषव करने के लिए यज्ञ में मुझ इन्द्र द्वारा आज्ञा दिए हुए स्तोताओं ने वृषाकपि का पूजन किया। वहाँ उपस्थित दैदीप्मीन मुझ  इन्द्र की मेरे द्वारा प्रेरित होकर भी उन स्तोताओं ने स्तुति नहीं की किन्तु मेरे पुत्र वृषाकपि की ही स्तुति की जिस सोम से बढ़े हुए यज्ञो में स्वामी वृषाकपि मेरा पुत्र और मेरा मित्र होकर सोमपान में हालांकि हर्षित हुआ। तो भी उन यज्ञों में मैं इन्द्र सम्पूर्ण जगत में श्रेष्ठतर हूँ। आचार्य माधव भट्ट के अनुयायी इस ऋचा को इन्द्राणी का वचन मानते हैं। उनका कहना है कि इन्द्राणी के लिए अर्पित हवि को वृषाकपि के स्थान में विद्यमान किसी अन्य मृग ( पशु ) ने दूषित कर दिया है। वहाँ इन्द्राणी इन्द्र से कहती है। उस पक्ष में तो इस ऋचा का यह अर्थ है।)सोमाभिषव करने के लिए आज्ञा दिए गये  यजमान सोनाभिषव की प्रक्रिया से अलग हो गये और मेरे पति इन्द्रदेव की   स्तोता उस जनपद में स्तुति नहीं करते हैं। जिस जनपद में बढ़े हुए धनों  में स्वामी वृषाकपि  हर्षित होता है। मेरे मित्र और मेरे प्रिय इन्द्र देव सब जगत् में श्रेष्ठतर हैं।१।

        परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः। नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥२॥

          "अनुवाद :- हे इन्द्र तुम अत्यन्त चलकर वृषाकपि के पास जाते हो। अर्थात् अन्यत्र सोम पीने के लिए नहीं जाते हो। वही इन्द्र समस्त जगत् में श्रेष्ठतर है।२।

        किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः। यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्रप उत्तरः ॥३॥

          "अनुवाद :-  हे इन्द्र हरित वर्ण वाले वृषाकपि ने तुम्हारा क्या प्रिय कार्य किया ? क्यों कि वृषाकपि मृग पशु) जाति का है। जिस वृषा कपि के तुम इन्द्र उदार होकर पुष्टिकर धन शीघ्र न करते हो। जो इन्द्र समस्त जगति में श्रेष्ठतर है।३।

        यमिमं त्वं वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि । श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥४॥

          "अनुवाद :-  हे इन्द्र तुम जिस अभिलाषित   वृषाकपि का पालन करते हो उस वृषाकपि को सूकर  खाने की इच्छाकरने वाला कुत्ता शीघ्र भक्षण करे।और उसके कान को पकड़े । क्योंकि कुत्ता सूअर को खाना चाहता है। इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठतर है।४।

        प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत् ।शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥५॥

          "अनुवाद :-  मुझ इन्द्राणी के लिए यजमानों द्रारा अर्पितप्रिय और  विशेषरूप से घृतयुक्त  हवियोंं को वृषाकपि के स्थान में विद्मान किसी कपि ने दूषित कर दिया। तत्पश्चात् मेरी इच्छा गै कि उस कि स्वामी वृषाकपि का शिर शीघ्र काट दूँ। मैं इस दुष्ट कर्म करने वाले वृषाकपि के लिए सुखकर न होऊँ। इस मुझ इन्द्राणी के पति इन्द्र समस्त जगत् में श्रेष्ठतर हैं।५।

        न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशुतरा भुवत् ।न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥६॥

          "अनुवाद :-

        मुझ इन्द्राणी से दूसरी कोई नारी अत्यन्त सौभाग्य वती नहीं है। मुझ इन्द्राणी से दूसरी नारी अत्यन्त सुखी अथवा सुपुत्रों वाली नहीं है। जैसा कि यह ऋचा कहती है ।६।

        "यह बहुत रज वाली रमणी मुझ स्वनय राजा को बहुत बार भोग( संभोग) प्रदान करती है। मेरे से दूसरी नारी पुरुषो को अत्यधिक रूप से अपना शरीर समर्पित करने वाली नहीं है। मेरी तुलना में दूसरी स्त्री संभोग में लीन अपनी दौंनों जाघों को ऊपर उठाने वाली नहीं है। मेरे पति समस्त जगत में उत्कृष्टतर हैं।६।

        _____________

        वैदिक काल में सर्वत्र पत्नी को सम्मान प्राप्त नहीं था। वेदों में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनसे पति की पत्नी के प्रति हेय दृष्टि का आभास मिलता है। स्त्रियों के विषय में ऋग्वेद में जो विवरण आए हैं।

        ______________

        इस सन्दर्भ में इन्द्राणी और कृषाकपि का प्रसंग अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 

        इन्द्र की अनुपस्थिति में वृक्षाकपि ने इन्द्राणी का शील भंग करने का प्रयास किया, जिसे इन्द्राणी में प्रयत्नपूर्वक असफल कर दिया। 

        इन्द्र के आने पर इन्द्राणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं, कि वृषाकपि मेरा घनिष्ठ मित्र है। स्वयं इन्द्र भी इसी कामुक प्रवृति का देव है । जो सुरा और सनुन्दरीयों ही जीवन का आनन्द खोजता है 

        उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्ग भविष्यति ।भसन्मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥७॥

         "अनुवाद :-"इस प्रकार इन्द्राणी द्रारा बुरा भला कहा हुआ वृषाकपि कहता है कि हे माता ! सुन्दर लाभभ मे जिस प्रकार से तुमने कहा है। वैसा ही अंग शीघ्र हो जाये । तुम्हारे इस प्रेम करने को स्वीकार करने में मेरा क्या प्रयोजन है। मेरे पिता के लिए तुम्हारी यौनि उपयुक्त हो ।और मेरे पिता के लिए तुम्हीरी जंघा उपयुक्त हो। मेरे पिता इन्द्र को आपका शिर प्रेमालाप करने में कोयल आदि पक्षी  की तरह हर्षिकत करे। मेरे पिता इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं।७।

        इन्द्र के आने पर इन्द्राणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं, कि वृषाकपि मेरा घनिष्ठ मित्र है। स्वयं इन्द्र भी इसी कामुक प्रवृति का देव है । जो सुरा और सनुन्दरीयों में ही जीवन का आनन्द खोजता है । इन्द्र शचि से कहता है  कि वृषाकपि के बिना मुझे सुख नहीं प्राप्त हो सकता-

        किं सुबाहो स्वङ्गुरे पृथुष्टो पृथुजाघने ।किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥८॥

         "अनुवाद :- इन्द्र  क्रोधित इन्द्राणी को शान्त करते हुए कहता है कि हे सुन्दर भुजाओं वाली ,सुन्दर अंगुरियों वाली बड़े बालों वाली चौड़ी जाँघो वाली  तथा वीर पत्नी इन्द्राणी! तुम हमारे पुत्र वृषाकपि पर क्यो क्रोध कर रही हो।जिसका पिता मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ।८।


        अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते ।उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः॥९॥

        संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति ।वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१०॥

        इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् ।नह्यस्या अपरं चन साकं मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥११॥

        नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेरृते ।यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१२॥

        _____________   

        वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे । घसत्ते इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१३॥

         "अनुवाद :-

        मुझ इन्द्राणी से दूसरी नारी सौभाग्य शाली नहीं  है । कामनाओं की वर्षा करने से वृषभ अभीष्टदेश को जाने से इन्द्र वृषाकपि है। हे धनवाली और उत्तम पुत्र वाली और पुत्र वधू वाली शचि ! तुम्हारे ये पति इन्द्र वीर्य दान करने नें समर्थ पशु ( बैल)को शीघ्र खाऐं। और तुम्हें सुख कर हवि प्रदान करें । तुम्हारे पति इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं।१३ ।

        __________________

        उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम् ।उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१४॥

         "अनुवाद :-

        इसके बाद इन्द्र कहता है।  मेरी पत्नी इन्द्राणी द्वारा भेजे हुए याज्ञिक   पन्द्रह से बीस बैलों( वृषभों) को एक साथ पकाते हैं। और उन्हें  मैं  इन्द्र खाता हूँ । तथा उन्हें खाकर मोटा होता हूँ।मेरी मैंने कोशों को यज्ञ करने वाले सोम रस से भरते हैं। वह मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ।१४।


        वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत् मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१५॥

         "अनुवाद :- इसके बाद इन्द्राणी कहती है कि हे  इन्द्र! जैसे तेज लिंग या सींगों वाला वृषभ गायों के समूह के बीच  में आवाज करता हुआ प्रसन्न होता है। वैसे ही तुम मेरे साथ रमण( सैक्स ) करो । तुम्हारे हृदय के लिए दधिमन्थन के सयय में शब्द करता हुआ  कल्याण कारी हो। तुम्हारे लिए इन्द्राणी भावाभिलाषिणी जिस सोम को अभिषुत करती है। वह सोम भी कल्याण कारी हो । मेरे पति समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं ।१५।

        न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत् । सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१६॥

         "अनुवाद :- 

        हे इन्द्र वह मनुष्य  कभी मैथुन नहीं कर सकता  , जिस पुरुष का लिंग जंघाओं के बीच में लम्बा होकर लटक जाता है। वही पुरुष स्त्री के साथ मैथुन कर सकता है  जिस लेटे हुए पुरुष का लिंग जम्हाई लेता हो । इन्द्राणी का पति इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं ।१६।

        न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते । सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१७॥

        अनुवाद :-वह मनुष्य मैथुन नहीं कर सकता  जिस लेटे हुए पुरुष का लिंग लटक जाता है।किन्तु वही मनुष्य मैथुन कर सकता है जिस मनुष्य का लिंग जंघाओं के बीच में  अकड़ता जम्हाई लेता है।

        शेष अर्थ पूर्ववत् है। यहाँ पूर्वोक्त का अन्तर  देखने योग्य है। पहली ऋचा में इन्द्राणी इन्द्र से कहती है। और उस दूसरी ऋचा में इन्द्र इन्द्राणी से कहता है। इस प्रकार दौंनों में कोई विरोध नहीं है।१७। कामशास्त्र की खुलकर वार्ता है।

        अर्थ:- (वृषभः-न तिग्मशृङ्गः) जैसे तीक्ष्ण शृङ्गवाला वृषभ-साँड (यूथेषु-अन्तः-रोरुवत्) गोसमूहों के अन्दर बहुत शब्द करता है, तथा वैसे (इन्द्र) हे इन्द्र  (ते मन्थः) तेरा मन्थन व्यापार  (हृदे शम्) हृदय के लिये कल्याणकारी हो (तं यं भावयुः-सुनोति) उस जिस पुत्र को आत्मभाव चाहनेवाली अपनानेवाली इन्द्राणी उत्पन्न करती है (न सः-ईशे) वह नहीं स्वामित्व करता है, न ही (यस्य कपृत्) जिसका लिंग (सक्थ्या-अन्तरा लम्बते) दोनों  जङ्घाओं के मध्य में लम्बित होता लटकता है (स-इत्-ईशे) वह ही समर्थ होता है (यस्य निषेदुषः) जिस निकट शयन करते हुए का (रोमशं विजृम्भते) रोमोंवाला लिंग  विजृम्भन करता है-फड़कता है (न सः-ईशे) वह मैथुन  नहीं कर सकता है (यस्य निषेदुषः-रोमशं विजृम्भते) जिसके निकट शयन किये हुए रोमों  वाला अङ्ग लिंग फड़कता है (सः-इत्-ईशे) वह ही गृहस्थकर्म पर अधिकार रखता है (यस्य सक्थ्या-अन्तरा कपृत्-लम्बते) जिसके निकट शयन करने पर -जङ्घाओं के बीच में लिंग लम्बा होता है, वह ही स्त्रीयों पर अधिकार कर पाता है॥१७॥

        अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत् ।असिं सूनां नवं चरुमादेधस्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१८॥

        १८ हे  “इन्द्र "अयं “वृषाकपिः "परस्वन्तं परस्वमात्मनो विषयेऽवर्तमानं "हतं= हिंसितं “विदत् =विन्दतु । तथा हतस्य विशसनाय “असिं =शस्त्रं "सूनाम्= उद्धानं पाकार्थं "नवं प्रत्यग्रं "चरुं =भाण्डम् “आत् अनन्तरम् “{एधस्य काष्ठस्य} “आचितं=संगृहीतं "अनः =शकटं च विन्दतु । मस पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥

        बैल पकाने का जिक्र-

        अनुवाद :-

        सायण- भाष्य-−(इन्द्र) हे इन्द्र ! (अयं वृषाकपिः) यह वृषाकपि-है।(परस्वन्तं हतं विदत्) वराहयु-वन्य- कुत्ते को मार सका (असिम्) काटनेवाले शस्त्र तलवार को (सूनाम्) वधस्थान को (नवं चरुम्)  नव अन्न हवि को (आत्) अनन्तर और (एधस्य-आचितम्-अनः)- पकाने के लिये ईंधन के भरे अन:-छकड़े को (इन हत्या के साधनों को) चयनित कर लिया ॥१८॥


        अयमेमि विचाकशद्विचिन्वन्दासमार्यम् । पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१९॥

        अनुवाद :-

        तत्पश्चात इन्द्र कहता है। मैं इन्द्र यजमानों को देखता हुआ। दास और आर्य को अलग करता हुआ यज्ञ में जाता हूँ।तथा हवि पकाने वाले औरसोम अभिषव करने वाले यजमान का  परिपक्व मन से सोम अभिषव करने वाले यजमान का सोम पीता हूँ। तथा बुद्धि मान यजमान को मैं इन्द्र देखता हूँ। जो मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ।१९।

        धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना ।नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहाँ उप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२०॥

        अनुवाद :-जल शून्य और जल विहीन देश धन्व होता है। काटने योग्य वन कृन्तत्र होता है।जो जल शून्य और वन विहीन देश होता है। ऐसा वन मृगों के निर्वासन वाला होता है। किन्तु सघन जल नहीं होता है उस शत्रु गृह और हमारे घर के बीच कितने योजनों की दूरी है। अर्थात वह हमारा घर अत्यन्त दूर नहीं हैं।अत: निकटवर्ती शत्रुगगृह से ही हे वृषाकपि ! तुम हमारे घर में विशेष रूप में चले आओ और आकर यज्ञ गृहों के समीप जाओ । क्योंकि मैं इन्द्र सबसे अधिक श्रेष्ठ हूँ।२०।


        पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै । य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२१॥

        अनुवाद :-आकर वापिस गये हुए वृषाकपि से इन्द्र कहते हैं। हे वृषाकपि तुम फिर हमारी ओर आओ!और तुम्हारे आने पर तुम्हारे चित को प्रसन्न करने वाले कर्मों को इन्द्राणी और मैं इन्द्र हम दोनों  विचार कर पूर्ण करें ! उदय होकर सब प्राणियों की नींद के नाशक जो सूर्य हैं जैसे वे अस्त होते हैं वैसे ही तुम मार्ग में अपने आवास को जाते हो। क्योंकि मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ ।२१।


        यदुदञ्चो वृषाकपे ! गृहमिन्द्राजगन्तन । क्व स्य पुल्वघो मृगः कमगञ्जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२२॥

        अनुवाद :-जाकर फिर आये हुए वृषाकपि से इन्द्र पूछते हैं। हे परम ऐश्वर्य शाली वृषाकपि ! तुम सीधे खड़े़ होकर मेरे घर में आओ ! एक वृषाकप् के लिए बहुवचन पद पूजा-( सम्मान) के लिए प्रयुक्त है। हे वृषाकपि वहाँ आप से सम्बन्धित बहुत से पाथिक( मार्गसम्बन्धी) रसों का उपभोक्ता वह मृग कहाँ रह गया अथवा मनुष्यों को हर्षित करने वाला मृग किस देश को चला गया। वह मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ ।२२।


        पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम् । भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२३॥

        अनुवाद :-

        इन्द्र के द्वारा छोड़े जाते हुए वाण से  इस मन्त्र के द्वारा वषाकपि आश करते हैं। कि हे इन्द्र द्वारा छोड़े हुए वाण पर्शु नाम की मृगी थी इस मनु पुत्री पर्ष़शु ने एक साथ बीस पुत्रों को जन्म दिया उसका उदर गर्भ में स्थित बीस पुत्रों से पुष्ट हो गया था। उस पर्शु का कल्याण हो मेरे पिता इन्द्र जगत में सबसे श्रेष्ठ हैं।२३।

        सायणभाष्यम्: - मूल संस्कृत रूप-

        "यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् ।निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थमहेश्वरम् ॥

        अष्टमाष्टकस्य चतुर्थोऽध्याय आरभ्यते । तत्र ‘वि हि ' इति त्रयोविंशत्यृचं द्वितीयं सूक्तम् ।

        _____________________

        वृषाकपिर्नामेन्द्रस्य पुत्रः । स चेन्द्राणीन्द्रश्चैते त्रयः संहताः संविवादं कृतवन्तः । तत्र ‘वि हि सोतोरसृक्षत ' : किं सुबाहो स्वङ्गुरे ' ‘ इन्द्राणीमासु नारिषु ' इति द्वे ‘ उक्ष्णो हि मे ' ' अयमेमि' इति चतस्र इत्येता नवर्च इन्द्रवाक्यानि । अतस्तासामिन्द्र ऋषिः । ‘ पराहीन्द्र ' इति पञ्च ‘ अवीराम् ' इति द्वे ' वृषभो न तिग्मशृङ्गः' इत्याद्याश्चतस्र इत्येकादशर्चं इन्द्राण्या वाक्यानि । अतस्तासामिन्द्राण्यृषिः । ‘ उवे अम्ब ' ‘ वृषाकपायि रेवति ' • पशुर्ह नाम ' इति तिस्रो वृषाकपेर्वाक्यानि । अतस्तासां वृषाकपिर्ऋषिः । सर्वं सूक्तमैन्द्रं पञ्चपदापङ्क्तिच्छन्दस्कम् । तथा चानुक्रान्तं -- वि हि त्र्यधिकैन्द्रो वृषाकपिरिन्द्राणीन्द्रश्च समूदिरे पाङ्तम् ' इति । षष्ठेऽहनि ब्राह्मणाच्छंसिन उक्थ्यशस्त्र एतत्सूक्तम् । सूत्रितं च ---- ‘ अथ वृषाकपिं शंसेद्यथा होताज्याद्यां चतुर्थे ' ( आश्व. श्रौ. ८. ३) इति । यदि षष्ठे:हन्युक्थ्यस्तोत्राणि द्विपदासु न स्तुवीरन् सामगा यदि वेदमहरग्निष्टोमः स्यात्तदानीं ब्राह्मणाच्छंसी माध्यंदिने सवन आरम्भणीयाभ्यः ऊर्ध्वमेतत्सूक्तं शंसेद्विश्वजित्यपि । तथा च सूत्रितं -- सुकीर्तिं ब्राह्मणाच्छंसी वृषाकपिं च पङ्क्तिशंसम् ' (आश्व. श्रौ. ८. ४) इति ।। 

        "अनुवादभाष्य :-

         ॥१।।सोतोः =सोमाभिषवं कर्तुं "वि "असृक्षत । यागं प्रति मया विसृष्टा अनुज्ञाताः स्तोतारो= वृषाकपेर्यष्टारः । “हि= इति पूरणः । तत्र "देवं= द्योतमानम् "इन्द्रं मां “न “अमंसत । मया प्रेरिताः सन्तोऽपि ते स्तोतारो न स्तुतवन्तः । किंतु मम पुत्रं वृषाकपिमेव स्तुतवन्तः । "यत्र येषु “पुष्टेषु सोमेन प्रवृद्धेषु यागेषु "अर्यः= स्वामी “वृषाकपिः मम पुत्रः मत्सखा मम सखिभूतः सन् “अमदत् सोमपानेन हृष्टोऽभूत् । यद्यप्येवं तथापि “इन्द्रः अहं "विश्वस्मात् सर्वस्माज्जगतः "उत्तरः =उत्कृष्टतरः। माधवभट्टास्तु वि हि सोतोरित्येषर्गिन्द्राण्या वाक्यमिति मन्यन्ते। तथा च तद्वचनम् । इन्द्राण्यै कल्पितं हविः कश्चिन्मृगोऽदूदुषदिन्द्रपुत्रस्य वृषाकपेर्विषये वर्तमानः । तत्रेन्द्रमिन्द्राणी वदति । तस्मिन्पक्षे त्वस्या ऋचोऽयमर्थः । सोतोः= सोमाभिषवं कर्तुं वि ह्यसृक्षत। उपरतसोमाभिषवा आसन् यजमाना इत्यर्थः । किंच मम पतिमिन्द्रं देवं नामंसत स्तोतारो न स्तुवन्ति । कुत्रेति अत्राह । यत्र यस्मिन् जनपदे पुष्टेषु प्रवृद्धेषु धनेष्वर्यः स्वामी वृषाकपिरमदत् । मत्सखा मत्प्रियश्चेन्द्रो विश्वस्मात् सर्वस्माज्जगत उत्तरः उत्कृष्टतरः ।।

        "अनुवाद भाष्य :-

        ॥२।हे “इन्द्र त्वम् "अति {अत्यन्तं “व्यथिः= चलितः "वृषाकपेः =वृषाकपिं “परा “धावसि= प्रतिगच्छसि । "अन्यत्र "सोमपीतये सोमपानाय “नो "अह नैव च “प्र “विन्दसि प्रगच्छसीत्यर्थः । सोऽयम् "इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ।

        "अनुवाद भाष्य :-


        ॥३।हे इन्द्र “त्वां प्रति "हरितः= हरितवर्णः "मृगः= मृगभूतः "अयं वृषाकपिः। मृगजातिर्हि =वृषाकपि। "किं प्रियं "चकार अकार्षीत् । "यस्मै वृषाकपये "पुष्टिमत्= पोषयुक्तं "वसु= धनम् "अर्यो “वा उदार इव स त्वं "नु क्षिप्रम् “इरस्यसीत् प्रयच्छस्येव । यः "इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥

        "अनुवाद भाष्य :-


        ५=“मे मह्यमिन्द्राण्यै “तष्टानि यजमानैः कल्पितानि “प्रिया प्रियाणि “व्यक्ता व्यक्तान्याज्यैर्विशेषेणाक्तानि हवींषि कश्चित् वृषाकपेर्विषये वर्तमानः "कपिः “व्यदूदुषत्= दूषयामास । ततोऽहम् “अस्य तत्कपिस्वामिनो वृषाकपेः “शिरो “नु क्षिप्रं "राविषं लुनीयाम् । "दुष्कृते दुष्टस्य कर्मणः कर्त्रे वृषाकपयेऽस्मै {"सुगं= सुखं} न "भुवम् अहं न भवेयम् । अस्मै सुखप्रदात्री न भवामीत्यर्थः । अस्या मम पतिः “इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥१।

        "अनुवाद :-भाष्य

        6-“मत् मत्तोऽन्या "स्त्री नारी "सुभसत्तरा अतिशयेन सुभगा "न "भुवत् न भवति । नास्तीत्यर्थः । किंच मत्तोऽन्या स्त्री "सुयाशुतरा अतिशयेन सुसुखातिशयेन

        सुपुत्रा वा "न भवति । तथा च मन्त्रान्तरं -- ददाति मह्यं यादुरी =याशूनां =भोज्या शता' (ऋ. सं. १. १२६. ६) इति । किंच “मत् मत्तोऽन्या “प्रतिच्यवीयसी पुमांसं प्रति शरीरस्यात्यन्तं च्यावयित्री “न अस्ति । किंच मत्तोऽन्या स्त्री “सक्थ्युद्यमीयसी संभोगेऽत्यन्तमुत्क्षेप्त्री “न अस्ति । न मत्तोऽन्या काचिदपि नारी मैथुनेऽनुगुणं!

        अयं शरारु:) यह घातक  (माम्) मुझको (अवीराम् इव) अबला की भाँति (अभि मन्यते) मानता है ।(वीरिणी अस्मि) वीराङ्गना हूँ (इन्द्रपत्नी) मैं इन्द्र की पत्नी हूँ (मरुत् सखा)  मरुत जिनके मित्र है। (इन्द्रः)  (विश्वस्मात् उत्तर:) संसार में सबसे श्रेष्ठ है।

        "अनुवाद :-भाष्य

        मुझ इन्द्राणी से दूसरी कोई नारी अत्यन्त सौभाग्य वती नहीं है। मुझ इन्द्राणी से दूसरी नारी अत्यन्त सुखी अथवा सुपुत्रों वाली नहीं है। जैसा कि यह ऋचा कहती है ।६।

        "यह बहुत रज वाली रमणी मुझ सुना राजा को बहुत बार भोग( संभोग) प्रदान करती है। मेरे से दूसरी नारी पुरुषो को अत्यधिक रूप से अपना शरीर समर्पित करने वाली नहीं है। मेरी तुलना में दूसरी स्त्री संभोग में अपनी दौंनों जाघों को ऊपर उठाने वाली नहीं है। मेरे पति समस्त जगत में उत्कृष्ट हैं।६।

        ______________

        वैदिक काल में सर्वत्र पत्नी को सम्मान प्राप्त नहीं था। वेदों में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनसे पति की पत्नी के प्रति हेय दृष्टि का आभास मिलता है। स्त्रियों के विषय में ऋग्वेद में जो विवरण आए हैं।

        ______________


        "इस सन्दर्भ में इन्द्राणी और कृषाकपि का प्रसंग अत्यन्त महत्वपूर्ण है!

        इन्द्र की अनुपस्थिति में वृक्षाकपि ने इन्द्राणी का शील भंग करने का प्रयास किया, जिसे इन्द्राणी में प्रयत्नपूर्वक असफल कर दिया। 

        इन्द्र के आने पर इन्द्राणी ने इन्द्र से वृक्षाकपि की शिकायत की, तो इन्द्र ने वृषाकपि पर क्रोध नहीं करते हुए अपितु यह कहकर वे इन्द्राणी को शान्त कर देते हैं, कि वृषाकपि मेरा घनिष्ठ मित्र है। स्वयं इन्द्र भी इसी कामुक प्रवृति का देव है । जो सुरा और सनुन्दरीयों ही जीवन का आनन्द खोजता है 

        इन्द्र शचि से कहता है  कि वृषाकपि के बिना मुझे सुख नहीं प्राप्त हो सकता-

        "नाहमिन्द्राणि शरण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते।‘‘

        _________________________ 

        ब्याज पर उधार में दिए जाने वाली वस्तुओं में स्वर्ण, अन्न और गायों के साथ स्त्रियों का भी उल्लेख आता है। 

        सम्भवतः इसी कारण पी0वी0 काणे जी लिखते हैं, ‘‘ऋग्वेद (1.109.12) गलत सन्दर्भ), मैत्रायाणी संहिता (1.10.1), निरूक्त (6.9,1.3) तैत्तिरीय ब्राह्मण (1.7,10) आदि के अवलोकन से यह विदित होता है कि प्राचीन काल में विवाह के लिए लड़कियों का क्रय-विक्रय होता था।‘‘ 

        अथर्ववेदः/ काण्डं २०/सूक्तम् १२६-


        अथर्ववेदः - काण्डं २०
        सूक्तं २०.१२६
        वृषाकपिरिन्द्राणी च।

        दे. इन्द्रः। छ. पङ्क्तिः
        वृषाकपिसूक्तम्

                  (अथर्ववेद  20/126)
        वि हि सोतोरसृक्षत नेन्द्रं देवममंसत ।
        यत्रामदद्वृषाकपिरर्यः पुष्टेषु मत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१॥

        परा हीन्द्र धावसि वृषाकपेरति व्यथिः ।
        नो अह प्र विन्दस्यन्यत्र सोमपीतये विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२॥

        किमयं त्वां वृषाकपिश्चकार हरितो मृगः ।
        यस्मा इरस्यसीदु न्वर्यो वा पुष्टिमद्वसु विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥३॥

        यमिमं त्वं वृषाकपिं प्रियमिन्द्राभिरक्षसि ।
        श्वा न्वस्य जम्भिषदपि कर्णे वराहयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥४॥

        प्रिया तष्टानि मे कपिर्व्यक्ता व्यदूदुषत्।
        शिरो न्वस्य राविषं न सुगं दुष्कृते भुवं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥५॥

        न मत्स्त्री सुभसत्तरा न सुयाशुतरा भुवत्।
        न मत्प्रतिच्यवीयसी न सक्थ्युद्यमीयसी विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥६॥

        उवे अम्ब सुलाभिके यथेवाङ्गं भविष्यति ।
        भसन् मे अम्ब सक्थि मे शिरो मे वीव हृष्यति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥७॥

        किं सुबाहो स्वङ्गुरे पृथुष्टो पृथुजाघने ।
        किं शूरपत्नि नस्त्वमभ्यमीषि वृषाकपिं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥८॥

        अवीरामिव मामयं शरारुरभि मन्यते ।
        उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥९॥

        संहोत्रं स्म पुरा नारी समनं वाव गच्छति ।
        वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१०॥

        इन्द्राणीमासु नारिषु सुभगामहमश्रवम् ।
        नह्यस्या अपरं चन जरसा मरते पतिर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥११॥

        ____________________________________
        नाहमिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेर्ऋते ।
        यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१२॥

        वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे ।
        घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१३॥

        उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंसतिम् ।
        उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१४॥

        वृषभो न तिग्मशृङ्गोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत्।
        मन्थस्त इन्द्र शं हृदे यं ते सुनोति भावयुर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१५॥

        न सेशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत्।
        सेदीशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१६॥

        न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते ।
        सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृत्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१७॥

        अयमिन्द्र वृषाकपिः परस्वन्तं हतं विदत्।
        असिं सूनां नवं चरुमादेधस्यान आचितं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१८॥

        अयमेमि विचाकशद्विचिन्वन् दासमार्यम् ।
        पिबामि पाकसुत्वनोऽभि धीरमचाकशं विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१९॥

        धन्व च यत्कृन्तत्रं च कति स्वित्ता वि योजना ।
        नेदीयसो वृषाकपेऽस्तमेहि गृहामुप विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२०॥

        पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै ।
        य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२१॥

        यदुदञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगन्तन ।
        क्व स्य पुल्वघो मृगः कमगं जनयोपनो विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२२॥

        पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम् ।
        भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥२३॥

        _________    

        ॥७-एवमिन्द्राण्या शप्तो वृषाकपिर्ब्रवीति । “उवे इति संबोधनार्थो निपातः । हे "अम्ब= मातः “सुलाभिके= शोभनलाभे त्वया "यथैव येन प्रकारेणैवोक्तं तथैव तत् "अङ्ग क्षिप्रं "भविष्यति भवतु । किमनेन त्वदनुप्रीतिकारिणा ग्रहेण मम प्रयोजनम् । किंच "मे मम पितुः त्वदीयो “भसत् भग उपयुज्यताम्। किंच मम पितुस्त्वदीयं "सक्थि चोपयुज्यताम् । किंच "मे मम पितरमिन्द्रं त्वदीयं "शिरः च प्रियालापेन “वीव यथा कोकिलादिः पक्षी तद्वत् “हृष्यति हर्षयतु । मम पिता “इन्द्रः "विश्वस्मात् “उत्तरः ॥

        "अनुवाद :-

        इस प्रकार इन्द्राणी के द्वारा बुरा भला कहा गया वृषाकपि कहता है। हे माता ! सुन्दर लाभ में जिस प्रकार तुमने कहा है। वैसा ही अंग शीघ्र हो जाए तुम्हारे इस प्रेम करने में मेरा क्या प्रयोजन है। मेरे पिता के लिये तुम्हारी यौनि  उपयुक्त हो। और मेरे पिता के लिए तुम्हारी जंघा उपयुक्त हो। मेरे पिता को तुम्हारा सिर प्रेमालाप से कोयल आदि पक्षीयों की भाँति  हर्षित करे। मेरे पिता इन्द्र समस्त जगत में उत्तम है।७।

         ।८-क्रुद्धामिन्द्र उपशमयति । हे “सुबाहो हे =शोभनबाहो{ "स्वङ्गुरे= शोभनाङ्गुलिके} “पृथुष्टो पृथुकेशसंघाते “पृथुजघने विस्तीर्णजघने "शूरपत्नि वीरभार्ये हे इन्द्राणि “त्वं "नः अस्मदीयं “वृषाकपिं “किं किमर्थम् "अभ्यमीषि अभिक्रुध्यसि । एकः किंशब्दः पूरणः । यस्य पिता “इन्द्रः अहं “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥

        "अनुवाद :-

        ॥९-पुनरिन्द्रमिन्द्राणी ब्रवीति ।“शरारुः= घातुको मृगः “अयं वृषाकपिः “माम् इन्द्राणीम् “अवीरामिव "अभि "मन्यते विजानाति । "उत अपि च “इन्द्रपत्नी इन्द्रस्य भार्या "अहम् इन्द्राणी “वीरिणी पुत्रवती " *मरुत्सखा मरुद्भिर्युक्ता च "अस्मि भवामि ।*

        अनुवाद:

        “[ इन्द्राणी बोलती है]: यह क्रूर जानवर ( वृशाकापि ) मुझे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में तुच्छ जानता है जिसका कोई नर (रक्षक) नहीं है, और फिर भी मैं नर संतानों की मां हूं, इंद्र की पत्नी हूं , मरुतों की मित्र  ; इंद्र सब (संसार) से ऊपर है।”

        सायण की टिप्पणी: ऋग्वेद-भाष्य (ऋग्वेद 10/86/9)

        [इंद्राणी बोलती है]: यह जंगली जानवर (वृषाकपि) मुझे ऐसे तुच्छ समझता है जैसे कि उसका कोई नर (रक्षक) नहीं है, और फिर भी मैं नर संतानों की मां हूं, इंद्र की पत्नी हूं, मरुतों की मित्र हूं; इंद्र सब (संसार) से ऊपर है।

        "अनुवाद :-

        १०-नारी= स्त्री “ऋतस्य= सत्यस्य "वेधाः= विधात्री “वीरिणी= पुत्रवती “इन्द्रपत्नी इन्द्रस्य भार्येन्द्राणी “संहोत्रं स्म समीचीनं यज्ञं खलु “समनं= संग्रामं “वा। समितिः समनम्' इति संग्रामनामसु पाठात् । "अव प्रति “पुरा “गच्छति । “महीयते स्तोतृभिः स्तूयते च । तस्या मम पतिः “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ २ ॥

        "अनुवाद :-

         ॥११-अथेन्द्राणीमिन्द्रः स्तौति । "आसु सौभाग्यवत्तया प्रसिद्धासु "नारिषु स्त्रीषु स्त्रीणां मध्ये “इन्द्राणीं “सुभगां सौभाग्यवतीम् "अहम् इन्द्रः “अश्रवम् अश्रौषम्। किंच “अस्याः इन्द्राण्याः “पतिः पालकः "विश्वस्मात् "उत्तरः उत्कृष्टतरः "इन्द्रः “अपरं “चन अन्यद्भूतजातमिव "जरसा =वयोहान्या ("नहि "मरते न खलु म्रियते )

        । यद्वा । इदं वृषाकपेर्वाक्यम् । तस्मिन् पक्षे त्वहमिति शब्दो वृषाकपिपरतया योज्यः । अन्यत्समानम् ॥

        "अनुवाद :-

        ______________________

        १३-हे वृषाकपायि । कामानां वर्षकत्वादभीष्टदेशगमनाच्चेन्द्रो वृषाकपिः । तस्य पत्नि । यद्वा । वृषाकपेर्मम मातरित्यर्थः । “रेवति धनवति "सुपुत्रे शोभनपुत्रे "सुस्नुषे शोभनस्नुषे हे इन्द्राणि "ते तवायम्

        ___________________

        "इन्द्रः {"उक्षणः= Oxen सेचन समर्थान् “आदु= अद् भक्षणे) अनन्तरमेव । शीघ्रमेवेत्यर्थः । पशून्- “घसत्= प्राश्नातु । किंच “काचित्करम् । कं= सुखम् । तस्याचित् संघः । तस्करं हविः "प्रियम् इष्टं कुर्विति शेषः । किंच ते पतिः “इन्द्रः “विश्वस्मात् “उतरः । तथा च यास्कः - ‘ वृषाकपायि रेवति सुपुत्रे मध्यमेन {सुस्नुषे}  पुत्रवधू-

        माध्यमिकया वाचा । स्नुषा साधुसादिनीति वा साधुसानिनीति वा । प्रियं कुरुष्व सुखाचयकरं हविः सर्वस्माद्य इन्द्र उत्तरः' (निरु. १२, ९) इति

        "अनुवाद :-कामनाओं की वर्षा करने से वृषभ अभीष्टदेश को जाने से इन्द्र वृषाकपि है। हे धनवाली और उत्तम पुत्र वाली और पुत्र वधू वाली शचि ! तुम्हारे ये पति इन्द्र वीर्य दान करने नें समर्थ पशु ( बैल) को शीघ्र खाऐं। और तुम्हें सुख कर हवि प्रदान करें । तुम्हारे पति इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं।१३ ।

        ॥१४-अथेन्द्रो ब्रवीति । “मे =मदर्थं “पञ्चदश पञ्चदशसंख्याकान् “विंशतिं= विंशतिसंख्याकांश्च “उक्ष्णः= वृषभान् "साकं= सह मम भार्ययेन्द्राण्या। प्रेरिता यष्टारः "पचन्ति =। “उत अपि च अहमग्नि तान् भक्षयामि । जग्ध्वा चाहं "पीव =“इत स्थूल एव भवामीति शेषः । किंच "मे मम “उभा= उभौ “कुक्षी “पृणन्ति= सोमेन पूरयन्ति यष्टारः । सोऽहम् "इन्द्रः "सर्वस्मात् "उत्तरः ॥

        इसके बाद इन्द्र कहता है।  मेरी पत्नी इन्द्राणी द्वारा भेजे हुए याज्ञिक   पन्द्रह से बीस बैलों( वृषभों) को एक साथ पकाते हैं। और उन्हें  मैं  इन्द्र खाता हूँ । तथा उन्हें खाकर मोटा होता हूँ।मेरी मैंने कोशों को यज्ञ करने वाले सोम रस से भरते हैं। वह मैं इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हूँ।१४।

        १५-अथेन्द्राणी ब्रवीति ।"{तिग्मशृङ्गः =तीक्ष्णशृङ्गः शेप: वा} "वृषभो "न यथा वृषभः "यूथेषु गोसंघेषु “अन्तः =मध्ये “रोरुवत्= शब्दं कुर्वन् गा अभिरमयति- (मैथुन करोति) तथा हे इन्द्र त्वं मामभिरमय इति शेषः । किंच “हे इन्द्र "ते =तव "हृदे हृदयाय "मन्थः =दध्नो मथनवेलायां शब्दं कुर्वन् “शं शंकरो भवत्विति शेषः । किंच "ते तुभ्यं "यं सोमं “भावयुः भावमिच्छन्तीन्द्राणी “सुनीति अभिषुणोति सोऽपि शंकरो भववित्यर्थः । मम पतिः “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः ॥१५ ॥

        "अनुवाद :-

        इसके बाद इन्द्राणी कहती है कि हे  इन्द्र! जैसे तेज लिंग या सींगों वाला वृषभ गायों के समूह के बीच  में आवाज करता हुआ प्रसन्न होता है। वैसे ही तुम मेरे साथ रमण( सैक्स ) करो । तुम्हारे हृदय के लिए दधिमन्थन के सयय में शब्द करता हुआ  कल्याण कारी हो। तुम्हारे लिए इन्द्राणी भावाभिलाषिणी जिस सोम को अभिषुत करती है। वह सोम भी कल्याण कारी हो । मेरे पति समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं ।१५।

        १६- हे इन्द्र "सः जनः “न “ईशे मैथुनं कर्तुं नेष्टे न शक्नोति "यस्य जनस्य “कपृत् =शेपः “सक्थ्या= सक्थिनी “अन्तरा "रम्बते= लम्बते । "सेत् स एव स्त्रीजने “ईशे =मैथुनं कर्तुं शक्नोति “यस्य जनस्य “निषेदुषः शयानस्य "रोमशम् उपस्थं "=विज़म्भते विवृतं भवति । यस्य च पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् “उत्तरः ॥

        अश्लील अर्थ-

        "अनुवाद :-

        हे इन्द्र वह मनुष्य  कभी मैथुन नहीं कर सकता  , जिस पुरुष का लिंग जंघाओं के बीच में लम्बा होकर लटक जाता है। वही पुरुष स्त्री के साथ मैथुन कर सकता है  जिस लेटे हुए पुरुष का लिंग विस्तृत हो जाता है। इन्द्राणी का पति इन्द्र समस्त जगत में श्रेष्ठ हैं ।१६।

        न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते । सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥१७॥

        (अथर्ववेद में भी  - काण्ड » 20; सूक्त » 126; ऋचा » 16 है।

        सः) वह पुरुष (न ईशे) ऐश्वर्यवान् नहीं होता है, (यस्य) जिसका (कपृत्) लिंग (सक्थ्या अन्तरा) दोनों जंघाओं के बीच (रम्बते) नीचे लटकता है, (सः इत्) वही पुरुष (ईशे) ऐश्वर्यवान् होता है, (यस्य निषेदुषः) जिस बैठे हुए  हुए]पुरुष का (रोमशम्) रोमवाला लिंग।(विजृम्भते) जम्हाई लेता है फैलता है, (इन्द्रः) इन्द्र (विश्वस्मात्) सब [प्राणी मात्र] से (उत्तरः) उत्तम है ॥१६॥

        सक्थि= उरु( जाँघ) (सज्यते इति । सन्ज सङ्गे + “ असिसञ्जिभ्यां क्थिन् ।  “ उणा० ३ । १५४ । क्थिन् । )  ऊरुः ।  इत्यमरः कोश ॥  (यथा   मार्कण्डेये ।  १८ ।  ४९ । “ नृणां पदे स्थिता लक्ष्मीर्निलयं संप्रयच्छति । सक्थ्नोश्च संस्थिता वस्त्रं तथा नानाविधं वसु ॥ ) शकटावयवविशेषः । इत्युणादिकोषः ॥

        सक्थि शब्द यूरोपीय तथा ईरानी ईराकी भाषाओं में भी है।

        Etymology-

        From Proto-Indo-Iranian *sáktʰiš,(सक्थि) from Proto-Indo-European *sokʷHt-i-s (“thigh”). Cognate with Avestan 𐬵𐬀𐬑𐬙𐬌‎ (haxti, “thigh”), Old Armenian ազդր (azdr), Middle Persian [script needed] (h(ʾ)ht' /⁠haxt⁠/, “thigh”), Ossetian агъд (aǧd), Hittite [Term?] (/⁠šakuttai⁠/).

        Noun-

        सक्थि  (sákthin

        1. the thigh, thigh-bone quotations 
        2. the pole or shafts of a cart
        3. (euphemistic, in the dual) the female genitals quotations 

        Declension-

        Neuter i-stem declension of सक्थि (sákthi)

        Further reading

        कपृत्- लिंग![संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग "लिंग।"
         < रोमश[संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, नपुंसकलिंग"वल्व =गर्भे (उल्व- यौनि भग)
        "अनुवाद :-वह मनुष्य मैथुन नहीं कर सकता  जिस लेटे हुए पुरुष का लिंग लटक जाता है।किन्तु वही मनुष्य मैथुन कर सकता है जिस मनुष्य का लिंग जंघाओं के बीच में  अकड़ता जम्हाई लेता है।

        शेष अर्थ पूर्ववत् है। यहाँ पूर्वोक्त का अन्तर  देखने योग्य है। पहली ऋचा में इन्द्राणी इन्द्र से कहती है। और उस दूसरी ऋचा में इन्द्र इन्द्राणी से कहता है। इस प्रकार दौंनों में कोई विरोध नहीं है।१७। कामशास्त्र की खुलकर वार्ता है।

        अर्थ:- (वृषभः-न तिग्मशृङ्गः) जैसे तीक्ष्ण शृङ्गवाला वृषभ-साँड (यूथेषु-अन्तः-रोरुवत्) गोसमूहों के अन्दर बहुत शब्द करता है, तथा वैसे (इन्द्र) हे इन्द्र  (ते मन्थः) तेरा मन्थन व्यापार  (हृदे शम्) हृदय के लिये कल्याणकारी हो (तं यं भावयुः-सुनोति) उस जिस पुत्र को आत्मभाव चाहनेवाली अपनानेवाली इन्द्राणी उत्पन्न करती है (न सः-ईशे) वह नहीं स्वामित्व करता है, न ही (यस्य कपृत्) जिसका लिंग (सक्थ्या-अन्तरा लम्बते) दोनों  जङ्घाओं के मध्य में लम्बित होता लटकता है (स-इत्-ईशे) वह ही समर्थ होता है (यस्य निषेदुषः) जिस निकट शयन करते हुए का (रोमशं विजृम्भते) रोमोंवाला लिंग  विजृम्भन करता है-फड़कता है (न सः-ईशे) वह मैथुन  नहीं कर सकता है (यस्य निषेदुषः-रोमशं विजृम्भते) जिसके निकट शयन किये हुए रोमोंवाला अङ्ग फड़कता है (सः-इत्-ईशे) वह ही गृहस्थकर्म पर अधिकार रखता है (यस्य सक्थ्या-अन्तरा कपृत्-लम्बते) जिसके निकट शयन करने पर -जङ्घाओं के बीच में लिंग विजृम्भित होता है, वह ही स्त्रीयोंपर अधिकार कर पाता  है ॥१७॥

        शृङ्गं हि मन्मथोद्भेदस्तदागमनहेतुकः । उत्तमप्रकृतिप्रायो रसः शृङ्गार इष्यते ॥

        शृङ्ग= न॰ शॄ--गन् पृषो॰ मुम् ह्रस्वश्च।
        १ पर्वतोपरिभागेसातौ अमरः कोश।
        २ प्रभुत्वे
        ३ चिह्ने
        ४ जलक्रीडार्थयन्त्रभेदे(पिचकारी) लिङ्गे च। यूरोपीय  रूप सिरञ्ज- syringe से साम्य- दीनां विषाणे (शृङ्गा)
        ६ उत्कर्षे चमेदि॰।
        ७ ऊर्ये
        ८ तीक्ष्णे
        ९ पद्मे च शब्दर॰
        १० महिष- शृङ्गनिर्मितवाद्यभेदे (शिङ्ग)
        ११ कामोद्रेके साहित्यदर्पण- शृङ्गार शब्दे दृश्यम्।
        १२ कूर्चशीर्षकवृक्षे पु॰ मेदिनीकोश।

        syringe (noun) (latin-suringa)  (Greek-syringa,)

        सिरिंज (संज्ञा) संकीर्ण ट्यूब," जो"तरल  धारा इंजेक्ट करने के लिए 15-वीं सदी की शुरुआत में.प्रयोग होता था (पहले यह  सुरिंगा, 14वीं सदी के अंत में था), जो लेट लैटिन के (सिरिंज,)(श्रृंगा-) से ग्रीक के  (सिरिंज,) सिरिंक्स से आया।

        "ट्यूब, होल, चैनल, शेफर्ड पाइप," सिरिजिन से संबंधित "पाइप, सीटी, फुसफुसाहट के लिए" ,'' श्रृँग - सींग -से सम्बन्धित हैं।

        १८ हे  “इन्द्र "अयं “वृषाकपिः "परस्वन्तं परस्वमात्मनो विषयेऽवर्तमानं "हतं= हिंसितं “विदत् =विन्दतु । तथा हतस्य विशसनाय “असिं =शस्त्रं "सूनाम्= उद्धानं पाकार्थं "नवं प्रत्यग्रं "चरुं =भाण्डम् “आत् अनन्तरम् “{एधस्य काष्ठस्य} “आचितं पूर्णम् "अनः =शकटं च विन्दतु । मस पतिः "इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥

        बैल पकाने का जिक्र-

        −(इन्द्र) हे इन्द्र ! (अयं वृषाकपिः) यह वृषाकपि-है।(परस्वन्तं हतं विदत्) वराहयु-वन्य कुत्ते को मार सका (असिम्) काटनेवाले शस्त्र तलवार को (सूनाम्) वधस्थान को (नवं चरुम्)  नव अन्न हवि को (आत्) अनन्तर और (एधस्य-आचितम्-अनः) जलाने के लिये ईंधन के भरे शकट-छकड़े को इन हत्या के साधनों को अपने अधीन कर लिया, ॥१८॥

        ______________________

        "अनुवाद : भाष्य-

         ॥१९-अथेन्द्रो ब्रवीति । "विचाकशत् पश्यन् यजमानान् “दासम्= उपक्षपयितारम् {सुरम्= "आर्यम् }अपि च "विचिन्वन् = पृथक्कुर्वन् "अयम् अहमिन्द्रः “एमि= यज्ञं प्रति गच्छामि। यज्ञं गत्वा च “पाकसुत्वनः । पचतीति =पाकः । सुनोतीति =सुत्वा । हविषां पक्तुः सोमस्याभिषोतुर्यजमानस्य पाकेन विपक्वेन मनसा सोमस्याभिषोतुर्वा यजमानस्य संबन्धिनं सोमं "पिबामि । तथा “धीरं धीमन्तं यजमानम् "अभि "अचाकशम्= अभिपश्यामि । योऽहम् "इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः॥

        "अनुवाद :-भाष्य-

        ॥२०"धन्व निरुदकोऽरण्यरहितो देशः । "कृन्तत्रं कर्तनीयमरण्यम् । "यत् यत् "च “धन्व "च कृन्तत्रं च भवति । मृगोद्वासमरण्यमेवंविधं भवति न त्वत्यन्तविपिनम् । तस्य शत्रुनिलयस्यास्मदीयगृहस्य च मध्ये "कति "स्वित् “ता तानि “योजना योजनानि स्थितानि । नात्यन्तदूरे तद्भवतीत्यर्थः । अतः "नेदीयसः अतिशयेन समीपस्थाच्छत्रुनिलयात् हे "वृषाकपे त्वम् "अस्तम् अस्माकं गृहं “वि “एहि विशेषेणागच्छ । आगत्य च "गृहान् यज्ञगृहान् "उप गच्छ । यतोऽहम् "इन्द्रः सर्वस्मादुत्कृष्टः ॥

        "अनुवाद :-भाष्य-

        २१-आगत्य प्रतिगतं वृषाकपिमिन्द्रो ब्रवीति । हे "वृषाकपे त्वं "पुनरेहि अस्मान् प्रत्यागच्छ । आगते च त्वयि "सुविता सुवितानि कल्याणानि त्वच्चित्तप्रीतिकराणि कर्माणि "कल्पयावहै इन्द्राण्यहं च आवामुभौ पर्यालोच्य कुर्याव । किंच “यः स्वप्ननंशनः उदयेन सर्वस्य प्राणिनः स्वप्नानां नाशयिता आदित्यः सः “एषः त्वं “पथा मार्गेण “अस्तम् आत्मीयमावासं "पुनः “एषि गच्छसि । यतोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् “उत्तरः। तथा च यास्कः - ‘ सुप्रसूतानि वः कर्माणि कल्पयावहै य एष स्वप्ननंशनः स्वप्नान्नाशयस्यादित्य उदयेन सोऽस्तमेषि पथा पुनः' (निरु. १२.२८) इति ॥

        "अनुवाद :-भाष्य-

        २२-गत्वा पुनरागतं वृषाकपिमिन्द्रः पृच्छति । हे “इन्द्र= परमैश्वर्यवन् हे "वृषाकपे यूयम् "उदञ्चः उद्गामिनः सन्तो मद्गृहम् "अजगन्तन =आगच्छ ।

        एकस्यापि बहुवचनं पूजार्थम् । तत्र भवतः संबन्धी “पुल्वघः बहूनां भौमरसानामत्ता “स्यः सः "मृगः "क्व अभूत् "जनयोपनः जनानां मोदयिता मृगः "कं वा देशम् "अगन् =अगच्छत् । सोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः । यद्वा इन्द्राणीवाक्यमिदम् । अत्र यास्कः-- ‘यदुदुञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगमत क्व स्य पुल्वघो मृगः क्व स बह्वादी मृगः । मृगो मार्ष्टेर्गतिकर्मणः । कमगमद्देशं जनयोपनः ' (निरु. १३. ३ ) इति ॥

        "अनुवाद :-भाष्य-

        २३-इन्द्रविसृज्यमानमनेन' मन्त्रेण वृषाकपिराशास्ते । हे "भल इन्द्रेण विसृज्यमान शर । भलतिर्भेदनकर्मा । ("पर्शुः "नाम मृगी) । “ह इति पूरणः । "मानवी मनोर्दुहितेयं "विंशतिं विंशतिसंख्याकान् पुत्रान् "साकं= सह "ससूव= अजीजनत् । "त्यस्यै =तस्यै “भद्रं भजनीयं कल्याणम् "अभूत् =भवतु । लोडर्थे लुङ। "यस्या

         "उदरमामयत्= गर्भस्थैर्विंशतिभिः पुत्रैः पुष्टमासीत् । मम पिता “इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ ४ ॥

        "अनुवाद :-भाष्य-

        Yima (Yama) – the first mortal king to have ruled. He was favored by the gods and given supernatural powers. When the population grew too large, he enlarged the world and also saved the world when the gods informed him a bitter winter was coming and he enclosed animals, vegetation, and seeds in a giant barn (a tale preceding the biblical narrative of Noah and his Ark) to preserve life. He fell from divine grace when he began to think more highly of himself than he should have. Even so, for his virtuous service, he was made Lord of the Dead, and the afterlife was initially known as Yima's Realm.


        Jamshid (Jam, Yima Kshaeta) – the fourth king of the world who brought civilization to its greatest height, initiated the construction of cities, established social hierarchy, and introduced winemaking. According to one part of his legend, Jamshid banished a woman of his harem who, in attempting to commit suicide afterwards, drank a bottle of fermented grape juice thinking it was poison. When she found it produced pleasing sensations, she brought the rest to Jamshid who reinstated her and decreed that grapes should be used in making wine.

        Indar – the early god of courage, bravery, heroism, and warfare.

        Indra – the demon of apostasy who encouraged the abandonment of religious practice and true faith.

        Haoma सोम:– god of the harvest, health, strength, and vitality; personification of the haoma plant whose juices brought enlightenment and of which Gaokerena was the greatest and largest.

        Daevas व- – the mostly male demons in the service of Angra Mainyu who spread lies and disorder in the world. They are the sworn enemies of the Amesha Spentas and all that is good and work closely with the drujs who are mostly female demons.

        Dev – demon of war and the terror of war, one of the most powerful daevas, completely lacking in morality or compassion.

        Atar अत्रि- – the god of fire who is also the personification of fire and physically present when fires are lighted. He is associated with light, righteousness, and purity.


        २१-आगत्य प्रतिगतं वृषाकपिमिन्द्रो ब्रवीति । हे "वृषाकपे त्वं "पुनरेहि अस्मान् प्रत्यागच्छ । आगते च त्वयि "सुविता सुवितानि कल्याणानि त्वच्चित्तप्रीतिकराणि कर्माणि "कल्पयावहै इन्द्राण्यहं च आवामुभौ पर्यालोच्य कुर्याव । किंच “यः स्वप्ननंशनः उदयेन सर्वस्य प्राणिनः स्वप्नानां नाशयिता आदित्यः सः “एषः त्वं “पथा मार्गेण “अस्तम् आत्मीयमावासं "पुनः “एषि गच्छसि । यतोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् “उत्तरः। तथा च यास्कः - ‘ सुप्रसूतानि वः कर्माणि कल्पयावहै य एष स्वप्ननंशनः स्वप्नान्नाशयस्यादित्य उदयेन सोऽस्तमेषि पथा पुनः' (निरु. १२.२८) इति ॥

        "अनुवाद :-भाष्य-

        २२-गत्वा पुनरागतं वृषाकपिमिन्द्रः पृच्छति । हे “इन्द्र= परमैश्वर्यवन् हे "वृषाकपे यूयम् "उदञ्चः उद्गामिनः सन्तो मद्गृहम् "अजगन्तन =आगच्छ ।

        एकस्यापि बहुवचनं पूजार्थम् । तत्र भवतः संबन्धी “पुल्वघः बहूनां भौमरसानामत्ता “स्यः सः "मृगः "क्व अभूत् "जनयोपनः जनानां मोदयिता मृगः "कं वा देशम् "अगन् =अगच्छत् । सोऽहम् “इन्द्रः "विश्वस्मात् "उत्तरः । यद्वा इन्द्राणीवाक्यमिदम् । अत्र यास्कः---- ‘ यदुदुञ्चो वृषाकपे गृहमिन्द्राजगमत क्व स्य पुल्वघो मृगः क्व स बह्वादी मृगः । मृगो मार्ष्टेर्गतिकर्मणः । कमगमद्देशं जनयोपनः ' (निरु. १३. ३ ) इति ॥

        "अनुवाद :-भाष्य-

        २३-इन्द्रविसृज्यमानमनेन' मन्त्रेण वृषाकपिराशास्ते । हे "भल इन्द्रेण विसृज्यमान शर । भलतिर्भेदनकर्मा । ("पर्शुः "नाम मृगी) । “ह इति पूरणः । "मानवी मनोर्दुहितेयं "विंशतिं विंशतिसंख्याकान् पुत्रान् "साकं= सह "ससूव= अजीजनत् । "त्यस्यै =तस्यै “भद्रं भजनीयं कल्याणम् "अभूत् =भवतु । लोडर्थे लुङ। "यस्या

         "उदरमामयत्= गर्भस्थैर्विंशतिभिः पुत्रैः पुष्टमासीत् । मम पिता “इन्द्रः “विश्वस्मात् "उत्तरः ॥ ॥ ४ ॥

        "अनुवाद :-भाष्य-

        Yima (Yama) – the first mortal king to have ruled. He was favored by the gods and given supernatural powers. When the population grew too large, he enlarged the world and also saved the world when the gods informed him a bitter winter was coming and he enclosed animals, vegetation, and seeds in a giant barn (a tale preceding the biblical narrative of Noah and his Ark) to preserve life. He fell from divine grace when he began to think more highly of himself than he should have. Even so, for his virtuous service, he was made Lord of the Dead, and the afterlife was initially known as Yima's Realm.


        Jamshid (Jam, Yima Kshaeta) – the fourth king of the world who brought civilization to its greatest height, initiated the construction of cities, established social hierarchy, and introduced winemaking. According to one part of his legend, Jamshid banished a woman of his harem who, in attempting to commit suicide afterwards, drank a bottle of fermented grape juice thinking it was poison. When she found it produced pleasing sensations, she brought the rest to Jamshid who reinstated her and decreed that grapes should be used in making wine.

        Indar – the early god of courage, bravery, heroism, and warfare.

        Indra – the demon of apostasy who encouraged the abandonment of religious practice and true faith.

        Haoma सोम:– god of the harvest, health, strength, and vitality; personification of the haoma plant whose juices brought enlightenment and of which Gaokerena was the greatest and largest.

        Daevas व- – the mostly male demons in the service of Angra Mainyu who spread lies and disorder in the world. They are the sworn enemies of the Amesha Spentas and all that is good and work closely with the drujs who are mostly female demons.

        Dev – demon of war and the terror of war, one of the most powerful daevas, completely lacking in morality or compassion.

        Atar अत्रि- – the god of fire who is also the personification of fire and physically present when fires are lighted. He is associated with light, righteousness, and purity.


         
         हित्ती पौराणिक कथा - , हुर्रियन और हित्ती प्रभावों का मिश्रण है । मेसोपोटामिया( ईरान ईराॐ और कनानी प्रभाव हुर्रियन पौराणिक कथाओं के माध्यम से अनातोलिया की पौराणिक कथाओं में प्रवेश करता हैं। हित्ती निर्माण मिथक क्या रहा होगा, इसका कोई ज्ञात विवरण नहीं है, लेकिन विद्वानों का अनुमान है कि हिट्टियन मातृ देवी, जिसे नवपाषाण स्थल कैटालहोयुक से ज्ञात "महान देवी" अवधारणा से जुड़ा माना जाता है , अनातोलियन तूफान की पत्नी हो सकती है। भगवान (जो थोर , इंद्र और ज़ीउस जैसी अन्य परंपराओं के तुलनीय देवताओं से संबंधित माना जाता है )।

        यूरोपीय पुरातन कथाओं में इन्द्र को "एण्ड्रीज" (Andreas) के रूप में वर्णन किया गया है । जिसका अर्थ होता है शक्ति सम्पन्न व्यक्ति ।

          🌅⛵ 

        Andreas - son of the river god peneus and founder of orchomenos in Boeotia।

        Andreas Ancient Greek - German was the son of river god peneus in Thessaly from whom the district About orchomenos in Boeotia was called Andreas in Another passage pousanias speaks of Andreas( it is , however uncertain whether he means the same man as the former) as The person who colonized the island of Andros .... 

        अर्थात् इन्द्र थेसिली में एक नदी देव पेनियस का पुत्र था । जिससे एण्ड्रस नामक द्वीप नामित हुआ 

        पेनिस - लिंगेन्द्रीय का वाचक है। _____________________________

        "डायोडॉरस के अनुसार .." ग्रीक पुरातन कथाओं के अनुसार एण्ड्रीज (Andreas) रॉधामेण्टिस (Rhadamanthys) से सम्बद्ध था । रॉधमेण्टिस ज्यूस तथा यूरोपा का पुत्र और मिनॉस (मनु) का भाई था । 

        ग्रीक पुरातन कथाओं में किन्हीं विद्वानों के अनुसार एनियस (Anius) का पुत्र एण्ड्रस( Andrus) के नाम से एण्ड्रीज प्रायद्वीप का नामकरण करता है।

        जो अपॉलो का पुजारी था  परन्तु पूर्व कथन सत्य है । ग्रीक भाषा में इन्द्र शब्द का अर्थ शक्ति-शाली पुरुष है । जिसकी व्युत्पत्ति- ग्रीक भाषा के ए-नर (Aner) शब्द से हुई है ।

        जिससे एनर्जी (energy) शब्द विकसित हुआ है। संस्कृत भाषा में{ अन् =श्वसने प्राणेषु च }के रूप में  वैदिक कालीन धातु विद्यमान है ।

        जिससे प्राण तथा अणु जैसे शब्दों का विकास हुआ है।

        कालान्तरण में वैदिक  भाषा में नर शब्द भी इसी रूप से व्युत्पन्न हुआ .... वेल्स भाषा में भी नर व्यक्ति का वाचक है । फ़ारसी मे नर शब्द तो है ।

        परन्तु इन्द्र शब्द नहीं है  इनदर है। वेदों में इन्द्र को वृत्र का शत्रु बताया है।यह सर्व विदित है।

        वृत्र को केल्टिक माइथॉलॉजी मे (ए-बरटा) ( Abarta ) कहा है । जो वहाँ दनु और त्वष्टा परिवार का सदस्य है । 

        इन्द्रस् देवों का नायक अथवा यौद्धा था ।

        भारतीय पुरातन कथाओं में त्वष्टा को इन्द्र का पिता बताया है।

         शम्बर को ऋग्वेद के द्वित्तीय मण्डल के सूक्त १४ / १९ में कोलितर कहा है पुराणों में इसे दनु का पुत्र कहा है । जिसे इन्द्र मारता है । ऋग्वेद में इन्द्र पर आधारित २५० सूक्त हैं । यद्यपि कालान्तरण में सुरों के नायक को ही इन्द्र उपाधि प्राप्त हुई ।

        अत: कालान्तरण में भी जब देवोपासक  भू- मध्य रेखीय भारत भूमि में आये ... जहाँ भरत अथवा वृत्र की अनुयायी व्रात्य ( वारत्र )नामक जन जाति पूर्वोत्तरीय स्थलों पर निवास कर रही थी।

         भारत में भी यूरोप से आगत सुरों की सांस्कृतिक मान्यताओं में भी स्वर्ग उत्तर में है । और नरक दक्षिण में है ।

        स्मृति रूप में अवशिष्ट रहीं ... और विशेष तथ्य यहाँ यह है कि नरक के स्वामी यम हैं यह मान्यता भी यहीं से मिथकीय रूप में स्थापित हुई ।

        नॉर्स माइथॉलॉजी के ग्रन्थ प्रॉज-एड्डा में नारके का अधिपति यमीर को बताया गया है। 

        यमीर यम ही यूरोपीय रूपान्तरण है । हिम शब्द संस्कृत में यहीं से विकसित है यूरोपीय लैटिन आदि भाषाओं में हीम( Heim) शब्द हिम के लिए आज भी यथावत है। 

        नॉर्स माइथॉलॉजी प्रॉज-एड्डा में यमीर (Ymir) Ymir is a primeval being , who was born from venom that dripped from the icy - river earth from his flesh and from his blood the ocean , from his bones the hills from his hair the trees from his brains the clouds from his skull the heavens from his eyebrows middle realm in which mankind lives" _______________________________

         (Norse mythology prose adda) अर्थात् यमीर ही सृष्टि का प्रारम्भिक रूप है। यह हिम नद से उत्पन्न , नदी और समुद्र का अधिपति हो गया । पृथ्वी इसके माँस से उत्पन्न हुई ,इसके रक्त से समुद्र और इसकी अस्थियाँ पर्वत रूप में परिवर्तित हो गयीं इसके वाल वृक्ष रूप में परिवर्तित हो गये ,मस्तिष्क से बादल और कपाल से स्वर्ग और भ्रुकुटियों से मध्य भाग जहाँ मनुष्य रहने लगा उत्पन्न हुए .. ऐसी ही धारणाऐं कनान देश की संस्कृति में थी । वहाँ यम को यम रूप में ही नदी और समुद्र का अधिपति माना गया है। 

        जो हिब्रू परम्पराओं में या: वे अथवा यहोवा हो गया उत्तरी ध्रुव प्रदेशों में जब शीत का प्रभाव अधिक हुआ तब नीचे दक्षिण की ओर ये लोग आये जहाँ आज बाल्टिक सागर है, यहाँ भी धूमिल स्मृति उनके ज़ेहन ( ज्ञान ) में विद्यमान् थी 

        बाल्टिक सागर के तट वर्ती प्रदेशों पर दीर्घ काल तक क्रीडाऐं करते रहे .

        पश्चिमी बाल्टिक सागर के तटों पर इन्हीं देव संस्कृति के अनुयायीयों ने मध्य जर्मन स्केण्डिनेवीया द्वीपों से उतर कर बोल्गा नदी के द्वारा दक्षिणी रूस .त्रिपोल्जे आदि स्थानों पर प्रवास किया आर्यों के प्रवास का सीमा क्षेत्र बहुत विस्तृत था । आर्यों की बौद्धिक सम्पदा यहाँ आकर विस्तृत हो गयी थी ।

        मनुः जिसे जर्मन आर्यों ने मेनुस् (Mannus) कहा आर्यों के पूर्व - पिता के रूप में प्रतिष्ठित थे ! मेन्नुस mannus( थौथा) (त्वष्टा)--(Thautha ) की प्रथम सन्तान थे ! 

        मनु के विषय में रोमन लेखक टेकिटस (tacitus) के अनुसार---- Tacitus wrote that mannus was the son of tuisto and The progenitor of the three germanic tribes ---ingeavones--Herminones and istvaeones .... ____________________________________ in ancient lays, their only type of historical tradition they celebrate tuisto , a god brought forth from the earth they attribute to him a son mannus, the source and founder of their people and to mannus three sons from whose names those nearest the ocean are called ingva eones , those in the middle Herminones, and the rest istvaeones some people inasmuch as anti quality gives free rein to speculation , maintain that there were more tribal designations- Marzi, Gambrivii, suebi and vandilii-__and that those names are genuine and Ancient Germania ____________________________________________

        Chapter 2 ग्रीक पुरातन कथाओं में मनु को मिनॉस (Minos)कहा गया है । जो ज्यूस तथा यूरोपा का पुत्र तथा क्रीट का प्रथम राजा था । जर्मन जाति का मूल विशेषण डच (Dutch) था । जो त्वष्टा नामक इण्डो- जर्मनिक देव ही है ।

         टेकिटिस लिखता है , कि Tuisto ( or tuisto) is the divine encestor of German peoples...... ट्वष्टो tuisto---tuisto--- शब्द की व्युत्पत्ति- भी जर्मन भाषाओं में *Tvai----" two and derivative *tvis --"twice " double" thus giving tuisto--- The Core meaning -- double अर्थात् द्वन्द्व -- अंगेजी में कालान्तरण में एक अर्थ द्वन्द्व- युद्ध (dispute / Conflict )भी होगया यम और त्वष्टा दौनों शब्दों का मूलत: एक समान अर्थ था इण्डो-जर्मनिक संस्कृतियों में  मिश्र की पुरातन कथाओं में त्वष्टा को (Thoth) अथवा tehoti ,Djeheuty कहा गया जो ज्ञान और बुद्धि का अधिपति देव था । ____________________________________

        आर्यों में यहाँ परस्पर सांस्कृतिक भेद भी उत्पन्न हुए विशेषतः जर्मन आर्यों तथा फ्राँस के मूल निवासी गॉल ( Goal ) के प्रति जो पश्चिमी यूरोप में आवासित ड्रूयूडों की ही एक शाखा थी l जो देवता (सुर ) जर्मनिक जन-जातियाँ के थे लगभग वही देवता ड्रयूड पुरोहितों के भी थे । यही ड्रयूड( druid ) भारत में द्रविड कहलाए 

        इन्हीं की उपशाखाऐं  वेल्स (wels) केल्ट (celt )तथा ब्रिटॉन (Briton )के रूप थीं जिनका तादात्म्य (एकरूपता ) भारतीय जन जाति क्रमशः भिल्लस् ( भील ) किरात तथा भरतों से प्रस्तावित है ये भरत ही व्रात्य ( वृत्र के अनुयायी ) कहलाए आयरिश अथवा केल्टिक संस्कृति में वृत्र  का रूप अवर्टा ( Abarta ) के रूप में है यह एक देव है। जो थौथा (thuatha) (जिसे वेदों में त्वष्टा कहा है !) और दि - दानन्न ( वैदिक रूप दनु ) की सन्तान है .

        Abarta an lrish / celtic god amember of the thuatha त्वष्टाः and De- danann his name means = performer of feats अर्थात् एक कैल्टिक देव त्वष्टा और दनु परिवार का सदस्य वृत्र या Abarta जिसका अर्थ है कला या करतब दिखाने बाला देव यह अबर्टा ही ब्रिटेन के मूल निवासी ब्रिटों Briton का पूर्वज और देव था इन्हीं ब्रिटों की स्कोट लेण्ड ( आयर लेण्ड ) में शुट्र--- (shouter )नाम की एक शाखा थी , जो पारम्परिक रूप से वस्त्रों का निर्माण करती थी ।

         वस्तुतःशुट्र फ्राँस के मूल निवासी गॉलों का ही वर्ग था , जिनका तादात्म्य भारत में शूद्रों से प्रस्तावित है , ये कोल( कोरी) और शूद्रों के रूप में है ।

        जो मूलत: एक ही जन जाति के विशेषण हैं एक तथ्य यहाँ ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में जर्मन आर्यों और गॉलों में केवल सांस्कृतिक भेद ही था जातीय भेद कदापि नहीं ।

         क्योंकि आर्य शब्द का अर्थ यौद्धा अथवा वीर होता है । यूरोपीय लैटिन आदि भाषाओं में इसका यही अर्थ है । 

        बाल्टिक सागर से दक्षिणी रूस के पॉलेण्ड त्रिपोल्जे आदि स्थानों पर बॉल्गा नदी के द्वारा कैस्पियन सागर होते हुए भारत ईरान आदि स्थानों पर इनका आगमन हुआ । 

        आर्यों के ही कुछ क़बीले इसी समय हंगरी में दानव नदी के तट पर परस्पर सांस्कृतिक युद्धों में रत थे ।

        भरत जन जाति यहाँ की पूर्व अधिवासी थी संस्कृत साहित्य में भरत का अर्थ जंगली या असभ्य किया है। 

        और भारत देश के नाम करण कारण यही भरत जन जाति थी ।भारतीय प्रमाणतः जर्मन आर्यों की ही शाखा थे जैसे यूरोप में पाँचवीं सदी में जर्मन के ऐंजीलस कबीले के आर्यों ने ब्रिटिश के मूल निवासी ब्रिटों को परास्त कर ब्रिटेन को एञ्जीलस - लेण्ड अर्थात् इंग्लेण्ड कर दिया था और ब्रिटिश नाम भी रहा जो पुरातन है ।

        इसी प्रकार भारत नाम भी आगत आर्यों से पुरातन है दुष्यन्त और शकुन्तला पुत्र भरत की कथा बाद में जोड़ दी गयी जैन साहित्य में एक भरत ऋषभ देव परम्परा में थे। जिसके नाम से भारत शब्द बना।

        इस लिए द्रविड और शूद्र शब्द भी यूरोपीय मूल के हैं।

        आर्य द्रविड और शूद्र थ्योरी सत्यनिष्ठ नहीं है।

        दिया. इसलिए अधिकतर लोग संस्कृत भाषा बोलने लगे.

        संस्कृत बोलने वाले सीरिया के इस साम्राज्य के बारे में पहले जानते थे।

        इंडो-आर्यन परम्परा में . इन्द्र नाम की सबसे पुरानी तारीख़ी घटना 14-वीं सदी ईसापूर्व की बोगाज़कोय की प्रसिद्ध हित्ती-मितानी संधि में है। हां मितन्नी( मितज्ञु) दैवीय गवाहों के रूप में मित्र-वरुण, इंद्र और नासत्य का आह्वान करते हैं 

        यह सन्देश कीलाक्षर लिपि में है। जो उस समय सुमेर की लिपि थी।

        मितन्नी "एमोराइट-(मरुत) तथा हित्ती ये सुमेरियन जातियाँ थी।

        यदु और तुर्वसु को जब पुरोहितों ने नहीं छोड़ा तो उनके वंशज कृष्ण को कैसे छोड़ के।

        वेदों में यदु और तुर्वसु का नकारात्मक वर्णन-
        स॒त्यं तत्तु॒र्वशे॒ यदौ॒ विदा॑नो अह्नवा॒य्यं ।  व्या॑नट् तु॒र्वणे॒ शमि॑ ॥२७।
        (ऋग्वेद 8/45/27) 
        (पद-पाठ)
        स॒त्यम् । तत् । तु॒र्वशे॑ । यदौ॑ । विदा॑नः । अ॒ह्न॒वा॒य्यम् ।
        वि । आ॒न॒ट् । तु॒र्वणे॑ । शमि॑ ॥२७।।
        (सायण-भाष्य)
        “तुर्वशे राज्ञि “यदौ च यदुनामके च राज्ञि “तत् प्रसिद्धं यागादिलक्षणं “शमि कर्म  शची शमी' इति कर्मनामसु पाठात् । "सत्यं परमार्थं "विदानः जानंस्तयोः प्रीत्यर्थम् अह्नवाय्यम् अह्नवाय्यनामकं तयोः शत्रुं 
        “तुर्वणे= संग्रामे “व्यानट्= व्याप्तवान् ।।
        (पद का अर्थान्वय)
        _________
        अग्निना । तुर्वशम् । यदुम् । पराऽवतः । उग्रऽदेवम् । हवामहे ।   अग्निः । नयत् । नवऽवास्त्वम् । बृहत्ऽरथम् । तुर्वीतिम् । दस्यवे । सहः ॥१८।।
        (सायण-भाष्य)
        “अग्निना सहावस्थितान् तुर्वशनामकं यदुनामकम् उग्रदेवनामकं च राजर्षीन् "परावतः =दूरदेशात् "हवामहे =आह्वयामः ।                                  स च "अग्निः नववास्तुनामकं बृहद्रथनामकं तुर्वीतिनामकं च राजर्षीन् "नयत्= इहानयतु । कीदृशोऽग्निः ।                                       "दस्यवे "सहः अस्मदुपद्रवहेतोश्चोरस्याभिभविता ॥{ नयत् । ‘णीञ् प्रापणे'। लेटि अडागमः  इतश्च लोपः' इति इकारलोपः  } नववास्त्वम् । नवं वास्तु यस्यासौ नववास्तुः । ‘ वा छन्दसि' इत्यनुवृत्तेः अमि पूर्वत्वाभावे यणादेशः । बृहद्रथम् । बहुव्रीहौ पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वम् ॥
        ________________________________
        प्रियासः । इत् । ते । मघऽवन् । अभिष्टौ । नरः । मदेम । शरणे । सखायः । नि । तुर्वशम् । नि । याद्वम् । शिशीहि । अतिथिऽग्वाय । शंस्यम् । करिष्यन् ॥८।
        अथर्ववेद में भी (काण्ड २० /अध्याय ५/ सूक्त ३७/ ऋचा ७)
         हे इन्द्र !  हम तुम्हारे मित्र रूप यजमान 
        अपने घर में प्रसन्नता से रहें; तथा तुम अतिथिगु को सुख प्रदान करो ।
        और तुम तुर्वसु और यादवों को क्षीण  करने वाले उनका नाश करने  बनो। अर्थात् उन्हें परास्त करने वाले बनो ! 
        (ऋग्वेद-7/19 /8)

        हे "मघवन्= धनवन्निन्द्र “ते =तव "अभिष्टौ =अभ्येषणे "नरः =स्तोत्राणां नेतारो वयं "सखायः समानख्यातयः “प्रियासः =प्रियाश्च सन्तः “शरणे ="इत् गृह एव “मदेम= मोदेम ।                    किञ्च “अतिथिग्वाय । पूजयातिथीन् गच्छतीत्यतिथिग्वः । 

        तस्मै सुदासे दिवोदासाय= वास्मदीयाय राज्ञे “शंस्यं= शंसनीयं सुखं "करिष्यन् =कुर्वन् 
        "तुर्वशं राजानं "नि "शिशीहि =वशं कुरु । "याद्वं च राजानं “नि शिशीहीत्यर्थः ॥

        सायण-भाष्यम् :-
        तृतीयेऽनुवाके सप्त सूक्तानि । तत्र ‘अया वीती' इति त्रिंशदृचं प्रथमं सूक्तम् । अमहीयुर्नामाङ्गिरस ऋषिः । गायत्री छन्दः । पवमानः सोमो देवता । तथा चानुक्रान्तम्- अया वीती त्रिंशदमहीयुः' इति । उक्तो विनियोगः ॥

        अ॒या वी॒ती परि॑ स्रव॒ यस्त॑ इंदो॒ मदे॒ष्वा ।अ॒वाह॑न्नव॒तीर्नव॑ ॥१।।
        पुरः॑ स॒द्य इ॒त्थाधि॑ये॒ दिवो॑दासाय॒ शंब॑रं ।अध॒ त्यं तु॒र्वशं॒ यदुं॑ ॥२।
        (ऋग्वेद9/61/1-2)

        हे सोम ! तुम्हारे किस रस ने दासों के निन्यानवे पुरों अर्थात् नगरों) को तोड़ा था। उसी रस से युक्त होकर तुम इन्द्र के पीने के लिए प्रवाहित हो जाओ। १।

        शम्बर के नगरों को तोड़ने वाले ! सोम रस ने ही तुर्वसु की सन्तानों तथा यदु की सन्तान यादवों को शासन अथवा (वश) में किया ।२।
        पदपाठ-
        अ॒या । वी॒ती । परि॑ । स्र॒व॒ । यः । ते॒ । इ॒न्दो॒ इति॑ । मदे॑षु । आ ।
        अ॒व॒ऽअह॑न् । न॒व॒तीः । नव॑ ॥१।।

        (सायण-भाष्य)
        हे “इन्दो= सोम “अया =अनेन रसेन “वीती= वीत्या इन्द्रस्य भक्षणाय “परि “स्रव =परिक्षर । कीदृशेन रसेनेत्यत आह । “ते= तव “यः रसः “मदेषु= संग्रामेषु “नवतीर्नव इति नवनवतिसंख्याकाश्च शत्रुपुरीः “अवाहन =जघान  अमुं सोमरसं पीत्वा मत्तः सन्निन्द्र उक्तलक्षणाः शत्रुपुरीर्जघानेति कृत्वा रसो जघानेत्युपचारः ॥

        _____________________________________
        पुरः॑ स॒द्य इ॒त्थाधि॑ये॒ दिवो॑दासाय॒ शंब॑रं ।अध॒ त्यं तु॒र्वशं॒ यदुं॑ ॥२।
        शम्बर के नगरों को तोड़ने वाले ! सोम रस ने ही तुर्वसु की सन्तानों तथा यदु की सन्तान यादवों को शासन अथवा (वश) में किया ।२।

        पुरः॑ । स॒द्यः । इ॒त्थाऽधि॑ये । दिवः॑ऽदासाय । शम्ब॑रम् ।
        अध॑ । त्यम् । तु॒र्वश॑म् । यदु॑म् ॥२।
        (पद का अर्थान्वय)
         (इत्थाधिये दिवोदासाय) दिवोदास के लिए(शम्बरम्) शम्बर को (त्यम् तुर्वशम् यदुम्) और यदु और तुर्वसु को (अध) (पुरः) पुर को ध्वंसन करो ॥२॥

        (ऋग्वेद9/61/1-2)

        “सद्यः एकस्मिन्नेवाह्नि “पुरः =शत्रूणां पुराणि सोमरसोऽवाहन् । “इत्थाधिये सत्यकर्मणे “दिवोदासाय राज्ञे “शम्बरं शत्रुपुराणां स्वामिनम् "अध अथ =“त्यं तं “तुर्वशं तुर्वशनामकं राजानं दिवोदासशत्रुं “यदुं यदुनामकं राजानं च वशमानयञ्च । 

        अत्रापि सोमरसं पीत्वा मत्तः सन्निन्द्रः सर्वमेतदकार्षीदिति सोमरसे कर्तृत्वमुपचर्यते ॥

        ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की १० वीं ऋचा में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास के रूप में सम्बोधित किया गया है।  वह भी गोपों के रूप में सम्भवत: वैदिक सन्दर्भ में दास - दाता का वाचक रहा परन्तु लोकिक संस्कृत में दास पराधीन और गुलाम का वाचक रहा जो शूद्र वर्ण में सम्मिलित किए गये।

        " उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी   " गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।। 

        (ऋग्वेद १०/६२/१०)

        यदु और तुर्वसु नामक दौनों दास जो गायों से घिरे हुए हैं हम उन सौभाग्य शाली दौनों दासों की वर्णन करते हैं ।

        प्रियास इत् ते मघवन् अभीष्टौ   नरो मदेम शरणे सखाय:।
        नि तुर्वशं नि यादवं शिशीहि   अतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन् ।।
        (ऋग्वेद ७/१९/८ ) में भी यही ऋचा

        सत्यं तत् तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम् ।
        व्यानट् तुर्वशे शमि । (ऋग्वेद ८/४६/२७

        हे इन्द्र! तुमने यादवों के प्रचण्ड कर्मों  को सत्य (अस्तित्व) में मान कर संग्राम में अह्नवाय्यम् को प्राप्त कर डाला ;अर्थात् उनका हनन (शमन) कर डाला ।

        अह्नवाय्य :- ह्नु--बा० आय्य न० त० ।
        निह्नवाकर्त्तरि ।

        “सत्यं तत्तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम्” ऋ० ८, ४५, २७ अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में यही ऋचांश बहुतायत से है 

        किम् अंगत्वा मघवन् भोजं आहु: शिशीहि मा शिशयं त्वां श्रृणोमि ।।
        अथर्ववेद का० २०/७/ ८९/३/

        हे इन्द्र तुम भोग करने वाले हो ।
        तुम शत्रु को क्षीण करने वाले हो । 
        तुम मुझे क्षीण न करो 

        _____________________________

        शतमहं तिरिन्दिरे सहस्रं पर्शावा ददे ।
        राधांसि याद्वानाम् ॥४६॥(ऋग्वेद ८/६/४६)

        (सायण-भाष्य)
        इदमादिकेन तृचेन तिरिन्दिरस्य राज्ञो दानं स्तूयते । “पर्शौ परशुनाम्नः पुत्रे । उपचारज्जन्ये जनकशब्दः । “तिरिन्दिरे एतत्संज्ञे राजनि “याद्वानाम् । यदुरिति मनुष्यनाम । यदव एव याद्वाः । स्वार्थिकस्तद्धितः । तेषां मध्ये “अहं “शतं शतसंख्याकानि “सहस्रं सहस्रसंख्याकानि च “राधांसि धनानि “आ “ददे स्वीकरोमि । यद्वा । याद्वानां यदुकुलजानामन्येषां राज्ञां स्वभूतानि राधांसि बलादपहृतानि तिरिन्दिरे वर्तमानान्यहं प्राप्नोमि ।।

        त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम् ।
        ददुष्पज्राय साम्ने ॥४७॥ऋग्वेद ८/६/
        _______________________________
        त्रीणि॑ श॒तान्यर्व॑तां स॒हस्रा॒ दश॒ गोना॑म् ।
        द॒दुष्प॒ज्राय॒ साम्ने॑ ॥४७।।

        सायण-भाष्य-
        पूर्वस्यामृचि स्वसंप्रदानकं दानमुक्तम् । अधुनान्येभ्योऽप्यृषिभ्यस्तिरिन्दिरो बहु धनं दत्तवानित्याह । 

        “अर्वतां गन्तॄणामश्वानां “त्रीणि "शतानि "गोनां गवां “दश दशगुणितानि "सहस्रा सहस्राणि च "पज्राय स्तुतीनां प्रार्जकाय “साम्ने एतत्संज्ञायर्षये । यद्वा । साम्ने ।
         साम स्तोत्रम् । तद्वते पज्राय पज्रकुलजाताय कक्षीवते । “ददुः तिरिन्दिराख्या राजानो दत्तवन्तः ।।

        उदानट् ककुहो दिवमुष्ट्राञ्चतुर्युजो ददत् ।
        श्रवसा याद्वं जनम् ॥४८॥(ऋग्वेद ८/६/४८)

        उत् । आ॒न॒ट् । क॒कु॒हः । दिव॑म् । उष्ट्रा॑न् । च॒तुः॒ऽयुजः॑ । दद॑त् ।
        श्रव॑सा । याद्व॑म् । जन॑म् ॥४८।।
        सायण-भाष्य-
        अयं राजा “ककुहः उच्छ्रितः सन् “श्रवसा कीर्त्या “दिवं स्वर्गम् "उदानट् उत्कृष्टतरं व्याप्नोत् । किं कुर्वन् । "चतुर्युजः चतुर्भिः स्वर्णभारैर्युक्तान् “उष्ट्रान् “ददत् प्रयच्छन् । तथा “याद्वं “जनं च द्रासत्वेन प्रयच्छन् ॥ ॥ १७ ॥
        __________   

        यदु वंशीयों में परशु के पुत्र तिरिन्दर से सहस्र संख्यक धन मैने प्राप्त किया !
        ऋग्वेद ८/६/४६
        ___________________________________
        त्वं धुनि॑रिन्द्र॒ धुनि॑मतीरृ॒णोर॒पः सी॒रा न स्रव॑न्तीः ।
        प्र यत्स॑मु॒द्रमति॑ शूर॒ पर्षि॑ पा॒रया॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ स्व॒स्ति ॥१२।।

        पदपाठ-
        त्वम् । धुनिः । इन्द्र । धुनिऽमतीः । ऋणोः । अपः । सीराः । न । स्रवन्तीः ।
        प्र । यत् । समुद्रम् । अति । शूर । पर्षि । पारय । तुर्वशम् । यदुम् । स्वस्ति ॥१२

        हे "इन्द्र “धुनिः शत्रूणां कम्पयिता “त्वं “धुनिमतीः धुनिर्नामासुरो यासु निरोधकतया विद्यते ताः “अपः उदकानि "सीरा “न नदीरिव “स्रवन्तीः प्रवहन्तीः “ऋणोः अगमयः ।
        धुनिं हत्वा तेन निरोधितान्युदकानि प्रवाहयतीत्यर्थः ।
        ______________________
         हे “शूर वीरेन्द्र “यत् यदा “समुद्रम् “अति अतिक्रम्य “प्र “पर्षि प्रतीर्णो भवसि तदा समुद्रपारे तिष्ठन्तौ “तुर्वशं “यदुं च "स्वस्ति क्षेमेण “पारय अपारयः । समुद्रमतारयः ।।
        अनुवाद:-
        हमारे कल्याण के लिए यदु और तुर्वसु को समुद्र के दूसरी पार करते हो। अर्थात्  क्यों पुरोहितों को आशंका है कि ये दौंनों कहीं आँखों के सामने न रहें।

        __________________________________

        "य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम् ।
        इन्द्रः स नो युवा सखा ॥१॥

         (ऋग्वेद-6/45/1)
        इन्द्रः॑। सः। नः॒ । युवा॑। सखा॑ ॥१
        यः । आ । अनयत् । पराऽवतः । सुऽनीती । तुर्वशम् । यदुम् ।
        यः इन्द्रः "तुर्वशं “यदुं चैतत्संज्ञौ राजानौ शत्रुभिर्दूरदेशे प्रक्षिप्तौ “सुनीती सुनीत्या शोभनेन नयनेन “परावतः तस्माद्दूरदेशात् “आनयत् अनीतवान् “युवा तरुणः “सः “इन्द्रः “नः अस्माकं “सखा भवतु ।।

        पदों का अर्थ:-(यः) जो (युवा) जवानी युक्त (इन्द्रः) इन्द्र देव (सुनीती) सुन्दर न्याय से (परावतः)- दूरदेशात्  दूर देश से भी  -परा+अव--वा० अति । १ दूरदेशे निघण्टुः (तुर्वशम्)  तुर्वसु को  (यदुम्) यदु को (आ) सब प्रकार से (अनयत्) लङ्(अनद्यतन भूत) वह इन्द्र ले गया । (सः) वह (नः) हम लोगों का (सखा) मित्र हो ॥१॥

        ऋग्वेद 6.45.1 व्याकरण का अंग्रेजी विश्लेषण]

        य < यः < यद्[संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग"कौन; कौन सा; यत् [सर्वनाम]।"
        अनयत ्<  < √ नी [क्रिया], एकवचन, अपूर्ण" वापस करना; निकालना; निकालना।"

        परावतः < परवत्[संज्ञा], विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिंग"दूरी; ।"
        सुनीति < सुनीति [संज्ञा], अच्छी नीति, एकवचन, स्त्रीलिंग“सुनीति।”
        तुर्वश< तुर्वशुम्< 

        [संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, पुल्लिंग

        यदुम् < यदु

        [संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, पुल्लिंग

        “यदु; यदु।” इंद्रः < इंद्र

        [संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग

        सा < तद् [संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग

        "यह; वह, वह, यह (निरर्थक सर्वनाम); संबंधित(ए); वह; कर्तावाचक; तब; विशेष(ए); संबंधकारक; वाद्य; आरोपवाचक; वहाँ; बालक [शब्द]; संप्रदान कारक; एक बार; वही।"

        नहीं < नः <हमको

        [संज्ञा], संबंधवाचक, बहुवचन"मैं; मेरा।"

        युवा < युवान[संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग "युवा; युवा।”
        सखा < सखी

        [संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग; साथी; सखी [शब्द]।”

        "उत त्या तुर्वशायदू अस्नातारा शचीपतिः ।
        इन्द्रो विद्वाँ अपारयत् ॥१७॥
        हे इन्द्र ! उन दौंनों यदु और तुर्वसु को तुमने बन्धी बनाया और दूर समुद्र पार कर दिया। विद्वान इसे जानते हैं।१७।
        पदों के अर्थ:-
        उत अपि च "अस्नातारा= अस्नातारौ।  इन्द्रेण परिबद्धौ "त्या =त्यौ तौ= तौ द्वे । “तुर्वशायदू तुर्वशनामानं यदुनामकं च राजानौ “शचीपतिः= शचीन्द्रस्य भार्या । 
        तस्याः पतिर्भर्ता "विद्वान् -सकलमपि जानन् “इन्द्रः "अपारयत्=  पारे दूरे अकरोत् - पार दूर कर दिया।
        ____________________
        ऋग्वेदः सूक्तं ४,/३०/१७

        ष्णै- धातु के रूप द्विवचन वैदिक रूप अस्ना तारा- दौंनों  को बाँध दिया।
        जबकि ष्ना- स्ना धातु का भी यही समान  अनद्यतन भूत काल का रूप  सेना धातु का वैदिक है।
        अत: अनुवादक भ्रमित हैं कि स्नातारा- स्नान अर्थ में है। जबकि ष्णै- बन्धने वेष्टने वा। वेष्टन= घेरने या लपेटने की क्रिया या भाव है।

        क्यों कि पूर्वी ऋचाओं में यदु और तुर्वसु को अपने वश में करने लिए ब्राह्मण पुरोहित इन्द्र से निरन्तर प्रार्थना करते हैं ।
        फिर इन्द्र कि द्वारा यदु और तुर्वशु में एक का ही राज्याभिषेक होना चाहिए । परन्तु यहाँ यदु-तुर्वसु दौंनों का राज्याभिषेक कैसे हो सकता है ? अत: अस्नातारा= ष्णै = वैष्टने धातु का  लङ्(अनद्यतन भूत)का वैदिक द्विवचन रूप है। जिसका अर्थ है दौंनों को बाँध लिया लपेट लिया।

        लुट्(अनद्यतन भविष्यत् ष्णै=बन्धने वेष्टने वा" )
        एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
        प्रथमपुरुषःस्नातास्नातारौस्नातारः
        मध्यमपुरुषःस्नातासिस्नातास्थःस्नातास्थ
        उत्तमपुरुषःस्नातास्मिस्नातास्वःस्नातास्मः

        दोनों धातुओं के समान रूप होने से अर्थ भ्रान्ति होना स्वाभाविक ही है।
        लुट्(अनद्यतन भविष्यत् - ष्ना= शुचौ स्नाने वा" )
        एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
        प्रथमपुरुषःस्नातास्नातारौस्नातारः
        मध्यमपुरुषःस्नातासिस्नातास्थःस्नातास्थ
        उत्तमपुरुषःस्नातास्मिस्नातास्वःस्नातास्मः

        कृष्ण की अवधारणा भारत है। सिन्धु घाटी की सभ्यता के मोहन -जोदारो में कृष्ण की बाल लीला सम्बन्धी भित्ति चित्र है।

        वेदों में इन्द्र और कृष्ण का युद्ध वर्णित है।

        अथर्ववेद-(20/137/7)
        ऋषिः - तिरश्चीराङ्गिरसो द्युतानो वा
        देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् । सूक्तम् - (१३७)
        "अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः। आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥
        (इयानः) =चलता हुआ (अंशुमतीम्)=  यमुना नदी को । अव अतिष्ठत्= ठहरा है। (नृमणाः= नर  के समान मन वाले (इन्द्रः) इन्द्र  ने (तम् धमन्तम्) उस हाँफते हुए को (शच्या) शचि के साथ  (आवत्)-युद्ध किया ।
        लङ्(अनद्यतन भूत)
        एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
        प्रथमपुरुषःआवत्=युद्ध किया 
        (स्नेहितीः) स्नेहयुक्त (अप अधत्त) हटा लिया है ॥७॥
        टिप्पणी:-
        (धमन्तम्) =उच्छ्वसन्तम्।  पराभवेन दीर्घंश्वसन्तम्- उसास लेते हुए को।  (स्नेहितीः) स्नेहतिः स्नेहतिर्वधकर्मा-निघ० २।१९। स्वकीया मारणशीलाः सेनाः (नृमणाः) नेता के समान मन वाले- नेतृतुल्यमनस्कः (अप अधत्त) -दूर हटा दिया-दूरे धारितवान् -निवर्तितवान् ॥

        ऋग्वेद प्रथम एवम् अष्टम मण्डल में कृष्ण का वर्णन सायण भाष्य सहित-

        ऋग्वेदः सूक्तं १.१०१
        कुत्स आङ्गिरसः
        देवता- इन्द्रः( १ गर्भस्राविण्युपनिषद्)। जगती, ८-११ त्रिष्टुप्

        "प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना।                                    अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥१॥(ऋ०१/१०१/१)
        _________________________________
        सायण का अर्थ-
        हे ऋत्विजो ! स्तुति योग्य उन इन्द्र के लिए हवि रूप अन्न से युक्त स्तुति रूप वचन का उत्कृष्टता से उच्चारण करो !  जिन इन्द्र ने ऋजिश्वा नामक मित्र राजा के साथ कृष्ण नानक असुर के द्वारा गर्भवती उसकी स्त्रीयों का वध  किया था। अर्थात् कृष्ण नामक असुर को मारकर  उसके पुत्रों का जन्म न होने देने के लिए ही उसकी गर्भवती स्त्रियों का भी इन्द्र ने बध कर दिया था । रक्षा पाने के इच्छुक हम कामनाओं की वर्षा करने वाले और वज्र युक्त दक्षिण हाथ वाले मरुतों से युक्त उन इन्द्र का मित्रता के लिए आह्वान करते हैं।यहाँ मूल ऋचा में कृष्ण के लिए असुर शब्द नहीं है परन्तु सायण ने असुर विशेषण अपनी तरफ से जोड़ दिया है।

        आंध्र " को " इंद्र " से लिया जाना चाहिए, जैसा कि फ़्रेंच में " आंद्रेई " है।
        वह वज्र के नाम से जाना जाने वाला बिजली का वज्र धारण करता है और ऐरावत नामक सफेद हाथी पर सवार होता है। इंद्र सर्वोच्च देवता हैं और अग्नि के जुड़वां भाई हैं और उनका उल्लेख अदिति के पुत्र आदित्य के रूप में भी किया गया है। उनका घर स्वर्ग में मेरु पर्वत पर स्थित है।

        इंद्र पारसी धर्म में एक देवता के नाम के रूप में प्रकट होता है । उन्हें बर्मीज़ में ðadʑá mɪ́ɴ , थाई में พระอินทร์ (Phra In), मलय में Indera, तेलुगु में ఇంద్రుడు (Indrudu), तमिल में இந்தி के नाम से जाना जाता है। ரன் (इंथिरन), चीनी में 帝释天 (दिशितिआन), और में जापानी के रूप में 帝釈天 (ताईशाकुटेन)।
        वह वज्रपाणि से जुड़े हैं - मुख्य धर्मपाल या बुद्ध, धर्म और संघ के रक्षक और रक्षक जो पांच ध्यानी बुद्ध की शक्ति का प्रतीक हैं।

        एक देवता के रूप में इंद्र अन्य इंडो-यूरोपीय देवताओं के सजातीय हैं; वे या तो थोर, पेरुन और ज़ीउस जैसे गरजने वाले देवता हैं, या डायोनिसस जैसे नशीले पेय के देवता हैं। मितन्नी के देवताओं में इंद्र (इंदारा) के नाम का भी उल्लेख किया गया है, जो एक हुरियन-भाषी लोग थे जिन्होंने लगभग 1500BC-1300BC तक उत्तरी सीरिया पर शासन किया था।

        ऋग्वेद संहिता की ऋचाएँ वैदिक साहित्य के सबसे पुराने और जटिल साहित्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। 
        (ऋग्वेद 1.101.1)

        "प्र मंदिने पितुमद अर्चता वाको यः कृष्णगर्भा निर्हन्न ऋषिस्वना | अवस्यावो विष्वाणं वज्रदक्षिणं मारुतवन्तं सख्यय हवामहे। (ऋग्वेद १/१०१/१)
        अनुवाद:-
        “जो प्रसन्न है (प्रशंसा के साथ), उसे आहुतियों के साथ प्रणाम करो, जिसने ऋषिस्वन के साथ, कृष्ण की मूर्ति को नष्ट कर दिया ; सुरक्षा की इच्छा से, हम अपने मित्र बनने के लिए उसकी मांग करते हैं, जो (लाभों का) दाता है, जो अपने दाहिने हाथ में वज्र रखता है , उसकी देखभाल मारुति करता है।

        सायण की टिप्पणी: ऋग्वेद-भाष्य-
        ऋजिश्वान एक राजा और इंद्र का मित्र था ; कृष्ण एक असुर थे, जिनमें उनके स्त्रियों की भी हत्या कर दी गई थी, ताकि उनका कोई भी संतान जीवित न रह सके। 

        व्याकरणिक टिप्पणी:-
         प्र=
        [विशेषक्रिया]
        "की ओर; आगे।"
        मंदिने=
        [संज्ञा], मूलवाचक, एकवचन, पुल्लिंग
        “नशीला पदार्थ; ताज़ा करने वाला।”

        पितुमद < पितुमत्
        [संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, नपुंसकलिंग
        "आहार।"

        अर्चता= अर्च्-स्तुतौ-
        [क्रिया], बहुवचन, वर्तमान अनिवार्यता

        "गाओ; पूजा करना; सम्मान; प्रशंसा; स्वागत।"

        वचो < वाचः < वचस्
        [संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, नपुंसकलिंग

        "कथन; आज्ञा; भाषण; शब्द; सलाह; शब्द; आवाज़।"

        यः < यद्
        [संज्ञा], कर्तावाचक, एकवचन, पुल्लिंग
        "कौन; कौन सा; यत् [सर्वनाम]।"

        कृष्ण < कृष्ण
        [संज्ञा]

        कृष्णगर्भ < गर्भः < गर्भ
        [संज्ञा], कर्मवाचक, बहुवचन, स्त्रीलिंग

        “भ्रूण; गर्भ; अंदर; गुला; भ्रूण; गर्भ; बच्चा; ; गर्भाद्रुति; उत्तर; गर्भावस्था; यार; पेट; निशेचन; अंदर; उधेड़; बच्चा; द्रवपुंज; बीच" स्त्री

        निर्हन्न < निर्हन्न < निर्हन्न < √हन्
        [क्रिया], एकवचन, मूल सिद्धांतकार (इंड.)

        ऋजिस्वान < ऋजिस्वान
        [संज्ञा], वाद्य, एकवचन, पुल्लिंग

        ऋजिस्वान्।”

        अवस्यावो < अवस्यावः < अवस्यु
        [संज्ञा], कर्तावाचक, बहुवचन, पुल्लिंग

        “सुरक्षा की मांग करना; मजबूरन

        विश्णम् < विश्णम् < विश्णम्
        [संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, पुल्लिंग

        "साँड़; इंद्र; घोड़ा; विश्णु; आदमी।"

        वज्रदक्षिणम् < वज्र
        [संज्ञा], पुल्लिंग

        “वज्र; वज्र; वज्र; वज्र; बिजली चमकाना; अभ्र; वज्रमुषा; हीरा; वज्र [शब्द]; वज्रकपात; वज्र; वैक्रान्त।"

        वज्रदक्षिणम् < दक्षिणम् < दक्षिणा
        [संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, पुल्लिंग

        “दक्षिणी; सही; दक्षिण; दक्षिण दिशा में; दक्षिणा [शब्द]; ईमानदार; दक्षिणवर्त; चतुर्।"

        मरुतवंतं < मरुतवंतम् < मारुतवंत
        [संज्ञा], कर्म कारक, एकवचन, पुल्लिंग

        “इंद्र; मेरुवंत [शब्द]।"

        साख्य < साख्य
        [संज्ञा], संपुष्टकारक, एकवचन, नपुंसकलिंग

        "दोस्ती; सहायता; कंपनी।"

        हवामहे < ह्वा
        [क्रिया], बहुवचन, वर्तमान सूचक
        "उठाना; अपील करना; बुलाना; बुलाओ।"

        यो व्यंसं जाहृषाणेन मन्युना यः शम्बरं यो अहन्पिप्रुमव्रतम्।                                        इन्द्रो यः शुष्णमशुषं न्यावृणङ्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥२॥

        यस्य द्यावापृथिवी पौंस्यं महद्यस्य व्रते वरुणो यस्य सूर्यः ।                                              यस्येन्द्रस्य सिन्धवः सश्चति व्रतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥३॥
        सामवेदः -कौथुमीया/संहिता -ग्रामगेयः-प्रपाठकः १०-वैरूपम्

        सामवेदः‎ - कौथुमीया‎ - संहिता‎ - ग्रामगेयः‎ - प्रपाठकः १०
        :32 वैरूपम्.-
        प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना ।
        अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हुवेमहि ।। ३८० ।। तथा  ऋग्वेद १/१०१/१

        (३८०।१) ।। वैरूपम् । विरूपो जगतीन्द्रो मरुत्त्वान्।
        प्रमंदाऽ२३४इने ।। पितुमदाऽ३र्च्चाऽ३तावचः । यःकाऽ३ओऽ२३४वा ।
        कृष्णगर्भानिरहन्नृजिश्वनाऽ३ । अवस्याऽ२३४वाः। वृषणंवा । ज्रादक्षाऽ२३४इणाम् ।
        मारौवाओऽ२३४वा ।। त्वन्तꣳसख्यायहुवाऽ५इमहाउ ।। वा ।।
        ( दी ३ । प० १० । मा० ९ )२३ ( णो । ६५१)

        द्र. पञ्चनिधनं वैरूपम्
        वैरूपोपरि वैदिकसंदर्भाः

        अस्मिन् जगति अस्माकं इन्द्रियाणि यत्किंचित् संवेदनं प्राप्नुवन्ति, तत् सर्वं असत्यं तु नैवास्ति, किन्तु विरूपितं अवश्यमस्ति। यदा वयं वैराजपदं प्राप्नुवन्ति, तदा अस्माकं दृष्टिः सत्यस्य दर्शने समर्था भवति।"
        ________
        यो अश्वानां यो गवां गोपतिर्वशी य आरितः कर्मणिकर्मणि स्थिरः।                        वीळोश्चिदिन्द्रो यो असुन्वतो वधो मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥४॥
        ___________

        यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्यो ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्दत् ।  इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥५॥

        यः शूरेभिर्हव्यो यश्च भीरुभिर्यो धावद्भिर्हूयते यश्च जिग्युभिः ।                                                इन्द्रं यं विश्वा भुवनाभि संदधुर्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥६॥

        रुद्राणामेति प्रदिशा विचक्षणो रुद्रेभिर्योषा तनुते पृथु ज्रयः ।                                                इन्द्रं मनीषा अभ्यर्चति श्रुतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥७॥

        यद्वा मरुत्वःपरमे सधस्थे यद्वावमे वृजने मादयासे।अत आ याह्यध्वरं नो अच्छा त्वाया हविश्चकृमा सत्यराधः ॥८॥

        त्वायेन्द्र सोमं सुषुमा सुदक्ष त्वाया हविश्चकृमा ब्रह्मवाहः।                                                अधा नियुत्वः सगणो मरुद्भिरस्मिन्यज्ञे बर्हिषि मादयस्व ॥९॥

        मादयस्व हरिभिर्ये त इन्द्र विष्यस्व शिप्रे वि सृजस्व धेने ।                                              आ त्वा सुशिप्र हरयो वहन्तूशन्हव्यानि प्रति नो जुषस्व ॥१०॥

        मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा वयमिन्द्रेण सनुयाम वाजम् ।                                                  तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥११॥

        {सायण-भास्यम्}
        प्र मन्दिने' इति एकादशर्चमष्टमं सूक्तमाङ्गिरसस्य कुत्सस्यार्षम् । अष्टम्याद्याश्चतस्रस्त्रिष्टुभः शिष्टाः सप्त जगत्यः । इन्द्रो देवता । तथा चानुक्रान्तं - ' प्रमन्दिन एकादश कुत्स आद्या गर्भस्राविण्युपनिषच्चतुस्त्रिष्टुबन्तम्' इति । दशरात्रस्य नवमेऽहनि मरुत्वतीये एतत्सूक्तम् । विश्वजितः' इति खण्डे सूत्रितं- ‘प्र मन्दिन इमा उ त्वेति मरुत्वतीयम्' (आश्व. श्रौ. ८.७.) इति ॥
        ____________________
        प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना।                                    अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥१॥
        अर्थ-
        अच्छी प्रकार से  इन्द्र और उसके सखा राजा   ऋजिश्वन् की  स्तुति करने वाले के लिए यह निर्देश है कि वे उनकी अन्न से पूरित हवि आदि से अर्चना करते हुए  ऐसे वचनों से कहें कि वे इन्द्र मरुतगण जिनके सखा है और जिन इन्द्र ने दाहिने हाथ में वज्र धारण करते हुए कृष्ण के द्वारा गर्भिताओं का वध कर दिया था ;रक्षा के इच्छुक हम सब उन शक्ति शाली इन्द्र का ही आह्वान करते हैं । 

        विशेष=असुर शब्द का प्रयोग तो कृष्ण के लिए सायण ने अपने भाष्य में ही किया है । अन्यथा मूल ऋचा में असुर पद नहीं  होकर अदेव पद है ।
        ____
          . १०९-११५ ) । एतदनार्षत्वेनानादरणीयं भवति । एषोऽर्थः क्रमेणर्क्षु वक्ष्यते । तथा चास्या ऋचोsयमर्थः । 1“द्रप्सः =। द्रुतं सरति गच्छतीति द्रप्सः । पृषोदरादिः । द्रुतं गच्छन् "दशभिः “सहसैः दशसहस्रसंख्यैरसुरैः “इयानः= “कृष्णः एतन्नामकोऽसुरः "अंशुमतीं नाम नदीम् “अव “अतिष्ठत् =अवतिष्ठते । ततः 2-“शच्या= कर्मणा प्रज्ञानेन वा 3-“धमन्तम्= उदकस्यान्तरुच्छ्वसन्तं यद्वा जगद्भीतिकरं शब्दं कुर्वन्तं “तं =कृष्णमसुरम् “इन्द्रः मरुद्भिः सह 5-“आवत् =प्राप्नोत् । पश्चात्तं कृष्णमसुरं तस्यानुचरांश्च हतवानिति वदति । “नृमणाः नृषु मनो यस्य सः । यद्वा । कर्मनेतृष्वृत्विक्ष्वेकविधं मनो यस्य स तथोक्तः । तादृशः सन् “स्नेहितीः । स्नेहतिर्वधकर्मसु पठितः । सर्वस्य हिंसित्रीस्तस्य सेनाः “अप “अधत्त ।6- अपधानं =हननम् । अवधीदित्यर्थः । ‘ अप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः' (सा. सं. १. ४. १.४.१) इति छन्दोगाः पठन्ति । तस्यानुचरान् हत्वा तं द्रुतं गच्छन्तमसुरमपाधत्त । हतवान् ॥
        _________________
        "द्र॒प्सम॑पश्यं॒ विषु॑णे॒ चर॑न्तमुपह्व॒रे न॒द्यो॑ अंशुमत्या:।
        नभो॒ न कृ॒ष्णम॑वतस्थि॒वांस॒मिष्या॑मि वो वृषणो॒ युध्य॑ता॒जौ ॥१४
        द्रप्सम् । अपश्यम् । विषुणे । चरन्तम् । उपऽह्वरे । नद्यः । अंशुऽमत्याः ।
        नभः । न । कृष्णम् । अवतस्थिऽवांसम् । इष्यामि । वः । वृषणः । युध्यत । आजौ ॥१४

        तुरीयपादो मारुतः । मरुतः प्रति यद्वाक्यमिन्द्र उवाच तदत्र कीर्त्यते । हे मरुतः “द्रप्सं द्रुतगामिनं कृष्णमहम् “अपश्यम् =अदर्शम् । कुत्र वर्तमानम् । “विषुणे= विष्वगञ्चने सर्वतो विस्तृते देशे । यद्वा । विषुणो विषमः । विषमे परैरदृश्ये गुहारूपे देशे। “चरन्तं =परितो गच्छन्तम् । किंच “अंशुमत्याः एतन्नामिकायाः “नद्यः =नद्याः “उपह्वरे= अत्यन्तं गूढे स्थाने “नभो “न नभसि यथादित्यो दीप्यते तद्वत्तत्र दीप्यमानम् “अवतस्थिवांसम् उदकस्यान्तरवस्थितं “कृष्णम् एतन्नामकमसुरमपश्यम् । तस्मिन् दृष्टे सति हे “वृषणः कामानामुदकानां वा सेक्तारो मरुतः “वः युष्मान् युद्धार्थम् “इष्यामि अहमिच्छामि । ततो यूयं तमिमं कृष्णम् "आजौ । अजन्ति गच्छन्त्यत्र योद्धार आयुधानि प्रक्षेपयन्तीति वाजिः संग्रामः । तस्मिन् "युध्यत संहरत । वाक्यभेदादनिघातः । केचित् इष्यामि वो मरुतः इति पठन्ति । तत्र हे मरुतः वो युष्मानिच्छामीत्यर्थो भवति ॥

        अध॑ द्र॒प्सो अं॑शु॒मत्या॑ उ॒पस्थेऽधा॑रयत्त॒न्वं॑ तित्विषा॒णः।विशो॒ अदे॑वीर॒भ्या॒३॒॑चर॑न्ती॒र्बृह॒स्पति॑ना यु॒जेन्द्र: ससाहे ॥१५।अध । द्रप्सः । अंशुऽमत्याः । उपऽस्थे । अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः ।
        विशः। अदेवीः ।अभि। आऽचरन्तीः ।बृहस्पतिना । युजा । इन्द्रः । ससहे ॥१५।

        1-“अध= अथ 2-“द्रप्सः =द्रुतगामी कृष्णः 3-“अंशुमत्याः= नद्याः 4-“उपस्थे =समीपे 5-“तित्विषाणः= दीप्यमानः सन् 6-“तन्वम् =आत्मीयं शरीरम् 7-“अधारयत् । =परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन 8-“युजा= सहायेन 9-“अदेवीः =अद्योतमानाः । कृष्णरूपा इत्यर्थः । यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । 10-“आचरन्तीः= आगच्छन्तीः 11-“विशः= असुरसेनाः "अभि 12-"ससहे =जघान । तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ॥ ३४ ॥ 

        त्वं ह॒ त्यत्स॒प्तभ्यो॒ जाय॑मानोऽश॒त्रुभ्यो॑ अभव॒ः शत्रु॑रिन्द्र ।
        गू॒ळ्हे द्यावा॑पृथि॒वी अन्व॑विन्दो विभु॒मद्भ्यो॒ भुव॑नेभ्यो॒ रणं॑ धाः ॥१६
        पद पाठ:-
        त्वम् । ह । त्यत् । सप्तऽभ्यः । जायमानः । अशत्रुऽभ्यः । अभवः । शत्रुः । इन्द्र ।
        गूळ्हे इति । द्यावापृथिवी इति । अनु । अविन्दः । विभुमत्ऽभ्यः । भुवनेभ्यः । रणम् । धाः ॥१६

        हे “इन्द्र “त्वं खलु “त्यत् तत् कर्म कृतवानसि। किं तत् उच्यते । "जायमानः त्वं प्रादुर्भवन्नेव । “अशत्रुभ्यः स्तुरहितेभ्यः “सप्तभ्यः कृष्णवृत्रनमुचिशम्बरादिसप्तभ्यो बलवद्भ्यः शत्रुभ्यः तदर्थं “शत्रुः “अभवः । यद्वा । सप्तभ्यः । ससैवाङ्गिरसः । सप्तभ्योङ्गिरोभ्यो गवानयनार्थं प्रादुर्भवन्नेवाशत्रुभ्यो बलवद्भ्यः पणिभ्यः शत्रुरभवः । किंच हे इन्द्र त्वं “गूळ्हे तमसा गूढे संवृते “द्यावापृथिवी द्यावापृथिव्यौ सूर्यात्मना ते प्रकाश्यानुक्रमेण "अविन्दः अलभथाः । तथा “विभुमद्भ्यः महत्त्वयुक्तेभ्यः "भुवनेभ्यः लोकेभ्यः "रणं रमणं “धाः धारयसि । विदधासीत्यर्थः ॥
        _________________________

        drip (v.)
        c. 1300, drippen, "to fall in drops; let fall in drops," from Old English drypan, also dryppan, from Proto-Germanic *drupjanan (source also of Old Norse dreypa, Middle Danish drippe, Dutch druipen, Old High German troufen, German triefen), perhaps from a PIE root *dhreu-. Related to droop and drop. Related: Dripped; dripping.

        drip (n.)
        mid-15c., drippe, "a drop of liquid," from drip (v.). From 1660s as "a falling or letting fall in drops." Medical sense of "continuous slow introduction of fluid into the body" is by 1933. The slang meaning "stupid, feeble, or dull person" is by 1932, perhaps from earlier American English slang sense "nonsense" (by 1919).

        विषुण-अनेक रूप का। बहुरूपी। २. सर्वग। सर्वगत। ३. विप्रकीर्ण। बिखरा हुआ। ४. पराङमुख [को०]।

        अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
        आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥
        द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
        नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥
        अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
        विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
        _______________________________________
        क्रमशः उपर्युक्त तीनों ऋचाओं का पदपाठ-

        "अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः ।
        आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त ॥१३॥

        पद का अन्वय= अव । द्रप्सः । अंशुऽमतीम् । अतिष्ठत् । इयानः । कृष्णः । दशऽभिः । सहस्रैः ।आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नेहितीः । नृऽमनाः । अधत्त ॥१३।

        शब्दार्थ व व्याकरणिक विश्लेषण-                १-अव= तुम रक्षा करो लोट्लकर  मध्यम पुरुष एकवचन।
        २-द्रप्स:= जल से द्रप्स् का पञ्चमी एकवचन यहाँ करण कारक के रूप में  ।
        ३- अंशुमतीम् = यमुनाम्  –यमुना को अथवा यमुना के पास द्वितीया यहाँ करण कारक के रूप में ।
        ४-अवतिष्ठत् =  अव उपसर्ग पूर्वक (स्था धातु का तिष्ठ आदेश  लङ्लकार रूप)  स्थित हुए।
        ५- इन्द्र: शच्या -स्वपत्न्या= इन्द्र: पद में प्रथमा विभक्ति एकवचन कर्ता करक  तथा शच्या में शचि के तृत्तीया विभक्ति करणकारक का रूप शचि इन्द्र: की पत्नी का नाम है।।
         ६-धमन्तं= अग्निसंयोगम् कुर्वन्तं  कोलाहलकुर्वन्तंवा। चमकते हुए को अथवा हल्ला करते हुए को।  (ध्मा धातु का धम आदेश तथा +शतृ(अत्) प्रत्यय कर्मणि द्वित्तीया का रूप  एक वचन धमन्तं कृष्ण का विशेषण है  ।
        ७-अप स्नेहिती: = जल में भीगते हुए का।
        ८-नृमणां( धनानां) 
        ९-अधत्त= उपहार या धन दिया ।(डुधाञ् (धा)=दानधारणयोर्लङ्लकारे आत्मनेपदीय अन्यपुरुषएकवचने) 
        विशेषटिप्पणी-
        १०-अव्=१- रक्षण २-गति ३-कान्ति ४-प्रीति ५-तृप्ति ६-अवगम ७-प्रवेश ८-श्रवण ९- स्वाम्यर्थ १०-याचन ११-क्रिया। १२ -इच्छा १३- दीप्ति १४-अवाप्ति १५-आलिङ्गन १६-हिंसा १७-दान  १८-वृद्धिषु।                
        ११-अव् – एक परस्मैपदीय धातु है और धातुपाठ में इसके अनेक अर्थ हैं । प्रकरण के अनुरूप अर्थ ग्रहण करना चाहिए ।
        प्रथम पुरुष एक वचन का लङ् लकार(अनद्यतन भूूूतकाल का रूप।
        आवत् =प्राप्त किया । 
        हिन्दी अर्थ- हे कृष्ण आप यमुना के तट पर स्थित इस जल के रक्षा करने वाले हैं आप इसकी रक्षा करो ! कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं। इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि के साथ अग्नि से संयोजित होते हुए अर्थात् दैदीप्यमान उस कृष्ण को प्राप्त किया अथवा उनके पास गमन किया  और जल में भीगे हुए कृष्ण को भेंट स्वरूप  धन दिया।
        भाष्य-
        कृष्णो दशसहस्रैर्गोपै:परिवृत: सन्  अँशुमतीनामधेयाया नद्या:  यमुनाया: तटेऽतिष्ठत् तत्र कृष्णस्य नाम्न: प्रसिद्धं  तं गोपं नद्यार्जलेमध्ये   स्थितं इन्द्रो ददर्श स इन्द्र: स्वपत्न्या शच्या सार्धं आगत्य  जले स्निग्धे तं गोपं कृष्णं तस्यानुचरानुपगोपाञ्च अतीवानि धनानि अदात्।

        हिन्दी अनुवाद- कृष्ण दश हजार गोपों से घिरे हुए हैं अशुमती अथवा यमुना के तट पर स्थित कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उस गोप कृष्ण को यमुना नदी के जल में स्थित देखा।

        ________________________________
        द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः ।
        नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ ॥१४॥

        पद का अन्वय= द्र॒प्सम् । अ॒प॒श्य॒म् । विषु॑णे । चर॑न्तम् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । न॒द्यः॑ । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ ।
        नभः॑ । न । कृ॒ष्णम् । अ॒व॒त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । इष्या॑मि । वः॒ । वृ॒ष॒णः॒ । युध्य॑त । आ॒जौ ॥१४।।

        हिन्दी अर्थ-इन्द्र कहता है कि विभिन्न रूपों में मैंने यमुना के जल को देखा और वहीं अंशुमती नदी के निर्जन प्रदेश में चरते हुए बैल अथवा साँड़ को भी देखा  और इस साँड को युद्ध में लड़ते हुए मैं देखना चाहूँगा । अर्थात यह साँड अपने स्थान पर अडिग खडे़  कृष्ण को संग्राम में युद्ध करे ऐसा होते हुए मैं देखना चाहूँगा। जहाँ जल और- ( नभ) बादल भी न हो ऐसे स्थान पर-
        (अर्थात कृष्ण की शक्ति मापन के लिए इन्द्र यह इच्छा करता है )
        _______________    
        शब्दार्थ व्याकरणिक विश्लेषण-
        १-द्र॒प्सम्= जल को कर्मकारक द्वित्तीया।अपश्यम्=अदर्शम्  दृश् धातु का लङ्लकार  (सामान्य भूतकाल ) क्रिया पदरूप  - मैंने देखा ।__________________

        २- वि + सवन(‌सुन) रूप विषुण -(विभिन्न रूप)।   षु (सु)= प्रसवऐश्वर्ययोः - परस्समैपदीय सवति सोता [ कर्मणि- ]  सुषुवे सुतः सवनः सवः अदादौ (234) सौति स्वादौ षुञ् अभिषवे (51) सुनोति (911) सूनुः, पुं, (सूयते इति । सू + “सुवः कित् ।” उणादिसूत्र्र ३।३५। इति (न:) स:च कित् )

        पुत्त्रः । (यथा, रघुः । १ । ९५ ।
        “सूनुः =सुनृतवाक् स्रष्टुः विससर्ज्जोदितश्रियम् ) अनुजः । सूर्य्यः । इति मेदिनी ॥ अर्कवृक्षः । इत्यमरः कोश ॥
        षत्व विधान सन्धि :-"विसइक्कु हयण्सि षत्व" :- इक् स्वरमयी प्रत्याहार के बाद 'कु(कखगघड•)     'ह तथा यण्प्रत्याहार ( य'व'र'ल) के वर्ण हो और फिर उनके बाद 'स'आए तो वहाँ पर 'स'का'ष'हो जाता है:- यदि 'अ' 'आ' से भिन्न  कोई  स्वर जैैैसे इ उ आदि हो अथवा 'कवर्ग' ह् य् व् र् ल्'  के बाद तवर्गीय 'स' उष्म वर्ण आए तो 'स' का टवर्गीय मूर्धन्य 'ष' ऊष्म वर्ण हो जाता है ।

        शर्त यह कि यह "स" आदेश या प्रत्यय का ही होना चाहिए जैसे :- दिक् +सु = दिक्षु । चतुर् + सु = चतुर्षु। हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु । मातृ + सु = मातृषु ।परन्तु अ आ स्वरों के बाद स आने के कारण  ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 

        परन्तु अ' आ 'स्वरों के बाद स आने के कारण ही गंगासु ,लतासु ,और अस्मासु आदि में परिवर्तन नहीं आता है 'हरि+ सु = हरिषु ।भानु+ सु = भानुषु । बालके + सु = बालकेषु ।मातृ + सु = मातृषु । वि+सम=विषम । वि+सुन =विषुण अथवा विष्+ उणप्रत्यय=विषुण।__________________________

        विषुण-विभिन्न रूपी।
        ३-वृ॒ष॒णश्चर॑न्तम्=  चरते हुए साँड  को।
        ४-आजौ =  संग्रामे  युद्ध में।
        ५-अ॒व॒ = उपसर्ग
        ६- त॒स्थि॒ऽवांस॑म्= तस्थिवस् शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन का रूप तस्थिवांसम् है । तस्थिवस्=  स्था--क्वसु  स्थितवति (स्थिर) अडिग अथवा जो एक ही स्थान पर खड़ा होते हुए में।
        ७-व:= युष्मान् - तुम सबको ।  युष्मभ्यम् ।  युष्माकम् । यष्मच्छब्दस्य द्बितीया चतुर्थी षष्ठी बहुवचनान्तरूपोऽयम् इति व्याकरणम् ॥
        ८-उपह्वरे= निर्जन देशे।
        ९-वृ॒ष॒णः॒ = साँड ने ।
        १०-युध्य॑त= युद्ध करते हुए।
        ११-आजौ= युद्ध में ।
        १२-इष्या॑मि= मैं इच्छा करुँगा।
        ___________________________________

        "अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थेऽधारयत्तन्वं तित्विषाणः ।
        विशो अदेवीरभ्याचरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे ॥१५॥
        ______________
        अर्थ-कृष्ण ने अंशुमती के जल के नीचे अपने दैदीप्यमान शरीर को अशुमती की गोद में धारण किया  जो इनके गोपों - विशों (गोपालन आदि करने वाले -वैश्यवृत्ति सम्पन्न) थे ।  चारो ओर चलती हुई गायों के साथ रहने वाले गोपों को इन्द्र ने बृहस्पति की  सहायता से दमन किया ।
        पदपाठ-विच्छेदन :-
        । द्रप्स:। अंशुऽमत्याः। उपऽस्थे ।अधारयत् । तन्वम् । तित्विषाणः। विशः। अदेवीः ।अभि । आऽचरन्तीः। बृहस्पतिना। युजा । इन्द्रः। ससहे॥१५।
        “अध =अथ अधो वा “द्रप्सः= द्रव्य अथवा जल बिन्दु: “अंशुमत्याः= यमुनाया: नद्याः“(उपस्थे=समीपे “(  त्विष धातु =दीप्तौ अर्थे  तित्विषाणः= दीप्यमानः)( सन् =भवन् ) “(तन्वम् द्वितीया कर्मणि वैदिके रूपे = शरीरम्) “(अधारयत्  = शरीर धारण किया)। परैरहिंस्यत्वेन बिभर्ति । यद्वा । बलप्राप्त्यर्थं स्वशरीरमाहारादिभिरपोषयत् । तत्र “इन्द्रः गत्वा “बृहस्पतिना एतन्नामकेन देवेन “युजा =सहायेन “अदेवीः = देवानाम्  ये न पूजयन्ति इति अदेवी:। कृष्णरूपा इत्यर्थः । 
        यद्वा । पापयुक्तत्वादस्तुत्याः । “आचरन्तीः =आगच्छन्तीः “विशः= गोपालका:"अभि "ससहे षह्(सह्) लिट्लकार ( अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) ।।शक्यार्थे - चारो और से सख्ती की ।
         सह्- सह्यति विषह्यति ससाह सेहतुः सिसाहयिषति सुह्यति सुषोह अधेः प्रसहने (1333) इत्यत्र सह्यतेः सहतेर्वा निर्देश इति शक्तावुपेक्षायाञ्च उदाहृतं तमधिचक्रे इति (7) 22  तमवधीदित्यर्थः प्रसङ्गादवगम्यते ॥ ॥ ३४ ॥ 

        ऋग्वेद २/१४/७ में भी सायण ने "उपस्थ' का अर्थ उत्संग( गोद) ही किया है । जैसे 
        अध्वर्यवो यः शतमा सहस्रं भूम्या उपस्थेऽवपज्जघन्वान् ।
        कुत्सस्यायोरतिथिग्वस्य वीरान्न्यावृणग्भरता सोममस्मै ॥७॥देखे हे अध्वर्यवो जघन्वान् पूर्वं शत्रून् हतवान् य इंद्रः शतं सहस्रमसुरान् भूम्या उपस्थ उत्संगेऽवपत् । एकैकेन प्रकारेणापातयत् । किंच यः कुत्सस्यैतन्नामकस्य राजर्षेः । आयोः पौरूरवसस्य राजर्षेः। अतिथिग्वस्य दिवोदासस्य । एतेषां त्रयाणां वीरानभिगंतॄन्प्रति द्वंद्विनः शुष्णादीनसुरान् न्यवृणक् । वृणक्तिर्हिंसाकर्मा । अवधीत् । तथा च मंत्रवर्णः । त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारंधयोऽतिथिग्वाय शंबरं ।१. ५१. ६.। इति । तादृशायेंद्राय सोमं भरत ॥
         
        तस्मिन्स रमते देवः स्त्रीभिः परिवृतस्तदा ।
        हारनूपुरकेयूररशनाद्यैर्विभूषणैः।1.73.२०।

        १-तस्मिन् -उसमें ।
         २-रमते लट्लकार अन्य पुरुष एक वचन - क्रीडा करते हैं रमण करते हैं । रम्=क्रीडायाम्
        ३-देव:(प्रथमा विभक्ति एक वचन कर्ताकारक।
        स्त्रीभि:=  तृतीया विभक्ति करण कारक बहुवचन रूप स्त्रीयों के साथ।
        परिवृत:= चारों ओर से घिरे हुए।

        हारनूपुरकेयूररशना आद्यै: तृतीया विभक्ति वहुवचन = हार नूपुर(घँघुरू) केयूर(बाँह में पहनने का एक आभूषण  ,बिजायठ  बजुल्ला ,अंगद , बहुँठा अथवा भुजबंद भी जिसकी हिन्दी नाम हैं  आदि के द्वारा । 
        तदा= तस्मिन् काले -उस समय में।
        भूषितानां वरस्त्रीणां चार्वङ्गीनां विशेषतः ।
        ताभिः सम्पीयते पानं शुभगन्धान्वितं शुभम् । २१।
        भूषितानां= भूषण पहने हुओं का (षष्ठी वहुवचन रूप सम्बन्ध बोधक रूप)
        वरस्त्रीणां=श्रेष्ठ स्त्रीयों का ।
        चारु=सुन्दर । अङ्गीनाम्= अंगों वाली का षष्ठी विभक्ति वहुचन रूप ।
        विशेषत:=विशेष से पञ्चमी एकवचन अपादान कारक।
        शुभम्- जल जैसा राजनिघण्टु में शुभम् नपुँसक रूप में जल अर्थ उद्धृत किया है । अत: उपर्युक्त श्लोक में 'शुभम् शुभगन्धान्वितं' विशेषण का विशेष्य पद है ।
        शुभगन्धान्वितं= शुभ (कल्याण कारी) गन्धों से युक्त को द्वितीया विभक्ति  कर्म कारक पद रूप ।

        कृष्ण ने अपने जीवन काल में कभी भी मदिरा का पान भी नहीं किया ।
        सुर संस्कृति से प्रभावित  कुछ तत्कालीन यादव सुरा पान अवश्य करते रहे होंगे । परन्तु  सुरापान यादवों की सांस्कृतिक परम्परा या पृथा नहीं थी।
        जैसा कि वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में  

        वाल्मीकि रामायण कार ने वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में )
        सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है-
        “सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l”
        सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:. अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥
        (वाल्मीकि रामायण  बालकाण्ड सर्ग 45 के श्लोक 38)
        उपर्युक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है.।
        चूंकि देव लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे।
        इस कारण देवोपासक पुरोहितों  के कथित देव (देवता) सुर कहलाये और सुरा का पान नहीं करने वाले  असुर (जिन्हें इन्द्रोपासक देवपूजकों  द्वारा अदेव कहा गया) असुर कहलाये. ।

        परन्तु वैदिक सन्दर्भ में असुर का प्रारम्भिक अर्थ प्रज्ञा तथा प्राणों से युक्त मानवेतर प्राणियों को कहा गया है ।
        इसी कारण सायण आचार्य ने कृष्ण को अपने 
        ऋग्वेद के अष्टम् मण्डल के सूक्त संख्या 96 की कुछ ऋचाओं के भाष्य में अदेवी: पद के आधार पर  (13,14,15,) में कृष्ण को असुर अथवा अदेव"  कहकर कृष्ण का युद्ध इन्द्र से हुआ ऐसा वर्णित है ।
        परन्तु वेदों की व्याख्या करने वाले देवोपासक पुरोहितों ने द्वेष वश कृष्ण को भी सुरापायी बनाने के लिए द्वि-अर्थक पदों से कृष्ण चरित्र का वर्णन करने की चेष्टा की है।
        परन्तु फिर भी ये लोग पूर्ण त: कृष्ण की आध्यात्मिक छवि खराब करने में सफल नहीं हो पाये हैं ।
        राजनिर्घण्टः।। शुभम्-(उदकम् । इति निघण्टुः । १।१२।
        सम्पीङ् - सम्यक्पाने आत्मनेपदीय अन्य पुरुष एक वचन रूप सम्पीयते ( सम्यक् रूप से पीता है - पी जाती है ।

        भविष्य पुराण के ब्रह्म खण्ड में कृष्ण के इस प्रकार के विलासी चरित्र दर्शाने के लिए काल्पनिक वर्णन किया गया है।
        स्त्रियों के साथ दिन में रमण ( संभोग) करना और मदिरापान करना कृष्ण सदृश श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद् के वक्ता के द्वारा असम्भव ही है ।
        कृष्ण ने कभी भी देवसंस्कृति की मूढ़ मान्यताओं का अनुमोदन नहीं किया जैसे निर्दोष पशुओं की यज्ञ में बलि के रूप में हिंसा करना ।
        और करोड़ो देवों की पूजा करना। ये कृष्ण ने नहीं किया।
        ______
        जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अध्याय में कृष्ण ने अर्जुन से कहा
        येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:।
        तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।9/23।
        _______________
        श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय नवम का २३ वाँ श्लोक
        अर्थ: –हे अर्जुन ! जो भक्त दूसरे देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मेरा ही पूजन करते हैं, लेकिन उनकी यह पूजा विना विधि पूर्वक ही होती है।
        कृष्ण का तो एक ही उद्घोष( एलान) था कि सभी देवताओं से सम्बन्धित सम्प्रदाय ( धर्मों) को छोड़कर मेरी शरण आजा मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।
        श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय अठारह का मूल श्लोकः देखें निम्न रूपों में
        __________
        सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
        अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।18.66। 
        सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।
         कृष्ण के सन्दर्भ में कुछ तथाकथित नव बौद्ध कहते हैं कि कृष्ण शब्द संस्कृत का है और पाली भाषा में नहीं है।

        परन्तु उनको पता होना चाहिए कि( र) वर्ण पाली भाषा में है।
        जो कि (ऋ+ अ = र) का सन्ध्यक्षर संक्रमण का नवीन रूप है।
        ___________    

        "दातव्यं दानं तु दीयते दीनं दयनीयं वा।
        उच्च दानं दातुः इच्छानुरूपं सुप्रभा।
        भिक्षितव्य भिक्षा भिक्षुकस्य इच्छानुरूपा
        पुण्यरहिता तुच्छा हीना  इयं  किंवा ।१।
        अनुवाद:-
        "दान देना ही कर्तव्य है" - तो दान दीन को देना चाहिए जो दया का पात्र होता है यह दान उच्च और दाता की इच्छा के अनुसार होता है।
        भीख भिखारी की इच्छा के अनुसार और दान की अपेक्षा तुच्छ व हीन होती है इसका कोई पुण्य नही होता है।१।
          आभीर संहिता-
        यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।
        भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।
        (श्रीमद्भगवद्गीता-9/25) 
        अनुवाद:-
        देवताओं का पूजन करनेवाले  देवताओं को प्राप्त होते हैं। पितरों का पूजन करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूत-प्रेतों को ही प्राप्त होते हैं।
        परन्तु  हे अर्जुन!  मेरा पूजन करने वाले वैष्णव भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।



        इस संसार में प्रत्येक प्राणी के जीवन में  सभी घटित  घटनाओं और प्राप्त  वस्तुओं का अस्तित्व उद्देश्य पूर्ण और सार्थक ही है।  वह नियत है , और निश्चित भी है।

        भले हीं उसकी उपयोगिता हमारे जीवन के अनुकूल उस समय हो या नहो हो ।  क्योंकि उसकी घटित सूक्ष्म वास्तविकताओं का हम्हें  कभी स्थूल बोध ही नहीं होता है।

        लोगों को कभी भी  भविष्य में स्वयं द्वारा करने वाले कर्ता बनकर कर्मों के लिए दाबा नहीं करना चाहिए- और बीते हुए समय में  भूल से की गयी गलत क्रियाओं के लिए  भी पछतावा भी नहीं करना  चाहिए । बुद्धिमानी इसी में है। 

        हाँ भूत काल की घटनाओं से उनके सकारात्मक या नकारात्मक परिणामों से मनुष्य शिक्षा लेकर भविष्य की  सुधारात्मक परियोजना का  अवश्य विचार करना चाहिए  । 

        यद्यपि कर्म तो वर्तमान के ही धरातल पर सम्पादित  होता है। अत: वर्तमान को ही बहुत सजग तरीके जीना- जीवन की कला है।

        भविष्य की घटित घटनाओं का ज्ञान  स्थूल दृष्टि से तो कोई नहीं कर सकता है।
        परन्तु रात्रि के अन्तिम पहर में देखे हुए स्वप्न भी जीवन में सन्निकट भविष्य में होने वाली कुछ घटनाओं का प्रकाशन अवश्य करते  हैं।
        विज्ञान के युग में भी यह एक गूढ़ पहेली है। इसके मूल में न दि मत इच्छाऐं हैं और न आने वाले जीवन की परीक्षाऐं-

        ये भविष्य की घटनाएँ कभी प्रतिकूल प्रतीत होते हुए भी अनुकूल स्थितियों का निर्माण करती हैं । मनुष्य इसे नहीं जान पाता-

        और अनुकूल प्रतीत होते हुए भी वाली ये  घटनाएँ  प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्माण कर देती हैं।  ये सब तो प्रारब्ध का विधान ही है। प्रारब्ध कर्म संस्कार के धागों से निर्मित जीवन का मानचित्र( नक्शा) है।

        कभी कभी हम बचपन में केवल शोक अथवा सनक में ऐसी वस्तुओं का संग्रह कर लेते हैं जो उस समय तो निरर्थक और बेकार सी होती हैं परन्तु भविष्य में कभी उनकी उपयोगिता सार्थक हो जाती है। यह तो प्रारब्ध का विधान है।

        दर-असल प्रारब्ध अनेक जन्मों के मन के  निर्देशन द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों से किए गये कर्मों का सञ्चित रूप में से एक जीवन के  निर्देशन के लिए विभाजित रूप है। 
        अर्थात  ( एक जीवन में फलित परिस्थितियों और उपलब्धियों की सुलभता का नाम एक दूसरा नाम  है।  स्वभाव की रवानगी में यही प्रारब्ध ही  व्याप्त है। 

        यही प्रारब्ध  भाग्य संज्ञा से भी  अभिहित किया जाता है।

        परन्तु जब लोग स्वभाव के विपरीत संयम से कुछ नया करते हैं तब  वह साधना नवीन कर्म संस्कार का निर्माण करती है। 

        यही क्रियमाण कर्म है। जिससे आगामी जीवन के प्रारब्ध का निर्माण होता है।

        यही जीवन का सत्य है। हमने जीवन की प्रयोगशाला में  यह अनुभव रूपी प्रयोग भी किया है। यह प्रयोगशाला और प्रयोग सबका मौलिक ही होता है। सार्वजनिक कदापि नहीं -

         दुनियाँ के  सभी  प्राणियों  की क्रियाविधि काल के तन्तुओं से निर्मित‌ प्रारब्ध की डोर से नियन्त्रित है।

        परिस्थितियों के वस्त्रों में  है डोर या धागा  सबका प्रारब्ध का लगा है  इन वस्त्रों से  जीवन आवृत  है। और डोर वही प्रारब्ध ( भाग्य ) की लगी हुई  है।
        इसी लिए अहंकार रहित होकर कर्तव्य करने में ही जीवन की सार्थकता है।

         -  योगेश रोहि  -

        श्रीराधाकृष्णाभ्याम् नम: 

                           इति - समापनम्★•

         -

        Yadav Yogesh Kumar Rohi:
        पुराणों में श्री कृष्ण की आयु ( जीवन काल) और उनकी लौकिक लीलाऐं-

        ब्रह्मवैवर्तपुराण /खण्डः 4 (श्रीकृष्णजन्मखण्डः अध्याय 129 श्री कृष्ण के गोलोक गमन तथा उनकी १२५ वर्ष की आयु का विवरण-)


        विषय सूची
        १ कृष्ण काल
        २ कृष्ण का समय
        ३ कंस के समय मथुरा
        ४ प्राचीनतम संस्कृत साहित्य
        ५ पुराणेतर ग्रंथ


        संसार में एक कृष्ण ही हुए जिन्होंने फिलॉसोफी को  गीत बनाकर अपनी मुरली की तानों पर  गुनगुनाया है।

        श्रीकृष्ण के समय का निर्धारण विभिन्न विद्वानों ने किया है । 

        कई विद्वान श्री कृष्ण को 3500 वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं मानते है ।
        भारतीय मान्यता के अनुसार कृष्ण का काल 5000 वर्ष से भी कुछ अधिक पुराना लगता है । इसका वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार भी कुछ विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है ।

        श्रीकृष्ण का समय के संबंध में श्री कृष्ण दत्त वाजपेयी का मत- "वर्तमान ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म लगभग ई॰ पू० 1500 माना जाता है। 

        ये सम्भवत: 100 वर्ष से कुछ ऊपर की आयु तक जीवित रहे। ब्रह्म वैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड कृष्ण की आयु 125 वर्ष निर्धारित करता है।
        अपने इस दीर्घजीवन में उन्हें विविध प्रकार के कार्यो में व्यस्त रहते हुए भी जीवन के यथार्थ की व्यवहारिक व्याख्या की । 
        उनका प्रारंभिक जीवन तो ब्रज में कटा और शेष द्वारका में व्यतीत हुआ ।

        बीच-बीच में उन्हें अन्य अनेक प्रान्तो में भी जाना पडा़ ।
        जो अनेक घटनाएं उनके समय में घटी उनकी विस्तृत चर्चा पुराणों तथा महाभारत आदि में मिलती है 

        वैदिक साहित्य में तो कृष्ण का उल्लेख बहुत कम मिलता है विशेषत: ऋग्वेद में  और उसमें भी उन्हें मानव-रूप में ही दिखाया गया है। 

         एक  विचारक डॉ० प्रभुदयाल मित्तल द्वारा प्रस्तुत प्रमाण कृष्ण काल को 5000 वर्ष पूर्व का प्रमाणित करते हैं उन्होंने छांदोग्योपनिषद के श्लोक का हवाला दिया है । 
        ज्योतिष का प्रमाण देते हुए श्री मित्तल लिखते हैं- "मैत्रायणी उपनिषद और शतपथ ब्राह्मण के “कृतिका स्वादधीत” उल्लेख से तत्कालीन खगोल-स्थिति की गणना कर ट्रेनिंग कालेज, पूना के गणित प्राध्यापक स्व. शंकर बालकृष्ण दीक्षित महोदय ने मैत्रायणी उपनिषद की ईसवी सन् ने 1600 पूर्व का और शतपथ ब्राह्मण को 3000 वर्ष का माना था ।

        मैत्रायणी उपनिषद सबसे पीछे का उपनिषद कहा जाता है और उसमें छांदोग्य उपनिषद के अवतरण मिलते है, इसलिए छांदोग्य मैत्रीयणी से पूर्व का उपनिषद हुआ।

        शतपथ ब्राह्मण और उपनिषद आजकल के विद्वानों के मतानुसार एक ही काल की रचनाएं हैं, अत: छांदोग्य का काल भी ईसा से 3000 वर्ष पूर्व का हुआ।

        छांदोग्य उपनिषद में देवकी पुत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है ( छान्दोग्य उपनिषद,प्रथम भाग,खण्ड 17) “देवकी पुत्र” विशेषण के कारण उक्त उल्लेख के कृष्ण स्पष्ट रूप से वृष्णि वंश के कृष्ण हैं। 

        इस प्रकार कृष्ण का समय प्राय: 5000 वर्ष पूर्व का ज्ञात होता है ।" - डा प्रभुदयाल मित्तल डॉ० मित्तल ने किस आधार पर छांदोग्योपनिषद को 5000 वर्ष प्राचीन बताया है यह कहीं उल्लेख नहीं है ।

        छांदोग्योपनिषद के ई पू 500 से 1000 वर्ष से अधिक प्राचीन होने के प्रमाण नहीं मिलते ।


        कृष्ण का समय
        डा॰ मित्तल लिखते हैं -" परीक्षित के समय में सप्तर्षि (आकाश के सात तारे) मघा नक्षत्र पर थे, जैसा शुक्रदेव द्वारा परीक्षित से कहे हुए वाक्य से प्रमाणित है। 

        ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सप्तर्षि एक नक्षत्र पर एक सौ वर्ष तक रहते है । आजकल सप्तर्षि कृतिका नक्षत्र पर है जो मघा से 21 वां नक्षत्र है।

        इस प्रकार मघा के कृतिक पर आने में 2100 वर्ष लगे हैं। 
        किंतु यह 2100 वर्ष की अवधि महाभारत काल कदापि नहीं है।
        इससे यह मानना होगा कि मघा से आरम्भ कर 27 नक्षत्रों का एक चक्र पूरा हो चुका था और दूसरे चक्र में ही सप्तर्षि उस काल में मघा पर आये थे।
         पहिले चक्र के 2700 वर्ष में दूसरे चक्र के 2100 वर्ष जोड़ने से 4800 वर्ष हुए ।

        यह काल परीक्षित की विद्यमानता का हुआ । परीक्षित के पितामह अर्जुन थे, जो आयु में श्रीकृष्ण से 18 वर्ष छोटे थे । इस प्रकार ज्योतिष की उक्त गणना के अनुसार कृष्ण-काल अब से प्राय: 5000 वर्ष पूर्व का सिद्ध होता है ।"
        _________
        आजकल के चैत्र मास के वर्ष का आरम्भ माना जाता है, जब कि कृष्ण काल में वह मार्गशीर्ष से होता था ।बसन्त ऋतु भी इस काल में मार्गशीर्ष माह में होती थी। 

        महाभारत में मार्गशीर्ष मास से ही कई स्थलों पर महीनों की गणना की गयी है । गीता में जहाँ भगवान की विभूतियों का वर्णन हुआ हैं, वहाँ “मासानां मार्गशीर्षोऽहम” और “ऋतुनां कुसुमाकर” के उल्लेखों से भी उक्त कथन की पुष्टि होती है ।

         ज्योतिष शास्त्र के विद्धानों ने सिद्ध किया है कि मार्गशीर्ष में वसन्त सम्पात अब से प्राय: 5000 वर्ष पूर्व होता था । (भारतीय ज्योतिषशाला,पृष्ठ 34) इस प्रकार भी श्रीकृष्ण काल के 5000 वर्ष प्राचीन होने की पुष्टि होती है ।

        श्रीकृष्ण द्वापर युग के अन्त और कलियुग के आरम्भ के सन्धि-काल में विद्यमान थे । भारतीय ज्योतिषियों के मतानुसार कलियुग का आरम्भ शक संवत से 3176 वर्ष पूर्व की चैत्र शुक्ल 1 को हुआ था । आजकल 1887 शक संवत है । 

        इस प्रकार कलियुग को आरम्भ हुए 5066 वर्ष हो गये है । कलियुग के आरम्भ होने से 6 माह पूर्व मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत का युद्ध का आरम्भ हुआ था, जो 18 दिनों तक चला था । उस समय श्रीकृष्ण की आयु 83 वर्ष की थी । उनका तिरोधान 119 वर्ष की आयु में हुआ था।
        परन्तु ब्रह्म वैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड कृष्ण की आयु125 वर्ष वर्णन करता है।

        इस प्रकार भारतीय मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण विद्यमानता या काल शक संवत पूर्व 3263 की भाद्रपद कृष्ण. 8 बुधवार के शक संवत पूर्व 3144 तक है । भारत के विख्यात ज्योतिषी वराह मिहिर, आर्यभट, ब्रह्मगुप्त आदि के समय से ही यह मान्यता प्रचलित है । 

        भारत का सर्वाधिक प्राचीन युधिष्ठिर संवत जिसकी गणना कलियुग से 40 वर्ष पूर्व से की जाती है, उक्त मान्यता को पुष्ट करता है ।

        पुरातत्ववेत्ताओं का मत है कि अब से प्राय: 5000 वर्ष पूर्व एक प्रकार का प्रलय हुआ था । उस समय भयंकर भूकम्प और आंधी तूफानों से समुद्र में बड़ा भारी उफान आया था । उस समय नदियों के प्रवाह परिवर्तित हो गये थे, विविध स्थानों पर ज्वालामुखी पर्वत फूट पड़े थे और पहाड़ के श्रृंग टूट-टूटकर गिर गये थे ।

        वह भीषण दैवी दुर्घटना वर्तमान इराक में बगदाद के पास और वर्तमान मैक्सिको के प्राचीन प्रदेशों में हुई थी, जिसका काल 5000 वर्ष पूर्व का माना जाता है । उसी प्रकार की दुर्घटनाओं का वर्णन महाभारत और भागवत आदि पुराणों भी मिलता है । इनसे ज्ञात होता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात उसी प्रकार के भीषण भूकम्प हस्तिनापुर और द्वारिका में भी हुए थे, जिनके कारण द्वारिका तो सर्वथा नष्ट ही हो गयी थी ।

        बगदाद(ईराक) और हस्तिनापुर तथा प्राचीन मग प्रदेश( ईरान) और द्वारिका प्राय: एक से आक्षांशों पर स्थित हैं, अत: उनकी दुर्घटनाओं का पारिस्परिक सम्बन्ध विज्ञान सम्मत है । 

        बगदाद प्रलय के पश्चात वहाँ बताये गये “उर” नगर को तथा मैक्सिको (दक्षिणी अमेरिका, ) स्थित मय प्रदेश के ध्वंस को जब 5000 वर्ष प्राचीन माना जा सकता है, जब महाभारत और भागवत में वर्णित वैसी ही घटनाओं, जो कृष्ण के समय में हुई थी, उसी काल का माना जायगा । ऐसी दशा में पुरातत्व के साक्ष्य से भी कृष्ण-काल 5000 वर्ष प्राचीन सिद्ध होता है ।

         यह दूसरी बात है कि महाभारत और भागवत ग्रंथों की रचना बहुत बाद में हुई थी, किंतु उनमें वर्णित कथा 5000 वर्ष पुरानी ही है ।

        ज्योतिष और पुरातत्व के अतिरिक्त इतिहास के प्रमाण से भी कृष्ण-काल विषयक भारतीय मान्यता की पुष्टि होती है । यवन नरेश सैल्युक्स ने मैगस्थनीज नामक अपना एक राजदूत भारतीय नरेश चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा था । मैगस्थनीज ने उस समय के अपने अनुभव लेखबद्ध किये थे ।

        इस समय उस यूनान राजदूत का मूल ग्रंन्थ तो नहीं मिलता है, किंतु उसके जो अंश एरियन आदि अन्य यवन लेखकों ने उद्धृत किये थे, वे प्रकाशित हो चुके है ।

        मैगस्थनीज ने लिखा है कि मथुरा में शौरसेनी लोगों का निवास है । वे विशेष रूप से हरकुलीज (हरि कृष्ण) की पूजा करते है । उनका कथन है कि डायोनिसियस के हरकुलीज 15 पीढ़ी और सेण्ड्रकोटस (चन्द्रगुप्त) 153 पीढ़ी पहले हुए थे । इस प्रकार श्रीकृष्ण और चन्द्रगुप्त में 138 पीढ़ियों के 2760 वर्ष हुए। 

        चन्द्रगुप्त का समय ईसा से 326 वर्ष पूर्व है । इस हिसाब से श्रीकृष्ण काल अब से (1965+326+2760) 5051 वर्ष पूर्व सिद्ध होता है ।

        कंस के समय मथुरा-
        कंस के समय में मथुरा का क्या स्वरूप था, इसकी कुछ झलक पौराणिक वर्णनों में देखी जा सकती है। यद्यपि ये वर्णन अतिशयक्ति पूर्ण व काव्यात्मक ही हैं।
        जब श्रीकृष्ण ने पहली बार इस नगरी को देखा तो भागवतकार के शब्दों में उसकी शोभा इस प्रकार थी।

        'उस नगरी के प्रवेश-द्वार ऊँचे थे और स्फटिक पत्थर के बने हुए थे। उनके बड़े-बड़े सिरदल और किवाड़ सोने के थे। 
        नगरी के चारों ओर की दीवाल (परकोटा) ताँबे और पीतल की बनी थी तथा उसके नीचे की खाई दुर्लभ थी। 
        नगरी अनेक उद्यानों एक सुन्दर उपवनों से शोभित थी।'


        'सुवर्णमय चौराहों, महलों, बगीचियों, सार्वजनिक स्थानों एवं विविध भवनों से वह नगरी युक्त थी। वैदूर्य, बज्र, नीलम, मोती, हीरा आदि रत्नों से अलंकृत छज्जे, वेदियां तथा फर्श जगमगा रहे थे और उन पर बैठे हुए कबूतर और मोर अनेक प्रकार के मधुर शब्द कर रहे थे। गलियों और बाज़ारों में, सड़कों तथा चौराहों पर छिड़काव किया गया था। और उन पर जहाँ-तहाँ फूल-मालाएँ,

        दूर्वा-दल, लाई और चावल बिखरे हुए थे।'


        'मकानों के दरवाजों पर दही और चन्दन से अनुलेपित तथा जल से भरे हुए मङल-घट रखे हुए थे, फूलों, दीपावलियों, बन्दनवारों तथा फलयुक्त केले और सुपारी के वृक्षों से द्वार सजाये गये थे और उन पर पताके और झड़ियाँ फहरा रही थी।'


        उपर्युक्त वर्णन कंस या कृष्ण कालीन मथुरा से कहाँ तक मेल खाता है, यह बताना कठिन है। परन्तु इससे तथा अन्य पुराणों में प्राप्त वर्णनों से इतना अवश्य ज्ञात होता है कि तत्कालीन मथुरा एक समृद्ध पुरी थी। उसके चारों ओर नगर-परकोटा थी तथा नगरी में उद्यानों का बाहुल्य था। मोर पक्षियों की शायद इस समय भी मथुरा में अधिकता थी। महलों, मकानों, सड़कों और बाज़ारों आदि के जो वर्णन मिलते है उनसे पता चलता है कि कंस के समय की मथुरा एक धन-धान्य सम्पन्न नगरी थी।

        इस प्रकार भारतीय विद्वानों के सैकड़ों हज़ारों वर्ष प्राचीन निष्कर्षों के फलस्वरूप कृष्ण-काल की जो भारतीय मान्यता ज्योतिष, पुरातत्व और इतिहास से भी परिपुष्ट होती है, उसे न मानने का कोई कारण नहीं है । 

        आधुनिक काल के विद्वानों इतिहास और पुरातत्व के जिन अनुसन्धानों के आधार पर कृष्ण-काल की अवधि 3500 वर्ष मानते है, वे अभी अपूर्ण हैं इस बात की पूरी सम्भावना है कि इन अनुसन्धानों के पूर्ण होने पर वे भी भारतीय मान्यता का समर्थन करने लगेंगे ।

        प्राचीनतम संस्कृत साहित्य-
        वैदिक संहिताओं के अनंतर संस्कृत के प्राचीनतम साहित्य-आरण्यक, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथों और पाणिनीय सूत्रों में श्रीकृष्ण का थोड़ा बहुत उल्लेख मिलता है । 

        जैन साहित्य में श्रीकृष्ण को तीर्थंकर नेमिनाथ जी का चचेरा भाई बतलाया गया है । इस प्रकार जैन धर्म के प्राचीनतम साहित्य में श्रीकृष्ण का उल्लेख हुआ है ।

         बौद्ध साहित्य में जातक कथाएं अत्यंत प्राचीन है उनमें से “घट जातक” में कृष्ण कथा वर्णित है । यद्यपि उपर्युक्त साहित्य कृष्ण – चरित्र के स्त्रोत से संबंधित है, तथापि कृष्ण-चरित्र के प्रमुख ग्रंथ 1. महाभारत 2. हरिवंश, 3. विविध पुराण, 4. गोपाल तापनी उपनिषद और 5. गर्ग संहिता हैं ।

        यहाँ इन ग्रंथों में वर्णित श्रीकृष्ण के चरित्र पर प्रकाश डाला जाता है ।

        पुराणेतर ग्रंथ
        जिन पुराणेतर ग्रंथों में श्रीकृष्ण का चरित्र वर्णित है, उसमें “गोपाल तापनी उपनिषद” और “गर्ग संहिता” प्रमुख है । 

        यहाँ पर उनका विस्तृत विवरण दिया जाता है – गोपाल तापनी उपनिषद : - यह कृष्णोपासना से संबंधित एक आध्यात्मिक रचना है । इसके पूर्व और उत्तर नामक दो भाग है । पूर्व भाग को “कृष्णोपनिषद” और उत्तर भाग को “अथर्वगोपनिषद” कहा गया है ।

        यह रचना सूत्र शैली में है, अत: कृष्णोपासना के परवर्ती ग्रंथो की अपेक्षा यह प्राचीन जान पड़ती है । इसका पूर्व भाग उत्तर भाग से भी पहले का ज्ञात होता है । श्रीकृष्ण प्रिया राधा और उनके लीला-धाम ब्रज में से किसी का भी नामोल्लेख इसमें नहीं है । इससे भी इसकी प्राचीनता सिद्ध होती हैं । 

        डा. प्रभुदयाल मीतल, कृष्ण का समय 5000 वर्ष पूर्व मानते हैं । वे इसको अनेक तथ्य एवं उल्लेखों के आधार पर प्रमाणित भी करते हैं । 


        श्री कृष्ण दत्त वाजपेयी का मत भिन्न है, वे कृष्ण काल को 3500 वर्ष से अधिक पुराना नहीं मानते । 


        श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता तथा तत्संबंधी अन्य समस्याओं के लिए देखिए- राय चौधरी-अर्ली हिस्ट्री आफ वैष्णव सेक्ट, पृ0 39, 52; आर0जी0 भंडारकार-ग्रंथमाला, जिल्द 2, पृ0 58-291;

         विंटरनीज-हिस्ट्री आफ इंडियन लिटरेचर, जिल्द 1, पृ0 456; मैकडॉनल तथा कीथ-वैदिक इंडेक्स, जि0 1, पृ0 184; ग्रियर्सन-एनसाइक्लोपीडिया आफ रिलीजंस (`भक्ति' पर निबंध); भगवानदास-कृष्ण; तदपत्रिकर-दि कृष्ण प्रायलम; पार्जीटर-ऎश्यंट इंडियन हिस्टारिकल ट्रेडीशन आदि।

        तद्धैतत् घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाच

        तद्धैतत्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाच,अपिपास एव
         बभूवसोऽन्तवेलायामेतत् त्रयँ प्रतिपद्येत, 'अक्षितमसि', 'अच्युतमसि',
        'प्राणसँशितमसी'ति  तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ।।  ।।
        "छांदोग्य उपनिषद (3,17,6),
        जिसमें देवकी पुत्र कृष्ण का उल्लेख है और उन्हें घोर आंगिरस का शिष्य कहा है। परवर्ती साहित्य में श्रीकृष्ण को देव या विष्णु रूप में प्रदर्शित करने का भाव मिलता है (देखें तैत्तिरीय आरण्यक, 10, 1, 6; पाणिनि-अष्टाध्यायी, 4, 3, 98 आदि)। महाभारत तथा हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्म पुराण, वायु पुराण, भागवत पुराण, पद्म पुराण, देवी भागवत अग्नि पुराण तथा ब्रह्म वैवर्त पुराण पुराणों में उन्हें प्राय: भागवान रूप में ही दिखाया गया है।

        इन ग्रंथो में यद्यपि कृष्ण के आलौकिक तत्व की प्रधानता है तो भी उनके मानव या ऐतिहासिक रूप के भी दर्शन यत्र-तत्र मिलते हैं।

        पुराणों में कृष्ण-संबंधी विभिन्न वर्णनों के आधार पर कुछ पाश्चात्य विद्वानों को यह कल्पना करने का अवसर मिला कि कृष्ण ऐतिहासिक पुरुष नहीं थे।
         इस कल्पना की पुष्टि में अनेक दलीलें दी गई हैं, जो ठीक नहीं सिद्ध होती। यदि महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त, ब्राह्मण-ग्रंथों तथा उपनिषदों के उल्लेख देखे जायें तो कृष्ण के ऐतिहासिक तत्व का पता चल जायगा।

        बौद्ध-ग्रंथ घट जातक तथा जैन-ग्रंथ उत्तराध्ययन सूत्र से भी श्रीकृष्ण का ऐतिहासिक होना सिद्ध है। यह मत भी भ्रामक है कि ब्रज के कृष्ण, द्वारका के कृष्ण तथा महाभारत के कृष्ण एक न होकर अलग-अलग व्यक्ति थे।

        अथापराह्ने भगवान् कृष्णः सङ्‌कर्षणान्वितः ।
         मथुरां प्राविशद् गोपैः दिदृक्षुः परिवारितः ॥ १९ ॥
        ( मिश्र )
        ददर्श तां स्फाटिकतुङ्ग गोपुर
             द्वारां बृहद् हेमकपाटतोरणाम् ।
         ताम्रारकोष्ठां परिखादुरासदां
             उद्यान रम्योप वनोपशोभिताम् ॥ २० ॥
         सौवर्णशृङ्‌गाटकहर्म्यनिष्कुटैः
             श्रेणीसभाभिः भवनैरुपस्कृताम् ।
         वैदूर्यवज्रामलनीलविद्रुमैः
             मुक्ताहरिद्‌भिर्वलभीषु वेदिषु ॥ २१ ॥
         जुष्टेषु जालामुखरन्ध्रकुट्टिमेषु
             आविष्टपारावतबर्हिनादिताम् ।
         संसिक्तरथ्यापणमार्गचत्वरां
             प्रकीर्णमाल्याङ्‌कुरलाजतण्डुलाम् ॥ २२ ॥
         आपूर्णकुम्भैर्दधिचन्दनोक्षितैः
             प्रसूनदीपावलिभिः सपल्लवैः ।
         सवृन्दरम्भाक्रमुकैः सकेतुभिः
             स्वलङ्‌कृतत् द्वारगृहां सपट्टिकैः ॥ २३ ॥

        (भागवतपुराण- 10/ 41/20-23)
        भगवान ने देखा कि नगर के परकोटे में स्फटिकमणि के बहुत ऊँचे-ऊँचे गोपुर तथा घरों में भी बड़े-बड़े फाटक बने हुए हैं।
         उनमें सोने के बड़े-बड़े किंवाड़ लगे हैं और सोने के ही तोरण बने हुए हैं।
         नगर के चारों ओर ताँबें और पीतल की चहरदीवारी बनी हुई है।
        खाई के कारण और और कहीं से उस नगर में प्रवेश करना बहुत कठिन है।
        स्थान-स्थान पर सुन्दर-सुन्दर उद्यान और रमणीय उपवन शोभायमान हैं। 
        सुवर्ण से सजे हुए चौराहे, धनियों के महल, उन्हीं के साथ के बगीचे, कारीगरों के बैठने के स्थान या प्रजावर्ग के सभा-भवन और साधारण लोगों के निवासगृह नगर की शोभा बढ़ा रहे हैं।
         वैदूर्य, हीरे, स्फटिक नीलम, मूँगे, मोती और पन्ने आदि से जड़े हुए छज्जे, चबूतरे, झरोखे एवं फर्श आदि जगमगा रहे हैं।
         उन पर बैठे हुए कबूतर, मोर आदि पक्षी भाँति-भाँति बोली बोल रहे हैं।
        सड़क, बाजार, गली एवं चौराहों पर खूब छिड़काव किया गया है।
         स्थान-स्थान पर फूलों के गजरे, जवारे खील और चावल बिखरे हुए हैं।
         घरों के दरवाजों पर दही और चन्दन आदि से चर्चित जल से भरे हुए कलश रखे हैं और वे फूल, दीपक, नयी-नयी कोंपलें फलसहित केले और सुपारी के वृक्ष, छोटी-छोटी झंडियों और रेशमी वस्त्रों से भलीभाँति सजाए हुए हैं।


        चंद्रमा (यानी कृष्ण) एक समूह से घिरा हुआ है। आत्माएं उनकी किरणों के अंश हैं क्योंकि घटकों की प्रकृति आत्मा में मौजूद है। कृष्ण दो भुजाओं से घिरे हुए हैं। उनकी कभी चार भुजाएं नहीं होतीं. वहाँ वह एक ग्वालिन से घिरा हुआ सदैव क्रीड़ा करता रहता है। गोविंदा (अर्थात कृष्ण) अकेले ही एक पुरुष हैं; ब्रह्मा आदि स्त्रियाँ ही हैं। उसी से प्रकृति प्रकट होती है। यह स्वामी प्रकृति का एक स्वरूप है।


        _      
        न राधिका समा नारी न कृष्णसदृशः पुमान् ।
        वयः परं न कैशोरात्स्वभावः प्रकृतेः परः ।५२।
        अनुवाद:-
        न तो राधा के समान कोई स्त्री है और न ही कृष्ण के समान कोई पुरुष है। किशोरावस्था से बढ़कर कोई (बेहतर) उम्र नहीं है; यह प्रकृति का महान सहज स्वभाव है।५२। 

        ध्येयं कैशोरकं ध्येयं वनं वृंदावनं वनम् ।
        श्याममेव परं रूपमादिदेवं परो रसः ।५३।
        अनुवाद:-
        किशोरावस्था में स्थित कृष्ण का  ध्यान करना चाहिए. वृन्दावन-उपवन का ध्यान करना चाहिए। सबसे महान रूप (वह) श्याम है , और वह परम रस  का प्रथम देव  है।५३।

        बाल्यं पंचमवर्षांतं पौगंडं दशमावधि ।
        अष्टपंचककैशोरं सीमा पंचदशावधि ।५४।
        बाल्य पाँचवें वर्ष तक रहता है। 
        पोगण्ड दसवें वर्ष तक होता है।
        (पाँच से दस वर्ष तक की अवस्था की बालक)
        किशोरावस्था तेरह  वर्ष तक चलती है और
        (इसकी) सीमा पन्द्रहवाँ वर्ष है।

        यौवनोद्भिन्नकैशोरं नवयौवनमुच्यते ।
        तद्वयस्तस्य सर्वस्वं प्रपंचमितरद्वयः ।५५।
        युवावस्था ( यौवन ) से उत्पन्न होने वाली किशोरावस्था को तरुण युवा ( नवयौवन ) कहा जाता है। बाल्यावस्था और युवावस्था के बीच का अर्थात् ग्यारह से पंद्रह वर्ष तक की अवस्था का बालक किशोर होता है। यह अवस्था ही उसका सर्वस्व है; (उससे भिन्न) आयु अवास्तविक ( प्रपंच ) है।

        बाल्यपौगंडकैशोरं वयो वंदे मनोहरम् ।
        बालगोपालगोपालं स्मरगोपालरूपिणम् ।५६।
        मैं मनोहर अवस्था बचपन, लड़कपन और किशोरावस्था को सलाम करता हूं। मैं उन बाल ग्वाल कृष्ण को नमस्कार करता हूँ जो कामदेव रूपी ग्वाले के रूप में हैं।

        वंदे मदनगोपालं कैशोराकारमद्भुतम् ।
        यमाहुर्यौवनोद्भिन्न श्रीमन्मदनमोहनम् ।५७।
        एक किशोर की प्रकृति के हैं और अद्भुत हैं, और जिन्हें वे कामदेव-मोहक कहते हैं, मैं उन्हें नमस्कार करता हूं।५७।

        अध्याय 77 - कृष्ण का वर्णन
         पाताल-खंड )

        ___
        सत्यंनित्यंपरानंदंचिद्घनंशाश्वतंशिवम् ।
        नित्यां मे मथुरां विद्धि वनं वृंदावनं तथा ।२६।

        यमुनां गोपकन्याश्च तथा गोपालबालकाः ।
        ममावतारो नित्योऽयमत्र मा संशयं कृथाः ।२७।
        अनुवाद:-
        तब भगवान ने स्वयं वृन्दावन उपवन में विचरण करते हुए मुझसे कहा: 

        "मेरा कोई भी रूप उससे बड़ा नहीं है जो दिव्य, शाश्वत, अंशहीन, क्रियाहीन, शांत और शुभ, बुद्धि और आनंद का रूप है, पूर्ण है।" 
        ,जिसकी आंखें पूरी तरह से खिले हुए कमल की पंखुड़ियों की तरह हैं, जिन्हें आपने (अभी) देखा था। वेद इसका वर्णन केवल कारणों के कारण के रूप में करते हैं, जो सत्य है, शाश्वत है, महान आनंद स्वरूप है, बुद्धि का पुंज है, शाश्वत और शुभ है। मेरी मथुरा को शाश्वत जानो,

        वैसे ही वृन्दावन भी; इसी प्रकार (अनन्त जानो) यमुना, ग्वाले और ग्वाले। मेरा यह अवतार अनन्त है।२६-२७।

        ममेष्टा हि सदा राधा सर्वज्ञोऽहं परात्परः ।
        सर्वकामश्च सर्वेशः सर्वानंदः परात्परः ।२८।

        मयि सर्वमिदं विश्वं भाति मायाविजृंभितम् ।
        ततोऽहमब्रुवं देवं जगत्कारणकारणम्। २९।
        अनुवाद:-
        इसमें कोई संदेह न रखें. राधा मुझे सदैव प्रिय है। मैं सर्वज्ञ हूं, महानों से भी महान हूं। मेरी सभी इच्छाएं पूरी हो गई हैं, मैं सबका स्वामी हूं, मैं संपूर्ण आनंद हूं और महान से भी महान हूं।२८-२९।

        काश्च गोप्यस्तु के गोपा वृक्षोऽयं कीदृशो मतः ।
        वनं किं कोकिलाद्याश्च नदी केयं गिरिश्च कः ।३०।

        कोऽसौ वेणुर्महाभागो लोकानंदैकभाजनम् ।
        भगवानाह मां प्रीतः प्रसन्नवदनांबुजः ।३१।
        अनुवाद:-
        तब मैंने संसार के कारण भगवान से कहा: “ग्वाले कौन हैं? ग्वालिनें क्या हैं? यह किस प्रकार का वृक्ष बताया गया है? यह गिरि कौन है? कोयल आदि क्या हैं? नदी क्या है? और पहाड़ क्या है? यह महान बांसुरी कौन है, जो सभी लोगों के लिए आनंद का एकमात्र स्थान है?।।३०-३१।

        गोप्यस्तु श्रुतयो ज्ञेया ऋचो वै गोपकन्यकाः ।
        देवकन्याश्च राजेंद्र तपोयुक्ता मुमुक्षवः ।३२।

        गोपाला मुनयः सर्वे वैकुंठानंदमूर्त्तयः ।
        कल्पवृक्षः कदंबोऽयं परानंदैकभाजनम् ।३३।
        अनुवाद:-
        भगवान ने प्रसन्न होकर और अपने कमल के समान मुख से प्रसन्न होकर मुझसे कहा: “ग्वालों को वेदों को जानना चाहिए। ग्वालों की युवा पुत्रियों को ऋक्स (भजन) के रूप में जाना जाना चाहिए। हे राजन, वे दिव्य देवियाँ हैं। वे तपस्या से संपन्न हैं और मोक्ष की इच्छा रखते हैं। सभी ग्वाले साधु हैं, वैकुंठमें आनंद स्वरूप हैं।यह कदंब इच्छा-प्राप्ति वाला वृक्ष है, सर्वोच्च आनंद का भंडार है।३२-३३।


        इति श्रीपद्मपुराणे पातालखंडे वृंदावनादिमथुरामाहात्म्यकथनंनाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ।७३।


        ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्डः)/अध्यायः १२८
          ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्डः अध्याय - 128)

        अथाष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
                   "नारायण उवाच
        श्रीकृष्णश्च समाह्वानं गोपांश्चापि चकार सः।
        भाण्डीरे वटमूले च तत्र स्वयमुवास ह ।।१।।

        पुराऽन्नं च ददौ तस्मै यत्रैव ब्राह्मणीगणः।
        उवास राधिका देवी वामपार्श्वे हरेरपि ।।२।।


        दक्षिणे नन्दगोपश्च यशोदासहितस्तथा ।
        तद्दक्षिणो वृषभानस्तद्वामे सा कलावती ।।३।।

        अन्ये गोपाश्च गोप्यश्च बान्धवाः सुहृदस्तथा ।
        तानुवाच स गोविन्दो यथार्थ्यं समयोचितम्।।४।।

                          "श्रीभगवानुवाच
        शृणु नन्द प्रवक्ष्यामि सांप्रतं समयोचितम्।
        सत्यं च परमार्थं च परलोकसुखावहम् ।।५।।

        आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं भ्रमं सर्वं निशामय।
        विद्युद्दीप्तिर्जले रेषा यथा तोयस्य बुद्बुदम्।।६।।

        मथुरायां सर्वमुक्तं नावशेषं च किंचन।
        यशोदां बोधयामास राधिका कदलीवने ।।७।।

        तदेव सत्यं परमं भ्रमध्वान्तप्रदीपकम्।
        विहाय मिथ्यामायां च स्मर तत्परमं पदम्।।८ ।।

        जन्ममृत्युजराव्याधिहरं हर्षकरं परम्।
        शोकसंतापहरणं कर्ममूलनिकृन्तनम् ।।९।।

        मामेव परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम् ।
        ध्यायंध्यायं पुत्रबुद्धिं त्यक्त्वा लभ परंपदम्।।१०।।

        गोलोकं गच्छ शीघ्रं त्वं सार्धं गोकुलवासिभिः।
        आरात्कलेरागमनं कर्ममूलनिकृन्तनम् ।।११।।


        स्त्रीपुंसोर्नियमो नास्ति जातीनां च तथैव च ।
        विप्रेसन्ध्यादिकंनास्ति चिह्नं यज्ञोपवीतकम्।१२ ।

        यज्ञसूत्रं च तिलकं शेषं लुप्तं सुनिश्चितम् ।
        दिवाव्यवायनिरतं विरतं धर्मकर्मणि ।।१३।।

        यज्ञानां च व्रतानां च तपसां लुप्तमेव च।
        केदारकन्याशापेनधर्मो नास्त्येव केवलम्।।१४।।

        स्वच्छन्दगामिनीस्त्रीर्णा पतिश्च सततं वशे ।
        ताडयेत्सततंतं च भर्त्सयेच्छ दिवानिशम्।।१५।।

        प्राधान्यं स्त्रीकुटुम्बानां स्त्रीणां च सततं व्रज।
        स्वामीचभक्तस्तासां च पराभूतो निरन्तरम्।।१६।।

        कलौ च योषितः सर्वा जारसेवासु तत्पराः।
        शतपुत्रसमः स्नेहस्तासां जारे भविष्यति ।।१७।।

        ददाति तस्मै भक्ष्यं च यथा भृत्याय कोपतः।
        सस्मिता सकटाक्षा साऽमृतदृष्ट्या निरन्तरम्।।१८।

        जारं पश्यति कामेन विषदृष्ट्या पतिं सदा।
        सततं गौरवं तासां स्नेहं च जारबान्धवे ।।१९।।

        पत्यौ करप्रहारं च नित्यं नित्यं करोति च।
        मिष्टान्नं श्रद्धया भक्त्या जाराय प्रददाति च।२०।

        वेषयुक्ता च सततं जारसेवनतत्परा।
        प्राणा बन्धुर्गतिश्चाऽऽत्मा कलौ जारश्चयौषिताम्। २१।

        लुप्ता चातिथिसेवा च प्रलुप्तं विष्णुसेवनम्।
        पितृणामर्चनं चैव देवानां च तथैव च ।।२२।।

        विष्णुवैष्णवयोर्द्वेषी सततं च नरो भवेत्।
        वाममन्त्रोपासकाश्च चतुर्वर्णाश्च तत्पराः ।।२३।।

        शालग्रामं च तुलसीं कुशं गङ्गोदकं तथा।
        नस्पृशेन्मानवो धूर्तो म्लेच्छाचाररतः सदा।।२४।।

        कारणं कारणानां च सर्वेषां सर्वबीजकम्।
        सुखदं मोक्षदं शश्वद्दातारं सर्वसम्पदाम् ।।२५।।

        त्यक्त्वा मां परया भक्त्या क्षुद्रसम्पत्प्रदायिनम्।
        वेदनिघ्नं वाममन्त्रं जपेद्विप्रश्च मायया ।।२६।।

        सनातनी विष्णुमाया वञ्चितं तं करिष्यति।
        ममाऽऽज्ञयाभगवती जगतां च दुरत्यया।।२७ ।।

        कलेर्दशसहस्राणि मदर्चा भुवि तिष्ठति ।
        तदर्धानि च वर्षाणि गङ्गा भुवनपावनी ।।२८।।

        तुलसी विष्णुभक्ताश्च यावद्गङ्गा च कीर्तनम् ।
        पुराणानि च स्वल्पानि तावदेव महीतले ।।२९।।

        मम चोत्कीर्तनं नास्ति एतदन्ते कलौ व्रज ।
        एकवर्णा भविष्यन्तिकिराता बलिनःशठाः।।३० ।।

        पित्रोः सेवा गुरोः सेवा सेवा च देवविप्रयोः ।
        विवर्जिता नराः सर्वे चातिथीनां तथैव च।।३१।।

        सस्यहीना भवेत्पृथ्वी साऽनावृष्ट्या निरन्तरम् ।
        फलहीनोऽपि वृक्षश्च जलहीना सरित्तथा।।३२।।

        वेदहीनो ब्राह्मणश्च बलहीनश्च भूपतिः।
        जातिहीनाजनाःसर्वे म्लेच्छोभूपोभविष्यति।।३३।।


        भृत्यवत्ताडयेत्तातं पुत्रः शिष्यस्तथा गुरुम् ।
        कान्तं च ताडयेत्कान्ता लुब्धकुक्कुटवद्गृही।३४।

        नश्यन्ति सकला लोकाः कलौ शेषे च पापिनः।
        सूर्याणामातपात्केचिज्जलौघेनापि केचन ।।३५।।

        हे गोपेन्द्र प्रतिकलौ न नश्यति वसुंधरा ।
        पुनःसृष्टौ भवेत्सत्यं सत्यबीजं निरन्तरम्।।३६।।


        एतस्मिन्नन्तरे विप्र रथमेव मनोहरम् ।
        चतुर्योजनविस्तीर्णमूर्ध्वे च पञ्चयोजनम् ।।३७।।

        शुद्धस्फटिकसंकाशं रत्नेन्द्रसारनिर्मितम्।
        अम्लानपारिजातानां मालाजालविराजितम्।।३८।।

        मणीनां कौस्तुभानां च भूषणेन विभूषितम् ।
        अमूल्यरत्नकलशं हीरहारविलम्बितम् ।।३९।।

        मनोहरैः परिष्वक्तं सहस्रकोटिमन्दिरैः ।
        सहस्रद्वयचक्रं च सहस्रद्वयघोटकम् ।।४०।।

        सूक्ष्मवस्त्राच्छादितं च गोपीकोटीभिरावृतम् ।
        गोलोकादागतं तूर्णं ददृशुः सहसा व्रजे ।।४१।।

        कृष्णाज्ञया तमारुह्य ययुर्गोलोकमुत्तमम् ।
        राधा कलावती देवीधन्या चायोनिसंभवा।।४२।।

        गोलोकाद गता गोप्यश्चायोनिसंभवाश्च ताः ।
        श्रुतिपत्न्यश्च ताः सर्वाः स्वशरीरेण नारद।।४३।।

        सर्वे त्यक्त्वा शरीराणि नश्वराणि सुनिश्चितम् ।
        गोलोकं च ययौ राधा सार्घं गोकुलवासिभिः ।४४।

        ददर्श विरजातीर्र नानारत्नविभूषितम् ।
        तदुत्तीर्य ययौ विप्र शतशृङ्गं च पर्वतम् ।।४५।।

        नानामणिगणाकीर्णं रासमण्डलमण्डितम् ।
        ततो ययौ कियद्दूरं पुण्यं वृन्दावनं वनम्।।४६ ।।

        सा ददर्शाक्षयवटमूर्ध्वे त्रिशतयोजनम् ।
        शतयोजनविस्तीर्णं शाखाकोटिसमावृतम् ।।४७ ।।

        रक्तवर्णैः फलौघैश्च स्थूलैरपि विभूषितम् ।
        गोपीकोटिसहस्रैश्च सार्धं वृन्दा मनोहरा ।।४८ ।।

        अनुव्रजं सादरं च सस्मिता सा समाययौ ।
        अवरुङ्य रथात्तूर्णं राधां सा प्रणनाम च ।।४९ ।।

        रासेश्वरीं तां संभाष्य प्रविवेश स्वमालयम् ।
        रत्नसिंहासने रम्ये हीरहारसमन्विते ।। ५०।।

        वृन्दा तां वासयामास पादसेवनतत्परा ।
        सप्तभिश्च सखीभिश्च सेवितां श्वेतचामरैः ।।५१ ।।

        आययुर्गोपिकाः सर्वा द्रष्टुं तां परमेश्वरीम् ।
        नन्दादिकं प्रकल्प्यैतद्राधा वासं पृथकपृथक्।५२।

        परमानन्दरूपा सा परमानन्दपूर्वकम् ।
        स्ववेश्मनि महारम्ये प्रतस्थे गोपिका सह ।। ५३ ।।
        _________

        इति श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण श्रीकृष्णजन्मखण्ड उत्तरार्द्ध नारदनारायणो संवाद
        भांडीरवने व्रजजनसमक्षं नन्दं बोधयता कृष्णेन कलिदोषाणां निरूपणम्, अकस्मात्प्राप्तेनाद्भुतरथेन राधादिसर्वगोपीनां गोलोके गमनं च
        अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः।।१२८।।
        "हिन्दी अनुवाद:-
        "पत्नियों ने श्रीकृष्ण को अन्न दिया था; उस भाण्डीर वट की छाया में श्रीकृष्ण स्वयं विराजमान हुए और वहीं समस्त गोपों को बुलवा भेजा। श्रीहरि के वामभाग में राधिकादेवी, दक्षिणभाग में यशोदा सहित नन्द, नन्द के दाहिने वृषभानु और वृषभानु के बायें कलावती तथा अन्यान्य गोपगोपी, भाई-बन्धु तथा मित्रों ने आसन ग्रहण किया। तब गोविन्द ने उन सबसे समयोचित यथार्थ वचन कहा।

        श्री भगवान बोले- नन्द! इस समय जो समयोचित, सत्य, परमार्थ और परलोक में सुखदायक है; उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त सभी पदार्थ बिजली की चमक, जल के ऊपर की हुई रेखा और पानी के बुलबुले के समान भ्रमरूप ही हैं- ऐसा जानो। मैंने मथुरा में तुम्हें सब कुछ बतला दिया था, कुछ भी उठा नहीं रखा था।
         उसी प्रकार कदलीवन में राधिका ने यशोदा को समझाया था। वही परम सत्य भ्रमरूपी अंधकार का विनाश करने के लिए दीपक है; इसलिए तुम मिथ्या माया को छोड़कर उसी परम पद का स्मरण करो। 
        वह पद जन्म-मृत्यु-जरा व्याध का विनाशक, महान हर्षदायक, शोक संताप का निवारक और कर्ममूल का उच्छेदक है।
         मुझ परम ब्रह्म सनातन भगवान का बारंबार ध्यान करके तुम उस परम पद को प्राप्त करो। अब कर्म की जड़ काट देने वाले कलियुग का आगमन संनिकट है; अतः तुम शीघ्र ही गोकुलवासियों के साथ गोलोक को चले जाओ. तदनन्तर भगवान ने कलियुग के धर्म तथा लक्षणों का वर्णन किया।
        विप्रवर! इसी बीच वहाँ व्रज में लोगों ने सहसा गोलोक से आये हुए एक मनोहर रथ को देखा। वह रथ चार योजन विस्तृत और पाँच योजन ऊँचा था; बहुमूल्य रत्नों के सारभाग से उसका निर्माण हुआ था। 
        वह शुद्ध स्फटिक के समान उद्भासित हो रहा था; विकसित पारिजात पुष्पों की मालाओं से उसकी विशेष शोभा हो रही थी; वह कौस्तुभमणियों के आभूषणों से विभूषित था; उसके ऊपर अमूल्य रत्नकलश चमक रहा था; उसमें हीरे हार लटक रहे थे; वह सहस्रों करोड़ मनोहर मंदरियों से व्याप्त था; उसमें दो हजार पहिये लगे थे और दो हजार घोड़े उसका भार वहन कर रहे थे तथा उस पर सूक्ष्म वस्त्र का आवरण पड़ा हुआ था एवं वह करोड़ों गोपियों से समावृत था।
         नारदराधा और धन्यवाद की पात्र कलावती देवी का जन्म किसी के गर्भ से नहीं हुआ था। यहाँ तक कि गोलोक से जितनी गोपियाँ आयी थीं; वे सभी आयोनिजा थीं। 
        उसके रूप में श्रुतिपत्नियाँ ही अपने शरीर से प्रकट हुई थीं। वे सभी श्रीकृष्ण की आज्ञा से अपने नश्वर शरीर का त्याग करके उस रथ पर सवार हो उत्तम गोलोक को चली गयीं।
        साथ ही राधा भी गोकुलवासियों के साथ गोलोक को प्रस्थित हुईं।
        ब्रह्मन! मार्ग में उन्हें विरजा नदी का मनोहर तट दीख पड़ा, जो नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित था।
        उसे पार करके वे शतश्रृंग पर्वत पर गयीं। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकार के मणिसमूहों से व्याप्त सुसज्जित रासमण्डल को देखा।
        उससे कुछ दूर आगे जाने पर पुण्यमय वृन्दावन मिला। 
        आगे बढ़ने पर अक्षयवट दिखायी दिया, उसकी करोड़ों शाखाएँ चारों ओर फैली हुई थीं। 
        वह सौ योजन विस्तारवाला और तीन सौ योजन ऊँचा था और लाल रंग के बड़े-बड़े फलसमूह उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।
        उसके नीचे मनोहर वृन्दा हजारों करोड़ों गोपियों के साथ विराजमान थीं। 
        उसे देखकर राधा तुरंत ही रथ से उतरकर आदर सहित मुस्कराती हुई उसके निकट गयीं। वृन्दा ने राधा को नमस्कार किया।
         तत्पश्चात रासेश्वरी राधा से वार्तालाप करके वह उन्हें अपने महल के भीतर लिवा ले गयी। वहाँ वृन्दा ने राधा को हीरे के हारों से समन्वित एक रमणीय रत्नसिंहासन पर बैठाया और स्वयं उनकी चरण सेवा में जुट गयी।
        सात सखियाँ श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं। इतने में परमेश्वरी राधा को देखने के लिए सभी गोपियाँ वहाँ आ पहुँचीं। तब राधाने नन्द आदि के लिए पृथक-पृथक आवासस्थान की व्यवस्था की। 
        तदनन्तर परमान्दरूपा गोपिका राधा परमानन्द
        पूर्वक सबके साथ अपने परम रुचिर भवन को प्रस्थित हुईं।
        ब्रह्मवैवर्तपुराणम्/खण्डः ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्डः अध्याय - 128)
         योगेश कुमार "रोहि" द्वारा संपादित किया गया

         

             ब्रह्मवैवर्तपुराण /खण्डः 4 (श्रीकृष्णजन्मखण्डः अध्याय 129 श्री कृष्ण के गोलोक गमन तथा उनकी १२५ वर्ष की आयु का विवरण-)
        अथैकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः   
                    "नारायण उवाच
        श्रीकृष्णो भगवांस्तत्र परिपूर्णतमः प्रभुः ।दृष्ट्वा सालोक्यमोक्षं च सद्यो गोकुलवासिनाम् ।१।                                       "महादेव उवास
         पञ्चभिर्गोपैर्भाण्डीरे वटमूलके ।        ददर्श गोकुलं सर्व गोकुलं व्याकुलं तथा । २ ।
        अरक्षकं च व्यस्तं च शून्यं वृन्दावनं वनम् ।योगेनामृतवृष्ट्या च कृपया च कृपानिधिः ।३ ।
        गोपीभिश्च तथा गोपैः परिपूर्णं चकार सः ।तथा वृन्दावनं चैव सुरम्यं च मनोहरम् ।४।
        गोकुलस्थाश्च गोपाश्च समाश्वासं चकार सः उवाच मधुरं वाक्यं हितं नीतं च दुर्लभम् । ५।
        श्री भगवानुवाच हे गोपगण हे बन्धो सुखं तिष्ठ स्थिरो भव । रमणं प्रियया सार्धं सुरम्यं रासमण्डलम् ।६।
        तावत्प्रभृति कृष्णस्य पुण्ये वृन्दावने वने ।अधिष्ठानं च सततं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।७।

        तथा जगाम भाण्डीरं विधाता जगतामपि ।स्वयं शेषश्च धर्मश्च भवान्या च भवःस्वयम् । ८ ।
        सूर्यश्चापि महेन्द्रश्च चन्द्रश्चापि हुताशनः ।कुबेरो वरुणश्चैव पवनश्च यमस्तथा ।। ९ ।।
        ईशानश्चापि देवाश्च वसवोऽष्टौ तथैव च ।सर्वे ग्रहाश्च रुद्राश्च मुनयो मनवस्तथा ।। १० ।।
        त्वरिताश्चाऽऽययुः सर्वे यत्राऽऽस्ते भगवान्प्रभुः । प्रणम्य दण्डवद्भूभौ तमुवाच विधिः स्वयम् ।। ११ 
        ब्रह्मवाच परिपूर्णतम् ब्रह्मस्वरूप नित्यविग्रह । ज्योतिःस्वरूप परम नमोऽस्तु प्रकृतेः पर ।१२।
        सुनिर्लिप्त निराकार साकार ध्यानहेतुना ।स्वेच्छामय परं धाम परमात्मन्नमोऽस्तु ते। १३।
        सर्वकार्यस्वरूपेश कारणानां च कारण ।ब्रह्मेशशेषदेवेश सर्वेश ते नामामि ।१४।
        सरस्वतीश पद्मेश पार्वतीश परात्पर । हे सावित्रीश राधेश रासेश्वर ते नमामि ।१५।
        सर्वेषामादिभूतर्स्त्वं सर्वः सर्वेश्वरस्तथा ।सर्वपाता च संहर्ता सृष्टिरूप नमामि । १६।
        त्वत्पादपद्मरजसा धन्या पूता वसुन्धरा ।शून्यरूपा त्वयि गते हे नाथ परमं पदम् ।। १७।  
        "यत्पञ्चविंशत्यधिकं वर्षाणां शतकं गतम् ।
        त्यक्त्वेमां स्वपदं यासि रुदतीं विरहातुराम् ।। १८ ।।

                   "महादेव उवाच
        ब्रह्मणा प्रार्थितस्त्वं च समागत्य वसुन्धराम् भूभारहरणं कृत्वा प्रयासि स्वपदं विभो। १९।
        त्रैलोक्ये पृथिवी धन्या सद्यः पूता पदाङ्किता। वयं च मुनयो धन्याः साक्षाद्दृष्ट्वा पदाम्बुजम् । २०।
        ध्यानासाध्यो दुराराध्यो मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् अस्माकमपि यश्चेशः सोऽधुना चाक्षुषो भुवि ।२१।
        वासुः सर्वनिवासश्च विश्वनि यस्य लोमसु ।देवस्तस्य महाविष्णुर्वासुदेवो महीतले ।। २२ ।
        सुचिरं तपसा लब्धं सिद्धेन्द्राणां सुदुर्लभम् यत्पादपद्ममतुलं चाक्षुषं सर्वजीविनाम् । २३।                                                            "अनन्त उवाच
        त्वमनन्तो हि भगवन्नाहमेव कलांशकः ।विश्वैकस्थे क्षुद्रकूर्मे मशकोऽहं गजे यथा ।२४।
        असंख्यशेषाः कूर्माश्च ब्रह्मविषणुशिवात्मकाः । असंख्यानि च विश्वानि तेषामीशः स्वयं भवान् ।। २५ ।।
        अस्माकमीदृशं नाथ सुदिनं क्व भविष्यति स्वप्नादृष्टश्चयश्चेशः स दृष्टः सर्वजीविनाम् । २६ ।
        नाथ प्रयासि गोलोकं पूतां कृत्वा वसुन्धराम् तामनाथां रुदन्तीं च निमग्नां शोकसागरे । २७ ।                                            "देवा ऊचु: 
        वेदाःस्तोतुं न शक्ता यं ब्रह्मेशानादयस्तथा ।तमेव स्तवनं किं वा वयं कुर्मो नमोऽस्तु ते ।२८।
        इत्येवमुक्त्वा देवास्ते प्रययुर्द्वारकां पुरीम् ।तत्रस्थं भगवन्तं च द्रष्टुं शीघ्रं मुदाऽन्विताः।२९।
        अथ तेषां च गोपाला ययुर्गोलोकमुत्तमम् ।पृथिवी कम्पिता भीता चलन्तः सप्तसागराः ।। ३० ।।
        हतश्रियं द्वारकां च त्यक्त्वा च ब्रह्मशापतः मूर्तिं कदम्बमूलस्थां विवेश राधिकेश्वरः ।। ३१।
        ते सर्वे चैरकायुद्धे निपेतुर्यादवास्तथा ।चितामारुह्य देव्यश्च प्रययुः स्वामिभिः सह ।३२ ।
        अर्जुनः स्वपुरं गत्वा समुवाच युधिष्ठिरम् ।स राजा भ्रातृभिः सार्धं ययौ स्वर्गं च भार्यया ।। ३३ ।।
        दृष्ट्वा कदम्बमूलस्थं तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।देवा ब्रह्मादयस्ते च प्रणेमुर्भक्तिपूर्वकम् ।। ३४।
        तुष्टुवुः परमात्मानं देवं नारायणं प्रभुम् ।श्यामं किशोरवयसं
        व्याधास्त्रसंयुतं पादपद्मं पद्मादिवन्दितम् ।दृष्ट्वा ब्रह्मादिदेवांस्तानभयं सस्मितं ददौ । ३७।
        पृथिवीं तां समाश्वास्य रुदन्ती प्रेमविह्वलाम् व्याधं प्रस्थापयामास परं स्वपदमुत्तमम् । ३८ ।
        बलस्य तेजः शेषे च विवेश परमाद्भुतम् ।प्रद्युम्नस्य च कामे वै वाऽनिरुद्धस्य ब्रह्मणि ।३९।
        अयोनिसंभवा देवी महालक्ष्मीश्च रुक्मिणी वैकुण्ठं प्रययौ साक्षात्स्वशरीरेण नारद । ४०।
        सत्यभामा पृथिव्यां च विवेश कमलालया।स्वयं जाम्बवती देवी पार्वत्यां विश्वमातरि।४१।
        या या देव्यश्च यासां चाप्यंशरुपाश्च भूतले ।तस्यां तस्यां प्रविविशुस्ता एव च पृथक्पृथक् । ४२।
        साम्बस्य तेजः स्कन्दे च विवेश परमाद्भुतम् कश्यपे वसुदेवश्चाप्यदिव्यां देवकी तथा । ४३ ।
        रुक्मिणीमन्दिरं त्यकत्वा समस्तां द्वारकां पुरीम् । स जग्राह समुद्रश्च प्रफुल्लवदनेक्षणः ।४४ ।।
        लवणोदः समागत्य तुष्टाव पुरुषोत्तमम् ।रुरोद तद्वियोगेन साश्रुनेत्रश्च विह्वलः । ४५।
        गङ्गा सरस्वती पद्मावती च यमुना तथा ।गोदावरी स्वर्णरेखा कावेरी नर्मदा मुने । ४६ ।
        शरावती बाहृदा च कृतमाला च पुण्यदा ।समाययुश्च ताः सर्वाः प्रणेमुः परमेश्वरम् । ४७ ।
        उवाच जाह्नवी देवी रुदती परमेश्वरम् ।साश्रुनेत्राऽतिदीना सा विरहज्वरकातरा ।। ४८ ।।
                "भागीरथयुवाच
         हे नाथ रमणश्रेष्ठ यासि गोलोकमुत्तमम् । अस्माकं का गतिश्चात्र भविष्यति कलौ युगे ।। ४९ ।।
        श्रीभगवानुवाच कलेः पञ्चसहस्राणि वर्षाणि तिष्ठ भूतले । पापानि पापिनो यानि तुभ्यं दास्यन्ति स्नात: ।। ५० ।।

        मन्मन्त्रोपासकस्पर्शाद्भस्मीभूतानि तत्क्षणात् ।भविष्यन्ति दर्शनाच्च स्नानादेव हि जाह्नवि ।। ५१ ।।
        हरेर्नामानि यत्रैव पुराणानि भवन्ति हि । तत्र गत्वा सावधानमाभिः सार्धं च श्रोष्यसि ।।५२।।
        पुराणश्रवणाच्चैव हरेर्नामानुकीर्तनात् ।भस्मीभूतानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ।। ५३ ।।
        भस्मीभूतानि तान्येव वैष्णवालिङ्गनेन च ।तृणानि शुष्ककाष्ठानि दहन्ति पावका यथा ।। ५४ ।।
        तथाऽपि वैष्णवा लोके पापानि पापिनामपि । पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यपि च जाह्नवि ।। ५५ ।।
        मद्भक्तानां शरीरेषु सन्ति पूतेषु संततम् ।मद्भक्तपादरजसा सद्यः पूता वसुंधरा ।। ५६ ।।
        सद्यः पूतानि तीर्थानि सद्याः पूतं जगत्तथा ।मन्मन्त्रोपासका विप्रा ये मदुच्छिष्टभोजिनः ।। ५७ ।।
        मामेव नित्यं ध्यायन्ते ते मत्प्राणाधिकाः प्रियाः । तदुपस्पर्शमात्रेण पूतो वायुश्च पावकः ।। ५८ ।।


        कलेर्दशसहस्राणि मद्भक्ताः सन्ति भूतले ।एकवर्णा भविष्यन्ति मद्भक्तेषु गतेषु च। ५९।
        मद्भक्तशून्या पृथिवी कलिग्रस्ता भविष्यति एतस्मिन्नन्तरे तत्र कृष्णदेहाद्विनिर्गतः ।। ६० ।।
        चतुर्भुजश्च पुरुषः शतचन्द्रसमप्रभः ।शङ्खचक्रगदापद्मधरः श्रीवत्सलाञ्छनः । ६१ ।
        सुन्दरं रथमारुह्य श्रीरोदं स जगाम ह ।सिन्धुकन्या च प्रययौ स्वयं मूर्तिमती सती। ६२।
        श्रीकृष्णमनसा जाता मर्त्यलक्ष्मीर्मनोहरा । श्वेतद्वीपं गते विष्णौ जगत्पालनकर्तरि ।६३ ।
        शुद्धसत्त्वस्वरूपे च द्विधारूपो बभूव सः । दक्षिणांशश्च द्विभुजो गोपबालकरूपकः ।। ६४ ।।
        नपीनजलदश्यामः शोभितः पीतवाससा ।श्रीवंशवदनः श्रीमान्सस्मितः पद्मलोचनः ।। ६५ ।।
        शतकोटीन्दुसौन्दर्यं शतकोटिस्मरप्रभाम् ।दधानः परमानन्दः परिबूर्णतमः प्रभुः ।। ६६ ।।
        परं धाम परं ब्रह्मस्वरूपो निर्गुणः स्वयम् ।परमात्मा च सर्वेषां भक्तानुग्रहविग्रहः ।। ६७ ।।
        नित्यदेहश्च भगवानीश्वरः प्रकृतेः परः ।योगिनो यं वदन्त्येवं ज्योतीरूपं सनातनम् ।। ६८ ।।
        ज्योतिरम्यन्तरे नित्यरूपं भक्ता विदन्ति यम् । वेदा वदन्ति सत्यं यं नित्यमाद्यं विचक्षणाः ।। ६९ ।।
        यं वदन्ति सुराः सर्वे परं स्वेच्छामयं प्रभूम् ।सिद्धेन्द्रा मुनयः सर्वे सर्वरूपं वदन्ति यम् ।। ७० ।।
        यमनिर्वचनीयं च योगीन्द्रः शंकरो वदेत् ।स्वयं विधाता प्रवदेत्कारणानां च कारणम् ।। ७१ ।।
        शेषो वदेदनन्तं यं नवधारूपमीश्वरम् ।तर्काणामेव षण्णां च षड्विधं रूपमीप्सितम् ।। ७२ ।।
        वैष्णवानामेकरूपं वेदानामेकमेव च ।पुराणानामेकरूपं तस्मान्नवविधं स्मृतम् ।। ७३ ।।
        न्यायोऽनिर्वचनीयं च यं मतं शंकरो वदेत् ।नित्यं वैशेषिकाश्चाऽऽद्यं तं वदन्ति विचक्षणाः ।। ७४ ।।
        सांख्य वदन्ति तं देवं ज्योतीरूपं सनातनम् मीमांसा सर्वरूपं च वेदान्तः सर्वकारणम् ।। ७५ ।।
        पातञ्जलोऽप्यनन्तं च वेदाः सत्यस्वरूपकम् । स्वेच्छामयं पुराणं च भक्ताश्च नित्यविग्रहम् ।। ७६ ।।
        सोऽयं गोलोकनाथश्च राधेशो नन्दनन्दनः ।गोकुले गोपवेषश्च पुण्ये वृन्दावने वने ।। ७७ ।।
        चतुर्भुजश्च वैकुण्ठे महालक्ष्मीपतिः स्वयम् नारायणश्च भगवान्यन्नाम मुक्तिकारणम् ।। ७८ ।।सकृन्नारायणेत्युक्त्वा पुमान्कल्पशतत्रयम् ।गङ्गादिसर्वतीर्थेषु स्नातो भवति नारद ।। ७९ ।।
        सुनन्दनन्दकुमुदैः पार्षदैः परिवारितः ।शङ्खचक्रगदापद्मधरः श्रीवत्सलाञ्छनः ।। ८० ।।
        कौस्तुभेन मणीन्द्रेण भूषितो वनमालया ।देवैः स्तुतश्च यानेन वैकुण्ठं स्वपदं ययौ ।। ८१ ।।
        गते वैकुण्ठनाथे च राधेशश्च स्वयं प्रभुः ।चकार वंशीशब्दं च त्रैलोक्यमोहनं परम् ।। ८२ ।।
        मूर्च्छांप्रापुर्देवगणा मुनयश्चापि नारद ।अचेतना बभूवुश्च मायया पार्वतीं विना ।। ८३ ।।
        उवाच पार्वती देवी भगवन्तं सनातनम् ।विष्णुमाया भगवती सर्वरूपा सनातनी ।। ८४ ।।
        परब्रह्मस्वरूपा या परमात्मस्वरूपिणी ।सगुणा निर्गुणा सा च परा स्वेच्छामयी सती।८५।
           "पार्वत्युवाच
        एकाऽहं राधिकारूपा गोलोके रासमण्डले रासशून्यं च गोलोकं परिपूर्ण कुरु प्रभो ।। ८६ ।।
        गच्छ त्वं रथमारुह्य मुक्तामाणिक्यभूषितम् परिबूर्णतमाऽहं च तव वङः स्थलस्थिता ।। ८७ ।।
        तवाऽऽज्ञया महालक्ष्मीरहं वैकुण्ठगामिनी ।सरस्वती च तत्रैव वामे पार्श्वे हरेरपि । ८८।
        तवाहं मनसा जाता सिन्धुकन्या तवाऽऽज्ञया । सावित्री वेदमाताऽहं कलया विधिसंनिधौ ।। ८९ ।।
        तैजःसु सर्वदेवानां पुरा सत्ये तवाऽऽज्ञया ।अधिष्ठानं कृत तत्र धृतं देव्या शरीरकम् ।। ९० ।।
        शुम्भादयश्च दैत्याश्च निहताश्चावलीलया ।दुर्ग निहत्य तुर्गाऽहं त्रिपुरा त्रिपुरे वधे ।। ९१ ।।
        निहत्य रक्तबीजं च रक्तबीजविनाशिनी ।तवाऽऽज्ञया दक्षकन्या सती सत्यस्वरूपिणी ।। ९२ ।।
        योगेन त्यक्त्वा देहं च शैलजाऽहं तवाऽऽज्ञया । त्वया दत्तवा (त्ताः शंकराय गोलोके रासमण्डले ।। ९३ ।।
        विष्णुभक्तिरहं तेन विष्णुमाया च वैष्णवी ।नारायणस्य मायाऽहं तेन नारायणी स्मृता । ९४।

        कृष्णप्राणाधिकाऽहं च प्राणाधिष्ठातृदेवता महाविष्णोश्च वासोश्च जननी राधिका स्वयम् ।। ९५ ।।
        तवाऽऽज्ञया पञ्चधाऽहं पञ्चप्रकृतिरूपिणी । कलाकलांशयाऽहं च देवपत्नयो गृहे गृहे ।। ९६ ।।
        शीघ्रं गच्छ महाभाग तत्राऽहं विरहातुरा ।गोपीभिः सहिता रासं भ्रमन्ती परितः सदा ।। ९७ ।।
        पार्वतीवचनं श्रुत्वा प्रहस्य रसिकेश्वरः ।
        रत्नयानं 
        समारुह्य ययौ गोलोकमुत्तमम् ।। ९८ ।।
        पार्वती बोधयामास स्वयं देवगणं तथा ।मायावंशीरवाच्छन्नं विष्णुमाया सनातनी ।। ९९ ।।
        कृत्वा ते हरिशब्दं च स्वगृहं विस्मयं ययुः ।शिवेन सार्धं दुर्गा सा प्रहृष्टा स्वपुरं ययौ ।। १०० ।।
        अथ कृष्णं समायान्तं राधा गोपीगणैः सह अनुव्रजं ययौ हृष्टा सर्वज्ञा प्राणवल्लभम् ।। १०१ ।।
        दृष्ट्वा समीपमायान्तमवरुह्य रथात्सती ।प्रणनाम जगन्नाथं सिरसा सखिभिः सह ।। १०२ ।।
        गोपा गोप्यश्च मुदिताः प्रफुल्लवदनेक्षणाः ।दुन्दुभिं वादयामासुरीश्वरागमनोत्सुकाः ।। १०३ ।।
        विरजां च समुत्तीर्य दृष्ट्वा राधां जगत्पतिः अवरुह्य रथात्तूर्णं गृहीत्वा राधिकाकरम् ।। १०४ ।।
        शतशृङ्गं च बभ्राम सुरम्यं रासमण्डलम् ।दृष्ट्वाऽक्षयवटं पुण्यं पुण्यं वृन्दावनं ययौ ।। १०५ ।।
        तुलसीकाननं दृष्ट्वा प्रययौ मालतीवनम् ।वामे कृत्वा कुन्दवनं माधवीकाननं तथा ।। १०६ ।।
        चकार दक्षिणे कृष्णश्चम्पकारण्यमीप्सिनम् चकार पश्चात्तूर्णं च चारुचन्दनकाननम् ।। १०७ ।।
        ददर्श पुरतो रम्यं राधिकाभवनं परम् ।उवास राधया सार्धं रत्नसिंहासने वरे ।। १०८ ।।
        सकर्पूरं च ताम्बूलं बुभुजे वासितं जलम् ।सुष्वाप पुष्पतल्पे च सुगन्धिचन्दनार्चिते ।। १०९ ।।
        स रेमे रामया सार्धं निमग्नो रससागरे ।इत्येवं कथितं सर्वं धर्मवक्त्राच्च यच्छ्रुतम् ।। ११० ।।
        गोलोकारोहणं रम्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। १११ ।।      
        ब्रह्म वैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड (उत्तरार्द्ध): अध्याय 128 
        श्रीकृष्ण जन्म खण्ड (उत्तरार्द्ध): अध्याय 128

        तब श्रीकृष्ण ने उन ब्रह्मा आदि देवों की ओर मुस्कराते हुए देखकर उन्हें अभयदान दिया। पृथ्वी प्रेमविह्वल हो रही थी; उसे पर्णरूप से आश्वासन दिया और व्याध को अपने उत्तम परम पद को भेज दिया। तत्पश्चात बलदेव जी परम अद्भुत तेज शेषनाग में, प्रद्युम्न का कामदेव में और अनिरुद्ध का ब्रह्मा में प्रविष्ट हो गया। नारद! देवी रुक्मिणी, जो अयोनिजा तथा साक्षात महालक्ष्मी थीं; अपने उसी शरीर से वैकुण्ठ को चली गयीं। कमलालया सत्यभामा पृथ्वी में तथा स्वयं जाम्बवती देवी जगज्जननी पार्वती में प्रवेश कर गयीं। इस प्रकार भूतल पर जो-जो देवियाँ जिन जिनके अंश से प्रकट हुई थीं; वे सभी पृथक-पृथक अपने अंशी में विलीन हो गयीं। साम्ब का अत्यंत निराला तेज स्कन्द में, वसुदेव कश्यप में और देवकी अदिति में समा गयीं। विकसित मुख और नेत्रों वाले समुद्र ने रुक्मिणी के महल को छोड़कर शेष सारी द्वारकापुरी को अपने अंदर समेट लिया। इसके बाद क्षीरसागर ने आकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का स्तवन किया। उस समय उनके वियोग का कारण उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये और वह व्याकुल होकर रोने लगा। मुने! तत्पश्चात गंगा, सरस्वती, पद्मावती, यमुना, गोदावरी, स्वर्णरेखा, कावेरी, नर्मदा, शरावती, बाहुदा और पुण्यदायिनी कृतमाला ये सभी सरिताएँ भी वहाँ आ पहुँचीं और सभी ने परमेश्वर श्रीकृष्ण को नमस्कार किया। उनमें जह्नुतनया गंगा देवी विरह-वेदना से कातर तथा अत्यंत दीन हो रही थी। उनके नेत्रों में आँसू उमड़ आये थे। वे रोती हुई परमेश्वर श्रीकृष्ण से बोलीं।

        भागीरथी ने कहा- नाथ! रमणश्रेष्ठ! आप तो उत्तम गोलोक को पधार रहे हैं; किंतु इस कलियुग में हमलोगों की क्या गति होगी?

        तब श्री भगवान बोले- जाह्नवि! पापीलोग तुम्हारे जल में स्नान करने से तुम्हें जिन पापों को देंगे; वे सभी मेरे मंत्र की उपासना करने वाले वैष्णव के स्पर्श, दर्शन और स्नान से तत्काल ही भस्म हो जाएंगे। जहाँ हरि नाम संकीर्तन और पुराणों की कथा होगी; वहाँ इन सरिताओं के साथ जाकर सावधानतया श्रवण करोगी। उस पुराण-श्रवण तथा हरि नाम संकीर्तन से ब्रह्महत्या आदि महापातक जलकर राख हो जाते हैं। वे ही पाप वैष्णव के आलिंगन से भी दग्ध हो जाते हैं। जैसे अग्नि सूखी लकड़ी और घास फूस को जला डालती है; उसी प्रकार जगत में वैष्णव लोग पापियों के पापों को भी नष्ट कर देते हैं। गंगे! भूतल पर जितने पुण्यमय तीर्थ हैं; वे सभी मेरे भक्तों के पावन शरीरों में सदा निवास करते हैं। मेरे भक्तों की चरण रज से वसुन्धरा तत्काल पावन हो जाती है, तीर्थ पवित्र हो जाते हैं तथा जगत शुद्ध हो जाता है। जो ब्राह्मण मेरे मंत्र के उपासक हैं, मुझे अर्पित करने के बाद मेरा प्रसाद भोजन करते हैं और नित्य मेरी ही ध्यान में तल्लीन रहते हैं; वे मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। उनके स्पर्शमात्र से वायु और अग्नि पवित्र हो जाते हैं। 

        *****

        मेरे भक्तों के चले जाने पर सभी वर्ण एक हो जाएंगे और मेरे भक्तों से शून्य हुई पृथ्वी पर कलियुग का पूरा साम्राज्य हो जायेगा। इसी अवसर पर वहाँ श्रीकृष्ण के शरीर से एक चार-भुजाधारी पुरुष प्रकट हुआ। उसकी प्रभा सैकड़ों चंद्रमाओं को लज्जित कर रही थी। वह श्रीवत्स-चिह्न से विभूषित था और उसके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पा रहे थे।



        ब्रह्म वैवर्त पुराण
        श्रीकृष्ण जन्म खण्ड (उत्तरार्द्ध): अध्याय 128
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        वह एक सुंदर रथ पर सवार होकर क्षीरसागर को चला गया। तब स्वयं मूर्तिमती सिन्धुकन्या भी उनके पीछे चली गयीं। जगत के पालनकर्ता विष्णु के श्वेतद्वीप चले जाने पर श्रीकृष्ण के मन से उत्पन्न हुई मनोहरा मर्त्यलक्ष्मी ने भी उनका अनुगमन किया। इस प्रकार उस शुद्ध सत्त्वस्वरूप के दो रूप हो गये। उनमें दक्षिणांग हो भुजाधारी गोप-बालक के रूप में प्रकट हुआ। वह नूतन जलधर के समान श्याम और पीताम्बर से शोभित था; उसके मुख से सुंदर वंशी लगी हुई थी; नेत्र कमल के समान विशाल थे; वह शोभासंपन्न तथा मन्द मुस्कान से युक्त था। वह सौ करोड़ चंद्रमाओं के समान सौंदर्यशाली, सौ करोड़ कामदेवों की सी प्रभावाला, परमानन्द स्वरूप, परिपूर्णतम, प्रभु, परमधाम, परब्रह्मस्वरूप, निर्गुण, सबका परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, अविनाशी शरीरवाला, प्रकृति से पर और ऐश्वर्यशाली ईश्वर था। योगीलोग जिसे सनातन ज्योतिरूप जानते हैं और उस ज्योति के भीतर जिसके नित्य रूप को भक्ति के सहारे समझ पाते हैं। विचक्षण वेद जिसे सत्य, नित्य और आद्य बतलाते हैं, सभी देवता जिसे स्वेच्छामय परम प्रभु कहते हैं, सारे सिद्धशिरोमणि तथा मुनिवर जिसे सर्वरूप कहकर पुकारते हैं, योगिराज शंकर जिसका नाम अनिर्वचनीय रखते हैं, स्वयं ब्रह्मा जिसे कारण के कारण रूप से प्रख्यात करते हैं और शेषनाग जिस नौ प्रकार के रूप धारण करने वाले ईश्वर को अनन्त कहते हैं; छः प्रकार के धर्म ही उनके छः रूप हैं, फिर एक रूप वैष्णवों का, रूप वेदों और एक रूप पुराणों का है; इसीलिए वे नौ प्रकार के कहे जाते हैं। जो मत शंकर का है, उसी मत का आश्रय ले न्यायशास्त्र जिसे अनिर्वचनीय रूप से निरूपण करता है, दीर्घदर्शी वैशेषिक जिसे नित्य बतलाते हैं; सांख्य उन देव को सनातन ज्योतिरूप, मेरा अंशभूत वेदान्त सर्वरूप और सर्वकारण, पतञ्जलिमतानुयायी अनन्त, वेदगण सत्यस्वरूप, पुराण स्वेच्छामय और भक्तगण नित्यविग्रह कहते हैं; वे ही ये गोलोकनाथ श्रीकृष्ण गोकुल में वृन्दावन नामक पुण्यवन में गोपवेष धारण करके नन्द के पुत्ररूप से अवतीर्ण हुए हैं। ये राधा के प्राणपति हैं। ये ही वैकुण्ठ में चार-भुजाधारी महालक्ष्मीपति स्वयं भगवान नारायण हैं; जिनका नाम मुक्ति प्राप्ति का कारण है।

        नारद! जो मनुष्य एक बार भी ‘नारायण’ नाम का उच्चारण कर लेता है; वह तीन सौ कल्पों तक गंगा आदि सभी तीर्थों में स्नान करने का फल पा लेता है।


         तदनन्तर जो शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं; जिनके वक्षःस्थल में श्रीवत्स का चिह्न शोभा देता है; मणिश्रेष्ठ कौस्तुभ और वनमाला से जो सुशोभित होते हैं; वेद जिनकी स्तुति करते हैं; वे भगवान नारायण सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षदों के साथ विमान द्वारा अपने स्थान वैकुण्ठ को चले गये। 

        ____
        ****

        उन वैकुण्नाथ के चले जाने पर राधा के स्वामी स्वयं श्रीकृष्ण ने अपनी वंशी बजायी, जिसका सुरीला शब्द त्रिलोकी को मोह में डालने वाला था। नारद! उस शब्द को सुनते ही पार्वती के अतिरिक्त सभी देवतागण और मुनिगण मूर्च्छित हो गये और उनकी चेतना लुप्त हो गयी।
        ******** 

         तब जो भगवती विष्णुमाया, सर्वरूपा, सनातनी, परब्रह्मस्वरूपा, परमात्मस्वरूपिणी सगुणा, निर्गुणा, परा और स्वेच्छामयी हैं; वे सती साध्वी देवी पार्वती सनातन भगवन श्रीकृष्ण से बोलीं।
        _____



        पार्वती ने क
        हा- प्रभो! गोलोक स्थित रासमण्डल में मैं ही अपने एक राधिकारूप से रहती हूँ।

         इस समय गोलोक रासशून्य हो गया है; अतः आप मुक्ता और माणिक्य से विभूषित रथ पर आरूढ़ हो वहाँ जाइये 
        ********

        और उसे परिपूर्ण कीजिए। आपके वक्षःस्थल पर वास करने वाली परिपूर्णतमा देवी मैं ही हूँ. 

        आपकी आज्ञा से वैकुण्ठ में वास करने वाली महालक्ष्मी मैं ही हूँ। 

        वहीं श्रीहरि के वामभाग में स्थित रहने वाली सरस्वती भी मैं ही हूँ।
        *
         मैं आपकी आज्ञा से आपके मन से उत्पन्न हुई सिन्धुकन्या हूँ।
        **

         ब्रह्मा के संनिकट रहने वाली अपनी कला से प्रकट हुई वेदमाता सावित्री मेरा ही नाम है।
        *
         पहले सत्ययुग में आपकी आज्ञा से मैंने समस्त देवताओं के तेजों से अपना वासस्थान बनाया और उससे प्रकट होकर देवी का शरीर धारण किया। उसी शरीर से मेरे द्वारा लीलापूर्वक शुम्भ आदि दैत्य मारे गये। 

        मैं ही दुर्गासुर का वध करके ‘दुर्गा’, त्रिपुर का संहार करने पर ‘त्रिपुरा’ और रक्तबीज को मारकर ‘रक्तबीज विनाशिनी’ कहलाती हूँ।

         आपकी आज्ञा से मैं सत्यस्वरूपिणी दक्षकन्या ‘सती’ हुई।

         वहाँ योगधारण द्वारा शरीर का त्याग करके आपके ही आदेश से पुनः गिरिराजनन्दिनी ‘पार्वती’ हुई; जिसे आपने गोलोक स्थित रासमण्डल में शंकर को दे दिया था।

         मैं सदा विष्णुभक्ति में रत रहती हूँ; इसी कारण मुझे वैष्णवी और विष्णुमाया कहा जाता है।

        नारायण की माया होने के कारण मुझे लोग नारायणी कहते हैं।
        _____
         मैं श्रीकृष्ण की प्राणप्रिया, उनके प्राणों की अधिष्ठात्री देवी और वासु स्वरूप महाविष्णु की जननी स्वयं राधिका हूँ।

        आपके आदेश से मैंने अपने को पाँच रूपों में विभक्त कर दिया; जिससे पाँचों प्रकृति मेरा ही रूप हैं। 
        _______
        मैं ही घर–घर में कला और कलांश से प्रकट हुई वेद पत्नियों के रूप में वर्तमान हूँ। महाभाग! वहाँ गोलोक में मैं विरह से आतुर हो गोपियों के साथ सदा अपने आवास स्थान में चारों ओर चक्कर काटती रहती हूँ; अतः आप शीघ्र ही वहाँ पधारिये। 
        _____
        नारद! पार्वती के वचन सुनकर रसिकेश्वर श्रीकृष्ण हँसे और रत्ननिर्मित विमान पर सवार हो उत्तम गोलोक को चले गये।

         तब सनातनी विष्णुमाया स्वयं पार्वती ने मायारूपिणी वंशी के नाद से आच्छन्न हुए देवगण को जगाया। 

        वे सभी हरिनामोच्चारण करके विस्मयाविष्ट हो अपने-अपने स्थान के चले गये। 

        श्रीदुर्गा भी हर्षमग्न हो शिव के साथ अपने नगर को चली गयीं। तदनन्तर सर्वज्ञा राधा हर्षविभोर हो आते हुए प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण के स्वागतार्थ गोपियों के साथ आगे आयीं। 
        ___
        श्रीकृष्ण को समीप आते देखकर सती राधिका रथ से उतर पड़ीं और सखियों के साथ आगे बढ़कर उन्होंने उन जगदीश्वर के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया।

        ग्वालों और गोपियों के मन में सदा श्रीकृष्ण के आगमन की लालसा बनी रहती थी; अतः उन्हें आया देखकर वे आनन्दमग्न हो गये। उनके नेत्र और मुख हर्ष से खिल उठे फिर तो वे दुन्दुभियाँ बजाने लगे। उधर विरजा नदी को पार करके जगत्पति श्रीकृष्ण की दृष्टि ज्यों ही राधा पर पड़ी, त्यों ही वे रथ से उतर पड़े और राधिका के हाथ को अपने हाथ में लेकर शतश्रृंग पर्वत पर घूमने चले गये। वहाँ सुरम्य रासमण्डल, अक्षयवट और पुण्यमय वृन्दावन को देखते हुए तुलसी कानन में जा पहुँचे। 

        वहाँ से मालतीवन को चले गये। फिर श्रीकृष्ण ने कुन्दवन तथा माधवी कानन को बायें करके मनोरम चम्पकारण्य को दाहिने छोड़ा। पुनः सुरुचिर चन्दन कानन को पीछे करके आगे बढ़े तो सामने राधिका का परम रमणीय भवन दीख पड़ा। 

        वहाँ जाकर वे राधा के साथ श्रेष्ठ रत्नसिंहासन पर विराजमान हुए। फिर उन्होंने सुवासित जल पिया तथा कपूरयुक्त पान का बीड़ा ग्रहण किया। तत्पश्चात वे सुगन्धित चंदन से चर्चित पुष्पशय्या पर सोये और रास-सागर में निमग्न हो सुंदरी राधा के साथ विहार करने लगे। नारद! इस प्रकार मैंने( नारायण)
          रमणीय गोलोकारोहण के विषय में अपने पिता धर्म के मुख से जो कुछ सुना था, वह सब तुम्हें बता दिया। 

        अब पुनः और क्या सुनना चाहते हो ?


        उपर्युक्त कथानक में नारद और नारायण का संवाद है  ये नारायण क्षीरसागर वाले नहीं है। ये धर्नके पुत्र हैं जो उनकी पत्नी दक्ष कन्या मूर्ति के गर्भ से उत्पन्न हुए हरि ,कृष्ण नर और नारायण)


                                                            
        इति श्रीब्रह्मवैवर्त  महापुराण श्रीकृष्णजन्मखण्ड उत्तरार्द्ध नारदनारायण - सौति शौनक के बीच  गोलोकारोहण नामैकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १२९ ।।
                          ब्रह्म वैवर्त पुराण
        श्रीकृष्ण जन्म खण्ड (उत्तरार्द्ध): अध्याय 129
        श्रीकृष्ण के गोलोक गमन का वर्णन-

        श्रीनारायण कहते हैं- नारद! परिपूर्णतम प्रभु भगवान श्रीकृष्ण वहाँ तत्काल ही गोकुलवासियों के सालोक्य मोक्ष को देखकर भाण्डीरवन में वटवृक्ष के नीचे पाँच गोपों के साथ ठहर गए।

        वहाँ उन्होंने देखा कि सारा गोकुल तथा गो-समुदाय व्याकुल है। 
        रक्षकों के न रहने से वृन्दावन शून्य तथा अस्त-व्यस्त हो गया है। 
        *********
        तब उन कृपासागर को दया गयी। फिर तो, उन्होंने योगधारणा द्वारा अमृत की वर्षा करके वृन्दावन को मनोहर, सुरम्य और गोपों तथा गोपियों से परिपूर्ण कर दिया। 

        साथ ही गोकुलवासी गोपों को ढाढस भी बँधाया। तत्पश्चात वे हितकर नीतियुक्त दुर्लभ मधुर वचन बोले।

        श्रीभगवान ने कहा- हे गोपगण! हे बन्धो! तुमलोग सुख का उपभोग करते हुए शान्तिपूर्वक यहाँ वास करो; क्योंकि प्रिया के साथ विहार, सुरम्य रासमण्डल और वृन्दावन नामक पुण्यवन में श्रीकृष्ण का निरन्तर निवास तब तक रहेगा, जब तक रहेगा, जब तक सूर्य और चंद्रमा की स्थिति रहेगी। 

        तत्पश्चात लोकों के विधाता ब्रह्मा भी भाण्डीरवन में आये। 
        उनके पीछे स्वयं शेष, धर्म, भवानी के साथ स्वयं शंकर, सूर्य, महेंद्र, चंद्र, अग्नि, कुबेर, वरुण, पवन, यम, ईशान आदि देव, आठों वसु, सभी ग्रह, रुद्र, मुनि तथा मनु- ये सभी शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँचे, जहाँ सामर्थ्यशाली भगवान श्रीकृष्ण विराजमान थे।

        तब स्वयं ब्रह्मा ने दण्ड की भाँति भूमि पर लेटकर उन्हें प्रणाम किया और यों कहा।

        ब्रह्मा बोले- भगवन! आप परिपूर्णतम ब्रह्मस्वरूप, नित्य विग्रहधारी, ज्योतिः स्वरूप, परमब्रह्मा और प्रकृति से परे हैं, आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। परमात्मान! आप परम निर्लिप्त, निराकार, ध्यान के लिए साकार, स्वेच्छामय और परमधाम हैं; आपको प्रणाम है। सर्वेश! आप संपूर्ण कार्य स्वरूपों के स्वामी, कारणों के कारण और ब्रह्मा, शिव, शेष आदि देवों के अधिपति हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। 

        परात्पर! आप सरस्वती, पद्मा, पार्वती, सावित्री और राधा के स्वामी हैं; रासेश्वर! आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। सृष्टिरूप! आप सबके आदिभूत, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सबके पालक और संहारक हैं; आपको नमस्कार प्राप्त हो। हे नाथ! आपके चरणकमल की रज से वसुन्धरा पावन तथा धन्य हुई हैं; आपके परमपद चले जाने पर यह शून्य हो जायेगी।

        इस पर क्रीड़ा करते आपके एक सौ पचीस वर्ष बीत गये। 
        "यत्पञ्चविंशत्यधिकं वर्षाणां शतकं गतम् ।
        त्यक्त्वेमां स्वपदं यासि रुदतीं विरहातुराम् ।। १८ ।।

         ब्रह्म वैवर्त पुराण श्रीकृष्णजन्मखण्ड अध्याय-129
        विरहातुरा रोती हुई पृथ्वी को छोड़कर अपने धाम को पधार रहे हैं।




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