रविवार, 30 जून 2019

राम और कृष्ण के चरित्र की भिन्नताऐं -

अब आप राम द्रोही मुझे मत कहना
राम का दुरुपयोग सदीयों से रूढ़िवादी करते आरहे हैं ।
आज राम को फिर आतंक और रूढ़िवादिता का पर्याय वाची बना दिया गया है ।

यद्यपि राम को ३२ देशों की संस्कृतियों
में वर्णन किया गया है ।
यहाँं तक कि सुमेरियन, बैबीलॉनियन संस्कृतियों में भी गिलगमेश के महाकाव्य में तसरत, राम, सिता, जैसे पात्र विद्यमान हैं।
मिश्र में रेमेसिस और सीटामुन
परन्तु भारत में --रामायण बुद्ध के परवर्ती काल में नये सिरे से किंवदन्तियों तथा कुछ कल्पनाओं के आधार पर निर्मित की गयी ।
आप स्वयं देख लो

सदीयों से श्रृद्धा और मनु का कभी मिलन नहीं हो पाया ।
श्रृद्धा प्रवण लोगों ने ही मनन करने की आवश्यकता का अनुभव नहीं किया ।
परिणाम यह हुआ कि श्रृद्धा बटक गयी।

और यह सर्व विदित है कि भावनाओं में विचारों का आनुपातिक तारतम्य परक समायोजन न हो तो  ज्ञान उत्पन्न हो ही नहीं सकता है ।
श्रृद्धा में डूब कर आप विचार हीन कभी न बनें .
आपको विदित हो कि वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में जावालि ऋषि से संवाद करते हुए राम " तथागत बुद्ध को गाली दें तो कोई बुद्धिजीवी क्या कहेगा?

आप रामायण को कितना सत्य मानोगे ऐसे ही कुछ श्लोक जो ‘आयोध्या-काण्ड’ में आये हैं ।

यहाँ पर वाल्मीकि रामायण के  लेखक ने ‘बुद्ध’ और ‘बौद्ध-धम्म’ को नीचा दिखाने की नीयत से  ‘तथागत-बुद्ध’ को स्पष्ट ही श्लोकबद्ध (सम्बोधन) करते हुए,
राम के मुँह से चोर, धर्मच्युत, नास्तिक और अनेक अपमान-जनक शब्दों से संबोधित करवा दिया हैं।

यहाँ कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहैं हैं , जिनकी पुष्टि आप स्वयं ‘वाल्मिकी रामायण से कर सकते हैं ।
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:- उग्र तेज वाले नृपनन्दन श्रीरामचन्द्र, जावालि ऋषि के नास्तिकता से भरे वचन सुनकर उनको सहन न कर सके और उनके वचनों की निंदा करते हुए राम उनसे फिर बोले :-
“निन्दाम्यहं कर्म पितुः कृतं , तद्धस्तवामगृह्वाद्विप मस्थबुद्धिम्।
बुद्धयाऽनयैवंविधया चरन्त ,
सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम्।।”
– अयोध्याकाण्ड, सर्ग – 109. श्लोक : 33।।

• सरलार्थ :- हे जावालि!
मैं अपने पिता (दशरथ) के इस कार्य की निन्दा करता हूँ।
कि उन्होने तुम्हारे जैसे वेदमार्ग से भ्रष्ट बुद्धि वाले धर्मच्युत नास्तिक को अपने यहाँ स्थान दिया है ।।
क्योंकि ‘बुद्ध’ जैसे नास्तिक - मार्गी , जो दूसरों को उपदेश देते हुए घूमा-फिरा करते हैं , वे केवल घोर नास्तिक ही नहीं, प्रत्युत धर्ममार्ग से च्युत भी हैं ।

     देखें राम बुद्ध के विषय में क्या कहते हैं ।
नीचे तथागत बुद्ध का वर्णन यथावत् कर दिया है।
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“यथा हि चोरः स, तथा ही बुद्धस्तथागतं।
नास्तिकमत्र  विद्धि तस्माद्धियः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तिकेनाभिमुखो बुद्धः स्यातम् ।।

” -(अयोध्याकांड, सर्ग -109, श्लोक: 34 / पृष्ठों संख्या
गीता प्रेस गोरख पुर संस्करण :1678)

सरलार्थ :- जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार ‘तथागत बुद्ध’ और और उनके नास्तिक अनुयायी भी दंडनीय है ।

‘तथागत'(बुद्ध) और ‘नास्तिक चार्वाक’ को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिए।
इसलिए राजा को चाहिए कि प्रजा की भलाई के लिए ऐसें मनुष्यों को वहीं दण्ड दें, जो चोर को दिया जाता है।

परन्तु जो इनको दण्ड देने में असमर्थ या वश के बाहर हो, उन ‘नास्तिकों’ से समझदार और विद्वान ब्राह्मण कभी वार्तालाप ना करे।

इससे स्पष्ट है कि रामायण बुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है न कि बुद्ध से 7000 साल पहले की रचना
कुछ विद्वान इसे 2000 वर्ष पुरातन भी मानते हैं ।

अब काल निर्धारण ही आप कैसे करोगे ?
कि राम कब हुए कितने वर्ष तक जीवित रहे
इनका कोई भी प्राकृतिक व वैज्ञानिक आधार नहीं हैं
एक स्थान पर वर्णन है कि

अरोगा: सर्वसिद्धार्थश्चतुर्वर्षशतायुष:।
कृते त्रेतायुगे त्वेषां पादशो ह्रसते वय:।25।

"सतयुग में मनुष्य निरोग होते हैं उनकी संपूर्ण कामनाएं सिद्ध होती हैं तथा वे चार सौ(400)वर्षों की आयु वाले होते हैं ।

त्रेता युग आने पर उनकी आयु एक चौथाई घटकर तीन सौ (300) वर्षों की रह जाती है।

इस प्रकार द्वापर में दो सौ (200) और कलयुग में (100 )वर्षों की आयु होती है।
अब विचारणीय तथ्य यह है कि
अब आश्रम व्यवस्था का विधान केवल 100 वर्ष के
लिए ही क्यों है ।
क्या ये व्यवस्था कलियुग में बनायी गयी।
उपनिषदों तथा वेदों मे ध्वनित शतंसमा शब्द भी सौ वर्ष का निर्धारक है ।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे
(ईशावास्योपनिषद)
अर्थात्‌ मनुष्यों को कर्म करते हुए 100वर्ष जीना चाहिए!
यहाँं 200 या 300 वर्षो की तो बात ही नहीं है ।

अब बात यह है कि "शतं समा" ( सौ वर्ष) जाने की बात वेद में होती है तो 'वह किस युग की है ।
कल युग की
यदि हम सब मानते हैं कि वेदों का प्रादुर्भाव सतयुग में हुआ ।
और सतयुग में समान्य व्यक्ति चार सौ वर्ष जीवन व्यतीत करता था ।
तो वेदों के केवल जीवन सौ वर्ष क्यों माने गये हैं
जैसे-
पश्येम शरदः शतम् ।।१।।
जीवेम शरदः शतम् ।।२।।
बुध्येम शरदः शतम् ।।३।।
रोहेम शरदः शतम् ।।४।।
पूषेम शरदः शतम् ।।५।।
भवेम शरदः शतम् ।।६।।
भूयेम शरदः शतम् ।।७।।
भूयसीः शरदः शतात् ।।८।।
(अथर्ववेद, काण्ड १९, सूक्त ६७)

हम सौ शरदों तक देखें (१)।
सौ वर्षों तक हम जीवित रहें (२)।
सौ वर्षों तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे(३);
सौ वर्षों तक हम वृद्धि करते रहें,
हमारी उन्नति होती रहे (४);
सौ वर्षों तक हम पुष्टि प्राप्त करते रहें(५);
हम सौ वर्षों तक बने रहें (६);
सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें (७);
सौ वर्षों से भी आगे ये सब कल्याणमय बातें होती रहें (८)।
उपर्युक्त ऋचाओं में केवल सौ वर्ष की ही कामना की है -जैसे या तीन सौ वर्ष की नहीं।
अब आप बताओ कि महाभारत प्राचीनत्तम या वेद ?

वाल्मीकि रामायण बाल-काण्ड अष्टादश: अध्याय में तो वर्णित है कि ।

चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिण: ।
वानरान् सुमहाकायान् सर्वान् वै वनचारिण:।।२३।

देवताओं का गुण गाने वाले बनवासी चारणों ने बहुत से  विशालकाय वानर पुत्र उत्पन्न किए वे सब जंगली फल फूल खाने वाले थे ।23।

अब वानर जब वन के नरों से उत्पन्न हुए हैं ।
तो वानरों को नर का पूर्वज क्यों माना जाय ?
अब दशरथ और राम के समय के विषय में कल्पना देखिए कि जो
वाल्मीकि रामायण में वर्णित है कि

-जब राजा दशरथ की अवस्था साठ हजार वर्ष की हो गयी तब राम का जन्म हुआ।

(यह वर्णनबीसवाँ सर्ग बाल-काण्ड में है )
षष्टिर्वर्षसहस्राणि जातस्य मम कौशिक।10
कृच्छ्रेणोत्पादितश्चायं न रामं नेतुमर्हसि।

हे कुशिक नन्दन ! मेरी अवस्था साठ हजार वर्ष की हो गयी ।
इस बुढ़ापे में में बड़ी कठिनाई से पुत्र प्राप्ति हुई है अत आप राम को न ले जाऐं।
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-जब एक जिज्ञासु ने कहा कि राम का शासन ग्यारह हजार वर्ष तक हुआ ।और कृष्ण लगभग 125 वर्ष तक जीवित रहे ।
तो दौनों में कैसा मेल ?
और चरित्र के स्तर पर भी
राम वर्ण व्यवस्था के समर्थक और कृष्ण वर्ण व्यवस्था के विध्वंसक
हैं ।

राम देव संस्कृति के प्रतिष्ठा देते हैं तो कृष्ण इन्द्र से युद्ध करते हैं ।
कृष्ण नारी जाति को सम्मान और उच्चता प्रदान करते हैं तो राम सीता जैसी पवित्र स्त्री को अग्नि परीक्षा के बाद भी गर्भवती अवस्था में निर्जन वन प्रदेश में मरने के लिए छोड़कर चले जाते हैं ।
--जो स्त्री चौदह वर्षों तक उनके साथ उनकी सेवा करती है ।
कृष्ण का चरित्र बहुतायत रूप में श्रीमद्भगवत् गीता में प्रतिध्वनित है ।
जिसे पञ्चमी सदी में महाभारत में समायोजित किया गया ।

और अवतार वाद की अवधारणा तो केवल अाभीरों के भागवत धर्म से प्रादुर्भूत है ।
जोकि कि यहूदियों के नवीवाद का एक रूपान्तरण है
यहूदियों ने इसे सुमेरियन बैबीलॉनियन संस्कृतियों से ग्रहण किया ।
सुमेरियन पुरा-कथाओं में नबू ज्ञान का देवता है ।
और भाषायी स्तर पर नवी शब्द के दो अर्थ नेता और आँख मिलते हैं ।
संस्कृत भाषा में नाविक शब्द इसी का प्रतिरूप है।
संस्कृत धातु'पाठ में नी धातु इसका श्रोत है।

नवीवाद कालान्तरण में ईसाईयों तथा मुसलमानों की शरीयत में भी यहूदियों से ही आया।
जैनियों में तीर्थंकर और सिखों गुरुवाद की अवधारणा इसी का अवशेष हैं ।

अव राम को अवतार वाद की जद में क्यों से लिया
अत: यह सब पुष्य-मित्र सुंग कालीन पुरोहितों ने किया
राम और कृष्ण के चरित्र का कोई साम्य नहीं
परन्तु अब सब मेल कर दिया है।
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प्रस्तुति-करण यादव योगेश कुमार

रविवार, 23 जून 2019

भारतीय इतिहास का सम्यक् निर्धारण बुद्ध के समय से होता है

भागवतपुराण में महात्मा बुद्ध का वर्णन सिद्ध करता है-कि भागवतपुराण बुद्ध के बहुत बाद की रचना है ।
दशम् स्कन्ध अध्याय 40 में श्लोक संख्या 22 पर
वर्णन है कि 👇
नमो बुद्धाय शुद्धाय दैत्यदानवमोहिने ।
म्लेच्छ प्राय क्षत्रहन्त्रे नमस्ते कल्कि रूपिणे ।।22
दैत्य और दानवों को  मोहित करने के लिए आप शुद्ध अहिंसा मार्ग के प्रवर्तक बुद्ध का जन्म ग्रहण करेंगे ---मैं आपके लिए नमस्कार करता हूँ ।और पृथ्वी के क्षत्रिय जब म्लेच्छ प्राय हो जाऐंगे तब उनका नाश करने के लिए आप कल्कि अवतार लोगे ! मै आपको नमस्कार करता हूँ 22।
महाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व भीष्मस्तवराज विषयक सैंतालीसवें अध्याय में भीष्म द्वारा भगवान् कृष्ण की स्तुति के प्रसंग में बुद्ध का वर्णन है।👇

भीष्म कृष्ण के बाद बुद्ध और फिर कल्कि अवतार का स्तुति करते हैं ।

जैसा कि अन्य पुराणों में विष्णु के अवतारों का क्रम-वर्णन है ।
उसी प्रकार यहाँं भी -

अब बुद्ध का समय ई०पू० 566 वर्ष है ।
फिर महाभारत को हम बुद्ध से भी पूर्व आज से साढ़े पाँच हजार वर्ष पूर्व क्यों घसीटते हैं?
नि: सन्देह सत्य के दर्शन के लिए  हम्हें श्रृद्धा का 'वह चश्मा उतारना होगा; जिसमें अन्ध विश्वास के लेंस लगे हुए हैं।

पुराणों में कुछ पुराण -जैसे भविष्य-पुराण में महात्मा बुद्ध को पिशाच या असुर कहकर उनके प्रति घृणा प्रकट की है ।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में राम के द्वारा  बुद्ध को चोर कह कर घृणा प्रकट की गयी है ।

इस प्रकार कहीं पर बुद्ध को गालीयाँ दी जाती हैं तो कहीं चालाकी से विष्णु के अवतारों में शामिल कर लिया जाता है ।

नि:सन्देह ये बाते महात्मा बुद्ध के बाद की हैं ।
क्यों कि महाभारत में महात्मा बुद्ध का वर्णन  इस प्रकार है। देखें👇
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दानवांस्तु  वशेकृत्वा पुनर्बुद्धत्वमागत:।
सर्गस्य  रक्षणार्थाय तस्मै बुद्धात्मने नम:।।

अर्थ:– जो सृष्टि रक्षा के लिए दानवों को अपने अधीन करके पुन:  बुद्ध के रूप में अवतार लेते हैं उन बुद्ध स्वरुप श्रीहरि को नमस्कार है।।

हनिष्यति कलौ प्राप्ते म्लेच्‍छांस्तुरगवाहन:।
धर्मसंस्थापको यस्तु तस्मै कल्क्यात्मने नम:।।

जो कलयुग आने पर घोड़े पर सवार हो धर्म की स्थापना के लिए म्लेच्‍छों का वध करेंगे उन कल्कि  रूप श्रीहरि को नमस्कार है।।

( उपर्युक्त दौनों श्लोक शान्तिपर्व राजधर्मानुशासनपर्व भीष्मस्तवराज विषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पृष्ठ संख्या 4536) गीता प्रेस संस्करण में क्रमश: है ।

ही कुछ श्लोक जो ‘आयोध्या-कांड’ में आये है ।
यहाँ पर वाल्मीकि रामायण के  लेखक ने ‘बुद्ध’ और ‘बौद्ध-धम्म’ को नीचा दिखाने की नीयत से  ‘तथागत-बुद्ध’ को स्पष्ट ही श्लोकबद्ध (सम्बोधन) करते हुए,
राम के मुँह से चोर, धर्मच्युत नास्तिक और अपमान-जनक अपमानजनक शब्दों से संबोधित करवा दिया हैं।
यहाँ कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहैं हैं , जिनकी पुष्टि आप ‘वाल्मिकी रामायण से कर सकते हैं ।
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:- उग्र तेज वाले नृपनन्दन श्रीरामचन्द्र, जावालि ऋषि के नास्तिकता से भरे वचन सुनकर उनको सहन न कर सके और उनके वचनों की निंदा करते हुए उनसे फिर बोले :-
“निन्दाम्यहं कर्म पितुः कृतं , तद्धस्तवामगृह्वाद्विप मस्थबुद्धिम्।
बुद्धयाऽनयैवंविधया चरन्त , सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम्।।”
– अयोध्याकाण्ड, सर्ग – 109. श्लोक : 33।।
• सरलार्थ :- हे जावालि!
मैं अपने पिता (दशरथ) के इस कार्य की निन्दा करता हूँ।
कि उन्होने तुम्हारे जैसे वेदमार्ग से भ्रष्ट बुद्धि वाले धर्मच्युत नास्तिक को अपने यहाँ स्थान दिया है ।। क्योंकि ‘बुद्ध’ जैसे नास्तिक - मार्गी , जो दूसरों को उपदेश देते हुए घूमा-फिरा करते हैं , वे केवल घोर नास्तिक ही नहीं, प्रत्युत धर्ममार्ग से च्युत भी हैं ।
     देखें राम बुद्ध के विषय में क्या कहते हैं ।
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“यथा हि चोरः स, तथा ही बुद्धस्तथागतं।
नास्तिकमत्र  विद्धि तस्माद्धियः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तिकेनाभिमुखो बुद्धः स्यातम् ।।
” -(अयोध्याकांड, सर्ग -109, श्लोक: 34 / पृष्ठों संख्या
गीता पेरेस गोरख पुर :1678)
सरलार्थ :- जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार ‘तथागत बुद्ध’ और और उनके नास्तिक अनुयायी भी दंडनीय है ।
‘तथागत'(बुद्ध) और ‘नास्तिक चार्वक’ को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिए।
इसलिए राजा को चाहिए कि प्रजा की भलाई के लिए ऐसें मनुष्यों को वहीं दण्ड दें, जो चोर को दिया जाता है।
परन्तु जो इनको दण्ड देने में असमर्थ या वश के बाहर हो, उन ‘नास्तिकों’ से समझदार और विद्वान ब्राह्मण कभी वार्तालाप ना करे।
इससे स्पष्ट है कि रामायण बुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है न कि बुद्ध से 7000 साल पहले की रचना
कुछ विद्वान 2000वर्ष पुरातन भी मानते हैं ।

. ये संपूर्ण श्लोक ‘वाल्मिकि रामायण’ (मूल) से उद्घृत है।
अगर किसी को कोई आपत्ति हो तो, कृपया,
‘रामायण’ को अच्छी तरह से पढ़ लेने के बाद ही करें !
प्रतिक्रिया दे अन्यथा नहीं ....

भविष्यपुराण (गीताप्रेस कोड-584) प्रतिसर्गपर्व चतुर्थखण्ड (पृष्ठ सं-372) मे लिखा है कि "2700 साल कलियुग बीत जाने के बाद बलि नामक असुर के द्धारा भेजा गया 'मय' नामक असुर धरती पर आया! वह असुर शाक्यगुरू बनकर दैत्यपक्ष को बढ़ाने लगा और जो उसका शिष्य होता उसे 'बौद्ध' कहा जाता। उसने तमाम तीर्थों पर मायावी यन्त्रों को स्थापित कर दिया था, जिससे जो भी मानव उन तीर्थों पर जाता वह 'बौद्ध' हो जाता। इससे चारों तरफ बौद्ध व्याप्त हो गये और दस करोड़ आर्य बौद्ध बन गये।"

इस पुराण मे जिस "मय" असुर का वर्णन है, वह कोई और नही बल्कि गौतम बुद्ध है! इस पुराण मे बुद्ध को मानने वाले बौद्धों को "दैत्यपक्षी" कहा गया है।

भविष्यपुराण के इस कथन से यह स्पष्ट है कि पौराणिकों को बुद्ध से किस कदर चिढ़ थी कि उन्हे दैत्य ही घोषित कर दिया। जबकि इसके पूर्व के पुराणों ने बुद्ध को विष्णु का अवतार माना है।

नरसिंहपुराण अध्याय-36 श्लोक-9 मे लिखा है-
"कलौ प्राप्ते यथा बुद्धो भवेन्नारायणः प्रभुः"
अर्थात- कलियुग प्राप्त होने पर भगवान नारायण बुद्ध का रूप धारण करेंगे।

इसी नरसिंहपुराण मे एक अन्य स्थान पर बुद्ध को राम का ही वंशज तथा सूर्यवंशी भी बताया गया है। इस पुराण के 21वें अध्याय मे लिखा है कि राम के पुत्र लव, लव के पुत्र पद्म, पद्म के पुत्र अनुपर्ण, अनुपर्ण के पुत्र वस्त्रपाणि, वस्त्रपाणि के पुत्र शुद्धोधन और शुद्धोधन के पुत्र गौतम बुद्ध हुये।
अर्थात राम की छठवीं पीठी मे बुद्ध पैदा हुये थे।

वैसे अगर इसे पूर्ण सच मान लिया जाये तो फिर राम का समय आज से लगभग तीन हजार साल के आसपास का ही होता है! यदि बुद्ध अब से ढ़ाई हजार साल पहले थे तो उनके छः पूर्वज अधिकतम छः सौ साल और पूर्व होगे, जो लगभग ईसा से 1100 सौ वर्ष पूर्व का हो सकता है!
अब यह गणना इतनी कम है, अतः सनातनी इसे मानने से तुरन्त इनकार कर देंगे।
यहाँ मै आपको एक बात और बता दूँ कि नरसिंहपुराण हिन्दूधर्म के 18 पुराणों मे नही आता। यह एक उपपुराण है, अतः अधिकांश लोग यही मानते हैं की इसमे मिलावट नही है।




यहूदियों का ब्राह्मणों से कोई सम्बन्ध नहीं!

यहूदियों का ब्राह्मणों से कोई सम्बन्ध नहीं!
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वर्तमान काल में कुछ  दलित विचारकों में एक भ्रान्ति मूलक अवधारणा प्रतिष्ठित हो कर रह गयी है ।
वे इतिहास को पूर्व दुराग्रह पूर्ण दृष्टि-कोण से समाज में प्रचारित व प्रसारित कर रहे  हैं ।
वे दलित विचारक कथित ब्राह्मण को यहूदी के वंशज कहने लगे हैं ।
अब उनके पास कौन सा शोध प्रमाण है ।
जिसके आधार पर वे यह सिद्ध कर सके
कि यहूदी ब्राह्मणों के पूर्वज हैं ।
परन्तु उनके पास कोई ठोस प्रमाण नहीं ।

आपको विश्व-इतिहास के पृष्ठों से ज्ञान भी होगा कि
यहूदी सदीयों से बिखरे थे ना जाने उनका कौन सा देश था ।
परन्तु वे पैलास्टाइन के निवासी थे ।
पालों का स्थान पालस्थान ही कालान्तरण में पैलास्टाइन तथा फलिस्तीन के रूप में हुआ।
सदीयों से यहूदियों पर दुनियाँ की अन्य बर्बर जातियों ने जुल्म ढाया !🎄🎆
ये कभी मिश्र की पहाड़ीयों में भटकते रहे तो कभी कनान के बीहड़ो में पश्चिमीय एशिया में एेसा कौन सा देश और स्थान रहा जहाँ यहूदियों ने प्रवास न किया हो
जर्मनी देश में यहूदियों को यद्दीश भी कहा गया ।
जर्मनी में जितने वैज्ञानिक हुए अलबर्ट आँइन्सटीन -जैसे वे भी यहूदी मूल के थे ।
हिटलर के विषय में इतिहास कार जानते हैं ।
'वह भी यहूदियों से उसी प्रकार घृणा करता था -जैसे
आज के ब्राह्मण यादवों तथा उनके पूर्वज यदु से करते थे ।
1944 के समकक्ष हिटलर ने दस लाख यहूदियों को जहरीले चेम्बर मे डालकर इस लिए मरवाया कि वे देव संस्कृति के या नॉर्डिक स्वीअर जन-जाति से सम्बद्ध नहीं थे ।
आर.एस.एस. के गुरु गोलचक्कर (गोलेलकर) ने हिटलर की यहूदियों के मारने के कारण बहुत तारीफ की थी।
ये सर्वविदित है कि आरएसएस कथित ब्राह्मण का संघटन है प्रमाण के तौर पर गुरु गोलचक्कर के द्वारा लिखा ग्रन्थ "बंच आफ थॉट्स" है
अब सवाल ये उठता है अगर ब्राह्मण यहूदी होते तो यहूदियों को मारने वाले हिटलर यहूदियों को सजातिय बन्धु होने के कारण क्यों मारता।

हिटलर स्वयं को नार्डीक आर्य बोलता था,
और मैनुस (Manus) को अपना आदि पूर्वज कहता ।
उसकी ध्वजा पर स्वास्तिक का चिन्ह सर्व प्रकाशित है ही जिसे हेकेनक्रूज( हुक क्रोस) जर्मन- भाषा में करते हैं

अब  दलित चिंतकों को जवाब देना चाहिए कि हिटलर ने यहूदियों को जाति-द्वेष से प्रेरित होकर क्यों मारा?

शनिवार, 22 जून 2019

कोर्ट ऐैतिहासिक फैसले साक्ष्यों के आधार पर कर सकता है । यादवों के इतिहास के साक्ष्य वेदों के आधार पर ही मान्य हैं । क्यों कि पुराण भी वैदिक सिद्धान्तों की प्रतिछाया है । वेदों में भी ऋग्वेद प्राचीनत्तम साक्ष्य है ।

कोर्ट ऐैतिहासिक फैसले साक्ष्यों के आधार पर कर सकता है ।
यादवों के इतिहास के साक्ष्य वेदों के आधार पर ही मान्य हैं ।
क्यों कि पुराण भी वैदिक सिद्धान्तों की प्रतिछाया मात्र है ।
वेदों में भी ऋग्वेद प्राचीनत्तम साक्ष्य है ।
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अर्थात् ई०पू० 2500 से 1500 के काल तक-- इसी ऋग्वेद में बहुतायत से यदु और तुर्वसु का साथ साथ वर्णन हुआ है ।
वह भी दास अथवा असुर रूप में
यद्यपि दास शब्द का वैदिक ऋचाओं में अर्थ देव संस्कृति के प्रतिद्वन्द्वी असुरों से ही है।

और वे असुर भी  वैसे नहीं थे जैसा वर्णन भारतीय पुराणों तथा शास्त्रों में उनका किया जाता है ।
क्योंकि वर्णन करने वाले देव-संस्कृति के उपासक पुरोहित थे।

ऋग्वेद में असुर' शब्द का प्रयोग लगभग 105 बार हुआ है।
उसमें 90 स्थानों पर इसका प्रयोग 'श्रेष्ठ' अर्थों में किया गया है और केवल 15 स्थनों  पर यह 'देवताओं के शत्रु' का वाचक है।
'वह भी परवर्ती वैदिक काल में
'असुर' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है- प्राणवन्त, प्राणशक्ति संपन्न ('असुरिति प्राणनामास्त:
शरीरे भवति, निरुक्ति ३.८)

( यास्क निरुक्तकोश )और इस प्रकार यह वैदिक देवों के एक सामान्य विशेषण के रूप में भी व्यवहृत किया गया है।
विशेषत: वरुण के लिए .. सुमेरियन बैबीलॉनियन संस्कृतियों में इन्हें असीरियन कहा गया।

परन्तु ये दास या असुर अपने पराक्रम बुद्धि- कौशल से सम्माननीय ही रहे हैं ।

अत: दास शब्द प्रारम्भ काल में दानी  या दाता का वाचक था।

परन्तु ईरानी सन्दर्भों में दास नेता अथवा दाता का वाचक है ।

और उन्हीं प्राचीनत्तम सन्दर्भों में असुर और दास शब्दों के अर्थ निर्धारित करने चाहिए न कि आधुनिक अर्थों में

क्यों कि वैदिक सन्दर्भों में तथा परवर्ती काल में भी घृणा शब्द दया का वाचक है ।
परन्तु आज घृणा (नफ़रत) का वाचक है ।

ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की १० वीं ऋचा में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास के रूप में सम्बोधित किया गया है। 👇
वह भी गोपों को रूप में
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" उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी ।
" गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।।

(ऋग्वेद १०/६२/१०) यदु और तुर्वसु नामक दौनो दास जो गायों से घिरे हुए हैं हम उन सौभाग्य शाली दासों की प्रशंसा करते हैं।
यहाँ पर गोप शब्द स्पष्टत: है।
गो-पालक ही गोप होते हैं ऋग्वेद के प्राय: ऋचाओं में यदु और तुर्वसु का वर्णन नकारात्मक रूप में हुआ है।  👇
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प्रियास इत् ते मघवन् अभीष्टौ
नरो मदेम शरणे सखाय:।

नि तुर्वशं नि यादवं शिशीहि
अतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन् ।।

(ऋग्वेद ७/१९/८ ) में भी यही ऋचा अथर्ववेद में भी (काण्ड २० /अध्याय ५/ सूक्त ३७/ ऋचा ७) हे इन्द्र ! हम तुम्हारे मित्र रूप यजमान अपने घर में प्रसन्नता से रहें; तथा तुम अतिथिगु को सुख प्रदान करो।
और तुम तुर्वसु और यादवों को क्षीण करने वाले बनो। अर्थात् उन्हें परास्त करने वाले बनो !
(ऋग्वेद ७/१९/८)

ऋग्वेद में भी यथावत् यही ऋचा है ; इसका अर्थ भी देखें :- हे ! इन्द्र तुम अतिथि की सेवा करने वाले सुदास को सुखी करो ।

और तुर्वसु और यदु को हमारे अधीन करो।
और भी देखें यदु और तुर्वसु के प्रति पुरोहितों की दुर्भावना अर्वाचीन नहीं अपितु प्राचीनत्तम भी है ।... देखें--- 👇
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अया वीति परिस्रव यस्त इन्दो मदेष्वा ।
अवाहन् नवतीर्नव ।१।
पुर: सद्य इत्थाधिये दिवोदासाय , शम्बरं अध त्यं तुर्वशुं यदुम् ।२।

(ऋग्वेद ७/९/६१/ की ऋचा १-२)
हे सोम ! तुम्हारे किस रस ने दासों के निन्यानवे पुरों अर्थात् नगरों) को तोड़ा था ।
उसी रस से युक्त होकर तुम इन्द्र के पीने के लिए प्रवाहित हो ओ। १।

शम्बर के नगरों को तोड़ने वाले ! सोम रस ने ही तुर्वसु की सन्तान तुर्को तथा यदु की सन्तान यादवों (यहूदीयों ) को शासन (वश) में किया।

यदु को ही ईरानी पुरातन कथाओं में यहुदह् कहा जो ईरानी तथा बैबीलॉनियन संस्कृतियों से सम्बद्ध साम के वंशज- असीरियन जन-जाति के सहवर्ती यहूदी थे।

असुर तथा यहूदी दौनो साम के वंशज- हैं भारतीय पुराणों में साम के स्थान पर सोम हो गया ।
यादवों से घृणा चिर-प्रचीन है देखें--और भी 👇

सत्यं तत् तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम् ।
व्यानट् तुर्वशे शमि ।
(ऋग्वेद ८/४६/२

हे इन्द्र ! तुमने यादवों के प्रचण्ड कर्मों को सत्य (अस्तित्व) में मान कर संग्राम में अह्नवाय्यम् को प्राप्त कर डाला ।

अर्थात् उनका हनन कर डाला ।
अह्नवाय्य :- ह्नु--बा० आय्य न० त० ।
निह्नवाकर्त्तरि ।

“सत्यं तत्तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम्” ऋ० ८, ४५, २७
अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में यही ऋचांश बहुतायत से है ।

किम् अंगत्वा मघवन् भोजं आहु:
शिशीहि मा शिशयं त्वां श्रृणोमि ।।

अथर्ववेद का० २०/७/ ८९/३/

हे इन्द्र तुम भोग करने वाले हो ।
तुम शत्रु को क्षीण करने वाले हो ।
तुम मुझे क्षीण न करो ।
यदु को दास अथवा असुर कहना सिद्ध करता है कि ये असीरियन जन-जाति से सम्बद्ध सेमेटिक यहूदी यों के पूर्वज यहुदह् ही थे।
कालान्तरण में किंवदन्तियाँ के द्वारा कथाओं में व्यतिक्रमण होना स्वाभाविक ही है ।

यद्यपि  पुराणों और ईसाईयों की हिब्रू-बाइबिल में यदु और यहुदह् शब्द की व्युत्पत्तियाँ समान है ।
अर्थात् यज्ञ अथवा स्तुति से सम्बद्ध व्यक्ति ।
यहूदीयों का सम्बन्ध ईरान तथा बेबीलोन से भी रहा है ।

ईरानी असुर संस्कृति में दाहे शब्द दाहिस्तान के सेमेटिक मूल के व्यक्तियों का वाचक है।
यदु एेसे स्थान पर रहते थे।

जहाँ ऊँटो का बाहुल्य था ऊँट उष्ण स्थान पर रहने वाला पशु है ।

यह स्था (उष + ष्ट्रन् किच्च ) ऊषरे तिष्ठति इति उष्ट्र (ऊषर अर्थात् मरुस्थल मे रहने से ऊँट संज्ञा )।
(ऊँट) प्रसिद्धे पशुभेदे स्त्रियां जातित्त्वात् ङीष् । “हस्तिगोऽश्वोष्ट्रदमकोनक्षत्रैर्यश्च जीवति”
“नाधीयीताश्वमारूढ़ो न रथं न च हस्तिनम् देखें-👇

-ऋग्वेद में "शतमहं तिरिन्दरे सहस्रं वर्शावा ददे ।
राधांसि यादवानाम् त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा
दश गोनाम् ददुष्पज्राय साम्ने ४६।

उदानट् ककुहो दिवम् उष्ट्रञ्चतुर्युजो ददत् ।
श्रवसा याद्वं जनम् ।४८।१७।👇

यदु वंशीयों में परशु के पुत्र तिरिन्दर से सहस्र संख्यक धन मैने प्राप्त किया !
ऋग्वेद ८/६/४६

यह स्थान इज़राएल अथवा फलस्तीन ही है ।
क्या जादौन अपने को इन रूपों में मानते हैं ।

ब्राह्मणों का आगमन यूरोप स्वीडन से मैसॉपोटमिया सुमेरो-फोनियन के सम्पर्क में रहते हुए हुआ है ।
सुमेरियन पुरातन कथाओं में (बरमन) /बरम (Baram) पुरोहितों को कहते है ।

ईरानी में बिरहमन तथा जर्मनिक जन-जातियाँ में ब्रेमन ब्रामर अथवा ब्रेख्मन है।
जो ब्राह्मण शब्द का तद्भव है।

पुष्य-मित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मणों ने अहीरों( यादवों से सदीयों से घृणा की है )उन्हें ज्ञान से वञ्चित किया और उनके इतिहास को विकृत किया और उन्हें दासता की जञ्जीरों में बाँधने की कोशिश भी की परन्तु अहीरों ने दास
(गुलाम) न बन कर दस्यु बनना स्वीकार किया ।
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"यह समग्र शोध श्रृंखला :- यादव योगेश कुमार' 'रोहि' के द्वारा अनुसन्धानित नवीनत्तम तथ्य है "

ईरानी भाषा में दस्यु तथा दास शब्द क्रमश दह्यु तथा दाहे के रूप में हैं ।

ऋग्वेद के दशम् मण्डल के ६२वें सूक्त की १० वीं ऋचा में यदु और तुर्वसु को स्पष्टत: दास के रूप में सम्बोधित किया गया है।

उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी ।
गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।।
(ऋग्वेद १०/६२/१०)
यदु और तुर्वसु नामक दौनो दास जो गायों से घिरे हुए हैं हम उन सौभाग्य शाली दौनों दासों की प्रशंसा करते हैं ।
यहाँ पर गोप शब्द स्पष्टत: है।
जो अहीरों का वाचक है
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अमरकोश में जो गुप्त काल की रचना है ;उसमें अहीरों के अन्य नाम-पर्याय वाची रूप में वर्णित हैं।
आभीर पुल्लिंग विशेषण संज्ञा गोपालः समानार्थक:
१-गोपाल,२-गोसङ्ख्य, ३-गोधुक्, ४-आभीर,५-वल्लव,६-गोविन्द, ७-गोप ८ - गौश्चर: ९-पाल  (2।9।57।2।5 अमरकोशः)
अत: साक्ष्य अहीरों के पक्ष  में ही है न कि जादौनों के रूप में क्यों कि जादौन बंजारे हैं गोप नहीं -

यादवों की एक शाखा कुकुर  कहलाती थी ।
ये लोग अन्धक राजा के पुत्र कुकुर के वंशज माने जाते हैं ।
दाशार्ह देशबाल -दशवार , ,सात्वत ,जो कालान्तरण में हिन्दी की व्रज बोली क्रमशः सावत ,सावन्त , कुक्कुर कुर्रा , कुर्रू  आदि रूपों परिवर्तित हो गये  ।

ये वस्तुत यादवों के कबीलागत विशेषण हैं ।

  कुकुर एक प्रदेश जहाँ कुक्कुर जाति के यादव रहते थे  यह देश राजपूताने के अन्तर्गत है ; जो कभी मत्स्या देश था ।
और  कालान्तरण में  उसके वंशजों द्वारा नामकरण हुआ ।
कुकुर+ अवलि =कुकुरावलि --कुरावली---करौली
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संस्कृत ग्रन्थों में कुकुर यादवों के विषय में पर्याप्त
आख्यान परक विवरण प्राप्त होता है ।

कोश ग्रन्थों में इस शब्द की व्युत्पत्ति काल्पनिक रूप से  इस प्रकार दर्शायी है ।

  कुम् पृथिवीं कुरति त्यजति स्वामित्वेन इति कुकुर ।
यदुवंशीयनृपभेदे तेषां ययातिशापात् राज्यं नास्तीति पुराणकथा यदुशब्दे दृश्या ।

अर्थात् कुकुर 'वह हैं --जो अपने स्वामित्व के द्वारा 'पृथ्वीराज को त्यागते हैं क्यों कि यदु के वंशज जिनके पूर्वज यदु ने ययाति के शाप  से राज्य प्राप्त नहीं किया ।
इस रूढ़िवादी परम्पराओं के प्रभाव से ...

“विधुरि ता धुरिताः” कुकुरस्त्रिय”
   महाकवि-माघः
२ दशार्हे देशभेदे  ।
कुकुरच् किच्च ।
३ कुक्कुरे हड्डचन्द्रः ।
कुकुरनृपश्चान्धकुकुरः भजमानशुचिकम्बलबर्हिषास्तथान्धकस्य पुत्राः” इति विष्णु पुराण

“कुकुरो भजमानश्च शुचिः कम्बलबर्हिषः ।
“अन्धकात् काश्यदुहिता चतुरोलभतात्मजान् कुकुरं भजमानं च शमं कम्बलबहिषम्” हरिवंश पुराण ३८ अध्याय ।
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वारगाथा काल में नल्ह सिह भाट द्वारा
विजय पाल रासो के रचना की गयी ।
नल्हसिंह भाट कृत इस रचना के केवल '42' छन्द उपलब्ध है।

विजयपाल, जिनके विषय में यह रासो काव्य है, विजयगढ़, करौली के 'यादव' राजा थे।
इनके आश्रित कवि के रुप में 'नल्ह सिंह' का नाम आता है।
रचना की भाषा से यह ज्ञात होता है कि यह रचना 17 वीं शताब्दी से पूर्व की नहीं हो सकती है।

करौली के यदुवंशी राजा पाल कहे जाते हैं |
समय के प्रभाव से मथुरा को त्याग कर और सम्वत् 1052  में बयाने के पास बनी पहाड़ी की उपत्यका में ये जा बसे |

राजा विजयपाल के पुत्र तहनपाल (त्रिभुवनपाल) ने तहनगढ़ का किला बनवाया |
तहनपाल के पुत्र धर्मपाल (द्वितीय) और हरिपाल थे ;
जिनका समय संवत् 1227 का है |

  कृष्ण जी के प्रपौत्र (नाती )वज्र को मथुरा का अधिपति बनाने का प्रसंग श्रीमद भागवत् के दशम स्कन्ध में आता है ।

कहा जाता है की लगभग सातवीं शताब्दी के आस पास सिंध से (जहां भाटियों का वर्चस्व था ) कुछ यदुवंशी मथुरा वापिस आ गए और उन्हों ने यह इलाका पुनः जीत लिया ।

इन राजाओं की वंशावली राजा धर्मपाल से शुरू होती है जो की श्री कृष्ण 77वीं पीढ़ी के वंशज थे ।

वर्तमान काल में करौली का राजघराना पाल  राजाओं के वंशज है ।
पाल अहीरों का प्राचीनत्तम विशेषण रहा है।

पहाड़ों पर बसने वाले डोगरा राजपूतों में भी इनकी कई खांपें मिली हुई हैं ।
ये ढढोर कबीले को अहीर से सम्बद्ध हैं

ढढोर ' यदुवंशी अहीरों की एक प्रसिद्ध गोत्र है
जिनका निर्गमन राजस्थान के प्रसिद्ध ढूंढार क्षेत्र से हुआ है।
राजस्थान में जयपुर के आसपास के क्षेत्र जैसे करौली, धौलपुर, नीमराणा और ढींग (दीर्घपुर) बयाना (वज्रायन) के विशाल क्षेत्र को " ढूंढार " कहा जाता है एवं यहाँ ढूंढारी भाषा बोली जाती है।

आज भी यहाँ ढंढोर अहीरों के गांव यहाँ मौजूद हैं।
ढढोर अहीर मूलतः द्वारिकाधीश भगवान कृष्ण के प्रपौत्र युवराज वज्रनाभ यदुवंशी के वंशजों में से एक माने जाते हैं एवं इनकी अराध्य देवी कैलादेवी(कंकाली माता) हैं।
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भगवान कृष्ण की पीढ़ी के 135 वें राजा विजयपाल यदुवंशी के ही विभिन्न पुत्रों में से एक से यह "ढढोर" वंश चला।

ऐसा "विजयपाल रासो "में भी वर्णन मिलता है कि यदुवंशी क्षत्रियों के उस समय राजस्थान और बृज में 1444 गोत्र उपस्थित थे।

इन्हीं विभिन्न 1444 यदुवंशी क्षत्रियों के गोत्र में से एक था !
ढढोर गोत्र जिन्होंने मुहम्मद गौरी के राजस्थान पर आक्रमण के समय पृथवीराज चौहान की ओर से लड़ते हुए गौरी की सेना से युद्ध किया था।

सन् 1018 में मथुरा के महाराज कुलचन्द्र यादव और महमूद गज़नी के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें गज़नी की सेना ने कपट पूर्वक  यदुवंशीयों को पराजित कर दिया।

राजा कुलचंद्र यादव के पुत्र राजा विजयपाल यदुवंशी के नेतृत्व में ज्यादातर यादव बयाना आ गए।
बयाना वज्रायन शब्द का तद्भव है ।

इस लिए विजयपाल ने मथुरा के क्षेत्र  में बनी अपनी प्राचीन राजधानी छोड़कर पूर्वी राजस्थान की मानी नामक पहाड़ी के उच्च-स्थली भाग पर बयाना का दुर्ग का निर्माण किया।

विजयपाल रासो नामक ग्रन्थ में इस राजा के पराक्रम का अच्छा वर्णन है ।

इसमे लिखा है कि महाराजा विजयपाल का 1045 ई0 में अबूबक्र शाह कान्धारी से घमासान युद्ध हुआ ।

संवत 1103 में यवनों ने संगठित होकर अबूबक्र कंधारी के नेतृत्व में विजय मंदिर गढ़ पर हमला किया और दुर्ग को चारों तरफ से घेर लिया  इस युद्ध में  विजयपाल वीरगति को प्राप्त हुये और उनके साथ उनके 18 में से 11 पुत्र भी वीरगति को प्राप्त हुए पराजय का समाचार किले में पहुचते ही महाराजा विजयपाल की रानियों ने राजपरिवार की अन्य स्त्रियों एवं किले की सैकड़ो अहीर क्षत्राणियों के साथ अग्नि की प्रचंड ज्वाला में कूद कर जौहर कर लिया शायद ही देश के इतिहास में इतना बड़ा जौहर हुआ होगा ।
परन्तु यह प्रथा यदुवंश में परवर्ती है ।
क्योंकि कृष्ण की मृत्यु के समय कोई भी कृष्ण की पत्नी या अन्य यदुवंशी स्त्रीयाँ सती या पति की चिता पर नहीं जलीं ।

यह चित्तौड़ के जौहर से भी बड़ा जौहर था जिसके साक्ष्य आज भी विजयमन्दिरगढ़ किले में मौजूद है यह घटना फाल्गुन वदी तीज दिन सोमवार संवत 1103 को घटित हुई थी ।
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सन् 1196ई0 में मोहम्मद गौरी ने बयाना( विजयमन्दिरगढ़) और तिमनगढं पर हमला किया जिसमे विजयपाल यदुवंशी के पीढ़ी के शासक राजा कुंवरपाल सिंह यदुवंशी के नेतृत्व में यादव सेना ने मोहम्मद गौरी की सेना का डटकर रणभूमि में मुकबला किया लेकिन पराजित होकर वहा से पलायन करना पड़ा।

इसके पश्चात वहा से पलायन कर राजा कुंवरपाल सिंह यदुवंशी ने बचे हुए यादव सेना और सामंतों के साथ चित्तौड़ में शरण ली ।

यादव रजवाड़ों ने चित्तौड़ के दुर्ग में अपने कुल देवी माँ योगमाया के भव्य मंदिर का निमार्ण करवाया जो कंकाली माता के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं।

राजा कुवंरपाल यदुवंशी के पुत्र हुए महिपाल सिंह यादव

यदुवंशी अहीरों ने राजस्थान के कोटा से 22 कि ०मी० दूर पाटन में आये तथा यहाँ तक यदुवंशी अभीरों के
14 44 गोत्र एकसाथ मौजूद थे ।


यद्य पि  करौली के जादौनों का उदय  आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध  नवीं सदी के पूर्वार्द्ध में  मथुरा के यादव शासक ब्रह्मपाल अहीर से हुआ जो दशवें अहीर राजा थे ।⬇🔄

राजा धर्मपाल बाद ईस्वी  सन्  879 में इच्छपाल (ऋच्छपाल) मथुरा के शासक हुए ।

 इनके ही दो पुत्र थे  प्रथम  पुत्र ब्रहमपाल जो मथुरा के शासक थे  हुए दूसरे पुत्र विनयपाल  जो महुबा (मध्यप्रदेश) के शासक हुए 

विजयपाल भी करौली के यादव अहीरों की जादौंन शाखा का मूल पुरुष/ आदि पुरुष/ संस्थापक विजयपाल माना गया परन्तु इतिहास में  ब्रह्मपाल ही मान्य हैं 

 विजयपाल जिसने 1040 ईस्वी में अपने राज्य की राजधानी मथुरा से हटाकर बयाना
( विजय मंदिर गढ़) को बनाया ------------


तथा यहाँ केशवराय जी के विशाल मन्दिर का निर्माण कराया इस मन्दिर के नाम से ही आज वह शहर केशवराय पाटन शहर के नाम से जाना जाता है पाटन से यादव समाज के लोग बिखर गए और राजा कुंवरपाल यदुवंशी के जेष्ठ पुत्र  महिपाल सिंह यादव के नेतृत्व में यादव वंश के 86 गोत्र नर्मदांचल में आकर बस गए और शिवपुरी में स्वतंत्र जागीर स्थापित करी।

इन्हीं 1444 गोत्रों में से एक गोत्र है ढंढोर गोत्र जो मुहम्मद गौरी से युद्ध के बाद राजस्थान से पलायन कर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के गोरखपुर, आज़मगढ़ आदि इलाकों में जा बसे।

करौली के सस्थापक कुकुर यादवों की शाखा से लोग थे

यद्यपि ये लोग चरावाहों की परम्पराओं का निर्वहन यदु को द्वारा स्थापित होने से करता थे ।

क्यों कि यदु ने कभी भी राज्य स्वीकार नहीं किया ।
वे गोप थे और हमेशा गायों  से घिरे रहते थे ।
ऋग्वेद के दशम मण्डल के 62 वें  सूक्त की दशवीं ऋचा में देखें--

" उत् दासा परिविषे स्मत्दृष्टी गोपर् ईणसा
यदुस्तुर्वशुश्च मामहे ।।ऋ०10/62/10
इतिहास लेखक मोहन दास गुप्ता ने लिखा की ये सभी भी क्षत्रिय सूचक विशेषण सिंह अपने नाम- के पश्चात् नहीं लगाते थे ।

केवल पाल विशेषण लगाते थे ।
क्यों कि ये स्वयं को गोपाल कृष्ण का वंशज मानते थे ।
गोपाल ,गोप तथा आभीर केवल यादवों के व्यवसाय परक विशेषण हैं ।
और आभीर वीरता सूचक प्रवृत्ति का सूचक है ।

करौली के मन्दिर में गाय और भेड़ यदुवंशी शासकों के पाल गोपाल रूपों का़ी -स्मृति है ।
इस लिए जादौन समाज का यह दावा निराधार व भ्रान्ति मूलक है कि अहीर यदुवंशी नहीं होते हैं ।
उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि जादौन राजस्थान में ही चारण बंजारों का रूपान्तरण है ।

अापस में सलाह करके एकत्रित होकर वृष्णि वंशीयों गोपों की स्त्रीयों सहित 
अर्जुन को परास्त कर लूट लिया ।।
महाभारत मूसल पर्व का अष्टम् अध्याय का यह 47 श्लोक है।
निश्चित रूप से यहाँ पर युद्ध की पृष्ठ-भूमि का वर्णन ही नहीं है ।

और इसी बात को बारहवीं शताब्दी में रचित ग्रन्थ -भागवत पुराण के प्रथम अध्याय स्कन्ध एक में श्लोक संख्या 20 में आभीर शब्द के स्थान पर गोप शब्द के प्रयोग द्वारा अर्जुन को परास्त कर लूट लेने की घटना का  वर्णन किया गया है ।
इसे भी देखें---
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"सो८हं नृपेन्द्र रहित: पुरुषोत्तमेन 
सख्या  प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्य: ।।
अध्वन्युरूक्रम परिग्रहम् अंग रक्षन् ।
गौपै: सद्भिरबलेव विनिर्जितो८स्मि ।२०।
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हे राजन् ! जो मेरे सखा अथवा प्रिय मित्र ---नहीं ,नहीं मेरे हृदय ही थे ; उन्हीं पुरुषोत्तम कृष्ण से मैं रहित हो गया हूँ ।
कृष्ण की पत्नीयाें को द्वारिका से अपने साथ इन्द्र-प्रस्थ लेकर आर रहा था ।
परन्तु मार्ग में दुष्ट गोपों ने मुझे एक अबला के समान हरा दिया।
और मैं अर्जुन कृष्ण की  गोपिकाओं अथवा वृष्णि वंशीयों की पत्नीयाें की रक्षा नहीं कर सका!
(श्रीमद्भगवद् पुराण अध्याय
एक श्लोक संख्या २०)
पृष्ठ संख्या --१०६ गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण देखें-

महाभारत के मूसल पर्व में गोप के स्थान पर आभीर शब्द का प्रयोग सिद्ध करता है।

कि गोप शब्द ही अहीरों का विशेषण है।तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।
भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं ।
कि "समय बड़ा बलवान होता है।
वो समय ही है जो व्यक्ति को छोटा या बड़ा बनाता है। जैसे एक बार जब महान धनुर्धर अर्जुन का समय खराब हुआ तो वह भीलों के हमले से गोपियों की रक्षा नहीं कर पाए।
पता नहीं तुलसी ने भीलों वाला अनुवाद कहाँ से किया ?

यदुवंशीयों का गोप अथवा आभीर विशेषण ही वास्तविक है ;  क्योंकि गोपालन ही इनकी शाश्वत वृत्ति (कार्य) वंश परम्परागत रूप से आज तक अवशिष्ट रूप में मिलता है ।
महाभारत के खिल-भाग हरिवंश पुराण में नन्द ही नहीं अपितु वसुदेव को गोप ही कहा गया है।
और कृष्ण का जन्म भी गोप (आभीर)के घर में बताया है ।

प्रथम दृष्ट्या तो ये देखें-- कि वसुदेव को गोप कहा है।
यहाँ हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किया जाता है ।
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"इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत ।
गावां कारणत्वज्ञ:कश्यपे शापमुत्सृजन् ।२१

येनांशेन हृता गाव: कश्यपेन महर्षिणा ।
स तेन अंशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति।२२

द्या च सा सुरभिर्नाम अदितिश्च सुरारिण:
ते८प्यमे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यत:।।२३

ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि संस्यते।
स तस्य कश्यस्यांशस्तेजसा कश्यपोपम: ।२४

वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले ।
गिरिगोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरत: ।२५।

तत्रासौ गौषु निरत: कंसस्य कर दायक:।
तस्य भार्याद्वयं जातमदिति सुरभिश्च ते ।२६।

देवकी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्यभृत् ।२७।
सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति।
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गीता प्रेस गोरखपुर की हरिवंश पुराण 'की कृति में
श्लोक संख्या क्रमश: 32,33,34,35,36,37,तथा 38 पर देखें---
अनुवादक पं० श्री राम नारायण दत्त शास्त्री पाण्डेय "राम" "ब्रह्मा जी का वचन " नामक  55 वाँ अध्याय।
उपर्युक्त संस्कृत भाषा का
अनुवादित रूप इस प्रकार है
:-हे विष्णु ! महात्मा वरुण के ऐसे वचनों को सुनकर तथा इस सन्दर्भ में समस्त ज्ञान प्राप्त करके भगवान ब्रह्मा ने कश्यप को शाप दे दिया और कहा
।२१।
कि  हे कश्यप  अापने अपने जिस तेज से  प्रभावित होकर वरुण की उन गायों का
अपहरण किया है ।
उसी पाप के प्रभाव-वश होकर तुम भूमण्डल पर तुम अहीरों (गोपों) का जन्म धारण करें ।२२।

तथा दौनों देव माता अदिति और सुरभि तुम्हारी पत्नीयाें के रूप में पृथ्वी पर तुम्हरे साथ जन्म धारण करेंगी।२३।
इस पृथ्वी पर अहीरों ( ग्वालों ) का जन्म धारण कर महर्षि कश्यप दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि सहित आनन्द पूर्वक जीवन यापन करते रहेंगे ।

हे राजन् वही कश्यप वर्तमान समय में वसुदेव गोप के नाम से प्रसिद्ध होकर पृथ्वी पर गायों की सेवा करते हुए जीवन यापन करते हैं।

मथुरा के ही समीप गोवर्धन पर्वत है; उसी पर पापी कंस के अधीन होकर वसुदेव गोकुल पर राज्य कर रहे हैं।
कश्यप की दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि ही क्रमश: देवकी और रोहिणी के नाम से अवतीर्ण हुई हैं
२४-२७।(उद्धृत सन्दर्भ --)

यादव योगेश कुमार' रोहि' की शोध श्रृंखलाओं पर आधारित---
और यही प्रकरण गायत्री परिवार के संस्थापक पं० श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा अनुवादित हरिवंश पुराण के बरेली संस्करण में है ।

पितामह ब्रह्मा की योजना नामक ३२वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या २३० अनुवादक -- पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
आचार्य   " ख्वाजा कुतुब संस्कृति संस्थान वेद नगर बरेली संस्करण)
अब कृष्ण को भी गोपों के घर में जन्म लेने वाला बताया है ।
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गोप अयनं य: कुरुते जगत: सार्वलौकिकम् ।
स कथं गां गतो देशे विष्णुर्गोपर्त्वमागत: ।।९।

अर्थात्:-जो प्रभु भूतल के सब जीवों की
रक्षा करनें में समर्थ है ।
वे ही प्रभु विष्णु इस भूतल पर आकर गोप (आभीर) क्यों हुए ? अर्थात् अहीरों के घर में जन्म क्यों ग्रहण किया ? ।९।
हरिवंश पुराण "वराह ,नृसिंह  आदि अवतार नामक १९ वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या १४४ (ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण)
सम्पादक पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य . तथा
गीता प्रेस गोरखपुर की हरिवंश पुराण की कृति में वराहोत्पत्ति वर्णन " नामक पाठ चालीसवाँ अध्याय
और इतना ही नहीं समस्त ब्राह्मणों की आराध्या ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सत्ता गायत्री भी नरेन्द्र सेन अहीर की कन्या हैं ।
और उसका वर्णन भी आभीर तथा गोप शब्द के पर्याय वाची रूप में वर्णित किया है ।
देखें--- निम्न श्लोकों में -

और अनेक भारतीय पुराणों में जैसे अग्नि- पुराण,पद्मपुराण आदि में अहीरों को देवताओं के रूप में  अवतरित किया है और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी गायत्री को भी नरेन्द्र सेन अहीर की कन्या के रूप में भी वर्णन किया गया है।
वहाँ भी अहीर (आभीर) तथा गोप शब्द परस्पर पर्याय वाची रूप में वर्णित हैं।
गोपों (अहीरों) को देवीभागवतपुराण तथा महाभारत , हरिवंश पुराण आदि मे देवताओं का अवतार बताया गया है ।
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" अंशेन त्वं पृथिव्या वै ,
प्राप्य जन्म यदो:कुले ।

भार्याभ्याँश संयुतस्तत्र ,
गोपालत्वं करिष्यसि ।१४।

अर्थात् हे कश्यप तुम  अपने अंश से तुम पृथ्वी पर गोप बनकर यादव कुल में जन्म लोग !और अपनी भार्यायों के साथ गोपालन करोगे !

अब निश्चित रूप से आभीर और गोप परस्पर पर्याय वाची रूप हैं।
यह शास्त्रीय पद्धति से प्रमाणित भी है ।
और सुनो !
गो-पालन यदु वंश की परम्परागत वृत्ति ( कार्य ) होने से ही भारतीय इतिहास में यादवों को गोप ( गो- पालन करने वाला ) कहा गया है
वैदिक काल में ही यदु को दास सम्बोधन के द्वारा असुर संस्कृति से सम्बद्ध मानकर ब्राह्मणों की अवैध वर्ण-व्यवस्था ने शूद्र श्रेणि में परिगणित किया  था ।
तो यह दोष ब्राह्मणों का ही है ।
यदु की गोप वृत्ति को प्रमाणित करने के लिए ऋग्वेद की ये ऋचा सम्यक् रूप से प्रमाण है ।

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यादव योगेश कुमार "रोहि" सम्पर्क सूत्र 8077160219..