यहाँ 'बात, हालात और लात' शीर्षक से कव्वाली शैली के रंग और तेवर के साथ द्रुपद पद (चार चरणों की शास्त्रीय बंदिश रचना) प्रस्तुत है:
बात, हालात और लात
स्थापना / मँगलाचरण (कव्वाली अलाप तेवर)
आदम की ज़ात में यहाँ, योगेश रंग हज़ार हैं,
कोई सुघर, कोई छलिया, तो कोई खुद्दार हैं!
सुनों ध्यान से अर्ज़ हमारी, जग की ये सच्चाई,
तीन तरह के लोग यहाँ पर, करते जगत-हँसाई!
चरण १ (बात वाले - स्वाभिमानी)
बात वाले जो बंदे हैं जग में, स्वाभिमान से जीते हैं,
सत्य वचन की दारू पीकर, विष हँस-हँस कर पीते हैं।
वाणी जिनकी मिश्री जैसी, सर न झुके अभिमान से,
मान-मर्यादा प्राण से प्यारी, रहते बड़े स्वाभिमान से।
चरण २ (हालात वाले - मनमानी)
हालात वाले जो बंदे हैं, अपनी मनमानी करते हैं,
जैसी बहे बयार जगत की, वैसा ही रंग धरते हैं। उनको गिरगिट के वंशज समझो!
समय देख रूप बदलते हैं, स्वार्थ की रोटी सेकें,
नियत इनकी डगमग डोले, अवसरवादी ऊँची फेकें।
चरण ३ (लात वाले - गुमानी)
लात वाले जो अज्ञानी हैं, अति गुमान में एंठे हैं,
बिना दंड के समझ न आए, सिर पर चढ़कर बैठें हैं।
अहंकार के मद में अंधे, बात किसी की न मानें,
जब तक पड़े न सिर पर ठोकर, रीति-नीति न ये जानें।
चरण ४ (आभोग / समापन)
बात वाले हैं फूल चमन के, हालातों वाले पानी,
लातों वाले हैं धूल राह की, समझे रोहि ज्ञानी!
आदमियत का भेद यही है, पहचानो हर एक नज़र,
इंसानी फ़ितरत के आगे, बेदम है हर एक हुनर!
चरण ५ (समीक्षा व चेतनावानी)
कुछ बातों के मीठे विष से, अपना काम चलाते हैं,
कुछ हालात की आड़ में छुपकर, अपना रंग दिखाते हैं।
पर लात वाले जो ढीठ यहाँ हैं, लातों से ही होश में आते हैं।
सीधे रस्ते कभी न चलते, ठोकर खाकर पहचानते।
पूरक पंक्तियाँ (कव्वाली गिरह तेवर)
बंदे! समझ ले तू भी ये रुख़, कौन सी तेरी राह है,
बात, हालात या लात की आदत, किसकी तुझको चाह है!
इंसान वही जो बात को समझे, स्वाभिमान को धार ले,
वरना ये जग लात मारकर, फिर उसे जमीन पर डार ले!
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क़व्वाली: बात, हालात और लात
(मँगलाचरण / अलाप)
आदम की ज़ात में यहाँ, योगेश रंग हज़ार हैं,
कोई सुघर, कोई छलिया, तो कई खुद्दार हैं!
सुनो ध्यान से अर्ज़ हमारी, जग की ये सच्चाई,
तीन तरह के लोग यहाँ पर, करते जगत-हँसाई!
(रदीफ़ - कोरस)
दुनिया में हैं लोग यहाँ पर, तीन तरह की ज़ात के,
कुछ हालात के मारे यहाँ, कुछ दीवाने बात के!
चरण १ (बात वाले - स्वाभिमानी)
बात वाले जो बंदे हैं जग में, स्वाभिमान से जीते हैं,
सत्य वचन की दबा पिलाकर, विष हँस-हँस कर पीते हैं।
वाणी जिनकी मिश्री जैसी, सर न झुके अभिमान से,
मान-मर्यादा प्राण से प्यारी, रहते बड़े स्वाभिमान से।
(गिरह / तकरार)
सर कटा सकते हैं लेकिन, सर झुका सकते नहीं,
बात के जो पक्के हैं, वो अपना ईमान गंवाते नहीं!
चरण २ (हालात वाले - मनमानी)
हालात वाले जो बंदे हैं, अपनी मनमानी करते हैं,
जैसी बहे बयार जगत की, वैसा ही रंग धरते हैं।
उनको गिरगिट के वंशज समझो, समय देख रूप बदलते हैं,
स्वार्थ की रोटी सेकें ये, बस ऊँची ऊँची फेंकें हैं।
चरण ३ (लात वाले - गुमानी)
लात वाले जो अज्ञानी हैं, अति गुमान में एंठे हैं,
बिना दंड के समझ न आए, सिर पर चढ़कर बैठें हैं।
अहंकार के मद में अंधे, बात किसी की न मानें,
जब तक लगे न उनको ठोकर, रीति-नीति न जानें।
चरण ४ (समीक्षा व चेतनावानी)
कुछ बातों के मीठे विष से, अपना काम चलाते हैं,
कुछ हालात की आड़ में छुपकर, अपना रंग दिखाते हैं।
पर लात वाले जो ढीठ यहाँ हैं, लातों से होश में आते हैं,
सीधे रस्ते कभी न चलते, ठोकर खाकर गिर जाते हैं।
(गिरह / चेतनावानी)
बंदे! समझ ले तू भी ये रुख़, कौन सी तेरी राह है,
बात, हालात या लात की आदत, किसकी तुझको चाह है!
इंसान वही जो बात को समझे, स्वाभिमान को धार ले,
वरना ये जग लात मारकर, सबको जमीन पर डार ले!
चरण ५ (फ़र्ज़, नीयत और बंदगी)
कर्ज़ और मर्ज़ पनपने न दें, ये ज़िंदगी के हर्ज हैं,
नीयत हो तबीयत के माकूल, लोगें की पुरानी तर्ज हैं।
आज भी कुछ एक नेक ज़माने में, जिनके लिए सबसे पहले फ़र्ज़ है,
वाहयाती प्रभु! स्वार्थीयों के जहान में ! उम्र बीत जाए मेरी, तेरे ध्यान और ज्ञान में,
तुमसे गुज़ारिशें हैं मेरी, तुमसे बस यही अर्ज़ है!
आभोग / समापन
बात वाले हैं फूल चमन के, हालातों वाले पानी,
लातों वाले हैं धूल राह की, समझे रोहि जो ज्ञानी!
आदमियत का भेद यही है, पहचानो हर एक नज़र,
इंसानी फ़ितरत के आगे, बेदम है हर एक हुनर!
भारतीय लोक संगीत धुन व राजस्थानी संगीत धुनों से युक्त कर ऑडियो जनरेट करें!
ऑडियो जनरेट करें
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