प्राचीन अवेस्तन (ईरानी) शब्दों 'वास्त्रिय' (Vāstriya) और 'हुइतिश/हुइति' (Huitiš/Huiti) के संस्कृत भाषाई रूप (समानार्थी शब्द) निम्नलिखित हैं:
  1. वास्त्रिय (Vāstriya): इसका संस्कृत रूप वास्त्रिय या वास्त्य ही है। यह मूलतः संस्कृत के 'वास्तु' (निवास या भूमि) या 'वस्' धातु (चराना/खेती) से संबंधित है। भाषाई और सामाजिक अर्थ में यह वैदिक संस्कृत के वैश्य (कृषक/पशुपालक) वर्ग के समानांतर है।
  2. हुइतिश / हुइति (Huitiš / Huiti): इसका संस्कृत रूप सूति (Sūti) है। अवेस्तन भाषा में 'ह' (h) ध्वनि अक्सर संस्कृत के 'स' (s) में बदल जाती है (जैसे: हप्त-हिंदू = सप्त-सिंधु)। क्रियात्मक और सामाजिक अर्थ में यह वैदिक संस्कृत के शूद्र (शिल्पकार/श्रमजीवी) वर्ग के समानांतर है। सूतकार- सूत्रकार 
  3. सामाजिक वर्गीकरण में तुलना:
प्राचीन भारत और प्राचीन ईरान (अवेस्ता) दोनों में समाज को समान रूप से चार मुख्य व्यावसायिक वर्गों में विभाजित किया गया था:
अवेस्तन वर्ग (इरानी)संस्कृत समतुल्य शब्दसामाजिक अर्थ / व्यवसाय
आथ्रवन (Āthravan)अथर्वन् (Atharvan)पुरोहित / ब्राह्मण वर्ग
रथएश्तार (Rathaēštar)रथेश्ठ / रथेष्ठ (Ratheṣṭha)योद्धा / क्षत्रिय वर्ग
वास्त्रिय (Vāstriya-fšuyant)वास्त्य / वैश्य (Vaiśya)कृषक, पशुपालक और भूमिपति
हुइतिश / हुइति (Huitiš)सूति / शूद्र (Śūdra)दस्तकार, शिल्पकार और श्रमिक


1. 'वास्त्रिय' (Vāstriya) का धातुगत संबंध
अवेस्तन शब्द Vāstriya (वास्त्रिय) मूल रूप से खेती, पशुपालन और चरागाह से जुड़े समाज के लिए आता है।
  • मूल भारत-ईरानी धातु: इसका निकास √wāstr- या √was- से माना जाता है, जिसका अर्थ "चराना", "बसाना" या "निवास करना" होता है।
  • संस्कृत में विकास:
    • संस्कृत में इसी धातु से 'वास्तु' (जिसका मूल अर्थ 'बसी हुई भूमि' या 'घर' है) और 'वास्तव्य' (रहने योग्य) शब्द बनते हैं।
    • खेती और चराई के संदर्भ में, भारोपीय मूल धातु *wes- (कपड़े पहनना / चराना) से संस्कृत में 'वस्त्र' और अवेस्तन में 'वास्त्र' (घास, चरागाह या कपड़ा) दोनों शब्द विकसित हुए।
    • चूँकि प्राचीन समाज में भूमि और पशुधन ही वैश्यों (तीसरे वर्ग) की मुख्य संपत्ति थे, इसलिए भूमि और चरागाह से जुड़े होने के कारण उन्हें अवेस्ता में वास्त्रिय और भारत में वास्त्य या वैश्य कहा गया।

2. 'हुइतिश' (Huitiš / Huiti) का धातुगत संबंध
अवेस्तन में Huiti (हुइति) का अर्थ श्रमजीवी, कारीगर, या शिल्पी वर्ग से है। भाषा विज्ञान में इसका संबंध सीधे संस्कृत की √सु (su) धातु से है।
  • मूल भारोपीय (PIE) धातु: यह आदि-भारोपीय धातु *seu- / *su- से आता है, जिसका अर्थ "निचोड़ना", "उत्पन्न करना", "प्रेरित करना" या "काम में लाना" होता है।
  • अवेस्तन और संस्कृत में रूप:
    • संस्कृत: संस्कृत में √सु (su) धातु से 'सूति' (उत्पत्ति, निर्माण या जन्म) और 'सूत' (शिल्पी, सारथी, या बुनकर) जैसे शब्द बनते हैं।
    • अवेस्तन: इस भाषा में 'ह' (h) और 'स' (s) का विनिमय नियम (Sound Shift) काम करता है। इसलिए संस्कृत का 'सु' अवेस्तन में 'हु' (hu) बन जाता है। इसी hu धातु में प्रत्यय लगने से 'हुइति' (Huiti) शब्द बना。
  • अर्थगत संबंध: जैसे वैदिक काल में समाज का चौथा वर्ग (शूद्र/शिल्पी) शारीरिक श्रम, हाथ की कारीगरी और भौतिक वस्तुओं के 'निर्माण या सृजन' (सूत/सूति) से जुड़ा था, ठीक उसी तरह अवेस्तन में हुइतिश वर्ग भी धातु, मिट्टी और कपड़े के शिल्पकारों (Artisans/Laborers) का प्रतिनिधित्व करता था।

💡 भाषा विज्ञान का एक और सुंदर प्रमाण: 'सोम' और 'होमा'
इस √सु और √हु धातु का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण ऋग्वेद और अवेस्ता के धार्मिक अनुष्ठानों में मिलता है:
  • ऋग्वेद में रस निकालने (निचोड़ने) की क्रिया को सूत (Suta) या सूति (Sūti) कहा जाता है और पूजनीय पौधे को सोम (Soma)।
  • अवेस्ता में इसी रस निकालने की क्रिया को हुति (Huiti) और उसी पूजनीय पौधे को हाओमा (Haoma) कहा जाता है।
इस प्रकार, 'वास्त्रिय' सीधे भूमि/चरागाह (वास्तु) से और 'हुइतिश' शारीरिक श्रम/निर्माण (सूति) से धातुगत रूप से जुड़े हुए हैं।

अवेस्ता में वास्त्रोपश्या-वस धातु मूलक है। और हुइतिश शब्द संस्कृत सूति ( वस्त्रों का सीवन करने वाला सुत्र कार ही  शूद्र है।