शनिवार, 11 जुलाई 2020

जब पूर्वाग्रह एक निष्कर्ष के तौर पर समाविष्ट होते हैं ..तब नियम बदल जाते हैं ।

मिट गये जहाँ से वे लोग
इरादे जिनके बुलन्द थे ।

गैरों की बात कौन करे !
अपनों को भी नापसन्द थे।

फितरत थी उनकी यही ।
 गुरूर में डूबे और कुन्द थे।

उजाले इल्मो तलीम के 'न हुए
आदर्शों पर पड़ी वे धुन्द थे ।

कुछ लोग कहते है ।
हमारे बारे में सुनिए ।

वे समाज में लम्पट 
और तान्त्रिक सगुनिए।

हमारी अच्छाइयों में 
बुराईयाँ दिखाते हैं ।
कहते हम ब्राह्मण की निन्दा
और कभी प्रशंसा गाते हैं।





कि हम एक तरफ तो ब्राह्मणों के ग्रन्थों का हबाला अपने बात की पुष्टिकरण में देते हैं दूसरी तरफ ब्राह्मण ग्रन्थों का खण्डन भी करते हैं ।
अस्तु इस प्रकार के उद्गार व्यक्त करने वाले अपनी भावनाओं को प्रतिबिम्बित करते हैं।
 
सुन बेटा  तेरी संवाद शैली से तेरी भावनाऐं 
प्रतिबिम्बित हो गयी हैं ।


परन्तु ऐसा करते हैं ! 
वे कभी हमारे निष्कर्षों पर नहीं पहुँचना चाहते हैं ।

ब्राह्मणों के ग्रन्थों में पूर्व काल सत्य प्रतिष्ठित था  क्योंकि लोग आध्यात्मिक भावों से ओत-प्रोत और संयमी प्रवृत्तियों से समन्वित थे ।
'परन्तु काल के प्रवाह में गंगाजल की की स्वच्छ धीरे के साथ धार्मिक कर्मकाण्ड जनित गन्दगी भी आयी वह मिलाबट जोड़ तोड़ के रूप में थी ।
ऐसा इसलिये हुआ क्यों कि संयम और आध्यात्मिक भावों के लोप होने से पुरोहितों में भोग -लिप्सा
स्वार्थ और झूँठी शान शौकत और समाज पर अपना वर्चस्व स्थापित करने मंशा लम्बे समय तक रहीं 
पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा 
गिरने वाले उठरहे थे और उठे वाले ग्रन्थ रहे थे ।

और जो कालान्तरण में धर्मशास्त्रों स्मृति आदि ग्रन्थों में वृहद्रथ की मौत के बाद !

 पुष्यमित्र सुंग के निर्देशन में बौद्धों जैनों और के विरोध स्वरूप  ब्राह्मणीय वर्चस्व के पुनरोत्थान के लिए पतंजलि आदि पुरोहितों के साथ वैदिक कर्म काण्डों की प्रतिष्ठा हुई ।

यद्यपि ब्राह्मणों का एक धड़ा जो आध्यात्मिक और दार्शनिक सिद्धान्तों का स्थापन अपने तप और साधना की परिणति के रूप में कर रहा था ।

उसे वर्ण व्यवस्था ब्राह्मण वाद या 'कर्म'काण्ड मूलक विधियों से कोई मतलब नहीं था ।

'परन्तु कुछ ब्राह्मण बौद्धों जैनों और भागवत धर्म के अनुयायीयों से अपने अपने स्तर से मुकाबला कर रहे थे ।
ग्रन्थों का लेखन भी हुआ 


मिलाबट हुई तो वही असत्य है ।
क्योंकि जो तथ्य पूर्व कल में सत्य थे उनमें पूर्वाग्रह एक निष्कर्ष के तौर पर समाविष्ट हुए । 

वे यथावत ही नहीं बने रहे उनमें कितनी जोड़-तोड़ हुई ये वक्त के खण्डरों में दफन है ।

जैसा कोई कपड़ा अपनी प्रारम्भिक क्रियाओं में नवीन और अन्तिम क्रियाओं में जीर्ण और शीर्ण हो जाता है ।

इसी प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थों में हुआ 'परन्तु मिलाबट के बावजूद  भी 
बहुत सी बाते सत्य हैं ।
क्योंकि प्रत्येक वस्तु अपनी कु निशानियाँ तो छोड़ती है ।



जैसे फूलो से रस को मधुमक्खीयाँ सहजता से निकालती हैं और मोम 🐧 अलग छोड़ देती हैं ।
उसी प्रकार  हमने भी इन ब्राह्मण ग्रन्थों से कुछ तथ्य निकाले हैं ।

अच्छाइयों और बुराईयों को प्रस्तुत करना समीक्षात्मक शैली है । 
और हमने यही अपनायी 
हमने कभी कोई भा निर्णय या निष्कर्ष स्थापित नहीं किया 
क्योंकि इसमें पूर्वाग्रह का समायोजन होता है ।

अधिकतर हमारे लेख इसी प्रकार के होते हैं ।
कारण यह है कि हम निर्णय पाठकों से आमन्त्रित करते हैं ।
इसी लिए कुछ पाठक- वृन्द प्राय: शिकायत करते हैं कि वे हमारी पोष्ट पढ़कर कन्फ्यूज होते हैं 
और कोई कोई तो बैचारा फ्यूज हो जाता है ।

वास्तव में हमारी पोष्ट सब के लिए नहीं जिसका जैसा बौद्धिक स्तर वह वहीं तक पहुँच पाता है।

प्रस्तुति-करण यादव योगेश कुमार 'रोहि'

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