बुधवार, 1 जुलाई 2020

आभीर कन्या रूपाढ्या सुनासा चारु लोचना...


राम के ब्रह्मास्त्र से समुद्र – कुक्षि के सूखने और नूतन कूप के निर्माण के माध्यम से आत्मज्ञान द्वारा देह चेतना के विनाश और आत्म-चेतना के निर्माण का चित्रण

-    राधा गुप्ता

युद्धकाण्ड (अध्याय 22) में वर्णित प्रस्तुत कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है –

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

        समुद्र के प्रति कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए राम ने जब ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया, तब समुद्र एक देवता के रूप में प्रकट हुआ और समुद्र – लंघन हेतु उपाय बताने के लिए अग्रसर हुआ। परन्तु राम ने उसे रोका और कहा कि मेरा यह बाण अमोघ है, अतः पहले यह बताईये कि इसे किस स्थान पर छोडा जाए।

        समुद्र ने कहा कि उत्तर की ओर द्रुमकुल्य नाम से विख्यात जो पवित्र देश है, वहीं आप इस बाण को सफल कीजिए। वहाँ भयानक रूप और कर्म वाले आभीर जाति के मनुष्य निवास करते हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं और उन्हीं पापाचारियों के स्पर्श से मेरा जल दूषित हो जाता है।

        समुद्र के कथनानुसार राम ने वहीं अपना बाण छोड दिया। राम के बाण से समुद्र का वह कुक्षिस्थान सूखकर मरुभूमि बन गया और वहीं एक अन्य व्रण (छिद्र) बनकर कुएँ के समान हो गया। कुएँ से निकलता हुआ वह जल भी समुद्र के जल की भाँति दिखाई देने लगा।

कथा की प्रतीकात्मकता

सर्वप्रथम प्रतीकों को समझकर कथा को समझना सहज होगा।

1-       द्रुमकुल्य देश – द्रुमकुल्य शब्द वास्तव में द्रुमकुल शब्द का ही छिपा हुआ स्वरूप है। द्रुमकुल (द्रुम – कुल) का अर्थ है – द्रुम अर्थात् वृक्ष के कुल का। मनुष्य का मन रूपी गहरा समुद्र भी ठीक वैसा ही है जैसा एक वृक्ष, अर्थात् जैसे किसी भी वृक्ष की मूल (जडें) होती हैं और तना, शाखा, पत्ते, फूल तथा फल आदि के रूप में वृक्ष विस्तार को प्राप्त करता है, उसी प्रकार मनुष्य का मन भी एक वृक्ष की भाँति होता है। संचित अनुभव, मान्यताएँ, वर्तमान सूचनाओं पर आधारित ज्ञान तथा इन तीनों के समन्वय से निर्मित हुई चेतना (शरीर – चेतना अथवा आत्म – चेतना) उस मन रूपी वृक्ष की मूल (जडें) होती हैं तथा विचार, भाव, दृष्टिकोण, कर्म, आदतें, दृष्टि, व्यक्तित्व और भाग्य उस मन रूपी वृक्ष के तने, शाखा, पत्ते, फूल तथा फल आदि होते हैं। मन रूपी द्रुमकुल देश को निम्नांकित तालिका से भलीभाँति समझा जा सकता है।

 



यह तालिका एक वृक्ष की भाँति है, इसीलिए इसे द्रुमकुल देश कहकर संकेतित किया गया है।

2 – आभीर जाति के स्पर्श से समुद्र के जल का दूषित होना –

आभीर (आ – भियं – राति) शब्द का अर्थ है – चारों ओर से (आ) भय को (भयं) देने वाला (राति)। देह – चेतना (मैं शरीर हूँ – इस अहसार में स्थित) को ही यहाँ द्रुमकुल्य देश की आभीर जाति कहकर संकेतित किया गया है क्योंकि देह चेतना ही मनुष्य को चारों ओर से भय प्रदान करती है। मृत्यु का भय, व्यक्तियों और वस्तुओं को खोने का भय, सुरक्षा का भय, मान – सम्मान को गंवाने का भय तथा आधि – व्याधि का भय आदि अनेक प्रकार के भय हैं जिनसे मनुष्य निरन्तर ग्रस्त रहता है।

   कथा संकेत करती है कि देह – चेतना में रहते हुए उपर्युक्त भयों से ग्रस्त रहने के कारण मन रूपी समुद्र का व

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