बुधवार, 21 मार्च 2018

गोप अयनं य: कुरुते जगत: सार्वलौकिकम् । स कथं गां गतो देशे विष्णुर्गोपर्त्वमागत: ।।12। (  हरिवंश पुराण अध्याय 40 वराहोत्पत्ति श्लोक संख्या 12 गीता प्रेस से प्रकाशित कृति में ) अर्थात्:-जो प्रभु भूतल के सब जीवों की रक्षा करनें में समर्थ है । वे ही प्रभु विष्णु इस भूतल पर आकर गोप (आभीर) क्यों हुए ? ।९।


प्राय:  कुछ रूढ़िवादी ब्राह्मण अथवा राजपूत समुदाय के लोग यादवों को आभीरों (गोपों) से पृथक बताने वाले
महाभारत के मूसल पर्व अष्टम् अध्याय से
यह प्रक्षिप्त (नकली)श्लोक उद्धृत करते हैं ।
और यह कहते फिरते हैं कि अहीरों ने यादव उपाधि जादौन ठाकुरों की चुरा ली है ।
और महाभारत का यह प्रक्षिप्त नकली श्लोक भी दिखाते हैं ।
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ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहतचेतस: ।
आभीरा मन्त्रामासु: समेत्याशुभ दर्शना: ।। ४७।
अर्थात्  वे पापकर्म करने वाले तथा लोभ से पतित चित्त वाले ! अशुभ -दर्शन अहीरों ने एकत्रित होकर वृष्णि वंशी यादवों को लूटने की  सलाह की ।४७।

अब इसी बात को  बारहवीं शताब्दी में रचित ग्रन्थ श्री-मद्भगवद् पुराण के प्रथम अध्याय में आभीर शब्द के स्थान पर गोप शब्द के सम्बोधन द्वारा कहा गया है ।
इसे भी देखें---और तुलना करें
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"सो८हं नृपेन्द्र रहित: पुरुषोत्तमेन । 
सख्या  प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्य: ।।
अध्वन्युरूक्रम परिग्रहम् अंग रक्षन् ।
गौपै: सद्भिरबलेव विनिर्जितो८स्मि ।२०।
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हे राजन् ! जो मेरे सखा अथवा -प्रिय मित्र -नहीं ,नहीं मेरे हृदय ही थे ; उन्हीं पुरुषोत्तम कृष्ण से मैं रहित हो गया हूँ  ; कृष्ण की पत्नीयाें को द्वारिका से अपने साथ इन्द्र-प्रस्थ लेकर आर रहा था ।
परन्तु मार्ग में दुष्ट गोपों ने मुझे एक अबला के समान हरा दिया ।
और मैं अर्जुन उनकी गोपिकाओं तथा वृष्णि वंशीयों की पत्नीयाें की रक्षा नहीं कर सका !
(  श्रीमद्भगवद् पुराण अध्याय प्रथम की श्लोक संख्या २०(पृष्ट संख्या --१०६ पर गीता प्रेस गोरखपुर  संस्करण में यह प्रक्षिप्त (नकली)  उद्धृत है ।-
जिसमें गोपिकाओं को ही गोप लूटते हुए वर्णित कर दरसाए  गये हैं ।
अब महाभारत के मूसल पर्व में भागवतपुराण के  गोप शब्द  के स्थान पर आभीर शब्द का प्रयोग सिद्ध करता है ; कि गोप ही आभीर (अहीर )हैं ।
बारहवीं सदी में लिपिबद्ध ग्रन्थ श्रीमद्भागवत् पुराण में अहीरों या गोपों  को बाहर से आया बताया गया वह भी शक सिथियन तथा यूनानीयों के साथ।
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    किरात हूणान्ध्र पुलिन्द पुलकसा:
   आभीर शका यवना खशादय :।
येsन्यत्र पापा यदुपाश्रयाश्रया शुध्यन्ति
तस्यै प्रभविष्णवे नम:।
(श्रीमद्भागवत् पुराण-- २/४/१८)
अर्थात् किरात, हूण ,पुलिन्द ,पुलकस तथा आभीर , शक, यवन ( यूनानी) ,खश आदि जन-जातियाँ तथा अन्य जन-जातियाँ यदुपति कृष्ण के आश्रय में आकर शुद्ध हो गयीं ; उस प्रभाव शाली कृष्ण को नमस्कार है।
श्रीमद्भागवत् पुराण-- २/४/१८
फिर महाभारत के  मूसल पर्व में वर्णित अभीर कहाँ से आ गये ।
यदि महाभारत को हम पाँच हजार वर्ष से भी प्रचीन ग्रन्थ माना तो  और वाल्मीकि-रामायण को पात्र राम , वाल्मीकि आदि तो त्रेता युग  में थे ।
जिसे इतिहास कारों ने आज से सात हजार वर्ष पूर्व निर्धारित किया है । और रूढ़ि वादी ब्राह्मण परम्पराऐं तो आज से नौ लाख वर्ष सिद्ध करने की कोशिश कर की हैं । ये सभी ग्रन्थ केवल बुद्ध को परवर्ती काल खण्ड की रचनाऐं हैं।
महाभारत का मूसल पर्व और वाल्मीकि-रामायण का अन्तिम उत्तर काण्ड धूर्त और मूर्खों की ही रचनाऐं हैं।
क्योंकि इन दौनों काण्ड या पर्वों में दार्शिनिक सिद्धान्तों की धज्जियाँ उड़ाई गयीं है ।
महाभारत के मूसल पर्व में  गायों से गदहा और खच्चरियों से हाथी तथा कुत्तों से विलौटा भी उत्पन्न होते हैं।
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व्यजानयन्त खरा गोषु करभा८श्वतरीषु च ।
शुनीष्वापि बिडालश्च मूषिका नकुलीषु च।९।
अर्थात् गायों के पेट से गदहे तथा खच्चरियों से हाथी । कुतिया से बिलोटा ,और नेवलियों के गर्भ से चूहा उत्पन्न होने लगे ।
(महाभारत मूसल पर्व द्वित्तीय अध्याय)
यहाँ "समान प्रसवात्मिका इति जाति ज्ञेयो "
वाला न्याय दर्शन का सिद्धान्त खण्डित हो गया ।

और वाल्मीकि-रामायण के उत्तर काण्ड में शम्बूक वध प्रकरण में कर्म - सिद्धान्त खण्डित हो जाता है ।
महाभारत के मूसल पर्व में कृष्ण की सोलह हजार पत्नियों का पति होने  का भी उल्लेख भागवतपुराण के ही समान है ।
ये सभी बातें सिद्धान्त हीन व विना सिर पैर की हैं ।
अब  हम यह प्रतिपादित करते हैं कि महाभारत के ही खिल-भाग( अवशिष्ट) समझे जाने वाले
हरिवंश पुराण में  नन्द को ही नहीं अपितु वसुदेव को भी  गोप ही कहा गया है।
और कृष्ण का जन्म भी गोप (आभीर) जन-जाति में हुआ था; एेसा वर्णन है ।
प्रथम दृष्ट्या तो यही  देखें-- कि वसुदेव को गोप कहा है
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  "इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत ।
गावां कारणत्वज्ञ:कश्यपे शापमुत्सृजन् ।२१
येनांशेन हृता गाव: कश्यपेन महर्षिणा ।
स तेन अंशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति।२२
द्या च सा सुरभिर्नाम अदितिश्च सुरारिण:
ते८प्यमे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यत:।।२३
ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि संस्यते।
स तस्य कश्यस्यांशस्तेजसा कश्यपोपम: ।२४
वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले ।
गिरिगोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरत: ।२५।
तत्रासौ गौषु निरत: कंसस्य कर दायक:।
तस्य भार्याद्वयं जातमदिति सुरभिश्च ते ।२६।
देवकी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्यभृत् ।२७।
सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति।

गीता प्रेस गोरखपुर की हरिवंश पुराण 'की कृति में
श्लोक संख्या क्रमश: 32,33,34,35,36,37,तथा 38 पर देखें--- अनुवादक पं० श्री राम नारायण दत्त शास्त्री पाण्डेय "राम" "ब्रह्मा जी का वचन " नामक  55 वाँ अध्याय।
______________हिन्दी-अनुवाद________________

  :-हे विष्णु ! महात्मा वरुण के ऐसे वचनों को सुनकर तथा इस सन्दर्भ में समस्त ज्ञान प्राप्त करके भगवान ब्रह्मा ने कश्यप को शाप दे दिया और कहा
।२१। कि  हे कश्यप  अापने अपने जिस तेज से  प्रभावित होकर उन गायों का अपहरण किया ।
उसी पाप के प्रभाव-वश होकर भूमण्डल पर तुम अहीरों (गोपों) का जन्म धारण करें ।२२।
तथा दौनों देव माता अदिति और सुरभि तुम्हारी पत्नीयाें के रूप में पृथ्वी पर तुम्हरे साथ जन्म धारण करेंगी।२३।
इस पृथ्वी पर अहीरों ( ग्वालों ) का जन्म धारण कर महर्षि कश्यप दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि सहित आनन्द पूर्वक जीवन यापन करते रहेंगे ।
हे राजन् वही कश्यप वर्तमान समय में वसुदेव गोप के नाम से प्रसिद्ध होकर पृथ्वी पर गायों की सेवा करते हुए जीवन यापन करते हैं।
मथुरा के ही समीप गोवर्धन पर्वत है; उसी पर पापी कंस के अधीन होकर वसुदेव गोकुल पर राज्य कर रहे हैं।
कश्यप की दौनों पत्नीयाें अदिति और सुरभि ही क्रमश: देवकी और रोहिणी के नाम से अवतीर्ण हुई हैं
२४-२७।(उद्धृत सन्दर्भ --)
पितामह ब्रह्मा की योजना नामक ३२वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या २३० अनुवादक -- पं० श्रीराम शर्मा आचार्य    " ख्वाजा कुतुब संस्कृति संस्थान वेद नगर बरेली संस्करण)
और इतना ही नहीं यहाँ तो  कृष्ण को भी गोपों के ही घर में जन्म लेने वाला बताया है ।
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गोप अयनं य: कुरुते जगत: सार्वलौकिकम् ।
स कथं गां गतो देशे विष्णुर्गोपर्त्वमागत: ।।९।
(  हरिवंश पुराण अध्याय 40 वराहोत्पत्ति
श्लोक संख्या 12 गीता प्रेस से प्रकाशित कृति में )
अर्थात्:-जो प्रभु भूतल के सब जीवों की
रक्षा करनें में समर्थ है ।
वे ही प्रभु विष्णु इस भूतल पर आकर गोप (आभीर) क्यों हुए ? ।९।
और यही बात गायत्री परिवार के संस्थापक पं० श्री राम शर्मा ने भी कही (हरिवंश पुराण "वराह ,नृसिंह  आदि अवतार नामक १९ वाँ अध्याय पृष्ठ संख्या १४४ (संस्कृति - संस्थान ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण)
सम्पादक पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य .गीता प्रेस गोरखपुर की हरिवंश पुराण की कृति में वराहोत्पत्ति वर्णन " नामक पाठ चालीसवाँ अध्याय
पृष्ठ संख्या (182) श्लोक संख्या (12) पर कृष्ण को अहीरों को घर में ही जन्मा सिद्ध किया है ।
अब निश्चित रूप से आभीर और गोप परस्पर पर्याय वाची रूप हैं; यह हमने शास्त्रीय पद्धति से भी प्रमाणित किया  है । अब दुर्भाग्य से मन्द बुद्धि वाले पुष्यमित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मणों ने स्मृति-ग्रन्थों में गोपों को शूद्र कह कर ही  वर्णित किया गया है।
यह भी देखें-व्यास -स्मृति )तथा  सम्वर्त -स्मृति में एक स्थान पर लिखा है :-
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" क्षत्रियात् शूद्र कन्यानाम् समुत्पन्नस्तु य: सुत: ।
स गोपाल इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशय: ।।
अर्थात् क्षत्रिय से शूद्र की कन्या में उत्पन्न होने वाला पुत्र गोपाल अथवा गोप होता है ।
और विप्रों के द्वारा उनके यहाँ भोजान्न होता है इसमें संशय नहीं .... पाराशर-स्मृति लिखने वाले ने तो सारी सरहदें ही पार कर दीं कि जिन गोपों के घर जन्म लेने वाले कृष्ण हुए उन गोपों को ही शूद्र घोषित करने की असफल चेष्टा भी कर डाली देखें--- निम्न श्लोक
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वर्द्धकी नापितो गोप: आशाप: कुम्भकारक: ।
वणिक् किरात: कायस्थ: मालाकार: कुटुम्बिन: एते चान्ये च बहव शूद्र:भिन्न स्व कर्मभि: चर्मकारो भटो भिल्लो रजक: पुष्करो नट: वरटो मेद। चाण्डालदास श्वपचकोलका: ।।११।।
एतेsन्त्यजा समाख्याता ये चान्ये च गवार्शना:
एषां सम्भाषणाद् स्नानंदर्शनादर्क वीक्षणम् ।।१२।। 
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  वर्द्धकी (बढ़ई) , नाई , गोप , आशाप , कुम्हार ,वणिक् ,किरात , कायस्थ, माली , कुटुम्बिन, ये सब अपने कर्मों से भिन्न बहुत से शूद्र हैं ।
चमार ,भट, भील ,धोवी, पुष्कर, नट, वरट, मेद , चाण्डाल ,दाश, श्वपच , तथा कोल (कोरिया)ये सब अन्त्यज कहे जाते हैं ।
और अन्य जो गो-भक्षक हैं ; वे भी अन्त्यज होते हैं । इनके साथ सम्भाषण करने पर स्नान कर सूर्य दर्शन  करना चाहिए तब शुद्धि  होती है ।
नीचे भी ऐसे ही कुछ श्लोक हैं ।
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अभोज्यान्ना:स्युरन्नादो यस्य य: स्यात्स तत्सम: नापितान्वयपित्रार्द्ध सीरणो दास गोपका:।।४९।। शूद्राणामप्योषान्तु भुक्त्वाsन्न नैव दुष्यति ।
धर्मेणान्योन्य भोज्यान्ना द्विजास्तु विदितान्वया:।५०।।                                             (व्यास-स्मृति)
नाई वंश परम्परा व मित्र ,अर्धसीरी ,दास ,तथा गोप ,ये सब शूद्र हैं । तो भी इन शूद्रों के अन्न को खाकर दूषित नहीं होते ।।
जिनके वंश का ज्ञान है ;एेसे द्विज धर्म से परस्पर में भोजन के योग्य अन्न वाले होते हैं ।५०।
(व्यास- स्मृति प्रथम अध्याय श्लोक ११-१२)  स्मृतियों की रचना काशी में हुई ,
वर्ण-व्यवस्था का पुन: दृढ़ता से विधान पारित करने के लिए काशी के इन ब्राह्मणों ने रूढ़ि वादी पृथाओं के पुन: संचालन हेतु स्मृति -ग्रन्थों की रचना की जो पुष्यमित्र सुंग की परम्पराओं के अनुगामी थे । यह बात निम्न श्लोक से ही ध्वनित है।
देखें-निम्न श्लोक दृष्टव्य है इस सन्दर्भ में..
" वाराणस्यां सुखासीनं वेद व्यास तपोनिधिम् । पप्रच्छुमुर्नयोSभ्येत्य धर्मान् वर्णव्यवस्थितान् ।।१।।
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अर्थात् वाराणसी में सुख-पूर्वक बैठे हुए तप की खान वेद व्यास से ऋषियों ने वर्ण-व्यवस्था के धर्मों को पूछा ।
निश्चित रूप इन विरोधाभासी तथ्यों से ब्राह्मणों के विद्वत्व की पोल खुल गयी है ।
जिन्होंने योजना बद्ध विधि से समाज में ब्राह्मण वर्चस्व स्थापित कर के लिए सारे -ग्रन्थों पर व्यास की मौहर लगाकर अपना ही स्वार्थ सिद्ध किया है ।
ये सारी हास्यास्पद व विकृतिपूर्ण अभिव्यञ्जनाऐं पुष्यमित्र सुंग के अनुयायी ब्राह्मणों की हैं।
समाज में अव्यवस्था उत्पन्न करने में इनके आडम्बरीय रूप का ही योगदान है ।

     अब कोई बुद्धि जीव् बताए कि हिन्दू धर्म के नाम पर कोई यादव ये मिथ्या कपोल - कल्पित मान्यता ऐं क्यों स्वीकार करे !
सभी यादवों को श्रीमद्भगवद् गीता पर आधारित धर्म भागवद् - धर्म मान्य कर ग्रहण करना चाहिए और केवल और केवल सभा -ग्रन्थों को त्याग कर श्रीमद्भगवद् गीता को अपना धर्म ग्रन्थ स्वीकार करना चाहिए ।
यही यादवों का धर्म-ग्रन्थ हो और इससे सम्बद्ध श्रीमद्भागवत धर्म ।
यहाँ भागवतपुराण का कोई स्थान नहीं है ।
क्योंकि ये तो पाखण्डीयों का काम शास्त्रीय पद्धति पर लिखित ग्रन्थ है ।
यह  प्रेरणाऐं प्रो० राम शिरोमणि यादव व
भाई वी० कुमार यादव  से अनुग्रहीत हैं ।
      विचारक :- यादव योगेश कुमार 'रोहि

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