बुधवार, 28 जनवरी 2026

आह्लाद- उदयबल

भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय ४ 

देशराज एवं वत्सराज आदि राजाओं का आविर्भाव -
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सूतजी ने कहा — भोजराज के स्वर्गारोहण के पश्चात् उनके वंश में सात राजा हुए, किन्तु अल्पायु होने के नाते उन भाग्यहीनों का राजकाल तीन सौ वर्ष के भीतर ही समाप्त हो गया और वे स्वर्गीय होते गये। 

उनके राज्य के अन्तर्गत छोटे-छोटे अनेक राजा हुए । उनके कुल के सातवें राजा का नाम वीरसिंह बताया जाता है । उनके कुल के तीन राजा दो सौ वर्ष के अन्तर्गत स्वर्गीय हो गये थे । दशवें राजा का नाम गंगा सिंह बताया जाता है, जिसने कल्पक्षेत्र में अपने राज्य का धर्मतः उपभोग किया है । अन्तर्वेदी नामक कान्यकुब्ज प्रदेश में जयचन्द्र नामक राजा हुआ तथा इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) में तोमर कुलभूषण अनंगपाल नामक राजा हुआ । इसी भाँति ग्राम-राष्ट्रपाल (जमीदार-तालुकेदार) के रूप में अनेक राजा हुए अग्निवंश का बलवत्तर विस्तार हुआ है । पूर्व में कपिलाश्रम (गङगासागर), पश्चिम में वाहीकान्त उत्तर में चीन के अन्त तक और दक्षिण में सेतुबन्ध तक विस्तृत भूमि में साठ लाख बलवान ग्रामाधिप (जमीदार-तालुकेदार) हुए हैं, जो अग्निहोत्र करने वाले तथा गो-ब्राह्मण के हितैषी थे । उन धर्मकुशल राजाओं के समय में द्वापर के समान ही धर्म का प्रचार था, इसी से सभी स्थानों में द्वापर के समय का ही अनुभव हो रहा था । सभी घरों में धन था, प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक थे, गाँव-गाँव में देवता प्रतिष्ठित थे और देश-देश में यज्ञानुष्ठान का महारम्भ हुआ था । उस समय चारों ओर म्लेच्छ राजा आर्य-धर्म के ही अनुयायी थे ।

इसे देखकर घोर कलि म्लेच्छ समेत अत्यन्त भीरु होकर नीलांचल पर पहुँचकर उस बुद्धिमान् ने भगवान् की शरण ली । वहाँ उसने बारह वर्ष तक ध्यानयोग किया-अपने ध्यान में सच्चिदानन्द एवं सनातन भगवान् कृष्ण को देखकर उसने राधा समेत उन भगवान् को मानसिक स्तुति द्वारा प्रसन्न किया जो पुराण (प्राचीन) रूप, अजर और नित्य वृन्दावन में निवास करते हैं । कलि ने कहा — स्वामिन् ! मेरे किये हुए साष्टांग दण्डवत् को आप स्वीकार करें । कृपानिधान ! मैं आपके चरण की शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये । आप समस्त पापों के नाशक तथा समस्त काल रूप भगवान् हैं । आप का रूप सत्ययुग में गौर, त्रेता में रक्तवर्ण, द्वापर में पीतवर्ण और मेरे समय सौभाग्यवश आप कृष्णरूप हैं । 

मेरे पुत्र जिन्हें म्लेच्छ कहा जाता है, आर्यधर्म के अनुयायी हो गये हैं । स्वामिन् ! मेरे लिए चार घरों का निर्माण किया गया है — द्यूत (जूआ खेलने का स्थान) मद्य का स्थान, सुवर्ण-स्थान, और स्त्रियों के हास्य। इन्हें अग्निवंश के क्षत्रियों ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है । जनार्दन ! मैं इस समय देह, कुल और राष्ट्र का त्यागकर आपके चरणकमल में स्थित हूँ । यह सुनकर भगवान् कृष्ण ने मन्दमुस्कान करते हुए कहा — कले ! तुम्हारी रक्षा के लिए महाबली मैं उत्पन्न होऊँगा । वहाँ मेरा अंश भूतल में पहुँचकर उन बलशाली राजाओं का विनाश करके महीतल में म्लेच्छ वंश के राजाओं की प्रतिष्ठा करेंगे। इतना कहकर भगवान् उसी स्थान पर अन्तर्हित हो गये और म्लेच्छ समेत कलि को परम आनन्द की प्राप्ति हुई ।
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उस बीच विप्र ! जो घटना घटी मैं बता रहा हूँ, सुनो ! बाक्सर (बक्सर) नामक गाँव में एक व्रतपा नाम की आभीरी (अहीराणी) रहती थी, जिसने नव वर्ष तक अनवरत श्रीदुर्गा जी की उपासना की थी । प्रसन्न होकर उससे चण्डिका देवी ने कहा — शोभने ! वर की याचना करो । आभीरी ने कहा — मातः ! यदि आपको वर प्रदान करना है, तो ईश्वरि (स्वामिनि) मेरे कुल में बलराम और कृष्ण के समान दो बलशाली बालकों की उत्पत्ति हो ।’ इसे स्वीकार करके देवी उसी स्थान पर अन्तर्हित हो गई । वसुमान् नामक एक राजा ने उसके रूप-लावण्य पर मुग्ध होकर उसके साथ धार्मिक विवाह संस्कार सुसम्पन्न करके उसे अपने महल में रख लिया । उस राजा के उस रानी द्वारा ज्येष्ठ देशराज और कनिष्ठ वत्सराज नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए, जो सौ हाथी के समान बलवान् थे । उन दोनों ने मगध के राजा पर विजय प्राप्तकर वहाँ के राजा हो गये ।

वनरस के अधिपति शतयत्त (सैयद) नामक म्लेच्छ अत्यन्त शूर था । उसके शिव की आज्ञावश भीमसेन के अंश से उत्पन्न, वीरण नामक पुत्र हुआ । एक म्लेच्छ ताड़ के बराबर ऊँचाई तक कूदता था इसीलिए उसका तालन नाम रखा गया था । उस समय उससे सैयद का रोमांचकारी युद्ध आरम्भ हुआ । उसमें बलवान् होने के नाते तालन की विजय हुई । पश्चात्, आपस में मित्रता करके वे तीनों शूर जयचन्द्र की परीक्षा के लिए उनके यहाँ गये । (अध्याय ४) 


एतस्मिन्नन्तरे विप्र यथा जातं शृणुष्व तत् ।।
आभीरी वाक्सरे ग्रामे व्रतपा नाम विश्रुता ।।२२।।
अनुवाद- इसके उपरान्त( मध्य ) हे ब्राह्मण जो हुआ वह सुन ! बक्सर (आधुनिक बिहार का एक जिला) नामक गाँव में एक व्रतपा नामकी अहीराणी प्रसिद्ध थी।२२।

नवदुर्गाव्रतं श्रेष्ठं ? नववर्षं चकार ह ।।
प्रसन्ना चण्डिका प्राह वरं वरय शोभने ।।२३ ।।
अनुवाद- उसने नवदुर्गा का व्रत नौ वर्ष तक किया तत्पश्चात प्रसन्न हो कर देवी दुर्गा ने उससे कहा हे प्रिया ! वरदान माँग ।२३।

साह तां यदि मे मातर्वरो देयस्त्वयेश्वरि।।
रामकृष्णसमौ बालौ भवेयाः ममान्वये।।२४ ।।
अनुवाद- तब व्रतपा ने कहा ! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो हे देवी बलराम और कृष्ण के समान दो पुत्र मेरे वंश में उत्पन्न हों ।२४।

तथेत्युक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत।।
वसुमान्नाम नृपतिस्तस्या रूपेण मोहितः।।२५।।
अनुवाद - ऐसा ही हो कहकर वह देवी अन्तर् ध्यान हो गयी  वसुमान नामक राजा ने उस व्रतपा के रूप पर मोहित होकर उसके साथ विवाह किया।२५।
 
उद्वाह्य धर्मतो भूपः स्वगेहे तामवासयत् ।।
तस्यां जातौ नृपात्पुत्रौ देशराजस्तु तद्वरः।२६।।
अनुवाद:-विवाह कर धर्म पूर्वक वह राजा उसे अपने घर ले जाकर प्रसन्नता पूर्वक रहने लगा। उस व्रतपा के गर्भ से उस वसुमान राजा के दो श्रेष्ठ पुत्र देशराज और वत्सराज हुए  ।२६।

आवार्य वत्सराजश्च शतहस्तिसमो बले ।।
जित्वा तौ मागधान्देशान्राज्यवन्तौ बभूवतुः।२७।।
अनुवाद- उन दोनों ( व्रतपा और वसुमान) उत्पन्न हुए उन दोनों नें  मगध( पश्चिमी बिहार) को जीतकर उस पर शासन किया ।२७।

इति श्रीभविष्ये महापुराणे प्रतिसर्गपर्वणि चतुर्युगखण्डापरपर्याये कलियुगीयेतिहासमुच्चये चतुर्थोऽध्यायः।।४।।



भविष्यपुराणम् /पर्व ३ (प्रतिसर्गपर्व)/खण्डः ३/अध्यायः ०९

             ।। सूत उवाच ।। 
कालियं तौ पराजित्य भ्रातरौ नृपसेवकौ ।।
गतौ गोपालके राष्ट्रे भूपतिर्दलवाहनः ।।१।।


सहस्रचण्डिकाहोमे नानाभूपसमागमे ।।
गृहीतौ महिषौ ताभ्यां भूपैरन्यैश्च दुर्जयौ ।। २ ।।


पूर्वं हि नृपकन्याभ्यां प्रत्यहं बन्धनं गतौ ।।
तौ सम्पूज्य विधानेन ददौ ताभ्यां च कन्यके ।।३।।


देवकीं देशराजाय ब्राह्मीं तस्यानुजाय वै ।।
ददौ दुर्गाज्ञया राजा रूपयौवनशालिनीम् ।। ४ ।।


लक्षावृत्तिं तथा वेश्यां गीतनृत्यविशारदाम् ।।
कन्ययोश्च सखीं रम्यां मेघमल्लाररागिणीम् ।।५।।


शतं गजान्रथान्पञ्च हयांश्चैव सहस्रकान् ।।
चत्वारिंशच्च शिबिकाः प्रददौ दलवाहनः ।। ६ ।।


बहुद्रव्ययुतां कन्यां दासदासीसमन्विताम् ।।
उदूह्य वेदविधिना प्रापतुश्च महावतीम् ।। ७ ।।


मलना तां वधूं दृष्ट्वा तस्यै ग्रैवेयकं ददौ ।।
ब्राह्म्यै षोडशशृंगारं तथा द्वादशभूषणम् ।।८।।


राजा च परमानन्दी देशराजाय शूरिणे ।।
ददौ दशपुरं रम्यं नानाजननिषेवितम् ।। ९ ।।


ऊषतुस्तत्र तौ वीरौ राजमान्यौ महाबलौ ।।
एतस्मिन्नन्तरे जातो देवसिंहो हराज्ञया ।। 3.3.9.१० ।।


जाते तस्मिन्कुमारे तु देवकी गर्भमादधौ ।।
दासश्रुता पतेर्देवी सुषुवे पुत्रमूर्जितम् ।। १ १।।


गौरांगं कमलाक्षं च दीप्यमानं स्वतेजसा ।।
तदानंदमयो देवः शक्रः सुरगणैः सह ।। १२ ।।


शंखशब्दं चकारोच्चैर्जयशब्दं पुनःपुनः ।।
दिशः प्रफुल्लिताश्चासन्ग्रहाः सर्वे तथा दिवि ।।१३।।


आयाता बहवो विप्रा वेदशास्त्रपरायणाः ।।
चक्रुस्ते जातकर्मास्य नामकर्म तथाविधम् ।।१४।।


रामांशं तं शिशुं ज्ञात्वा प्रसन्नवदनं शुभम् ।।
भाद्रकृष्णतिथौ षष्ठ्यां चन्द्रवारेऽरुणोदये ।।१५।।


संजातः कृत्तिकाभे च पितृवंशयशस्करः ।।
आह्लादनाम्ना ह्यभवत्प्रश्रितश्च महीतले ।। १६ ।।


मासान्ते च सुते जाते ब्राह्मी पुत्रमजीजनत् ।।
धर्मजांशं तथा गौरं महाबाहुं सुवक्षसम् ।। १७ ।।


तदा च ब्राह्मणाः सर्वे दृष्ट्वा बालं शुभाननम् ।।
प्रसन्नवदनं चारुं पद्मचिह्नपदस्थितम् ।। १८ ।।


तैर्द्विजैश्च कृतो नाम्ना बलखानिर्महाबलः ।।
वर्षान्ते वत्सजे जातं मूलगण्डान्तसम्भवः ।।१९ ।।


चामुण्डो देवकिसुतो निजवंशभयंकरः ।।
जनितारं ततस्त्याज्य इत्यूचुर्द्विजसत्तमाः ।।
न तत्याज सुतं राजा बालत्वेऽपि दयापरः ।। 3.3.9.२० ।।


त्रिवर्षांते गते तस्मिन्बलखानौ सुते शुभे ।।
शूद्र्यां जातः शिखण्डयंशो रूपणो नाम विश्रुतः ।। २१ ।।


वत्सराजो ययौ देशे गुर्जरे च मदालसाम्।
स सुतां च समादाय दिने तस्मिन्समागतः ।। २२।।


प्राप्ते तस्मिन्वत्सराजे जम्बुकः स्वबलैर्वृतः ।।
सप्तलक्षैश्च संप्राप्तो बाहुशाली यतेंद्रियः ।। २३ ।।


रुरोध नगरीं सर्वां राज्ञः परिमलस्य वै ।।
त्रिलक्षैश्च माहावत्यै सार्द्धं तौ जग्मतुः पुरात् ।। २४।।


माहिष्मतैः सप्तलक्षैः सार्द्धं युद्धमभून्महत् ।।
त्रिरात्रं दारुणं घोरं यमराष्ट्रविवर्द्धनम् ।। २५ ।।


शिवस्य वरदानेन भ्रात्रोर्जातः पराजयः ।।
बद्ध्वा तौ जम्बुको राजा लुण्ठयित्वा महावतीम् ।। २६ ।।


वेश्यां लक्षारतिं तस्य तं हतं तद्गजं तथा ।।
ग्रैवेयकं तथा हारं मणिरत्नविभूषितम् ।।२७।।


गृहीत्वा नगरीं सर्वां भस्मयित्वा गृहं ययौ ।।
ये गुप्ता भूतले शूरास्ते शेषाश्च तदाऽभवन् ।।२८।।


दुर्गेषु यानि रत्नानि तानि प्राप्य मुदा ययौ ।।
लुंठिते नगरे तस्मिन्देवकी गर्भमुत्तमम् ।। २९ ।।


कृष्णांशं सप्तमास्यं हि चादधाद्दैवतप्रिया ।।
ज्ञात्वा कुलाधमं पुत्रं चामुण्डं देवकी सती ।। 3.3.9.३० ।।


कल्पक्षेत्रं समागम्य कालिन्द्यां तमपातयत्।।
योजनान्ते गते तस्मित्महीराजपुरोहितः ।।३१।।


सामन्तो नाम तं गृह्य श्वशुरालयमाययौ ।।
जातस्तु दशमासान्ते रात्रौ घोरतमोवृते ।। ३२ ।।


भाद्रकृष्णाष्टमीसौम्ये ब्राह्मनक्षत्रसंयुते ।।
प्रादुरासीज्जगन्नाथो देवक्यां च महोत्तमः ।। ३३ ।।


श्यामांगः स च पद्माक्ष इंद्रनीलमणिद्युतिः ।।
विमानानां सहस्राणां प्रकाशः समजायत ।। ३४ ।।


विस्मिता जननी तत्र दृष्ट्वा बालं तमद्भुतम् ।।
नगरे च महाश्चर्यं जातं सर्वे समाययुः ।। ३५ ।।


उदयः किमहो जातो देवानां सूर्यरूपकः ।।
इत्याश्चर्य्यजुजां तेषां वागुवाचाशरीरिणी ।। ३६ ।।


कृष्णांशो भूतले जातः सर्वानन्दप्रदायकः ।।
स नाम्नोदयसिंहो हि सर्वशत्रुप्रकाशहा ।। ३७ ।।


इत्याकाशवचः श्रुत्वा ते परं हर्ष माययुः ।।
यस्मिन्काले सुतो जातस्तदा च मलना सती ।।३८।।


श्यामांगं सुन्दरं बालं सर्वलक्षणलक्षितम् ।।
सुषुवे परमोदारं फाल्गुनांशं शिवाज्ञया ।। ३९ ।।


तदा तु नगरी सर्वा हर्षभूता बभूव ह ।।
षष्ठाहनि सुते जाते ब्रह्मानन्दगुणाकरे ।। 3.3.9.४० ।।


ब्राह्मी तु सुषुवे पुत्रं पार्षदांशं महाबलम् ।।
श्यामांगं कमलाक्षं च दृढस्कन्धं महाभुजम् ।।४१।।


ब्राह्मणाश्च तदागत्य जातकर्म ह्यकारयन् ।।
सुखखानिर्द्विजैर्नाम्ना कृतस्तु गणकोत्तमैः ।।४२।।


क्रमेण वर्द्धिता बालाः सर्वलोकशिवंकराः ।।
तेषां काली महच्छ्रेष्ठा पितृमातृप्रियंकरी ।। ४३ ।।


तृतीयाब्दे वयः प्राप्ते कृष्णांशे बलवत्तरे ।।
शक्रस्तद्दर्शनकांक्षी हयारूढो जगाम ह ।। ४४ ।।


क्रीडन्स चन्दनारण्ये कृष्णांशो भ्रातृभिः सह ।।
नभस्थं पुरुषं दृष्ट्वा सहस्राक्षं जहास वै ।। ४५ ।।


अश्विनी हरिणी दिव्या उच्चैःश्रवसमन्तिके ।।
गत्वा गर्भमुपादाय स्वगेहं पुनराययौ ।। ४६ ।।


वर्षांतरे च सुषुवे कपोतं तनयं शुभम् ।।
पञ्चाब्दं च समायाते विद्याध्यनमास्थिताः ।।४७।


ब्राह्मणं शिवशर्माणं सर्वविद्याविशारदम् ।।
स्वभक्त्या सेवनं कृत्वा ते चक्रुर्वेदपाठिकाम् ।। ४८ ।।


अष्टाब्दे चैव कृष्णांशो नामपत्रादिकां क्रियाम् ।।
लिखतां बालकानां च कृष्णांशः श्रेष्ठतामगात् ।। ४९ ।।


इति श्रीभविष्ये महापुराणे प्रतिसर्गपर्वणि चतुर्युगखण्डापरपर्याये कलियुगीयेतिहाससमुच्चये कृष्णांशावतारो नाम नवमोऽध्यायः ।। ९ ।।

भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय ९ कृष्णांश ‘आह्लाद’ (आल्हा) का जन्म-

सूत जी बोले — राज-सेवक दोनों भाइयों ने कालिय (करिया) को पराजित करके गोपालपुर राज्य( ग्वालियर) के अधीश्वर यादव राजा दलवाहन के यहाँ प्रस्थान किया । वहाँ सहस्र चण्डी के अनुष्ठान में हवन का आरम्भ होने जा रहा था, जिसमें अनेक राजागण उपस्थित थे । इन दोनों भाइयों ने (देवी के बलिदानार्थ) उपस्थित उन भैंसों को पकड़कर अपने अधीन कर रखा था जिन्हें अन्य कोई राजा नहीं पकड़ सकता था । राजा की दोनों कन्याओं ने उन्हें पहले ही बाँध रखा था । प्रसन्न होकर राजा ने अपनी दोनों कन्याएँ इन दोनों भाइयों को प्रदान किया । देवकी(दिवला) देशराज को और ब्राह्मी वत्सराज को देकर दुर्गा जी की आज्ञा से उन रूप यौवनशालिनी कन्याओं का पाणिग्रहण संस्कार सविधान सुसम्पन्न कराया। 

उन कन्याओं के साथ लक्षावृत्ति नामक वेश्या, जो नृत्य एवं गान में अत्यन्त निपुण थी, और मेघ मल्हार राग गाने वाली उसकी सुन्दरी सखियाँ भेजी गई तथा सौ हाथी, पाँच सहस्र घोड़े और चालीस पालकी भी राजा दलवान( दलवाहन) ने सप्रेम प्रदान किया । अत्यन्त धनराशि और अनेक दास दासी गणों समेत उन कन्याओं को लेकर सविधान विवाह हो जाने के उपरान्त अपनी महावती पुरी में वे दोनों भाई चले आये । मलना ने उस वधू को देखकर वह अमूल्य (नौलखा) हार, ब्राह्मी को सोलह शृंगार तथा बारह आभूषण प्रदान किया। परमानन्द मग्न होकर राजा परिमल ने दश गाँव जिसमें भाँति-भाँति की जाति के मनुष्य अधिक संख्या में रह रहे थे, वीर देशराज को प्रदान किया । उसी स्थान में ये दोनों पराक्रमी भाई रहने लगे । शिव की आज्ञावश जिस समय देवसिंह ने जन्म ग्रहण किया उसी समय देवकी ने गर्भधारण किया था, समय पाकर गौरवर्ण, कमल नेत्र एवं अपनी आभा से देदीप्यमान सन्तान के उत्पन्न होते ही देवताओं के सहित इन्द्र आनन्दित हुए । शंखों की ध्वनि और बार-बार जय शब्द होने लगे । दिशाएँ हरी-भरी दिखाई देने लगी, उसी भाँति आकाश में ग्रहगण प्रसन्नता प्रकट कर रहे थे । वेद-शास्त्र के पारगामी अनेक ब्राह्मण विद्वानों ने वहाँ एकत्र होकर उस शिशु का जातकर्म एवं नामकरण सविधान सुसम्पन्न किया । शुभ एवं प्रसन्नमुख वाले उस पुत्र को, जो भाद्र कृष्ण की पष्ठी चन्द्रवार के दिन अरुणोदय बेला तथा कृत्तिका नक्षत्र में उत्पन्न एवं अपने पितृवंश को यशस्वी बनाने वाला था, राम का अंश जानकर उसका ‘आह्लाद’ (आल्हा) नामकरण किया । वह बालक इसी नाम से इस भूतल में ख्याति प्राप्त किया। इस बालक के जन्मग्रहण करने के एक मास पश्चात् ब्राह्मी ने भी पुत्ररत्न उत्पन्न किया, जो गौरवर्ण, लम्बी भुजाएँ, विशालवक्षस्थल, तथा धर्म-पुत्र (युधिष्ठर) का अंश था । उस समय ब्राह्मणों ने उस बच्चे को देखकर, जिसका शुभ-प्रसन्नमुख और चरण-तल, सुन्दर कमल चिह्न से विभूपित था, महाबली होने के नाते उसको ‘बलस्वामी बलखानि’ (मलखान) नामकरण ब्राह्मणों ने तीसरे वर्ष की अवस्था प्राप्त होने पर उस सबल एवं कृष्णांश (से उत्पन्न उदय) के दर्शनाभिलाषी इन्द्र घोड़े पर बैठकर वहाँ आये, जहाँ वह चन्दन के वन में अपने भाइयों के साथ बाल-क्रीडा में निमग्न हो रहा था । उस समय आकाश में स्थित इन्द्र को देखकर उस बालक ने अट्टहास (ठठाकर हँसा) किया, इधर हरिणी नामक बड़वा (घोड़ी) भी इन्द्र के उस दिव्य उच्चैःश्रवा नामक घोड़े के पास पहुँचकर उसके द्वारा गर्भ धारणकर पुनः अपने घर लौट आई।पश्चात् वर्ष की समाप्ति में उसने कपोत (कबूतर) नामक एक पुत्र (अश्व) उत्पन्न किया । पाँचवें वर्ष के आरम्भ में इन बालकों ने विद्याध्ययन आरम्भ किया। शिवशर्मा नामक ब्राह्मण की, जो सम्पूर्ण विद्या में निपुण थे, भक्ति-श्रद्धा से सेवा कर रहे थे, जो इन्हें शिक्षा दे रहे थे । आठ वर्ष की अवस्था में वह उदयसिंह अध्ययन करने वाले सभी बालकों में कुशाग्र बुद्धि हुआ, पत्रादि-लेखन भली-भाँति कर लेता था । (अध्याय ९) 

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