जातियों की उत्पत्ति- मिथक, पुराण और ऐतिहासिक दृष्टिकोण
परिचय-
भारतीय इतिहास और धार्मिक ग्रंथों में विभिन्न जातियों की उत्पत्ति को लेकर कई कथाएं और व्याख्याएं मौजूद हैं। ये कथाएं अक्सर पुराणों, महाभारत, वेदों और आधुनिक इतिहासकारों के कार्यों से ली गई हैं। इस लेख में, हम राजपूत, क्षत्रिय, द्रविड़, हूण आदि जातियों की उत्पत्ति की तुलना करेंगे, विशेष रूप से ब्रह्मवैवर्त पुराण, कर्नल जेम्स टॉड, वी.ए. स्मिथ जैसे स्रोतों के आधार पर। यह विश्लेषण "सत्य प्रतिरूप" पुस्तक की भावना में आधारित है, जहां सभी श्लोकों और उद्धरणों को यथासंभव सत्यापित और संदर्भित किया गया है। रिसर्च के दौरान, पुराणों के मूल पाठों को ऑनलाइन उपलब्ध संस्करणों से सत्यापित किया गया, जैसे संस्कृत ग्रंथों के डिजिटल संग्रह और इतिहासकारों की पुस्तकें। अंत में, गोप, आभीर (अहीर) और यादव की चर्चा के साथ निष्कर्ष निकाला जाएगा, जो इन्हें क्षत्रिय वर्ण से जोड़ता है।
यह लेख मनमाने वर्णसंकर सिद्धांतों की आलोचना करता है, जो अक्सर सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों के कारण गढ़े गए लगते हैं।
1. राजपूत जाति- वर्णसंकर या विदेशी उत्पत्ति?
मध्यकाल में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध राजपूत जाति को पुराणकारों ने वर्णसंकर घोषित किया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में राजपूतों की उत्पत्ति क्षत्रिय पुरुष और करण स्त्री से बताई गई है-
क्षत्रात्करणकन्यायां राजपुत्रों बभूव ह।
राजपुत्र्यां तु करणादागरीति प्रकीर्तित: 1110 ।
अर्थ- क्षत्रिय पुरुष तथा करण कन्या के संयोग से राजपूत जाति का उद्भव होता है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मखंड, अध्याय-10)
प्रश्न उठता है कि करण स्त्री कौन है? उत्तर में कहा गया है कि शूद्र और वैश्य के मिश्रण से करण की उत्पत्ति होती है-
इत्येवमाद्या विप्रेन्द्र सच्छूद्राः परिकीर्तिताः । शूद्राविशोस्तु करणोऽम्बष्ठो वैश्याद्दिवजन्मनोः ।।18 ।।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मखंड, अध्याय-10)
आधुनिक अंग्रेज इतिहासकारों ने भी राजपूतों को विदेशी बताया है। कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी पुस्तक Annals and Antiquities of Rajasthan में राजपूतों को सीथियन (Scythian) की संतान बताया, उन्हें विदेशी घोषित करते हुए। इसी प्रकार, वी.ए. स्मिथ ने राजपूतों को शक और हूण की संतान कहा, जहां अग्निकुल से संबंधित चौहान, परमार, चालुक्य आदि को शक-हूण से जोड़ा, जबकि राष्ट्रकूट और चंदेल को गोंड, भर आदि जातियों से।
ये दावे राजपूतों की स्वाभिमानी और राष्ट्रप्रेमी छवि को चुनौती देते हैं, लेकिन रिसर्च से पता चलता है कि ये व्याख्याएं औपनिवेशिक इतिहासलेखन की हैं, जो भारतीय जातियों को विदेशी स्रोतों से जोड़ती हैं।
2. क्षत्रिय जाति- बहुमुखी उत्पत्ति कथाएं
क्षत्रिय जाति की उत्पत्ति तीन प्रमुख तरीकों से बताई गई है, जो प्राचीन ग्रंथों में विविधता दिखाती है:
क) ऋग्वेद में क्षत्रिय की उत्पत्ति भुजा/बाहु से-
बाहू इति। राजन्यः । कृतः ।।12।।
(ऋग्वेद, 10/90/12)
ख) इक्ष्वाकु वंशी क्षत्रियों (जैसे भगवान राम) की उत्पत्ति मनु के नाक छींकने से-
क्षुवतस्तु मनोः पूर्वमिक्ष्वाकुरभिनिः सृतः ।।8।।
अर्थ- प्राचीनकाल में मनु द्वारा नाक से छींकने पर इक्ष्वाकु निकल पड़े थे।
(ब्रह्मांड पुराण, मध्यम भाग, अध्याय-63)
ग) महाभारत में क्षत्रियों की उत्पत्ति ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय स्त्री से, जब परशुराम ने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय-रहित किया-
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा। जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेंद्रे पर्वतोत्तमे।।4।।
तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति ।
ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ।।5 ।।
तेभ्यश्च लेभिरे गर्भ क्षत्रियास्ताः सहस्रशः।
ततः सुधुविरे राजन् क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान ।।7।।
कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये ।
एवं तद् ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ।।8।।
जातं वृद्ध च धर्मेण सुदीघेर्णायुषान्वितम् ।
चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्ब्रह्मणोत्तराः ।।9।।
अर्थ- क्षत्रिय नारियों ने पुत्र की अभिलाषा से ब्राह्मणों की शरण ली, और इससे क्षत्रिय संतान की वृद्धि हुई।
(महाभारत, आदिपर्व, प्रथम खंड, अध्याय-64)
यह मत अमान्य है क्योंकि-
प्रथम, क्षत्रिय जाति प्राचीनकाल से अस्तित्व में है।
द्वितीय, ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय स्त्री से उत्पन्न संतान ब्राह्मण होती है-
भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते।
आनुपूर्व्याद् द्वयोहींनौ मातृजात्यौ प्रसूयतः ।।4।।
(अनुशासनपर्व, अध्याय-48)
3. ब्राह्मण जाति- सर्वश्रेष्ठ लेकिन विविध उत्पत्ति
ब्राह्मण को भारत की सर्वश्रेष्ठ जाति माना गया है, जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से बताई गई है:
ब्राह्मणः। अस्य। मुखम्। आसीत् ।।
ख) उपाध्याय, दीक्षित आदि दस ब्राह्मणों की उत्पत्ति कश्यप के पुत्र कण्वमुनि और आर्यावती से-
दशपुत्रास्तयोर्जाता आर्यबुद्धिकरा हि ते। उपाध्यायो दीक्षितश्च पाठकः शुक्लमिश्रकौ ।।7।।
अग्निहोत्री द्विवेदी च त्रिवेदी पांड एव च। चतुर्वेदीति कथिता यथा नाम तथा गुणाः ।।8।।
(भविष्य पुराण, भाग-2, प्रतिसर्ग पर्व, अध्याय-21)
ग) मनु से ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानवों की उत्पत्ति-
ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः । ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम् ।।14।।
अर्थ- उनसे ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उत्पन्न हुए।
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय-75)
4. अन्य जातियां- वर्णसंकर और हास्यास्पद कथाएं
बहादुर, जाट आदि को वर्णसंकर कहा गया:
म्लैच्छेश्चभुक्त्वत्यस्ताबभूवु वर्णसङ्कराः ।
न वै आदो न वै म्लैच्छाजट्टा जात्या न नेहनाः ।।2711
(भविष्य पुराण, अध्याय-2, प्रतिसर्ग पर्व)
द्रविड़, हूण, शक आदि की उत्पत्ति नंदिनी गाय के मूत्र, गोबर आदि से-
आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ ।
अंगारवर्ष मुञ्चंती मुहुर्वालधितो महत् ।।35 ।।
असृजत् पहलवान पुच्छात् प्रत्रवाद् द्रविड़ाञ्छकान् । योनिदेशाच्च यवनान शकृतः शबरान बहून । 136 ।।
मूत्रतश्चासृजत काश्चिच्छबरांश्चैव पार्श्वतः पौण्ड्रान किरातान यवनान सिंहलान बबार्शन खसान । ।37 ।।
चिबुकांश्च पुलिंदांश्च चीनान् हूणान् सकेरलान् ।
ससर्ज फेनतः सा गौम्लेंच्छान बहुविधानपि ।।38 ।।
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय-173)
शक की उत्पत्ति विरोधाभासी: महाभारत में नंदिनी गाय से, लेकिन शिव पुराण में सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से-
नरिष्यन्ताच्छका पुत्रा नमगस्य सुतोऽभवत् । ।122 ।।
(शिव पुराण, उमाकोटि संहिता, अध्याय 36, पेज 1297)
5. सत्य दृष्टि कोण, अहीर (गोप-आभीर-यादव) का क्षत्रिय वर्ण
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि जब किसी जाति ने सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी, तो उसे वर्णसंकर या निम्न घोषित किया गया, जैसे बौद्ध, मौर्य, कायस्थ, राजपूत, वैश्य आदि। अहीर जाति ने भी भागवत धर्म और राजनैतिक सत्ता से चुनौती दी, इसलिए उसे शूद्र, महाशूद्र, अत्यज, वर्णसंकर या विदेशी कहा गया। लेकिन मूल ग्रंथों से सिद्ध है कि यादव/अहीर क्षत्रिय हैं।
यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ।।3411
अर्थ- यदु से यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए।
(मत्स्य पुराण, अध्याय-34/30; महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 85; हरिवंश पुराण, हरिवंश पर्व, 33/55)
पृथ्वीराज रासो में 36 क्षत्रिय वंशों में आभीर (अहीर) शामिल-
रवि ससि जादव वंश, ककुस्थ परमार सदावर। चाहुवान चालुकय, छंद सिलार अभियर। (आभीर) दोयमत मकवान, गरूअ गोहिल गोहिलपुत। चापोत्कट परिवार, राव राठौर रोसजुत। देवरा टांक सैन्धव अनिग, योतिक प्रतिहार दधिषट। कारट्टपाल कोटपाल हुल, हरितट गौर कमाष मट। धन्यपालक निकुंभ वर, राजपाल कविनीस। कालछुरक्कै आदि दे, बरने वंस छत्तीस।
नंदगोप की पुत्री योगमाया को क्षत्रिया कहा गया-
निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा विद्याना ब्रह्मविद्या त्वमोंकारोऽथ वषट् तथा 23।।
(हरिवंश पुराण, विष्णु पर्व, अध्याय-3)
नंदगोप स्वयं क्षत्रिय-
एवमिति सार्द्धम ।। एवं नंदःगोपः क्षत्रा व्रजरक्षाधिकृतेन गोकुले आघोषयत् सर्वत्र घोषितवान् । ।13।।
(अन्वितार्थ प्रकाशिका, अध्याय 39, दशम स्कंध, पूर्व भाग, पेज 1260)
कृष्ण-बलराम क्षत्रिय-
क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्या प्रकृतिस्थिताः ।
यदुवंशे समुत्पन्न क्षात्रं वृत्त मनुष्ठित ।।10।।
(हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व, 80/10)
कृष्ण गोप/अहीर जाति में उत्पन्न-
गोपजातिप्रतिच्छन्नौ देवा गोपालरूपिणः ।
ईडिरे कृष्णरामौ च नटा इव नटं नृप ।।11।।
(भागवत पुराण, 10/18/11)
इस प्रकार, गोप-आभीर (अहीर)-यादव क्षत्रिय वर्ण के हैं। यह रिसर्च पुराणों के मूल श्लोकों पर आधारित है, जो "सत्य प्रतिरूप" में सत्यापित हैं।
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