यह श्लोक लक्ष्मीनारायण संहिता से है। इसका हिंदी अनुवाद यह है:
1. *यदु: प्राह न शक्नोमि दार्दं ते यौवनं रुप।*
- यदु ने कहा कि मैं अपने दार्द (पशुओं) को यौवन (जवान) रूप में नहीं रख सकता।
2. *जरासा हेतवः पशु विन्ता इड्विस्थरस्तथा ॥७३॥*
- जरा (वृद्धावस्था) के कारण पशुओं की चिंता इड्विस्थरस्था (पशुपालन) में होती है।
3. *कदाचित् निस्समच्चा व शीतजाठरपीडनम्।*
- कभी-कभी असंतुष्टता और शीत जाठर पीड़ा से पशुओं का पालन करना पड़ता है।
4. *सा जरा रोचते मे न भोगाकांक्षो ह्ययं मम ॥७४॥*
- जरा (वृद्धावस्था) मुझे रोचती है, लेकिन भोग की आकांक्षा नहीं है।
5. *श्रुत्वा राजा दाशापैनं राज्यहीनः संव्रचः।*
- राजा दाशापिन्द्र ने सुना कि राज्यहीन होने पर क्षत्रिय धर्म में पशुपालक बनना पड़ता है।
6. *तेजोहीनः क्षत्रियर्मव्जितः पशुपालकः ॥७५॥*
- तेजोहीन और क्षत्रिय धर्म से च्युत व्यक्ति पशुपालक बन जाता है।
7. *भविष्यति न सन्देहो याहि राज्यादू बहिर्मम् ॥*
- भविष्य में राज्य से बाहर जाओ और पशुपालक बन जाओ, इसमें कोई संदेह नहीं है।
इस श्लोक में यदु को पशुपालक के रूप में वर्णित किया गया है और वृद्धावस्था में पशुपालन के महत्व को बताया गया है।
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