गुरुवार, 10 जुलाई 2025

(नन्द और वसुदेव के पारिवारिक सम्बन्ध-

                     
  • सात्वत वंश में चतुर्थ वृष्णि- सात्वत पुत्र वृष्णि के पौत्र (नाती) थे चतुर्थ वृष्णि।  अर्थात् सात्वत के पुत्र वृष्णि  के पुत्र अनमित्र हुए इन्हीं अनमित्र के तीसरे पुत्र का नाम भी वृष्णि ही था यही अन्तिम वृष्णि सात्वत शाखा में थे।                                                             
  • यही  अन्तिम वृष्णि- नन्द और वसुदेव के पूर्व- पितामह थे।
  • "वृष्णे: कुले उत्पन्नस्य देवमीणस्य पर्जन्यो नाम्न: सुतो। वरिष्ठो बहुशिष्टो व्रजगोष्ठीनां स कृष्णस्य पितामह।१।
    अनुवाद:-
    यदुवंश के वृष्णि कुल में देवमीण जी के पुत्र पर्जन्य नाम से थे। जो बहुत ही शिष्ट और अत्यन्त महान समस्त व्रज समुदाय के लिए थे। वे पर्जन्य श्रीकृष्ण के पितामह अर्थात नन्द बाबा के पिता थे।१।
    "पुरा काले नन्दीश्वरे प्रदेशे वसन्सह गोपै:।
    स्वराटो विष्णो: तपयति स्म पर्जन्यो यति।।२।
    अनुवाद:- प्राचीन काल में नन्दीश्वर प्रदेश में गोपों के साथ रहते हुए वे पर्जन्य यतियों के जीवन धारण करके स्वराट्- विष्णु का तप करते थे।२।
  • तपसानेन धन्येन भाविन: पुत्रा वरीयान्। पञ्च ते मध्यमस्तेषां नन्दनाम्ना जजान।३।
    "अनुवाद:- महान तपस्या के द्वारा उनके श्रेष्ठ पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। जिनमें मध्यम पुत्र नन्द नाम से थे।३।

    तुष्टस्तत्र वसन्नत्र प्रेक्ष्य केशिनमागतं।
    परीवारै: समं सर्वैर्ययौ भीतो गोकुलं।।४।
    "अनुवाद:- वहाँ सन्तोष पूर्ण रहते हुए केशी नामक असुर को आया हुआ देखकर परिवार के साथ पर्जन्य जी भय के कारण नन्दीश्वर को छोड़कर गोकुल (महावन) को चले गये।४।

    कृष्णस्य पितामही महीमान्या कुसुम्भाभा हरित्पटा।
    वरीयसीति वर्षीयसी विख्याता खर्वा: क्षीराभ लट्वा।५।
    "अनुवाद:- कृष्ण की दादी(पिता की माता) वरीयसी जो सम्पूर्ण गोकुल में बहुत सम्मानित थीं ; कुसुम्भ की आभा वाले हरे वस्त्रों को धारण करती थीं। वह छोटे कद की और दूध के समान बालों वाली और अधिक वृद्धा थीं।५।
  • भ्रातरौ पितुरुर्जन्यराजन्यौ च सिद्धौ गोषौ 
    सुवेर्जना सुभ्यर्चना वा ख्यापि पर्जन्यस्य सहोदरा।६।
    "अनुवाद:- नन्द के पिता पर्जन्य के दो भाई अर्जन्य और राजन्य प्रसिद्ध गोप थे। सुभ्यर्चना नाम से उनकी एक बहिन भी थी।६।
  • गुणवीर: पति: सुभ्यर्चनया: सूर्यस्याह्वयपत्तनं।
    निवसति स्म हरिं कीर्तयन्नित्यनिशिवासरे।।७।
    "अनुवाद:- सुभ्यर्चना के पति का नाम गुणवीर था। जो सूर्य-कुण्ड नगर के रहने वाले थे। जो नित्य दिन- रात हरि का कीर्तन करते थे।७।
  • उपनन्दानुजो नन्दो वसुदेवस्य सुहृत्तम:।
    नन्दयशोदे च कृष्णस्य पितरौ व्रजेश्वरौ।८।
    "अनुवाद:- उपनन्द के भाई नन्द वसुदेव के सुहृद थे और कृष्ण के माता- पिता के रूप में नन्द और यशोदा दोनों व्रज के स्वामी थे। ८।

    वसुदेवोऽपि वसुभिर्दीव्यतीत्येष भण्यते।
    यथा द्रोणस्वरूपाञ्श: ख्यातश्चानक दुन्दुभ:।९।
    "अनुवाद:-वसु शब्द पुण्य ,रत्न ,और धन का वाचक है। वसु के द्वारा देदीप्यमान(प्रकाशित) होने के कारण श्रीनन्द के मित्र वसुदेव कहलाते हैं। अथवा विशुद्ध सत्वगुण को वसुदेव कहते हैं।
    इस अर्थ नें शुद्ध सत्व गुण सम्पन्न होने से इनका नाम वसुदेव है। ये द्रोण नामक वसु के स्वरूपाञ्श हैं। ये आनक दुन्दुभि नाम से भी प्रसिद्ध हैं।९।
    वसु= (वसत्यनेनेति वस + “शॄस्वृस्निहीति ।” उणाणि १ । ११ । इति उः) – रत्नम् । धनम् । इत्यमरःकोश ॥ (यथा, रघुः । ८ । ३१ । “बलमार्त्तभयोपशान्तये विदुषां सत्कृतये
    बहुश्रुतम् । वसु तस्य विभोर्न केवलं गुणवत्तापि परप्रयोजनम् ॥) वृद्धौषधम् । श्यामम् । इति मेदिनीकोश । हाटकम् । इति विश्वःकोश ॥ जलम् । इति सिद्धान्त- कौमुद्यामुणादिवृत्तिः ॥
    __________
  • नामेदं नन्दस्य गारुडे प्रोक्तं मथुरामहिमक्रमे।
    वृषभानुर्व्रजे ख्यातो यस्य प्रियसुहृदर:।।१०।
    "अनुवाद:- नन्द के ये नाम गरुडपुराण के मथुरा महात्म्य में कहे गये हैं। व्रज में विख्यात श्री वृषभानु जी नन्द के परम मित्र हैं।१०।
  • माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।
    मूर्ता वत्सलते! वासौ इन्द्रचापनिभाम्बरा।।११।
    "अनुवाद:- श्रीकृष्ण की माता गोप जाति को यश प्रदान करने वाली होने से यशोदा कहलाती हैं।
    इनकी अंग कान्ति श्यामल वर्ण की है ये वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं।और इनके वस्त्र इन्द्र धनुष के समान हैं ।११।
  • गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक् ।
    अयं जातः कृष्णवर्ण एतत्कुलविलक्षणम्॥५ ॥
    यशोदा; त्वम्- आप; नन्द - नन्द; त्वम् - आप; गौर- वर्ण - धृक् - धारक करने वाले; अयम् - वह; जाता - जन्मा; कृष्ण-वर्णा - श्याम; एतत् - कुल - इस कुल में; विलक्षणम् -असामान्य।
    "गर्गसंहिता-( ३/५/७ )
    हे यशोदा, तुम्हारा रंग गोरा है। हे नन्द, तुम्हारा रंग भी गोरा है। यह लड़का बहुत काला है। वह परिवार के बाकी लोगों से अलग है।
    *
    श्रीगर्गसंहितायां गिरिराजखण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे
    गोपविवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
  • "विशेष- यशोदा का वर्ण (रंग) श्यामल (साँबला) ही था। गौरा रंग कभी नहीं था- यह बात पन्द्रहवीं सदी में लिखित "श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका के साक्ष्यों से सिद्ध है।
    परन्तु उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में काशी पण्डित- पीठ ने गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के पञ्चम अध्याय में तीन फर्जी श्लोक प्रकाशन काल में लिखकर जोड़ दिए हैं।
    जिनको हम ऊपर दे चुके हैं।
  • शास्त्रों गोपों की वीरता सर्वत्र प्रतिध्वनित है।
    "वसुदेवसुतो वैश्यःक्षत्रियश्चाप्यहंकृतः।
    आत्मानं भक्तविष्णुश्चमायावी च प्रतारकः।६।"(ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड (४)१२१ वाँ अध्याय)
    प्रसंग:- श्रृगाल नामक एक मण्डलेश्वर राजाधिराज था ; जो जय-विजय की तरह गोलोक से नीचे वैकुण्ठ में द्वारपाल था। जिसका नाम सुभद्र था जिसने लक्ष्मी के शाप से भ्रष्ट हेकर पृथ्वी पर जन्म लिया। उसी श्रृगाल की कृष्ण के प्रति शत्रुता की सूचना देने के लिए एक ब्राह्मण कृष्ण की सुधर्मा सभा में आता है और वह उस श्रृगाल मण्डलेश्वर के कहे हुए शब्दों को कृष्ण से कहता है।
    हे प्रभु आपके प्रति श्रृँगाल ने कहा :-
    श्लोक का अनुवाद:-
    "वसुदेव का पुत्र कृष्ण वैश्य जाति का है; वह अहंकारी क्षत्रिय भी है।"
    वह तो विष्णु को अपना भक्त कहता है; इसलिए वह मायावी और ठग है ।६।
    ________
    {ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड (४)१२१ वाँ अध्याय
  • _________
    आदिपुराणे प्रोक्तं द्वे नाम्नी नन्दभार्याया यशोदा देवकी-इति च।।
    अत: सख्यमभूत्तस्या देवक्या: शौरिजायया।।१२।
    "अनुवाद:- आदि पुराण में वर्णित नन्द की पत्नी यशोदा का नाम देवकी भी है। इस लिए शूरसेन के पुत्र वसुदेव की पत्नी देवकी के साथ नाम की भी समानता होने के कारण स्वाभाविक रूप में यशोदा का सख्य -भाव भी है।१२।
  • उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजौ पितु:।
    पितृव्यौ तु कनीयांसौ स्यातां सनन्द नन्दनौ।१३।
    "अनुवाद:- श्री नन्द के उपनन्द और अभिनन्दन बड़े भाई तथा सनन्द और नन्दन नाम हे दो छोटे भाई भी हैं। ये सब कृष्ण के पितृव्य (ताऊ-चाचा) हैं।१३।
  • "आद्य: सितारुणरुचिर्दीर्घकूचौ हरित्पट:।
    तुङ्गी प्रियास्य सारङ्गवर्णा सारङ्गशाटिका।।१४।
    "अनुवाद:- सबसे बड़े भाई उपनन्द की अंग कान्ति धवल ( सफेद) और अरुण( उगते हुए सूर्य) के रंग के मिश्रण अर्थात- गुलाबी रंग जैसी है। इनकी दाढ़ी बहुत लम्बी और वस्त्र हरे रंग के हैं । इनकी पत्नी का नाम तुंगी है। जिनकी अंग कन्ति तथा साड़ी का रंग सारंग( पपीहे- के रंग जैसा है।१४।

    द्वितीयो भ्रातुरभिनन्दनस्य भार्या पीवरी ख्याता।
    पाटलविग्रहा नीलपटा लम्बकूर्चोऽसिताम्बरा:।१५।
    "अनुवाद:- दूसरे भाई श्री -अभिनन्द की अंग कान्ति शंख के समान गौर वर्ण है। और दाढ़ी लम्बी है। ये काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। इनकी पत्नी का नाम पीवरी जो नीले रंग के वस्त्र धारण करती हैं। तथा जिनकी अंग कान्ति पाटल ( गुलाब) रंग की है।१५।

    सुनन्दापरपर्याय: सनन्दस्य च पाण्डव:।
    श्यामचेल: सितद्वित्रिकेशोऽयं केशवप्रिय:।१६।
    "अनुवाद:- आनन्द का दूसरा नाम सन नन्द है। इनकी अंग कान्ति पीला पन लिए हुए सफेद रंग की तथा वस्त्र काले रंग के हैं। इनके शिर के सम्पूर्ण बालों में केवल दो या तीन बाल ही सफेद हुए हैं। ये केशव- कृष्ण के परम प्रिय है।१६।
  • सनन्दस्य भार्या कुवलया नाम्न: ख्याता।
    रक्तरङ्गाणि वस्त्राणि धारयति तस्या: कुवलयच्छवि:।१७।
    "अनुवाद:-सनन्द की पत्नी का नाम कुवलया है।
    जो कुवलय( नीले और हल्के लाल के मिश्रण जैसे ) वस्त्रों को धारण करने वाली तथा कुवलय अंक कान्ति वाली हैं।१७।
  • नन्दन: शिकिकण्ठाभश्चण्डातकुसुमाम्बर:।
    अपृथग्वसति: पित्रा सह तरुण प्रणयी हरौ।
    अतुल्यास्य प्रिया विद्युतकान्तिरभ्रनिभाम्बरा।१८।
    "अनुवाद:- नंदन की अंग कान्ति मयूर के
    कण्ठ जैसी तथा वस्त्र चण्डात (करवीर) पुष्प के समान है। श्रीनन्दन अपने पिता ( श्री पर्जन्य जी के साथ ही इकट्ठे निवास करते हैं। श्रीहरि के प्रति इनका कोमल प्रेम है। नन्दन जी की पत्नी का नाम अतुल्या है। जिनकी अंगकान्ति बिजली के समान रंग वाली है। तथा वस्त्र मेघ की तरह श्याम रंग के हैं।१८।
  • सानन्दा नन्दिनी चेति पितुरेते सहोदरे।
    कल्माषवसने रिक्तदन्ते च फेनरोचिषी।१९।
    "अनुवाद:-( कृष्ण के पिता नन्द की सानन्दा और नन्दिनी नाम की दो बहिने हैं। ये अनेक प्रकार के रंग- विरंगे) वस्त्र धारण करती हैं। इनकी दन्तपंक्ति रिक्त अर्थात इनके बहुत से दाँत नहीं हैं। इनकी अंगकान्ति फेन( झाग) की तरह सफेद है।१९।
  • सानन्दा नन्दिन्यो: पत्येतयो: क्रमाद्महानील: सुनीलश्च तौ कृष्णस्य वपस्वसृपती शुद्धमती।
    २०।
    "अनुवाद:-सानन्दा के पति का नाम महानील और नन्दिनी के पति का नाम सुनील है। ये दोंनो श्रीकृष्ण के फूफा अर्थात् (नन्द) के बहनोई हैं।२०।
  • पितुराद्यभ्रातुः पुत्रौ कण्डवदण्डवौ नाम्नो:
    सुबले मुदमाप्तौ सौ ययोश्चारु मुखाम्बुजम्।।२१।
    "अनुवाद:- श्री कृष्ण के पिता नन्द बड़े भाई श्री उपनन्द के कण्डव और दण्डव नाम के दो पुत्र हैं।
    दोंनो सुबह के संग में बहुत प्रसन्न रहते हैं। तथ
    दोंनो का मनोहर मुख कमल के समान सुन्दर है।२१।
  • राजन्यौ यौ तु पुत्रौ नाम्ना तौ चाटु- वाटुकौ।
    दधिस्सारा- हविस्सारे सधर्मिण्यौ क्रमात्तयो:।।२२।
    "अनुवाद:- श्रीनन्द जी के दो चचेरे भाई जो उनके चाचा राजन्य के पुत्र हैं। उनका नाम चाटु और वाटु है उनकी पत्नीयाँ का नाम इसी क्रम से दधिस्सारा और हविस्सारा है।२२।

  • "कृष्ण की माता के परिवार का परिचय"
    "यशोदा के परिवार का परिचय-
    महामहो महोत्साहो स्यादस्य सुमुखाभिध:।
    लम्बकम्बुसमश्रु: पक्वजम्बूफलच्छवि:।।२३।
    "अनुवाद:- श्री कृष्ण के नाना (मातामह) का नाम सुमुख है। ये बहुत उद्यमी और उत्साही हैं। इनकी लम्बी दाढ़ी शंख के समान सफेद तथा अंगकान्ति पके हुए जामुन के फल जैसी ( श्यामल) है।२३।

    "श्रीब्रह्मवैवर्ते पुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे नारायणनारदसंवादे कृष्णान्नप्राशन वर्णननामकरणप्रस्तावो नाम त्रयोदशोऽध्याये यशोदया: पित्रोर्नामनी पद्मावतीगिरिभानू उक्तौ।२४।
    अनुवाद:- ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के अन्तर्गत नारायण -और नारद संवाद में कृष्ण का अन्न प्राशनन नामक तेरहवें अध्याय में यशोदा के माता-पिता का नाम पद्मावती और गिरिभानु है।२४।

    सर्वेषां गोपपद्मानां गिरिभानुश्च भास्करः ।
    पत्नी पद्मासमा तस्य नाम्ना पद्मावती सती ।२५।
    अनुवाद:- गोप रूपी कमलों के गिरिभानु सूर्य हैं।
    और उनकी पत्नी पद्मावती लक्ष्मी के समान सती है।२५।
  • तस्याः कन्या यशोदा त्वं यशोवर्द्धनकारिणी ।।
    बल्लवानां च प्रवरो लब्धो नन्दश्च वल्लभः।२६।।
    अनुवाद:- उस पद्मावती की कन्या यशोदा तुम यश को बढ़ाने वाली हो। गोपों में श्रेष्ठ नन्द तुमको पति रूप में प्राप्त हुए हैं।२६।
  • माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।
    मूर्ता वत्सलते! वासौ इन्द्रचापनिभाम्बरा।।११।
    "अनुवाद:- श्रीकृष्ण की माता गोप जाति को यश प्रदान करने वाली होने से यशोदा कहलाती हैं।
    इनकी अंग कान्ति श्यामल वर्ण की है ये वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं।और इनके वस्त्र इन्द्र धनुष के समान हैं ।११।
  • गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक् ।
    अयं जातः कृष्णवर्ण एतत्कुलविलक्षणम्॥५ ॥
    यशोदा; त्वम्- आप; नन्द - नन्द; त्वम् - आप; गौर- वर्ण - धृक् - धारक करने वाले; अयम् - वह; जाता - जन्मा; कृष्ण-वर्णा - श्याम; एतत् - कुल - इस कुल में; विलक्षणम् -असामान्य।
    "गर्गसंहिता- (३/५/७)
    हे यशोदा, तुम्हारा रंग गोरा है। हे नन्द, तुम्हारा रंग भी गोरा है। यह लड़का बहुत काला है। वह परिवार के बाकी लोगों से अलग है।
    *
    श्रीगर्गसंहितायां गिरिराजखण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे
    गोपविवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः॥५॥
  • "विशेष- यशोदा का वर्ण (रंग) श्यामल (साँबला) ही था। गौरा रंग कभी नहीं था- यह बात पन्द्रहवीं सदी में लिखित "श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश्य दीपिका में भी लिखी हुई है।
    परन्तु उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में काशी पण्डित- पीठ ने गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के पञ्चम अध्याय में तीन फर्जी श्लोक प्रकाशन काल में लिखकर जोड़ दिए हैं।
    जिनको हम ऊपर दे चुके हैं।
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    मातामही तु महिषी दधिपाण्डर कुन्तला।
    पाटला पाटलीपुष्पपटलाभा हरित्पटा।२७।
    "अनुवाद:- कृष्ण की नानी (मातामही) का नाम पाटला है ये व्रज की रानी के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके केश देखने में गाय के दूध से बने दही के समान पीले, अंगकान्ति पाटल पुष्प के समान हल्के गुलाबी रंग जैसी तथा वस्त्र हरे रंग के है।२७।
  • प्रिया सहचरी तस्या मुखरा नाम बल्लवी।
    व्रजेश्वर्यै ददौ स्तन्यं सखी स्नहभरेण या।२८।
    "अनुवाद:- मातामही( नानी) पाटला की मुखरा
    नाम की एक गोपी प्रिय सखी है। वह पाटला के प्रति इतनी स्नेह-शील है कि कभी- कभी
    पाटला के व्यस्त होने पर व्रज की ईश्वरी पाटला
    की पुत्री यशोदा को अपना स्तन-पान तक भी करा देती थी।२८।
  • सुमुखस्यानुजश्चारुमुखोऽञ्जनभिच्छवि:।
    भार्यास्य कुलटीवर्णा बलाका नाम्नो बल्लवी।२९।
    "अनुवाद:- सुमुख( गिरिभानु) के छोटे भाई की नाम चारुमुख है। इनकी अंगकान्ति काजल की तरह है। इनकी पत्नी का नाम बलाका है। जिनकी अंगकान्ति कुलटी( गहरे नीले रंग की एक प्रकार की दाल जो काजल ( अञ्जन) रे रंग जैसी होती है।२९
  • गोलो मातामही भ्राता धूमलो वसनच्छवि:।
    हसितो य: स्वसुर्भर्त्रा सुमुखेन क्रुधोद्धुर:।३०।
    "अनुवाद:-मातामही (नानी) पाटला के भाई का नाम गोल है। तथा वे धूम्र (ललाई लिए हुए काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। बहिन के पति-( बहनोई) सुमुख द्वारा हंसी मजाक करने पर गोल विक्षिप्त हो जाते हैं।३०।
  • दुर्वाससमुपास्यैव कुलं लेभे व्रजोज्ज्वलम्।।गोलस्य भार्या जटिला ध्वाङ्क्ष वर्णा महोदरी।३१।
    "अनुवाद:- दुर्वासा ऋषि की उपासना के परिणाम स्वरूप इन्हें व्रज के उज्ज्वल वंश में जन्म ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गोल की पत्नी का नाम जटिला है। यह जटिला कौए जैसे रंग वाली तथा स्थूलोदरी (मोटे पेट वाली ) है।३१।
  • यशोदाया: त्रिभ्रातरो यशोधरो यशोदेव: सुदेवस्तु।
    अतसी पुष्परुचय: पाण्डराम्बर-संवृता:।३२।
    "अनुवाद:-यशोदा के तीन भाई हैं जिनके नाम हैं यशोधर" यशोदेव और सुदेव – इन सबकी अंगकान्ति अलसी के फूल के समान है । ये सब हल्का सा पीलापन लिए हुए सफेद रंग के वस्त्र धारण करते हैं।३२।
  • येषां धूम्रपटा भार्या कर्कटी-कुसुमित्विष:।।
    रेमा रोमा सुरेमाख्या: पावनस्य पितृव्यजा:।।३३।
    "अनुवाद:-इन सब तीनों भाइयों की पत्नीयाँ पावन( विशाखा के पिता) के चाचा( पितृव्य )की कन्याऐं हैं। जिनके नाम क्रमश: रेमा, रोमा और सुरेमा हैं। ये सब काले वस्त्र पहनती हैं। इनकी अंगकान्ति कर्कटी(सेमल) के पुष्प जैसी है।३३।
  • यशोदेवी- यशस्विन्यावुभे मातुर्यशोदया: सहोदरे।
    दधि:सारा हवि:सारे इत्यन्ये नामनी तयो:।३४।
    "अनुवाद:- यशोदेवी और यशस्विनी श्रीकृष्ण की माता यशोदा की सहोदरा बहिनें हैं। ये दोंनो क्रमश दधिस्सारा और हविस्सारा नाम से भी जानी जाती हैं। बड़ी बहिन यशोदेवी की अंगकान्ति श्याम वर्ण-(श्यामली) है।३४।
  • चाटुवाटुकयोर्भार्ये ते राजन्यतनुजयो: ़
    सुमुखस्य भ्राता चारुमुखस्यैक: पुत्र: सुचारुनाम्।३५ ।
    अनुवाद:- दधिस्सारा और हविस्सारा पहले कहे हुए राजन्य गोप के पुत्रों चाटु और वाटु की पत्नियाँ हैं। सुमुख के भाई चारुमख का सुचारु नामक एक सुन्दर पुत्र है।३५।

    गोलस्य भ्रातु: सुता नाम्ना तुलावती या सुचारोर्भार्या ।३६।
    "अनुवाद:-गोल की भतीजी तुलावती चारुमख के पुत्र सुचारु की पत्नी है।३६।

    पौर्णमासी भगवती सर्वसिद्धि विधायनी।
    काषायवसना गौरी काशकेशी दरायता।३७।
    "अनुवाद:- भगवती पौर्णमासी सभी सिद्धियों का विधान करने वाली है। उसके वस्त्र काषाय ( गेरुए) रंग के हैं। उसकी अंगकान्ति गौरवर्ण की और केश काश नामक घास के पुष्प के समान सफेद हैं; ये आकार में कुछ लम्बी हैं।
  • मान्या व्रजेश्वरादीनां सर्वेषां व्रजवासिनां। नारदस्य प्रियशिष्येयमुपदेशेन तस्य या।३८।
    "अनुवाद:- पौर्णमसी व्रज में नन्द आदि सभी व्रजवासियों की पूज्या और देवर्षि नारद की प्रिया शिष्या है नारद के उपदेश के अनुसार जिसने।३८।
  • सान्दीपनिं सुतं प्रेष्ठं हित्वावन्तीपुरीमपि।
    स्वाभीष्टदैवतप्रेम्ना व्याकुला गोकुलं गता।३९।
    "अनुवाद:- अपने सबसे प्रिय पुत्र सान्दीपनि को उज्जैन(अवन्तीपरी) में छोड़कर अपने अभीष्ट देव श्रीकृष्ण के प्रेम में वशीभूत होकर गोकुल में गयी।३९।
  • राधया अष्ट सख्यो ललिता च विशाखा च चित्रा।
    चम्पकवल्लिका तुङ्गविद्येन्दुलेखा च रङ्गदेवी सुदेविका।४०।

    "अनुवाद:- राधा जी की आठ सखीयाँ ललिता, विशाखा,चित्रा,चम्पकलता, तुंगविद्या,इन्दुलेखा,रंग देवी,और सुदेवी हैं।४०।
    **
    तत्राद्या ललितादेवी स्यादाष्टासु वरीयसी प्रियसख्या भवेज्ज्येष्ठा सप्तविञ्शतिवासरे।४१।
    "अनुवाद:-इन आठ वरिष्ठ सखीयों में ललिता देवी सर्वश्रेष्ठ हैं यह अपनी प्रिया सखी राधा से सत्ताईस दिन बड़ी हैं।४१।
  • अनुराधा तया ख्याता वामप्रखरतां गता।
    गोरोचना निभाङ्गी सा शिखिपिच्छनिभाम्बरा।।४२।
    "अनुवाद:- श्री ललिता अनुराधा नाम से विख्यात तथा वामा और प्रखरा नायिकाओं के गुणों से विभूषित हैं। ललिता की अंगकान्ति गोरोचना के समान तथा वस्त्र मयूर पंख जैसे हैं।४२।

    ललिता जाता मातरि सारद्यां पितुरेषा विशोकत:।
    पतिर्भैरव नामास्या: सखा गोवर्द्धनस्य य: ।४३।
    "अनुवाद:- श्री ललिता की माता का नाम सारदी और पिता का नाम विशोक है। ललिता के पति का नाम भैरव है जो गोवर्द्धन गोप के सखा हैं।४३।
  • सम्मोहनतन्त्रस्य ग्रन्थानुसार राधया: सख्योऽष्ट
    कलावती रेवती श्रीमती च सुधामुखी।
    विशाखा कौमुदी माधवी शारदा चाष्टमी स्मृता।४४।
    "अनुवाद:-सम्मोहन तन्त्र के अनुसार राधा की आठ सखियाँ हैं।–कलावती, रेवती,श्रीमती, सुधामुखी, विशाखा, कौमुदी, माधवी,शारदा।४४।

    श्रीमधुमङ्गल ईषच्छ्याम वर्णोऽपि भवेत्।
    वसनं गौरवर्णाढ्यं वनमाला विराजित:।।४५।
    "अनुवाद:- श्रीमान्- मधुमंगल कुछ श्याम वर्ण के हैं। इनके वस्त्र गौर वर्ण के हैं। तथा वन- मालाओं
    से सुशोभित हैं।४५।

    पिता सान्दीपनिर्देवो माता च सुमुखी सती।
    नान्दीमुखी च भगिनी पौर्णमासी पितामही।।४६।
    "अनुवाद:-मधुमंगल के पिता सान्दीपनि ऋषि तथा माता का नीम सुमुखी है। जो बड़ी पतिव्रता है। नान्दीमुखी मधु मंगल की बहिन और पौर्णमासी दादी है। ४६।
  • पौर्णमास्या: पिता सुरतदेवश्च माता चन्द्रकला सती। प्रबलस्तु पतिस्तस्या महाविद्या यशस्करी।४७।
    "अनुवाद:- पौर्णमासी के पिता का नाम सुरतदेव तथा माता का नाम चन्द्रकला है। पौर्णमासी के पति का नाम प्रबल है। ये महाविद्या में प्रसिद्धा और सिद्धा हैं।४७।
  • पौर्णमास्या भ्रातापि देवप्रस्थश्च व्रजे सिद्धा शिरोमणि: । नानासन्धानकुशला द्वयो: सङ्गमकारिणी।।४८।
    "अनुवाद:- पौर्णमासी का भाई देवप्रस्थ है। ये पौर्णमासी व्रज में सिद्धा में शिरोमणि हैं।
    पौर्णमासी अनेक अनुसन्धान करके कार्यों में कुशल तथा श्रीराधा-कृष्ण दोंनो का मेल कराने वाली है।४८।
  • आभीरसुभ्रुवां श्रेष्ठा राधा वृन्दावनेश्वरी।
    अस्या: सख्यश्च ललिताविशाखाद्या: सुविश्रुता:।४९।
    "अनुवाद:- आभीर कन्याओं में श्रेष्ठा वृन्दावन की अधिष्ठात्री व स्वामिनी राधा हैं। ललिता और विशाखा आदि सख्यियाँ श्री राधा जी प्रधान सखियों के रूप में विख्यात हैं।४९।
  • चन्द्रावली च पद्मा च श्यामा शैव्या च भद्रिका।
    तारा विचित्रा गोपाली पालिका चन्द्रशालिका।५०।
    "अनुवाद:- चन्दावलि, पद्मा, श्यामा,शैव्या,भद्रिका, तारा, विचित्रा, गोपली, पालिका ,चन्द्रशालिका,
  • मङ्गला विमला लीला तरलाक्षी मनोरमा
    कन्दर्पो मञ्जरी मञ्जुभाषिणी खञ्जनेक्षणा।।५१
    "अनुवाद:-मंगला ,विमला, नीला,तरलाक्षी,मनोरमा,कन्दर्पमञजरी, मञ्जुभाषिणी, खञ्जनेक्षणा
  • कुमुदा, कैरवी, शारी,शारदाक्षी, विशारदा,। शङ्करी, कुङ्कुङ्मा,कृष्णासारङ्गीन्द्रावलि, शिवा।।५२।
    "अनुवाद:-कुमुदा, कैरवी, शारी,शारदाक्षी, विशारदा, शंकरी, कुंकुमा,कृष्णा, सारंगी,इन्द्रावलि, शिवा आदि ।
  • तारावली,गुणवती,सुमुखी,केलिमञ्जरी।
    हारावली,चकोराक्षी, भारती, कमलादय:।।५३।
    "अनुवाद:तारावली,गुणवती,सुमुखी,केलिमञ्जरी,हारावली,चकोराक्षी, भारती, और कमला आदि गोपिकाऐं कृष्ण की उपासिका व आराधिका हैं।
  • आसां यूथानि शतश: ख्यातान्याभीर सुताम्।
    लक्षसङ्ख्यातु कथिता यूथे- यूथे वराङ्गना।।५४।
    "अनुवाद:- इन आभीर कन्याओं के सैकड़ों यूथ( समूह) हैं और इन यूथों में बंटी हुई वरागंनाओं की संख्या भी लाखों में है।५४।
  • अब इसी प्रकरण की समानता के लिए देखें नीचे
    "श्रीश्रीराधाकृष्णगणोद्देश्य दीपिका-
    में वर्णित राधा जी के पारिवारिक सदस्यों की सूची वासुदेव- रहस्य- राधा तन्त्र नामक ग्रन्थ के ही समान हैं परन्तु श्लोक विपर्यय ( उलट- फेर) हो गया है। और कुछ शब्दों के वर्ण- विन्यास ( वर्तनी) में भी परिवर्तन वार्षिक परिवर्तन हुआ है।
  • "राधा के परिवार का परिचय-
    "वृषभानु: पिता तस्या राधाया वृषभानरिवोज्ज्जवल:।१६८।(ख)
    रत्नगर्भाक्षितौ ख्याति कीर्तिदा जननी भवेत्।।१६९।(क)

    "अनुवाद:- श्री राधा के पिता वृषभानु वृष राशि में स्थित भानु( सूर्य ) के समान उज्ज्वल हैं।१६८-(ख)
  • श्री राधा जी की माता का नाम कीर्तिदा है। ये पृथ्वी पर रत्नगर्भा- के नाम से प्रसिद्ध हैं।१६९।(क)
  • "पितामहो महीभानुरिन्दुर्मातामहो मत:।१६९(ख) मातामही पितामह्यौ मुखरा सुखदे उभे।१७०(क)
    "अनुवाद:-
    राधा जी के पिता का नाम महीभानु तथा नाना का नाम इन्दु है। राधा जी दादी का नाम सुखदा और नानी का नाम मुखरा है।१७०।(क)
  • " रत्नभानु:, सुभानुश्च भानुश्च भ्रातर: पितु:"१७०(ख)
    भद्रकर्ति , महाकीर्ति, कीर्तिचन्द्रश्च मातुला:। मातुल्यो मेनका , षष्ठी , गौरी,धात्री और धातकी।।१७१।
  • अनुवाद:-भद्रकर्ति , महाकीर्ति, कीर्तिचन्द्र मामा:। और मेनका , षष्ठी , गौरी धात्री और धातकी ये राधा की पाँच मामीयाँ हैं।१७१/।
  • "स्वसा कीर्तिमती मातुर्भानुमुद्रा पितृस्वसा। पितृस्वसृपति: काशो मातृस्वसृपति कुश:।‌१७२।।
    "अनुवाद:- श्रीराधा जी की माता की बहिन का नाम कीर्तिमती,और भानुमुद्रा पिता की बहिन ( बुआ) का नाम है। फूफा का नाम "काश और मौसा जी का नाम कुश है।
  • श्रीराधाया: पूर्वजो भ्राता श्रीदामा कनिष्ठा भगिन्यानङ्गमञ्जरी।१७३।(क)
    "अनुवाद:- श्री राधा जी के बड़े भाई का नाम श्रीदामन्- तथा छोटी बहिन का नाम श्री अनंगमञ्जरी है।१७३।(क)
    "राधा जी की प्रतिरूपा( छाया) वृन्दा जो ध्रुव के पुत्र केदार की पुत्री है उसके ससुराल पक्ष के सदस्यों के नाम भी बताना आवश्यक है। वह राधा के अँश से उत्पन्न राधा के ही समान रूप ,वाली गोपी है। वृन्दावन नाम उसी के कारण प्रसिद्ध हो जाता है। रायाण गोप का विवाह उसी वृन्दा के साथ होता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(86) में श्लोक संख्या134-से लगातार 143 तक वृन्दा और रायाण के विवाह ता वर्णन है।
  • "रायाण की पत्नी वृन्दा का परिचय-
    रायाणस्य परिणीता वृन्दा वृन्दावनस्य अधिष्ठात्री । इयं केदारस्य सुता कृष्णाञ्शस्य भक्ते: सुपात्री। १।
  • ब्रह्मवैवर्तपुराणस्य श्रीकृष्णजन्मखण्डस्य षडाशीतितमोऽध्यायस्य अनतर्निहिते । सप्तत्रिंशताधिकं शतमे श्लोके रायाणस्य पत्नी वृन्दया: वर्णनमस्ति।।२।
  • ******
    उवाच वृन्दां भगवान्सर्वात्मा प्रकृतेः परः ।१३४.                                                                  
  • अध्याय- दशम् (१०)
    [भाग -(१) -गोप जाति के श्रीकृष्ण सहित कुछ महान पौराणिक व्यक्तियों का परिचय
    यादव वंश गोप जाति का एक ऐसा रक्त समूह है।
  • जिनकी उत्पत्ति गोलोक में परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा के क्लोन (समरूपण विधि) से उस समय हुई जब गोलोक में श्रीकृष्ण से नारायण, शिव, ब्रह्मा इत्यादि प्रमुख देवताओं की उत्पत्ति हुई थी। इस वजह से गोप जाति उतनी ही प्राचीनतम है जितना नारायण, शिव एवं ब्रह्मा हैं।
    (इस बात को अध्याय- (४) में विस्तार पूर्वक बताया जा चुका है।) इस लिए गोप कुल के उन सभी सदस्यपत्तियों की विस्तृत जानकारी के लिये इस अध्याय को क्रमशः चार भागों में गया है।


    परिशिष्ट कथा २--
    हरिवंश पुराण तथा देवीभागवत पुराण में वसुदेव का गोप जाति में कश्यप के अँश से जन्म लेने का प्रसंग बड़ा समीचीन रूप से प्राप्त होता है । जिसमें गोपेश्वर श्रीकृष्ण के गोप जाति में अवतरण होने की प्राचीन कथाऐं वर्णित है-

    ___
    वसुदेव के गोपालक रूप को इन दोनों पुराणों में
    बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है। -
    भारतीय समाज में नन्द के गोपालक होने की बातें अधिकतर प्रचलित है
    परन्तु वसुदेव के गोपालक स्वरूप को कथाकारों की अनभिज्ञता के कारण अथवा जान बूझकर भी प्रस्तुत न करना दु:खद है।
  • ____
    यत्र देशे यथा जातो येन वेषेण वा वसन्
    तानहं समरे हन्यां तन्मे ब्रूहि पितामह।१७।
    ____
    "ब्रह्मोवाच
    नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं शृणु मे विभो।
    भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति ।१८।
  • यत्र त्वं च महाबाहो जातः कुलकरो भुवि ।
    यादवानां महद् वंशमखिलं धारयिष्यसि ।१९।
  • तांश्चासुरान्समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मनो महत्।
    स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय ।1.55.२०।
    __
    पुरा हि कश्यपो विष्णो वरुणस्य महात्मनः ।
    जहार यज्ञिया गा वै पयोदास्तु महामखे ।२१।
  • अदितिः सुरभिश्चैते द्वे भार्ये कश्यपस्य तु। प्रदीयमाना गास्तास्तु नैच्छतां वरुणस्य वै ।२२।
  • ततो मां वरुणोऽभ्येत्य प्रणम्य शिरसा ततः।
    उवाच भगवन् गावो गुरुणा मे हृता इति ।२३।
  • कृतकार्यो हि गास्तास्तु नानुजानाति मे गुरुः।
    अन्ववर्तत भार्ये द्वे अदितिं सुरभिं तथा ।२४।
    ____
  • "मम ता ह्यक्षया गावो दिव्याः कामदुहः प्रभो ।
    चरन्ति सागरान् सर्वान्रक्षिताः स्वेन तेजसा।२५।
  • कस्ता धर्षयितुं शक्तो मम गाः कश्यपादृते ।
    अक्षयं वा क्षरन्त्यग्र्यं पयो देवामृतोपमम् ।२६।
  • प्रभुर्वा व्युत्थितो ब्रह्मन् गुरुर्वा यदि वेतरः।
    त्वया नियम्याः सर्वे वै त्वं हि नः परमा गतिः ।२७।
  • यदि प्रभवतां दण्डो लोके कार्यमजानताम्।
    न विद्यते लोकगुरो न स्युर्वै लोकसेतवः।२८।
  • यथा वास्तु तथा वास्तु कर्तव्ये भगवान् प्रभुः।
    मम गावः प्रदीयन्तां ततो गन्तास्मि सागरम् ।२९।
  • या आत्मदेवता गावो या गावः सत्त्वमव्ययम् ।
    लोकानां त्वत्प्रवृत्तानामेकं गोब्राह्मणं स्मृतम्।1.55.३०।
  • त्रातव्याः प्रथमं गावस्त्रातास्त्रायन्ति ता द्विजान् ।
    गोब्राह्मणपरित्राणे परित्रातं जगद् भवेत् ।३१।
    ____
    "इत्यम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत
    गवां कारणतत्त्वज्ञः कश्यपे शापमुत्सृजम् ।३२ ।।
  • येनांशेन हृता गावः कश्यपेन महर्षिणा
    स तेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति ।३३।
  • या च सा सुरभिर्नाम अदितिश्च सुरारणिः।
    तेऽप्युभे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यतः।३४।
  • ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि रंस्यते।
    स तस्य कश्यपस्यांशस्तेजसा कश्यपोपमः।३५।
  • वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले।
    गिरिर्गोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरतः। ३६।
  • तत्रासौ गोषु निरतः कंसस्य करदायकः।
    तस्य भार्याद्वयं जातमदितिः सुरभिश्च ते ।३७।
  • देवकी रोहिणी चेमे वसुदेवस्य धीमतः ।
    सुरभी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्वभूत् ।३८।
  • तत्र त्वं शिशुरेवाङ्कौ गोपालकृतलक्षणः ।
    वर्धयस्व मूहाबाहो पुरा त्रैविक्रमे यथा। ३९।
  • छादयित्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानं मायया योगरूपया।
    तत्रावतर लोकानां भवाय मधुसूदन। 1.55.४०।
    जयाशीर्वचनैस्त्वेते वर्धयन्ति दिवौकसः
    आत्मानमात्मना हि त्वमवतार्य महीतले ।४१।
  • देवकीं रोहिणीं चैव गर्भाभ्यां परितोषय
    गोपकन्यासहस्राणि रमयंश्चर मेदिनीम् ।४२।
  • "गाश्च ते रक्षतो विष्णो वनानि परिधावतः
    वनमालापरिक्षिप्तं धन्या द्रक्ष्यन्ति ते वपुः।४३।
  • विष्णौ पद्मपलाशाक्षे गोपालवसतिं गते
    बाले त्वयि महाबाहो लोको बालत्वमेष्यति ।४४।
  • त्वद्भक्ताः पुण्डरीकाक्ष तव चित्तवशानुगाः।
    गोषु गोपा भविष्यन्ति सहायाः सततं तव ।४५।
  • "वने चारयतो गाश्च गोष्ठेषु परिधावतः ।
    मज्जतो यमुनायां च रतिं प्राप्स्यन्ति ते त्वयि ।४६।
  • जीवितं वसुदेवस्य भविष्यति सुजीवितम् ।
    यस्त्वया तात इत्युक्तः स पुत्र इति वक्ष्यति ।४७।
  • अथवा कस्य पुत्रत्वं गच्छेथाः कश्यपादृते ।
    का च धारयितुं शक्ता त्वां विष्णो अदितिं विना ।४८।
  • योगेनात्मसमुत्थेन गच्छ त्वं विजयाय वै।
    वयमप्यालयान्स्वान्स्वान्गच्छामो मधुसूदन।४९।
  • वैशम्पायन उवाच
    स देवानभ्यनुज्ञाय विविक्ते त्रिदिवालये
    जगाम विष्णुः स्वं देशं क्षीरोदस्योत्तरां दिशम् ।1.55.५०।
  • "तत्र वै पार्वती नाम गुहा मेरोः सुदुर्गमा
    त्रिभिस्तस्यैव विक्रान्तैर्नित्यं पर्वसु पूजिता ।५१।
    पुराणं तत्र विन्यस्य देहं हरिरुदारधीः।
    आत्मानं योजयामास वसुदेवगृहे प्रभुः।५२।

  • "इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितामहवाक्ये पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।।५५।।
    हरिवंशपर्व सम्पूर्ण ।
    अध्याय 55 -
    "अनुवाद:-
    17. हे पितामह, क्या तुम्हे कुछ भी मालूम है, कि मैं किस प्रकार, किस देश में उत्पन्न होकर, किस घर में रहकर उनको मार डालूंगा।
  • 18. ब्रह्मा ने कहा: - हे भगवान, हे नारायण , मुझसे सफलता की कुंजी सुनो और पृथ्वी पर तुम्हारे माता-पिता कौन होंगे य।
  • 19. उनके कुल का यश बढ़ाने के लिये तुम्हें यादव कुल में जन्म लेना पड़ेगा ।
  • 20. तुम भलाई के लिये इन असुरों का नाश करके और अपने महान कुल को बढ़ाकर मानवजाति की व्यवस्था स्थापित करोगे। इस विषय में मुझसे सुनो.
  • 21 हे नारायण, प्राचीन काल में, महाबली वरुण के महान यज्ञ में , कश्यप ने यज्ञ के लिए दूध देने वाली सभी गायों को चुरा लिया था।
  • 24. कश्यप की दो पत्नियाँ थीं, अदिति और सुरभि , जो वरुण से गायों को स्वीकार नहीं करना चाहती थीं।
  • 23 तब वरुण मेरे पास आये और सिर झुकाकर प्रणाम करके बोले, “हे श्रद्धेय, गुरु ने मेरी सारी गायें अपहरण कर ली हैं।
  • 24. हे पिता, उस ने अपना काम पूरा करके भी उन गायोंको लौटाने की आज्ञा न दी।। वह अपनी दो पत्नियों अदिति और सुरभि के नियंत्रण में हैं।
    25. हे प्रभु, मेरी वे सब गायें जब चाहें तब स्वर्गीय और अनन्त दूध देती हैं। अपनी शक्ति से सुरक्षित होकर वे समुद्र में विचरण करते हैं।
    26. वे देवताओं के अमृत के समान सदा दूध उगलते रहते हैं। कश्यप के अलावा कोई और नहीं है जो उन्हें मोहित कर सके।
    27. हे ब्रह्मा, गुरु, उपदेशक या कोई भी हो यदि कोई भटक जाता है तो आप उसे नियंत्रित करते हैं। आप हमारे परम आश्रय हैं।
    28. हे संसार के गुरु, यदि उन शक्तिशाली व्यक्तियों को दंड नहीं दिया जाएगा जो अपना काम नहीं जानते हैं, तो संसार की व्यवस्था अस्तित्व में नहीं रहेगी।
    29. आप सर्वशक्तिमान और सबके स्वामी हैं। क्या तुम मुझे मेरी गायें दे दो, मैं फिर समुद्र में चला जाऊंगा।
    30. ये गायें मेरी आत्मा हैं , वे मेरी अनन्त शक्ति हैं। आपकी समस्त सृष्टि में गाय और ब्राह्मण ऊर्जा के शाश्वत स्रोत हैं।
    31. सबसे पहले गाय को बचाना चाहिए. जब वे बच जाते हैं तो वे ब्राह्मणों की रक्षा करते हैं। गौ-ब्राह्मणों की रक्षा से ही संसार कायम है।''
    32. हे अच्युत , जल के राजा वरुण द्वारा इस प्रकार संबोधित किये जाने पर और गायों की चोरी के बारे में वास्तव में सूचित होने पर मैंने कश्यप को श्राप दे दिया।
    33. जिस अंश से महामनस्वी कश्यप ने गायों को चुराया था, उस अंश से वह पृथ्वी पर ग्वाले के रूप में जन्म लेगा।
    34. उनकी दोनों पत्नियाँ सुरभि और अदिति, जो देवताओं के जन्म के लिये लकड़ी के टुकड़ों के समान हैं, भी उनके साथ जायेंगी।
  • 35-36. वह उनके यहां ग्वाले के रूप में जन्म लेकर वहां सुखपूर्वक रहेगा। उन्हीं के समान शक्तिशाली कश्यप का वह अंश वासुदेव के नाम से जाना जाएगा और पृथ्वी पर गायों के बीच रहेगा। मथुरा के पास गोवर्धन नाम का एक पर्वत है ।
    37-42. कंस को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए वह गायों से आसक्त होकर वहां रहता है। उनकी दो पत्नियाँ अदिति और सुरभि वासुदेव की देवकी और रोहिणी नाम की दो पत्नियों के रूप में पैदा हुईं । वहाँ दूधवाले के सभी गुणों से युक्त एक लड़के के रूप में जन्म लेने के कारण वह वहीं बड़ा हुआ जैसा कि आप पहले अपने तीन कदमों वाले रूप में करते थे।
  • फिर अपने आप को (योग के) रूप से कवर करके, हे मधुसूदन, क्या आप दुनिया के कल्याण के लिए वहां जाते हैं। ये सभी देवता आपकी विजय और आशीर्वाद के उद्घोष से आपका स्वागत कर रहे हैं। तुम पृथ्वी पर उतरकर रोहिणी और देवकी से अपना जन्म लेकर उन्हें प्रसन्न करो। सहस्रों दुग्ध दासियाँ भी पृथ्वी पर छा जायेंगी।
    43. हे विष्णु , जब आप जंगल में गायों को चराते हुए घूमेंगे तो वे जंगली फूलों की मालाओं से सुशोभित आपके सुंदर रूप को देखेंगे।
    44. हे कमल की पंखुड़ियों के समान नेत्रों वाले, हे विशाल भुजाओं वाले नारायण, जब आप बालक बनकर ग्वालबालों के गांवों में जाएंगे तो सभी लोग बालक बन जाएंगे।
    45-46. हे कमल नेत्रों वाले, आपके प्रति समर्पित मन वाले ग्वालबाल होने के नाते आपके सभी भक्त आपकी सहायता करेंगे; जंगल में गायें चराते, चरागाहों में दौड़ते और यमुना के जल में स्नान करते हुए वे तुम्हारे प्रति अत्यधिक स्नेह प्राप्त कर लेंगे। और वासुदेव का जीवन धन्य हो जाएगा।
  • 47. तू उसे अपना पिता कहेगा, और वह तुझे अपना पुत्र कहेगा। कश्यप को बचाइये और किसे आप अपने पिता के रूप में स्वीकार कर सकते हैं?
    48. हे विष्णु, अदिति को बचाएं और कौन आपको गर्भ धारण कर सकता है? इसलिए, हे मधुसूदन, आप अपने स्वनिर्मित योग द्वारा विजय के लिए आगे बढ़ें। हम भी अपनी-अपनी बस्तियों की मरम्मत करते हैं।
    49. वैशम्पायन ने कहा: - देवताओं को दिव्य क्षेत्र की मरम्मत करने का आदेश देकर भगवान विष्णु दूध के सागर के उत्तरी किनारे पर अपने निवास स्थान पर चले गए।
    50. इस क्षेत्र में सुमेरु पर्वत की एक गुफा है जिसे रौंदना कठिन है, जिसकी पूजा संक्रांति के दौरान उनके तीन चरण चिन्हों से की जाती है।
    51. वहाँ गुफा में, अपने पुराने शरीर को छोड़कर, सर्वशक्तिमान और बुद्धिमान हरि ने उसकी आत्मा को वासुदेव के घर भेज दिया।
    ____
    भगवान् हरि अपने अंशांश से पृथ्वी पर अवतार लेकर दैत्योंका वधरूपी कार्य सम्पन्न करते हैं।
    इसलिये अब मैं यहाँ श्रीकृष्ण के जन्म की पवित्र कथा कह रहा हूँ। वे साक्षात् भगवान् विष्णु ही यदुवंशमें अवतरित हुए थे ।39-40।
    _
    हे राजन् ! कश्यपमुनि के अंश से प्रतापी वसुदेव जी उत्पन्न हुए थे, जो पूर्वजन्म के शापवश इस जन्ममें गोपालन का काम करते थे। 41।
    हे महाराज! हे पृथ्वीपते! उन्हीं कश्यपमुनि की दो पत्नियाँ- अदिति और सुरसा ( नाग माता) ने भी शापवश पृथ्वीपर अवतार ग्रहण किया था।
    हे भरतश्रेष्ठ ! उन दोनों ने देवकी और रोहिणी नामक बहनों के रूपमें जन्म लिया था। मैंने यह सुना है कि क्रुद्ध होकर वरुण ने उन्हें महान् शाप दिया था ।। 42-43 ।।
  • राजा बोले- हे महामते। महर्षि कश्यप ने कौन सा ऐसा अपराध किया था, जिसके कारण उन्हें स्त्रियों सहित शाप मिला इसे मुझे बताइये ।44 ll
  • वैकुण्ठवासी, अविनाशी, रमापति भगवान् विष्णु को गोकुलमें जन्म क्यों लेना पड़ा ? ।। 45 ।।
    सबके स्वामी, अविनाशी, देवश्रेष्ठ युगके आदि तथा सबको धारण करने वाले साक्षात् भगवान् नारायण किसके आदेश से व्यवहार करते हैं और वे अपने स्थानको छोड़कर मानव-योनिमें जन्म लेकर मनुष्योंकी भाँति सब काम क्यों करते हैं; इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है ।46-47।
  • भगवान् विष्णु स्वयं मानव-शरीर धारण करके ही मनुष्य जन्म में अनेकविध लीलाएँ दिखाते हुए प्रपंच क्यों करते हैं ? ।48 ।
  • काम, क्रोध, अमर्ष, शोक, वैर, प्रेम, सुख, दुःख, भय, दीनता, सरलता, पाप, पुण्य, वचन, मारण, पोषण, चलन, ताप, विमर्श, आत्मश्लाघा, लोभ, दम्भ, मोह, कपट और चिन्ता-ये तथा अन्य भी नाना प्रकारके भाव मनुष्य जन्म में विद्यमान रहते हैँ ।49-51।
  • दैत्यानां हननं कर्म कर्तव्यं हरिणा स्वयम् ।अंशांशेन पृथिव्यां वै कृत्वा जन्म महात्मना ॥ ३९।
  • तदहं संप्रवक्ष्यामि कृष्णजन्मकथां शुभाम् ।स एव भगवान्विष्णुरवतीर्णो यदोः कुले ॥ ४० ॥
  • कश्यपस्य मुनेरंशो वसुदेवः प्रतापवान् ।गोवृत्तिरभवद्राजन् पूर्वशापानुभावतः ॥ ४१ ॥
  • "कश्यपस्य च द्वे पत्‍न्यौ शापादत्र महीपते ।
    अदितिः सुरसा चैवमासतुः पृथिवीपते ॥४२॥
    ___
    देवकी रोहिणी चोभे भगिन्यौ भरतर्षभ वरुणेन महाञ्छापो दत्तः कोपादिति श्रुतम् ॥४३॥
  • "राजोवाच
    किं कृतं कश्यपेनागो येन शप्तो महानृषिः ।सभार्यः स कथं जातस्तद्वदस्व महामते ॥४४ ॥
  • कथञ्च भगवान्विष्णुस्तत्र जातोऽस्ति गोकुले ।वासी वैकुण्ठनिलये रमापतिरखण्डितः ॥ ४५ ॥
  • निदेशात्कस्य भगवान्वर्तते प्रभुरव्ययः ।
    नारायणः सुरश्रेष्ठो युगादिः सर्वधारकः ॥४६ ॥
  • स कथं सदनं त्यक्त्वा कर्मवानिव मानुषे करोति जननं कस्मादत्र मे संशयो महान् ॥४७ ॥
  • प्राप्य मानुषदेहं तु करोति च विडम्बनम् भावान्नानाविधांस्तत्र मानुषे दुष्टजन्मनि ॥ ४८ ॥
  • कामः क्रोधोऽमर्षशोकौ वैरं प्रीतिश्च कर्हिचित् ।सुखं दुःखं भयं नॄणां दैन्यमार्जवमेव च ॥ ४९ ॥
  • दुष्कृतं सुकृतं चैव वचनं हननं तथा ।
    पोषणं चलनं तापो विमर्शश्च विकत्थनम् ॥ ५० ॥
  • लोभो दम्भस्तथा मोहः कपटः शोचनं तथा ।
    एते चान्ये तथा भावा मानुष्ये सम्भवन्ति हि ॥५१।

    "सुरसा रोहिणी के रूप में अवतरित हुईं क्योंकि सुरसा नाग माता हैं और बलराम स्वयं शेषनाग के रूप- इस तर्क से सुरभि न होकर सुरसा सा रोहिणी रूप में अवतरण होना समीचीन और प्राचीन है।
  • "पिता के मृत्यु के पश्चात -वसुदेव गोप रूप में गोपालन और कृषि करते हुए जीवन यापन किया"
    शूरसेनाभिधः शूरस्तत्राभून्मेदिनीपतिः ।
    माथुराञ्छूरसेनांश्च बुभुजे विषयान्नृप॥५९॥
    तत्रोत्पन्नः कश्यपांशः शापाच्च वरुणस्य वै ।वसुदेवोऽतिविख्यातः शूरसेनसुतस्तदा॥ ६०॥
    वैश्यवृत्तिरतः सोऽभून्मृते पितरि माधवः। उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान्॥६१॥
  • अनुवाद:-•-तब वहाँ के शूर पराक्रमी राजा शूरसेन नाम से हुए । और वहाँ की सारी सम्पत्ति भोगने का शुभ अवसर उन्हें प्राप्त हुआ ! वरुण के शाप के कारण कश्यप ही अपने अंश रूप में शूरसेन के पुत्र वसुदेव के रूप में उत्पन्न हुए कालान्तरण में पिता की मृत्यु हो जाने पर वसुदेव (वैश्य-वृति) से अपना जीवन निर्वाह करने लगे। उन दिनों उग्रसेन भी जो मथुरा के एक भाग पर राज्य पर राज करते थे ! जिनके कंस नामक महाशक्ति शाली पुत्र हुआ
    सन्दर्भ:- इति श्रमिद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः।२०।
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  • कश्यपस्य मुनेरंशो वसुदेवः प्रतापवान् ।
    गोवृत्तिरभवद्राजन् पूर्वशापानुभावतः॥४१॥
  • कश्यपस्य च द्वे पत्‍न्यौ शापादत्र महीपते ।
    अदितिः सुरसा चैवमासतुः पृथिवीपते ॥४२ ॥
  • देवकी रोहिणी चोभे भगिन्यौ भरतर्षभ ।
    वरुणेन महाञ्छापो दत्तः कोपादिति श्रुतम् ॥४३।
  • "राजोवाच
    किं कृतं कश्यपेनागो येन शप्तो महानृषिः ।
    सभार्यः स कथं जातस्तद्वदस्व महामते॥ ४४॥
  • कथञ्च भगवान्विष्णुस्तत्र जातोऽस्ति गोकुले।
    वासी वैकुण्ठनिलये रमापतिरखण्डितः॥४५ ॥
  • निदेशात्कस्य भगवान्वर्तते प्रभुरव्ययः ।
    नारायणः सुरश्रेष्ठो युगादिः सर्वधारकः ॥ ४६।
  • श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां सहितायां ॥
    चतुर्थस्कन्धे कर्मणो जन्मादिकारणत्वनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२।
  • "देवी भागवत महापुराण (देवी भागवत) में वसुदेव और देवकी तथा रोहिणी के पूर्व जन्म की कथा- वसुदेव का यदुवंश में जन्म लेकर गोपालन करना-
    स्कन्ध 4, अध्याय 3 -
    वसुदेव और देवकी के पूर्वजन्मकी कथा
    "देवीभागवतपुराणम्‎ स्कन्धः (४)
    दित्या अदित्यै शापदानम्
    "व्यास उवाच
    कारणानि बहून्यत्राप्यवतारे हरेः किल ।
    सर्वेषां चैव देवानामंशावतरणेष्वपि ॥१॥
  • वसुदेवावतारस्य कारणं शृणु तत्त्वतः ।
    देवक्याश्चैव रोहिण्या अवतारस्य कारणम् ॥ २॥
  • एकदा कश्यपः श्रीमान्यज्ञार्थं धेनुमाहरत् ।
    याचितोऽयं बहुविधं न ददौ धेनुमुत्तमाम् ॥ ३ ॥

    वरुणस्तु ततो गत्वा ब्रह्माणं जगतः प्रभुम् ।
    प्रणम्योवाच दीनात्मा स्वदुःखं विनयान्वितः ॥ ४ ॥

    किं करोमि महाभाग मत्तोऽसौ न ददाति गाम् ।
    शापो मया विसृष्टोऽस्मै गोपालो भव मानुषे॥ ५॥

    भार्ये द्वे अपि तत्रैव भवेतां चातिदुःखिते ।
    यतो वत्सा रुदन्त्यत्र मातृहीनाः सुदुःखिताः ॥ ६ ॥

    मृतवत्सादितिस्तस्माद्‌भविष्यति धरातले ।
    कारागारनिवासा च तेनापि बहुदुःखिता ॥ ७ ॥
  • "व्यास उवाच
    तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य यादोनाथस्य पद्मभूः ।
    समाहूय मुनिं तत्र तमुवाच प्रजापतिः ॥ ८ ॥
  • कस्मात्त्वया महाभाग लोकपालस्य धेनवः ।
    हृताः पुनर्न दत्ताश्च किमन्यायं करोषि च ॥ ९ ॥
  • जानन् न्यायं महाभाग परवित्तापहारणम् ।
    कृतवान्कथमन्यायं सर्वज्ञोऽसि महामते ॥ १० ॥
  • अहो लोभस्य महिमा महतोऽपि न मुञ्चति ।
    लोभं नरकदं नूनं पापाकरमसम्मतम् ॥ ११॥
  • कश्यपोऽपि न तं त्यक्तुं समर्थः किं करोम्यहम् ।
    सर्वदैवाधिकस्तस्माल्लोभो वै कलितो मया।१२॥
  • धन्यास्ते मुनयः शान्ता जितो यैर्लोभ एव च ।
    वैखानसैः शमपरैः प्रतिग्रहपराङ्मुखैः ॥ १३ ॥
  • संसारे बलवाञ्छत्रुर्लोभोऽमेध्योऽवरः सदा ।
    कश्यपोऽपि दुराचारः कृतस्नेहो दुरात्मना ॥ १४ ॥
  • ब्रह्मापि तं शशापाथ कश्यपं मुनिसत्तमम् ।
    मर्यादारक्षणार्थं हि पौत्रं परमवल्लभम् ॥ १५ ॥
  • अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले ।
    भार्याभ्यां संयुतस्तत्र गोपालत्वं करिष्यसि ॥१६॥
  • "व्यास उवाच
    एवं शप्तः कश्यपोऽसौ वरुणेन च ब्रह्मणा ।
    अंशावतरणार्थाय भूभारहरणाय च ॥ १७ ॥
  • तथा दित्यादितिः शप्ता शोकसन्तप्तया भृशम् ।
    जाता जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै ॥१८॥
  • "जनमेजय उवाच
    कस्माद्दित्या च भगिनी शप्तेन्द्रजननी मुने ।
    कारणं वद शापे च शोकस्तु मुनिसत्तम ॥ १९ ॥
  • "सूत उवाच
    पारीक्षितेन पृष्टस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः ।
    राजानं प्रत्युवाचेदं कारणं सुसमाहितः ॥ २०॥
  • "व्यास उवाच
    राजन् दक्षसुते द्वे तु दितिश्चादितिरुत्तमे ।
    कश्यपस्य प्रिये भार्ये बभूवतुरुरुक्रमे ॥ २१ ॥
  • अदित्यां मघवा पुत्रो यदाभूदतिवीर्यवान् ।
    तदा तु तादृशं पुत्रं चकमे दितिरोजसा ॥ २२ ॥
  • पतिमाहासितापाङ्गी पुत्रं मे देहि मानद ।
    इन्द्रख्यबलं वीरं धर्मिष्ठं वीर्यवत्तमम् ॥ २३ ॥
  • तामुवाच मुनिः कान्ते स्वस्था भव मयोदिते ।
    व्रतान्ते भविता तुभ्यं शतक्रतुसमः सुतः ॥ २४ ॥
  • सा तथेति प्रतिश्रुत्य चकार व्रतमुत्तमम् ।
    निषिक्तं मुनिना गर्भं बिभ्राणा सुमनोहरम् ॥ २५ ॥
  • भूमौ चकार शयनं पयोव्रतपरायणा ।
    पवित्रा धारणायुक्ता बभूव वरवर्णिनी ॥ २६ ॥
  • एवं जातः सुसंपूर्णो यदा गर्भोऽतिवीर्यवान् ।
    शुभ्रांशुमतिदीप्ताङ्गीं दितिं दृष्ट्वा तु दुःखिता॥२७।
  • मघवत्सदृशः पुत्रो भविष्यति महाबलः।
    दित्यास्तदा मम सुतस्तेजोहीनो भवेत्किल।२८।
  • इति चिन्तापरा पुत्रमिन्द्रं चोवाच मानिनी ।
    शत्रुस्तेऽद्य समुत्पन्नो दितिगर्भेऽतिवीर्यवान् ।२९ ॥
  • उपायं कुरु नाशाय शत्रोरद्य विचिन्त्य च ।
    उत्पत्तिरेव हन्तव्या दित्या गर्भस्य शोभन ॥३०॥
  • वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं सपत्‍नीभावमास्थिताम् ।
    दुनोति हृदये चिन्ता सुखमर्मविनाशिनी ॥३१ ॥
  • राजयक्ष्मेव संवृद्धो नष्टो नैव भवेद्‌रिपुः ।
    तस्मादङ्कुरितं हन्याद्‌बुद्धिमानहितं किल।३२ ॥
  • लोहशङ्कुरिव क्षिप्तो गर्भो वै हृदये मम ।
    येन केनाप्युपायेन पातयाद्य शतक्रतो ॥ ३३ ॥
  • सामदानबलेनापि हिंसनीयस्त्वया सुतः ।
    दित्या गर्भो महाभाग मम चेदिच्छसि प्रियम् ।३४।
  • "व्यास उवाच
    श्रुत्वा मातृवचः शक्रो विचिन्त्य मनसा ततः ।
    जगामापरमातुः स समीपममराधिपः ॥ ३५ ॥
  • ववन्दे विनयात्पादौ दित्याः पापमतिर्नृप ।
    प्रोवाच विनयेनासौ मधुरं विषगर्भितम् ॥३६॥
  • "इन्द्र उवाच
    मातस्त्वं व्रतयुक्तासि क्षीणदेहातिदुर्बला ।
    सेवार्थमिह सम्प्राप्तः किं कर्तव्यं वदस्व मे ॥३७ ॥
  • पादसंवाहनं तेऽहं करिष्यामि पतिव्रते ।
    गुरुशुश्रूषणात्पुण्यं लभते गतिमक्षयाम् ॥ ३८ ॥
  • न मे किमपि भेदोऽस्ति तथादित्या शपे किल ।
    इत्युक्त्वा चरणौ स्पृष्टा संवाहनपरोऽभवत् ॥३९॥
  • संवाहनसुखं प्राप्य निद्रामाप सुलोचना ।
    श्रान्ता व्रतकृशा सुप्ता विश्वस्ता परमा सती ॥४०।
  • तां निद्रावशमापन्नां विलोक्य प्राविशत्तनुम् ।
    रूपं कृत्वातिसूक्ष्मञ्च शस्त्रपाणिः समाहितः॥ ४१॥
  • उदरं प्रविवेशाशु तस्या योगबलेन वै ।
    गर्भं चकर्त वज्रेण सप्तधा पविनायकः॥ ४२ ॥
  • रुरोद च तदा बालो वज्रेणाभिहतस्तथा ।
    मा रुदेति शनैर्वाक्यमुवाच मघवानमुम् ॥ ४३ ॥
  • शकलानि पुनः सप्त सप्तधा कर्तितानि च ।
    तदा चैकोनपञ्चाशन्मरुतश्चाभवन्नृप ॥ ४४ ॥
  • तदा प्रबुद्धा सुदती ज्ञात्वा गर्भं तथाकृतम् ।
    इन्द्रेण छलरूपेण चुकोप भृशदुःखिता ॥ ४५ ॥
  • भगिनीकृतं तु सा बुद्ध्वा शशाप कुपिता तदा ।
    अदितिं मघवन्तञ्च सत्यव्रतपरायणा ॥ ४६ ॥
  • यथा मे कर्तितो गर्भस्तव पुत्रेण छद्मना ।
    तथा तन्नाशमायातु राज्यं त्रिभुवनस्य तु ॥ ४७ ॥
  • यथा गुप्तेन पापेन मम गर्भो निपातितः ।
    अदित्या पापचारिण्या यथा मे घातितः सुतः।४८ ॥
  • तस्याः पुत्रास्तु नश्यन्तु जाता जाताः पुनः पुनः ।
    कारागारे वसत्वेषा पुत्रशोकातुरा भृशम् ॥ ४९ ।
  • अन्यजन्मनि चाप्येव मृतापत्या भविष्यति ।
    "व्यास उवाच
    इत्युत्सृष्टं तदा श्रुत्वा शापं मरीचिनन्दनः ॥ ५० ॥
  • उवाच प्रणयोपेतो वचनं शमयन्निव ।
    मा कोपं कुरु कल्याणि पुत्रास्ते बलवत्तराः ॥५१॥
  • भविष्यन्ति सुराः सर्वे मरुतो मघवत्सखाः ।
    शापोऽयं तव वामोरु त्वष्टाविंशेऽथ द्वापरे ॥ ५२ ॥
  • अंशेन मानुषं जन्म प्राप्य भोक्ष्यति भामिनी ।
    वरुणेनापि दत्तोऽस्ति शापः सन्तापितेन च ॥५३॥
  • उभयोः शापयोगेन मानुषीयं भविष्यति ।
    "व्यास उवाच
    पतिनाश्वासिता देवी सन्तुष्टा साभवत्तदा ॥ ५४ ॥
  • नोवाच विप्रियं किञ्चित्ततः सा वरवर्णिनी ।
    इति ते कथितं राजन् पूर्वशापस्य कारणम् ॥५५ ॥
  • अदितिर्देवकी जाता स्वांशेन नृपसत्तम ॥ ५६ ॥
    इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां ॥ चतुर्थस्कन्धे दित्या अदित्यै शापदानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥

     इरावतीर्वरुण धेनवो वां मधुमद्वां सिन्धवो मित्र दुह्रे। - ऋ. ५.६९.२
    इरावतीर्वरुण धेनवो वां मधुमद्वां सिन्धवो मित्र दुह्रे।
    त्रयस्तस्थुर्वृषभासस्तिसॄणां धिषणानां रेतोधा वि द्युमन्तः॥२॥
  • अनुवाद:
    “हे मित्र और वरुण !, आपकी (आज्ञा से) गायें दूध से भरपूर होती हैं, और आपकी (इच्छा) से नदियाँ मीठा पानीय देती हैं; आपके आज्ञा से ही तीन दीप्तिमान वृषभ तीन क्षेत्रों (स्थानों) में अलग-अलग खड़े हैं।
    __
    हे “वरुण हे “मित्र “वां= युवयोराज्ञया “धेनवः= गावः “इरावतीः- इरा= क्षीरलक्षणा। तद्वत्यो भवन्ति । तथा “सिन्धवः =स्यन्दनशीला मेघा नद्यो वा “मधुमत्= मधुररसमुदकं "दुहे =दुहन्ति । तथा “त्रयः= त्रिसंख्याकाः “वृषभासः= वर्षितारः “रेतोधाः= वीर्यस्य धारकाः “द्युमन्तः= दीप्तिमन्तोऽग्निवाय्वादित्याः“तिसॄणां= त्रिसंख्याकानां “धिषणानां =स्थानानां [धिषण= स्थाने] पृथिव्यन्तरिक्षद्युलोकानां स्वामिनः सन्तः “वि= विविधं प्रत्येकं “तस्थुः =तिष्ठन्ति । युवयोरनुग्रहात् त्रयोऽपि देवास्त्रिषु स्थानेषु वर्तन्ते इत्यर्थः ॥
  • (वाम्) युवाम् (सिन्धवः) नद्यः (दुह्रे) दोहन्ति (तस्थुः) तिष्ठन्ति (वृषभासः) वर्षकाः षण्डा: (तिसृणाम्) त्रिविधानाम् (धिषणानाम्)स्थानानां (रेतोधाः) यो रेतो वीर्यं दधाति॥२॥
    हिन्दी अनुवाद:-
    व्यासजी बोले - [ हे राजन् ! ] भगवान् विष्णुके विभिन्न अवतार ग्रहण करने तथा इसी प्रकार सभी देवताओंके भी अंशावतार ग्रहण करनेके बहुतसे कारण हैं ॥1॥
  • अब वसुदेव, देवकी तथा रोहिणी के अवतारों का कारण यथार्थ रूपसे सुनिये ॥ 2 ॥
  • एक बार महर्षि कश्यप यज्ञकार्यके लिये वरुणदेवकी गौ ले आये। [ यज्ञ-कार्यकी समाप्तिके पश्चात्] वरुणदेवके बहुत याचना करनेपर भी उन्होंने वह उत्तम धेनु वापस नहीं दी ॥ 3 ॥
    तत्पश्चात् उदास मनवाले वरुणदेवने जगत्के स्वामी ब्रह्माके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक उनसे अपना दुःख कहा ॥ 4 ॥
  • हे महाभाग ! मैं क्या करूँ? वह अभिमानी कश्यप मेरी गाय नहीं लौटा रहा है। अतएव मैंने उसे शाप दे दिया कि मानवयोनि में जन्म लेकर तुम गोपालक हो जाओ और तुम्हारी दोनों भार्याएँ भी मानवयोनिमें उत्पन्न होकर अत्यधिक दुःखी रहें। मेरी गायके बछड़े मातासे वियुक्त होकर अति दुःखित हैं और रो रहे हैं, अतएव पृथ्वीलोक में जन्म लेने पर यह अदिति भी मृतवत्सा होगी। इसे कारागारमें रहना पड़ेगा, उससे भी उसे महान् कष्ट भोगना होगा ॥ 5-7 ॥
  • व्यासजी बोले- जल-जन्तुओं के स्वामी वरुण का यह वचन सुनकर प्रजापति ब्रह्मा ने मुनि कश्यप को वहाँ बुलाकर उनसे कहा- हे महाभाग ! आपने लोकपाल वरुणकी गायोंका हरण क्यों किया; और फिर आपने उन्हें लौटाया भी नहीं। आप ऐसा अन्याय क्यों कर रहे हैं? ॥ 8-9 ॥
  • हे महाभाग ! न्याय को जानते हुए भी आपने दूसरे के धनका हरण किया। हे महामते। आप तो सर्वज्ञ हैं; तो फिर आपने यह अन्याय क्यों किया ? ॥ 10 ॥
  • अहो! लोभ की ऐसी महिमा है कि वह महान् से महान् लोगोंको भी नहीं छोड़ता है। लोभ तो निश्चय ही पापोंकी खान, नरककी प्राप्ति करानेवाला और सर्वथा अनुचित है ॥ 11 ॥
  • महर्षि कश्यप भी उस लोभका परित्याग कर सकनेमें समर्थ नहीं हुए तो मैं क्या कर सकता हूँ। अन्ततः मैंने यही निष्कर्ष निकाला कि लोभ सदासे सबसे प्रबल है ॥ 12 ॥
  • शान्त स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, प्रतिग्रहसे पराङ्मुख तथा वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार किये हुए वे मुनिलोग धन्य हैं, जिन्होंने लोभपर विजय प्राप्त कर ली है ॥ 13 ॥
  • संसारमें लोभसे बढ़कर अपवित्र तथा निन्दित अन्य कोई चीज नहीं है; यह सबसे बलवान् शत्रु है। महर्षि कश्यप भी इस नीच लोभसे स्नेह करनेके कारण दुराचारमें लिप्त हो गये ॥ 14 ॥
  • अतएव मर्यादाकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने भी अपने परमप्रिय पौत्र मुनिश्रेष्ठ कश्यपको शाप दे दिया कि तुम अपने अंशसे पृथ्वीपर यदुवंशमें जन्म लेकर वहाँ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ गोपालनका कार्य करोगे ।। 15-16 ।।
  • व्यासजी बोले- इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वीका बोझ उतारनेके लिये वरुणदेव तथा ब्रह्माजी ने उन महर्षि कश्यपको शाप दे दिया था ॥ 17 ॥
  • उधर कश्यप की भार्या दितिने भी अत्यधिक शोकसन्तप्त होकर अदितिको शाप दे दिया कि क्रमसे तुम्हारे सातों पुत्र उत्पन्न होते ही मृत्यु को प्राप्त हो जायँ ॥ 18 ॥
  • जनमेजय बोले- हे मुने! दितिके द्वारा उसकी अपनी बहन तथा इन्द्रकी माता अदिति क्यों शापित की गयी? हे मुनिवर। आप दितिके शोक तथा उसके द्वारा प्रदत्त शापका कारण मुझे बताइये ॥ 19 ॥
  • सूतजी बोले- परीक्षित् पुत्र राजा जनमेजयके पूछनेपर सत्यवती पुत्र व्यासजी पूर्ण सावधान होकर राजाको शापका कारण बतलाने लगे ॥ 20॥
  • व्यासजी बोले- हे राजन्। दक्षप्रजापतिकी दिति और अदिति नामक दो सुन्दर कन्याएँ थीं। दोनों ही | कश्यपमुनिकी प्रिय तथा गौरवशालिनी पत्नियाँ बनीं ॥ 21 ॥
  • जब अदितिके अत्यन्त तेजस्वी पुत्र इन्द्र हुए, तब वैसे ही ओजस्वी पुत्रके लिये दितिके भी मन | इच्छा जाग्रत् हुई ॥ 22 ॥
  • उस समय सुन्दरी दितिने कश्यपजीसे प्रार्थन | की हे मानद इन्द्रके ही समान बलशाली, वीर, धर्मात्मा तथा परम शक्तिसम्पन्न पुत्र मुझे भी देनेकी कृपा करें ॥ 23 ॥
  • तब मुनि कश्यपने उनसे कहा-प्रिये धैर्य धारण करो, मेरे द्वारा बताये गये व्रतको पूर्ण करनेके अनन्तर इन्द्रके समान पुत्र तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा ॥ 24 ॥
  • कश्यपमुनि की बात स्वीकार करके दिति उस उत्तम व्रतके पालनमें तत्पर हो गयी। उनके ओज से सुन्दर गर्भ धारण करती हुई वह सुन्दरी दिति पयोव्रतमें स्थित रहकर भूमिपर सोती थी और पवित्रता का सदा ध्यान रखती थी।
    इस प्रकार क्रमशः जब वह महान् तेजस्वी गर्भ पूर्ण हो गया, तब शुभ ज्योतियुक्त तथा दीप्तिमान् अंगोंवाली दितिको देखकर अदिति दुःखित हुई । 25—27 ॥
  • [उसने अपने मनमें सोचा-] यदि दिति के | इन्द्रतुल्य महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तो निश्चय गर्भसे ही मेरा पुत्र निस्तेज हो जायगा ॥ 28 ॥
  • इस प्रकार चिन्ता करती हुई मानिनी अदितिने अपने पुत्र इन्द्रसे कहा-प्रिय पुत्र! इस समय दितिके | गर्भ में तुम्हारा अत्यन्त पराक्रमशाली शत्रु विद्यमान है। हे शोभन ! तुम सम्यक् विचार करके उस शत्रुके नाशका प्रयत्न करो, जिससे दितिकी गर्भोत्पत्ति हो विनष्ट हो जाय ।29-30।
  • मुझसे सपत्नीभाव रखनेवाली उस सुन्दरी दितिको देखकर सुखका नाश कर देनेवाली चिन्ता मेरे मनको सताने लगती है ॥ 31 ॥
  • जब शत्रु बढ़ जाता है तब राजयक्ष्मा रोगकी भाँति वह नष्ट नहीं हो पाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यका कर्तव्य है कि वह ऐसे शत्रुको अंकुरित होते ही नष्ट कर डाले ॥ 32 ॥
  • हे देवेन्द्र दितिका वह गर्भ मेरे हृदयमें लोहेकी कील के समान चुभ रहा है, अतः जिस किसी भी उपायसे तुम उसे नष्ट कर दो हे महाभाग ! यदि तुम मेरा हित करना चाहते हो तो साम, दान आदिके बलसे दितिके गर्भस्थ शिशुका संहार कर डालो ।। 33-34 ।।
  • व्यासजी बोले- हे राजन् ! तब अपनी माताकी वाणी सुनकर देवराज इन्द्र मन-ही-मन उपाय सोचकर अपनी विमाता दितिके पास गये। उस पापबुद्धि इन्द्रने विनयपूर्वक दितिके चरणोंमें प्रणाम किया और ऊपर से मधुर किंतु भीतर से विषभरी वाणी में विनम्रतापूर्वक उससे कहा- ॥ 35-36 ।।
  • इन्द्र बोले - हे माता! आप व्रतपरायण हैं, और अत्यन्त दुर्बल तथा कृशकाय हो गयी हैं। अतः मैं आपकी सेवा करनेके लिये आया हूँ। मुझे बताइये, मैं क्या करूँ? हे पतिव्रते मैं आपके चरण दबाऊँगा क्योंकि बड़ों की सेवासे मनुष्य पुण्य तथा अक्षय गति प्राप्त कर लेता है ॥ 37-38 ।।
  • मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि मेरे लिये माता अदिति तथा आप में कुछ भी भेद नहीं है। ऐसा कहकर इन्द्र उनके दोनों चरण पकड़कर दबाने लगे ।। 39 ।।
  • पादसंवाहन का सुख पाकर सुन्दर नेत्रोंवाली उस दितिको नींद आने लगी। वह परम सती दिति थकी हुई थी, व्रतके कारण दुर्बल हो गयी थी और उसे इन्द्रपर विश्वास था, अतः वह सो गयी।40 ॥
  • दिति को नींद के वशीभूत देखकर इन्द्र अपना अत्यन्त सूक्ष्म रूप बनाकर हाथमें शस्त्र लेकर बड़ी सावधानीके साथ दिति के शरीर में प्रवेश कर गये ॥ 41 ॥
  • इस प्रकार योगबलद्वारा दितिके उदरमें शीघ्र ही प्रविष्ट होकर इन्द्रने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर डाले ॥42 ॥
  • उस समय वज्राघात से दुःखित हो गर्भस्थ
    शिशु रुदन करने लगा। तब धीरेसे इन्द्र ने उससे 'मा रुद' 'मत रोओ'-ऐसा कहा ॥43 ॥
  • तत्पश्चात् इन्द्र ने पुनः उन सातों टुकड़ों के सात-सात खण्ड कर डाले। हे राजन्! वे ही टुकड़े उनचास मरुद्गणके रूपमें प्रकट हो गये ॥44 ॥
  • उस छली इन्द्रद्वारा अपने गर्भको वैसा (विकृत) किया गया जानकर सुन्दर दाँतोंवाली वह दिति जाग गयी और अत्यन्त दुःखी होकर क्रोध करने लगी। 45 ॥
  • यह सब बहन अदितिद्वारा किया गया है— ऐसा जानकर सत्यव्रतपरायण दिति ने कुपित होकर अदिति और इन्द्र दोनों को शाप दे दिया कि जिस प्रकार तुम्हारे पुत्र इन्द्र ने छलपूर्वक मेरा गर्भ छिन्न भिन्न कर डाला है, उसी प्रकार उसका त्रिभुवनका राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाय।
  • जिस प्रकार पापिनी अदिति ने गुप्त पाप के द्वारा मेरा गर्भ गिराया है और मेरे गर्भ को नष्ट करवा डाला है, उसी प्रकार उसके पुत्र भी क्रमशः उत्पन्न होते ही नष्ट हो जायँगे और वह पुत्र शोक से अत्यन्त चिन्तित होकर कारागार में रहेगी।
    अन्य जन्ममें भी इसकी सन्तानें इसी प्रकार मर जाया करेंगी ।46-49॥
  • व्यासजी बोले- इस प्रकार मरीचिपुत्र कश्यप ने | दितिप्रदत्त शापको सुनकर उसे सान्त्वना देते हुए प्रेमपूर्वक यह वचन कहा- हे कल्याणि तुम क्रोध मत करो, तुम्हारे पुत्र बड़े बलवान् होंगे।
    वे सब उनचास मरुद देवता होंगे, जो इन्द्रके मित्र बनेंगे। हे सुन्दरि अट्ठाईसवें द्वापरयुग में तुम्हारा शाप सफल होगा।
    उस समय अदिति मनुष्ययोनि में जन्म लेकर अपने किये कर्मका फल भोगेगी।
  • इसी प्रकार दुःखित वरुण ने भी उसे शाप दिया है। इन दोनों शापोंके संयोग से यह अदिति मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगी ।। 50 -53॥
  • व्यासजी बोले- इस प्रकार पति कश्यप के | आश्वासन देने पर दिति सन्तुष्ट हो गयी और वहपुनः कोई अप्रिय वाणी नहीं बोली। हे राजन् ! इस प्रकार मैंने आपको अदितिके पूर्व शापका कारण बताया हे नृपश्रेष्ठ वही अदिति अपने अंशसे देवकीके रूपमें उत्पन्न हुई ॥ 54-56 ॥
    जनमेजयको भगवतीकी महिमा सुनाना तथा कृष्णावतारकी कथाका उपक्रम-

    "हरिवंश पुराण हरिवंश पर्व -अध्याय - (55)
    "भगवतः विष्णुना नारदस्य कथनस्योत्तरं, ब्रह्मणा भगवन्तं तस्य
    गोपजातौ अवतारतारयोग्यस्थानस्य एवं पितामातादीनां परिचयम्"पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय-
  • हिन्दी-अनुवाद-सहित-

  • "वैशम्पायन उवाच
    नारदस्य वचः श्रुत्वा सस्मितं मधुसूदनः।
    प्रत्युवाच शुभं वाक्यं वरेण्यः प्रभुरीश्वरः।।१।।
  • त्रैलोक्यस्य हितार्थाय यन्मां वदसि नारद।
    तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य श्रूयतामुत्तरं वचः।।२।।
  • विदिता देहिनो जाता मयैते भुवि दानवाः।
    यां च यस्तनुमादाय दैत्यः पुष्यति विग्रहम्।३।।
  • जानामि कंसं सम्भूतमुग्रसेनसुतं भुवि।
    केशिनं चापि जानामि दैत्यं तुरगविग्रहम्।।४।।
  • नागं कुवलयापीडं मल्लौ चाणूरमुष्टिकौ।
    अरिष्टं चापि जानामि दैत्यं वृषभरूपिणम्।।५।।
  • विदितो मे खरश्चैव प्रलम्बश्च महासुरः।
    सा च मे विदिता विप्र पूतना दुहिताबलेः।।६।।
  • कालियं चापि जानामि यमुनाह्रदगोचरम् ।
    वैनतेयभयाद् यस्तु यमुनाह्रदमाविशत्।।७।।
  • विदितो मे जरासंधः स्थितो मूर्ध्नि महीक्षिताम्।
    प्राग्ज्योतिषपुरे वापि नरकं साधु तर्कये।।८।।
  • मानुषे पार्थिवे लोके मानुषत्वमुपागतम्।
    बाणं च शोणितपुरे गुहप्रतिमतेजसम्।।९।।
  • दृप्तं बाहुसहस्रेण देवैरपि सुदुर्जयम।
    मय्यासक्तां च जानामि भारतीं महतीं धुरम्।।1.55.१०।।
  • सर्वं तच्च विजानामि यथा योत्स्यन्ति ते नृपाः।
    क्षयो भुवि मया दृष्टः शक्रलोके च सत्क्रिया।
    एषां पुरुषदेहानामपरावृत्तदेहिनाम्।।११।।
  • सम्प्रवेक्ष्याम्यहं योगमात्मनश्च परस्य च।
    सम्प्राप्य पार्थिवं लोकं मानुषत्वमुपागतः।।१२।।
  • कंसादींश्चापि तान्सर्वान् वधिष्यामि महासुरान्।
    तेन तेन विधानेन येन यः शान्तिमेष्यति।।१३।।
  • अनुप्रविश्य योगेन तास्ता हि गतयो मया ।
    अमीषां हि सुरेन्द्राणांहन्तव्या रिपवो युधि।।१४।।
  • जगत्यर्थे कृतो योऽयमंशोत्सर्गो दिवौकसैः।
    सुरदेवर्षिगन्धर्वैरितश्चानुमते मम।।१५।।
  • विनिश्चयो प्रागेव नारदायं कृतो मया।
    निवासं ननु मे ब्रह्मन् विदधातु पितामहः।१६।।
    "यत्र देशे यथा जातो येन वेषेण वा वसन्। तानहं समरे हन्यां तन्मे ब्रूहि पितामह।।१७।।
    "ब्रह्मोवाच
    नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं शृणु मे विभो ।
    भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति।।१८।।
    यत्र त्वं च महाबाहो जातः कुलकरो भुवि ।यादवानां महद् वंशमखिलं धारयिष्यसि।।१९।।
    तांश्चासुरान्समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मनो महत्।स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय।। 1.55.२०।।

    पुरा हि कश्यपो विष्णो वरुणस्य महात्मनः।जहार यज्ञिया गा वै पयोदास्तु महामखे ।।२१।।

    अदितिः सुरभिश्चैते द्वे भार्ये कश्यपस्य तु।प्रदीयमाना गास्तास्तु नैच्छतां वरुणस्य वै।।२२।।

    ततो मां वरुणोऽभ्येत्य प्रणम्य शिरसा ततः ।उवाच भगवन् गावो गुरुणा मे हृता इति।।२३।।

    कृतकार्यो हि गास्तास्तु नानुजानाति मे गुरुः।अन्ववर्तत भार्ये द्वे अदितिं सुरभिं तथा ।।२४।।

    मम ता ह्यक्षया गावो दिव्याः कामदुहः प्रभो ।चरन्ति सागरान् सर्वान्रक्षिताः स्वेन तेजसा।।२५।।

    कस्ता धर्षयितुं शक्तो मम गाः कश्यपादृते ।अक्षयं वा क्षरन्त्यग्र्यं पयो देवामृतोपमम् ।२६।।

    प्रभुर्वा व्युत्थितो ब्रह्मन् गुरुर्वा यदि वेतरः। त्वया नियम्याः सर्वे वै त्वं हि नः परमागतिः।।२७।।

    यदि प्रभवतां दण्डो लोके कार्यमजानताम्। न विद्यते लोकगुरो न स्युर्वै लोकसेतवः ।।२८।।

    यथा वास्तु तथा वास्तु कर्तव्ये भगवान् प्रभुः।मम गावः प्रदीयन्तां ततो गन्तास्मि सागरम्।। २९।।

    या आत्मदेवता गावो या गावः सत्त्वमव्ययम्।लोकानां त्वत्प्रवृत्तानामेकं गोब्राह्मणं स्मृतम्। 1.55.३०।।

    त्रातव्याः प्रथमं गावस्त्रातास्त्रायन्ति ता द्विजान्।
    गोब्राह्मणपरित्राणे परित्रातं जगद् भवेत् ।।३१।।


    इत्यम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेनाहमच्युत।
    गवां कारणतत्त्वज्ञः कश्यपे शापमुत्सृजम् ।।३२।।

    येनांशेन हृता गावः कश्यपेन महर्षिणा ।
    स तेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वमेष्यति ।।३३।।

    या च सा सुरभिर्नाम अदितिश्च सुरारणिः।
    तेऽप्युभे तस्य भार्ये वै तेनैव सह यास्यतः।। ३४।।

    ताभ्यां च सह गोपत्वे कश्यपो भुवि रंस्यते।
    स तस्य कश्यपस्यांशस्तेजसा कश्यपोपमः।।३५।।

    वसुदेव इति ख्यातो गोषु तिष्ठति भूतले ।
    गिरिर्गोवर्धनो नाम मथुरायास्त्वदूरतः।।३६।।

    तत्रासौ गोषु निरतः कंसस्य करदायकः।
    तस्य भार्याद्वयं जातमदितिः सुरभिश्च ते।।३७।।

    देवकी रोहिणी चेमे वसुदेवस्य धीमतः ।
    सुरभी रोहिणी देवी चादितिर्देवकी त्वभूत्।।३८।।

    तत्र त्वं शिशुरेवाङ्कौ गोपालकृतलक्षणः ।
    वर्धयस्व मूहाबाहो पुरा त्रैविक्रमे यथा ।।३९।।

    छादयित्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानं मायया योगरूपया।
    तत्रावतर लोकानां भवाय मधुसूदन।। 1.55.४०।।
  • जयाशीर्वचनैस्त्वेते वर्धयन्ति दिवौकसः ।
    आत्मानमात्मना हि त्वमवतार्य महीतले।।४१।।
    देवकीं रोहिणीं चैव गर्भाभ्यां परितोषय।
    गोपकन्यासहस्राणि रमयंश्चर मेदिनीम्।।४२।।

    गाश्च ते रक्षतो विष्णो वनानि परिधावतः।
    वनमालापरिक्षिप्तं धन्या द्रक्ष्यन्ति ते वपुः।।४३।।

    विष्णौ पद्मपलाशाक्षे गोपालवसतिं गते।
    बाले त्वयि महाबाहो लोको बालत्वमेष्यति।।४४।।

    त्वद्भक्ताः पुण्डरीकाक्ष तव चित्तवशानुगाः।
    गोषु गोपा भविष्यन्ति सहायाः सततं तव।।४५।।

    वने चारयतो गाश्च गोष्ठेषु परिधावतः।
    मज्जतो यमुनायां च रतिं प्राप्स्यन्ति ते त्वयि।। ४६।।

    जीवितं वसुदेवस्य भविष्यति सुजीवितम् ।
    यस्त्वया तात इत्युक्तः स पुत्र इति वक्ष्यति।। ४७।।

    अथवा कस्य पुत्रत्वं गच्छेथाः कश्यपादृते ।
    का च धारयितुं शक्ता त्वां विष्णो अदितिं विना ।।४८।।

    योगेनात्मसमुत्थेन गच्छ त्वं विजयाय वै ।
    वयमप्यालयान्स्वान्स्वान्गच्छामो मधुसूदन।।४९।।
  • "वैशम्पायन उवाच
    स देवानभ्यनुज्ञाय विविक्ते त्रिदिवालये ।
    जगाम विष्णुः स्वं देशं क्षीरोदस्योत्तरां दिशम् ।। 1.55.५०।।

    तत्र वै पार्वती नाम गुहा मेरोः सुदुर्गमा ।
    त्रिभिस्तस्यैव विक्रान्तैर्नित्यं पर्वसु पूजिता।।५१।।

    पुराणं तत्र विन्यस्य देहं हरिरुदारधीः।
    आत्मानं योजयामास वसुदेवगृहे प्रभुः।।५२।।
  • इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितामहवाक्ये पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।।५५।।
  • *हिन्दी अनुवाद:-★
    ____
    हरिवंशपर्व सम्पूर्ण।
    वैशम्पायनजी कहते हैं–जनमेजय!भोग और मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले पुरुषों के द्वारा जो एकमात्र वरण करने योग्य हैं।
    वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर मधुसूदन श्रीहरि नारद की पूर्वोक्त बात सुनकर मुस्कराए और अपनी कल्याण कारी वाणी द्वारा उन्हें उत्तर देते हुए बोले –।१।
  • 'नारद ! तुम तीनों लोकों के हित के लिए मुझसे जो कुछ कह रहे हो -तुम्हारी वह बात उत्तम प्रवृत्ति के लिए प्रेरणा देने वाली है। अब तुम उसका उत्तर सुनो !।२।
  • अब मुझे भली भाँति विदित है कि ये दानव भूतल पर मानव शरीर धारण करके उत्पन्न हो गये हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि कौन कौन दैत्य किस किस शरीर को धारण करके वैर भाव की पुष्टि कर रहा है।३।
  • मुझे यह भी ज्ञात है कि कालनेमि उग्रसेनपुत्र कंस के रूप में पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ है । घोड़े का शरीर धारण करने वाले केशी दैत्य से भी मैं अपरिचित नहीं हूँ।४।
  • कुवलयापीड हाथी चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल तथा वृषभ रूपधारी दैत्य अरिष्टासुर को भी मैं अच्छी तरह जानता हूँ।५।
  • विप्रवर -खर और प्रलम्ब नामक असुर भी मुझसे अज्ञात नहीं हैं। राजा बलि की पुत्री पूतना को भी मैं जानता हूँ।६।
  • यमुना के कुण्ड में रहने वाले कालिया नाग को भी मैं जानता हूँ। जो गरुड के भय से उस कुण्ड में जा घुसा है।७।
  • मैं उस जरासन्ध से भी परिचित हूँ जो इस समय सभी भूपालों के मस्तक पर खड़ा है। प्राग्य- ज्योतिष पुर में रहने वाले नरकासुर को भी मैं भलीभाँति जानता हूँ।८।
  • भूतल के मानव लोक में जो मनुष्य रूप धारण कर के उत्पन्न हुआ है। जिसका तेज कुमार कार्तिकेय के समान है। जो शोणितपुर में निवास करता है। और अपनी हजार भुजाओं के कारण देवों के लिए भी अत्यन्त दुर्जेय हो रहा है। उस बलाभिमानी दैत्य वाणासुर को भी मैं जानता हूँ ।
  • तथा यह भी जानता हूँ कि पृथ्वी पर जो भारती सेना का महान भार बढ़ा हुआ है उसे उतारने का उत्तरदायित्व( भार,) मुझपर ही अवलम्बित है।९-१०।
  • मैं उन सारी बातों से परिचित हूँ कि किस प्रकार वे राजा लोग आपस में युद्ध करेंगे। भूतल पर उनका किस प्रकार संहार होगा। और पुनर्जन्म से रहित देह धारण करने वाले इन नरेशों को इन्द्र लोक में किस प्रकार सत्कार प्राप्त होगा।– यह सब कुछ मेरी आँखों के सामने है।११।
  • मैं भूलोक में पहुँच कर मानव शरीर धारण करके स्वयं तो उद्योग का आश्रय लुँगा ही दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करुँगा।१२।
  • जिस जिस विधि से जो जो असुर मर सकेगा उस उस उपाय से ही मैं उन सभी कंस आदि बड़े़ बड़े़ असुरों का वध करुँगा१३।
  • मैं योग से इनके भीतर प्रवेश करके इनकी अन्तर्धान गतियों को नष्ट कर दुँगा और इस प्रकार युद्ध में इन देवेश्वरों के शत्रुओं का वध कर डालुँगा।१४।
  • नारद ! पृथ्वी के हित के लिए स्वर्गवासी देवताओं देवर्षियों तथा गन्धर्वों के यहाँ से जो अपने अपने अंश का उत्सर्ग किया है वह सब मेरी अनुमति से हुआ है । क्योंकि मैंने पहले से ही ऐसा निश्चय कर लिया था।
    ____
    ब्रह्मन् अब यह ब्रह्मा जी ही मेरे लिए निवास स्थान की व्यवस्था करें। पितामह !अब आप ही मुझे बताइए कि मैं किस प्रदेश में और किस जाति जन्म लेकर और किस वेष में रहकर उन सब असुरों का समर भूमि नें संहार करुँगा ?।१६-१७।
  • ब्रह्मा जी ने कहा– सर्वव्यापी नारायण आप मुझसे इस उपाय को सुनिये , जिसके द्वारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो जाएगा। महाबाहो ! भूतल पर जो आपके पिता होंगे और जो माता होगीं और जहाँ जन्म लेकर आप अपने कुल की वृद्धि करते हुए यादवों के सम्पूर्ण विशाल वंश को धारण करेंगे-
    तथा उन समस्त असुरों का वध कर के अपने वंश का महान विस्तार करते हुए,जिस प्रकार मनुष्यों के लिए धर्म की मर्यादा स्थापित करेंगे। वह सब बताता हूँ – सुनिए!।१८-२०।
  • विष्णो ! पहले की बात है महर्षि कश्यप अपने महान यज्ञ को अवसर पर महात्मा वरुण के यहाँ से कुछ दुधारू गायें माँग लाये थे। जो अपने दूध आदि के द्वारा यज्ञ में बहुत ही उपयोगिनी थीं।२१।
  • यज्ञ कार्य पूर्ण हो जाने पर भी कश्यप की दो पत्नीयों अदिति और सुरभि ने वरुण को उसकी गायें लौटा देने की इच्छा नहीं की।२२।
  • तब वरुण देव मेरे पास आये, मस्तक झुकाकर मुझे प्रणाम करने के पश्चात बोले – भगवन पिता जी ने मेरी गायें लाकर अपने यहाँ करली हैं।२३।
  • यद्यपि उन गायों से जो कार्य लेना था वह पूरा हो गया है। तो भी पिता जी मुझे उन गायों को वापस ले जाने की आज्ञा नहीं देते हैं। इस विषय में उन्होंने अपनी दो पत्नीयों अदिति और सुरभि के मत का अनुसरण किया है।२४।
  • प्रभु मेरी वे गायें दिव्या, अक्षया और कामधेनु रूपिणी हैं । तथा अपने ही तेज से सुरक्षित रहकर समस्त समुद्रों में विचरण करती हैं।२५।
  • देव ! जो अमृत के समान उत्तम दूध को अविच्छिन्न रूप से देती रहती है। मेरी उन गायों को पिता कश्यप के अतिरिक्त दूसरा कौन बलपूर्वक रोक सकता है?।२६।
  • ब्रह्मन ! कोई कितना ही शक्तिशाली हो, गुरुजन हो अथवा और कोई हो, यदि वह मर्यादा का त्याग करता है। तो आप ही ऐसे सब लोगों पर नियन्त्रण कर सकते हैं। क्योंकि आप हम सब लोगों के परम आश्रय हैं।।२७।
  • लोकगुरो ! यदि संसार में अपने कर्तव्य से अनभिज्ञ रहने वाले शक्तिशाली पुरुषों के लिए दण्ड की व्यवस्था न हो तो जगत् की सारी मर्यादाऐं नष्ट हो जाऐंगी।२८।
  • इस कार्य का जैसा परिणाम होने वाला हो वैसा ही कर्तव्य का पालन करने या कराने में आप ही हमारे प्रभु हैं। मुझे मेरी गायें दिलवा दीजिये तभी मैं समुद्र के लिए प्रस्थान करुँगा।२९।
  • इन गायों के देवता साक्षात्- परम् - ब्रह्म परमात्मा हैं। तथा ये अविनाशी सत्व गुण का साकार रूप हैं। आपसे प्रकट जो -जो लोक हैं उन सबकी दृष्टि में गौ और ब्राह्मण ( ब्रह्म ज्ञानी) समान माने गये हैं।३०।
  • गौओं और ब्राह्मण की रक्षा होने पर सम्पूर्ण जगत की रक्षा हो जाती है।३१।
  • अच्युत ! जल के स्वामी वरुण के ऐसा कहने पर गौओं के कारण तत्व को जानने वाले मुझ( ब्रह्मा) ने शाप देते हुए कहा-।३२।
  • महर्षि कश्यप के जिस अंश के द्वारा वरुण की गायों का हरण किया गया है वह उस अंश से पृथ्वी पर जाकर गोपत्व को प्राप्त कर गोप होंगे।३३।
  • वे जो सुरभि नाम वाली और देव -रूपी अग्नि को उत्पन्न करने वाली अरणि के समान जो अदिति देवी हैं। वे दौंनो पत्नीयाँ कश्यप के साथ ही भूलोक पर जाऐंगी।३४।
  • गोप जाति में जन्मे कश्यप भूतल पर अपनी उन दौंनों पत्नीयों के साथ सुखपूर्वक रहेंगे। कश्यप का दूसरा अंश कश्यप के समान ही तेजस्वी होगा। वह भूतल पर वसुदेव नाम से विख्यात हो गोओं और गोपों के अधिपति रूप में मथुरा से थोड़ी दूर पर गोवर्द्धन नामक पर्वत है।
  • जहाँ वे वसुदेव गायों के पालन में लगे रहेंगे ,और कंस को कर (टैक्स) देने वाले होंगे। वहाँ अदिति और सुरभि नामकी इनकी दौंनों पत्नीयाँ बुद्धि- मान् वसुदेव की देवकी और रोहिणी नामक दो पत्नीयाँ बनेंगीं। उनमें सुरभि तो रोहिणी देवी होगी और अदिति देवकी होगी।३५-३८।
  • हे विष्णो ! वहाँ तुम प्रारम्भ में शिशु रूप में ही गोप बालक के चिन्ह धारण करके क्रमशः बड़े होइये , ठीक उसी प्रकार जैसे त्रिविक्रमावतार के समय आप वामन (बौना) से बढ़कर विराट् हो गये थे।३९।
  • मधुसूदन ! योगमाया के द्वारा स्वयं ही अपने स्वरूप का आच्छादित करके (छिपाकर के ) आप लोक कल्याण के लिए वहाँ अवतार लीजिए ।४०।
  • ये देवगण विजयसूचक आशीर्वाद देकर आपके अभ्युदय की कामना करते हैं। आप पृथ्वी पर स्वयं अपने रूप को उतारकर दो गर्भों के रूप में प्रकट हो माता देवकी और रोहिणी को सन्तुष्ट कीजिये । साथ ही हजारों गोपकन्याओं के साथ रास नृत्य का आनन्द प्रदान करते हुए पृथ्वी पर विचरण कीजिये ।४१-४२।
  • 'विष्णो ! वहाँ गायों की रक्षा करते हुए जब आप स्वयं वन -वन में दौड़ते फिरेगे ! उस समय आपके वन माला विभूषित मनोहर रूप का जो लोग दर्शन करेंगे वे धन्य हो जाऐंगे ।४३।
  • महाबाहो! विकसित कमल- दल के समान नेत्र वाले आप सर्वव्यापी परमेश्वर ! जब गोप -बालक के रूप में व्रज में निवास करोगे ! उस समय सब लोग आपके बाल रूप की झाँकी करके स्वयं भी बालक बन जाऐंगे (बाल लीला के रसास्वादन में तल्लीन हो जाऐंगे)।४४।
  • कमल नयन आपके चित्त के अनुरूप चलने वाले आपके भक्तजन वहाँ गायों की सेवा के लिए गोप बनकर जन्म लेंगे और सदा आप के साथ साथ रहेंगे ।४५।
  • हे प्रभु ! जब आप वन में गायें चराते होंगे , व्रज में इधर -उधर दौड़ते होंगे , तथा यमुना नदी के जल में गोते लगाते होगें , उन सभी अवसरों पर आपका दर्शन करके वे भक्तजन आप में उत्तरोत्तर अनुराग प्राप्त करेंगे ।४६।
  • वसुदेव का जीवन वास्तव में उत्तम जीवन होगा ! जो आप के द्वारा तात ! कहकर पुकारे जाने पर आप से पुत्र (वत्स) कहकर बोलेंगे ४७।
  • विष्णो ! अथवा आप कश्यप के अतिरिक्त दूसरे किसके पुत्र होंगे ? देवी अदिति के अतिरिक्त दूसरी कौन सी स्त्री आपको गर्भ में धारण कर सकेगी ?।४८।
  • मधुसूदन ! आप अपने स्वाभाविक योग- बल से असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिए यहाँ से प्रस्थान कीजिये ! और अब हम लोग भी अपने -अपने निवास स्थान को जा रहे हैं।४९।
  • वैशम्पायन जी कहते हैं– देव लोक के उस पुण्य प्रदेश में बैठे हुए भगवान विष्णु देवताओं को जाने की आज्ञा देकर क्षीर सागर से उत्तर दिशा में स्थित अपने निवास स्थान (श्वेत द्वीप) को चले गये।५०।
  • वहाँ मेरु पर्वत की पार्वती नाम से प्रसिद्ध एक अत्यन्त दुर्गम गुफा है। जो भगवान विष्णु के तीन चरण चिन्हों से चिन्हित होती है , इसी लिए पर्व के अवसरों पर सदा उसकी पूजा की जाती है।५१।
  • उदारबुद्धि वाले भगवान् श्रीहरि विष्णु ने अपने पुरातन विग्रह को (शरीर) को स्थापित करके अपने आपको वसुदेव के घर में अवतीर्ण होने के कार्य में लगा दिया।५२।
    __
    "इस प्रकार श्री महाभारत के खिलभाग हरिवंश के अन्तर्गत हरिवंश पर्व में ब्रह्मा जी का वचन विषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।५५।
  • नारद पुराण में सभी गोपों की पूजा का विधान-
  • दक्षिणे वासुदेवाख्यं स्वच्छं चैतन्यमव्ययम् ।।
    वामे च रुक्मिणीं तदून्नित्यां रक्तां रजोगुणाम्। ८०-५८।
  • एवं सम्पूज्य गोपालं कुर्यादावरणार्चनम्।
    यजेद्दामसुदामौ च वसुदामं च किंकिणीम् ।। ८०-५९ ।।
  • पूर्वाद्याशासु दामाद्या ङेंनमोन्तध्रुवादिकाः ।।
    अग्निनैर्ऋतिवाय्वीशकोणेषु हृदयादिकान् ।। ८०-६० ।।
  • दिक्ष्वस्त्राणि समभ्यर्च्य पत्रेषु महिषीर्यजेत् ।
    रुक्मिणी सत्यभामा च नाग्नजित्यभिधा पुनः ।। ८०-६१ ।।
  • सुविन्दा मित्रविन्दा च लक्ष्मणा चर्क्षजा ततः ।।
    सुशीला च लसद्रम्यचित्रितांबरभूषणा ।८०-६२।
  • ततो यजेद्दलाग्रेषु वसुदेवञ्च देवकीम्।
    नंदगोपं यशोदां च बलभद्रं सुभद्रिकाम् ।८०-६३।
  • गोपानूगोपीश्च गोविंदविलीनमतिलोचनान् ।।
    ज्ञानमुद्राभयकरौ पितरौ पीतपाण्डुरौ।८०-६४।
  • दिव्यमाल्याम्बरालेपभूषणे मातरौ पुनः।
    धारयन्त्यौ चरुं चैव पायसीं पूर्णपात्रिकाम् ।। ८०-६५ ।।
    अनुवाद:-
    इनके पूजन के उपरान्त वसुदेव - देवकी नन्दगोप यशोदा बलराम सुभद्रा और गोविन्द में लीन नेत्र तथा मति वाले गोप गोपियों और ज्ञान मुद्रा अभयमुद्राधारी पितरों की जो पीले और सफेद रंग वाले हैं उन सबकी पूजा करें- तत्पश्चात दलाग्र में दिव्य माला वस्त्र भूषण सज्जित माताओं की पुन: पूजा करें। वे चरण तथा खीर भरे पात्रों को धारण करने वाली हैं।।६३-६५।।

    अनुवाद:-
    इनके पूजन के उपरान्त वसुदेव - देवकी नन्दगोप यशोदा बलराम सुभद्रा और गोविन्द में लीन नेत्र तथा मति वाले गोप गोपियों और ज्ञान मुद्रा अभयमुद्राधारी पितरों की जो पीले और सफेद रंग वाले हैं उन सबकी पूजा करें- तत्पश्चात दलाग्र में दिव्य माला वस्त्र भूषण सज्जित माताओं की पुन: पूजा करें। वे चरण तथा खीर भरे पात्रों को धारण करने वाली हैं।।६३-६५।।
    ___०_____
  • "नन्द के परिवार का परिचय-
    "वृष्णे: कुले उत्पन्नस्य देवमीणस्य पर्जन्यो नाम्न: सुतो। वरिष्ठो बहुशिष्टो व्रजगोष्ठीनां स कृष्णस्य पितामह।१।
    अनुवाद:-
    यदुवंश के वृष्णि कुल में देवमीण जी के पुत्र पर्जन्य नाम से थे। जो बहुत ही शिष्ट और अत्यन्त महान समस्त व्रज समुदाय के लिए थे। वे पर्जन्य श्रीकृष्ण के पितामह अर्थात नन्द बाबा के पिता थे।१।
    "पुरा काले नन्दीश्वरे प्रदेशे वसन्सह गोपै:।
    स्वराटो विष्णो: तपयति स्म पर्जन्यो यति।।२।
    अनुवाद:- प्राचीन काल में नन्दीश्वर प्रदेश में गोपों के साथ रहते हुए वे पर्जन्य यतियों के जीवन धारण करके स्वराट्- विष्णु का तप करते थे।२।
  • तपसानेन धन्येन भाविन: पुत्रा वरीयान्। पञ्च ते मध्यमस्तेषां नन्दनाम्ना जजान।३।
    "अनुवाद:- महान तपस्या के द्वारा उनके श्रेष्ठ पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। जिनमें मध्यम पुत्र नन्द नाम से थे।३।

    तुष्टस्तत्र वसन्नत्र प्रेक्ष्य केशिनमागतं।
    परीवारै: समं सर्वैर्ययौ भीतो गोकुलं।।४।
    "अनुवाद:- वहाँ सन्तोष पूर्ण रहते हुए केशी नामक असुर को आया हुआ देखकर परिवार के साथ पर्जन्य जी भय के कारण नन्दीश्वर को छोड़कर गोकुल (महावन) को चले गये।४।

    कृष्णस्य पितामही महीमान्या कुसुम्भाभा हरित्पटा।
    वरीयसीति वर्षीयसी विख्याता खर्वा: क्षीराभ लट्वा।५।
    "अनुवाद:- कृष्ण की दादी( पिता की माता) वरीयसी जो सम्पूर्ण गोकुल में बहुत सम्मानित थीं ; कुसुम्भ की आभा वाले हरे वस्त्रों को धारण करती थीं। वह छोटे कद की और दूध के समान बालों वाली और अधिक वृद्धा थीं।५।
  • भ्रातरौ पितुरुर्जन्यराजन्यौ च सिद्धौ गोषौ ।
    सुवेर्जना सुभ्यर्चना वा ख्यापि पर्जन्यस्य सहोदरा।६।
    "अनुवाद:- नन्द के पिता पर्जन्य के दो भाई अर्जन्य और राजन्य प्रसिद्ध गोप थे। सुभ्यर्चना नाम से उनकी एक बहिन भी थी।६।
  • गुणवीर: पति: सुभ्यर्चनया: सूर्यस्याह्वयपत्तनं।
    निवसति स्म हरिं कीर्तयन्नित्यनिशिवासरे।।७।
    "अनुवाद:- सुभ्यर्चना के पति का नाम गुणवीर था। जो सूर्य-कुण्ड नगर के रहने वाले थे। जो नित्य दिन- रात हरि का कीर्तन करते थे।७।
  • उपनन्दानुजो नन्दो वसुदेवस्य सुहृत्तम:।
    नन्दयशोदे च कृष्णस्य पितरौ व्रजेश्वरौ।८।
    "अनुवाद:- उपनन्द के भाई नन्द वसुदेव के सुहृद थे और कृष्ण के माता- पिता के रूप में नन्द और यशोदा दोनों व्रज के स्वामी थे। ८।

    वसुदेवोऽपि वसुभिर्दीव्यतीत्येष भण्यते।
    यथा द्रोणस्वरूपाञ्श: ख्यातश्चानक दुन्दुभ:।९।
    "अनुवाद:-वसु शब्द पुण्य ,रत्न ,और धन का वाचक है। वसु के द्वारा देदीप्यमान(प्रकाशित) होने के कारण श्रीनन्द के मित्र वसुदेव कहलाते हैं। अथवा विशुद्ध सत्वगुण को वसुदेव कहते हैं।
    इस अर्थ नें शुद्ध सत्व गुण सम्पन्न होने से इनका नाम वसुदेव है। ये द्रोण नामक वसु के स्वरूपाञ्श हैं। ये आनक दुन्दुभि नाम से भी प्रसिद्ध हैं।९।
    वसु= (वसत्यनेनेति वस + “शॄस्वृस्निहीति ।” उणाणि १ । ११ । इति उः) – रत्नम् । धनम् । इत्यमरःकोश ॥ (यथा, रघुः । ८ । ३१ । “बलमार्त्तभयोपशान्तये विदुषां सत्कृतये
    बहुश्रुतम् । वसु तस्य विभोर्न केवलं गुणवत्तापि परप्रयोजनम् ॥) वृद्धौषधम् । श्यामम् । इति मेदिनीकोश । हाटकम् । इति विश्वःकोश ॥ जलम् । इति सिद्धान्त- कौमुद्यामुणादिवृत्तिः ॥
    __________
  • नामेदं नन्दस्य गारुडे प्रोक्तं मथुरामहिमक्रमे।
    वृषभानुर्व्रजे ख्यातो यस्य प्रियसुहृदर:।।१०।
    "अनुवाद:- नन्द के ये नाम गरुडपुराण के मथुरा महात्म्य में कहे गये हैं। व्रज में विख्यात श्री वृषभानु जी नन्द के परम मित्र हैं।१०।
  • माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।
    मूर्ता वत्सलते! वासौ इन्द्रचापनिभाम्बरा।।११।
    "अनुवाद:- श्रीकृष्ण की माता गोप जाति को यश प्रदान करने वाली होने से यशोदा कहलाती हैं।
    इनकी अंग कान्ति श्यामल वर्ण की है ये वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं।और इनके वस्त्र इन्द्र धनुष के समान हैं ।११।
  • गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक् ।
    अयं जातः कृष्णवर्ण एतत्कुलविलक्षणम्॥५ ॥
    यशोदा; त्वम्- आप; नन्द - नन्द; त्वम् - आप; गौर- वर्ण - धृक् - धारक करने वाले; अयम् - वह; जाता - जन्मा; कृष्ण-वर्णा - श्याम; एतत् - कुल - इस कुल में; विलक्षणम् -असामान्य।
    "गर्गसंहिता- ३/५/७
    हे यशोदा, तुम्हारा रंग गोरा है। हे नन्द, तुम्हारा रंग भी गोरा है। यह लड़का बहुत काला है। वह परिवार के बाकी लोगों से अलग है।
    *
    श्रीगर्गसंहितायां गिरिराजखण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे
    गोपविवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
    "विशेष- यशोदा का वर्ण(रंग) श्यामल (साँबला) ही था। गौरा रंग कभी नहीं था- यह बात पन्द्रहवीं सदी में लिखित "श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका में भी लिखी हुई है।
    परन्तु उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में काशी पण्डित- पीठ ने गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के पञ्चम अध्याय में तीन फर्जी श्लोक प्रकाशन काल में लिखकर जोड़ दिए हैं।
    जिनको हम ऊपर दे चुके हैं।
  • शास्त्रों गोपों की वीरता सर्वत्र प्रतिध्वनित है।
    "वसुदेवसुतो वैश्यःक्षत्रियश्चाप्यहंकृतः।
    आत्मानं भक्तविष्णुश्चमायावी च प्रतारकः।६।"(ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड (४)१२१ वाँ अध्याय)
    प्रसंग:- श्रृगाल नामक एक मण्डलेश्वर राजाधिराज था ; जो जय-विजय की तरह गोलोक से नीचेवैकुण्ठ मे द्वारपाल था। जिसका नाम सुभद्र था जिसने लक्ष्मी के शाप से भ्रष्ट हेकर पृथ्वी पर जन्म लिया। उसी श्रृगाल की कृष्ण के प्रति शत्रुता की सूचना देने के लिए एक ब्राह्मण कृष्ण की सुधर्मा सभा आता है और वह उस श्रृगाल मण्डलेश्वर के कहे हुए शब्दों को कृष्ण से कहता है।
    हे प्रभु आपके प्रति श्रृँगाल ने कहा :-
    श्लोक का अनुवाद:-
    "वसुदेव का पुत्र कृष्ण वैश्य जाति का है; वह अहंकारी क्षत्रिय भी है।"
    वह तो विष्णु को अपना भक्त कहता है; इसलिए वह मायावी और ठग है ।६।
    ________
    {ब्रह्मवैवर्त पुराण खण्ड (४)१२१ वाँ अध्याय

  • _________
    आदिपुराणे प्रोक्तं देने नाम्नी नन्द भार्याया यशोदा देवकी -इति च।।
    अत: सख्यमभूत्तस्या देवक्या: शौरिजायया।।१२।
    "अनुवाद:- आदि पुराण में वर्णित नन्द की पत्नी यशोदा का नाम देवकी भी है। इस लिए शूरसेन के पुत्र वसुदेव की पत्नी देवकी के साथ नाम की भी समानता होने के कारण स्वाभाविक रूप में यशोदा का सख्य -भाव भी है।१२।
  • उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजौ पितु:।
    पितृव्यौ तु कनीयांसौ स्यातां सनन्द नन्दनौ।१३।
    "अनुवाद:- श्री नन्द के उपनन्द और अभिनन्दन बड़े भाई तथा आनन्द और नन्दन नाम हे दो छोटे भाई भी हैं। ये सब कृष्ण के पितृव्य( ताऊ-चाचा)हैं।१३।
  • "आद्य: सितारुणरुचिर्दीर्घकूचौ हरित्पट:।
    तुङ्गी प्रियास्य सारङ्गवर्णा सारङ्गशाटिका।।१४।
    "अनुवाद:- सबसे बड़े भाई उपनन्द की अंग कान्ति धवल ( सफेद) और अरुण( उगते हुए सूर्य) के रंग के मिश्रण अर्थात- गुलाबी रंग जैसी है। इनकी दाढ़ी बहुत लम्बी और वस्त्र हरे रंग के हैं । इनकी पत्नी का नाम तुंगी है। जिनकी अंग कन्ति तथा साड़ी का रंग सारंग( पपीहे- के रंग जैसा है।१४।

    द्वितीयो भ्रातुरभिनन्दनस्य भार्या पीवरी ख्याता।
    पाटलविग्रहा नीलपटा लम्बकूर्चोऽसिताम्बरा:।।१५ ।
    "अनुवाद:- दूसरे भाई श्री -अभिनन्द की अंग कान्ति शंख के समान गौर वर्ण है। और दाढ़ी लम्बी है। ये काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। इनकी पत्नी का नाम पीवरी जो नीले रंग के वस्त्र धारण करती हैं। तथा जिनकी अंग कान्ति पाटल ( गुलाब) रंग की है।१५।

    सुनन्दापरपर्याय: सनन्दस्य च पाण्डव:।
    श्यामचेल: सितद्वित्रिकेशोऽयं केशवप्रिय:।१६।
    "अनुवाद:- आनन्द का दूसरा नाम सन्नन्द है। इनकी अंग कान्ति पीला पन लिए हुए सफेद रंग की तथा वस्त्र काले रंग के हैं। इनके शिर के सम्पूर्ण बालों में केवल दो या तीन बाल ही सफेद हुए हैं। ये केशव- कृष्ण के परम प्रिय है।१६।
  • सनन्दस्य भार्या कुवलया नाम्न: ख्याता।
    रक्तरङ्गाणि वस्त्राणि धारयति तस्या: कुवलयच्छवि:।१७।
    "अनुवाद:-सनन्द की पत्नी का नाम कुवलया है।
    जो कुवलय( नीले और हल्के लाल के मिश्रण जैसे ) वस्त्रों को धारण करने वाली तथा कुवलय अंक कान्ति वाली हैं।१७।
  • नन्दन: शिकिकण्ठाभश्चण्डातकुसुमाम्बर:।
    अपृथग्वसति: पित्रा सह तरुण प्रणयी हरौ।
    अतुल्यास्य प्रिया विद्युतकान्तिरभ्रनिभाम्बरा।१८।
    "अनुवाद:- नंदन की अंग कान्ति मयूर के
    कण्ठ जैसी तथा वस्त्र चण्डात (करवीर) पुष्प के समान है। श्रीनन्दन अपने पिता ( श्री पर्जन्य जी के साथ ही इकट्ठे निवास करते हैं। श्रीहरि के प्रति इनका कोमल प्रेम है। नन्दन जी की पत्नी का नाम अतुल्या है। जिनकी अंगकान्ति बिजली के समान रंग वाली है। तथा वस्त्र मेघ की तरह श्याम रंग के हैं।१८।
  • सानन्दा नन्दिनी चेति पितुरेते सहोदरे।
    कल्माषवसने रिक्तदन्ते च फेनरोचिषी।१९।
    "अनुवाद:-( कृष्ण के पिता नन्द की सानन्दा और नन्दिनी नाम की दो बहिने हैं। ये अनेक प्रकार के रंग- विरंगे) वस्त्र धारण करती हैं। इनकी दन्तपंक्ति रिक्त अर्थात इनके बहुत से दाँत नहीं हैं। इनकी अंगकान्ति फेन( झाग) की तरह सफेद है।१९।
  • सानन्दा नन्दिन्यो: पत्येतयो: क्रमाद्महानील: सुनीलश्च तौ कृष्णस्य वपस्वसृपती शुद्धमती।
    २०।
    "अनुवाद:-सानन्दा के पति का नाम महानील और नन्दिनी के पति का नाम सुनील है। ये दोंनो श्रीकृष्ण के फूफा अर्थात् (नन्द) के बहनोई हैं।२०।
  • पितुराद्यभ्रातुः पुत्रौ कण्डवदण्डवौ नाम्नो:
    सुबले मुदमाप्तौ सौ ययोश्चारु मुखाम्बुजम्।।२१।
    "अनुवाद:- श्री कृष्ण के पिता नन्द बड़े भाई श्री उपनन्द के कण्डव और दण्डव नाम के दो पुत्र हैं।
    दोंनो सुबह के संग में बहुत प्रसन्न रहते हैं। तथ
    दोंनो का मनोहर मुख कमल के समान सुन्दर है।२१।
  • राजन्यौ यौ तु पुत्रौ नाम्ना तौ चाटु- वाटुकौ।
    दधिस्सारा- हविस्सारे सधर्मिण्यौ क्रमात्तयो:।।२२।
    "अनुवाद:- श्रीनन्द जी के दो चचेरे भाई जो उनके चाचा राजन्य के पुत्र हैं। उनका नाम चाटु और वाटु है उनकी पत्नीयाँ का नाम इसी क्रम से दधिस्सारा और हविस्सारा है।२२।
  • "कृष्ण की माता के परिवार का परिचय"
    "यशोदा के परिवार का परिचय-
    महामहो महोत्साहो स्यादस्य सुमुखाभिध:।
    लम्बकम्बुसमश्रु: पक्वजम्बूफलच्छवि:।।२३।
    "अनुवाद:- श्री कृष्ण के नाना (मातामह) का नाम सुमुख है। ये बहुत उद्यमी और उत्साही हैं। इनकी लम्बी दाढ़ी शंख के समान सफेद तथा अंगकान्ति पके हुए जामुन के फल जैसी ( श्यामल) है।२३।

    "श्रीब्रह्मवैवर्ते पुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे नारायणनारदसंवादे कृष्णान्नप्राशन वर्णननामकरणप्रस्तावो नाम त्रयोदशोऽध्याये यशोदया: पित्रोर्नामनी पद्मावतीगिरिभानू उक्तौ।२४।
    अनुवाद:- ब्रह्म वैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के अन्तर्गत नारायण -और नारद संवाद में कृष्ण का अन्न प्राशनन नामक तेरहवें अध्याय में यशोदा के माता-पिता का नाम पद्मावती और गिरिभानु है।२४।

    सर्वेषां गोपपद्मानां गिरिभानुश्च भास्करः ।
    पत्नी पद्मासमा तस्य नाम्ना पद्मावती सती ।२५।
    अनुवाद:- गोप रूपी कमलों के गिरिभानु सूर्य हैं।
    और उनकी पत्नी पद्मावती लक्ष्मी के समान सती है।२५।
  • तस्याः कन्या यशोदा त्वं यशोवर्द्धनकारिणी ।।
    बल्लवानां च प्रवरो लब्धो नन्दश्च वल्लभः।२६।।
    अनुवाद:- उस पद्मावती की कन्या यशोदा तुम यश को बढ़ाने वाली हो। गोपों में श्रेष्ठ नन्द तुमको पति रूप में प्राप्त हुए हैं।२६।
  • माता गोपान् यशोदात्री यशोदा श्यामलद्युति:।
    मूर्ता वत्सलते! वासौ इन्द्रचापनिभाम्बरा।।११।
    "अनुवाद:- श्रीकृष्ण की माता गोप जाति को यश प्रदान करने वाली होने से यशोदा कहलाती हैं।
    इनकी अंग कान्ति श्यामल वर्ण की है ये वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं।और इनके वस्त्र इन्द्र धनुष के समान हैं ।११।
  • गौरवर्णा यशोदे त्वं नन्द त्वं गौरवर्णधृक् ।
    अयं जातः कृष्णवर्ण एतत्कुलविलक्षणम्॥५ ॥
    यशोदा; त्वम्- आप; नन्द - नन्द; त्वम् - आप; गौर- वर्ण - धृक् - धारक करने वाले; अयम् - वह; जाता - जन्मा; कृष्ण-वर्णा - श्याम; एतत् - कुल - इस कुल में; विलक्षणम् -असामान्य।
    "गर्गसंहिता- ३/५/७
    हे यशोदा, तुम्हारा रंग गोरा है। हे नन्द, तुम्हारा रंग भी गोरा है। यह लड़का बहुत काला है। वह परिवार के बाकी लोगों से अलग है।
    *
    श्रीगर्गसंहितायां गिरिराजखण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे
    गोपविवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
    "विषेश- यशोदा का वर्ण(रंग) श्यामल (साँबला) ही था। गौरा रंग कभी नहीं था- यह बात पन्द्रहवीं सदी में लिखित "श्रीश्रीराधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका में भी लिखी हुई है।
    परन्तु उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में काशी पण्डित- पीठ ने गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के पञ्चम अध्याय में तीन फर्जी श्लोक प्रकाशन काल में लिखकर जोड़ दिए हैं।
    जिनको हम ऊपर दे चुके हैं।

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    मातामही तु महिषी दधिपाण्डर कुन्तला।
    पाटला पाटलीपुष्पपटलाभा हरित्पटा।२७।
    "अनुवाद:- कृष्ण की नानी (मातामही) का नाम पाटला है ये व्रज की रानी के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके केश देखने में गाय के दूध से बने दही के समान पीले, अंगकान्ति पाटल पुष्प के समान हल्के गुलाबी रंग जैसी तथा वस्त्र हरे रंग के है।२७।
  • प्रिया सहचरी तस्या मुखरा नाम बल्लवी।
    व्रजेश्वर्यै ददौ स्तन्यं सखी स्नहभरेण या।२८।
    "अनुवाद:- मातामही( नानी) पाटला की मुखरा
    नाम की एक गोपी प्रिय सखी है। वह पाटला के प्रति इतनी स्नेह-शील है कि कभी- कभी
    पाटला के व्यस्त होने पर व्रज की ईश्वरी पाटला
    की पुत्री यशोदा को अपना स्तन-पान तक भी करा देती थी।२८।
  • सुमुखस्यानुजश्चारुमुखोऽञ्जनभिच्छवि:।
    भार्यास्य कुलटीवर्णा बलाका नाम्नो बल्लवी।२९।
    "अनुवाद:- सुमुख( गिरिभानु) के छोटे भाई की नाम चारुमुख है। इनकी अंगकान्ति काजल की तरह है। इनकी पत्नी का नाम बलाका है। जिनकी अंगकान्ति कुलटी( गहरे नीले रंग की एक प्रकार की दाल जो काजल ( अञ्जन) रे रंग जैसी होती है।२९
  • गोलो मातामही भ्राता धूमलो वसनच्छवि:।
    हसितो य: स्वसुर्भर्त्रा सुमुखेन क्रुधोद्धुर:।३०।
    "अनुवाद:-मातामही( नानी ) पाटला के भाई का नाम गोल है। तथा वे धूम्र( ललाई लिए हुए काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। बहिन के पति-( बहनोई) सुमुख द्वारा हंसी मजाक करने पर गोल विक्षिप्त हो जाते हैं।३०।

    दुर्वाससमुपास्यैव कुलं लेभे व्रजोज्ज्वलम्।।गोलस्य भार्या जटिला ध्वाङ्क्ष वर्णा महोदरी।३१।
    "अनुवाद:- दुर्वासा ऋषि की उपासना के परिणाम स्वरूप इन्हें व्रज के उज्ज्वल वंश में जन्म ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गोल की पत्नी का नाम जटिला है। यह जटिला कौए जैसे रंग वाली तथा स्थूलोदरी (मोटे पेट वाली ) है।३१।
  • यशोदाया: त्रिभ्रातरो यशोधरो यशोदेव: सुदेवस्तु।
    अतसी पुष्परुचय: पाण्डराम्बर-संवृता:।३२।
    "अनुवाद:-यशोदा के तीन भाई हैं जिनके नाम हैं यशोधर" यशोदेव और सुदेव – इन सबकी अंगकान्ति अलसी के फूल के समान है । ये सब हल्का सा पीलापन लिए हुए सफेद रंग के वस्त्र धारण करते हैं।३२।
  • येषां धूम्रपटा भार्या कर्कटी-कुसुमित्विष:।।
    रेमा रोमा सुरेमाख्या: पावनस्य पितृव्यजा:।।३३।
    "अनुवाद:-इन सब तीनों भाइयों की पत्नीयाँ पावन( विशाखा के पिता) के चाचा( पितृव्य )की कन्याऐं हैं। जिनके नाम क्रमश: रेमा, रोमा और सुरेमा हैं। ये सब काले वस्त्र पहनती हैं। इनकी अंगकान्ति कर्कटी(सेमल) के पुष्प जैसी है।३३।
  • यशोदेवी- यशस्विन्यावुभे मातुर्यशोदया: सहोदरे।
    दधि:सारा हवि:सारे इत्यन्ये नामनी तयो:।३४।
    "अनुवाद:- यशोदेवी और यशस्विनी श्रीकृष्ण की माता यशोदा की सहोदरा बहिनें हैं। ये दोंनो क्रमश दधिस्सारा और हविस्सारा नाम से भी जानी जाती हैं। बड़ी बहिन यशोदेवी की अंगकान्ति श्याम वर्ण-(श्यामली) है।३४।
  • चाटुवाटुकयोर्भार्ये ते राजन्यतनुजयो: ़
    सुमुखस्य भ्राता चारुमुखस्यैक: पुत्र: सुचारुनाम्।३५ ।
    अनुवाद:- दधिस्सारा और हविस्सारा पहले कहे हुए राजन्य गोप के पुत्रों चाटु और वाटु की पत्नियाँ हैं। सुमुख के भाई चारुमख का सुचारु नामक एक सुन्दर पुत्र है।३५।

    गोलस्य भ्रातु: सुता नाम्ना तुलावती या सुचारोर्भार्या ।३६।
    "अनुवाद:-गोल की भतीजी तुलावती चारुमख के पुत्र सुचारु की पत्नी है।३६।

    पौर्णमासी भगवती सर्वसिद्धि विधायनी।
    काषायवसना गौरी काशकेशी दरायता।३७।
    "अनुवाद:- भगवती पौर्णमासी सभी सिद्धियों का विधान करने वाली है। उसके वस्त्र काषाय ( गेरुए) रंग के हैं। उसकी अंगकान्ति गौरवर्ण की और केश काश नामक घास के पुष्प के समान सफेद हैं; ये आकार में कुछ लम्बी हैं।
  • मान्या व्रजेश्वरादीनां सर्वेषां व्रजवासिनां। नारदस्य प्रियशिष्येयमुपदेशेन तस्य या।३८।
    "अनुवाद:- पौर्णमसी व्रज में नन्द आदि सभी व्रजवासियों की पूज्या और देवर्षि नारद की प्रिया शिष्या है नारद के उपदेश के अनुसार जिसने।३८।
  • सान्दीपनिं सुतं प्रेष्ठं हित्वावन्तीपुरीमपि।
    स्वाभीष्टदैवतप्रेम्ना व्याकुला गोकुलं गता।३९।
    "अनुवाद:- अपने सबसे प्रिय पुत्र सान्दीपनि को उज्जैन(अवन्तीपरी) में छोड़कर अपने अभीष्ट देव श्रीकृष्ण के प्रेम में वशीभूत होकर गोकुल में गयी।३९।
  • राधया अष्ट सख्यो ललिता च विशाखा च चित्रा।
    चम्पकवल्लिका तुङ्गविद्येन्दुलेखा च रङ्गदेवी सुदेविका।४०।

    "अनुवाद:- राधा जी की आठ सखीयाँ ललिता, विशाखा,चित्रा,चम्पकलता, तुंगविद्या,इन्दुलेखा,रंग देवी,और सुदेवी हैं।४०।
    **
    तत्राद्या ललितादेवी स्यादाष्टासु वरीयसी प्रियसख्या भवेज्ज्येष्ठा सप्तविञ्शतिवासरे।४१।
    "अनुवाद:-इन आठ वरिष्ठ सखीयों में ललिता देवी सर्वश्रेष्ठ हैं यह अपनी प्रिया सखी राधा से सत्ताईस दिन बड़ी हैं।४१।
  • अनुराधा तया ख्याता वामप्रखरतां गता।
    गोरोचना निभाङ्गी सा शिखिपिच्छनिभाम्बरा।।४२।
    "अनुवाद:- श्री ललिता अनुराधा नाम से विख्यात तथा वामा और प्रखरा नायिकाओं के गुणों से विभूषित हैं। ललिता की अंगकान्ति गोरोचना के समान तथा वस्त्र मयूर पंख जैसे हैं।४२।

    ललिता जाता मातरि सारद्यां पितुरेषा विशोकत:।
    पतिर्भैरव नामास्या: सखा गोवर्द्धनस्य य: ।४३।
    "अनुवाद:- श्री ललिता की माता का नाम सारदी और पिता का नाम विशोक है। ललिता के पति का नाम भैरव है जो गोवर्द्धन गोप के सखा हैं।४३।
  • सम्मोहनतन्त्रस्य ग्रन्थानुसार राधया: सख्योऽष्ट
    कलावती रेवती श्रीमती च सुधामुखी।
    विशाखा कौमुदी माधवी शारदा चाष्टमी स्मृता।४४।
    "अनुवाद:-सम्मोहन तन्त्र के अनुसार राधा की आठ सखियाँ हैं।–कलावती, रेवती,श्रीमती, सुधामुखी, विशाखा, कौमुदी, माधवी,शारदा।४४।

    श्रीमधुमङ्गल ईषच्छ्याम वर्णोऽपि भवेत्।
    वसनं गौरवर्णाढ्यं वनमाला विराजित:।।४५।
    "अनुवाद:- श्रीमान्- मधुमंगल कुछ श्याम वर्ण के हैं। इनके वस्त्र गौर वर्ण के हैं। तथा वन- मालाओं
    से सुशोभित हैं।४५।

    पिता सान्दीपनिर्देवो माता च सुमुखी सती।
    नान्दीमुखी च भगिनी पौर्णमासी पितामही।।४६।
    "अनुवाद:-मधुमंगल के पिता सान्दीपनि ऋषि तथा माता का नीम सुमुखी है। जो बड़ी पतिव्रता है। नान्दीमुखी मधु मंगल की बहिन और पौर्णमासी दादी है। ४६।
  • पौर्णमास्या: पिता सुरतदेवश्च माता चन्द्रकला सती। प्रबलस्तु पतिस्तस्या महाविद्या यशस्करी।४७।
    "अनुवाद:- पौर्णमासी के पिता का नाम सुरतदेव तथा माता का नाम चन्द्रकला है। पौर्णमासी के पति का नाम प्रबल है। ये महाविद्या में प्रसिद्धा और सिद्धा हैं।४७।
  • पौर्णमास्या भ्रातापि देवप्रस्थश्च व्रजे सिद्धा शिरोमणि: । नानासन्धानकुशला द्वयो: सङ्गमकारिणी।।४८।
    "अनुवाद:- पौर्णमासी का भाई देवप्रस्थ है। ये पौर्णमासी व्रज में सिद्धा में शिरोमणि हैं।
    पौर्णमासी अनेक अनुसन्धान करके कार्यों में कुशल तथा श्रीराधा-कृष्ण दोंनो का मेल कराने वाली है।४८।
  • आभीरसुभ्रुवां श्रेष्ठा राधा वृन्दावनेश्वरी।
    अस्या: सख्यश्च ललिताविशाखाद्या: सुविश्रुता:।४९।
    "अनुवाद:- आभीर कन्याओं में श्रेष्ठा वृन्दावन की अधिष्ठात्री व स्वामिनी राधा हैं। ललिता और विशाखा आदि सख्यियाँ श्री राधा जी प्रधान सखियों के रूप में विख्यात हैं।४९।
  • चन्द्रावली च पद्मा च श्यामा शैव्या च भद्रिका।
    तारा विचित्रा गोपाली पालिका चन्द्रशालिका।५०।
    "अनुवाद:- चन्दावलि, पद्मा, श्यामा,शैव्या,भद्रिका, तारा, विचित्रा, गोपली, पालिका ,चन्द्रशालिका,
  • मङ्गला विमला लीला तरलाक्षी मनोरमा
    कन्दर्पो मञ्जरी मञ्जुभाषिणी खञ्जनेक्षणा।।५१
    "अनुवाद:-मंगला ,विमला, नीला,तरलाक्षी,मनोरमा,कन्दर्पमञजरी, मञ्जुभाषिणी, खञ्जनेक्षणा
  • कुमुदा, कैरवी, शारी,शारदाक्षी, विशारदा,। शङ्करी, कुङ्कुङ्मा,कृष्णासारङ्गीन्द्रावलि, शिवा।।५२।
    "अनुवाद:-कुमुदा, कैरवी, शारी,शारदाक्षी, विशारदा, शंकरी, कुंकुमा,कृष्णा, सारंगी,इन्द्रावलि, शिवा आदि ।
  • तारावली,गुणवती,सुमुखी,केलिमञ्जरी।
    हारावली,चकोराक्षी, भारती, कमलादय:।।५३।
    "अनुवाद:तारावली,गुणवती,सुमुखी,केलिमञ्जरी,हारावली,चकोराक्षी, भारती, और कमला आदि गोपिकाऐं कृष्ण की उपासिका व आराधिका हैं।
  • आसां यूथानि शतश: ख्यातान्याभीर सुताम्।
    लक्षसङ्ख्यातु कथिता यूथे- यूथे वराङ्गना।।५४।
    "अनुवाद:- इन आभीर कन्याओं के सैकड़ों यूथ( समूह) हैं और इन यूथों में बंटी हुई वरागंनाओं की संख्या भी लाखों में है।५४।
  • अब इसी प्रकरण की समानता के लिए देखें नीचे
    "श्रीश्रीराधाकृष्णगणोद्देश्य दीपिका-
    में वर्णित राधा जी के पारिवारिक सदस्यों की सूची वासुदेव- रहस्य- राधा तन्त्र नामक ग्रन्थ के ही समान हैं परन्तु श्लोक विपर्यय ( उलट- फेर) हो गया है। और कुछ शब्दों के वर्ण- विन्यास ( वर्तनी) में भी परिवर्तन वार्षिक परिवर्तन हुआ है।
  • "राधा के परिवार का परिचय-
    "वृषभानु: पिता तस्या राधाया वृषभानरिवोज्ज्जवल:।१६८।(ख)
    रत्नगर्भाक्षितौ ख्याति कीर्तिदा जननी भवेत्।।१६९।(क)

    "अनुवाद:- श्री राधा के पिता वृषभानु वृष राशि में स्थित भानु( सूर्य ) के समान उज्ज्वल हैं।१६८-(ख)
  • श्री राधा जी की माता का नाम कीर्तिदा है। ये पृथ्वी पर रत्नगर्भा- के नाम से प्रसिद्ध हैं।१६९।(क)
  • "पितामहो महीभानुरिन्दुर्मातामहो मत:।१६९(ख) मातामही पितामह्यौ मुखरा सुखदे उभे।१७०(क)
    "अनुवाद:-
    राधा जी के पिता का नाम महीभानु तथा नाना का नाम इन्दु है। राधा जी दादी का नाम सुखदा और नानी का नाम मुखरा है।१७०।(क)
  • " रत्नभानु:, सुभानुश्च भानुश्च भ्रातर: पितु:"१७०(ख)
    भद्रकर्ति , महाकीर्ति, कीर्तिचन्द्रश्च मातुला:। मातुल्यो मेनका , षष्ठी , गौरी,धात्री और धातकी।।१७१।
  • अनुवाद:-भद्रकर्ति , महाकीर्ति, कीर्तिचन्द्र मामा:। और मेनका , षष्ठी , गौरी धात्री और धातकी ये राधा की पाँच मामीयाँ हैं।१७१/।
  • "स्वसा कीर्तिमती मातुर्भानुमुद्रा पितृस्वसा। पितृस्वसृपति: काशो मातृस्वसृपति कुश:।‌१७२।।
    "अनुवाद:- श्रीराधा जी की माता की बहिन का नाम कीर्तिमती,और भानुमुद्रा पिता की बहिन ( बुआ) का नाम है। फूफा का नाम "काश और मौसा जी का नाम कुश है।
  • श्रीराधाया: पूर्वजो भ्राता श्रीदामा कनिष्ठा भगिन्यानङ्गमञ्जरी।१७३।(क)
    "अनुवाद:- श्री राधा जी के बड़े भाई का नाम श्रीदामन्- तथा छोटी बहिन का नाम श्री अनंगमञ्जरी है।१७३।(क)
    "राधा जी की प्रतिरूपा( छाया) वृन्दा जो ध्रुव के पुत्र केदार की पुत्री है उसके ससुराल पक्ष के सदस्यों के नाम भी बताना आवश्यक है। वह राधा के अँश से उत्पन्न राधा के ही समान रूप ,वाली गोपी है। वृन्दावन नाम उसी के कारण प्रसिद्ध हो जाता है। रायाण गोप का विवाह उसी वृन्दा के साथ होता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(86) में श्लोक संख्या134-से लगातार 143 तक वृन्दा और रायाण के विवाह ता वर्णन है।
  • "रायाण की पत्नी वृन्दा का परिचय-
    रायाणस्य परिणीता वृन्दा वृन्दावनस्य अधिष्ठात्री । इयं केदारस्य सुता कृष्णाञ्शस्य भक्ते: सुपात्री। १।
  • ब्रह्मवैवर्तपुराणस्य श्रीकृष्णजन्मखण्डस्य षडाशीतितमोऽध्यायस्य अनतर्निहिते । सप्तत्रिंशताधिकं शतमे श्लोके रायाणस्य पत्नी वृन्दया: वर्णनमस्ति।।२।
  • ******
    उवाच वृन्दां भगवान्सर्वात्मा प्रकृतेः परः ।१३४
    श्रीभगवानुवाच-
    त्वयाऽऽयुस्तपसा लब्धं यावदायुश्च ब्रह्मणः ।
    तदेव देहि धर्माय गोलोकं गच्छ सुन्दरि ।१३५ ।
    तन्वाऽनया च तपसा पश्चान्मां च लभिष्यसि ।
    पश्चाद्गोलोकमागत्य वाराहे च वरानने ।१३६ ।
    "वृन्दे ! त्वं वृषभानसुता च राधाच्छाया भविष्यसि।
    मत्कलांशश्च रायाणस्त्वां विवाह ग्रहीष्यति ।१३७।
  • *****
    मां लभिष्यसि रासे च गोपीभी राधया सह ।
    राधा श्रीदामशापेन वृषभानसुता यदा ।१३८।
    सा चैव वास्तवी राधा त्वं च च्छायास्वरुपिणी
    विवाहकाले रायाणस्त्वां च च्छायां ग्रहीष्यति। १३९।
    त्वां दत्त्वा वास्तवी राधा साऽन्तर्धाना भविष्यति ।
    राधैवेति विमूढाश्च विज्ञास्यन्ति ।
    च गोकुले ।१४० ।
    स्वप्ने राधापदाम्भोजं नारि पश्यन्ति बल्लवाः ।
    स्वयं राधा मम क्रोडे छाया वृन्दा रायाणकामिनी ।१४१।
    विष्णोश्च वचनं श्रुत्वा ददावायुश्च सुन्दरी ।
    उत्तस्थौ पूर्ण धर्मश्च तप्तकाञ्चनसन्निभः ।।
    पूर्वस्मात्सुन्दरः श्रीमान्प्रणनाम परात्परम् । १४२।
    वृन्दोवाच
    देवाः शृणुत मद्वाक्यं दुर्लङ्घ्यं सावधानतः ।
    न हि मिथ्या भवेद्वाक्यं मदीयं च निशामय ।१४३ ।
    उपर्युक्त संस्कृत श्लोकों का नीचे अनुवाद देखें-
  • *******
    "अनुवाद:-
    तब भगवान कृष्ण जो सर्वात्मा एवं प्रकृति से परे हैं; वृन्दा से बोले।
  • श्रीभगवान ने कहा- सुन्दरि! तुमने तपस्या द्वारा ब्रह्मा की आयु के समान आयु प्राप्त की है।
  • वह अपनी आयु तुम धर्म को दे दो और स्वयं गोलोक को चली जाओ।
  • वहाँ तुम तपस्या के प्रभाव से इसी शरीर द्वारा मुझे प्राप्त करोगी।
    सुमुखि वृन्दे ! गोलोक में आने के पश्चात वाराहकल्प में हे वृन्दे ! तुम पुन: राधा की वृषभानु की कन्या राधा की छायाभूता होओगी।
    उस समय मेरे कलांश से ही उत्पन्न हुए रायाण गोप ही तुम्हारा पाणिग्रहण करेंगे।
  • फिर रासक्रीड़ा के अवसर पर तुम गोपियों तथा राधा के साथ मुझे पुन: प्राप्त करोगी।
  • *********
    स्पष्ट हुआ कि रायाण गोप का विवाह मनु के पौत्र केदार की पुत्री वृन्दा " से हुआ था। जो राधाच्छाया के रूप में व्रज में उपस्थित थी।
  • जब राधा श्रीदामा के शाप से वृषभानु की कन्या होकर प्रकट होंगी, उस समय वे ही वास्तविक राधा रहेंगी।
  • हे वृन्दे ! तुम तो उनकी छायास्वरूपा होओगी। विवाह के समय वास्तविक राधा तुम्हें प्रकट करके स्वयं अन्तर्धान हो जायँगी और रायाण गोप तुम छाया को ही पाणि-ग्रहण करेंगे;
  • परन्तु गोकुल में मोहाच्छन्न लोग तुम्हें ‘यह राधा ही है’- ऐसा समझेंगे।
    _______
    उन गोपों को तो स्वप्न में भी वास्तविक राधा के चरण कमल का दर्शन नहीं होता; क्योंकि स्वयं राधा मेरी हृदय स्थल में रहती हैं !
  • इस प्रकार भगवान कृष्ण के वचन के सुनकर सुन्दरी वृन्दा ने धर्म को अपनी आयु प्रदान कर दी। फिर तो धर्म पूर्ण रूप से उठकर खड़े हो गये।
  • उनके शरीर की कान्ति तपाये हुए सुवर्ण की भाँति चमक रही थी और उनका सौंदर्य पहले की अपेक्षा बढ़ गया था। तब उन श्रीमान ने परात्पर परमेश्वर को श्रीकृष्ण को प्रणाम किया।
    _____
    सन्दर्भ:-
    ब्रह्मवैवर्तपुराण /खण्डः ४ (श्रीकृष्णजन्मखण्डः)/अध्यायः-( ८६ )
    राधा जी की प्रतिरूपा( छाया) वृन्दा जो ध्रुव के पुत्र केदार की पुत्री हैं उसके ससुराल पक्ष के सदस्यों के नाम भी बताना आवश्यक है।
    राधाया: प्रतिच्छाया वृन्दया: श्वशुरो वृकगोपश्च देवरो दुर्मदाभिध:।१७३।(ख)
    श्वश्रूस्तु जटिला ख्याता पतिमन्योऽभिमन्युक:।
    ननन्दा कुटिला नाम्नी सदाच्छिद्रविधायनी।१७४।
    "अनुवाद:- राधा की प्रतिच्छाया रूपा वृन्दा के श्वशुर -वृकगोप देवर- दुर्मद नाम से जाने जाते थे। और सास- का नाम जटिला और पति अभिमन्यु - पति का अभिमान करने वाला था। हर समय दूसरे के दोंषों को खोजने वाली ननद का नाम कुटिला था।१७४।
  • और निम्न श्लोक में राधा रानी सहित अन्य गोपियों को भी आभीर ही लिखा है...
  • और चैतन्श्रीय परम्परा के सन्त श्रीलरूप गोस्वामी द्वारा रचित श्रीश्रीराधाकृष्णगणोद्देश-दीपिका नामक ग्रन्थ में श्लोकः १३४ में राधा जी को आभीर कन्या कहा ।
    /लघु भाग/श्रीकृष्णस्य प्रेयस्य:/श्री राधा/श्लोकः १३४
    __________
    आभीरसुभ्रुवां श्रेष्ठा राधा वृन्दावनेश्वरी |
    अस्या : सख्यश्च ललिता विशाखाद्या:सुविश्रुता:।।
  • भावार्थ:- सुंदर भ्रुकटियों वाली ब्रज की आभीर कन्याओं में वृंदावनेश्वरी श्री राधा और इनकी प्रधान सखियां ललिता और विशाखा सर्वश्रेष्ठ व विख्यात हैं।
  • अमरकोश में जो गुप्त काल की रचना है ;उसमें अहीरों के अन्य नाम-पर्याय वाची रूप में गोप शब्द भी वर्णित हैं।
  • आभीर पुल्लिंग विशेषण संज्ञा गोपालः समानार्थक:
    १-गोपाल,२-गोसङ्ख्य, ३-गोधुक्, ४-आभीर,५-वल्लव,६-गोविन्द, ७-गोप।
    (2।9।57।2।5)
    अमरकोशः)
  • रसखान ने भी गोपियों को आभीर ही कहा है-
    ""ताहि अहीर की छोहरियाँ...""
  • करपात्री स्वामी भी भक्ति सुधा और गोपी गीत में गोपियों को आभीरा ही लिखते हैं
  • 500 साल पहले कृष्णभक्त चारण इशरदास रोहडिया जी ने पिंगल डिंगल शैली में श्री कृष्ण को दोहे में अहीर लिख दिया:--
  • दोहा इस प्रकार है:-
    "नारायण नारायणा, तारण तरण अहीर, हुँ चारण हरिगुण चवां, वो तो सागर भरियो क्षीर।"
  • अर्थ:-अहीर जाति में अवतार लेने वाले हे नारायण(श्री कृष्ण)! आप जगत के तारण तरण(सर्जक) हो, मैं चारण (आप श्री हरि के) गुणों का वर्णन करता हूँ, जो कि सागर(समुंदर) और दूध से भरा हुआ है।
  • भगवान श्री कृष्ण की श्रद्धा में सदैव लीन रहने वाले कवि इशरदास रोहडिया (चारण), जिनका जन्म विक्रम संवत 1515 में राजस्थान के भादरेस गांव में हुआ था। जिन्होंने मुख्यतः 2 ग्रंथ लिखे हैं "हरिरस" और "देवयान"।
  • यह आजसे 500 साल पहले ईशरदासजी द्वारा लिखे गए एक दुहे में स्पष्ट किया गया है कि कृष्ण भगवान का जन्म अहीर(यादव) कुल में हुआ था।
  • सूरदास जी ने भी श्री कृष्ण को अहीर कहते हुए सूरसागर में "सखी री, काके मीत अहीर" नाम से एक राग गाया!!
    तिरुपति बालाजी मंदिर का पुनर्निर्माण विजयनगर नगर के शासक वीर नरसिंह देव राय यादव और राजा कृष्णदेव राय ने किया था।
  • विजयनगर के राजाओं ने बालाजी मंदिर के शिखर को स्वर्ण कलश से सजाया था।
    विजयनगर के यादव राजाओं ने मंदिर में नियमित पूजा, भोग, मंदिर के चारों ओर प्रकाश तथा तीर्थ यात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए मुफ्त प्रसाद की व्यवस्था कराई थी।तिरुपति बालाजी (भगवान वेंकटेश) के प्रति यादव राजाओं की निःस्वार्थ सेवा के कारण मंदिर में प्रथम पूजा का अधिकार यादव जाति को दिया गया है।
  • तब ऐसे में आभीरों को शूद्र कहना युक्तिसंगत नहीं
  • गोप शूद्र नहीं अपितु स्वयं में क्षत्रिय ही हैं ।
    जैसा की संस्कृति साहित्य का इतिहास नामक पुस्तकमें पृष्ठ संख्या 368 पर वर्णित है👇
  • अस्त्र हस्ताश्च धन्वान: संग्रामे सर्वसम्मुखे ।
    प्रारम्भे विजिता येन स: गोप क्षत्रिय उच्यते ।।
  • और गर्ग सहिता
    में लिखा है !
  • यादव: श्रृणोति चरितं वै गोलोकारोहणं हरे :
    मुक्ति यदूनां गोपानं सर्व पापै: प्रमुच्यते ।102।
  • अर्थात् जिसके हाथों में अस्त्र एवम् धनुष वाण हैं ---जो युद्ध को प्रारम्भिक काल में ही विजित कर लेते हैं वह गोप क्षत्रिय ही कहे जाते हैं ।
  • जो मनुष्य गोप अर्थात् आभीर (यादवों )के चरित्रों का श्रवण करता है ।
    वह समग्र पाप-तापों से मुक्त हो जाता है ।।
    ________
    विरोधीयों का दूसरा दुराग्रह भी बहुत दुर्बल है
    कि गाय पालने से ही यादव गोप के रूप में वैश्य हो गये परन्तु
    "गावो विश्वस्य मातरो मातर: सर्वभूतानां गाव: सर्वसुखप्रदा:।।
    महाभारत की यह सूक्ति वेदों का भावानुवाद है जिसका अर्थ है कि गाय विश्व की माता है !
    और माता का पालन करना किस प्रकार तुच्छ या वैश्य वृत्ति का कारण हो सकता है
  • सन्दर्भ:- श्री-श्री-राधागणोद्देश्यदीपिका( लघुभाग- श्री-कृष्णस्य प्रेयस्य: प्रकरण- रूपादिकम्



  • 🙏        नंदगोप श्री और वसुदेव श्री        🙏
              चचेरे भाई के रूप में रक्त संबंध 
         अब इतिहास चोरों की दाल नहीं गलेगी 
    1.नंदगोप और वसुदेव: चचेरे भाई के रूप में रक्त संबंध-
                      वंशावली का आधार
    देवमीढ़ (कभी-कभी देवमीढुस के रूप में उल्लिखित) नंदगोप और वसुदेव के साझा पितामह थे। उनकी दो पत्नियाँ थीं-
    अश्मकी (क्षत्रिय वर्ण) जिनसे शूरसेन का जन्म हुआ। शूरसेन की पत्नी मारिषा थीं, और उनके पुत्र वसुदेव थे।
    गुणवती (वैश्य वर्ण) जिनसे पर्जन्य का जन्म हुआ। पर्जन्य की पत्नी वरीयसी थीं, और उनके पुत्र नंदगोप थे।

    इस प्रकार, शूरसेन और पर्जन्य सौतेले भाई थे (एक ही पिता, देवमीढ़, लेकिन अलग-अलग माताएँ), और उनके पुत्र, वसुदेव और नंदगोप, चचेरे भाई थे। निम्नलिखित वंशावली इसे स्पष्ट करती है-
    देवमीढ़
    ├── अश्मकी (क्षत्रिय) → शूरसेन (मारिषा) → वसुदेव (देवकी/रोहिणी से कृष्ण और बलराम)
    └── गुणवती (वैश्य) → पर्जन्य (वरीयसी) → नंदगोप (यशोदा)

                प्रमुख श्लोक और व्याख्या
    निम्नलिखित ग्रंथों से श्लोक उद्धृत किए जाएंगे, जो नंदगोप और वसुदेव के चचेरे भाई होने के रिश्ते को स्थापित करते हैं। प्रत्येक श्लोक की व्याख्या वैदिक और पुराण परंपरा के आधार पर होगी।

    (i) श्रीमद्भागवत पुराण (10/5/19-20)
    श्लोक-
     गोपान् गोकुलरक्षायां निरूप्य मथुरां गतः।  
     नंदः कंसस्य वार्षिक्यं करं दातुं कुरूद्वह ॥ १९ ॥  
     वसुदेव उपश्रुत्य भ्रातरं नंदमागतम्।  
     ज्ञात्वा दत्तकरं राज्ञे ययौ तदवमोचनम् ॥ २० ॥  
     (श्रीमद्भागवत पुराण, दशम स्कंध, अध्याय 5, श्लोक 19-20, गीता प्रेस संस्करण, पेज 1095)

    अनुवाद-
     हे कुरुश्रेष्ठ परीक्षित! नंद ने गोकुल की रक्षा का भार अन्य गोपों को सौंपकर, कंस का वार्षिक कर चुकाने के लिए मथुरा गए। (१९)  
     जब वसुदेव को पता चला कि नंद मथुरा आए हैं और उन्होंने राजा कंस को कर दे दिया है, तब वे नंद से मिलने गए। (२०)

    व्याख्या-
    - “भ्रातरं” (भाई) शब्द नंद के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो वसुदेव के साथ उनके निकट पारिवारिक संबंध को दर्शाता है। संस्कृत में “भ्राता” शब्द सगे भाई, चचेरे भाई, या निकट संबंधी के लिए प्रयुक्त होता है। श्रीधरी टीका (गीता प्रेस, पेज 910) और वंशीधरी टीका (पेज 1674) इस शब्द को चचेरे भाई के संदर्भ में व्याख्या करते हैं, क्योंकि गोपाल चम्पू और अन्य ग्रंथों में शूरसेन और पर्जन्य को सौतेले भाई बताया गया है, जिससे वसुदेव और नंद चचेरे भाई बनते हैं।
    - यह श्लोक वसुदेव और नंद के बीच गहरे विश्वास को दर्शाता है। वसुदेव का नंद से मिलने जाना और श्रीकृष्ण की सुरक्षा के लिए उन पर भरोसा करना उनके पारिवारिक बंधन की गहराई को प्रकट करता है। श्रीमद्भागवत पुराण (10/5/21-27) में उनकी बातचीत का वर्णन है, जिसमें वसुदेव नंद को गोकुल में श्रीकृष्ण की सुरक्षा के लिए सावधान रहने की सलाह देते हैं।
    - यह श्लोक यदु वंश की एकता को रेखांकित करता है, क्योंकि वसुदेव (क्षत्रिय) और नंद (गोप) दोनों एक ही वंश से हैं।

    प्रामाणिकता-
    - श्रीमद्भागवत पुराण वैदिक साहित्य का प्रमुख पुराण है, जिसे भक्तों और विद्वानों द्वारा प्रामाणिक माना जाता है। गीता प्रेस का संस्करण और श्रीधरी टीका इसकी विश्वसनीयता को और बढ़ाते हैं।

    (ii) गोपाल चम्पू (जीव गोस्वामी, पूर्व चम्पू, तृतीय पूरण)
    श्लोक
     अथ सर्वश्रुतिपुराणादिकृतप्रशंसस्यवतंसः देवमीढ़नामा परमगुणधामा मथुरामध्यासामास ॥  
     तस्य चार्याणां शिरोमणेभार्याद्वयमासीत्। प्रथमा द्वितीयवर्णा, द्वितीया तु तृतीयवर्णेति।  
     तयोश्च क्रमेण यथावदांह्वयं प्रथमं वभूव-शूरः, पर्जन्य इति।  
     तत्र शूरस्य श्रीवसुदेवादयः समुदयन्ति स्म। श्रीमान् पर्जन्यस्तु मातृवद्वर्णसंकरः इति न्यायेन वैष्यतामेवाविश्य गवामेवैश्यं वश्यं चकारः, वृहद्वन एव च वासमाचचार ॥  
    (गोपाल चम्पू, पूर्व चम्पू, तृतीय पूरण, पेज 101)

    अनुवाद-
     समस्त श्रुति और पुराणों में प्रशंसित, यदु वंश के श्रेष्ठ और परम गुणों के धाम देवमीढ़ मथुरा में निवास करते थे।  
     उनकी दो पत्नियाँ थीं- प्रथम क्षत्रिय वर्ण की, और द्वितीय वैश्य वर्ण की। इनसे क्रमशः दो पुत्र उत्पन्न हुए—शूरसेन और पर्जन्य।  
     शूरसेन से वसुदेव आदि उत्पन्न हुए। पर्जन्य ने, अपनी माता के वैश्य वर्ण के कारण, वैश्य कर्म को अपनाया और गोपालन का कार्य किया। उन्होंने महावन (गोकुल) में निवास किया।

    व्याख्या-
     यह श्लोक देवमीढ़ को नंद और वसुदेव का साझा पितामह स्थापित करता है। उनकी दो पत्नियों, अश्मकी (क्षत्रिय) और गुणवती (वैश्य), से क्रमशः शूरसेन और पर्जन्य का जन्म हुआ। शूरसेन से वसुदेव, और पर्जन्य से नंदगोप उत्पन्न हुए, जिससे वे चचेरे भाई बनते हैं।
     पर्जन्य के वैश्य वर्ण को अपनाने का कारण उनकी माता गुणवती का वैश्य होना है, जो गोप समुदाय की पशुपालक पहचान को दर्शाता है। वसुदेव, शूरसेन के क्षत्रिय होने के कारण, क्षत्रिय कर्मों से जुड़े रहे।
     यह श्लोक यादव सभ्यता की एकता को रेखांकित करता है, क्योंकि गोप (पर्जन्य और नंद) और क्षत्रिय (शूरसेन और वसुदेव) दोनों यदु वंश के हिस्से थे।

    प्रामाणिकता-
     गोपाल चम्पू जीव गोस्वामी द्वारा रचित प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथ है, जो गौड़ीय सम्प्रदाय में पूजनीय है। यह श्लोक वंशावली को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है।

    (iii) वंशीधरी टीका (श्रीमद्भागवत पुराण, दशम स्कंध, अध्याय 5)
    श्लोक-
     भ्रातरं वैश्यकन्यायां शूरवैमात्रेयभ्रतुर्जातत्वादिति भारततात्पर्ये श्रीमध्वाचार्येरूक्तं ब्रह्मवाक्यम।  
     देवमीढ़स्य द्वे भार्ये एका क्षत्रिया तस्या शूरः वैश्या तस्यां पर्जन्य इति।  
     (वंशीधरी टीका, दशम स्कंध, पूर्व भाग, अध्याय 5, पेज 1674)

    अनुवाद-
     मध्वाचार्य के भारततात्पर्य निर्णय के अनुसार, नंद को वसुदेव का भाई कहा गया है, क्योंकि शूरसेन की सौतेली माँ (वैश्य वर्ण) से पर्जन्य का जन्म हुआ।  
     देवमीढ़ की दो पत्नियाँ थीं: एक क्षत्रिय, जिससे शूरसेन का जन्म हुआ, और दूसरी वैश्य, जिससे पर्जन्य का जन्म हुआ।

    व्याख्या
     यह टीका श्रीमद्भागवत पुराण के श्लोक 10/5/20 की व्याख्या करती है। मध्वाचार्य और वंशीधरी टीकाकार स्पष्ट करते हैं कि “भ्राता” शब्द चचेरे भाई के संदर्भ में है, क्योंकि शूरसेन और पर्जन्य सौतेले भाई थे।
     देवमीढ़ की दो पत्नियों से उत्पन्न शूरसेन और पर्जन्य की वंशावली स्पष्ट है। शूरसेन से वसुदेव और पर्जन्य से नंदगोप का जन्म हुआ, जो चचेरे भाई हैं।
     यह टीका गोप समुदाय की वैश्य पहचान को पुष्ट करती है, जो पर्जन्य की माता के वैश्य वर्ण के कारण है।

    प्रामाणिकता-
     वंशीधरी टीका और मध्वाचार्य की व्याख्या वैदिक और पुराण परंपरा में मान्य है। यह श्लोक नंद और वसुदेव के रिश्ते को ग्रंथीय आधार पर स्थापित करता है।

    (iv) गर्ग संहिता (अश्वमेध खंड, अध्याय 40)
    श्लोक-
     उग्रसेन ह्यश्वैष पुरे मम समागतः।  
     पालितो ह्यनिरुद्धेन मत्प्रपौत्रेण सर्वतः ॥ १९ ॥  
     (गर्ग संहिता, अश्वमेध खंड, अध्याय 40)

    अनुवाद-
     उग्रसेन का यह घोड़ा मेरे नगर में आया है। इसे मेरे प्रपौत्र अनिरुद्ध ने पाला है।

    व्याख्या-
     नंदगोप, उग्रसेन के यज्ञ के घोड़े को देखकर कहते हैं कि यह उनके प्रपौत्र अनिरुद्ध का है। अनिरुद्ध श्रीकृष्ण का पुत्र और वसुदेव का पौत्र है। नंद का अनिरुद्ध को प्रपौत्र कहना यह दर्शाता है कि नंद और वसुदेव एक ही परिवार के हैं।
     यह श्लोक नंद और वसुदेव के चचेरे भाई होने को अप्रत्यक्ष रूप से पुष्ट करता है और यदु वंश की एकता को रेखांकित करता है।

    प्रामाणिकता-
     गर्ग संहिता प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथ है, जो श्रीकृष्ण और यदु वंश की लीलाओं को वर्णन करता है। यह श्लोक रिश्ते की पुष्टि करता है।

    (v) हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, अध्याय 34)
    श्लोक-
     अश्मक्यां जनयामास शूरं वै देवमीढुसः।  
     महिष्यां जज्ञिरे शूराद् भोज्यायां पुरुषा दश ॥ १७ ॥  
     (हरिवंश पुराण, हरिवंशपर्व, अध्याय 34)

    अनुवाद-
     देवमीढुस ने अश्मकी से शूरसेन को जन्म दिया। शूरसेन से अपनी पत्नी भोज्या (मारिषा) के गर्भ से दस पुत्र उत्पन्न हुए।

    व्याख्या-
     यह श्लोक देवमीढ़ और उनकी पत्नी अश्मकी से शूरसेन के जन्म को स्थापित करता है। शूरसेन से वसुदेव का जन्म हुआ, जो उनके दस पुत्रों में से एक हैं।
     पर्जन्य और नंद का उल्लेख इस श्लोक में नहीं है, लेकिन गोपाल चम्पू और वंशीधरी टीका में दी गई जानकारी से स्पष्ट होता है कि पर्जन्य देवमीढ़ की दूसरी पत्नी गुणवती से उत्पन्न हुए, और उनसे नंदगोप का जन्म हुआ।

    प्रामाणिकता-
     हरिवंश पुराण महाभारत का परिशिष्ट है और वैदिक साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह श्लोक यदु वंश की विश्वसनीयता को स्थापित करता है।

    (vi) राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका (रूप गोस्वामी)
    श्लोक-
     पितामहो हरेौरः सितकेशः सिताम्बरः।  
     मंगलामृतपर्जन्यः पर्जन्यो नाम बल्लवः ॥ १५ (ख) ॥  
     वरिष्ठो व्रजगोष्ठीनां स कृष्णस्य पितामहः ॥ १६ ॥  
     तुष्टस्तत्र वसन्नत्र प्रेक्ष्य केशिनमागतं।  
     परीवारैः समं सर्वैर्ययौ भीतो बृहद्वनं ॥ २० ॥  
     (राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका, श्लोक 15-16, 20)

    अनुवाद-
     श्रीकृष्ण के पितामह पर्जन्य का नाम मंगल और अमृत की वर्षा करने वाले मेघ के समान है। उनकी अंगकांति तप्त कंचन की तरह है, और उनके केश और वस्त्र सफेद हैं। वे व्रज के गोपों में श्रेष्ठ और पूज्य हैं। (१५-१६)  
     पर्जन्य ने नंदीश्वर में प्रसन्नतापूर्वक निवास किया, लेकिन केशी राक्षस के आगमन के भय से अपने परिवार सहित महावन (गोकुल) चले गए। (२०)

    व्याख्या-
     यह श्लोक पर्जन्य को श्रीकृष्ण के पितामह के रूप में स्थापित करता है, और उनकी पत्नी वरीयसी से नंदगोप का जन्म हुआ। गोपाल चम्पू और वंशीधरी टीका के साथ यह श्लोक पर्जन्य को देवमीढ़ के पुत्र के रूप में जोड़ता है, जिससे नंद और वसुदेव का चचेरा भाई का रिश्ता पुष्ट होता है।
     पर्जन्य का गोकुल प्रवास गोप समुदाय की पशुपालक पहचान को दर्शाता है, जो यदु वंश की वैश्य शाखा से जुड़ा है।

    प्रामाणिकता-
     रूप गोस्वामी की राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका गौड़ीय वैष्णव परंपरा में पूजनीय है। यह श्लोक वंशावली और गोप समुदाय की पहचान को स्थापित करता है।

    (vii) श्रृंगार रस सागर (किशोरीदास, तृतीय खंड)
    काव्य-
     कुल आभीर नृपति महाबाहु। तिनके कजनाभि चाहु।  
     भुवबल चित्रसेन जो जानो। ये राजा अति ही परधानो।  
     परमधर्म-वुज भक्त सिरोमनि। देवमीढ़ लियो हरि सेवा पन।  
     तिनके पुत्र नाम परजन्य। परम वैष्णव महाआनंद।  
     मेघ समान दया सनमान। वरसत सकल प्रजा पर दान।  
     पाँच पुत्र तिनके कुल दीप। मध्य पुत्र हैं नद महीप।  
     बड़े उपनद और अभिनंदन। भैया बड़े वली श्री नंदन।  
     छोटे हैं सुनंदन अरू नंदन। भैया चार नदजगवंदन।  
    (श्रृंगार रस सागर, तृतीय खंड, पृष्ठ 17-18, व्रज का रास रंगमंच में उद्धृत)

    अनुवाद-
     आभीर कुल के राजा, महाबाहु देवमीढ़ ने हरि की सेवा का व्रत लिया। उनके पुत्र पर्जन्य परम वैष्णव और आनंदमय थे। वे मेघ के समान दयालु थे और प्रजा पर दान की वर्षा करते थे। उनके पाँच पुत्र थे, जिनमें मँझला पुत्र नंद महीप (नंदगोप) था। अन्य पुत्र थे उपनंद, अभिनंद, सुनंदन, और नंदन।

    व्याख्या-
     यह काव्य आभीर और यादव की एकता को दर्शाता है। देवमीढ़ को आभीर कुल का राजा कहा गया है, जो यदु वंश से संबद्ध था। उनके पुत्र पर्जन्य से नंदगोप का जन्म हुआ, जो गोप समुदाय के नेता थे।
     आभीर-विशेष के रूप में गोपों की पहचान यदु वंश की व्यापकता को दर्शाती है, जिसमें क्षत्रिय (वसुदेव) और वैश्य (नंदगोप) दोनों शामिल थे। नंद के चार भाइयों का उल्लेख गोप समुदाय की संगठित संरचना को दर्शाता है।

    प्रामाणिकता-
     श्रृंगार रस सागर काव्यात्मक रचना है, जो व्रज का रास रंगमंच में उद्धृत है। यह आभीर और यादव की सांस्कृतिक एकता को वैदिक परंपरा के अनुरूप प्रस्तुत करता है।

    (viii) ब्रह्मवैवर्त पुराण (भाग 2, 7/5)
    संदर्भ-
     ब्रह्मवैवर्त पुराण में वसुदेव को यशोदा का ज्येष्ठ कहा गया है, जो नंद के साथ उनके निकट संबंध को दर्शाता है।

    व्याख्या-
     यह उल्लेख नंद और वसुदेव के बीच निकट पारिवारिक संबंध को पुष्ट करता है। गोपाल चम्पू और वंशीधरी टीका के आधार पर, “ज्येष्ठ” शब्द को चचेरे भाई के संदर्भ में व्याख्या किया जा सकता है, क्योंकि संस्कृत में पारिवारिक शब्दावली व्यापक अर्थों में प्रयुक्त होती है।
     यह यदु वंश की एकता को रेखांकित करता है।

    प्रामाणिकता-
     ब्रह्मवैवर्त पुराण एक प्रमुख वैष्णव पुराण है, जो श्रीकृष्ण और यदु वंश की महिमा का वर्णन करता है।

    (ix) कल्याण भक्तमाल अंक (गीता प्रेस, अध्याय 33)
    वर्णन-
     यदुवंश में सर्वगुण सम्पन्न देवमीढ़ नाम के एक राजा हुए। ये श्रीदेवमीढ़ मथुरा में निवास करते थे। इनकी दो पत्नियाँ थीं। पहली क्षत्रियवर्ण की, दूसरी वैश्य वर्ण की। उन दोनों रानियों के क्रम से यथायोग्य दो पुत्र हुए। एक का नाम था शूरसेन, दूसरे का नाम था पर्जन्य।  
    (कल्याण भक्तमाल अंक, गीता प्रेस, गोरखपुर, अध्याय 33)

    व्याख्या-
    -यह वर्णन यदु वंश की वंशावली को प्रस्तुत करता है। यह नंद और वसुदेव के चचेरे भाई होने को पुष्ट करता है, क्योंकि शूरसेन और पर्जन्य सौतेले भाई थे।
     देवमीढ़ को मथुरा का शासक बताया गया है, जो यदु वंश की गौरवशाली परंपरा को रेखांकित करता है।

    प्रामाणिकता-
     गीता प्रेस की प्रकाशन परंपरा वैदिक और पुराण साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने के लिए जानी जाती है। यह वर्णन विश्वसनीयता प्रदान करता है।

    (x) आनंद वृंदावन चम्पू (स्तवक 2)
    श्लोक-
     नाम्राः नंदीश्वर शैले मंदिरं। स्फुरदिन्दिरम ॥ ६२ ॥  
     (आनंद वृंदावन चम्पू, द्वितीय स्तवक, पेज 52)

    अनुवाद-
     नंदीश्वर पर्वत पर पर्जन्य का भव्य मंदिर था, जो इंदिरा (लक्ष्मी) की तरह शोभायमान था।

    व्याख्या-
     यह श्लोक पर्जन्य के नंदीश्वर में निवास और उनके गोपालन कार्य को दर्शाता है। आनंद वृंदावन चम्पू में पर्जन्य के केशी राक्षस के भय से नंदीश्वर छोड़कर महावन (गोकुल) जाने का वर्णन है, जो गोप समुदाय की पशुपालक पहचान को रेखांकित करता है।
     पर्जन्य के पुत्र नंदगोप ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया, और श्रीकृष्ण को पालने का दायित्व लिया। यह श्लोक गोप समुदाय की यदु वंश से उत्पत्ति और उनकी सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है।

    प्रामाणिकता-
     आनंद वृंदावन चम्पू वैष्णव साहित्य का काव्यात्मक ग्रंथ है, जो श्रीकृष्ण और गोप समुदाय की लीलाओं को जीवंत करता है।

    2. गोप, आभीर (अहीर), और यादव सांस्कृतिक और वंशीय एकता

    श्लोक और व्याख्या
    (i) गोपाल चम्पू (पूर्व चम्पू, तृतीय पूरण, श्लोक 36)
    श्लोक-
     श्रीमदुपनंदादय पञ्चनंदना जगदेवानंद यामासुः।  
     उपनंदोऽभिनंदश्च नंदः सन्नंद नंदनौ ॥ ३६ ॥  
     (गोपाल चम्पू, पूर्व चम्पू, तृतीय पूरण)

    अनुवाद-
     उपनंद, अभिनंद, नंद, सन्नंद, और नंदन—ये पर्जन्य के पाँच पुत्र थे, जो संसार को आनंद प्रदान करने वाले थे।

    व्याख्या-
     यह श्लोक पर्जन्य के पाँच पुत्रों का उल्लेख करता है, जिनमें नंदगोप मँझला पुत्र है। यह गोप समुदाय की संगठित संरचना को दर्शाता है, जो यदु वंश की वैश्य शाखा से जुड़ा है।
     आभीर-विशेष के रूप में गोपों की पहचान इस श्लोक में निहित है, क्योंकि पर्जन्य ने गोपालन का कार्य अपनाया था। यह यदु वंश की व्यापकता को दर्शाता है, जिसमें क्षत्रिय (वसुदेव) और वैश्य (नंद) दोनों शामिल थे।

    प्रामाणिकता-
     यह श्लोक गोप समुदाय की सांस्कृतिक और वंशीय पहचान को जीव गोस्वामी की काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत करता है, जो वैष्णव परंपरा में विश्वसनीय है।

    (ii) विष्णु पुराण (चतुर्थ अंश, अध्याय 14)
    श्लोक-
     यदोः पुत्रचतुष्कं तु यदुवंशविवर्द्धनम्।  
     सहस्रजित् क्रौष्टिश्चैव शतजित् चायुजस्तथा ॥ ११ ॥  
     (विष्णु पुराण, चतुर्थ अंश, अध्याय 14)

    अनुवाद-
     यदु के चार पुत्र थे, जो यदु वंश को बढ़ाने वाले थे: सहस्रजित, क्रौष्टि, शतजित, और आयु।

    व्याख्या-
     विष्णु पुराण यदु वंश की वंशावली का विस्तृत वर्णन करता है। यदु के वंशजों में देवमीढ़, शूरसेन, पर्जन्य, वसुदेव, और नंद शामिल हैं। यह श्लोक यदु वंश की व्यापकता को स्थापित करता है, जिसमें गोप और आभीर समुदाय भी शामिल हैं।
     गोप और आभीर को यदु वंश की पशुपालक शाखा के रूप में वर्णित किया गया है, जो गोपाल चम्पू और श्रृंगार रस सागर में “आभीर-विशेष” के रूप में उल्लिखित है।

    प्रामाणिकता-
     विष्णु पुराण एक प्रमुख वैदिक पुराण है, जो यदु वंश की वंशावली को प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करता है।

    3. यादव सभ्यता का संरक्षण और चुनौतियाँ

    श्लोक और संदर्भ-
    - यादव सभ्यता यदु वंश की गौरवशाली परंपरा है, जो श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव, और नंदगोप जैसे व्यक्तित्वों से समृद्ध है। श्रीमद्भागवत पुराण (9/24), विष्णु पुराण (चतुर्थ अंश, अध्याय 14), और हरिवंश पुराण में यदु वंश की वंशावली विस्तार से वर्णित है।
    - गोप और आभीर यदु वंश की पशुपालक शाखाएँ हैं, जो गोपाल चम्पू, राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका, और श्रृंगार रस सागर में “आभीर-विशेष” के रूप में वर्णित हैं। ये समुदाय वैश्य वर्ण से जुड़े हैं, लेकिन उनकी यदु वंशी उत्पत्ति उन्हें यादव सभ्यता का अभिन्न अंग बनाती है।
    - 15वीं-16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु और छह गोस्वामियों (रूप गोस्वामी, जीव गोस्वामी, सनातन गोस्वामी आदि) ने वृंदावन को केंद्र बनाकर यादव सभ्यता को पुनर्जनन किया। गोपाल चम्पू, राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका, और आनंद वृंदावन चम्पू जैसे ग्रंथों ने इस सभ्यता की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान को संरक्षित किया।

    चुनौतियाँ-
     कुछ समूह श्रीकृष्ण की सार्वभौमिक भक्ति के कारण उनकी विरासत को अपनी पहचान से जोड़ने का प्रयास करते हैं। श्रीमद्भागवत पुराण, गर्ग संहिता, गोपाल चम्पू, और राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका जैसे ग्रंथ स्पष्ट रूप से यादव, गोप, और आभीर की यदु वंश से उत्पत्ति को स्थापित करते हैं, जो इस सभ्यता की प्रामाणिकता को पुष्ट करते हैं।
     मध्यकाल और औपनिवेशिक काल में शिक्षा से वंचन के कारण यादव समुदाय की ऐतिहासिक विरासत मौखिक परंपराओं तक सीमित रही। गीता प्रेस और वृंदावन के ग्रंथों ने इस विरासत को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    संरक्षण के उपाय-
    ग्रंथों का अध्ययन- गीता प्रेस, गोरखपुर और वृंदावन के गौड़ीय वेदांत प्रकाशन से श्रीमद्भागवत पुराण, गर्ग संहिता, गोपाल चम्पू, और राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका जैसे ग्रंथ प्राप्त किए जा सकते हैं। यदुकुल सर्वस्व (मन्नालाल अभिमन्यु, वाराणसी) और व्रज का रास रंगमंच (रामनारायण अग्रवाल) जैसे ग्रंथ भी उपयोगी हैं।
    सांस्कृतिक उत्सव- जन्माष्टमी, होली, और गोवर्धन पूजा जैसे उत्सव यादव सभ्यता की स्मृति को जीवित रखते हैं।
    सामुदायिक जागरूकता-यादव समुदाय को संगठित होकर अपनी वंशावली और इतिहास को प्रचारित करना चाहिए।

    4. यादव सभ्यता की गौरव गाथा

    यादव सभ्यता यदु वंश की अमर गाथा है, जो श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव, और नंदगोप जैसे व्यक्तित्वों से सुशोभित है। देवमीढ़, यदु वंश के परम गुणवान राजा, इस सभ्यता के पितामह थे। उनकी दो पत्नियों, अश्मकी और गुणवती, ने क्रमशः शूरसेन और पर्जन्य को जन्म दिया। श्रीमद्भागवत पुराण (10/5/19-20) में वसुदेव और नंद के “भ्राता” संबंध को, और गोपाल चम्पू, वंशीधरी टीका, और राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका में उनकी चचेरे भाई की स्थिति को स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया है। गर्ग संहिता (अश्वमेध खंड, अध्याय 40) में नंद द्वारा अनिरुद्ध को प्रपौत्र कहना उनके और वसुदेव के पारिवारिक बंधन को पुष्ट करता है।

    वसुदेव, शूरसेन के पुत्र, मथुरा के क्षत्रिय नेता थे, जिन्होंने कंस के अत्याचारों का सामना किया। नंदगोप, पर्जन्य के पुत्र, व्रज के गोप समुदाय के अधिपति थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण को अपने पुत्र के रूप में पाला। राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका और श्रृंगार रस सागर में पर्जन्य और नंद की गोप पहचान को “आभीर-विशेष” के रूप में वर्णित किया गया है, जो यदु वंश की व्यापकता को दर्शाता है। आनंद वृंदावन चम्पू में पर्जन्य के गोकुल प्रवास और नंद की महिमा का वर्णन इस सभ्यता की सांस्कृतिक समृद्धि को जीवंत करता है।

    गोप और आभीर यदु वंश की पशुपालक शाखाएँ हैं, जो वंशीधरी टीका और कल्याण भक्तमाल अंक में वैश्य वर्ण से जुड़ी हैं, लेकिन उनकी यदु वंशी उत्पत्ति उन्हें यादव सभ्यता का अभिन्न अंग बनाती है। श्रीकृष्ण, स्वयं एक गोप के रूप में व्रज में पले, ने गोपालन, भक्ति, और धर्म की परंपराओं को अमर किया। 

    15वीं-16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु और छह गोस्वामियों ने वृंदावन को केंद्र बनाकर यादव सभ्यता को पुनर्जनन किया। गोपाल चम्पू, राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका, और आनंद वृंदावन चम्पू जैसे ग्रंथों ने इस सभ्यता की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान को संरक्षित किया। गीता प्रेस की पुस्तकें और वृंदावन के ग्रंथ इस विरासत को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम हैं।

    यह गाथा एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जो वैदिक परंपरा के अनुरूप पाठकों को गर्व और संतुष्टि प्रदान करती है।

    5. निष्कर्ष और सुझाव
    नंदगोप और वसुदेव- श्रीमद्भागवत पुराण (10/5/19-20), गोपाल चम्पू, वंशीधरी टीका, राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका, गर्ग संहिता, और श्रृंगार रस सागर स्पष्ट रूप से पुष्ट करते हैं कि नंदगोप और वसुदेव चचेरे भाई थे, जिनके पितामह देवमीढ़ थे। उनके पिता, शूरसेन और पर्जन्य, सौतेले भाई थे।
    गोप-आभीर-यादव- ये सभी यदु वंश की शाखाएँ हैं। गोप और आभीर पशुपालक समुदाय थे, जो यदु वंश की क्षत्रिय और वैश्य पहचान से जुड़े थे। श्रृंगार रस सागर और गोपाल चम्पू उनकी सांस्कृतिक एकता को प्रस्तुत करते हैं।
    यादव सभ्यता का संरक्षण- गीता प्रेस, गोरखपुर और वृंदावन के गौड़ीय वेदांत प्रकाशन से श्रीमद्भागवत पुराण, गर्ग संहिता, गोपाल चम्पू, और राधाकृष्ण गणोद्देश दीपिका जैसे ग्रंथ प्राप्त किए जा सकते हैं। यदुकुल सर्वस्व (मन्नालाल अभिमन्यु, वाराणसी) और व्रज का रास रंगमंच (रामनारायण अग्रवाल) जैसे ग्रंथ भी उपयोगी हैं।




    भाग- [२] गोपों का क्षत्रित्व कर्म-
                           
    वैष्णव वर्ण के गोप- क्षत्रित्व कर्म को निःस्वार्थ एवं निष्काम भाव करते हैं। इसलिए उन्हें क्षत्रियों में महाक्षत्रिय कहा जाता है। किन्तु ध्यान रहे- ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के क्षत्रियों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि गोप वैष्णव वर्ण के महाक्षत्रिय है ना कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य वर्ण के। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण श्रीकृष्ण की नारायणी सेना थी जिसका गठन गोपों को लेकर श्रीकृष्ण द्वारा भूमि-भार हरण के उद्देश्य से ही किया था। भगवान श्रीकृष्ण सहित इस नारायणी सेना का प्रत्येक गोप- सैनिक, क्षत्रियोचित कर्म करते हुए बड़े से बड़े युद्धों में दैत्यों का वध करके भूमि के भार को दूर किया। गोपों को क्षत्रियोचित कर्म करने से ही उन्हें क्षत्रियों में महाक्षत्रिय कहा जाता है।
         
    इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण भी क्षत्रियोचित कर्म से ही अपने को क्षत्रिय कहा हैं, न कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण के क्षत्रिय वर्ण से। इस बात की पुष्टि-हरिवंश पुराण के भविष्यपर्व के अध्याय-८० के श्लोक संख्या-१० में पिशाचों को अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि-

    क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्या: प्रकृतिस्थिता:।
    यदुवंशे समुत्पन्न: क्षात्रं वृत्तमनुष्ठित:।।१०।

    अनुवाद- मैं क्षत्रिय हूँ। प्राकृतिक मनुष्य मुझे ऐसा ही कहते और जानते हैं। यदुकुल में उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिए क्षत्रियोचित कर्म का अनुष्ठान करता हूँ।
     
    अतः उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण क्षत्रियोचित कर्म करने से ही अपने को वैष्णव वर्ण के महाक्षत्रिय मानते हैं, न कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के जन्मगत
    क्षत्रियों से , और यह भी ज्ञात हो कि- भगवान श्रीकृष्ण जब भी भूतल पर अवतरित होते हैं तो वे वैष्णव वर्ण के गोप कुल में ही अवतरित होते हैं ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण में नही।

    इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण महाभारत के उद्योग पर्व के सेनोद्योग नामक उपपर्व के सप्तम अध्याय में श्लोक संख्या- (१८) और (१९) में अपने गोपों को अजेय योद्धा के रूप में बताते हैं-

    "मत्सहननं तुल्यानां ,गोपानाम् अर्बुदं महत्।
    नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:।१८।

    अनुवाद - मेरे पास दस करोड़ गोपों की विशाल सेना है, जो सबके सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीर वाले हैं।
    उन सबकी 'नारायण' संज्ञा है। अर्थात् वे सभी नारायण नाम से विश्व विख्यात हैं। वे सभी युद्ध में डटकर मुकाबला करने वाले हैं।।१८।।
               
    अतः उपर्युक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि भूतल पर गोपों (अहिरों) से बड़ा क्षत्रियोचित कर्म करने वाला दूसरा कोई नहीं है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण इन्हीं गोपों को लेकर नारायणी सेना का गठन करके पृथ्वी का भार उतारते हैं।
    इसीलिए उन्हें महाक्षत्रिय कहा जाता है।

    ✳️ भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गोप हैं। इस बात को इस पुस्तक के अध्याय- (५) जो "भगवान श्री कृष्ण का गोप होना तथा गोप कुल में अवरण" नामक शीर्षक से है, उसमें विस्तार पूर्वक बताया गया है, वहाँ से इस विषय पर पाठकगण  विस्तार से जानकारी ले सकते हैं।

    भगवान श्रीकृष्ण के गोपकुल के अन्य सदस्यों की ही भाँति नन्दबाबा की पुत्री योगमाया- विन्ध्यवासिनी (एकानंशा) को भी "क्षत्रिया" होने के सम्बन्ध में हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के अध्याय-तीन के श्लोक-२३ में लिखा गया है कि-
    निद्रापि सर्वभूतानां मोहिनी क्षत्रिया तथा।
    विद्यानां ब्रह्मविद्या त्वमोङ्कारोऽथ वषट् तथा ।।२३।
            
    अनुवाद-  समस्त प्राणियों को मोह में डालने वाली निद्रा भी तुम्हीं हो। तुम क्षत्रिया हो, विद्याओं में ब्रह्मविद्या हो तथा तुम ही ॐकार एवं वषट्कार हो।
        
    किन्तु इस सम्बन्ध में ध्यान रहे कि योगमाया- विन्ध्यवासिनी क्षत्रित्व कर्म से वैष्णव वर्ण की क्षत्रिया है न कि ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण की। क्योंकि योगमाया विन्ध्यवासिनी, गोप नन्द बाबा की एकलौती पुत्री हैं।

    कुल मिलाकर वैष्णव वर्ण के गोप क्षत्रियोचित कर्म से क्षत्रिय हैं न कि ब्रह्माजी की वर्ण -व्यवस्था के जन्मजात क्षत्रिय।
    इसलिए उन्हें वैष्णव वर्ण के महाक्षत्रिय कहा जाता है। जो समय-समय पर भूमि का भार दूर करने के लिए तथा पापियों का नाश करने के लिए शस्त्र उठाकर रण-भूमि में कूद पड़ते हैं। इसके उदाहरण- दुर्गा,  गोपेश्वर श्रीकृष्ण, और उनकी नारायणी सेना के गोप (अहीर) हैं।
        
    अब यहाँ पर कुछ पाठक गणों को अवश्य संशय हुआ होगा कि- गोपों को क्षत्रिय न कहकर महाक्षत्रिय क्यों कहा जाता है ? तो इसका एक मात्र जवाब है कि गोप और उनसे सम्बन्धित सभी सेनाएँ जैसे- "नारायणी सेना" अपराजिता एवं अजेया है, और उसके प्रत्येक गोप-यादव सैनिकों में लोक और परलोक को जीतने की क्षमता हैं। क्योंकि सभी  गोप भगवान श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न हुए हैं इसलिए उन पर कोई विजय नहीं पा सकता, अर्थात्  देवता, गन्धर्व, दैत्य,दानव, मनुष्य आदि कोई भी उनपर विजय नहीं पा सकता इसलिए उन्हें महाक्षत्रिय कहा जाता है। इन सभी बातों की पुष्टि गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक संख्या- (७) में भगवान श्रीकृष्ण उग्रसेन से स्वयं इन सभी बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि-

    ममांशा यादवा: सर्वे लोकद्वयजिगीषव:।
    जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्।।७।    
       
    अनुवाद - समस्त यादव मेरे अंश से प्रकट हुए हैं। वे लोक, परलोक दोनों को जीतने की इच्छा करते हैं। वे दिग्विजय के लिए यात्रा करके शत्रुओं को जीत कर लौट आएंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिए भेंट और उपहार लायेंगे।
             
    इन सभी बातों से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण के गोप और उनकी नारायणी सेना अजेया एवं अपराजिता है इसीलिए इन गोप कुल के यादवों को क्षत्रिय ही नहीं बल्कि महाक्षत्रिय भी कहा जाता है।


    भाग [३] गोपों का वैश्यत्व कर्म-
               
    ब्रह्माजी के चार वर्णों में तीसरे पायदान पर वैश्य लोग आते हैं। जिनका मुख्य कर्म- व्यवसाय, व्यापार, पशुपालन, कृषि कार्य इत्यादि है। और यह सभी कर्म वैष्णव वर्ण के गोप स्वतन्त्रत्तता पूर्वक करते हैं। इसलिए इन्हें कर्म के आधार पर वैश्य भी कहा जाता है, किन्तु ब्रह्माजी की वर्ण व्यवस्था के ये वैश्य नहीं है। क्योंकि गोपों का वर्ण तो वैष्णव वर्ण है, जो किसी भी कर्म को करने के लिए स्वतन्त्र हैं। अतः गोप समय आने पर युद्ध भी करते हैं, समय आने पर ब्राह्मणत्व कर्म करते हुए उपदेश देने का भी कार्य करते हैं, और समय आने पर शस्त्र भी उठाते हैं। इसके साथ ही गोप लोग कृषि कार्य, पशुपालन इत्यादि भी करते हैं।

    जिसमें ये गोप पशुपालन में मुख्य रूप से गो-पालन करते हैं, इसलिए लिए भगवान श्रीकृष्ण को गोपाल और समस्त गोपों को गोपालक कहा जाता है।
    गोपालन एवं कृषि कार्य से गोपों सहित भगवान श्रीकृष्ण का सम्बन्ध पूर्व काल से ही रहा है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण के धाम, गोलोक में भूरिश्रृँगा गायों का वर्णन-ऋग्वेद के मण्डल (१) के सूक्त- (154) की  ऋचा (6) में मिलता है-
    "ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि॥६।।
                 
    अर्थात् उपर्युक्त ऋचाओं का सार यही है कि विष्णु का परम धाम वहीं है, जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें रहती हैं, और वे विष्णु वहाँ गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) हैं, और यहीं स्वराट-विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि  नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए हैं।

    इससे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण सहित गोप वैश्य कर्म के अन्तर्गत गोपालन करते थे जो आज भी परम्परागत रूप गोपों में देखा जा सकता है। अर्थात् गोप,पशुपालन के साथ-साथ कृषि कर्म भी करते हैं। जिसे ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के ब्राह्मण और क्षत्रियों के लिए निषिद्ध माना गया है। किन्तु गोप, कृषि कर्म को निर्वाध एवं  नि:संकोच होकर करते हैं। इस बात की पुष्टि- गर्ग संहिता के गिरिराज खण्ड के अध्याय-(६) के श्लोक-(२६) में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण नन्द बाबा से कहते हैं कि-

    'कृषीवला वयं गोपा: सर्वबीजप्ररोहका:।
    क्षेत्रे मुक्ताप्रबीजानि विकीर्णीकृतवानहम्।।२६।
            
    अनुवाद- बाबा हम सभी गोप किसान हैं, जो खेतों में सब प्रकार के बीज बोया करते हैं। अतः हमने भी खेतों में मोती के बीच बिखेर दिए हैं।२६।
               
    इससे सिद्ध होता है कि गोप, कुशल कृषक भी है। और इस सम्बन्ध में बलराम जी को हल और मूसल धारण करना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि बलराम जी उस युग के सबसे बड़े कृषक रहे होंगे, जो अपने हल से कृषि कार्य के साथ-साथ भयंकर से भयंकर युद्ध भी किया करते थे।
               
    श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव जी को भी वैश्य कर्म करने की पुष्टि-देवीभागवतपुराण के चतुर्थ स्कन्ध के अध्याय- (२०) के श्लोक-(६०) और (६१) से होती है-

    "तत्रोत्पन्न: कश्यपांश: शापाच्च वरूणस्य वै।
    वसुदेवोऽतिविख्यात: शूरसेनसुतस्तदा।।६०।

    वैश्यावृत्तिरत: सोऽभून्मृते पितरि माधव:।
    उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान्।। ६१।

              
    अनुवाद- वहाँ पर वरुण देव के शापवश महर्षि कश्यप के अंशावतार परम यशस्वी वसुदेव जी शूरसेन के पुत्र होकर उत्पन्न हुए। पिता के मर जाने पर वे वसुदेव जी वैश्यावृत्ति में संलग्न होकर जीवन यापन करने लगे। उस समय वहाँ के राजा उग्रसेन थे और उनका कंस नामक एक प्रतापी पुत्र था।६०-६१।

    इससे सिद्ध होता है कि वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत किसी भी कर्म को छोटा या बड़ा नहीं माना गया है। इसी वजह से वैष्णव वर्ण के गोप, वैश्य कर्म करने में गर्व महसूस करते हैं। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण भी नन्द बाबा से बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि- बाबा हम सभी गोप किसान हैं।


    भाग [४] गोपों का शूद्रत्व कर्म-
          

    देखा जाए तो  ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य में चौथे पायदान पर शूद्र आते हैं, जिनका मुख्य कर्म सेवा करना निश्चित किया गया है। उससे हटकर शूद्र कुछ भी नहीं कर सकते, ऐसा ही उन पर प्रतिबंध लगाया गया है।
    किन्तु वैष्णव वर्ण में ऐसा कुछ भी नहीं है। क्योंकि वैष्णव वर्ण के गोप, ब्रह्मणत्व, क्षत्रित्व, वैश्य इत्यादि कर्मों के साथ- साथ सेवा कर्म को भी नि:संकोच और बड़े गर्व के साथ बिना किसी प्रतिबन्ध के करते आए हैं। जिसमें गोपों सहित भगवान श्रीकृष्ण का भी ऐसा ही कर्मगत स्वभाव देखने को मिलता है। क्योंकि पाप और अत्याचार को दूर करने के लिए और भक्तों के कल्याणार्थ व समाज सेवा के लिए ही प्रभु भूमि पर अवतरित होते हैं।
       
    भगवान श्रीकृष्ण को सेवा कर्म में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने की पुष्टि- युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से होती है, जिसका वर्णन- श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध (उत्तरार्द्ध ) के अध्याय-(७५) के श्लोक- (४-५)और (६) से होती है। जिसमें उस यज्ञ के बारे में लिखा गया है कि-
    भीमो महानसाध्यक्षो धनाध्यक्ष: सुयोधन:।
    सहदेवस्तु पूजायां नकुलो द्रव्यसाधने।।४।

    गुरुशुश्रूषणे जिष्णु: कृष्ण: पदावनेजन।
    परिवेषणे द्रुपदजा कर्णो दाने महामना:।।५।

    युयुधाननो विकर्णश्च हार्दिक्यो विदुरादय:।
    बाह्लीकपुत्रा भूर्याद्या ये च सन्तर्दनादय:।।६।

    अनुवाद- भीमसेन भोजनालय की देखभाल करते थे। दुर्योधन कोषाध्यक्ष थे, सहदेव अभ्यगतों के स्वागत सत्कार में नियुक्त थे और नकुल विविध प्रकार की सामग्री एकत्र करने का काम देखते थे। अर्जुन गुरुजनों की सेवा सुश्रुषा करते थे। और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, आए हुए अतिथियों के पाँव पखारने का काम करते थे। देवी द्रोपदी भोजन परोसने का काम करती थीं। और उदार शिरोमणि कर्ण खुले हाथों दान दिया करते थे।४-५-६।
    ( ज्ञात हो यह घटना महाभारत युद्ध से पहले की है।)
        
    इन उपर्युक्त श्लोक को यदि शुद्ध अन्तरात्मा से विचार किया जाए, तो गोपेश्वर श्रीकृष्ण ने समाज सेवा में वह कार्य किया जो ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य के शूद्र किया करते हैं। जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने वैष्णव वर्ण के गोप होकर पांव- पखार (धोकर) कर यह सिद्ध कर दिया कि-  वैष्णव वर्ण के सदस्य ब्रह्मणत्व, क्षत्रित्व, वैश्य कर्म- के साथ-साथ शूद्र (समाज सेवा) का कर्म करने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। जबकि ब्रह्माजी की वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य से सेवा कर्म को निंदनीय माना गया है।

    जबकि वैष्णव वर्ण में कोई भी कर्म छोटा या बड़ा नहीं माना गया है। इसमें वैष्णव जन निःसंकोच सभी कर्मों को बिना किसी प्रतिबन्ध के करने की आजादी होती है जो ब्रह्माजी के चातुर्वर्ण्य में ऐसी नहीं है।      
            
    इसीलिए वैष्णव वर्ण के गोपों की पौराणिक ग्रन्थों में भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। उनकी सभी प्रसंशाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन इसके अगले अध्याय- (१२) में किया गया है। उसे भी इसी अध्याय के साथ जोड़कर पढ़ें।
      
    इस प्रकार से यह अध्याय-(११) वैष्णव वर्ण के गोपों के प्रमुख कार्यों एवं दायित्वों की जानकारी के साथ समाप्त हुआ।


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                अध्याय- द्वादश (12)

    वैष्णव वर्ण" के गोपों की पौराणिक ग्रन्थों में प्रशंसा एवं सांस्कृतिक विरासत-

    इस अध्याय के महत्वपूर्ण प्रसंगों को अच्छी तरह से समझने के लिए इसको प्रमुख रूप से (दो) भागों में विभाजित किया गया है-

    भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
    भाग [२]- भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।

           (क)-हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य।
           (ख)-गोपों की देन "पञ्चम वर्ण"।
           (ग)-किसान और कृषि शब्द कृष्ण सहित गोपों की देन है। 
           (घ)-आर्य व ग्राम संस्कृति के जनक गोप हैं।
           (ङ)-आभीर छन्द और आभीर राग।
       
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    ▪️भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
              
    पौराणिक ग्रन्थों में वैष्णव वर्ण के गोपों अर्थात यादवों की समय-समय पर भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। जैसे-
    (१)- ब्रह्माजी के पुष्कर यज्ञ के समय जब अहीर कन्या देवी गायत्री का विवाह ब्रह्माजी से होने को सुनिश्चित हुआ तो वहीं पर सभी देवताओं और ऋषि- मुनियों की उपस्थिति में भगवान विष्णु गोपों से पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- १७ के श्लोक संख्या- (१७) में कहते हैं कि-
    धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।
    मया ज्ञात्वा तत: कन्यादत्ताचैषा विरञ्चये।।१७।

    अनुवाद-  तुम लोगों को मैंने धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल जानकर ही तुम्हारी कन्या को ब्रह्मा को प्रदान किया है।१७। 

    अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर सिद्ध होता है कि गोपों जैसा धर्मवत्सल, सदाचारी और धर्मज्ञ भूतल पर ही नहीं अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई नहीं है।

    (२)- गोपों (यादवों) की कुछ इसी तरह की प्रशंसा और  विशेषताओं को कंस स्वयं करता है। यादवों को अपने दरबार में बुलाकर उनसे जो कुछ कहा उसका वर्णन- हरिवंशपुराण के विष्णु पर्व के अध्याय -(२२ के १२ से २५ ) तक के श्लोकों में मिलता है। जो इस प्रकार है -

    "भवन्तः सर्वकार्यज्ञा वेदेषु परिनिष्ठिताः।
    न्यायवृत्तान्तकुशलास्त्रिवर्गस्य प्रवर्तकाः।।१२।

    कर्तव्यानां च कर्तारो लोकस्य विबुधोपमाः।
    तस्थिवांसो महावृत्ते निष्कम्पा इव पर्वताः।।१३।।

    अदम्भवृत्तयः सर्वे सर्वे गुरुकुलोषिताः।
    राजमन्त्रधराः सर्वे सर्वे धनुषि पारगाः।।१४ ।।

    यशः प्रदीपा लोकानां वेदार्थानां विवक्षवः।
    आश्रमाणां निसर्गज्ञा वर्णानां क्रमपारगाः।।१५।।

    प्रवक्तारः सुनियतां नेतारो नयदर्शिनाम् ।
    भेत्तारः परराष्ट्राणां त्रातारः शरणार्थिनाम्।।१६।।

    एवमक्षतचारित्रैः श्रीमद्भिरुदितोदितैः ।
    द्यौरप्यनुगृहीता स्याद्भवद्भिः किं पुनर्मही।। १७।।

    ऋषीणामिव वो वृत्तं प्रभावो मरुतामिव ।
    रुद्राणामिव वः क्रोधो दीप्तिरङ्गिरसारमिव।।१८।।

    व्यावर्तमानं सुमहद् भवद्भिः ख्यात कीर्तिभिः ।
    धृतं यदुकुलं वीरैर्भूतलं पर्वतैरिव।।१९।।

    अनुवाद -
    आप (यादव) समस्त कर्तव्य कर्मों के ज्ञाता, वेदों के परिनिष्ठित विद्वान, न्यायोचित वार्ता में कुशल, धर्म, अर्थ, और काम के प्रवर्तक, कर्तव्य पालक, जगत के लिए देवों के समान माननीय महान आचार्य विचार में दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने वाले और पर्वत के समान अविचल हैं। १२-१३।

    • आप सब लोग पाखण्डपूर्ण वृत्ति से दूर रहते हैं। सबने गुरुकुल में रहकर शिक्षा पाई है। आप सब लोग राजा की गुप्त मन्त्रणाओं को सुरक्षित रखने वाले तथा धनुर्वेद में पारंगत हैं।१४।

    • आपके यशस्वी रूप प्रदीप सम्पूर्ण जगत में अपना प्रकाश फैला रहे हैं। आप लोग वेदों के तात्पर्य का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। आश्रम के जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें आप जानते हैं। चारों वर्णों के जो क्रमिक धर्म हैं, उसके आप लोग पारंगत विद्वान हैं।१५।

    ✳️ ज्ञात हो श्लोक- (१५) में जो बात कही गई है वह यादवों के अतिरिक्त अन्य किसी पर लागू नहीं हो सकती क्योंकि ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था में  जन्मगत आधार पर यह  प्रतिबन्धित कर दिया गया है कि (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) लोग अपने ही वर्ण में रहकर कार्य करें दूसरे वर्ण का कार्य कदापि न करें। जबकि वैष्णव वर्ण में इस तरह कोई प्रतिबन्ध नहीं है इस लिए वैष्णव वर्ण के गोप सभी तरह के कर्म बिना बन्धन के स्वतन्त्रता पूर्वक करते हैं। इसलिए कंस यह बात कहा कि-" आप लोग वेदों के तात्पर्य का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। आश्रम के जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें आप जानते हैं। चारों वर्णों के जो क्रमिक धर्म हैं, उसके आप लोग पारंगत विद्वान हैं।१५।

    • आप लोग उत्तम विधियों के वक्ता, नीतिदर्शी पुरुषों के भी नेता, शत्रु राष्ट्रों के गुप्त रहस्यों का भेदन करने वाले तथा शरणार्थियों के संरक्षक हैं।१६।
    • आपके सदाचार में कभी आँच नहीं आने पाई है। आप लोग श्रीसम्पन्न हैं तथा श्रेष्ठ पुरुषों की चर्चा होते समय आप लोगों का नाम बारम्बार लिए जाते हैं। आप लोग चाहें तो स्वर्ग लोक पर भी अनुग्रह कर सकते हैं फिर इस भूतल की तो बात ही क्या ?।१७।

    • आपका (यादवों का) आचार ऋषियों के,  प्रभाव मरुद्गणों के, क्रोध रुद्रों के, और तेज अग्नि के समान है।१८।
    • यह महान यदुकुल जब अपनी मर्यादा से भ्रष्ट हो रहा था, उस समय विख्यात कीर्ति वाले आप जैसे वीरों ने ही इसे मर्यादा में स्थापित किया, ठीक उसी तरह से जैसे पर्वतों नें इस भूतल को दृढ़तापूर्वक धारण कर रखा है।१९।

    उपर्युक्त श्लोकों में देखा जाए तो यादवों के लिए पाँच महत्वपूर्ण बातें निकल कर सामने आती है। वो हैं-

    (१)- यादव- पाखण्डपूर्ण वृत्ति से सदैव दूर रहते थे और  आज  भी बहुतायत यादव  दूर रहते हैं।

    (२)- यादव- वेदों के तात्पर्य का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। तथा आश्रम के जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें ये लोग भली- भाँति जानते हैं। और ( ब्राह्मी वर्ण- व्यवस्था के जो ) चारों वर्णों के  क्रमिक धर्म है, उसके ये लोग पारंगत विद्वान हैं।   
    (३)- यादव- नीतिदर्शी पुरुषों के भी नेता, शत्रु राष्ट्रों के गुप्त रहस्यों का भेदन करने वाले तथा शरणार्थियों के संरक्षक हैं।
    (४)- यादवों के दृढ़-संकल्प की बात करें तो ये स्वर्ग लोक पर भी अनुग्रह कर सकते हैं, फिर इस भूतल की तो बात ही क्या।
    (५)- यादवों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनके आचार ऋषियों के, प्रभाव मरुद्गणों के, क्रोध रूद्रो के, और तेज अग्नि के समान होता है।

    दूसरी बात यह कि- यादवों की इन्हीं विशेषताओं की वजह से जब कालयवन नें नारद जी से पूछा कि इस समय पृथ्वी पर बलवान राजा कौन-कौन हैं ? इस पर नारद जी विष्णुपुराण के पञ्चम अंश के अध्याय- २३ के श्लोक संख्या- ६ में नारद जी ने बताया हैं -

    स तु वीर्यमदोन्मतः पृथिव्यां बलिनो नृपान्।
    अपच्छन्नारदस्तस्मै कथयामास यादवान्।।६।

    अनुवाद- तदनन्तर वीर्यमदोन्मत्त कालयवन ने नारद जी से पूछा कि- पृथ्वी पर बलवान राजा कौन-कौन से हैं ? इस पर नारद जी ने उसे यादवों को ही सबसे अधिक बलशाली बताया।

    इसी तरह से गोपकुल की गोपियों के लिए गर्गसंहिता के गोलक खण्ड के अध्याय- (१०) के श्लोक संख्या-(८) में नारद जी कंस से कहते हैं कि -
    "नन्दाद्या वसव: सर्वे वृषभान्वादय: सरा:।
    गोप्यो वेदऋचाद्याश्च सन्ति भूमौ नृपेश्वर।।८।

    अनुवाद -  नन्द आदि गोप वसु के अवतार हैं और वृषभानु आदि देवताओं के अवतार हैं।
    नृपेश्वर कंस ! इस व्रजभूमि में जो गोपियाँ हैं, उनके रूप में वेदों की ऋचाएँ यहाँ निवास करती हैं।
    अब इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि गोपियों की उपमा वेदों की ऋचाओं से की जाती है।

    (४)- गोपियाँ कोई साधारण स्त्रियाँ नहीं थीं। तभी तो चातुर्वर्ण्य के नियामक व रचयिता ब्रह्माजी-ने  श्रीमद्भभागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय- (४७) के श्लोक (६१) में गोपियों की चरण धूलि को पाने के लिए तरह-तरह की कल्पना करते हुए मन में विचार करते  हुए कहा- कि-

    "आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
    या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथमं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्।।६१।

    अनुवाद - मेरे लिए तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मैं इस वृन्दावन धाम में कोई झाड़ी, लता अथवा औषधि बन जाऊँ। अहा ! यदि मैं ऐसा बन जाऊँगा, तो मुझे इन व्रजांगनाओं (गोपियों ) की चरण धूलि निरन्तर सेवन करने के लिए मिलती रहेगी।
    अब इन गोपकुल की गोपियों लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि ब्रह्मा भी इनके चरण धूलि को पाने के लिए झाड़ी और लता तक बन जानें की इच्छा करते हैं।

    (५)- इसी तरह से गोपों के बारे में श्रीराधा जी, गोपी रूप धारण किए भगवान श्रीकृष्ण से- गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड के अध्याय-(१८) के श्लोक संख्या -(२२) में कहती हैं कि-
    "गा: पालयन्ति सततं रजसो गवां च गङ्गां स्पृशन्ति च जपन्ति गवां सुनाम्नाम।
    प्रेक्षन्त्यहर्निशमलं सुमुखं गवां च जाति: परा न विदिता भुवि गोपजाते:।।२२।

    अनुवाद - गोप सदा गौओं का पालन करते हैं। गोरज की गङ्गा में नहाते हैं, उनका स्पर्श करते हैं तथा गौओं के उत्तम नाम का जाप करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें दिन- रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।
    (६)- इसी तरह से परम ज्ञानयोगी उद्धव जी ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(९४) के कुछ प्रमुख श्लोकों में गोपियों  की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि-
    "धन्यं भारतवर्षं तु पुण्यदं शुभदं वरम् ।
    गोपीपादाब्जरजसा पूतं परमनिर्मलम्। ७७।

    ततोऽपि गोपिका धन्या सान्या योषित्सु भारते।
    नित्यं पश्यन्ति राधायाः पादपद्मं सुपुण्यदम्।७८।

    अनुवाद - इस भारतवर्ष में नारियों के मध्य गोपीकाऐं सबसे बढ़कर धन्या और मान्या हैं, क्योंकि वे उत्तम पुण्य प्रदान करने वाले श्रीराधा के चरणकमलों का नित्य दर्शन करती रहती हैं।७७-७८।

    पुनः उद्धव जी कहते हैं कि -

    "षष्टिवर्षसहस्राणि तपस्तप्तं च ब्रह्मणा ।
    राधिकापादपद्मस्य रेणूनामुपलब्धये ।।७९।

    गोलोकवासिनी राधा कृष्णप्राणाधिका परा ।
    तत्र श्रीदामशापेन वृषभानसुताऽधुना ।।८०।

    ये ये भक्ताश्च कृष्णस्य देवा ब्रह्मादयस्तथा।
    राधायाश्चापि गोपीनांकरां नार्हन्ति षोडशीम्।।८१।

    कृष्णभक्तिं विजानाति योगीन्द्रश्च महेश्वरः।
    राधा गोप्यश्च गोपाश्च गोलोकवासिनश्च ये।८२।।

    किञ्चित्सनत्कुमारश्च ब्रह्मा चेद्विषयी तथा।
    किंचिदेव विजानन्ति सिद्धा भक्ताश्च निश्चितम्।। ८३।।

    धन्योऽहं कृतकृत्योऽहमागतो गोकुलं यतः ।
    गोपिकाभयो गुरुभ्यश्च हरिभक्तिं लभेऽचलाम् ।। ८४ ।।

    मथुरां च न यास्यामि तीर्थकीर्तेश्च कीर्तनम् ।
    श्रोष्यामि किंकरो भूत्वा गोपीनां जन्मजन्मनि।। ८५।।

    न गोपीभ्यः परो भक्तो हरेश्च परमात्मनः।
    यादृशीं लेभिरेगोप्यो भक्तिं नान्ये च तादृशीम्।८६।।

    अनुवाद -
    • इन्हीं राधिका के चरण-कमल की रज को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा ने साठ हजार वर्षों तक तप किया था।७९।

    • गोलोक- वासिनी राधाजी, जो परा प्रकृति हैं। वहीं भगवान कृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। वे गोलोक में श्रीदामा के शाप से आज-कल भूलोक में वृषभानु की पुत्री राधा के नाम से उपस्थित हैं। और जो-जो श्रीकृष्ण के भक्त हैं, वे सभी राधा के भी भक्त हैं। ब्रह्मा आदि देवता गोपियों की १६ (सोलहवीं) कला की भी समानता नहीं कर सकते। ८०-८१।

    • श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म पूर्णरूप से तो योगीराज महेश्वर, राधा तथा गोलोकवासी और गोप-गोपियाँं ही जानती हैं। ब्रह्मा और सनत्कुमारों को कुछ ही ज्ञात है। सिद्ध और भक्त भी स्वल्प ही जानते हैं। ८२-८३।

    • इस गोकुल में आने से मैं धन्य हो गया। यहाँ गुरुस्वरूपा गोपिकाओं से मुझे अचल हरिभक्ति प्राप्त हुई है, जिससे मैं कृतार्थ हो गया। ८४।

    पुनः इसके अगले श्लोक- (८५) और (८६) में उद्धव जी कहते हैं कि-
    "मथुरां च न यास्यामि तीर्थकीर्तेश्च कीर्तनम् ।
    श्रोष्यामि किंकरो भूत्वा गोपीनां जन्मजन्मनि ।।८५।।

    न गोपिभ्यः परो भक्तों हरेश्च परमात्मनः।
    यादृशीं लेभिरे गोप्यो भक्तिं नान्ये च तादृशीम्।।८६।।

    अनुवाद -
    • अब मैं मथुरा नहीं जाऊँगा, और प्रत्येक जन्म में यहीं गोपियों का किंकर (दास,सेवक) होकर तीर्थश्रवा श्रीकृष्ण का कीर्तन सुनता रहूँगा, क्योंकि गोपियों से बढ़कर परमात्मा श्रीहरि का कोई अन्य भक्त नहीं है। गोपियों ने जैसी भक्ति प्राप्त की है वैसी भक्ति दूसरों को प्राप्त नहीं हुई। ८५ - ८६।               
    और यहीं कारण है कि शास्त्रों में सभी मनुष्यों को गोप और गोपियों की पूजा करने का भी विधान किया गया है। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भेवीभागवत पुराण के नवम् स्कंध के अध्याय -३० के श्लोक संख्या - ८५ से ८९ से होती है जिसमें लिखा गया है कि -

    "कार्तिकीपूर्णिमायां च कृत्वा तु रासमण्डलम्।
    गोपानां शतकं कृत्वा गोपीनां शतकं तथा।।८५।

    शिलायां प्रतिमायां च श्रीकृष्णं राधाया सह।
    भारते पूजयेभ्दवत्या चोपचाराणि षोडश।।८६।

    गोलोक वसते सोऽपि यावद्वै ब्राह्मणो वय।
    भारतं पुनरागत्य कृत्यो भक्तिं लभेद् दृढाम।।८७।

    क्रमेण सुदृढां भक्तिं लब्ध्वा मन्त्रं हरेरहो।
    देवं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः।।८८।

    ततः कृष्णस्य सारुपयं पार्षदप्रवरो भवेत्।
    पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत।।८९।

    अनुवाद - जो भारतवर्ष में कार्तिक पूर्णिमा को सैकड़ो गोपों तथा गोपियों को साथ लेकर रास मण्डल सम्बन्धी उत्सव मनाकर शालिग्राम- शिला पर या प्रतिमा में सोलहों प्रकार के पूजनोपचारों से भक्ति पूर्वक साधन सहित श्रीकृष्ण की पूजा सम्पन्न करता है, वह ब्रह्माजी के स्थिति पर्यन्त गोलोक में निवास करता है। 
    पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर वह श्रीकृष्ण की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। फिर भगवान श्रीहरि की क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मन्त्र प्राप्त करके देह त्याग के अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहाँ श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है। तब पुनः वहाँ से उसका पतन नहीं होता, वह जरा तथा मृत्यु से सर्वथा रहित हो जाता है। अर्थात व मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।८५-८९।

    नारद पुराण में सभी गेपों की पूजा का विधान-

    गोपवृंदयुतं वंशीं वादयन्तं स्मरेत्सुधीः ।।
    एवं ध्यात्वा जपेदादावयुतद्वितयं बुधः ।८०-५०।


    दक्षिणे वासुदेवाख्यं स्वच्छं चैतन्यमव्ययम् ।।
    वामे च रुक्मिणीं तदून्नित्यां रक्तां रजोगुणाम् ।। ८०-५८।

    एवं संपूज्य गोपालं कुर्यादावरणार्चनम् ।।
    यजेद्दामसुदामौ च वसुदामं च किंकिणीम् । ८०-५९ ।।

    पूर्वाद्याशासु दामाद्या ङेंनमोन्तध्रुवादिकाः ।।
    अग्निनैर्ऋतिवाय्वीशकोणेषु हृदयादिकान् ।८०-६० ।

    दिक्ष्वस्त्राणि समभ्यर्च्य पत्रेषु महिषीर्यजेत् ।।
    रुक्मिणी सत्यभामा च नाग्नजित्यभिधा पुनः ।। ८०-६१ ।।

    सुविन्दा मित्रविन्दा च लक्ष्मणा चर्क्षजा ततः ।।
    सुशीला च लसद्रम्यचित्रितांबरभूषणा ।८०-६२।

    ततो यजेद्दलाग्रेषु वसुदेवञ्च देवकीम् ।।
    नंदगोपं यशोदां च बलभद्रं सुभद्रिकाम् ।८०-६३।

    गोपानूगोपीश्च गोविंदविलीनमतिलोचनान् ।।
    ज्ञानमुद्राभयकरौ पितरौ पीतपांडुरौ।८०-६४।

    दिव्यमाल्याम्बरालेपभूषणे मातरौ पुनः ।।
    धारयन्त्यौ चरुं चैव पायसीं पूर्णपात्रिकाम् ।८०-६५।

    अनुवाद:-
    इनके पूजन के उपरान्त वसुदेव - देवकी नन्दगोप यशोदा बलराम सुभद्रा और गोविन्द में लीन नेत्र तथा मति वाले गोप गोपियों और ज्ञान मुद्रा अभयमुद्राधारी  पितरों की जो पीले और सफेद रंग वाले हैं उन सबकी पूजा करें- तत्पश्चात दलाग्र में दिव्य माला वस्त्र भूषण सज्जित माताओं की पुन: पूजा करें। वे चरण तथा खीर भरे पात्रों को धारण करने वाली हैं।।६३-६५।।

    _____________________
    श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे तृतीयपादे कृष्णमन्त्रनिरूपणं नामाशीतितमोऽध्यायः ।८०।









    गोपों की इन्हीं सब आध्यात्मिक विशेषताओं के कारण इनको पापों से मुक्ति दिलाने वाला कहा
     गया है। इसकी पुष्टि-  गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड खण्ड़ के अध्याय- ६० के श्लोक संख्या- ४० से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-

    "य: श्रृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरेः।
    मुक्तिं यदुनां गोपानां सर्वपापै: प्रमुच्यते।। ४०।

    अनुवाद- जो लोग श्रीहरि के गोलोक धाम पधारने का चरित्र सुनते हैं तथा गोपालक (गोप), यादवों की मुक्ति का वृत्तान्त पढ़ते हैं, वे यह सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।४०।।

    कुछ इसी तरह की बात श्रीविष्णु पुराण के चतुर्थ अंश के अध्याय- (११) के श्लोक संख्या- (४) में भी लिखी गई है जिसमें गोपकुल के यादव वंश को पाप मुक्ति का सहायक बताया गया है-

    "यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यतते।
    यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परंब्रह्म निराकृति।। ४।

    अनुवाद - जिसमें श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्म ने साकार रूप में अवतार लिया था, उस यदुवंश का श्रवण करने से मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।४।

    ✳️ किन्तु वे लोग विशेषकर ऐसे कथावाचक, पापों से मुक्त नहीं हो पाते जो जानबूझकर या स्वार्थवश या लालचवश श्रीकृष्णकथा में श्रीकृष्ण की आधी-अधुरी जानकारी को बताते हुए आगे बढ़ जाते हैं। ऐसे कथावाचक कभी भी पाप से मुक्त नहीं हो सकते। साथ ही वे पाप तथा दण्ड के भागी होते हैं। क्योंकि श्रीकृष्णकथा तभी पूर्ण मानी जाती है जब श्रीकृष्ण के साथ ही उनके पारिवारिक सदस्य गोपों का भी वर्णन किया गया हो। क्योंकि यह ध्रुव सत्य है कि गोपेश्वर श्रीकृष्ण के सहचर गोप हैं जिनके साथ भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीलाएँ करते रहते हैं। इसीलिए बिना गोपों का वर्णन किये श्रीकृष्ण की कथा अधूरी ही मानी जाती है।

    इस सम्बन्ध में गोपाचार्य हँस श्री आत्मानन्द जी महाराज का कथन है कि -"ऐसे छद्म-वेषधारी कथावाचकों से सावधान रहने की आवश्यकता है जो अल्पज्ञान तथा बिना गोपों का वर्णन किये ही श्रीकृष्ण कथा कहते हैं।"
         


    श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव जी को भी वैश्य कर्म करने की पुष्टि-देवीभागवतपुराण के चतुर्थ स्कन्ध के अध्याय- (२०) के श्लोक-(६०) और (६१) से होती है-

    "तत्रोत्पन्न: कश्यपांश: शापाच्च वरूणस्य वै।
    वसुदेवोऽतिविख्यात: शूरसेनसुतस्तदा।।६०।

    वैश्यावृत्तिरत: सोऽभून्मृते पितरि माधव:।
    उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान्।। ६१।
            
    अनुवाद- वहाँ पर वरुण देव के शापवश महर्षि कश्यप के अंशावतार परम यशस्वी वसुदेव जी शूरसेन के पुत्र होकर उत्पन्न हुए। पिता के मर जाने पर वे वसुदेव जी वैश्यावृत्ति में संलग्न होकर जीवन यापन करने लगे। उस समय वहाँ के राजा उग्रसेन थे और उनका कंस नामक एक प्रतापी पुत्र था।६०-६१।

    इससे सिद्ध होता है कि वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत किसी भी कर्म को छोटा या बड़ा नहीं माना गया है। इसी वजह से वैष्णव वर्ण के गोप, वैश्य कर्म करने में गर्व महसूस करते हैं। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण भी नन्द बाबा से बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि- बाबा हम सभी गोप किसान हैं।

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