शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

अन्य देवताओं की पूजा तथा कृष्ण की भक्ति का भिन्न भिन्न फल- विधान-


सावित्री धर्मराज के प्रश्नोत्तर और धर्मराजद्वारा सावित्री को वरदान देना-

श्रीनारायण बोले [हे नारद!] सावित्री की बात सुनकर यमराज आश्चर्यमें पड़ गये और हँसकर उन्होंने प्राणियों के कर्मफलके विषयमें बताना आरम्भ किया ॥1॥


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जीव के कर्म का फल तथा संसार से उसके उद्धार का उपाय सुनने के लिये मुझे बहुत कौतूहल हो रहा है, अतः  हे धर्मराज मुझ सावित्री को वह सब  बताने की आप कृपा कीजिये ॥ 12 ॥

धर्मराज बोले- हे महासाध्वि तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। अब मैं जीवों के कर्मफल के विषयमें बता रहा हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो ll 13 ll


पुण्यभूमि भारतवर्ष में ही शुभ और अशुभ कर्म की उत्पत्ति होती है, अन्यत्र नहीं दूसरी जगह लोग केवल कर्मों का फल भोगते हैं।

हे पतिव्रते। देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व और राक्षसादि ये ही शुभाशुभ कर्म करनेवाले हैं, दूसरे पशु आदि प्राणी नहीं।

देवादि विशिष्ट प्राणी ही सभी योनियों का फल भोगते हैं, सभी योनियों में भटकते हैं और शुभाशुभ कर्मोंका फल स्वर्ग तथा नरक में भोगते हैं ll 14 -16 ll
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वे विशिष्ट प्राणी समस्त योनियों में भ्रमण करते रहते हैं और पूर्वजन्म में अर्जित किये गये शुभ तथा अशुभ कर्मों का फल भोगते रहते हैं। शुभ कर्म के प्रभाव से प्राणी स्वर्गादि लोकों में जाते हैं तथा अशुभ कर्म के कारण वे विभिन्न नरकों में पड़ते हैं ll 17-18 ॥

कर्म के निःशेष (समाप्त) हो जानेपर भक्ति उत्पन्न होती है। हे साध्वि वह भक्ति दो प्रकारकी बतलायी गयी है। एक निर्वाणस्वरूपा भक्ति है और दूसरी ब्रह्मरूपिणी भगवती प्रकृति के लिये की जानेवाली भक्ति है। ll19ll

प्राणी पूर्वजन्म में किये गये कुकर्म के कारण रोगी और शुभ कर्मके कारण रोगरहित होता है। इस प्रकार अपने कर्म से ही जीव दीर्घजीवी, अल्प आयुवाला, सुखी तथा दुःखी होता है। प्राणी अपने कुत्सित कर्मके प्रभावसे नेत्रहीन तथा अंगहीन होता है।  सर्वोत्कृष्ट कर्म के द्वारा प्राणी अपने दूसरे जन्ममें सिद्धि आदि भी प्राप्त कर लेता है । ll20-21॥


हे देवि ! साधारण बात कह चुका हूँ, अब विशेष बात सुनो। हे सुन्दरि ! यह अत्यन्त दुर्लभ विषय पुराणों और धर्मशास्त्रों में वर्णित है। इसे पूर्णरूप से गुप्त रखना चाहिये (केवल पात्र को ही बताना चाहिए) ॥ 22 ॥

भारतवर्ष में समस्त योनियों में मानवयोनि परम दुर्लभ है। सभी मनुष्यों में ब्रह्मवेत्ता  श्रेष्ठ होता है। वह सम्पूर्ण कर्मों में प्रशस्त माना गया है। हे साध्वि ! उनमें ब्रह्मनिष्ठ साधक भारतवर्षमें अधिक गरिमामय माना जाता है। हे साध्वि! सकाम तथा निष्काम भेद से साधक दो प्रकारके होते हैं। सकाम होने से वह कर्मप्रधान होता है। निष्काम केवल भक्त होता है। 

सकाम कर्मफल भोगता है और निष्काम समस्त सुखासुख भोगोंके उपद्रवोंसे रहित रहता है। 

हे साध्वि ! वह शरीर त्यागकर भगवान-का जो निरामय धाम उसे प्राप्त करता है और हे साध्वि ! उन निष्काम जनों को पुनः इस लोक में नहीं आना पड़ता। वे द्विभुज परमात्मा श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं और अन्तमें वे भक्त दिव्यरूप धारणकर गोलोक को ही प्राप्त होते हैं ॥23-27॥
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सकाम वैष्णव वैकुण्ठधाममें जाकर समयानुसार पुनः भारतवर्ष में लौट आते हैं और यहाँ पर अच्छे कुलों में उनका जन्म होता है। वे सभी कुछ समय बीतने पर क्रमशः निष्काम भक्त बन जाते हैं और मैं उन्हें अपनी निर्मल भक्ति प्रदान कर देता हूँ; यह सर्वथा निश्चित है। 

जो सकाम ब्राह्मण तथा वैष्णवजन हैं, अनेक जन्मों में भी विष्णुभक्ति से रहितहोने के कारण उनकी बुद्धि निर्मल नहीं हो पाती वे आवागमन के चक्क  में गतिशील रहते हैं॥28-30 ॥

हे साध्वि ! जो द्विज तीर्थोंमें रहकर सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं, वे ब्रह्मा के लोक जाते हैं और समयानुसार पुनः भारतवर्ष में आते हैं ॥ 31 ॥

जो तीर्थोंमें अथवा कहीं अन्यत्र रहकर सदा अपने ही धर्म-कर्ममें लगे रहते हैं, वे सत्यलोक पहुँचते हैं और पुनः भारतवर्ष में जन्म लेते हैं ॥ 32 ॥

जो ब्राह्मण अपने धर्म में संलग्न रहकर भारतवर्षमें सूर्यकी उपासना करते हैं, वे सूर्यलोक जाते हैं और समयानुसार लौटकर पुनः भारतवर्ष में जन्म लेते हैं ॥ 33 ॥

जो धर्मपरायण तथा निष्काम मानव मूलप्रकृति भगवती जगदम्बाकी भक्ति करते हैं, वे मणिद्वीप लोक में जाते हैं और फिर वहाँसे लौटकर नहीं आते ॥ 34 ॥
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जो अपने धर्मों में संलग्न रहते हुए शिव, शक्ति और गणपतिकी उपासना करते हैं वे शिवलोक जाते हैं और कुछ समय पश्चात् वहाँ से पुनः भारतवर्ष में लौट आते हैं॥ 35 ॥

हे साध्वि ! जो ब्राह्मण अपने धर्म में निरत रहकर अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, वे विभिन्न नश्वर लोकों में जाते हैं और समयानुसार पुण्य क्षीण होने पर पुनः भारतवर्षमें जन्म लेते हैं ॥ 36 ॥

जो द्विज अपने धर्म में संलग्न रहते हुए निष्काम भावसे भगवान् श्रीहरिकी भक्ति करते हैं, वे उस भक्ति के प्रभाव से क्रम से श्रीहरिके लोकको प्राप्त होते हैं ॥ 37 ॥ 

जो विप्र सदा अपने धर्मसे विमुख, आचारहीन, काम लोलुप तथा देवाराधन से रहित हैं, वे अवश्य ही नरकमें पड़ते हैं ॥ 38 ll

चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने धर्ममें संलग्न रहकर ही शुभ कर्मका फल भोगनेके अधिकारी होते हैं ॥ 39 ॥


जो अपने कर्तव्य से विमुख हैं, वे अवश्य ही नरकमें जाते हैं और अपने कर्म का फल भोगते हैं। वे भारतवर्ष में नहीं आ सकते। अतः चारों वर्णों के लोगोंको अपने-अपने धर्म का पालन करना चाहिये ll 40 ॥

हे साध्वि ! अपने धर्म में तत्पर रहनेवाले जो ब्राह्मण अपने धर्ममें संलग्न ब्राह्मणको अपनी कन्या प्रदान करते हैं, वे चन्द्रलोक में जाते हैं।

और वहाँपर चौदह इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त निवास करते हैं। कन्याको अलंकारों से विभूषित करके दान करने से दुगुना फल कहा जाता है।

सकाम भावसे दान करनेवाले उसी चन्द्रलोकमें जाते हैं, किंतु निष्काम भावसे दान करनेवाले साधुपुरुष वहाँ नहीं जाते, फलकी इच्छासे रहित वे विष्णुलोकको प्राप्त होते हैं ॥ 41-433 ॥


जो लोग ब्राह्मणोंको गव्य, चांदी, सोना, वस्त्र, घृत, फल और जल प्रदान करते हैं; वे चन्द्रलोक में जाते हैं और हे साध्वि ! वे उस लोक में एक मन्वन्तरतक निवास करते हैं। उस दानके प्रभावसे ही वे लोग वहाँ इतने दीर्घकालतक सुखपूर्वक निवास करते हैं ।। 44-45 ॥

हे साध्वि! जो लोग पवित्र ब्राह्मणको सुवर्ण, गौ और ताम्र आदि देते हैं, वे सूर्यलोक में जाते हैं। और हे साध्वि ! वे वहाँ उस लोकमें दस हजार वर्षोंतक निवास करते हैं। वे उस विस्तृत लोक में निर्विकार होकर दीर्घकालतक निवास करते हैं ।। 46-47 ॥

जो मनुष्य ब्राह्मणों को भूमि तथा प्रचुर धन प्रदान करता है, वह भगवान् विष्णु के श्वेतद्वीप नामक मनोहर लोकमें पहुँच जाता है और वहाँपर चन्द्र सूर्यकी स्थितिपर्यन्त निवास करता है।******

हे मुने ! वह पुण्यवान् मनुष्य उस महान् लोक में विपुल कालतक वास करता है ॥ 48-49॥

जो लोग विप्रको भक्तिपूर्वक गृहका दान करते हैं, वे चिरकालतक स्थिर रहनेवाले सुखदायी विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं।

 हे साध्वि ! वे मनुष्य दानमें दिये गये उस गृहके रजकणकी संख्याके बराबर वर्षोंतक उस अत्यन्त श्रेष्ठ तथा विशाल विष्णुलोक में निवास करते हैं। जो मनुष्य जिस किसी भी देवताके उद्देश्य से मन्दिर का दान करता है, वह उस देवताके लोकमें जाता है और उस लोकमें उतने ही वर्षोंतक वास करता है, जितने उस मन्दिर में रजकण होते हैं। अपने घरपर दान करनेसे चार गुना, किसी पवित्र तीर्थमें दान करनेसे सौ गुना और किसी श्रेष्ठ स्थानमें दान करने से दुगुना पुण्यफल प्राप्त होता है-ऐसा ब्रह्माजीने कहा है ॥50 - 53॥


जो व्यक्ति समस्त पापोंसे मुक्त होनेके लिये तड़ागका दान करता है, वह जनलोक जाता है और उस तड़ाग में विद्यमान रेणु-संख्या के बराबर वर्षोंतक उस लोकमें रहता है। वापी( प्यायू) का दान करने से मनुष्य  उससे भी दस गुना फल प्राप्त कर लेता है। वापीके दानसे तड़ाग-दानका फल स्वतः प्राप्त हो जाता है।
चार हजार धनुषके बराबर लम्बा तथा उतना ही  अथवा उससे कुछ कम चौड़ा जिसका प्रमाण हो, उसे वापी कहा गया है ॥ 54-56 ॥


यदि कन्या किसी योग्य वरको प्रदान की जाती है, तो वह दान दस वापीके दानके समान होता है और यदि कन्या अलंकारों से सम्पन्न कर के दी जाती है, तो उससे भी दुगुना फल प्राप्त होता है। जो फल तड़ाग के दानसे मिलता है, वही फल उस तड़ाग के जीर्णोद्धार से भी प्राप्त हो जाता है। किसी वापी का कीचड़ दूर कराकर उसका उद्धार करने से वापी दान के समान पुण्य प्राप्त हो जाता है ।। 57-58 ।।

हे साध्वि ! जो मनुष्य पीपल का वृक्ष लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह तपोलोक पहुँचता है और वहाँ पर दस हजार वर्षों तक निवास करता है। हे सावित्रि जो व्यक्ति समस्त प्राणियों के लिये पुष्पोद्यान का दान करता है, वह दस हजार वर्षों तक ध्रुवलोक में निश्चितरूप से निवास करता है ।। 59-60 ॥


हे साध्वि ! जो मनुष्य विष्णुके उद्देश्यसे भारतमें विमानका दान करता है, वह पूरे एक मन्वन्तरतक विष्णुलोक में निवास करता है। चित्रयुक्त तथा विशाल विमानका दान करनेपर उसके दानका चौगुना फल होता है। शिविका का दान करने से मनुष्य उसका आधा फल प्राप्त करता है—यह निश्चित है। जो व्यक्ति भगवान् श्रीहरिके उद्देश्यसे भक्तिपूर्वक दोला मन्दिरका दान करता है, वह भी विष्णुलोकमें सौ  मन्वन्तरतक निवास करता है ।। 61-63 ॥

हे पतिव्रते ! जो मनुष्य आरामगृहों से युक्त राजमार्गका निर्माण कराता है, वह दस हजार वर्षोंतक इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ 64 ॥

ब्राह्मणों अथवा देवताओं को दिया हुआ दान समान फल प्रदान करता है जो पूर्वजन्ममें दिया गया है, जन्मान्तरमें उसी का फल प्राप्त होता है और जो नहीं दिया गया है, उसका फल नहीं मिलता। पुण्यवान् मनुष्य स्वर्ग आदि लोकोंके सुख भोगकर भारतवर्ष में क्रमशः उत्तम से उत्तम कुलों में  जन्म ग्रहण करता है। इस प्रकार वह पुण्यवान् विप्र भी पुनः स्वर्गमें अपने कर्मफलका भोग करके भारतवर्षमें ब्राह्मण होकर जन्म प्राप्त करता है।

क्षत्रिय आदिके लिये भी ऐसा ही है। क्षत्रिय हो अथवा वैश्य - कोई करोड़ों कल्पके तपस्याके प्रभावसे भी ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त कर सकता- ऐसा श्रुतियों में सुना गया है ।। 65- 68।।

करोड़ों कल्प बीत जानेपर भी बिना भोग प्राप्त किये कर्मका क्षय नहीं होता। अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मका फल मनुष्यको भोगना ही पड़ता है। *******

देवता और तीर्थकी सहायतासे तथा कायव्यूह ( तप) - से प्राणी शुद्ध हो जाता है। हे साध्वि! ये कुछ बातें मैंने तुम्हें बतला दीं; अब आगे क्या सुनना चाहती हो ? ।। 69-70 ।।




स्कन्ध 9, अध्याय 30 - 
दिव्य लोकोंकी प्राप्ति करानेवाले पुण्यकर्मों का वर्णन
सावित्री बोली- हे यम ! जिस कर्म के प्रभाव से  पुण्यवान् मनुष्य स्वर्ग आदि अन्य लोकों में जाते हैं, उसे मुझे बताने की कृपा कीजिये ॥ 1 ॥

धर्मराज बोले - [ हे साध्वि!] जो भारतवर्ष में विप्रको अन्नका दान करता है, वह दान दिये गये अन्नकी संख्याके बराबर वर्षोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अन्नदान महादान है। जो अन्य लोगोंको भी अन्नदान करता है, वह भी अन्नके दानों की संख्याके बराबर वर्षोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। 

अन्नदानसे बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा। इस दानमें पात्र - परीक्षा अथवा समय-सम्बन्धी नियम की कोई आवश्यकता नहीं होती है ॥ 2-4 ॥


हे साध्वि ! यदि कोई मनुष्य देवताओं अथवा ब्राह्मणों को आसन का दान करता है, तो वह दस हजार वर्षोंतक विष्णुलोक में निवास करता है ॥ 5 ॥

जो मनुष्य ब्राह्मण को दूध देनेवाली दिव्य गाय प्रदान करता है, वह उस गायके शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित रहता है ॥ 6 ॥


[साधारण दिनोंकी अपेक्षा] पुण्य-दिन में दिये गये गोदानका फल चार गुना, तीर्थमें सौ गुना और नारायणक्षेत्रमें गोदानका फल करोड़ गुना होता है ॥ 7 ॥

जो मनुष्य भारतवर्षमें भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको गाय प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षोंतक चन्द्रलोकमें निवास करता है ॥ 8 ॥

जो व्यक्ति किसी ब्राह्मणको उभयमुखी (प्रसव करती हुई ) गायका दान करता है, वह उस गायके शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ 9 ॥


जो मनुष्य ब्राह्मण को स्वच्छ तथा मनोहर छत्र प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षोंतक वरुणलोक में आनन्दित रहता है ॥10॥

हे साध्वि ! जो मनुष्य पीड़ित शरीरवाले दुःखी ब्राह्मण को एक जोड़ा वस्त्र प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षोंतक वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ 11 ॥

जो व्यक्ति किसी ब्राह्मणको वस्त्रसहित शालग्रामका अर्पण करता है, वह चन्द्रमा तथा सूर्यकी स्थितिपर्यन्त वैकुण्ठमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ 12 ॥


जो मनुष्य किसी ब्राह्मणको दिव्य तथा मनोहर शय्याका दान करता है, वह चन्द्रमा तथा सूर्यके स्थिति-कालतक चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ 13 ॥

जो देवताओं तथा ब्राह्मणोंको दीपकका दान करता है, वह मन्वन्तरपर्यन्त अग्निलोक में वास करता है ॥ 14 ॥

भारतवर्षमें जो मनुष्य ब्राह्मणको हाथीका दान करता है, वह इन्द्र की आयुपर्यन्त उनके आधे आसनपर विराजमान रहता है ॥ 15 ॥

भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मण को अश्वका दान करता है, वह जबतक चौदहों इन्द्रोंकी स्थिति बनी रहती है, तबतक वरुणलोकमें आनन्द प्राप्त करता है ।। 16 ।।

जो व्यक्ति ब्राह्मणके लिये उत्तम शिबिकाका दान करता है, वह भी चौदह इन्द्रोंकी स्थितितक वरुणलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ 17 ॥ 

हे साध्वि ! जो मनुष्य ब्राह्मणको उत्तम वाटिका प्रदान करता है, वह मन्वन्तरपर्यन्त वायु लोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ 18 ॥

जो व्यक्ति ब्राह्मणको पंखा तथा श्वेत चैवर का दान करता है, वह निश्चितरूप से दस हजार वर्षों तक वायुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥19॥

जो मनुष्य धान्य तथा रत्नका दान करता है, वह दीर्घायु तथा विद्वान् होता है। दान देनेवाला तथा  लेनेवाला वे दोनों निश्चय ही वैकुण्ठलोकमें चले जाते हैं ॥20॥ 
सिद्धान्त विहीन बात-@

जो मनुष्य भारतवर्षमें निरन्तर भगवान् श्रीहरिके नामका जप करता है, वह दीर्घजीवी होता है और मृत्यु उससे सदा दूर रहती है ॥ 21 ॥

भारतवर्षमें जो विद्वान् पुरुष पूर्णिमा को रात के कुछ शेष रहने पर दोलोत्सव कराता है, वह जीवन्मुक्त होता है, इस लोक में सुख भोगकर वह अन्त में विष्णु के धाम को प्राप्त होता है और वहाँ सौ मन्वन्तरकी अवधि तक निश्चितरूप से निवास करता है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें यह उत्सव मनानेपर उससे भी दुगुना फल प्राप्त होता है और वह व्यक्ति कल्पपर्यन्त जीवित रहता है- ऐसा ब्रह्माजीने कहा है ।। 22-24 ॥

भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मण को तिलका दान करता है, वह तिलोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक शिवजीके धाममें आनन्द प्राप्त करता है। वहाँसे पुनः उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह दीर्घकालतक जीवित रहते हुए सुख भोगता है। तिलसे परिपूर्ण ताँबे के पात्रका दान करनेसे उससे भी दूना फल प्राप्त होता है ।। 25-26 ॥

भारत में जो मनुष्य उपभोग करनेयोग्य पतिव्रता तथा सुन्दर कन्याको अलंकारों तथा वस्त्रोंसे विभूषित करके उसे किसी ब्राह्मण को भार्या के रूप में अर्पण करता है, वह चौदहों इन्द्रोंको स्थितिपर्यन्त चन्द्रलोक प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और वहाँ पर स्वर्ग की अप्सराओंके साथ दिन-रात आनन्द प्राप्त करता रहता है। 

उसके बाद वह निश्चय ही गन्धर्वलोकमें दस हजार वर्षोंतक निवास करता है और वहाँपर उर्वशी के साथ क्रीडा करते हुए दिन-रात आनन्द प्राप्त करता है।
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 तत्पश्चात् उसे हजारों जन्मतक सुन्दर, साध्वी, सौभाग्यवती, कोमल तथा प्रिय सम्भाषण करनेवाली भार्या प्राप्त होती है । 27-30 ॥

जो मनुष्य ब्राह्मणको सुन्दर फल प्रदान करता है, वह जितने फल दिये गये होते हैं उतने वर्षोंतक इन्द्रलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इसके बाद वह उत्तम योनिमें जन्म लेकर श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करता है। फलवाले वृक्षोंके दानका फल उससे भी हजार गुना अधिक बताया गया है।

जो मनुष्य ब्राह्मणको केवल फलदान करता है, वह भी दीर्घ कालतक स्वर्गमें निवास करके पुनः भारतवर्षमें जन्म ग्रहण करता है ।। 31-33 ll

भारतवर्षमें जो मनुष्य अनेक प्रकारके द्रव्योंसे युक्त तथा नानाविध धान्योंसे परिपूर्ण विशाल भवन ब्राह्मणको प्रदान करता है, वह सौ मन्वन्तरतक देवलोकमें निवास करता है। तदनन्तर उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह महान् धनाढ्य हो जाता है ।। 34-35 ll

हे साध्वि पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में जो मनुष्य हरी भरी फसलोंसे सम्पन्न सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको अर्पण करता है, वह निश्चितरूपसे सौ मन्वन्तरतक वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुनः उत्तम योनिमें जन्म लेकर वह बहुत महान् राजा होता है। सौ जन्मोंतक भूमि उसका त्याग नहीं करती और वह श्रीयुक्त, धनवान् तथा पुत्रवान् राजा होता है ।। 36-38 ॥

जो व्यक्ति उत्तम गोशाला तथा गाँव ब्राह्मणको प्रदान करता है, वह एक लाख मन्वन्तरतक वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् श्रेष्ठ कुलमें जन्म पाकर वह लाखों गाँवोंसे सम्पन्न हो जाता है और लाख जन्मोंतक भूमि उसका साथ नहीं छोड़ती ।। 39-40 ॥ 

भारतभूमिपर जो मनुष्य ब्राह्मणको उत्तम प्रजाओंसे युक्त, उत्कृष्ट, पकी हुई फसलोंसे सम्पन्न तथा अनेक प्रकारके कमलयुक्त जलाशयों, वृक्षों, फलों और लताओंसे सुशोभित नगर प्रदान करता है; वह दस लाख इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त कैलासमें सुप्रतिष्ठित होता है। इसके बाद वह भारतवर्षमें उत्तम योनिमें जन्म लेकर राजेश्वर होता है और लाखों नगर प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है। दस हजार वर्षोंतक धरा उस मनुष्यका साथ नहीं छोड़ती और वह निश्चितरूपसे पृथ्वीतलपर सर्वदा महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न रहता है ।। 41-44 ॥

जो मनुष्य अत्यन्त उत्तम अथवा मध्यम श्रेणीवाले, प्रजाओंसे परिपूर्ण, बावली तड़ागसे युक्त तथा अनेक प्रकारके वृक्षोंसे सम्पन्न एक सौ नगरोंका दान किसी द्विजको करता है, वह करोड़ मन्वन्तरकी अवधितक वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वह फिरसे उत्तम वंशमें जन्म लेकर जम्बूद्वीपका अधिपति होता है और जैसे इन्द्र स्वर्गमें सुशोभित होते हैं, वैसे ही वह परम

ऐश्वर्यवान् होकर पृथ्वीलोकमें सोभा प्राप्त करता है करोड़ों जन्मों तक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती और वह महान् राजराजेश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित होकर कल्पके अन्ततक जीवित रहता है ॥ 45 - 48 ॥

जो मनुष्य ब्राह्मणको अपना सम्पूर्ण अधिकार दे देता है, उसे अन्तमें चौगुना फल प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ।। 49 ।।

जो व्यक्ति तपस्वी ब्राह्मणको जम्बूद्वीपका दान देता है, वह अन्तमें सौ गुना फल प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ 50 ॥

जम्बूद्वीपकी भूमिका दान करनेवाले, समस्त तीर्थोंमें निवास करनेवाले सभी तपस्याओंमें रत रहनेवाले, सम्पूर्ण श्रेष्ठ स्थानोंमें निवास करनेवाले, अपना सर्वस्व दान करनेवाले तथा समस्त प्रकारकी सिद्धियोंको प्राप्त किये हुए महेश्वरी जगदम्बाके भक्तको पुनः संसारमें जन्म नहीं लेना पड़ता ll 51-52 ll

भगवती जगदम्बाके उपासकोंके समक्ष असंख्य ब्रह्माओंका लय हो जाता है, किंतु वे भगवती भुवनेश्वरीके परम धाम मणिद्वीपमें निवास करते रहते हैं ॥ 53 ॥

भगवतीके मन्त्रकी उपासना करनेवाले पुरुष मानव-शरीर त्यागनेके अनन्तर जन्म, मृत्यु एवं जरारहित ऐश्वर्यमय दिव्यरूप धारण करके उन भगवतीकी सारूप्यमुक्ति प्राप्तकर उनकी सेवामें सदा संलग्न रहते हैं। वे मणिद्वीपमें निवास करते हुए खण्डप्रलयका अवलोकन करते रहते हैं॥ 54-55॥

देवता, सिद्ध तथा समग्र विश्व एक निश्चित अवधिपर नष्ट हो जाते हैं; किंतु जन्म, मृत्यु और जरासे रहित देवीभक विनाशको प्राप्त नहीं होते ॥56॥जो मनुष्य कार्तिक महीने में भगवान् श्रीहरिको तुलसी अर्पण करता है, वह श्रीहरिके धाममें तीन युगतिक आनन्दपूर्वक निवास करता है। तदनन्तर उत्तम कुलमें जन्म लेकर वह निश्चितरूपसे भगवान्की भक्ति प्राप्त करता है और इस भारतभूमिमें रहनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषोंमें अति श्रेष्ठ हो जाता है ।। 57-58 ।।

जो व्यक्ति अरुणोदयके समय गंगाके मध्य स्नान करता है, वह साठ हजार युगोंतक भगवान् श्रीहरिके धाममें आनन्द प्राप्त करता है। वह श्रेष्ठ कुलमें जन्म पाकर विष्णुमन्त्रकी सिद्धि करता है और अन्तमें पुनः मानवशरीर त्यागकर भगवान् श्रीहरिके धाममें चला जाता है। उस वैकुण्ठधामसे फिर पृथ्वीतलपर उसका दुबारा जन्म नहीं होता। भगवान्‌का सारूप्य प्राप्त करके वह सदा उनकी सेवामें संलग्न रहता है । ll 59-61 ॥

जो व्यक्ति प्रतिदिन गंगामें स्नान करता है, वह सूर्यकी भाँति पृथ्वीलोकमें पवित्र माना जाता है और उसे पग-पगपर अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है, यह सर्वथा निश्चित है। उसकी चरण-रजसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। अन्तमें वह वैकुण्ठधाम पहुँचकर सूर्य तथा चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त वहाँ आनन्द प्राप्त करता है। तदनन्तर उत्तम कुलमें पुनः जन्म लेकर उसे अवश्य ही भगवान् श्रीहरिकी भक्ति सुलभ होती है। वह जीवन्मुक्त, परम तेजस्वी, तपस्वियोंमें श्रेष्ठ, स्वधर्मपरायण, निर्मलहृदय, विद्वान् तथा जितेन्द्रिय होता है। ll62-64ll

मीन और कर्कराशिपर रहते समय सूर्य अत्यधिक तपते हैं। जो पुरुष उस समय भारतमें सुवासित जलका दान करता है, वह चौदहों इन्द्रोंको स्थितिपर्यन्त कैलासमें आनन्द भोगता है।

 तत्पश्चात् उत्तम योनिमें जन्म पाकर रूपवान्, सुखी, शिवभक्त, तेजस्वी तथा वेद-वेदांगका पारगामी विद्वान् होता है ll 65- 67 ॥

जो मनुष्य वैशाख महीनेमें ब्राह्मणको सत्का दान करता है, वह उस सत्तूके कणोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक शिवलोकमें आनन्दपूर्वक निवास करता है ॥ 68 ॥

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भारतवर्षमें जो मनुष्य श्रीकृष्ण जन्माष्टमीका व्रत करता है, वह अपने सौ जन्मोंमें किये गये पापों छूट जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। जबतक चौदह इन्द्रोंकी स्थिति बनी रहती है, तब तक वह वैकुण्ठलोकमें आनन्दका भोग करता है। इसके बाद वह पुनः उत्तम योनिमें जन्म लेकर निश्चितरूपसे भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति प्राप्त करता है ॥ 69-70 ॥

इस भारतवर्षमें जो मनुष्य शिवरात्रि का व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरोंके कालतक शिवलोकों आनन्दसे रहता है॥ 71 ॥

जो मनुष्य शिवरात्रिके दिन भगवान् शंकरको बिल्वपत्र अर्पण करता है, वह बिल्वपत्रोंकी जितनी संख्य है उतने वर्षोंतक उस शिवलोकमें आनन्द भोगता है। पुनः श्रेष्ठ योनि प्राप्त करके वह निश्चय ही शिवभक्ति प्राप्त करता है और विद्या, पुत्र, श्री, प्रजा तथा भूमि- इन सबसे सदा सम्पन्न रहता है ॥ 72-73 ।।

जो व्रती चैत्र अथवा माघ में पूरे मासभर, आधे मास, दस दिन अथवा सात दिनतक भगवान् शंकरकी पूजा करता है और हाथ में बेंत लेकर भक्तिपूर्वक उनके सम्मुख नृत्य करता है, वह उपासना के दिनोंकी संख्याके बराबर युगों तक शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ।। 74-75 ll
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जो मनुष्य भारतवर्षमें श्रीरामनवमीका व्रत सम्पन करता है, वह विष्णुके धाम में सात मन्वन्तर तक आनन्द करता है। पुनः उत्तम योनि में जन्म पाकर वह निश्चय ही रामकी भक्ति प्राप्त करता है और जितेन्द्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा महान् धनी होता है ॥ 76-77॥

हे साध्वि! जो मनुष्य विविध प्रकारके नैवेद्यों, उपहार सामग्रियों, धूप-दीप आदि पूजनोपचारोंके द्वारा भगवती प्रकृति को शारदीय महापूजा करता है। तथा उस अवसरपर नृत्य, गीत, वाद्य आदिके द्वारा अनेकविध मंगलोत्सव मनाता है; वह सात मन्वन्तरों की अवधितक शिवलोक में निवास करता है। पुनः उत्तम योनि में जन्म पाकर वह मनुष्य निर्मल बुद्धि, अपार सम्पत्ति तथा पुत्र-पौत्रोंकी अभिवृद्धि प्राप्त करता है।

वह हाथी, घोड़े आदि वाहनोंसे सम्पन्न तथा महान  प्रभावशाली राजराजेश्वर हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है ll78-81ll

शारदीय नवरात्रकी शुक्लाष्टमी तिथिसे प्रारम्भ करके एक पक्षतक नित्य पवित्र भारतभूमिपर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उत्तम षोडशोपचार अर्पित करके भगवती महालक्ष्मीकी पूजा करता है, वह चौदह इन्द्रोंके कालपर्यन्त गोलोकमें वास करता है। तत्पश्चात् उत्तम कुलमें जन्म लेकर वह राजराजेश्वर बनता है ।। 82-84 ॥
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जो भारतवर्षमें कार्तिकपूर्णिमा को सैकड़ों गोपों तथा गोपियों को साथ लेकर रासमण्डल - सम्बन्धी उत्सव मनाकर शिलापर या प्रतिमामें सोलहों प्रकारके पूजनोपचारोंसे भक्तिपूर्वक राधासहित श्रीकृष्णकी पूजा सम्पन्न करता है, वह ब्रह्माजीके स्थितिपर्यन्त गोलोकमें निवास करता है। पुनः भारतवर्षमें जन्म पाकर वह श्रीकृष्णकी स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। भगवान् श्रीहरिकी क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मन्त्र प्राप्त करके देह त्यागके अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहाँ श्रीकृष्णके समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है। पुनः वहाँसे उसका पतन नहीं होता, वह जरा तथा मृत्युसे सर्वथा रहित हो जाता है ।। 85-89 ॥

जो व्यक्ति शुक्ल अथवा कृष्णपक्षको एकादशीका व्रत करता है, वह ब्रह्माके आयुपर्यन्त वैकुण्ठलोकमें आनन्दका भोग करता है। पुनः भारतवर्षमें जन्म लेकर वह निश्चय ही श्रीकृष्णकी भक्ति प्राप्त करता है और वह क्रमशः एकमात्र श्रीहरिके प्रति अपनी भक्तिको सुदृढ़ करता जाता है। अन्तमें मानव देह त्यागकर वह पुनः गोलोक चला जाता है और वहाँपर श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त करके उनका पार्षद बन जाता है। वहाँसे पुनः संसारमें उसका आगमन नहीं होता और वह सदाके लिये जरा तथा मृत्युसे मुक्त हो जाता है । ll90 - 92 ॥

जो मनुष्य भाद्रपद मासके शुक्लपक्षको द्वादशी तिथिको इन्द्रकी पूजा करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक  इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है। 
जो भारतवर्षमें रविवार, संक्रान्ति अथवा शुक्लपक्षको सप्तमी तिथिको सूर्यकी पूजा करके भोजनमें हविष्यान्न ग्रहण करता है, वह चौदों इन्द्रोंके आयुपर्यन्त सूर्यलोकमें सुप्रतिष्ठित होता है। 
इसके बाद भारतवर्षमें फिरसे जन्म लेकर वह आरोग्ययुक्त तथा श्रीसम्पन्न होता है  ll93-95। जो मनुष्य ज्येष्ठ मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको भगवती सावित्रीका पूजन करता है, वह सात मन्वन्तरोंकी अवधितक ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुनः पृथ्वी पर लौटकर वह श्रीमान् अतुल पराक्रमी, चिरंजीवी, ज्ञानवान् तथा सम्पदासम्पन्न हो जाता है ।। 96-973 ॥

जो मनुष्य माघ महीने के शुक्लपक्षकी पंचमी तिथिको भक्तिपूर्वक सोलहों प्रकारके पूजनोपचारोंको अर्पणकर सरस्वतीको पूजा करता है, वह ब्रह्माके आयुपर्यन्त मणिद्वीपमें दिन-रात प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और पुनः जन्म ग्रहणकर महान् कवि तथा पण्डित होता है । 98-993॥

भारतवर्ष में जो जीवनभर भक्तिसे सम्पन्न होकर ब्राह्मणको नित्य गौ और सुवर्ण आदि प्रदान करता है, वह उस गौके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उससे भी दुगुने वर्षोंतक विष्णुलोकमें वास करता है और वहाँ भगवान् श्रीहरिके साथ मंगलमय क्रीड़ा तथा उत्सव करते हुए आनन्दका भोग करता है।
तत्पश्चात् पुनः भारतवर्षमें जन्म पाकर श्रीसम्पन्न, पुत्रवान् विद्वान् ज्ञानवान् तथा हर प्रकारसे सुखी राजराजेश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित होता है ।। 100 - 1023 ॥

भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मणों को मिष्टान्नका भोजन कराता है, वह उस ब्राह्मणके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्षोंतक विष्णुलोक में आनन्द प्राप्त करता है। तत्पश्चात् वहाँसे पुनः इस लोकमें जन्म लेकर वह सुखी, धनवान्, विद्वान्, दीर्घजीवी, श्रीमान् तथा अतुलनीय पराक्रमवाला होता है। ll 103-1043 ll

भारतवर्षमें जो मनुष्य भगवान् श्रीहरिके नामका स्वयं कीर्तन करता है अथवा इसके लिये दूसरेको प्रेरणा देता है, वह जपे गये नामोंकी संख्या बराबर युगोंतक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है और वहाँसे पुनः इस लोकमें आकर वह सुखी तथा धनवान् होता है ।। 105-106 ॥

यदि भगवान्का नामजप नारायणक्षेत्र में किया जाय तो उसका फल करोड़ों गुना अधिक होता है। जो मनुष्य नारायण क्षेत्र में भगवान् श्रीहरिके नामकाएक करोड़ जप करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे रहित होकर जीवन्मुक्त हो जाता है—यह सत्य है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता, वह वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वह भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त कर लेता है और वहाँसे उसका

पतन नहीं होता है। इस प्रकार वह भगवान् विष्णुकी परम भक्ति सुलभ कर लेता है और अन्ततः उसे भगवान् विष्णुकी सारूप्य मुक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ 107-109 ॥

जो मनुष्य प्रतिदिन पार्थिव लिंग बनाकर शिवकी पूजा करता है और जीवनपर्यन्त इस नियमका पालन करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है और उस पार्थिव लिंगमें विद्यमान रजकणोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहाँसे पुनः भारतवर्ष में जन्म लेकर वह महान् राजा होता है । 110-111 ॥

जो मनुष्य प्रतिदिन शालग्रामका पूजन करता है और शालग्रामशिलाके जलका पान करता है, वह सौ ब्रह्माकी आयुतक वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। उसके बाद फिरसे जन्म लेकर भगवान् श्रीहरिकी दुर्लभ भक्ति प्राप्त करता है और पुनः विष्णुलोक में सुप्रतिष्ठित होता है और उसका पतन नहीं होता ।। 112-113 ॥

जो मनुष्य समस्त तपों तथा व्रतोंको सम्पन्न कर लेता है, वह चौदह इन्द्रोंके कालपर्यन्त वैकुण्ठमें निवास करता है। वहाँ से पुनः भारतवर्ष में जन्म ग्रहणकर वह महान् सम्राट् होता है। तदनन्तर वह मुक्त हो जाता है और फिर उसे दुबारा जन्म नहीं लेना पड़ता ।। 114-115 ॥

जो सभी तीर्थोंमें स्नान तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर लेता है, वह निर्वाणपदको प्राप्त होता है और पुनः पृथ्वीलोकमें उसका जन्म नहीं होता है ॥ 116 ॥

जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें अश्वमेधयज्ञ करता है, वह उस अश्वके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं; उतने वर्षोंतक इन्द्रके आधे आसनपर विराजमान रहता है। राजसूययज्ञ करनेसे मनुष्य इससे भी चार गुना फल प्राप्त करता है ॥ 117 ॥

भगवती का यज्ञ सभी यज्ञों से भी श्रेष्ठ कहा गया है। हे वरानने ! विष्णु और ब्रह्माने पूर्वकालमें इस यज्ञको किया था और त्रिपुरासुरका वध करनेके लिये महादेव शंकरजीने भी इस यज्ञको सम्पन्न किया था। हे सुन्दरि ! यह शक्ति-यज्ञ सम्पूर्ण यज्ञोंमें प्रधान है; तीनों लोकोंमें इस यज्ञके समान कोई भी यज्ञ नहीं है ।। 118 - 120 ॥

हे साध्वि! पूर्व कालकी बात है, दक्षप्रजापतिने महान् उत्सवके साथ भगवतीका यज्ञ किया था, जिसमें दक्ष प्रजापति तथा शंकरमें परस्पर कलह हो गया। क्रोधमें आकर ब्राह्मणोंने नन्दीको तथा नन्दीने ब्राह्मणोंको शाप दे दिया। इसलिये चन्द्रमाको मस्तकपर धारण करनेवाले शिवने दक्षके यज्ञका विध्वंस कर डाला ।। 121-122 ॥

प्राचीन कालमें दक्षप्रजापति, धर्म, कश्यप, शेषनाग, मुनि कर्दम, स्वायम्भुव मनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, कपिल तथा ध्रुव-ये सभी लोग भगवतीयज्ञ सम्पन्न कर चुके हैं ॥। 123-124 ll

देवीयज्ञ करनेवाला पुरुष हजारों राजसूययज्ञोंका फल निश्चित रूपसे प्राप्त कर लेता है। देवीयज्ञसे बढ़कर फल प्रदान करनेवाला कोई यज्ञ नहीं है ऐसा वेदमें कहा गया है 125 ॥

देवीयज्ञ करनेवाला सौ वर्षतक जीवित रहकर अन्तमें जीवन्मुक्त हो जाता है, यह सत्य है। वह इस लोकमें ज्ञान तथा तपमें साक्षात् भगवान् विष्णुके तुल्य हो जाता है ॥ 126 ॥

हे वत्से! हे भामिनि ! जिस प्रकार देवताओंमें विष्णु विष्णुभक्तोंमें नारद, शास्त्रोंमें वेद, वर्णोंमें ब्राह्मण, तीर्थोंमें गंगा, पुण्यात्मा पवित्रोंमें शिव, व्रतोंमें एकादशी, पुष्पोंमें तुलसी, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, पक्षियोंमें गरुड, स्त्रियोंमें मूलप्रकृति; राधा; सरस्वती तथा पृथिवी, शीघ्रगामी तथा चंचल इन्द्रियोंमें मन, प्रजापतियोंमें ब्रह्मा, प्रजाओंमें राजा, वनोंमें वृन्दावन, वर्षोंमें भारतवर्ष, श्रीमान् लोगोंमें श्री, विद्वानोंमें सरस्वती, पतिव्रताओंमें भगवती दुर्गा और सौभाग्यवती श्रीकृष्ण भार्याओं में राधा सर्वोपरि हैं, उसी प्रकार समस्त यज्ञोंमें देवीयज्ञ श्रेष्ठ है । ll127- 132 ।।एक सौ अश्वमेधयज्ञ करनेसे मनुष्य इन्द्रपद पा जाता है। एक हजार अश्वमेध करके राजा पृथुने विष्णुपद प्राप्त किया था ॥ 133 ॥

सम्पूर्ण तीर्थोंके स्नान, समस्त यज्ञोंकी दीक्षा, सभी व्रतों, तपों तथा चारों वेदोंके पाठोंका पुण्य और पृथ्वीकी प्रदक्षिणा- इन सभी साधनोंके फल स्वरूप शक्तिस्वरूपा भगवती जगदम्बाकी सेवा सुलभ हो जाती है, जो प्राणीको मोक्ष प्रदान कर देती है ।। 134- 135 ॥

पुराणों, वेदों तथा इतिहासोंमें सर्वत्र भगवतीके चरणकमलकी उपासनाको ही सारभूत बताया गया है। उन भगवतीके चरित्रका वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम तथा गुणोंका कीर्तन, उनके स्तोत्रोंका स्मरण, उनकी वन्दना, उनका नाम जप, उनके चरणोदक तथा नैवेद्यका ग्रहण - यह सब नित्य सम्पादित करना चाहिये। हे साध्वि ! यह सर्वसम्मत तथा सभीके लिये अभीष्ट भी है ।। 136 - 138 ॥

हे वत्से ! तुम निर्गुण परब्रह्मस्वरूपिणी पराम्बा भगवती मूलप्रकृतिकी उपासना करो। अब तुम अपने पतिको ग्रहण करो और सुखपूर्वक अपने भवनमें निवास करो। मनुष्यों का यह मंगलमय कर्मविपाक मैंने तुमसे कह दिया, यह प्रसंग सबके लिये अभीष्ट, सर्वसम्मत, श्रेष्ठ तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाला है ॥ 139- 140 ॥

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