गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

प्रस्तावना- कॉपीड





"सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादि हेतवे।तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम:।१।

श्रीकृष्ण गोपेश्वरस्य पञ्चंवर्णम्-

        पुस्तक का प्रथम भाग:-

राधेकृष्णाभ्याम्  मित्रो !   मित्रो - इस पुस्तक में आप लोग परम प्रभु श्रीकृष्ण के उन तीन रहस्य पूर्ण प्रसंगों के विषय में तो जानेगे' ही जिन्हें आज तक बहुत ही कम लोग जानते हैं; अथवा कहें कि फिर जानते ही नहीं हैं-  और इसके साथ साथ आप कृष्ण के आध्यात्मिक ,दार्शनिक और योगसिद्धि के सिद्धान्त से भी परिचित होंगे। 

आज हम इस युगान्तकारी ज्ञान के आधार पर भगवान् श्रीकृष्ण से सम्बन्धित उन घटनाओं को भी प्रस्तुत करेंगे ; जिसे जानबूझ कर अथवा कहें अज्ञानता-वश कथाकारों द्वारा अब तक जनसाधारण के समाने प्रस्तुत नहीं किया गया है। 
जिसके परिणाम स्वरूप जनमानस में कृष्ण के वास्तविक चरित्रों (कारनामों) का प्रचार- प्रसार नहीं हो सका और श्रीकृष्ण के अद्भुत रहस्यों से आजतक सारी दुनिया अनभिज्ञ ही रह गयी है।

कृष्ण के वास्तविक स्वरूप का यथावत् ज्ञान न होने के कारण ही साधारण लोग आज तक भ्रम जाल में भँसकर संसार में विभिन्न प्रकार के प्रलाप करते हुए देखे और सुने जाते हैं-
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और इसी भ्रमजाल को दूर करने के लिए अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण के चारित्रिक रहस्यों को सम्पूर्ण सारगर्भित  रूप से बताने के लिए हमने  इस पुस्तक को  प्रमुख रूप से तीन खण्डों (भागों) 1-सृष्टि-सर्जन -खण्ड  2- आध्यात्मिक -खण्ड और 3-लोकाचरण-खण्ड में विभाजित किया हैं ।
ताकि - साधारण लोगों को (क्रमानुसार-)समझ में आ जाय कि कृष्ण यथार्थ में क्या थे  ? और  उनका आध्यात्मिक और सांसारिक जीवन में क्या योगदान था ?- 
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और उस लोक में कौन -कौन से प्राणी रहते हैं , तथा उन लोकों के अधिपति कौन है ? और उन अधिपतियों के भी अधिपति (सुप्रीम -पावर) कौन है ?

जिसकी शक्ति से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गतिमान है अथवा कहें कि  "ब्रह्माण्ड के प्रत्येक ग्रह " उपग्रह" नक्षत्र" और तारे, आदि की *गतियों की भिन्नता का आधार उन पिण्ड के  *घनत्व ( द्रव्यमान) के सापेक्षिक उत्पन्न हुए *गुरुत्वाकर्षण  आदि के मूल में भी उसी  परम- ब्रह्म परमेश्वर की सत्ता का प्रभाव विद्यमान है ।
उसी सर्वशक्तिमान ईश्वर को , परम-प्रभु, परम-तत्व" इत्यादि नामों से भी तत्वज्ञानी लोग अनुभव व वर्णन किया करते हैं।

(ब्रह्म वैवर्त पुराण-प्रकृतिखण्ड: अध्याय (3) में वर्णन है- कि   परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्री राधा से प्रकट विराट स्वरूप बालक ही विराट - विष्णु है। जो अनेक ब्रह्माण्डों का कारण है।-
गोलोक से जब इस भूलोक पर वह परिपूर्णतम श्रीकृष्ण अपनी गोपालन लीला करने के लिए गोपों में ही अवतरित होते हैं।
जिस प्रकार एक पीपल का बीज स्वयं के भीतर विशाल पीपल वृक्ष की सम्पूर्ण विकास सम्भावनाऐं समाविष्ट ( Included) किये हुए होता है। उसी प्रकार वह परम- प्रभु परमेश्वर पृथ्वी पर गोप जाति में अवतरित होकर भी अपने अन्दर सम्पूर्ण सत्ता की सम्भावनाऐं समाविष्ट( Included) किये हुए होते हैं।
सत्य कहा जाय तो कृष्ण एक समग्र व्यक्तित्व ही नहीं अपितु  एक सम्पूर्ण चेतना थे। जिन्होने पृथ्वी पर विद्यमान तत्कालीन समाज का चारित्रिक और आध्यात्मिक रूप से समुचित मार्ग- दर्शन किया।
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ब्रह्म- वैवर्त पुराण उपर्युक्त प्रकृति खण्ड में अध्याय तीन में नारायण और नारद के संवाद क्रम में सृष्टि उत्पत्ति की कथा का वर्णन करते हैं।
भगवान नारायण कहते हैं– नारद ! तदनन्तर वह बालक जो केवल अण्डाकार था, ब्रह्मा की आयु तक वह बालक ब्रह्माण्ड गोलक के जल में विद्यमान रहा। फिर समय पूरा हो जाने पर वह सहसा (अचानक) दो रूपों में प्रकट हो गया। एक रूप तो उसका अण्डाकार ही रहा और एक अन्य रूप शिशु के रूप में परिणत हो गया। 

उस शिशु की ऐसी कान्ति थी, मानो सौ करोड़ सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हों। माता का दूध न मिलने के कारण भूख से पीड़ित होकर वह शिशु कुछ समय तक रोता रहा।

माता-पिता उसे त्याग चुके थे। वह निराश्रय होकर जल के अन्दर समय व्यतीत कर रहा था। जो असंख्य ब्रह्माण्ड का स्वामी है, उस शिशु ने अनाथ की भाँति, आश्रय पाने की इच्छा से ऊपर की ओर दृष्टि दौड़ायी। उसकी आकृति स्थूल से भी स्थूलतम थी। अतएव उसका नाम इसी कारण ‘महाविराट’ पड़ा।

जैसे परमाणु अत्यन्त सूक्ष्मतम होता है, वैसे ही वह शिशु उसके सापेक्ष अत्यन्त स्थूलतम था।

वह बालक तेज में परमात्मा श्रीकृष्ण के सोलहवें अंश की बराबरी कर रहा था।

परमात्मा स्वरूपा प्रकृति-संज्ञक राधा से उत्पन्न यह महान विराट बालक ही सम्पूर्ण विश्व का आधार है। यही ‘महाविष्णु’ कहलाता है।

इसके प्रत्येक रोमकूप में जितने विश्व हैं, उन सबकी संख्या का पता लगा पाना श्रीकृष्ण के लिये भी असम्भव है। वे भी उन्हें स्पष्ट बता नहीं सकते। जैसे जगत के रजःकण को कभी किसी के द्वारा  नहीं गिना जा सकता, उसी प्रकार इस शिशु के शरीर में कितने ब्रह्माण्ड तथा उस प्रत्येक ब्रह्माण्ड में कितने ब्रह्मा" विष्णु और शिव आदि देव त्रयी के रूप में विद्यमान  हैं– यह नहीं बताया जा सकता। 

प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा, विष्णु और शिव देव त्रयी( त्रिदेव) सृष्टि के सर्जन पालन और अन्त में संहार( नाश) के लिए क्रमश: रज, सत और तमोगुण के प्रतिनिधि   के रूप में विद्यमान रहते हैं। ब्रह्माण्ड से पचास करोड़ योजन ऊपर ऊपर वैकुण्ठलोक है।

यह ब्रह्माण्ड से बाहर है। इसके भी ऊपर पचास करोड़ योजन के विस्तार में गोलोकधाम है। अर्थात ब्रह्माण्ड से 100 करोड़ योजन ऊपर गोलोक विद्यमान है।

श्रीकृष्ण के समान ही यह गोलोक भी नित्य और चिन्मय सत्य स्वरूप है।
श्रीकृष्ण पृथ्वी पर जब भी अवतरण करते हैं तब वे गोपों में ही  अवतरण करते हैं।
यह पृथ्वी तब सात द्वीपों से सुशोभित होती है। सात समुद्र इसकी शोभा बढ़ाते हैं। पृथ्वी पर उन्नचास छोटे-छोटे द्वीप हैं। पर्वतों और वनों की तो कोई संख्या ही नहीं है।

ब्रह्माण्ड में सबसे  ऊपर सात स्वर्गलोक हैं। ब्रह्मलोक भी इन्हीं में सम्मिलित है। नीचे सात पाताल हैं। यही  ब्रह्माण्ड विस्तार का परिचय है। 

पृथ्वी से ऊपर भूर्लोक, उससे परे भुवर्लोक, भुवर्लोक से परे स्वर्लोक, उससे परे जनलोक, जनलोक से परे तपोलोक, तपोलेक से परे सत्यलोक और सत्यलोक से  भी परे ब्रह्मा का लोक ब्रह्मलोक है जहाँ  ब्रह्मा जी विद्यमान रहते हैं। यह लोक ऐसा प्रकाशमान है, मानो तपाया हुआ सोना चमक रहा हो। ये सभी लोक कृत्रिम हैं। कुछ तो ब्रह्माण्ड के भीतर हैं और कुछ बाहर। नारद ! ब्रह्माण्ड के नष्ट होने पर ये सभी लोक नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि पानी के बुलबुले की भाँति यह सारा जगत अनित्य है।
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श्रीकृष्ण के स्थाई लोक  गोलोक को नित्य, अविनाशी एवं अकृत्रिम कहा गया है। 
वैकुण्ठलोक,  शिव-लोक की आयु ब्रह्मा के लोक ब्रह्मलोक की अपेक्षा अधिक  है।
परन्तु ये दौंनों  लोक भी क्रमश: सात्विक और तामसिक होने से प्राकृतिक ही हैं। परन्तु  ये रजोगुणात्मक ब्रह्मा के लोक की अपेक्षा अधिक आयु वाले हैं।

उस विराटमय बालक के प्रत्येक रोमकूप में असंख्य ब्रह्माण्ड निश्चित रूप से विद्यमान हैं। और एक-एक ब्रह्माण्ड में अलग-अलग ब्रह्मा, विष्णु और शिव विराजमान हैं।
वत्स नारद ! देवताओं की संख्या  (तीन + तीस) तेतीस करोड़ है जो परम ब्रह्म - श्रीकृष्ण के पृष्ठदेश( पीठ) से उत्पन्न हुए । जबकि गोप हृदय देश के रोमकूपों से  कोशिका विभाजन की समरूपण( क्लोन) विधि से उत्पन्न हुए हैं। गोप सृष्टि देव सृष्टि की अपेक्षा उच्च है।
गोप कृष्ण स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं।और देव परमेश्वर के पृष्ठदेश से उत्पन्न होने से गोपों के समकक्ष नहीं हैं। अत: गोप श्रीकृष्ण सारूप्य होने से देवों के भी पूज्य हैं।
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ये सभी देवता सर्वत्र भाव और अधिष्ठातृ रूप से  व्याप्त हैं। दिशाओं के स्वामी, दिशाओं की रक्षा करने वाले तथा ग्रह एवं नक्षत्र– सभी इसमें सम्मिलित हैं। भूमण्डल पर चार प्रकार के वर्ण हैं। जो ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न हैं। नीचे नागलोक है। चर और अचर सभी प्रकार के प्राणी उस पर निवास करते हैं।
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नारद ! परम ब्रह्म के साकार रूप श्रीकृष्ण और उनकी सहचारिणी आदि प्रकृति रूपा राधा से महविष्णु का जन्म हुआ। जो एक विराट् बालक के रूप में था।  अप जन्मकाल के कुछ काल उपरान्त विराट स्वरूप बालक बार-बार ऊपर दृष्टि दौड़ाने लगा। उस समय गोलोक में  वह गोलाकार पिण्ड बिल्कुल खाली था।
दूसरी कोई भी वस्तु वहाँ नहीं थी। उसके मन में चिन्ता उत्पन्न हो गयी। भूख से आतुर होकर वह बालक बार-बार रुदन करने लगा। फिर जब उसे ज्ञान हुआ, तब उसने परम पुरुष श्रीकृष्ण का ध्यान किया।

तब वहीं उसे सनातन ब्रह्म ज्योति के दर्शन प्राप्त हुए। वे ज्योतिर्मय श्रीकृष्ण नवीन मेघ के समान श्याम थे। उनकी दो भुजाएँ थीं। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था। उनके हाथ में मुरली शोभा पा रही थी। मुखमण्डल मुस्कान से भरा था। भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये वे कुछ व्यस्त-से जान पड़ते थे। पिता परमेश्वर को देखकर वह बालक संतुष्ट होकर हँस पड़ा। फिर तो वर के अधिदेवता श्रीकृष्ण ने समयानुसार उसे वर दिया। 
कहा- ‘बेटा ! तुम मेरे समान ज्ञानी बन जाओ।भूख और प्यास तुम्हारे पास न आ सके। प्रलय पर्यन्त यह असंख्य ब्रह्माण्ड तुम पर अवलम्बित रहे। तुम निष्कामी, निर्भय और सबके लिये वरदाता बन जाओ। इस ब्रह्म वैवर्तपुराण के समान देवी भागवत पुराण- प्रकृति खण्ड- स्कन्ध नवम् अध्याय तृतीय) मे ंभी  इस  बालक के विषय में ठीक इसी प्रकार का वर्णन है  -

ब्रह्मपुत्र नारद ! मन्त्रोपदेश के पश्चात् परम प्रभु श्रीकृष्ण ने उस बालक के भोजन की व्यवस्था की, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो ! प्रत्येक विश्व में वैष्णवजन जो कुछ भी नैवेद्य भगवान को अर्पण करते हैं,
उसमें से सोलहवाँ भाग तो विष्णु को मिलता है और पंद्रह भाग इस बालक के लिये निश्चित किए गये हैं; क्योंकि यह बालक स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्ण का विराट-रूप है। यह बालक ही महाविष्णु है।

रूद्र की उत्पत्ति का प्रकरण पुराणों में भिन्न-भिन्न ढ़ग से प्राप्त होता है। सैद्धान्तिक रूप से विष्णु की प्रेरणा से रूद्र से ब्रह्मा की उत्पत्ति होनी चाहिए- 
परन्तु अधिकतर ग्रन्थों में प्रक्षेपित रूप से ब्रह्मा से शिव ( रूद्र ) उत्पत्ति का प्रकरण प्राप्त होता है। कदाचित यह तीन गुणों का क्रमवार उच्च, मध्य और निम्न के अनुसार उत्पत्ति प्रकरण होना तो सम्भव है।  और यदि गुणसंयोजन प्रक्रिया के सिद्धान्त के अनुसार "सत और "तम के परिणाम स्वरूप "रजो गुण" की उत्पत्ति क्रम में रूद्र से ब्रह्मा की उत्पत्ति का होने का गुणात्मक सिद्धान्त भी सम्भव  है।

ब्रह्मा और शिव (रूद्र) की उत्पत्ति के प्रकरण के दोनों रूपों को हम तुलनात्मक रूप से निम्न गद्यांशों में प्रस्तुत करते हैं।

शब्दार्थ एवम्- व्याकरणिक विश्लेषण-
ललाटे- सप्तमी विभक्ति एक वचन - ललाट में -
ब्रह्मण: -  पञ्चमी विभक्ति ब्रह्मणः - ब्रह्मा से ।  एव- ही च और। रूद्रा: -रूद्रगण। एकादश:- ग्यारह । एव- ही। शिवांशेन में तृतीया विभक्ति एक वचन- शिव अंश से । वै - निश्चय ही। सृष्टि सञ्चरणाय-सृष्टि विनाश के लिए । भविष्यन्ति- उत्पन्न होंगे।
अनुवाद:-
और इस प्रकार ब्रह्मा के ललाट से ग्यारह रूद्र तो शिव के अंश से सृष्टि के संहार के लिए उत्पन्न होंगे।४३।

शब्दार्थ एवम्- व्याकरणिक विश्लेषण-
कालाग्नि-रूद्र- तेषु- एक:। विश्व- संहार- कारक =
उनमें कालाग्नि नामक एक  रूद्र  विश्व का संहारक होगा।
पाता= पा धातु - रक्षणे कर्म्मणि + घञ् कृदन्त प्रत्यय पात:  (त्राता) त्रि० मेदिनीकोश -रक्षक विष्णु: का विशेषण रक्षक या पालक होने से "पाता" है। - विषयी=विषयों का भोक्ता।  क्षुद्रांशेन- भविष्यति। क्षुद्र (छोटे) अंश से उत्पन्न होगा।

अनुवाद:-
इन रूद्रों में एक कालाग्नि  नामक रूद्र विश्व का संहारक होगा
विषयों के भोक्ता विष्णु क्षुद्र अंश से( क्षुद्र विष्णु) अवतीर्ण होकर विश्व की रक्षा करने वाले होंगे।४४।

"ब्रह्मवैवर्तपुराणम् प्रकृतिखण्डःअध्याय"३-

वस्तुत: विष्णु ब्रह्मा और रूद्र तीनों महान ईश्वरीय सत्ताऐं  त्रिगुण ( सत- रज और तम) नामक प्रकृति के गुणों के प्रतिनिधि हैं। सत और तम प्रकाश और अन्धकार गुणधर्मी हैं सृष्टि उत्पत्ति क्रम में भी सत और तम स्वतन्त्र और सापेक्ष समान महत्व के गुण हैं। केवल स्थिति ही  दोंनों गुणों की परस्पर विपरीत है। 'सत और 'तम दोनों गुणों के मिलने से 'रजोगुण' निर्मित होता है। इस क्रम से रजोगुण के प्रतिनिधि ब्रह्मा भी  विष्णु से प्रेरित रूद्र से उत्पन्न होने चाहिए। लिंग पुराण में सायद रूद्र से ब्रह्मा की उत्पत्ति के इस प्रयोग का वर्णन है।

 "लिङ्गमहापुराण पूर्वभाग रुद्रोत्पत्तिवर्णनं नामक(२२) वें अध्याय में रूद्र की उत्पत्ति मृत ब्रह्मा की देह से दर्शायी है।

'प्रजाः स्रष्टुमनाश्चक्रे तप उग्रं पितामहः।
तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित्समवर्तत।१७ ।
अनुवाद:-
संतान उत्पन्न करने की इच्छा से ब्रह्मा ने कठोर तपस्या की इस प्रकार तप करते समय उस तप से कुछ नहीं हुआ ।22.17 ।

'ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो ह्यजायत।।
क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः।१८।
अनुवाद:-
फिर बहुत दिनों के बाद ब्रह्मा के दुःख से क्रोध उत्पन्न हो गया। और क्रोध से आवेशित उसकी आँखों से आँसू की बूँदें गिर पड़ी। 22.18 ।

"ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो वातपित्तकफात्मकाः।
महाभागा महासत्त्वाः स्वस्तिकैरप्यलङ्कृताः।१९।
अनुवाद:-
फिर उन आंसू की बूंदों से वायु, पित्त और कफ से युक्त सत्व सम्पन्न महाभाग्यशाली  स्वास्तिक से अलंकृत ।१९। 

प्रकीर्णकेशाः सर्पास्ते प्रादुर्भूता महा विषाः।
सर्पांस्तानग्रजान्दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दयत्।२०।
अनुवाद,:-महाविषधर सर्प उत्पन्न हुए।
जिनके केश फैले हुए थे।-19।
अपने सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न हुए उन सर्पों को देखकर  ब्रह्मा ने स्वयं अपनी  निंदा की।20।.

अहो धिक् तपसो मह्यं फलमीदृशकं यदि।
लोकवैनाशिकी जज्ञे आदावेव प्रजा मम।२१।
अनुवाद:-
यदि यह मेरी तपस्या का फल है तो धिक्कार है मुझ पर मेरे प्रजा के आदि में जगत् का नाश करने के लिए सर्प उत्पन्न हुए हैं।21।.
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तस्य तीव्राभवन्मूर्च्छा क्रोधामर्षसमुद्भवा।
मूर्च्छाभिपरितापेन जहौ प्राणान्प्रजापतिः।२२।
अनुवाद:-
उस तीव्र मूर्च्छा, क्रोध और अमर्ष- (असहनशीलता) के कारण ब्रह्मा अत्यधिक बेहोश हो गये और प्रजापति ब्रह्मा ने मूर्च्छा के ताप से  अपने प्राण त्याग दिये ।.22 ।

'तस्याप्रतिमवीर्यस्य देहात्कारुण्यपूर्वकम्।
अथैकादश ते रुद्रा रुदन्तोऽभ्यक्रमस्तथा।२३।
अनुवाद:-
तब उस अतुलनीय पराक्रमी पुरुष के शरीर से करुणापूर्वक रोते हुए ग्यारह रुद्र उत्पन्न होकर उनके पास आये ।23 ।

"रोदनात्खलु रुद्रत्वं तेषु वै समजायत।
ये रुद्रास्ते खलु प्राणा ये प्राणास्ते तदात्मकाः।२४।
अनुवाद:-
उनके रुदन करने  से ही वे रुद्र कहलाए वे रुद्र वास्तव में जीवन-शक्ति ( प्राण) हैं और वे जीवन-शक्तियाँ उन्हीं से बनी हैं।24।

'प्राणाः प्राणवतां ज्ञेयाः सर्वभूतेष्ववस्थिताः।
अत्युग्रस्य महत्त्वस्य साधुराचरितस्य च।२५।
अनुवाद:-
जीवन देने वाले प्राणों को सभी प्राणियों में निवास के रूप में समझा जाना चाहिए।
वह अत्यंत उग्र और अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा साधु आचरण वाला थे ।25।
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प्राणांस्तस्य ददौ भूयस्त्रिशूली नीललोहितः।
लब्ध्वासून् भगवान्ब्रह्म देवदेवमुमापतिम्।२६।अनुवाद:-
नीले और लाल त्रिशूल धारी नील-लोहित रूद्र ने उस ब्रह्मा को फिर से जीवन देकर जीवित कर दिया।
देवताओं के स्वामी ब्रह्मा  ने प्राणों  को प्राप्त कर  रूद्र रूप में  उमापति को ही प्राप्त कर लिया।26।
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श्रीलिङ्गमहापुराण पूर्वभाग रुद्रोत्पत्तिवर्णनं नामक द्वाविंशतितमोऽध्यायः। २२।
यह  लिंग-पुराण के पूर्वी भाग में रुद्र की उत्पत्ति का वर्णन नामक बाईसवाँ अध्याय है।22।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अतिरिक्त  "देवी-भागवत पुराण के नवम स्कन्ध के तृतीय अध्याय- में भी इसी प्रकार का गोलोक से सृष्टि का उत्पत्ति का वर्णन है।

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा– 'वत्स ! मेरी ही भाँति तुम भी बहुत समय तक अत्यन्त स्थिर होकर विराजमान रहो। असंख्य ब्रह्माओं के जीवन समाप्त हो जाने पर भी तुम्हारा नाश नहीं होगा। और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में अपने सूक्ष्म अंश से तुम विराजमान रहोगे। तुम्हारे नाभिकमल से विश्वस्रष्टा ब्रह्मा प्रकट होंगे।  ब्रह्मा के ललाट से ग्यारह रुद्रों का आविर्भाव होगा। शिव के अंश से वे रुद्र सृष्टि के संहार की व्यवस्था करेंगे। उन ग्यारह रुद्रों में जो ‘कालाग्नि’ नाम से प्रसिद्ध हैं, वे ही रुद्र विश्व के संहारक( नाशकरने वाले) होंगे।

"हे बालक ! विष्णु  विश्व की रक्षा करने के लिये तुम्हारे सूक्ष्म अंश से प्रकट होंगे। जिनको  क्षुद्रविराट (छोटा- विष्णु) कहा जाएगा ।

मेरे वर के प्रभाव से तुम्हारे हृदय में सदा मेरी भक्ति बनी रहेगी। तुम मेरे परम सुन्दर स्वरूप को ध्यान के द्वारा निरन्तर देख सकोगे, यह निश्चित है। तुम्हारी कमनीया माता मेरे वक्षःस्थल पर विराजमान रहेगी।
उसकी भी झाँकी तुम प्राप्त कर सकोगे। वत्स ! अब मैं अपने गोलोक में जाता हूँ। तुम यहीं ठहर कर स्थित रहो।'

इस प्रकार उस बालक से यह कहकर भगवान श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और तत्काल वहाँ गोलोक में पहुँचकर उन्होंने सृष्टि की व्यवस्था करने वाले ब्रह्मा को तथा संहार कार्य में कुशल रुद्र को आज्ञा दी।

भगवान श्रीकृष्ण (स्वराट्- विष्णु) रूप में ब्रह्मा से बोले– 'वत्स ! सृष्टि रचने के लिये जाओ। विधे ! मेरी बात सुनो, महाविराट के एक रोमकूप में स्थित क्षुद्र विराट पुरुष के नाभिकमल से तुम  प्रकट होओ।' 

फिर गोपेश्वर श्री कृष्ण ने रुद्र को संकेत करके कहा– ‘वत्स महादेव ! जाओ। महाभाग ! अपने अंश से ब्रह्मा के ललाट से प्रकट हो जाओ और स्वयं भी दीर्घकाल तक तपस्या करो।’

नारद ! जगत्पति भगवान श्रीकृष्ण यों कहकर चुप हो गये। तब ब्रह्मा और कल्याणकारी शिव– दोनों महानुभाव उन्हें प्रणाम करके विदा हो गये।

महाविराट पुरुष के रोमकूप में जो ब्रह्माण्ड-गोलक का जल है, उसमें वे महाविराट पुरुष अपने अंश से क्षुद्र विराट पुरुष हो गये, जो इस समय भी ब्रह्माण्ड में क्षुद्र विष्णु के रूप में विद्यमान हैं। उन क्षुद्र विराट विष्णु  का स्वरूप कृष्ण की अपेक्षा युवा है जबकि कृष्ण का स्वरूप सदा किशोर वय में होता है। यही दोनों की मौलिकता का एक प्रमुख भेद है।
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अनुवाद:-
इन क्षीर-शायी नारायण  की सदा युवा अवस्था रहती है। इनका श्याम रंग का शरीर है। ये पीताम्बर पहनते हैं। जलरूपी शैय्या पर सोये रहते हैं। इनका मुखमण्डल मुस्कान से सुशोभित है। इन प्रसन्न मुख विश्वव्यापी प्रभु को ‘जनार्दन’ कहा जाता है। इन्हीं के नाभि कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और उस (क्षुद्र विष्णु) के अन्तिम छोर का पता लगाने के लिये वे ब्रह्मा उस कमलदण्ड में एक लाख युगों तक चक्कर लगाते रहे परन्तु उसका कभी कहीं अन्त नहीं पाया।
सन्दर्भ:-
ब्रह्म वैवर्त पुराण-
प्रकृतिखण्ड: अध्याय(3) तथा देवीभागवत पुराण नवम स्कन्ध अध्याय-(3) 
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नारद इतना प्रयास करने पर भी वे पद्मजन्मा ब्रह्मा जब पद्मनाभ (विष्णु) की नाभि से उत्पन्न हुए कमलदण्ड के अन्त तक जाने में सफल न हो सके। तब उनके मन में चिन्ता घिर आयी। वे पुनः अपने स्थान पर आकर भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमल का ध्यान करने लगे। उस स्थिति में उन्हें दिव्य दृष्टि के द्वारा क्षुद्र विराट पुरुष ( छोटे विष्णु )के दर्शन प्राप्त हुए।

महाविराट(वे पुरुष  क्षुद्र विराट् )  रोमकूपक में ( क्षीरसागर )के  भीतर जलमय शैय्या पर  शयन कर रहे थे। फिर जिनके रोमकूप में वह ब्रह्माण्ड था, तब ब्रह्मा को उन महाविराट पुरुष के तथा उनके भी परम प्रभु भगवान श्रीकृष्ण के भी दर्शन हुए। 

साथ ही गोपों और गोपियों से सुशोभित गोलोकधाम का भी ब्रह्मा आदि को  दर्शन हुआ। फिर तो उन ब्रह्मा ने स्वयं  श्रीकृष्ण की स्तुति की और उनसे वरदान पाकर सृष्टि का कार्य आरम्भ कर दिया।

स्वयं भगवान स्वराट् विष्णु ( श्रीकृष्ण)  जो गोलोक में अपने मूल कारण "कृष्ण" रूप में ही विराजमान हैं वही समयानुसार आभीर जाति में मानवरूप में सीधे अवतरित होकर इस पृथ्वी पर धर्म ( सदाचरण) की शिक्षा देने के लिए आते हैं; 

क्योंकि आभीर (गोप) जाति साक्षात् उनके रोम कूप ( शरीर के हृदय कोशिका) से उत्पन है जो गुण-धर्म में उन्हीं कृष्ण के समान होती है। विज्ञान में यही समरूपण (क्लोन) विधि कहलाती है।

इस बात की पुष्टि अनेक ग्रन्थ से होती है।प्रसिद्ध वैष्णव ग्रन्थ गर्ग-संहिता में उद्धृत " कुछ तथ्यो  को हम प्रस्तुत करते हैं।

कृष्ण का गोप जाति में अवतरण और गोप जाति के विषय में राधा जी का अपना मन्तव्य प्रकट करना ही इसी तथ्य को सूचित करता है। कि गोपों से श्रेष्ठ इस सृष्टि में कोई  दूसरी जाति नहीं  है।

अनुवाद:- जब स्वयं कृष्ण राधा की एक सखी बनकर  स्वयं ही कृष्ण की राधा से निन्दा करते हैं तब राधा कहती हैं -

"भूतल के अधिक-भार का -हरण करने वाले कृष्ण तथा सत्पुरुषों के कल्याण करने वाले कृष्ण  गोपों के ही घर में प्रकट हुए हैं। फिर तुम हे सखी ! उन आदिपुरुष श्रीकृष्ण की निन्दा कैसे करती हो ? तुम तो बड़ी ढीठ जान पड़ती हो। ये गोप सदा गौओं का पालन करते हैं, गोरज की गंगा में नहाते हैं, उसका स्पर्श करते हैं तथा गौओं का उत्तम नामों का जप करते हैं।                      

इतना ही नहीं, उन्हें दिन-रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप-जाति से बढ़कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।२१-२२।

(सन्दर्भ:- गर्गसंहिता वृन्दावन खण्ड अध्याय १८)

गाय और गोप जिनके लीला- सहचर बनते हैं।
और इनकी आदिशक्ति- राधा ही "दुर्गा" गायत्री"और उर्वशी आदि के रूप में अँशत:  इन अहीरों के घर में जन्म लेने के लिए प्रेरित होती हैं। उन अहीरों को हेय कैसे कहा जा सकता है ?_ 

ऋग्वेद में विष्णु के लिए  'गोप', 'गोपति' और 'गोपा:' जैसे विशेषणों से सम्बोधित किया गया है।  वस्तुत: वैदिक ऋचाओं मे ं सन्दर्भित  विष्णु गोप रूप में जिस लोक में रहते वहाँ बहुत सी स्वर्ण मण्डित सीगों वाली गायें रहती हैं। 

जो पुराण वर्णित गोलोक का  ही रूपान्तरण अथवा संस्करण है। विष्णु के लिए गोप - विशेषण की परम्परा  "गोप-गोपी-परम्परा के ही प्राचीनतम लिखित प्रमाण कहे जा सकते हैं।

इन (उरूक्रम त्रिपाद-क्षेपी) लम्बे डग धर के अपने तीन कदमों में ही तीन लोकों को नापने वाले। विष्णु के कारण रूप और इस ब्रह्माण्ड से परे  ऊपर गोलोक में विराजमान द्विभुजधारी शाश्वत किशोर कृष्ण ही हैं।

विष्णु के तृतीय पाद-क्षेप  परम पद में मधु के उत्स (स्रोत )और भूरिश्रृंगा-(स्वर्ण मण्डित सींगों वाली) जहाँ गउएँ  रहती हैं , वहाँ पड़ता है।

"कदाचित इन गउओं के पालक होने के नाते ही विष्णु को गोप कहा गया है।

ऋग्वेद में विष्णु के सन्दर्भ में ये तथ्य इस ऋचा में प्रतिबिम्बित है।

"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥ (ऋग्वेद १/२२/१८)

शब्दार्थ:-(अदाभ्यः) =सोमरस रखने के लिए गूलर की लकड़ी का बना हुआ पात्र को (धारयन्) धारण करता हुआ । (गोपाः) गोपालक रूप, (विष्णुः) संसार का अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) =तीन (पदानि) क़दमो से (विचक्रमे)= गमन करता है । और ये ही (धर्माणि)= धर्मों को धारण करता है ॥18॥

इन सभी तथ्यों की हम क्रमश: व्याख्या करेंगे।विष्णु को सम्पूर्ण संसार का रक्षक और अविनाशी बताया है। जिन्होंने धर्म को धारण करते हुए तीनों लोको सहित सम्पूर्ण ब्राह्माण्ड को तीन पगों( कदमों) ही में नाप लिया है

इस तरह अनेक श्रुतियों में परमात्मा के सगुण- साकार रूप का भी वर्णन मिलता है। "विष्णु का परम पद, परम धाम' दिव्य आकाश में स्थित एवं अनेक सूर्यों के समान देदीप्यमान गोलोक ही माना गया है -

"तद् विष्णो: परमं पदं पश्यन्ति सूरयः। दिवीय चक्षुरातातम् (ऋग्वेद १/२२/२०)।

उस विष्णु के परम पद में अनेक सूर्य दिखाई देते है। अर्थात तद् विष्णो:( उस विष्णु के)
सूरयः) सूर्यगण (दिवि) प्रकाशित लोक में । (आततम्) =फैले हुए (चक्षुरिव) नेत्रों के समान जो (विष्णोः) परमेश्वर के  (परमम्) उत्तम से उत्तम (पदम्)=स्थान (तत्) उस को (सदा) सब काल में (पश्यन्ति) देखते हैं॥२०॥

अनुवाद:-वह विष्णु के परम पद में अनेक सूर्य प्रकाशित होते हैं अर्थात- जिस प्रकाशित लोक में अनेक सूर्य गण विस्तारित हैं। जो  विस्तृत नेत्रों के समान उस विष्णु के उत्तम से उत्तम स्थान (लोक ) को सदैव देखते हैं।

ऋग्वेद के मण्डल 1 के सूक्त (154) की ऋचा संख्या (6) में भी नीचे देखें-

"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः।अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि" ऋग्वेद-१/१५४/६।)

सरल अनुवाद व अर्थ:-जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें हैं स्थित  अथवा विचरण करती हैं उस  स्थानों को - तुम्हारे  जाने के लिए जिसे-  वास्तव में तुम चाहते भी हो। जो- बहुत प्रकारों से प्रशंसित है जो- सुख वर्षाने वाले परमेश्वर का  उत्कृष्ट (पदम्) -स्थान लोक है जो अत्यन्त उत्कृष्टता से प्रकाशमान होता है  उसी के लिए यहाँ हम वर्णन करते हैं ॥६॥

उपर्युक्त ऋचाओं का सार है कि विष्णु का परम धाम वह है। जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें हैं। और वे विष्णु गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) है)। वस्तुत ऋग्वेद में यहाँ उसी गोलोक का वर्णन है जो ब्रह्म वैवर्त पुराण और देवीभागवतपुराण और गर्ग संहिता आदि  में वर्णित गोलोक है ।

विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए। परन्तु विष्णु कृष्ण का ही एकाँशी अथवा बह्वाँशी ( बहुत अंशों वाला) रूप है। 

सृष्टि में क्रियान्वित रहता है। स्वयं कृष्ण नहीं कृष्ण तो केवल लीला हेतु पृथ्वी लोक पर गोपों के सानिध्य में ही अवतरण करते हैं। क्योंकि गोप मूलत:  गोलोक की ही सृष्टि हैं 

"परन्तु पृथ्वी लोक पर गोपों की उत्पत्ति सत्युग में स्वराट् विष्णु के रोमकूपों से ही उसी क्रम में होती है। जैसे गोलोक में कृष्ण से मूल सृष्टि होती है  क्योंकि क्षुद्र विष्णु  भी स्वराट् विष्णु के अंश अवतार है।

पृथ्वी पर सत्युग में गोप (आभीर) जन उपस्थित रहते हैं। चातुर्वर्ण की सृष्टि और ऋषि, देवता आदि की सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात् जब ब्रह्मा एक महायज्ञ करते हैं। उसमें ब्रह्मा अपनी सम्पूर्ण सृष्टि के  चातुर्यवर्ण के लोगों को आमन्त्रित करते हैं। गोप ब्रह्मा की सृष्टि न होने से  इस यज्ञ में ब्रह्मा द्वारा आमन्त्रित नहीं किये जाते हैं।

जब इस यज्ञ के शुभ मुहूर्त (दिन- रात का तीसवाँ भाग ) व्यतीत न हो जाये इसी कारण से ब्रह्मा को यज्ञकार्य हेतु तत्काल एक पत्नी की आवशयकता होती है। "होता"यज्ञ में आहुति देनेवाला तथा मंत्र पढ़कर यज्ञकुंड में हवन की सामग्री डालने वाले के रूप में उपस्थित माना जाता है । अत्रि इस "होता" की भूमिका में हैं। सभी सप्तर्षि इस यज्ञ में किसी न किसी भूमिका में हैं।

विशेष—यह चार प्रधान ऋत्विजों में है जो ऋग्वेद के मंत्र पढ़कर देवताओं का आह्वान करता है होतृ कहलाता है।। 

जब एक बार पुष्कर क्षेत्र में  महायज्ञ के अवसर पर जब ब्रह्मा  की पत्नी सावित्री यज्ञ स्थल पर मुहूर्त के अनुसार उपस्थित न होती हैं। क्यों वे सावित्री गृह कार्य में व्यस्त हैं। याज्ञिक अनुष्ठान मुहूर्त विशेष में ही फलकारक होते हैं। सावित्री गृह कार्य में व्यस्त होने से यज्ञ- स्थल में आने को तैयार नहीं हैं। अब मुहूर्त का समय निकला जा रहा है। तभी सप्तर्षियों के कहने पर ब्रह्मा अपने यज्ञ कार्य के लिए इन्द्र को एक पत्नी बनाने के लिए कन्या लाने को कहते हैं। तब ब्रह्मा की सृष्टि से अलग वैष्णव सृष्टि गोपों (आभीरों) की कन्या गायत्री को इन्द्र ब्रह्मा के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।

विष्णु ही इस कन्या के दत्ता (कन्यादान करनेवाले पिता बनकर ) ब्रह्मा से इसका विवाह सम्पन्न कराते हैं।

"निष्कर्ष:- उपर्युक्त पद्मपुराण सृष्टि खण्ड अध्याय- (१६-१७) में वर्णित गायत्री की कथा से प्रमाणित होता है कि गायत्री के परिवारीय-जन गोप ,गोलोक से पृथ्वी पर गोपालन हेतु सतयुग में ही अवतरित हो गये थे। गोपों की सृष्टि पृथ्वी पर ही गोलोक के समान स्वराट् विष्णु के प्रतिनिधि क्षुद्र विष्णु के रोम कूपों से ब्रह्मा से पूर्व ही हो जाती है। 

 ये ब्रह्मा की सृष्टि से पृथक थे; इसलिए पुष्कर यज्ञ में अपनी सम्पूर्ण सृष्टि के साथ इन्हें ब्रह्मा द्वारा आमन्त्रित नहीं किया गया। ब्रह्मा का यह यज्ञ एक हजार वर्ष तक चला था।

अत्रि जो सावित्री द्वारा शापित हो गये थे;  गायत्री और ब्रह्मा के विवाह में सहायक होने के कारण उन्हें फिर आभीर कन्या गायत्री द्वारा  ही शाप मुक्त कर वरदान से अनुग्रहीत किया गया।

इसलिए अत्रि ने गायत्री को माँ कहकर सम्बोधित किया तब अत्रि को आभीर कन्या गायत्री का प्रथम विवाह कराने वाले पुरोहित होता हुए तभी से अहीरों के गोत्र प्रवर्तक हैं। अत: इन अत्रि को अहीरों का  पूर्वज कैसे कहा जा सकता है ? 

अत्रि आभीर कन्या  गायत्री  का विवाह भगवान् - विष्णु के अभिभावकत्व (संरक्षक होने के भाव ) में केवल यज्ञ कार्य व आध्यात्मिक कार्य करने हेतु ब्रह्मा के साथ कराते हैं गायत्री वैष्णवी शक्ति होने से ब्रह्मा से कोई सन्तान उत्पन्न नही होती है। ये ब्रह्मा की नाम मात्र की पत्नी हैं। गायत्री के समय से अत्रि अहीरों के प्रथम पुरोहित होने से गोत्र प्रवर्तक भी बन जाते है। परन्तु 'अत्रि का आभीर (यादव ) जाति से कोई रक्त सम्बन्ध नहीं है।

 ये कालान्तर में अहीर जाति के पुरोहित बन कर  गोत्र प्रवर्तक  हो गये हों यह सम्भव है परन्तु अहीर जाति अत्रि से उत्पन्न हुई है यह कहना शास्त्रीय सिद्धान्त के विपरीत है । 

विदित हो कि वामन अवतार कृष्ण के अंशावतार विष्णु का ही अवतार है नकि स्वयं कृष्ण का अवतार -क्योंकि कृष्ण का साहचर्य सदैव गो और गोपों में ही रहता है।

"कृष्ण हाई वोल्टेज रूप हैं तो विराट और क्षुद्र विराट आदि रूप उनके ही कम वोल्टेज के रूप हैं।

विष्णु कृष्ण के ही एक प्रतिनिधि रूप हैं। परन्तु स्वयं कृष्ण नहीं क्योंकि कृष्ण समष्टि (समूह) हैं तो विष्णु व्यष्टि (इकाई) अब इकाई में समूह को गुण धर्म तो विद्यमान होते हैं पर उसकी सम्पूर्ण सत्ता अथवा अस्तित्व नहीं।

विशेष:- पद्म पुराण सृष्टि खण्ड '  ऋग्वेद तथा श्रीमद्भगवद्गीता और स्कन्द आदि पुराणों में  गोपों को ही धर्म का आदि प्रसारक(propagater) माना गया है ।

ऋग्वेद 1.22.18) में  भगवान विष्णु गोप रूप में ही धर्म को धारण किये हुए हैं।

विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्”(ऋग्वेद 1.22.18) ऋग्वेद की यह ऋचा इस बात का उद्घोष कर रही है।

आभीर लोग प्राचीन काल से ही "व्रती और "सदाचार सम्पन्न होते थे। स्वयं भगवान् विष्णु ने सतयुग में भी अहीरों के समान किसी अन्य जाति को व्रती और सदाचारीयों में श्रेष्ठ न जानकर अहीरों को ही सदाचार सम्पन्न और धर्मवत्सल स्वीकार किया।

और इस कारण से भी स्वराट्- विष्णु(कृष्ण) ने अपना अवतरण भी इन्हीं अहीरों की जाति में लेना स्वीकार किया। और दूसरा कारण गोप स्वयं कृष्ण के सनातन अंशी हैं। जिनका पूर्व वराह कल्प में ही गोलोक में जन्म हुआ।

"व्यक्ति अपनी भक्ति और तप की शक्ति से गोलोक को प्राप्त कर गोप जाति में जन्म लेने की पात्रता प्राप्त कर लेता है।

वैदिक ऋचाओं में विष्णु का गोप होना सर्वविदित ही है।

यह गोप रूप विष्णु के आदि कारण रूप कृष्ण का है और यह विष्णु कृष्ण के प्रतिनिध रूप में ही अपने गोप रूप में धर्म को धारण करने की घोषणा कर रहे हैं। धर्म सदाचरण और नैतिक मूल्यों का  पर्याय है। और इसी की स्थापना के लिए कृष्ण भूलोक पर पुन: पुन: आते है।

 "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! अभ्युत्थानम्-अधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजामि- अहम्।। 
श्रीमद्भगवद्गीता- ( 4/7) 

'हे अर्जुन ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूप से प्रकट करता हूँ।

अत: गोप रूप में ही कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए समय समय पर अपने एक मानवीय रूप का आश्रय लेकर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं।




आज पुन: हम भगवान गोपेश्वर श्रीकृष्ण के यथार्थ जीवन  चरित्र का चित्रण करने का प्रयास कर रहे हैं। इस महान उद्देश्य पूर्ण पावन कार्य में  हमारे सम्बल और कृष्ण भक्ति के प्रसारक,    परम सात्विक, सन्त हृदय श्री "आत्मानन्द" जी भी हैं। जिनकी  पावन प्रेरणाओं से अनुप्रेरित होकर साधक व्यक्तित्व-  श्री माताप्रसाद जी , यादव योगेश कुमार के साथ सहयोगी की भूमिका में उपस्थित हैं। 

इसके अतिरिक्त हमारे ऐतिहासिक अन्वेषण पूर्ण लेखन काल में  सम्बल के रूप में श्रद्धेय आत्मानन्द जी से हमारा अनवरत विमर्श होता रहा है। एतदर्थ वे श्रद्धा और साधुता के पात्र ही नहीं वे हमारे प्रेरणा स्रोत के रूप में भी  उपस्थित रहे हैं।

आज हम पुन: वैष्णव वर्ण और तदनुरूप भागवत धर्म की उपयोगिता मानव की आध्यात्मिक पिपासा की तृप्ति के लिए अति आवश्यक है।

इतिहास के उन बिखरे हुए पन्नों को समेटने का और समाज में व्याप्त भ्रान्तियों को जड़ से मेटने का यह उपक्रम एक अल्प प्रयास के रूप में ही हम प्रारम्भिक चरण में क्रियान्वयन कर रहे हैं ;

प्रस्तावक:-"यादव योगेश कुमार रोहि

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