बुधवार, 22 जनवरी 2025

आत्मानन्द जी:
अध्याय- (७)✓✓✓

वैष्णव वर्ण के गोपों की पौराणिक प्रशंसा एवं
सांस्कृतिक विरासत।

इस महत्वपूर्ण प्रसंग को अच्छी तरह से समझने के लिए इस अध्याय को प्रमुख रूप से दो भागों में भागों में बांटा गया है-

भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
भाग [२]- भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।


▪️ भाग [१]- गोपों की पौराणिक प्रशंसा।
  
              
पौराणिक ग्रन्थों में वैष्णव वर्ण के गोपों अर्थात यादवों की समय-समय पर भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। जैसे-
(१)- ब्रह्मा जी के पुष्कर यज्ञ के समय जब अहीर कन्या देवी गायत्री का विवाह ब्रह्मा जी से होने को सुनिश्चित हुआ तो वहीं पर सभी देवताओं और ऋषि- मुनियों की उपस्थिति में भगवान विष्णु गोपों से पद्मपुराण के सृष्टि खंड के अध्याय- १७ के श्लोक संख्या- (१७) में कहते हैं कि-
धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।
मया ज्ञात्वा तत:कन्यादत्ताचैषा विरञ्चय ते।।१७।

अनुवाद-  तुम लोगों को मैंने धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल जानकर ही तुम्हारी कन्या ब्रह्मा को प्रदान किया है।१७।  

अतः उपरोक्त श्लोकों के आधार पर सिद्ध होता है कि गोपों जैसा धर्मवत्सल, सदाचारी और धर्मज्ञ भूतल पर ही नहीं अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मांड में कोई नहीं है।

(२)- गोपों (यादवों) की कुछ इसी तरह की प्रशंसा और  विशेषताओं को कंस स्वयं करता है।यादवों को अपने दरबार में बुलाकर उनसे जो कुछ कहा उसका वर्णन- हरिवंशपुराण के विष्णु पर्व के अध्याय -(२२ के १२ से २५ ) तक के श्लोकों में मिलता है। जो इस प्रकार है -

"भवन्तः सर्वकार्यज्ञा वेदेषु परिनिष्ठिताः।
न्यायवृत्तान्तकुशलास्त्रिवर्गस्य प्रवर्तकाः।।१२।

कर्तव्यानां च कर्तारो लोकस्य विबुधोपमाः।
तस्थिवांसो महावृत्ते निष्कम्पा इव पर्वताः।।१३।।

अदम्भवृत्तयः सर्वे सर्वे गुरुकुलोषिताः।
राजमन्त्रधराः सर्वे सर्वे धनुषि पारगाः।।१४ ।।

यशः प्रदीपा लोकानां वेदार्थानां विवक्षवः।
आश्रमाणां निसर्गज्ञा वर्णानां क्रमपारगाः।।१५।।

प्रवक्तारः सुनियतां नेतारो नयदर्शिनाम् ।
भेत्तारः परराष्ट्राणां त्रातारः शरणार्थिनाम्।।१६।।

एवमक्षतचारित्रैः श्रीमद्भिरुदितोदितैः ।
द्यौरप्यनुगृहीता स्याद्भवद्भिः किं पुनर्मही।। १७।।

ऋषीणामिव वो वृत्तं प्रभावो मरुतामिव ।
रुद्राणामिव वः क्रोधो दीप्तिरङ्गिरसारमिव।।१८।।

व्यावर्तमानं सुमहद् भवद्भिः ख्यात कीर्तिभिः ।
धृतं यदुकुलं वीरैर्भूतलं पर्वतैरिव।।१९।।

अनुवाद -
आप (यादव ) समस्त कर्तव्य कर्मों के ज्ञाता, वेदों के परिनिष्ठित विद्वान, न्यायोचित वार्ताव में कुशल, धर्म, अर्थ, और काम के प्रवर्तक, कर्तव्य पालक, जगत के लिए देवताओं के समान माननीय महान आचार्य विचार में दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने वाले और पर्वत के समान अविचल है। १२-१३।
• आप सब लोग पाखंडपूर्ण वृत्ति से दूर रहते हैं। सबने गुरुकुल में रहकर शिक्षा पाई है। आप सब लोग राजा की गुप्त मंत्राओं को सुरक्षित रखने वाले तथा धनुर्वेद में पारंगत है।१४।

• आपके यशस्वी रूप प्रदीप संपूर्ण जगत में अपना प्रकाश फैला रहे हैं। आप लोग वेदों के तात्पर्य का प्रतिपादन करने में समर्थ है। आश्रम के जो स्वाभाविक कर्म है, उन्हें आप जानते हैं। चारों वर्णों के जो क्रमिक धर्म है, उसके आप लोग पारंगत विद्वान है।१५।

• आप लोग उत्तम विधियों के वक्ता, नीतिदर्शी पुरुषों के भी नेता, शत्रु राष्ट्रों के गुप्त रहस्यों का भेदन करने वाले तथा शरणार्थियों के संरक्षक है।१६।
• आपके सदाचार में कभी आंच नहीं आने पाई है। आप लोग श्रीसंपन्न हैं तथा श्रेष्ठ पुरुषों की चर्चा होते समय आप लोगों के नाम बारम्बार लिए जाते हैं। आप लोग चाहें तो स्वर्ग लोक पर भी अनुग्रह कर सकते हैं फिर इस भूतल की तो बात ही क्या ?।१७।
• आपका (यादवों का ) आचार ऋषियों के,  प्रभाव मरुद्गणों के, क्रोध रुद्रों के, और तेज अग्नि के समान है।१८।
• यह महान यदुकुल जब अपनी मर्यादा से भ्रष्ट हो रहा था, उस समय विख्यात कीर्ति वाले आप जैसे वीरों ने ही इसे मर्यादा में स्थापित किया, ठीक उसी तरह से जैसे पर्वतों ने इस भूतल को दृढ़तापूर्वक धारण कर रखा है। १९।

उपरोक्त श्लोकों में देखा जाए तो यादवों के लिए
पांच महत्वपूर्ण बातें निकल कर सामने आती है। वो हैं-

(१)- यादव - पाखण्डपूर्ण वृत्ति से सदैव दूर रहते थे और आज भी दूर रहते हैं।
(२)- यादव - वेदों के तात्पर्य का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं। तथा आश्रम के जो स्वाभाविक कर्म है, उन्हें ये लोग भली- भाँति जानते हैं। और चारों वर्णों के जो क्रमिक धर्म है, उसके ये लोग पारंगत विद्वान है।    
 (३)- यादव - नीतिदर्शी पुरुषों के भी नेता, शत्रु राष्ट्रों के गुप्त रहस्यों का भेदन करने वाले तथा शरणार्थियों के संरक्षक हैं।
(४)- यादवों के दृढ़संकल्प की बात करें तो ये स्वर्ग लोक पर भी अनुग्रह कर सकते हैं, फिर इस भूतल की तो बात ही क्या ? ये सभी विशेषताएं आज भी यादवों में देखने को मिलती है।

(५)- यादवों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनके आचार ऋषियों के, प्रभाव मरुद्गणों के, क्रोध रूद्रो के, और तेज अग्नि के समान होता है दूसरी बात यह कि- यादवों की इन्हीं विशेषताओं की वजह से जब कालयवन नें नारद जी से पूछा कि इस समय पृथ्वी पर बलवान राजा कौन-कौन हैं ? इसपर नारद जी विष्णुपुराण के पंचम अंश के अध्याय- २३ के श्लोक संख्या- ६ में नारद जी बताएं हैं -

स तु वीर्यमदोन्मतः पृथिव्यां बलिनो नृपान्।
अपच्छन्नारदस्तस्मै कथयामास यादवान्।।६।

अनुवाद - तदनन्तर वीर्यदोन्मत्त कालयवन ने नारद जी से पूछा कि पृथ्वी पर बलवान राजा कौन-कौन से हैं ? इस पर नारद जी ने उसे यादवों को ही सबसे अधिक बलशाली बताया।६।



इसी तरह से गोपकुल की गोपियों के लिए गर्गसंहिता के गोलक खंड के अध्याय- १० के श्लोक संख्या-(८) में नारद जी कंस से कहते हैं कि -
"नन्दाद्या वसव: सर्वे बृषभान्वादय: सरा:।
गोप्यो वेदऋचाद्याश्च सन्ति भूमौ नृपेश्वर।।८।

अनुवाद -  नन्द आदि गोप वसु के अवतार हैं और वृषभानु आदि देवताओं के अवतार हैं।
 नृपेश्वर कंस ! इस "व्रजभूमि में जो गोपियां है, उनके रूप में वेदों की ऋचाएं यहां निवास करती हैं"।
अब इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि गोपियों की उपमा वेदों की ऋचाओं से की जाती है।

(४)- गोपिया कोई साधारण स्त्रियाँ नहीं थीं। तभी तो चातुर्वर्ण्य के नियामक व रचयिता ब्रह्मा जी- श्रीमद्भभागवत पुराण के दशम स्कंध के अध्याय - (४७) के श्लोक (६१) में गोपियों की चरण धूलि को पाने के लिए तरह-तरह की कल्पना करते हुए मन में विचार करते हैं कि-
"आसामहो चरणरेणुजुषामहंस्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथमं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्।।६१।


अनुवाद - मेरे लिए तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मैं इस वृंदावन धाम में कोई झाड़ी, लता अथवा औषधि बन जाऊं। अहा ! यदि मैं ऐसा बन जाऊंगा, तो मुझे इन व्रजांगनाओं (गोपियों ) की चरण धूलि निरंतर सेवन करने के लिए मिलती रहेगी।
अब इन गोपकुल की गोपियों लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि ब्रह्मा जी भी इनके चरण धूलि को पाने के लिए झाड़ी और लता तक बन जाने की इच्छा करते हैं।

(५)- इसी तरह से गोपों के बारे में श्री राधा जी, गोपी रूप धारण किए भगवान श्री कृष्ण से- गर्गसंहिता के वृंदावन खंड के अध्याय-१८ के श्लोक संख्या -२२ में कहती हैं कि-
"गा: पालयन्ति सततं रजसो गवां च गङ्गां स्पृशन्ति च जपन्ति गवां सुनाम्नाम।
प्रेक्षन्त्यहर्निशमलं सुमुखं गवां च जाति: परा न विदिता भुवि गोपजाते:।।२२।
अनुवाद - ग्वाले सदा गौओं का पालन करते हैं। गोरज की गंगा में नहाते हैं, उनका स्पर्श करते हैं तथा गौओं के उत्तम नाम का जाप करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें दिन- रात गौओं के सुंदर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।
(६)- इसी तरह से परम ज्ञानयोगी उद्धव जी ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड के अध्याय-(९४) के कुछ प्रमुख श्लोकों में गोपियों  की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि-
"धन्यं भारतवर्षं तु पुण्यदं शुभदं वरम् ।
गोपीपादाब्जरजसा पूतं परमनिर्मलम्।७७।

ततोऽपि गोपिका धन्या सान्या योषित्सु भारते ।
नित्यं पश्यन्ति राधायाः पादपद्मं सुपुण्यदम्।७८।
अनुवाद - इस भारतवर्ष में नारियों के मध्य गोपीकाएं सबसे बढ़कर धन्या और मान्या हैं, क्योंकि वे उत्तम पुण्य प्रदान करने वाले श्री राधा के चरणकमलों का नित्य दर्शन करती रहती हैं।७७-७८।

पुनः उद्धव जी कहते हैं कि -

"षष्टिवर्षसहस्राणि तपस्तप्तं च ब्रह्मणा ।
राधिकापादपद्मस्य रेणूनामुपलब्धये ।। ७९।

गोलोकवासिनी राधा कृष्णप्राणाधिका परा ।
तत्र श्रीदामशापेन वृषभानसुताऽधुना ।।८०।

ये ये भक्ताश्च कृष्णस्य देवा ब्रह्मादयस्तथा ।
राधायाश्चापि गोपीनांकरां नार्हन्ति षोडशीम्।।८१।

कृष्णभक्तिं विजानाति योगीन्द्रश्च महेश्वरः ।
राधा गोप्यश्च गोपाश्च गोलोकवासिनश्च ये । ८२।।

किंचित्सनत्कुमारश्च ब्रह्मा चेद्विषयी तथा ।
किंचिदेव विजानन्ति सिद्धा भक्ताश्च निश्चितम् ।। ८३।।

धन्योऽहं कृतकृत्योऽहमागतो गोकुलं यतः ।
गोपिकाभयो गुरुभ्यश्च हरिभक्तिं लभेऽचलाम् ।। ८४ ।।

मथुरां च न यास्यामि तीर्थकीर्तेश्च कीर्तनम् ।
श्रोष्यामि किंकरो भूत्वा गोपीनां जन्मजन्मनि ।। ८५ ।।

न गोपीभ्यः परो भक्तो हरेश्च परमात्मनः ।
यादृशीं लेभिरेगोप्यो भक्तिं नान्ये च तादृशीम्।८६।।

अनुवाद -
• इन्हीं राधिका के चरण कमल की रज को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा ने साठ हजार वर्षों तक तप किया था। ७९।

•  गोलोक- वासिनी राधा जी, जो परा प्रकृति हैं। वहीं  भगवान कृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। वे गोलोक में श्रीदामा के शाप से आज-कल  भूलोक में वृषभानु की पुत्री राधा के नाम से उपस्थित हैं। और जो-जो श्री कृष्ण के भक्त हैं, वे सभी राधा के भी भक्त हैं। ब्रह्मा आदि देवता गोपियों क

ी 16 (सोलहवीं) कला की भी समानता नहीं कर सकते। ८०-८१।
• श्री कृष्ण की भक्ति का मर्म पूर्णरूप से तो योगीराज महेश्वर, राधा तथा गोलोकवासी गोप और गोपियाँं ही जानती हैं। ब्रह्मा और सनत्कुमारों को कुछ ही ज्ञात है। सिद्ध और भक्त भी स्वल्प ही जानते हैं। ८२-८३।

•  इस गोकुल में आने से मैं धन्य हो गया। यहां गुरुस्वरूपा गोपिकाओं से मुझे अचल हरिभक्ति प्राप्त हुई है, जिससे मैं कृतार्थ हो गया। ८४।

पुनः इसके अगले श्लोक- ८५ और ८६ में उद्धव जी कहते हैं कि-
"मथुरां च न यास्यामि तीर्थकीर्तेश्च कीर्तनम् ।
श्रोष्यामि किंकरो भूत्वा गोपीनां जन्मजन्मनि ।। ८५ ।।
न गोपिभ्यः परो भक्तों हरेश्च परमात्मनः।
यादृशीं लेभिरे गोप्यो भक्तिं नान्ये च तादृशीम्।। ८६।।

अनुवाद -
• अब मैं मथुरा नहीं जाऊँगा, और प्रत्येक जन्म में यहीं गोपियों का किंकर (दास,सेवक) होकर तीर्थश्रवा श्रीकृष्ण का कीर्तन सुनता रहूँगा, क्योंकि गोपियों से बढ़कर परमात्मा श्रीहरि का कोई अन्य भक्त नहीं है। गोपियों ने जैसी भक्ति प्राप्त की है वैसी भक्ति दूसरों को प्राप्त नहीं हुई। ८५ - ८६।                
और यहीं कारण है कि शास्त्रों में सभी मनुष्यों को गोप और गोपियों की पूजा करने का भी विधान किया गया है। इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भेवीभागवत पुराण के नवम् स्कंध के अध्याय -३० के श्लोक संख्या - ८५ से ८९ से होती है जिसमें लिखा गया है कि -

"कार्तिकीपूर्णिमायां च कृत्वा तु रासमण्डलम्।
गोपानां शतकं कृत्वा गोपीनां शतकं तथा।।८५।

शिलायां प्रतिमायां च श्रीकृष्णं राधाया सह।
भारते पूजयेभ्दवत्या चोपचाराणि षोडश।।८६।

गोलोक वसते सोऽपि यावद्वै ब्राह्मणो वय।
भारतं पुनरागत्य कृत्यो भक्तिं लभेद् दृढाम।।८७।

क्रमेण सुदृढां भक्तिं लब्ध्वा मन्त्रं हरेरहो।
देवं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः।।८८।

ततः कृष्णस्य सारुपयं पार्षदप्रवरो भवेत्।
पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत।।८९।
अनुवाद - जो भारतवर्ष में कार्तिक पूर्णिमा को सैकड़ो गोपों तथा गोपियों को साथ लेकर रास मंडल संबंधी उत्सव मनाकर शालिग्राम- शिला पर या प्रतिमा में सोलहों प्रकार के पूजनोपचारों से भक्ति पूर्वक साधन सहित श्री कृष्ण की पूजा संपन्न करता है, वह ब्रह्मा जी के स्थिति पर्यंत गोलोक में निवास करता है। पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर वह श्री कृष्ण की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। फिर भगवान श्रीहरि की क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मंत्र प्राप्त करके देह त्याग के अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहां श्री कृष्ण के समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है। तब पुनः वहां से उसका पतन नहीं होता, वह जरा तथा मृत्यु से सर्वथा रहित हो जाता है। अर्थात व मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। ८५-८९।
          
                  
गोपों की इन्हीं सब आध्यत्मिक विशेषताओं के कारण- गोपों (यादवों) को पाप से मुक्ति दिलाने वाला कहा जाता है। इस बात की पुष्टि-  गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड खंड के अध्याय- ६० के श्लोक संख्या- ४० से होती है। जिसमें लिखा गया है कि-
"य: श्रृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरेः।
मुक्तिं यदुनां गोपानां सर्वपापै: प्रमुच्यते।। ४०।

अनुवाद- जो लोग श्री हरि के गोलोक धाम पधारने का चरित्र सुनते हैं तथा गोपालक( गोप) , यादवों की मुक्ति का वृतांत पढ़ते हैं, वे यह सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।४०।।

कुछ इसी तरह की बात श्रीविष्णु पुराण के चतुर्थ अंश के अध्याय- (११) के श्लोक संख्या- (४) में भी लिखी गई है जिसमें गोपकुल के यादव वंश को पाप मुक्ति का सहायक बताया गया है-

"यदोर्वंशं नरः श्रुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यतते।
यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति।। ४।
अनुवाद - जिसमें श्री कृष्ण नामक निराकार परब्रह्म ने साकार रूप में अवतार लिया था, उस यदुवंश का श्रवण करने से मनुष्य संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।४।

किंतु वे लोग विशेषकर ऐसे कथावाचक, पापों से मुक्त नहीं हो पाते जो जानबूझकर या स्वार्थवश या लालचवश श्रीकृष्ण कथा में श्रीकृष्ण की आधी -अधुरी जानकारी को बताते हुए आगे बढ़ जाते हैं। ऐसे कथावाचक कभी भी पाप से मुक्त नहीं हो सकते। साथ ही वे पाप तथा दण्ड के भागी होते हैं। क्योंकि श्री कृष्ण कथा तभी पूर्ण मानी  जाती है जब श्रीकृष्ण के साथ ही उनके पारिवारिक सदस्य गोपों का भी वर्णन किया गया हो। क्योंकि यह बात शास्त्रोचित है कि गोपेश्वर श्री कृष्ण के सहचर गोप हैं जिनके साथ भगवान श्री कृष्ण अपनी लीलाएं करते रहते हैं। इसीलिए बगैर गोपों का वर्णन किये श्रीकृष्ण की कथा अधूरी ही मानी जाती है। जिससे कभी उसके श्रवण का पुण्यफल प्राप्त नहीं हो सकता है।

इस संबंध में गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज का कथन है कि -"ऐसे छद्म-वेषधारी कथावाचकों से सावधान रहने की आवश्यकता है जो अल्पज्ञान से बिना गोपों का वर्णन किये ही श्रीकृष्ण कथा कहते हों।"
     
        गलत कथाओं को सुनने व

कहने के दुष्परिणामों
की जानकारी अध्याय - १ भाग-(दो) में बतायी जा चुकी है। वहां से इस विषय पर विस्तृत जानकारी ली जा सकती है।
                    
इस प्रकार से अध्याय- ७  का भाग (१) वैष्णव वर्ण के गोपकुल के गोप और गोपियों की पुराणों में की गई  प्रसंशाओं और उनकी आध्यात्मिक महत्ता की जानकारी के साथ समाप्त हुआ।
     इसी क्रम में इसके अगले भाग- (दो) में बताया गया है कि भारतीय संस्कृति में गोपों का कितना योगदान रहा है।

मंगलवार, 21 जनवरी 2025




इसी क्रम में इसके अगले भाग- (दो) में
बताया गया है कि भारतीय संस्कृति में गोपों का कितना योगदान रहा है।

वैष्णव वर्ण के गोपों की पौराणिक प्रशंसा एवं
सांस्कृतिक विरासत।

अध्याय -(७) भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।

                    भाग-[२]
    भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।

______    
हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य में कोई विशेष अन्तर नहीं है। देखा जाए तो हल्लीसं शरीर है तो रास उसकी आत्मा है।
हल्लीसं कला  है तो रास प्रभु की लीला है। अर्थात् जब गोप और गोपियां श्रीकृष्ण को केंद्र बिंदु मानकर हल्लीसं नृत्य करते-करते श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम विभोर होकर परम रस का आनन्द लेने लगते थे तब वहीं हल्लीसं नृत्य रास रूप में बदल जाता था। कुल मिलाकर "हल्लीसं" रास का प्राथमिक स्तर है तथा उसका विस्तार "रास" है जहां पर केवल परमानन्द की अनुमति होती है।

जिसमें गोप और गोपियां कृष्ण को केंद्र बिंदु मानकर उनकी परिधि में मुरली की धुन पर थिरकती अथवा हल और ईषा की आकृति में वृत्ताकार नर्तन करती हुई परमानन्द की अनुभूति करतीं थीं। इसी हल्लीसक नृत्य को श्रीकृष्ण ने अपनी कलात्मकता से संवार कर जो रुप दिया, वही बाद में रास के नाम से विकसित होकर "रसो वै सः रास' के रुप में प्रतिष्ठित हुआ।
_______________________________   

गोपेश्वर श्रीकृष्ण इस तरह की रास लीला अपने गोप-गोपियों के साथ गोलोक और भूलोक दोनों स्थानों पर प्राय:( अक्सर) किया करते हैं। किंतु दुर्भाग्य है कि रास के इस गूढ़ रहस्य को लोग भौतिक दृष्टि से देखते हैं । जबकि इसे आध्यात्मिक दृष्टि से ही देखना चाहिए।
अत: शुद्ध अन्त:करण वाला साधक ही रास के तत्व को राधा जी की कृपा कटाक्ष से ही जान सकता है।


ज्ञात हो - श्रीकृष्ण रास क्रीड़ा का आयोजन अधिकांशतः मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को या कार्तिकी पूर्णिमा की आधी रात के समय को ही किया करते थे। इस लिए इन दोनों समयों में की जाने वाली रास लीला को ही मोक्षदायिनी माना
गया है। इसकी पुष्टि -
श्रीमद्देवी भागवत पुराण के अध्याय- (३०) के श्लोक - ८५ से ८९ से होती है। जिसमें कार्तिक पूर्णिमा की रास लीला को मोक्षदायिनी बताया गया है -

कार्तिकीपूर्णिमायां च कृत्वा तु रासमण्डलम् ।
गोपानां शतकं कृत्वा गोपीनां शतकं तथा॥ ८५।
शिलायां प्रतिमायां च श्रीकृष्णं राधया सह।
भारते पूजयेद्‍भक्त्या चोपचाराणि षोडश॥ ८६।
गोलोके वसते सोऽपि यावद्वै ब्रह्मणो वयः।
भारतं पुनरागत्य कृष्णे भक्तिं लभेद्‌दृढाम्॥८७।
क्रमेण सुदृढां भक्तिं लब्ध्वा मन्त्रं हरेरहो ।
देहं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः॥ ८८।
ततः कृष्णस्य सारूप्यं पार्षदप्रवरो भवेत् ।
पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत्॥ ८९।

अनुवाद- ८५-८९
जो भारतवर्ष में कार्तिक पूर्णिमा को सैकड़ों गोपों तथा गोपियोंको साथ लेकर रासमण्डल - सम्बन्धी उत्सव मनाकर शिलापर या प्रतिमा में सोलहों प्रकारके पूजनोपचारों से भक्तिपूर्वक राधा सहित श्रीकृष्ण की पूजा सम्पन्न करता है, वह ब्रह्माजी के स्थिति पर्यन्त गोलोक में निवास करता है। तथा पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर वह श्रीकृष्ण की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। तव वह भगवान् श्रीहरि की क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मन्त्र प्राप्त करके देह त्यागके अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहां श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है। तब पुनः वहां से उसका पतन नहीं होता, वह जरा तथा मृत्युसे सर्वथा रहित हो जाता है। ८५-८९।
अतः उपरोक्त संदर्भों से ज्ञात होता है कि हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य गोपों की संस्कृति रही है। जिसकी छाप आज भी आध्यात्म से लेकर साधारण जनमानस तक देखी जाती है।

[२] - कृषि और किसान गोपों की संस्कृति कृषि-:



[५]- अभीर छन्द और राग भैरवी-:

जो भी राग और संगीत के बारे में थोड़ी सी भी जानकारी रखता होगा  वह अभीर छन्द और राग भैरवी को अवश्य जानता होगा। किंतु उसे यह पता नहीं होगा कि इसकी उत्पत्ति कब और कैसे हुई? इसी प्रश्न का समाधान यहां किया गया है।

इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि - अहीर भारत में एक प्राचीन जातीय समूह है जो मुख्य रूप से पशुपालक एवं कृषक हैं।
यह लोग जब भी अपने पशुओं को चराने के लिए समूह में जाते थे तब वे एक निश्चित राग और छ्न्द में गाया करते थे।
चुंकि ये अभीर जाति के थे इस लिए इनकी गायन विधा से जो राग निकला उन्हीं के नामानुसार उस राग का नाम "अहीर" हुआ। जिसकी आज भी संगीत की दुनिया में एक अलग पहचान है।

राग अहीर भैरव दो रागों का मिश्रण है, अहीर और भैरव । अहीर और अहीर भैरव के स्वर एक जैसे हैं, लेकिन उनकी मधुर संरचना में अंतर है।

आभीर एक मात्रिक छन्द का नाम भी है जिसके चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में  (११)  मात्राएँ होती है और अंत में जगण होता है । जैसे— यमाताराजभानसलगा-

ये छंदों के वार्णिक छंद का अनुक्रम है।

किसी भी वर्णिक छन्द में वर्णों का समूह गण कहलाता है। ये प्रायः तीन वर्णों से मिलकर एक गण का निर्माण करते हैं । इन गणों के नाम इस प्रकार से हैं:-

यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण और सगण ।

इनकी मात्राओं के लिए लघु को ‘I ’ और गुरु को ‘s’ कहते हैं ।इस लघु-गुरु का के ही क्रम को याद रखने का एक विशिष्ट सूत्र स्थापित किया गया है जोकि ये है:- यमाताराजभानसलगा

इसमें किसी शब्द में जिस गण की जानकारी पता करनी हो तो उसके वर्ण के बाद इसी सूत्र से अगले दो वर्ण उनकी मात्रा समेत उसके बाद और जोड कर लिखें तो शब्द में कौन सा वार्णिक गण है ये ज्ञात हो जाएगा।

जैसे: एक शब्द "ममता" लिया। तो सूत्र के अनुसार देखे सभी गण को-

यगण – अर्थात- यमाता = ।ऽऽ
मगण – मातारा = ऽऽऽ
तगण – ताराज = ऽऽ।
रगण – राजभा = ऽ।ऽ
जगण – जभान = ।ऽ।
भगण – भानस = ऽ॥
नगण – नसल = ।॥
सगण – सलगा = ॥ऽ

ममता शब्द में वार्णिक छंद का गण "सगण" आता है क्योंकि इस ममता शब्द में प्रथम दो वर्ण लघु और अंतिम वर्ण गुरु है।

यहि बिधि श्री रघुनाथ । गहे भरत के हाथ । पूजत लोग अपार । गए राज दरबार।

इस प्रकार से यह अध्याय- ७ वैष्णव वर्ण के गोपकुल  के गोप और गोपियों की पुराणों में की गई भूरी-भूरी प्रसंशाओं और उनकी आध्यात्मिक महत्ता एवं भारतीय संस्कृति में इनके प्रमुख योगदानों को जाना।
इसी क्रम में इसके अगले अध्याय- ८ में भगवान श्री कृष्ण का सदैव गोप होना तथा गोपकुल में उनके अवतरित होने के प्रमुख कारणों को जानेंगे।

५] - कृषि और किसान शब्द गोपों सहित कृष्ण और संकर्षण की ही देन है-



इसी क्रम में इसके अगले भाग- (दो) में
बताया गया है कि भारतीय संस्कृति में गोपों का कितना योगदान रहा है।

वैष्णव वर्ण के गोपों की पौराणिक प्रशंसा एवं
सांस्कृतिक विरासत।

अध्याय -(७) भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।

                    भाग-[२]
    भारतीय संस्कृति में गोपों का योगदान।



[५] - कृषि और किसान शब्द गोपों सहित कृष्ण और संकर्षण की ही देन है-  
इसको यदि व्याकरणिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो किसान शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा के कृषाण शब्द से हुई है। कृष्ण और संकर्षण कृषि संस्कृति के जनक थे। कृष्ण से ही कृषाण शब्द विकसित हुआ है।
वाचस्पत्यं संस्कृत भाषा कोश के अनुसार :
कृषाण-  (कृष्+ आनक्)–

आप्ते के संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोष के अनुसार भी कृषाण शब्द  कृष् धातु में -आनक्- अथवा किकन् प्रत्यय करने बनता है।  
अर्थात् जो कृषि से सम्बन्धित कार्य करे वह किसान है।
ज्ञात हो - कृष्ण शब्द का धातुमूलक अर्थ - कृषक भी है ।
कुल मिलाकर कृष्ण से "कृषाण" और कृषाण से किसान शब्द का विकास हुआ। 


भगवान श्रीकृष्ण का नाम भी इसी अनुरूप है क्योंकि वे एक सफल कृषक थे। सबसे पहले वे एक सफल पशु पालक( गोपालक) थे और पशु पालक  ही  कृषि संस्कृति के जनक थे।
आर्य चरावाहे थे जिन्होंने कालान्तर में कृषि संस्कृति का विकास किया।
और इस बात की पुष्टि- श्रीगर्गसंहिता, गिरिराज खण्ड के अध्याय -(६ ) से होती है। जिसमें भगवान श्री कृष्ण नन्द बाबा से कहते हैं कि-
               "श्रीभगवानुवाच -
कृषीवला वयं गोपाः सर्वबीजप्ररोहकाः।
क्षेत्रे मुक्ताप्रबीजानि विकीर्णीकृतवाहनम्।२६।

अनुवाद- बाबा हमारे गोप किसान हैं, जो खेतों में सब प्रकार के बीज बोया करते हैं। अतः हमने भी खेतों में मोती के बीच बिखेर दिए हैं।।२६।

इसी तरह से गर्गसंहिता के गिरिराज खण्ड के अध्याय (६) में नन्द बाबा के उस समय भी कृषक  होने की पुष्टि होती है जब एक बार कुछ गोप लोग वषभानु के दरबार में उपस्थित होकर नन्द और वृषभानु के वैभव की तुलना करते हुए  नन्द के विषय में वृषभानु जी कहते हैं कि-

त्वत्समं वैभवं नास्ति नन्दराजगृहे क्वचित्।
कृषीवलो नन्दराजो गोपतिर्दीनमानसः॥७॥

 यदि नन्दसुतः साक्षात्परिपूर्णतमो हरिः।
 सर्वेषां पश्यतां नस्तत्परिक्षां कारय प्रभो।।८।

अनुवाद:-( ७-८)
• यहाँ तक कि राजा नन्द के घर में भी तुम्हारे समान धन और ऐश्वर्य नहीं है। अनेक गायों के स्वामी कृषक राजा नन्द भी तुम्हारी तुलना में दीन-हीन हैं।७।
• हे स्वामी, यदि नन्द का पुत्र वास्तव में भगवान है, तो कृपया उसकी परीक्षा अवश्य लीजिए, जिससे हम सबके देखते हुए उसकी दिव्यता प्रकट हो जाएगी।८।

ज्ञात हो - जिस तरह से गोपेश्वर श्री कृष्ण सदैव गोप वेष( रूप) में रहते हैं, उसी तरह से बलराम जी भी सदैव किसान वेष में ही रहते हैं। चाहे वे कृषि-क्षेत्र में हो अथवा, युद्ध-क्षेत्र में हो,  तथा उनके साथ सदैव हल और मूसल रहता।
इस बात की पुष्टि गर्गसंहिता के बलभद्र खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक -(१३) से भी होती है। जिसमें बलराम जी भू-तल पर अवतरित होने से पहले अपने हल और मूसल को कहते हैं-
हे हलमुसले यदा-यदा युवयोः स्मरणंं करिष्यमि।
तदा तदा मत्युर आविर्भूते भवतम्।।१३।

अनुवाद - हे हल और मूसल ! मैं जब-जब तुम्हारा स्मरण करूं, तब-तब तुम मेरे सामने प्रकट हो जाना।१३।
 
उपर्युक्त सन्दर्भों से स्पष्ट होता है श्रीकृष्ण और बलराम दोनों ही कृषि संस्कृति के जनक और   किसानों  के पूर्वज और प्रतीक हैं। क्योंकि अबतक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में इनके जैसा किसान तथा गोपालक भेष( रूप) वाला न तो कोई देवता न किन्नर न गन्धर्व न दैत्य और न ही कोई दानव देखा गया।

           आर्य संस्कृति और किसान-:

आर्य और किसान एक सिक्के के दो पहलू हैं। क्योंकि आर्य शब्द भी हल और कृषि से जुड़ा हुआ है। प्रारम्भ में आर्य चरावाहे ही थे जिन्होंने कालान्तर में कृषि संस्कृति का विकास किया। क्योंकि आर्य शब्द जुड़ा है अरि से जिसमें 
अरि एक वैदिक देव है। जो सदैव अर (आरा) हाथ में लिए हुए ऋग्वेद में अरि सर्वोच्च ईश्वरीय शक्ति का वाचक है।
 जिसकी पुष्टि- ऋग्वेद -(१०/२८/१) से होती है-

"विश्वो ह्यन्यो अरिराजगाम ममेदह श्वशुरो ना जगाम ।
जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात्स्वाशितः पुनरस्तं जगायात् ॥१॥
पदान्वय:-  विश्वः । हि । अन्यः । अरिः । आऽजगाम । मम । इत् । अह । श्वशुरः । न । आ । जगाम ।जक्षीयात् । धानाः । उत । सोमम् । पपीयात् । सुऽआशितः । पुनः । अस्तम् । जगायात् ॥१.
ईश्वरोऽप्यरिः” [ निरु० ५। ७]

उपर्युक्त  ऋचा ( श्लोक) में अरि शब्द ईश्वर वाची है। यूनानी पुराण कथाओं में इस वैदिक देव का वर्णन अरेस( Ares) के रूप में यूनानी युद्ध देवता के लिए है।

अरेस नाम की व्युत्पत्ति पारम्परिक रूप से ग्रीक शब्द ἀρή (arē) से जुड़ी हुई है, जो डोरिक भाषा के ἀρά (ara) शब्द का आयोनिक( यूनानी) रूप है, जिसका अर्थ-  विनाश"

यूरोपीय विद्वान वाल्टर बर्कर्ट का कहना है कि "अरेस स्पष्ट रूप से एक प्राचीन अमूर्त संज्ञा है जिसका अर्थ है लड़ाई,  अथवा युद्ध है। 

अरि: शब्द कालान्तर में लौकिक संस्कृत में  हरि हो गया-
संस्कृत भाषा में "आरा" और "आरि" शब्द आज भी शस्त्र वाली हैं।  परन्तु वर्तमान में लौकिक संस्कृत में "अर्" धातु विद्यमान नहीं है।
सम्भव है कि पुराने जमाने में "अर्" धातु
रही हो; पीछे से लुप्त हो गई हो ।
अथवा यह भी हो सकता है कि "ऋ" धातु का  ही  रूपान्तरण, "अर" हो  (और संस्कृत व्याकरण में ऋ का अर् होता भी है)
संस्कृत व्याकरण में य्, व् र्, ल्  अन्त:स्थ वर्णों  का इ, उ, ऋ और लृ में परिवर्तन होना। सम्प्रसारण की प्रक्रिया है।
अर् अथवा ऋ धातु का अर्थ होता है-
"हल चलाना" 
यह भी सम्भव है कि "हल की गति के कारण ही "ऋ" धातु का अर्थ गतिसूचक हो गया हो ।
"ऋ" धातु के पश्चात "यत्" प्रत्यय करने से "अर्य्य और 'ऋ' धातु में " ण्यत्" प्रत्यय करने से "आर्य्य शब्द की सिद्धि होती है। ये दोनों शब्द कृदन्त पद हैं। कृदन्त वे पद( शब्द) होते हैं जिनकी व्युत्पत्ति किसी धातु ( क्रिया मूल) से हुई हो।
विभिन्न भाषाओं के कृषि वाचक धातुओं का विचार करने से जान पड़ता है कि "अर्य" और "आर्य" दोनों शब्दो का धात्वर्थ कृषक ही है।
इसका परोक्ष प्रमाण संस्कृत-साहित्य और व्याकरण में पाया भी जाता है।

"आर्य" शब्द का एक अर्थ वैश्य अथवा कृषक भी है। वैश्य शब्द वणिक का वाचक नहीं है।
वैश्य वृत्ति में पशुपालन और कृषि मूलक क्रियाऐं समायोजित होती है। जबकि वाणिज्य में व्यापारिक क्रियाएँ 
किसी वणिक( वनिया) को कभी खेत में हल चलाते तथा पशुओं को चराते हुए कभी नहीं देखा गया। और किसी किसान को व्यापारिक या महाजनी क्रियाएँ करते नहीं देखा गया।
दोनो वृत्ति( व्यवसाय) आपस में विरोधी हैं ।
आज व्यापारी और किसान दो विरोधी समुदाय हैं।
अपितु वाणिज्य क्रिया को कालान्तर में वैश्य वृत्ति के अन्तर्गत समाविष्ट कर दिया गया। जिसका पशुपालन और कृषि मूलक वृत्तियों से कोई तालमेल नहीं है।

पाणिनि की अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय के पहले पाद का "आर्य: स्वामिवैश्ययोः" सूत्र इस बात का  प्रपल प्रमाण है। कि आर्य लोक वैश्य वृत्ति ( कृषि और पशु पालन ) से सम्बन्धित थे। और स्वामित्व पूर्ण स्थिति में थे।
फिर पाणिनि के "इन्द्र वरुण-भव-शर्व" आदि (४-१-४९) सूत्र पर सिद्धान्त- कौमुदी में पाया गया और आर्याणी शब्दों का अर्थ वैश्य- जातीय स्त्री और आर्य शब्द का अर्थ वैश्य-पति लिखा है ।

फिर, वाजसनेयी (१४-२८) और तैत्तिरीय संहिता (४-३-१०-१) में चारों वर्णों के नाम-ब्रह्मण, क्षत्र, आर्य और शूद्र लिखे हैं।
हैं निस्सन्देह  इस समय तक आर्य शब्द पशुपालन और कृषि मूलक वृत्तियों से युक्त जन समुदाय का वाचक था।
प्राचीन वैश्यों का प्रधान कार्य कर्षण (कृषि कार्य) ही था । इन्ही का नाम "आर्य" है । अतएव "आर्य" शब्द का अर्थ "कृषक" कहना युक्ति-विरहित नही।
कृष्ण और संकर्षण जैसे शब्द भी कृषि मूलक हैं
गोप- गोचारण करते थे और इतिहास साक्षी है कि चरावाहों से कृषि संस्कृति का विकास हुआ और कृष्ण और संकर्षण (बलराम)
दोनों युग पुरुष कृषि संस्कृति के प्रवर्तक और सूत्रधार थे।
 इतिहास कारों का निष्कर्ष है कि आर्य चरावाहे ही थे । फिर बनिया ब्राह्मण और अन्य वृत्तियों से युक्त जन समुदाय को आर्य थ्योरी में जोड़ा गया।
क्यों व्यापार अथवा वाणिज्य वृत्ति को कृषि और पशु पालन वृत्ति से जोड़ा गया।
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यस्य परिकीर्तितं । (अग्निपुराण 151/9)
कृषि, गोपालन और व्यापार वैश्य के कर्म हैं। कृषि करना वैश्य का काम है। यह भारतीय शास्त्रों का विधान हैं ।
किसी वणिक या वन कया
 का काम नहीं -
ब्राह्मण के लिए। कृषि वृत्ति निषिद्ध ( मनाई) है।

मनुस्मृति में वर्णन है कि
"वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्सत्रियोऽपि वा। हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ।।10/83।
अर्थ-• ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वैश्य वृत्ति से जीवन निर्वाह करते हुए भी कृषि कार्य तो कभी न करें अर्थात् इसे यत्न पर्वक त्यागें क्योंकि कि यह हिंसा के अन्तर्गत है।
ब्राह्मण और क्षत्रिय न तो पशुपालन कर सकता हौनऔर न कृषि कार्य तो फिर वह व्यापार ही कर सकता है।

अर्थात कृषि कार्य वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए भी निषिद्ध ही है ।

इसी लिए वर्ण-व्यवस्था वादी वणिक कभी हल चलाते या कृषि कार्य करते हुए नहीं देखा जाता है। 

निश्चित रूप से यहाँ कृषि कार्य केवल शूद्र वर्ण का विधान है। इसकी पुष्टि - नृसिंह पुराण अध्याय 58 के 11 वें श्लोक से होती है-
दासवद्ब्राह्मणानां च विशेषेण समाचरेत् । अयाचितं प्रदातव्यम् कृषिं वृत्यर्थमाचरेत्।।११।
अनुवाद:-
 शूद्र व्यक्ति दासों के समान ब्राह्मणों की विशेष रूप से सेवा करे  और विना कुछ माँगे हुए अपनी ही सम्पत्ति का दान करना चाहिए और जीविका उपार्जन के लिए कृषि कर्म करे।११।

परन्तु व्यास, पराशर और वैजयन्ती कोश में एक और कृषि वर्ग का उल्लेख है जिन्हें ‘कुटुम्बी’ कहा गया है। जिन्हें शूद्रों के अन्तर्गत रखा गया है।
इसी काल में एक और वर्ग कीनाश का उल्लेख आता है जो कीनाश वैश्य थे किन्तु आठवीं शताब्दी के नारद स्मृति के टीकाकार ने कीनाशों को शूद्र बताया है।
परन्तु कोई वणिक कभी कृषि कार्य करते हुए नहीं देखा सिवाय व्यापार के।

फिर भी व्यास स्मृति में वणिक और गोप को शूद्र रूप में वर्णन सिद्ध करता है कि द्वेष और रोष के आवेश में पुरोहित वर्णव्यवस्था की मर्यादा भी भूल गये अन्यथा वणिक् शब्द जो स्वयं वैश्य का पर्याय है। उसको शूद्र धर्मी  कभी न कहते। सायद यही कारण है कि-

किसान जो भारत के सभी समाजों के लिए अन्न का उत्पादन करता है और पशुपालन के द्वारा दुग्ध सबको उपलब्ध कराता है ;वही किसान जो जीवन के कठिनतम संघर्षों से गुजर कर भी अनाज उत्पन्न करता है तथा 
दृढ़ता और धैर्य पूर्वक वीरता के गुणों से समन्वित होकर कृषि कार्य करता है। उसे कभी शूद्र तो कभी वैश्य वृत्ति से जोड़ा गया।

किसान से शक्तिशाली और जीवन का बलिदान करने वाला सायद ही कोई दूसरा इस संसार में है।
परन्तु उसके बलिदान का कोई प्रतिमान और ना कोई मूल्य है। फिर भी किसान जो कभी वाणिज्यिक गतिविधियों से अलग थलग ही रहता है , कभी बेईमानी नही करता कभी ठगाई नहीं करता और वणिक जिसे कभी हल चलाते और फसल उगाते नहीं देखा सिवाय ठगाई और व्यापार के फिर दोनों विरोधी समुदायों एक ही वर्ण में क्यों जोड़ा गया।
किसान और वणिक को वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत  समान रूप में परिभाषित करने वाले धूर्तों ने किसान को शूद्र और वैश्य के हल न पकड़ने के विधान बना डाले और अन्ततः वणिक को शूद्र वर्ण में समायोजित कर दिया है। 




ग्राम संस्कृति किसानों की देन है -:

व्याकरणिक दृष्टिकोण से ग्राम शब्द संस्कृत की ग्रस् …धातु मूलक है..—(ग्रस् मन् ) प्रत्यय..आदन्तादेश..ग्रस् धातु का ही अपर रूप ग्रह् भी है । जिससे गृह शब्द का निर्माण हुआ है अर्थात् जहाँ खाने के लिए मिले वह घर है ।
इसी ग्रस् धातु का वैदिक रूप… गृभ् …है ; गृह ही ग्रास है

ज्ञात हो आर्य और 'वीर' शब्द का विकास परस्पर समानता मूलक है। दोनों शब्दों की व्युपत्ति पर एक सम्यक् विश्लेषण -
कुसीदकृषिवाणिज्यं पाशुपाल्यं विशः स्मृतम् ॥शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा द्विजो यज्ञान्न हापयेत् ।96.28॥
(गरुड़ पुराण)
श्रीगरुड महापुराण पूर्वखण्ड प्रथमांशाख्य आचारकाण्ड याज्ञवल्क्योक्तश्राद्धनिरूपणं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥96॥

भारतीय इतिहास ही नहीं अपितु विश्व इतिहास यह उद्घोषणा करता है। कि
कुशल चरावाहों के रूप में सम्पूर्ण एशिया की धरा पर अपनी महान सम्पत्ति गौओं के साथ कबीलों के रूप में यायावर जीवन व्यतीत करने वाले आर्य ही कृषक  थे ।
यहीं से इनकी ग्राम - सभ्यता का विकास हुआ था जो अपनी गौओं के साथ साथ विचरण करते हुए ये चरावाहे जहाँ जहाँ भी ये विशाल ग्रास-मेदिनी (घास के मैदान) देखते उसी स्थान पर अपना पढ़ाव डाल देते थे। इनके ये पड़ाव स्थाई होते गये और  उसी प्रक्रिया के तहत बाद में कालान्तर ग्राम संस्कृति का जन्म व विकास हुआ। ग्राम शब्द (आभीर-पल्लि या गाँव) शब्द का वाचक हो गया।

पं० महावीर प्रसाद द्विवेदी अपनी ऐतिहासिक पुस्तक "अतीत की स्मृति" में प्रमाणों से समन्वित होकर आर्य शब्द का मूल अर्थ कृषक ही लिखते हैं।
"प्राचीन वैश्यों का प्रधान कार्य कर्षण( खेत जोतना- और बौना ही था। 

अतएव "आर्य" शब्द का अर्थ कृषक कहना युक्ति-विरहित नही। किसी किसी का मत है कि "आर्य" का अर्थ आरि धारण करने वाला है। ज्ञात हो कि आरि ( पशुओं को विशेषत: बैलों को नियन्त्रित करने वाले शस्त्र का नाम था- 
अरि ( हल ) और आर ( पशुओं का नियन्त्रण करने वाला यन्त्र) धारण करने वाला ही आर्य था।

वर्ण-व्यवस्था के निर्माण काल में गोपालन और कृषि को निम्न मानते हुए वैश्य वर्ण में समायोजित किया और पशुपालन और कृषि न करने वाले व्यापारीयों को भी कृषि और पशु पालन वृत्ति में जोड़ दिया।

आर्य शब्द का व्युत्पत्ति मूलक अर्थ वीर अथवा युद्ध के देवता अरि: से सम्बंधित होने के कारण दृढ़ता और धैर्य मूलक प्रवृत्ति होने के कारण श्रेष्ठ व्यक्ति के अर्थ में भी रूढ़ होकर कर्मवीर और धर्मवीर आदि का पर्याय हुआ।
 दृढ़ता और धैर्य वीरों का और कृषकों का ही समान मौलिक गुण (प्रवृत्ति) है।

श्रेष्ठ पुरुष तथा श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न विशेषत:—स्वामी, गुरू और सुहद् आदि को संबोधन करने में भी इस आर्य शब्द का व्यवहार नाट्यशास्त्र में  होने लगा । छोटे लोग बड़े को सम्बोधित करते हुए आर्य का प्रयोग करते , —स्त्री पति को सम्बोधित करते हुए आर्य शब्द का प्रयोग करती, और छोटा भाई बड़े भाई को, शिष्य गुरु का आर्य या आर्यपुत्र कहकर संबोधित करते हैं ।
नाटकों में भी नटी भी सूत्रधार को आर्य या आर्यपुत्र कहती है।

ज्ञात हो- पाश्चात्य नाट्यशास्त्र में नायक का वाचक हीरो (Hero) आर्य शब्द का ही रूपान्तरण है।
 
आपने हेरो (Harrow) शब्द भी सुना होगा और हल दोनों का श्रोत ऋ-अर्-हिंसागतियो: धातु प्रसिद्ध ही है।

 
इतना सबकुछ होने के बाद भी कृषकों का सामाजिक स्तर शास्त्र वेत्ता ब्राह्मण की दृष्टि में निम्न ही बना रहा है। जबकि 
हिन्दू धर्म की नीतियों का पालन करने वाले कितने किसान स्वयं को क्षत्रिय मानते हैं इस पर भी विचार कर लेना आवश्यक है।




  

रविवार, 19 जनवरी 2025

रास का प्रकरण पूरा हुआ नीचे देखें ⭕👇

     [१]- हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य :-

हल्लीसं और 'रास' नृत्य को जानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि हल्लीसं क्या है और इसका मतलब क्या है ? तभी हल्लीसं और 'रास' नृत्य को अच्छी तरह से समझा जा सकता है।
        हल्लीषम् शब्द की ब्युत्पत्ति को देखा जाए तो -
हल्लीषम् शब्द के मूल में निहित हल धातु का मूल अर्थ-
हलहल्लीषम् -विलेखे भ्वादिगणीय परस्मैपदीय सकर्म सेट् धातु से- हलति अहालीत् आदि क्रिया रूप में दृष्टिगोचर होता है-
हलः हालः-  हल्यते कृष्यतेऽनेन  इति हल्+ घञर्थे करणे (क)। लाङ्गल ( हल) अमरः कोश।
हल वह यन्त्र जिससे कृषि कार्य किया जाए और ईषा- हलयुगयोर्मध्यमकाष्ठे (लाङ्गलदण्डे)वा हल के मध्य में लकड़ी का दण्ड - हल और ईषा इन दोनों शब्दों से तद्धित शब्द बनता है- हल्लीषा- हल्लीषक। 

अर्थात् कृषि कार्य हेतु वह यंत्र जिसके दो भाग- हल्लीषा यानी हरिष और हल्लीषक यानी हत्था होते हैं। जिसमें हरीश लकड़ी का एक लम्बा दंड होता है तथा उसी में लगा लकड़ी का एक हल्लीषक (हत्था) होता है जिसे हाथ से  पकड़ कर किसान खेतों की जुताई करते हैं। इसके संयुक्त रूप को ही हल कहा जाता है।
इसकी खोज द्वापरयुग में बलराम जी द्वारा खेतों की जुताई और फसलों की मड़ाई के लिए मूशल तथा युद्ध के समय शस्त्र के लिए किया था। इस लिए उनका एक नाम हालधर हुआ जो आज हलधर चित्र और नाम दोनों ही किसानों का प्रतीक है।
बलराम जी द्वारा हल और मूशल की खोज किए जाने के बाद उस युग में कृषि क्षेत्र में क्रांति आई। सभी गोप किसान  हल को खुशियों और क्रांति का देवता मानकर प्रमुख त्योहारों और उत्सवों पर हल और मूशल को भूमि पर रखकर उसके ईषा (दण्ड) के समानान्तर दृश्य में मण्डलाकार आकृति में नृत्य किया करते थे। तभी से इस विशेष नृत्य का नाम हल्लीषा हुआ।

 हल्लीषा नृत्य की पुष्टि हरिवंशपुराण- विष्णुपर्व /अध्याय- 89/ श्लोक- 68 से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
"जग्राह वीणामथ नारदस्तु षड्ग्रामरागादिसमाधियुक्ताम्।
हृल्लीसकं तु स्वयमेव कृष्णः सवंशघोषं नरदेव पार्थः।६८। 
अनुवाद:-
उस समय नारद ने तो अपनी वीणा ग्रहण की जो छ: ग्रामों पर आधारित राग आदि के द्वारा चित्त को एकाग्र करने वाली थी।  नरदेव ! स्वयं श्रीकृष्ण ने तो अपनी मुरली (वंशी) के घोष द्वारा हल्लीसक नृत्य का आयोजन किया।६८
उपरोक्त श्लोकों से सिद्ध होता है कि हल्लीसक अहीरों का सांस्कृतिक नृत्य है। जिसके जनक श्रीकृष्ण और संकर्षण हैं। 
इसके अतिरिक्त गोप किसान शादी-विवाह के शुभ अवसरों पर हल, मूशल और ओखली को मण्डप में रखकर शुभ कार्य को सम्पन्न करते थे तथा विशेष आगंतुकों का स्वागत   अन्न, दही और मूशल से परीछन कर करते थे। जो आज भी भारतीय संस्कृति में यह विधान देख जाता है जो गोपों की ही देन है।
 
हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य में कोई विशेष अंतर नहीं है। देखा जाए तो हल्लीसं शरीर है तो रास उसकी आत्मा है। 
हल्लीसं आनन्द है तो रास परमानन्द है। अर्थात् जब गोप और गोपियां श्रीकृष्ण को केंद्र बिंदु मानकर हल्लीसं नृत्य करते-करते श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम विभोर होकर परम रस का आनन्द लेने लगते थे तब वहीं हल्लीसं नृत्य रास में बदल जाता था। कुल मिलाकर "हल्लीसं" रास का प्राथमिक स्तर है तथा उसका विस्तार "रास" है जहां पर केवल परमानन्द की अनुमति होती है। जिसमें गोप और गोपियां कृष्ण को केंद्र बिंदु मानकर उनकी परिधि में मुरली की धुन पर थिरकती अथवा हल और ईषा की आकृति में वृत्ताकार नर्तन करती हुई परमानन्द की अनुभूति करतीं थीं। 

 गोपेश्वर श्रीकृष्ण इस तरह की रास अपने गोप-गोपियों के साथ गोलोक और भूलोक दोनों जगहों पर अक्सर किया करते हैं। किंतु दुर्भाग्य है कि रास के इस गूढ़ रहस्य को कम ही लोग जानते हैं और अज्ञानता वश इसकी गलत व्याख्या करते हैं।

ज्ञात हो - श्रीकृष्ण रास क्रीड़ा का आयोजन अधिकांशतः मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को या कार्तिकी पूर्णिमा की आधी रात के समय किया करते थे। इस लिए इन दोनों समयों में की जाने वाली रास लीला को ही मोक्षदायिनी माना गया है। इसकी पुष्टि - 
श्रीमद्देवी भागवत पुराण के अध्याय- (३०) के श्लोक - ८५ से ८९ से होती है। जिसमें कार्तिक पूर्णिमा की रास लीला को मोक्षदायिनी बताया गया है - 

कार्तिकीपूर्णिमायां च कृत्वा तु रासमण्डलम् ।
गोपानां शतकं कृत्वा गोपीनां शतकं तथा॥ ८५
शिलायां प्रतिमायां च श्रीकृष्णं राधया सह।
भारते पूजयेद्‍भक्त्या चोपचाराणि षोडश॥ ८६
गोलोके वसते सोऽपि यावद्वै ब्रह्मणो वयः।
भारतं पुनरागत्य कृष्णे भक्तिं लभेद्‌दृढाम्॥ ८७
क्रमेण सुदृढां भक्तिं लब्ध्वा मन्त्रं हरेरहो ।
देहं त्यक्त्वा च गोलोकं पुनरेव प्रयाति सः॥ ८८
ततः कृष्णस्य सारूप्यं पार्षदप्रवरो भवेत् ।
पुनस्तत्पतनं नास्ति जरामृत्युहरो भवेत्॥ ८९

अनुवाद- ८५-८९
जो भारतवर्ष में कार्तिक पूर्णिमा को सैकड़ों गोपों तथा गोपियोंको साथ लेकर रासमण्डल - सम्बन्धी उत्सव मनाकर शिलापर या प्रतिमा में सोलहों प्रकारके पूजनोपचारों से भक्तिपूर्वक राधा सहित श्रीकृष्ण की पूजा सम्पन्न करता है, वह ब्रह्माजी के स्थिति पर्यन्त गोलोक में निवास करता है। तथा पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर वह श्रीकृष्ण की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है। तव वह भगवान् श्रीहरि की क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मन्त्र प्राप्त करके देह त्यागके अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहां श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है। तब पुनः वहां से उसका पतन नहीं होता, वह जरा तथा मृत्युसे सर्वथा रहित हो जाता है। ८५-८९।
अतः उपरोक्त संदर्भों से ज्ञात होता है कि हल्लीसं एवं 'रास' नृत्य गोपों की संस्कृति रही है। जिसकी छाप आज भी आध्यात्म से लेकर साधारण जनमानस तक देखी जाती है।

शनिवार, 18 जनवरी 2025

क्या ब्राह्मण कपिला गाय से उत्पन्न हुए-

अमृतं ब्राह्मणा गावो गन्धर्वाप्सरसस्तथा।
अपत्यं कपिलायास्तु पुराणे परिकीर्तितम्।1-66-52।

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्यायः।।66।।

अनुवाद:-अमृत, ब्राह्मण, गौऐं गन्धर्व तथा अप्सराऐं- ये सब पुराण में कपिला गायों की ही संतानें वतायी गयी हैं।

अर्थात अप्सराऐं और ब्राह्मण दोनो कपिला गाय की सन्तानें हैं तो अप्सराऐं ब्राह्मणों की बहिने हुईं 
यदि अप्सराऐं स्वर्ग की वेश्याऐं हैं तो वे ब्राह्मणों की बहिने ही हैं।



देवीभागवतपुराण /स्कन्धः ०९/अध्यायः ४९

देवीभागवतपुराणम्‎ | स्कन्धः -९
सुरभ्युपाख्यानवर्णनम्

               "नारद उवाच
का वा सा सुरभिर्देवी गोलोकादागता च या।
तज्जन्मचरितं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि यत्‍नतः ॥ १ ॥

              "श्रीनारायणाय उवाच
गवामधिष्ठातृदेवी गवामाद्या गवां प्रसूः ।
गवां प्रधाना सुरभिर्गोलोके सा समुद्‍भवा ॥२॥

सर्वादिसृष्टेश्चरितं कथयामि निशामय ।
बभूव तेन तज्जन्म पुरा वृन्दावने वने ॥ ३ ॥
देवी भागवत महापुराण ( देवी भागवत)

स्कन्ध 9, अध्याय 49 - 
 
आदि गौ सुरभिदेवीका आख्यान
नारदजी बोले - हे ब्रह्मन् ! गोलोकसे जो सुरभिदेवी आयी थीं, वे कौन थीं ? मैं ध्यानपूर्वक उनका जन्मचरित्र सुनना चाहता हूँ ॥ 1 ॥

श्रीनारायण बोले- [हे नारद!] वे देवी सुरभि गोलोकमें प्रकट हुईं। वे गौओंकी अधिष्ठात्री | देवी, गौओंकी आदिस्वरूपिणी, गौओंकी जननी तथा गौओंमें प्रधान हैं। मैं सभी गौओंकी आदिसृष्टिस्वरूपा उन सुरभिके चरित्रका वर्णन कर रहा हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनिये। पूर्वकालमें वृन्दावनमें सुरभिका प्रादुर्भाव हुआ था ॥ 2-3॥




अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका तथा।
क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनिः।
12।

प्राधा- कश्यप की एक स्त्री और दक्ष की एक कन्या का नाम। विशेष—पूराणों में इसे गंधवों और अप्सराओं की माता बतलाया गया है।
अरिष्टा:- कश्यप ऋषि की स्त्री और दक्ष प्रजापति की पुत्री जिससे गंधर्व उत्पन्न हुए थे । 

मत्स्यपुरण में वर्णन है कि देवक्षत्र यादव के पुत्र मधु ने मधुपुर (मथुरा) नगरी बसायी- यही मत्स्य पुराण का वर्णन वास्तविक है।

मत्स्यपुरण में वर्णन है कि देवक्षत्र यादव के पुत्र मधु ने मधुपुर (मथुरा) नगरी बसायी- यही मत्स्य पुराण का  वर्णन वास्तविक है।

  • "यदोर्वंशस्यान्तर्गते देवक्षत्रस्यमहातेजा पुत्रो मधु: तस्यनाम्ना मधोः पुर वसस्तथा। आसीत् पुरवसः पुत्रः पुरुद्वान् पुरुषोत्तमः।४४।

(मत्स्य- पुराण अध्याय- 44 श्लोक- 44)

अनुवाद:-"मथुरा का पूर्व नाम मधुपर था।  यादव राजा देवक्षत्र के पुत्र मधु के नाम पर यह नाम प्रचलित हुआ" यही वास्तविकता है। हरिवंश पुराण में मधुरा को शत्घ्न से जोड़ना क्षेपक ही है।

मत्स्य पुराण के अनुसार यादव राजा  देवक्षत्र के पुत्र मधु थे । मधु ने ब्रजभूमि में यमुना नदी के दाहिने किनारे पर एक राज्य की स्थापना की, जिसका नाम उनके नाम पर मधुपुर रखा गया। बाद में इसे मथुरा के नाम से जाना गया । उनसे पुरवस नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । ये पुरवस बाद वाले पुरुद्वान के पिता थे । पुरुद्वान् का जन्तु नाम का एक पुत्र था । जंतु (अँशु) की पत्नी ऐक्ष्वाकि से सात्वत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । सात्वत मधु के पांचवें उत्तराधिकारी थे। सात्वत के उत्तराधिकारियों को भी सात्वत के नाम से ही जाना जाता था । सात्वत के पुत्र भजिन, भजमान ,दिव्य , देववृध, अन्धक , महाभोज , वृष्णि आदि थे।

_____

  • आसीत्कुरुवशात्पुत्रः पुरुहोत्रः प्रतापवान्अंशुर्जज्ञेथ वैदर्भ्यां द्रवंत्यां पुरुहोत्रतः।२८।

28. कुरुवश से एक वीर पुत्र पुरुहोत्र का जन्म हुआ। पुरुहोत्र से वैदर्भी नामक पत्नी में अंशु नामक पुत्र हुआ।

📚:

  • वेत्रकी त्वभवद्भार्या अञ्शोस्तस्यां व्यजायत७सात्वतः सत्वसम्पन्नः सात्वतान्कीर्तिवर्द्धनः।२९।

29-. अंशु की पत्नी वेत्रकी से सात्वत हुआ जो ऊर्जा से संपन्न और बढ़ती प्रसिद्धि वाला था।

  • इमां विसृष्टिं विज्ञाय ज्यामघस्य महात्मनःप्रजावानेति सायुज्यं राज्ञः सोमस्य धीमतः।३०।

30- महाराज ज्यामघ की इन संतानों को जानकर कोई भी सन्तान वाला व्यक्ति पुत्र जोड़कर, सोम के साथ एक रूपता प्राप्त करता है।

  • "सात्वतान्सत्वसंपन्ना कौसल्यां सुषुवे सुतान्तेषां सर्गाश्च चत्वारो विस्तरेणैव तान्शृणु।३१।

31-. कौशल्या में सत्व सम्पन्न सात्वत से चार पुत्रों को जन्म हुआ उन्हें विस्तार से सुनो

×××××××××

  • कुकुरं भजमानं च श्यामं कंबलबर्हिषम्कुकुरस्यात्मजो वृष्टिर्वृष्टेस्तु तनयो धृतिः।४५।

45- ये चार पुत्र थे (कुकुर , भजमान, श्याम और कम्बलबर्हिष) । कुकुर के पुत्र वृष्टि हुए और वृष्टि के पुत्र धृति थे।

"सात्वत वंश के यादव"

📚: सात्वत् (सात्वत्)। - यदु वंश के एक राजा और देवक्षत्र के पुत्र थे। सात्वत के सात पुत्र थे जिनमें -भज, भजी, दिव्य, वृष्णि, देववृध,अन्धक और महाभोज शामिल थे।

गुरुवार, 16 जनवरी 2025

गोगोमहिष्यादिकं यदूनामिदं यादवं स्यात् गवादि यादवं वित्तं- इति बोपपालित कोश - आर्य और कृषक तथा पश-ु पालक समानार्थक शब्द हैं।

गोप- आभीर जाति का ही एक गोपालन वृत्ति ( व्यवसाय) मूलक विशेषण है। इसी आभीर( आहीर) जाति के  अन्य पर्यायवाची निम्न लिखित हैं।
(अमरकोश द्वितीय काण्ड)
संस्कृत के प्राचीन  बोपपालितकोश में यादवों की सम्पत्ति और धन गायों को बताया गया है। गाय भैंस आदि यादवों का (वित्त) धन है। 
(बोपपालितकोश)-

गोपों के यादव होने के सन्दर्भ कई पुराणों में स्पष्ट  रूप से प्राप्त होते हैं।


अनुवाद:-
अतएव मर्यादा की रक्षाके लिये ब्रह्माजी ने भी अपने परमप्रिय पौत्र मुनिश्रेष्ठ कश्यपको शाप दे दिया ।१५।
कि तुम अपने अंश से पृथ्वी पर यदुवंशमें जन्म लेकर वहाँ अपनी दोनों पत्नियों के साथ गोपालन का कार्य करोगे ।१६।

श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां सहितायां ॥ 
चतुर्थस्कन्धे कर्मणो जन्मादिकारणत्वनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः।२।

तथा श्री मद्देवी भागवत पुराण के इसी चतुर्थ स्कन्ध के तृतीय पाठ में आगे भी यादवों के गोपालन का वर्णन है।

           (दित्या अदित्यै शापदानम्)

                "व्यास उवाच
"कारणानि बहून्यत्राप्यवतारे हरेः किल ।
सर्वेषां चैव देवानामंशावतरणेष्वपि ॥१॥

वसुदेवावतारस्य कारणं शृणु तत्त्वतः।
देवक्याश्चैव रोहिण्या अवतारस्य कारणम् ॥२॥

एकदा कश्यपः श्रीमान्यज्ञार्थं धेनुमाहरत् ।
याचितोऽयं बहुविधं न ददौ धेनुमुत्तमाम् ॥३॥

वरुणस्तु ततो गत्वा ब्रह्माकिंणं जगतः प्रभुम् ।
प्रणम्योवाच दीनात्मा स्वदुःखं विनयान्वितः॥४॥

करोमि महाभाग मत्तोऽसौ न ददाति गाम् ।
शापो मया विसृष्टोऽस्मै गोपालो भव मानुषे॥ ५॥


अनुवाद:-व्यासजी बोले - [ हे राजन् ! ] भगवान् विष्णु के विभिन्न अवतार ग्रहण करने तथा इसी प्रकार सभी देवताओं के भी अंशावतार ग्रहण करने के बहुतसे कारण हैं ॥1॥

अब वसुदेव, देवकी तथा रोहिणी के अवतारों का कारण यथार्थ रूप से सुनिये ॥2॥

एक बार महर्षि कश्यप यज्ञकार्यके लिये वरुणदेवकी गौ ले आये। [ यज्ञ-कार्यकी समाप्तिके पश्चात्] वरुणदेवके बहुत याचना करनेपर भी उन्होंने वह उत्तम धेनु वापस नहीं दी ॥3॥
तत्पश्चात् उदास मनवाले वरुणदेव ने जगत्के स्वामी ब्रह्माके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक उनसे अपना दुःख कहा ॥4॥

हे महाभाग ! मैं क्या करूँ? वह अभिमानी कश्यप मेरी गाय नहीं लौटा रहा है। अतएव मैंने उसे शाप दे दिया कि मानवयोनि में जन्म लेकर तुम गोपाल(अहीर) हो जाओ ।5॥

(देवीभागवतपुराण /स्कन्धः ४/अध्यायः ३)

ब्रह्मापि तं शशापाथ कश्यपं मुनिसत्तमम् ।
मर्यादारक्षणार्थं हि पौत्रं परमवल्लभम् ॥१५॥

                    "व्यास उवाच
एवं शप्तः कश्यपोऽसौ वरुणेन च ब्रह्मणा ।
अंशावतरणार्थाय भूभारहरणाय च ॥१७ ॥

तथा दित्यादितिः शप्ता शोकसन्तप्तया भृशम् ।
जाता जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै ॥१८॥ 

अनुवाद:- अतएव मर्यादाकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने भी अपने परमप्रिय पौत्र मुनिश्रेष्ठ कश्यपको शाप दे दिया ।15।

कि तुम अपने अंशसे पृथ्वी पर यदुवंश में जन्म लेकर वहाँ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ गोपालन का कार्य करोगे ।।16।।

व्यासजी बोले- इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वीका बोझ उतारने के लिये वरुणदेव तथा ब्रह्माजी ने उन महर्षि कश्यप को शाप दे दिया था ॥17॥

उधर कश्यपकी भार्या दितिने भी अत्यधिक शोकसन्तप्त होकर अदितिको शाप दे दिया कि क्रमसे तुम्हारे सातों पुत्र उत्पन्न होते ही मृत्यु को प्राप्त हो जायँ ॥18॥
_______
इस प्रकार शाप और वरदान के माध्यम से भी यदुवंश की गाथाओं का आख्यानों में  समायोजित किया गया।

गोपालक (पुरूरवा) की पत्नी आभीर कन्या उर्वशी का प्रचीन प्रसंग का विवरण भी यही  सिद्ध करता है कि अधिकतर ईश्वरीय शक्तियों का अवतरण अहीर जाति में ही हुआ। जो कला और ज्ञान के अद्भुत समन्वयी रूप थे।

गायत्री अहीरों की सबसे विदुषी और कठिन व्रतों का पालन करने वाली प्रथम कन्या सिद्ध होती हैं।

इसी लिए स्वयं विष्णु भगवान ने ब्रह्मा के यज्ञ-सत्र में गायत्री की भूरि -भूरि प्रशंसा की है।
गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता पद पर नियुक्त किया गया। 
संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।
गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम गोविल है  जो गोलोक से अवतरित होकर आनर्त (गुजरात) देश में निवास करते थे क्योंकि यह देश उस समय गायों के निवास करने का ही स्थान था।

गायत्री के पिता और माता का गोविल- और गोविला- नाम उनके  गायों से सम्बन्धित गौलौकीय अवधारणा को पुष्ट करता हैं। यह हम पूर्व में ही बता चुके हैं कि -

 अत: पद्मपुराण सृष्टि खण्ड में गायत्री का दुहिता सम्बोधन भी प्राप्त है।

भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में आज तक ग्रामीण क्षेत्र में लड़की ही गाय-भैंस का दूध दुहती है। यह उसी परम्परा अवशेष हैं।


गायत्री को ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता पद पर नियुक्त किया गया। संसार का सम्पूर्ण ज्ञान गायत्री से नि:सृत होता है।
गायत्री की माता का नाम "गोविला" और पिता का नाम नन्दसेन/अथवा नरेन्द्र सेन आभीर था। जो आनर्त (गुजरात) में निवास करते थे
पद्म पुराण सृष्टि खण्ड में गायत्री का एक प्रसंग है जिसमें वह कहती हैं।
"मत्कृते येऽत्र शापिता शावित्र्या ब्राह्मणा सुरा:। तेषां अहं करिष्यामि शक्त्या साधारणां स्वयम्।।७।।
"अनुवाद:-मेरे कारण ये ब्राह्मण और देवगण सावित्री के द्वारा शापित हुए हैं‌। उन सबको मैं (गायत्री) अपनी शक्ति से साधारणत: पूर्ववत् ( पहले जैसा) कर दुँगी।।७।।

किसी के द्वारा दिए गये शाप को 
समाप्त कर उसे समान्य करना और समान्य
को फिर वरदान में बदल देना अर्थात जो शापित थे उनको वरदान देना
यह कार्य आभीर कन्या गायत्री के द्वारा
ही सम्भव हो सका ।  
अन्यथा कोई देवता किसी अन्य के द्वारा दिए गये शाप का शमन कभी  नहीं कर सकता है।

ब्रह्मा ने अपनी सृष्टि रचना के पश्चात यह अपना  प्रथम यज्ञ सत्र प्रारम्भ किया था।

 जिसमें अपने द्वारा उत्पन्न चारों वर्णो के लोगों, ,देवगण, सप्तर्षि
आदि को आमन्त्रित किया था। 
परन्तु ब्रह्मा के इस यज्ञ समारोह में गोपगण उपस्थित नहीं थे। 

क्योंकि गोप ब्रह्मा की सृष्टि का अंग  नहीं थे । ये मनुष्य गण गोलोक में ही स्वराट विष्णु ( द्विभुज धारी) कृष्ण के लोम(रोम) कूपों से उत्पन्न हैं। 

विशेष:- गोपों को ही संसार में धर्म का आदि प्रसारक माना गया है। ऋग्वेद में वर्णित है कि भगवान विष्णु गोप रूप में धर्म को धारण किये हुए हैं।

आभीर लोग प्राचीन काल से ही व्रती, धर्म वत्सल और सदाचार सम्पन्न होते थे।
स्वयं भगवान् विष्णु ने सतयुग में भी अहीरों के समान किसी अन्य जाति को व्रती और सदाचारीयों में सम्पन्न न जानकर अहीरों को ही सदाचार सम्पन्न और धर्मवत्सल स्वीकार किया था।

और इसी कारण से विष्णु ने अपना अवतरण भी इन्हीं अहीरों की जाति में लेना स्वीकार किया।

विष्णु सनातन गोप हैं , वैदिक ऋचाओं में विष्णु का गोप होना सर्वविदित ही है।
____________________


हम बात करते हैं पद्मपुराण सृष्टि खण्ड के अध्याय-17 में वर्णित- अहीरों की जाति में भगवान कृष्ण के रूप में विष्णु के निम्नलिखित तीन श्लोकों की :- जिसमें प्रथम श्लोक में अहीरों को धर्मतत्व का ज्ञाता होना तथा सदाचारी होना सूचित किया गया है इसके बाद के श्लोकों में गायत्री के द्वारा आभीर जाति का उद्धार करने वाला बताया और तृतीय श्लोक में विष्णु द्वारा अपने अवतरण की स्वीकृति अहीरों को दे दी गयी थी।

ये तीनों बाते हीं सिद्ध करती हैं कि अहीरों की जाति सबसे प्राचीन और पवित्र है जिसमें स्वयं भगवान विष्णु अवतरण करते हैं।

पद्मपुराण सृ्ष्टिखण्ड के (१७) वें अध्याय के निम्न लिखित श्लोकइस सन्दर्भ में विचारणीय है।

___________________________________
"अनया गायत्र्या तारितो गच्छ युवां भो आभीरा ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६।

"
अनुवाद -विष्णु ने अहीरों से कहा मैंने तुमको धर्मज्ञ, धार्मिक, सदाचारी तथा धर्मवत्सल जानकर तुम्हारी इस गायत्री नामकी कन्या को ब्रह्मा के लिए यज्ञकार्य हेतु पत्नी रूप में दिया है। (क्योंकि यज्ञ एक व्रतानुष्ठान ही है)।
और अहीर कन्याऐं सदैव कठिन व्रतों का पालन करती रहती हैं।

हे अहीरों ! इस गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब लोग ! दिव्यलोकों को जाओ- और तुम्हारी अहीर जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों की कार्य की सिद्धि के लिए मैं  अवश्य अवतरण करुँगा (अवतारं करिष्येहं ) और वहीं मेरी सांसारिक लीला (क्रीडा) भी होगी जब धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।

निष्कर्ष:- उपर्युक्त श्लोकों में भगवान विष्णु संसार में अहीरों को ही सबसे बड़े धर्मज्ञ ' धर्मवत्सल,सदाचारी और सुव्रतज्ञ (अच्छे व्रतों को जानने वाला ) मानते हैं और इसी लिए उनका सांसारिक कल्याण करने के लिए उनकी ही अहीर जाति में अवतरण करते हैं।

गोप लोग विष्णु के शरीर से उनके रोमकूपों से उत्पन्न होते हैं। अत: ये वैष्णव जन हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं-

ब्रह्मवैवर्तपुराण में लिखा है कि वैष्णव ही इन अहीरों का वर्ण है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण एकादश -अध्याय श्लोक संख्या (४१)
निम्नलिखित श्लोक में ब्राह्मण" क्षत्रिय" वैश्य" और शूद्र वर्ण के अतिरिक्त एक स्वतन्त्र जाति और वर्ण भी माना गया है। जिसे वैष्णव नाम दिया गया है। जो विष्णु से सम्बन्धित अथवा उनके रोमकूपों से उत्पन्न है।

"विष्णुर्देवताऽस्य तस्येदं वा अण् वैष्णव -विष्णु-उपासके विष्णोर्जातो इति वैष्णव विष्णुसम्बन्धिनि च स्त्रियां ङीप् वैष्णवी- दुर्गा, गायत्री आदि।
___________________
अनुवाद:-ब्राह्मण' क्षत्रिय 'वैश्य और शूद्र जो चार जातियाँ( वर्ण) जैसे इस विश्व में हैं वैसे ही वैष्णव नाम कि एक स्वतन्त्र जाति  (वर्ण )भी इस संसार में है ।४३।

वैष्णव वर्ण ब्रह्मा के द्वारा निर्मित चार वर्णों से श्रेष्ठ व पृथक इसलिए है । वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत गोप लोगों का व्यवसाय गोपालन और कृषि के अतिरिक्त १-युद्ध करना - २-ज्ञान देना और ३- दीन और वञ्चितों की सेवा करना भी है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में स्वयं गोपों के नायक श्रीकृष्ण ने भोजन के उपरान्त पत्तले भी उठाईं थी और आगन्तुकों के चरणों को भी पखारा या धोया था।

अर्थात ब्राह्मी वर्णव्यवस्था के सभी वर्णों के काम अकेले गोपों ने ही कर दिया था।
यदि गोप ब्राह्मी वर्णव्यवस्था के अन्तर्गत होते तो गो पालक होने से नारायणीयम् सेना के योद्धा कभी नहीं होते ! क्योंकि ब्राह्मी वर्णव्यवस्था में एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण के व्यक्ति के व्यवसाय ( कार्य)को  कभी नहीं कर सकता है। वैष्णव वर्ण इसी कारण सभी वर्णों से श्रेष्ठ है।

विष्णु का परम पद, परम धाम दिव्य- आकाश में स्थित एवं सूर्य के समान देदीप्यमान माना गया है -
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम् ॥२०॥

देवता — विष्णुः ; छन्द — गायत्री;
स्वर — षड्जः; ऋषि — मेधातिथिः काण्वः
(सूरयः) बहुत से सूर्य (दिवि) आकाश में (आततम्) फैले हुए (चक्षुरिव) नेत्रों के समान जो (विष्णोः) विष्णु भगवान् ! (परमम्) उत्तम से उत्तम (पदम्) स्थान को ! (तत्) उसको (पश्यन्ति) देखते हैं॥20॥(ऋग्वेद १/२२/२०)।

इसी प्रकार का वर्णन भविष्य पुराण में भी ऋग्वेद का उपर्युक्त श्लोक है।

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।।
दिवीव चक्षुराततम् ।।१९।।
भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) के उस अविनाशी परमधाम गोलोक का सूर (ज्ञानी जन) निरन्तर दर्शन करते रहते हैं। आकाश में सूर्य के सदृश वे (भगवान्) परम व्योम में चतुर्दिक् संव्याप्त एवं प्रकाशस्वरूप विद्यमान हैं ।।१९।

पीतवस्त्रेण कृष्णाय श्वेतवस्त्रेण शूलिने।।
कौसुम्भवस्त्रेणाढ्येन गौरीमुद्दिश्य दापयेत्।।२०।

पीले वस्त्र के द्वारा कृष्ण के लिए श्वेत वस्त्र के द्वारा  शूलिन ( शिव) के लिए और कौसुम्भ वस्त्र के द्वारा गौरी को लक्ष्य करके दीप- का अर्पण( दान) करना चाहिए । 4.130.२०।।

इति श्रीभविष्ये महापुराण उत्तरपर्वणि श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादे दीपदानविधिवर्णनं नाम त्रिंशदुत्तरशततमोऽध्यायः।।१३०।।

उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥५॥

अर्थानुवाद:-(यत्र) जिसमें (देवयवः) देवों का अन्न( जौ) (नरः) जन (मदन्ति) आनन्दित होते हैं (तत्) उस (अस्य) इस (उरुक्रमस्य) अनन्त पराक्रमयुक्त (विष्णोः) के (प्रियम्) प्रिय (पाथः) मार्ग को (अभ्यश्याम्) सब ओर से प्राप्त होऊँ, जिस परमात्मा के (परमे) अत्युत्तम (पदे) प्राप्त होने योग्य पद में (मधवः) मधुरादि गुणयुक्त पदार्थ का (उत्सः) श्रोत- वर्तमान है (सः, हि) वही (इत्था) इस प्रकार से हमारा (बन्धुः) भाई के समान है ॥५।

"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि।६।

(यत्र) जहाँ (अयासः) स्थित हुईं (भूरिशृङ्गाः) स्वर्ण मण्डित सींगों वाली (गावः)गायें हैं (ता) उन (वास्तूनि) स्थानों को (वाम्) तुम   (गमध्यै) जाने के लिए  (उश्मसि) चाहते हो। जो (उरुगायस्य) बहुत प्रकारों से प्रशंसित (वृष्णः) सुख वर्षानेवाले परमेश्वर का (परमम्) उत्कृष्ट (पदम्) स्थान (भूरिः) अत्यन्त (अव भाति)  प्रकाशित होता है (तत्) उसको (अत्राह) यहाँ ही हम लोग चाहते हैं ॥६॥
______


किसान शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा के
शब्द कृषाण से हुई है। कृष्ण और संकर्षण कृषि संस्कृति के जनक थे। कृष्ण से ही कृषाण शब्द विकसित हुआ है।
वाचस्पत्यम् के अनुसार :
कृषाण- त्रि० कृष—वा० आनक्– कर्षके कृषिशब्दे -

आप्ते के संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोष के अनुसार :
कृषाण  कृष्-आनक्-किकन् वा
(जो कृषि से सम्बन्धित कार्य करे वह किसान है)।

कृष्ण शब्द का धातुमूलक अर्थ - कृषक भी है।
स्वयं कृष्ण कहते हैं कि हम सब कृषक हैं।

               श्रीभगवानुवाच -
कृषीवला वयं गोपाः सर्वबीजप्ररोहकाः ।
 क्षेत्रे मुक्ताप्रबीजानि विकीर्णीकृतवाहनम् ।२६।
_______________
श्रीगर्गसंहितायां गिरिराजखण्डे श्रीनारदबहुलाश्वसंवादे
हरिपरीक्षणं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

भगवान ने कहा: हम गोप किसान हैं। हम सभी प्रकार के बीज बोते हैं। मैंने खेतों में कुछ मोती बोए हैं।२६।


गर्गसंहिता के इसी गिरिराज खण्ड में नन्द को भी कृषक कहा गया है।
जब एक बार कुछ गोप लोग वषभानु के दरबार में उपस्थित होकर नन्द और वृषभानु के वैभव की तुलना करते हैं- तो वे नन्द के विषय में कहते हैं।

त्वत्समं वैभवं नास्ति नन्दराजगृहे क्वचित् ।
कृषीवलो नन्दराजो गोपतिर्दीनमानसः ॥७॥

 यदि नन्दसुतः साक्षात्परिपूर्णतमो हरिः ।
 सर्वेषां पश्यतां नस्तत्परिक्षां कारय प्रभो।।८।

अनुवाद:-
यहाँ तक कि राजा नन्द के घर में भी तुम्हारे समान धन और ऐश्वर्य नहीं है।
अनेक गायों के स्वामी कृषक राजा नन्द तुम्हारी तुलना में दीन-हीन हैं।७।

हे स्वामी, यदि नन्द का पुत्र वास्तव में भगवान है, तो कृपया उसकी परीक्षा लीजिए, जिससे हम सब देखते हुए उसकी दिव्यता प्रकट हो जाएगी।८

गर्गसंहिता-खण्डः (३) (गिरिराजखण्डः)अध्यायः (६)


                "श्रीभगवानुवाच -
कृषीवला वयं गोपाः सर्वबीजप्ररोहकाः ।
 क्षेत्रे मुक्ताप्रबीजानि विकीर्णीकृतवाहनम् ॥


वैदिक शब्द कृषि जो कृषि धान मूलक है उसके लिए भारोपीय परिवार में (केलस्ति) परिकल्पित है।
यह एक भारोपीय मूल का शब्द है। इसका मूल शब्द *kʷéls-e-ti (खीँचना, घसीटना) 

अवेस्तन : 𐬐𐬀𐬭𐬱𐬀𐬌𐬙𐬌 (कर्शति)
फ़ारसी : کشیدن (केशिदान)
आर्मेनियन : քարշ (कर्श)
सन्दर्भ :—
आप्ते का संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोष
विक्शनरी
वाचस्पत्यम्
कृषि की रोमन देवी कौन है ?
सेरेस कृषि की रोमन देवी हैं। वह उर्वरता, गेहूं और मातृ प्रेम की देवी भी हैं। उसका ग्रीक समकक्ष डेमेटर है।

सेरेस नाम का अर्थ क्या है ? फसल की रोमन देवी का नाम प्रोटो-इटैलिक शब्द, (keres) केरेस( कृषि) मूलक  से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'अनाज के साथ'। यह उर्वरता, फसल, गेहूं और कृषि की देवी के रूप में उनकी भूमिका से जुड़ा है।

उसके नाम से, हमें 'अनाज' शब्द मिलता है। अंग्रेजी में, जिसका उपयोग अभी भी गेहूं और अनाज आधारित नाश्ते के भोजन का वर्णन करने के लिए दैनिक रूप से किया जाता है।

The name Cerēs stems from Proto-Italic *kerēs it's mean ('with grain, Ceres'; cf.
अनुवाद-
सेरेस नाम प्रोटो-इटैलिक *केरेस से निकला है, इसका मतलब है ('अनाज के साथ, सेरेस';।

आर्य शब्द भी हल और कृषि से जुड़ा है।
आर्य चरावाहे थे जिन्होंने कालान्तर में कृषि संस्कृति का विकास किया।
आर्य शब्द जुड़ा है अरि से 
अरि आदि देव है। 

विश्वो ह्यन्यो अरिराजगाम ममेदह श्वशुरो ना जगाम ।
जक्षीयाद्धाना उत सोमं पपीयात्स्वाशितः पुनरस्तं जगायात् ॥१॥ ऋग्वेद -(१०/२८/१)

पदान्वय:-  विश्वः । हि । अन्यः । अरिः । आऽजगाम । मम । इत् । अह । श्वशुरः । न । आ । जगाम ।जक्षीयात् । धानाः । उत । सोमम् । पपीयात् । सुऽआशितः । पुनः । अस्तम् । जगायात् ॥१.

ईश्वरोऽप्यरिः” [निरु० ५।७]


उपर्युक्त ईश्वर वाची अरि: शब्द कालान्तर में हरि हो गया-
संस्कृत भाषा में "आरा" और "आरि" शब्द हैं परन्तु वर्तमान में "अर्" धातु विद्यमान नहीं है।
सम्भव है कि पुराने जमाने में "अर्" धातु
रही हो; पीछे से लुप्त हो गई हो ।
अथवा यह भी हो सकता है कि "ऋ" धातु ही के रूपान्तरण, "अर" (और संस्कृत व्याकरण में ऋ का अर् होता भी है) और उसका मूल अर्थ
"हल चलाना" हो।
यह भी सम्भव है कि "हल की गति के कारण ही "ऋ" धातु का अर्थ गतिसूचक हो गया हो ।
"ऋ" धातु के पश्चात "यत्" प्रत्यय करने से "अर्य्य और आर्य शब्द 'ऋ' धातु में " ण्यत्" प्रत्यय करने से "आर्य्य शब्द की सिद्धि होती है। ये कृदन्त पद हैं।
विभिन्न भाषाओं के कृषि वाचक धातुओं का विचार करने से जान पड़ता है कि "अर्य" और "आर्य" दोनों शब्दो का धात्वर्थ कृषक है।
इसका परोक्ष प्रमाण संस्कृत-साहित्य और व्याकरण में पाया भी जाता है।
आर्य ही नहीं अपितु "आर्य" शब्द का एक अर्थ वैश्य अथवा कृषक भी है। वैश्य शब्द वणिक सा वाचक नहीं है। अपितु वाणिज्य क्रिया को कालान्तर में वैश्य वृत्ति के अन्तर्गत समाविष्ट कर दिया।
पाणिनि की अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय के पहले पाद का "आर्य: स्वामिवैश्ययोः" सूत्र इस बात का प्रमाण है।
फिर पाणिनि के "इन्द्र वरुण-भव-शर्व" आदि (४-१-४९) सूत्र पर सिद्धान्त- कौमुदी में पाया और आर्याणी शब्दों का अर्थ वैश्य-जातीय स्त्री और आर्य शब्द का अर्थ वैश्य-पति लिखा है ।

फिर, वाजसनेयी (१४-२८) और तैत्तिरीय संहिता (४-३-१०-१) में चारों वर्णो के नाम-ब्रह्मण, क्षत्र, आर्य और शूद्र लिखे हैं।
प्राचीन वैश्यों का प्रधान कार्य कर्षण (कृषि कार्य)ही था । इन्ही का नाम "आर्य" है । अतएव "आर्य" शब्द का अर्थ "कृषक" कहना युक्ति-विरहित नही।
कृष्ण और संकर्षण जैसे शब्द भी कृषि मूलक हैं
गोप गो -चारण करते थे और चरावाहों से कृषि संस्कृति का विकास हुआ और कृष्ण और संकर्षण ( बलराम)
दोनों युग पुरुष कृषि संस्कृति के प्रवर्तक और सूत्रधार थे इतिहास कारों का निष्कर्ष है कि आर्य चरावाहे ही थे ।
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यस्य परिकीर्तितं । (अग्निपुराण 151/9)
कृषि, गोपालन और व्यापार वैश्य के कर्म हैं !कृषि करना वैश्य का काम है! यह भारतीय शास्त्रों का विधान हैं ।
मनुस्मृति में वर्णन है कि "वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्सत्रियोऽपि वा। हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ।।10/83
अर्थ-• ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वैश्य वृत्ति से जीवन निर्वाह करते हुए भी कृषि कार्य तो कभी न करें अर्थात् इसे यत्न पर्वक त्यागें क्योंकि कि यह हिंसा के अन्तर्गत है ।
अर्थात कृषि कार्य वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए भी निषिद्ध ही है ।
इसी लिए वर्ण-व्यवस्था वादी वणिक कभी हल चलाते या कृषि कार्य करते हुए नहीं देखा जाता है। 
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क : पुनर् आर्य निवास: ?
आर्यों ( कृषकों) का निवास कहाँ है ? ग्रामो घोषो नगरं संवाह इति ।
ग्राम ( ग्रास क्षेत्र) घोष नगर आदि -( द्वितीय अध्याय पस्पशाह्निक पतञ्जलि महाभाष्य)
निश्चित रूप से यहाँ कृषि कार्य केवल शूद्र वर्ण का विधान है ।
जैसा कि नृसिंह पुराण में वर्णन करते विधान निश्चित किया है।
दासवद्ब्राह्मणानां च विशेषेण समाचरेत् । अयाचितं प्रदातव्यम् कृषिं वृत्यर्थमाचरेत्।।११।
दासों के समान ब्राह्मणों की विशेष रूप से सेवा करे विना कुछ माँगे हुए और अपनी ही सम्पत्ति का दान करना चाहिए और जीविका उपार्जन के लिए कृषि कर्म करे ।।११।
(नृसिंह पुराण अध्याय 58 का 11वाँ श्लोक)
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परन्तु व्यास, पराशर और वैजयंती में एक कृषि वर्ग का उल्लेख है जिन्हें ‘कुटुम्बी’ कहा गया है।
इन्हें शूद्रों के अन्तर्गत रखा गया है।
इस काल में एक और वर्ग कीनाश का उल्लेख आता है प्राचीन ग्रंथों में कीनाश वैश्य थे किन्तु आठवीं शताब्दी के नारद स्मृति के टीकाकार ने कीनाशों को शूद्र बताया है।
परन्तु कोई वणिक कभी कृषि कार्य करते हुए नहीं देखा सिवाय व्यापार के
फिर भी व्यास स्मृति में वणिक और गोप को शूद्र रूप में वर्णन सिद्ध करता है कि द्वेष और रोष के आवेश में पुरोहित वर्णव्यवस्था की मर्यादा भी भूल गये अन्यथा वणिक् शब्द जो स्वयं वैश्य का पर्याय है। को शूद्र धर्मी न कहते !
सायद यही कारण है ।
किसान जो भारत के सभी समाजों को अन्न उत्पादन करता है ।
और पशुपालन के द्वारा दुग्ध सबको उपलब्ध कराता है ;वही किसान जो जीवन के कठिनत्तमसंघर्षों से गुजर कर भी अनाज उत्पन्न करता है ।
दृढ़ता और धैर्य पूर्वक वीरता के गुणों से समन्वित होकर कृषि कार्य करता है ।
किसान से शक्तिशाली और जीवन का बलिदान करने वाला सायद दूसरा कोई नहीं इस संसार में !
परन्तु उसके बलिदान कि कोई प्रतिमान नहीं !और कोई मूल्य नहीं !
फिर भी किसान जो कभी वाणिज्यिक गतिविधियों से अलग थलग ही रहता है , कभी बेईमानी नही करता कभी ठगाई नहीं करता और वणिक जिसे कभी हल चलाते और फसल उगाते नहीं देखा सिवाय ठगाई और व्यापार के और तब भी किसान और वणिक को वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत दौंनों को समान रूप में परिभाषित करने वाले धूर्तों ने किसान को शूद्र और वैश्य को हल न पकड़ने का विधान बना डाले और अन्तत: वणिक को शूद्र वर्ण में समायोजित कर दिया है ।
पणि: अथवा फनीशी जिसके पूर्वज थे
यह आश्चर्य ही है ।

किसानों को विधान बनाने वाले भी किसान की रोटी से ही पेट भरते हैं ।
परन्तु गुण कर्म के आधार भी धर्म शास्त्रों में यह वर्ण-व्यवस्था निराधार ही थी ।
किसान भोला- है यह तो जानते सब ; परन्तु यह भाला भी बन सकता है इसे भी जानते तो अच्छा होता है ।
किसान आज मजदूर से भी आर्थिक स्तर पर पिछड़ा है ।
"रूढ़िवादी समाज में व्यक्ति का आकलन रूढ़िवादी विधानों से ही होता है ।
वर्ण- व्यवस्था में कृषि गोपालन को भी वणिक से भी निम्न स्तर का माना है परन्तु ये निम्न लगभग शूद्र के स्तर पर ।
१-व्यवहर्त्ता २- वार्त्तिकः ३- वणिकः ४- पणिकः । इति राजनिर्घण्टः में ये वैश्य के पर्याय हैं ।
(आर्य' और 'वीर' शब्दों का विकास)
परस्पर सम्मूलक है । दौनों शब्दों की व्युपत्ति पर एक सम्यक् विश्लेषण -
कुसीदकृषिवाणिज्यं पाशुपाल्यं विशः स्मृतम् ॥शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा द्विजो यज्ञान्न हापयेत् ।96.28॥
(गरुड़ पुराण)
श्रीगारुणे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे याज्ञवल्क्योक्तश्राद्धनिरूपणं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥96॥
कुशल चरावाहों के रूप में सम्पूर्ण एशिया की धरा पर अपनी महान सम्पत्ति गौओं के साथ कबीलों के रूप में यायावर जीवन व्यतीत करने वाले आर्य पशु पलक  ही थे ।
यहीं से इनकी ग्राम - सभ्यता का विकास हुआ था अपनी गौओं के साथ साथ विचरण करते हुए .
जहाँ जहाँ भी ये विशाल ग्रास-मेदिनी (घास के मैदान )देखते उसी स्थान पर अपना पढ़ाव डाल देते थे ।
उसी प्रक्रिया के तहत बाद में ग्राम शब्द (पल्लि या गाँव) शब्द का वाचक हो गया ।
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ग्राम शब्द संस्कृत की ग्रस् …धातु मूलक है..—(ग्रस् मन् )प्रत्यय..आदन्तादेश..ग्रस् धातु का ही अपर रूप ग्रह् भी है । जिससे गृह शब्द का निर्माण हुआ है अर्थात् जहाँ खाने के लिए मिले वह घर है ।
इसी ग्रस् धातु का वैदिक रूप… गृभ् …है ; गृह ही ग्रास है
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यही कारण है कि कृषकों का सामाजिक स्तर शास्त्र वेत्ता ब्राह्मण की दृष्टि में निम्न ही है ।
हिन्दू धर्म की नीतियों का पालन करने वाले कितने किसान स्वयं को क्षत्रिय मानते हैं ? विचार कर ले !
श्रीमद्भगवद्गीता जो पञ्चम सदी में वर्ण-व्यवस्था की भेट चढ़ी उसके अष्टादश अध्याय में भी लिख डाला है । कि
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥44॥
अनुवाद:-
कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य- भूमि में हल चलाने का नाम ‘कृषि’ है, गौओं की रक्षा करनने वाला ‘गोरक्ष’ है, उसका भाव ‘गौरक्ष्य’ यानी पशुओं को पालना है तथा क्रय-विक्रय रूप वणिक् कर्म का नाम ‘वाणिज्य’ है- ये तीनों वैश्यकर्म हैं अर्थात् वैश्यजाति के स्वाभाविक कर्म हैं।
वैसे ही शूद्र का भी परिचर्यात्मक अर्थात् सेवारूप कर्म स्वाभाविक है।।44।।

पुरोहितों का कहना है कि जाति के उद्देश्य से कहे हुए इन कर्मों का भली प्रकार अनुष्ठान किये जाने पर स्वर्ग की प्राप्ति रूप स्वाभाविक फल होता है।
Pracheen Bharat Ka Rajneetik Aur Sanskritik Itihas - Page 23 पर वर्णन है
'ऋ' धातु में ण्यत' प्रत्यय जोडने से 'आर्य' शब्द की उत्पत्ति होती है ऋ="जोतना', अत: आर्यों को कृषक ही माना जाता है । '
पं० महावीर प्रसाद द्विवेदी अपनी ऐतिहासिक पुस्तक "अतीत की स्मृति" में प्रमाणों से समन्वित होकर आर्य शब्द का मूल अर्थ कृषक ही लिखते हैं।
"प्राचीन वैश्यों का प्रधान कार्य कर्षण ही था । इन्ही का नाम "आर्य" है ।
अतएव "आर्य" शब्द का अर्थ कृषक कहना युक्ति-विरहित नही। किसी किसी का मत है कि "आर्य" का अर्थ आरि धारण करने वाला है ।
वर्ण-व्यवस्था के निर्माण काल में गोपालन और कृषि को निम्न मानते हुए वैश्य वर्ण में समायोजित किया

परन्तु फिर भी आर्य का व्युत्पत्ति मूलक अर्थ वीर अथवा युद्ध के देवता अरि: से सम्बंधित होने के कारण दृढ़ता और धैर्य मूलक प्रवृत्ति होने के कारण श्रेष्ठ व्यक्ति के अर्थ में रूढ़ होकर कर्मवीर और धर्मवीर आदि रूपों में परिभाषित हुआ दृढ़ता और धैर्य वीरों का और कृषकों का ही आज भी मौलिक गुण (प्रवृत्ति) है।
श्रेष्ठ पुरुष तथा श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न विशेषत:—स्वामी, गुरु और सुहद् आदि को संबोधन करने में भी इस शब्द का व्यवहार होने लगा । छोटे लोग बड़े को जैसे, —स्त्री पति को, छोटा भाई बड़े भाई को, शिष्य गुरु का आर्य या आर्यपुत्र कहकर संबोधित करते हैं ।
नाटकों में भी नटी भी सूत्रधार को आर्य या आर्यपुत्र कहती है ।
पाश्चात्य नाट्यशास्त्र में हीरो (Hero) आर्य का ही रूपान्तरण है ।
आपने हेरो (Harrow) शब्द भी सुना होगा और हल दोनों का श्रोत ऋ-अर्-हिंसागतियो: धातु प्रसिद्ध ही है। 
पूर्व वैदिक काल के ईश्वर वाची अरि का एक रूपान्तरण हरि भी हुआ।