बुधवार, 8 मार्च 2023

होली


               

होली की मान्यता लोकपर्व के रूप में अधिक है किन्तु प्राचीन संस्कृत-शास्त्रों में इस पर्व का विपुल उल्लेख मिलता है ।

भविष्य पुराण में तो होली को शास्त्रीय उत्सव कहा गया है। ऋतुराज वसंत में मनाए जाने वाले रंगों के इस पर्व का प्राचीनतम सांकेतिक उल्लेख यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक (1.3.5) में मिलता है- भाष्यकार सायण लिखते हैं- “वसंत ऋतु में देवता के वस्त्र हल्दी से रँगे हुए हैं ।" होली शब्द की उत्पत्ति ‘होलाका’ शब्द से हुई है । अथर्व वेद के परिशिष्ट (18,12.1) में फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलाका कहा गया है- “फाल्गुनां पौर्णिमास्यां रात्रौ होलाका” । प्राचीन संस्कृत साहित्य में वसंतोत्सव का विस्तृत वर्णन है । यह उत्सव वसंत पंचमी से प्रारंभ हो कर चैत्र कृष्ण त्रयोदशी तक संपन्न होता था । होली इसी वसंतोत्सव के अंतर्गत एक विशेष पर्व है जिसका उल्लेख प्राचीन संस्कृत साहित्य में विभिन्न नामों से मिलता है, यथा- फाल्गुनोत्सव, मधूत्सव, मदनोत्सव, चैत्रोत्सव, सुवसंतक, दोलोत्सव, रथोत्सव, मृगयोत्सव, अनंगोत्सव, कामोत्सव, फग्गु (प्राकृत) ।

 

पहली ईस्वी शती में कवि हाल द्वारा संकलित प्राकृत ग्रन्थ ‘गाथा सप्तशती’ में होली में एक-दूसरे पर रंगीन चूर्ण और कीचड़ फेंके जाने का वर्णन है- “नायिका अपनी हथेलियों में गुलाल ले कर खड़ी ही रह गई, नायक पर रंग डालने की उसकी योजना असफल हो गई (4.12) । किसी ने फाल्गुनोत्सव में तुम पर बिना विचारे जो कीचड़ डाल दिया है उसे धो क्यों रही हो (4.69) ।’’ चौथी-पाँचवीं शताब्दी के महाकवि कालिदास की कृति ‘अभिज्ञानशाकुंतलम’ में दो दासियों के वार्तालाप में वसंतोत्सव की चर्चा है- “कृपा कर बताइए कि राजा ने वसंतोत्सव मनाए जाने पर प्रतिबन्ध क्यों लगाया है ? मनुष्यों को राग-रंग सदा से प्रिय है इसलिए कोई बड़ा ही कारण होगा ।’’ कालिदास की ही रचना ‘मालविकाग्निमित्र’ के अंक 3 में विदूषक राजा से कहता है- “रानी इरावती जी ने वसंत के आरम्भ की सूचना देने वाली रक्ताशोक की कलियों की पहले-पहल भेंट भेज कर नए वसंतोत्सव के बहाने निवेदन किया है कि आर्यपुत्र के साथ मैं झूला झूलने का आनंद लेना चाहती हूँ ।" 7 वीं शती के कवि दंडी रचित 'दशकुमारचरितमें होली का उल्लेख 'मदनोत्सवके रूप में किया गया है। इसी काल में हर्ष ने ‘रत्नावली’ नाटक लिखा । इस के पहले अंक में विदूषक राजा से होली की चर्चा इस प्रकार करता है- “इस मदनोत्सव की शोभा तो देखिए, युवतियाँ अपने हाथों में पिचकारी ले कर नागर पुरुषों पर रंग डाल रहीं हैं और वे पुरुषगण कौतूहल से नाच रहे हैं । उडाए गए गुलाल से दसों  दिशाओं के मुख पीत वर्ण के हो रहे  हैं ।“

 

कतिपय पुराणों में भी होली या फाल्गुनोत्सव का वर्णन है । माना जाता है कि पुराणों की रचना पहली से दसवीं शताब्दी तक होती रही है । भविष्य पुराण के फाल्गुनोत्सव नामक अध्याय 132 में होली के संबंध में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का रोचक संवाद देखिए- युधिष्ठिर पूछते हैं- “जनार्दन, फाल्गुन मास के अंत में पूर्णिमा के दिन गाँव-गाँव में प्रत्येक घर में जिस समय उत्सव मनाया जाता है, लड़के लोग क्यों प्रलाप करते हैं, होली क्यों और कैसे जलाई जाती है ? इसके संबंध में विस्तार से बताइए ।" उत्तर में श्रीकृष्ण होली पर्व के प्रारंभ होने की कथा सुनाते हैं । कथा के अंतर्गत शिव जी और वशिष्ठ का संवाद है । अंत में शिव जी  कहते हैं- “आज फाल्गुन मास की पूर्णिमा है, शीतकाल की समाप्ति और ग्रीष्म का आरंभ हो रहा है । अतः आप लोक को अभय प्रदान करें जिससे सशंकित मानव पूर्व की भांति हास्य-विनोद से पूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें । बालकवृन्द हाथ में डंडे लिए समर के लिए लालायित योद्धा की भांति हँसी-खेल करते हुए बाहर जाकर सूखे लकड़ियाँ और ऊपले एकत्र करें तथा उसे जलाएँ तत्पश्चात राक्षस नाशक मन्त्रों के साथ सविधान उस में आहुति डाल कर हर्सोल्लास से सिंहनाद करते और मनोहर ताली बजाते हुए उस अग्नि की तीन परिक्रमा करें । सभी लोग वहाँ एकत्रित हों और निःशंक हो कर यथेच्छ गायन, हास्य और मनोनुकूल प्रलाप करें ।‘’

 

बंगाल में होली के अवसर पर दोलोत्सव मनाया जाता है । इस का उल्लेख भी भविष्य पुराण के अध्याय 133 में है । पार्वती शिव जी से कहती है- “प्रभो ! झूला झूलती हुई इन स्त्रियों को देखिए । इन को देख कर मेरे  मन में कौतूहल उत्पन्न हो गया है । अतः मेरे लिए भी एक सुसज्जित हिंडोला बनाने की कृपा करें । त्रिलोचन ! इन स्त्रियों की भाँति मैं भी  आपके साथ हिंडोला झूलना चाहती हूँ ।‘’ तब शिव जी ने देवों को बुला कर हिंडोला बनवाया और पार्वती की मनोकामना पूर्ण हुई । इस के बाद हिंडोला बनाने-सजाने और दोलयात्रा की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन है । भविष्य पुराण में दोलोत्सव की तिथि चैत्र शुक्ल चतुर्दशी दी गई है किन्तु आजकल यह उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा और चैत्र शुक्ल द्वादशी को मनाया जाता है । इस के अतिरिक्त अध्याय 135 में मदन महोत्सव का भी वर्णन है ।

 

नारद पुराण (1.124) में फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका-पूजन और दहन का उल्लेख है । साथ ही यह भी कहा गया है कि इस पर्व को संवत्सर दहन या मतान्तर से कामदहन के रूप में भी मनाया जाता है- “संवत्सरस्य दाहोsयम, कामदाहो मतान्तरे ।’’ संवत्सर दहन का आशय ‘बीत रहे वर्ष की विदाई और नए वर्ष का स्वागत’ है । नील मुनि द्वारा रचित ‘नीलमत पुराण’ के श्लोक संख्या 647 से 650 में होली मानाने की विधि का वर्णन इस प्रकार है- “फाल्गुन पूर्णिमा को उदय होते पूर्णचंद्र की पूजा करनी चाहिए । रात्रि के समय गायन, वादन, नृत्य और अभिनय का आयोजन किया जाना चाहिए जो चैत्र कृष्ण पंचमी तक निरंतर रहे । पाँच दिनों तक पर्पट नामक औषधीय पौधे के रस का सेवन करना चाहिए ।’’

 

भोजदेव की 11 वीं शताब्दी की रचना सरस्वती कंठाभरणम’ में लिखा है कि सुवसंतक वसंतावतार के दिन को कहते हैं। वसंतावतार अर्थात बसंत का आगमन, यह दिन वसंत पंचमी का ही है। दक्षिण भारत के संस्कृत कवि अहोबल ने 15 वीं शताब्दी में ‘विरूपाक्ष वसंतोत्सव चम्पू’ नामक ग्रन्थ की रचना की । इस में वसंतोत्सव की विस्तार से चर्चा की गई है । इन सब के अतिरिक्त भारवि, राजगुरु मदन, वात्स्यायन, माघ, भवभूति आदि की कृतियों में भी वसंतोत्सव का उल्लेख मिलता है ।

 

उपर्युक्त विवेचन से यह निश्चित होता है कि होली का पर्व प्राचीन काल से ही सम्पूर्ण भारतीय समाज में उल्लास और उमंग का महत्वपूर्ण उत्सव रहा है । परम्पराओं का निर्माण पहले लोक के द्वारा लोक में होता है तत्पश्चात वह शास्त्रों में अंकित हो कर सांस्कृतिक विरासत का रूप ले लेती हैं । आज भी हमारी यह गरिमामयी सांस्कृतिक विरासत भारतीय जन-मानस को सद्भाव, एकता और समानता का सन्देश दे रही है।






हुलहुली शब्द से जन्मी थी होली, इसमें और विजयादशमी में एक समानता है

4 वर्ष पहले
  • फाग उत्सव और होलिका दहन पहले अलग-अलग थे, कालांतर में एक हुए
  • भगवान कृष्ण ने सबसे पहले भेदभाव मिटाया; उद्धव को महसूस कराया कि प्रेम तो भक्ति और ज्ञान, दोनों पर भारी है

पुराण और वैदिक परंपराएं होली को एक यज्ञ के रूप में स्वीकार करती हैं। जिस तरह विजयादशमी जीत का पर्व है, वैसे ही होली भी विजय का पर्व है। दशहरा शत्रु पर तो होली स्वयं पर विजय का उत्सव है। भीतर की बुराई को होली की अग्नि में दहन करना, वैमनस्य को भूल कर प्रेम के रंगों में सराबोर होना। ये होली है। वेदों से लेकर आधुनिक ग्रंथों तक में होली, फाग उत्सव और वसंतोत्सव की महिमा गाई है। वैदिक परंपरा होली को यज्ञ ही मानती है। शमी की लकड़ियों का सामूहिक रूप से दहन और उसमें औषधियों के साथ नई फसल की बालियों का जलाना यज्ञ जैसा ही है।

 

होली : वेद से उपनिषदों तक!
होली शब्द का अर्थ बहुत अलग है। इसका मूल रूप हुलहुली (शुभ अवसर की ध्वनि) शब्द है, जो ऋ-ऋ-लृ का लगातार उच्चारण है। मुंडक उपनिषद कहता है कि आकाश के 5 मण्डल हैं, जिनमें पूर्ण विश्व तथा ब्रह्माण्ड हमारे अनुभव से परे हैं। सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी का अनुभव होता है, जो शिव के 3 नेत्र हैं। इनके चिह्न 5 मूल स्वर हैं- अ, इ, उ, ऋ, लृ। शिव के 3 नेत्रों का स्मरण ही होली है। 

 

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्र सूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः। (मुण्डक उपनिषद्, 2/1/4)   

विजय के लिये उलुलय (होली) का उच्चारण होता है। अथर्ववेद कहता है कि विजय के लिए निकले वीरों का विजय घोष उलुलय (विजय या शुभ अवसर की ध्वनि) होता है। होली विजय का उत्सव है। विजय का राग है। जीत की ध्वनि है।

 

उद्धर्षतां मघवन् वाजिनान्युद वीराणां जयतामेतु घोषः। 
पृथग् घोषा उलुलयः एतुमन्त उदीरताम्। (अथर्ववेद 3/19/6)

वेद ये मानते हैं कि संवत्सर (नए वर्ष) की शुरुआत अग्नि से होती है, चैत्र मास गर्मी के मौसम में होता है। सूर्य अपने ताप के उच्चतम स्तर पर होता है। साल का अंत होते-होते ये अग्नि समाप्त हो जाती है। इसलिए नए साल की शुरुआत के पहले फिर अग्नि प्रज्वलित की जाती है। यही अग्नि फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर जलाई जाने वाली होली है। 

 

अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते, अग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति।
अग्निर्जागार तमयं सोम आह-तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः। (ऋग्वेद 5/44/15)

अग्नि का पुनः ज्वलन-सम्वत्सर रूपी अग्नि वर्ष के अन्त में खर्च हो जाती है, अतः उसे पुनः जलाते हैं, जो सम्वत्-दहन है।




रङ्गाजीवश्चित्रकरस्त्वष्टा तक्षा च वर्धकिः ।
नाडिन्धमः स्वर्णकारो नापितान्तावसायिनः ।। ३६६.४४ ।।

पञ्चालिका पुत्रिका स्याद्वर्करस्तरुणः पशुः ।
मञ्जूषा पेटकः पेडा तुल्यसाधारणौ समौ ।।
प्रतिमा स्यात् प्रतिकृतिर्वर्गा ब्रह्मादयः स्मृताः ।। ३६६.४८ ।।

इत्यादिम्हापुराणे आग्नेये क्षत्रविट्‌शूद्रवर्गा नाम षट्‌षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥

______ 

हमारे एक मित्र पंकज पटनवी कह रहे हैं कि रंग गुलाल और अबीर सभी अरबी फारसी के शब्द हैं ।

वह कहना चाहते हैं कि ये होली मुगलों की देन है।

परन्तु हम कहते हैं कि गुलाल और अबीर भले ही अरबी फारसी हों परन्तु रंग प्राचीन संस्कृत भाषी शब्द है।


पुराणों में रंग रजक और राग जैसे शब्द है।जो रंगाई से सम्बन्धित हैं 

अग्निपुराण और अमरकोश में रंग और रंगाजीव शब्द हैं । 

चित्रकार के अर्थ में -

रङ्गाजीवश्चित्रकरस्त्वष्टा तक्षा च वर्धकिः ।नाडिन्धमः स्वर्णकारो नापितान्तावसायिनः। ३६६.४४ ।।

इत्यादिम्हापुराणे आग्नेये क्षत्रविट्‌शूद्रवर्गा नाम षट्‌षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥

श्रीमद्भागवत पुराण -

श्लोक  10.41.32  

रजकं कञ्चिदायान्तं रङ्गकारं गदाग्रज: ।द‍ृष्ट्वायाचत वासांसि धौतान्यत्युत्तमानि च ॥ ३२ ॥

शब्दार्थ:-रजकम्—धोबी को; कञ्चित्—किसी; आयान्तम्—आते हुए; रङ्ग-कारम्—रँगाई करने वाले को; गद-अग्रज:—गद के बड़े भाई कृष्ण ने; दृष्ट्वा—देखकर; अयाचत—याचना की; वासांसि—वस्त्रों की; धौतानि—धुले; अति-उत्तमानि—अत्युत्तम; च— तथा ।.

अनुवाद:-कपड़ा रँगने वाले एक धोबी को अपनी ओर आते देखकर कृष्ण ने उससे उत्तमोत्तम धुले वस्त्र माँगे।


सोमवार, 6 मार्च 2023

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ वेदों में पुरुष और पुरुषों में उत्तम तथा मूर्ति पूजा का विधान -

(शरीर, आत्मा और परमात्मा का वर्णन)

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ (१६)

भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में दो प्रकार के ही जीव होते हैं एक नाशवान (क्षर) और दूसरे अविनाशी (अक्षर), इनमें समस्त जीवों के शरीर तो नाशवान होते हैं और समस्त जीवों की आत्मा को अविनाशी कहा जाता है। (१६)

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ (१७)

भावार्थ : परन्तु इन दोनों के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ पुरुष है जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह अविनाशी भगवान तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी प्राणीयों का भरण-पोषण करता है। (१७)

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ (१८)

भावार्थ : क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ। (१८)

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ (१९)

भावार्थ : हे भरतवंशी अर्जुन! जो मनुष्य इस प्रकार मुझको संशय-रहित होकर भगवान रूप से जानता है, वह मनुष्य मुझे ही सब कुछ जानकर सभी प्रकार से मेरी ही भक्ति करता है। (१९)

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्‍बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ (२०)

भावार्थ : हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह शास्त्रों का अति गोपनीय रहस्य मेरे द्वारा कहा गया है, हे भरतवंशी जो मनुष्य इस परम-ज्ञान को इसी प्रकार से समझता है वह बुद्धिमान हो जाता है और उसके सभी प्रयत्न पूर्ण हो जाते हैं। (२०)


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥
इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद् भगवद् गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में पुरुषोत्तम-योग नाम का पंद्रहवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ ॥

अदो यद्दारु प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम् । तदार स्व दुर्हणो तेन गच्छ परस्तरम् ॥

(ऋग्वेद १०। १५५। ३) अदः (दूरमें), यत् (जो), अपूरुषम् (जो पुरुष द्वारा निर्मित नहीं है), दारु (काष्ठमय पुरुषोत्तमाख्य देव शरीर), सिन्धोः (समुद्र के), पारे (तट पर), प्लवते (जलके ऊपर है), हे दुर्हण (स्तोता), तत् (वह), आरभस्व (अवलम्बन करो), तेन (उसके द्वारा), गच्छ परस्तरम् (उत्कृष्ट स्थान वैकुण्ठ) को प्राप्त हो।

'हे उपासक! दूर देशमें समुद्र के तट पर जल के ऊपर जो दारुब्रह्मा की मूर्ति है, जो किसी मनुष्य से निर्मित नहीं है, उसकी आराधना करके उनकी कृपा से वैकुण्ठ को प्राप्त हो ।'

उड़ीसा प्रांत में भुवनेश्वर के निकट उदयगिरि की हाथी गुफा में कलिंगराज खारवेल की जो लिपि है, उसमें भी नीम के काष्ठ से निर्मित मूर्ति का उल्लेख मिलता है। खारवेल चन्द्रगुप्त के १५० वर्ष बाद हुए हैं।

सनातन धर्म के समग्र शास्त्र वेदमूलक हैं।

पुरुष सूक्तम

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।         स भूमिँसर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङगुलम्।। 

 जो सहस्रों सिरवाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्माँड को आवृत करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं ।।1।।
 पुरुषऽएवेदँ सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।।2।।
 जो सृष्टि बन चुकी, जो बनने वाली है, यह सब विराट पुरुष ही हैं। इस अमर जीव-जगत के भी वे ही स्वामी हैं और जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी वे ही स्वामी हैं ।।2।।
 एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पुरुषः।
पादोઽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।3।।
 विराट पुरुष की महत्ता अति विस्तृत है। इस श्रेष्ठ पुरुष के एक चरण में सभी प्राणी हैं और तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में स्थित हैं ।।3।।
 त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
 ततो विष्वङ व्यक्रामत्साशनानशनऽअभि।4।
 चार भागों वाले विराट पुरुष के एक भाग में यह सारा संसार, जड़ और चेतन विविध रूपों में समाहित है। इसके तीन भाग अनंत अंतरिक्ष में समाये हुए हैं ।।4।।
 
ततो विराडजायत विराजोऽअधि पूरुषः।
स जातोऽअत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः।5।
 
उस विराट पुरुष से यह ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ। उस विराट से समष्टि जीव उत्पन्न हुए। वही देहधारीरूप में सबसे श्रेष्ठ हुआ, जिसने सबसे पहले पृथ्वी को, फिर शरीरधारियों को उत्पन्न किया ।।5।|
 
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ।6।
 
उस सर्वश्रेष्ठ विराट प्रकृति यज्ञ से दधियुक्त घृत प्राप्त हुआ (जिससे विराट पुरुष की पूजा होती है)। वायुदेव से संबंधित पशु हरिण, गौ, अश्वादि की उत्पत्ति उस विराट पुरुष के द्वारा ही हुई ।6।।
 
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतऽऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ।7।।
 
(उस विराट यत्र पुरुष से ऋग्वेद एवं सामवेद का प्रकटीकरण हुआ। उसी से यजुर्वेद एवं अथर्ववेद का प्रादुर्भाव हुआ अर्थात् वेद की ऋचाओं का प्रकटीकरण हुआ ।।7।।
 
तस्मादश्वाऽअजायन्त ये के चोभयादतः।
 गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाताऽअजावयः।8।
 
उस विराट यज्ञ पुरुष से दोनों तरफ दाँतवाले घोड़े हुए और उसी विराट पुरुष से गौएँ, बकरियाँ और भेड़ें आदि पशु भी उत्पन्न हुए ।।8।।
 
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
 तेन देवाऽअयजन्त साध्याऽऋषयश्च ये ।।9।।

 मंत्रद्रष्टा ऋषियों एवं योगाभ्यासियों ने सर्वप्रथम प्रकट हुए पूजनीय विराट पुरुष को यज्ञ (सृष्टि के पूर्व विद्यमान महान ब्रह्मांडरूप यज्ञ अर्थात् सृष्टि यज्ञ) में अभिषिक्त करके उसी यज्ञरूप परम पुरुष से ही यज्ञ (आत्मयज्ञ) का प्रादुर्भाव किया ।।9।।

 यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
 मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादाऽउच्येते ।।10।।
 
संकल्प द्वारा प्रकट हुए जिस विराट पुरुष का ज्ञानी जन विविध प्रकार से वर्णन करते हैं, वे उसकी कितने प्रकार से कल्पना करते हैं ? उसका मुख क्या है ? भुजा, जाँघें और पाँव कौन से हैं ? शरीर-संरचना में वह पुरुष किस प्रकार पूर्ण बना ? ।।10।।
 
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्याँ शूद्रोऽअजायत ।।11।।
 
(विराट पुरुष का मुख ब्राह्मण हुए । बाहू राजन्य-क्षत्रिय किये गये। और उसके ऊरू वैश्य एवं दोनों पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए ।।11।।
 
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादिग्निरजायत ।।12।।
 
विराट पुरुष के मन से चन्द्रमा चक्षु से सूर्य और कर्मों से व नाभी से अंतरिक्ष, सिर से द्युलोक, पाँवों से भूमि तथा कानों से दिशाएँ प्रकट हुई।कानों से वायु और प्राण  और मुख से अग्नि उत्पन्न हुई। ।।13।।
 
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
 वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्मऽइध्मः शरद्धविः।।14।।
 
जब देवों ने विराट पुरुष को हवि मानकर यज्ञ का शुभारम्भ किया, तब घृत वसंत ऋतु, ईंधन (समिधा) ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हुई ।।14।।
 
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।
 देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽअबध्नन् पुरुषं पशुम् ।।15।।
 
देवों ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उसमें विराट पुरुष को ही पशु (हव्य) रूप की भावना से बाँधा (नियुक्त किया), उसमें यज्ञ की सात परिधियाँ (सात समुद्र) एवं इक्कीस (छंद) समिधाएँ हुईं ।।15।।
 
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
 ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ।।16।।
 
आदिश्रेष्ठ धर्मपरायण देवों ने यज्ञ से यज्ञरूप विराट सत्ता का यजन किया। यज्ञीय जीवन जीने वाले धार्मिक महात्माजन पूर्वकाल के साध्य देवताओं के निवास स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं ।।16।।
 
 शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः!!

छान्दोग्योपनिषद- 8.12.3

"एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमपुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वानाज्ञाभिर्वा नोपजनं स्मरनिदं शरीरं स यथा प्रयोग्य आचरण युक्त एवमेवयमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥ 8.12.3 ॥

3. इसी प्रकार आनन्दमय आत्मा शरीर से उत्पन्न होकर विश्व आत्मा के प्रकाश को प्राप्त कर अपने स्वरूप में प्रकट होता है। यह परमात्मा है , लौकिक स्व। फिर वह स्वतंत्र रूप से महिलाओं, गाड़ियों, या रिश्तेदारों के साथ खाने, खेलने, या आनंद लेने के लिए विचरण करता है, उसे यह याद नहीं रहता कि वह किस शरीर में पैदा हुआ था। जिस प्रकार घोड़ों या बैलों को गाड़ी में जोता जाता है, उसी प्रकार प्राण [जीवन] शरीर में [ कर्म के कारण ] कसा हुआ रहता है।


रविवार, 5 मार्च 2023

अब्राह्मणः सङ्ग्रहणे प्राणान्तं दंडमर्हति ।




श्लोक 8.359


अब्राह्मणः सङ्ग्रहणे प्राणान्तं दंडमर्हति ।
चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमः सदा ॥ 359 ॥ मनुस्मृति अध्याय- (8/359)

सभा वर्णों का स्त्रियाँ रक्षा योग्य होती हैं। उनके साथ बलात्कार नहीं करना चाहिए ब्राह्मण जाति को छोड़कर  तीनों वर्णों के व्यक्ति को व्यभिचार का दोषी पाए जाने पर मृत्यु दण्ड मिलना चाहिए।।359।।


 महिलाओं के साथ बार-बार बातचीत करने से उनका जुनून तेज हो जाता था; ताकि कामदेव के बाणों का शिकार होकर, वे राजा द्वारा दी गई छोटी-छोटी सजाओं का बुरा न मानें, और अपने जीवन को जोखिम में डालकर भी ऐसा कार्य करें।

यही कारण है कि जो लोग दूसरे पुरुषों की पत्नियों के पास आना शुरू कर देते हैं, उनके लिए कड़ी सजा देना सही माना जाता है।

जहाँ तक वर्तमान श्लोक का संबंध है, हम ' 

गंगानाथ झा द्वारा व्याख्यात्मक नोट्स

अब्राह्मण: ' - ' क्षत्रिय और बाकी' (उच्च जाति की महिला के साथ दुर्व्यवहार) (मेधातिथि और नंदन); - 'ब्राह्मण महिला के साथ शूद्र दुर्व्यवहार' (कुलूका और राघवानंद)।

यह श्लोक विवादरत्नाकर (पृ. 388) में उद्धृत किया गया है, जिसमें कहा गया है कि यह 'गैर-ब्राह्मण' को एक उच्च जाति की महिला के साथ दुर्व्यवहार करने के लिए संदर्भित करता है; - व्यवहार-बालंबभटी (पृ. 115) में; - और विवादसिंतामणि (पृ.) . 174) निचली जाति में से एक के लिए दंड निर्धारित करने के रूप में। उच्च जाति की महिला के साथ अभद्रता

विभिन्न लेखकों द्वारा तुलनात्मक नोट्स

बौधायन (2.4.1-2)।—'ब्राह्मण के अलावा कोई भी व्यभिचार के लिए शारीरिक दंड भुगतेगा; - सभी जातियों के पुरुषों की पत्नियों को धन की तुलना में अधिक सावधानी से संरक्षित किया जाना चाहिए।'

आपस्तंब (2.26.20)।—'यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में व्यभिचार किया है, तो उसके अंगों को अंडकोष सहित काट दिया जाएगा।'

बृहस्पति (23.10-12)।—'यदि कोई पुरुष अनिच्छुक स्त्री का उल्लंघन करता है, तो राजा उसकी पूरी संपत्ति जब्त कर लेगा, उसका लिंग और अंडकोष काट देगा और उसे एक गधे पर चढ़ाएगा। जब कोई पुरुष धोखे से किसी महिला का आनंद लेता है, तो उसकी सजा उसकी पूरी संपत्ति की जब्ती होगी; और उसके बाद उस पर स्त्री अंग का दाग लगाया जाएगा और नगर से निकाल दिया जाएगा। उच्चतम जुर्माना समान जाति की महिला के साथ संबंध के लिए लगाया जाएगा; एक निचली जाति की महिला के साथ संबंध के लिए आधा; और एक पुरुष जो उच्च जाति की महिला के साथ संबंध रखता है, उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा।'

कात्यायन (विवादरत्नाकर, पृ. 389)।—'जब पुरुष ने महिला के साथ अपना संभोग पूरा कर लिया है, तो बलपूर्वक, मौत की सजा दी जाएगी।'

व्यास (विवादरत्नाकर, पृ. 392)।—'यदि कोई पुरुष किसी ऐसी स्त्री के साथ संभोग करता है जो अपनी इच्छा से उसके पास आती है, तो उस स्त्री के अनिच्छुक होने पर सजा आधी होगी।'

अर्थशास्त्र (पृ. 172).—'एक पुरुष को अनिच्छुक स्त्री के साथ कभी स्वतंत्रता नहीं लेनी चाहिए; यदि वह किसी इच्छुक महिला के साथ अवैध संबंध बनाता है, तो उस पर 50 पण और महिला का आधा जुर्माना लगाया जाएगा।'


गुरुवार, 2 मार्च 2023

इति श्रीवामनपुराणे त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।। आभीर तोमर शक यवन आदि जातियों का वर्णन-

मत्स्याः कुशट्टाः कुणिकुण्डलाश्च पाञ्चालकाश्याः सह कोसलाभिः।। १३.३५

वृकाः शबरकौवीराः सभूलिङ्गा जनास्त्विमे।
शकाश्चैव समशका मध्यदेश्या जनास्त्विमे।। १३.३६
____________
बाह्लीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः।
अपरान्तास्तथा शूद्राः पह्लवाश्च सखेटकाः।। १३.३७


गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः।
शातद्रवा ललित्थाश्च पारावतसमूषकाः।। १३.३८

माठरोदकधाराश्च कैकैया दशमास्तथा।
क्षत्रियाः प्रातिवैश्याश्च वैश्यशूद्रकुलानि च।। १३.३९

काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा ह्यङ्गलौकिकाः।
चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुधा बाह्यतोदराः।। १३.४०


आत्रेयाः सभरद्वाजाः प्रस्थलाश्च दशेरकाः।
लम्पकास्तावकारामाः शूलिकास्तङ्गणैः सह।। १३.४१


औरसाश्चालिमद्राश्च किरातानां च जातयः
तामसाः क्रममासाश्च सुपार्श्वाः पुण्ड्रकास्तथा।। १३.४२

कुलूताः कुहुका ऊर्णास्तूणीपादाः सुकुक्कुटाः।
माण्डव्या मालवीयाश्च उत्तरापथवासिनः।। १३.४३

अङ्गा वङ्गा मुद्गरवास्त्वन्तर्गिरिबहिर्गिराः।
तथा प्रवङ्गा वाङ्गेया मांसादा बलदन्तिकाः।। १३.४४

ब्रह्मोत्तरा प्राविजया भार्गवाः केशबर्बराः।
प्रग्ज्योतिषाश्च शूद्रश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः।। १३.४५

माला मगधगोनन्दाः प्राच्य जनपदास्त्विमे।
पुण्ड्राश्च केरलाश्चैव चौडाः कुल्याश्च राक्षस।। १३.४६

जातुषा मूषिकादाश्च कुमारादा महाशकाः।
महाराष्ट्रा माहिषिकाः कालिङ्गाश्चैव सर्वशः।। १३.४७


आभीराः सह नैषीका आरण्याः शबराश्च ये।
बलिन्ध्या विन्ध्यमौलेया वैदर्भा दण्डकैः सह।। १३.४८


पौरिकः सौशिकाश्चैव अश्मका भोगवर्द्धनाः।
वैषिकाः कुन्दला अन्ध्रा उद्भिदा नलकारकाः।
दाक्षिणात्या जनपदास्त्विमे शालकटङ्कटः।। १३.४९

सूर्पारका कारिवना दुर्गास्तालीकटैः सह।
पुलीयाः ससिनीलाश्च तापसास्तामसास्तथा।। १३.५०

कारस्करास्तु रमिनो नासिक्यान्तरनर्मदाः।
भारकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैरपि।। १३.५१


वात्सेयाश्च सुराष्ट्राश्च आवन्त्याश्चार्बुदैः सह।
इत्येते पश्चिमामाशां स्थिता जानपदा जनाः।।। १३.५२

कारुषाश्चैकलव्याश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह।
उत्तमर्णा दशार्णाश्च भोजाः किंकवरैः सह।। १३.५३

तोशला कोशलाश्चैव त्रैपुराश्चैल्लिकास्तथा।
तुरुसास्तुम्बराश्चैव वहनाः नैषधैः सह।। १३.५४


अनूपास्तुण्डिकेराश्च वीतहोत्रास्त्ववन्तयः।
सुकेशे वन्ध्यमूलस्थस्त्विमे जनपदाः स्मृताः।। १३.५५

अथो देशान् प्रवक्ष्यामः पर्वताश्रयिणस्तु ये।
निराहारा हंसमार्गाः कुपथास्तङ्गणाः खशाः।। १३.५६

कुथप्रावरणाश्चैव ऊर्णाः पुण्याः सहूहुकाः।
त्रिगर्त्ताश्च किराताश्च तोमराः शिशिराद्रिकाः।। १३.५७

इमे तवोक्ता विषयाः सुविस्तराद् द्वीपे कुमारे रजनीचरेश।
एतेषु देशेषु च देशधर्मान् संकीर्त्यमानान् श्रृणु तत्त्वतो हि।। १३.५८

इति श्रीवामनपुराणे त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।

बुधवार, 1 मार्च 2023

श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये नवचत्वारिंशात्तमोऽध्यायः। सरस्वती से ब्रह्मा का संभोग- तथा सप्तर्षियों का जन्म

श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये नवचत्वारिंशात्तमोऽध्यायः।

 मार्कण्डेय उवाच।

चतुर्मुखानामुत्पत्तिं विस्तरेण ममानघ।
तथा ब्रह्मेश्वराणां च श्रोतुमिच्छा प्रवर्तते १।


          सनत्कुमार उवाच।
शृणु सर्वमशेषेण कथयिष्यामि तेऽनघ।
ब्रह्मणः स्रष्टुकामस्य यद्वृत्तं पद्मजन्मनः २।


उत्पन्न एव भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।
ससर्ज सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ३।


पुनश्चिन्तयतः सृष्टिं जज्ञे कन्या मनोरमा।
नीलोत्पलदलश्यामा तनुमध्या सुलोचना ४।


तां दृष्ट्वाभिमतां ब्रह्मा मैथुनायाजुहाव ताम्।
तेन पापेन महता शिरोऽशीर्यत वेधसः ।५।


तेन शीर्णेन स ययौ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
सान्निहत्यं सरः पुण्यं सर्वपापक्षयावहम् ।६।


तत्र पुण्ये स्थाणुतीर्थे ऋषिसिद्धनिषेविते।
सरस्वत्युत्तरे तीरे प्रतिष्ठाप्य चतुर्मुखम् ।७।


आराधयामास तदा धूपैर्गन्धैर्मनोरमैः।
उपहारैस्तथा हृद्यै रौद्र सूक्तैर्दिने दिने ।८।

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये नवचत्वारिंशात्तमोऽध्यायः।

समाप्तं सरोमाहात्म्यम्।


__________________________________

शूद्रा श्च तस्मादुत्पन्नाः शुश्रूषार्थं द्विजन्मनाम्।
ततश्चिन्तयतः सृष्टिं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।
मनसा मानसा जाताः सनकाद्या महर्षयः ।३९।


पुनश्चिन्तयतस्तस्य प्रजाकामस्य धीमतः ।
उत्पन्ना ऋषयः सप्त ते प्रजापतयोऽभवन् ।४०।
पुनश्चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च ।
बालखिल्याः समुत्पन्नास्तपःस्वाध्यायतत्पराः।४१।


ते सदा स्नाननिरता देवार्चनपरायणाः।
उपवासैर्व्रतैस्तीव्रैः शोषयन्ति कलेवरम् ।४२।


वानप्रस्थेन विधिना अग्निहोत्रसमन्विताः।
तपसा परमेणेह शोषयन्ति कलेवरम् ।४३।

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः।

_____________

ब्राह्मणाश्च तपो धर्मं तीर्थयात्राश्च कुर्वते।
वैश्याश्च पशुवृत्तिस्थाः शूद्राः शुश्रूषणे रताः।। ७.२४

चातुर्वर्ण्यं ततः स्वे स्वे आश्रमे धर्मकर्मणि।
आवर्त्तत ततो देवा वृत्त्या युक्ताभवन् मुने।। ७.२५

(श्रीवामनपुराणे सप्तम् अध्याय)

                ।ऋषय ऊचुः।
कथं मङ्कणकः सिद्धः कस्माज्जातो महानृषिः।
नृत्यमानस्तु देवेन किमर्थं स निवारितः।१।
               ।लोमहर्षण उवाच।
कश्यपस्य सुतो जज्ञे मानसो मङ्कणो मुनिः।
स्नानं कर्तुं व्यवसितो गृहीत्वा वल्कलं द्विजः।२।


तत्र गता ह्यप्सरसो रम्भाद्याः प्रियदर्शनाः।
स्नायन्ति रुचिराः स्निग्धास्तेन सार्धमनिन्दिताः।३ ।


ततो मुनेस्तदा क्षोभाद्रे तः स्कन्नं यदम्भसि ।
तद्रे तः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः ।४ ।


सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह ।
तत्रर्षयः सप्त जाता विदुर्यान् मरुतां गणान् ।५।

वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः ।
वायुज्वालो वायुरेतो वायुचक्रश्च वीर्यवान् ।६ ।

एते ह्यपत्यास्तस्यर्षेर्धारयन्ति चराचरम् ।
पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति मे श्रुतम् ।७।

क्षतः किल करे विप्रास्तस्य शाकरसोऽस्रवत् ।
स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् ।८।

ततः सर्वं प्रनृत्तं च स्थावरं जङ्गमं च यत् ।
प्रनृत्तं च जगद् दृष्ट्वा तेजसा तस्य मोहितम् ।९ ।

ब्रह्मादिभिः सुरैस्तत्र ऋषिभिश्च तपोधनैः ।
विज्ञप्तो वै महादेवो मुनेरर्थे द्विजोत्तमाः ।१०।

नायं नृत्येद् यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि ।
ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव हि ।११।

सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत ।
हर्षस्थानं किमर्थं च तवेदं मुनिसत्तम ।
तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम ।१२।

                  ।ऋषिरुवाच।
किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम् ।
यं दृष्ट्वाहं प्रनृत्तो वै हर्षेण महतान्वितः ।१३।

तं प्रहस्याब्रवीद् देवो मुनिं रागेण मोहितम् ।
अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीह प्रपश्यताम् ।१४।

एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं देवदेवो महाद्युतिः ।
अङ्गुल्यग्रेणवप्रेन्द्रा : ! स्वाङ्गुष्ठं ताडयद् भवः ।१५।

ततो भस्म क्षतात् तस्मान्निर्गतं हिमसन्निभम् ।
तद् दृष्ट्वा व्रीडितो विप्रः पादयोः पतितोऽब्रवीत् ।१६।
नान्यं देवादहं मन्ये शूलपाणेर्महात्मनः ।
चराचरस्य जगतो वरस्त्वमसि शूलधृक् ।१७।

त्वदाश्रयाश्च दृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ ।
पूर्वस्त्वमसि देवानां कर्ता कारयिता महत् ।१८।

त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्ते ह्यकुतोभयाः ।
एवं स्तुत्वा महादेवमृषिः स प्रणतोऽब्रवीत् ।१९ ।

भगवंस्त्वप्रसादाद्धि तपो मे न क्षयं व्रजेत् ।
ततो देवः प्रसन्नात्मा तमृषिं वाक्यमब्रवीत् ।२०।

                ।ईश्वर उवाच।
तपस्ते वर्द्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा ।
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्द्धमहं सदा ।२१ ।

सप्तसारस्वते स्नात्वा यो ममर्चिष्यते नरः ।
न तस्य दुर्लभं किञ्चिदिह लोके परत्र च ।२२ ।

सारस्वतं च तं लोकं गमिष्यति न संशयः ।
शिवस्य च प्रसादेन पाप्नोति परमं पदम् ।२३ ।

________________    
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः।


तत्र ब्रह्मर्षिकुण्डेषु स्नातस्य द्विजसत्तमाः ।
सप्तर्षीणां प्रसादेन सप्तसोमफलं भवेत् ८ ।
भरद्वाजो गौतमश्च जमदग्निश्च कश्यपः ।
विश्वामित्रो वसिष्ठश्च अत्रिश्च भगवानृषिः ।९।


तत्र ब्रह्मर्षिकुण्डेषु स्नातस्य द्विजसत्तमाः ।
सप्तर्षीणां प्रसादेन सप्तसोमफलं भवेत् ८ ।
भरद्वाजो गौतमश्च जमदग्निश्च कश्यपः ।
विश्वामित्रो वसिष्ठश्च अत्रिश्च भगवानृषिः ९

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत् कुरुक्षेत्रं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।६ ।


कुरुक्षत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् ।
इत्येवं वाचमुत्सृज्य सर्वपाषैः प्रमुच्यते ।७।


इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः।

ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो जयते महीम् ।
वैश्यो धनसमृद्धिं च शूद्रः सुखमवाप्नुयात् ।
वामनस्य च माहात्म्यं शृण्वन् पापैः प्रमुच्यते।९१।
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः।

वामनपुराण-

सा ब्रह्माणं समायाता चन्द्रं चन्द्रानुगानपि।
या रक्ता रक्तवसना वाजिस्था रजसान्विता।। ७५.२३

तां प्रादाद् देवराजाय मनवे तत्समेषु च।
पीताम्बरा या सुभगा रथस्था कनकप्रभा।। ७५.२४

प्रजापतिभ्यस्तां प्रादात् शुक्राय च विशःसु च।
नीलवस्त्राऽलिसदृशी या चतुर्थी वृषस्थिता।। ७५.२५

सा दानवान् नैऋतांश्च शूद्रान् विद्याधरानपि।
विप्राद्याः श्वेतरूपां तां कथयन्ति सरस्वतीम्।। ७५.२६

स्तुवन्ति ब्रह्मणा सार्धं मखे मन्त्रादिभिः सदा।
क्षत्रिया रक्तवर्णां तां जयश्रीमिति शंसिरे।। ७५.२७

सा चेन्द्रेणासुरश्रेष्ठ मनुना च यशस्विनी।
वैश्यास्तां पीतवसनां कनकाङ्गीं सदैव हि।। ७५.२८

स्तुवन्ति लक्ष्मीमित्येवं प्रजापालास्तथैव हि।
शूद्रास्तां नीलवर्णाङ्गीं स्तुवन्ति च सुभक्तितः।। ७५.२९

श्रिया देवीति नाम्ना तां समं दैत्यैश्च राक्षसैः।
एवं विभक्तास्ता नार्यस्तेन देवेन चक्रिणा।। ७५.३०

एतासां च स्वरूपस्तास्तिष्ठन्ति निधयोऽव्ययाः।
इतिहासपुराणानि वेदाः साङ्गास्तथोक्तयः।। ७५.३१
स्वाध्याययज्ञनिरता दातारः शस्त्रजीविनः।
क्षत्रियाः सन्तु दैत्येन्द्र प्रजापालनधर्मिणः।। ७४.४५

यज्ञाध्ययनसंपन्ना दातारः कृषिकारिणः।
पाशुपाल्यं प्रकुर्वन्तु वैश्या विपणिजीविनः।। ७४.४६

ब्राह्मणक्षत्रियविशां सदा शुश्रूषणे रताः।
शूद्राः सन्त्वसुरश्रेष्ठ तवाज्ञाकारिणः सदा।। ७४.४७

यदा वर्णाः स्वधर्मस्था भवन्ति दितिजेश्वर।
धर्मवृद्धिस्तदा स्याद्वै धर्मवृद्धौ नृपोदयः।। ७४.७४

तस्माद् वर्णाः स्वधर्मस्थास्त्वया कार्याः सदा बले।
तद्वृद्धौ भवतो वृद्धिस्तद्धानौ हानिरुच्यते।। ७४.४९

इत्थं वचः श्राव्य महासुरेन्द्रो बलिं महात्मा स बभूव तूष्णीम्।
ततो यदाज्ञापयसे करिष्ये इत्थं बलिः प्राह वचो महर्षे।। ७४.५०

इति श्रीवामनपुराणे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ।।



पुन्नाम्नो नरकात् त्राति पुत्रस्तेनेह गीयते।
शेषपापहरः शिष्य इतीयं वैदिकी श्रुतिः।। ६०.७७

सनत्कुमार उवाच।।
कोऽयं पुन्नामको देव नरकात् त्राति पुत्रकः।
कस्माच्छेषं ततः पापं हरेच्छिष्यश्च तद्वद।। ६०.७८

ब्रह्मोवाच।।
एतत् पुराणं परमं महर्षे योगाङ्गयुक्तं च सदैव यच्च।
तथैव चोग्रं भयहारि मानवं वदामि ते साध्य निशामयैनम्।। ६०.७९

इति श्रीवामनपुराणे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ।।


  1.  मुर उपरि टिप्पणी

मरीचिरत्रिः पुलहः पुलस्त्यः क्रतुर्वसिष्ठो भृगुरङ्गिराश्च।
मृकण्डुजस्ते कुरुतां हि स्वस्ति स्वस्ति सदा सप्त महर्षयश्च।। ५८.१८


विश्वेश्विनौ साध्यमरुद्गणाग्नयो दिवाकराः शूलधरा महेश्वराः।
यक्षाः पिशाचा वसवोऽथ किन्नराः ते स्वस्ति कुर्वन्तु सदोद्यतास्त्वमी।। ५८.१९

नागाः सुपर्णाः सरितः सरांसि तीर्थानि पुण्यायतनाः समुद्राः।
महाबला भूतगणा गणेन्द्राः ते स्वस्ति कुर्वन्तु सदा समुद्यताः।। ५८.२०

स्वस्ति द्विपादिकेभ्यस्ते चतुष्पादेभ्य एव च।
स्वस्ति ते बहुपादेभ्यस्त्वपादेभ्योऽप्यनामयम्।। ५८.२१

प्राचीं दिग् रक्षतां वज्री दक्षिणां दण्डनायकः।
पाशी प्रतीचीं रक्षतु लक्ष्मांशुः पातु चोत्तराम्।। ५८.२२

वह्निर्दक्षिणपूर्वां च कुबेरो दक्षिणापराम्।
प्रतीचीमुत्तरां वायुः शिवः पूर्वोत्तरामपि।। ५८.२३

उपरिष्टाद् ध्रुवः पातु अधस्ताच्च धराधरः।
मुसती लाङ्गली चक्री धनुष्मानन्तरेषु च।। ५८.२४

वाराहोऽम्बुनिधौ पातु दुर्गे पातु नृकेसरी।
सामवेदध्वनिः श्रीमान् सर्वतः पातु माधवः।। ५८.२५

(वामनपुराण-58अध्याय-)

जैमिनीयाश्वमेधपर्व (अध्याय: 9 )

शीलभंगे तु नारीणां दोषास्तु बहवो नृप ॥
स्त्रीणां नैव तु विश्वासः कर्तव्यस्तु कदाचन ॥२४॥
अन्याश्रितान्यचित्तानां विश्वासो न सुखप्रदः॥
बहुधा हसते या तु बालं च परिचुंबती ॥२५॥
दृष्ट्वा पुमांसं त्वरिता प्रस्खलंत्यनुधावति ॥
गायंती सुस्वरं हृष्टा कर्णं कंडूयते कटिम् ॥२६॥
अचैलं मस्तकं स्वं तु हासं च कुरुते वृथा ॥
ईदृशी या भवेन्नारी विज्ञेया बंधकी नरैः ॥ २७॥
वृथा परगृहं याति वृथा पश्यति तं जनम् ॥
दूतिकां जननीं वेत्ति तत्संगेऽतीवलालसा ॥ २८॥
मालाकारी नापिती च नटी प्रवाजिका तथा ॥
फणिव्रततिपत्राणि विक्रीणाति तु या भुवि ॥ २९ ॥
सैरंध्री चापि दासी च तथा पतिविवर्जिता ॥
सूतिका धवहीना च तथा कापालिनी तु या ॥
ईदृशीनां संगमेन यस्यास्तुष्यति मानसम् ॥8.३० ॥
स्वैरिणीनां तु सा राज्ञी विज्ञेया धर्मनंदन ॥
तस्माद्रक्षेत्स्त्रियं पार्थ दुष्टसंगाद्विशेषतः ॥३१ ॥
असूयकोऽथ पिशुनो नास्तिको धूर्तको नरः ॥
समीपे संस्थितो राज्ञां प्रजानां दुर्लभं सुखम् ॥ ३२ ॥
प्रजाः पालय भद्रं ते तासु नष्टासु नश्यति ॥
नाचरंति तु ये धर्मान्नृपते ब्राह्मणादयः॥ ३३ ॥
न चिन्तयन्ति देवेशं देवकीनंदनं हरिम् ॥
नास्तिकास्ते नरा ज्ञेयाः सर्वधर्मबहिष्कृताः ॥३४॥
एतैः सहासनं स्पर्शं मनसापीह नाचरेत् ॥
आराधयन्ति देवेशं प्राणिनां मुक्तिदं हरिम् ॥
देवतुल्याश्च ते ज्ञेयाश्चाण्डालोऽपि हरेः प्रियः ॥३५॥
इत्याश्वमेधिकेपर्वणि जैमिनीये व्यासवाक्यं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥


 (अध्याय: 9

युधिष्ठिर उवाच ॥
कथं लक्ष्मी स्थिरा तात प्राणिनां जायते गृहे ॥
गोविन्देन सहावासं कथं जायेत तद्वद ॥ १॥
व्यास उवाच ॥
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि यथा लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् ॥
सत्यं शौचविशेषेण प्राणिनां शिवचिंतनम् ॥ २॥
तत्र स्थिरायते लक्ष्मीस्तत्र नारायणो हरिः ॥
मातरं पितरं पुत्रो भ्रातरं ज्येष्ठमेव च ॥ ३॥
मन्यते बांधवगणं तत्र लक्ष्मीः स्थिरायते ॥
भार्या पतिपरा यत्र पतिः क्रोधवशो न चेत् ॥ ४॥
कृतं जानाति यो मानी कूटसाक्ष्यं न यो वदेत् ॥
श्राद्धं न वंचयेद्यस्तु वित्तशाठयेन पैतृकम् ॥५॥
श्रद्धावान्कुरुते कर्म दत्त्वा दानं न यो वदेत् ॥
कृत्वा शूरत्वमाजौ हि न भवेद्यो विकत्थनः॥६॥
परास्त्रियं हि वन्देत मातृतुल्यां महीपते ॥
आरामकारकश्चैव वापीकूपमठादिकृत् ॥ ७॥
तडागसत्रप्रासादविप्रमन्दिरकारकः॥
कन्यादानं च यो दद्यात्सदातीर्थावगाहकः॥८॥
सदा दानपरोऽतीतः पापाच्चैव नरोत्तमः ॥
एवंविधं नरं पार्थ रमा संश्रयते भुवि ॥९॥
दुष्टात्मानं त्यजेल्लक्ष्मीः पिशुनं वृषलीपतिम् ॥
तथा च द्यूतकर्तारं द्यूतं च तव सुप्रियम् ॥ 9.१० ॥
प्रथमं वारितश्चासि सर्वैः पार्थिवबन्धुभिः॥
दुर्योधनादिभिः साध कृतं द्यूतं वराटकैः ॥ ११ ॥
अक्षैश्चतुर्भिर्भवता क्रीडितं न च शोभनम् ॥
जितमित्येव शकुनिः सह ताताधमैर्नरैः ॥ १२॥
मया तदैव विज्ञातं कौरवाणां ध्रुवं क्षयः॥
स त्वं श्रिया परित्यक्तो द्यूतदोषेण भारत ॥ १३ ॥
त्यज्यते स श्रिया नित्यं परान्ने यस्तु लंपटः॥
मदिरापानमत्तो यो मृगयासक्तचेतनः ॥१४॥
साधुनिन्दाकरो यस्तु यस्त्वारामादिभञ्जकः॥
तस्करः काञ्चनादीनां धातूनां च तथा नृप ॥ १५॥
रसानां चैव धान्यानां पुस्तकस्यापहारकः ॥
तृणकाष्ठसमूहानां फलादीनां नराधिप ॥१६॥
स्तेनोऽपि वस्तुजातानां स श्रिया त्यज्यते नरः ॥
अमायां रविसंक्रान्तौ व्यतीपाते च वैधृतौ ॥१७॥
पितृक्षयाहे तीर्थे यो मैथुनी न रमास्पदम् ॥
इति ते कथिता धर्मा अत ऊर्ध्वं निशामय ॥१८॥
समानय त्वं गोविंदं यथा यज्ञः प्रजायते॥
विना तु वासुदेवं ते न हि वासः सुखावहः॥१९॥
जैमिनिरुवाच ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य मुनेरमिततेजसः ॥
प्रत्युवाच ततो राजा भीमं विनयतत्परम् ॥9.२०॥
युधिष्ठिर उवाच॥
भीम याहि महाबाहो कृष्णं प्रति ममाज्ञया ॥
तमानयाशु गोविन्दं पुत्रपौत्रसमन्वितम् ॥२१॥
यशोदां देवकीं देवीं सत्यभामां च रुक्मिणीम् ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य धर्मराजस्य धीमतः॥ २२ ॥
नमस्कृत्य च तं भीमः प्रतस्थे द्वारकां प्रति ॥
मार्गे बहुविधान्देशानतिचक्राम सत्वरः ॥ २३॥
नानाविधानि रम्याणि नानावृक्षयुतानि च ॥
वनानि समतिक्रम्य चचार पवनात्मजः ॥ २४॥
पर्वतान्विविधान्रम्याञ्छिखरैरतिशोभितान् ॥
अतिवेगवतीश्चैव सरितो विपुलाः पथि॥२५॥
अतिक्रम्य ददर्शासौ दूरात्कृष्णपुरीं तदा ॥
सुवर्णकलशोपेतां तोरणैरतिशोभिताम् ॥२६॥
चन्दनोदकसेकेन सिक्तमार्गा तथैव च ॥
हृष्टपुष्टजनोपेतामुग्रसेनेन पालिताम् ॥ २७॥
नानावृक्षसमाकीर्णैर्नानावाल्लिविराजितैः॥
क्रीडावनैर्विराजन्तीं प्राकारैः परिखावृताम् ॥ २८॥
अक्रूराद्या यत्र भक्ताः सेवन्ते गरुडध्वजम् ॥
रुक्मिणीसत्यभामाद्याः स्त्रियो भगवतश्च याः॥२९॥
तास्सर्वा भगवत्प्रीत्या यस्यां सेवन्ति तं हरिम् ॥
एवंविधां द्वारकां तां दृष्ट्वा भीमो महाबलः ॥9.३०॥
हर्षेण महता युक्तो बभूव जनमेजय ॥
द्वारकाया बहिर्देशे महासरसि शोभने ॥३१॥
स्नात्वा सर्वविधिं कृत्वा प्रवेशायोपचक्रमे ॥
परद्वारेण संप्राप्य द्वारवत्यां वृकोदरः॥३२॥
यदा प्रवेशं कुरुते मन्दिरे माधवस्य सः॥
तदा स कुरुते कृष्णो भोजनं बहुभिर्वृतः ॥३३॥
रम्यं तु देवकीदत्तं पात्रे वै काञ्चने शुभे ॥
कचोलानां चतुःषष्टिन्यस्ते सुघटिते हरिः॥३४॥
पायसं चन्द्रसंकाशं सितशर्करया युतम्।।
भक्तं कुमुदवर्णाभं मुद्गदालिस्तथैव च॥३५॥
नानाव्यंजनसंयुक्तं त्रिभिः पंक्तिभिरेव च॥
निम्बूरसेन सार्द्रेण फलमूलयुतेन च॥३६॥
विकृतानि कृतान्येव शतशो भोजने विभो ॥
मरीचं पिप्पली चार्द्रं रंभाशर्करया युता ॥३७॥
सितया सहितेनाथ दुग्धेन क्वथितेन च ॥
घृतं सितायुतं देव्या दत्तं प्रीत्या यशोदया ॥३८॥
पूरिकाश्च तथा क्षीरविकाराश्च प्रसाधिताः ॥
मृद्वीका शिंशपा चूत करमर्दकृताः शुभाः ॥३९॥
मरीचपिप्पलीयुक्ता एलाचंद्रकसंयुताः॥
क्वथिताः कथिका यस्मिन्भोजने भूरिशो हरेः॥ 9.४० ॥
प्रलेहिकाः कृता यत्र कचोले रससंयुताः॥
नानाकुसुमसंमोदयुक्ताः सूदैः कृता हि ते॥४१॥
मण्डका वर्तुला रम्याः समाः सर्वत्र बिंबवत् ॥
मधुयुक्तेन गव्येन युक्ते तस्मिन्सुभाजने ॥४२॥
काञ्चने तु कचोले वै स्थितं कांचनसुप्रभम् ॥
घृतं सुवासितं प्रीत्या दत्तं देव्या यशोदया ॥४३॥
तत्र गोधूमचूर्णेन चन्द्रकेण विलोडितम् ॥
घृतं न दृश्यते तत्र काञ्चनप्रभयान्वितम् ॥४४॥
सौहालिकाः पूरिकास्तु शतच्छिद्रास्तु वेष्टिकाः॥
पूपिकास्तु तथा क्षीरविकारास्तु प्रकाशिकाः॥४५॥
मणयः सूत्रसंघाश्च मालतीकुसुमादयः॥
पर्पटाः कर्बुरा रम्या माषकूष्माण्डसंयुताः॥४६॥
वटकान्विविधान्रम्यान्भुंक्ते वै देवकीसुतः ॥
हिंगुजाजीरमरिचैः पूरितार्द्रेण ते शुभाः ॥४७॥
शुक्लेन लवणेनापि शुद्धतैलेन पूरिताः॥
कुंकुमाभाः स्नेहहीनाः सक्षता इव दुर्जनाः॥४८॥
दधिदुग्धयुताः केचिच्चिंचिणीचूतसंयुताः॥
द्राक्षारसयुताः केचित्तथान्ये कथिकायुताः॥४९॥
राजिकाजलमध्याश्च शुभान्ये सितया युताः॥
रसैश्चतुर्भिश्चैवान्ये वटका नवधा स्थिताः॥9.५०॥
वज्रप्रभास्तु कनकाश्चारबीजसुखारिकैः॥
शकलैर्नारिकेलस्य लवंगशतसंयुतैः॥५१॥
घृतक्षीरसितान्यस्ताः कटाहे तु प्रलोडिताः ॥
लब्ध्वा सितास्तु कृसरं रम्यास्तत्रैव फेनिकाः ॥५२॥
पेडारिकास्तु वै बह्वयः कृता राजन्कवोष्णिकाः॥
मोदकास्तत्र संभूताश्चारबीजभवाः परे॥५३॥
सितया तु कृताश्चान्ये दुग्धाज्येन विनिर्मिताः॥५४॥
नारिकेलफलैश्चान्ये तिलैश्चणकबीजकैः॥
ईदृशान्मोदकान्रम्यान्कृष्णस्यार्थे तु भोजने ॥५५॥

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मांसं तु संस्कृतं सूदैर्मृगवाराहसंभवम्॥
शाशिकं रौहिकं चैव चैत्तलं मेषसंभवम् ॥५६॥

मस्त्यंमांसं लाविकं च तैत्तिरं रुचिदायकम् ॥
नानारसयुतं रम्यं बुभुजे देवकीसुतः ॥५७॥
अर्शोऽघ्नं मानिनीकंदं सिंधुवारेन्द्रवाहकम् ॥
नारिंगं चिंचिडीकंद कौकुरीफलमेव च॥५८॥
दशारं कर्कटीजातं शुभं निंबफलं शिवम् ॥
टिंटाफललवंगंच श्रीफलं नीरकल्ककम् ॥ ५९॥
वल्कलं वंशकारीरं तथा कायफलं नवम् ॥
द्राक्षाफलं चूतफलं रम्यं कंटकितं फलम् ॥ 9.६० ॥
धात्रीफलं शुक्तिभवं फलमंबाडकं तथा ॥
रंभाफलं पिप्पली च मरीचाश्च मनोहराः ॥६१ ॥
शुद्धसर्षपतैलेन लवणेन च वेष्टितम् ॥
तथा राजिकया विद्धं त्रिभिर्वर्षैर्घटेस्थितम् ॥ ६२ ॥
भुंक्ते च भगवांस्तत्र देवकीवाक्यतोषितः ॥
समीपस्था रुक्मिणी तु लक्ष्मणा चारुलोचना ॥ ६३ ॥
सत्यभामाजांबवतीव्यजनेन समन्विताः॥
चारुनूपुरसंरावा रणद्वलयमेखलाः ॥ ६४ ॥
हारकेयूरशोभिन्यः कृष्णपार्श्वे सुसंस्थिताः ॥
पृथक्पृथङ्निरीक्षंत्यो वीजयन्त्यो हसंति च ॥ ६५॥
कथयंत्यः कथाः काश्चिन्निरीक्षंत्यो जगत्प्रभुम् ॥
पारिजातभवान्यानि बिभ्रंत्यः कुसुमानि ताः॥६६॥
सत्यभामा स्मितं कृत्वा कृष्णं वचनमब्रवीत् ॥
सत्यभामोवाच ॥
सांप्रतं भोजनं कृष्ण समीचीनं सुशिक्षितम् ॥ ६७॥
गोपालत्वं परित्यज्य तक्रपानं तथोदकम् ॥
ईषन्नम्रो भवान्भूत्वा दुग्धं पक्वं तु यः पुरा ॥ ६८॥
पीत्वा च धावसेऽरण्ये कालिंदीतीरसंस्थितः ॥
गोपालानां यदन्नानि हरसे तत्तु विस्मृतम् ॥ ६९॥
इदानीं मानुषं धर्मं जानाति सकलं भवान् ॥
धर्मपुत्रस्य संगत्या विज्ञातं भवताखिलम्॥9.७०॥
चामरैर्वीज्यते दिव्यैः पश्य रुक्मिणि वैभवम् ॥
अस्याश्रयेण मे नाशः कर्मणः संभविष्यति ॥ ७१॥
मत्तोऽन्यां पट्टमहिषीमात्मानं च सुशोभनम् ॥
न मां पश्यति कल्याणि भुञ्जानां कर्मणां फलम् ॥ ७२ ॥
आयामि यामि पुरतो न मां वारयते हरिः ॥
वेदभाषितमाकर्ण्य कृष्णे मे रमते मनः ॥७३॥
तस्मान्मयापि क्रियते सेवनं सर्वदा क्षितौ ॥
देवक्युवाच ॥
न लज्जसे कथं त्वं वै ब्रुवंती केशवं प्रति ॥ ७४॥
अहं तथाऽस्य जननी वसुदेवोऽस्य वै पिता ॥
उभाभ्यां क्रियते कर्म कृष्णतुष्टिकरं परम् ॥ ७९ ॥
निखिलोऽयं पुरा देहे विधृतस्तु मया लघुः ॥
अहं करोम्यस्य कर्म ब्रुवती त्वं न लज्जसे ॥ ७६॥
ममोदरे यदा प्राप्तस्तदा प्राप्तं सुबन्धनम् ॥
वसुदेवेन वीरेण पश्य त्वं कर्मणो गतिम् ॥७७॥
अलक्ष्यलक्षणश्चायं संवृतः शत्रुसूदनः॥
तस्मान्माता चास्य पिता न भार्या प्राप्नुते सुखम् ॥७८॥
सर्वे स्वकर्मणा भद्रे जीवंत्येव हि मानवाः ॥
ये भजन्ति हरिं कृष्णं प्राप्नुयुस्ते सुखं शुभे ॥ ७९ ॥
सत्यभामोवाच ॥
भवत्या साधुवचनं प्रोक्तं कृष्णस्य सन्निधौ ॥
तत्कथं वै प्रशंसंति सर्वे विप्रा जनार्दनम् ॥ 9.८० ॥
एनं हि तावकं पुत्रं विस्मयस्तत्र मेऽपरः॥
कर्मणां नाशकृद्देवो महतां देवकीसुतः॥ ८१ ॥
अस्मिन्देहे महत्कष्टं कुर्वाणां वेत्ति माधवः ॥
हृदये तु धृतः पूर्वं त्वया नैव निरीक्षितः॥ ८२॥
मया तु धार्यते भद्रे हृदये परिदृश्यते ॥
तस्मात्ते कर्मणां नाशः क्रियते ह्यमुना शुभे॥८३॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्रसन्नवदनो हरिः॥
यावद्वदति तां देवीं तावद्भीमः समागतः॥८४॥
दृष्ट्वा तदा समायांतं हृषीकेशो वृकोदरम् ॥
वारयामास हि तदा सैरन्ध्रीवचनेन तम् ॥ ८५॥
किं वदिष्यति भीमोऽसाविति बुद्ध्या नराधिप ॥
कौतुकी भीमवचनश्रवणे सर्वदा हरिः ॥ ८६॥
इत्याश्वमेधिके पर्वणि जैमिनीये भीमागमो नाम नवमोऽध्यायः॥९॥