सबसे पहले तो नव बौद्ध का यह मानना भी युक्ति युक्त नहीं कि कुषाण वंशी वासुदेव ही कृष्ण का रूपान्तरण है।
हाँ इतना कहा जा सकता है कि सम्भवत: वासुदेव कनिष्क के उत्तराधकारी मध्य एशिया( तुर्की और चीनी) यू-ची कबीले के थे जो चरावाहे थे। कृष्ण का स्वतन्त्र उल्लेख ऋग्वेद से लेकर छान्दोग्य
उपनिषद में भी मिलता है जो पुराणों और रामायण, महाभारत से प्राचीनत्तम भारतीय साहित्य हैं।
सिन्धु सभ्यता की मोहन-जोदारो की खुदाई में भी कृष्ण चरित्र से सम्बम्धित "ओखल बन्धन" और यमलार्जुन वृक्षों के दृश्यों से अंकित पत्थर मिले हैं।
मोहनजो-दारो सिंधी शब्द है। जिसका अर्थ है 'मृतकों का टीला' और कभी-कभी
इसका अर्थ '
मोहन का टीला' भी होता है। और यह मोहन कौन था ? सभी जानते हैं।
कम से कम 40,000 लोगों की अनुमानित आबादी के साथ, मोहनजो-दारो लगभग 1700 ईसा पूर्व तक समृद्ध रहा।
सिन्धु घाटी की सभ्यता सम्भवतः ईसा पूर्व नवम सदी तक जीवन्त रही होगी ।
कृष्ण, शिव, दुर्गा, जैसे पौराणिक पात्रों की प्रतिमाएँ भी यहाँ भी मिली हैं।
यह मोहनजो-दारो, लरकाना जिले, सिंध (अब पाकिस्तान में) के पुरातात्विक स्थल है जहाँ से खोदी गई एक साबुन की टेबलेट प्राप्त है।
विशेष:-
टेबलेट- सोपस्टोन (जिसे स्टीटाइट या सोपरॉक के नाम से भी जाना जाता है) एक टैल्क-शिस्ट है, जो एक प्रकार की रूपांतरित चट्टान है। यह मुख्य रूप से मैग्नीशियम से भरपूर खनिज टैल्क से बना है। यह डायनेमोथर्मल मेटामोर्फिज्म और मेटासोमैटिज्म द्वारा निर्मित होता है, जो उन क्षेत्रों में होता है जहां टेक्टोनिक प्लेटें नीचे जाती हैं, गर्मी और दबाव से, तरल पदार्थ के प्रवाह के साथ, लेकिन पिघले बिना चट्टानों को बदलती हैं। यह हजारों वर्षों से नक्काशी का एक माध्यम रहा है।
यह टेबलेट भगवान कृष्ण के जीवन की एक महत्वपूर्ण कहानी के साथ अद्भुत समानता दर्शाता है।
टैबलेट में एक बालक को दो पेड़ों को उखाड़ते हुए दिखाया गया है। इन दोनों पेड़ों से दो मानव आकृतियाँ निकल रही हैं और कुछ पुरातत्वविदों इसे भगवान कृष्ण से जुड़ी तारीखें तय करने के लिए एक दिलचस्प पुरातात्विक खोज करार दे रहे हैं।
यह छवि यमलार्जुन प्रकरण- (भागवत और हरिवंश पुराण दोनों में उल्लिखित) से मिलती जुलती है।
टैबलेट पर मौजूद युवा लड़के के भगवान कृष्ण होने की बहुत संभावना है, और पेड़ों से निकलने वाले दो इंसान दो शापित गंधर्व हैं, जिन्हें नलकूबर और मणिग्रीव के रूप में पहचाना जाता है।
ऊपर: मोहेंजो-दारो, लरकाना जिला, सिंध (अब पाकिस्तान में) के पुरातात्विक स्थल से सोपस्टोन टैबलेट की खुदाई की गई। स्रोत - मैके की रिपोर्ट, भाग 1, पृष्ठ 344-45, भाग 2, प्लेट 90, वस्तु संख्या। डीके 10237.
दिलचस्प बात यह है कि मोहनजो-दारो में खुदाई करने वाले डॉ. ईजेएच मैके" ने भी इस छवि की तुलना यमलार्जुन प्रकरण से की है। इस विषय के एक अन्य विशेषज्ञ प्रो. वीएस अग्रवाल ने भी इस पहचान को स्वीकार किया है। इसलिए, यह काफी सम्भव है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग भगवान कृष्ण की कहानियों से अवगत थे। बेशक, इस तरह का एक और पृथक साक्ष्य तथ्यों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। हालाँकि, सबूतों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में और अधिक अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है।
द्वारिका के साथ सिन्धु घाटी सभ्यता के स्थलों (पूरे उपमहाद्वीप में) की भौगोलिक निकटता को देखते हुए, इस कोण को भी ध्यान में रखते हुए अनुसंधान किया जाना चाहिए।
जबकि मोहनजो-दारो शब्द का आम तौर पर स्वीकृत अर्थ 'मुर्दों का टीला' है, इसके समानांतर अर्थ - 'मोहन का टीला' की जांच की भी कुछ गुंजाइश है। समानता एक संयोग से भी अधिक हो सकती है!
रुचि रखने वालों के लिए मोहनजो-दारो की पृष्ठभूमि की जानकारी (स्रोत:www.harappa.com)
मोहनजो-दारो की खोज मूल रूप से 1922 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक अधिकारी आरडी बनर्जी ने की थी, हड़प्पा में प्रमुख खुदाई शुरू होने के दो साल बाद।
बाद में, 1930 के दशक के दौरान "जॉन मार्शल, केएन दीक्षित, अर्नेस्ट मैके" और कई अन्य लोगों के निर्देशन में साइट( स्थल ) पर बड़े पैमाने पर खुदाई की गई।
हालाँकि उनके तरीके उतने वैज्ञानिक या तकनीकी रूप से अच्छे नहीं थे जितने होने चाहिए थे, फिर भी वे बहुत सारी जानकारी लेकर आए जिसका अभी भी विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जा रहा है।
इस स्थल पर अन्तिम प्रमुख उत्खनन परियोजना 1964-65 में स्वर्गीय डॉ. जीएफ डेल्स द्वारा की गई थी, जिसके बाद मौसम से उजागर संरचनाओं को संरक्षित करने की समस्याओं के कारण खुदाई रोक दी गई थी।
1964-65 के बाद से साइट पर केवल बचाव उत्खनन, सतह सर्वेक्षण और संरक्षण परियोजनाओं की अनुमति दी गई है।
इनमें से अधिकांश बचाव अभियान और संरक्षण परियोजनाएं पाकिस्तानी पुरातत्वविदों और संरक्षकों द्वारा संचालित की गई हैं।
(1980) के दशक में व्यापक वास्तुशिल्प दस्तावेज़ीकरण, विस्तृत सतह सर्वेक्षण, सतह स्क्रैपिंग और जांच के साथ मिलकर जर्मन और इतालवी सर्वेक्षण टीमों द्वारा डॉ. माइकल जानसन (आरडब्ल्यूटीएच) और डॉ. मौरिज़ियो तोसी (आईएसएमईओ) के नेतृत्व में किया गया था।
हड़प्पा सभ्यता की तिथि कार्बन डेटिंग पद्धति द्वारा 2500 ई०पूर्व से (1750) ई० पूर्व तक निर्धारित की जती है।
शिलापट पर श्रीकृष्ण जन्म के प्रमाण-
भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा में जन्म लेने को लेकर भारतीयों में कोई संदेह नहीं। धर्मग्रंथों में उनकी न जाने कितनी लीलाओं का वर्णन है। इसके पुरातात्विक प्रमाण भी मौजूद हैं, लेकिन आमतौर पर जानकारी में नहीं हैं। सत्तानवे साल पहले गताश्रम टीला से मिली मूर्ति को भगवान कृष्ण के जन्म का पुरातत्व में पहला प्रमाण है।
धर्मग्रन्थ-
इस क्रम में पहले हम तमिलनाडु के ऐतिहासिक नगर महाबलिपुरम् से सम्बन्धित तथ्यों का भी विश्लेषण करते हैं। जे मथुरा ी पृष्ठ भूमि रर
जिसमें प्राप्त शिलाओं पर कृष्ण बांसुरी बजाते हुए अंकित हैं।
यह ऐतिहासिक सन्दर्भ है-
महाबलिपुरम के तट मन्दिर को दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में माना जाता है जिसका सम्बन्ध आठवीं शताब्दी से है।
महाबलिपुरम् (Mahabalipuram) या कहें मामल्लपुरम् (Mamallapuram) भारत के तमिलनाडु राज्य के चेंगलपट्टु ज़िले में स्थित एक प्राचीन नगर (शहर) है।
यह मन्दिरों का शहर राज्य की राजधानी, चेन्नई, से (55) किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी से तटस्थ है।
चैन्नई का पुराना नाम मदुरैई है जिसका शुद्ध रूप मथुरा है।
स्थानीय लोग इसे (तेन मदुरा) कहते हैं, यानि दक्षिणी मथुरा - उत्तर भारत के मथुरा की उपमा में यह नाम है।
क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक रूप से पाण्ड्य राजाओं का शासन रहा है, चोळों के साम्राज्य में भी यहाँ पाण्ड्यों की उपस्थिति रही है।
याद रहे कि तमिळ लिखावट को देखकर यह निश्चित नहीं किया जा सकती है। कि इसका नाम और उच्चारण मथुरा था। या मतुरा या मदुरा या मधुरा - तमिळ उच्चारण में भी यह अन्तर स्पष्ट नहीं होता।
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पल्लव राजाओ की विरासत -
महाबलिपुरम प्राचीन शहर अपने भव्य मंदिरों, स्थापत्य और सागर-तटों के लिए बहुत प्रसिद्ध है।सातवीं शताब्दी में यह शहर पल्लव(आभीर) राजाओं की राजधानी था।
द्रविड वास्तुकला की दृष्टि से यह शहर अग्रणी स्थान रखता है। यहाँ पर पत्थरो को काट कर मन्दिर बनाया गया। पल्लव वंश के अन्तिम शासक अपराजित थे। वे कभी भी किसी से पराजित नहीं हुए।
यह मन्दिर द्रविड वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। यहाँ तीन मन्दिर हैं। बीच में भगवान विष्णु का मन्दिर है जिसके दोनों तरफ से शिव मन्दिर हैं। मन्दिर से टकराती सागर की लहरें एक अनोखा दृश्य उपस्थित करती हैं।
इसे महाबलीपुरम् का रथ मंदिर भी कहते है। इसका निर्माण "नरसिंह वर्मन्" प्रथम ने कराया था। नरसिंह वर्मन, पल्लव राजवंश का एक शक्तिशाली शासक था, जिसने 630 से 668 ईस्वी तक शासन किया।
प्रारम्भ में इस शहर को "मामल्लपुरम" कहा जाता था।
महाबलिपुरम के लोकप्रिय रथ दक्षिणी सिर पर स्थित हैं।
महाभारत के पाँच पाण्डवों के नाम पर इन रथों को पाण्डव रथ कहा जाता है। पाँच में से चार रथों को एकल चट्टान पर उकेरा गया है।
द्रौपदी और अर्जुन रथ वर्ग के आकार का है जबकि भीम रथ रेखीय आकार में है।
धर्मराज रथ सबसे ऊंचा है।
इसमे दौपदी के पाँच रथमन्दिर हुए। क्योंकि उसके पांच पति थे। इस लिए उसके पांच रथमंदिर हुए।
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कृष्ण मण्डपम्-
यह मन्दिर महाबलिपुरम के प्रारम्भिक पत्थरों को काटकर बनाए गए मन्दिरों में से एक है। मन्दिर की दीवारों पर ग्रामीण जीवन की झलक देखी जा सकती है। एक चित्र में भगवान कृष्ण को गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाए तथा बाँसुरी बजाते हुए दिखाया गया है।
यमुना में कृष्ण और गोपिकाओं का सबसे पहला उल्लेख-
निम्नलिखित पंक्तियों का अनुवाद डॉ. कामिल ज़्वेलेबिल द्वारा किया गया है।
नर हाथी अपनी मादा के खाने के लिए कोमल टहनियों को नष्ट कर देता है, उसकी तुलना "माल" से की जाती है, जो कपड़े पहनने के लिए पेड़ों की शाखाओं (यानी कुरुंतमारम, कन्नन द्वारा काटा गया जंगली चूना) पर चलते हुए रौंदता (चलता, कूदता, मिटिट्टु) बनाता है।
पानी से भरी तोलुनाई नदी के दूर-दूर तक फैले रेत वाले चौड़े घाट के [किनारों पर] ग्वालों अंतर- (आयर) समुदाय की युवा महिलाओं (मकलिर) को ठण्ड लगती है।
और डॉ. ज़्वेलेबिल के अनुसार, किंवदन्ती का यह संस्करण किसी भी संस्कृत स्रोत को ज्ञात नहीं है। सबसे पहला संस्कृत स्रोत या तो भागवतपुराण/ अथवा देवीभागवत महापुराण या विष्णुपुराण प्रतीत होता है।
साइन्स जर्नी चैनल का यूट्यूबर "कृष्ण" शब्द को सातवीं आठवीं सताब्दी का मानता है । जबकि
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ऋग्वेद की सबसे पुरानी प्रति भोजपत्र पर लिखी हुई है, जिसे पुणे (महाराष्ट्र) के भण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) में रखा गया।शारदा लिपि का समय मुख्यतः (8)वीं से (13)वीं शताब्दी ईस्वी तक माना जाता है, हालांकि इसकी उत्पत्ति (8)वीं शताब्दी के आसपास पश्चिमी ब्राह्मी लिपि से हुई मानी जाती है. यह कश्मीर और आसपास के उत्तर-पश्चिमी भारतीय क्षेत्रों में संस्कृत और कश्मीरी भाषाओं को लिखने के लिए व्यापक रूप से उपयोग की जाती थी, खासकर कश्मीर में 13वीं शताब्दी तक यह फली-फूली.
शारदा लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि की पश्चिमी शाखा से हुआ.
इसके सबसे पुराने ज्ञात अभिलेख (8)वीं शताब्दी के आसपास के हैं.।
यह लिपि (13)वीं शताब्दी तक कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पञ्जाब में व्यापक रूप से प्रचलित थी.
यह कश्मीर की मूल लिपि है और शारदा देवी (ज्ञान की देवी) के नाम पर रखी गई है.
इसका उपयोग कश्मीर में ही नहीं, बल्कि पंजाब और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में भी होता था, जहाँ से गुरुमुखी और टाकरी जैसी लिपियाँ विकसित हुईं.
प्राचीन वैदिक साहित्य का एक बड़ा हिस्सा इसी लिपि में लिखा गया है.
आजकल शारदा लिपि का उपयोग बहुत सीमित है और केवल कश्मीरी पंडित समुदाय द्वारा धार्मिक और ज्योतिषीय उद्देश्यों के लिए कभी-कभी किया जाता है.
इसे संरक्षित करने और पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, क्योंकि यह भारतीय सभ्यता की एक महत्वपूर्ण विरासत है.
ऋग्वेद की प्राचीन लिपि शारदा लिपि में है
जबकि बाकी (29) मेनुस्क्रिप्ट (पाण्डुलिपि) देवनागरी लिपि में भी हैं.
इनमें बहुत से ऐसे फीचर हैं, शब्दों के ऐसे उच्चारण हैं, जो फिलहाल आधुनिक प्रतियों में कहीं नहीं दिखते हैं।.
शारदा लिपि का व्यवहार ईसा की दसवीं शताब्दी से उत्तर-पूर्वी पंजाब और कश्मीर में देखने को मिलता है।
एक यूरोपीय. विद्वान "ब्यूह्लर का मत था कि शारदा लिपि की उत्पत्ति गुप्त लिपि की पश्चिमी शैली से हुई है, और उसके प्राचीनतम लेख (8) वीं शताब्दी से मिलते हैं।
"श्रीकृष्ण का ऐतिहासिक और साहित्यिक स्रोत-
एक व्यक्तित्व के रूप में कृष्ण का विस्तृत विवरण सबसे पहले ऋग्वेद और उसके बाद छान्दोग्योपनिषद में मिलता है।
फिर बहुत बाद में महाकाव्य महाभारत में कृष्ण के विषय में लिखा गया है , जिसमें कृष्ण को विष्णु के पूर्ण-अवतार के रूप में दर्शाया गया है। जबकि महाभारत से पूर्व लिखित ग्रन्थ ब्रह्म वैवर्तपुराण में कृष्ण को विष्णु का भी मूल कहा गया है।
महाभारत के बाद के परिशिष्ट हरिवंशपुराण में कृष्ण के बचपन और युवावस्था का एक विस्तृत संस्करण है। इसके अतिरिक्त
भारतीय-यूनानी मुद्रण में भीकृष्ण चरित्र अंकित हैं।-
(180) ईसा पूर्व लगभग इण्डो-ग्रीक राजा एगैथोकल्स ने देवताओं की छवियों पर आधारित कुछ सिक्के जारी किये थे।
भारत में अब उन सिक्को को वैष्णव दर्शन से सम्बन्धित माना जाता है। सिक्कों पर प्रदर्शित देवताओं को विष्णु के अवतार बलराम -( संकर्षण) के रूप में देखा जाता है जिसमें गदा और हल और वासुदेव-कृष्ण , शंख और सुदर्शन चक्र दर्शाये हुए हैं।
प्राचीन संस्कृत व्याकरण भाष्यकार पतंजलि ने अपने महाभाष्य में भारतीय ग्रन्थों के देवता कृष्ण और उनके सहयोगियों के कई सन्दर्भों का उल्लेख किया है।
पाणिनी की श्लोक- (३/१/२६) पर अपनी टिप्पणी में, वह कंसवध अथवा कंस की हत्या का भी उल्लेख करते हैं, जो कि कृष्ण से सम्बन्धित किंवदन्तियों का एक महत्वपूर्ण अंग है।
पाणिनि का समय भी ईसा पूर्व 800 से 400 के मध्य है, विद्वान् जन पाणिनि का समय भगवान बुद्ध से पूर्व बताते हैं। पाणिनी पणि ( फोनीशियन ) जाति से सम्बन्धित थे जिन्होंने भाषा और लिपि पर कार्य किया।
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दुनियाँ की प्रथम लिपि फोनेशियन है पणि लोगो की देन है जिससे कालान्तर में दुनियाभर की अन्य लिपियाँ विकसित हुई । पणियों का उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है ।
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