रविवार, 22 मार्च 2026

कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे

ऋग्वेद के दसवें मण्डल के 21वें सूक्त के तीसरे मन्त्र (ऋग्वेद १०/२१/३) का अर्थ और भावार्थ निम्नलिखित है।

मन्त्र:
त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव ।
कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे ॥३॥
सायण भाष्य-
धर्माणः =यज्ञस्य धारयितार ऋत्विजः जुहूभिः= संपूर्णाहुतिभिर्होमपात्रैः त्वे =त्वामेव आसते= उपासते सेवन्ते । तत्र दृष्टान्तः । सिञ्चतीरिव । वृष्टिलक्षणाः पृथिवीं सिञ्चन्त्य आपोऽग्निं यथा स्वपितृत्वेन सेवन्ते तद्वत् । अग्नेरापः (तै. आ. ८.१ ) इति श्रुतेस्तस्यापां पितृत्वम् । यद्वा । जुहूभिः सिञ्चतीरिव सिच्यमाना आहुतय इव धर्माणस्त्वया धार्यमाणा रश्मयस्त्वे त्वय्यासते निवसन्ति । हे अग्ने त्वं कृष्णा =कृष्णवर्णानि अर्जुना अर्जुनानि= श्वेतवर्णानि ज्वालान्तर्गतरूपाणि च विश्वाः सर्वाः श्रियः शोभाः अधि धिषे अधिकं यथा भवति तथा धारयसि । किमर्थम् । वः= युष्माकं सर्वेषां देवानां विमदे विविधसोमपानजन्यमदार्थम् । यत एवमतः विवक्षसे त्वं महान् भवसि ॥ 

पदार्थान्वय (हिंदी अर्थ):
(त्वे) हे अग्निदेव (अग्रणी परमात्मा)! तेरे ही आश्रय में,
(धर्माणः-आसते) तुम्हारे गुणों के धारक (उपासक/धर्मी) विराजते हैं।
(जुहूभिः-सिञ्चतीः-इव) जिस प्रकार होम के चम्मच (जुहू) से घृत की धाराएं होमाग्नि में सिंची जाकर आश्रय लेती हैं,
(कृष्णा अर्जुना रूपाणि) उसी प्रकार हे अग्नि! तुम कृष्ण (धूममय/श्याम) और अर्जुन (श्वेत/शुद्ध) रूपों (अग्नि की लपटों) को धारण करते हो।
(वि वो मदे) हर्ष के निमित्त, विशिष्ट रूप से (वि) उस (तुझे) वरण करते हैं (स्तोता)।
(विश्वाः श्रियः-अधि धिषे) तुम सब प्रकार की सम्पदाओं/शोभाओं को धारण करते हो।
(विवक्षसे) हे अग्नि! तुम महान् हो। 


भावार्थ:
यह मन्त्र अग्निदेव की स्तुति में है, जिसमें अग्नि को प्रकाश, ज्ञान और शक्ति का प्रतीक माना गया है। जैसे यज्ञ में जुहू (चम्मच) से घृत सिंचा जाता है और अग्नि उसे अपने में समाहित कर लेती है, वैसे ही धर्मी मनुष्य अपने गुणों से परमात्मा के आश्रय में रहते हैं। अग्नि या परमात्मा कृष्ण (अंधकार-नाशक) और अर्जुन (उज्ज्वल-प्रकाशमय) दोनों रूपों को धारण करने वाले हैं। स्तोता कहता है कि हे अग्नि! आप ज्ञान और संपत्ति को धारण करने वाले हैं और स्तुति के योग्य हैं। 


इस संस्कृत व्याख्या का हिंदी अनुवाद और व्याकरणिक विश्लेषण नीचे दिया गया है:
हिंदी अनुवाद
"धर्मों (यज्ञ के नियमों) को धारण करने वाले ऋत्विज, 'जुहू' (होमपात्रों) और पूर्ण आहुतियों के साथ तुम्हारी ही उपासना (सेवा) करते हैं। इसमें उदाहरण यह है— जैसे सींचने वाले जल के समान। जिस प्रकार वर्षा रूपी जल पृथ्वी को सींचता हुआ अग्नि को अपने पिता के रूप में सेवा प्रदान करता है (क्योंकि श्रुति कहती है 'अग्नि से जल उत्पन्न हुए', अतः अग्नि जलों का पिता है), वैसे ही वे ऋत्विज तुम्हारी सेवा करते हैं। 
अथवा (दूसरा अर्थ), जुहू के द्वारा सींची जाने वाली आहुतियों के समान, तुम्हारे द्वारा धारण की गई किरणें तुममें ही निवास करती हैं। हे अग्नि! तुम कृष्ण (काली) और अर्जुन (सफेद) वर्ण वाली ज्वालाओं के भीतर रहने वाली सभी शोभाओं (शक्तियों) को अत्यधिक धारण करते हो। किसलिए? तुम सभी देवताओं के 'विमद' (सोमपान से उत्पन्न विशेष हर्ष या आनंद) के लिए इन्हें धारण करते हो। क्योंकि तुम ऐसा करते हो, इसलिए तुम महान कहलाते हो।"


व्याकरणिक टिप्पणी (Grammatical Analysis)
इस गद्यांश में प्रयुक्त प्रमुख शब्दों की व्याख्या इस प्रकार है:
धर्माणः: (धृ + मन्) यहाँ यह यज्ञीय नियमों या कर्मों को धारण करने वाले ऋत्विजों के लिए प्रयुक्त है।
त्वे: यह 'त्वाम्' (तुममें/तुम्हारी) के अर्थ में वैदिक प्रक्रिया का पद है (युष्मद शब्द, सप्तमी एकवचन का छान्दस रूप)।
आसते: 'आस्' धातु (अदादिगण, आत्मनेपद, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन)। इसका अर्थ 'बैठना' या 'उपासना करना' है।
सिञ्चतीरिव: 'सिञ्चत्यः' + 'इव'। सिच् (सींचना) धातु से 'शतृ' प्रत्यय और स्त्रीलिंग में 'ङीप्' होकर 'सिञ्चन्त्यः' बनता है, जिसका वैदिक रूप यहाँ 'सिञ्चतीः' है।
धिषे: 'धा' (धारण करना) धातु, लट् लकार (छान्दस), मध्यम पुरुष एकवचन। इसका अर्थ है 'तुम धारण करते हो'।
विमदे: वि + मद (हर्ष/नशा)। यहाँ यह देवताओं के सोमपान जन्य आनंद के लिए प्रयुक्त है।
विवक्षसे: 'वह्' धातु के यङ्-लुगन्त प्रक्रिया या अतिशयता के अर्थ में प्रयुक्त पद, जिसका अर्थ 'महान होना' या 'अत्यधिक प्रदीप्त होना' है।
विशेष संदर्भ
यह व्याख्या ऋग्वेद के किसी मन्त्र (संभवतः अग्नि सूक्त) पर आधारित है, जहाँ अग्नि को जलों का उत्पादक (पिता) और सभी प्रकाशों (शुक्ल-कृष्ण) का आधार बताया गया है।
क्या आप इस मंत्र का मूल संस्कृत श्लोक या इसके विशिष्ट पद के बारे में और अधिक जानना चाहेंगे?

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