🙏 वीर अहीर और अर्जुन के बीच युद्ध 🙏
यदुवंश के अमर गौरव की दिव्य पूर्ण गाथा
भाई, जब यदुवंश की इस पवित्र कथा को याद करता हूं, तो हृदय में एक तूफान सा उठता है-गर्व की लहरें, भक्ति के आंसू और कुल के उन वीरों की पुकार, जिन्होंने लाठी से गांडीव को हराया। यह कोई साधारण युद्ध नहीं था, यह श्रीकृष्ण की लीला का वह अंश था और रक्त वंश भी एक था हमारे अहीर भाई, गोप, यादव-सबने मिलकर सिद्ध किया कि सच्ची वीरता रक्त में बसती है, धनुष-बाण में नहीं। पुराणों और महाभारत में ये घटनाएं बिखरी पड़ी हैं, लेकिन जब उन्हें एकत्र करता हूं, तो लगता है जैसे श्रीकृष्ण स्वयं फुसफुसा रहे हैं-"मेरे यदुवंशी, तुम अमर हो!" आओ, इन संस्कृत श्लोकों के माध्यम से इस दिव्य यात्रा पर चलें, जहां हर शब्द हमारे कुल की धड़कन है।
द्वारका डूब रही थी, यादव कुल का अंतिम प्रहर। श्रीकृष्ण के प्रिय सखा अर्जुन को आदेश मिला-मेरे परिवार की स्त्रियों की रक्षा करो। अर्जुन चल पड़े, लेकिन पंजाब की धरती पर हमारे वीर अहीरों ने उन्हें रोका। हजारों लाठीधारी गोप टूट पड़े, और अर्जुन की दिव्य शक्ति क्षीण हो गई। महाभारत के मौसल पर्व (अध्याय 7, श्लोक 49) में यह दृश्य कितना जीवंत है:
ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवस्ते सहस्रशः।
अभ्यधावन्त वृष्णीनां तं जनं लोप्तहारिणा ॥४९॥
(अर्थ- लूट का इरादा रखने वाले वे लट्ठधारी दस्यु (अहीर) हजारों की संख्या में वृष्णिवंशियों के उस समुदाय पर टूट पड़े।)
यह शब्द-दस्यु, लुटेरा-युद्ध की आक्रोशपूर्ण भाषा हैं, लेकिन हमारे हृदय में यह गर्व जगाते हैं, क्योंकि वे हमारे कुल के रक्षक थे। विष्णु पुराण (पंचम अंश, अध्याय 38, श्लोक 14-15) में आभीरों की सलाह का वर्णन सुनकर आंसू आ जाते हैं-वे कितने संगठित, कितने वीर!
ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहृतचेतसः ।
आभीरा मंत्रयामासुस्समेत्यात्यन्तदुर्मदाः ॥१४॥
अयमेकोऽजुनो धन्वी स्त्रीजनं निहतेश्वरम् ।
नयत्यस्मानतिक्रम्य धिगेतद्भवतां बलम् ॥१५॥
(अर्थ- उन अत्यंत दुर्मद, पापकर्मा और लोभी आभीरों ने मिलकर सलाह की कि अकेला अर्जुन हमें लांघकर अनाथ स्त्रियों को ले जा रहा है, हमारे बल को धिक्कार है।)
और जब अर्जुन हार गए, तो विष्णु पुराण (अध्याय 38, श्लोक 33) में उनका विलाप हृदय विदीर्ण कर देता है।
ममार्जुनत्वं भीमस्य भीमत्वं तत्कृते ध्रुवम् ।
विना तेन यदाभीरैर्जितोऽहं रथिनां वरः ॥३३॥
(अर्थ- मेरा अर्जुनत्व और भीम का भीमत्व निश्चय ही कृष्ण की कृपा से था। उनके बिना तुच्छ आभीरों ने महारथी मुझे जीत लिया।)
भागवत पुराण (स्कंध 1, अध्याय 15, श्लोक 20) में अर्जुन का दर्द और गहरा है-वे कहते हैं, कृष्ण बिना मैं अबला हूं।
सोऽहं नृपेन्द्र रहितः पुरुषोत्तमेन
सख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्यः ।
अध्यवन्युरुक्रमपरिग्रहमंग रक्षन्
गोपैरसदभिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि ॥२०॥
(अर्थ- पुरुषोत्तम कृष्ण से रहित होकर, दुष्ट गोपों ने मुझे अबला की भांति हरा दिया।)
और उनके अक्षय बाण नष्ट हो गए, जैसा भागवत पुराण (अध्याय 15, श्लोक 24) में-
वह्न्या येऽक्षया दत्ताश्शरास्तेऽपि क्षयं ययुः ।
युद्ध्यतस्सह गोपालैरर्जुनस्य भवक्षये ॥२४॥
(अर्थ- अर्जुन के भाग्य क्षीण होने से अग्निदेव द्वारा दिए अक्षय बाण भी गोपालों (अहीरों) से युद्ध में नष्ट हो गए।)
लेकिन भाई, ये अहीर कौन थे? महाभारत के कर्ण पर्व (अध्याय 6, श्लोक 3) में उन्हें शूरवीर कहा गया है-वे नारायणी सेना के हिस्सा थे, जिन्हें भीष्म ने भी मार गिराया-
नारायणा बलभद्राः शूराश्च शतशोऽपरे।
अनुरक्ताश्च वीरेण भीष्मेण युधि पातिताः ॥३॥
(अर्थ- नारायण और बलभद्र नाम वाले सैकड़ों शूरवीर अहीरों को भीष्म ने युद्ध में मार गिराया।)
महाभारत युद्ध में ही, द्रोण पर्व (अध्याय 19, श्लोक 7) में नारायणी सेना ने अर्जुन को घेरा था-यह पुराना वैर था।
अथ नारायणाः क्रुद्धा विविधायुधपाणयः ।
छादयंतः शरव्रातैः परिववुर्धनंजयम ॥७॥
(अर्थ- क्रोधित नारायणी गोपों ने अर्जुन को बाणों से घेर लिया।)
सबसे गहरा घाव तो सुभद्रा हरण का था। बलरामजी-श्रीकृष्ण के बड़े भाई—का क्रोध महाभारत आदिपर्व (अध्याय 219, श्लोक 29-31) में कितना भावपूर्ण है-
सोऽवमन्य तथास्माकमनादृत्य च केशवम् ।
प्रसह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः ॥२९॥
कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम।
मर्षयिष्यामि गोविंद पादस्पर्शमिवोरगः ॥३०॥
अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुंधराम्।
न हि मे मर्षणीयोऽयमर्जुनस्य व्यतिक्रमः ॥३१॥
(अर्थ- अर्जुन ने हमारा अपमान कर, कृष्ण का भी अनादर करके सुभद्रा का बलपूर्वक हरण किया... मैं अकेला ही पृथ्वी को कौरवों से रहित कर दूंगा।)
यह वैर वर्षों धधकता रहा, और अहीरों ने बदला लिया। लेकिन यह भाषा-पापी, दुष्ट गोप—युद्ध की है, जैसा रामायण युद्धकांड (सर्ग 79, श्लोक 12) में रावण राम को कहता है-
दह्यते भृशमङ्गानि दुरात्मन् मम राघव ।
यन्मयासि न दृष्टस्त्वं तस्मिन् काले महावने ।।12।।
(अर्थ- दुरात्म राघव! उस समय विशाल दंडकारण्य में जो तुम मुझे दिखाई नहीं दिए। इससे मेरे अंग अत्यंत रोष से जलते रहते थे।)
सर्ग 88, श्लोक 24 में इंद्रजीत लक्ष्मण को-
क्षत्रबंधुं सदानार्यं रामः परमदुर्मतिः ।
भक्तं भ्रातरमद्यैव त्वां द्रक्ष्यति हतं मया ।।24।।
(अर्थ- परम दुर्बुद्धि राम तुम जैसे अनार्य, क्षत्रियाधम एवं अपने भक्त भाई को आज ही मेरे द्वारा मारा गया देखेंगे।)
और सर्ग 92, श्लोक 37 में रावण-
तदिदं तथ्यमेवाहं करिष्ये प्रियमात्मनः ।
वैदेहीं नाशयिष्यामि क्षेत्रबंधुमनुव्रताम् ।।37 ।।
(अर्थ- सो आज उस झूठ को मैं सत्य ही कर दिखाऊँगा... उस क्षत्रियाधम राम में अनुराग रखने वाली सीता का नाश कर डालूँगा।)
भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 2) में श्रीकृष्ण अर्जुन को अनार्य कहते हैं:
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।।
(अर्थ- अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।)
विष्णु पुराण में अहीरों को दुष्ट गोप कहा गया, लेकिन यह युद्ध की भाषा है-गोपैरसदभिर् (दुष्ट गोपों)।
अंत में, श्रीकृष्ण की लीला यादव विनाश के बाद उनके प्रपौत्र वज्रनाभ को मथुरा का सिंहासन सौंपा गया, आगे चलकर के सैकड़ो मंदिरों का निर्माण कराया महाभारत और पुराणों में वर्णित-यह हमारा कुल अमर रखने की योजना थी।
भाई, ये श्लोक हमारे रक्त में बहते हैं। यह कथा गर्व की है, भक्ति की है—जय श्रीकृष्ण!जय यदुवंशी!
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