बुधवार, 29 जून 2022

भागवत पुराण स्कन्ध/अध्याय /श्लोक १०/५३/५७_________________तं मानिन: स्वाभिभवं यश:क्षयंपरे जरासन्धमुखा न सेहिरे ।अहो धिगस्मान् यश आत्तधन्वनांगोपैर्हृतं केशरिणां मृगैरिव ॥५७॥अनुवाद~उस समय जरासन्ध के वशवर्ती अभिमानी राजाओं को अपना यह बड़ा भारी तिरस्कार और यश-कीर्ति का नाश सहन न हुआ। वे सब-के-सब चिढ़कर कहने लगे- ‘अहो, हमें धिक्कार है। आज हम लोग धनुष धारण करके खड़े ही रहे और ये गोप, जैसे सिंह के भाग को हरिण ले जाये, उसी प्रकार हमारा सारा यश छीन ले गये।'अर्थात् राजकुमारी रुक्मिणी जी रथ पर चढ़ना ही चाहती थीं कि भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त शत्रुओं के देखते-देखते उनकी भीड़ में से रुक्मिणी को उठा लिया और उन सैकड़ों राजाओं के सिर पर पाँव रखकर उन्हें अपने रथ पर बैठा लिया, जिसकी ध्वजा पर गरुड़ का चिह्न लगा हुआ था। इसके बाद जैसे सिंह सियारों के बीच में से अपना भाग ले जाये, वैसे ही रुक्मिणी जी को लेकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने (नारायणी सेना के गोपों) के साथ वहाँ से प्रस्थान किया।_____

भागवत पुराण स्कन्ध/अध्याय /श्लोक १०/५३/५७

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तं मानिन: स्वाभिभवं यश:क्षयं
परे जरासन्धमुखा न सेहिरे ।
अहो धिगस्मान् यश आत्तधन्वनां
गोपैर्हृतं केशरिणां मृगैरिव ॥५७॥

अनुवाद~

उस समय जरासन्ध के वशवर्ती अभिमानी राजाओं को अपना यह बड़ा भारी तिरस्कार और यश-कीर्ति का नाश सहन न हुआ। वे सब-के-सब चिढ़कर कहने लगे- ‘अहो, हमें धिक्कार है। आज हम लोग धनुष धारण करके खड़े ही रहे और ये  गोप, जैसे सिंह के भाग को हरिण ले जाये, उसी प्रकार हमारा सारा यश छीन ले गये।'

अर्थात् राजकुमारी रुक्मिणी जी रथ पर चढ़ना ही चाहती थीं कि भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त शत्रुओं के देखते-देखते उनकी भीड़ में से रुक्मिणी को उठा लिया और उन सैकड़ों राजाओं के सिर पर पाँव रखकर उन्हें अपने रथ पर बैठा लिया, जिसकी ध्वजा पर गरुड़ का चिह्न लगा हुआ था। 

इसके बाद जैसे सिंह सियारों के बीच में से अपना भाग ले जाये, वैसे ही रुक्मिणी जी को लेकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने (नारायणी सेना के गोपों) के साथ वहाँ से प्रस्थान किया।

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