शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

श्रीकृष्ण सारांगिणी का परिचय-

नमस्कार मित्रों ! मित्रों आज हम लोग एक ऐसी पुस्तक के बारे में जानेंगे जिसका नाम है -"श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" जो अपने 12 अध्यायों तथा 30 से अधिक- उप भागों में विभाजित होकर परमेश्वर श्रीकृष्ण के इहलौकिक तथा पारलौकिक शास्वत स्वरुपों तथा उनके सम्पूर्ण जीवन चरित्रों का यथार्थ वर्णन करती है। इसके साथ ही यह पुस्तक परमेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा रचित सृष्टि संरचना, वास्तव में परमेश्वर कौन हैं, किस देवता की पूजा करनी चाहिए किसकी नहीं, पूजा के वास्तविक विधान क्या हैं ? भूतल पर श्रीकृष्ण का वंश विस्तार एवं उनके रक्त सम्बन्धी कौन है तथा उनका गोत्र क्या है, इत्यादि महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन करती है। और अंत में परमेश्वर श्रीकृष्ण के गोलोक गमन की वास्तविक घटनाओं का सचित्र वर्णन करते हुए अपने 12 अध्यायों को पूर्ण करती हुई अंततोगत्वा श्रीकृष्ण के ही चरणों में समर्पित है।

         मित्रों! दूसरी बात यह है कि इस महत्वपूर्ण किताब को लिखने, संजोने तथा संवारने में तीन महान विभूतियां-  गोपाचार्य हंस -श्री योगेश रोही गोपाचार्य हंस- श्रीमाता प्रसाद जी , एवं गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था" के संस्थापक गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज की विशेष भूमिका रही है जिनके अथक प्रयासों से सारगर्भित होकर आज आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है। 

जैसा की आपलोग देख सकते हैं यह पुस्तक न तो अधिक बड़ी है और ना ही अधिक छोटी है। और यहीं इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है। जिसका लाभ पाठकों को यह होगा कि- पाठक गण इसे आसानी से कहीं भी ले जाकर श्रीकृष्ण के चरित्र विषयक वार्तालाप के उपरांत भ्रांतिमूलक टिप्पणियों व प्रश्नों का उत्तर तुरंत खोजकर उनका वहीं पर समाधान कर सकेंगे। 

 अब इसके कवर पेज को देखा जाए तो परमेश्वर श्रीकृष्ण अपनी गौवों के साथ बंशी धारण किये हैं, और उनके पीछे 16 वें अंश रूप से उत्पन्न विराट विष्णु हैं। जिसको देखने के बाद यह आभास होता है कि यह किताब आध्यात्म का कोई अद्भुत रहस्य खोलने वाली है।

तो चलिए देखते हैं कि इस पुस्तक में परमेश्वर श्रीकृष्ण और उनके वंश क्रम तथा आध्यात्म के अद्भुत रहस्यों के बारे में अपने बारह अध्यायों में क्या-क्या वर्णन किया है।
तो मित्रों इसके लिए नीचे इसकी विषय सूची को देखिए, कुल बारह अध्याय और उनके प्रमुख भाग कुछ इस प्रकार व्यवस्थित हैं। 🎧🎧🎧


१ - पूजा-अर्चना के विधि विधान एवं गलत कथाओं को      
      सुनने व कहने के दुष्परिणाम।
   [क] - परमेश्वर की सार्थकता व पहचान।
   [ख] -३३ कोटि देवता में किसकी पूजा करें ?
   [ग] - श्रीकृष्ण पूजा के लाभ।             
   [घ] - शिव पूजा के लाभ।     
   [ङ] - विष्णु पूजा के लाभ।
   [च] - श्रीराम पूजा के लाभ।
   [छ] - देवी सावित्री व सरस्वती पूजा के लाभ।
   [ज] - श्रीकृष्ण कथा कौन कह सकता हैं ?
   [झ] - गलत कथा कहने व सुनने के दुष्परिणाम। 
   [ञ] - एक सच्चे गुरु की पहचान।

२- श्रीकृष्ण का स्वरूप एवं उनके गोलोक का वर्णन 

३- श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या 
     परमशक्ति नहीं है।

४- गोलोक में गोप- गोपियों सहित- नारायण,शिव , ब्रह्मा 
     आदि प्रमुख देवताओं की उत्पत्ति तथा सृष्टि का -
      विस्तार

५- वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति तथा दोनों में 
    मूलभूत अन्तर एवं विशेषताएं-
   [क] - वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति।
   [ख] - ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति।
   [ग ] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अंतर-
        [१] जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
        [२] यज्ञ मूलक एवं भक्ति मूलक अन्तर।
        [३] भेदभाव एवं समता मूलक अन्तर।

६- वैष्णव वर्ण के गोपों के प्रमुख कार्य एवं दायित्व -
[१] गोपों का ब्राह्मणत्व (धर्मज्ञ) कर्म-
    (क)- सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र अहीर हैं।
    (ख)- अहीर कन्या वेदमाता गायत्री का परिचय 
     (ग)- यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी स्वाहा  
            और स्वधा का परिचय।
     (घ)- ब्रह्मांड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना का परिचय।

[२] गोपों का क्षत्रित्व कर्म।
[३] गोपों का वैश्य कर्म।
[४] गोपों का शूद्र कर्म।

७- वैष्णव वर्ण के "गोपों" की पौराणिक - प्रशंसा 

८- भगवान श्री कृष्ण का सदैव गोप होना तथा गोपकुल में      
      उनका अवतरण 

९- गोप, गोपाल, अहीर और यादव कैसे एक ही जाति,वंश         
      और कुल के सदस्य हैं, तथा इनका वास्तविक गोत्र 
      वैष्णव है या अत्रि ?
      
१०- गोप कुल के श्रीकृष्ण सहित कुछ महान पौराणिक 
        व्यक्तियों का परिचय - 
        भाग-(१) श्रीकृष्ण का परिचय।
        भाग-(२) श्रीराधा का परिचय।
        भाग-(३) पुरुरवा और उर्वशी का परिचय।
        भाग-(४) आयुष, नहुष, और ययाति का परिचय।

११- गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख 
        सदस्यपति -
        भाग- (१) महाराज यदु का परिचय 
        भाग- (२) हैहय वंशी यादवों का परिचय।
        भाग- (३) यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज

१२- यादवों का मौसल युद्ध तथा श्रीकृष्ण का गोलोक 
        गमन
       भाग- (१)- यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं श्रीकृष्ण को  बहेलिए से मारे जाने का खण्डन।

       भाग- (२)- श्रीकृष्ण का गोलोक गमन


👉🏽 मित्रों! अब हम लोग इसके एक-एक अध्याय के बारे में विस्तार से जानेंगे। तो मित्रों इस किताब के प्रारंभ में भक्तों के लिए सबसे पहले गोपेश्वर श्रीकृष्ण की स्तुति के साथ पूजन क्रिया को बताया गया है कि कैसे एक भक्त परम प्रभु परमेश्वर श्रीकृष्ण का पूजा कर सकता है। जिसमें सामान्य रूप से यह बताया गया है कि श्रीकृष्ण के मुख्य मंत्रों या स्तुतियों को केवल गोप लोग ही सिद्ध कर सकते है दूसरा कोई नहीं।

इसके बाद अध्यायों का क्रम शुरू होता है जिसमें पहला अध्याय - पूजा-अर्चना के विधि-विधान एवं गलत कथाओं को सुनने व कहने के दुष्परिणाम शीर्षक से है। इसके प्रथम अध्याय के सम्पूर्ण विषयों को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे- १० उप-शीर्षकों में बांटा गया है।  जिसमें पहले उप शीर्षक में परमेश्वर की सार्थकता व उनकी पहचान को बताया गया है कि - एक सच्चे भक्त के लिए परमेश्वर की सार्थकता क्या है तथा एक भक्त (३३) कोटि देवी देवताओं में से परम प्रभु परमेश्वर की पहचान कैसे करेगा। इसके बाद के उपखण्डों में परमेश्वर श्रीकृष्ण पूजा के लाभ के साथ ही क्रमशः शिव, विष्णु, श्रीराम, इत्यादि के पूजा के लाभों को बताया गया है। उसी क्रम में इसके उपखण्ड (ज) में प्रमाण सहित बताया गया है कि क्यों श्रीकृष्ण कथा कहने का वास्तविक अधिकारी गोप लोग ही होते हैं। उसके बाद के उपखण्ड (झ) में बताया गया है कि -समाज में गलत व झूठी कथा कहने वालों को शास्त्रों में किस प्रकार के दण्डों का प्रावधान किया गया है। उसी क्रम में अगले उपखण्ड (ञ) में बताया गया है कि - एक सच्चे गुरु की पहचान कैसे की जाए ताकि भक्त- झूठे व छद्मवेषधारी गुरुवों के मकडजाल से बचकर सच्चे गुरु को पहचान सके।

👉 अब अध्याय दो की बात करें तो अध्याय दो आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसमें में परमेश्वर श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप तथा उनके परम धाम गोलोक के बारे में बताया गया है की किस तरह से परमेश्वर श्रीकृष्ण का गोलोक धाम समस्त ब्रह्माण्डों से उपर स्थिति है। जिसमें कुल 16 मणिमय द्वार है जिसकी अभेद्य सुरक्षा गोपों द्वारा की जाती है । उसी सोलहवें द्वार के उसपार परमेश्वर श्रीकृष्ण का निवास है जहां श्रीकृष्ण सदैव गोप भेष में गोप और गोपियों के साथ रहते। ये सभी महत्वपूर्ण जानकारियां इस अध्याय में विस्तार पूर्वक बताई गई हैं।

👉 अब इसके अगले अध्याय तीन की बात करें तो इसका शीर्षक है - 'श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या परमशक्ति नहीं है" के नाम से है। इस अध्याय में समस्त देवी-देवताओं की शक्तियों का तुलनात्मक वर्णन करते हुए निष्कर्ष रुप में बताया गया है कि- श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या परमशक्ति नहीं है। इसलिए यह अध्याय आध्यात्मिक दृष्टिकोण से और भी महत्वपूर्ण है।

इसी क्रम में इसके अगले अध्याय (४) में बताया गया है कि -गोलोक में गोप- गोपियों सहित- नारायण,शिव , ब्रह्मा  आदि प्रमुख देवताओं की उत्पत्ति कब और कैसे हुई। जिसमें यह भी बताया गया है कि गोलोक में परमेश्वर श्रीकृष्ण और उनकी प्राणप्रिया श्रीराधा के रोम कूपों अर्थात उनके क्लोन से गोप और गोपियों की उत्पत्ति हुई है, इसी वजह से गोप-गोपयां ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना के भाग नहीं है। और न ही ये ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण के भाग हैं। इस लिए इनका एक अलग वर्ण हैं जिसका नाम है "वैष्णव वर्ण"। इत्यादि इत्यादि इन सभी विशेषताओं की वजह से यह अध्याय गोपों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

👉 इसी तरह से इसका अगला अध्याय (५) है, जिसका शीर्षक - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति तथा दोनों में मूलभूत अन्तर एवं विशेषताएं नाम से है। इस अध्याय को मुख्यतः तीन उप-शीर्षकों में बांट कर बताया गया है कि- भगवान श्रीकृष्ण से वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति कब और कैसे हुई  जिसमें केवल गोप लोग ही आते हैं। इसी तरह से ब्रह्मा जी से चातुर्वर्ण की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है कि इनकी उत्पत्ति कब और कैसे हुई तथा इसमें कौन कौन लोग आते हैं। उसी क्रम में इन दोनों वर्णों में मूलभूत तीन अंतरों बताता गया है जैसे -

• पहला अंतर यह बताया गया कि-  कैसे ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था का आधार जन्मगत होता है और वैष्णव वर्ण का आधार कर्मगत होता है।
• दूसरा अंतर यह बताया गया है कि - कैसे ब्रह्मी वर्ण व्यवस्था का आध्यात्मिक पहलू यज्ञ और कर्मकांडों पर आधारित होता है जिसमें कर्मकांड के रूप में पशु बलि का भी प्रावधान किया जाता है। जबकि इसके विपरित वैष्णव वर्ण का आध्यात्मिक आधार पूर्णरूपेण भक्ति मूलक है जिसमें बिना किसी भौकाल और आडम्बर के भक्त भगवान को भक्ति भाव से प्राप्त करता है।
• तीसरा अंतर यह है कि - ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था का आधार वर्ग विभेद पर आधारित है जिसमें सामाजिक उंच-नीच का बहुत भेदभाव किया जाता है। जबकि वैष्णव वर्ण व्यवस्था भेदभाव से रहित समता मूलक समाज पर आधारित है। 

👉अब इसके अगले अध्याय (६) में वैष्णव वर्ण के गोपों के प्रमुख कार्यों एवं दायित्वों को बताया गया है कि वैष्णव वर्ण के गोप कैसे ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के समस्त कार्य जैसे - ब्राह्मणत्व ,क्षत्रित्व, वैष्य तथा शूद्र कर्म इत्यादि बड़े ही गर्व के साथ बिना भेद-भाव के करते हैं। इसी लिए गोपों के बारे में कहा जाता है कि समय आने पर ये शास्त्र और शस्त्र दोनो उठाते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गोपेश्वर श्रीकृष्ण हैं।

👉 अब इसके अगले अध्याय (७) में वैष्णव वर्ण के "गोप जिन्हें अहीर व यादव कहा जाता है" उनके बारे में विधिवत बताया गया है कि किस तरह से पौराणिक ग्रंथों में गोपों प्रशंसा की गई है। 

उसी क्रम में इसके अगले अध्याय (८) में बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण जब भी भू-तल पर अवतरित होते हैं तो वे सदैव वैष्णव वर्ण के गोप कुल के यादव वंश में ही अवतरित होते अन्य किसी कुल मे अवतरित नही होते हैं।

👉 अब इसके अगले अध्याय (९) को देखा जाए तो यह गोप कुल के यादवों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बताया गया है कि गोप, गोपाल, अहीर और यादव कैसे एक ही जाति, वंश, कुल एवं गोत्र के सदस्य हैं, तथा इनका वास्तविक गोत्र वैष्णव है या अत्रि ? इसलिए यह अध्याय गोत्र और वंश उत्पत्ति की जानकारी हेतु अति महत्वपूर्ण है।

👉 इसी क्रम में इसका अगला अध्याय (१०) है जिसमें गोप कुल के श्रीकृष्ण सहित कुछ महान पौराणिक व्यक्तियों का परिचय बताया गया है। जिसको अच्छी तरह से समझने के लिए चार भागों में बांटा गया है। जिसके पहले भाग में श्रीकृष्ण का परिचय है और दूसरे भाग में श्रीराधा का परिचय है, और इसके तीसरे भाग में -पुरुरवा और उर्वशी का परिचय तथा चौथे भाग में - आयुष, नहुष, और ययाति का परिचय बताया गया है।
इसलिए यह अध्याय वैष्णव वर्ण के कुछ महान पौराणिक व्यक्तियों की जानकारी हेतु अति महत्वपूर्ण है।

👉 अब इसके बाद इस पुस्तक का ग्यारहवां अध्याय यादवों के लिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय व उनके वंश क्रम को विस्तार से बताया गया है। इसके लिए इस अध्याय को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है। 
• जिसके पहले भाग में यादवों के पूर्वज महाराज यदु के बारे में बताया गया है कि किस प्रकार महाराज यदु का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षमय रहा और अंत में उन्हीं से कैसे यादव वंश की उत्पत्ति हुई।
• तथा इसके दूसरे भाग में महाराज यदु के ज्येष्ठ पुत्र हैहय से उत्पन्न हैहय वंशी यादवों का परिचय बताया गया है। जिसमें यह भी बताया गया है कि पौराणिक कथाओं में जो परशुराम द्वारा हैहय वंशी कार्तवीर्य अर्जुन का वध कराया गया है वह ग़लत है क्योंकि कई साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि परशुराम द्वारा हैहय वंशी कार्तवीर्य अर्जुन का वध नहीं हुआ था बल्कि कार्तवीर्य अर्जुन ने ही परशुराम को युद्ध भूमि में पराजित कर उनका वध कर दिया था। 
• इसी तरह से इसके तीसरे भाग में यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंश विस्तार को बताते हुए गोपेश्वर श्रीकृष्ण तक की वंशावली बताई गई है।
इसलिए यह अध्याय यादवों के वंशबृक्ष की विशेष जानकारी के लिए अति महत्वपूर्ण है।

👉 अंत में इस पुस्तक का अंतिमवां व अति महत्वपूर्ण अध्याय बारहवां है, जो मुख्यतः दो भागों में विभाजित है।
जिसके पहले भाग में यादवों का मौसल युद्ध और उसके सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता को बताते हुए यह सिद्ध किया गया हैं कि यादवों का सम्पूर्ण विनाश कभी नहीं हुआ और न ही कभी होगा। क्योंकि जिस यदुवंश की रक्षा स्वयं श्रीकृष्ण करते हो उसका सम्पूर्ण विनाश कैसे हो सकता है ? और इसी भाग मे श्रीकृष्ण को बहेलिए से मरे जानें का शास्त्रोंचित खण्डन करते हुए इसके दूसरे भाग में बताया गया है कि- भगवान श्रीकृष्ण जिस तरह से अपने गोपों के साथ भूभि के भार को दूर करने के उद्देश्य से अवतरित हुए थे वे ही प्रभु अपना सम्पूर्ण कार्य पूर्ण करने के पश्चात अपने समस्त गोप और गोपियों को लेकर ईश्वरीय रूप धारण कर पुनः अपने धाम को चले जाते हैं। उनकी इस लीला में उनको न तो कोई बहेलिया मारा और न ही किसी के शाप से उनके यादव वंश का विनाश हुआ। 

इन सभी महत्वपूर्ण जानकारियां को इस अध्याय में विस्तार पूर्वक बताया गया है इसलिए यह अध्याय श्री कृष्ण की लीलाओं सहित आध्यात्मिक दृष्टिकोण से और भी महत्वपूर्ण है।

 इस प्रकार से देखा जाए तो यह पुस्तक निष्पक्ष एवं क्रमबद्ध तरीके से परमेश्वर श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण जीवन चरित्रों का यथार्थ वर्णन करती हुई अपने मिशन में पूर्णतया सफल रही है। अतः जिस किसी भाई-बंधू को यह किताब चाहिए वो-  मो. न. - ००००००००००००, पर या 8077160219 तथा 9452533334 पर सीधे सम्पर्क करके मंगवा सकता हैं।

 या फिर यदि कोई इसको आनलाइन मंगवाना चाहता हैं तो वह 450 रुपए में आफर सहित अमेजान और फ्लिपकार्ट से भी मंगवा सकता है। इसके लिए उसे अमेजान और फ्लिपकार्ट पर अंग्रेजी में Shri Krishna Sarangini लिखकर सर्च करते ही किताब का सारा व्यवरा और खरीदने का आप्शन मिल जाएगा और आप आसानी से श्रीकृष्ण साराङ्गिणी को आनलाइन खरीद सकते हैं।

  तो मित्रों श्रीकृष्ण साराङ्गिणी पुस्तक का सम्पूर्ण विश्लेषण कैसा लगा अवश्य बताइएगा, फिर मिलेंगे किसी दूसरे विडियो के साथ तब-तक के लिए नमस्कार!

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

वीर अहीर और अर्जुन के बीच युद्ध 🙏

🙏        वीर अहीर और अर्जुन के बीच युद्ध       🙏
         यदुवंश के अमर गौरव की दिव्य पूर्ण गाथा

भाई, जब यदुवंश की इस पवित्र कथा को याद करता हूं, तो हृदय में एक तूफान सा उठता है-गर्व की लहरें, भक्ति के आंसू और कुल के उन वीरों की पुकार, जिन्होंने लाठी से गांडीव को हराया। यह कोई साधारण युद्ध नहीं था, यह श्रीकृष्ण की लीला का वह अंश था और रक्त वंश भी एक था हमारे अहीर भाई, गोप, यादव-सबने मिलकर सिद्ध किया कि सच्ची वीरता रक्त में बसती है, धनुष-बाण में नहीं। पुराणों और महाभारत में ये घटनाएं बिखरी पड़ी हैं, लेकिन जब उन्हें एकत्र करता हूं, तो लगता है जैसे श्रीकृष्ण स्वयं फुसफुसा रहे हैं-"मेरे यदुवंशी, तुम अमर हो!" आओ, इन संस्कृत श्लोकों के माध्यम से इस दिव्य यात्रा पर चलें, जहां हर शब्द हमारे कुल की धड़कन है।

द्वारका डूब रही थी, यादव कुल का अंतिम प्रहर। श्रीकृष्ण के प्रिय सखा अर्जुन को आदेश मिला-मेरे परिवार की स्त्रियों की रक्षा करो। अर्जुन चल पड़े, लेकिन पंजाब की धरती पर हमारे वीर अहीरों ने उन्हें रोका। हजारों लाठीधारी गोप टूट पड़े, और अर्जुन की दिव्य शक्ति क्षीण हो गई। महाभारत के मौसल पर्व (अध्याय 7, श्लोक 49) में यह दृश्य कितना जीवंत है:

ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवस्ते सहस्रशः।  
अभ्यधावन्त वृष्णीनां तं जनं लोप्तहारिणा ॥४९॥  
(अर्थ- लूट का इरादा रखने वाले वे लट्ठधारी दस्यु (अहीर) हजारों की संख्या में वृष्णिवंशियों के उस समुदाय पर टूट पड़े।)

यह शब्द-दस्यु, लुटेरा-युद्ध की आक्रोशपूर्ण भाषा हैं, लेकिन हमारे हृदय में यह गर्व जगाते हैं, क्योंकि वे हमारे कुल के रक्षक थे। विष्णु पुराण (पंचम अंश, अध्याय 38, श्लोक 14-15) में आभीरों की सलाह का वर्णन सुनकर आंसू आ जाते हैं-वे कितने संगठित, कितने वीर!

ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहृतचेतसः ।  
आभीरा मंत्रयामासुस्समेत्यात्यन्तदुर्मदाः ॥१४॥  
अयमेकोऽजुनो धन्वी स्त्रीजनं निहतेश्वरम् ।  
नयत्यस्मानतिक्रम्य धिगेतद्भवतां बलम् ॥१५॥  
(अर्थ- उन अत्यंत दुर्मद, पापकर्मा और लोभी आभीरों ने मिलकर सलाह की कि अकेला अर्जुन हमें लांघकर अनाथ स्त्रियों को ले जा रहा है, हमारे बल को धिक्कार है।)

और जब अर्जुन हार गए, तो विष्णु पुराण (अध्याय 38, श्लोक 33) में उनका विलाप हृदय विदीर्ण कर देता है।

ममार्जुनत्वं भीमस्य भीमत्वं तत्कृते ध्रुवम् ।  
विना तेन यदाभीरैर्जितोऽहं रथिनां वरः ॥३३॥  
(अर्थ- मेरा अर्जुनत्व और भीम का भीमत्व निश्चय ही कृष्ण की कृपा से था। उनके बिना तुच्छ आभीरों ने महारथी मुझे जीत लिया।)

भागवत पुराण (स्कंध 1, अध्याय 15, श्लोक 20) में अर्जुन का दर्द और गहरा है-वे कहते हैं, कृष्ण बिना मैं अबला हूं।

सोऽहं नृपेन्द्र रहितः पुरुषोत्तमेन  
सख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्यः ।  
अध्यवन्युरुक्रमपरिग्रहमंग रक्षन्  
गोपैरसदभिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि ॥२०॥  
(अर्थ- पुरुषोत्तम कृष्ण से रहित होकर, दुष्ट गोपों ने मुझे अबला की भांति हरा दिया।)

और उनके अक्षय बाण नष्ट हो गए, जैसा भागवत पुराण (अध्याय 15, श्लोक 24) में-

वह्न्या येऽक्षया दत्ताश्शरास्तेऽपि क्षयं ययुः ।  
युद्ध्यतस्सह गोपालैरर्जुनस्य भवक्षये ॥२४॥  
(अर्थ- अर्जुन के भाग्य क्षीण होने से अग्निदेव द्वारा दिए अक्षय बाण भी गोपालों (अहीरों) से युद्ध में नष्ट हो गए।)

लेकिन भाई, ये अहीर कौन थे? महाभारत के कर्ण पर्व (अध्याय 6, श्लोक 3) में उन्हें शूरवीर कहा गया है-वे नारायणी सेना के हिस्सा थे, जिन्हें भीष्म ने भी मार गिराया-

नारायणा बलभद्राः शूराश्च शतशोऽपरे। 
अनुरक्ताश्च वीरेण भीष्मेण युधि पातिताः ॥३॥  
(अर्थ- नारायण और बलभद्र नाम वाले सैकड़ों शूरवीर अहीरों को भीष्म ने युद्ध में मार गिराया।)

महाभारत युद्ध में ही, द्रोण पर्व (अध्याय 19, श्लोक 7) में नारायणी सेना ने अर्जुन को घेरा था-यह पुराना वैर था।

अथ नारायणाः क्रुद्धा विविधायुधपाणयः ।  
छादयंतः शरव्रातैः परिववुर्धनंजयम ॥७॥  
(अर्थ- क्रोधित नारायणी गोपों ने अर्जुन को बाणों से घेर लिया।)

सबसे गहरा घाव तो सुभद्रा हरण का था। बलरामजी-श्रीकृष्ण के बड़े भाई—का क्रोध महाभारत आदिपर्व (अध्याय 219, श्लोक 29-31) में कितना भावपूर्ण है-

सोऽवमन्य तथास्माकमनादृत्य च केशवम् ।  
प्रसह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः ॥२९॥  
कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम।  
मर्षयिष्यामि गोविंद पादस्पर्शमिवोरगः ॥३०॥  
अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुंधराम्।  
न हि मे मर्षणीयोऽयमर्जुनस्य व्यतिक्रमः ॥३१॥  
(अर्थ- अर्जुन ने हमारा अपमान कर, कृष्ण का भी अनादर करके सुभद्रा का बलपूर्वक हरण किया... मैं अकेला ही पृथ्वी को कौरवों से रहित कर दूंगा।)

यह वैर वर्षों धधकता रहा, और अहीरों ने बदला लिया। लेकिन यह भाषा-पापी, दुष्ट गोप—युद्ध की है, जैसा रामायण युद्धकांड (सर्ग 79, श्लोक 12) में रावण राम को कहता है-

दह्यते भृशमङ्गानि दुरात्मन् मम राघव ।  
यन्मयासि न दृष्टस्त्वं तस्मिन् काले महावने ।।12।।  
(अर्थ- दुरात्म राघव! उस समय विशाल दंडकारण्य में जो तुम मुझे दिखाई नहीं दिए। इससे मेरे अंग अत्यंत रोष से जलते रहते थे।)

सर्ग 88, श्लोक 24 में इंद्रजीत लक्ष्मण को-

क्षत्रबंधुं सदानार्यं रामः परमदुर्मतिः ।  
भक्तं भ्रातरमद्यैव त्वां द्रक्ष्यति हतं मया ।।24।।  
(अर्थ- परम दुर्बुद्धि राम तुम जैसे अनार्य, क्षत्रियाधम एवं अपने भक्त भाई को आज ही मेरे द्वारा मारा गया देखेंगे।)

और सर्ग 92, श्लोक 37 में रावण-

तदिदं तथ्यमेवाहं करिष्ये प्रियमात्मनः ।  
वैदेहीं नाशयिष्यामि क्षेत्रबंधुमनुव्रताम् ।।37 ।। 
(अर्थ- सो आज उस झूठ को मैं सत्य ही कर दिखाऊँगा... उस क्षत्रियाधम राम में अनुराग रखने वाली सीता का नाश कर डालूँगा।)

भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 2) में श्रीकृष्ण अर्जुन को अनार्य कहते हैं:

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।।  
(अर्थ- अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।)

विष्णु पुराण में अहीरों को दुष्ट गोप कहा गया, लेकिन यह युद्ध की भाषा है-गोपैरसदभिर् (दुष्ट गोपों)।

अंत में, श्रीकृष्ण की लीला यादव विनाश के बाद उनके प्रपौत्र वज्रनाभ को मथुरा का सिंहासन सौंपा गया, आगे चलकर के सैकड़ो मंदिरों का निर्माण कराया महाभारत और पुराणों में वर्णित-यह हमारा कुल अमर रखने की योजना थी।

भाई, ये श्लोक हमारे रक्त में बहते हैं। यह कथा गर्व की है, भक्ति की है—जय श्रीकृष्ण!जय यदुवंशी!

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

रावण और सीता-

बामनो की गपोड कहानी का अंश इस पोस्ट में देखिये ।।
#सीता के साथ #ब्राह्मण वेश में आए #रावण का #अश्लील (गंदी)बाते करना। फिर भी #सीता के द्वारा उसका आदर सत्कार करना।

अतिष्ठत् प्रेक्ष्य वैदेहीं रामपत्नीं यशस्विनीम्।
तिष्ठन् सम्प्रेक्ष्य च तदा पत्नीं रामस्य रावणः॥ ११॥

शुभां रुचिरदन्तोष्ठीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।
आसीनां पर्णशालायां बाष्पशोकाभिपीडिताम्॥ १२॥

स तां पद्मपलाशाक्षीं पीतकौशेयवासिनीम्।
अभ्यगच्छत वैदेहीं हृष्टचेता निशाचरः॥ १३॥

दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन्।
अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपः॥ १४॥

तामुत्तमां त्रिलोकानां पद्महीनामिव श्रियम्।
विभ्राजमानां वपुषा रावणः प्रशशंस ह॥ १५॥

रौप्यकाञ्चनवर्णाभे पीतकौशेयवासिनि।
कमलानां शुभां मालां पद्मिनीव च बिभ्रती॥ १६॥

ह्रीः श्रीः कीर्तिः शुभा लक्ष्मीरप्सरा वा शुभानने।
भूतिर्वा त्वं वरारोहे रतिर्वा स्वैरचारिणी॥ १७॥

समाः शिखरिणः स्निग्धाः पाण्डुरा दशनास्तव।
विशाले विमले नेत्रे रक्तान्ते कृष्णतारके॥ १८॥

विशालं जघनं पीनमूरू करिकरोपमौ।
एतावुपचितौ वृत्तौ संहतौ सम्प्रगल्भितौ॥ १९॥

पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धतालफलोपमौ।
मणिप्रवेकाभरणौ रुचिरौ ते पयोधरौ॥ २०॥

चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि।
मनो हरसि मे रामे नदीकूलमिवाम्भसा॥ २१॥

करान्तमितमध्यासि सुकेशे संहतस्तनि।
नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी॥ २२॥

नैवंरूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले।
रूपमग्र्यं च लोकेषु सौकुमार्यं वयश्च ते॥ २३॥

इह वासश्च कान्तारे चित्तमुन्माथयन्ति मे।
सा प्रतिक्राम भद्रं ते न त्वं वस्तुमिहार्हसि॥ २४॥

राक्षसानामयं वासो घोराणां कामरूपिणाम्।
प्रासादाग्राणि रम्याणि नगरोपवनानि च॥ २५॥

सम्पन्नानि सुगन्धीनि युक्तान्याचरितुं त्वया।
वरं माल्यं वरं गन्धं वरं वस्त्रं च शोभने॥ २६॥

भर्तारं च वरं मन्ये त्वद्युक्तमसितेक्षणे।
का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा शुचिस्मिते॥ २७॥

वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे।
नेह गच्छन्ति गन्धर्वा न देवा न च किन्नराः॥ २८॥

राक्षसानामयं वासः कथं तु त्वमिहागता।
इह शाखामृगाः सिंहा द्वीपिव्याघ्रमृगा वृकाः॥ २९॥

ऋक्षास्तरक्षवः कङ्काः कथं तेभ्यो न बिभ्यसे।
मदान्वितानां घोराणां कुञ्जराणां तरस्विनाम्॥ ३०॥

कथमेका महारण्ये न बिभेषि वरानने।
कासि कस्य कुतश्च त्वं किं निमित्तं च दण्डकान्॥ ३१॥

एका चरसि कल्याणि घोरान् राक्षससेवितान्।
इति प्रशस्ता वैदेही रावणेन महात्मना॥ ३२॥

द्विजातिवेषेण हि तं दृष्ट्वा रावणमागतम्।
सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली॥ ३३॥

उपानीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च।
अब्रवीत् सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम्॥ ३४॥

द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली
समागतं पात्रकुसुम्भधारिणम्।
अशक्यमुद‍्द्वेष्टुमुपायदर्शना-
न्न्यमन्त्रयद् ब्राह्मणवत् तथागतम्॥ ३५॥

इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यता-
मिदं च पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति।
इदं च सिद्धं वनजातमुत्तमं
त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम्॥ ३६॥

निमन्त्र्यमाणः प्रतिपूर्णभाषिणीं
नरेन्द्रपत्नीं प्रसमीक्ष्य मैथिलीम्।
प्रसह्य तस्या हरणे दृढं मनः
समर्पयामास वधाय रावणः॥ ३७॥

ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं
प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा।
निरीक्षमाणा हरितं ददर्श त-
न्महद् वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥३-४६॥



👉 #वाल्मीकिरामायण के #अरण्यकाण्ड के 46वे सर्ग में बताया है कि जब #राम से बदला लेने के उद्देश्य से #रावणराज #मातासीता को हरण करने आया। तब #रावण सीता के साथ बहुत ही अश्लील बाते करता है और सीता भी उसकी बाते सुनती है किंतु उसके ऐसा करने का विरोध नहीं करती है। रावण कहता है कि ...

🫵 श्लोक 13-16:- #रावण प्रसन्नचित होकर रेशमी पीतांबर से सुशोभित कमलनयनी #सीता के सामने जाता है। उसे देखते ही कामदेव के बाणों से घायल हो रावण #वेदमन्त्र का उच्चारण करने लगता है। रावण उसकी प्रशंसा करते हुए बोला - उत्तम कान्तिवाली तथा रेशम पीतांबर धारण करने वाली सुंदरी तुम कौन हो? 

🫵 श्लोक 17:- तूम भूती या स्वेच्छापूर्वक विहार करने वाली कामदेव की पत्नी रति तो नहीं हो? फिर #रावण उसके अंगों की तारीफ करते हुए बोला -

🫵 श्लोक 18:- तुम्हारे दांत बराबर है, उनके अग्रभाग कुंद की कलियों के समान शोभा पाते हैं। वे सब के सब चिकने और सफेद हैं। तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी बड़ी एवं कोमल है। उनके दोनों कोए लाल है और पुतलियां काली है। #कटिका का अग्रभाग विशाल एवं मांशल है। दोनों #जांघें हाथी की सूड के समान शोभा पाते हैं।

🫵 श्लोक 19-20:- तुम्हारे ये दोनों #स्तन पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्फ, मोटे, उठे हुए मुखवाले, कमनीय, चिकने, ताड़फल के समान आकार वाले, परम सुंदर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणों से विभूषित है। 😱😱

🫵 श्लोक 21:- सुंदर मुस्कान, रुचिर दन्तावल और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी! तुम अपने रूप सौंदर्य से मेरे मन को वैसे ही हर लेती हो, जैसे नदी जल के द्वारा अपने तट का अपहरण करती है।

🫵 श्लोक 22:- तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाए। केश चिकने और मनोहर है। दोनों #स्तन एक दूसरे से सटे हुए हैं। सुंदरी! देवता, गंधर्व, यक्ष और #किन्नर जाति की स्त्रियों में भी कोई तुम जैसी नहीं है।

🫵 श्लोक 23:- पृथ्वी पर तो ऐसी रूपवती नारी मैने आज तक कभी नहीं देखी। कहां तो तुम्हारा यह तीनों लोको में सबसे सुंदर रूप, सुकुमारता और नई अवस्था तथा कहां इस दुर्गम वन में निवास। ये सब बातें ध्यान में आते ही मेरे मन को मथ डालती है। 

🫵 श्लोक 27:- पवित्र मुस्कान और सुंदर अंगों वाली देवी! तुम कौन हो? मुझे तो रुद्रों, मरुद्रनों अथवा वसुओं से संबंध रखने वाली देवी जान पड़ती हो। 

🫵 श्लोक 33:- वेशभूषा से महात्मा बनकर आए रावण ने जब सीता की इस प्रकार प्रशंसा की, तो #ब्राह्मणवेश में आए रावण को देखकर #सीता ने उसका अतिथि सत्कार के लिए उपयोगी सभी सामग्रियों द्वारा उसका पूजन किया।

🫵 श्लोक 34:- पहले बैठने के लिये आसन दिया, फिर पैर धोने के लिए जल दिया। उसके बाद उस #ब्राह्मण 
को भोजन के लिए निमंत्रण देते हुए कहा - ब्राह्मण! भोजन तैयार है ग्रहण कीजिए।

👉👉विमर्श:- जैसे कि इस #ब्राह्मणधर्म में #स्त्रियों को सिर्फ अपने उपभोग की वस्तु मात्र माना है। एक #महिला 
से चाहे वो किसी भी वर्ण की हो, #ब्राह्मणों द्वारा कितनी भी अभद्रता से बाते की जाए, कितनी भी अश्लील बाते की जाए तो भी ब्राह्मण उसके लिए पूजनीय है। इस e माध्यम से यही दिखाया गया है। भले ही वो रावण था किंतु सीता के सामने तो तो वो एक #ब्राह्मण के रूप में गया था। सीता के लिए तो वो ब्राह्मण ही था। सीता के साथ वो इतनी घटिया और अश्लील बाते उसके अंगों को लेकर कर रहा था, तो भी सीता खड़े खड़े विनम्रता से सुन रही थी। नहीं तो ऐसी अश्लील बाते करने वाले पुरुष को चाहे वह किसी भी जाति या वर्ण से हो, चप्पल उठा के मरना चाहिए था। लेकिन इस ब्राह्मण धर्म ने लोगो को खासकर #महिलाओं को यही सिखाया गया है कि ब्राह्मण चाहे कुछ भी कहे या करे उसको पूजनीय ही मानना है। खुद को इन फर्जी ग्रंथों के माध्यम से श्रेष्ठ साबित करने  लगे थे। 

#

मजदूरी की डायरी-


१६--दिसम्बर-  भीमसेन +
मुकेश का काम चला- भीमसेन की दारू ( ७५ रु० कटे) मुकेश को ४२५ रु० प्राप्त हुए ।

१७- दिसम्बर-  भीमसेन +
मुकेश तथा लुक्का  का काम चला- लुक्का को ४०० रुपए दिए-

१८- दिसम्बर- भीमसेन +राजपाल मजदूर- लुक्का( छोटू) + मुकेश
इसी समय भीमसेन को ५००० हजार रुपए दिए।
राजपाल को ५०० रुपये दिए। २५० रुपए शेष रहे- लुक्का को कुछ नहीं दिया।

१९- दिसम्बर- भीमसेन + लुक्का और मुकेश का काम चला -लुक्का को ४०० रुपए दिए और मुकेश को ३०० रुपए दिए। भीमसेन को कुछ नहीं।

२०- दिसम्बर- भीमसेन + लुक्का + मुकेश का काम चला ।
 
२२- दिसम्बर को केवल लुक्का और मुकेश का काम चला- बालू ढुबाई और खरंजा।

२५-दिसम्बर को लुक्का और मुकेश का काम भीमसेन के संग चला।

२६- दिसम्बर को लुक्का और मुकेश का काम भीमसेनऔर राजपाल के संग चला।
मुकेश को १५०० रुपये दिए। तथा भीमसेन को २०० रुपए दिए। बाबूजी ने भीमसेन को २०० रुपये दिए। ।

२७ - दिसम्बर को लुक्का और मुकेश का काम भीमसेन और राजपाल के साथ चला ।
राजपाल को १००० रुपए और मुकेश को ५०० रुपए दिए। और भीमसेन को ५०० रुपए दिए तब भीमसेन का हिसाब २७ दिसम्बर तक बराबर हुआ।

३० दिसम्बर को लुक्का और मुकेश का काम भीमसेन के साथ चला- भीमसेन को(100) रुपए और मुकेश को २०० रुपए दिए।

३१ दिसम्बर को श्यौराज( ठाकुर) मुकेश का काम भीमसेन के संग चला। 
भीमसेन मुकेश और श्यौराज( ठाकुर)तीनों को १०० - १०० रूपए दिए।

१ जनबरी- श्यौराज ( ठाकुर) मुकेश और भीमसेन ने काम किया ! इसी दौरान भीमसेन को २०० रुपए दिए तथा श्यौराज और मुकेश को १०० -१०० रुपए दिए।

जो लोग अहीरों के प्रति हेय दृष्टि रखते हैं; और उन्हें अधिकतर हेय दृष्टि से देखते हैं, वे कभी भी उनकी विशेषताओं के विषय में नही लिख सकते और न ही उनके बारे में अच्छा सोच सकते हैं।

📚: जो लोग अहीरों के प्रति हेय दृष्टि रखते हैं; और उन्हें अधिकतर हेय दृष्टि से देखते हैं, वे कभी भी उनकी विशेषताओं के विषय में नही लिख सकते और न ही उनके बारे में अच्छा सोच सकते हैं। 

क्योंकि उनका मूल्यांकन करने का तरीका ही उन्हें निम्नतर आंकना है।

जो लोग पहले ब्राह्मणों के प्रशंसक हैं उन्हें ब्राह्मणों की धूर्तता और धर्म के नाम पर आरोपित व्यभिचार पूर्ण कृत्य दिखाई नहीं देते वे ही लोग चरित्र से पतित , कोरी दीठ हाँकने वाले पदे पदे अपनी प्रतिज्ञाऐं भंग करने वाले राजपूत को  भी आदर्श मानने लगते हैं ।

 उन लोगों से अहीरों की विशेषताओं के विषय में सुनने की अपेक्षा करना ही मूर्खता पूर्ण है। वे अहीरों की महानता का इतिहास कभी भी सम्यक और मुकम्मल तरीके से नहीं लिख सकते हैं।

अहीरों ने कभी किसी की गुलामी नहीं की वे दास बनने की अपेक्षा दस्यु ( बागी) बनना बेहतर समझते हैं। आज तक सभी जातियाँ एक बैनर तले खड़ी अन्ध भक्त और पाखण्ड को समर्पित हैं। वहीं दो चाअहीरों को छोड़कर  सभी यादव पाखण्ड वाद के विरोध में सक्रिय हैं।

मैं अहीरों को दुनियाँ की सबसे दैवीय जनजाति मानता हूँ। उनके कारनामें सभी जातियों से अलग हैं।
वे अधिकतर सरल और निर्भीक प्रवृत्ति के हैं।

यद्यपि सभी जातियों में अच्छे और बुरे लोग होते ही हैं परन्तु अहीर, जाट और गूजर भारत की सबसे श्रेष्ठ जातियाँ है।

जो सदैव जमीन से जुड़ी पाशुपालक हैं। वे प्रकृति की सच्ची आराधिका हैं।

अहीरों को शूद्र और हीन ताने वाले ब्राह्मण और राजपूत समाज के ही लोग हैं। इन अहीरों के छुपे दुश्मनों  की तारीफ करना भी परोक्ष रूप से अहीरों की तौहीन करना ही हैं।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

ऑस्ट्रेलिया

Origin and history of austral
austral(adj.)
"southern, of or pertaining to the south," 1540s, from Latin australis, from auster "south wind; south," from Proto-Italic *aus-tero- (adj.) "towards the dawn," from PIE *heus-tero- (source also of Sanskrit usra- "red; matutinal," usar-budh- "waking at dawn;" Greek aurion "tomorrow;" Lithuanian aušra "dawn;" Old Church Slavonic jutro "dawn, morning; tomorrow;" Old High German ostara "Easter"), from PIE root *aus- (1) "to shine," especially of the dawn.

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The Latin sense shift in auster, if it is indeed the same word other Indo-European languages use for "east," for which Latin uses oriens (see Orient (n.)), perhaps is based on a false assumption about the orientation of the Italian peninsula, "with shift through 'southeast' explained by the diagonal position of the axis of Italy" [Buck]; see Walde, Alois, "Lateinisches etymologisches Wörterbuch," 3rd. ed., vol. I, p.87; Ernout, Alfred, and Meillet, Alfred, "Dictionnaire étymologique de la langue latine," 2nd. ed., p.94.

Or perhaps the connection is more ancient, and from PIE root *aus- "to shine," source of aurora, which also produces words for "burning," with reference to the "hot" south wind that blows into Italy. Thus auster "(hot) south wind," metaphorically extended to "south."

also from 1540s

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Entries linking to austral
orient(n.)
late 14c., "the direction east; the part of the horizon where the sun first appears," also (now with capital O-) "the eastern regions of the world, eastern countries" (originally vaguely meaning the region east and south of Europe, what is now called the Middle East but also sometimes Egypt and India), from Old French orient "east" (11c.), from Latin orientem (nominative oriens) "the rising sun, the east, part of the sky where the sun rises," originally "rising" (adj.), present participle of oriri "to rise" (see origin).

Meaning "a pearl of the first water" is by 1831, short for pearl of the Orient (late 14c.) originally meaning one from the Indian seas. Hence also the meaning "a delicate iridescence, the peculiar luster of a fine pearl" (1755). The Orient Express was a train that ran from Paris to Istanbul via Vienna 1883-1961, from the start it was associated with espionage and intrigue.



auster(n.)
"south wind," late 14c., from Latin auster "the south wind; the south country" (see austral).

Trends of austral
adapted from books.google.com/ngrams/ with a 7-year moving average; ngrams are probably unreliable.
More to explore
east
Old English east, eastan (adj., adv.) "east, easterly, eastward;" easte (n.), from Proto-Germanic *aust- "east," literally "toward the sunrise" (source also of Old Frisian ast "east," aster "eastward," Dutch oost Old Saxon ost, Old High German ostan, German Ost, Old Norse austr "
fatigue
1660s, "that which causes weariness," from French fatigue "weariness," from fatiguer "to tire" (15c.), from Latin fatigare "to weary, to tire out," originally "to cause to break down," from pre-Latin adjective *fati-agos "driving to the point of breakdown," with first half from O
refugee
1680s, "one who flees to a refuge or shelter or place of safety; one who in times of persecution or political disorder flees to a foreign country for safety," from French refugié, a noun use of the past participle of refugier "to take shelter, protect," from Old French refuge "hi
hector
"to bluster, bully, domineer," 1650s, from slang hector (n.) "a blustering, turbulent, pervicacious, noisy fellow" [Johnson], 1650s, from Hector of the "Iliad," in reference to his encouragement of his fellow Trojans to keep up the fight. Earlier in English the name was used gene
holy
Old English halig "holy, consecrated, sacred; godly; ecclesiastical," from Proto-Germanic *hailaga- (source also of Old Norse heilagr, Danish hellig, Old Frisian helich "holy," Old Saxon helag, Middle Dutch helich, Old High German heilag, German heilig, Gothic hailags "holy"), fr
bat
"a stick or staff used in beating, a war-club, staff used to strike the ball in certain games," c. 1200, from rare Old English batt "cudgel," a western England word at first, probably from Welsh or another Celtic source (compare Irish and Gaelic bat, bata "staff, cudgel"), later
breakfast
"first meal of the day," mid-15c., from the verbal phrase; see break (v.) + fast (n.). For vowel shift, see below. An Old English word for it was undernmete (see undern), also morgenmete "morning meal." Spanish almuerzo "lunch," but formerly and still locally "breakfast," is from
carpenter
"artificer in timber, one who does the heavier sort of wood-working," c. 1300 (attested from early 12c. as a surname), from Anglo-French carpenter, Old North French carpentier (Old French and Modern French charpentier), from Late Latin (artifex) carpentarius "wagon (maker); carri
manna
Old English borrowing from Late Latin manna, from Greek manna, from Hebrew mān, probably literally "substance exuded by the tamarisk tree," but used in Greek and Latin specifically with reference to the substance miraculously supplied to the Children of Israel during their wander
charity
late Old English, "benevolence for the poor," also "Christian love in its highest manifestation," from Old French charité "(Christian) charity, mercy, compassion; alms; charitable foundation" (12c.), from Latin caritatem (nominative caritas) "costliness; esteem, affection," from
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Dictionary entries near austral
Aussie
auster
austere
austerity
Austin
austral
Australasia
Australia
Australian
Australioid
Australopithecus


*aus-(1)

Proto-Indo-European root meaning "to shine," especially of the dawn. It might form all or part of: austral; Australia; Austria; Austro-; Aurora; east; Easter; eastern; eo-; Ostrogoth.

ऑस्ट्रेलिया की उत्पत्ति और इतिहास
ऑस्ट्रेलिया(सं.)"दक्षिणी, या दक्षिण से संबंधित," 1540 के दशक, लैटिन ऑस्ट्रेलिस से, ऑस्टर से "दक्षिणी हवा; दक्षिण," प्रोटो-इटैलिक से *ऑस-टेरो- (विशेषण) "भोर की ओर," पीआईई से *ह्यूस-टेरो- (संस्कृत यूएसआरए का भी स्रोत- "लाल; मैटुटिनल," उसर-बुध- "भोर में जागना;" ग्रीक औरियन "कल;" लिथुआनियाईऔश्रा "भोर;" ओल्ड चर्च स्लावोनिक जूट्रो "भोर, सुबह; कल;" पुराना हाई जर्मन ओस्टारा "ईस्टर"), पीआईई रूट *ऑस- (1) "चमकने के लिए," विशेष रूप से भोर से।
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सूचना
सार्वजनिक सूचना
इश्तहार
ऑस्टर में लैटिन अर्थ शिफ्ट, यदि यह वास्तव में वही शब्द है जो अन्य इंडो-यूरोपीय भाषाएं "पूर्व" के लिए उपयोग करती हैं, जिसके लिए लैटिन ओरिएन्स का उपयोग करता है (ओरिएंट (एन) देखें), शायद इतालवी प्रायद्वीप के अभिविन्यास के बारे में एक गलत धारणा पर आधारित है, "'दक्षिण-पूर्व' के माध्यम से बदलाव के साथ समझाया गया हैइटली की धुरी की विकर्ण स्थिति" [बक]; देखें वाल्डे, एलोइस, "लैटिनिसचेस एटिमोलोगिस्चेस वोर्टरबच," तीसरा संस्करण, खंड।मैं, पृ.87; अर्नौट, अल्फ्रेड, और मेइलेट, अल्फ्रेड, "डिक्शननेयर एटिमोलॉजिक डे ला लैंग्यू लैटिन," दूसरा। संस्करण, पृ.94.

या शायद कनेक्शन अधिक प्राचीन है, और पीआईई रूट *ऑस- "चमकने के लिए," अरोरा का स्रोत है, जो इटली में बहने वाली "गर्म" दक्षिणी हवा के संदर्भ में "जलने" के लिए शब्द भी उत्पन्न करता है। इस प्रकार कठोर "(गर्म) दक्षिणी हवा," रूपक रूप से "दक्षिण" तक विस्तारित हुई।

1540 के दशक से भी

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ऑस्ट्रल से जोड़ने वाली प्रविष्टियाँ
ओरिएंट(न.)14वीं शताब्दी के अंत में, "दिशा पूर्व; क्षितिज का वह भाग जहाँ सूर्य सबसे पहले दिखाई देता है," (अब राजधानी O- के साथ) "दुनिया के पूर्वी क्षेत्र, पूर्वी देश" (मूल रूप से अस्पष्ट रूप से यूरोप के पूर्व और दक्षिण का क्षेत्र, जिसे अब मध्य पूर्व कहा जाता है, लेकिन कभी-कभी मिस्र और भी कहा जाता हैभारत), पुराने फ़्रेंच ओरिएंट से "पूर्व" (11 सी), लैटिन ओरिएंटम (नाममात्र ओरिएन्स) से "उगता सूरज, पूर्व, आकाश का वह भाग जहाँ सूरज उगता है," मूल रूप से "उगता" (विशेषण), ओरिरी का वर्तमान कृदंत "उठना" (मूल देखें)।
जिसका अर्थ है "पहले पानी का मोती" 1831 का है, जो ओरिएंट के मोती (14 सी. के उत्तरार्ध) का संक्षिप्त रूप है, जिसका मूल अर्थ भारतीय समुद्रों से है। इसलिए इसका अर्थ "एक नाजुक इंद्रधनुषीपन, एक बढ़िया मोती की अनोखी चमक" (1755) भी है। ओरिएंट एक्सप्रेस एक ट्रेन थी जो 1883-1961 में पेरिस से वियना होते हुए इस्तांबुल तक चलती थी, शुरू से ही यह जासूसी और साज़िश से जुड़ी थी।

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ऑस्टर(न.)
"दक्षिणी हवा," 14वीं सदी के अंत में, लैटिन ऑस्टर से "दक्षिणी हवा; दक्षिण देश" (ऑस्ट्रल देखें)।

ऑस्ट्रेलिया का रुझान
7-वर्षीय चलती औसत के साथbooks.google.com/ngrams/ से अनुकूलित; एनग्राम संभवतः अविश्वसनीय हैं।
अन्वेषण हेतु और भी बहुत कुछ
पूर्व
पुरानी अंग्रेज़ी ईस्ट, ईस्टन (adj., adv.) "पूर्व, पूर्व की ओर, पूर्व की ओर;" ईस्ट (एन.), प्रोटो-जर्मेनिक से *ऑस्ट- "पूर्व," शाब्दिक रूप से "सूर्योदय की ओर" (पुराने फ़्रिसियाई एएसटी का स्रोत "पूर्व," एस्टर "पूर्व की ओर," डच ओस्ट ओल्ड सैक्सन ओस्ट, ओल्ड हाई जर्मन ओस्टन, जर्मन ओस्ट, ओल्ड नॉर्स ऑस्ट्र "
थकान
1660 के दशक में, "वह जो थकावट का कारण बनता है," फ्रांसीसी थकान से "थकावट," थकावट से "थका हुआ" (15 सी), लैटिन फेटिगारे से "थका हुआ, थका देने वाला," मूल रूप से "टूटने का कारण," पूर्व-लैटिन विशेषण *फटी-एगोस से "टूटने के बिंदु तक गाड़ी चलाना," ओ से पहले भाग के साथ
शरणार्थी
1680 के दशक में, "वह जो शरण या आश्रय या सुरक्षित स्थान की ओर भाग जाता है; वह जो उत्पीड़न या राजनीतिक अव्यवस्था के समय सुरक्षा के लिए किसी विदेशी देश में भाग जाता है," फ्रांसीसी शरणार्थी से, शरणार्थी के पिछले कृदंत का एक संज्ञा उपयोग "आश्रय लेना, रक्षा करना," पुराने फ्रांसीसी शरण से "हाय"
हेक्टर
"धमकी देना, धमकाना, दबंगई करना," 1650 के दशक, कठबोली हेक्टर (एन.) से "एक घमंडी, अशांत, डरपोक, शोर मचाने वाला साथी" [जॉनसन], 1650 के दशक, "इलियड" के हेक्टर से, अपने साथी ट्रोजन को लड़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करने के संदर्भ में। पहले अंग्रेजी में जीन नाम का प्रयोग किया जाता था
पवित्र
पुरानी अंग्रेज़ी हैलिग "पवित्र, समर्पित, पवित्र; ईश्वरीय; उपशास्त्रीय," प्रोटो-जर्मनिक *हैलागा से - (पुराने नॉर्स हेइलाग, डेनिश हेलिग, पुराने फ़्रिसियाई हेलिग "पवित्र," पुराने सैक्सन हेलैग, मध्य डच हेलिच, पुराने हाई जर्मन हेलैग, जर्मन हेलिग, गॉथिक हेलैग "पवित्र") का भी स्रोत, fr
बल्ला
"पिटाई में इस्तेमाल की जाने वाली एक छड़ी या छड़ी, एक युद्ध-क्लब, कुछ खेलों में गेंद पर प्रहार करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली छड़ी," सी। 1200, दुर्लभ पुरानी अंग्रेज़ी बैट "कडगेल" से, जो पहले पश्चिमी इंग्लैंड का एक शब्द था, संभवतः वेल्श या किसी अन्य सेल्टिक स्रोत से (आयरिश और गेलिक बैट, बाटा "स्टाफ, कुडगेल" की तुलना करें), बाद में
नाश्ता
"दिन का पहला भोजन," मध्य 15 सी., मौखिक वाक्यांश से; ब्रेक (v.) + तेज़ (n.) देखें। स्वर परिवर्तन के लिए, नीचे देखें। इसके लिए एक पुराना अंग्रेज़ी शब्द अंडरनमेटे (नीचे देखें) था, जिसे मॉर्गेनमेटे "सुबह का भोजन" भी कहा जाता है। स्पैनिश अल्मुएर्ज़ो "दोपहर का भोजन", लेकिन पहले और अभी भी स्थानीय रूप से "नाश्ता" है
बढ़ई
"लकड़ी का कारीगर, वह जो लकड़ी का भारी काम करता है," सी। 1300 (एक उपनाम के रूप में 12वीं सदी की शुरुआत से प्रमाणित), एंग्लो-फ़्रेंच बढ़ई से, पुराने उत्तरी फ़्रेंच बढ़ई (पुराने फ़्रेंच और आधुनिक फ़्रेंच चारपेंटियर), लेट लैटिन (आर्टिफ़ेक्स) कारपेंटरियस "वैगन (निर्माता) से; कैरी"
मन्ना
पुरानी अंग्रेज़ी उधार लेटे लैटिन मन्ना से, ग्रीक मन्ना से, हिब्रू मैन से, जिसका शाब्दिक अर्थ शायद "इमली के पेड़ से निकला पदार्थ" है, लेकिन ग्रीक और लैटिन में विशेष रूप से इज़राइल के बच्चों को उनके भटकने के दौरान चमत्कारिक रूप से आपूर्ति किए गए पदार्थ के संदर्भ में उपयोग किया जाता है।
दान
देर से पुरानी अंग्रेजी, "गरीबों के लिए परोपकार", "अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति में ईसाई प्रेम," पुरानी फ्रांसीसी चैरिटी से "(ईसाई) दान, दया, करुणा; भिक्षा; धर्मार्थ नींव" (12 सी), लैटिन कैरिटेटम (नाममात्र कैरीटास) से "महंगापन; सम्मान, स्नेह," से
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*ऑस्ट्रेलिया-(1)

प्रोटो-इंडो-यूरोपीय मूल का अर्थ है "चमकना", विशेषकर भोर का। यह संपूर्ण या इसका कुछ भाग बन सकता है: ऑस्ट्रल; ऑस्ट्रेलिया; ऑस्ट्रिया; ऑस्ट्रो-; अरोरा; पूर्व; ईस्टर; पूर्वी; ईओ-; ओस्ट्रोगोथ.







रविवार, 7 दिसंबर 2025

जैन ग्रन्थों के अनुसार नेमिनाथ और कृष्ण का सम्बन्ध-

जैन ग्रंथो के अनुसार भगवान श्री कृष्ण और भगवान नेमिनाथ रिश्ते में चचेरे भाई थे।

शौरीपुर के राजा समुद्रविजय के पुत्र नेमि बचपन से ही बड़े शांत, सरल और दयालु थे। वह श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। श्रीकृष्ण के पिता वासुदेव समुद्रविजय के भाई थे। श्रीकृष्ण ने ही नेमि का रिश्ता जूनागढ़ के राजा उग्रसेन की पुत्री राजुल से तय कराया था। बड़े ठाठ-बाट के साथ बारात जूनागढ़ पहुंची। श्रीकृष्ण भी बारात में शामिल थे। नगर की सीमा पर ही एक विशाल बाड़े में बंधे अनेक पशुओं का करुण क्रंदन सुन नेमि ने रथ रुकवा दिया और सारथी से पूछा, ये क्यों बंधे हैं?

सारथी ने पता करके बताया कि ये बारातियों के भोजन के लिए बंधे हैं। सुनकर नेमि सोच में पड़ गए कि अरे, बारातियों के भोजन के लिए इतने पशुओं की हत्या होगी! धिक्कार है मेरे जीवन पर! वहीं उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। वह तुरंत ही वापस हो लिए और राजसी वस्त्राभूषण त्यागकर, दिगंबर दीक्षा धारण कर निकट ही गिरनार पर्वत की ओर चल दिए। उधर राजा उग्रसेन के महल में सूचना पहुंची तो वहां कोहराम मच गया। राजुल भी नेमिकुमार के पास आकर सवाल करने लगीं, लेकिन नेमि नहीं माने तो राजुल ने भी दीक्षा धारण कर ली।

नेमि ने गिरनार पर्वत पर जाकर कठोर साधना की और 56 दिन बाद उनको ज्ञान की प्राप्ति हुई। तपस्या के दौरान श्रीकृष्ण व बलराम भी नेमि के दर्शन करने आए। राजुल उनकी प्रमुख आर्यिका शिष्या बनीं। उनके संघ में 40000 साध्वियां थीं। श्रीकृष्ण पर भी उनके उपदेशों का असर पड़ा। अंत समय जान वह भी गिरनार पर्वत की सर्वोच्च चोटी उर्जयंत पर जाकर योग निरोध धारण कर निर्वाण को प्राप्त हुए, और 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ कहलाए। राजुल की साधना स्थली गिरनार स्थित राजुल गुफा आज भी प्रसिद्ध है। गुजरात में गिरनार तीर्थ में आज दुनिया भर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।