*यदुवंश संहिता*
"प्राक्कथन"
पुस्तक "यदुवंश संहिता" का मुख्य उद्देश्य- पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता को सिद्ध करते हुए उनसे उत्पन्न यादवों के प्राचीनतम् और अद्यतन इतिहास को प्रमाण सहित निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर बताना है कि-
▪️ श्रीकृष्ण कौन ?
▪️यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य क्या है?
▪️यादवों की मुख्य- जाति, वंश, वर्ण, कुल एवं गोत्र क्या है ?
▪️यादवों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा भारतीय संस्कृति में उनका योगदान क्या रहा है?
▪️भारत के अलग-अलग प्रान्तों में यादवों को किन नामों से जाना जाता है ?
▪️भारतीय राजनीति में यादवों की प्रारम्भिक एवं अद्यतन स्थिति क्या है?
▪️भारतीय राजनीति के कुछ महान यादव राजनेताओं का जीवन परिचय इत्यादि को बताना भी इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है।
निर्देशक एवं मार्गदर्शक -
गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज
लेखक गण-
गोपाचार्य हंस श्री योगेश कुमार रोहि जी एवं
गोपाचार्य हंस श्री माताप्रसाद जी
विषय सूचिका-
अध्याय(1)- श्रीकृष्ण का परिचय-
(क)- आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ख)- ऐतिहासिक परिचय-
(1)- पुरातात्विक परिचय
(2)- लिपिकीय परिचय
अध्याय(2)- गोप (यादव) की उत्पत्ति
(क)- पौराणिक साक्ष्य
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
(ख)- ऐतिहासिक साक्ष्य
अध्याय (3)- यादवों की मुख्य-जाति
अध्याय(4)- यादवों का वर्ण
अध्याय(5)- यादवों का वंश एवं कुल
अध्याय(6)- यादवों का गोत्र
अध्याय(7)- भारत के प्रमुख यादव राजा
(क)- पौराणिक गोप (यादव) राजा
(1)- पुरुरवा
(2)- नहुष
(3)- यदु
(4)- कार्त्यवीर्य अर्जुन
(5)- शिशुपाल
(6)- देवमीढ
(7)- देवक
(8)- पर्जन्य
(9)- आहुक
(10)- कंस
(11)- नन्द बाबा
(12)- वसुदेव
(13)- बलराम जी
(14)- श्रीकृष्ण
(ख)- ऐतिहासिक यादव राजा
(1)- वीर अहीर लोरिक
(2)- आल्हा-ऊदल
(3)- अहीर देवायत बोदर
(4)- देवगिरी के यादव राजा
(क)-भिल्लम पंचम
(ख)-सिंघण द्वितीय
(ग)-रामचंद्र यादव
(5)- विजयनगर के यादव राजा
(क)- हरिहर एवं बुक्का
(ख)- कृष्णदेवराय
(6)-दक्षिण के अहीर राजा
(क)- राजा ईश्वरसेन अहीर
(6)- मैसूर के यादव राजा
(क)- राजा देवराज वाडियार
(7)- कर्नाटक के यादव राजा
(क)- राजा देवराज वाडियार
अध्याय(8)- प्रमुख क्रान्तिकारी यादव
1- राव तुला राम
2- प्राण सुख यादव
3- राव गोपाल देव
4- वीरन अलगु मुत्थु कोने
5- रघुवर प्रसाद यादव:
6- राम चरित्र राय यादव
7- ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
8- बदलू सिंह
अध्याय(9)- प्रान्तिय स्तर पर यादवों के प्रमुख सरनेम।
1- उत्तर प्रदेश और बिहार
2- हरियाणा, दिल्ली और पंजाब
3- राजस्थान
4- मध्यप्रदेश
5- गुजरात
6- महाराष्ट्र
7- तमिलनाडु
8- आन्ध्र प्रदेश और हरियाणा
9- कर्नाटक
10- केरल
11-पश्चिम बंगाल
12-ओडिशा
अध्याय(10)- प्रमुख यादव राजनेता
(क)- उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनेता
1- रामनरेश यादव
2- मुलायम सिंह यादव
3- प्रो. रामगोविन्द चौधरी
4- शिवपाल सिंह यादव
5- शरद यादव
6- अखिलेश सिंह यादव
7- डिम्पल यादव
8- डी० पी यादव
(B)- बिहार के प्रमुख राजनेता
1- बिन्देश्वरी प्रसाद मण्डल
2- रामलखन सिंह यादव (शेरे बिहार)
2- लालू प्रसाद यादव
3- श्रीमती रावड़ी देवी
4- तेजस्वी यादव
5- पप्पू यादव (राजेश रञ्जन)
6- रञ्जिता रञ्जन
7- नित्यानन्द राय
(C)- अन्य राज्यों के यादव राजनेता
1- मोहन यादव
2- भूपेन्द्र यादव
4- अन्नपूर्णा देवी
5- राव इन्द्रजीत सिंह
अध्याय(11)- प्रमुख यादव सामाजिक
कार्यकर्ता।
(1)- राजित सिंह यादव
(2)- गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज
(3)- गोपाचार्य श्री माताप्रसाद यादव
(4)- गोपाचार्य श्री योगेश कुमार रोहि
(5)- राव विजेन्द्र सिंह यादव (रेवाड़ी रियासत)
(5)- जाहल बेन अहीर
(6)- रमा भाई अहीर
(7)- मनोज कुमार यादव (बिहार)
(8)- सुनील यादव सुल्तानपुरिया
अध्याय(12)- खेल एवं सिने जगत के
प्रमुख यादव
(क)- खेल जगत के प्रमुख यादव
(A) - क्रिकेट
1- सूर्यकुमार यादव
2- कुलदीप यादव
3- उमेश यादव
4- मयंक यादव
5- पूनम यादव
6- राधा यादव
(B)- कुस्ती
1- नरसिंह पंचम यादव
2- वीरेंद्र सिंह यादव
3- गुरु हनुमान (विजय पाल यादव)
(C)- अन्य खेल
1- संतोष यादव
2- अभिषेक यादव
3- पुनम यादव
4- सचिन यादव
5- चंकी यादव
(ख)- सिने जगत के प्रमुख यादव
1- खेसारी लाल यादव
1- राजकुमार यादव
2- राजपाल यादव
3- रघुवीर यादव
4- लीना यादव
6- रजनीकांत
7- पारुल यादव
8- नरसिंह यादव
9- बाबा यादव
10- रवि यादव
11- एलविश यादव
(ग)- वाद्य एवं संगीत जगत के प्रमुख यादव
1- पन्नालाल घोष
2- विक्रम घोष
3- ध्रुवा घोष
4- बालेश्वर यादव
5- हीरालाल यादव
6- काशीनाथ यादव
7- राम कैलाश यादव
8- विहारी लाल यादव
9- निरहुआ
10- संजय यदुवंशी (अवधी गायक)
गोपों (यादवों) की परिशिष्ट कथाएं
(1)- गोपों की सत्यनारायण व्रत कथा
(2)- वेदमाता गायत्री की कथा
(3)- यज्ञों की देवी गोपी स्वाहा और स्वधा की कथा
(4)- ब्रह्माण्ड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना की कथा
(5)- यादवों का विश्वजीत युद्ध
[1/19, 6:42 PM] आत्मानन्द जी: अध्याय(1)-
-श्रीकृष्ण का परिचय-
यह अध्याय उनके लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को काल्पनिक और अनैतिहासिक मानकर उनकी सत्ता को मानने से इन्कार करते हैं।
किन्तु ऐसी बात नहीं है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण की सत्ता आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दोनों ही तरह से स्थित हैं।
इसको अच्छी तरह समझने के लिए इस अध्याय को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है -
(क)- श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय
(ख)- ऐतिहासिक परिचय-
(1)- पुरातात्विक परिचय
(2)- लिपिकीय परिचय
(क)- श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक परिचय-
(1)- गोलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
भगवान श्रीकृष्ण समस्त ब्रह्माण्डों से पच्चास करोड़ योजन उपर गोलोक में अपने गोप और गोपियों के साथ सदैव गोप वेष में रहते हैं। जिसकी पुष्टि ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय (दो) के श्लोक २१ से होती है जिसमें बताया गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम् ।२१।
अनुवाद - वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर)- वेष में रहते हैं।२१।
इसी तरह से ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक - ६१ से ६५ में लिखा गया है कि -
एवंरूपमरूपं तं मुने ध्यायन्ति वैष्णवाः।६१॥
सततं ध्येयमस्माकं परमात्मानमीश्वरम्।।
अक्षरं परमं ब्रह्म भगवन्तं सनातनम्।६२।।
स्वेच्छामयं निर्गुणं च निरीहं प्रकृतेः परम्।।
सर्वाधारं सर्वबीजं सर्वज्ञं सर्वमेव च।६३।।
सर्वेश्वरं सर्वपूज्यं सर्वसिद्धिकरं प्रदम्।।
स एव भगवानादिर्गोलोके द्विभुजः स्वयम्।६४।
गोपवेषश्च गोपालैः पार्षदैः परिवेष्टितः।।
परिपूर्णतमः श्रीमान् श्रीकृष्णो राधिकेश्वरः।६५।
अनुवाद -६१-६५-
• मुने ! वैष्णवजन उन निराकार परमात्मा का इस रूप में ध्यान किया करते हैं। वे परमात्मा ईश्वर हम सब लोगों के सदा ही ध्येय हैं। उन्हीं को अविनाशी परब्रह्म कहा गया है।६१-६२।
• वे ही दिव्य स्वेच्छामय शरीरधारी सनातन भगवान हैं। वे निर्गुण, निरीह और प्रकृति से परे हैं। सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वज्ञ,सर्वस्वरुप है।६३।।
• सर्वेश्वर, सर्वपूज्य तथा सम्पूर्ण सिद्धियों को हाथ में देने वाले हैं। वे आदि पुरुष भगवान स्वयं ही द्विभुज रूप धारण करके गोलोक में निवास करते हैं।६४।
•उनकी वेशभूषा भी ग्वालों (अहीरों) के समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालों (गोपों) से घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजी (श्रीराधा) के साथ रहने वाले और श्रीराधिका के प्राणेश्वर हैं।६५।
इसके अतिरिक्त ऋग्वेद मण्डल (१) के सूक्त- (१५४) की ऋचा (६) में भी गोलोक का वर्णन मिलता है। जिसमें लिखा गया है कि- गोलोक में भूरिश्रृंगा गायें रहती हैं। इसीलिए उस परमधाम को गोलोक अर्थात् गायों का लोक कहा जाता है।
"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयास:। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्ण: परमं पदमव भाति भूरि॥६।।
पदों के अर्थ व अन्वय:-
जिसमें "पदों का अर्थ है:-(यत्र)= जहाँ (अयासः)= प्राप्त हुए अथवा गये (भूरिशृङ्गाः)= स्वर्ण युक्त सींगों वाली (गावः)= गायें हैं (ता)= उन ।(वास्तूनि)= स्थानों को (वाम्)= तुम को (गमध्यै)= जाने को लिए (उश्मसि)= इच्छा करते हो। (उरुगायस्य)= बहुत प्रकारों से प्रशंसित (वृष्णः)= सुख वर्षाने वाले परमेश्वर का (परमम्)= उत्कृष्ट (पदम्)= स्थान (भूरिः)= अत्यन्त (अव भाति) =उत्कृष्टता से प्रकाशमान होता है (तत्)= उसको (अत्राह)= यहाँ ही हम लोग चाहते हैं ॥६।
अर्थात् उपर्युक्त ऋचाओं का सार यही है कि श्रीकृष्ण का परम धाम वहीं है, जहाँ स्वर्ण युक्त सींगों वाली गायें रहती हैं, और वे विष्णु (श्रीकृष्ण) वहाँ गोप रूप में अहिंस्य (अवध्य) हैं, और यही स्वराट-विष्णु ही श्रीकृष्ण, वासुदेव, नारायण आदि नामों से परवर्ती युग में लोकप्रिय हुए हैं। क्योंकि इस सम्बन्ध में ऐसा ही लिखा गया है कि -
"त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः ।
अतो धर्माणि धारयन् ॥१८॥
(ऋग्वेद १/२२/१८)
इस ऋचा के पद-भेद से स्पष्ट होता है कि -
(अदाभ्यः) =सोमरस रखने के लिए गूलर की लकड़ी का बना हुआ पात्र को (धारयन्)= धारण करता हुआ । (गोपाः)= गोपालक रूप, (विष्णुः)= संसार का अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) =तीन (पदानि)= क़दमो से (विचक्रमे)= गमन करता है । और ये ही (धर्माणि)= धर्मों को ।१८॥
अर्थात् यह बात वेदों से भी सुनिश्चित है कि - परमेश्वर श्रीकृष्ण का सनातन निवास गोलोक है, जहाँ वे गोप-वेष में अपनी गायों तथा गोपों के साथ रहते हैं और और वे ही भगवान भूतल पर अपने गोपों के यहाँ गोप-वेष में ही अवतरित होकर धर्म की स्थापना बारम्बार करते हैं। इसी बात को प्रमाण सहित इसी क्रम में आगे बताया गया है।
(2)- भूलोक में श्रीकृष्ण का परिचय-
जिस तरह से भगवान श्रीकृष्ण का परिचय गोलोक में है उसी तरह से इनका परिचय भूतल में भी है। क्योंकि यह सर्वविदित है कि भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से जब भी भू-तल पर भूमि भार हरण के लिए अवतरित होते हैं, तो वे अपने समस्त गोप-गोपियों के साथ ही गोपकुल में गोपों के यहाँ ही अवतरित होते हैं।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।
(श्रीमद्भागवत गीता अध्याय- ४/७)
अनुवाद:-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- "जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने आप को साकार रूप से प्रकट करता हूँ अर्थात् भूतल पर शरीर रूप धारण करता हूँ"।
इसी सत्य को चरितार्थ करने के लिए परमेश्वर श्रीकृष्ण अपने गोलोक से धरा-धाम पर गोपकुल के यादव वंश में अवतरित होते हैं।
इस बात की पुष्टि- श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय -४ के श्लोक संख्या- २२ से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते।।२२।
अनुवाद - अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
इसी तरह से श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के अध्याय-(६) के श्लोक संख्या -(२३) और (२५) में ब्रह्मा जी श्री कृष्ण से कहते हैं कि-
अवततीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद् रुपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः।। २३।
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरूषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीताय पंचविंशाधिकं प्रभो।।२५।
अनुवाद - आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिए उदारता और पराक्रम से भरी अनेक लीलाएँ कीं ।२३।
• पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान प्रभु ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये "एक सौ पचीस वर्ष" बीत गए हैं।२५।
▪️इसी तरह से हरिवंश पुराण के हरिवंश पर्व के अध्याय- (५५) के श्लोक-१७ में गोपेश्वर श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी से पूछा कि- आप मुझे यह बताएं कि मैं किस प्रदेश में कैसे प्रकट होकर अथवा किस वेष में रहकर उन सब असुरों का समर भूमि में संहार करूँगा ? इस पर ब्रह्माजी श्लोक संख्या- (१८ से २०) में कहा -
नारायणेमं सिद्धार्थमुपायं श्रृणु मे विभो।
भुवि यस्ते जनयिता जननी च भविष्यति।। १८।
यत्र त्वं च महाबाहो जात: कुलकरो भुवि।
यादवानां महद वंशमखिलं धारयिष्यसि।।१९।
ताश्चासुरान् समुत्पाट्य वंशं कृत्वाऽऽत्मननो महत्।
स्थापयिष्यसि मर्यादां नृणां तन्मे निशामय।।२०।
अनुवाद - सर्वव्यापी नारायण ! आप मेरे इस उपाय को सुनिए, जिसके द्वारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो जाएगा। हे महाबाहो ! भूतल पर जो आपके पिता होंगे,जो माता होगीं और जहाँ जन्म लेकर आप अपने कुल की वृद्धि करते हुए यादवों के सम्पूर्ण विशाल वंश को धारण करेंगे तथा उन समस्त असुरों का संहार करके अपने वंश का महान विस्तार करते हुए जिस प्रकार मनुष्यों के लिए धर्म की मर्यादा स्थापित करेंगे, वह सब बताता हूँ सुनिए।१८-१९-२०।
▪️इसी तरह से गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुवंश में जन्म लेने की पुष्टि- गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (१४) के श्लोक संख्या- (४१) से होती है। जिसमें त्रेता-युग के रावण का भाई विभीषण जो अमर होकर लंका का राजा द्वापर युग तक जीवित था। उसी समय यादव अपनी विशाल सेना के साथ विश्वजीत युद्ध के लिए निकले थे। उसी समय दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने विभीषण को बताया कि-
असंख्यब्राह्मण्डपतिर्गोलोकेश: परात्पर:।
जातस्तयोर्वधाथार्य यदुवंशे हरि: स्वयंम्।।४१।
यादवेन्द्रो भूरिलीलो द्वारकायां विराजते। ४२/२
अनुवाद - असंख्य ब्रह्माण्डपति परात्पर गोलोकनाथ श्रीकृष्ण यदुवंश में अवतीर्ण हुए हैं। वे यादवेंद्र बहुत सी लीलाएँ करते हुए इस समय द्वारिका में विराजमान है।४१-४२/२।
यादवों के उसी विश्वजीत युद्ध के समय मुनि वामदेव ने राजा गुणाकर को भी भगवान श्रीकृष्ण को यादव कुल में उत्पन्न होने की बात बहुत ही अच्छे ढंग से बताया है। जिसका वर्णन गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (२८) के श्लोक संख्या (४५) व (४६) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-
वामदेव उवाच -
राजंस्त्वं हि न जानासि परिपूर्णतमं हरिम् ॥
सुराणां महदर्थाय जातं यदुकुले स्वयम् ॥
भुवो भारावताराय भक्तानां रक्षणाय च ॥४३॥
भूत्वा यदुकुले साक्षाद्द्वारकायां विराजते ॥
तेन कृष्णेन पुत्रोऽयं प्रद्युम्नो यादवेश्वरः ॥
उग्रसेनमखार्थाय जगज्जेतुं प्रणोदितः ॥४४॥
अनुवाद - राजन ! तुम नहीं जानते कि परिपूर्णतम परमात्मा श्रीहरि, देवताओं का महान कार्य सिद्ध करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं। पृथ्वी का भार उतरने और भक्तों की रक्षा करने के लिए यदुकुल में अवतीर्ण हो वे साक्षात भगवान द्वारिकापुरी में विराजते हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने उग्रसेन के यज्ञ की सिद्धि के लिए सम्पूर्ण जगत को जीतने के निमित्त अपने पुत्र यादवेश्वर प्रद्युम्न को भेजा है।४३- ४४।
▪️यादवों के उसी विश्वजित् युद्ध के समय जब श्रीकृष्ण के द्वारा महान बलशाली दैत्यराज शकुनि मारा गया तब उसकी पत्नी मदालसा ने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से जो कुछ कहा उससे भी सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण गोप जाति के यदुकुल में अवतीर्ण हुए थे। जिसका वर्णन गर्गसंगीता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय- (४२) के श्लोक संख्या- (६) और (७) में कुछ इस प्रकार लिखा गया है-
भारावताराय भुवि प्रभो त्वं जातो यदूनां कुल आदिदेव।
ग्रसिष्यसे पासि भवं निधाय गुणैर्न लिप्तोऽसि नमामितुभ्यम्।। ६।
मदात्मजं पालय भीत-भीतममुष्य हस्तं कुरु शीर्षि्ण देव।
भर्त्रा कृते में किल तेऽपराधं क्षमस्व देवेश जगन्निवास।। ७।
अनुवाद- (६-७)
प्रभो आदि देव ! आप भूतल का भार उतारने के लिए यदुकुल में अवतरित हुए हैं। आप ही संसार के स्रष्टा एवं पालक है, और प्रलयकाल आनेपर आप ही इसका संहार भी करते हैं। किन्तु आप कभी भी गुणों में लिप्त नहीं होते। मैं आपकी अनुकूलता प्राप्त करने के लिए आपके चरणों को प्रणाम करती हूँ। मेरा पुत्र बहुत डरा हुआ है। आप इसकी रक्षा कीजिए। देव ! इसके मस्तक पर अपना वरद हस्त रखिए। देवेश ! जगन्निवास ! मेरे पति ने जो अपराध किया है उसे क्षमा कीजिए।
▪️इसी तरह से जब सभी देव मिलकर ब्रह्माजी का विवाह अहीर कन्या गायत्री से भगवान् विष्णु के निर्देशन में कराते हैं, तब ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री क्रोध से तिलमिलाकर अहीर कन्या गायत्री सहित देवताओं को शापित करती हैं। उसी समय वहाँ उपस्थित विष्णु को भी सावित्री शाप दे देती हैं। उसी शाप के विधान से भी गोपेश्वर श्रीकृष्ण को यदुकुल में जन्म लेना पड़ता। इस बात की पुष्टि- पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या-(१६१) से होती है। जिसमें सावित्री विष्णु को शाप देते हुए कहती हैं कि-
यदा यदुकुले जातः कृष्णसंज्ञो भविष्यसि।
पशूनां दासतां प्राप्य चिरकालं गोप रूपेण भ्रमिष्यसि ।।१६१।
अनुवाद - हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगें। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बनकर लम्बे समय तक इधर-उधर भ्रमण करोगे।१६१।
▪️इसी तरह से बलरामजी को भी यदुकुल में उत्पन्न होने की पुष्टि गर्गसंहिता के बलभद्र खण्ड के श्लोक संख्या -(१३) और (१४) से होती है। जिसमें बलराम जी स्वयं अपने पार्षदों से कहते हैं कि -
हे हलमुसले यदा-यदा युवयोः स्मरणंं करिष्यमि।
तदा तदा मत्युर आविर्भूते भवतम्।। १३
भो वर्म त्वमपि चाविर्भव। हे मुनयः पाणिन्यादयो हे व्यासादयो हे कुमुदादयो हे कोटिशो रुद्रा हे भवानीनाथ हे एकादश रुद्रा हे गन्धर्वा, हे वासुक्यादिनागेन्द्रा, हे निवातकवचा हे वरुण, हे कामधेनो मूम्यां भारतखण्डे यदुकुलेऽवतरन्तं मां यूयं सर्वे सर्वदा एत्य मम दर्शनं कुरुत।।१४।
अनुवाद - हे हल और मुसल! मैं जब-जब तुम्हारा स्मरण करूँ, तब-तब तुम मेरे सामने प्रकट हो जाना।
हे कवच ! तुम भी वैसे ही प्रकट हो जाना। हे पाणिनि, व्यास तथा कुमुद आदि मुनियों ! हे कोटि-कोटि रूद्रों ! गिरिजापति शंकर जी ! ग्यारह रुद्रों ! गन्धर्वों ! वासुकि आदि नागराजों ! निवातकवच आदि दैत्यों ! हे वरूण और कामधेनु! मैं भूमण्डल पर भारतवर्ष में यदुकुल में अवतार लूँगा। तुम सब वहाँ आकर सदा सर्वदा मेरा दर्शन करना।१३-१४।
✳️ अतः उपर्युक्त सभी श्लोकों से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण गोप अथवा आभीर जाति के यदुवंश के वृष्णि कुल में हुआ है। किन्तु इस सम्बन्ध में ज्ञात हो कि- यदुवंश - वैष्णव वर्ण के गोपजाति का ही प्रमुख वंश है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को जब वंश में जन्म लेने की बात कही जाती है तब उनके लिए यदुवंश का नाम लिया जाता है। किन्तु जब भगवान श्रीकृष्ण को जाति में जन्म लेने की बात कही जाती है तो उनके लिए गोपजाति या आभीर (आहिर) जाति का नाम लिया जाता है। इसमें दोनों तरह से बात एक ही है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को अनेक बार यदुवंश के साथ-साथ गोपजाति में भी जन्म लेने की बात कही गई है। जैसे-
गोपेश्वर श्रीकृष्ण को गोपजाति में जन्म लेने की बात हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में कही गई है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८।
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है ; और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
▪️भगवान श्रीकृष्ण को भू-तल पर गोपकुल में अवतीर्ण होने की बात गायत्री संग ब्रह्माजी के विवाह के समय तब होती है जब इन्द्र गोप कन्या गायत्री को लेकर ब्रह्माजी से विवाह हेतु यज्ञ स्थल पर ले गए थे। तब सभी गोप अपना मुख्य शस्त्र लकुटि- दण्ड (लाठी- डण्डा) के साथ अपनी कन्या गायत्री को खोजते हुए ब्रह्मा के यज्ञ स्थल में पहुँचे। वहाँ पहुँच कर गायत्री के माता-पिता ने पूछा कि- मेरी कन्या को कौन यहाँ लाया है ? तब उनकी यह बात सुनकर तथा उनके क्रोध का अन्दाजा लगाकर वहाँ उपस्थित सभी देवता और ऋषि मुनि भयभीत हो गए। तभी वहाँ उपस्थित विष्णु भगवान् गोपों के सामने उपस्थित हो गए और उस अवसर पर जो कुछ गोपों से कहा उसका वर्णन पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७) के श्लोक संख्या -(१६) से (२०) में मिलता है। जिसमें भगवान्- विष्णु यज्ञ-स्थल में सबके समक्ष गोपों से कहते हैं कि -
युष्माभिरनया आभीरकन्याया
तारितो गच्छ ! दिव्यान्लोकान्महोदयान्।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये।१६ ।
अवतारं करिष्येहं सा क्रीडा तु भविष्यति।
यदा नन्दप्रभृतयो ह्यवतारं धरातले।१७।
करिष्यन्ति तदा चाहं वसिष्ये तेषु मध्यतः।
युष्माकं कन्यकाः सर्वा वसिष्यन्ति मया सह।। १८।
तत्र दोषो न भविता न द्वेषो न च मत्सरः।
करिष्यन्ति तदा गोपा भयं च न मनुष्यकाः।।१९।
न चास्याभविता दोषः कर्मणानेन कर्हिचित्।
श्रुत्वा वाक्यं तदा विष्णोः प्रणिपत्य ययुस्तदा ।।२०।
अनुवाद:- हे आभीरों (गोपों) इस तुम्हारी आभीर कन्या गायत्री के द्वारा उद्धार किये गये तुम सब लोग दिव्यलोकों को जाओ तुम्हारी अहीर जाति के यदुकुल के अन्तर्गत वृष्णिकुल में देवों के कार्य की सिद्धि के लिए मैं अवतरण करुँगा।१६।
• और वहीं मेरी लीला (क्रीडा) होगी। उसी समय धरातल पर नन्द आदि का भी अवतरण होगा।१७।
• तब मैं उनके बीच रहूँगा। तुम्हारी सभी पुत्रियाँ मेरे साथ ही रहेंगी।१८।
• तब वहाँ कोई पाप, द्वेष और ईर्ष्या नहीं होगी। गोप (आभीर) लोग भी किसी को भय नहीं देंगे।१९।
• इस कार्य (ब्रह्मा से विवाह करने) के फलस्वरूप इस (तुम्हारी पुत्री को) कोई पाप नहीं लगेगा। विष्णु के ये वचन सुनकर वे सभी उन्हें प्रणाम करके वहाँ से चले गए।२०।
किन्तु जाते समय गोपगणों ने भी विष्णु से यह वचन करवाया कि आप निश्चित रूप से गोपकुल में ही जन्म लेंगे। जिसका वर्णन इसी अध्याय के श्लोक -२१ में है जिसमें गोपगण भगवान-विष्णु से कहते हैं कि -
एवमेष वरो देव यो दत्तो भविता हि मे।
अवतारः कुलेऽस्माकंं कर्तव्योधर्मसाधनः।। २१।
अनुवाद - हे देव ! यहीं हो। आपने जो वर दिया, वैसा ही हो। आप हमारे कुल में धर्मसाधन के कर्तव्य के लिए अवश्य अवतार लेंगे।२१।
तब विष्णु ने भी गोपों को ऐसा ही वचन दिया। तत्पश्चात सभी गोप प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घर चले गए।
उसी समय अहीर कन्या गायत्री ने ब्रह्माजी की प्रथम पत्नी सावित्री जो विष्णु को यह शाप दे चुकी थी कि- हे विष्णु ! जब तुम यदुवंश में जन्म लोगे, तो तुम कृष्ण के नाम से जाने जाओगे। उस समय तुम पशुओं (गायों) के सेवक बन कर लम्बे समय तक इधर-उधर भटकते रहोगे। उस शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४) और (१५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यंन्ति मद्वं शप्रभवानराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
• आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! (श्रीकृष्ण) तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी।
• पुन: गायत्री विष्णु से कहती हैं- मेरे गोप वंश के लोग जहाँ भी रहेंगे वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो।१५।
✳️ ज्ञात हो उपर्युक्त श्लोकों में गायत्री द्वारा जिस विष्णु को सम्बोधित किया जा रहा है वह छूद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक अंश से भूतल पर श्रीकृष्ण का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे ही अनन्त ब्रह्माण्ड में अनन्त छूद्र (छोटे) विष्णु हैं जो परमेश्वर श्रीकृष्ण के एक-एक अंश से प्रतिनिधित्व किया करते हैं। अतः गायत्री द्वारा भूलोक पर विष्णु नाम का वास्तविक सम्बोधन परमेश्वर श्रीकृष्ण के लिए ही है।
अतः उपर्युक्त सभी महत्वपूर्ण श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- गोपों में श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्ध है और धर्म स्थापना हेतु गोपेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म या अवतरण, वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत गोप जाति (अहीर जाति) के यादव वंश में ही होता है जहाँ उनके रक्त सम्बन्धी हैं। अन्य किसी जाति या वंश में नहीं।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण, चाहे गोलोक में हों या भूलोक में हों, वे सदैव गोपवेष में गोपों के ही साथ ही रहते हैं, और सभी लीलाएँ उन्हीं के साथ ही करते हैं। इसीलिए गोपों को श्रीकृष्ण का सहचर (सहगामी) अर्थात् साथ-साथ चलने वाला भी कहा जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण को सदैव गोपवेष में गोपों के साथ रहने की पुष्टि - हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय -(३) के श्लोक -(३४) से होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने जन्म से पूर्व योग माया से कहते हैं कि-
मोहहित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत्।
अहमप्यात्मनो वृत्तिं विधास्ये गोषु गोपवतः।। ३४।
अनुवाद - तुम उस कंस को मोह में डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत का उपभोग करोगी। और मैं भी व्रज में गौओं के बीच में रहकर गोपों के समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा।
ये तो रही बात भूलोक की। किन्तु गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक में भी अपने गोपों के साथ सदैव गोपवेष में ही रहते हैं। इस बात की पुष्टि -ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्म-खण्ड के अध्याय
(२)- के श्लोक -(२१) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
स्वेच्छामयं सर्वबीजं सर्वाधारं परात्परम्।
किशोरवयसं शश्वद्गोपवेषविधायकम्।।२१।
अनुवाद- वे ही प्रभु स्वेच्छामयी सभी के मूल- (आदि-कारण) सर्वाधार तथा परात्पर- परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है और वे प्रभु गायों के उस लोक (गोलोक) में सदा गोप (आभीर) भेष में रहते हैं।२१।
अतः इस उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण चाहे गोलोक में हों या भूलोक, दोनों स्थानों पर वे सदैव गोपवेष में गोपों के साथ ही रहते हैं।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों में एक नाम "गोपवेशः" और गोपकृत भी है जिसका क्रमशः अर्थ है- सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला तथा नूतन गोपों का निर्माण करने वाला
इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय -(५९) के श्लोक- (३०) से होती है।
वने वत्सचारी महावत्सहारी
बकारिः सुरैः पूजितोऽघारिनामा ।
वने वत्सकृद्गोपकृद्गोपवेषः*
कदा ब्रह्मणा संस्तुतः पद्मनाभः ॥ ३०
गोपकृत - अर्थात् = नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।
गोपवेशः - अर्थात् = सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला
इसी तरह से हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- (१००) के श्लोक - (२६) और (४१) में भगवान श्रीकृष्ण को गोप और यादव दोनों होने की पुष्टि पौण्ड्रक-श्रीकृष्ण के समय होती है। उस युद्ध के मध्य श्रीकृष्ण से पौण्ड्रक कहता है कि-
स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह।
भो भो यादव गोपाल इदानिं क्व गतो भवात।। २६।
गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।। ४१।
अनुवाद - ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गए थे ? आजकल मैं ही वासुदेव नाम से विख्यात हूंँ।२६।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने पौण्ड्रक से कहा-
• राजन मैं सर्वदा गोप हूँ, प्राणियों का सदा प्राण दान करने वाला हूँ, तथा सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों का शासक हूँ। ४१
इसी प्रकार से एक बार श्रीकृष्ण की तरह-तरह की अद्भुत लीलाओं को देखकर गोपों को संशय होने लगा कि कृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। ये या तो कोई देव हैं या कोई ईश्वरीय शक्ति। और इस रहस्य को श्रीकृष्ण अपने गोपों से गुप्त रखना चाहते थे, ताकि मेरी बाल-लीला बाधित न हो। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण उनके संशय को दूर करने के लिए हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व के अध्याय- (२०) के श्लोक- (११) में अपने सजातीय गोपों से कहते हैं कि-
मन्यते मां यथा सर्वे भवन्तो भीमविक्रमम्।
तथाहं नावमन्तव्यः स्वजातीयोऽस्मि बान्धवः।।११।
अनुवाद - आप सब लोग मुझे जैसा भयानक पराक्रमी समझ रहे हैं, वैसा मानकर मेरा अनादर न करें। मैं तो आप लोगों का सजातीय (गोप जाति का) भाई बन्धु ही हूँ।
इस प्रकार से यह अध्याय (एक)- इस जानकारी के साथ समाप्त हुआ कि- गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक और भू-लोक दोनों स्थानों पर सदैव गोपवेष में अपने गोपकुल के गोपों के साथ ही रहते हैं। अब इसके अगले अध्याय- (दो) में गोप (यादवों) की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। उसको भी इस अध्याय के साथ जोड़कर पढे़ें ।
भाग- (ख) ऐतिहासिक परिचय-
यह भाग उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो भगवान श्रीकृष्ण को अनैतिहासिक मानकर श्रीकृष्ण को एक काल्पनिक (व्यक्ति) कैरेक्टर मानते हैं। जबकि उन लोगों को यह पता नहीं है कि श्रीकृष्ण की सत्ता काल्पनिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक है। इसी बात को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे दो प्रमुख भागों में बांटा गया है (1)पुरातात्विक परिचय (2)- लिपिकीय परिचय।
(1) पुरातात्विक परिचय -
[1/19, 6:44 PM] आत्मानन्द जी: अध्याय(2)-
गोप (यादवों) की उत्पत्ति
यादवों यानी गोपों की उत्पत्ति को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे दो भागों तथा चार उप भागों में विभाजित करके प्रमाण सहित बताया गया है की गोप यानी यादवों की उत्पत्ति सर्वप्रथम गोलोक में तथा उसके बाद भू-लोक में कब और कैसे हुई है। जिसमें आप यह भी जान पाएंगे की गोप और यादव कैसे एक ही होते हैं। इन समस्त जानकारियों के लिए निम्नलिखित पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत हैं -
(क)- पौराणिक साक्ष्य
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
(ख)- ऐतिहासिक साक्ष्य
(क)- पौराणिक साक्ष्य -
(1)- गोलोक में यादवों की उत्पत्ति
यदि गोपों अर्थात् यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक संदर्भों को देखा जाए तो वेदों से लेकर लगभग प्रत्येक पुराणों में गोलोक में इनकी प्रथम उत्पत्ति के संदर्भ मिलते हैं। जैसे- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-(5) के श्लोक संख्या- २५, ४० और ४२ में बहुत ही स्पष्ट रूप से लिखा गया है-
"आविर्बभूव कन्यैका कृष्णस्य वामपार्श्वतः।
धावित्वा पुष्पमानीय ददावर्घ्यं प्रभोः पदे।२५।
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः।
आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः।४२।
अनुवाद -
गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के वाम-पार्श्व से वामा के रूप में एक कामनाओं की प्रतिमूर्ति- प्रकृति रूपा कन्या उत्पन्न हुई जो कृष्ण के ही समान किशोर-वय थी।२५।
• फिर तो उस किशोरी अर्थात् श्रीराधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• उसी क्षण श्रीकृष्ण के रोमकूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
इसी प्रकार से गोपों की उत्पत्ति के बारे में श्रीमद्देवी भागवत पुराण के नवम् स्कन्ध अध्याय-(२) के श्लोक- ६०-६१ में लिखा गया है कि -
अथगोलोकनाथस्य लोमनां विवरतो मुने।
भूताश्चासंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः।। ६०
रुपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च।
प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे भभूवः पार्षदा विभोः।। ६१
अनुवाद- ६०-६१
हे मुने ! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण के रोमकूपों (कोशिकाओं) से असंख्य गोपगण प्रकट हुए, जो वय, तेज, रुप, गुण, बल तथा पराक्रम में उन्हीं के समान थे। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्राणों के समान प्रिय पार्षद बन गये।
✳️ ज्ञात हो कि- गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा के समरूप इसलिए थे, क्योंकि इनकी उत्पत्ति श्रीकृष्ण और श्रीराधा की सूक्ष्मतम इकाई (कोशिका) अर्थात उनके क्लोन से हुई हैं। इसलिए सभी गोप श्रीकृष्ण के समरूप तथा सभी गोपियों श्रीराधा के समरूप उत्पन्न हुईं।
इस बात को आज विज्ञान भी स्वीकारता है कि- समरूपण अर्थात क्लोनिंग विधि से उत्पन्न जीव उसी के समरूप होता है, जिससे उसकी क्लोनिंग की गई होती है।
और विज्ञान के इस समरूपण सिद्धान्त से परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा ने पूर्व काल में ही अपनी सूक्ष्मतम इकाइयों से समरूपण विधि द्वारा गोलोक में गोप-गोपियों की उत्पत्ति कीं थीं।
इस प्रकार से सिद्ध होता है कि गोपों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण से तथा गोपियों की उत्पत्ति श्रीराधा से हुई है। इस बात को प्रमुख देवों सहित परमात्मा श्रीकृष्ण ने भी स्वीकार किया है। जैसे- गोप और गोपियों की उत्पत्ति के बारे में भगवान शिव ने पूर्व काल में पार्वती को भी ऐसा ही दृष्टान्त सुनाया था। जिसे शिव-वाणी समझ कर इस घटना को पुराणों में सार्वकालिक और सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया। जिसका वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृतिखण्ड के अध्याय-(४८) के श्लोक संख्या- (४३) में मिलता है। जिसमें शिवजी पार्वती से कहते हैं-
"बभूव गोपीसंघश्च राधाया लोमकूपतः।श्रीकृष्णलोमकूपेभ्यो बभूवुः सर्वबल्लवाः।।४३।
अनुवाद -• श्रीराधा के रोमकूपों से गोपियों का समुदाय प्रकट हुआ है, तथा श्रीकृष्ण के रोमकूपों से सम्पूर्ण गोपों (आभीरों) का प्रादुर्भाव हुआ है।
▪️इस प्रकार से देखा जाए तो शिव जी के कथन से भी यह सिद्ध होता है कि गोप और गोपियों की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों से प्रारम्भिक रूप से गोलोक में ही हुई है।
▪️इसी तरह से गोप-गोपियों की उत्पत्ति को लेकर परम प्रभु परमात्मा श्रीकृष्ण की वे सभी बातें और प्रमाणित कर देती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने अँश से उत्पन्न गोपों की उत्पत्ति के विषय में स्वयं ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड के अध्याय -(३६) के श्लोक संख्या -(६२) में राधा जी से कहते हैं-
"गोपाङ्गनास्तव कला अत एव मम प्रियाः।
मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः। ६२।
अनुवाद:- हे राधे ! समस्त गोपियाँ तुम्हारी कलाऐं हैं। और सभी गोलोक वासी गोप मेरे रोमकूपों से उत्पन्न मेरी ही कलाऐं तथा अंश हैं।६२।
और ऐसी ही बात भगवान श्रीकृष्ण उस समय भी कहते हैं- जब वे स्वयं भूतल पर गोप जाति के यदुवंश के अन्तर्गत वृष्णि कुल में अवतरित होते हैं।, और कुछ समय पश्चात कंस का वध करके मथुरा के सिंहासन पर पुन: कंस के पिता उग्रसेन को अभिषिक्त करते हैं। और इसके कुछ समय पश्चात उग्रसेन भगवान श्रीकृष्ण से राजसूय यज्ञ के आयोजन का परामर्श करते हैं।। उसी प्रसंग के क्रम में स्वयं श्रीकृष्ण उग्रसेन से कहते हैं कि- "सभी यादव मेरे अंश हैं"। श्रीकृष्ण के इस कथन की पुष्टि गर्गसंहिता के विश्वजितखण्ड के अध्याय (२) के श्लोक संख्या- (५-६ और- ७) से होती है, जिसमें लिखा गया है कि-
"सम्यग्व्यवसितं राजन् भवता यादवेश्वर।
यज्ञेन ते जगत्कीर्तिस्त्रिलोक्यां सम्भविष्यति॥५॥
आहूय यादवान्साक्षात्सभां कृत्वथ सर्वतः।
ताम्बूलबीटिकां धृत्वा प्रतिज्ञां कारय प्रभो ॥६॥
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः॥ जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- (५,६,७)- तब श्रीकृष्ण ने कहा- राजन् ! यादवेश्वर ! आपने बड़ा उत्तम निश्चय किया है। उस यज्ञ से आपकी कीर्ति तीनों लोकों में फैल जायगी।
• प्रभो ! सभा में समस्त यादवों को सब ओर से बुलाकर पान का बीड़ा रख दीजिये और प्रतिज्ञा करवाईये कि-
• समस्त यादव मेरे ही अंश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।
▪️ इसके अतिरिक्त गोपों की उत्पत्ति के विषय में कुछ ऐसा ही वर्णन उस समय भी मिलता है, जब समस्त यादव विश्वजीत युद्ध के लिए भूमण्डल पर चारों दिशाओं में निकल पड़े, तब उस समय दन्तवक्र नाम के एक दुष्ट राजा से यादवों का भयानक युद्ध हुआ। उसी समय श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-( 11 ) के श्लोक संख्या-(२१ और २२) में दन्तवक्र को यादवों का परिचय देते हुए कहा-
"नन्दो द्रोणो वसुः साक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः। गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्भवाः।२१।
"राधारोमोद्भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः।
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परै:।२२।
अनुवाद (२१-२२)- नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुल में अवतीर्ण हुए हैं। और गोलोक में जो गोपालगण (आभीर) हैं, वे साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं, और गोपियों श्री राधा के रोम से उत्पन्न हुई हैं। वे सब की सब यहाँ व्रज में उतर आई हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी गोपांगनाऐं हैं जो पूर्व-काल में पूण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुईं हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के एक हजार नामों में एक नाम "गोपकृत"
भी है जिसका अर्थ है- नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के अश्वमेधखण्ड के अध्याय -(५९) के श्लोक- (३०) से होती है।
वने वत्सचारी महावत्सहारी
बकारिः सुरैः पूजितोऽघारिनामा ।
वने वत्सकृद्गोपकृद्गोपवेषः*
कदा ब्रह्मणा संस्तुतः पद्मनाभः ॥ ३०
गोपकृत - अर्थात् = नूतन गोपों का निर्माण करने वाला।
गोपवेशः - अर्थात् = सर्वदा गोप (अहीर) वेश में रहने वाला
▪️इस प्रकार से इन अनेक पौराणिक साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि सर्वप्रथम गोलोक में परमेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों से ही गोप और गोपियों की उत्पत्ति हुई है जिन्हें भू-तल पर यादव, अहीर, घोष, गोप, और गोपाला इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।
किन्तु सवाल यह है कि क्या गोलोक के गोप और गोपियाँ ही
भू-लोक की गोप- गोपियाँ हैं या कोई और? इस प्रश्न का समाधान प्रमाण सहित भाग- (दो) में बताया गया है।
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
(2)- भू-लोक में यादवों की उत्पत्ति
कुछ लोगों को यह संशय हो सकता है कि गोलोक की गोप- गोपियाँ भू-लोक की नहीं हो सकतीं। किन्तु ऐसी बात नहीं है, गोलोक की ही गोप-गोपियाँ भू-लोक की भी हैं। और ये गोलोक से भू-लोक पर एक निश्चित प्रयोजन के तहत् भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही समयं समयं पर भू-लोक पर आती हैं। यह ध्रुव सत्य है। इसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के अध्याय-(६) में उस समय होती है जब देवों के निवेदन पर गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने समस्त गोप-गोपियों को बुलाकर कहते हैं-
जनुर्लभत गोपाश्च गोप्यश्च पृथिवीतले।।
गोपानामुत्तमानां च मन्दिरे मन्दिरे शुभे।६९।।
अनुवाद - भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- गोप और गोपियों ! तुम सब भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ घर-घर में जन्म लो ।
तब श्रीकृष्ण का आदेश पाकर सभी गोप-गोपियाँ भूतल पर श्रेष्ठ गोपों के शुभ-शुभ घरों में अवतरित हुए। उनको भूतल पर अवतरित होने की पुष्टि- उस समय भी होती है, जब समस्त यादव विश्वजीत युद्ध के लिए भू-तल पर चारों दिशाओं में निकल पड़े, तब उस समय दन्तवक्र नाम के एक दुष्ट राजा से यादवों का भयानक युद्ध हुआ। उसी समय श्री कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न ने गर्गसंहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय-(११ ) के श्लोक संख्या-(२१ और २२) में दन्तवक्र को यादवों का परिचय देते हुए कहते हैं-
"नन्दो द्रोणो वसुः साक्षाज्जातो गोपकुलेऽपि सः।
गोपाला ये च गोलोके कृष्णरोम समुद्भवाः।२१।
"राधारोमोद्भवा गोप्यस्ताश्च सर्वा इहागताः।
काश्चित्पुण्यैः कृतैः पूर्वैः प्राप्ताः कृष्णं वरैः परै:।२२।
अनुवाद-नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं जो गोकुल में अवतीर्ण हुए हैं। और गोलोक के गोपालगण (आभीर) जो साक्षात श्रीकृष्ण के रोम से प्रकट हुए हैं, और गोपियाँ जो श्रीराधा के रोमकूप से उत्पन्न हुई हैं। वे सब की सब यहाँ (भूतल के ) व्रज में उतर आईं हैं। उनमें से कुछ ऐसी भी गोपांगनाऐं हैं जो पूर्व-काल में पूण्यकर्मों तथा उत्तम वरों के प्रभाव से श्रीकृष्ण को प्राप्त हुईं हैं।२१-२२।
इसी तरह से समस्त गोलोकवासी गोप जो कभी श्रीकृष्ण के अंश से गोलोक में उत्पन्न हुए थे उन सभी को भू-तल पर गोपकुल के यादव वंश में भगवान श्रीकृष्ण के ही अंश रूप में अवतरित या जन्म लेने की पुष्टि- गर्गसंहिता के विश्वजित्खण्ड के अध्याय (२) के श्लोक- ७ से होती है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण यादवों के विश्वजीत युद्ध होने से पहले उग्रसेन से कहते हैं-
ममांशा यादवाः सर्वे लोकद्वयजिगीषवः।
जित्वारीनागमिष्यन्ति हरिष्यन्ति बलिं दिशाम्॥७॥
अनुवाद:- समस्त यादव मेरे ही अँश से प्रकट हुए हैं, और वे लोक,परलोक दोनों को जीतने की इच्छा रखने वाले हैं। वे दिग्विजय के लिये यात्रा करके, शत्रुओं को जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओं से आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे।७।
इसी तरह से गोप और गोपियों को गोलोक से भूतल पर आने की पुष्टि- गर्गसंहिता के गोलोकखण्ड के अध्याय- १५ के श्लोक-६३ से भी होती है। जिसमें लिखा गया है-
यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
तथा गोपीगणा गोपा गोलोके राधिकेच्छया॥ ६३॥
अनुवाद :-आप समस्त गोप तथा गोपियाँ इस भूतल पर गोलोक से आये हुए हो। यह सब राधा जी की ही इच्छा थी।६३।
ठीक इसी तरह की बात गर्गसंहिता के गिरिराजखण्ड के अध्याय- ५ के श्लोक संख्या- ३७ में भी लिखी गई कि-
यूयं सर्वेऽपि गोपाला गोलोकादागता भुवि ।
तथा गोपीगणा गावो गोकुले राधिकेच्छया॥ ३७॥
अनुवाद :-आप समस्त गोपगण इस भूतल पर गोलोक से आये हो। इसी तरह से गोपियाँ और गौएँ भी श्रीराधा की इच्छा से ही गोकुल में आयी हैं।३७।
अतः उपर्युक्त श्लोकों से स्पष्ट होता है कि गोलोक की समस्त गोप तथा गोपियाँ भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर उनके साथ ही गोलोक से भू-लोक पर अवतरित हुए हैं।
इस प्रकार से आप लोगों ने गोप यानी यादवों की उत्पत्ति के पौराणिक संदर्भों को जाना। अब आप लोग यादवों के ऐतिहासिक संदर्भों में यानी इनको इतिहास के पन्नों में जान पाएंगे कि इनका वर्णन कब और कैसे किया गया है। इनके ऐतिहासिक संदर्भों को अध्याय (7) के भाग (ख) के शीर्षक (ऐतिहासिक यादव राजा) में विस्तार पूर्वक बताया गया है, वहां से इनके ऐतिहासिक संदर्भों पाठक गण जानकारी ले सकते हैं।
इस प्रकार से यह अध्याय यादवों की उत्पत्ति के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले अध्याय (3) में यादवों की प्रमुख जाती अहीर की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी गई है।
[1/19, 6:46 PM] आत्मानन्द जी: अध्याय(3)-
यादवों की मुख्य जाती
जातियों की उत्पत्ति या कहें निर्धारण मनुष्य के एक ही तरह के रक्त सम्बन्धी आनुवांशिक प्रवृत्तियों से होता है। जिसमें प्रवृत्तियाँ व्यक्ति की जन्मजात (Genetic) होती हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके जाति समूहों में संचारित होती रहती है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के अनुरुप ही व्यक्ति का स्वभाव और गुण बनता है, जो उस जाति समूह को उसी अनुरूप कार्य करने को प्रेरित करता है। और इसी गुण विशेष के आधार पर मनुष्य जातियों में एक विशेष जाति का उत्पत्ति होती है। इसी जन्मजात प्रवृत्तियों के कारण समाज में अलग-अलग जातियों के भिन्न-भिन्न स्वभाव और गुण देखें जातें हैं।
इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जाति व्यक्ति समूहों की प्रवृत्ति मूलक पहचान है जो मनुष्य समूहों में अलग-अलग देखी जाती है। जैसे वणिक समाज का वर्ण "वैश्य" है जिनका वृत्ति (व्यवसाय) खरीद-फरोख्त करना है। और उसी अनुसार उनकी स्वभावगत गहराई- लोलुपता और मितव्यता है। यही उनकी जातिगत और वर्णगत पहचान है।
कोई भी जाति अपने समूह की सबसे बड़ी इकाई होती है। और यह ऐसे ही नहीं बनती है। इसके लिए जाति को छोटी-छोटी इकाईयों के विकास क्रमों से गुजरना होता है। जैसे -
किसी भी जाति की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति होता है, फिर कई व्यक्तियों के मिलने से एक परिवार बनता है, और कई परिवारों के मिलने से अनेक कुलों या गोत्रों का निर्माण होता है। पुनः कई कुलों के संयोग से उस जाति का एक वंश और वर्ण बनता है। अर्थात् वंश, वर्ण, कुल, गोत्र और परिवार के सामूहिक रूप को जाति कहा जाता है। इसी को जाति का विकास क्रम कहा जाता है।
दूसरी बात यह है की किसी भी जाति के विकास क्रम में मनुष्यों की प्रवृत्तियां ही मुख्य कारण होती है। क्योंकि मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर अन्ततोगत्वा वृत्तियों यानी व्यवसायों का वरण (चयन) करती है। उनके व्यवसायों के वरण करने से ही उस जाति का वर्ण निर्धारित होता है।
व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र) निर्धारित हुआ है।
अब यह सब कैसे सम्भव होता है। इसको अच्छी तरह समझने के लिए क्रमशः जाति, वर्ण, वंश, कुल और गोत्र को विस्तार से जानना होगा तभी पूरी बात समझ में आयेगी। इन सभी बातों को क्रमशः अगले अध्यायों में बताया गया है।
अब इसी क्रम में हमलोग जानेंगे कि की अहीर (आभीर) जाति की उत्पत्ति कैसे हुई और किस आधार पर यादवों की जाति "अहीर" हुई़ ? जिसे- आभीर को गोप, गोपाल, ग्वाल, घोष, वल्लभ, इत्यादि नामों से क्यों जाना जाता है ?
तो इस सम्बन्ध में बता दें कि- अहीर जाति की वृत्ति यानी व्यवसाय पूर्वकाल से ही कृषि और पशु पालन रहा है। यह वृत्ति उन्ही प्रवृत्ति वालों में हो सकती है जो निर्भीक और साहसी हों। चुँकि गोपालक अहीर अपने पशुओं को जंगलों, तपती धूप, आँधी तूफान, ठण्ढ़ और बारिश की तमाम प्राकृतिक झन्झावातों को निर्भीकता पूर्वक झेलते हुए पशुओं के बीच रहते हैं। इसी जन्मजात निर्भीक प्रवृत्ति के कारण ही इनको आभीर (अहीर) कहा गया, तथा वृत्ति (व्यवसाय) गोपालन की वजह से इन्हें - गोप, गोपाल, ग्वाल, घोष और वल्लभ कहा गया जो इनकी वृत्ति यानी व्यवसाय मूलक पहचान हैं। ये तो रही अहीर जाती की वृत्ति एवं प्रवृत्ति मूलक पहचान।
किन्तु जबतक गोप (अहीर) जाति के (Blood relation) रक्त सम्बन्धों को न जान लिया जाए, तबतक अहीर जाति की (Genetic) जानकारी अधुरी ही मानी जाएगी। इसलिए अहीर (गोप) जाति के रक्त सम्बन्धों को जानना आवश्यक है कि अहीर जाति के मूल में किसका प्रारम्भिक रक्त सम्बन्ध विद्यमान है।
तो इसके लिए बता दें कि अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त सम्बन्ध है। इसकी पुष्टि- उस समय होती है जब सावित्री द्वारा विष्णु को दिये गये शाप को गायत्री ने वरदान में बदलते हुए विष्णु से जो कहा उसका वर्णन- स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के अध्याय- १९३ के श्लोक -(१४ और १५) में मिलता है। जिसमें गायत्री विष्णु से कहतीं हैं कि -
तेनाकृत्येऽपि रक्तास्ते गोपा यास्यन्ति श्लाघ्यताम्॥
सर्वेषामेव लोकानां देवानां च विशेषतः ॥१४॥
यत्रयत्र च वत्स्यन्ति मद्वंशप्रभवा नराः॥
तत्रतत्र श्रियो वासो वनेऽपि प्रभविष्यति॥१५॥
अनुवाद -(१४-१५)
आभीर कन्या गायत्री विष्णु से कहती है- हे विष्णो ! तुम्हारे रक्त सम्बन्धी (blood relative) सभी गोप (अहीर) बिना कुछ किये ही तुम्हारे द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाऐंगे। और इनकी प्रशंसा विशेषतः देवताओं सहित सभी लोकों में होगी। तथा मेरे गोप वंश (कुल) के लोग जहाँ भी रहेंगे, वहाँ श्री (सौभाग्य और समृद्धि) विद्यमान रहेगी, चाहे वह स्थान जंगल ही क्यों न हो। १४-१५।
अब सवाल यह है कि गायत्री स्वयं अपने को गोप कुल का तथा गोपों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) किस आधार पर कहीं ? इसको भी जानना आवश्यक है।
चुँकि भूतल पर देवी गायत्री गोप कुल की सनातनी एवं आदि देवी हैं। इसलिए उन्हें स्वयं तथा अपने गोपों की मूल उत्पत्ति का ज्ञान था कि गोप और गोपियों की उत्पत्ति गोलोक में श्रीकृष्ण और श्रीराधा के रोम कूपों अर्थात उनके क्लोन से हुई है। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय-5 के श्लोक संख्या- (४०) और (४२) से है, जिसमें लिखा गया है कि -
तस्या राधायाश्च लोमकूपेभ्यः सद्योगोपाङ्गनागणः। आविर्बभूव रूपेण वेशेनैव च तत्समः।४०।
कृष्णस्य लोमकूपेभ्यः सद्यो गोपगणो मुने।
आविर्बभूव रूपेण वेषेणैव च तत्समः। ४२।
अनुवाद- ४०-४२
• उसी क्षण उस किशोरी अर्थात् श्री राधा के रोमकूपों से तत्काल ही अनेक गोपांगनाओं की उत्पत्ति हुई; जो रूप और वेष में राधा के ही समान थीं। ४०।
• फिर तो श्रीकृष्ण के रोम कूपों से भी अनेक गोप-गणों का आविर्भाव हुआ जो रूप और वेष रचना में श्रीकृष्ण के ही समान थे।४२।
अतः उपर्युक्त श्लोकों के आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि- अहीर जाति के मूल में गोपेश्वर श्रीकृष्ण का ही रक्त विद्यमान है। इसी लिए स्कन्द पुराण खण्ड- (६) के नागर खण्ड के श्लोक-(१४) में ज्ञान की देवी गायत्री ने भी गोपों अर्थात् आभीरों को श्रीकृष्ण का रक्त सम्बन्धी (blood relative) कहीं हैं।
अब हमलोग आभीर जाती की शब्द व्युत्पत्ति के आधार पर जानेंगे कि इसकी उत्पत्ति कैसे हुई है।
तो आभीर जाति को यदि शब्द ब्युत्पत्ति के हिसाब से देखा जाय तो- अभीर शब्द में 'अण्' तद्धित प्रत्यय करने पर आभीर समूह वाची रूप बनता है। अर्थात् आभीर शब्द अभीर शब्द का ही बहुवचन है। 'परन्तु परवर्ती संस्कृत कोश कारों नें आभीरों की गोपालन वृत्ति और उनकी वीरता प्रवृत्ति को दृष्टि-गत करते हुए अभीर और आभीर शब्दों की दो तरह से भिन्न-भिन्न व्युत्पत्तियाँ कर दीं। जैसे-
ईसा पूर्व पाँचवी सदी में कोशकार अमर सिंह ने अपने कोश अमरकोश में अहीरों की प्रवृत्ति वीरता (निडरता) को केन्द्रित करके आभीर शब्द की व्युत्पत्ति की है। नीचे देखें।
आ= समन्तात् + भी=भीयं (भयम्) + र= राति ददाति शत्रुणां हृत्सु = जो चारो तरफ से शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करता है वह आभीर कहलाता है।
किन्तु वहीं पर अमर सिंह के परवर्ती शब्द कोशकार- तारानाथ नें अपने ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में अभीर- जाति की शब्द व्युत्पत्ति को उनकी वृत्ति यानी व्यवसाय के आधार पर गोपालन को केन्द्रित करके की है। नींचे देखें।
"अभिमुखी कृत्य ईरयति गा- इति अभीर = जो सामने मुख करके चारो-ओर से गायें चराता है या उन्हें घेरता है।
अगर देखा जाय तो उपरोक्त दोनों शब्दकोश में जो अभीर शब्द की ब्युत्पत्ति को बताया गया है उनमें बहुत अन्तर नही है। क्योंकि एक नें अहीरों की वीरता मूलक प्रवृत्ति (aptitude ) को आधार मानकर शब्द ब्युत्पत्ति को दर्शाया है तो वहीं दूसरे नें अहीर जाति को गोपालन वृत्ति अथवा (व्यवसाय) (profation) को आधार मानकर शब्द ब्युत्पत्ति को दर्शाया है।
अहीर शब्द के लिए दूसरी जानकारी यह है कि- आभीर का तद्भव रूप अहीर होता है। अब यहाँ पर तद्भव और तत्सम शब्द को जानना आवश्यक हो जाता है। तो इस सम्बन्ध में सर्वविदित है कि - संस्कृत भाषा के वे शब्द जो हिन्दी में अपने वास्तविक रूप में प्रयुक्त होते है, उन्हें तत्सम शब्द कहते हैं। ऐसे शब्द, जो संस्कृत और प्राकृत से विकृत होकर हिन्दी में आये हैं, 'तद्भव' कहलाते हैं। यानी तद्भव शब्द का मतलब है, जो शब्द संस्कृत से आए हैं, लेकिन उनमें कुछ बदलाव के बाद हिन्दी में प्रयोग होने लगे हैं। जैसे आभीर संस्कृत का शब्द है, किन्तु कालान्तर में बदलाव हुआ और आभीर शब्द हिन्दी में अहीर शब्द के रूप में प्रयुक्त होने लगा। ऐसे ही तद्भव शब्द के और भी उदाहरण है जैसे- दूध, दही, अहीर, रतन, बरस, भगत, थन, घर इत्यादि।
किन्तु यहाँ पर हमें अहीर और आभीर, शब्द के बारे में ही विशेष जानकारी देना है कि इनका प्रयोग हिन्दी और संस्कृत ग्रन्थों में कब, कहाँ और कैसे एक ही अर्थ के लिए प्रयुक्त हुआ है।
तो इस सम्बन्ध में सबसे पहले अहीर शब्द के बारे में जानेंगे कि हिन्दी ग्रन्थों में इसका प्रयोग कब और कैसे हुआ। इसके बाद संस्कृत ग्रन्थों में जानेंगे कि आभीर शब्द का प्रयोग गोप, अहीर और यादवों के लिए कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ।
अहीर शब्द का प्रयोग हिन्दी पद्य साहित्यों में कवियों द्वारा बहुतायत रुप से किया गया है। जैसे-
अहीर शब्द का रसखान कवि अपनी रचनाओं में खूब प्रयोग किए हैं-
"ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।
धुरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।। खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी।
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण की श्रद्धा में सदैव लीन रहने वाले कवि इशरदास रोहडिया (चारण), जिनका जन्म विक्रम संवत- (1515) में राजस्थान के भादरेस गांँव में हुआ था। जिन्होंने 500 साल पहले दो ग्रन्थ "हरिरस" और "देवयान" लिखे। जिसमें ईशरदासजी द्वारा रचित "हरिरस" के एक दोहे में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि कृष्ण भगवान का जन्म अहीर (यादव) कुल में हुआ था।
नारायण नारायणा! तारण तरण अहीर।
हूँ चारण हरिगुण चवां, सागर भरियो क्षीर।। ५८
अर्थात् - अहीर जाति में अवतार लेने वाले हे नारायण (श्रीकृष्ण)! आप जगत के तारण तरण (सर्जक) हो, मैं चारण आप श्रीहरि के गुणों का वर्णन करता हूँ, जो कि सागर (समुन्दर) और दूध से भरा हुआ है। ५८
और श्रीकृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि सूरदास जी ने भी श्रीकृष्ण को अहीर कहते हुए सूरसागर के दशमस्कन्ध-(पृष्ठ ४७९) में लिखा है-
सखीरी काके मीत अहीर ।
काहेको भरिभरि ढारति हो इन नैन राहके नीर ।।
आपुन पियत पियावत दुहि दुहिं इन धेनुनके क्षीर। निशि वासर छिन नहिं विसरत है जो यमुनाके तीर।। ॥
मेरे हियरे दौं लागतिहै जारत तनुकी चीर । सूरदास प्रभु दुखित जानिकै छांडि गए वे परि ।।८२॥
ये उपर्युक्त सभी उदाहरण अहीर के हैं जो हिन्दी साहित्यिक ग्रन्थों प्रयुक्त हुआ हैं। अब हमलोग आभीर शब्द को जानेंगे जो अहीर का तद्भव रूप है, वह संस्कृत ग्रन्थों में कहाँ-कहाँ प्रयुक्त हुआ हैं। इसके साथ ही आभीर (अहीर) शब्द के पर्यायवाची शब्द - गोप, गोपाल और यादव को भी जानेंगे कि पौराणिक ग्रन्थों में अभीर के ही अर्थ में कैसे प्रयुक्त हुए हैं।
सबसे पहले हम गर्ग संहिता के विश्वजीत खण्ड के अध्याय ७ के श्लोक संख्या- १४ को लेते हैं जिसमें में भगवान श्रीकृष्ण और नन्दबाबा सहित पूरे अहीर समाज के लिए आभीर शब्द का प्रयोग शिशुपाल उस समय किया जब सन्धि का प्रस्ताव लेकर उद्धव जी शिशुपाल के यहाँ गए। किन्तु वह प्रस्ताव को ठुकराते हुए उद्धव जी से श्रीकृष्ण के बारे में कहा कि-
आभीरस्यापि नन्दस्य पूर्वं पुत्रः प्रकीर्तितः।
वसुदेवो मन्यते तं मत्पुत्तोऽयं गतत्रपः।। १४
प्रद्युम्नं तस्तुतं जित्वा सबलं यादवैः सह।
कुशस्थलीं गमिश्यामि महीं कर्तुमयादवीम्।। १६
अनुवाद -
• वह (श्रीकृष्ण) पहले नन्द नामक अहीर का भी बेटा कहा जाता था। उसी को वासुदेव लाज- हया छोड़कर अपना पुत्र मानने लगे हैं। १४
• मैं उसके पुत्र प्रद्युम्न को यादवों तथा सेना सहित जीतकर भूमण्डल को यादवों से शून्य कर देने के लिए कुशस्थली पर चढ़ाई करूँगा। १६
उपर्युक्त दोनो श्लोक को यदि देखा जाए तो भगवान श्रीकृष्ण सहित सम्पूर्ण अहीर और यादव समाज के लिए ही आभीर शब्द का प्रयोग किया गया है किसी अन्य के लिए नहीं।
इसी तरह से आभीर शूरमाओं का वर्णन महाभारत के द्रोणपर्व के अध्याय- २० के श्लोक - ६ और ७ में मिलता है जो शूरसेन देश से सम्बन्धित थे।
भूतशर्मा क्षेमशर्मा करकाक्षश्च वीर्यवान्।
कलिङ्गाः सिंहलाः प्राच्याः शूराभीरा दशेरकाः।। ६
यवनकाम्भोजास्तथा हंसपथाश्च ये।
शूरसेनाश्च दरन्दा मद्रकेकयाः।। ७
अर्थ:- भूतशर्मा , क्षेमशर्मा पराक्रमी कारकाश , कलिंग सिंहल पराच्य (शूर के वंशज आभीर) और दशेरक। ६
अनुवाद - शक यवन ,काम्बोज, हंस -पथ नाम वाले देशों के निवासी शूरसेन प्रदेश के अभीर (अहीर) दरद, मद्र, केकय ,तथा एवं हाथी सवार घुड़सवार रथी और पैदल सैनिकों के समूह उत्तम कवच धारण करने उस व्यूह के गरुड़ ग्रीवा भाग में खड़े थे।६-७।
इसी तरह से विष्णुपुराण द्वित्तीयाँश तृतीय अध्याय का श्लोक संख्या १६,१७ और १८ में अन्य जातियों के साथ-साथ शूर आभीरों का भी वर्णन मिलता है-
"तथापरान्ताः ग्रीवायांसौराष्ट्राः शूराभीरास्तथार्ब्बुदाः। कारूषा माल्यवांश्चैव पारिपात्रनिवासिनः । १६
सौवीरा-सैन्धवा हूणाः शाल्वाः शाकलवासिनः।मद्रारामास्तथाम्बष्ठाः पारसीकादयस्तथा । १७
आसां पिबन्ति सलिलं वसन्ति सरितां सदा ।
समीपतो महाभागा हृष्टपुष्टजनाकुलाः ।। १८
अनुवाद - पुण्ड्र, कलिंग, मगध, और दाक्षिणात्य लोग, अपरान्त देशवासी, सौराष्ट्रगण, शूर आभीर और अर्बुदगण, कारूष,मालव और पारियात्रनिवासी, सौवीर, सैन्धव, हूण, साल्व, और कोशल देश वासी तथा माद्र,आराम, अम्बष्ठ, और पारसी गण रहते हैं। १७-१७
हे महाभाग ! वे लोग सदा आपस में मिलकर रहते हैं और इन्हीं का जलपान करते हैं। उनकी सन्निधि के कारण वे बड़े हृष्ट-पुष्ट रहते हैं। १८
▪️ इसी तरह से महाभारत के उद्योग पर्व के सेनोद्योग नामक उपपर्व के सप्तम अध्याय में श्लोक संख्या- (१८) और (१९) पर गोपों (अहिरों) को अजेय योद्धा के रूप में वर्णन है-
"मत्सहननं तुल्यानां ,गोपानाम् अर्बुदं महत् । नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:।१८।
अनुवाद - मेरे पास दस करोड़ गोपों (आभीरों) की विशाल सेना है, जो सबके सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीर वाले हैं। उन सबकी 'नारायण' संज्ञा है। वे सभी युद्ध में डटकर मुकाबला करने वाले हैं। ।।१८।।
इसी तरह से जब भगवान श्रीकृष्ण इन्द्र की पूजा बन्द करवा दी, तब इसकी सूचना जब इन्द्र को मिली तो वह क्रोध से तिलमिला उठा और भगवान श्रीकृष्ण सहित समस्त अहीर समाज को जो कुछ कहा उसका वर्णन श्रीमद् भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय -२५ के श्लोक - ३ से ५ में मिलता है। जिसमें इन्द्र अपने दूतों से कहा कि-
अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम्
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम्।। ३
वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्।
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ।। ५
अनुवाद- ओह, इन जंगली ग्वालों (गोपों ) का इतना घमण्ड! सचमुच यह धन का ही नशा है। भला देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्ण के बल पर उन्होंने मुझ देवराज का अपमान कर डाला। ३
• कृष्ण बकवादी, नादान, अभिमानी और मूर्ख होने पर भी अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है। वह स्वयं मृत्यु का ग्रास है। फिर भी उसी का सहारा लेकर इन अहीरों ने मेरी अवहेलना की है। ५
उपर्युक्त दोनो श्लोकों में यदि देखा जाए- तो इनमें गोप शब्द आया है जो अहीर, और यादव शब्द का पर्यायवाची शब्द है।
इसी तरह से संस्कृत श्लोकों में अहीरों के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग श्रीमद्भागवत पुराण स्कन्ध १० अध्याय- ६१ के श्लोक ३५ में मिलता है। जिसमें जूवा खेलते समय रुक्मी बलराम जी को कहता है कि -
नैवाक्षकोविदा यूयं गोपाला वनगोचरा:।
अक्षैर्दीव्यन्ति राजनो बाणैश्च नभवादृशा।। ३५
अनुवाद - बलराम जी आखिर आप लोग वन- वन भटकने वाले वाले गोपाल (ग्वाले) ही तो ठहरे! आप पासा खेलना क्या जाने ? पासों और बाणों से तो केवल राजा लोग ही खेला करते हैं।
इस श्लोक को यदि देखा जाए तो इसमें बलराम जी के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग किया गया है जो एक साथ- गोप, ग्वाल, अहीर और यादव समाज के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इसलिए गर्ग संगीता के अनुवाद कर्ता, अनुवाद करते हुए गोपाल शब्द को ग्वाल के रूप में रखा।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण को एक ही प्रसंग में एक ही स्थान पर यदुवंश शिरोमणि और गोप (ग्वाला) दोनों शब्दों से सम्बोधित युधिष्ठिर के राजशूय यज्ञ के दरम्यान उस समय किया गया। जब यज्ञ हेतु सर्वसम्मति श्रीकृष्ण को अग्र पूजा के लिए चुना गया। किन्तु वहीं पर उपस्थित शिशुपाल इसका विरोध करते हुए भगवान श्रीकृष्ण को
यदुवंश शिरोमणि न कहकर उनके लिए ग्वाला (गोप) शब्द से सम्बोधित करते हुए उनका तिरस्कार किया। जिसका वर्णन- श्रीमद् भागवत पुराण के दशम स्कन्ध के अध्याय 74 के श्लोक संख्या - १८, १९, २० और ३४ में कुछ इस प्रकार है -
सदस्याग्र्यार्हणार्हं वै विमृशनतः सभासदः।
नाध्यगच्छन्ननैकान्त्यात् सहदेवस्तदाब्रवीत् ।। १८
अर्हति ह्यच्युतः श्रैष्ठ्यं भगवान् सात्वतां पतिः।
एष वै देवताः सर्वा देशकालधनादयः।। १९
यदात्मकमिदं विश्वं क्रतवश्च यदात्मकाः।
अग्निनराहुतयो मन्त्राः सांख्यं योगश्च यत्परः।। २०
अनुवाद - अब सभासद लोग इस विषय पर विचार करने लगे कि सदस्यों में सबसे पहले किसकी पूजा (अग्रपूजा) होनी चाहिए। जितनी मति, उतने मत। इसलिए सर्वसम्मति से कोई निर्णय न हो सका। ऐसी स्थिति में सहदेव ने कहा। १८
• यदुवंश शिरोमणि भक्त वत्सल भगवान श्रीकृष्ण ही सदस्यों में सर्वश्रेष्ठ और अग्रपूजा के पात्र हैं, क्योंकि यही समस्त देवताओं के रूप में है, और देश, काल, धन आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सब के रूप में भी ये ही हैं। १९
• यह सारा विश्व श्रीकृष्ण का ही रूप है। समस्त यज्ञ भी श्री कृष्ण स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्णा ही अग्नि, आहुति और मन्त्रों के रूप में है। ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग ये दोनों भी श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए ही हैं।
भगवान श्रीकृष्ण की इतनी प्रशंसा सुनकर शिशुपाल क्रोध से तिलमिला उठा और कहा -
सदस्पतिनतिक्रम्य गोपालः कुलपांसनः।
यथा काकः पुरोडाशं सपर्यां कथमर्हति।। ३४
अनुवाद - यज्ञ की भूल-चूक को बताने वाले उन सदस्यपत्तियों को छोड़कर यह कुलकलंक ग्वाला (गोपालक) भला, अग्रपूजा का अधिकारी कैसे हो सकता है ? क्या कौवा कभी यज्ञ के पुरोडाश का अधिकारी हो सकता है ? ३४
उपर्युक्त श्लोकों के अनुसार यदि शिशुपाल के कथनों पर विचार किया जाए तो वह श्रीकृष्ण के लिए गोपाल शब्द का प्रयोग किया। यहाँ तक तो शिशुपाल का कथन बिल्कुल सही है, क्योंकि - भगवान श्रीकृष्ण- गोप, गोपाल और ग्वाला ही हैं। इस सम्बन्ध में भगवान श्रीकृष्ण हरिवंश पुराण के विष्णु पर्व के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या -५८ में स्वयं अपने को गोप और गोपकुल में जन्म लेने की भी बात कहे हैं जो इस प्रकार है-
एतदर्थं च वासोऽयंव्रजेऽस्मिन् गोपजन्म च।
अमीषामुत्पथस्थानां निग्रहार्थं दुरात्मनाम्।।५८
अनुवाद - इसीलिए ब्रज में मेरा यह निवास हुआ है और इसीलिए मैंने गोपों में अवतार ग्रहण किया है।
अतः शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण को गोपाल या गोप कहा कोई गलत नहीं कहा। किन्तु वह भगवान श्रीकृष्ण को कौवा और कुलकलंक कहा, यहीं उसने गलत कहा जिसके परिणाम स्वरुप भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया।
इसी तरह से पौण्ड्रक ने अपने सभासदों से श्रीकृष्ण के लिए गोपबालक और यदुश्रेष्ठ (यादव श्रेष्ठ) नाम से सम्बोधित किया है। जिसका वर्णन हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- ९१ के श्लोक- १४ में कुछ इस तरह से वर्णन किया गया है।
वासुदेवेति मां ब्रूत न तु गोपं यदुत्तमम्।
एकोऽहं वासुदेवो हि हत्वा तं गोपदारकम्।। १४
अनुवाद - पौंड्रक अपने सभासदों से कहता है कि- मुझे ही वासुदेव कहो उस यदुश्रेष्ठ गोप को नहीं। उस गोपबालक को
मारकर एकमात्र मैं ही वासुदेव रहूँगा।
इसी तरह से हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व के अध्याय- १०० के श्लोक - २६ और ४१ में भगवान श्रीकृष्ण को गोप और यादव दोनों होने की पुष्टि होती है। जो पौण्ड्रक, श्रीकृष्ण युद्ध का प्रसंग है। उस युद्ध के बीच पौण्ड्रक भगवान श्रीकृष्ण से कहता है कि-
स ततः पौण्ड्रको राजा वासुदेवमुवाच ह।
भो भो यादव गोपाल इदानिं क्व गतो भवात।। २६
गोपोऽहं सर्वदा राजन् प्राणिनां प्राणदः सदा।
गोप्ता सर्वेषु लोकेषु शास्ता दुष्टस्य सर्वदा।। ४१
अनुवाद- राजा पौंड्रक ने भगवान से कहा- ओ यादव ! ओ गोपाल ! इस समय तुम कहाँ चले गए थे? २६
• तब भगवान श्रीकृष्ण ने पौंड्रक से कहा- राजन ! मैं सर्वदा गोप हूँ, अर्थात प्राणियों का प्राण दान करने वाला हूँ , सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों का शासक हूँ।
देखा जाए तो उपर्युक्त तीनों श्लोकों से तीन बातें और सिद्ध होती है।
• पहला यह कि- राजा पौंड्रक, भगवान श्रीकृष्ण को यादव, यादवश्रेष्ठ, गोपबालक और गोप शब्दों से सम्बोधित करता है। इससे सिद्ध होता है कि यादव और गोप (अहीर) एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं।
• दूसरा यह कि- भगवान श्रीकृष्ण स्वयं घोषणा करते हैं कि - "मैं सर्वदा गोप हूँ"।
• तीसरा यह कि- गोप ही एक ऐसी जाती है जो सम्पूर्ण लोकों का रक्षक तथा सर्वदा दुष्टों पर शासन करने वाली है।
ज्ञात हो - अहीर, गोप, गोपाल, ग्वाल ये सभी यादव शब्द का ही पर्यायवाची शब्द हैं, चाहे इन्हें अहीर कहें, गोप कहें, गोपाल कहें, ग्वाला कहें, यादव कहें ,सब एक ही बात है। जैसे-
भगवान श्रीकृष्ण को तो सभी जानते हैं कि यदुवंश में उत्पन्न होने से उन्हें यादव कहा गया जो उनकी वंश मूलक पहचान है। तथा उनको गोप कुल में जन्म लेने से उन्हें गोप कहा गया जो उनके कुल रूपी पहचान है। इसी क्रम में उन्हें गोपालन करने से उन्हें गोपाल और ग्वाला कहा गया जो उनकी वृत्ति यानी व्यवसाय मूलक पहचान है। इसी तरह से उनकी जाति मूलक पहचान के लिए उन्हें आभीर या अहीर कहा गया। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण को चाहे अहीर कहें, गोप- कहें, गोपाल कहें, ग्वाला कहें, या यादव कहें ,सब एक ही बात है।
इस प्रकार से आप लोगों ने जाती उत्पत्ति को व्यक्तियों के वृत्ति और प्रबृत्ति मूलक आधार पर यादवों की मुख्य जाती - अहीर, घोष, गोप, गोपाल, इत्यादि को जाना। अब इसके अगले अध्याय(4) में यादवों के वर्ण के बारे में जानकारी दी गई है कि यादवों का वास्तविक वर्ण क्या है।
[1/19, 6:47 PM] आत्मानन्द जी: अध्याय(4)-
यादवों का वर्ण
अधिकांश लोग वर्ण और जाति में अन्तर नहीं जानते हैं। इसलिए अपने वर्ण को ही जाति कहते हैं और जाति को ही वर्ण कहते हैं। इसके दो कारण हो सकते हैं-
पहला यह कि या तो उन्हें जाति और वर्ण में अन्तर का ज्ञान नहीं है या दूसरा यह कि पौराणिक ग्रन्थों में अधिकांश लोगों की जातियों का वर्णन नहीं मिलता है, ऐसी स्थिति में वे लोग अपने वर्ण को जाति कहनें लगते हैं। जैसे किसी ब्राह्मण से पूछा जाए कि आपकी जाति क्या है? तो वह अपनी जाति के स्थान पर अपने "वर्ण" ब्राह्मण को ही जाति बताएगा। इसी तरह से ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के किसी क्षत्रिय वर्ण से यदि पूछा जाए कि आपकी जाति क्या है? तो वह अपनी जाति के स्थान पर अपने वर्ण को ही बताते हुए कहेगा कि मेरी जाति क्षत्रिय है। जबकि उसे पता होना चाहिए कि क्षत्रिय जाति नहीं बल्कि एक वर्ण है।
जैसा की हमने इसके पहले अध्याय (3) में जाति वाले प्रकरण में स्पष्ट कर चुका हूँ कि- " किसी भी जाति के विकास क्रम में मनुष्यों की प्रवृत्तियां ही मुख्य कारण होती है। क्योंकि मनुष्यों की जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही विकसित होकर अन्ततोगत्वा वृत्तियों यानी व्यवसायों का वरण करती है। उनके व्यवसायों के वरण करने से ही उस जाति का वर्ण निर्धारित होता है, और उनके व्यवसायों के वरण के आधार पर ही जातियों का चार वर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र निर्धारित हुआ है"।
किन्तु पौराणिक ग्रंथों में ब्रह्मा जी ने मनुष्यों के कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था के विपरीत केवल अपने यज्ञ सम्पादन हेतु इन चार वर्णों को जन्म के आधार पर बना दिया। जिसमें ब्रह्मा जी ने अपने मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, उदर से वैष्य, और पैरों से शूद्र को उत्पन्न करके मानव स्वभाव के विपरीत एक नई वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया, जिसके परिणाम स्वरूप सामाजिक भेदभाव का उदय हुआ।
ब्रह्मा जी द्वारा इस तरह के चार वर्णों को बनाए जाने की पुष्टि- विष्णुपुराण- प्रथमांशः/अध्यायः (६) के श्लोक- ७ से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद्ब्रह्या चकार वै ।
चातुर्वर्ण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् ॥७॥
अनुवाद:-तदनन्तर, यज्ञ के साधन-भूत चातुर्वर्ण्य को ब्रह्मा ने यज्ञ-निष्पत्ति (उत्पादन) के लिए बनाया।७।
इसके अतिरिक्त और भी प्रमाण है जिसमें बताया गया है कि जन्म आधारित चातुर्वर्ण्य की रचना ब्रह्मा जी द्वारा ही की गई है। जैसे- विष्णु पुराण के प्रथमांश के छठे अध्याय के श्लोक- (६) में लिखा गया है कि -
ब्रह्मणाः क्षत्रिया वेश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम।
पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः।।६।।
अनुवाद:-
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को ब्रह्मा जी ने
उत्पन्न किया। इनमें ब्राह्मण उनके मुख से, क्षत्रिय वक्षःस्थल से, वैश्य जाँघों से और शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए।।६।
इसी तरह से पद्मपुराण सृष्टिखण्ड के अध्याय-(३) के श्लोक संख्या-(१३०) में भी लिखा गया है कि-
"ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम। पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः।१३०।
अनुवाद- पुलस्त्यजी बोले- कुरुश्रेष्ठ ! सृष्टि की इच्छा रखने वाले ब्रह्माजी ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों को उत्पन्न किया। इनमें ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय वक्षःस्थल से, वैश्य जाँघों से और शूद्र ब्रह्माजी के पैरों से उत्पन्न हुए।१३०।
फिर तो ब्रह्मा जी की जन्म आधारित ब्राह्मी वर्ण- व्यवस्था भी चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,और शूद्र) में विभाजित हो गई, जिसके परिणाम स्वरूप समाजिक वर्ग विभेद का उदय हुआ। इस बात की पुष्टि- अत्रि संहिता के (१४० वाँ) श्लोक से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
"जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते॥१४०
अनुवाद:- ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हाेने वाला जन्म से ही 'ब्राह्मण' कहलाता है। फिर उपनयन संस्कार हाे जाने पर वह 'द्विज' कहलाता है और विद्या प्राप्त कर लेने पर वही ब्राह्मण 'विप्र' कहलाता है। इन तीनाें नामाें से युक्त हुआ ब्राह्मण 'श्राेत्रिय' कहा जाता है।१४०।
विशेष:- (श्रुति (वेद) के ज्ञाता ब्राह्मण ही श्रोत्रिय कहलाता है।)
अतः उपर्युक्त सभी पौराणिक साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि सर्वप्रथम ब्रह्मा जी ने ही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था के विपरीत जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया।
किन्तु ध्यान रहे ये ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था केवल ब्रह्मा जी से उत्पन्न उनकी संतानों पर ही लागू और प्रभावी हो सकती है यादवों पर नहीं।
अब सवाल यह है कि ऐसी क्या बात है कि ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था गोपों यानी यादवों पर लागू नहीं होती? या कहें यादव ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के भाग क्यों नहीं हैं?
तो इसका जवाब यह है कि- गोपों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी से न होकर श्रीकृष्ण से हुई है, इसलिए गोप यानी आभीर जिन्हें यादव भी कहा जाता है ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना और उनकी वर्ण व्यवस्था से परे हैं। चुंकि गोप श्रीकृष्ण यानी स्वराट विष्णु से उत्पन्न हैं इसलिए उत्पत्ति विशेष के कारण इनका वर्ण श्रीकृष्ण यानी स्वराट विष्णु के नामानुसार इनका वर्ण वैष्णव ही है, जो ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था से बिल्कुल अलग और स्वतंत्र है। जिसे पञ्चम वर्ण के नाम से भी जाना जाता है। इस पांचवें वर्ण यानी वैष्णव वर्ण के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय- ७३ के श्लोक- ९२ में स्वयं कहे हैं कि-
पशुजन्तुषु गौश्चहं चन्दनं काननेषु च ।
तीर्थपूतश्च पूतेषु निःशङ्केषु च वैष्णवः।।९२।
अनुवाद- मैं पशुओं में गाय हूँ, और वनों में चन्दन हूँ। पवित्र स्थानों में तीर्थ हूँ, और निशंकों (अभीरों अथवा निर्भीकों ) में वैष्णव हूँ। ९२
"नि:शङ्क शब्द की व्याकरणिक व्युत्पत्ति विश्लेषण-
नि:शङ्क- निस् निषेध वाची उपसर्ग+ शङ्क = भय (त्रास) भीक:अथवा डर।
नि:शङ्क पुलिङ्ग शब्द है जिसका अर्थ होता है- निर्भीक अथवा निडर।)
नि:शङ्क का मूल अर्थ निर्भीक है और निर्भीक का अर्थ होता जो कभी भयभीत नहीं होता हो।
अत: नि:शङ्क अथवा निर्भीक विशेषण पद आभीर शब्द का ही पर्याय है, जो अहीरो (गोपों) की जातिगत प्रवृत्ति है। आभीर लोग वैष्णव वर्ण तथा धर्म के अनुयायी होते ही हैं।
अत: ब्रह्मवैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्मखण्ड का उपर्युक्त श्लोक गोप जाति की निर्भीकता प्रवृत्ति का भी संकेत करता है।
अतः उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध होता है कि- "वैष्णव वर्ण" की उत्पत्ति श्रीकृष्ण (स्वराट विष्णु) से हुई है। जिसमें केवल गोप (अहीर) आते हैं। जिसकी पुष्टि- ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मखण्ड के एकादश (११) अध्याय के श्लोक संख्या (४3) से होती है। जिसमें लिखा गया है कि -
"ब्रह्मक्षत्त्रियविट्शूद्राश्चतस्रो जातयो यथा।
स्वतन्त्रा जातिरेका च विश्वस्मिन्वैष्णवाभिधा।।४३।
"अनुवाद:- ब्राह्मण" क्षत्रिय" वैश्य" और शूद्र इन चार वर्णों के अतिरिक्त एक स्वतन्त्र जाति अथवा वर्ण इस संसार में प्रसिद्ध है। जिसे वैष्णव नाम दिया गया है। जो स्वराट
विष्णु (श्रीकृष्ण) से सम्बन्धित अथवा उनके रोमकूपों से उत्पन्न होने से वैष्णव संज्ञा से नामित है।४३।
*(विषेश- गोपों की उत्पत्ति श्रीकृष्ण से हुई है इसको इसी पुस्तक के अध्याय-(2) में तथा मेरी दूसरी पुस्तक- "श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" में विस्तार पूर्वक बताया गया है)
चुंकि "वैष्णव वर्ण" की उत्पत्ति स्वराट विष्णु से हुई है इसलिए वैष्णव वर्ण सभी वर्णों में श्रेष्ठ है। इस बात की पुष्टि - पद्म पुराण के उत्तराखण्ड के अध्याय(६८) श्लोक संख्या १-२-३ से होती है जिसमें भगवान शिव नारद से कहते हैं।
महेश्वर उवाच-
शृणु नारद! वक्ष्यामि वैष्णवानां च लक्षणम् यच्छ्रुत्वा मुच्यते लोको ब्रह्महत्यादिपातकात् ।१।
तेषां वै लक्षणं यादृक्स्वरूपं यादृशं भवेत् ।तादृशंमुनिशार्दूलशृणु त्वं वच्मिसाम्प्रतम्।२।
विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते। सर्वेषां चैव वर्णानां वैष्णवःश्रेष्ठ उच्यते ।३।
अनुवाद- (१,२,३) महेश्वर उवाच ! हे नारद , सुनो, मैं तुम्हें वैष्णव का लक्षण बतलाता हूँ। जिन्हें सुनने से लोग ब्रह्म- हत्या जैसे पाप से मुक्त हो जाते हैं।१।
वैष्णवों के जैसे लक्षण और स्वरूप होते हैं। उसे मैं बतला रहा हूँ। हे मुनि श्रेष्ठ ! उसे तुम सुनो ।२।
चूँकि वह स्वराट विष्णु (श्रीकृष्ण) से उत्पन्न होने से ही वैष्णव कहलाते है; और सभी वर्णों मे वैष्णव वर्ण श्रेष्ठ कहा जाता हैं।३।
यदि वैष्णव शब्द की व्युत्पत्ति को व्याकरणिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो "शब्द कल्पद्रुम" में विष्णु से ही वैष्णव शब्द की ब्युत्पत्ति बताई गई है-
विष्णुर्देवताऽस्य तस्येदं वा अण्- वैष्णव - तथा विष्णु-उपासके विष्णोर्जातो इति वैष्णव विष्णुसम्बन्धिनि च स्त्रियां ङीप् वैष्णवी- दुर्गा गायत्री आदि।
अर्थात् विष्णु देवता से सम्बन्धित वैष्णव स्त्रीलिंग में (ङीप्) प्रत्यय होने पर वैष्णवी शब्द बना है जो- दुर्गा, गायत्री आदि का वाचक है।
अतः उपरोक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि- विष्णु से वैष्णव शब्द और वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति होती है, जिसे पञ्चमवर्ण के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें केवल- गोप, (अहीर, यादव) जाति ही आती हैं बाकी कोई नहीं।
तब ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि- जब यादव ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के भाग नहीं हैं तो ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में क्या है?
तो इसका उत्तर है- यादव- वैष्णव वर्ण के अन्तर्गत-महाब्राह्मण, महाक्षत्रिय, महावैश्य, और महाशूद्र है। क्योंकि
वैष्णव वर्ण के लोग बिना किसी संकोच और प्रतिबंध के वे सभी कार्य कर सकते हैं जो ब्राह्मी जी के चातुर्वर्ण्य के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र करते हैं। जब ये ब्राह्मणत्व (धार्मिक) कर्म करते हैं तो ये महाब्राह्मण, धर्मवत्सल,धर्मज्ञ, महाज्ञानी, महाविद्वान और महाउपदेशक कहलाते है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गोपेश्वर श्रीकृष्ण हैं जिनका उपदेश रुपी गीता ज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अद्भुत एवं अद्वितीय है। इसी तरह से गोपी शतचंद्रानना, गोपी स्वाहा, गोपी स्वधा, अहीर कन्या देवी गायत्री और समस्त गोप-गोपियाँ धर्मज्ञ और धर्मवत्सल के विशेष उदाहरण हैं। इन सभी के बारे में इसी किताब में अध्यायों के बाद "परिशिष्ट कथाओं" में क्रमशः (2,3, और 4) में वर्णन किया गया है। इनके धर्मवत्सल कर्मों से ही पुराणों में खूब प्रसंशा हुई है जैसे -
देवी गायत्री सहित समस्त गोपों को धर्म वत्सल एवं धर्मज्ञ होने की पुष्टि-पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड के अध्याय- (१७ के श्लोक- १५-१६ और १७) से होती है जिसमें भगवान विष्णु गोपों की कन्या, गायत्री को ब्रह्माजी को कन्यादान के उपरान्त गोपों से कहते हैं कि-
भोभोगोपसदाचारनत्वंशोचितुमर्हसि।
कन्यााषतेमहाभागाप्राप्तादेवंविरिञ्चिनम्।।१५।
योगिनियोंगयुक्तायेब्राह्मणाबेदपारगा:।
नलभन्तेप्रार्थयन्तस्ताङ्गतिन्दुहितागता।१६।
धर्मवन्तं सदाचारं भवन्तं धर्मवत्सलम्।
मया ज्ञात्वा तत:कन्यादत्ताचैषा विरंचयते।।१७।
अनुवाद - १५ से १७
• हे गोपगण (अहीरगण) ! तुम यहाँ वृथा प्रलाप मत करो। यह पुण्यवती, सौभाग्यवती तथा कुल एवं बन्धुगण के लिए आनन्दप्रदा है। इस बाला को हम यहाँ लाए हैं। इसे ब्रह्मा ने अपनी पत्नी बनाया है। इन्होंने भी ब्रह्मा का अवलम्बन किया है। यदि यह पुण्यवती नहीं होती, तब इस सभा में आती क्यों ? हे महाभाग! तुम यह सब जानकर अब शोक मत करो। तुम्हारी यह भाग्यशाली कन्या ने ब्रह्मा को प्राप्त किया है। १५।
• ज्ञान योगी, कर्मयोगी तथा वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रार्थना भी करके यह स्थान नहीं पाते, तथापि तुम्हारी यह कन्या उस गति को पा गई है।१६।
• तुम लोगों को मैंने धार्मिक, सदाचारी एवं धर्मवत्सल जानकर ही तुम्हारी कन्या ब्रह्मा को प्रदान किया है।१७।
*विशेष- (देवी गायत्री को अहीर कन्या होने के बारे में इसी किताब के परिशिष्ट कथा वाले भाग में बताया गया है)
गोपों के इसी गुण विशेष के कारण भगवान श्रीकृष्ण के सामने श्रीराधा जी ने गोपों को सबसे बड़ा धर्मवत्सल कहा इस बात की पुष्टि - गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड के अध्याय-१८ के श्लोक संख्या -२२ से होती है। जिसमें राधा जी श्रीकृष्ण से कहती हैं कि-
"गा: पालयन्ति सततं रजसो गवां च गङ्गां स्पृशन्ति च जपन्ति गवां सुनाम्नाम।
प्रेक्षन्त्यहर्निशमलं सुमुखं गवां च जाति: परा न विदिता भुवि गोपजाते:।।२२।
अनुवाद - गोप सदा गौओं का पालन करते हैं। गोरज की गङ्गा में नहाते हैं, उनका स्पर्श करते हैं तथा गौओं के उत्तम नाम का जाप करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें दिन- रात गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन होता है। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़ कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है।
गोपों और यादवों के धर्मज्ञ और धर्मवत्सल होने के कारण ही इनको जगत का मुक्ति दाता कहा गया है। इसकी पुष्टि-
गर्गसंगीता के अश्वमेधखंड खंड के अध्याय ६० के श्लोक संख्या ४० से होती है जिसमें लिखा गया है कि-
य: श्रृणोति चरित्रं वै गोलोकारोहणं हरे:।
मुक्तिं यदुनां गोपानां सर्वपापै: प्रमुच्यते।। ४०
अनुवाद -जो लोग श्री हरि के गोलोक धाम पधारने का चरित्र सुनते हैं तथा गोप, यादव की मुक्ति का वृतांत पढ़ते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं।
इसी तरह का वर्णन श्रीविष्णुपुराण के चतुर्थ अंश के अध्याय-११ के श्लोक संख्या-४ में भी लिखा गया है, जिसमें गोपकुल के यादव वंश को पाप मुक्ति का सहायक बताया गया है-
यदोर्वंशं नर: श्रुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यतते।
यत्रावतीर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति।। ४
अनुवाद - जिसमें श्री कृष्णा नमक निराकार परब्रह्म ने अवतार लिया था, उस यदुवंश का श्रवण करने से मनुष्य संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
अतः उपर्युक्त सभी पौराणिक संदर्भों से से सिद्ध होता है कि वैष्णव वर्ण के गोपों से बडा़ कोई धर्मज्ञ और धर्मवत्सल इस भूतल पर नहीं है। तभी तो चातुर्वर्ण्य के नियामक ब्रह्मा जी स्वयं गोपों में गोप बनकर जन्म लेने की कामना करते हुए गर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड, अध्याय-९ के श्लोक संख्या-४३ में कहते हैं कि-
घोषेषु वासिनामेषां भूत्वाऽहं त्वत्पदाम्बुजम्।
यदा भजेयं सुगतिस्तदा भूयान्न चान्यथा ॥४३॥"
अनुवाद- मैं गोप कुल में जन्म लेकर पादपद्मों की आराधना करता करता हुआ सुगति प्राप्त कर सकूं
निष्कर्ष- अब यहाँ दो बातें निकल कर बाहर आतीं हैं-
(1) पहली बात यह है कि जब चातुर्वर्ण्य के नियामक ब्रह्मा जी स्वयं वैष्णव वर्ण के गोपों में गोप बनकर जन्म लेने की कामना करते हों, तो इससे यहीं निष्कर्ष निकलता है कि भूतल पर गोपों से बड़ा धर्मज्ञ, सुब्रतज्ञ, सदाचारी और धर्मवत्सल इस सृष्टि जगत में कोई नहीं है।
(2) दूसरी बात यह की जो ब्रह्मा जी स्वयं सृष्टि का सृजन कर्ता होकर अपने चार वर्णों के लोगों को उत्पन्न किया हो वह स्वयं अपने ही सृजन में जन्म लेने की कामना (प्रार्थना) करें यह सम्भव हो ही नहीं सकता। इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मा जी अपनी सृष्टि रचना से अलग स्वराट विष्णु से उत्पन्न वैष्णव वर्ण के गोपों के यहाँ ही जन्म लेने कामना करते है। अतः उपर्युक्त सभी साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि ब्रह्मा जी न तो वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति हुई है और न ही गोपों को ब्रह्मा जी ने उत्पन्न किया है। इस लिए गोप और उनका वैष्णव वर्ण ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य से बिल्कुल अलग और स्वतंत्र है। जिसमें सभी गोप बिना भेदभाव के निःसंकोच एवं स्वतंत्रता पूर्वक कार्य करते हुए महाब्राह्मण, महाक्षत्रिय, महावैश्य, और महाशूद्र है। इनको ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य में से किसी एक वर्ण में स्थापित करना महामूर्खता है।
अब सवाल यह है कि वैष्णव वर्ण के गोपों को क्षत्रिय न कह कर महाक्षत्रिय क्यों कहा जाता है?
तो इसका उत्तर है- इनको महाक्षत्रिय इस लिए कहा जाता है कि जब भी भू-तल पर धर्म की हानि और पाप की वृद्धि होती है तब गोपेश्वर श्रीकृष्ण गोलोक से अपने सम्तस्त गोप-गोपियो को लेकर भू-तल पर अवतरित होते हैं और गोपेश्वर श्रीकृष्ण अपने गोपों को लेकर धर्म स्थापना के निमित्त सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करके पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। उस समय उनका साथ देने वाले सिर्फ गोप ही होते हैं दूसरा कोई नहीं। इस अद्भुत और असम्भव कार्य की वजह से ही गोपों को क्षत्रिय नहीं वल्कि महाक्षत्रिय कहा जाता है। उनके इस विजय अभियान को "यादवों के विश्वजीत युद्ध" नाम से जाता है। जिसको गर्गसंहिता में "विश्वजीत युद्ध" नामक खण्ड में विशेष रूप में वर्णन किया गया है।
यादवों के इस विश्वजीत युद्ध को इस पुस्तक में अध्यायों के अन्त में "परिशिष्ट-(5) में भी संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है। वहाँ से पाठक गण जानकारी ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त यूट्यूब पर "यादव सम्मान" चैनल पर भी यादवों के विश्वजीत युद्ध को चल चित्र (विडियो) के रुप में बडे़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
दूसरा सवाल यह है कि यादवों को महावैष्य (महाव्यापारी) क्यों कहा जाता है? तो इसका उत्तर यह है कि यादव (गोप) पूर्व काल से ही पशु पालक और दुग्ध उत्पादक होने के साथ ही कुशल कृषक भी हैं। इनके इसी वृत्ति (व्यवसाय) की वजह से भगवान श्रीकृष्ण सहित समस्त यादवों को गोपाल कहा जाता है। ये अपने इन सभी कार्यों में पूर्णतया दक्ष हैं। सर्वप्रथम कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने वाले गोप (यादव) ही हैं। बलराम जी इसके प्रथम उदाहरण है। क्योंकि इन्होंने ही सर्वप्रथम हल और मूल की खोज करके उस समय कृषि क्षेत्र में क्रांति लाए। इसलिए उनका एक नाम हलधर हुआ।
ज्ञात हो- आज भी किसान का प्रतीक हलधर है। बलराम जी अपने हल और मूशल से खेती भी किया करते थे और समय आने पर इसी से महायुद्ध भी करते थे। बलराम जी जब भी भगवान श्रीकृष्ण के साथ भू-तल पर अवतरित होते हैं तो वे अपने हर और मूशल के साथ यादव कुल में ही अवतरित होते हैं। इसकी पुष्टि- गर्गसंहिता के बलभद्र खण्ड के अध्याय-(२) के श्लोक -(१३) से होती है। जिसमें बलराम जी भू-तल पर अवतरित होने से पहले अपने हल और मूसल से कहते हैं-
हे हलमुसले यदा-यदा युवयोः स्मरणंं करिष्यमि।
तदा तदा मत्युर आविर्भूते भवतम्।।१३।
अनुवाद - हे हल और मूसल ! मैं जब-जब तुम्हारा स्मरण करूँ, तब-तब तुम मेरे सामने प्रकट हो जाना।१३।
इसी तरह से भगवान श्रीकृष्ण सहित सभी गोपों को एक साथ कृषक होने की पुष्टि- श्रीगर्गसंहिता, गिरिराज खण्ड के अध्याय-(६ ) से होती है। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण नन्दबाबा से कहते हैं कि-
कृषीवला वयं गोपाः सर्वबीजप्ररोहकाः।
क्षेत्रे मुक्ताप्रबीजानि विकीर्णीकृतवाहनम्।२६।
अनुवाद- बाबा हमारे गोप किसान हैं, जो खेतों में सब प्रकार के बीज बोया करते हैं। अतः हमने भी खेतों में मोती के बीच बिखेर दिए हैं।।२६।
उपर्युक्त सन्दर्भों से स्पष्ट होता है श्रीकृष्ण और बलराम और समस्त गोप कृषि और आर्य संस्कृति के जनक होने के साथ साथ किसानों के आदि पूर्वज और प्रतीक भी हैं। क्योंकि अबतक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में इनके जैसा किसान तथा गोपालक भेष (रूप) वाला न तो कोई देवता न किन्नर न गन्धर्व न दैत्य और न ही कोई दानव देखा गया और न ही ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य में इनके जैसा कोई है।
सम्पूर्ण निष्कर्ष -
उपर्युक्त सभी संदर्भों से सिद्ध होता है कि यादवों का वर्ण "वैष्णव" है जो स्वराट विष्णु से उत्पन्न होने की वजह से ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य से बिल्कुल अलग और स्वतंत्र है।
इस लिए यादवों को ब्रह्मा जी के चार वर्णों में से किसी एक वर्ण में स्थापित करना महामूर्खता है।
इस प्रकार से यह अध्याय यादवों के वास्तविक वर्ण की जानकारी के साथ समाप्त हुआ। अब इसके अगले अध्याय-(5) में यादवों के वंश एवं कुल के बारे में जानकारी दी गई।