गुरुवार, 28 अगस्त 2025

कलिसन्तरणोपनिषद-



हरिः ॐ ।। द्वापरान्ते नारदो ब्रह्माणं जगाम कथं भगवन् गां पर्यटन्कलि संतरेयमिति । स होवाच ब्रह्मा साधु पृष्टोऽस्मि सर्वश्रुतिरहस्यं गोप्यं तच्छृणु येन कलिसंसारं तरिष्यसि । भगवत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलिर्भवति । नारदः पुनः पप्रच्छ तन्नाम किमिति । स होवाच हिरण्यगर्भः ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।1।।
अनुवाद:-

हरिः ॐ । (द्वापर जिसके अऩ्त में है, अर्थात्) कलियुग में देवर्षि नारद जी सभी जगह भ्रमण करते हुये ब्रह्मा जी के पास जाकर, पूछा कि किस प्रकार से कलियुग में जीव का तारण हो सकेगा । तब उन ब्रह्माजी ने कहा – मुझसे आपने बहुत ही अच्छा प्रश्न पूछा है । आप सारे वेदों के गुप्त सार को सुनें जिससे कि कलियुग में संसार से जीव तर जायेगा । भगवान आदिपुरुष नारायण के नाम उच्चारण मात्र से ही कलियुग के सारे दोष मिट जाते हैं । तब नारद जी ने दुबारा पूछा कि वह नाम क्या है ? तदनन्तर हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी ने कहा –
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।1।


इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम् । नातः परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते ।।2।।

इस प्रकार से यही सोलह अक्षर का नाम है, जो कलियुग के दोषों का नाश करने वाला है । इससे श्रेष्ठ कोई भी उपाय सभी वेदों में देखने को नहीं मिलता है ।।2।।

इति षोडशकलावृत्तस्य जीवस्यावरणविनाशनम् । ततः प्रकाशते परं ब्रह्म मेघापाये रविरश्मीमण्डलीचेति । पुनर्नारदः पप्रच्छ भगवन्कोऽस्य विधिरिति । तं होवाच नास्य विधिरिति । सर्वदा शुचिरशुचिर्वा पठन्ब्राह्मणः सलोकतां समीपतां सरूपतां सायुज्यतामेति  । यदाऽस्य षोडशीकस्य सार्धत्रिकोटीर्जपति तदा ब्रह्महत्यां तरति । तरति वीरहत्याम् । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । पितृदेवमनुष्याणामपकारात्पूतो भवति । सर्वधर्मपरित्यागपापात्सद्यः शुचितामाप्नुयात् । सद्यो मुच्यते सद्यो मुच्यते इत्युपनिषत् ।।3।।

अनुवाद:-


 हरिः ॐ तत् सत् ।।
इस प्रकार से सोलह कलाओं से युक्त जीव के आवरण का विनाश हो जाता है ।  तब जीव को परम ब्रह्म उसी प्रकार से उद्भासित हो जाते हैं जैसे बादल के नष्ट हो जाने पर सूर्य के किरणों के मण्डली दृश्यमान हो जाते हैं ।

 तब नारद जी ने पूछा कि – हे भगवन् ! इसकी विधि क्या है । तब ब्रह्मा जी ने नारद जी से कहा कि – इसका कोई विशेष नियम नहीं है । जीव सभी अवस्था में चाहे शुद्ध हों या अशुद्ध हों, इस षोडशाक्षरी मंत्र का जाप करता हुआ परम ब्रह्म के सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति कर लेता हे ।

 जब इस षोडशाक्षरी मंत्र का साढ़े तीन करोड़ जप हो जाता है, तब जीव के ब्रह्महत्या के दोष का नाश हो जाता है । वीर के हत्या के दोष का नाश हो जाता है । स्वर्ण के चोरी का पाप नाश हो जाता है । पितरों, देवताओं और मनुष्यों के प्रति किये गये अपकार का भी नाश होकर वह पवित्र हो जाता है । सभी धर्मों के परित्याग करके वह सभी पापों से मुक्त हो कर पवित्र हो जाता है । 

तत्क्षण ही मुक्त हो जाता है । तत्क्षण ही मुक्त हो जाता है । ऐसा ही विज्ञान है ।।3।।

इति श्रीकलिसंतरणोपनिषत्समाप्ताः ।।
।। इस प्रकार से कलिसंतरणोपनिषद समाप्त होता है ।।

विशेष-

 कलिसन्तरणोपनिषद
कृष्ण यजुर्वेद से सम्बन्धित इस उपनिषद में 'यथा नाम तथा गुण' की उक्ति को चरितार्थ करते हुए 'कलियुग' के दुष्प्रभाव से मुक्त हो जाने का अति सुगम उपाय बताया गया है। 

इसमें 'हरि नाम' की महिमा का ही वर्णन है। इसीलिए इसे 'हरिनामोपनिषद' भी कहा जाता है। इसमें कुल तीन मन्त्र हैं। 

नारद और ब्रह्मा जी के संवाद-रूप में में इस उपनिषद की रचना हुई है।
इसमें बताया गया है कि आत्मा के ऊपर जो आवरण पड़ा हुआ है, उसे भेदने के लिए सुगम उपाय भगवान के नाम का स्मरण है। जिस प्रकार मेघाच्छन्न सूर्य, वायु के द्वारा मेघों को हटाने पर मुक्त आकाश में चमकने लगता है, वैसे ही भगवान नाम के कीर्तन से 'ब्रह्म' का दर्शन सम्भव हो जाता है। ब्रह्मा जी ने कहा-
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

इसमें राम सम्बोधन - भागवत धर्म के सह संस्थापक बलराम का सम्बोधन है। एकादश वैदिक उपनिषदों से पृथक कलि सन्तरण उपनिषद वैष्णवों का उपनिषद है।

इसमें वर्णित  सोलह नाम जपने से कलिकाल के महान् पापों का नाश हो जाता है।

मन से शुद्ध स्थिति में इस मन्त्र-नाम का सतत जप करने वाला भक्त, सभी तरह के बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है और 'मोक्ष' को प्राप्त होता है।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

शिलालिंगं तु शूद्राणां महाशुद्धिकरं शुभम्-

रसलिंगं ब्राह्मणानां सर्वाभीष्टप्रदं भवेत् ।
बाणलिंगं क्षत्रियाणां महाराज्यप्रदं शुभम् ।४८।

स्वर्णलिंगं तु वैश्यानां महाधनपतित्वदम् ।
शिलालिंगं तु शूद्राणां महाशुद्धिकरं शुभम् ।४९ ।

 शिव पुराण विश्वेरसंहिता अध्याय (18.) 

स्त्रीणां तु पार्थिवं लिंगं सभर्तृणां विशेषतः ।
विधवानां प्रवृत्तानां स्फाटिकं परिकीर्तितम् ।५१ ।

जट्टा भविष्य पुराण-

जजाट- जजात- ययाति+

संज्ञा पुं० [सं० ययाति] दे० 'ययाति' । उ०—बलि वैणु अंबरीष मानधाता प्रहलाद कहिये कहाँ लौ कथा रावण जजात की ।—राम० धर्म०, पृ० ६४ ।


मेहना म्लेच्छजातीया जट्टा आर्यमयाः स्मताः।
क्वचित्कचिच्च ये शेषाः क्षत्रियाश्चपहानिजा:।२८।
अनुवाद:- मेहना म्लेच्छ जाति है और जट्टा(जाट)आर्य जाति है। कोई और कुछ जो शेष क्षत्रिय हैं वे चौहानों से उत्पन्न हैं।।२८।

महीराजस्तु बलवांस्तृतीयो देहलीपतिः ।
सहोद्दीनस्य नृपतेर्वशमाप्य मृतिं गतः ॥२५॥
अनुवाद:- महीराज (पृथ्वीराज)  जो दिल्ली का तीसरा राजा था वह वह साहुद्दीन( मोहम्मद गौरी) राजा के वश में होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।२५।

चपहानेश्च स कुलं छाययित्वा दिवं ययौ ।
तस्य वंशे तु राजन्यास्तेषां पत्न्यः पिशाचकैः ॥२६॥
अनुवाद:- महीराज( पृथ्वी राज) चौहानों के कुल को छाया देकर वह स्वर्ग को सिधार गया । उस के वंश के राजाओं की पत्नीयाँ पिशाच और म्लेच्छो के द्वारा भोगी जाकर  ।
म्लेच्छैश्च भुक्तवत्यस्ता बभूबुर्वर्णसंकराः ।
न वै आर्या न वै म्लेच्छा जट्टा जात्या च मेहनाः ॥२७॥
अनुवाद:-
उन से वर्णसंकर जातियाँ उत्पन्न होती हैं जो निश्चय ही न तो आर्य ही थे और ना ही  म्लेच्छ जैसे जाट और मेहना( मेहणा- मीणा) जातियाँ।२७।


Purana and Itihasa (epic history)— पुराण शब्दावली में जर्तिका शब्द भी जट्ट का रूपान्तरण है।

जर्तिका (जर्तिक)—वाह्लीकों की एक जनजाति। इन्हें जनजातियों में सबसे निम्न माना जाता है। (महाभारत कर्णपर्व, अध्याय 44, श्लोक 10)।

देशांश्च विविधांश्चित्रान्पूर्ववृत्तांश्च पार्थिवान्।
ब्राह्मणाः कथयन्ति स्म धृतराष्ट्रनिवेशने।। 8-37-14
तत्र वृद्धः पुरावृत्ताः कथाः कश्चिद्द्विजोत्तमः।
बाह्लीकदेशं मद्रांश्च कुत्सयन्वाक्यमब्रवीत्।। 8-37-15।

बहिष्कृता हिमवतता गङ्गया च तिरस्कृताः।
सरस्वत्या यमुनया कुरुक्षेत्रेण चापि ये।।8-37-16।

पञ्चानां सिन्धुषष्ठानां नदीनां येऽन्तराश्रिताः।
तान्धर्मबाह्यानशुचीन्बाह्लीकानपि वर्जयेत्।।8-37-17।


गोवर्धनो नाम वटः सुभाण्डं नाम पत्तनम्।
एतद्राजन्कलिद्वारमाकुमारात्स्मराम्यहम्।। 8-37-18।


कार्येणात्यर्थगूढेन बाह्लीकेषूषितं मया।
तत एषां समाचारः संवासाद्विदितो मया।।8-37-19।


शाकलं नाम नगरमापगानामनिम्नगा।
चण्डाला नाम बाह्लीकास्तेषां वृत्तं सुनिन्दितम्।। 8-37-20।


पानं गुडासवं पीत्वा गोमांसं लशुनैः सह।
अपूपसक्तुमद्यानामाशिताः शीलवर्जिताः।। 8-37-21।


गायन्त्यथ च नृत्यन्ति स्त्रियो मत्ता विवाससः।
नगरापणवेशेषु बहिर्माल्यानुलेपनाः।। 8-37-22।


मत्ताः प्रगीतविरुतैः खरोष्ट्रनिनदोपमैः।
अनावृता मैथुने ताः कामचाराश्च सर्वशः।। 8-37-23।


आहुरन्योन्यसूक्तानि प्रब्रुवाणा मदोत्कण्ठा।
हेहतेहेहतेत्येवं स्वामिभर्तृहतेति च।। 8-37-24।


आक्रोशन्त्यः प्रनृत्यन्ति व्रात्याः पर्वस्वसंयताः।
तासां किलावलिप्तानां निवसन्कुरुजाङ्गले।। 8-37-25।


कश्चिद्बाह्लीकदुष्टानां नातिहृष्टमना जगौ।
सा नूनं बृहती गौरी सूक्ष्मकम्बलवासिनी।। 8-37-26।


मामनुस्मरती शेते बाह्लीकं कुरुवासिनम्।
शतद्रुं नु कदा तीर्त्वा तां च रम्यामिरावतीम्।
गत्वा स्वदेशं द्रक्ष्यामि स्थूलजङ्घाः शुभाः स्त्रियः।। 8-37-27।


मनःशिलोज्ज्वलापाङ्ग्यो गौर्यस्ताः काकुकूजिताः।
कम्बलाजिनसंवीता रुदन्त्यः प्रियदर्शनाः।। 8-37-28।


मृदङ्गानकशङ्खानां मर्दलानां च निःस्वनैः।
खरोष्ट्राश्वतरैश्चैव मत्ता यास्यामहे सुखम्।। 8-37-29।


शमीपीलुकरीराणां वनेषु सुखवर्त्मसु।
अपूपान्सक्तुपिण्डांश्च प्राश्नन्तो मथितान्वितान्।। 8-37-30।


पथिषु प्रबलो भूत्वा तथा सम्पततोऽध्वगान्।
चेलापहारं कुर्वाणास्ताडयिष्याम भूयसः।। 8-37-31।


एवंशीलेषु व्रात्येषु बाह्लीकेषु दुरात्मसु।
कश्चेतयानो निवसेन्मुहूर्तमपि मानवः।। 8-37-32।


कर्ण उवाच।
ईदृशा ब्राह्मणेनोक्ता बाह्लीका मोघचारिणः।
येषां षड्भागहर्ता त्वमुभयोः पुण्यपापयोः।। 8-37-33।


इत्युक्त्वा ब्राह्मणः साधुरुत्तरं पुनरुक्तवान्।
बाह्लीकेष्वविनीतेषु प्रोच्यमानं निबोध तत्।। 8-37-34।


ततत्र स्म राक्षसी गाति कृष्णचतुर्दशीम्।
नगरे शाकले स्फीते आहत्य निशि दुन्दुभिम्।। 8-37-35।


कथं वस्तादृशो गाथाः पुनर्गास्यामि शाकले।
गव्यस्य तृप्ता मांसस्य पीत्वा गौडं सुरासवम्।। 8-37-36।


गौरीभिः सह नारीभिर्बृहतीभिः स्वलङ्कृता।
पलाण्डुगण्डूषयुताः खादन्तश्चेशिकान्बहून्।। 8-37-37।


वाराहं कौक्कुटं मांसं गव्यं गार्दभमौष्ट्रकम्।
धानाश्च ये न खादन्ति तेषां जन्म निरर्थकम्।। 8-37-38।


एवं गायन्ति ये मत्ताः शीधुना पीलुकावने।
सबालवृद्धाः क्रन्दन्ति तेषां धर्मः कथं भवेत्।। 8-37-39।


यत्र लोकेश्वरः कृष्णो देवदेवो जनार्दनः।
विस्मृतः पुरुषैरुग्रैस्तेषां धर्मः कथं भवेत्।। 8-37-40।


इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते।
यदन्योप्युक्तवानस्मान्ब्राह्मणः कुरुसंसदि।। 8-37-41।


पञ्चनद्यो वहन्त्येता यत्र पीलुवनान्युत।
शतद्रुश्च विपाशा च तृतीयैरावती तथा।। 8-37-42।


चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुषष्ठा महानदी।
आरट्टा(राठी) नाम बह्लीका एतेष्वार्यो हि नो वसेत्।। 8-37-43।


व्रात्यानां दासमीयानां विदेहानामयज्वनाम्।
न देवाः प्रतिगृह्णन्ति पितरो ब्राह्मणास्तथा।। 8-37-44।


तेषां प्रनष्टधर्माणां बाह्लीकानामिति श्रुतिः।
ब्राह्मणेन यथा प्रोक्तं विदुषा साधुसंसदि।। 8-37-45।


काष्ठकुण्डेषु बाह्लीका मृण्मयेषु च भुञ्जते।
सक्तुमद्यावलिप्तेषु श्वावलीढेषु निर्घृणाः।। 8-37-46।


आविकं चौष्ट्रिकं चैव क्षीरं गार्दभमेव च।
तद्विकारांश्च बाह्लीकाः खादन्ति च पिबन्ति च।। 8-37-47।


पात्रसङ्करिणो जाल्माः सर्वान्नक्षीरभोजनाः।
आरट्टा नाम बाह्लीका वर्जनीया विपश्चिता।। 8-37-48।



इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते।
यदन्योऽप्युक्तवान्मह्यं ब्राह्मणः कुरुसंसदि।। 8-37-49


युगन्धरे पयः पीत्वा प्रोष्य चाप्यच्युतस्थले।
तद्वद्भूतिलये स्नात्वा कथं स्वर्गं गमिष्यति।। 8-37-50


पञ्चनद्यो वहन्त्येता यत्र निःसृत्य पर्वतात्।
आरट्टा नाम बाह्लीका न तेष्वार्यो द्व्यहं वसेत्।। 8-37-51


बाह्लीका नाम हीकश्च विपाशायां पिशाचकौ।
तयोरपत्यं बाह्लीका नैषा सृष्टिः प्रजापतेः।। 8-37-52।


ते कथं विविधान्धर्माञ्ज्ञास्यन्ते हीनयोनयः।। 8-37-53


कारस्करान्माहिषकान्करम्भान्कटकालिकान्।
कर्करान्वीरकान्वीरा उन्मत्तांश्च विवर्जयेत्।। 8-37-54।


इति तीर्थानुसञ्चारी राक्षसी काचिदब्रवीत्।
एकरात्रमुषित्वेह महोलूखलमेखला।। 8-37-55


आरट्टा नाम ते देशा बाह्लीकं नाम तद्वनम्।
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः।। 8-37-56


।। इति श्रीमन्महाभारते कर्णपर्वणि
सप्तत्रिंशोऽध्यायः।। 37 ।।

महाभारत कर्ण पर्व अध्याय- 44 श्लोक 1-19)


चतुश्चत्वारिंश (44) अध्याय: कर्ण पर्व

महाभारत: कर्ण पर्व: चतुश्चत्वारिंश अध्याय: श्लोक 1-19 का हिन्दी अनुवाद:-

कर्ण के द्वारा मद्र और बाह्लीक देश वासियों की निन्दा-

शल्य बोले-कर्ण ! तुम दूसरों के प्रति जो आक्षेप करते हो,ये तुम्हारे प्रलाप मात्र हैं। तुम जैसे हजारों कर्ण न रहैं तो भी युद्ध स्थल में शत्रुओं पर विजय पायी जा सकती है।

संजय कहते हैं-राजन् ! ऐसी कठोर बात बोलते हुए मद्रराज शल्य से कर्ण ने पुनः दूनी कठोरता लिये अप्रिय वचन कहना आरम्भ किया। कर्ण कहते हैं-मद्र नरेश ! तुम एकाग्रचित होकर मेरी ये बातें सुनो। राजा धृतराष्ट्र के समीप कही जाती हुई इन सब बातों को मैंने सुना था। 

*************************************

एक दिन महाराज धृतराष्ट्र के घर में बहुत से ब्राह्मण आ-आकर नाना प्रकार के विचित्र देशों तथा पूर्ववर्ती भूपालों के वृत्तांत सुना रहे थे। 

वहीं किसी वृद्ध एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण ने बाह्लीक और मद्रदेश की निन्दा करते हुए वहाँ की पूर्व घटित बातें कही थीं-। जो प्रदेश हिमालय, गंगा, सरस्वती, यमुना और कुरुक्षेत्र की सीमा से बाहर हैं तथा जो सतलज,व्यास,रावी,चिनाब,और झेलम-इन पाँचों सिंधु नदीयों के बीच में स्थित है, उन्हें बाह्लीक कहते हैं। उन्हें त्याग देना चाहिये।

 गोवर्द्धन नोक वटवृक्ष और सुभद्र नामक चबूतरा-ये दोनों वहाँ के राजभवन के द्वार पर स्थित हैं,जिन्हें मैं बचपन से ही भूल नहीं पाता हूँ। मैं अत्यन्त गुप्त कार्य वश कुछ दिनों तक बाह्लीक देश में रहा था। इससे वहाँ के निवासियों के सम्पर्क में आकर मैंने उनके आचार-व्यवहार की बहुत सी बातें जान ली थीं। वहाँ शाकल( स्यालकोट) नामक एक नगर और आपगा नाम की एक नदी है,जहाँ जार्तिक( जट्ट) नाम वाह्लीक निवास करते हैं। उनका चरित्र अत्यन्त निन्दित है। वे भुने हुए जौ और लहसुन के साथ गोमांस खाते और गुड़ से बनी हुई मदिरा पीकर मतवाले बने रहते हैं। पूआ,मांस और वाटी खाने वाले बाह्लीक देश के लोग शील और आचार शून्य हैं। वहाँ की स्त्रियाँ बाहर दिखाई देने वाली माला और अंगराग धारण करके मतवाली तथा नग्न होकर नगर एवं घरों की चहारदिवारियों के पास गाती और नाचती हैं। 

वे गदहों के रेंकने और ऊँटों के बलबलाने की सी आवाज से मतवाले पन में ही भाँति-भाँति के गीत गाती हैं। और मैथुन-काल में भी परदे के भीतर नहीं रहती हैं। वे सब-के-सब सर्वथा स्वेच्छाचारिणी होती हैं। मद से उन्मत्त होकर परस्पर सरस विनोद युक्त बातें करती हुई वे एक दूसरे को ओ घायल की हुई ! ओ किसी की मारी हुई ! है पतिमर्दिते ! इत्यादि गालियाँ देकर पुकारती और नृत्य करती हैं। पर्वों और त्यौहारों के अवसर पर तो उन संस्कारहीन रमणीयों के संयम का बाँध और भी टूट जाता है। इन्हीं बाह्लीक देशी मदमत्त एवं दुष्ट स्त्रियों का कोई सम्बन्धी वहाँ से आकर कुरुजांगल प्रदेश में निवास करता था। वह अत्यन्त खिन्नचित्त होकर इस प्रकार गुनगुनाया करता था-। निश्चय ही वह लँबी,गोरी और महीन कम्बल की साड़ी पहनने वाली मेरी प्रेयसी कुरुजांगल प्रदेश में निवास करने वाले मुझ बाह्लीक को निरन्तर याद करती हुई सोती होगी।। में कब सतलज और उस रमणीय रावी नदी को पार करके अपने देश में पहुँचकर शंख की बनी हुई मोटी-मोटी चूडि़यों को धारण करने वाली वहाँ की सुन्दरी स्त्रियों को देखूँगा। जिनके नेत्रों के प्रान्त भाग मैनसिल के आलेप से उज्ज्वल हैं, दोनों नेत्र और ललाट अंलन सुशोभित हैं तथा जिनके सारे अंग कम्बल और मृगचर्म से आवृत हैं,वे गोरे रंगवाली प्रियदर्शना (परम सुनदरी) रमणियाँ मृदंग,ढोल,शंख और मर्दल आदि वाद्यों की ध्वनि के साथ-साथ कब नृत्य करती दिखायी देंगी।


महाभारत कर्ण पर्व अध्याय 44 श्लोक 20-40

चतुश्चत्वारिंश (44) अध्याय: कर्ण पर्व

महाभारत: कर्ण पर्व: चतुश्चत्वारिंश अध्याय: श्लोक 20-40 का हिन्दी अनुवाद

कब हमलोग मदोन्मत्त हो गदहै,ऊँट और खच्चरों की सवारी द्वारा सुखद मार्गाें वाले शमी,पीलु और करीले के जंगलों में सुख से यात्रा करेंगे। मार्ग में तक्र के साथ पूए और सत्तू के पिण्ड खाकर अत्यन्त प्रबल हो कब चलते हुए बहुत से राहगीरों को उनके कपड़े छीकर हम अच्छी तरह पीटेंगे। संस्कारशून्य दुरात्मा बाहीक ऐसे ही स्वभाव के होते हैं। उनके पास कौन सचेत मुनष्य दो घड़ी भी निवास करेगा ? ब्राह्मण ने निरर्थक आचार-विचार वाले बाहीकों को ऐसा ही बताया है,जिनके पुण्य और पाप दोनों का छठा भाग तुम लिया करते हो। शल्य ! उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने ये सब बातें बताकर उद्दण्ड बाहीकों के विषय में पुनः जो कुछ कहा था,वह भी बताता हूँ,सुनसे-। उस देश में एक राक्षसी रहती है,जो सदा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को समृद्धशाली शाकल नगर में रात के समय दुन्दुभि बजाकर इस प्रकार गाती है-। मैं वस्त्राभूषणों से विभूषित हो गोमांस खाकर और गुड़ की बनी हुई मदिरा पीकर तृप्त हो अंजलि भर प्याज के साथ बहुत सी भेड़ों को खाती हुई गोरे रंग की लंबी युवती स्त्रियों के साथ मिलकर इस शाकल नगर में पुनः कब इस तरह की बाहीक सम्बन्धी गाथाओं का गान करूँगी। जो सूअर,मुर्गा,गाय,गदहा,ऊँट और भेड़ के मांस नहीं खाते,उनका जन्म व्यर्थ है,। जो शाकल निवासी आबालवृद्ध नरनारी मदिरा से उन्मत्त हो चिल्ला-चिल्लाकर ऐसी गाथाएँ गाया करते हैं,उनमें धर्म कैसे रह सकता है ? शल्य ! इस बात को अच्छी तरह समझ लो। हर्ष का विषय है कि इसके सम्बन्ध में मैं तुम्हें कुछ और बातें बता रहा हूँ,जिन्हें दूसरे ब्राह्मण ने कौरव-सभा में हम लोगों से कहा था-। जहाँ शतद्रु (सतलज), विपाशा (व्यास),तीसरी इरावती (रावी),चन्द्रभागा (चिनाव),और वितस्ता (झेलम),-ये पाँच नदियँा छठी सिंधु नदी के साथ बहती हैं;जहाँ पीलु नामक वृक्षों के कई जंगल हैं,वे हिमालय की सीमा से बाहर के प्रदेशआरट्टनाम से विख्यात हैं।वहाँ का धर्म-कर्म नष्ट हो गया है। उन देशों में कभी भी न जाय। जिनके धर्म-कर्म नष्ट हो गये हैं,वे संस्कारहीन,जारज बाहीक यज्ञ-कर्म से रहित होते हैं। उनके दिये हुए द्रव्य को देवता,पितर और ब्राह्मण भी ग्रहन नहीं करते हैं,यह बात सुनने में आयी है। किसी विद्वान् ब्राह्मण ने साधु पुरुषों की सभा में यह भी कहा कि  बाहलीकक देश के लोग काठ के कुण्डों में तथा मिट्टी के बर्तन में जहाँ सत्तू और मदिरा लिपटे होते हैं और जिनहैं कुत्ते चाटते रहते हैं,घृणाशून्य होकर भोजन करते हैं। बाहीक देश के निवासी भेड़,ऊँटनी और गदही के दूध पीते और उसी दूध के बने हुए दही-घी आदि खाते हैं। वे जारज पुत्र उत्पन्न करने वाले नीच आरट्ट नामक बाहीक सबका अनन खाते और सबका देध पीते हैं। अतः विद्वान् पुरुष को उन्हें दूर से ही त्याग देना चाहिये। शल्य ! इस बात को याद कर लो। अभी तुमसे और भी बातें बताऊँगा,जिन्हें किसी दूसरे ब्राह्मण ने कौरव सभा में स्वयं मुझसे कहा था-। युगन्धर नगर में दूध पीकर अच्युत स्थल नामक नगर में एक रात रहकर तथा भूतिलय में स्नान करके मनुष्य कैसे स्वर्ग में जायेगा ? जहाँ पर्वत से निकल कर पूर्वोक्त ये पँाच नदियँा बहती हैं,वे आरट्ट नाम से प्रसिद्ध बाहीक प्रदेश हैं। उनमें श्रेष्ठ पुरुष दो दिन भी निवास न करे।

महाभारत कर्ण पर्व अध्याय 44 श्लोक 41-47


चतुश्चत्वारिंश (44) अध्याय: कर्ण पर्व

महाभारत: कर्ण पर्व: चतुश्चत्वारिंश अध्याय: श्लोक 41-47 का हिन्दी अनुवाद

विपाशा (व्यास),नदी में दो पिशाच रहते हैं। दक का नाम है बहि और दूसरे का नाम है हीक। इन्हीं दोनों की संतानें बाहीक कहलाती हैं। ब्रह्माजी ने इनकी सृष्टि नहीं की है। वे नीच योनि में उत्पन्न हुए मनुष्य नाना प्रकार के धर्मों को कैसे जानेंगे ? कारस्कर, माहिषक, कुरंड, केरल, कर्कोटक और वीरक-इन देशों के धर्म (आचार-व्यवहार) दूषित हैं;अतः इनका त्याग कर देना चाहिये। विशाल ओखलियों की मेखला (करधनी) धारण करने वाली किसी राक्षसी ने किसी तीर्थयात्री के घर में एक रात रहकर उससे इस प्रकार कहा था। जहाँ ब्रह्माजी के समकालीन (अत्यन्त प्राचीन) वेद-विरुद्ध आचरण वाले नीच ब्राह्मण निवास करते हैं,वे आरट्ट नामक देश हैं और वहाँ के जल का नाम बाहीक है। उन अधम ब्राह्मणों को न तो वेदों का ज्ञान है,न वहाँ यज्ञ की वेदि याँ हैं और न उनके यहाँ यज्ञ-याग ही कोते हैं। वे संस्कारहीन एवं दासों से समागम करने वाली कुलटा स्त्रियों की संतानें हैं;अतः देवता उनका अन्न ग्रहण नहीं करते हैं। प्रस्थल,मद्र,गान्धार,आरट्ट,खस,वसाति,सिंधु तथा सौवीर-ये देश प्रायः अत्यन्त निन्दित हैं।

इस प्रकार श्रीमहाभारत में कर्णपर्व में कर्ण और शल्य का संवाद विषयक चौंवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।




स्रोत : archive.org: पौराणिक विश्वकोश

जर्तिक (जर्टिक) महाभारत ( देखें 8.30.14) में उल्लिखित एक नाम है और यह लोगों और स्थानों के लिए प्रयुक्त अनेक उचित नामों में से एक है। नोट: महाभारत (जिसमें जर्तिक का उल्लेख है) एक संस्कृत महाकाव्य है जिसमें 1,00,000 श्लोक (छंद) हैं और यह 2000 वर्ष से भी अधिक पुराना है।

स्रोत : जाटलैंड: महाभारत के लोगों और स्थानों की सूची
संदर्भ जानकारी


भारत और विदेशों की भाषाएँ

संस्कृत शब्दकोश

सियालकोट (उर्दूسِیال کوٹअंग्रेज़ीSialkotपाकिस्तान के पंजाब 
प्रान्त के उत्तर-पूर्व में स्थित सियालकोट जिले का मुख्यालय एवं सैनिक छावनी है। नगर उत्तरी-पश्चिमी रेलमार्ग पर लाहौर से 100 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह नगर अनेक व्यवसायों एवं उद्योगों का केंद्र है। नगर में 20 वीं शताब्दी के एक किले के भग्नावशेष हैं जो एक टीले पर खड़े हैं। इतिहासकारों का अनुमान है कि यह टीला किले से अधिक प्राचीन है। कुछ इतिहासकारों ने नगर की पहचान प्राचीन 'शाकल नगर' से की है। जिसका उल्लेख महाभारत कर्ण पर्व में है।

____________    

बाह्लीक देश" का संदर्भ दो प्रमुख अर्थों में प्रयोग होता है: पहला, यह प्राचीन भारतीय साहित्य में वाह्लिका या बाह्लीक नामक साम्राज्य को संदर्भित करता है, जो कि संभवतः आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान के बल्ख़ क्षेत्र में था और दूसरा, आधुनिक भू-राजनीतिक संदर्भ में यह बाल्टिक सागर के आसपास के देशों — एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया — को भी कहा जा सकता है प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार बाह्लीक
  • एक जनपद या साम्राज्य है :
    बाह्लीक शब्द एक प्राचीन भारतीय जनपद या सांस्कृतिक क्षेत्र को दर्शाता है। 
  • स्थान:
    यह क्षेत्र मध्य एशिया में ऑक्सस नदी (आधुनिक अमु दरिया) के दक्षिण और हिंदू कुश पहाड़ों के उत्तर में, आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान में स्थित था।                     
  • इतिहास:
    बाह्लीक के राजा प्रतीप के पुत्र थे और उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था। ये शन्तनु के परिवीरीय जन थे।
आधुनिक भू-राजनीति में बाह्लीक (बाल्टिक देश)है।
  • देश:
    इस संदर्भ में, बाह्लीक का अर्थ एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया है। 
  • समूह:
    ये बाल्टिक सागर के आसपास स्थित हैं और नाटो, यूरोपीय संघ और यूरोज़ोन के सदस्य हैं। 

_________________________________________

मद्र राज्य  प्राचीन भारतीय महाकाव्य महाभारत में पश्चिमी राज्यों के बीच समूहीकृत एक राज्य था । इसकी राजधानी मद्र क्षेत्र में सागल थी। कुरु राजा पांडु ( पांडु ) की दूसरी पत्नी माद्री मद्र राज्य से थीं और उन्हें माद्री कहा जाता था । पांडव जुड़वाँ, नकुल और सहदेव , उनके पुत्र थे। माद्री का भाई शल्य मद्र का राजा था। हालाँकि पांडवों से स्नेह था, लेकिन उसे दुर्योधन का समर्थन देने के लिए छल किया गया और कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान पांडवों के खिलाफ लड़ाया गया । 

सागल को अपनी राजधानी बनाने वाले मद्र साम्राज्य (पूर्वी मद्र या पूर्व मद्र) के अलावा, यह माना जाता है कि एक पश्चिमी मद्र (अपरा मद्र) और एक उत्तरी मद्र ( उत्तर मद्र ) भी था।



मद्र साम्राज्य दक्षिण एशिया में स्थित है

वायु पुराण के अनुसार, मद्र राज्य की स्थापना अनु वंश के राजा उशीनर शिबि ने की थी। अनु ययाति के पुत्र थे ।

भागवत पुराण के अनुसार , मद्र राज्य की स्थापना त्रेता युग में अनु राजा शिबि के पुत्र मद्र ने की थी ।

मद्र संस्कृति


बाह्लीक लोगों को वैदिक संस्कृति का "बाहरी" माना जाता था, क्योंकि वे भारतवर्ष की एक विदेशी जनजाति थे । बाह्लीक नाम का प्रयोग मद्र, सिंधु, केकय, गांधार और कम्बोज से भिन्न राज्य को दर्शाने के लिए भी किया जाता है। कौरवों और पांडवों के पूर्वज, कुरु राजा शांतनु का एक भाई था जो बाह्लीक राज्य पर शासन करता था ।

मद्र एक बाह्लीक देश के रूप में-

बाह्लिक या पश्चिमी देश ठंडे देश थे और लोग कंबल का इस्तेमाल करते थे। वे भेड़ें भी पालते थे और भेड़ का दूध पीते थे । उन्हें ऊँटों का अच्छा ज्ञान था। उनके पास उत्तम गुणवत्ता वाले घोड़े थे। उनके घोड़े और यहाँ तक कि घुड़सवार भी आर्यावर्त (उत्तर भारतीय राज्य जहाँ वैदिक संस्कृति का प्रचलन था) के राजाओं के बीच युद्धों में इस्तेमाल किए जाते थे ।

उनके सैनिक युद्ध में शामिल दोनों पक्षों की सहायता के लिए भुगतान करते थे। संभवतः यही कारण था कि मद्रराज शल्य को कुरुक्षेत्र युद्ध में दुर्योधन का पक्ष लेना पड़ा , क्योंकि उन्हें दुर्योधन का साथ देने के लिए छल से भुगतान लेना पड़ा था।

पश्चिमी राज्यों को दर्शाने वाला एक और सामूहिक नाम अराष्ट्र या अरत्ता है , जिसका अर्थ है राजाविहीन देश। इससे यह संदेह पैदा होता है कि क्या ये देश निर्वाचित सरदारों द्वारा शासित गणराज्य थे, अगर हम इस शब्द के सकारात्मक अर्थ को समझें। नकारात्मक अर्थ में अराष्ट्र शब्द का अर्थ बिना किसी नियंत्रण वाला या घोर अव्यवस्था वाला राज्य हो सकता है।

मद्र जनजाति की उत्पत्ति (पांडु की दूसरी पत्नी माद्री का राज्य)


यवन किरात , चीन , सवर , बरबर, शक , तुषार , कंक, पथव, आंध्र, मद्रक , पौंड्र, पुलिंद रमथ और काम्वोज का उल्लेख आर्यावर्त के राज्यों से परे की जनजातियों के रूप में एक साथ किया गया है  आर्यावर्त के राजाओं को इनसे निपटने में संदेह था। (12,64)

अन्द्रक, गुहा, पुलिंद, सवर, चुचुक, मद्रक, यम, काम्वोज , किरात और बरबर का उल्लेख अज्ञात जनजातियों के रूप में किया गया है। कृत युग में , वे पृथ्वी पर (अर्थात प्राचीन भारत में) कहीं नहीं थे। त्रेता युग से ही उनकी उत्पत्ति हुई और वे बढ़ने लगे। जब त्रेता और द्वापर युग का मिलन हुआ , तो क्षत्रिय एक - दूसरे के निकट आकर युद्ध में लग गए (12,206)।

मद्र जनजाति और साल्व जनजाति की उत्पत्ति एक सामान्य थी जैसा कि (1,121) में एक मिथक से संकेत मिलता है। यहां इन दोनों जनजातियों की उत्पत्ति पुरु की जाति के एक राजा को माना गया था , जिसे व्युषिताश्व के नाम से जाना जाता था। उनकी पत्नी भद्रा थीं, जो कक्षीवत की पुत्री थीं (कक्षीवत गौतम-दीर्घतमस के पुत्र थे, जो वली नामक राजा की रानी की दासी से उत्पन्न हुए थे, जो मगध के बाहरी इलाके में शासन करते थे । ( अंग और मगध भी देखें)। व्युषिताश्व की मृत्यु के बाद भद्रा के सात पुत्र पैदा हुए। बाद में वे सभी राजा बने। उनमें से तीन साल्व के तीन राजा बने और उनमें से चार मद्र के चार राजा बने।

मिथक में बताया गया है कि ये सात राजा उसके पति के मृत शरीर से पैदा हुए थे!

मद्र वधुओं का कुरुओं के साथ गठबंधन


मद्र विवाह प्रथा

कुरुराज पांडु के पितातुल्य संरक्षक भीष्म , शल्य की बहन को पांडु के लिए वधू के रूप में मांगने मद्र की राजधानी गए । इस पर शल्य ने उत्तर दिया: "हमारे कुल में हमारे पूर्वजों द्वारा निभाई जाने वाली एक प्रथा है, जिसका उल्लंघन, चाहे वह अच्छी हो या बुरी, मैं नहीं कर सकता। यह सर्वविदित है, और इसलिए तुम्हें भी ज्ञात है, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।" प्रथा यह थी कि वर को वधू के संबंधियों को दहेज देना होता था। भीष्म ने शल्य को बहुत सारा धन दिया और माद्री को पांडु के लिए वधू के रूप में स्वीकार किया (1,113)।

पांडव सहदेव ने मद्र के राजा द्युतिमत की पुत्री विजया से विवाह किया, उसे स्वयंवर में प्राप्त किया और उससे सुहोत्र नामक पुत्र उत्पन्न किया। (1,95)

मद्रास के राजा


राजा अश्वपति


अश्वपति मद्र (मद्र राज्य के संस्थापक) के पुत्र और राजा शिबि के पौत्र थे। वे मद्र की प्रसिद्ध राजकुमारी सावित्री के पिता थे , जो प्रसिद्ध शाल्व राजकुमार सत्यवान की प्रेमिका (और बाद में पत्नी) बनीं। अश्वपति की पत्नी मालव नामक एक छोटे कबीले से थीं । उन्हें मालवी (3,291) के नाम से जाना जाता था। अश्वपति और मालवी के पुत्र बाद में शक्तिशाली मालव राजा बने। उन्होंने अपना राज्य अवंती ( उज्जैन , मध्य प्रदेश ) तक फैलाया । इस प्रकार मालव वंश की उत्पत्ति मद्र ( पाकिस्तान के पंजाब प्रांत) के राजा अश्वपति (3,297) से हुई।

राजा शल्य / मुकप्पन


शल्य मद्र का सबसे प्रसिद्ध राजा था। कुरुक्षेत्र युद्ध के अंतिम दिन वह कौरव सेना का सेनापति बना । वह कुरुक्षेत्र युद्ध में लड़ने वाला सबसे बुजुर्ग भाला-सेनानी था । भीम ने द्रौपदी के स्वयंवर समारोह (1,192) के दौरान एक-दूसरे को जाने बिना गदा-युद्ध में शल्य को हरा दिया था । कुरुक्षेत्र युद्ध के अंतिम दिन (18वें दिन) पांडव राजा युधिष्ठिर ने उसका वध कर दिया था । भीष्म ने शल्य को अथिरथ (एक महान रथ-योद्धा) (5,166) का दर्जा दिया था । शल्य घोड़ों के ज्ञान और युद्ध के मैदान में रथ चलाने में भी कुशल थे (8,31)। इस कारण से, शल्य को युद्ध के दौरान एक दिन के लिए कर्ण का सारथी बनने के लिए मजबूर होना पड़ा। शल्य के रुक्मांगद और रुक्मरथ नामक दो पुत्र थे (1,188 इसी प्रकार शल्य के कई भाई भी युद्ध में शामिल हुए। उनके छोटे भाई अभिमन्यु (8,5) द्वारा मारे गए। उन्हें मुकप्पन भी कहा जाता है।

अन्य मद्र राजा भी थे जैसे द्युतिमत का उल्लेख (1,95) में पांडव सहदेव के ससुर के रूप में किया गया है 

नकुल का मद्र राज्य में आगमन |


युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के लिए कर एकत्र करने हेतु पश्चिम की ओर अपने सैन्य अभियान के दौरान नकुल भी मद्र राज्य में आये थे।

पाण्डुपुत्र नकुल ने अपने बल से रामथ, हरहुण और पश्चिम के विभिन्न राजाओं को परास्त कर दिया। वहाँ रहते हुए नकुल ने कृष्ण वसुदेव के पास दूत भेजे । वसुदेव ने समस्त यादवों के साथ उनका राज्य स्वीकार कर लिया। वहाँ से महाबली वीर, मद्र नगरी साकला में जाकर, अपने चाचा शल्य से स्नेहवश पाण्डवों का राज्य स्वीकार करवा लिया । अपने मामा के आतिथ्य और सत्कार के पात्र, उस यशस्वी राजकुमार का उनके चाचा ने भरपूर सत्कार किया। नकुल ने शल्य से बहुत-से रत्न और रत्न प्राप्त किए और अपना राज्य छोड़ दिया।

कुरुक्षेत्र युद्ध में मद्र


मद्र राजा शल्य एक अक्षौहिणी सेना लेकर पांडवों की सेना में शामिल होने आए , क्योंकि उनके भतीजे अर्थात जुड़वां नकुल और सहदेव कोई और नहीं बल्कि सबसे छोटे पांडव थे। उनकी सेना प्रतिदिन मद्र ( पाकिस्तान के पंजाब प्रांत) से उपप्लव्य ( राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर कहीं ), मत्स्य नगरी की ओर धीरे-धीरे कूच करती थी, जहाँ पांडवों ने डेरा डाला था। जब उनकी सेना कुरुजांगल (पांडवों का राज्य, आधुनिक हरियाणा ) पहुँची, तो दुर्योधन के आदमियों ने सेना को रोक लिया। उन्होंने अपनी पहचान बताए बिना शल्य और उनके आदमियों का स्वागत किया, उनके लिए तंबू बनाए और उन्हें सभी सुख-सुविधाओं से युक्त किया। मद्र सैनिकों को कुरुक्षेत्र युद्ध में भाग लेने के लिए दुर्योधन के अधिकारियों से भुगतान भी मिलता था। जब तक शल्य को सच्चाई का पता चला, तब तक वह दुर्योधन के लिए युद्ध के लिए ऋणी हो गए थे । (5,8)

धनुष-युद्ध में शल्य के मुख्य प्रतिद्वंदी राजा युधिष्ठिर थे (5,57)। दोनों ने कई बार युद्ध किया (6-45 आदि)। उन्होंने नकुल और सहदेव से भी कई युद्ध किए। उन्होंने विराट और द्रुपद जैसे कई योद्धाओं को पराजित किया । शल्य 17वें दिन कर्ण के रथ के सारथी बने (8,36)। अंतिम दिन युधिष्ठिर ने अपने चाचा शल्य का वध कर दिया , जो उस समय कौरव सेना के सेनापति थे (9,17)।

मद्र सेना ने अन्य पश्चिमी सेनाओं जैसे त्रिगर्त , केकय , गांधार , यवन , सिंधु , सौवीर , अम्वस्थ आदि के साथ युद्ध किया (6-51 आदि)।

जिस दिन शल्य को कर्ण के रथ का सारथी बनने के लिए बाध्य किया गया , उसी दिन उनके बीच विवाद उत्पन्न हो गया (8-40,44)। इस विवाद का वर्णन करने वाले अंश इन योद्धाओं के बीच विद्यमान सांस्कृतिक मतभेदों पर प्रकाश डालते हैं। 

पुराणकोष से

अरट्ट भरतक्षेत्र का एक देश । यहाँ के घोड़े प्रसिद्ध थे । महापुराण 16. 141-148, 156,30.107


ध्वनि की समानता पर आधारित सिद्धांत

यह जट , जर्ता और जर्तिका की ध्वनि की समानता पर आधारित एक और सिद्धांत है । कैम्पबेल और ग्रियर्सन प्रथम ऐसे अग्रणी भाषाविद् हैं जिन्हें संभवतः संस्कृत साहित्य के जर्तिकों में जाटों का सबसे पहला उल्लेख मिलता है । प्रोफ़ेसर लासेन 2 और कनिंघम तृतीय भी उन्हें जर्टिकाओं के साथ पहचानने में पीछे नहीं रहे । लेकिन इस सिद्धांत के मुख्य प्रतिपादक सी.वी. वैद्य हैं, जो दावा करते हैं कि जाट ही जर्टिका या जर्ट हैं , जो प्राचीन काल में साकल( पाकिस्तान का स्यालकोट) के आसपास रहते थे और जिनका उल्लेख महाभारत के कर्ण पर्व में मिलता है । वह लिखते हैं , "तीनों समुदायों यानी मराठा, राजपूत और (गुर्जर) में जाट सबसे पुराने हैं। और जाटों से पुराने अहीर हैं। महाभारत में उनका उल्लेख जर्त के रूप में किया गया है। उनका पहला उल्लेख पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के चंद्र के व्याकरण में " अजय जरतो हूण " वाक्य में है। नृजातीय विशेषताएं, यानी उनका गोरा रंग, लंबा कद, ऊंची नाक और लंबा सिर, स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे आर्य हैं ।

भारत में जातिगत पूर्वाग्रह की जन्मजात भावना ने जातियों के मिश्रण को बहुत हद तक रोक दिया है और जाटों ने अपने रक्त को लगभग अक्षुण्ण बनाए रखा है। हालांकि आधुनिक राय द्वारा उनके कृषक होने और विधवा विवाह की प्रथा के कारण शूद्र के रूप में माना जाता है, वे भारत में सबसे शुद्ध आर्य हैं और आर्य आक्रमणकारियों की पहली जाति से संबंधित हैं , हमारे विचार से, आर्यों की सौर जाति जो मूल रूप से पंजाब में बस गई थी

डॉ. सिद्धांतशास्त्री 5 और डॉ. बी.एन. पुरी 6 भी जाटों को महाकाव्य के जर्तों या जर्तिकों से जोड़ते हैं। श्री बी.एस. दहिया 7 मानते हैं कि जाट संस्कृतनिष्ठ जर्त का उतना ही अच्छा प्राकृत रूप है जितना कि गूजर गुर्जर का है । जाटों के एक अन्य इतिहासकार, लेफ्टिनेंट राम सरूप जून 8, जिनके लिए वे आर्यों की चंद्र जाति के वंशज हैं , का मानना ​​है कि जर्तिकों सहित सभी बारह बाहिक जनजातियाँ 


, यद्यपि कर्ण पर्व में अशोभनीय रूप से चित्रित की गई हैं, महाभारत के समय पंजाब में जाटों (जर्तिकों) के अस्तित्व को साबित करती हैं । प्राचीन अरब दुनिया में जाटों को जाट  के रूप में जाना जाता था । इस्लाम का विश्वकोश भी उन्हें जर्तों के साथ पहचानता है जो पंजाब और सिंध में उत्तर-संस्कृत भारतीय मूल के मध्य इंडो-आर्यन थे ।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 40 का अंत


सिद्धान्त के समर्थकों

इस सिद्धांत के सबसे कट्टर समर्थक शायद बुद्ध प्रकाश हैं। वे न केवल सी.वी. वैद्य के सुर में सुर मिलाते हैं, बल्कि जाटों के कथित पूर्वजों, जार्तिकों , के बारे में अतिरिक्त जानकारी भी देते हैं। वे लिखते हैं। "ऐसा प्रतीत होता है कि जार्टिका या जार्टस का आगमन , जो इयाती के समान हैं, जो ताखोरोई के साथ मिलकर, टास्केंड के आसपास जक्सार्ट के उत्तरी भाग के पास रहते थे , टॉलेमी के अनुसार , और जिनके आधुनिक वंशज, जिन्हें जाट कहा जाता है , पूरे पंजाब में फैले हुए हैं और मुख्य रूप से मद्रास की विदेशी विशेषताओं के लिए जिम्मेदार हैं । ये जार्टस भारतीय संस्कृति के लिए विदेशी थे, जैसा कि निंदा के स्वर से प्रकट होता है, जिसमें गुड़ और चावल से बनी शराब पीने और रोल और चॉप के रूप में लहसुन के साथ गोमांस खाने की उनकी आदत का उल्लेख महाभारत में किया गया है ।

इन जनजातीय मिश्रणों के परिणामस्वरूप, मद्रास को रूढ़िवादी लोगों के आकलन में झटका लगा"।

वह 12 आगे कहते हैं कि "पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व की शुरुआती शताब्दियों में जर्त और आभीर पंजाब में फैल गए और इसके लोगों के आचरण और आचरण में गिरावट आई। वैदिक काल के बाद, जर्त पंजाब में चले गए और मद्र की राजधानी सकला पर कब्जा कर लिया... रॉलिंसन 13 के मत में , वे शक लोगों के समान थे जिन्हें जटा या गाटा कहा जाता था । वे दो शाखाओं में विभाजित थे, मस्सागेटे (बड़ा गाटा - जटा ) और थिस्सागेटे (छोटा गाटा-जटा)। उनकी पश्चिमी शाखा यूरोप में चली गई और गोथ के रूप में जानी गई और पूर्वी शाखा भारत में आई और उसे जार्टा कहा गया । उनके आधुनिक प्रतिनिधि जाट हैं, जो पंजाब के लोगों की रीढ़ हैं ।" बुद्ध प्रकाश 14 में "सिथो-ईरानी जनजातियों का एक समूह, अर्थात अर्जुनायन , विर्क , यौधेय , बाल्हिक , आदि, उसी अवधि में पंजाब में घुस आए। बाल्हिकों को पिसाका की संतान कहा जाता है , बाल्हिक का एक रूप वाल्हिक है , महाभारत में है और दूसरा वाहिका है "। पाणिनि 15 उशीनर की सीमाओं तक पूरे पंजाब के लिए वाहिका शब्द का उपयोग करता है । कात्यायन 16 ने वाहिका को 'बहि' (बाहर) से प्राप्त किया है और वाहिका देश को ब्राह्मणवादी समाज के दायरे से बाहर माना है। महाकाव्य 17 भी इसी व्युत्पत्ति का अनुसरण करता है और इस देश के सभी लोगों को वाहिका कहा जाता था। कहा जाता है कि ये लोग दो राक्षसों, बही और हीका या हिका की संतान हैं , जो विपासा नदी में रहते थे और महाभारत 18 में उनकी निंदा की गई है 


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 41 का अंत



सी.वी. वैद्य की तरह बुद्ध प्रकाश ने भी इस सिद्धांत के समर्थन में महाभारत में जर्तों या जर्तिकों सहित७ लोगों के चरित्र के चित्रण पर अप्रत्यक्ष रूप से भरोसा किया है , जिस पर विद्वानों की दुनिया में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई है।

कर्ण पर्व के वाह्लीक

इस सिद्धांत का आकलन करने से पहले, इस महान महाकाव्य के कर्ण पर्व में दिए गए वाहलीक लोगों के वर्णन पर एक नज़र डालना ज़रूरी है , जो इस सिद्धांत के प्रतिपादकों और अनुयायियों, दोनों का आधार है। इस ग्रंथ के अध्ययन से पता चलता है कि कर्ण द्वारा अपने सारथी शल्य को दिए गए कटु उत्तर में इन लोगों की आदतों और चरित्र का एक विस्तृत, यद्यपि अपमानजनक वर्णन है।

मद्र लोग अपने मित्रों के प्रति सदैव कपटी रहते हैं... स्नेहशून्य, सदैव दुष्ट, असत्यवादी और क्रूर। वे भुने हुए जौ और मछली खाते हैं और उनके घर में पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, चाचा, पुत्री, दामाद, भाई, पौत्र, मित्र और अतिथि, नौकर-चाकर और दास-दासियाँ, स्त्री-पुरुष एक साथ रहते हैं, गोमांस और लहसुन वाली मदिरा पीते हैं, कभी रोते हैं, कभी हँसते हैं और अश्लील बातों और गीतों में आनंदित होते हैं... उनकी स्त्रियाँ मदिरा के नशे में नग्न होकर नृत्य करती हैं... वे गोरे रंग और लम्बे कद की, कम्बल ओढ़े, निर्लज्ज और पवित्रता के नियमों के पालन में ढिलाई बरतने वाली होती हैं। हिमालय , गंगा, यमुना, सरस्वती और कुरुक्षेत्र के क्षेत्रों से निष्कासित बाह्कोंल से बचना चाहिए। बाहीकों की रचना प्रजापति ने नहीं की थी, जो रूढ़िवादी आर्यों के रचयिता थे ।

__

 वे पिशाच दम्पति, बहि और हीक, की संतान हैं , जो बिपासा नदी के तट पर रहते थे। (ब्यास) उनके अपने बेटे नहीं, बल्कि उनकी बहन के बेटे उनके उत्तराधिकारी बनते हैं।

" सकल नाम का एक नगर है और अपगा नाम की एक नदी है जहाँ बाह्लीकों का एक वर्ग रहता है, जिन्हें जात्रिक कहा जाता है । उनका चरित्र बहुत ही निंदनीय है... उनकी स्त्रियाँ... खुलेआम हँसती और नाचती हैं, ऊँट या गधे जैसी ऊँची और कर्कश आवाज़ में अ

श्लील गीत गाती हैं। वे विशेष रूप से उत्सव के अवसरों पर बहुत ही बेलगाम और उद्दंड हो जाती हैं, जब वे नाचती और चिल्लाती हैं, एक-दूसरे को "हे अभागिनी, पति का वध करने वाली" आदि कहती हैं। वे अंधाधुंध प्रेम-प्रसंग रचती हैं । वे दुराचारी और अनैतिक बर्बर हैं जो धर्म के किसी भी नियम का पालन नहीं करते। वे ( मद्रादि ) व्यर्थ ही जन्म लेते हैं जो मुर्गे, गाय, गधे, ऊँट, भेड़ का मांस मिट्टी, पत्थर और लकड़ी के बर्तनों में नहीं खाते और घोड़ी, ऊँट, गधे और भेड़ का दूध नहीं पीते। वे


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 42 का अंतय


अपना पेशा बदलते हैं। बाहिकों में , व्यक्ति पहले ब्राह्मण बनता है, फिर क्षत्रिय, फिर वैश्य, फिर शूद्र या नाई, फिर ब्राह्मण और फिर दास। महाभारत में वर्णित शास्त्रीय युग में पंजाब के लोगों की यही तस्वीर है । जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, डॉ. बुद्ध प्रकाश का मत है कि "विदेशी जर्तिकों या जर्तों का मद्रों के साथ मिश्रण मद्रों के पतन का कारण बना, जिन्हें रूढ़िवादी लोगों की नज़र में नुकसान उठाना पड़ा।" चूँकि उनके चरित्र के पतन का दोष जर्तों या जर्तिकों पर लगाया जाता है , इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ज़िम्मेदारी उन पर आती है और उनका चरित्र, ज़ाहिर है, बेहतर नहीं हो सकता है।

सिद्धांत के आलोचकों

इस सिद्धांत के मुख्य आलोचक, जिन्होंने इसे खारिज कर दिया है, वे हैं प्रो. कानूनगो 20, ठाकुर देश राज 21 , चौ. निरंजन सिंह 22 , डॉ. गिरीश चंद्र द्विवेदी 23 , वाईपी शास्त्री 24 ।

कानूनगो इस सिद्धांत पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि " केवल दो नामों की ध्वनि की समानता के आधार पर जाटों की पहचान जर्तिकों के साथ करना बहुत ही भ्रामक है, कि जर्त या जर्तिका , चौड़े या मध्यम सिर वाले पिशाच भाषी विदेशी आर्य, दीर्घशिरस्क जाटों के पूर्वज नहीं हो सकते , कि जाट, बाहिकों के विपरीत , हिंदुओं के कुछ पारंपरिक अनुष्ठानों का पालन करते हैं", कि जाट अंतर्विवाही बाह्लीकों के विपरीत बहिर्विवाही हैं, कि जाट समाज में किसी भी मामले में बहन के बेटे को अपने बेटों की तुलना में वैध उत्तराधिकारी नहीं माना जाता है, कि यह सबसे कम संभावना है कि एक महत्वहीन जर्तिका जनजाति का नाम, जो अपने अनैतिक चरित्र और आचरण की अशुद्धता के लिए कुख्यात है, अफगानिस्तान से मालवा तक देश के बड़े हिस्से में रहने वाले लाखों जाटों द्वारा अपनाया जाए , और अंत में, कि किसी भी जाट जनजाति को सकला के साथ कोई संबंध याद नहीं है ; बल्कि, वे यह मानते हैं कि उनके पूर्वज भारत के आंतरिक भाग से थे"। अनुभव से पता चलता है कि जाट , पुरुष उत्तराधिकारी के अभाव में, बेटी या बहन के बेटे को उत्तराधिकारी के रूप में अपनाते रहे हैं। लेकिन यह उनके साथ कभी भी नियमित प्रथा नहीं थी। अपवाद हमेशा नियम को सिद्ध करता है। यह भी स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि क्रॉस-कजिन विवाह, जो कि टॉटमैन 24 ए के अनुसार , "द्रविड़ समुदायों की एक चिह्नित विशेषता" रही है, जाटों को कभी पसंद नहीं आई । ठाकुर देश राज ने जाटों की जार्तिकों से कथित उत्पत्ति पर हमला करते हुए दावा किया कि कर्ण के समय पंजाब में न तो इस नाम की कोई जनजाति थी और न ही साकल नाम का कोई शहर था । अगर हम कनिंघम की साकल की अनुमानित पहचान को छोड़ दें , तो ( ह्यून त्सांग, सियालकोट के तथाकथित शी-की-लो ) को संकला या सांगला या


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 43 का अंत


संगालावाला टीबा ( प्राकृत में सागाला ), हम वास्तव में पाते हैं कि पाणिनि 26 (IV. 2. 75) के अनुसार यह कथोई 26a ( झंग जिले में कथस ) का एक किलाबंद गढ़ था , न कि जार्तस और मद्रास का ।

हालाँकि, ठाकुर देश राज का दावा है कि उस समय सकला का अस्तित्व नहीं था। महाभारत का दावा असत्य प्रतीत नहीं होता। यदि यह नगर छठी शताब्दी ईसा पूर्व से पहले अस्तित्व में होता, तो यह पूर्ववर्ती लेखकों की पैनी नज़र से बच नहीं पाता। महाभारत के अंतिम वाचक सौति उग्रश्रवा द्वारा उल्लिखित नगर और शहर सामान्यतः उस शास्त्रीय युग के हैं, जिसके दौरान सकल नगर अस्तित्व में आया होगा और जिसे उन्होंने महाकाव्य में स्थान दिया था। वेबर 26ब के अनुसार, ऋक् के प्रत्यक्ष संदर्भ में सकल शब्द का "प्राचीनतम उल्लेख " ऐतरेय ब्राह्मण (111.43) में उद्धृत एक स्मारक श्लोक, 'यज्ञगाथा' में मिलता है। लेकिन यह ब्राह्मण महाकाव्योत्तर काल की रचना है। सकल का अगला संदर्भ , जो हमें उपलब्ध है, बौद्ध काल का है, जो मद्रास की राजधानी था  यह संभवतः देशराज के दावे को पुष्ट करता है। आश्चर्य की बात यह है कि फाहियान ने भी इस शहर का नाम नहीं बताया है।

ठाकुर देश राज का यह तर्क कि जर्टिका जनजाति का उद्भव (वास्तविक महाकाव्य युद्ध की अवधि से बहुत बाद का) है, हल्के में नहीं लिया जा सकता। कभी-कभी जर्ट या जर्टिका को जर्तृका भी लिखा जाता है, जो संभवतः जर्त्री से व्युत्पन्न है। हम ऋग्वेद (1,142, 1-2) में वर्णित एक शृंगा जरित्री या जरीता के बारे में जानते हैं । लेकिन यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि क्या जर्ट इस ऋग्वैदिक ऋषि से जुड़े हैं। यदि किसी भी तरह से, वे थे, तो हमें कहना होगा कि वे सौति के प्रकोप और दंश से बच नहीं सकते थे, अन्यथा वे इतिहास में एक क्षत्रिय की कलंकरहित संतान के रूप में दर्ज हो जाते। ऋषि की कलंकरहित संतान के रूप में दर्ज हो जाते। वर्तमान महाभारत का साहित्यिक पूर्वज मूल "जय" नामक एक लघु महाकाव्य है, जो "भारत" में परिणत हुआ और जो आगे के संवर्द्धन और अंतर्वेशनों के साथ वर्तमान विस्तृत "महाभारत" में विकसित हुआ। ठाकुर देश राज का मानना ​​है कि जर्तिकों का उल्लेख पूर्व संस्करणों (जय और भरत) में नहीं मिलता। उनका उल्लेख केवल महाभारत में मिलता है । रॉबर्ट शेफर , जिन्होंने 1452 ईस्वी से 1879 ईस्वी तक महाभारत के विभिन्न संस्करणों में वर्णित जनजातियों के नृवंशविज्ञान का गहन अध्ययन किया , जिसमें "आलोचनात्मक संस्करण" भी शामिल है, उन्हें कहीं भी जर्तिकों या जर्तों का उल्लेख नहीं मिलता। यदि हम सी.वी. वैद्य मिराशी और अन्य द्वारा बताई गई 3102 ईसा पूर्व की तिथि को महाकाव्य युद्ध की तिथि मानते हैं और बुद्ध प्रकाश पर भरोसा करते हैं, तो कौन हमें यह विश्वास दिलाएगा कि जर्तिक या जर्तिक प्रकट हुए थे।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 44 का अंत


पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व की शुरुआती शताब्दियों के ऐतिहासिक परिदृश्य पर, यानी महाकाव्य युद्ध (3102 ईसा पूर्व) से दो हज़ार साल बाद, ठाकुर देश राज के कथन को निर्विवाद रूप से सही मानने के हर कारण मौजूद हैं। रॉबर्ट शेफर को 1879 तक लिखे गए महाभारत के किसी भी संस्करण में जर्तों या जर्तिकों का उल्लेख नहीं मिलता, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उन्हें इस तिथि के बाद महाकाव्य में शामिल किया गया होगा।

चौधरी निरंजन सिंह, जिनके विचार में जर्तिका एक व्यक्ति थे, या तो एक योद्धा या एक राजा, आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि क्या सीवी वैद्य जाटों के जीवन के हर पहलू पर गंभीरता से विचार करने के बाद भी उन्हें जर्तिकाओं का वंशज मानते । डॉ. जीसी द्विवेदी, जिनके अनुसार " जर्तिका , जंगली लोग, कभी भी सरल, विवेकशील और अपेक्षाकृत सुसंस्कृत जाटों के पूर्वज नहीं हो सकते ", इस सिद्धांत को खारिज करने में लगभग क़ानूनगो के साथ खड़े हैं । वाईपी शास्त्री के अनुसार, "सीवी वैद्य, उत्तर के जाटों के जीवन से अनभिज्ञ होने के साथ-साथ उन राजपूतों से प्रभावित थे जो जाटों को पतित मानते थे, जाटों को जर्तिकाओं से जोड़कर, खुद को पक्षपाती और पक्षपाती इतिहासकार साबित करते हैं।"


जाट इस बेतुके और घृणित सिद्धांत को खारिज करने के लिए उपरोक्त विद्वानों के ऋणी हो सकते हैं, फिर भी यह कहा जा सकता है कि इस सिद्धांत पर उनका विचार पर्याप्त गहराई तक नहीं जाता और इसकी निंदा करने के लिए उनके तर्क अपर्याप्त हैं क्योंकि उनमें से प्रत्येक इस बेतुके सिद्धांत के एकमात्र स्रोत के रूप में महाभारत की प्रामाणिकता की जाँच करता है। ठाकुर देशराज को छोड़कर, सभी ने महाभारत में मद्रों की एक जनजाति के रूप में जार्तिकों के समावेश को प्रामाणिक माना है। देशराज सहित, वे सभी एक समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ के रूप में महाकाव्य की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने में विफल रहे, जिसे उन लेखकों द्वारा बार-बार संशोधित किया गया था, जिन्होंने अपने धार्मिक निहित स्वार्थों के कारण, उस समय हमारे देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में सरस्वती नदी के पार रहने वाली योद्धा जनजातियों का वर्णन करते समय निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता । उनमें से किसी ने भी जातीय जानकारी के स्रोत के रूप में महाकाव्य की प्रकृति की जाँच नहीं की है। हमारे विचार से, ऐसा मूल्यांकन सीवी वैद्य और बुद्ध प्रकाश के तर्कों का खंडन करने के लिए अपरिहार्य है। महाकाव्य के युगों-युगों में विकास के समकालीन साक्ष्यों को नज़रअंदाज़ करने का दोष उन पर भी समान रूप से है। प्राचीन काल के सामाजिक चित्र पर एक टिप्पणी के रूप में महाकाव्य की प्रामाणिकता पर अंधविश्वास करना अवैज्ञानिक है, क्योंकि इसकी टिप्पणियाँ पक्षपातपूर्ण हैं और इसकी व्याख्याएँ गहरे जातीय पूर्वाग्रहों से प्रभावित हैं।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 45 का अंत


जातीय इतिहास के पुनर्निर्माण के स्रोत के रूप में महाभारत

यह अब एक खुला रहस्य है कि महाभारत के लेखकों ने , जैसा कि हम जानते हैं, महाकाव्य को संशोधित करने और उसमें क्षेपक जोड़ने में अपनी स्याही खर्च कर दी थी। हम पहले ही महाकाव्य के इतिहास का संक्षिप्त विवरण दे चुके हैं; आइए अब इसे और विस्तार से प्रस्तुत करते हैं। प्रारंभ में, इस महाकाव्य की रचना युद्ध के एक प्रत्यक्षदर्शी और समकालीन, कृष्ण-द्वैपायन व्यास ने की थी, और इसे "जय" नाम दिया गया था जिसमें 8800 श्लोक थे। इसके बाद, व्यास के शिष्य, वैशम्पायन, जो अर्जुन के पुत्र जनमेजय के समकालीन थे, ने इसे संशोधित किया और इसे "भारत" नाम दिया गया जिसमें 24000 श्लोक थे। अंत में, लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रशर्व ( अशोक के समकालीन) ने इसे अपने वर्तमान विशाल रूप में विस्तारित किया , और इसे "महाभारत" नाम दिया जिसमें लगभग 100000 श्लोक हैं । एक अन्य अधिकारी (राजा राव) के अनुसार इसमें 2,14,778 श्लोक हैं । 19वीं शताब्दी ईस्वी तक महान महाकाव्य में जोड़ और घटाव, संशोधन और विकृति जारी रही, हालांकि मुख्य संशोधन और अंतर्वेशन आरएस त्रिपाठी 30 के अनुसार मुख्य रूप से 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व और 400 ईस्वी के बीच हुए थे " कौरवों और पांडवों के गाथागीत का उपयोग कारवां सराय और शाही अदालतों के लिए एक साथ किया गया था"।

अखन्यसिलस (पौराणिक गायक), वैतालिक (वंशावलीकार) और नरसिम्सी (प्रशंसक, जिन्हें सूत , माग्ध और वंदिना कहा जाता है) ने अपने स्वयं के राजनीतिक और धार्मिक निहित स्वार्थों के साथ-साथ अपने स्वामियों के हितों के साथ जनजातियों और स्थानों के काल्पनिक नामों से देवताओं और अलौकिक राक्षसों, ड्रेगन और दिग्गजों का निर्माण किया। जार्तिकास ऐसी ही एक जनजाति प्रतीत होती है। उन्हें दो राक्षसों, बहि और हिका की संतान के रूप में वर्णित किया गया है । इस तरह की प्रकृति की कई कहानियों की तरह, यह अध्ययन भी महाकाव्य में अज्ञात तिथि पर जोड़ा गया था, शायद उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में। एनके सिद्धहंत 31 ने ठीक ही देखा है कि "वीर काव्य, जो वीरता और कौशल के कार्यों से ग्रस्त था, उसका नायक या औसत व्यक्ति के परिवार या घरेलू जीवन की तस्वीर से बहुत कम लेना-देना था"। इसलिए, महाभारत द्वारा इस प्रकार प्राप्त विशाल चरित्र हमें असली और नकली में अंतर करने की बहुत कम गुंजाइश छोड़ता है।

तथ्य यह है कि कर्ण , जो क्षत्रिय नहीं था , सौति आदि का प्रवक्ता था, उसे काल्पनिक ब्राह्मण यात्रियों का उपयोग करने के लिए मजबूर किया गया, जिन्होंने बदले में, झूठे आरोपों के साथ सभी प्रकार की गंदी बातें कहीं 


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 46 का अंत


राक्षसों और रक्षसियों का निर्माण किया 34। इस तरह की वृद्धि महाभारत की विश्वसनीयता को बहुत कम कर देती है , विशेष रूप से मध्यदेश के बाहर रहने वाले क्षत्रिय जनजातियों की प्रस्तुति में । "जय" शब्द "भारत" में विकसित हुआ और इसे "महाभारत" में बढ़ा दिया गया क्योंकि इसमें बहुत हद तक बेतुके ढंग से बनाए गए उपाख्यानों को चतुराई से जोड़ दिया गया था, ताकि अपने गौरवशाली काल में बौद्ध धर्म का मुकाबला किया जा सके और पंजाब और सिंध के लगभग सभी क्षत्रिय जनजातियों की निंदा की जा सके जिन्होंने नए धर्म को अपनाया था 35। बौद्ध धर्म के अभूतपूर्व प्रसार का कम से कम एक कारण यह था कि भगवान बुद्ध एक साथी थे । से कम एक कारण यह था भगवान क्षत्रिय थे, उस काल के मार्टिन लूथर या स्वामी दयानंद, जो वैदिक धर्म के रूढ़िवादी चैंपियनों द्वारा क्षत्रियों के शोषण के खिलाफ खड़े हुए थे।


दिलचस्प बात यह है कि वेबर भी अपने तरीके से इसकी जोरदार पुष्टि करते हैं, ब्राह्मणवादी और वैदिक दृष्टिकोणों के बीच अंतर करते हुए, वैदिक दृष्टिकोण में बौद्ध धर्म को स्थान देते हैं। उनके अनुसार, " सिंधु नदी के तट पर सिकंदर द्वारा पाई गई जातियाँ और जनजातियाँ पूरी तरह से वैदिक आधार पर खड़ी प्रतीत होती हैं, न कि ब्राह्मणवादी आधार पर। वास्तव में, यह सच है, लेकिन हमें इससे भारत के संबंध में कोई भी निष्कर्ष निकालने का औचित्य नहीं होना चाहिए। क्योंकि पंजाब के इन लोगों ने कभी भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अधीन नहीं हुए, बल्कि हमेशा अपने प्राचीन वैदिक दृष्टिकोण को बनाए रखा, स्वतंत्र और स्वतन्त्र, बिना किसी पुरोहिती प्रभुत्व या जाति व्यवस्था के। इसी कारण से, वे अपने उन रिश्तेदारों की ओर से भी हार्दिक घृणा के पात्र थे, जो आगे चलकर भटक गए थे, और इसी कारण से बौद्ध धर्म ने भी उनके बीच आसानी से प्रवेश किया।" वे आगे बताते हैं कि सप्त सिंधु से " हिंदुस्तान के सुंदर इलाकों" की ओर पलायन क्यों हुआ और प्रवासियों का अपने पैतृक घर और उसके लोगों के प्रति हमेशा कैसा रवैया रहा। "श्वेत यजुस के ब्राह्मण में संरक्षित एक किंवदंती के अनुसार, पुरोहित इस आंदोलन के बहुत बड़े कारण थे, क्योंकि वे राजाओं पर, उनकी इच्छा के विरुद्ध भी, अपने धर्मशास्त्र थोपते थे (वेबर का इंडिशे स्टुडियन, खंड 1, पृष्ठ 178)। सिंधु पर स्थित पैतृक घर के साथ संबंध , बेशक, पहले बहुत करीबी रहा; हालांकि, बाद में, जब हिंदुस्तान में नया ब्राह्मणवादी संगठन पूरी तरह से मजबूत हो गया।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 47 का अंत



इसमें कटुता का प्रबल तत्व समा गया था, क्योंकि ब्राह्मण अपने उन पुराने रिश्तेदारों को, जो अपने पूर्वजों की रीति-रिवाजों के प्रति सच्चे रहे थे, धर्मत्यागी और अविश्वासी मानते थे  "

महाभारत में संशोधित कथाओं को जोड़ने का उद्देश्य "आर्यवाद की चीखों को प्रबल करना" था, जिसका ' बौद्ध धर्म से टकराव' हुआ था। बौद्ध धर्म अपनाने वाले गणतंत्रीय कबीलों की इस महाकाव्य में उन लेखकों द्वारा निंदा की गई जो राजतंत्र और ब्राह्मणवाद के अनुयायी थे। कर्ण को शल्य और उसके देशवासियों को एक अत्यंत निंदनीय तीखा प्रहार करते हुए दर्शाया गया है , जो शल्य के प्रत्युत्तर में था, जिसने युधिष्ठिर के कहने पर कर्ण को अशक्त करने का प्रयास किया था । सीवी वैद्य 36 भी इस घटना को न केवल हास्यास्पद मानते हैं, बल्कि एक क्षेपक भी मानते हैं। यदि ऐसा है, तो सभी श्लोकों में तीखापन समाहित है। भी इस घटना को न केवल हास्यास्पद मानते हैं, बल्कि एक क्षेपक भी मानते हैं। यदि ऐसा है, तो कर्ण पर्व में शल्य के देशवासियों के प्रति कर्ण क्षेपक होने की समान रूप से संभावना है।

मद्रास के बारे में कुछ तथ्य

इस सिद्धांत का खंडन करने के लिए महाकाव्य में निहित प्रमाणों की कोई कमी नहीं है। महाकाव्य समाज में प्रचलित उच्च आदर्श सदैव ईर्ष्या के पात्र बने रहेंगे। सामान्यतः स्त्री को, माँ के रूप में, "पृथ्वी से भी अधिक भारी" माना जाता था; पत्नी के रूप में, पूज्य को, "घर का पवित्र दीपक" माना जाता था, और पुरुष को, पिता के रूप में, "स्वर्ग से भी ऊँचा" माना जाता था; पति के रूप में, "देवताओं से भी ऊँचा"। पश्चिम की वीरगाथाओं में हमें माँ के प्रति ऐसी श्रद्धा का कोई उदाहरण नहीं मिलता जो केवल हमारे महाकाव्य में ही पाई जाती है। मद्रों ने अपनी पूरी सेना, अपने राजा शल्य और अपने पुत्र रुक्मरथ को कर्ण के लिए बलिदान कर दिया, जो उन पर झूठा मित्र होने का आरोप लगाता है और उनके चरित्र-हनन का ऐसा अभ्यास करता है जो कहीं भी अद्वितीय नहीं है। शल्य अपना स्व-लगाया कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाते हैं, आवश्यकता पड़ने पर कर्ण की रक्षा और सहायता करते हैं । महाभारत को साहित्यिक कृति मानने के बावजूद , कर्ण का अपने कुल के विरुद्ध तीखा प्रहार , एक क्रोधित योद्धा के उद्गार से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकता। आख़िरकार, जाति-गर्वित भीष्म ने शल्य की बहन को स्वीकार किया था , माद्री को पांडु की पत्नी के रूप में । फिर मद्रों का इतना पतन कैसे हो सकता है ?

बाहिक और व्रात्य कहे जाने वाले मद्रों ने वैदिक विद्या के विशेषज्ञ, मरागर सौंगायनी और कपय पात्र-चाल जैसे प्रसिद्ध शिक्षकों को जन्म दिया । उन्होंने यजुष, चरक और जीवक जैसे प्रसिद्ध चिकित्सकों को भी जन्म दिया ; और प्रसिद्ध 'संस्कृत व्याकरण के जनक' पाणिनि को भी जन्म दिया। मद्र स्त्रियाँ थीं


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 48 का अंत


उम्मीद की जाती है कि उन्होंने अपनी उत्तराधिकारी मां, वुसिताश्व की पत्नी भद्रा का अनुकरण किया होगा । मद्रों में मालवी ( मल्लवों की) जैसी महिलाएं, मद्र राजा अश्वपति की पत्नी माद्री , जिसे गलती से बाह्लीकी कहा गया, दो पांडवों , नकुल और सहदेव की मां, अच्छे चरित्र के उल्लेखनीय उदाहरणों का प्रतीक थीं, और सत्यवान की पत्नी, मद्र राजा अश्वपति की बेटी सावित्री भी थीं। ये सभी हिंदू किंवदंतियों और ज्ञान में अपने गुणों और अच्छे स्वभाव के लिए प्रसिद्ध हैं। यह वह महान जनजाति है, जिसका जीवन के सभी क्षेत्रों में इतना शानदार रिकॉर्ड है, जिसे किसी इंटरपोलर ने कर्ण के आधार पर अपमानित किया है। जातीयता स्थापित करने के स्रोत के रूप में इस तरह के महाकाव्य की क्या प्रामाणिकता हो सकती है?


यदि कर्ण पर्व में दिए गए आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई होती, तो मगध के महातीथ नामक ब्राह्मण गांव के पिप्पली मानवक के माता-पिता ने कभी भी उसके लिए "असाधारण सुन्दरता वाली स्वर्ण प्रतिमा के समान" दुल्हन की खोज हेतु दूतों को मद्रदेश, जो कि शापित भूमि थी, नहीं भेजा होता, जहां उन्हें भद्र कपिलानी, 43 में एक दुल्हन मिली , जो अपनी चमक और सुंदरता में उस प्रतिमा से भी अधिक थी। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि गंगा क्षेत्र के ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बारे में कहा जाता है कि 44 "उस काल में उच्च शिक्षा, यज्ञ (ब्राह्मण मंत्रोच्चार), उचित आर्य शिष्टाचार, चिकित्सा और शुद्ध संस्कृत के लिए, वाचिकों की भूमि पर गए थे । उनके तुतलाते उच्चारण, खराब वाक्यविन्यास, देहाती उच्चारण और अक्सर बिल्कुल असभ्य शब्दावली के बावजूद, गंगा क्षेत्र के इन शिष्यों को वाचिकों ने उनकी जाति और वंश की बहुत अधिक जांच किए बिना अच्छे शिष्यों के रूप में स्वीकार कर लिया था।" यह कौषीतकी ब्राह्मण (7.6) के कथनों द्वारा स्पष्ट रूप से समर्थित है, अर्थात्, जो लोग सर्वोत्तम वाणी सीखना चाहते हैं, वे उत्तर-पश्चिम (वाचिकदेश) जाएं, क्योंकि यह केवल वहीं बोली जाती है 44a । यह कर्ण के तीखे प्रहार से मेल नहीं खाता, क्योंकि यदि वह जो कहता है वह सत्य है, तो मध्यदेश के ऋषि इस अंधकारमय भूमि पर हर विज्ञान का अध्ययन करने के लिए नहीं आते। कर्ण प्रकरण में जाटों के पूर्वजों , अर्थात् पंजाब और सिंध के क्षत्रिय जनजातियों को बाहरी ( वाहिका) बताने का सचेत प्रयास किया गया है। ) और पतित ( व्रात्य ) बताने का एक सचेत प्रयास प्रतीत होता है, मानो दुनिया की सारी बुराइयाँ उन्हीं के कारण थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह उन कबीलों को नीचा दिखाने की एक बड़ी प्रवृत्ति का हिस्सा है जिन्होंने ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को चुनौती देने में स्वतंत्र भावना दिखाई। यह उन लोगों को बदनाम करने के एक जानबूझकर चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है जिनमें ब्राह्मणवाद का विरोध करने और उसे अस्वीकार करने का सामान्य ज्ञान और साहस था।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 49 का अंत


बाहिक और व्रात्य के अर्थ

बाहिक या वाहिका के अर्थों की सावधानीपूर्वक जाँच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। बाहिक को कभी-कभी वाहिका या वाहीक के पर्याय के रूप में बहलिका या वाह्लिका समझ लिया जाता है । ( बाह्लिक या वाह्लिक वास्तव में गांधार देश के निवासी थे )। जातीय अर्थ में इसका अर्थ है, बाहरी या औपचारिक आचरण में अधार्मिक व्यवहार करने वाला पंजाब के लोग । इन शब्दों (बाह या वाह) के मूल का अर्थ है ले जाने वाला, धारा, सरिता, नर नदी। इसमें कोई बड़ी असंभवता नहीं है कि महाभारत के अंतर्वेशनकर्ताओं और फलस्वरूप बाद के सूत्रकारों ने क्षत्रिय जनजातियों को बाहरी या विदेशी बताकर उनकी निंदा करते हुए इस शब्द के अर्थों का अपनी सुविधानुसार उपयोग किया हो, अन्यथा, शब्द का मूल इस संदेह की हर छाया को दूर कर देता है कि इसका अर्थ है- नदियों का देश और उसके निवासी, वाहिका । केपी जायसवाल 47 भी हमारे तर्क का समर्थन करते हैं जब वे कहते हैं कि " वाहिका शब्द के महत्व पर अभी तक विचार नहीं किया गया है, क्योंकि इसका अर्थ नदियों का देश है और इस प्रकार, वाहिका-भूमि में सिंध घाटी और पंजाब शामिल होंगे ।" अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि क्षत्रिय जनजातियाँ, जो सप्त-सिंधु या वाहिकादेश में अपने गण-संघों के साथ रहती थीं , निस्संदेह मध्यदेश के संदर्भ में विदेशी थीं, लेकिन निश्चित रूप से विदेशी नहीं थीं क्योंकि उन्हें शास्त्रीय संस्कृत में प्रस्तुत करने के प्रयास चल रहे थे। डॉ. आरएस त्रिपाठी 48 वाहिकाओं की भूमि के संबंध में भी यही मत रखते हैं 


जहाँ तक प्राचीन 'कलम और प्रेस के उस्तादों' द्वारा वाहिकदेश के गणतांत्रिक क्षत्रिय कबीलों के लिए प्रयुक्त अपमानजनक विशेषण व्रात्य के स्पष्टीकरण का प्रश्न है, हमें फिर से इस शब्द के अर्थों की सहायता लेनी होगी। आपस्तम्ब 49 और पारस्कर 50 ने उपनयन संस्कार न करने के कारण उन्हें व्रात्य कहा है । मनु 51 और याज्ञवल्क्य 52 ने उन्हें गायत्री या सावित्री-पतिता से पतित माना है, और इस प्रकार, आर्य समाज के दायरे से बाहर । बौधायन 53 उन्हें वर्णशंकर कहते हैं । अतः, उन्हें न तो वेद पढ़ाए जाने थे, न ही समारोहों या बलिदानों में भाग लेने की अनुमति थी और उनके साथ सामाजिक मेलजोल वर्जित था 54। पतंजलि 55 के लिए वे अकुशल कारीगर थे। डांगे 56 के लिए वे कृषक थे और ब्लंट 57 के लिए वे द्विज आर्यों के वंशज थे ।

ब्लंट और डांगे के कथनों को छोड़कर, उपरोक्त लेखकों द्वारा दिए गए सभी अर्थ कर्ण पर्व में सौति और अन्य लोगों द्वारा वाहिका जनजातियों की निंदा करने के लिए प्रयुक्त किए गए हैं।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 50 का अंत


महाभारत इस उक्ति को भूल गया कि "साक्ष्य जितना पुराना होता है, वह उतना ही अधिक विश्वसनीय और निष्पक्ष होता है"। पाणिनि 58 हमें बताते हैं कि व्रात्य वे लोग थे जो व्रात्स ( संघ ) में रहते थे या उससे संबंधित थे । कात्यायन 59 और सायण 60 के अनुसार श्रीनि , पुग , गण ; संघ और व्रात का अर्थ समूह और वर्ग है , लेकिन कात्यायन 61 के अनुसार वे अपने राजनीतिक संगठन में पिछड़े हुए थे (क्योंकि वे राजन्यक नहीं थे )। तांड्य महाब्राह्मण 62 उन्हें आश्रितों के रूप में मानता है , जिन्हें देवताओं ने पृथ्वी पर छोड़ दिया था जो स्वर्ग लोक में चले गए थे; इसका अर्थ है कि वे लोग गांवों में उन लोगों द्वारा पीछे छोड़ दिए गए थे जो शहरी केंद्रों में चले गए थे जहां जीवन की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हो सकती थीं। पाणिनि का 63 दावा है कि उनके नेता को ग्रामणी कहा जाता था सबसे बढ़कर, ऋग्वेद में सामाजिक इकाई के लिए व्रत एक विशेष शब्द है , जो भाषाविज्ञान की दृष्टि से भ्रातृ से जुड़ा है , और स्पष्टतः इसका अर्थ भाईचारा है (ऋग्वेद 1.163.8 और IX. 14.2) 63a । वास्तव में , व्रात्य गैर-ब्राह्मण आर्य थे , जो ब्राह्मणवाद की परिधि से बाहर रहते थे, और जिन्होंने रूढ़िवादी पंथ का खुलकर विरोध किया (वेबर, 1914, 110 पृष्ठ)।

व्रत-गण-संगना या समूहों (लोकतांत्रिक गणराज्यों और संघों) में रहने वाले क्षत्रिय जनजातियों को उन सभी निंदनीय बातों के लिए उपहासित और फटकारा गया, जिनके बारे में सोचा जा सकता था  वैदिक धार्मिक परंपरा के तथाकथित सामाजिक रूप से उन्नत अनुयायी यह भूल गए कि व्रात्यों के प्रति तिरस्कार प्रदर्शित करते हुए , "वे वैदिक आर्यों की प्राचीन संस्था की निंदा कर रहे थे और उनके अपने पूर्वज भी सुदूर अतीत में व्रात्यों के बीच निवास करते थे, अन्यथा वे कभी स्वर्ग से अवतरित न होते। व्रात-गणों की मुख्य विशेषता यह थी कि उनके पास कोई निजी संपत्ति नहीं थी, कोई वर्ग नहीं था, कोई दासता नहीं थी और कोई शोषण नहीं था ।64 इसलिए, राजतंत्र के पक्षधर कौटल्य और महाभारत द्वारा उनके प्रति घृणा चरम पर पहुँच गई, हालाँकि वेदों में उनकी बहुत उच्च प्रतिष्ठा थी। वैदिक ऋषियों ने व्रात्यों के प्रति प्रतिकूल दृष्टिकोण रखने के बजाय, उनकी महिमा का गान किया। अथर्ववेद 65 , उनकी महिमा को एक भव्य ब्रह्मांडीय पैमाने पर व्यक्त करता है, और आर्यों का सबसे पहला और सबसे प्रमुख ग्रंथ ऋग्वेद 66 भी व्रात्यों को एक विशिष्ट महिमा प्रदान करता है। और गणों ।

दासता काल के लेखकों और राजतंत्र के समर्थकों ने वाहिका-देश व्रत-गणों के लिए सबसे बुरे वर्णन सुरक्षित रखे । जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, वाहिका और मद्र पुरुष बारी-बारी से अपना वर्ण बदलते थे। इसे संस्कृति के पैरोकारों द्वारा पाप माना जाता था।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 51 का अंत



दास-स्वामी, जो अपने शूद्र दासों की पीठ पर सवार होकर, सारे सुख और स्वतंत्रता पर अपना एकाधिकार करना चाहते थे। आरसी जैन 61 हमें सूचित करते हैं कि व्रत शब्द 'वृ' से बना है जिसका अर्थ है चुनना, चयन करना, किसी से बेहतर पसंद करना, पसंद करना, (मोनियर-विलियम्स, संस्कृत अंग्रेजी शब्दकोश, पृष्ठ 1007 भी देखें)। इस प्रकार, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्रत्य, व्रत-गणों के स्वतंत्र वर्गहीन समाज को प्राथमिकता देते थे, जिसमें उनके सदस्यों को, रूढ़िवादी वर्ग-ग्रस्त समाज के विपरीत, व्यक्तिगत और सामाजिक तथा राजनीतिक उन्नति के समान अवसर प्राप्त थे। व्रतियों की यह जीवन-शैली ब्राह्मणवादी जीवन-नियमों का पालन नहीं करती थी, बल्कि उनका विरोध करती थी। व्रात्य ( ग्रामणी ) उत्तर वैदिक वृत्त ( यमुना और गंगा के बीच ब्रह्मव्रत अंतरवेदी ) के बाहर के आर्य होने के कारण हमेशा रूढ़िवादी वैदिक आर्यों और उनके पुजारियों के खिलाफ थे ।67a । व्रात्य अपने स्वयं के यज्ञ और बलिदान भी करते थे, जिसमें उनके नेता भी भाग लेते थे , 68 लेकिन तब भी उन्हें अशुद्ध और बर्बर बताया जाता था, जो ब्राह्मणवाद की परिधि से बाहर रहते थे। वे अपने स्वयं के व्रत का पालन करते थे, लेकिन तब भी उन्हें विधर्मी के रूप में निंदित किया जाता था। अथर्वोपनिषदों में व्रात्य शब्द का प्रयोग "स्वयं में शुद्ध" के अर्थ में सर्वोच्च सत्ता को दर्शाने के लिए किया गया है और संभवतः यह ब्राह्मण-विरोधी बौद्ध शिक्षकों को संदर्भित करता है। इसलिए, इसमें कोई संदेह नहीं है कि मध्यदेश में जाति व्यवस्था की उभरती कठोरता और वाहिकदेश के व्रात्य क्षत्रिय जनजातियों द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने के साथ, वे ब्राह्मणों के हमलों का शिकार हो गए और उन्हें कलंकित किया गया। अब्राह्मण आर्य , और इसलिए, 'पतित'। संक्षेप में कहें तो, उन्होंने वाहिकदेश के क्षत्रियों की प्राचीन संस्थाओं, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को कलंकित और अपमानित किया ।

व्रत भारत में आर्य गणों का एक जनजातीय संघ था , जो अन्य मूल निवासियों पर उनकी सैन्य विजय के दौरान और उसके बाद अस्तित्व में आया । ऋग्वेद में इन्हें पंचव्रत कहा गया है । सायण के पंचज्ञ मनुष्य कौन हैं? विल्सन की 'पाँच समान बलि प्रजातियाँ' भी हैं । पार्जिटर भी अनिच्छा से इन्हें ययाति के वंशज पाँच प्रजातियों के रूप में पहचानते हैं , जिनका वास्तव में संपूर्ण पृथ्वी पर प्रभुत्व था। ऋग्वेद के पंचव्रत या विल्सन और पार्जिटर की पाँच प्रजातियाँ निस्संदेह यदु, तुर्वत्सु, द्रुह्वु, अनु और पुरुस थीं, जैसा कि जिमर ने भी पुष्टि की है। वे आर्यों की ऐल प्रजाति के रूप में जाने जाते थे । यह ध्यान देने योग्य है कि अनाव अनु के वंशज थे , जिनके दो पुत्र उशीनर और तितिक्षु थे । प्रथम की संतानें सिविस थीं थीं ,


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 52 का अंत


सिंधु , सौवीर , कैकेय , मद्रास , वाहिक (सभी जाटों के पूर्वज ) जिन्होंने पंजाब और सिंध पर प्रभुत्व किया , वे तित्क्षु के अपने पुत्र बलि के माध्यम से अंग , वंग , कलिंग , पुंड्र और सुह्मा थे ; जिन्होंने पूर्वी बिहार , बंगाल और उड़ीसा पर प्रभुत्व किया। 77 इसलिए आर. शेफर (1954) द्वारा पूर्वी और पश्चिमी अनावों के साथ उनकी नृवंशविज्ञान संबंधी पहचान, महाभारत के लेखकों ने उत्तर के चीन , किरात , खास , शक , वसाति , लिच्छवि , मल्ल , दक्षिण के करस्कर , महिषक , कलिंग केरल , आंतरिक क्षेत्र के विर्क और कर्कोटक , पश्चिम के सौराष्ट्र के खिलाफ अपना हमला निर्देशित किया , लेकिन उनका मुख्य लक्ष्य पंजाब और सिंध की ऐला - अनव जनजातियाँ थीं । 78 उन्हें उनके गैर-ब्राह्मणवादी विश्वासों और आस्था के कारण व्रात्य और वृषला कहा गया ।

'समय की रात' के बाद से ब्राह्मणवाद के विकास का इतिहास 'रहस्य से ढकी पहेली' को उजागर करता है। ऐतिहासिक प्रकाशन इस अनुमान से भरे पड़े हैं कि ब्राह्मणवाद आर्यों का उदार और सौम्य उपहार है , जो शुरू में ऐसा नहीं था, उपलब्ध साक्ष्य इसकी पुष्टि करते हैं। जैसा कि हम पार्जिटर 79 से जानते हैं , "ब्राह्मणवाद मूल रूप से एक ऐल या आर्य संस्था नहीं थी। ब्राह्मण गैर-आर्यों से जुड़े थे और उनके बीच स्थापित थे। ऐला , जो स्वयं यज्ञकर्ता थे, वास्तव में ब्राह्मणों का विरोध करते थे। पूर्व और दक्षिण में अनार्यों पर ऐलाओं के विजयी विस्तार ने ब्राह्मणों की स्थिति और प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से प्रभावित किया। ऐलाओं की विजय का लाभ साझा करने के उद्देश्य से जैसा कि मुगलों के अधीन राजपूतों ने किया था, ब्राह्मणों ने ऐला सरदारों के साथ वैवाहिक संबंधों के माध्यम से उन तक पहुँच बनाने का प्रयास किया, जिसने अंततः ब्राह्मणों के धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं को प्रभावित किया। इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि ब्राह्मणवाद ऐला विचारों के अनुसार विकसित हुआ और इसकी उन्नति का अधिकांश श्रेय क्षत्रियों के प्रभाव को जाता है । " ऐलाओं ने , वास्तव में, ब्राह्मणों को भी आर्य बनाया , जैसा उन्होंने अन्य लोगों को बनाया था"। जहाँ तक उत्तर-पश्चिमी वाहिकादेश के वंशजों की निंदा का प्रश्न है , यह स्वाभाविक प्रतीत होता है कि अपने पूर्ववर्ती अनार्य यज्ञमानों की पराजय का बदला लेने के लिए , ब्राह्मणों ने बाद में कोई कसर नहीं छोड़ी, यहां तक ​​कि तलवार भी नहीं, उन्हें नीच दानव , दस्यु , असुर , म्लेच्छ , राक्षस और पिशाच कहकर धिक्कारने के लिए कहा जा सके ।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 53 का अंत


अब शास्त्रीय काल के समकालीन साक्ष्यों की बात करें, जिसके दौरान महाभारत में मुख्य रूप से अंतर्वेशन किया गया था, तो हम जानते हैं कि महाभारत के लेखकों और बाद के लेखकों के दावे को खारिज करना पर्याप्त है, जिन्होंने वाहिका जनजातियों की कमजोर तस्वीर का प्रचार किया था । जनरल चेसनी 80 हमें सूचित करते हैं कि " यूनानियों ने भारतीयों की बहुत प्रशंसा की थी; अपने आठ वर्षों के निरंतर युद्ध में उन्हें कभी भी ऐसे कुशल और वीर सैनिकों का सामना नहीं करना पड़ा था, जो कद-काठी और आचरण में एशिया की अन्य सभी जातियों से श्रेष्ठ थे....भारतीय ग्राम समुदाय उस काल में भी फला-फूला, और उस बहादुर और पुरुषार्थी जाति में, जिसने बाईस शताब्दी पहले पोरस के अधीन इतनी दृढ़ता से युद्ध किया था , हम वर्तमान समय के पंजाबी कृषक लोगों के सभी उत्तम गुणों को पहचान सकते हैं, उस वीर को, जिसने हमारी बारी में हमसे इतनी दृढ़ता से युद्ध किया, और जो अब भारतीय साम्राज्य का सबसे मूल्यवान अंग है, और उसकी महारानी के सर्वश्रेष्ठ सैनिक हैं।" यह संदर्भ, निस्संदेह, बाहिकदेश के "शापित" आयुधजीवी गणों और उनके वंशजों की ओर संकेत करता है, जाटों की ओर संकेत करता है ।

जार्टा पर बाहरी स्रोत

यह उल्लेखनीय है कि कुछ बाहरी स्रोत भी जर्तों पर प्रकाश डालते हैं , लेकिन न तो उन्हें जर्त्तिकों या मद्रासों से जोड़ते हैं , न ही उनकी निंदा करते हैं। प्लिनी 81 , द एल्डर, एक रोमन विद्वान (23-79 ई.) ने ग्राटे ( जर्तों ) को तक्षशिला 82 के पास अमांडा के समतल प्रदेश में बताया है । टॉलेमी 83 ने निचली सिंधु में इंडो-सिथिया के ज़रातोई का भी उल्लेख किया है , जो NLDE 84 के अनुसार जालंधर के पास स्थित है । ये स्रोत पंजाब और सिंध में जर्तों के अस्तित्व को स्थापित करते हैं , लेकिन उनके बारे में कोई नकारात्मक बात नहीं कहते। बल्कि, बाहीकों की "शिष्ट व्यवहार और अच्छे जीवन-शैली 85 " के लिए प्रशंसा की जाती है। स्ट्रैबो 86 और मेगस्थनीज 87 ने उन्हें "सरल और मितव्ययी, व्यवहार में व्यवस्थित, चोरी में आत्मसंयम रखने वाले और बलिदान के अलावा शराब न पीने वाले" पाया। डायोडोरस 88 ने उन्हें "उच्चतम स्तर पर कल्याणकारी कानूनों द्वारा शासित और उनकी राजनीतिक व्यवस्था को प्रशंसनीय पाया; उनके बीच दहेज आदि की तुलना में सुंदरता को सर्वोच्च सम्मान दिया जाता था।" और "इन शहरों ( सांगला) के निवासियों ने या सकला ) के निवासियों को" आम तौर पर "अपने देशवासियों की तुलना में उच्च सम्मान में" रखा जाता है।

फिर भी, हम तीन अन्य समान रूप से महत्वपूर्ण स्रोतों को जानते हैं - अर्थात् मेनाण्डर का मिलिंद-पन्हो (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व), पतंजलि का महाभाष्य और पाणिनि का अष्टाध्यायी (छठी शताब्दी ईसा पूर्व), जो बाहीकों के जीवन और सभ्यता तथा उनके इतिहास पर प्रचुर प्रकाश डालते हैं।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 54 का अंत


पंजाब के लोगों के निवास स्थान, वाहिकदेश , पर आश्चर्य की बात है कि इनमें से कोई भी महाभारत में वर्णित वाहिक जनजातियों के संस्करण की पुष्टि नहीं करता। बल्कि, दो भारतीय विद्वानों और यूनानी-बैक्ट्रियन राजा मेनांडर (संस्कृत या पाली प्राकृत के मिलिंदो 90 ) की रचनाओं में उपलब्ध उनके सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन का वर्णन कर्ण-पर्व के दावे का खंडन करता है। मिलिंदो पन्हो हमें पंजाब के लोगों की बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करते हैं । "उसका देश (पंजाब) स्वर्ग था; पुरुष सुंदर थे और स्त्रियाँ मनोहर थीं; उसके लोग धर्मपरायण थे और सकल नगरी धन , सोने-चाँदी के बर्तन, ताँबे और पत्थर के बर्तन; अनाज, हर प्रकार के भोजन और पेय; हर प्रकार के शरबत और मिठाइयों से इतनी भरी थी कि धन में वह उत्तर-कुरुओं से प्रतिस्पर्धा करती थी और वैभव में वह अलकनंदा , देवताओं की नगरी थी।" यहाँ यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि इस सिद्धांत के प्रतिपादक, मेरा आशय है, सी.वी. वैद्य 91 का मानना ​​है कि महाभारत के साक्ष्य यूनानी विद्वानों के साक्ष्य से कम मूल्यवान हैं।

महाकाव्य के दावे का खंडन करने तथा वाहिका लोगों के प्रति निष्पक्षता के लिए हमें यह भी जोड़ना होगा कि चीनी यात्रियों ने उनके बारे में क्या कहा था। फा-हियान 92 उनके विनम्र आचरण और मिलनसार भावना के लिए उन्हें बहुत सम्मान देता था। "आम लोगों (उत्तर-पश्चिमी सीमांत- उद्यना ) का भोजन और वस्त्र केंद्रीय राज्य ( मथुरा ) के समान ही थे ", जहाँ "लोग बड़ी संख्या में और खुश थे; उन्हें अपने घरों का पंजीकरण नहीं कराना पड़ता था, या किसी मजिस्ट्रेट और उनके नियमों का पालन नहीं करना पड़ता था, केवल शाही भूमि पर खेती करने वालों को उसमें से अनाज का एक हिस्सा देना पड़ता था; राजा बिना सिर काटे या शारीरिक दंड के शासन करता था; अपराधियों पर परिस्थितियों के अनुसार हल्का या भारी जुर्माना लगाया जाता था; केवल दुष्ट विद्रोह के बार-बार प्रयास करने पर उनका दाहिना हाथ काट दिया जाता था; पूरे देश में लोग किसी भी जीवित प्राणी को नहीं मारते थे, न ही मादक मदिरा का सेवन करते थे, न ही प्याज या लहसुन खाते थे (चांडालों को छोड़कर, जो मनु के अनुसार शूद्र पुरुष और ब्राह्मण महिला की संतान थे, जो शहर के बाहर रहते थे और जिन्हें शहर में प्रवेश करते समय दूसरों को उनसे दूर रहने की चेतावनी देने के लिए ढोल बजाना पड़ता था); वे सूअर और मुर्गियाँ नहीं पालते थे और जीवित पशु नहीं बेचते थे; बाजारों में कसाई की दुकानें नहीं थीं और नशीले पेय पदार्थों के विक्रेता नहीं थे। फा-हियान भिड़ा (पंजाब) के लोगोंे द्वारा प्रदर्शित करुणा और सहानुभूति से बहुत प्रभावित हुए , जिन्होंने उन्हें और उनके अनुयायियों को उनकी जरूरत की चीजें प्रदान कीं और उनके साथ शासन के नियमों के अनुसार व्यवहार किया।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 55 का अंत


कानून। हालाँकि, ऊपर उद्धृत साक्ष्य अनावश्यक माने जा सकते हैं, फिर भी उनकी प्रासंगिकता है। गुप्त काल में संपूर्ण संस्कृत साहित्य का संशोधन किया गया था । महाभारत भी इसके संशोधन और क्षेपणों से बच नहीं सका। इसलिए, वाहिक लोगों को बदनाम करने वाले क्षेपणों का प्रतिकार करने के लिए , उन क्षेपणों को लागू करना अत्यंत आवश्यक है जो , समकालीन विद्वान फाहियान द्वारा

यद्यपि पश्चिमी मद्रास के लोगों के जीवन से संबंधित ह्वेन त्सांग के वृत्तांत अपेक्षाकृत बाद के (7वीं शताब्दी ईस्वी) हैं, फिर भी इस सिद्धांत के विरुद्ध अपने बचाव को पुष्ट करने के लिए उनका अन्वेषण करना अप्रासंगिक नहीं होगा। सकला के निकट डाकुओं द्वारा लूटे जाने के बावजूद, उस क्षेत्र के लोगों के बारे में शांत ह्वेन त्सांग का अवलोकन निष्पक्ष प्रतीत होता है। उनके अनुसार , "सभी लोग भोजन करने से पहले स्नान करते हैं; बचा हुआ भोजन कभी नहीं खाते, बर्तन नहीं देते, उपयोग के बाद लकड़ी और पत्थर के बर्तनों को नष्ट नहीं करते, सोने, चाँदी, ताँबे और लोहे के बर्तनों को रगड़कर चमकाते हैं, विलो की लकड़ी से अपने दाँत साफ करते हैं, अपने हाथ और मुँह धोते हैं और जब तक ये स्नान समाप्त नहीं हो जाते, वे एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते; वे अपने आचरण में कपटी या विश्वासघाती नहीं होते और अपनी शपथों और वादों के प्रति वफादार होते हैं।" यह गैर-ब्राह्मण स्रोतों से प्राप्त प्रमाण है जो महाभारत के संस्करण का निर्णायक रूप से खंडन करता है और जिसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इससे बड़ी असंभवता और क्या हो सकती है कि मद्रदेश के योद्धा कबीलों की निंदा ह्वेनसांग की यात्रा के बाद महाकाव्य में फिर से शामिल की गई हो ताकि उन लोगों के उनके गुलाबी चित्रण की चमक फीकी पड़ जाए और साथ ही 'अजय जरतो हुनान' की चमक फीकी पड़ जाए, जो 599 ईस्वी में जार्तों की बहादुरी को बढ़ती श्रद्धांजलि देता है और जिसने सीवी वैद्य को जार्तों को जाटों से जोड़ने के लिए एक सुराग का काम किया 


अब हम कर्ण पर्व में मद्र देश की महिलाओं के बारे में दिए गए अपमानजनक संदर्भों पर विचार कर सकते हैं। आधुनिक विद्वानों ने महाभारत का गहन अध्ययन किया है, विशेष रूप से महाकाव्य युग में और सामान्य रूप से हिंदू सभ्यता में महिलाओं की स्थिति और प्रतिष्ठा के संबंध में। हम जानते हैं कि उन्होंने मद्र देश की महिलाओं के चरित्र के निन्दनीय वर्णन को कोई महत्व नहीं दिया है । दूसरी ओर, उन्होंने इसे बेतुका बताकर खारिज कर दिया है। डॉ. अल्तेकर 95 , जिन्होंने सैन्य प्रशिक्षण सहित, सह-पाठ्यचर्या और पाठ्येतर गतिविधियों का गहन अध्ययन किया था।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 56 का अंत


"महाकाव्य काल में अविवाहित और विवाहित महिलाओं ने भाग लिया", का मानना ​​है कि महाभारत में महिलाओं की यौन नैतिकता में आश्चर्यजनक शिथिलता के बारे में काल्पनिक कहानियाँ "निःसंदेह महिलाओं के चरित्र को कलंकित करने के लिए जानबूझकर लिखी गई हैं, उनके द्वारा व्यक्त की गई भावना को समाज में कोई स्वीकृति नहीं मिली; वे एक समझदार व्यक्ति के लिए कोई विश्वास नहीं रखती हैं और उन्हें उनके अंकित मूल्य पर नहीं लिया जाना चाहिए"। डॉ. आप्टे 96 यह भी टिप्पणी करते हैं कि "जबकि हमें उस युग के दौरान अचूक शुद्धता की अत्यधिक अतिरंजित धारणाओं को नहीं मानना ​​चाहिए, अलग-अलग मामलों को असंगत महत्व देने की आवश्यकता नहीं है।"

इस संबंध में सबसे प्रखर आलोचक डॉ. (कुमारी) शाकंभरी जयाल (97) हैं , जो दृढ़तापूर्वक कहती हैं कि "महाकाव्य में स्वतंत्र समाजों और महिलाओं द्वारा प्रयोग की जाने वाली स्वतंत्रता के संदर्भ केवल स्वार्थी पक्षों के कथन हैं। कर्ण द्वारा मद्र स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। किसी भी विशेष समाज या देश में स्त्रियों की व्यभिचारिता का पता लगाना और उसे किसी विशेष जाति से जोड़ना कठिन है। इसलिए, सुनी-सुनाई बातों पर आधारित ये विवरण अत्यंत संदिग्ध और अविश्वसनीय हैं, और हो सकता है कि युद्ध के वृत्तांतों को और अधिक रोचक बनाने के लिए इन्हें जोड़ा गया हो।" डॉ. जोगीराज बसु ( 98) कहते हैं कि "हो सकता है कि लापरवाही का कोई एक उदाहरण रहा हो, लेकिन ऐसे इक्का-दुक्का अपवाद इस सामान्य नियम को कम नहीं कर सकते कि यौन नैतिकता का स्तर बहुत ऊँचा था और स्त्रियों की शील एक अमूल्य निधि मानी जाती थी।" अतः, उपरोक्त के आलोक में, कर्ण पर्व में मद्र स्त्रियों की निंदा को बेतुका और निरर्थक मानकर खारिज किया जाता है। यह केवल उन लोगों की पूर्ण गैरजिम्मेदारी की ओर इशारा करता है, जो अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए तथा अपने संकीर्ण जातिगत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूरे लोगों को अशुद्धता से बदनाम कर सकते हैं।

सिद्धांत का विश्लेषण अधूरा रह सकता है जब तक कि जर्तों या जर्तिकों के अस्तित्व को ढँके रहस्य को संतोषजनक ढंग से हल नहीं किया जाता। बारहवीं शताब्दी ईस्वी के जैन विद्वान वर्धमान 99 ने शक , खस और जर्त नामक तीन जनजातियों का उल्लेख किया है और हमें सूचित किया है कि "अंतिम के एक योद्धा ने हूणों को हराया "। आचार्य गोपिका 100 ने योद्धा का नाम लिए बिना " हूणों का सफाया करने वाले राजा की प्रशंसा की "। डीसी गांगुली 101 आधुनिक कच्छ को दसवीं शताब्दी ईस्वी के जर्तदेश के रूप में संदर्भित करते हैं , जिसके राजा फुला और उनके पुत्र, लक्ष थे , लेकिन यह संदिग्ध है कि क्या वे किसी भी तरह से महाकाव्य के जर्तिकों से जुड़े थे । हेमचंद्र 102 ने जर्तों की पहचान श्वेत वन की एक जंगली जनजाति ( श्वेत-वनवासी ) से की है, दुर्गा सिन्हा 103 ने सातवीं शताब्दी ईस्वी में जर्तह दीर्घरोमा (लंबे बालों वाले लोग) का उल्लेख किया है ।


जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 57 का अंत



चंद्रगोमिन 104 में छठी शताब्दी ईस्वी में अजय जरतो हूण (अजेय जार्तों ने हूणों को हराया ) का उल्लेख है । पाणिनि के एक पूर्ववर्ती यास्क 105 ने जत्या अत्नारो नामक लोगों का उल्लेख किया है , लेकिन उन्हें जर्ता नहीं कहा है , भगवदत्त और उसके बाद बीएस दहिया 106 ने दावा किया है कि लंबे बालों वाले लोग ( जर्ता दीर्घरोमा ) कोई और नहीं बल्कि महाभारत (47.26) के शक, तुखारा, कंकश्च रोमशा श्रृंगनोराह ( शक , तुखारा , कंक आदि लंबे बालों वाले) हैं, लेकिन महाकाव्य में उन्हें जार्त नहीं कहा गया है ।

उपरोक्त विद्वानों के कार्यों से हमें एक तथ्य उजागर होता हुआ मिलता है कि एक जार्ता योद्धा या राजा ने हूणों को पराजित किया था ।

हूणों का विजेता कौन था?

आखिर हूणों का यह विजेता कौन था ?

  • मजूमदार ने चंद्रगोमिन के संस्करण को 'अजय गुप्तो हुनान' के रूप में पढ़ा और उनके लिए यह विजेता एक गुप्त सम्राट था, लेकिन इस गलत विचार को बाद में उन्होंने और बेलवलकर ने सही कर दिया 
  • अब विद्वानों के बीच कालानुक्रमिक और नृवंशविज्ञान के आधार पर आम सहमति यह है कि हूणों का यह संहारक, मंदसोर अभिलेख के अनुसार मालवा का राजा यशोधर्म था ।108 (532-33 A.D.).
  • मजूमदार 109 उन्हें औलीकरस से जोड़ता है where as
  • कार्लाइल और कनिंघम 110 उसे बैंस मानते हैं ,
  • लेकिन सभी इरादों और उद्देश्यों के लिए, जैसा कि उक्त शिलालेख से प्रमाणित होता है, वह विर्क वंश से संबंधित था ।

It goes without saying that the Tukharas (Tusharas), Kankas or KangAulikaras or Aulikas or AulakhasBains or BainswalasVirkas or Birkas, are all the names of the Jat tribes and they claim no connection with the Jartikas of the Great Epic. But the Sanskrit scholars of the medieval period seen to have used the so-called sanskritised term Jarta for the warrior chiefs of such tribes without specifically mentioning their names. Hence they seem to have taken a cue from the suggested Jartikas thrown up by the Epic to perpetuate their gloomy picture in the popular mind, otherwise they could have easily used for those tribes the term Jat or Jatt or Zutt which had, without any shadow of doubt, come to be applied to various warrior tribes of north-western India since the time of Panini and Herodotus112.

A signal challenge here has been the evident intention of various subsequent scholars, acting as authorities but with apparent racial and religious bias to confuse Jat and Jarta in the mind of general public. The term Jartika or Jarta has come down to be notorious for symbolsing all impurity and indecencies. The purpose of its use for the Virka


The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations: End of page 58


conquerors of the Hunas was not to represent the former as Jat but to decry them and to dilute and pollute the perfume of their heroic and historical deeds. The version of their absurd origin, highlighted by Buddha Prakash113, as "chimerical offspring of the union of a prince and a she-wolf, (a biological impossibility) further strengthens our suspicion regarding the intention of the scholar vis-a-vis the Jats. The Virkas were a republican Vahika warrior tribe. Instead of giving credit to their martial qualities they were denounced as sons of a she-wolf, if not those of a bitch. 'The etymology of Vahikas from the two imaginary demons, Bahi and Heeka, residing in the Vipasa river, is considered fanciful by the learned scholar, but even then, they are said to have degenerated the people of the Panjab, conveying probably the concealed sense that they, too, are the sons of the demons. Above all, the same scholar refreshes, rather authoritatively, in the popular psyche, the idea that the admixture of the Jarttikas or Jartas with the Madras etc. led to the degeneration of the latter's character. He seems to be so much convinced with the version of the Epic as if he himself accompanied the Jartas in the Madradesa. What a pity, that an insignificant "jarta-fish" spoiled the whole water of Vahika rivers and her warriors, and a pinch of Jarttika Yoghurt" turned the whole milk of all the Vahika Madras sour! The normal tendency is for new-comers to be coloured by the culture of the majority, for every body follows the dictum: "while in Rome, do as the Romans do". What a surprise, that the Jartikas escaped the civilizing influence and acculturation by the highly advanced Vahika tribes; instead, they barbarised the latter'. The Brahman writers have made wide use of the formula: "Give the dog a bad name and hang it". The Jats were named as Jartas and were defamed throughout Indian history.


No less confusing is the view of C.V. Vaidya, according to whom the Jats, on the one hand, are "the purest of the Aryans, belonging to the Solar race", but, on the other hand, the Shudras in modern opinion for following the Vedic practice of widow marriage and the noblest profession of agriculture and animal husbandry besides their arms, and connects them with the denounced Jarttikas of the Karna Parva of the Mahabharata. He tries to establish his assertion with the statemate, 'Ajaya Jarto Hunan' of Chandragomin of the fifth century A.D. A close analysis of Vaidya's assertion also compels us to remark that the Jats, as descendents of the Solar race of the Aryans, lose their ancestral lustre


The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations: End of page 59



As soon as they are connected with "the Jarttika or Jartas who were not created by the Prajapati." This eminent scholar, too, had contributed to build a psychosis that the Jats are the Jarttikas or Jartas, the immoral and the notorious people of the Mahabharata time. Had he, to whom "the: Jats are the purest [[Aryans and are the descendents of the first race, the: Solar race", disenchanted himself from the racial and religious prejudices, he could have, in all fairness to them, identified the Jats, are also called Asuras, as the progeny of Jata114, one of the seven sons of Brahma, probably from his Asuri wife. In common parlance in northern India there are only two 'devatas', the 'Jat devata' and the 'Brahmana devata' 114a, but the orthodox scholars can ill afford to pay this glowing tribute to their adversaries, the Jats, for their honourable origin from the son of Brahma.

Jarta or Jartika origin theory rejected

To sum up our discussion of the theory, it may, in capsule, be remarked that the version of the Mahabharata, regarding the Jarttikas and their gloomy picture, cannot be considered reliable because of its more-than one redactions, revisions and interpolations at different times by different scholars with vested interests. The contention of scholars, who question the very existence of the Jarttikas and Sakala at the time of the Epic war, cannot be dismissed lightly and deserves further investigations. The evidence from other sources pertaining to the contemporary period, during which the Great Epic is believed to have been largely interpolated, not only does not support the calumny but, on the other hand, it forcefully contradicts the picture purporting to assassinate the character of the Vahika warrior tribes, the progenitors of the Jats, Modern scholars, who have burnt mid-night oil in making an intensive as well as extensive study of the Great Epic and of the position and status of women in the Heroic Age of Indian history, are not found wanting in rejecting the nefarious depiction of the Vahika women as absurd and preposterous.

The purpose of the theory, instead of tracing the origin of the Jats, was threefold i.e.

  • primarily to represent the Jats as out landers (Vahikas or Bahikas) in the sense that they hailed from other adjoining countries where they are, being the purest Aryans, the autochthons in India;
  • secondly to denounce them perpetually in popular estimation, by identifying them with the Obnoxiously painted Jartikas or Jartas, as fallen and degenerate as depicted in the Great Epic;
  • thirdly to denounce the ancestors of the present Jats for adopting Buddhism and for not submitting to the yoke of Brahmanism

The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations: End of page 60


which after its revival sought to impose on them in ancient period. A clever play upon words with similar sounds has been made to conceal the truth, which cannot be easily understood by common man.

Even if we accept the identification of the modern Jats with the ancient Jarttikas or Jartas, we, as noticed above, find the life and character of the two people poles apart. In all probability the Jartas were followers of Zoroastara (Zaratushtra = Zarat + ushtra, Trara- porevala, 1951: 73f and Rahurkar, 1964: 130) who, as informed by Max Muller115, before their schism with the followers of Vedic religion, "were a colony' from northern India and who were Ahura Worshippers". The coins of Kanishka116 present besides others the Zoroastrian gods also. We have every reason to gather from it that some of the Zoroastrians must a so be in the Panjab and Sindh during his reign. Like the Sakas and Kushanas they must have been naturally denigrated by the champions of the Brahmanical faith. Just as the later Kushan-Saka Jats were assimilated with the aboriginal Jats, so might have Jartas been absorbed into them. But we must remember that the Jarta admixture is some thing different from Jarta origin of the Jats.

Hence, the theory is rejected as much a futile effort as the scaling of the height of the Everest by a blind with a raw cotton thread."


The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations: End of page 61


Notes and References

1. Qanungo, op.cit., p. 5 & fn.
2. ASR, Vol. 11, 1863-64, p. 3.
3. Anc. Geog. of Ind., 1924, Calcutta, p. 696.
4. His. of Med. Hindu Ind., Vol. 1, 1979, N. Delhi, pp. 86 ff.
5. Correspondence with author.
6. Ind. in the Time of Patanjali, 1957, Bombay, p. 77. But he does not hold the Jarttikas as Jats.
7. Jats (The Anc. Rulers), 1983, Delhi, pp. 22f.
8. His. of Jats, 1967, Delhi, p. 15.
9. Strange, G. Le.; Eastern Caliphate, 1966, London, pp. 244 331. Westphal-Hellbusch Sigrid and Heinz Westphal; Zur Geschichte un: Kultur der Jat, 1968, Berlin, p. 12.
10. Ency. of Islam, Vol. 11. p. 488.
11. Pol. & Soc. Movements in Anc. Pb. 1964, Delhi, pp. 114, 2.)1.
12. Ibid. pp. 219, 243, 251.
13. His. of Herodotus, Vol. III, pp. 185, 209.
14. Buddha Prakash, op. cit., pp. 135f.
15. Ashtadhyayi, IV, 2, 117-118; V: 3, 114.
16. Buddha Prakash, op.cit., pp. 136.
17. Mbt., VIII, 44.
18. Infra.
19. एमबीटी ., कर्ण पर्व , XL 22-23; XLIV, 6-7,10-21,35-37,42-46; XLV, 6-7,13, आदि।
20. ओप.सिट., पृ. 7एफ
21. ओप.सीआईटी., पृ. 81.
22. ओप.सीआईटी., पृ. 15एफ.
2. ओप.सीआईटी., पृ. 379.
24. उद्धृत, उर्दू संस्करण, पृ. 31.
24ए. टॉटनमैन, थॉमस, आर. 1974 "उत्तरी भारत में क्रॉस-कजिन मैरिज?", दक्षिण एशिया में किन्शिप और इतिहास में, मिशिगन, दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया पर पत्र, संख्या 7; एन आर्बर, दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशियाई अध्ययन केंद्र, मिशिगन विश्वविद्यालय, पृ. 84.
25. ओप.सिट., पृ. 206-19, 696. cf. मैकक्रिंडल, 'आक्रमण', पृ. 347,411.
26. अग्रवाल, वी. 5.; ऑप.सीआईटी., पृ. 73.

जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 62 का अंत



26ए. कथई (कैथिस), यहूदियों के हित्ती। हिलाइट में रोमनकृत, जहां: 'वाहिती गण देव-गणिता', वाहिकादेश या एयरयाना के पार्थियन (भरतियन) गणों के पूज्य भगवान (वाडेल, ऑप.ईट., पृ. 107; सीएफ भी सी लासेन। इंडी. चे अल्टर थुमकुंडे, 1847, 1,9)।
26बी. वेबर, अल्ब्रेक्ट; उसका। ऑफ इंडस्ट्रीज़ लिट., लंदन, 1914, पृ. 33 एफ.एन. सी एफ वेबर भी. इंडी चे स्टडीएन, वॉल्यूम। 1, पृ.277.
27. कैंब्रिज हिज. ऑफ इंड., खंड 1, पृ. 496; सेक्रेड बुक्स ऑफ ईस्ट, खंड XV, भाग II, पृ. 132.
28. ओ.पी.सी. टी.
29. वैद्य, सी.वी.; महाभारत-एक आलोचना, 1904. बम्बई. पृ. 1-7; वेबर, ए.; हिज. ऑफ इंड. लिट., 1914, लंदन पृ. 183-89. बेनीप्रसाद, अन्ना कल्चर ऑफ इंड. (हिंदी संस्करण), 1950, पृ. 150.
30. ओप., सीआईटी., पृ. 66.
31. ओप., सीआईटी., पृ. 145.
32. वही, 192.
33. एमबीटी, एक्सएल, 20एफ; एक्सएलवी, 23एफ, 30, 33एफ, 391; एक्सएलवी, 2.
34. वही XLIV, 22, 41, 43, 48; XLV, 25.
35. वैद्य, सी.वी. ; उसका। मेड का. हिंदू इंडस्ट्रीज़, वॉल्यूम। 11, 1924, बम्बई, पृ. 313.
35ए. वेबर, ए.; हिज. ऑफ इंडियन लिटरेचर, लंदन 1914 पृ. 4,39.
36. एमबीटी. एक आलोचना, पृष्ठ 28.
37. सिद्धांत, op.cit., पृ. 147, 155, 162.
38. भगवददाता, भारतवर्ष का बृहद इतिहास, खंड। मैं, पी. 156.
39. वैद्य, सी.वी.; एमबीटी. ए क्रिटिसिज्म, पृ. 29. वाई.पी. शास्त्री, ओप.सीआईटी., हिंदी संस्करण, पृ. 614.
40. वैदिक इंडेक्स, खंड 1, पृष्ठ 138. ए.डी. पुसाल्कर, इतिहास और भारतीय संस्कृति - 'वैदिक युग', पृष्ठ 262-63. भगवदत्त, ऑप.सीआईटी., पृष्ठ 156. बी.सी. लॉ, क्षत. ऑफ एन.सी. इंड., 1975, पृष्ठ 214.
41. भगदत्त, op.cit., पृ. 156.
42. बुद्ध प्रकाश , op.cit., पृ. 112-13.
43. वही, पृ. 43.
44. कोसंबी, डीडी; कुल. और सिव. Anc का. इंडस्ट्रीज़, नई दिल्ली, 1976, पृ.118.
44ए. कीथ, ऋग्वेद-ब्राह्मण, हार्वर्ड ओरिएंटल सीरीज, संख्या 25 (1920), पृष्ठ भी देखें। 387. एसके चटर्जी, इंडो-आर्यन एंड हिंदी, 1960, पिन्ना, केएल मूल होपाध्याय, कलकत्ता, पी. 50; एचसी चकलादर, ईस्टर्न इंडस्ट्रीज़ और आर्यावर्त ए IHQ 4, नंबर 1 (1928) में।
45. आप्टे:, वी.एस., स्कट. इंजी. डिक., भाग II, 1959 पृष्ठ 1164,1405,1422। द्वारका प्रसाद चतुवेर्दी शर्मा, एसकेटी। शबदरथ कौस्तुम्भ, 1957, पृ. 804.
46. ​​मुखर्जी; राधा कुमुद; अन्य. इंडस्ट्रीज़, इलाहाबाद, 1956, पृ. 141.
47. हिन्दू राजनीति, पृष्ठ 32, भाग 7; पृष्ठ 33, भाग 18.
48. op.cit., पृ. 252.

जाट: उनकी उत्पत्ति, प्राचीनता और प्रवास : पृष्ठ 63 का अंत


49. एसबीई, खंड XXX, भाग II, पृष्ठ 37. अथर्ववेद, XV भी देखें।
50. वही, खंड II, भाग I, पृ. 4-5.
51. वही, खंड XXV, पृ. 37.
52. चट्टोपाध्याय, लोकायत, पृ. 167.
53. एसबीई, खंड XIV, भाग II, पृष्ठ 198.
54. कैम्ब. हिज, इंड., खंड I, पृ. 276.
55. अग्रवाल, वी.एस.; पाणिनि से औद्योगिक क्न., पृ. 442-44.









आरट्ट



सिद्धांतकोष से

1. (महापुराण/प्रस्तावना 50/पं.पन्नालाल) पंजाब के एक प्रदेश का नाम;
2. भरत क्षेत्र का एक देश - देखें मनुष्य - 4.4


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

भरतक्षेत्र का एक देश । यहाँ के घोड़े प्रसिद्ध थे । महापुराण 16. 141-148, 156,30.107