नमस्कार मित्रों ! मित्रों आज हम लोग एक ऐसी पुस्तक के बारे में जानेंगे जिसका नाम है -"श्रीकृष्ण साराङ्गिणी" जो अपने 12 अध्यायों तथा 30 से अधिक- उप भागों में विभाजित होकर परमेश्वर श्रीकृष्ण के इहलौकिक तथा पारलौकिक शास्वत स्वरुपों तथा उनके सम्पूर्ण जीवन चरित्रों का यथार्थ वर्णन करती है। इसके साथ ही यह पुस्तक परमेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा रचित सृष्टि संरचना, वास्तव में परमेश्वर कौन हैं, किस देवता की पूजा करनी चाहिए किसकी नहीं, पूजा के वास्तविक विधान क्या हैं ? भूतल पर श्रीकृष्ण का वंश विस्तार एवं उनके रक्त सम्बन्धी कौन है तथा उनका गोत्र क्या है, इत्यादि महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन करती है। और अंत में परमेश्वर श्रीकृष्ण के गोलोक गमन की वास्तविक घटनाओं का सचित्र वर्णन करते हुए अपने 12 अध्यायों को पूर्ण करती हुई अंततोगत्वा श्रीकृष्ण के ही चरणों में समर्पित है।
मित्रों! दूसरी बात यह है कि इस महत्वपूर्ण किताब को लिखने, संजोने तथा संवारने में तीन महान विभूतियां- गोपाचार्य हंस -श्री योगेश रोही गोपाचार्य हंस- श्रीमाता प्रसाद जी , एवं गोपेश्वर श्रीकृष्ण सर्वस्वम् कथा संस्था" के संस्थापक गोपाचार्य हंस श्री आत्मानन्द जी महाराज की विशेष भूमिका रही है जिनके अथक प्रयासों से सारगर्भित होकर आज आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है।
जैसा की आपलोग देख सकते हैं यह पुस्तक न तो अधिक बड़ी है और ना ही अधिक छोटी है। और यहीं इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है। जिसका लाभ पाठकों को यह होगा कि- पाठक गण इसे आसानी से कहीं भी ले जाकर श्रीकृष्ण के चरित्र विषयक वार्तालाप के उपरांत भ्रांतिमूलक टिप्पणियों व प्रश्नों का उत्तर तुरंत खोजकर उनका वहीं पर समाधान कर सकेंगे।
अब इसके कवर पेज को देखा जाए तो परमेश्वर श्रीकृष्ण अपनी गौवों के साथ बंशी धारण किये हैं, और उनके पीछे 16 वें अंश रूप से उत्पन्न विराट विष्णु हैं। जिसको देखने के बाद यह आभास होता है कि यह किताब आध्यात्म का कोई अद्भुत रहस्य खोलने वाली है।
तो चलिए देखते हैं कि इस पुस्तक में परमेश्वर श्रीकृष्ण और उनके वंश क्रम तथा आध्यात्म के अद्भुत रहस्यों के बारे में अपने बारह अध्यायों में क्या-क्या वर्णन किया है।
तो मित्रों इसके लिए नीचे इसकी विषय सूची को देखिए, कुल बारह अध्याय और उनके प्रमुख भाग कुछ इस प्रकार व्यवस्थित हैं। 🎧🎧🎧
१ - पूजा-अर्चना के विधि विधान एवं गलत कथाओं को
सुनने व कहने के दुष्परिणाम।
[क] - परमेश्वर की सार्थकता व पहचान।
[ख] -३३ कोटि देवता में किसकी पूजा करें ?
[ग] - श्रीकृष्ण पूजा के लाभ।
[घ] - शिव पूजा के लाभ।
[ङ] - विष्णु पूजा के लाभ।
[च] - श्रीराम पूजा के लाभ।
[छ] - देवी सावित्री व सरस्वती पूजा के लाभ।
[ज] - श्रीकृष्ण कथा कौन कह सकता हैं ?
[झ] - गलत कथा कहने व सुनने के दुष्परिणाम।
[ञ] - एक सच्चे गुरु की पहचान।
२- श्रीकृष्ण का स्वरूप एवं उनके गोलोक का वर्णन
३- श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या
परमशक्ति नहीं है।
४- गोलोक में गोप- गोपियों सहित- नारायण,शिव , ब्रह्मा
आदि प्रमुख देवताओं की उत्पत्ति तथा सृष्टि का -
विस्तार
५- वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति तथा दोनों में
मूलभूत अन्तर एवं विशेषताएं-
[क] - वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति।
[ख] - ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति।
[ग ] - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य में अंतर-
[१] जन्मगत एवं कर्मगत अन्तर।
[२] यज्ञ मूलक एवं भक्ति मूलक अन्तर।
[३] भेदभाव एवं समता मूलक अन्तर।
६- वैष्णव वर्ण के गोपों के प्रमुख कार्य एवं दायित्व -
[१] गोपों का ब्राह्मणत्व (धर्मज्ञ) कर्म-
(क)- सत्यनारायण व्रत कथा के मुख्य पात्र अहीर हैं।
(ख)- अहीर कन्या वेदमाता गायत्री का परिचय
(ग)- यज्ञों में हवन को ग्रहण करने वाली गोपी स्वाहा
और स्वधा का परिचय।
(घ)- ब्रह्मांड विदुषी गोपी शतचन्द्रानना का परिचय।
[२] गोपों का क्षत्रित्व कर्म।
[३] गोपों का वैश्य कर्म।
[४] गोपों का शूद्र कर्म।
७- वैष्णव वर्ण के "गोपों" की पौराणिक - प्रशंसा
८- भगवान श्री कृष्ण का सदैव गोप होना तथा गोपकुल में
उनका अवतरण
९- गोप, गोपाल, अहीर और यादव कैसे एक ही जाति,वंश
और कुल के सदस्य हैं, तथा इनका वास्तविक गोत्र
वैष्णव है या अत्रि ?
१०- गोप कुल के श्रीकृष्ण सहित कुछ महान पौराणिक
व्यक्तियों का परिचय -
भाग-(१) श्रीकृष्ण का परिचय।
भाग-(२) श्रीराधा का परिचय।
भाग-(३) पुरुरवा और उर्वशी का परिचय।
भाग-(४) आयुष, नहुष, और ययाति का परिचय।
११- गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख
सदस्यपति -
भाग- (१) महाराज यदु का परिचय
भाग- (२) हैहय वंशी यादवों का परिचय।
भाग- (३) यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंशज
१२- यादवों का मौसल युद्ध तथा श्रीकृष्ण का गोलोक
गमन
भाग- (१)- यादवों के सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता एवं श्रीकृष्ण को बहेलिए से मारे जाने का खण्डन।
भाग- (२)- श्रीकृष्ण का गोलोक गमन
👉🏽 मित्रों! अब हम लोग इसके एक-एक अध्याय के बारे में विस्तार से जानेंगे। तो मित्रों इस किताब के प्रारंभ में भक्तों के लिए सबसे पहले गोपेश्वर श्रीकृष्ण की स्तुति के साथ पूजन क्रिया को बताया गया है कि कैसे एक भक्त परम प्रभु परमेश्वर श्रीकृष्ण का पूजा कर सकता है। जिसमें सामान्य रूप से यह बताया गया है कि श्रीकृष्ण के मुख्य मंत्रों या स्तुतियों को केवल गोप लोग ही सिद्ध कर सकते है दूसरा कोई नहीं।
इसके बाद अध्यायों का क्रम शुरू होता है जिसमें पहला अध्याय - पूजा-अर्चना के विधि-विधान एवं गलत कथाओं को सुनने व कहने के दुष्परिणाम शीर्षक से है। इसके प्रथम अध्याय के सम्पूर्ण विषयों को अच्छी तरह से समझने के लिए इसे- १० उप-शीर्षकों में बांटा गया है। जिसमें पहले उप शीर्षक में परमेश्वर की सार्थकता व उनकी पहचान को बताया गया है कि - एक सच्चे भक्त के लिए परमेश्वर की सार्थकता क्या है तथा एक भक्त (३३) कोटि देवी देवताओं में से परम प्रभु परमेश्वर की पहचान कैसे करेगा। इसके बाद के उपखण्डों में परमेश्वर श्रीकृष्ण पूजा के लाभ के साथ ही क्रमशः शिव, विष्णु, श्रीराम, इत्यादि के पूजा के लाभों को बताया गया है। उसी क्रम में इसके उपखण्ड (ज) में प्रमाण सहित बताया गया है कि क्यों श्रीकृष्ण कथा कहने का वास्तविक अधिकारी गोप लोग ही होते हैं। उसके बाद के उपखण्ड (झ) में बताया गया है कि -समाज में गलत व झूठी कथा कहने वालों को शास्त्रों में किस प्रकार के दण्डों का प्रावधान किया गया है। उसी क्रम में अगले उपखण्ड (ञ) में बताया गया है कि - एक सच्चे गुरु की पहचान कैसे की जाए ताकि भक्त- झूठे व छद्मवेषधारी गुरुवों के मकडजाल से बचकर सच्चे गुरु को पहचान सके।
👉 अब अध्याय दो की बात करें तो अध्याय दो आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसमें में परमेश्वर श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप तथा उनके परम धाम गोलोक के बारे में बताया गया है की किस तरह से परमेश्वर श्रीकृष्ण का गोलोक धाम समस्त ब्रह्माण्डों से उपर स्थिति है। जिसमें कुल 16 मणिमय द्वार है जिसकी अभेद्य सुरक्षा गोपों द्वारा की जाती है । उसी सोलहवें द्वार के उसपार परमेश्वर श्रीकृष्ण का निवास है जहां श्रीकृष्ण सदैव गोप भेष में गोप और गोपियों के साथ रहते। ये सभी महत्वपूर्ण जानकारियां इस अध्याय में विस्तार पूर्वक बताई गई हैं।
👉 अब इसके अगले अध्याय तीन की बात करें तो इसका शीर्षक है - 'श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या परमशक्ति नहीं है" के नाम से है। इस अध्याय में समस्त देवी-देवताओं की शक्तियों का तुलनात्मक वर्णन करते हुए निष्कर्ष रुप में बताया गया है कि- श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर या परमशक्ति नहीं है। इसलिए यह अध्याय आध्यात्मिक दृष्टिकोण से और भी महत्वपूर्ण है।
इसी क्रम में इसके अगले अध्याय (४) में बताया गया है कि -गोलोक में गोप- गोपियों सहित- नारायण,शिव , ब्रह्मा आदि प्रमुख देवताओं की उत्पत्ति कब और कैसे हुई। जिसमें यह भी बताया गया है कि गोलोक में परमेश्वर श्रीकृष्ण और उनकी प्राणप्रिया श्रीराधा के रोम कूपों अर्थात उनके क्लोन से गोप और गोपियों की उत्पत्ति हुई है, इसी वजह से गोप-गोपयां ब्रह्मा जी की सृष्टि रचना के भाग नहीं है। और न ही ये ब्रह्मा जी के चातुर्वर्ण के भाग हैं। इस लिए इनका एक अलग वर्ण हैं जिसका नाम है "वैष्णव वर्ण"। इत्यादि इत्यादि इन सभी विशेषताओं की वजह से यह अध्याय गोपों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
👉 इसी तरह से इसका अगला अध्याय (५) है, जिसका शीर्षक - वैष्णव वर्ण और चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति तथा दोनों में मूलभूत अन्तर एवं विशेषताएं नाम से है। इस अध्याय को मुख्यतः तीन उप-शीर्षकों में बांट कर बताया गया है कि- भगवान श्रीकृष्ण से वैष्णव वर्ण की उत्पत्ति कब और कैसे हुई जिसमें केवल गोप लोग ही आते हैं। इसी तरह से ब्रह्मा जी से चातुर्वर्ण की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है कि इनकी उत्पत्ति कब और कैसे हुई तथा इसमें कौन कौन लोग आते हैं। उसी क्रम में इन दोनों वर्णों में मूलभूत तीन अंतरों बताता गया है जैसे -
• पहला अंतर यह बताया गया कि- कैसे ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था का आधार जन्मगत होता है और वैष्णव वर्ण का आधार कर्मगत होता है।
• दूसरा अंतर यह बताया गया है कि - कैसे ब्रह्मी वर्ण व्यवस्था का आध्यात्मिक पहलू यज्ञ और कर्मकांडों पर आधारित होता है जिसमें कर्मकांड के रूप में पशु बलि का भी प्रावधान किया जाता है। जबकि इसके विपरित वैष्णव वर्ण का आध्यात्मिक आधार पूर्णरूपेण भक्ति मूलक है जिसमें बिना किसी भौकाल और आडम्बर के भक्त भगवान को भक्ति भाव से प्राप्त करता है।
• तीसरा अंतर यह है कि - ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था का आधार वर्ग विभेद पर आधारित है जिसमें सामाजिक उंच-नीच का बहुत भेदभाव किया जाता है। जबकि वैष्णव वर्ण व्यवस्था भेदभाव से रहित समता मूलक समाज पर आधारित है।
👉अब इसके अगले अध्याय (६) में वैष्णव वर्ण के गोपों के प्रमुख कार्यों एवं दायित्वों को बताया गया है कि वैष्णव वर्ण के गोप कैसे ब्राह्मी वर्ण व्यवस्था के समस्त कार्य जैसे - ब्राह्मणत्व ,क्षत्रित्व, वैष्य तथा शूद्र कर्म इत्यादि बड़े ही गर्व के साथ बिना भेद-भाव के करते हैं। इसी लिए गोपों के बारे में कहा जाता है कि समय आने पर ये शास्त्र और शस्त्र दोनो उठाते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गोपेश्वर श्रीकृष्ण हैं।
👉 अब इसके अगले अध्याय (७) में वैष्णव वर्ण के "गोप जिन्हें अहीर व यादव कहा जाता है" उनके बारे में विधिवत बताया गया है कि किस तरह से पौराणिक ग्रंथों में गोपों प्रशंसा की गई है।
उसी क्रम में इसके अगले अध्याय (८) में बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण जब भी भू-तल पर अवतरित होते हैं तो वे सदैव वैष्णव वर्ण के गोप कुल के यादव वंश में ही अवतरित होते अन्य किसी कुल मे अवतरित नही होते हैं।
👉 अब इसके अगले अध्याय (९) को देखा जाए तो यह गोप कुल के यादवों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बताया गया है कि गोप, गोपाल, अहीर और यादव कैसे एक ही जाति, वंश, कुल एवं गोत्र के सदस्य हैं, तथा इनका वास्तविक गोत्र वैष्णव है या अत्रि ? इसलिए यह अध्याय गोत्र और वंश उत्पत्ति की जानकारी हेतु अति महत्वपूर्ण है।
👉 इसी क्रम में इसका अगला अध्याय (१०) है जिसमें गोप कुल के श्रीकृष्ण सहित कुछ महान पौराणिक व्यक्तियों का परिचय बताया गया है। जिसको अच्छी तरह से समझने के लिए चार भागों में बांटा गया है। जिसके पहले भाग में श्रीकृष्ण का परिचय है और दूसरे भाग में श्रीराधा का परिचय है, और इसके तीसरे भाग में -पुरुरवा और उर्वशी का परिचय तथा चौथे भाग में - आयुष, नहुष, और ययाति का परिचय बताया गया है।
इसलिए यह अध्याय वैष्णव वर्ण के कुछ महान पौराणिक व्यक्तियों की जानकारी हेतु अति महत्वपूर्ण है।
👉 अब इसके बाद इस पुस्तक का ग्यारहवां अध्याय यादवों के लिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें गोप कुल के यादव वंश का उदय एवं उसके प्रमुख सदस्यपतियों का परिचय व उनके वंश क्रम को विस्तार से बताया गया है। इसके लिए इस अध्याय को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है।
• जिसके पहले भाग में यादवों के पूर्वज महाराज यदु के बारे में बताया गया है कि किस प्रकार महाराज यदु का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षमय रहा और अंत में उन्हीं से कैसे यादव वंश की उत्पत्ति हुई।
• तथा इसके दूसरे भाग में महाराज यदु के ज्येष्ठ पुत्र हैहय से उत्पन्न हैहय वंशी यादवों का परिचय बताया गया है। जिसमें यह भी बताया गया है कि पौराणिक कथाओं में जो परशुराम द्वारा हैहय वंशी कार्तवीर्य अर्जुन का वध कराया गया है वह ग़लत है क्योंकि कई साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि परशुराम द्वारा हैहय वंशी कार्तवीर्य अर्जुन का वध नहीं हुआ था बल्कि कार्तवीर्य अर्जुन ने ही परशुराम को युद्ध भूमि में पराजित कर उनका वध कर दिया था।
• इसी तरह से इसके तीसरे भाग में यदु पुत्र- क्रोष्टा और उनके वंश विस्तार को बताते हुए गोपेश्वर श्रीकृष्ण तक की वंशावली बताई गई है।
इसलिए यह अध्याय यादवों के वंशबृक्ष की विशेष जानकारी के लिए अति महत्वपूर्ण है।
👉 अंत में इस पुस्तक का अंतिमवां व अति महत्वपूर्ण अध्याय बारहवां है, जो मुख्यतः दो भागों में विभाजित है।
जिसके पहले भाग में यादवों का मौसल युद्ध और उसके सम्पूर्ण विनाश की वास्तविकता को बताते हुए यह सिद्ध किया गया हैं कि यादवों का सम्पूर्ण विनाश कभी नहीं हुआ और न ही कभी होगा। क्योंकि जिस यदुवंश की रक्षा स्वयं श्रीकृष्ण करते हो उसका सम्पूर्ण विनाश कैसे हो सकता है ? और इसी भाग मे श्रीकृष्ण को बहेलिए से मरे जानें का शास्त्रोंचित खण्डन करते हुए इसके दूसरे भाग में बताया गया है कि- भगवान श्रीकृष्ण जिस तरह से अपने गोपों के साथ भूभि के भार को दूर करने के उद्देश्य से अवतरित हुए थे वे ही प्रभु अपना सम्पूर्ण कार्य पूर्ण करने के पश्चात अपने समस्त गोप और गोपियों को लेकर ईश्वरीय रूप धारण कर पुनः अपने धाम को चले जाते हैं। उनकी इस लीला में उनको न तो कोई बहेलिया मारा और न ही किसी के शाप से उनके यादव वंश का विनाश हुआ।
इन सभी महत्वपूर्ण जानकारियां को इस अध्याय में विस्तार पूर्वक बताया गया है इसलिए यह अध्याय श्री कृष्ण की लीलाओं सहित आध्यात्मिक दृष्टिकोण से और भी महत्वपूर्ण है।
इस प्रकार से देखा जाए तो यह पुस्तक निष्पक्ष एवं क्रमबद्ध तरीके से परमेश्वर श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण जीवन चरित्रों का यथार्थ वर्णन करती हुई अपने मिशन में पूर्णतया सफल रही है। अतः जिस किसी भाई-बंधू को यह किताब चाहिए वो- मो. न. - ००००००००००००, पर या 8077160219 तथा 9452533334 पर सीधे सम्पर्क करके मंगवा सकता हैं।
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तो मित्रों श्रीकृष्ण साराङ्गिणी पुस्तक का सम्पूर्ण विश्लेषण कैसा लगा अवश्य बताइएगा, फिर मिलेंगे किसी दूसरे विडियो के साथ तब-तक के लिए नमस्कार!