ऋग्वेद के खिलभाग (Khilani) में कृष्ण का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैदिक परम्परा और परवर्ती पौराणिक परम्परा के बीच एक सेतु का काम करता है। खिलभाग ऋग्वेद के वे सूक्त हैं जो मुख्य संहिताओं के अंत में परिशिष्ट के रूप में जोड़े गए हैं।
ऋग्वेद के खिलभाग में कृष्ण का वर्णन मुख्य रूप से निम्नलिखित सन्दर्भों और नामों में मिलता है:
1. वासुदेव कृष्ण -
खिलभाग के 'अश्वसूक्त' और अन्य अंशों में कृष्ण का उल्लेख एक वीर पुरुष और देवत्व के रूप में होने लगा था। यहाँ उन्हें 'वासुदेव' के नाम से भी सम्बोधित किया गया है, जो उन्हें वसुदेव के पुत्र के रूप में स्थापित करता है।
2. महाविष्णु के रूप में (As Maha-Vishnu)
खिलभाग के श्रीसूक्त (जो ऋग्वेद का एक अत्यन्त प्रसिद्ध खिल सूक्त है) में 'विष्णु' और उनकी शक्ति 'लक्ष्मी' का वर्णन है। यहाँ कृष्ण को विष्णु के अवतार या उनके स्वरूप के रूप में संकेतित किया गया है।
3. देवकीपुत्र-
यद्यपि 'देवकीपुत्र कृष्ण' का स्पष्ट उल्लेख मुख्य रूप से छान्दोग्य उपनिषद में मिलता है, लेकिन ऋग्वेद के खिल सूक्तों में कृष्ण के मानवीय और ईश्वरीय रूपों का सम्मिश्रण मिलता है, जहाँ उन्हें दुष्टों का संहार करने वाला बताया गया है।
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण-
ऋग्वेद के मुख्य मण्डल (8)वें मण्डल में भी 'कृष्ण' का उल्लेख आता है, लेकिन उनके संदर्भ में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं
- ऋषि कृष्ण: ऋग्वेद के 8वें मंडल के कुछ सूक्तों के द्रष्टा (रचयिता) 'कृष्ण' नामक ऋषि हैं, जिन्हें 'कार्ष्ण' (कृष्ण का पुत्र) या आंगिरस कुल का माना गया है।
- देव कृष्ण: कुछ स्थानों पर इन्द्र द्वारा 'कृष्ण' नामक देव सत्ता को स्वीकार न करने वाले या कबीले के प्रमुख के युद्ध का वर्णन है (ऋग्वेद 8.96.13)।
निष्कर्ष:-
खिलभाग (परिशिष्ट) तक आते-आते कृष्ण का स्वरूप एक महापुरुष, योद्धा और विष्णु के अंश के रूप में उभर चुका था, जो आगे चलकर महाभारत और पुराणों में पूर्ण ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
ऋग्वेद के खिलभाग में अश्व सूक्त और श्रीसूक्त अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ये सूक्त वैदिक काल के उत्तरार्द्ध और पौराणिक काल के उदय के बीच की कड़ियों को दर्शाते हैं।
यहाँ इनके विशिष्ट सन्दर्भ और श्लोक दिए गए हैं:
1. श्रीसूक्त (Sri Suktam)
श्रीसूक्त ऋग्वेद के परिशिष्ट (खिलभाग) का सबसे प्रसिद्ध सूक्त है। इसमें देवी लक्ष्मी की आराधना की गई है और इसमें 'विष्णु' तथा 'कृष्ण' के वैष्णव स्वरूप के संकेत मिलते हैं।
सन्दर्भ: ऋग्वेद परिशिष्ट (खिल) - सूक्त 11
प्रमुख श्लोक:-
कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥ (श्लोक 4)
- अर्थ: जो मंद मुस्कान वाली हैं, स्वर्ण के प्राकार (दीवारों) से घिरी हैं, दया से आर्द्र हैं, तेजोमय हैं, स्वयं तृप्त हैं और भक्तों को तृप्त करने वाली हैं, कमल पर विराजमान उन पद्मवर्णा लक्ष्मी का मैं यहाँ आह्वान करता हूँ।
इस सूक्त के अन्त में आने वाली 'फलश्रुति' में विष्णु की पत्नी के रूप में लक्ष्मी का वर्णन मिलता है, जो कृष्ण के 'विष्णु स्वरूप' को पुष्ट करता है:
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराजतनयां श्रीरंगधामेश्वरीम्...
2. अश्व सूक्त (Asva Suktam)
अश्व सूक्त में दिव्य अश्वों और सूर्य के रथ के घोड़ों की स्तुति है। खिलभाग के अन्तर्गत अश्व सूक्त में 'वासुदेव' शब्द का प्रयोग मिलता है, जो कृष्ण के पौराणिक स्वरूप की प्राचीनता को सिद्ध करता है।
सन्दर्भ: ऋग्वेद खिलभाग (अश्व सूक्त)
प्रमुख सन्दर्भ श्लोक (वासुदेव गायत्री का बीज):
खिलभाग के अश्व सूक्त के बाद आने वाले संकलन में विष्णु और वासुदेव की एकता पर बल दिया गया है:
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
- सन्दर्भ: यह मन्त्र खिल सूक्तों के अन्तर्गत 'विष्णु गायत्री' के रूप में प्रसिद्ध है।
- महत्व: यहाँ 'वासुदेव' और 'विष्णु' को एक ही परम तत्व माना गया है। यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है कि खिलभाग की रचना के समय तक कृष्ण (वासुदेव) को सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाने लगा था।
मुख्य अन्तर और विशेषताएँ-
|
सूक्त |
मुख्य देवता |
कृष्ण/विष्णु सन्दर्भ |
|---|---|---|
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श्रीसूक्त |
लक्ष्मी (श्री) |
'विष्णु-पत्नी' और 'माधव' के वैभव का वर्णन। |
|
अश्व सूक्त |
अश्व/सूर्य/अश्विनी कुमार |
'वासुदेव' नाम का उल्लेख और विष्णु से उनकी अभिन्नता। |
विशेष टिप्पणी: ऋग्वेद के खिल सूक्तों में 'कृष्ण' नाम के साथ 'गोपाल' या 'गोविन्द' जैसे नामों का सीधा प्रयोग अत्यन्त दुर्लभ है, किन्तु 'वासुदेव' और 'विष्णु' के माध्यम से उनके ईश्वरीय स्वरूप को खिलभाग में पूर्णतः स्थापित कर दिया गया था।
ऋग्वेद संहिता (मण्डल 1, सूक्त 82, ऋचा 4)
संस्कृत पाठ:
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परितस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि॥
उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातभिष्टये। यदा यदा युजो यथासि गोविन्द सखीनां विता ॥
शब्दार्थ और सन्दर्भ:
- गोविन्द (Govinda): यहाँ इन्द्र को 'गोविन्द' कहकर पुकारा गया है। इसका अर्थ है—"खोई हुई गौओं को खोजने या प्राप्त करने वाला।"
- मघवन: ऐश्वर्यवान इन्द्र।
- विता: रक्षा करने वाला।
भावार्थ:
"हे ऐश्वर्यवान इन्द्र (मघवन)! हमारी स्तुतियों को सुनिए। आप हमारे रक्षक हैं। हे गोविन्द! जब भी आप हमारे साथ होते हैं, आप अपने सखाओं (भक्तों) की रक्षा करने वाले और उन्हें अभीष्ट फल (गौएँ/ज्ञान) प्रदान करने वाले होते हैं।"
अन्य सन्दर्भ:
1. ऋग्वेद 9.96.18 (सोम के लिए):
नवम मण्डल में सोम पवमान की स्तुति में भी इसी धातु से बना विशेषण मिलता है:
ऋषिमना य ऋषिंकृत्स्वर्षाः सहस्रणीथः पदवीः कवीनाम् ।
तृतीयं धाम महिषः सिषासञ्छ्येनो विचाकाशद् गोविद् अन्तः ॥
(यहाँ 'गोविद्' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ भी 'गौओं को जानने वाला' या 'प्राप्त करने वाला' है।)
निष्कर्ष:
ऋग्वेद की इन ऋचाओं में 'गोविन्द' शब्द उस शक्ति का परिचायक है जो अंधकार (असुर पणि) से प्रकाश (गौओं) को मुक्त कराती है। यही दार्शनिक आधार आगे चलकर श्रीकृष्ण के नाम के साथ जुड़ा, जहाँ उन्होंने इन्द्र के स्थान पर स्वयं को 'गोविन्द' के रूप में प्रतिष्ठित किया (गोवर्धन लीला के पश्चात)।
यह बहुत ही गहरा और विचारोत्तेजक विचार है। आपने अहंकार, नास्तिकता और मानसिक अशांति के बीच के अंतर्संबंध को बहुत ही सटीक रूप से रेखांकित किया है।
यहाँ आपके गद्य की व्याख्या और उसका संस्कृत छन्द में रूपांतरण प्रस्तुत है:
गद्य की व्याख्या (Explanation)
यह गद्य मानव मनोविज्ञान और आध्यात्मिक पतन की एक श्रृंखला को दर्शाता है:
- अहंकार और नास्तिकता: जब व्यक्ति के भीतर 'मैं' (अहंकार) प्रबल हो जाता है, तो वह स्वयं को ही सर्वोपरि मानने लगता है। इस स्थिति में वह किसी ईश्वरीय सत्ता या उच्चतर सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाता है।
- शान्ति और आनन्द का अभाव: नास्तिक व्यक्ति केवल भौतिक जगत को सत्य मानता है। चूँकि भौतिक वस्तुएँ नश्वर हैं, इसलिए उसे कभी स्थायी शान्ति या आत्मिक आनन्द की प्राप्ति नहीं होती।
- मरुस्थल जैसी स्थिति: जैसे मरुस्थल में हरियाली नहीं होती, वैसे ही अहंकारी का जीवन प्रेम और करुणा से रहित होकर नीरस हो जाता है।
- लोभ और पागलपन: आन्तरिक रिक्तता को भरने के लिए वह लोभ और लालच के चक्रव्यूह में फँस जाता है, जो अंततः उसे मानसिक विक्षिप्तता या अशांति की ओर धकेल देता है।
संस्कृत छन्द रूपांतरण (Verse in Sanskrit)
मैंने आपके भावों को अनुष्टुप छन्द (जो कि गीता का मुख्य छन्द है) में पद्यबद्ध किया है:
अहङ्कारप्रभावेण नास्तिको जायते नरः।
न शान्तिं न च विन्दति स आनन्दं कदाचन॥ १॥
मरुस्थलमिवासारं लोभग्रस्तेन चेतसा।
उन्मत्तः स भ्रमत्येव पाहि नः कृष्ण दुष्पथात्॥ २॥
व्याकरण एवं शब्दार्थ (Grammar & Meaning)
प्रथम श्लोक:
- अहङ्कारप्रभावेण: (अहंकार के प्रभाव से) - अहंकार + प्रभावेण (तृतीया विभक्ति, एकवचन)।
- नास्तिको जायते नरः: (मनुष्य नास्तिक हो जाता है) - 'जन' धातु, लट् लकार।
- न शान्तिं न च विन्दति: (न शान्ति प्राप्त करता है और न ही...) - 'विद्' (लाभ) धातु, लट् लकार।
- स आनन्दं कदाचन: (वह आनन्द को कभी भी [प्राप्त नहीं करता])।
द्वितीय श्लोक:
- मरुस्थलमिवासारं: (मरुस्थल की तरह सारहीन/नीरस) - मरुस्थलम् + इव + आसारम्।
- लोभग्रस्तेन चेतसा: (लोभ से ग्रस्त चित्त/मन के द्वारा) - 'चेतस्' शब्द, तृतीया विभक्ति।
- उन्मत्तः स भ्रमत्येव: (वह पागल होकर भटकता ही रहता है) - 'भ्रम्' धातु (भ्रमण करना)।
- पाहि नः कृष्ण दुष्पथात्: (हे कृष्ण! हमें कुमार्ग/बुरी प्रवृत्तियों से बचाएँ) - 'पा' (रक्षणे) धातु, लोट् लकार (आज्ञा/प्रार्थना)। 'दुष्पथात्' में अपादान कारक (पञ्चमी विभक्ति) है।
निष्कर्ष: आपकी प्रार्थना "पाहि नः कृष्ण दुष्पथात्" (हे कृष्ण, हमें बुरे मार्ग से बचाओ) वास्तव में शरणागति का भाव है, जो अहंकार को नष्ट करने की पहली सीढ़ी है।
"अहंकार की अधिकता व्यक्ति को नास्तिक बना देती है। अर्थात जन्मजन्मातरों का सञ्चित अहंकार नास्तिकता में बदल जाता है और नास्तिक व्यक्ति न तो शान्ति प्राप्त करता है। और नही आनन्द वह मरुस्थल की तरह नीरस होकर लोभ लालच और भौतिक चिन्ताओं के आगोश में आकर पागल हो जाता है। अत: हे प्रभु कृष्ण हम्हे इस प्रकार की दुष्प्रवृत्तीयों से बचाऐं !
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