योगेश्वर श्रीकृष्ण साहित्यिक एवं अभिलेखीय साक्ष्यों का एक ऐतिहासिक दर्पण
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योगेश्वर श्रीकृष्ण भारतीय सनातन संस्कृति के एक ऐसे महान व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन, दर्शन और कृतित्व समय की सीमाओं को पार करता हुआ आज भी प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। प्राचीन ग्रंथों, वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा अभिलेखों में उनके उल्लेख न केवल उनकी ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हैं, अपितु उनकी दिव्यता और सामाजिक भूमिका को भी उजागर करते हैं। इस लेख में, प्रस्तुत श्लोकों एवं प्रमाणों का गहन अध्ययन करते हुए, हम श्रीकृष्ण के जीवन, उनके मंत्र-रचना से जुड़े योगदान, साहित्यिक उल्लेखों तथा अभिलेखीय साक्ष्यों पर एक सुंदर दृष्टिपात करेंगे। यह यात्रा हमें वेदों की गहराइयों से लेकर पुराणों की कथाओं और प्राचीन शिलालेखों तक ले जाएगी, जहाँ कृष्ण यादव-गोप वंश के रूप में अवतरित होकर मानवता का मार्गदर्शन करते दिखाई देते हैं।
साहित्यिक साक्ष्य- वेदों से पुराणों तक का सफर
श्रीकृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है, जहाँ वे न केवल एक योद्धा या देवता के रूप में, अपितु मंत्रों के द्रष्टा (ऋषि) के रूप में प्रतिष्ठित हैं। ऋग्वेद में यादव ऋषि आसंग उन्हें मंत्रों का रचयिता बताते हैं। उदाहरणस्वरूप, ऋग्वेद (8/85/4) में कहा गया है:
शृणुतम्। जरितुः। हवम् । कृष्णस्य। स्तुवतः। नरा। मध्वः । सोमस्य । पीतये ।।
यहाँ कृष्ण की स्तुति में सोम रस का आह्वान किया गया है, जो उनकी आध्यात्मिक ऊँचाई को दर्शाता है। इसी प्रकार, यादव ऋषि आसंग ने स्वयं मंत्र रचे, जैसे ऋग्वेद (8/1/31) में-
आ। यत्। अश्वान् । वनन्वतः। श्रद्धया। अहम्। रथे। रुहम्। उत। वामस्य । वसुनः। चिकेतति। यः। अस्ति। याद्वः । पशुः ।।
उनकी पत्नी शाश्वती भी मंत्र-रचना में सक्रिय थीं, जैसा कि ऋग्वेद (8/1/30-34) में वर्णित है-
अनु। अस्य। स्थूरम् । ददृशे । पुरस्तात्। अनस्थः । ऊरुः। अवऽरम्बमाणः । शश्वती। नारीं। अभिऽचक्ष्य। आह। सुऽभद्रम् । अर्थ। भोजनम्। बिभर्षि।।
ये श्लोक दर्शाते हैं कि कृष्ण परिवारिक एवं आध्यात्मिक परंपरा में गहराई से जुड़े थे। ऋग्वेद (8/96/13) में उनका भौगोलिक संदर्भ भी मिलता है, जहाँ वे अंशुमती (यमुना) नदी के तट पर निवास करते बताए गए हैं-
अवं द्वप्सो अंशुमतींमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्त्रैः ।
आवततम्इंद्रः शच्या धमन्तमप स्रहिंतीनृमणां अधत्त ।।
वैदिक काल से आगे बढ़ते हुए, छान्दोग्य उपनिषद् (3/17/6) में कृष्ण को देवकी-पुत्र के रूप में पहली बार स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जहाँ उनके गुरु घोर आंगिरस का भी जिक्र है-
तद्वैतद्घोर आंङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रा- योक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रपिपद्ये ताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणस शितमसीति तत्रैते द्वेऋचै भवतः ।।
यहाँ कृष्ण को आध्यात्मिक ज्ञान के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। व्याकरण ग्रंथों में, पाणिनि की अष्टाध्यायी (4/3/98) में वासुदेव कृष्ण की पूजा का उल्लेख है-
वासुदेवाजुर्नाभ्यां वुन् ।
पतंजलि के महाभाष्य (3/1/26 एवं 3/2/113) में कृष्ण की कथाएँ लोकप्रिय बताई गई हैं-
केचित्कंसभक्त भवन्ति केचिद्वासुदेव भक्तः ।
जघान कंसं किल वासुदेव ।
इसके अतिरिक्त, महाभारत, हरिवंश पुराण तथा अन्य पुराणों में कृष्ण की कथाएँ विस्तार से वर्णित हैं, जो उनकी योद्धा, दार्शनिक एवं अवतारी भूमिका को रेखांकित करती हैं।
अभिलेखीय साक्ष्य- पत्थरों पर अंकित इतिहास
साहित्य के अलावा, अभिलेखीय प्रमाण श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता को और मजबती प्रदान करते हैं। सबसे प्राचीन विदेशी संदर्भ बोगजकोई (तुर्की) में 1400 ई.पू. का है, जहाँ उनके प्रतिद्वंद्वी इंद्र का उल्लेख है। भारत में, बेसनगर (मध्य प्रदेश) के गरुड़ स्तंभ (200 ई.पू.) में यूनानी राजदूत हेलियोडोरस द्वारा वासुदेव कृष्ण के सम्मान में स्थापित अभिलेख मिलता है, जिसमें वे स्वयं को भागवत अनुयायी बताते हैं। अभिलेख की प्रथम पंक्ति में लिखा है-
(दे) वदेवस वा (सु) देवस गरुड़ध्वजे अयं ।
मथुरा के मोराकूप अभिलेख में पंचवृष्णि वीरों (संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, साम्ब) की प्रतिमाएँ उल्लिखित हैं। नागरी (घोसुंडी, राजस्थान) के हाथीवाड़ी अभिलेख में संकर्षण-वासुदेव को अनिहत एवं सर्वेश्वर कहा गया है-
(वततिन अश्वमेघ या) जिनाभगव (द्) भ्यां संकर्षण-वासुदेवाभ्यां (अनिहताभ्यां सर्वश्वरा) भ्यां पूजा-शिला-प्राकरो नारायण-वाटिका ।
(ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख, कृष्ण दत्त वाजपेयी, पृष्ठ 103)
नानाघाट अभिलेख (सातवाहन काल) में नागनिका द्वारा कुबेर एवं वासुदेव का नमन है-
सिद्धि प्राप्त हो... धर्म का नमन, संकर्षण-वासुदेव, महिमावान् चंद्रसूर्य, चारों लोकपालों, यम-वरुण-कुबेर-वासुदेव को नमन ।
(ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख, पृष्ठ 119)
षोडास कालीन मथुरा अभिलेख में वासुदेव, विष्णु एवं श्री की प्रतिमाएँ तथा मंदिर निर्माण का जिक्र है-
शेग्रवस गोत्रस्य मूल वसुस्य भार्याएँ वसुस्य मातरे ।।
गाजीपुर के भितरी अभिलेख (स्कंदगुप्त काल) में वासुदेव प्रतिमा स्थापना का उल्लेख है-
हित इव लेभे संविधानपोदेशः ।
विचलित कुल लक्ष्मी स्तम्भनायोद्यतेन क्षितितल-श्यनीये येन नीता त्रियामा समु ।।
(ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख, पृष्ठ 179-181)
विदेशी साक्ष्यों में, मेगस्थनीज की इंडिका (400 ई.पू.) में कृष्ण को 'हेराक्लीज' कहा गया है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण का जीवन एवं गोप-यादव संदर्भ
श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में वसुदेव-देवकी के घर हुआ, किंतु कंस के भय से वे गोकुल में नंदगोप के घर पले। उनके प्रपितामह देवमीढ़ की दो पत्नियों से शूरसेन (क्षत्रिय वंश) एवं पर्जन्य (वैश्य वंश) हुए, जिससे नंदगोप कृष्ण के चाचा बने। पुराणों में विष्णु का अवतार गोप वंश में बताया गया है। पद्म पुराण (सृष्टि खंड, अध्याय 17) में-
अवतारः कुलेऽस्माकं कर्तव्यो धर्मसाधनः ।।
युष्माकं च कुले चापि देवकार्यार्थसिद्धये ।।
स्कंद पुराण (नागरखंड, उत्तर भाग, अध्याय 193) में गायत्री द्वारा गोप वंश में जन्म का वर्णन-
यत्तया कथितो वंशो ममायं गोपसंज्ञितः ।।
भागवत पुराण (10/18/11) में कृष्ण को गोप जाति में उत्पन्न कहा गया-
गोपजातिप्रतिच्छन्नौ देवा गोपालरूपिणः ।
इंडिरे कृष्णरामौ च नटा इव नटं नृप ।।
महाभारत (भीष्म पर्व, अध्याय 23) में दुर्गा को नंदगोप की पुत्री एवं कृष्ण की बहन बताया गया-
अट्टशूलप्रहरणे खड्गखेटकधारिणि ।
गोपेंद्रस्यानुजे ज्येष्ठे नंदगोपकुलोद्भवे ।।
हरिवंश पुराण (भविष्य पर्व, अध्याय 92) में यादव एवं गोप को समानार्थी माना गया-
स हि गोपा वृथा बाल्याद् धारयत्येव नाम मे । वासुदेवो जगत्यस्मिन् निर्जित्य बलिनं यदुम् ।।
शब्दकोश में 'जाति' का अर्थ वंश या समुदाय है, जो कृष्ण को गोपाल (अहीर) के रूप में स्थापित करता है। गर्ग संहिता में भी 'गोपालकृष्ण' की कथा वर्णित है।
अमर विरासत का प्रतीक-
ये सभी साक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि श्रीकृष्ण न केवल एक मिथकीय चरित्र हैं, अपितु एक ठोस ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं, जिनकी जड़ें वैदिक काल की गहराइयों में समाहित हैं। गोप-यादव वंश में उनका अवतार सामाजिक समरसता, न्याय और धर्म की रक्षा का अद्भुत संदेश देता है। यह विरासत आज भी जीवंत है, विशेषकर वर्तमान भारत में यादव वर्ग के लोगों में, जो अपने स्वभाव से अत्यंत भोले, सरल और भावुक हृदय के स्वामी हैं। उनकी यह कोमलता और विश्वास की सरलता कभी-कभी उन्हें भटकाव की ओर ले जाती है, जहाँ कोई उन्हें आसानी से प्रभावित कर दूसरे मार्ग पर ले जा सकता है। किंतु उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि वे उस महान वंश की संतान हैं, जिसने हजारों वर्षों के इतिहास में राजवंशों को जन्म दिया, योद्धाओं को उत्पन्न किया और योगेश्वर श्रीकृष्ण जैसे अवतार को धारण किया। इस गौरवशाली परंपरा पर गर्व करना उनका नैसर्गिक अधिकार है। पितृ-पितामह का वंश कभी बदला नहीं जा सकता; वह हमारी पहचान की अमर नींव है। यदि कभी ऐसा प्रतीत होता है कि परंपराएँ कमजोर पड़ रही हैं, तो यह हमारी सामूहिक जागरूकता और संरक्षण की कमी का संकेत मात्र है। श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ-कर्मयोग, भक्ति और सत्य की खोज-आज भी हमें मार्ग दिखाती हैं कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर ही हम सच्ची उन्नति और शक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यह विरासत न केवल अतीत की धरोहर है,