मन की चंचलता, ईश्वर-भक्ति और स्वाभिमान पर आधारित कव्वाली के अंदाज में यह भक्ति गीत:
मत्ला (प्रस्तावना)
देना हमको इतना मालिक, ज्ञान और धन-धान, जीवन की सार्थकत हो जाए और तेरी पहचान!
दो वक्त की रोटी मिल , चलने को स्वाभिमान।सपनों सी दुनिया में हैं ,सब आते जाते इन्सान ,
तेरा ध्यान रहे ऐ दाता, और मन पर रहे कमान !
अंतरा 1
यह जग एक मुसाफ़िरख़ाना, कोई न टिकने पाया, माटी का यह पुतला बंदे, पल भर में मुरझाया।
क्षणभंगुर इस दुनियाँ का तू कभी न करना अभिमान,
नश्वर है पहचान यहाँ की, केवल ईश्वर महान। तेरा ध्यान रहे ऐ दाता, मन पर रहे कमान!
अंतरा 2
धोखेबाज़ बड़ा यह मन है, मत करना कभी विश्वास,! लोभ लालच की दुनियाँ में होता नहीं कोई खास।
इस कारण भटक रहा मानव, कैसे होगा उद्धार। मौज मस्ती जिन्दगी सस्ती करता लेकर उधार।
काली करतूतें इनसां की, रोहि मन की ही पैदाईश हैं,
पाप जगाए अपने जेहन में पहली और आखिरी ख़्वाहिश हैं।
तेरा ध्यान रहे ऐ दाता, मन पर रहे कमान ! देना हमको इतना मालिक, ज्ञान और धन-धान, जीवन की सार्थकत हो जाए और तेरी पहचान!
अंतरा 3
महापापी इस मन को वश में , करने की तू कोई दबा दे। कदम डिगें ना कभी सफर में ! तू ऐसा दबदबा दे।
सच्चाई और नेक डगर का,दिल में उजियारा भर दे। सर्दी, बरसा और गर्मी सहले हमको ऐसा घर दे । नियम संयम जीवन में पल पल, करूँ तेरे भजनों का गान !
तेरा ध्यान रहे ऐ दाता, मेरा मन पर रहे कमान!
देना हमको इतना मालिक, ज्ञान और धन-धान, जीवन की सार्थकत हो जाए और तेरी पहचान!
दो वक्त की रोटी मिल , चलने को स्वाभिमान।सपनों सी दुनिया में हैं ,सब आते जाते इन्सान ,
तेरा ध्यान रहे ऐ दाता, और मन पर रहे कमान !
दो वक्त की रोटी मिले , चलने को स्वाभिमान।सपनों सी दुनिया में हैं ,सब आते जाते इन्सान ,
तेरा ध्यान रहे ऐ दाता, और मन पर रहे कमान !
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