शनिवार, 19 सितंबर 2026

मइया आजादपुर वाली !

इस सुंदर और दार्शनिक बंदिश के आधार पर, आइए इस भावमयी गीत को और अधिक विस्तृत और काव्यात्मक रूप में पिरोते हैं, जो राग मेघ मल्हार के गंभीर, सात्विक और करुणामयी वातावरण को जीवंत कर दे।

गीत: आजादपुर वाली मइया की जय"

राग: मेघ मल्हार

ताल: कहरवा

स्थाई (मुखड़ा)

​हे मइया आजादपुर निवासिनी,  पहाड़ीपुर तक तुम प्रकाशिनी!

काली नदी पर रम्य वसेरा।      पावन भूमि आजादुर डेरा। 

मइया मेरी तुम कल्याणिनी!        तुम पर चढ़ता लोटा पानी।...

अंतरा 1 (गंगा प्रसाद यादव और इतिहास का स्मरण)

​युग-युग से तेरी ज्योति निराली,

भक्तों की सदा  करती रखवाली।

 श्रीगंगाप्रसाद ने जब-जब टेरा,       सब भूत प्रेत का मिटा अंधेरा!

भक्त औसान ने आरति गायी।  बहुत समय तक रस्म निभाई।  

 जो तुझको शुद्धि से ध्यावे !         वो साधक सिद्धि को पावे ...

काली नदी के तट पर विचरण !  यही तेरी तपस्या का प्रांगण. 

माँ तेरी शक्ति अजब निराली।      दूर दूर से आते आते सबाली। 

कोई ज्ञानी कोई मानी ,और चले आते कोई अज्ञानी।

अंतरा 2 (वृद्धा अम्मा का वात्सल्य रूप)

श्वेत साटिका पीपल की वाटिका।                सूप थमा है एक हाथ में और दूसरे में लाटिका।

 मइया के दर आते बहुत हैं। पर पाक साफ कुछ ही आते। ईमान मान और ध्यान सदा, कुछ ही भगत जो अपनाते। 

मइया से अरदास हमारी यह दास तेरा है अज्ञानी ।    

हे मइया आजादपुर निवासिनी,  पहाड़ीपुर तक तुम प्रकाशिनी!

काली नदी पर रम्य वसेरा। पावन भूमि आजादपुर डेरा। 

मइया मेरी तुम कल्याणिनी! तुम पर चढ़ता लोटा से पानी।

...

​श्वेत वसना  भोली, ममता जिनकी मिश्री घोली।

मइया पीपल की छांव बिराजे, संख मृदंग बहु घंटा वाजे। 

अंतरा 3 (सूप और शुचिता का दार्शनिक प्रतीक)

​हाथ में सूप लिए जग त्राता ,

तुम हो पाप- ताप की घाता।

जैसे धान से भूसी को  छांटे,

वैसे ही कर्मों के बंधन काटे...

जो भी चरणों में चित्त को लाऐ,

वह सारे संकट से  तर जाए !

जिस मूर्ख ने तेरी महिमा न जानी । आँखों के सामने मिट गया अभिमानी ।  तू दुष्टों की नाशिनी।

समापन (आरतीमयी पुट)

​हे मइया आजादपुर निवासिनी,  पहाड़ीपुर तक तुम प्रकाशिनी!

काली नदी पर रम्य वसेरा।      पावन भूमि आजादुर डेरा। 

मइया मेरी तुम कल्याणिनी!        तुम पर चढ़ता लोटा पानी।...


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