रविवार, 20 सितंबर 2026

(माता की आरती)

कव्वाली: "दर-ए-मइया पे झुकता है ज़माना"

स्थाई (टेर)

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !

भाव हृदय में श्रद्धा के हैं, हम नहीं कोई गबइया।

तुम हो सच्ची तुम हो अच्छी, मझधार से तुम्हीं खिबैया। 

भवसागर का ओर-छोर नहीं है मोह के भंवरो में नइया।  

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !

अन्तरा: (१)

जिसने खुद को किया हवाले । मइया उसको फिर तू ही सम्हाले। इस दुनियाँ के ढंग अजब निराले। दुनियाँ में वे ही लोग आले।  जिनके कारनामें हैं काले। ईमान बिके, इंसान बिके,सब  बिकें भैंस और गइया !

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !भाव हृदय में श्रद्धा के हैं हम नहीं कोई गबइया।

अन्तरा (२-) 

काली नदी के तीर अहीरों की एक छोटी बस्ती।गाय भैंस का पालन करते चलाते अपनी गृहस्थी। मइया में आस्था जिनकी ये उनकी लाज रखबइया।    

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !भाव हृदय में श्रद्धा के हैं हम नहीं कोई गबइया।

अन्तरा-(३)-ये जीवन है एक गाड़ी। मन की स्टेरिंग वारी! ड्राइवर बुद्धि का अनाड़ी। ओर ये चौराहे पर ठाड़ी। इन्द्रियों के हैं पइया। अब नहीं कोई चलबइया।

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !भाव हृदय में श्रद्धा के हैं हम नहीं कोई गबइया।

बड़ी रीति दुँनियाँ की उल्टी!  अब ईमान नहीं है कोई । इन्सान आज भगवान बना है। जाकी शर्म लाज गयी  खोई। जो घने कुकर्म करता जीवन में वाको नाय रोहि वचबइया 

हम तुम्हें स्मरण करते हैं आजादपुर वाली मइया !

भाव हृदय में श्रद्धा के हैं, हम नहीं कोई गबइया।


जयकारा: जोर से बोलो! आजादपुर वाली मइया की जय! 

नोट: इस कव्वाली को हल्के ढोलक और हारमोनियम की धुन पर तानते हुए गाया जाए, तो इसका आनंद और भी बढ़ जाता है।


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