शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

कब्बाली


खून से लथपथ है  माटी, इन्सानियत गयी भार में!

राजनीति की चाल देखो, आज धर्म के बाजार में,

सत्य और न्याय, बिक गए हैं हुकूमती दरबार में !

​(मुख्य गायक - पहली कड़ी)

हुस्न को देखकर जब मन उनका मचल गया !

तिश्नगी की आग में ईमान उनका जल गया।

उन हवशियों की उसके जिस्म पर निगाह थी,

वह कोई बेकसूर सायद बेपनाह थी!

दूर तलक नहीं था उसका कोई रखवाला,

एक चीख और बेबसी वहाँ पर गवाह थी।

इस दरिंदगी की आग में उसको जला डाला,

दोबारा उठने की फिर उसको न चाह थी।

एक नज़्म बनकर मुख से निकल पड़ी रोहि,

वह कोई कविता नहीं, बस दिल की आह थी!

आदमी कमवक्त दरिन्दा और दरीद है।         वासना का पुजारी , हबश का मुरीद है।

इसे पता है कि पतंगा जल गया लौ पर ।       उसके जल जाने का ये खुद चश्मदीद है। कौन बच पाया इस दहकते अंगार में  

​(कोरस - गूँजती हुई आवाज़ में)

कहाँ गया वो चैन देश का , कमी हई सद-व्यवहार में ?

खून से लथपथ है  माटी, इन्सानियत गयी भार में!

​(मुख्य गायक - दूसरी कड़ी, तेज़ और व्यंग्यात्मक लय में)

जात-पात के पाश में, उलझी हुई है सियासत,

हुक्मरानों को फिकर है, काबिज रहे रियासत।

राम नाम पर राजनीति है, सरकार इसी बल जीती है,

अंध भक्तों की भीड़ में घोषणाएँ अब रीती हैं।

मन्दिरों और मस्जिदों के नाम पर संग्राम है,

भीड़ बेहिसाब है,  रोड हर जगह जाम है।

देख लो ऐ हुक्मरानों! ये कैसा इंतज़ाम है ?

बेरोजगारी भी हर तरफ, मंहगाई भी बेलगाम है।

कथनी-करनी में भेद बहुत, ईमान अब नीलाम है! शौहरतें वह खरीदता है जिसके पास दाम हैं। अय्याशीयाँ मिल जाती हैं उसको उपहार में  

​(कोरस - संबल देते हुए)

राजनीति की चाल देखो, धर्म के बाजार में,

सत्य और न्याय दोनों, बिक गए हैं दरबार में!

​(मुख्य गायक - तीसरी कड़ी, शायरी अंदाज़ में)

कलम की धार कुंद है, कानून की आँखें अंधी हैं,

सच्चाई के पाँव में बेड़ियाँ, दौलत की राह में बंधी हैं।

तानाशाह के हुक्म पर चलती है यहाँ सरकार,

न्याय की चौखट पे बैठा कोई अंधा पहरेदार।

कागज के टुकड़ों पे इंसानों को तोलते हैं,

हम राम राज्य लाये हैं, वे ऐसा बोलते हैं!

​(कोरस - द्रुत गति और ताल के साथ)

कहाँ गया वो चैन देश का , कमी हई सद-व्यवहार में ?

खून से लथपथ है  माटी, इन्सानियत गयी भार में

​(अंतिम बंध - चेतावनी भरे और मार्मिक स्वर में)

छोड़ दो यह द्वेष, दौलत छोड़ो हराम की ,

सत्य की राह पर, झाँडियाँ किस काम की?

हिन्दू हो या मुसलमान, धरती हर अवाम की,

गन्दी राजनीति मत करो, हिन्दुत्व और राम की!

प्रेम से सींचो इसे, वरना बिगड़ेंगे हालात,

देश में दंगे भड़क जाएँगे, नंगे करेंगे घात।

केस मुकदमे चलते रहेंगे, पहुँचेंगे हवालात,

दुनियाँ में बिगड़ जाएगी मेरे देश की बात!

​(समापन - कोरस और मुख्य गायक एक साथ)

सम्मान महिलाओं को दो सदा, यह ईश्वरीय इबादत है,

इंसानियत को बचाना ही, सबसे बड़ी विशारत है...

इन्सानियत जिन्दा रहेगी सादगी और प्यार में 

क्यों  खून से लथपथ है  माटी, इन्सानियत गयी भार में!

राजनीति की चाल देखो, आज धर्म के बाजार में,

सत्य और न्याय, बिक गए हैं हुकूमती दरबार में !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें